Rajasthan State v. Kiksura Ram

High Court of Rajasthan · 15 Dec 2009
B. R. Gavai
Criminal Appeal No 2119 of 2010
2022 INSC 760
criminal appeal_dismissed Significant

AI Summary

The Supreme Court upheld the High Court's acquittal of the accused in a murder case, ruling that appellate interference is unwarranted when the acquittal is based on possible and reasonable evaluation of evidence.

Full Text
Translation output
गैर - प्रति वेद्य
भार का उच्च म न्यायालय
आपराति क अपीलीय क्षेत्राति कार
आपराति क अपील संख्या 2119/2010
राजस्थान राज्य अपीलक ा#
(ओ)
बनाम
किकस् ूरा राम प्रति वादी
(यो)
किनर्ण#य
बी. आर. गवई, जे.
JUDGMENT

1. व #मान अपील में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा किदनांक 15 सिस म्बर, 2009 को जो पुर क े डी. बी. आपराति क अपील सं. 25/1986 क े मामले में पारिर किनर्ण#य को चुनौ ी दी गई है, सिजससे इसमें प्रत्यथ[8] अभिभयुक्त को दोषमुक्त किकया गया है और किवद्व सिजला और सत्र न्याया ीश, जो पुर (सिजसे इसक े पश्चा ् ''किवचारर्ण न्यायालय'' कहा गया है) द्वारा पारिर किनर्ण#य, किदनांक 10 जनवरी, 1986 को मूल आपराति क मामला सं. 114/1986, को पलट किदया गया है सिजसमें भार ीय दंड संकिह ा, 2022 INSC 760 1860 (संक्षेप में ''भा. दं. सं.") की ारा 302 क े अ ीन प्रत्यथ[8] अभिभयुक्त को दोषी ठहराया गया और उसे आजीवन कारावास का दंड किदया गया था और भार ीय दंड संकिह ा की ारा 201 क े ह भी दोषी ठहराया गया और ीन साल क े कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

2. प्रति वादी-अभिभयुक्त पर भा. दं. सं. की ारा 302 और 201 क े ह दंडनीय अपरा का आरोप लगाया गया था। अभिभयोजन पक्ष का मामला है किक आरोपी ने अपनी पत्नी को लाठी से मार डाला, उसे घर से 100 फीट दूर घसीट कर ले गया और सबू किमटाने क े लिलए आग लगा दी। 3.किवचारर्ण न्यायालया ने सबू ों का मूल्यांकन करने क े बाद, प्रति वादी-अभिभयुक्त को भा. दं. सं. की ारा 302 क े ह दंडनीय अपरा क े लिलए दोषी ठहराया और उसे 100 रुपये क े जुमा#ने क े साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई। प्रति वादी अभिभयुक्त को आईपीसी की ारा 201 क े ह दंडनीय अपरा क े लिलए भी दोषी ठहराया गया था और 100 रुपये क े जुमा#ने क े साथ ीन साल क े कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

4. इससे असं ुष्ट होकर, प्रति वादी अभिभयुक्त ने उच्च न्यायालय क े समक्ष अपील दायर की। उच्च न्यायालय ने, आक्षेकिप किनर्ण#य क े द्वारा, अपील को स्वीकार कर लिलया और दोषसिसतिL क े आदेश को उलट किदया और अभिभयुक्तों को आरोपों से बरी कर किदया। इससे असं ुष्ट होकर, राजस्थान राज्य ने इस न्यायालय क े समक्ष अपील दायर की है।

5. हमने अपीलाथ8-राजस्थान राज्य की ओर से उपस्थिस्थ किवद्वान अति वक्ता श्री किवशाल मेघवाल को सुना।

