Shiv Kumar Sharma v. Rajasthan State

Supreme Court of India · 28 Jul 2022
B. R. Gavai; Pamidighantam Sri Narsimha
Criminal Appeal No 1050 of 2022 @ SLP (Criminal) No 2403 of 2017
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court acquitted the appellant of corruption and record tampering charges due to lack of evidence of dishonest intent, emphasizing limited interference with concurrent factual findings.

Full Text
Translation output
रिपोर्ट करने योग्य
भारत का उच्चतम न्यायालय
आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपील संख्या 1050 /2022
(एस.एल.पी. (आपराधिक) संख्या 2403/2017 से उत्पन्न)
शिव क
ु मार शर्मा ..........अपीलकर्ता (गण)
बनाम
राजस्थान राज्य ............प्रतिवादी (गण)
निर्णय
बी. आर. गवई, जे.
JUDGMENT

1. अनुमति दी गई।

2. यह अपील राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर क े विद्वत एकल न्यायाधीश द्वारा दिनांक 06.01.2017 को दिए गए निर्णय और आदेश को चुनौती देती है,जिसमें अपीलकर्ता/आरोपी द्वारा दायर की गई उस अपील को खारिज कर दिया गया था,जिसेअपीलार्थी द्वारा विद्वत विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम संख्या 1, जयपुर (जिसे इसमें इसक े बाद "विशेष न्यायाधीश"कहा गया है) द्वारा दिनांक 24.10.2013 को पारित फ ै सले और आदेश को चुनौती देते हुए दायर किया गया था,जिसमें अपीलकर्ता को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 ('पीसी अधिनियम') की धारा13 (1) (डी) (ii) सपठित धारा 15 और भारतीय दंड संहिता की धारा 477 ए क े तहत दंडनीय अपराधों क े लिए दोषी ठहराया गया था और उसे दोनों अपराधों क े लिए एक वर्ष क े कठोर कारावास और 5000-5000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।

3. विशेष न्यायाधीश ने, दिनांक 03.06.2004 क े आदेश द्वारा, अपीलार्थी क े विरुद्ध निम्नलिखित आरोप विरचित किएः "सर्वप्रथम,वर्ष 1994 में 25.04.1994 को और लगभग उसी समय, लोक सेवक क े रूप में काम करते हुए, आपने सह- अभियुक्त भगवान सहाय क े साथ षड्यंत्र रचा और उस आपराधिक षड्यंत्र को आगे बढ़ाने क े लिए, आपने प्राथमिक विद्यालय, मानकोट में कमरों और बरामदे क े निर्माण क े संबंध में 91,500/- रुपये की स्वीक ृ त राशि में से 15,000/- रुपये की अग्रिम राशि प्राप्त की और भगवान सहाय ने तीन मस्टर रोल में 14508 रुपये का कार्य और 18994 रुपये की निर्माण सामग्री क े वाउचर प्रस्तुत किए थे और 33502 रुपये व्यय होना बताया था जिसे मापन पुस्तक संख्या 51 क े पृष्ठ संख्या 71 और 72 में स्वीकार किया गया था और इसे शिव क ु मार शर्मा द्वारा 34580.13 रुपये क े रूप में उल्लेखित किया गया था, लेकिन बाद में,शिकायत पर,उक्त राशि 34580 रुपये को संशोधित कर 25911 रुपये कर दिया गया। इसी तरह, उपर्युक्त आपराधिक षड्यंत्र को आगे बढ़ाने क े लिए, आपने प्राथमिक विद्यालय सुरजनपुर में कमरों और बरामदे क े निर्माण क े लिए 80,000/- रुपये की स्वीक ृ त राशि में से 28,000/- रुपये का अग्रिम प्राप्त किया और श्री भगवान सहाय ने निर्माण कार्य का खर्च 61,843.40 रुपये, जिसमें 7 मस्टर रोल का खर्च 36,552/- रुपये और निर्माण क े वाउचर क े लिए 25,291.40 रुपये की राशि शामिल थी। उक्त राशि श्री शिव क ु मार शर्मा द्वारा मापन पुस्तिका सं. 51 क े पृष्ठ संख्या 71-72 पर 68,776 रुपये क े रूप में दर्ज की गई थी, लेकिन शिकायत पर, 68,776/- रुपये की कथित राशि काट कर 45,582/- रुपये कर दी गई थी।जांच में यह पाया गया कि सुरजनपुर में क े वल 28,264.42 रुपये का कार्य किया गया था और मानकोट में 25,911 रुपये का कार्य किया गया था और इस प्रकार, आपने श्रम और निर्माण का अतिरिक्त व्यय दिखाया है जो मनकोट में 7,698/- रुपये अधिक था और सुरजनपुर में 16,644/- रुपये अधिक था, आपको क ु ल मिलाकर 22,353/- रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया और राज्य सरकार को गलत तरीक े से नुकसान पहुंचाकर आपने गलत तरीक े से लाभ प्राप्त किया। आपने रिकॉर्डों में फ े रबदल कर झूठा रिकॉर्ड भी तैयार किया। लोक सेवक क े रूप में आपका उक्त कार्य एक दंडनीय अपराध है। इस प्रकार, आपने भारतीय दंड संहिता की धारा 417, 477A सपठित भारतीय दंड संहिता की धारा 120B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13 (1) (डी) (2) क े तहत दंडनीय अपराध किया है, जिसक े लिए मैंने संज्ञान लिया है।"

