Full Text
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
आपरात्रिक अपीलीय अत्रिकार क्षेि
आपराधिक अपील संख्या 1441/2022
झारखंड राज्य ........................... अपीलकर्ाा
बनाम
शैलेंद्र कुमार राय उर्ा पांडव राय .............................. प्रधर्वादी
डॉ. िनंजय र्वाई चंद्रचूड़, न्यायािीश
त्रर्वषय-सूची
क. पृष्ठभूत्रम 4 i. अत्रभयोजन पक्ष द्वारा परीक्षर् कराए गए गर्वाहों की गर्वाही 5
का अर्वलोकन
क. लल्लन प्रसाद, अधियोजन साक्षी सं. 11 5
ख. डॉ. आर. के. पांडेय, अधियोजन साक्षी सं. 6 7
ग. डॉ. मीनू मुखजी, अधियोजन साक्षी सं. 9 7
घ. डॉ. आर. महर्ो, अधियोजन साक्षी सं. 8 9
ङ. सुरेश यादव, अधियोजन साक्षी सं. 12 10
च. रेखा दासगुप्ता, अधियोजन साक्षी सं. 7 10
छ. पक्ष द्रोही गवाह 11 ii. बचार्व पक्ष द्वारा परीक्षर् कराए गए गर्वाहों की गर्वाही का अर्वलोकन 11
क. िीरेंद्र राय, बचाव साक्षी सं. 1 11
ख. दशरथ धर्वारी, बचाव साक्षी सं. 2 12
ख. मुद्दे 16
ग. प्रस्र्ुर् र्का 17
घ. धवश्लेषण 18 i. मृतका का बयान भारतीय साक्ष्य अत्रित्रनयम 1872 की िारा 32 (1) 18
के तहत प्रासंत्रगक है
क. पीध़िर्ा की मृत्यु जलने के कारण ही हुई 18
ख. मृर्का का कथन उसकी मृत्यु के कारण, पररधस्थधर्यों र्था घटनाओंसे 22
मेल खार्ा है, धजसके पररणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई
ग. मृत्युकाधलक कथन की स्वीकायार्ा और प्रामाधणकर्ा 25 ii. अत्रभयोजन पक्ष ने प्रत्रतर्वादी के त्रिलाफ अपने मामले को 29
युत्रियुक्त संदेह से परे सात्रबत कर त्रदया है
ङ. त्रिप्पत्रर्यां 35
JUDGMENT
1. यह अपील झारखंड उच्च न्यायालय के धदनांक 27 जनवरी 2018 के धनणाय से उद्भूर् है। उच्च न्यायालय ने प्रधर्वादी की अपील स्वीकार कर ली और अपर सत्र न्यायािीश, एर्.टी.सी.- II, देवघर द्वारा पाररर् दोषधसधि के आदेश को अपास्र् कर धदया और पररणामर्: दंडादेश धदनांक 10 अक्टूबर, 2006 और 11 अक्टूबर, 2006 को िी अपास्र् कर धदया। सत्र न्यायािीश ने प्रधर्वादी को िारर्ीय दंड संधहर्ा 18601 की िारा 302, 376, 341 और 448 के र्हर् दंडनीय अपरािों के धलए दोषी ठहराया था और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। क. पृष्ठभूत्रम
2. अधियोजन पक्ष के द्वारा दायर मामला यह है धक प्रधर्वादी 7 नवंबर 2004 की दोपहर को नारंगी गांव में पीध़िर्ा (मृर्का) के घर में घुसा। आरोप लगाया गया है धक उसने पीध़िर्ा को जमीन पर पटक धदया, उसके साथ बलात्कार धकया और िमकी दी धक अगर उसने शोर मचाया र्ो वह उसे जान से मार देगा। जब वह बचाव के धलए धचल्लाई, र्ब प्रधर्वादी ने कधथर् र्ौर पर उस पर केरोधसन डाल धदया और माधचस की र्ीली से आग लगा दी। धचल्लाने पर उसके दादा, मां और गांव का एक व्यधि उसके कमरे में आए। आरोप है धक प्रधर्वादी उन्हें देखकर मौके से र्रार हो गया।
