Aju alias Ajendra Prasad v. Rajasthan State; Suman Devi v. Rajasthan State

Supreme Court of India · 2022 INSC 983
M. R. Shah; Krishna Murari
Criminal Appeal No 1559 of 2022; Criminal Appeal No 1560 of 2022
(2022) INSC 983
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court acquitted the appellants in a murder case due to insufficient circumstantial evidence failing to exclude all reasonable hypotheses except their guilt.

Full Text
Translation output
रि पोर्ट योग्य
भा त का उच्चतम न्यायालय
आप ाधि क अपीलीय क्षेत्राधि का
आप ाधि क अपील संख्या 1559/2022
ाजू उर्फ ाजेंद्र प्रसाद ...... अपीलकता
बनाम
ाजस्थान ाज्य ..... प्रधितवादी
आप ाधि क अपील संख्या 1560/2022 क
े साथ
श्रीमती सुमन देवी .... अपीलकता
बनाम
ाजस्थान ाज्य ..... प्रधितवादी
निनर्णय
न्यायमूर्तित एम. आ . शाह
JUDGMENT

1. डी. बी. आप ाधि क अपील संख्या 106/2018 औ 107/2018 में ाजस्थान उच्च न्यायालय द्वा ा पारि त आक्षेनिपत निनर्णय औ आदेश से व्यथिथत औ असंतुष्ट महसूस क ते हुए मूल आ ोपी ाजू उर्फ ाजेंद्र प्रसाद औ श्रीमती सुमन देवी ने वतमान अपीले प्रस्तुत की है, जिजनमें उच्च न्यायालय ने मूल आ ोनिपयों को अंतर्गत ा ा 302 भा तीय संनिहता में दोषजिसद्ध क ते हुए अपीलार्थिथयों द्वा ा प्रस्तुत की र्गई उक्त अपीलों को खारि ज क निदया ।