6. अपीलक ा# राज्य क े किवद्वान अति वक्ता मेघवाल ने कथन किकया है किक जब किनचली अदाल ने गुमान सिंसह (पीडब्ल्यू 4) क े साक्ष्यों क े मूल्यांकन पर, प्रत्यथ8- अभिभयुक्त को दोषी ठहराया था, ो उच्च न्यायालय क े पास इसमें हस् क्षेप करने का कोई कारर्ण नहीं था। उसने कथन किकया है किक गुमान सिंसह (पी डब्ल्यू 4) क े समक्ष प्रत्यथ8-अभिभयुक्त द्वारा की गई न्यातियक े त्तर स्वीकारोकिक्त ऐसी है, जो न्यातियक मन में किवश्वास को प्रेरिर करेगी। यह कथन किकया गया है किक गुमान सिंसह (पी डब्ल्यू 4) एक स्व ंत्र गवाह था क्योंकिक उसने पुलिलस किवभाग में सेवा की थी और उसकी गवाही पर अकिवश्वास करने का कोई कारर्ण नहीं था। यह आगे प्रस् ु किकया गया है किक हमीरा राम (पी डब्ल्यू 7) को हालांकिक पक्षद्रोही घोकिष किकया गया है, किंक ु न्यातियक े त्तर संस्वीक ृ ति से संबंति उसकी गवाही का एक किहस्सा भरोसेमंद है और यह गुमान सिंसह (पी डब्ल्यू 4) की गवाही की पुकिष्ट कर ा है। इसलिलए, उन्होंने किनवेदन किकया किक उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आक्षेकिप किनर्ण#य को अपास् करने की आवश्यक ा है और किवचारर्ण न्यायालय क े किनर्ण#य की पुकिष्ट करने की आवश्यक ा है।

7. हमने 10 जनवरी, 1986 क े किनचली अदाल और 15 सिस ंबर, 2009 क े उच्च न्यायालय क े फ ै सले का अवलोकन किकया है।

8. दोषमुकिक्त क े लि[लाफ अपील में हस् क्षेप का दायरा बहु सीकिम है, जब क यह नहीं पाया जा ा किक न्यायालय द्वारा लिलया गया दृकिष्टकोर्ण असंभव या किवक ृ है, दोषमुकिक्त क े किनष्कष# में हस् क्षेप करने की अनुमति नहीं है। समान रूप से यकिद दो किवचार संभव हैं, ो दोषमुकिक्त क े आदेश को रद्द करने की अनुमति नहीं है, क े वल इसलिलए किक अपीलीय अदाल को सजा का रास् ा अति क संभाकिव लग ा है। हस् क्षेप भी उतिच होगा जब लिलया गया दृकिष्टकोर्ण किबल्क ु ल भी संभव न हो।

9. उच्च न्यायालय ने सबू ों पर किवस् ार से किवचार किकया है। किनर्विववाद रूप से, हमीरा राम (PW[7]) पक्षद्रोही हो गया है। किनचली अदाल को स्वयं प्रत्यथ8-अभिभयुक्त क े कहने पर कभिथ रूप से बरामद की गई आपलित्तजनक सामग्री की कभिथ बरामदगी पर अकिवश्वास था।

10. यह क े वल गुमान सिंसह (पी डब्ल्यू 4) द्वारा कभिथ रूप से की गई न्यातियक े त्तर संस्वीक ृ ति पर किनभ#र कर ा है। पंजाब राज्य बनाम भजन सिंसह और अन्य 1 क े मामले में इस अदाल क े फ ै सले पर भरोसा कर े हुए, इसी रह क े मामले गोपाल साह बनाम किबहार राज्य 2 में भी उच्च न्यायालय ने माना है किक न्यायाति रेक संस्वीक ृ ति सबू का एक कमजोर भाग था और जब क क ु छ सम्पुकिष्ट नहीं हो ी, क े वल न्यायाति रेक संस्वीक ृ ति क े आ ार पर दोषसिसतिL को कायम नहीं र[ा जा सक ा था। उच्च न्यायालय द्वारा लिलया गया दृकिष्टकोर्ण ना ो असंभव है ना ही किवक ृ ति ग्रस्, इसलिलए हमारे हस् क्षेप की आवश्यक ा नहीं है।