3. पीध़िर्ा के पररवार (उि ग्रामीण सधहर्) ने आग बुझाई और उसे देवघर सदर अस्पर्ाल ले गए। वहां उसे िर्ी कराया गया और उसके जख्मों का उपचार कराया गया। 1.िा.दं. सं. भाग- क पुधलस थाना सारवां के थाना प्रिारी को घटना के बारे में जानकारी धमली और वे देवघर गए। वहां उन्होंने उसी धदन (यानी 7 नवंबर, 2004 को ) पीध़िर्ा का 'र्दाबयान'दजा धकया। पीध़िर्ा ने अपने बयान में घटना का वणान धकया जैसा धक ऊपर पैराग्रार् 2 में अंधकर् है।
4. पीध़िर्ा के बयान के आिार पर पुधलस थाना सारवां में प्राथधमकी संख्या 163/2004 दजा की गई और अनुसंिान शुरू धकया गया। लल्लन प्रसाद अनुसंिान अधिकारी थे और बाद में सुरेश यादव ने उनसे अनुसंिान का प्रिार धलया। अनुसंिान पूरा होने पर, दंड प्रधिया संधहर्ा, 1973 की िारा 173 के र्हर् अनुसंिान अधिकारी ने िा.दं.सं. की िारा 307, 341, 376 और 448 के र्हर् अपरािों के धलए आरोप-पत्र प्रस्र्ुर् धकया। धदनांक 14 धदसम्बर 2004 को पीध़िर्ा की मृत्यु हो गई। पररणामस्वरूप प्रधर्वादी के धखलार् िा.दं.सं. की िारा 302 के र्हर् पूरक आरोप-पत्र समधपार् धकया गया।
5. प्रधर्वादी ने अपने दोष से इनकार धकया।
6. धवचारण के दौरान अधियोजन पक्ष ने अपने मामले के समथान में 12 गवाहों का परीक्षण कराया और बचाव पक्ष ने र्ीन गवाहों का परीक्षण कराया। गवाहों का मुख्य परीक्षण, प्रधर्परीक्षण र्था गवाहों की प्रामाधणकर्ा धनम्नानुसार हैi. अत्रभयोजन पक्ष द्वारा परीक्षर् कराए गए गर्वाहों की गर्वाही का अर्वलोकन क. लल्लन प्रसाद, अधियोजन साक्षी सं. 11 भाग- क
7. सारवां थाना प्रिारी लल्लन प्रसाद ने बयान धदया है धक उन्हें 7 नवंबर 2004 को उि घटना के बारे में जानकारी धमली, धजस पर वे देवघर पहुंचे। उन्होंने उसी धदन सदर अस्पर्ाल, देवघर में पीध़िर्ा का बयान अपनी धलखावट में दजा धकया और उसका बयान उसे पढ़ कर सुनाया। पीध़िर्ा ने उनकी उपधस्थधर् में बयान पर हस्र्ाक्षर धकए और धर्र उन्होंने स्वयं िी बयान पर हस्र्ाक्षर धकए। लल्लन प्रसाद की उपधस्थधर् में, पीध़िर्ा के दादा-दादी और उि ग्रामीण ने बयान पर हस्र्ाक्षर धकए और डॉ. आर. के. पांडेय ने प्रमाधणर् धकया धक पीध़िर्ा बयान देने में सक्षम थी और उन्होंने िी बयान पर हस्र्ाक्षर धकए। लल्लन प्रसाद ने कहा धक डॉ. आर. के. पांडेय उस समय उपधस्थर् थे जब उन्होंने मृर्का का बयान दजा धकया था।
8. उसके बाद उन्होंने डॉ. आर. के. पांडेय और अन्य गवाहों के बयान दजा धकए। एक वररष्ठ नसा रेखा दासगुप्ता ने पीध़िर्ा के अंर्वास्त्र सुपुदा धकए। लल्लन प्रसाद ने उन्हें जब्र् धकया और जब्र्ी सूची र्ैयार की।
9. आई.ओ. ने कहा धक उन्होंने घटनास्थल की जांच की। वहां जले हुए कप़िे, खाली बोर्ल, जो केरोधसन की-सी प्रर्ीर् हो रही थी, पाए गए। बरामदे में िूल थी, जहां अपराि धकया गया बर्ाया जार्ा है। उन्होंने देखा धक दीवार और र्शा पर जलने के धनशान थे। उन्होंने जले हुए कप़िे और खाली बोर्ल जब्र् की और जब्र्ी सूची र्ैयार की। उन्होंने कई अन्य गवाहों के बयान िी दजा धकए।
10. प्रधर्परीक्षण के दौरान सवालों के जवाब में लल्लन प्रसाद ने कहा धक उन्होंने सीजेएम, देवघर से प्रधर्वादी या मृर्का का बयान दजा करने के धलए आवेदन नहीं धकया था। भाग- क इसके अलावा, उन्होंने उस समय ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर या धसधवल सजान से पीध़िर्ा का बयान दजा करने का अनुरोि नहीं धकया। उन्होंने कहा धक उन्होंने खुद ही पीध़िर्ा का बयान दजा धकया क्योंधक उसका स्वास््य र्ेजी से धबग़ि रहा था।
11. उन्होंने कहा धक उन्हें यह याद नहीं है धक पीध़िर्ा को गहन धचधकत्सा इकाई में िर्ी कराया गया था या सामान्य वाडा में। वे उस वाडा में िर्ी रोधगयों की संख्या िी नहीं बर्ा सके। अनुसंिान अधिकारी ने बयान धदया धक उन्हें माधचस का धडब्बा, धमट्टी के र्ेल का दीपक, लालटेन या ऐसी अन्य कोई सामग्री िी नहीं धमली, धजससे घटनास्थल पर आग लगाई जा सके। उन्होंने कहा धक उन्होंने घटनास्थल से जब्र् की गई खाली बोर्ल को प्रयोगशाला में नहीं िेजा क्योंधक उसे जब्र् करने के र्ुरंर् बाद उसका स्थानांर्रण कर धदया गया था। ख. डॉ. आर. के. प ांडेय, अभियोजन स क्षी सां. 6
12. सदर अस्पर्ाल के एक धचधकत्सा अधिकारी डॉ. आर. के. पांडेय ने गवाही दी धक उन्होंने 7 नवंबर 2004 को पीध़िर्ा की जांच की थी, जब उसे जली हुई अवस्था में इलाज के धलए अस्पर्ाल लाया गया था। उन्होंने प्रमाधणर् धकया धक मृर्का बयान देने के धलए मानधसक और शारीररक रूप से सक्षम थी। धजस समय मृर्का ने लल्लन प्रसाद को बयान धदया, उस समय डॉ. आर. के. पांडेय मृर्का के बगल वाली मेज पर धकसी रोगी की जांच कर रहे थे। ग. डॉ. मीनू मुखजी, अभियोजन स क्षी सां. 9
13. सदर अस्पर्ाल में एक धचधकत्सा अधिकारी के पद पर कायारर् डॉ. मीनू मुखजी ने साक्ष्य धदया धक जब पीध़िर्ा का उपचार हो रहा था, उस समय वह िी पीध़िर्ा की जांच के भाग- क धलए गधठर् मेधडकल बोडा की सदस्य थी। डॉ. मीनू ने गवाही दी धक मेधडकल बोडा ने 7 नवंबर 2004 को मृर्का की जांच की और धनम्नधलधखर् धनष्कषा धनकाले: क. मृर्का के जघन क्षेत्र, स्र्नों और अगली खोप़िी में जलने के घाव थे। ख. मृर्का के जघन क्षेत्र में ‘बाहरी बाल’ नहीं पाए गए। ग. योधन पर िब्बों की पैथोलॉधजकल जांच ररपोटा से पर्ा चला धक मृर्का के जघन क्षेत्र में कोई स्पमा (जीधवर् या मृर्) नहीं था। घ. योधन जांच से पर्ा चला धक दो उंगधलयां आसानी से प्रधवष्ट की जा सकर्ीं थी। ङ. मृर्का के 14 ऊपरी और 14 धनचले दांर् थे, अथाार् अिी पूरे नहीं हुए थे। जघन सहविान 40% था। उसकी कलाई के एक्स-रे से पर्ा चला धक उसकी उम्र 17 साल से कम है।
14. जांच और धनष्कषों के आिार पर मेधडकल बोडा ने राय दी धकिः क. मृर्का की आयु लगिग 16 वषा थी। ख. संिोगकी संिावना सेइंकारनहीं धकया जा सकर्ा,हालांधकइससंबंि मेंकोईधनधिर् राय नहीं दी जा सकर्ी। मेधडकल बोडा के इस धनष्कषा एवं मंर्व्य को डॉ. मीनू मुखजी द्वारा र्ैयार एक ररपोटा में दजा धकया गया था। मेधडकल बोडा के अन्य सदस्यों ने िी इस ररपोटा पर हस्र्ाक्षर धकए।