2. मूल थिशकायतकता प्रकाश-मृतक क े भाई ने अपने भाई न ेंद्र उर्फ र्गोलिलया की हत्या क े लिलए आ ोपी व्यनिक्तयों क े लिखलार्फ थिशकायत/एर्फ. आई. आ. दज क ाई। 2022 INSC 983 थिशकायत/एर्फ. आई. आ. में कहा र्गया था निक उसक े भाई न ेंद्र का निववाह उसकी भाभी सुमन देवी से हुआ था। उनक े भाई औ उनकी पत्नी क े बीच क ु छ मतभेद थे। यह आ ोप लर्गाया र्गया था निक आ ोपी सुमन देवी क े सह-आ ोपी ाजू उर्फ ाजेंद्र प्रसाद क े साथ अवै संबं थे। निववाद औ मतभेदों क े का र्ण, आ ोपी सुमन देवी अपने पैतृक घ में हने लर्गी थी। निदनांक 26.09.2016 को उसका भाई-मृतक अपनी पत्नी औ बच्चों को वापस लाने क े लिलए अपने ससु क े घ र्गया था। अर्गले निदन सुबह उसे पता चला निक उसक े भाई ने आत्महत्या क ली औ उसका शव पेड़ से लर्टका हुआ पाया र्गया था। यह आ ोप लर्गाया र्गया था निक उसक े भाई की हत्या सुमन देवी, ससु मोती ाम, सास लखपधित देवी, देव निवक्रम औ ाजू उर्फ ाजेंद्र प्रसाद ने प स्प साजिजश क े तहत की थी। इसक े बाद, जांच पू ी होने प अपीलार्थिथयों क े लिखलार्फ आ ोप पत्र दाय निकया र्गया था। अपीलार्थिथयों-आ ोनिपयों क े निवरुद्ध ा ा 302 निवकल्पतः ा ा 302/34 भा तीय दण्ड संनिहता क े अंतर्गत अप ा क े लिलए आ ोप निव धिचत निकया र्गया। अपीलार्थिथयों-अथिभयुक्तों ने आ ोप अस्वीका निकया औ इसलिलए उन प पूव`क्त अप ा क े लिलए निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय द्वा ा मुकदमा चलाया र्गया। 2.[1] अथिभयुक्त क े निवरुद्ध आ ोप को सानिबत क ने क े लिलए, अथिभयोजन पक्ष ने 15 र्गवाहों को प ीधिक्षत क ाया, जिजनमें पी.डब्ल्यू.-6, मृतक की पुत्री थिशवानी औ अथिभयुक्त सुमन देवी औ पी.डब्ल्यू.-7 सुमन देवी की बहन सुनीता शानिमल हैं। अथिभयोजन पक्ष क े साक्ष्यों क े बंद होने क े बाद, आर्गे दंड प्रनिक्रया संनिहता की ा ा 313 क े अंतर्गत अथिभयुक्तों क े बयान दज निकये र्गये। साक्ष्यों क े मूल्यांकन प औ मृतक की बेर्टी पी.डब्ल्यू.-6 थिशवानी, अथिभयुक्त सुमन देवी औ सुमन देवी की बहन पी.डब्ल्यू.-7 सुनीता क े बयानों प निवश्वास क ते हुए निदनांक 22.01.2018 क े निनर्णय औ आदेश क े अनुसा, निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय ने अपीलकताओं-अथिभयुक्तों को भा तीय दंड संनिहता की ा ा 302 सपनिfत ा ा 34 क े तहत दंडनीय अप ा क े लिलए दोषी fह ाया औ उन्हें आजीवन का ावास औ 20,000/- रुपये क े जुमाने की सजा सुनाई र्गई। 2.[2] निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय द्वा ा निदए र्गए दोषजिसधिद्ध औ दंडादेश क े निनर्णय औ आदेश से व्यथिथत औ असंतुष्ट महसूस क ते हुए, अथिभयुक्तों ने उच्च न्यायालय क े समक्ष वतमान अपीलों को प्रस्तुत निकया। समान आक्षेनिपत निनर्णय औ आदेश द्वा ा, उच्च न्यायालय ने उक्त अपीलों को खारि ज क निदया है औ भा तीय दंड संनिहता की ा ा 302 सपनिfत ा ा 34 क े तहत दंडनीय अप ा क े लिलए अथिभयुक्तों को दोषी fह ाते हुए निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय द्वा ा निदए र्गए निनर्णय औ दोषजिसधिद्ध औ दंड की पुनिष्ट की है। 2.[3] उच्च न्यायालय द्वा ा अपील को खारि ज क ने औ दोषजिसधिद्ध क े निनर्णय औ आदेश की पुनिष्ट क ने वाले पारि त निकए र्गए निनर्णय औ आदेश से पीनिड़त औ असंतुष्ट महसूस क ते हुए, मूल अथिभयुक्तों ने वतमान अपीलों को प्रस्तुत निकया है।

3. सुश्री संर्गीता क ु मा औ सुश्री धिचत्रांर्गदा स्त्रवा ा, निवद्वान अधि वक्ता संबंधि त अपीलकताओं की ओ से उपस्थिस्थत हुए हैं औ सुश्री र्गु की त कौ, निवद्वान वकील प्रधितवादी - ाजस्थान ाज्य की ओ से उपस्थिस्थत हुई हैं।

4. संबंधि त अपीलार्थिथयों-अथिभयुक्तों की ओ से उपस्थिस्थत हुए निवद्वान अधि वक्ता ने पु जो त ीक े से तक प्रस्तुत निकया है निक मामले क े तथ्यों औ परि स्थिस्थधितयों में, निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय औ उच्च न्यायालय दोनों ने भा तीय दण्ड संनिहता की ा ा 302/34 क े तहत अप ा क े लिलए अपीलार्थिथयों को दोषी fह ाने में बहुत र्गंभी र्गलती की है । 4.[1] अपीलकताओं-मूल अथिभयुक्त की ओ से उपस्थिस्थत निवद्वान अधि वक्ता द्वा ा पु जो त ीक े से तक निदया जाता है निक मामला पारि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य प आ ारि त है।इसका कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। यह निनवेदन निकया है निक अपीलार्थिथयों क े निवरुद्ध लेश मात्र भी साक्ष्य नहीं है, जिजसक े द्वा ा यह कहा जा सक े निक अपीलकताओं ने मृतक को मा ा औ /या हत्या की। 4.[2] अपीलार्थिथयों-मूल अथिभयुक्तों की ओ से उपस्थिस्थत निवद्वान अधि वक्ता द्वा ा द्वा ा यह पु जो त ीक े से तक निदया है निक मृतक की बेर्टी पी.डब्ल्यू.-6 थिशवानी औ अथिभयुक्त सुमन देवी की बेर्टी, जिजन्हें 'स्र्टा र्गवाह' कहा र्गया है, ने अपने बयानों में स्पष्ट रूप से कहा है निक उन्होंने अपीलार्थिथयों को अपने निपता की हत्या क ते हुए नहीं देखा है। यह भी तक निदया र्गया है निक पी.डब्ल्यू.-6 क े बयान से भी, अथिभयोजन पक्ष यह स्थानिपत औ सानिबत नहीं क पाया है निक इसमें अपीलाथn-अथिभयुक्तर्गर्ण मृतक क े साथ अंधितम बा देखे र्गए थे। यह तक निदया र्गया है निक अथिभयोजन पक्ष घर्टनाओं की पू ी श्रृंखला को स्थानिपत क ने औ सानिबत क ने में निवर्फल हा है । यह तक निदया र्गया है निक इसलिलए भा तीय दंड संनिहता की ा ा 302/34 क े तहत अप ा क े लिलए अपीलकताओं-अथिभयुक्त की दोषजिसधिद्ध असं ा र्णीय है। 4.[3] अथिभयुक्त की ओ से उपस्थिस्थत निवद्वान अधि वक्ता ने मोहम्मद यूनुस अली त र्फदा बनाम पधिpम बंर्गाल ाज्य, (2020) 3 एस. सी. सी. 747 क े साथ- साथ अनव अली औ अन्य बनाम निहमाचल प्रदेश ाज्य, (2020) 10 एस. सी. सी. 166 क े मामले में अपने इस कथन क े समथन में इस न्यायालय क े निनर्णय प पु जो भ ोसा निकया है निक अथिभयुक्त का दोष सानिबत क ने क े लिलए अथिभयोजन द्वा ा जिजन परि स्थिस्थधितयों प भ ोसा निकया र्गया था, वे पूर्ण नहीं हैं औ उक्त परि स्थिस्थधितयां इस निनष्कष प नहीं पहुंच ही हैं निक सभी मानवीय संभाव्यताओं में, हत्या अपीलकताओं-अथिभयुक्तों द्वा ा की र्गई थी औ इसलिलए, अपीलकताओं को ऐसे परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य क े आ ा प दोषी नहीं fह ाया जाना चानिहए था।

5. वतमान अपीलों का ाज्य की ओ से उपस्थिस्थत निवद्वान अधि वक्ता द्वा ा पु जो निव ो निकया र्गया।

5. 1 यह तक प्रस्तुत निकया है निक वतमान मामले में, अथिभयोजन ने स्थानिपत निकया है औ सानिबत निकया है निक सुमन देवी औ मृतक क े बीच मतभेद औ निववाद थे। यह तक प्रस्तुत निकया है निक पुख्ता सबूत, मृतक की बेर्टी व आ ोपी सुमन देवी क े प ीक्षर्ण औ अन्य र्गवाहों की प ीक्षर्ण क क े, अथिभयोजन पक्ष ने यह स्थानिपत औ सानिबत निकया है निक पहले क े निदन/ ात में झर्गड़े हुए थे औ आ ोपी ाजू औ अन्य ने मृतक को मनिकयां दी थी। यह तक प्रस्तुत निकया है निक इसलिलए मामले क े तथ्यों औ परि स्थिस्थधितयों में, जब अथिभयोजन पक्ष ने हेतुक औ उन परि स्थिस्थधितयों को स्थानिपत निकया है जिजनक े का र्ण यह निनष्कष निनकाला र्गया निक अथिभयुक्तों ने मृतक की हत्या की थी । निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय औ उच्च न्यायालय दोनों ने भा तीय दण्ड संनिहता की ा ा 302/34 क े तहत अप ा क े लिलए अथिभयुक्त को सही दोषी fह ाया है। यह तक भी प्रस्तुत निकया है निक धिचनिकत्सा साक्ष्य-पोस्र्टमार्टम प्रधितवेदन से सानिबत होता है निक मृतक की हत्या की र्गई थी। 5.[2] उप ोक्त निनवेदन क ते हुए, वतमान अपीलों को खारि ज क ने की प्राथना की जाती है।

6. संबंधि त पक्षों क े निवद्वान अधि वक्ताओं को निवस्ता पूवक सुना र्गया।

7. हमने निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय द्वा ा पारि त निनर्णय औ आदेश क े साथ-साथ उच्च न्यायालय द्वा ा पारि त आक्षेनिपत निनर्णय औ आदेश का अवलोकन निकया है। हमने अथिभलेख प मौजूद सभी साक्ष्य का भी निर्फ से अवलोकन निकया है। 7.[1] आ ंभ में, यह अथिभलिललिखत निकया जाना अपेधिक्षत है निक मामला पारि स्थिस्थधितक साक्ष्य प आ ारि त है। ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमार्ण नहीं है जिजसक े द्वा ा यह कहा जा सक े निक अपीलकताओं ने मृतक को मा ा है या उसकी हत्या कारि त की थी। अप ा में अपीलार्थिथयों की भार्गीदा ी को इंनिर्गत क ने वाला कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य दज नहीं निकया र्गया है औ जैसा निक इसमें ऊप भी कहा र्गया है, अथिभयोजन का मामला पारि स्थिस्थधितक साक्ष्य प आ ारि त है । जैसा निक इस न्यायालय द्वा ा शृंखलाबद्घ निवनिनpयों में यह अथिभनिन ारि त निकया र्गया है, परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य क े मामले में, संधिचत रूप से ली र्गई परि स्थिस्थधितयां इस प्रका पूर्ण श्रृंखला का निनमार्ण क ती हो निक इस निनष्कष से कोई बचने की र्गुंजाइश नहीं है निक सभी मानवीय संभाव्यता क े भीत अप ा अथिभयुक्त द्वा ा ही निकया र्गया था न निक निकसी अन्य क े द्वा ा, औ दोषजिसधिद्ध को बनाए खने क े लिलए परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य पूर्ण होना चानिहए औ अथिभयुक्त क े दोष क े अलावा निकसी अन्य परि कल्पना की व्याख्या क ने में अक्षम होना चानिहए औ ऐसा साक्ष्य न क े वल अथिभयुक्त क े अप ा से संर्गत होना चानिहए बस्थिल्क उसकी निनद`निषता क े साथ भी असंर्गत होना चानिहए। 7.[2] बाबू बनाम क े ल ाज्य, (2010) 9 एस. सी. सी. 189 क े मामले में पै ा 22 से 24 में निनम्नलिललिखत रूप में अथिभनिन ारि त निकया र्गया हैः "22. क ृ ष्र्णन बनाम ाज्य [(2008) 15 एससीसी 430] में, इस न्यायालय ने अपने पहले क े निनर्णयों की एक बड़ी संख्या प निवचा क ने क े बाद निनम्नानुसा अवलोकन निकया:(एस सी सी पृष्ठ 435, पै ा 15) 15.....इस न्यायालय ने लर्गाता कई निनर्णयों की श्रंखला में यह अथिभनिन ारि त निकया है निक जब कोई मामला परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य प निनभ क ता है तो ऐसे साक्ष्य को निनम्नलिललिखत प ीक्षर्णों को पू ा क ना चानिहए: (i) जिजन परि स्थिस्थधितयों से अप ा बो का अनुमान लर्गाने की कोथिशश की जा ही है, उन्हें fोस औ दृढ़ता से स्थानिपत निकया जाना चानिहए; (ii) वे परि स्थिस्थधितयां निनधिpत प्रवृलि‚ की होनी चानिहए जो निबना निकसी र्गलती क े अथिभयुक्त क े अप ा की ओ संक े त क ती हैं। (iii) परि स्थिस्थधितयाँ, संचयी रूप से, एक श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चानिहए निक इस निनष्कष से कोई बच न सक े निक सभी मानवीय संभावना क े भीत अप ा अथिभयुक्त द्वा ा निकया र्गया था औ अन्य क े द्वा ा नहीं; औ (iv) दोषजिसधिद्ध को बनाए खने क े लिलए परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य पूर्ण औ अथिभयुक्त क े दोष क े अलावा निकसी अन्य परि कल्पना की व्याख्या क ने में अक्षम होना चानिहए औ ऐसा साक्ष्य न क े दोष क े अनुरूप सुसंर्गत होना चानिहए प ंतु उसकी मासूनिमयत क े साथ असंर्गत होना चानिहए ।(र्गंभी बनाम महा ाष्ट्र ाज्य [(1982) 2 एससीसी 351]) क े मामले को देखे।

23. श द बदnचंद सा दा बनाम महा ाष्ट्र ाज्य [(1984) 4 एस. सी. सी. 116] में पारि स्थिस्थधितक साक्ष्य प निवचा क ते समय यह अथिभनिन ारि त निकया र्गया है निक यह सानिबत क ने की जिजम्मेदा ी अथिभयोजन पक्ष की है निक श्रृंखला पू ी हो र्गई है औ अथिभयोजन में दुबलता या कमी को झूfे बचाव या अथिभवचन से fीक नहीं निकया जा सकता है। सजा से पहले की शत† परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य प आ ारि त हो सकती हैं, पू ी त ह से स्थानिपत होनी चानिहए। वे हैं: (एससीसी पृष्ठ 185, पै ा 153) (i) वे परि स्थिस्थधितयां जिजनसे दोष का निनष्कष निनकाला जाना है, पू ी त ह से स्थानिपत की जानी चानिहए।"संबंधि त परि स्थिस्थधितयां स्थानिपत "नहीं हो सकती " "या" " नहीं होनी चानिहए औ " "नहीं हो पायेंर्गी"। (ii) इस प्रका स्थानिपत तथ्य क े दोष की परि कल्पना क े अनुरूप होने चानिहए, अथात अथिभयुक्त क े दोषी होने क े अलावा निकसी अन्य परि कल्पना प व्याख्या क ने योग्य नहीं होने चानिहए; (iii) परि स्थिस्थधितयाँ निनर्णायक प्रक ृ धित औ प्रवृलि‚ की होनी चानिहए; (iv) उन्हें सानिबत की जाने वाली परि कल्पना को छोड़क प्रत्येक संभानिवत परि कल्पना को अपवर्जिजत क ना चानिहए औ (v) साक्ष्य की एक श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चानिहए निक अथिभयुक्त की निनद`निषता क े साथ संर्गत निनष्कष क े लिलए कोई उधिचत आ ा न छोड़े औ यह दर्थिशत क े निक सभी मानवीय संभाव्यताओं में काय अथिभयुक्त द्वा ा निकया र्गया होर्गा। इसी प्रका क े निवचा को इस न्यायालय द्वा ा उ‚ प्रदेश ाज्य बनाम सतीश [(2005) 3 एससीसी 114] औ पवन बनाम उ‚ ांचल ाज्य [(2009) 15 एससीसी 259] में दोह ाया र्गया है।

24. सुब्रमण्यम बनाम र्टी.एन. ाज्य में [(2009) 14 एससीसी 415], दहेज मृत्यु क े मामले प निवचा क ते हुए, इस न्यायालय ने पाया निक एक साथ हने का तथ्य एक मजबूत परि स्थिस्थधित है, लेनिकन मृतक प हिंहसा क े निकसी भी सबूत क े अभाव में अक े ले को निनर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता है, औ इस निनष्कष प पहुंचने क े लिलए क ु छ सबूत होना चानिहए निक पधित औ अक े ले पधित ही इसक े लिलए जिजम्मेदा थे।अथिभयोजन पक्ष द्वा ा पेश निकए र्गए साक्ष्य की प्रक ृ धित ऐसी नहीं होनी चानिहए जो अपीलाथn की दोषजिसधिद्ध को अस्थिस्थ बना दे। (देखें मेश भाई बनाम ाजस्थान ाज्य [(2009) 12 एससीसी 603]. (बल निदया र्गया)" 7.[3] जी. पाश्वनाथ बनाम कनार्टक ाज्य, (2010) 8 एस. सी. सी. 593 क े पै ा 23 औ 24 में यह अवलोकन निकया र्गया है औ निनम्नानुसा अथिभनिन ारि त निकया र्गया: "23. ऐसे मामलों में जहां साक्ष्य परि स्थिस्थधितजन्य है, उन परि स्थिस्थधितयों को, जिजनसे अप ा का निनष्कष निनकाला जाना है, पहली बा में पू ी त ह से स्थानिपत निकया जाना चानिहए। जिजन तथ्यों प भ ोसा निकया जाना चानिहए, प्रत्येक को सानिबत निकया जाना चानिहए। हालांनिक, इस जिसद्धांत को लार्गू क ने में एक त र्फ प्राथनिमक या बुनिनयादी कहे जाने वाले तथ्यों क े बीच अंत निकया जाना चानिहए औ दूस ी त र्फ उनसे तथ्यों का निनष्कष निनकाला जाना चानिहए। प्राथनिमक तथ्यों क े साक्ष्य क े संबं में, अदालत को साक्ष्य का निनर्णय क ना है औ यह तय क ना है निक क्या यह साक्ष्य एक निवशेष तथ्य सानिबत क ता है औ यनिद यह तथ्य सानिबत होता है, तो क्या यह तथ्य अथिभयुक्त व्यनिक्त क े अप ा क े निनष्कष की ओ जाता है। समस्या क े इस पहलू से निनपर्टने में, संदेह क े लाभ का जिसद्धांत लार्गू होता है। हालांनिक इस मामले में कोई कड़ी र्गायब नहीं होनी चानिहए, निर्फ भी यह आवश्यक नहीं है निक प्रत्येक कड़ी को प्रस्तुत साक्ष्य की सतह प प्रकर्ट होना चानिहए औ इनमें से क ु छ कनिड़यों को जिसद्ध तथ्यों से अनुमान लर्गाना पड़ सकता है। इन निनष्कषŒ को निनकालने में, अदालत को प्राक ृ धितक घर्टनाओं क े सामान्य पाठ्यक्रम औ मानवीय आच र्ण औ निवशेष मामले क े तथ्यों से उनक े संबं ों को ध्यान में खना चानिहए। तत्पpात न्यायालय को जिसद्ध तथ्यों क े प्रभाव प निवचा क ना होता है।

24. दोषजिसधिद्ध क े प्रयोजन क े लिलए परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य की पयाप्तता का निनर्णय लेने में, अदालत को सभी जिसद्ध तथ्यों क े क ु ल संचयी प्रभाव प निवचा क ना होता है, जिजनमें से प्रत्येक अप ा क े निनष्कष को पुष्ट क ता है औ यनिद इन सभी तथ्यों का संयुक्त प्रभाव लिलया जाता है एक साथ अथिभयुक्त क े दोष को स्थानिपत क ने में निनर्णायक है, दोषजिसधिद्ध न्यायोधिचत होर्गी भले ही यह हो सकता है निक इनमें से एक या अधि क तथ्य अपने आप में या स्वयं निनर्णायक नहीं हैं। स्थानिपत तथ्य क े अप ा की परि कल्पना क े अनुरूप होने चानिहए औ जिसद्ध निकए जाने वाले को छोड़क प्रत्येक परि कल्पना को अपवर्जिजत निकया जाना चानिहए। हिंकतु इसका यह अथ नहीं है निक क े वल पारि स्थिस्थधितक साक्ष्य प आ ारि त निकसी मामले में अथिभयोजन पक्ष क े सर्फल होने से पहले, उसे अथिभयुक्त द्वा ा सुझाई र्गई प्रत्येक परि कल्पना को अपवर्जिजत क देना चानिहए, चाहे वह निकतना भी असा ा र्ण औ काल्पनिनक क्यों न हो।साक्ष्य की ऐसी श्रृंखला होनी चानिहए जो अथिभयुक्त की निनद`निषता से सुसंर्गत निनष्कष क े लिलए कोई युनिक्तयुक्त आ ा न छोड़े औ यह दर्थिशत क े निक सभी मानवीय संभाव्यताओं में काय अथिभयुक्त द्वा ा निकया जाना चानिहए, जहां श्रृंखला में निवथिभन्न कनिड़याँ अपने आप में पूर्ण हैं, तब निमथ्या अथिभवाक या निमथ्या प्रधित क्षा को क े वल न्यायालय को आश्वासन देने क े लिलए सहायता क े लिलए बुलाया जा सकता है।" 7.[4] मोहम्मद यूनुस अली त र्फदा (पूव`क्त) औ अनव अली औ अन्य (पूव`क्त) क े मामले में पpातवतn निवनिनpयों में इस न्यायालय द्वा ा ऐसा ही दृनिष्टकोर्ण अपनाया र्गया है। 7.[5] इस न्यायालय द्वा ा पूव`क्त निनर्णयों में निदए र्गए निवधि को वतमान मामले तथ्यों प लार्गू क ते हुए इस प निवचा निकया जाना है निक क्या मामले क े तथ्यों औ परि स्थिस्थधितयों में,भा तीय दण्ड संनिहता की ा ा 302/34 क े तहत दंडनीय अप ा क े लिलए अथिभयुक्त को दोषी fह ाना उच्च न्यायालय औ निवचा र्ण न्यायालय द्वा ा न्यायोधिचत है? 7.[6] पी.डब्ल्यू.-6 क े बयान प निवचा क ने प, जिजसे मुख्य र्गवाह कहा जा सकता है औ जिजसक े बयान प अपीलाथn-अथिभयुक्त को भा.द.स. की ा ा 302/34 क े लिलए दोषी fह ाया जाता है, यह भी नहीं कहा जा सकता है निक अथिभयोजन ने स्थानिपत निकया है औ सानिबत निकया है निक अथिभयुक्त को मृतक क े साथ अंधितम बा देखा र्गया था। मुख्य प ीक्षा में पी.डब्ल्यू.-6 ने कहा है निक क ु छ झर्गड़े क े बाद, दादी मृतक को उस कम े में ले र्गई जहां मृतक सोने र्गया था। उसक े बाद वो भी सो र्गई औ सुबह जब उfी तो पता चला निक उसक े पापा पेड़ प लर्टक े हुए निमले हैं।जिज ह में उसने निवशेष रूप से कहा है निक उसने निकसी को भी अपने निपता को पीर्टते हुए नहीं देखा है। इस प्रका, इस बात का कोई सबूत नहीं है निक आ ोपी को अंधितम बा मृतक क े साथ देखा र्गया था। मृतक क े कम े में जाने औ सोने क े बाद क्या हुआ, इसका कोई साक्ष्य नहीं है। 7.[7] इन परि स्थिस्थधितयों में, अथिभयोजन अप ा औ घर्टनाओं की पू ी श्रृंखला को सानिबत क ने में निवर्फल हा है, जिजससे एकमात्र निनष्कष निनकल सकता है निक अपीलकता-आ ोपी ने अक े ले हत्या कारि त की थी या मृतक को मा ा था। परि स्थिस्थधितयों क े तहत औ परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य प पूव`क्त निनर्णयों में इस निवचा र्ण न्यायालय द्वा ा निन ारि त कानून को लार्गू क ते हुए, हमा ी ाय है निक निनचली अदालत औ उच्च निवचा र्ण न्यायालय ने ऐसे परि स्थिस्थधितजन्य साक्ष्य क े आ ा प भा.द.स ा ा 302/34 क े अंतर्गत अप ा क े लिलए अपीलकताओं को दोषी fह ाने में बहुत र्गंभी र्गलती की है। भा तीय दंड संनिहता की ा ा 302/34 क े तहत अप ा क े लिलए अपीलार्थिथयों-अथिभयुक्तर्गर्णों की दोषजिसधिद्ध सं ा र्णीय नहीं है।

8. उप ोक्त को ध्यान में खते हुए औ ऊप बताए र्गए का र्णों से, दोनों अपीलें सर्फल होती हैं। निवद्वान निवचा र्ण न्यायालय क े साथ-साथ उच्च न्यायालय द्वा ा अपीलकताओं को भा.दं.सं. की ा ा 302/34 क े लिलए मूल अथिभयुक्तर्गर्णों को दोषी fह ाने क े निनर्णय औ आदेश को अपास्त व द्द निकया जाता है औ अथिभयुक्तों को उस अप ा क े लिलए दोषमुक्त निकया जाता है जिजसक े लिलए उन्हें दोषी fह ाया र्गया था। यनिद निकसी अन्य मामले में आवश्यक न हो तो अपीलकताओं अथिभयुक्तों को तु ंत रि हा निकया जाए। तदनुसा वतमान अपीलें स्वीका की जाती है। ज.[एम.आ.शाह] ज.(क ृ ष्र्ण मु ा ी)