Full Text
भारत का उच्चतम न्यायालय
आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपील संख्या 1559/2022
राजू उर्फ राजेंद्र प्रसाद ...... अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य ..... प्रतिवादी
आपराधिक अपील संख्या 1560/2022 क
े साथ
श्रीमती सुमन देवी .... अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य ..... प्रतिवादी
निर्णय
न्यायमूर्ति एम. आर. शाह
JUDGMENT
1. डी. बी. आपराधिक अपील संख्या 106/2018 और 107/2018 में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश से व्यथित और असंतुष्ट महसूस करते हुए मूल आरोपी राजू उर्फ राजेंद्र प्रसाद और श्रीमती सुमन देवी ने वर्तमान अपीले प्रस्तुत की है, जिनमें उच्च न्यायालय ने मूल आरोपियों को अंतर्गत धारा 302 भारतीय संहिता में दोषसिद्ध करते हुए अपीलार्थियों द्वारा प्रस्तुत की गई उक्त अपीलों को खारिज कर दिया ।
2. मूल शिकायतकर्ता प्रकाश-मृतक क े भाई ने अपने भाई नरेंद्र उर्फ गोलिया की हत्या क े लिए आरोपी व्यक्तियों क े खिलाफ शिकायत/एफ. आई. आर. दर्ज कराई। शिकायत/एफ. आई. आर. में कहा गया था कि उसक े भाई नरेंद्र का विवाह उसकी भाभी सुमन देवी से हुआ था। उनक े भाई और उनकी पत्नी क े बीच क ु छ मतभेद थे। यह आरोप लगाया गया था कि आरोपी सुमन देवी क े सह-आरोपी राजू उर्फ राजेंद्र प्रसाद क े साथ अवैध संबंध थे। विवाद और मतभेदों क े कारण, आरोपी सुमन देवी अपने पैतृक घर में रहने लगी थी। दिनांक 26.09.2016 को उसका भाई-मृतक अपनी पत्नी और बच्चों को वापस लाने क े लिए अपने ससुर क े घर गया था। अगले दिन सुबह उसे पता चला कि उसक े भाई ने आत्महत्या कर ली और उसका शव पेड़ से लटका हुआ पाया गया था। यह आरोप लगाया गया था कि उसक े भाई की हत्या सुमन देवी, ससुर मोती राम, सास लखपति देवी, देवर विक्रम और राजू उर्फ राजेंद्र प्रसाद ने परस्पर साजिश क े तहत की थी। इसक े बाद, जांच पूरी होने पर अपीलार्थियों क े खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था। अपीलार्थियों-आरोपियों क े विरुद्ध धारा 302 विकल्पतः धारा 302/34 भारतीय दण्ड संहिता क े अंतर्गत अपराध क े लिए आरोप विरचित किया गया। अपीलार्थियों-अभियुक्तों ने आरोप अस्वीकार किया और इसलिए उन पर पूर्वोक्त अपराध क े लिए विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा मुकदमा चलाया गया। 2.[1] अभियुक्त क े विरुद्ध आरोप को साबित करने क े लिए, अभियोजन पक्ष ने 15 गवाहों को परीक्षित कराया, जिनमें पी.डब्ल्यू.-6, मृतक की पुत्री शिवानी और अभियुक्त सुमन देवी और पी.डब्ल्यू.-7 सुमन देवी की बहन सुनीता शामिल हैं। अभियोजन पक्ष क े साक्ष्यों क े बंद होने क े बाद, आगे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 क े अंतर्गत अभियुक्तों क े बयान दर्ज किये गये। साक्ष्यों क े मूल्यांकन पर और मृतक की बेटी पी.डब्ल्यू.-6 शिवानी, अभियुक्त सुमन देवी और सुमन देवी की बहन पी.डब्ल्यू.-7 सुनीता क े बयानों पर विश्वास करते हुए दिनांक 22.01.2018 क े निर्णय और आदेश क े अनुसार, विद्वान विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ताओं-अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 सपठित धारा 34 क े तहत दंडनीय अपराध क े लिए दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास और 20,000/- रुपये क े जुर्माने की सजा सुनाई गई। 2.