Muzaffar Hussain v. State of Uttar Pradesh and Others

Supreme Court of India · 06 May 2022
Nanjay Y. Chandrachud; Bela M. Vitravedi
Civil Appeal No. 3613 of 2022 (SLP (C) No. 21948 of 2019)
administrative appeal_dismissed Significant

AI Summary

The Supreme Court upheld disciplinary action against a judicial officer for misconduct in awarding excessive compensation, affirming the high standards of integrity required from judges and the propriety of the penalty imposed.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
भार ीय सव च्च न्यायालय क
े समक्ष
सिसविवल अपीलीय क्षेत्राति कार
सिसविवल याति का सं - 3613/2022
(एसएलपी (सी) संख्या- 21948/2019 से उत्पन्न)
मुजफ्फर हुसैन ...अपीलार्थी7 (गण)
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य ...प्रत्यर्थी7 (गण)
विन ण@ य
न्याय मूर्ति बेला एम. वित्रवेदी,
JUDGMENT

1. व @मान त्काल अपील में अपीलार्थी7 द्वारा रिरट याति का संख्या 496/2017 में अपीलार्थी7 एक न्यातियक अति कारी क े रूप में काय@ कर े हुए कथिर्थी कदा ार क े लिलए अपीलार्थी7 क े विवरूद्घ जारी अनुशासनात्मक काय@वाही क े सम्बन् मे जाॅं अति कारी द्वारा प्रस् ु रिरपोट@ क े आ ार पर उच्च् न्यायालय की फ ु ल काेट@ क े विनण@य क े अनुसरण में राज्य प्रत्यर्थी7 द्वारा दी गयी सजा को ुनौ ी दे े हुए इलाहाबाद उच्च् न्यायालय की लखनउ खण्ड पीठ क े आदेश विदनांविक 17.04.2019 को ुनौ ी दे ा है vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

2. थ्यात्मक आ ार

I. अपीलक ा@ वर्ष@ 1978 में उत्तर प्रदेश न्यातियक सेवा में शाविमल हुआ र्थीा और उसने सिस ंबर 2003 में उक्त सेवाओं से स्वैच्छि`aक सेवाविनवृलित्त मांगी र्थीी। सेवाविनवृलित्त क े ुरं बाद अपीलक ा@ प्रशासविनक -न्यायाति करण मुंबई पीठ, मुंबई में न्यातियक सदस्य क े रूप में शाविमल हो गया। 19 जुलाई, 2005 को अपीलक ा@ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े ओ. एस. डी. (जां ) क े विदनांक 19.07.2005 क े पत्र द्वारा सूति विकया गया र्थीा, जो क ै ट, नई विदल्ली क े प्र ान रसिजस्ट्रार को संबोति र्थीा विक उच्च न्यायालय क े द्वारा उनक े लिखलाफ विवभागीय जां शुरू की र्थीी, सिजसकी संख्या 26/2005 र्थीी। सिजसक े सार्थी आरोप पत्र की एक प्रति संलग्न की गई र्थीी। कथिर्थी आरोप-पत्र में अपीलक ा@ क े लिखलाफ बारह आरोप लगाए गए र्थीे. याति का क े लिखलाफ अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी यह आरोप अपीलक ा@ क े विवरूद्घ लगाया गया र्थीा विक अपीलक ा@ ने 23.05.2001 से 19.05.2003 की अवति क े दौरान आगरा क े 11 वें अति रिरक्त सिजला न्याया ीश क े रूप में ैना रह े हुए भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 क े ह मामलों क े एक समूह का फ ै सला विकया र्थीा और अति ग्रविह भूविम क े बाद क े खरीदारों द्वारा विकए गए विनवेश से कई गुना अति क मुआवजा अति विनण[7] विकया र्थीा विक ऐसे बाद क े खरीदारों को अति ग्रविह भूविम क े लिलए मुआवजे का दावा करने का कोई अति कार नहीं र्थीा विक अपीलक ा@ ने गज क े रूप में मुआवजा विन ा@रिर विकया र्थीा, न विक बीघा क े रूप में, और कानून और इच्छिnवटी क े मूलभू सिसद्धां ों क े घोर उल्लंघन क े ह मुआवजा अति विनण[7] विकया र्थीा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk और ऐसे बाद क े खरीदारों क े पक्ष में अनुति रूप से विव ार कर े हुए सभी न्यातियक मानदंडों और स्वाविमत्व क े लिखलाफ ऐसा मुआवजा अति विनण[7] विकया र्थीा। इसलिलए यह आरोप लगाया गया विक अपीलक ा@ पूण@ सत्यविनष्ठा और क @व्य क े प्रति पूण@ समप@ण बनाए रखने में विवफल रहा र्थीा, और इस प्रकार उसने उत्तर प्रदेश सरकारी कम@ ारी आ रण विनयम, 1956 क े विनयम-3 क े अर्थी@ में एक कदा ार विकया र्थीा.अपीलक ा@ क े लिखलाफ लगाए गए आरोप संख्या 12 श्री क े सी जैन नामक एक अति वक्ता क े बेटे क े पक्ष में मुआवजे में अत्यति क वृतिद्ध करक े उस पर अनुति रूप से एहसान करने से संबंति र्थीे। ii. -अपीलक ा@ ने विदनांक 07.09.2005 और 19.09.2005 क े पत्रों क े माध्यम से अपने लिखलाफ लगाए गए सभी आरोपों से इनकार विकया। विदनांक 20.01.2006 को अपीलक ा@ को विवभाग की ओर से उसक े विवरुद्ध शुरू की गई विवभागीय जाँ में प्रस् ु लिललिख विनवेदन प्राप्त हुए और अपीलार्थी7 ने उक्त जाँ में विदनांक 10.02.2006 को अपना लिललिख विनवेदन भी प्रस् ु विकया। iii -जां अति कारी ने अपनी जां रिरपोट@ विदनांक 05.04.2006 क े ह आरोप सं. 1 से 11 क "सिसद्ध" क े रूप में और आरोप सख्यां 12 "सिसद्ध नहीं" क े रूप में प्रस् ु विकया। जां अति कारी ने सजा की मात्रा क े प्रश्न पर आगे विव ार करने क े लिलए उक्त रिरपोट@ मुख्य न्याया ीश /प्रशासविनक सविमति /पूण@ vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk न्यायालय को प्रस् ु की। अपीलक ा@ को बुलाया गया और उसने कथिर्थी पूa ाa रिरपोट@ पर 14.06.2006 को अपना जवाब दालिखल विकया.जां अति कारी ने अपनी जां रिरपोट@ विदनांक 05.04.2006 क े ह आरोप सं. 1 से 11 क "सिसद्ध" क े रूप में और आरोप संख्या 12 "सिसद्ध नहीं" क े रूप में प्रस् ु विकया। जां अति कारी ने सजा की मात्रा क े प्रश्न पर आगे विव ार करने क े लिलए उक्त रिरपोट@ मुख्य न्याया ीश /प्रशासविनक सविमति /पूण@ न्यायालय को प्रस् ु की।उच्च न्यायालय क े फ ु ल न्यायालय द्वारा की गई उक्त सिसफारिरश क े अनुसरण में, प्रत्यर्थी7 राज्य ने सिसविवल सेवा विवविनयमों क े अनु`aेद 351 (ए) में विनविह प्राव ानों को ध्यान में रख े हुए, अपीलक ा@ की पेंशन से 90% को रोकने की मंजूरी दे े हुए 22 जनवरी, 2007 को एक आदेश पारिर विकया। iv. असं ुष्ट अपीलक ा@ ने इलाहाबाद उच्च् न्यायालय की लखनऊ पीठ, लखनऊ क े समक्ष एक रिरट दायर करक े 22 जनवरी, 2007 क े कथिर्थी आदेश की वै ा को ुनौ ी दी। उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने 17 अप्रैल, 2019 क े आक्षेविप आदेश क े माध्यम से पाया विक आरोप संख्या 1 से 3 क े संदभ@ में दंड का आदेश कानून की नजर में विटकाऊ नहीं र्थीा nयोंविक प्रति वादी उन घटनाओं क े लिलए आरोप य नहीं कर सक े र्थीे जो आरोप पत्र से 4 साल पहले हुई र्थीीं। र्थीाविप, उच्च न्यायालय ने अथिभविन ा@रिर विकया विक आरोप संख्या 4 से 11 क े संदभ@ में दज@ विनष्कर्ष• में हस् क्षेप करने का कोई आ ार नहीं है.उच्च न्यायालय ने समग्र परिरच्छिस्र्थीति यों को ध्यान में रख े हुए पेंशन लाभों की कटौ ी को 90 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk प्रति श क े स्र्थीान पर 70 प्रति श क कम कर विदया। व @मान अपील उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आदेश क े लिखलाफ विनद€थिश है।

3. विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री प्रदीप कां ने अपीलक ा@ क े लिलए विनम्नलिललिख क @ प्रस् ु विकएः I -अपीलक ा@ क े लिखलाफ जां आगरा विवकास प्राति करण, आगरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 1 में उच्च न्यायालय द्वारा जारी विनद€शों क े आ ार पर शुरू की गई र्थीी, हालांविक अपीलक ा@ क े लिखलाफ कोई थिशकाय लंविब नहीं र्थीी। ii -आरोप-पत्र में अपीलक ा@ क े लिखलाफ लगाए गए आरोपों क े क े वल अवलोकन से प ा ला विक आरोप कदा ार का प्रर्थीमदृष्टया मामला भी नहीं र्थीा और वे न ो थ्यात्मक रूप से और न ही कानूनी रूप से पोर्षणीय र्थीे। iii -मुआवजा मांगने का अति कार क े वल मुकदमा करने का अति कार नहीं बच्छिƒक एक संपलित्त का अति कार है और इसे कानूनी रूप से एक व्यविक्त से दूसरे व्यविक्त को हस् ां रिर विकया जा सक ा है जैसा विक उच्च म न्यायालय और उच्च न्यायालय क े विनण@यों में विनविह है। इस संबं में, उन्होंने भार संघ और अन्य बनाम इकबाल सिंसह 2 2, खोरशेद शापूर ेनाई, श्रीम ी बनाम असिसस्टेंट क ं ट्रोलर vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk ऑफ एस्टेट ड्यूटी 3 3, भार ीय खाद्य विनगम बनाम क ै लाश ंद[4] 4 और अन्य सिंसह बनाम कलेnटर और अन्य 5 में अवलंब लिलया। iv -अपीलक ा@ द्वारा भूविम अति ग्रहण अति विनयम की ारा 4(1) क े ह अति सू ना जारी होने की ति थिर्थी को भूविम क े बाजार मूƒय पर मुआवजा विदया गया र्थीा। अति ग्रही भूविम क े संबं में बाद क े खरीदारों द्वारा विदए गए मूƒय या विनवेश क े लिलए इसकी कोई प्रासंविगक ा नहीं र्थीी। इस संबं में प्रदीप कां ने उत्तर प्रदेश जल विनगम, लखनऊ बनाम कालरा प्रॉपट7ज (पी) लिलविमटेड, लखनऊ और अन्य 6 6 मीरा साहनी बनाम विदल्ली क े उपराज्यपाल[7] आविद पर अवलंब लिलया। v. कई मामलों में, सिजनमें अपीलक ा@ द्वारा बढ़ा हुआ मुआवजा अति विनण[7] विकया गया र्थीा, उच्च न्यायालय द्वारा और क ु a मामलों में उच्च म न्यायालय द्वारा बरकरार रखा गया र्थीा और इसलिलए यह नहीं कहा जा सक ा र्थीा विक अपीलक ा@ कथिर्थी रूप से बाहरी लाभ से वि‰याच्छिन्व र्थीा।

