Sadhana Chaudhary v. Rajasthan State and Others

Supreme Court of India · 12 Jul 2022
Ajay Rastogi; Vikram Nath
Criminal Appeal No 936 of 2022 @ SLP (Crl) No 8477 of 2021
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court set aside anticipatory bail granted to a police officer accused of serious sexual offenses and misuse of official position, emphasizing strict scrutiny in bail matters involving law enforcement personnel.

Full Text
Translation output
प्रतिवेद्य
भारत का सर्वोच्च्च न्यायालय
दांडिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
दाण्डिक अपीलीय संख्या 936/2022
(एसएलपी (सीआरएल) संख्या 8477/2021 से उत्पन्न)
साधना चौधरी अपीलार्थी (गण)
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य प्रतिवादी (गण)
निर्णय
विक्रम नाथ, न्यायाधीश
JUDGMENT

1. अनुमति दी गई।

2. अपीलकर्ता, शिकायतकर्ता / पीड़िता / अभियोक्त्री है। उसने यह अपील राजस्थान उच्च न्यायालय, खण्डपीठ जयपुर द्वारा दिनांक 25.08.2021 को एस. बी. दाण्डिकविविध जमानत याचिका संख्या 6394 (क ं वर पाल सिंह बनाम राजस्थान राज्य) में पारित आदेश/निर्णय की सत्यता की आलोचना करते हुए दायर की है, जिसक े तहत उच्च न्यायालय ने पुलिस थाना, करणी विहार, जयपुर, में भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 341, 354, 379 और 376 क े तहत दर्ज प्राथमिकी संख्या 161/2020 में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 क े तहत अग्रिम जमानत की राहत क े लिए आवेदन को स्वीकार किया ।

3. जैसा कि वर्तमान मामला अग्रिम जमानत मंजूर करने वाले आदेश से संबंधित है, हम सतर्क ता से तथ्यों और तर्कों को संक्षिप्त में संदर्भित कर रहे हैं ताकि कोई भी पक्ष पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो या निचली अदालत किसी भी टिप्पणी से प्रभावित न हो, जो हमारे द्वारा इस आदेश में की जा सकती है।

4. अभियोजन पक्ष की संक्षेप में कहानी यह है कि वर्ष 2018 में, जब प्रतिवादी नं.2,थाना अधिकारी, महिला थाना, झुंझुनू क े रूप में तैनात था, अपीलकर्ता की बहन ने उसक े ससुराल वालों क े खिलाफ उसी पुलिस थाने में शिकायत की थी। प्रतिवादी नं.[2] ने बैंक पास बुक, विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र, विवाह क े फोटो, आधार कार्ड और अपनी बहन का जन्म प्रमाण पत्र अपने पास रखा था और उससे कहा था कि वह बाद में वापस ले जाये । 25 सितंबर, 2018 को, जब अपीलकर्ता को प्रत्यर्थी नं. 2 से कागजात वापस लेने क े लिए बुलया तो उसक े झुंझुनू पहुंचने पर, उसे सूचित किया गया कि उसक े आधिकारिक आवास से कागजात वापस ले लें, जहां उसे अनिवार्य रूप से जाना पड़ा क्योंकि उसे उसी दिन जयपुर वापस लौटना था। आवास पर, प्रतिवादी नं.[2] ने अपीलकर्ता को छाछ की पेशकश की, जिसका उसने भोलेपन में सेवन कर लिया, लेकिन जाहिरा तौर पर वह ड्रग्स से युक्त था जिसक े परिणामस्वरूप अपीलकर्ता बेहोश हो गई। जब उसे होश आया, तो उसने खुद को बहुत अजीब स्थिति में पाया और तुरंत महसूस किया कि प्रतिवादी नं.[2] ने उसका शोषण किया है। प्रतिवादी नं.[2] ने उसे धमकी दी कि उसने अपने मोबाइल पर अश्लील और आपत्तिजनक परिस्थितियों में वीडियो बनाए हैं और तस्वीरें खींची हैं और अगर उसने उसकी मांगों और आदेशों को मानना जारी नहीं रखा, तो वह सब क ु छ सार्वजनिक कर देगा।