[2] विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा दिए गए दोषसिद्धि और दंडादेश क े निर्णय और आदेश से व्यथित और असंतुष्ट महसूस करते हुए, अभियुक्तों ने उच्च न्यायालय क े समक्ष वर्तमान अपीलों को प्रस्तुत किया। समान आक्षेपित निर्णय और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने उक्त अपीलों को खारिज कर दिया है और भारतीय दंड संहिता की धारा 302 सपठित धारा 34 क े तहत दंडनीय अपराध क े लिए अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय और दोषसिद्धि और दंड की पुष्टि की है। 2.[3] उच्च न्यायालय द्वारा अपील को खारिज करने और दोषसिद्धि क े निर्णय और आदेश की पुष्टि करने वाले पारित किए गए निर्णय और आदेश से पीड़ित और असंतुष्ट महसूस करते हुए, मूल अभियुक्तों ने वर्तमान अपीलों को प्रस्तुत किया है।
3. सुश्री संगीता क ु मार और सुश्री चित्रांगदा रस्त्रवारा, विद्वान अधिवक्ता संबंधित अपीलकर्ताओं की ओर से उपस्थित हुए हैं और सुश्री गुरकीरत कौर, विद्वान वकील प्रतिवादी - राजस्थान राज्य की ओर से उपस्थित हुई हैं।
4. संबंधित अपीलार्थियों-अभियुक्तों की ओर से उपस्थित हुए विद्वान अधिवक्ता ने पुरजोर तरीक े से तर्क प्रस्तुत किया है कि मामले क े तथ्यों और परिस्थितियों में, विद्वान विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/34 क े तहत अपराध क े लिए अपीलार्थियों को दोषी ठहराने में बहुत गंभीर गलती की है । 4.[1] अपीलकर्ताओं-मूल अभियुक्त की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा पुरजोर तरीक े से तर्क दिया जाता है कि मामला पारिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है।इसका कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। यह निवेदन किया है कि अपीलार्थियों क े विरुद्ध लेश मात्र भी साक्ष्य नहीं है, जिसक े द्वारा यह कहा जा सक े कि अपीलकर्ताओं ने मृतक को मारा और/या हत्या की। 4.[2] अपीलार्थियों-मूल अभियुक्तों की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा द्वारा यह पुरजोर तरीक े से तर्क दिया है कि मृतक की बेटी पी.डब्ल्यू.-6 शिवानी और अभियुक्त सुमन देवी की बेटी, जिन्हें 'स्टार गवाह' कहा गया है, ने अपने बयानों में स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्होंने अपीलार्थियों को अपने पिता की हत्या करते हुए नहीं देखा है। यह भी तर्क दिया गया है कि पी.डब्ल्यू.-6 क े बयान से भी, अभियोजन पक्ष यह स्थापित और साबित नहीं कर पाया है कि इसमें अपीलार्थी-अभियुक्तगण मृतक क े साथ अंतिम बार देखे गए थे। यह तर्क दिया गया है कि अभियोजन पक्ष घटनाओं की पूरी श्रृंखला को स्थापित करने और साबित करने में विफल रहा है । यह तर्क दिया गया है कि इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 क े तहत अपराध क े लिए अपीलकर्ताओं-अभियुक्त की दोषसिद्धि असंधारणीय है। 4.[3] अभियुक्त की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने मोहम्मद यूनुस अली तरफदार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, (2020) 3 एस. सी. सी. 747 क े साथ- साथ अनवर अली और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, (2020) 10 एस. सी. सी. 166 क े मामले में अपने इस कथन क े समर्थन में इस न्यायालय क े निर्णय पर पुरजोर भरोसा किया है कि अभियुक्त का दोष साबित करने क े लिए अभियोजन द्वारा जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया गया था, वे पूर्ण नहीं हैं और उक्त परिस्थितियां इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच रही हैं कि सभी मानवीय संभाव्यताओं में, हत्या अपीलकर्ताओं-अभियुक्तों द्वारा की गई थी और इसलिए, अपीलकर्ताओं को ऐसे परिस्थितिजन्य साक्ष्य क े आधार पर दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए था।