4 2014 (1) ADJ 379 (BD) vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk vi. अपीलक ा@ क े लिखलाफ कोई विवथिशष्ट आरोप नहीं र्थीा विक उसने रिरश्व ली र्थीी या विकसी व्यविक्त या व्यविक्तयों क े समूह क े प्रति कोई अनुति अनुग्रह विदखाया र्थीा.इसलिलए, क े वल इसलिलए विक बढ़ा हुआ मुआवजा विदया गया र्थीा, बाहरी विव ार का कोई विनष्कर्ष@ नहीं विनकाला जा सक ा र्थीा.क े वल संदेह यह साविब करने क े लिलए पया@प्त नहीं र्थीा विक अपीलक ा@ ने बाहरी लाभ क े कारण ऐसा विकया र्थीा। इस संबं में श्री प्रदीप कां ने क ृ ष्ण प्रसाद वमा@ (मृ ) बनाम विबहार राज्य और अन्य[8] क े मामले में, सा ना ौ री बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 9 क े मामले में और अभय जैन बनाम राजस्र्थीान उच्च न्यायालय और अन्य 10 10 क े मामले में उच्च म न्यायालय क े नवीन म विनण@य पर अवलंब लिलया है।

7. अपीलक ा@ को विकसी गंभीर कदा ार का दोर्षी न ठहराए जाने या कोई हाविन कारिर न विकए जाने क े कारण उसे 'गंभीर कदा ार' क े लिलए दंड नहीं विदया जा सक ा र्थीा। 4 सुश्री ारु अंवानी, प्रति वादी संख्या 2 की ओर से उपच्छिस्र्थी विवद्व अति वक्ता ने विनम्नलिललिख क @ प्रस् ु विकएः (i) अनुशासविनक काय@वाविहयों क े मामले में उच्च न्यायालय का अपने न्यातियक अति कारिरयों पर पूण@ विनयंत्रण है। इस मामले में विनयविम अनुशासनात्मक जां करने और कानून की उति प्रवि‰या का पालन करने क े बाद जां अति कारी ने

Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk उच्च न्यायालय क े समक्ष अपनी रिरपोट@ प्रस् ु की र्थीी। इसे फ ु ल कोट@ क े समक्ष रखा गया और उच्च न्यायालय की सामूविहक राय इस बा पर विव ार कर े हुए डगमगा गई विक न्यातियक अति कारी क े रूप में काम कर े हुए अपीलक ा@ ने अपने पद का दुरूप्रयोग विकया र्थीा। (ii) न्यातियक समीक्षा का दायरा बहु सीविम है। स्र्थीाविप कानूनी च्छिस्र्थीति क े अनुसार, न्यायालय अनुशासनात्मक प्राति कारी द्वारा लिलए गए विनण@य क े लिखलाफ अपील नहीं कर सक े और जब क प्रवि‰या में कोई विवक ृ ति या पेटेंट अवै ा या अ ार्किकक ा नहीं पाई जा ी ब क अपने विनष्कर्ष• को प्रति स्र्थीाविप नहीं कर सक े। न्यातियक समीक्षा, विनण@य क े लिखलाफ नहीं बच्छिƒक विनण@य लेने की प्रवि‰या क े लिखलाफ है। इस संबं में, उन्होंने सव@पल्ली रमैया (डी) टीआर एलआरएस बनाम सिजला कलेnटर ति त्तूर11 में इस न्यायालय क े विनण@य पर अवलंब लिलया है। (iii) अपीलक ा@ को उसक े विवरुद्ध की गई जां की काय@वाही क े दौरान पूण@ और विनष्पक्ष अवसर विदया गया र्थीा और उच्च न्यायालय क े पूण@ न्यायालय द्वारा अथिभलेख पर पूरी सामग्री पर विव ार करने क े बाद विनण@य लिलया गया र्थीा। अति रोविप दंड अपीलक ा@ क े अपरा क े अनुपा में भी र्थीा. iv न्यायालय को जां अति कारी द्वारा अथिभलिललिख साक्ष्य पर ले जा े हुए, उसने प्रस् ु विकया विक अपीलक ा@ ने बाद क े खरीदारों को अनुति लाभ पहु ाने क े लिलए पक्षपा आदेश क े द्वारा मुआवजा को कई गुना बढ़ा विदया र्थीा, vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk सिजन्हें मुआवजा प्राप्त आदेश का कोई अति कार नहीं र्थीा। उसने यह भी प्रस् ु विकया विक दावेदार जो बाद में खरीदार र्थीे क े द्वारा बहु कम विनवेश विकया र्थीा और मुआवजा प्राप्त करने का अति कार और मूल मालिलकों क े स्र्थीान पर मुकदमा करने का अति कार खरीदा र्थीा, जो भूविम अति ग्रहण अति विनयम क े प्राव ानों क े सार्थी पविठ संपलित्त हस् ां रण अति विनयम की ारा 6 (ई) क े ह पूरी रह से प्रति बंति र्थीा। (v) अं में, उन्होंने हमारा ध्यान इस न्यायालय की विनम्नलिललिख विटप्पथिणयों की ओर आकर्किर्ष विकया सिजसमें भार संघ बनाम क े. क े. वन 12 12 क े मामले में, सिजसमें यह अथिभविन ा@रिर विकया गया है विक न्यातियक अति कारी, यविद लापरवाही से या असाव ानी से काय@ कर ा है या विकसी व्यविक्त को अनुति लाभ पहुं ाने का प्रयास कर ा है या कोई ऐसा विनण@य ले ा है जो भ्रष्ट उद्देश्य से विकया गया है, ो वह न्याया ीश क े रूप में काय@ नहीं कर रहा है। साक्ष्य क े कठोर विनयम विवभागीय जां पर लागू नहीं हो े हैं।