5. यह बताया गया है कि अपीलकर्ता का शोषण लगभग दो वर्षों तक जारी रहा। मई, 2020 में, प्रतिवादी नं.[2] उसक े निवास पर आया,जहां वह अपने पति और बच्चों क े साथ रहती है। वह उसे अपनी जीप में जबरन किसी अज्ञात स्थान पर ले गया, शारीरिक रूप से उस पर हमला किया, उसका मोबाइल छीन लिया, फिर उसे गाड़ी से किसी जगह पर ले गया जहां बाद में किसी समय पर उसकी पत्नी और बच्चे आए और उन्होंने भी उस पर हमला किया, जिसक े परिणामस्वरूप वह बेहोश हो गई। पुलिस विभाग क े गश्ती वाहन ने उसे बचा लिया, जिसक े बाद उसने करणी विहार पुलिस स्टेशन, जयपुर में भा.दं.सं. की धारा 376, 323, 341, 354 और 379 क े तहत दंडनीय अपराधों क े लिए 01.06.2020 को प्राथमिकी संख्या 161/2020 दर्ज कराई। प्राथमिकी क े वल उस दिन की घटना क े बारे में थी, हालांकि, बाद में, जब अपीलकर्ता ठीक हो गई, तो उसने द.प्र.सं. की धारा 164 क े तहत अपने बयान में पूरी कहानी सुनाई।

6. इसक े अलावा, अपीलकर्ता का वाद है की प्रत्यर्थी नं.[2] ने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग करते हुए अपनी पत्नी द्वारा एक झूठी रिपोर्ट अपीलकर्ता क े खिलाफ पांच दिन बाद 05.06.2020 को दर्ज कराई, जो पुलिस स्टेशन, झोटवाड़ा, जयपुर में प्राथमिकी संख्या 234/2020 क े रूप में दर्ज की गई थी। यह भी बताया गया कि जांच क े बाद कथित प्राथमिकी में पूरी तरह से गलत और झूठे तथ्य पाए गए हैं और एक समापन रिपोर्ट पहले ही पेशकी जा चुकी है। हालांकि, जहां तक अपीलकर्ता द्वारा दर्ज प्राथमिकी का संबंध है,क्योंकि प्रत्यर्थी नं.[2] को हिरासत में नहीं लिया गया है, वह जांच में सहयोग नहीं कर रहा है और निष्पक्ष और उचित जांच क े लिए उससे कई चीजें और मोबाइल फोन बरामद किए जाने की आवश्यकता है। अपीलकर्ता क े अश्लील वीडियो और तस्वीरों पर नियंत्रण रखना भी आवश्यक है, इसलिए आरोपों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उसकी न्यायिक हिरासत की आवश्यकता है ।

7. अग्रिम जमानत का आदेश, जिसे उच्च न्यायालय क े समक्ष याचिका में निहित दावों को सही मान कर सरसरी तरीक े से पारित किया गया है, को रद्द करने की आवश्यकता है। यह भी अपीलकर्ता का वाद है कि प्रत्यर्थी नं.[2] ने आगे जाकर अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग करते हुए अपीलकर्ता क े खिलाफ बल्कि उसक े परिवार क े सदस्यों क े खिलाफ भी कई झूठी शिकायतें दर्ज कारवाई, ताकि उस पर वर्तमान प्राथमिकी को वापस लेने का दबाव बनाया जा सक े ।

8. राज्य-प्रतिवादी ने एक विस्तृत प्रति-शपथपत्र दाखिल किया है। संबंधित अनुछेद सं.[5] से 10 तक प्रासंगिक हैं जो इस प्रकार हैंः “5. यह अत्यंत सम्मान क े साथ प्रस्तुत किया जाता है कि प्राथमिकी 161/2020 की जांच में पर्याप्त साक्ष्य का पता चला है, जो साबित करता है कि अभियुक्त/प्रतिवादी संख्या 2, जो खुद एक पुलिस अधिकारी है, भा.दं.सं. की धारा 323,341,354,504,379,376 क े तहत अपराधों का दोषी है, जैसा कि

23.11. 2021 की तथ्यात्मक रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है।