5. वर्तमान अपीलों का राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा पुरजोर विरोध किया गया।
5. 1 यह तर्क प्रस्तुत किया है कि वर्तमान मामले में, अभियोजन ने स्थापित किया है और साबित किया है कि सुमन देवी और मृतक क े बीच मतभेद और विवाद थे। यह तर्क प्रस्तुत किया है कि पुख्ता सबूत, मृतक की बेटी व आरोपी सुमन देवी क े परीक्षण और अन्य गवाहों की परीक्षण करक े, अभियोजन पक्ष ने यह स्थापित और साबित किया है कि पहले क े दिन/रात में झगड़े हुए थे और आरोपी राजू और अन्य ने मृतक को धमकियां दी थी। यह तर्क प्रस्तुत किया है कि इसलिए मामले क े तथ्यों और परिस्थितियों में, जब अभियोजन पक्ष ने हेतुक और उन परिस्थितियों को स्थापित किया है जिनक े कारण यह निष्कर्ष निकाला गया कि अभियुक्तों ने मृतक की हत्या की थी । विद्वान विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/34 क े तहत अपराध क े लिए अभियुक्त को सही दोषी ठहराया है। यह तर्क भी प्रस्तुत किया है कि चिकित्सा साक्ष्य-पोस्टमार्टम प्रतिवेदन से साबित होता है कि मृतक की हत्या की गई थी। 5.[2] उपरोक्त निवेदन करते हुए, वर्तमान अपीलों को खारिज करने की प्रार्थना की जाती है।
6. संबंधित पक्षों क े विद्वान अधिवक्ताओं को विस्तारपूर्वक सुना गया।
7. हमने विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय और आदेश क े साथ-साथ उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश का अवलोकन किया है। हमने अभिलेख पर मौजूद सभी साक्ष्य का भी फिर से अवलोकन किया है। 7.[1] आरंभ में, यह अभिलिखित किया जाना अपेक्षित है कि मामला पारिस्थितिक साक्ष्य पर आधारित है। ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है जिसक े द्वारा यह कहा जा सक े कि अपीलकर्ताओं ने मृतक को मारा है या उसकी हत्या कारित की थी। अपराध में अपीलार्थियों की भागीदारी को इंगित करने वाला कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य दर्ज नहीं किया गया है और जैसा कि इसमें ऊपर भी कहा गया है, अभियोजन का मामला पारिस्थितिक साक्ष्य पर आधारित है । जैसा कि इस न्यायालय द्वारा शृंखलाबद्घ विनिश्चयों में यह अभिनिर्धारित किया गया है, परिस्थितिजन्य साक्ष्य क े मामले में, संचित रूप से ली गई परिस्थितियां इस प्रकार पूर्ण श्रृंखला का निर्माण करती हो कि इस निष्कर्ष से कोई बचने की गुंजाइश नहीं है कि सभी मानवीय संभाव्यता क े भीतर अपराध अभियुक्त द्वारा ही किया गया था न कि किसी अन्य क े द्वारा, और दोषसिद्धि को बनाए रखने क े लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य पूर्ण होना चाहिए और अभियुक्त क े दोष क े अलावा किसी अन्य परिकल्पना की व्याख्या करने में अक्षम होना चाहिए और ऐसा साक्ष्य न क े वल अभियुक्त क े अपराध से संगत होना चाहिए बल्कि उसकी निर्दोषिता क े साथ भी असंगत होना चाहिए। 7.[2] बाबू बनाम क े रल राज्य, (2010) 9 एस. सी. सी. 