4. ऐसा प्रतीत होता है कि प्राधिकारियों को प्राथमिक विद्यालय, मानकोट और सुरजनपुर में कमरों और बरामदों क े निर्माण में कदाचार क े बारे में शिकायत की गई थी। अभियोजन पक्ष यह थाकि मानकोट क े संबंध में शिकायत किए जाने क े बाद अपीलार्थी द्वारा मापन पुस्तिका में यह राशि 34,580 रुपये से घटाकर 25,911 रुपये कर दी गई थी। जहां तक सुरजनपुर में निर्माण कार्य का संबंध है, शिकायत किए जाने क े बाद यह राशि 68,776 रुपये से घटकर 45,582 रुपये कर दी गई।

5. शिकायत मिलने क े बाद श्री महेश प्रसाद माथुर को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया। जांच पूरी होने क े बाद उन्होंने एक जांच रिपोर्ट पेश की। जांच रिपोर्ट क े आधार पर अपराध दर्ज किया गया। आरोप पत्र दाखिल किया गया। अपीलकर्ता ने खुद को निर्दोष बताया और अन्वीक्षा चाही।विद्वान विशेष न्यायाधीश ने, विचारण की समाप्ति पर, अपीलार्थी को पूर्वोक्त रूप में दोषी ठहराया। अपीलकर्ता ने उच्च न्यायालय में एक अपील दायर की और उच्च न्यायालय ने विद्वत विशेष न्यायाधीश क े आदेश को सही ठहराया। इसलिए वर्तमान अपील दायर की गई है।

6. अपीलार्थी की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री रितेश अग्रवाल का कहना है कि उच्च न्यायालय और विद्वान विचारण न्यायालय दोनों ने ही पी.डब्लू. 8 श्री महेश प्रसाद माथुर और पी.डब्लू.14 जय भगवान, जांच अधिकारी क े साक्ष्य को उचित महत्व न देकर गलती की है।

7. विद्वत अधिवक्ता ने आगे कहा कि यह साबित करने क े लिए कोई तथ्य नहीं है कि अपीलार्थी ने या तो कोई मांग की थी या एक लोक सेवक क े रूप में अपनी स्थिति का दुरुपयोग करक े, अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति क े लिए कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ प्राप्त किया था। यह कहा गया कि अपीलार्थी ने अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति क े लिए कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया, इसको साबित करने वाले तथ्यों क े अभाव में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1) (घ) (ii) सपठित धारा 15 क े तहत दोषसिद्धि संधारणीय नहीं थी। वह आगे कहता है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 477 ए क े तहत दंडनीय अपराध क े लिए, अभियोजन पक्ष से यह अपेक्षित है कि वह यह साबित करे कि कथित कार्य धोखाधड़ी क े इरादे से जानबूझकर किया गया था। यह उनका निवेदन है कि ऐसा कोई सबूत रिकॉर्ड में नहीं आया है।

8. अतः विद्वत अधिवक्ता का कहना है कि दोष सिद्धि क े समवर्ती आदेश रद्द किए जाने योग्य है और अभियुक्त बरी किए जाने का हकदार है।