6. इसक े अलावा, 05.06.2020 को एक और प्राथमिकी संख्या 234/2020 श्रीमती उषा क ं वर जो की प्रतिवादी की पत्नी है, क े कहने पर भा.दं.सं. की धारा 143,323,341,384,504,379,452 क े तहत जयपुर पश्चिम क े पुलिस थाना झोटवाड़ा में दर्ज की गई थी। विस्तृत जांच क े बाद, यह पाया गया कि कथित प्राथमिकी झूठी जानकारी क े आधार पर दर्ज की गई थी और प्रतिवादी और उसक े परिवार क े किसी भी सदस्य क े खिलाफ कोई आपराधिक क ृ त्य नहीं पाया गया। इस प्रकार, द.प्र.सं.की धारा 173 क े तहत अंतिम रिपोर्ट पहले ही 27.09.2021 को एसीजेएम श्रेणी-3 की अदालत क े समक्ष दायर की जा चुकी है, जिसमें सुनवाई की अगली तारीख 25.01.2022 निर्धारित की गई है । दिनांक 25.11.2021 की तथ्यात्मक रिपोर्ट की एक मूल अनुवाद प्रतिलिपि जिसमें इसकी जांच और स्थिति का विवरण दिया गया है, यहां संलग्न है और अनुलग्नक- आर 2 (पृष्ठ संख्या 45 से 99)क े रूप में चिन्हित किया गया है।

7. उपरोक्त दोनों तथ्यात्मक प्रतिवेदनों में बताए गए तथ्यों क े अलावा, यह अत्यंत सम्मान क े साथ निवेदन किया जाता है कि अभियुक्त/प्रत्यर्थी नं. 2 एक पुलिस अधिकारी है जो कानून की प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ है और राजस्थान राज्य में कानून प्रवर्तन तंत्र का एक अंदरूनी सूत्रहै, इसलिए, यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि अभियुक्त/प्रत्यर्थी नं. 2 माननीय न्यायालय क े संरक्षण में हुए बिना जांच आगे बढ़े।

8. इसक े अलावा, उपरोक्त दो तथ्यात्मक रिपोर्टों में अब तक की जांच में सामने आया तथ्य याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि करता है और उन्हें साबित करता है। इसक े अलावा, प्राथमिकी 234/2020 में एफआर में विस्तार से बताया गया है कि क ै से याचिकाकर्ता और उसक े खिलाफ एक झूठा मामला बनाया गया था।

9. यह अत्यंत सम्मान क े साथ निवेदन किया जाता है कि ऊपर दिए गए तथ्यों क े बल पर, उत्तरदाता प्रत्यर्थी अभियुक्त/प्रत्यर्थी नं. 2 को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने की मांग करता है। विशेष रूप से, यह आवश्यक है कि सबूत क े अन्य टुकड़ों क े अलावा पीड़ित क े अश्लील फोटो, वीडियो, मोबाइल फोन और कपड़े क े बैग को खोजने क े लिए सभी प्रयास किए जाएं, जिसकी जानकारी क े वल अभियुक्त/प्रतिवादी नं. 2 को होगी। यह नोट किया जा सकता है कि आरोपी/प्रतिवादी नं. 2 ने जांच में पूरी तरह से सहयोग नहीं किया है, जैसा कि दिनांक 23.11.2021 की तथ्यात्मक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है।

10. उपर्युक्त प्रस्तुतियों क े आलोक में, माननीय न्यायालय क े समक्ष यह अत्यंत सम्मान क े साथ प्रार्थना की जाती है कि प्रत्यर्थी नं. 2 की अग्रिम जमानत मंजूर करने वाले आक्षेपित आदेश को रद्द किया जाए और अभियुक्त को माननीय न्यायालय से किसी संरक्षण क े बिना, प्रत्यर्थी-राज्य जैसा वह ठीक समझे, अन्वेषण करने क े लिए स्वतंत्र है।"

9. उपर्युक्त जवाबी शपथ पत्र में, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त, जयपुर (पश्चिम), जयपुर ने, जो राजस्थान राज्य द्वारा विधिवत रूप से प्राधिक ृ त है, हलफनामा दायर किया है ।अनुछेद 5 में कहा है कि पर्याप्त साक्ष्य का पता चला है जो साबित करता है कि प्रत्यर्थी नं.2, जो एक पुलिस अधिकारी है, अपराधों का दोषी है, जिसका विवरण 23.11.2021 की रिपोर्ट में दिया गया है। 10.अनुछेद 6 में यह कहा गया है कि प्रतिवादी नं.[2] ने प्राथमिकी संख्या 234/2020 क े रूपमें अपीलकर्ता क े खिलाफ एक झूठी रिपोर्ट दर्ज करवाई, जिसे विस्तृत जांच क े बाद झूठी सूचना क े आधार पर होना पाया गया और अपीलकर्ता या उसक े सदस्यों क े खिलाफ कोई आपराधिक क ृ त्य नहीं पाया गया। द.प्र.सं. की धारा 173 (2) क े तहत अंतिम रिपोर्ट पहले ही 27.09.2021 को प्रस्तुत की जा चुकी है।