189 क े मामले में पैरा 22 से 24 में निम्नलिखित रूप में अभिनिर्धारित किया गया हैः "22. क ृ ष्णन बनाम राज्य [(2008) 15 एससीसी 430] में, इस न्यायालय ने अपने पहले क े निर्णयों की एक बड़ी संख्या पर विचार करने क े बाद निम्नानुसार अवलोकन किया:(एस सी सी पृष्ठ 435, पैरा 15) 15.....इस न्यायालय ने लगातार कई निर्णयों की श्रंखला में यह अभिनिर्धारित किया है कि जब कोई मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर निर्भर करता है तो ऐसे साक्ष्य को निम्नलिखित परीक्षणों को पूरा करना चाहिए: (i) जिन परिस्थितियों से अपराधबोध का अनुमान लगाने की कोशिश की जा रही है, उन्हें ठोस और दृढ़ता से स्थापित किया जाना चाहिए; (ii) वे परिस्थितियां निश्चित प्रवृत्ति की होनी चाहिए जो बिना किसी गलती क े अभियुक्त क े अपराध की ओर संक े त करती हैं। (iii) परिस्थितियाँ, संचयी रूप से, एक श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चाहिए कि इस निष्कर्ष से कोई बच न सक े कि सभी मानवीय संभावना क े भीतर अपराध अभियुक्त द्वारा किया गया था और अन्य क े द्वारा नहीं; और (iv) दोषसिद्धि को बनाए रखने क े लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य पूर्ण और अभियुक्त क े दोष क े अलावा किसी अन्य परिकल्पना की व्याख्या करने में अक्षम होना चाहिए और ऐसा साक्ष्य न क े दोष क े अनुरूप सुसंगत होना चाहिए परंतु उसकी मासूमियत क े साथ असंगत होना चाहिए ।(गंभीर बनाम महाराष्ट्र राज्य [(1982) 2 एससीसी 351]) क े मामले को देखे।
23. शरद बर्दीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य [(1984) 4 एस. सी. सी. 116] में पारिस्थितिक साक्ष्य पर विचार करते समय यह अभिनिर्धारित किया गया है कि यह साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की है कि श्रृंखला पूरी हो गई है और अभियोजन में दुर्बलता या कमी को झूठे बचाव या अभिवचन से ठीक नहीं किया जा सकता है। सजा से पहले की शर्तें परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित हो सकती हैं, पूरी तरह से स्थापित होनी चाहिए। वे हैं: (एससीसी पृष्ठ 185, पैरा 153) (i) वे परिस्थितियां जिनसे दोष का निष्कर्ष निकाला जाना है, पूरी तरह से स्थापित की जानी चाहिए।"संबंधित परिस्थितियां स्थापित "नहीं हो सकती " "या" " नहीं होनी चाहिए और" "नहीं हो पायेंगी"। (ii) इस प्रकार स्थापित तथ्य क े दोष की परिकल्पना क े अनुरूप होने चाहिए, अर्थात अभियुक्त क े दोषी होने क े अलावा किसी अन्य परिकल्पना पर व्याख्या करने योग्य नहीं होने चाहिए; (iii) परिस्थितियाँ निर्णायक प्रक ृ ति और प्रवृत्ति की होनी चाहिए; (iv) उन्हें साबित की जाने वाली परिकल्पना को छोड़कर प्रत्येक संभावित परिकल्पना को अपवर्जित करना चाहिए और (v) साक्ष्य की एक श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चाहिए कि अभियुक्त की निर्दोषिता क े साथ संगत निष्कर्ष क े लिए कोई उचित आधार न छोड़े और यह दर्शित करे कि सभी मानवीय संभाव्यताओं में कार्य अभियुक्त द्वारा किया गया होगा। इसी प्रकार क े विचार को इस न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सतीश [(2005) 3 एससीसी 114] और पवन बनाम उत्तरांचल राज्य [(2009) 15 एससीसी 259] में दोहराया गया है।