9. राजस्थान राज्य क े विद्वत अपर महाधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी ने अपील का पुरजोर विरोध किया है। उनका कहना है कि तथ्य क े समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत सीमित है। उनका कहना है कि विद्वत विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय ने, सबूतों क े सही मूल्यांकन पर, यह पाया है कि अपीलार्थी ने बेईमानी क े इरादे से रिकॉर्ड में हेरफ े र किया था। उन्होने कहा कि उच्च अधिकारियों को शिकायत किए जाने क े बाद ही, अपीलकर्ता ने खुद को बचाने क े लिए रिकॉर्ड में हेरफ े र किया था और इस प्रकार, यह मामला स्पष्ट रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 477 ए क े तहत आता है.

10. इसमें कोई संदेह नहीं है कि तथ्य क े समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत सीमित है। जब तक निष्कर्ष विक ृ त या असंभव नहीं पाए जाते, न्यायालय तथ्यों क े समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालांकि, यह सुस्थापित है कि जब विचारण न्यायालय द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष साक्ष्य की उपेक्षा करक े दर्ज किए जाते हैं या साक्ष्य का मूल्यांकन स्पष्ट रूप से गलत है, तो इसमे न्यायालय को हस्तक्षेप करना होगा।

11. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (घ) (ii) सपठित धारा 15 क े तहत दंडनीय अपराध क े लिए यह साबित करना आवश्यक है कि किसी लोक सेवक ने अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति क े लिए कोई मूल्यवान वस्तु या धन संबंधी लाभ अभिप्राप्त करने का प्रयास किया है।वर्तमान मामले में, ऐसा कोई तथ्य रेकॉर्ड पर नहीं आया है। इसक े विपरीत, पीडब्लू 14 जय भगवान, जांच अधिकारी क े साक्ष्य स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि निर्माण सामग्री की राशि का भुगतान पंचायत समिति द्वारा सीधे ग्राम सेवक को किया गया था। इससे यह भी पता चलता है कि पंचायत समिति द्वारा सामग्री का बिल भी सीधे ग्राम सेवक को भेजा गया था। अपीलार्थी द्वारा इसका कोई सत्यापन नहीं किया गया था। यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि अपीलकर्ता को निर्माण सामग्री क े संबंध में ग्राम सेवक को भुगतान की गई राशि क े बारे में जानकारी नहीं थी। आगे यह स्वीकार किया गया है कि उस समय वर्तमान अपीलार्थी की देखरेख में लगभग 100 से 125 पंचायत कार्य चल रहे थे। आगे यह भी स्वीकार किया गया है कि यह दिखाने क े लिए रिकॉर्ड पर कोई तथ्य नहीं है कि शिकायत क े बाद अपीलकर्ता द्वारा एक्स-आर्टिकल 2 में प्रदर्श P22 से लेकर प्रदर्श P27 में सुधार किया गया था। पी डब्लू 14 जय भगवान, जांच अधिकारी क े साक्ष्य क े निम्नलिखित भाग का उल्लेख करना प्रासंगिक होगाः "मुख्यालय को भेजी गई अपनी जांच रिपोर्ट में मुझे शिव क ु मार क े खिलाफ कोई आपराधिक आरोप नहीं मिले थे और मैंने क े वल विभागीय जांच क े लिए सिफारिश की थी। हालांकि उच्च अधिकारियों क े निर्णय पर आरोप पत्र दाखिल किया गया था।"

12. पीडब्लू 14 आगे स्वीकार करता है कि पंचायत समिति द्वारा भुगतान की गई राशि अपीलार्थी द्वारा सही की गई राशि क े अनुसार थी। आगे यह भी स्वीकार किया गया है कि यह साबित करने क े लिए कोई सबूत नहीं था कि अभियुक्त भगवान सहाय और अपीलार्थी ने मिलकर उसमें सुधार किए थे। वह आगे स्वीकार करता है कि शिव क ु मार शर्मा, जो वर्तमान अपीलकर्ता है, ने जिला मजिस्ट्रेट क े समक्ष भगवान सहाय, ग्राम सेवक द्वारा निर्माण कार्य में अनियमितता क े बारे में शिकायत की थी.