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11. अनुछेद 7 में यह कहा गया है कि पुलिस अधिकारी, जो कानून की प्रक्रिया में अच्छी तरह से पारंगत है और कानून प्रवर्तन तंत्र का एक हिस्सा है, यह और भी जरूरी हो जाता है कि प्रत्यर्थी नं.[2] क े इस न्यायालय का संरक्षण दिये बिना जांच जारी रहे।

12. अनुछेद 9 में यह कहा गया है कि अग्रिम जमानत मंजूर करने क े आदेश को विशेष रूप से इस कारण रद्द करने की आवश्यकता इसलिए है कि कि सबूत क े अन्य टुकड़ों क े अलावा पीड़ित क े अश्लील फोटो, वीडियो, मोबाइल फोन और कपड़े क े बैग को खोजने क े लिए प्रयास अभी जारी हैं, जिसकी जानकारी क े वल अभियुक्त/प्रतिवादी नं. 2 को होगी।अनुछेद 9 में यह भी विशेष रूप से कहा गया है कि उसने जांच में पूरी तरह से सहयोग नहीं किया है, जैसा कि 23.11.2021 की तथ्यात्मक रिपोर्ट से स्पष्ट है।

13. दूसरी ओर, प्रतिवादी नं.[2] ने उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश को न्यायोचित ठहराया है। विद्वान अधिवक्ता क े अनुसार, अपीलकर्ता प्रत्यर्थी नं.[2] और उनक े परिवार क े सदस्यों का शोषण कर रही है। अग्रिम जमानत का आदेश पारित करते समय उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए कारण विधिक रूप से ग्राह्य तथ्यों और उच्च न्यायालय क े समक्ष रखी गई परिस्थितियों पर आधारित हैं।उन्होंने यह भी कहा कि एक बार जब उच्च न्यायालय अपने विवेक का प्रयोग कर लेता है, तो यह न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।यह भी निवेदन किया जाता है कि अपीलकर्ता और उसक े रिश्तेदारों क े खिलाफ दर्ज की गई अन्य प्राथमिकियाँ तीसरे व्यक्तियों/अजनबियों द्वारा है जो अपीलकर्ता और उसक े रिश्तेदारों द्वारा उगाही क े शिकार हैं। उनका प्रतिवादी नं. 2 से कोई लेना देना नहीं है।

14. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 क े अधीन अग्रिम जमानत की प्रयोज्यता या मंजूरी पर विधि को संक्षेप में निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता हैः

14.1. श्री गुरबख्श सिंह सिबिया और अन्य बनाम पंजाब राज्य ( (1980) 2 एससीसी 565) वाले मामले में,इस न्यायालय की एक संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश वाई. वी. चंद्रचूड़ ने न्यायालय क े लिए बोलते हुए अग्रिम जमानत की मंजूरी क े लिए विचारों पर विस्तार से विचार किया।

