Full Text
भारतीय सव�च् न्यायाल
दािण्ड अपील�य अ�धका�रता
दां�डक अपील सं.1217/ 2022
(@�व.अ.या.(दां.) सं.5806/ 2022)
क�पल गुप्त .... अपीलाथ�(गण)
बनाम
रा.रा.�े.�दल्ल एवं अन् .... प्रत्(गण)
�नणर्
JUDGMENT
1. अनुम�त प्रदा�न न्य., बी.आर.गवई
2. यह अपील �दल्ल उच् न्यायाल क े फािज़ल एकल न्यायाधी द्वार पा�रत �दनांक 28.09.2021क े �नणर् और आदेश को चुनौती देती है िजसक े द्वार दािण्ड �व.वा.सं.1567/ 2021को खा�रज कर �दया गया था िजसक े प�रणामस्वर भारतीय दंड सं�हता (‘भा.दं.सं.’) क� धारा 376 क े अंतगर् होने वाल� कायर्वाह को अ�भखं�डत करने हेतु प्रत् द्वार दायर प्राथर पत भी खा�रज कर �दया गया था।
3. प्राथ�म (‘एफ़.आई.आर.’) सं. 569/ 2020 �दनांक 25.08.2020 इस मामले क� प्रत् सं. 2 क े आग् पर दजर हुई। प्राथ�म म� यह कहा गया है �क फ़रवर� 2020 म� उसका एक्सीड� हुआ था िजसम� उसक� जांघ और टखने पर चोट� आई थीं। इसक े अ�त�रक् यह भी तहर�र �कया गया है �क वह असहाय और आ�थर् रू से परेशान हो गयी थी और अपने भ�वष् क� सुर�ा क े �लए एक बहुराष्ट् क ं पनी म� काम करने क� इच् छु थी और नौकर� ढूंढ रह� थी। नौकर� क� खोज क े दौरान, �शकायतकतार को मालूम हुआ �क अपीलाथ� अपने �लए एक �नजी सहायक (पसर्न अ�सस्ट�) क� तलाश म� है। अ�भयोजन प� क े अनुसार, प्रत् सं. 2 और अपीलाथ� क े बीच मैसेज क े माध्य से सं प क र हुआ िजसक े बाद प्रत् सं. 2 ने अपना लोक े शन अपीलाथ� को भेजा िजसक े अनुसार अपीलाथ� उसक े घर गया था। तद्पश्च, बलात्का क� घटना होने का आरोप लगाया गया है।
4. यह प्रत होता है �क उपरोक् प्राथ�म दजर होने क े बाद, वतर्मा अपीलाथ� द्वार प्रत् सं. 2 क े �वरुद एक और प्राथ�म दजर कराई गई िजसम� ज़बरदस्त वसूल� करने का आरोप लगाया गया।
5. महरौल� थाने म� दजर प्राथ�म सं. 824/ 2020 से उद्भू दोन� मामल� म� आरोप पत दायर हो चुक े ह�।
6. तद्पश्च यह प्रत होता है �क भा.दं.सं. क� धारा 376 से उद्भू मामले, यानी प्राथ�म सं. 569/ 2020, म� सौहादर्पूण समझौता हो गया था और उसक े प�रणामस्वर दं.प.सं. क� धारा 482 क े अंतगर् होने वाल� कायर्वाह को अ�भखं�डत करने क े �लए एक या�चका दायर क� गई थी। आ�े�पत आदेश क े माध्य से माननीय उच् न्यायाल ने उपरोक् या�चका को खा�रज कर �दया है।
7. मामले क े �व�चत तथ्य और हालात� क े मद्देनज़, हमने अपीलाथ� और प्रत् सं. 2 दोन� को �दनांक 14.07.2022 क े आदेश क े माध्य से न्यायाल म� व्यिक्त रू से प्रस् होने क े �नद�श �दए थे।
8. उपरोक् आदेश क े अनुसरण म�, अपीलाथ� और प्रत् सं. 2 स्वय न्यायाल म� प्रस् ह�।
9. सुबह क े सत म�, जब इस मामले पर लम्ब बहस हुई, तब हमने अपीलाथ� क े फािज़ल अ�धवक्त, डॉ. एन. प्रद शमार और प्रत् सं. 1 क े फािज़ल अ�त�रक् महा सॉ�ल�सटर, श् �वक्रमज बनज� को सुना। फािज़ल अ�त�रक् महा सॉ�ल�सटर, श् बनज� ने यह प्रस् �कया �क वतर्मा अपराध एक जघन् अपराध है और सम्पूण समाज क े �वरुद है। इसक े अ�त�रक् उन्ह�न यह भी प्रस् �कया �क यह एक सुस्था�प �व�ध है �क गंभीर और जघन् अपराध� म� दोन� प�� क� सहम�त क े बावजूद न्यायाल को कायर्वाह को अ�भखं�डत नह�ं करना चा�हए।
10. चूँ�क प्रत् सं. 2 क� ओर से कोई प्रस् नह�ं हुआ था, हमने फािज़ल अ�धवक्त, श् रउफ रह�म से न्या �मत क� भू�मका �नभाने और प्रत् सं. 2 क� ओर से उपिस्थ होने का अनुरोध �कया। हमने फािज़ल अ�त�रक् महा सॉ�ल�सटर और फािज़ल अ�धवक्त, श् रउफ रह�म से प्रत् सं. 2 से बात कर क े यह पता लगाने का भी अनुरोध �कया �क इस कायर्वाह को समाप् करवाने क े �लए द� गई अनुम�त स्वैिच् थी या �कसी दबाव म� आकर द� गई थी। हमने मामले को दोपहर क े सत म� सुनने क े �लए �नयत �कया।
11. दोपहर क े सत म� जब मामले को आहूत �कया गया तो फािज़ल अ�त�रक् महा सॉ�ल�सटर और श् रउफ रह�म ने हम� सू�चत �कया �क उन्ह�न प्रत् सं. 2 से बात क� और उस वातार्ला से यह स्पष हुआ �क प्रत् सं. 2 द्वार द� गई अनुम�त स्वैिच् थी और �बना �कसी दबाव क े द� गई थी। यह बताया गया �क प्रत् सं. 2 शां�तपूवर् अपना जीवन व्यती करने क े �लए दािण्ड कायर्वाह को समाप् करना चाहती है।
12. इसम� कोई संदेह नह�ं है �क फािज़ल अ�त�रक् महा सॉ�ल�सटर का इस न्यायाल द्वार पा�रत �व�भन् �नणर्य, िजनम� हत्य या बलात्का जैसे जघन् और गंभीर अपराध� म� न्यायाल द्वार कायर्वाह को अ�भखं�डत न करने क े वै�धक दृिष्टक को दोहराया गया है, पर �नभर्रत जताना �बलक ु ल सह� है। यहाँ नर�दर �संह बनाम पंजाब राज् क े मामले म� इस न्यायाल द्वार पा�रत �नणर् क े पैरा 29.[5] से 29.[7] को संद�भर् करना उ�चत होगा,जो इस प्रक है �क: “29.[5] अपनी शिक्तय का प्रय करते हुए, उच् न्यायाल को यह सु�निश्च करना होगा �क दोष�सद्� क� संभावना अल् और शून् है या नह�ं और दािण्ड मामल� को जार� रखने से अ�भयुक् क े साथ घोर उत्पीड़ और प�पात होगा और दािण्ड मामले रद् न करने से उसक े साथ घोर अन्या होगा या नह�ं। 29.[6] भा.दं.सं. क� धारा 307 क े अंतगर् आने वाले अपराध जघन् और गंभीर अपराध� क� श्रे म� आते ह�। अतः उन्ह सामान्यत समाज क े �वरुद हुए अपराध क� तरह समझा जाना चा�हए न �क क े वल एक व्यिक क े �वरुद हुए अपराध क� तरह। परन्त उच् न्यायाल का �नणर् क े वल इस बात पर �नभर् नह�ं करेगा �क प्राथ�म म� भा.दं.सं. क� धारा 307 का िज़क है या आरोप इस प्रावध क े अंतगर् लगाए गए ह�। उच् न्यायाल यह जांच करने क े �लए स्वतं होगा �क भा.दं.सं. क� धारा 307 का समावेश क े वल नाम का है या अ�भयोजन प� ने पयार्प सा�य एक�त् �कये ह�, िजनक� �सद्� भा.दं.सं. क� धारा 307 क े अंतगर् लगाए गए आरोप को �सद् करेगी। इस उद्देश क े �लए, उच् न्यायाल को यह ध्या म� रखना होगा �क �कस प्रक क� चोट� आयी ह�, य�द यह चोट� शर�र क े महत्वपूण/ नाज़ुक अंग� पर ह�, �कस प्रक क े ह�थयार� का उपयोग �कया गया है इत्या�द सामान्यत पी�ड़त क� चोट� क� �च�कत्स �रपोटर मागर्दशर कारक बन सकती है। इस प्र दृिष्ट �वश्लेष क े आधार पर, उच् न्यायाल यह जांच सकता है �क दोष�सद्� क� कड़ी या अल् और प्र�तक संभावना है। जहां पहले मामले म� न्यायाल समझौते और दािण्ड कायर्वाह क े अ�भखण्ड को अस्वीक ृ कर सकता है वह�ँ दूसरे मामले म� उच् न्यायाल क े पास प�� क े बीच हुए सम्पूण समझौते क े आधार पर अपराध शमन क� प्राथर को स्वीका करने क� अनुम�त होगी। इस चरण पर, न्यायाल इस तथ् से भी प्रभा� हो सकता है �क प�� क े बीच का समझौता उनक े बीच समन्व क� भावना उत्पन करेगा, िजससे भ�वष् म� उनक े �रश्त म� सुधार होने क� संभावना होगी। 29.[7] सं�हता क� धारा 482 क े अंतगर् अपनी शिक्तय का प्रय करना है या नह�ं यह तय करते समय, समझौते का समय अहम भू�मका �नभाता है। िजन वाद� म� अ�भक�थत अपराध होने क े तुरंत बाद तफ्ती क े दौरान ह� समझौता हो जाता है, उन मामल� म� उच् न्यायाल समझौते को स्वीका कर दािण्ड कायर्वाह/ जांच को अ�भखं�डत करने म� उदारता �दखा सकता है। इसका कारण यह है �क इस चरण म� तफ्ती जार� होती है और आरोप पत भी अभी दायर नह�ं हुआ होता। इसी प्रक, िजन वाद� म� आरोप� क� �वरचना हो चुक� है परन्त गवाह� शुर होना अभी बाक� है या गवाह� अभी प्राथ� स्त पर ह�, उन वाद� म� उच् न्यायाल उपरोक् प�रिस्थ�तय/ तथ्य क े प्र दृष्ट आंकलन क े बाद ह� अपनी शिक्तय का प्रय अनुक ू ल रू से करते हुए उदारता �दखा सकता है। वह�ं दूसर� ओर, िजन वाद� म� अ�भयोजन सा�य तकर�बन पूरे हो चुक े ह� या सा�य क� समािप् क े पश्चा मामला बहस क े स्त पर है, सामान्यत उच् न्यायाल को सं�हता क� धारा 482 क े अंतगर् अपनी शिक्तय का प्रय करने से परहेज़ करना चा�हए क्य�� ऐसे मामल� म� �वचारण न्यायाल मामले क े गुण� क े आधार पर अं�तम �नणर् लेने और इस �नष्कष पर पहुंचने क� िस्थ� म� होता है �क क्य भा.दं.सं. क� धारा 307 क े अंतगर् अपराध हुआ है या नह�ं। इसी प्रक, िजन वाद� म� �वचारण न्यायाल द्वार दोष�सद्� हो चुक� है और मामला उच् न्यायाल क े सम� अपील�य स्त पर है, क े वल प�� क े बीच हुए समझौते क े आधार पर समझौते को स्वीक ृ� नह�ं �मल सकती है िजससे �वचारण न्यायाल द्वार दोष�सद् अपराधी दोषमुक् हो सक े । ऐसे मामल� म� भा.दं.सं. क� धारा 307 क े अंतगर् लगाए गए आरोप �सद् हो चुक े होते ह� और जघन् अपराध क� दोष�सद्� अ�भलेख पर ल� जा चुक� होती है, अतः ऐसे अपराध म� दोषी ठहराए गए अपराधी को माफ़ करने का सवाल ह� नह�ं है।”
13. अतः यह प्रत है �क यह न्यायाल स्पष्ट यह मानता है �क हालां�क जघन् और गंभीर अपराध� क� कायर्वाह को अ�भखं�डत करने म� न्यायाल को जल्दबाज़ नह�ं करनी चा�हए, उच् न्यायाल पर इस बात क� जांच करने का प्र�तब नह�ं है �क ऐसे अपराध को लगाने क े �लए सामग् उपलब् है या पयार्प सा�य उपलब् ह� या नह�ं, िजनक� �सद्� से लगाए गए आरोप �सद् हो सक � । न्यायाल को इस पर भी �वचार करना होगा �क प�� क े बीच हुए समझौते से उनक े बीच समन्व क� भावना उत्पन होगी या नह�ं िजससे उनक े आपसी �रश्त म� सुधार हो सक े ।
14. न्यायाल ने यह भी माना �क कायर्वाह क े चरण को भी ध्या म� रखना उ�चत होगा। यह देखा गया है �क य�द कोई प्राथर पत �वलिम्ब चरण म� दायर �कया जाता है, जब सा�य संपन् �कये जा चुक े हो और मामला बहस या �नणर् क े चरण म� हो, तब न्यायाल को कायर्वाह को अ�भखं�डत करने क े �लए अपनी शिक्तय का प्रय करने म� जल्दबाज़ नह�ं करनी चा�हए। परन्त य�द ऐसा कोई प्राथर पत �वचारण क े आरम् होने से पहले प्रारं� चरण म� दायर �कया जाता है तो क�थत कारक न्यायाल क� शिक्तय क े प्रय पर प्रभ डालेगा।
15. उपरोक् तथ् और प�रिस्थ�तया वतर्मा मामले म� �व�चत ह�। प्रत् सं.[2] 23 वषर क� युवती है और उसे ऐसा लगता है �क इन दो मामल�, िजनम� से एक म� वह �शकायतकतार है और दूसरे म� अ�भयुक्, क े �वचारण म� उसक� जवानी बीत जाएगी। उसे यह भी लगता है �क य�द उसे राहत �मलने क े बजाय �वचारण से गुज़रना पड़ता है तो वह उसक े �लए एक यातना होगी।
16. दोन� ह� मामल� म�, हालां�क आरोप पत दायर हो चुक े ह�, आरोप� क� �वरचना अभी बाक� है। अतः �वचारण अभी आरम् नह�ं हुआ है। इसक े अ�त�रक्, यह भी ध्या म� रखने योग् है �क चूँ�क प्रत् सं.[2] स्वय अ�भयोजन क े वाद का समथर् नह�ं कर रह� है, य�द दािण्ड मुक़द्द् को जार� रखा जाये तो इसका अंत दोषमुिक् से ह� होगा। य�द प�� क े अनुरोध को अस्वीक ृ �कया जाता है तो यह दािण्ड मामला भी दािण्ड न्यायालय क े बोझ को बढ़ाएगा।
17. मामले को इस नज़�रये से देखते हुए और यह मानते हुए �क जघन् या गंभीर अपराध�, जैसे �क बलात्का, म� न्यायाल को आम तौर पर कायर्वाह को अ�भखं�डत करने क े �लए अपनी शिक्तय का प्रय नह�ं करना चा�हए, वतर्मा मामले क े �व�चत तथ्य और प�रिस्थ�तय को देखते हुए और आगे प्रत् सं.[2] को दो दािण्ड मुक़द्द्, िजनम� एक मामले म� वह पी�ड़त है और दूसरे म� अ�भयुक्, से गुज़रने क� यातना से बचाने और राहत देने क े �लए, हम यह मानते ह� �क यह उ�चत मामला है जहाँ न्यायाल द्वार दां�डक कायर्वाह को अ�भखं�डत करने क� अपनी �वशेष शिक् का उपयोग होना चा�हए।
18. मामले को इस नज़�रये से देखते हुए, अपील मंज़ूर क� जाती है और �नम्न�ल�ख प्राथ�म�क से उद्भू दािण्ड वाद� क� कायर्वा�हय को अ�भखं�डत कर रद् �कया जाता है: 1.प्राथ�म सं.569/ 2020,थाना महरौल�,नई �दल्ल (बलात्का) 2.प्राथ�म सं.824/ 2020, थाना महरौल�,नई �दल्ल (उद्दाप)
19. हम फािज़ल अ�त�रक् महा सॉ�ल�सटर और श् रउफ रह�म क े आभार� ह� �क उन्ह�न आगे बढ़ कर न्या �मत क� भू�मका �नभाते हुए प्रत् सं.[2] द्वार द� गई अनुम�त क� यथाथर्त मालूम क�।
20. लं�बत आवेदन पत,य�द कोई ह�,का �नपटान �कया जाता है। न्य. (बी.आर.गवई) न्य. (पामीद�घंतम श् नर�सम्ह) नई �दल्ल; 10 अगस्, 2022 अस्वीकर: देशी भाषा म� �नणर्य का अनुवाद मुकद्द्मेबाज़ के सी�मत प्रयोग हेतु �कया गया है ता� अपनी भाषा म� इसे समझ सक े एवं यह �कसी अन्य प्रयोजन हेतु प्रयोग नह�ं �कया | समस्त कायार्लयी एवं व्यावहा�रक प्रयोजन� हेतु �नणर्य का अंग्रेज़ी स्वरूप ह� अ�भप्रमा�णत मान कायार्न्वयन तथा लागू �कए जाने हेतु उसे ह� वर�यता द� जाए|