5. शुरुआ में, यह नोट विकया जा सक ा है विक न्यातियक अति कारिरयों क े उच्च स् र क े आ रण और रिरत्र को बनाए रखना इस न्यायालय क े लिलए हमेशा से बहु चिं ा का विवर्षय रहा है। सी. रविव ंद्रन अन्य न्यायमूर्ति ए. एम. भट्टा ाज[7] और अन्य13 क े मामले में, इस न्यायालय ने न्याया ीशों द्वारा ईमानदारी, vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अखंड ा और नैति क शविक्त क े उच्च मानकों को बनाए रखने की आवश्यक ा पर बल दे े हुए कहाः न्यातियक काया@लय अविनवाय@ रूप से एक साव@जविनक विवश्वास का स्र्थीान है। अ ः समाज को इसक े सिसवाय और कोई अति कार नहीं है विक न्याया ीश एक उच्च विनष्ठा, ईमानदारी वाला व्यविक्त हो और उसक े पास नैति क शविक्त, नैति क दृढ़ ा और भ्रष्ट या हाविनकारक प्रभावों क े प्रति अभेद्य हो। उससे अपेक्षा की जा ी है विक वह न्यातियक आ रण में औति त्य क े सवा@ति क कठोर मानकों को बनाए रखे। कोई भी ऐसा आ रण जो न्यायालय की अखंड ा और विनष्पक्ष ा में जन ा क े विवश्वास को कम कर ा है ो एेसा आ रण न्यातियक प्रवि‰या की प्रभावकारिर ा क े लिलए हाविनकारक होगा। इसलिलए समाज विकसी न्याया ीश से आ रण और ईमानदारी क े उच्च मानकों की अपेक्षा कर ा है। अलिललिख आ ार संविह ा न्यातियक अति कारिरयों क े लिलए स्पष्ट रूप से स्पष्ट है विक वे उच्च न्यातियक पदाति कारी से अपेतिक्ष उच्च नैति क या नैति क मानकों का अनुसरण करें और उन्हें आ रण क े पूण@ मानक क े रूप में आत्मसा करें, सिजससे जन ा का विवश्वास पैदा होगा, न्यातियक काया@लय की गरिरमा बढ़ेगी और न क े वल न्याया ीश बच्छिƒक न्यायालय की भी aविव बेह र होगी। अ ः यह एक vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk आ ारभू अपेक्षा है विक न्याया ीश का शासकीय और व्यविक्तग आ रण अनौति त्य से मुक्त होना ाविहए और यह औति त्य और सत्यविनष्ठा क े उच्च म मानक क े अनुरूप होना ाविहए। आ रण का मानक आम आदमी से अपेक्षा से ऊ ं ा है और अति वक्ता की अपेक्षा से भी ऊ ं ा है। वास् व में, यहां क विक उनका विनजी जीवन भी ईमानदारी और औति त्य क े उच्च मानकों का पालन करना ाविहए, जो दूसरों को स्वीकाय@ माने जाने वाले मानकों से ऊ ं े हों।इसलिलए, न्याया ीश समाज में विगर े स् र का सहारा लेने का जोलिखम नहीं उठा सक ा। 6 सा ना ौ री बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 14 14 में इस न्यायालय ने दोहराया विक न्यातियक अति कारिरयों को ईमानदारी, अखंड ा और सत्यविनष्ठा क े उच्च मानकों की आकांक्षा करनी ाविहए और उनका पालन करना ाविहए।