14.2. सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य ((2011) 1 एससीसी 694)वाले मामले में,इस न्यायालय ने श्री गुरबख्श सिंह सिबिया में संविधान पीठ क े निर्णय पर भरोसा करते हुए प्रतिवेदन क े अनुछेद 112 में निम्नलिखित कारक और मानदंड अधिकथित किए गए हैं जिन पर अग्रिम जमानत क े आवेदन पर विचार करते समय विचार किया जाएः "(i) आरोप की प्रक ृ ति और गंभीरता और अभियुक्त की सटीक भूमिका को गिरफ्तारी से पहले अच्छी तरह समझा जाना चाहिए।" (ii) आवेदक का पूर्ववृत्त जिसक े अंतर्गत यह तथ्य भी है कि क्या अभियुक्त को पहले किसी संज्ञेय अपराध क े संबंध में न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास भोगना पड़ा । (iii) आवेदक क े न्याय से भागने की संभावना (iv) अभियुक्त द्वारा समान या अन्य अपराधों को दोहराए जाने की संभावना (v) जहां आरोप क े वल आवेदक को गिरफ्तार करक े उसे आहत करने या अपमानित करने क े उद्देश्य से लगाए गए हैं (vi) अग्रिम जमानत मंजूर करने का प्रभाव विशेष रूप से बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करने वाले मामलों में (vii) न्यायालयों को अभियुक्त क े विरुद्ध पूरी उपलब्ध तथ्यों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए। अदालत को मामले में आरोपी की सही भूमिका को भी स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। जिन मामलों में आरोपी को दंड संहिता, 1860 की धारा 34 और 149 की मदद से शामिल किया गया है, उन पर अदालत को और अधिक सावधानी और एहतियात क े साथ विचार करना चाहिए क्योंकि मामलों में अत्यधिक उलझाव होना आम है और यह चिंता का विषय है। (viii) अग्रिम जमानत की मंजूरी क े लिए प्रार्थना पर विचार करते समय, दो कारकों क े बीच एक संतुलन बनाया जाना चाहिए, अर्थात्, स्वतंत्र, निष्पक्ष और पूर्ण जांच पर कोई प्रतिक ू ल प्रभाव नहीं डाला जाना चाहिए और अभियुक्त व्यक्ति क े उत्पीड़न, अपमान और अनुचित निरोध की रोकथाम होनी चाहिए । (ix) न्यायालय को गवाहों से छेड़छाड़ करने या शिकायतकर्ता को धमकी देने की युक्तियुक्त आशंका पर विचार करना चाहिए; (x) अभियोजन में गंभीरता में कमी पर हमेशा विचार किया जाना चाहिए और यह क े वल वास्तविकता का तत्व है जिस पर जमानत मंजूर करने क े मामले में विचार किया जाना चाहिए और घटनाओं क े सामान्य अनुक्रम में अभियोजन की वास्तविकता क े बारे में क ु छ संदेह होने की स्थिति में अभियुक्त जमानत क े आदेश का हकदार है।"

14. एक अन्य संविधान पीठ क े निर्णय, सुशीला अग्रवाल और अन्य बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) और अन्य ((2020) 5 एससीसी 1)क े मामले में, प्रतिवेदन क े अनुछेद 85 में न्यायाधीश रविन्द्र भट्ट ने धारा 438 क े तहत आवेदनों पर विचार करने क े लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों को निर्धारित किया। न्यायमूर्ति एम आर शाह ने एक अलग राय लिखी थी। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति विनीत सरन दोनों मतों से सहमत थे। अनुछेद 92, 92.[1] से 92.[9] में बताए गए अंतिम मार्गदर्शक कारक यहां पुन: प्रस्तुत किए गए हैं: “92. यह न्यायालय, दो निर्णयों में उपर्युक्त चर्चा क े आलोक में, और संदर्भ क े जवाबों को ध्यान में रखते हुए, स्पष्ट करता है कि द.प्र.सं. की धारा 438 क े तहत याचिकाओं पर विचार करते हुए न्यायालयों द्वारा निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है।

92.1. श्री गुरबक्श सिंह सिबिया और अन्य बनाम पंजाब राज्य ((1980) 2 एससीसी 565)वाले मामले क े फ ै सले क े अनुरूप, जब व्यक्ति गिरफ्तारी की आशंका की शिकायत करता है और आदेश क े लिए आता है, तो आवेदन ठोस तथ्यों पर आधारित होना चाहिए (अस्पष्ट या सामान्य आरोप नहीं)। अग्रिम जमानत की मांग करने वाले आवेदन में अपराध से संबंधित क े वल आवश्यक तथ्य होने चाहिए और आवेदक को उचित रूप से गिरफ्तारी की आशंका क्यों है, साथ ही साथ कहानी में उसका पक्ष भी होना चाहिए। ये न्यायालय क े लिए आवश्यक हैं, जो उसक े आवेदन पर विचार कर रहा है की खतरे या आशंका, उसकी गंभीरता या संजीदगी और कोईभी शर्त जो लगानी पड़ सकती हो की उपयुक्तता का मूल्यांकन करे। यह आवश्यक नहीं है कि कोई आवेदन प्राथमिकी किए जाने क े पश्चात् ही प्रस्तुत किया जाए, इसे पहले प्रस्तुत किया जा सकता है, बशर्ते कि तथ्य स्पष्ट हों और गिरफ्तारी की आशंका करने क े लिए युक्तियुक्त आधार हो।