24. सुब्रमण्यम बनाम टी.एन. राज्य में [(2009) 14 एससीसी 415], दहेज मृत्यु क े मामले पर विचार करते हुए, इस न्यायालय ने पाया कि एक साथ रहने का तथ्य एक मजबूत परिस्थिति है, लेकिन मृतक पर हिंसा क े किसी भी सबूत क े अभाव में अक े ले को निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता है, और इस निष्कर्ष पर पहुंचने क े लिए क ु छ सबूत होना चाहिए कि पति और अक े ले पति ही इसक े लिए जिम्मेदार थे।अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए साक्ष्य की प्रक ृ ति ऐसी नहीं होनी चाहिए जो अपीलार्थी की दोषसिद्धि को अस्थिर बना दे। (देखें रमेश भाई बनाम राजस्थान राज्य [(2009) 12 एससीसी 603]. (बल दिया गया)" 7.[3] जी. पार्श्वनाथ बनाम कर्नाटक राज्य, (2010) 8 एस. सी. सी. 593 क े पैरा 23 और 24 में यह अवलोकन किया गया है और निम्नानुसार अभिनिर्धारित किया गया: "23. ऐसे मामलों में जहां साक्ष्य परिस्थितिजन्य है, उन परिस्थितियों को, जिनसे अपराध का निष्कर्ष निकाला जाना है, पहली बार में पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए। जिन तथ्यों पर भरोसा किया जाना चाहिए, प्रत्येक को साबित किया जाना चाहिए। हालांकि, इस सिद्धांत को लागू करने में एक तरफ प्राथमिक या बुनियादी कहे जाने वाले तथ्यों क े बीच अंतर किया जाना चाहिए और दूसरी तरफ उनसे तथ्यों का निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। प्राथमिक तथ्यों क े साक्ष्य क े संबंध में, अदालत को साक्ष्य का निर्णय करना है और यह तय करना है कि क्या यह साक्ष्य एक विशेष तथ्य साबित करता है और यदि यह तथ्य साबित होता है, तो क्या यह तथ्य अभियुक्त व्यक्ति क े अपराध क े निष्कर्ष की ओर जाता है। समस्या क े इस पहलू से निपटने में, संदेह क े लाभ का सिद्धांत लागू होता है। हालांकि इस मामले में कोई कड़ी गायब नहीं होनी चाहिए, फिर भी यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक कड़ी को प्रस्तुत साक्ष्य की सतह पर प्रकट होना चाहिए और इनमें से क ु छ कड़ियों को सिद्ध तथ्यों से अनुमान लगाना पड़ सकता है। इन निष्कर्षों को निकालने में, अदालत को प्राक ृ तिक घटनाओं क े सामान्य पाठ्यक्रम और मानवीय आचरण और विशेष मामले क े तथ्यों से उनक े संबंधों को ध्यान में रखना चाहिए। तत्पश्चात न्यायालय को सिद्ध तथ्यों क े प्रभाव पर विचार करना होता है।
24. दोषसिद्धि क े प्रयोजन क े लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य की पर्याप्तता का निर्णय लेने में, अदालत को सभी सिद्ध तथ्यों क े क ु ल संचयी प्रभाव पर विचार करना होता है, जिनमें से प्रत्येक अपराध क े निष्कर्ष को पुष्ट करता है और यदि इन सभी तथ्यों का संयुक्त प्रभाव लिया जाता है एक साथ अभियुक्त क े दोष को स्थापित करने में निर्णायक है, दोषसिद्धि न्यायोचित होगी भले ही यह हो सकता है कि इनमें से एक या अधिक तथ्य अपने आप में या स्वयं निर्णायक नहीं हैं। स्थापित तथ्य क े अपराध की परिकल्पना क े अनुरूप होने चाहिए और सिद्ध किए जाने वाले को छोड़कर प्रत्येक परिकल्पना को अपवर्जित किया जाना चाहिए। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि क े वल पारिस्थितिक साक्ष्य पर आधारित किसी मामले में अभियोजन पक्ष क े सफल होने से पहले, उसे अभियुक्त द्वारा सुझाई गई प्रत्येक परिकल्पना को अपवर्जित कर देना चाहिए, चाहे वह कितना भी असाधारण और काल्पनिक क्यों न हो।