“ 19 इस न्यायालय द्वारा इस बा को दोहराया गया है विक न्यातियक अति कारिरयों को ईमानदारी, सत्यविनष्ठा और सत्यविनष्ठा के एक उच्च मानक की आकांक्षा करनी ाविहए और उसका पालन करना ाविहए। हाल ही में श्रीरंग यादवराव वाघमारे बनाम महाराष्ट्र राज्य [श्रीरंग यादवराव वाघमारे बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019) 9 एससीसी 144: (2019) 2 एससीसी (एल एं ड एस) 582] में, इस अदाल की एक खंडपीठ ने इन सिसद्धां ों को बहु ही संतिक्षप्त रूप से समाविह विकया है और दोहराया विक : (एससीसी पीपी। 146-47, पैरा 5-10)
vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk ‘5 एक न्याया ीश में आवश्यक पहला और सबसे महत्वपूण@ गुण सत्यविनष्ठा है। न्यायपालिलका में ईमानदारी की आवश्यक ा अन्य संस्र्थीानों की ुलना में बहु अति क है। न्यायपालिलका एक ऐसी संस्र्थीा है सिजसकी नींव ईमानदारी और अखंड ा पर आ ारिर है।इसलिलए यह आवश्यक है विक न्यातियक अति कारिरयों में ईमानदारी की उत्कृ ष्ट गुणवत्ता होनी ाविहए। इस न्यायालय ने ारक सिंसह बनाम ज्योति बसु [ ारक सिंसह बनाम ज्योति बसु, (2005) 1 एससीसी 201] में विनम्नलिललिख रूप में अथिभविन ा@रिर विकयाः(एस. सी. सी. पृष्ठ 203) 'ईमानदारी दूसरों क े अलावा न्यातियक अनुशासन की पह ान है। अब समय आ गया है विक न्यायपालिलका इस बा का पूरा ध्यान रखे विक न्याय का मंविदर अंदर से न टूटे, सिजससे न्याय प्रदान करने की प्रणाली में बाही म ेगी और इस प्रणाली में जन ा का विवश्वास खत्म हो जाएगा।यह याद रखना ाविहए विक बाहर क े ूफान की ुलना में अंदर क े कठफोड़वे एक बड़ा ख रा हैं।
6. न्याया ीश का व्यवहार न्यायालय क े भी र और बाहर दोनों जगह कठोर मानक का होना ाविहए। इस न्यायालय ने दया शंकर बनाम इलाहाबाद उच्च न्यायालय [दया शंकर बनाम इलाहाबाद उच्च न्यायालय, (1987) 3 एससीसी 1:1987 एससीसी (एल एंड एस) 132] में इस प्रकार अथिभविन ा@रिर विकयाः (एससीसी पृष्ठ 4-5, पैरा 11) vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk 11 - न्यातियक अति कारिरयों क े दो मानक नहीं हो सक े, एक न्यायालय में और दूसरा न्यायालय क े बाहर। उनक े पास इंसाफ, ईमानदारी और सत्यविनष्ठा का क े वल एक ही मानक होना ाविहए। वे सिजस पद पर काविबज हैं, उसमें वे अनुति रूप से काय@ नहीं कर सक े। 7 न्याया ीश लोक सेवक भी हो े हैं। एक न्याया ीश को हमेशा यह याद रखना ाविहए विक वह जन ा की सेवा करने क े लिलए है। एक न्याया ीश का विनण@य न क े वल उसक े विनण@यों की गुणवत्ता से बच्छिƒक उसक े रिरत्र की गुणवत्ता और शुद्ध ा से भी विकया जा ा है। एक े साव@जविनक और व्यविक्तग जीवन दोनों में त्रुविटहीन ईमानदारी परिरलतिक्ष होनी ाविहए। एैसा व्यविक्त जो दूसरों क े लिलए विनण@य दे ा है उसे इमानदार होना ाविहए। यह उच्च मानक है सिजसकी न्याया ीशों से अपेक्षा की जा ी है।
8. न्याया ीशों को यह याद रखना ाविहए विक वे क े वल कम@ ारी नहीं हैं बच्छिƒक उच्च साव@जविनक पद पर हैं। आरसी ंदेल बनाम एमपी क े उच्च न्यायालय में [आरसी ंदेल बनाम एमपी क े उच्च न्यायालय, (2012) 8 एससीसी 58: (2012) 2 एससीसी (सीआईवी) 343: (2012) 3 एससीसी (सीआरआई) 782: (2012) 2 scc (l&s) 469], इस अदाल ने माना विक एक न्याया ीश से अपेतिक्ष आ रण का मानक एक सामान्य व्यविक्त की ुलना में बहु अति क हैइस न्यायालय की विनम्नलिललिख विटप्पथिणयां प्रासंविगक हैंः(एससीसी पृष्ठ 70, पैरा 29) vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk 29 - न्यातियक सेवा कोई सा ारण सरकारी सेवा नहीं है और न्याया ीश ऐसे कम@ ारी नहीं हैं। न्याया ीश साव@जविनक पद ारण कर े हैं; उनका काय@ राज्य क े आवश्यक काय• में से एक है। अपने काय• और क @व्यों क े विनव@हन में, न्याया ीश राज्य का प्रति विनति त्व कर े हैं। न्याया ीश का पद लोक विवश्वास का पद हो ा है। एक न्याया ीश को बेदाग सत्यविनष्ठा और विनर्किववाद स्व ंत्र ा वाला व्यविक्त होना ाविहए।उसे उच्च नैति क मूƒयों क े सार्थी मूल रूप से ईमानदार होना ाविहए। जब कोई वादकारी न्यायालय कक्ष में प्रवेश कर ा है ो उसे यह सुविनति¤ महसूस करना ाविहए विक सिजस न्याया ीश क े समक्ष उसका मामला आया है, वह विनष्पक्ष रूप से और विबना विकसी विव ार क े न्याय प्रदान करेगा। न्याया ीश से अपेतिक्ष आ रण का स् र एक सा ारण व्यविक्त की ुलना में बहु ऊ ं ा है।यह कोई बहाना नहीं है विक ूंविक समाज में मानदंड विगर गए हैं, इसलिलए समाज से लिलए गए न्याया ीशों से यह अपेक्षा नहीं की जा सक ी विक वे न्याया ीश से अपेतिक्ष उच्च मानदंड और नैति क दृढ़ ा रखें। एक न्याया ीश, सीजर की पत्नी की रह, संदेह से परे होना ाविहए। न्यातियक प्रणाली की विवश्वसनीय ा उन न्याया ीशों पर विनभ@र कर ी है जो इसे बना े हैं। लोक ंत्र को फलने-फ ू लने और कानून क े शासन को बनाए रखने क े लिलए न्याय प्रणाली और न्यातियक प्रवि‰या को मजबू होना ाविहए और vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk प्रत्येक न्याया ीश को ईमानदारी, विनष्पक्ष ा और बौतिद्धक ईमानदारी क े सार्थी अपने न्यातियक क @व्यों का विनव@हन करना ाविहए। 9 इसमें कोई संदेह नहीं हो सक ा विक विकसी न्याया ीश को मामले का विवविन¤य क े वल अथिभलेख पर थ्यों और मामले पर लागू विवति क े आ ार पर करना ाविहए।यविद कोई न्याया ीश विकसी बाहरी कारण से विकसी मामले का विनण@य कर ा है ो वह कानून क े अनुसार अपने क @व्य का विनव@हन नहीं कर रहा है।
10. हमारे विव ार में 'सं ुविष्ट' शब्द का अर्थी@ क े वल मौविद्रक सं ुविष्ट नहीं है।वग7करण विवथिभन्न प्रकार क े हो सक े हैं।यह न की सं ुविष्ट, शविक्त की सं ुविष्ट, वासना की सं ुविष्ट आविद हो सक ी है।”