92. 2.जिस अदालत क े पास धारा 438 क े तहत आवेदन क े साथ संपर्क किया गया हो उसक े लिए यह लिए उचित होगा की वह(गिरफ्तारी की) आशंका की गंभीरता क े आधार परलोक अभियोजक को नोटिस जारी करे और सीमित अंतरिम अग्रिम जमानत मंजूर करते समय भी तथ्य अभिप्राप्त करें।

92.3. दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 में ऐसा क ु छ भी नहीं है जो अदालतों को समय क े संदर्भ में, या प्राथमिकी दर्ज करने, जांच या पूछताछ क े दौरान पुलिस द्वारा किसी गवाह क े बयान दर्ज करने आदि पर राहत को सीमित करने की शर्त लगाने क े लिए बाध्य करता हो।किसी आवेदन (अग्रिम जमानत की मंजूरी क े लिए) पर विचार करते समय न्यायालय को अपराध की प्रक ृ ति, व्यक्ति की भूमिका, अन्वेषण प्रक्रिया को प्रभावित करने या साक्ष्य क े साथ छेड़छाड़ (गवाहों को डराने-धमकाने सहित) की संभावना, न्याय से भागने की संभावना (जैसे देश छोड़कर जाना), आदि पर विचार करना न्यायसंगत होगा।धारा 437 (3), दण्ड प्रक्रिया संहिता में दी गई शर्तों को लागू करना चाहिए। [धारा 438 (2) क े आधार पर]। अन्य प्रतिबंधात्मक शर्ते अधिरोपित करने की आवश्यकता का निर्णय मामले क े आधार पर और राज्य या जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत तथ्यों क े आधार पर किया जाएगा। यदि मामला या मामले की जरूरत हो तो ऐसी विशेष या अन्य प्रतिबंधात्मक शर्तें अधिरोपित की जा सकती हैं, लेकिन सभी मामलों में नियमित तरीक े से अधिरोपित नहीं की जानी चाहिए। इसी प्रकार, ऐसी शर्ते जो अग्रिम जमानत की मंजूरी को सीमित करती हैं, मंजूर की जा सकती हैं, यदि वे किसी मामले या मामलों क े तथ्यों में अपेक्षित हैं, तथापि, ऐसी सीमित शर्ते हमेशा अधिरोपित नहीं की जा सकती हैं।

92.4. न्यायालयों को आमतौर पर अग्रिम जमानत मंजूर करने या इससे इनकार करने पर विचार करते समय अपराधों की प्रक ृ ति और गंभीरता, आवेदक की भूमिका और मामले क े तथ्यों जैसे विचारों से प्रेरित होकर विचार करना चाहिए की अग्रिम जमानत देना है या नहीं। जमानत देना या न देना विवेक का विषय है। समान रूप से और यदि ऐसा है तो किस प्रकार की विशेष शर्ते अधिरोपित की जानी हैं (या अधिरोपित नहीं की जानी हैं) मामले क े तथ्यों पर निर्भर हैं और न्यायालय क े विवेकाधिकार क े अधीन हैं।

92.5. अग्रिम जमानत, अभियुक्त क े आचरण और व्यवहार क े आधार पर, आरोप पत्र दाखिल करने क े बाद विचारण क े अंत तक जारी रह सकती है।

92.6. अग्रिम जमानत का आदेश इस अर्थ में 'आवरण'नहीं होना चाहिए, यानि कि गिरफ्तारी से अनिश्चित संरक्षण मिलने पर यह अभियुक्त को आगे अपराध करने का संबल न दे। यह उस अपराध या घटना तक सीमित होना चाहिए जिसक े लिए किसी विशिष्ट घटना क े संबंध में गिरफ्तारी की आशंका जताई गई है। यह भविष्य की किसी घटना क े संबंध में काम नहीं कर सकता है जिसमें कोई अपराध शामिल हो।

92.7. अग्रिम जमानत का आदेश किसी भी तरह से पुलिस या जांच एजेंसी क े अधिकारों या कर्तव्यों को सीमित या प्रतिबंधित नहीं करता है, उस व्यक्ति क े खिलाफ आरोपों की जांच करने क े लिए जो गिरफ्तारी पूर्व जमानत चाहता है और उसे मंजूरी दी जाती है।

92.8. अन्वेषण प्राधिकारी की अपेक्षाओं को सुकर बनाने क े लिए "सीमित अभिरक्षा"या "मानित अभिरक्षा"क े संबंध में सिबिया में की गई टिप्पणियां, किसी वस्तु की वसूली या किसी तथ्य की खोज की दशा में, धारा 27 क े उपबंधों को पूरा करने क े प्रयोजन क े लिए पर्याप्त होंगी, जो ऐसी किसी घटना (अर्थात् मानित अभिरक्षा में) क े दौरान किए गए किसी कथन से संबंधित है। ऐसी स्थिति में, अभियुक्त से अलग से आत्मसमर्पण करने और जमानत लेने क े लिए कहने का कोई प्रश्न (या आवश्यकता) नहीं है। सिबिया (पूर्वोक्त) ने यह मत व्यक्त किया था कि "यदि और जब भी अवसर पैदा होता है, तो अभियोजन पक्ष क े लिए इस न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य बनाम देओमन उपाध्याय (एआईआर 1960 एससी 1125)वाले मामले में दिए गए सिद्धांत का अवलंब लेकर जमानत पर रिहा व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी क े अनुसरण में किए गए तथ्यों की खोज क े संबंध में साक्ष्य अधिनियम की खंड 27 क े लाभ का दावा करना संभव हो सकता है।"

92.9. किसी भी शर्त क े उल्लंघन किए जाने पर जैसे कि फरार होने, जांच क े दौरान सहयोग नहीं करने, परिहार करने, जांच या मुकदमे क े परिणाम को प्रभावित करने की दृष्टि से गवाहों को धमकाने या उकसाने की स्थिति में पुलिस या जांच एजेंसी को धारा 439 (2) क े तहत आरोपी को गिरफ्तार करने क े निर्देश क े लिए संबंधित अदालत में जाने का अधिकार है जिसने अग्रिम जमानत प्रदान की है।

15. प्रस्तुतियों पर विचार करने क े बाद, रिकॉर्ड पर आए तथ्यों, विशेष रूप से राज्य-प्रतिवादी संख्या-1 का उनक े प्रति-शपथ पत्र में लिया गया मत और अग्रिम जमानत की मंजूरी या अस्वीक ृ ति पर माजूद कानून क े मद्देनजर, हमारा यह मत है कि अभिकथित अपराधों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, यह अग्रिम जमानत मंजूर करने क े लिए एक उपयुक्त मामला नहीं था, जबकि राज्य क े अनुसार, बरामदगियां अभी की जानी हैं और प्रत्यर्थी नं.[2] ने जांच में पूरा सहयोग नहीं दिया है।

16. प्रतिवादी नं.[2] एक आम आदमी नहीं है, कानून का पालन करने वाला व्यक्ति होने क े नाते कानून क े प्रति उसकी निष्ठा सामान्य रूप से एक आम आदमी से की जाने वाली अपेक्षा से अधिक होनी चाहिए, जिसका पालन करने में वह स्पष्ट रूप से विफल रहा।

17. हम यह भी महसूस करते हैं कि उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थी नं. 2 द्वारा उसकी याचिका में स्थापित मामले को सच क े रूप में स्वीकार कर कार्यवाही की है और उस आधार पर अग्रिम जमानत मंजूर की है। हमारी राय में उच्च न्यायालय ने त्रुटि की है ।

18. तदनुसार, अपील मंजूर किए जाने की आवश्यकता है। उच्च न्यायालय क े दिनांक 25.08.2021 क े आक्षेपित निर्णय और आदेश को रद्द किया जाता है और प्रतिवादी नं.[2] द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 क े तहत दायर याचिका को बर्खास्त किया जाता है।

19. हम प्रत्यर्थी नं.[2] को आत्मसमर्पण क े लिए दो सप्ताह का समय देते हैं, जिसक े न होने पर जांच एजेंसी उसे तुरंत गिरफ्तार करने और कानून क े अनुसार निष्पक्ष और उचित तरीक े से जांच करने क े लिए स्वतंत्र होगी।

20. इसमें ऊपर की गई टिप्पणियां क े वल अपील क े निपटान क े लिए हैं। यदि नियमित जमानत आवेदन दायर किया जाता है, तो ऊपर की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना कानून क े अनुसार उसक े स्वयं क े गुण-दोष पर विचार किया जा सकता है।

21. अपील उपर्युक्त रूप में स्वीकार की जाती है। …………………… न्यायाधीश [अजय रस्तोगी] …………………… न्यायाधीश [विक्रम नाथ] नई दिल्ली, 12 जुलाई, 2022 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.