13. अपीलार्थी की धन की मंजूरी या भुगतान करने में कोई भूमिका नहीं थी, इन महत्वपूर्ण पहलुओं को दोनों न्यायालयों द्वारा पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। जांच में जांच अधिकारी को अपीलकर्ता की कोई आपराधिक मंशा नहीं दिखी, इस साक्ष्य को भी नजरअंदाज कर दिया गया है। मामले को देखते हुए, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (डी) (ii) सपठित धारा 15 क े तहत दोषसिद्धि संधारणीय नहीं है.

14. अब भारतीय दंड संहिता की धारा 477 क क े तहत दोषसिद्धि पर बात करते हैं। भारतीय दंड संहिता कि धारा 477 ए क े तहत दोषसिद्धि क े लिए अभियोजन पक्ष क े लिए यह साबित करना आवश्यक है कि झूठी प्रविष्टि या चूक या इस तरह की प्रविष्टियों में हेरफ े र जानबूझकर धोखाधड़ी क े इरादे से किया गया है। अभियोजन पक्ष द्वारा ऐसा कोई तथ्य रेकॉर्डमें पेश नहीं किया गया है। इसक े विपरीत, पीडब्लू 8 महेश प्रसाद माथुर, जिन्हें एक जांच अधिकारी क े रूप में नियुक्त किया गया था, क े साक्ष्य से पता चलता है कि अपीलार्थी क े खिलाफ लगाए गए आरोप संधारणीय नहीं थे. पीडब्लू महेश प्रसाद माथुर क े बयान का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा, जो इस प्रकार हैः "जब मैं पूछताछ करने क े लिए मौक े पर गया तो मानकोट और सुरजपुर की मापन पुस्तिकाएँ मुझे दी गई ं। जिसक े आधार पर दिनांक 4.10.94 और 19.10.94 को मैंने घटनास्थल का दौरा करने क े बाद जांच की थी। सी.ओ. क े निर्देश पर मैंने 17.2.95 को राशि में आ रहे अंतर का विवरण तैयार किया था। मापन पुस्तिका संख्या51 (आर्टिकल सं0 2) क े पृष्ठ सं. 71,72 पर माप कनिष्ठ अभियंता द्वारा अभिलिखित की गई है। जो मेरी जांच में सही पाई गई। 25911/- रुपये क े इस कार्य क े लिए श्रम शुल्क क े रूप में 13422/- रुपये का भुगतान किया गया था, जो एक्स से वाई तक मापन पुस्तिका में दर्ज किया गया था, मुझे मानकोट गांव क े काम में कोई अनियमितता नहीं मिली। यदि गलती से मापन पुस्तिका क े योग में कोई गलती हो जाती है, तो मापन पुस्तिका क े आधार पर बिल तैयार करते समय, इस गलती को लेखा शाखा द्वारा ठीक किया जा सकता है। अकाल राहत कार्य समाप्त होने क े तीन महीने बाद मैं वहां गया था। उस जगह (सुरजनपुर) पर निर्माण कार्य की सामग्री क े पर्यवेक्षण क े लिए कोई व्यक्ति नियुक्त नहीं किया गया था। मौक े पर कोई चौकीदार नहीं था, जिसकी अनुपस्थिति में अगर कोई भी वहां पड़ी सामग्री ले जाएगा, मैं नहीं कह सकता। जिन पैटीज को मापन पुस्तिका में दिखाया गया है, वे मौक े पर नहीं पाए गए, इसलिए मैंने रिपोर्ट में इसक े बारे में उल्लेख किया था। निर्माण कार्य करवाने कि ज़िम्मेदारी ग्राम सेवक की होती है। यदि, 40267 रुपये क े मूल्यांकन में, जो मेरे द्वारा किया गया था, 6914/- रुपये क े पैटीज की लागत को शामिल किया जाएगा, तो मूल्यांकन राशि 47181/- रुपये हो जाएगी। पैटीज की लागत 6914 रुपये बीएसआर क े अनुसार लिखी गई है। जब मुझे मापन पुस्तिका 51 (आर्टिकल-2) प्राप्त हुआ, उस समय कनिष्ठ अभियंता द्वारा योग (क ु ल) में गलती क े कारण 59273 रुपए काट कर 47183 रुपए लिख दिये गए थे, जिस पर कनिष्ठ अभियंता क े हस्ताक्षर हैं। निर्माण सामग्री की राशि का भुगतान ग्राम पंचायत क े सरपंच को किया गया था, जो एजेंसी काम का संचालन कराती है, जबकि मस्टर रोल का भुगतान तहसील क े कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। निर्माण सामग्री की राशि का भुगतान पंचायत द्वारा किया गया था।"