7. यह भी उल्लेखनीय है विक जब न्यातियक या अ @-न्यातियक शविक्तयों का प्रयोग करने वाले अति कारी क े विवरुद्ध अनुशासविनक कार@वाई की जा सक ी है ो इस न्यायालय द्वारा भार संघ बनाम क े. क े. वन (पूव क्त) वाले मामले में भी संक्षेप में यह अति कथिर्थी विकया गया हैः - “28-इसलिलए, विनति¤ रूप से, वह अति कारी जो न्यातियक या अ @- न्यातियक शविक्तयों का प्रयोग, विकसी व्यविक्त पर अनुति अनुग्रह प्रदान करने क े लिलए लापरवाही या असाव ानी से काय@ कर ा है, वह े रूप में काय@ नहीं कर रहा है। दनुसार, प्रति वादी क े vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk क @ को अस्वीकार विकया जाना ाविहए। यह ध्यान रखना महत्वपूण@ है विक व @मान मामले में, हम प्रति वादी क े विनण@य की शुद्ध ा या वै ा से चिं ति नहीं हैं, बच्छिƒक एक अति कारी क े रूप में अपने क @व्यों क े विनव@हन में प्रति वादी क े आ रण से चिं ति हैं. नौ आकलनों क े संदभ@ में आदेशों की वै ा पर अति विनयम क े ह अपील या पुनरीक्षण में सवाल उठाया जा सक ा है, लेविकन हमारे मन में कोई संदेह नहीं है विक सरकार को आ रण विनयमों क े उल्लंघन क े लिलए अनुशासनात्मक कार@वाई करने से रोका नहीं गया है। इस प्रकार, हम इस विनष्कर्ष@ पर पहुं े हैं विक विनम्नलिललिख मामलों में अनुशासनात्मक कार@वाई की जा सक ी हैः (i) जहां अति कारी ने इस रह से काम विकया हो सिजससे ईमानदारी या सद्भावना या क @व्य क े प्रति समप@ण क े लिलए उसकी प्रति ष्ठा परिरलतिक्ष हो ी हो (ii) यविद अपने क @व्य क े विनव@हन में लापरवाही या कदा ार विदखाने क े लिलए प्रर्थीमदृष्टया सबू है (iii) यविद उसने इस रह से काम विकया है जो एक सरकारी कम@ ारी क े लिलए अनुति है vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk (iv) यविद उसने लापरवाही से काय@ विकया र्थीा या उसने विवविह श • का लोप विकया र्थीा जो सांविवति क शविक्तयों क े प्रयोग क े लिलए आवश्यक हैं। (v) यविद उसने विकसी पक्षकार को अनावश्यक रूप से पक्षपा रूप से लाभ प्रदान करने क े लिलए काय@ विकया र्थीा। (vi) यविद वह भ्रष्ट उद्देश्य से वि‰याच्छिन्व विकया गया र्थीा, ो रिरश्व विक नी भी aोटी nयों न हो, nयोंविक लाड@ कोक ने बहु पहले कहा र्थीा," रिरश्व भले ही aोटी हो, लेविकन गल ी बहु बड़ी है।"

8. यह कहना उति होगा विक संवै ाविनक न्यायालय को प्रदत्त न्यातियक पुनर्किवलोकन की शविक्त अपीलीय प्राति कारी की नहीं है बच्छिƒक क े वल विनण@य लेने की प्रवि‰या क सीविम है। विवभागीय प्राति कारिरयों क े विनण@य में हस् क्षेप क े वल भी अनुमेय है जब काय@वाही प्राक ृ ति क न्याय क े सिसद्धां ों का उल्लंघन कर े हुए या ऐसी काय@वाविहयों को विवविनयविम करने वाले सांविवति क विवविनयमों का उल्लंघन कर े हुए की गई हो या यविद यह विनण@य मनमाना या मनगढ़ ं पाया गया हो। अदाल ों को अपीलीय अदाल क े रूप में नहीं करना ाविहए और घरेलू जां में सामने आए सबू ों का पुनमू@ƒयांकन करना ाविहए और न ही इस आ ार पर हस् क्षेप करना ाविहए विक रिरकॉड@ पर उपलब् सामग्री पर एक और दृविष्टकोण संभव है। यविद जां विनष्पक्ष और उति रूप से की गई है और विनष्कर्ष@ साक्ष्य पर vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk आ ारिर हैं, ो साक्ष्य की पया@प्त ा या साक्ष्य की विवश्वसनीय ा विवभागीय जां में दज@ विनष्कर्ष• में हस् क्षेप करने का आ ार नहीं होगी।

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9. बम्बई उच्च न्यायालय बनाम शथिशकां एस. पाविटल और एक अन्य15 15 वाले मामले में इस न्यायालय ने यह अथिभविन ा@रिर विकयाः ऐसा लग ा है विक उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने इस मामले को इस रह से देखा है जैसे विक यह उच्च न्यायालय क े प्रशासविनक/अनुशासनात्मक प्राति कारी क े आदेश क े लिखलाफ एक अपील हो।विवभागीय प्राति कारिरयों क े विनण@य में हस् क्षेप की अनुमति संविव ान क े अनु`aेद 226 क े ह अति कार क्षेत्र का उपयोग कर े हुए दी जा सक ी है, यविद इस रह क े प्राति कारी ने प्राक े सिसद्धां ों का उल्लंघन कर े हुए या ऐसी जां क े रीक े को विन ा@रिर करने वाले वै ाविनक विवविनयमों का उल्लंघन कर े हुए काय@वाही की है या यविद प्राति कारी का विनण@य मामले क े साक्ष्य और योग्य ा क े लिलए असंग विव ारों द्वारा दूविर्ष विकया गया है, या यविद प्राति कारी द्वारा विकया गया विनष्कर्ष@ पूरी रह से मनमाना या मनगढं है विक कोई भी उति व्यविक्त इस रह क े विनष्कर्ष@ पर नहीं पहुं सक ा र्थीा, या उपरोक्त आ ार क े समान हैं।लेविकन हम इस बा की अनदेखी नहीं कर सक े विक विवभागीय प्राति कारी (इस मामले में उच्च न्यायालय की अनुशासनात्मक सविमति ) थ्यों क े एकमात्र न्याया ीश हैं, यविद जां उति रीक े से की गई है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk स्र्थीाविप कानूनी च्छिस्र्थीति यह है विक यविद कोई कानूनी साक्ष्य है, सिजस पर विनष्कर्ष@ आ ारिर हो सक े हैं, ो उस साक्ष्य की पया@प्त ा या यहां क विक विवश्वसनीय ा संविव ान क े अनु`aेद 226 क े ह दायर एक रिरट याति का में उच्च न्यायालय क े समक्ष प्र ार करने का मामला नहीं है। पुनः स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर बनाम नेमी ंद नलवाया16 16 वाले मामले में पैरा 7 में विनम्नलिललिख रूप में यह म व्यक्त विकया गयाः अब यह अ`aी रह से य हो गया है विक अदाल ें अपीलीय अदाल क े रूप में काय@ नहीं करेंगी और घरेलू जां में सामने आए सबू ों का पुनमू@ƒयांकन नहीं करेंगी, और न ही इस आ ार पर हस् क्षेप करेंगी विक रिरकॉड@ पर मौजूद सामग्री पर एक और दृविष्टकोण संभव है।यविद जां विनष्पक्ष और उति रूप से की गई है और विनष्कर्ष@ साक्ष्य पर आ ारिर हैं, ो साक्ष्य की पया@प्त ा या साक्ष्य की विवश्वसनीय प्रक ृ ति का प्रश्न विवभागीय जां क े विनष्कर्ष• में हस् क्षेप करने का आ ार नहीं होगा।इसलिलए, अदाल ें विवभागीय जां में दज@ थ्यों क े विनष्कर्ष• में हस् क्षेप नहीं करेंगी, सिसवाय उन मामलों क े जहां इस रह क े विनष्कर्ष@ विबना विकसी साक्ष्य या जहां वे स्पष्ट रूप से विवकृ हैं।विवक ृ ति का प ा लगाने क े लिलए परीक्षण यह देखना है विक nया न्यायाति करण उति रूप से काय@ कर रहा है, रिरकॉड@ पर सामग्री पर इस रह क े विनष्कर्ष@ पर पहुं सक ा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk है। र्थीाविप, न्यायालय अनुशासनात्मक मामलों क े विनष्कर्ष• में हस् क्षेप करेंगे, यविद प्राक ृ ति क न्याय या सांविवति क विवविनयमों क े सिसद्धां ों का उल्लंघन विकया गया है या यविद आदेश मनमाना, मनगढ़ं, असद्भावी या बाहरी विव ारों पर आ ारिर पाया जा ा है।