साक्ष्य की ऐसी श्रृंखला होनी चाहिए जो अभियुक्त की निर्दोषिता से सुसंगत निष्कर्ष क े लिए कोई युक्तियुक्त आधार न छोड़े और यह दर्शित करे कि सभी मानवीय संभाव्यताओं में कार्य अभियुक्त द्वारा किया जाना चाहिए, जहां श्रृंखला में विभिन्न कड़ियाँ अपने आप में पूर्ण हैं, तब मिथ्या अभिवाक या मिथ्या प्रतिरक्षा को क े वल न्यायालय को आश्वासन देने क े लिए सहायता क े लिए बुलाया जा सकता है।" 7.[4] मोहम्मद यूनुस अली तरफदार (पूर्वोक्त) और अनवर अली और अन्य (पूर्वोक्त) क े मामले में पश्चातवर्ती विनिश्चयों में इस न्यायालय द्वारा ऐसा ही दृष्टिकोण अपनाया गया है। 7.[5] इस न्यायालय द्वारा पूर्वोक्त निर्णयों में दिए गए विधि को वर्तमान मामले तथ्यों पर लागू करते हुए इस पर विचार किया जाना है कि क्या मामले क े तथ्यों और परिस्थितियों में,भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/34 क े तहत दंडनीय अपराध क े लिए अभियुक्त को दोषी ठहराना उच्च न्यायालय और विचारण न्यायालय द्वारा न्यायोचित है? 7.[6] पी.डब्ल्यू.-6 क े बयान पर विचार करने पर, जिसे मुख्य गवाह कहा जा सकता है और जिसक े बयान पर अपीलार्थी-अभियुक्त को भा.द.स. की धारा 302/34 क े लिए दोषी ठहराया जाता है, यह भी नहीं कहा जा सकता है कि अभियोजन ने स्थापित किया है और साबित किया है कि अभियुक्त को मृतक क े साथ अंतिम बार देखा गया था। मुख्य परीक्षा में पी.डब्ल्यू.-6 ने कहा है कि क ु छ झगड़े क े बाद, दादी मृतक को उस कमरे में ले गई जहां मृतक सोने गया था। उसक े बाद वो भी सो गई और सुबह जब उठी तो पता चला कि उसक े पापा पेड़ पर लटक े हुए मिले हैं।जिरह में उसने विशेष रूप से कहा है कि उसने किसी को भी अपने पिता को पीटते हुए नहीं देखा है। इस प्रकार, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी को अंतिम बार मृतक क े साथ देखा गया था। मृतक क े कमरे में जाने और सोने क े बाद क्या हुआ, इसका कोई साक्ष्य नहीं है। 7.[7] इन परिस्थितियों में, अभियोजन अपराध और घटनाओं की पूरी श्रृंखला को साबित करने में विफल रहा है, जिससे एकमात्र निष्कर्ष निकल सकता है कि अपीलकर्ता-आरोपी ने अक े ले हत्या कारित की थी या मृतक को मारा था। परिस्थितियों क े तहत और परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर पूर्वोक्त निर्णयों में इस विचारण न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून को लागू करते हुए, हमारी राय है कि निचली अदालत और उच्च विचारण न्यायालय ने ऐसे परिस्थितिजन्य साक्ष्य क े आधार पर भा.द.स धारा 302/34 क े अंतर्गत अपराध क े लिए अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराने में बहुत गंभीर गलती की है। भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 क े तहत अपराध क े लिए अपीलार्थियों-अभियुक्तगणों की दोषसिद्धि संधारणीय नहीं है।
8. उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए और ऊपर बताए गए कारणों से, दोनों अपीलें सफल होती हैं। विद्वान विचारण न्यायालय क े साथ-साथ उच्च न्यायालय द्वारा अपीलकर्ताओं को भा.दं.सं. की धारा 302/34 क े लिए मूल अभियुक्तगणों को दोषी ठहराने क े निर्णय और आदेश को अपास्त व रद्द किया जाता है और अभियुक्तों को उस अपराध क े लिए दोषमुक्त किया जाता है जिसक े लिए उन्हें दोषी ठहराया गया था। यदि किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो तो अपीलकर्ताओं अभियुक्तों को तुरंत रिहा किया जाए। तदनुसार वर्तमान अपीलें स्वीकार की जाती है। ज.[एम.आर.शाह] ज.(क ृ ष्ण मुरारी)