15. उपर्युक्त बयान स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अपीलार्थी द्वारा दर्ज की गई माप जांच अधिकारी द्वारा सही पाई गई थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उन्हें मानकोट गांव क े कार्य में कोई अनियमितता नहीं मिली। उन्होंने आगे स्वीकार किया कि यदि बिल तैयार करने क े समय मापन पुस्तिकाओं क े योग में कोई गलती की गई थी, तो लेखा शाखा द्वारा गलती को सुधारा जा सकता था।

19,402 characters total

16. पी. डब्लू. 8 महेश प्रसाद माथुर ने आगे कहा कि जहां तक सुरजनपुर का संबंध है, वहाँ किसी भी व्यक्ति को चौकीदार या पर्यवेक्षक क े रूप में नियुक्त नहीं किया गया था। उन्होने कहा कि एक चौकीदार क े अभाव में, यह संभव है कि साइट पर पड़ी सामग्री को कोई भी ले जा सकता है। उन्होंने स्वीकार किया कि यहां तक कि पैटीज भी मौक े पर नहीं पाए गए थे और उन्होने रिपोर्ट में इस बारे में उल्लेख किया है। उन्होंने आगे स्वीकार किया कि यदि 40,677/- रुपये में पैटीज की लागत 6914/- रुपये को शामिल किया जाता है तो क ु ल राशि47,181/- रुपये होती है।

17. पी.डब्ल्यू.[8] महेश प्रसाद माथुर ने आगे कहा है कि निर्माण सामग्री की राशि का भुगतान एजेंसी द्वारा सीधे ग्राम पंचायत क े सरपंच को किया गया था, जबकि मस्टर रोल का भुगतान तहसील क े कर्मचारियों द्वारा किया गया था। निर्माण सामग्री की राशि का भुगतान पंचायत द्वारा किया गया था। इस प्रकार, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि अपीलार्थी की भुगतान को मंजूरी देने या भुगतान करने में कोई भूमिका नहीं थी.

18. पी.डब्ल्यू.[8] महेश प्रसाद माथुर का साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अधिक से अधिक, अपीलार्थी क े कार्य को अनियमित कहा जा सकता है। हालांकि, यह दिखाने क े लिए रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं था कि ऐसी अनियमितताएं धोखाधड़ी क े इरादे से जानबूझकर की गई थीं।

19. मामले क े उस दृष्टिकोण से, हम पाते हैं कि जहां तक भारतीय दंड संहिता की धारा 477 ए क े तहत दोषसिद्धि का संबंध है, यह भी कानून की दृष्टि से संधारणीय नहीं है।

20. राजस्थान राज्य क े विद्वत अपर महाधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी ने कहा कि चूंकि तथ्य क े निष्कर्ष समवर्ती हैं, न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप करने में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए।

21. यह विधि का स्थापित सिद्धांत है कि तथ्य क े समवर्ती निष्कर्षों में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है जब तक कि वे स्पष्ट रूप से विक ृ त ना नजर आए। आखिरकार, समरूपता विक ृ ति का कोई प्रत्युत्तर नहीं है।

22. इस न्यायालय ने महेश दत्तात्रेय तीर्थकर बनाम महाराष्ट्र राज्य क े प्रकरण में क ु छ सिद्धांत निर्धारित किए थे कि कब यह न्यायालय भारत क े संविधान क े अनुच्छेद 136 क े तहत शक्तियों का उपयोग करने और तथ्य क े निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का हकदार होगा। निर्धारित सिद्धांतों में से एक इस प्रकार हैः "जहां अधीनस्थ न्यायालयों क े निष्कर्षों को विक ृ त या बिना किसी साक्ष्य या अप्रासंगिक साक्ष्य क े आधार पर दिखाया गया है या कथित निष्कर्षों को प्रभावित करने वाली अनियमितताएं हैं या जहां न्यायालयों को लगता है कि वे न्याय प्रदान करने मे विफल हुएहैं और निष्कर्षों क े परिणामस्वरूप अत्यधिक कठिनाई होने की संभावना है।"

23. पूर्वोक्त मामले में इस न्यायालय ने इस मुद्दे पर इस न्यायालय द्वारा पूर्व में दिये गए निर्णयों को निर्दिष्ट किया है। इसका उल्लेख करना उचित होगा, जो इस प्रकार हैं: "29. पुनः एच. पी. प्रशासन बनाम ओम प्रकाश [(1972) 1 एस. सी. सी. 249:1972 एस. सी. सी. (क्रिमि.) 88] में इस न्यायालय ने तथ्य क े निष्कर्ष क े साथ हस्तक्षेप क े प्रश्न पर भारत क े अनुच्छेद 136 क े तहत अपनी शक्ति पर विचार करते हुए इस प्रकार मत व्यक्त कियाः (एस. सी. सी. पृष्ठ 256, पैरा 4)" "4. अनुच्छेद 136 क े तहत विशेष अनुमति द्वारा दोषमुक्ति क े खिलाफ अपील में, इस न्यायालय को तथ्य क े निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने की शक्ति निस्संदेह रूप से प्राप्त है, दोषमुक्ति और दोषसिद्धि क े निर्णयों क े बीच कोई अंतर नहीं किया जा रहा है, हालांकि दोषमुक्ति क े मामले में यह आमतौर पर सबूतों क े मूल्यांकन या तथ्यों क े निष्कर्षों पर तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा जब तक कि उसे यह न लगे कि उच्च न्यायालय ने इसमें'विक ृ त या अन्यथा अनुचित तरीक े से'कार्य किया है।"

30. अरुणाचलम बनाम पी. एस. आर. साधननाथम [(1979) 2 एस. सी. सी. 297:1979 एस. सी. सी. (क्रिमि.) 454] में इस न्यायालय ने पूर्वोक्त विनिश्चयों में व्यक्त विचारों से सहमति व्यक्त करते हुए इस प्रकार कहाः (एससीसी पृष्ठ 300, पैरा

4) "4........शक्ति इस अर्थ में परिपूर्ण है कि अनुच्छेद 136 में उस शक्ति को परिभाषित करने वाला कोई शब्द नहीं हैं। लेकिन, शक्ति की प्रक ृ ति ने न्यायालय को ऐसी शक्ति का प्रयोग करने क े लिए स्वयं की सीमा निर्धारित करने क े लिए प्रेरित किया है। यह इस न्यायालय की सुस्थापित पद्धति है कि अनुच्छेद 136 क े अधीन इस शक्ति का सहारा क े वल बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में लिया जा सकता है, जैसे कि जब सामान्य लोक महत्व का कोई विधि का प्रश्न उठता है या कोई विनिश्चय न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर देता है। लेकिन, स्वयं द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों क े बावजूद, इस न्यायालय को तथ्य क े निष्कर्षों क े साथ हस्तक्षेप करने, दोषमुक्ति और दोषमुक्ति क े निर्णयों क े बीच कोई अंतर नहीं करने की भी निस्संदेह शक्ति है, यदि उच्च न्यायालय ने उन निष्कर्षों पर पहुंचने में, 'विक ृ त या अन्यथा अनुचित रूप से'कार्य किया है। (बल दिया गया)

31. पुनः उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बाबुल नाथ [(1994) 6 एस. सी. सी. 29:1994 एस. सी. सी. (क्री.) 1585] में इस न्यायालय ने निम्नलिखित मत व्यक्त कियाः (एस सी सी पृष्ठ 33, पैरा 5) “5 आरंभ में हम यह उल्लेख कर सकते हैं कि संविधान क े अनुच्छेद 136 क े तहत एक अपील में यह न्यायालय सामान्य रूप से साक्ष्य का मूल्यांकन नहीं करता है और गवाहों की विश्वसनीयता और उच्च न्यायालय द्वारा किए गए साक्ष्य क े मूल्यांकन पर सवाल नहीं उठाता है। सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय द्वारा किए गए साक्ष्यों क े मूल्यांकन को स्वीकार करता है, जब तक कि निश्चित रूप से, साक्ष्य क े मूल्यांकन और निष्कर्ष प्रक्रिया कानून की किसी भी त्रुटि से दूषित हो या नैसर्गिक न्याय क े सिद्धांतों क े विपरीत हो, रिकॉर्ड में त्रुटियां और साक्ष्य की गलत व्याख्या की गई हो, या जहां उच्च न्यायालय क े निष्कर्ष रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य से स्पष्ट रूप से अलग और असमर्थनीय हों।”

32. पट्टकल क ुं हिकोया बनाम ठुपियक्कल कोया (2000) 2 एस. सी. सी. 185) में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि जब भारत क े अनुच्छेद 136 क े अधीन कोई अपील उठती है, "उच्चतम न्यायालय की यह प्रथा नहीं है कि वह इस बात की जांच करने क े उद्देश्य से साक्ष्य की पुनः समीक्षा करे कि क्या उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा प्राप्त तथ्य सही है या नहीं। अपवाद क े वल उसी स्थिति मे लाये जा सकते है जंहा वह न्यायालय न्याय प्रदान करने में गंभीर रूप से विफल हुआ हो या स्पष्ट रूप से अवैध हो, लेकिन अन्य किसी आधार पर नहीं।

33. मिथिलेश क ु मारी बनाम प्रेम बिहारी खरे [(1989) 2 एससीसी 95] वाले प्रकरण में इस न्यायालय ने (एससीसी पृष्ठ 99) में यह अभिनिर्धारित किया है कि जहां अधीनस्थ न्यायालयों क े निष्कर्ष "विक ृ त या बिना किसी साक्ष्य या अपूर्ण साक्ष्य क े आधार पर दिखाए जाते हैं या कथित निष्कर्षों को प्रभावित करने वाली अनियमितताएं हैं या जहां न्यायालय यह महसूस करता है कि न्याय नहीं मिल पाया है और यह पाया गया है कि इसक े परिणामस्वरूप अत्यधिक कठिनाइयाँ होने की संभावना है,उच्चतम न्यायालय क े वल इस आधार पर हस्तक्षेप करने से इनकार नहीं कर सकता था कि विचाराधीन निष्कर्ष तथ्य क े निष्कर्ष हैं (बल दिया गया)

24. हाल ही में, इस न्यायालय ने अशोकसिंह जयेन्द्रसिंह बनाम गुजरात राज्य क े प्रकरण में यह भी अभिनिर्धारित किया था कि जब उच्च न्यायालय सही परिप्रेक्ष्य में मौखिक साक्ष्य का मूल्यांकन करने में विफल रहा है, तो यह न्यायालय निश्चित रूप से साक्ष्य की पुनः मूल्यांकन करने का हकदार होगा। उक्त प्रकरण में भी, इस न्यायालय द्वारा महत्वपूर्ण साक्ष्य की उपेक्षा करने क े बाद दोषसिद्धि की गई थी, दोषसिद्धि क े आदेश को रद्द कर दिया है और अभियुक्त को बरी कर दिया है.

25. वर्तमान मामले में, जैसा कि इसमें ऊपर चर्चा की गई है, विचारण न्ययालय और उच्च न्यायालय दोनों पी डब्लू 8 श्री महेश प्रसाद माथुर और पी डब्लू 14 जय भगवान क े साक्ष्य में प्रासंगिक और महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति को ध्यान में रखने में विफल रहे हैं। हमारे विचार में, उक्त स्वीकारोक्तियाँ महत्वपूर्ण थीं। हमारे विचार में, उक्त महत्वपूर्ण स्वीक ृ तियों को नजरअंदाज करक े दोषसिद्धि क े आदेश का आधार बनाना, आक्षेपित निर्णय को विक ृ ति क े दायरे में लाएगा।

26. इस प्रकार, अपील स्वीकार की जाती है। विद्वत विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम संख्या 1, जयपुर द्वारा दर्ज और उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि किए गए दोषसिद्धि और दंड क े आदेश को रद्द कर दिया जाता है. अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी किया जाता है। जमानत मुचलकों का उन्मोचन कर दिया जाता है।

27. लंबित आवेदन, यदि कोई हो, निस्तारित किए जाते है। जे. (बी. आर. गवई) जे. (पमीदीघंटम श्री नरसिम्हा) नई दिल्ली। 28 जुलाई, 2022 यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास'क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय वादी क े प्रतिबंधित उपयोग क े लिए उसकी भाषा में समझाने क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा। (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.