11. मामले क े थ्यों पर वापस आ े हुए, यह नोट विकया जा सक ा है विक े लिखलाफ आरोप-पत्र की ामील करने और उसे सुनवाई का पूरा अवसर देने क े बाद विनयविम अनुशासनात्मक काय@वाही की गई र्थीी। इसक े बाद, जां अति कारी द्वारा प्रस् ु जां रिरपोट@ क े अनुसरण में, उच्च न्यायालय क े पूण@ न्यायालय ने 02.09.2006 को उक्त जां रिरपोट@ को स्वीकार करने और त्काल प्रभाव से पेंशन लाभ क े 90% की कटौ ी क े सार्थी अपीलक ा@ को दंतिड करने का विनण@य लिलया र्थीा। उच्च न्यायालय क े पूण@ न्यायालय द्वारा की गई उक्त सिसफारिरश क े आ ार पर प्रत्यर्थी7-राज्य द्वारा पारिर दंड क े आदेश को अपीलक ा@ द्वारा उच्च न्यायालय में एक रिरट याति का दायर करक े ुनौ ी दी गई र्थीी। उच्च न्यायालय ने आरोप संख्या 1 से 3 को हटा विदया और अपीलक ा@ क े लिखलाफ आरोप संख्या 4 से 11 को बरकरार रखा, और उसक े पेंशन लाभों क े 90% क े स्र्थीान पर दंड को 70% क कम कर विदया।

12. प्रासंविगक रूप से, अपीलक ा@ ने प्राक े सिसद्धां ों क े उल्लंघन या जां काय@वाही क े दौरान या विनण@य लेने की प्रवि‰या क े दौरान विकसी वै ाविनक विनयमों या विवविनयमों क े उल्लंघन क े संबं में कोई आरोप नहीं लगाया र्थीा। इसलिलए, ऐसे विकसी भी आरोप क े अभाव में, उच्च न्यायालय द्वारा प्रशासविनक vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk पक्ष पर व्यविक्तपरक सं ुविष्ट प्राप्त की गई, और न्यातियक पक्ष पर उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आक्षेविप आदेश इस न्यायालय क े विकसी भी हस् क्षेप की आवश्यक ा नहीं है। जब जां की काय@वाही उति और कानूनी रीक े से की गई पाई गई है, और जब प्रशासविनक पक्ष क े सार्थी-सार्थी न्यातियक पक्ष पर उच्च न्यायालय ने जां अति कारी द्वारा अपीलक ा@ क े लिखलाफ लगाए गए आरोप संख्या ४ से ११ को 'साविब ' विकए जाने क े रूप में स्वीकार कर लिलया है, ो इस न्यायालय से एक अपीलीय प्राति कारी क े रूप में बैठने और जां अति कारी क े समक्ष पेश विकए गए साक्ष्य की पया@प्त ा या विवश्वसनीय ा का पुनमू@ƒयांकन करने की उम्मीद नहीं की गई र्थीी.विफर भी, इस न्यायालय ने क े वल अपने अं ःकरण को सं ुष्ट करने क े लिलए, न्यायालय ने विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री प्रदीप कां को े लिखलाफ लगाए गए आरोपों क े गुण -दोर्ष पर बहस करने की अनुमति दी र्थीी.

13. विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री कां द्वारा उठाए गए क @ की जड़ यह र्थीी विक े लिखलाफ लगाए गए आरोप थ्यात्मक या कानूनी रूप से विटकाऊ नहीं र्थीे nयोंविक अपीलक ा@ ने प्रासंविगक समय पर प्र लिल कानून क े अनुसार भूविम संदभ@ मामलों का फ ै सला विकया र्थीा। भार संघ और अन्य बनाम इकबाल सिंसह (उपयु@क्त) खोरशेद शापूर ेनाई बनाम असिसस्टेंट क ं ट्रोलर ऑफ एस्टेट ड्यूटी उपरोक्त अन्य सिंसह बनाम कलेnटर और अन्य (उपयु@क्त) में अथिभविन ा@रिर क े अनुसार मुआवजा मांगने का अति कार एक संपलित्त का अति कार है और इसे हस् ां रिर विकया जा सक ा है। इस न्यायालय की राय में, उक्त विनण@य प्रत्येक vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk मामले क े थ्यों पर विव ार कर े हुए प्रति पाविद विकये गए हैं, और भूविम अति ग्रहण अति विनयम क े ह अपील द्वारा य विकए गए मामलों क े थ्यों क े लिलए शायद ही कोई प्रासंविगक हैं. भार संघ और अन्य बनाम इकबाल सिंसह उपरोक्त क े मामले में, यह न्यायालय विवस्र्थीाविप व्यविक्तयों (मुआवजा और पुनवा@स) अति विनयम, 1955 क े ह एक विवस्र्थीाविप व्यविक्त द्वारा विनष्पाविद वसीय क े ह एक वसीय क े रूप में दावेदार क े अति कार की जां रहा र्थीा। खोरशेद शापूर ेनाई बनाम असिसस्टेंट क ं ट्रोलर ऑफ एस्टेट ड्यूटी उपरोक्त क े मामले में विवति क उत्तराति कारिरयों और अति ग्रविह भूविम क े मृ क मालिलक क े प्रति विनति यों द्वारा प्राप्त मुआवजे क े संबं में सहायक संपदा शुƒक विनयंत्रक, हैदराबाद द्वारा जारी विकए गए नोविटसों की वै ा और वै ा क े सवाल पर विव ार विकया जा रहा र्थीा। जहां क अपीलक ा@ क े लिखलाफ लगाए गए आरोपों का संबं है, यह आरोप लगाया गया र्थीा विक अपीलक ा@ ने बाद क े खरीदारों /विनवेशकों क े ारा में अत्यति क उच्च दर पर बढ़ा हुआ मुआवजा विदया र्थीा, सिजन्हें कोई मुआवजा प्राप्त करने का कोई अति कार नहीं र्थीा, विवशेर्ष रूप से जब संपलित्त क े हस् ां रण अति विनयम की ारा 6 (ई) विवशेर्ष रूप से क े वल मुकदमा करने क े अति कार क े हस् ां रण को प्रति बंति कर ी र्थीी.कथिर्थी मामलों का विनण@य अपीलक ा@ द्वारा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk कानून और इच्छिnवटी क े प्रमुख सिसद्धां ों क े घोर उल्लंघन में और सभी न्यातियक मानदंडों और औति त्य क े लिखलाफ विकया गया र्थीा, ाविक ऐसे बाद क े खरीदारों का अनावश्यक रूप से पक्ष लिलया जा सक े सिजन्हें मुआवजा प्राप्त करने का कोई कानूनी अति कार नहीं र्थीा.

14. क ृ ष्ण प्रसाद सिंसह बनाम विबहार राज्य उपरोक्त सा ना ौ री बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (उपयु@क्त) और अभय जैन बनाम राजस्र्थीान उच्च न्यायालय और एक अन्य (उपयु@क्त) क े मामले में इस न्यायालय क े विनण@य पर अपीलक ा@ क े लिलए विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री कां द्वारा अपने इस कर्थीन को पुष्ट करने क े लिलए विक क े वल संदेह ही कदा ार नहीं हो सक ा और यह विक कदा ार की विकसी भी संभाव्य ा को मौलिखक या दस् ावेजी सामग्री क े सार्थी समर्थी@न करने की आवश्यक ा है, ो उस पर भरोसा विकया जा सक ा है। उन्होंने यह भी कहा विक न्यातियक अति कारिरयों क े लिखलाफ अनुशासनात्मक काय@वाही क े वल इसलिलए शुरू नहीं की जा सक ी nयोंविक उनक े द्वारा विदया गया फ ै सला या आदेश गल र्थीा। हम अपीलक ा@ क े विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता द्वारा दी गई दलीलो से और उसक े द्वारा अवलंब लिलए गए विनण@यों क े अनुपा से पूरी रह सहम हैं. विफर भी, व @मान मामले में अपीलक ा@ को इस रीक े से काय@वाही का सं ालन कर े हुए पाया गया सिजसने उसकी प्रति ष्ठा और अखंड ा को परिरलतिक्ष विकया र्थीा.यह विदखाने क े लिलए पया@प्त साक्ष्य और सामग्री र्थीी विक अपीलक ा@ ने एक न्यातियक अति कारी क े रूप में अपने क @व्यों का विनव@हन कर े हुए स्वयं का दुरूपयेाग विकया र्थीा, और कानून क े विवथिशष्ट प्राव ानों की vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अवहेलना कर े हुए न्यातियक आदेश पारिर विकए र्थीे, ाविक अति ग्रविह भूविम क े बाद क े खरीदारों को अनावश्यक रूप से पक्षपा विकया जा सक े, सिजन्हें मुआवजे का दावा करने का कोई अति कार नहीं र्थीा, और यह विक इस रह क े आदेश भ्रष्ट उद्देश्य से लागू विकए गए र्थीे।इन परिरच्छिस्र्थीति यों में, उच्च न्यायालय संविव ान क े अनु`aेद 235 क े ह अपनी पय@वेक्षी अति कार क्षेत्र का उपयोग करने में पूरी रह से उति र्थीा।

15. हमारी राय में, न्यातियक आदेश पारिर करने की आड़ में विकसी पक्षकार का अनुति पक्ष लेना न्यातियक बेईमानी और कदा ार का सबसे खराब प्रकार है। पक्षपा करने क े लिलए बाहरी विव ार हमेशा मौविद्रक विव ार नहीं होना ाविहए। अnसर कहा जा ा है विक लोक सेवक पानी में मaली की रह हो े हैं, कोई नहीं कह सक ा विक मaली कब और क ै से पानी पी ी है। न्याया ीश को रिरकॉड@ में रखे गए थ्यों और मामले में लागू कानून क े आ ार पर मामले का फ ै सला करना ाविहए। यविद वह बाहरी कारणों से विकसी मामले का विनण@य कर ा है, ो वह कानून क े अनुसार अपने क @व्यों का पालन नहीं कर रहा है। जैसा विक अnसर उद्धृ विकया जा ा है, सीजर की पत्नी की रह एक न्याया ीश को संदेह से परे होना ाविहए।

16. इस मामले क े दृविष्टकोण से, हमें व @मान अपील में कोई मेरिरट नहीं विमल ी और इसे खारिरज कर विदया जा ा है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk …………………………………... [न्यायमूर्ति डॉ. नंजय वाई ंद्र ूड़] …………………………………. [न्यायमूर्ति बेला एम. वित्रवेदी] नई विदल्ली

06. 05. 2022 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk