Rajasthan State v. Kistura Ram

Supreme Court of India
B. R. Gavai
Criminal Appeal No 2119 of 2010
criminal appeal_dismissed Significant

AI Summary

The Supreme Court upheld the High Court's acquittal of the accused in a murder case, emphasizing limited interference in acquittal appeals and the need for corroboration of judicial confession evidence.

Full Text
Translation output
गैर - प्रतिवेद्य
भारत का उच्चतम न्यायालय
आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपील संख्या 2119/2010
राजस्थान राज्य अपीलकर्ता
(ओ)
बनाम
किस्तूरा राम प्रतिवादी
(यो)
निर्णय
बी. आर. गवई, जे.
JUDGMENT

1. वर्तमान अपील में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 15 सितम्बर, 2009 को जोधपुर क े डी. बी. आपराधिक अपील सं. 25/1986 क े मामले में पारित निर्णय को चुनौती दी गई है, जिससे इसमें प्रत्यर्थी अभियुक्त को दोषमुक्त किया गया है और विद्वत जिला और सत्र न्यायाधीश, जोधपुर (जिसे इसक े पश्चात् ''विचारण न्यायालय'' कहा गया है) द्वारा पारित निर्णय, दिनांक 10 जनवरी, 1986 को मूल आपराधिक मामला सं. 114/1986, को पलट दिया गया है जिसमें भारतीय दंड संहिता, 1860 (संक्षेप में ''भा. दं. सं.") की धारा 302 क े अधीन प्रत्यर्थी अभियुक्त को दोषी ठहराया गया और उसे आजीवन कारावास का दंड दिया गया था और भारतीय दंड संहिता की धारा 201 क े तहत भी दोषी ठहराया गया और तीन साल क े कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

2. प्रतिवादी-अभियुक्त पर भा. दं. सं. की धारा 302 और 201 क े तहत दंडनीय अपराध का आरोप लगाया गया था। अभियोजन पक्ष का मामला है कि आरोपी ने अपनी पत्नी को लाठी से मार डाला, उसे घर से 100 फीट दूर घसीट कर ले गया और सबूत मिटाने क े लिए आग लगा दी। 3.विचारण न्यायालया ने सबूतों का मूल्यांकन करने क े बाद, प्रतिवादी-अभियुक्त को भा. दं. सं. की धारा 302 क े तहत दंडनीय अपराध क े लिए दोषी ठहराया और उसे 100 रुपये क े जुर्माने क े साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई। प्रतिवादी अभियुक्त को आईपीसी की धारा 201 क े तहत दंडनीय अपराध क े लिए भी दोषी ठहराया गया था और 100 रुपये क े जुर्माने क े साथ तीन साल क े कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

4. इससे असंतुष्ट होकर, प्रतिवादी अभियुक्त ने उच्च न्यायालय क े समक्ष अपील दायर की। उच्च न्यायालय ने, आक्षेपित निर्णय क े द्वारा, अपील को स्वीकार कर लिया और दोषसिद्धि क े आदेश को उलट दिया और अभियुक्तों को आरोपों से बरी कर दिया। इससे असंतुष्ट होकर, राजस्थान राज्य ने इस न्यायालय क े समक्ष अपील दायर की है।

5. हमने अपीलार्थी-राजस्थान राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री विशाल मेघवाल को सुना।

6. अपीलकर्ता राज्य क े विद्वान अधिवक्ता मेघवाल ने कथन किया है कि जब निचली अदालत ने गुमान सिंह (पीडब्ल्यू 4) क े साक्ष्यों क े मूल्यांकन पर, प्रत्यर्थी- अभियुक्त को दोषी ठहराया था, तो उच्च न्यायालय क े पास इसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था। उसने कथन किया है कि गुमान सिंह (पी डब्ल्यू 4) क े समक्ष प्रत्यर्थी-अभियुक्त द्वारा की गई न्यायिक े त्तर स्वीकारोक्ति ऐसी है, जो न्यायिक मन में विश्वास को प्रेरित करेगी। यह कथन किया गया है कि गुमान सिंह (पी डब्ल्यू 4) एक स्वतंत्र गवाह था क्योंकि उसने पुलिस विभाग में सेवा की थी और उसकी गवाही पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं था। यह आगे प्रस्तुत किया गया है कि हमीरा राम (पी डब्ल्यू 7) को हालांकि पक्षद्रोही घोषित किया गया है, किंतु न्यायिक े त्तर संस्वीक ृ ति से संबंधित उसकी गवाही का एक हिस्सा भरोसेमंद है और यह गुमान सिंह (पी डब्ल्यू 4) की गवाही की पुष्टि करता है। इसलिए, उन्होंने निवेदन किया कि उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय को अपास्त करने की आवश्यकता है और विचारण न्यायालय क े निर्णय की पुष्टि करने की आवश्यकता है।

7. हमने 10 जनवरी, 1986 क े निचली अदालत और 15 सितंबर, 2009 क े उच्च न्यायालय क े फ ै सले का अवलोकन किया है।

8. दोषमुक्ति क े खिलाफ अपील में हस्तक्षेप का दायरा बहुत सीमित है, जब तक यह नहीं पाया जाता कि न्यायालय द्वारा लिया गया दृष्टिकोण असंभव या विक ृ त है, दोषमुक्ति क े निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं है। समान रूप से यदि दो विचार संभव हैं, तो दोषमुक्ति क े आदेश को रद्द करने की अनुमति नहीं है, क े वल इसलिए कि अपीलीय अदालत को सजा का रास्ता अधिक संभावित लगता है। हस्तक्षेप तभी उचित होगा जब लिया गया दृष्टिकोण बिल्क ु ल भी संभव न हो।

9. उच्च न्यायालय ने सबूतों पर विस्तार से विचार किया है। निर्विवाद रूप से, हमीरा राम (PW[7]) पक्षद्रोही हो गया है। निचली अदालत को स्वयं प्रत्यर्थी-अभियुक्त क े कहने पर कथित रूप से बरामद की गई आपत्तिजनक सामग्री की कथित बरामदगी पर अविश्वास था।

10. यह क े वल गुमान सिंह (पी डब्ल्यू 4) द्वारा कथित रूप से की गई न्यायिक े त्तर संस्वीक ृ ति पर निर्भर करता है। पंजाब राज्य बनाम भजन सिंह और अन्य 1 क े मामले में इस अदालत क े फ ै सले पर भरोसा करते हुए, इसी तरह क े मामले गोपाल साह बनाम बिहार राज्य 2 में भी उच्च न्यायालय ने माना है कि न्यायातिरेक संस्वीक ृ ति सबूत का एक कमजोर भाग था और जब तक क ु छ सम्पुष्टि नहीं होती, क े वल न्यायातिरेक संस्वीक ृ ति क े आधार पर दोषसिद्धि को कायम नहीं रखा जा सकता था। उच्च न्यायालय द्वारा लिया गया दृष्टिकोण ना तो असंभव है ना ही विक ृ तिग्रस्त, इसलिए हमारे हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।