15. प्रधर्परीक्षण के दौरान प्रश्नों के उत्तर में डॉ. मीनू मुखजी ने कहा धक संिोग के 72 घंटे बाद र्क गधर्शील शुिाणु और संिोग के 7-10 धदन बाद र्क गधर्हीन शुिाणु देखे जा भाग क सकर्े हैं। उन्होंने आगे कहा धक हो सकर्ा है मृर्का ने कधथर् अपराि की र्ारीख से पहले संिोग धकया होगा, और उसकी योधन में दो उंगधलयों के प्रवेश हो सकने का अथा है धक उसे संिोग करने की आदर् थी। उन्होंने बचाव पक्ष की इस बार् का िी खंडन धकया धक उन्होंने ऐसी मेधडकल ररपोटा इसधलए र्ैयार की है, क्योंधक उच्च अधिकाररयों ने ऐसा करने के धलए उन पर दबाव डाला था। घ. डॉ. आर. महतो, अभियोजन स क्षी सां. 8
16. सदर अस्पर्ाल के उपािीक्षक डॉ. आर. महर्ो ने गवाही दी धक उन्होंने 14 धदसंबर 2004 को मृर्का के शरीर का अंत्यपरीक्षण धकया और धनम्नधलधखर् धनष्कषा धनकाले: क. मृर् शरीर के धवधिन्न स्थानों पर अल्सर थे। उसके धसर, चेहरे और छार्ी पर कई पपध़ियां थीं। ये जख्म गंिीर रूप से जलने के कारण हुए और लगिग छह सप्ताह पहले के थे। ख. शरीर के अंत्यपरीक्षण से पर्ा चला धक खोप़िी सही-सलामर् थी, मधस्र्ष्क पदाथा पीला प़ि गया था, र्ेऱ्िे िी पीले थे, हृदय के दाधहने कक्ष में रि था और बायां कक्ष खाली था, पेट और मूत्राशय खाली थे। यकृर्, प्लीहा और गुदे संकुधचर् थे।
17. अपने मंर्व्यों के आिार पर डॉ. आर. महर्ो ने धनष्कषा धनकाला धक पीध़िर्ा की मृत्यु सेप्टीसीधमया के कारण हुई, जो पीध़िर्ा के गंिीर रूप से जलने का पररणाम था। उन्होंने अपने धनष्कषों और मंर्व्य को पोस्टमाटाम ररपोटा में दजा धकया। भाग क
18. प्रधर्परीक्षण के दौरान प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने कहा धक सेप्टीसीधमया से पीध़िर्ा लोगों की मानधसक धस्थधर् में बदलाव आ सकर्ा है, धजसके कारण वे धच़िधच़िे हो सकर्े हैं और धकसी िी प्रश्न का उत्तर नहीं िी दे सकर्े हैं। उन्होंने यह िी कहा धक मृर्का का इलाज कर रहे एक डॉक्टर ने उसे बोकारो बना अस्पर्ाल रेर्र कर धदया था। ङ सुरेश य दव, अभियोजन स क्षी सां. 12
19. सारवां के पुधलस अधिकारी सुरेश यादव ने साक्ष्य धदया धक उन्होंने 18 नवंबर 2004 को इस मामले के अनुसंिान का प्रिार लल्लन प्रसाद से ग्रहण धकया। उसने िारर्ीय दंड संधहर्ा की िारा 307, 341, 376 और 448 के र्हर् अपरािों के धलए द.प्र.सं. की िारा 173 के र्हर् आरोप-पत्र प्रस्र्ुर् धकया। जब उन्हें पर्ा चला धक पीध़िर्ा की 14 धदसंबर 2004 को मृत्यु हो गई, र्ो वे सदर अस्पर्ाल गए और द.प्र.सं. की िारा 174 के र्हर् मृत्यु समीक्षा ररपोटा र्ैयार की। इसके बाद, उन्होंने पोस्टमाटाम ररपोटा प्राप्त की और िा.दं.सं. की िारा 302 के अन्र्गार् प्रधर्वादी के धखलार् पूरक आरोप-पत्र प्रस्र्ुर् धकया। च. रेख द सगुप्त, अभियोजन स क्षी सां. 7 सदर अस्पर्ाल की नसा रेखा दासगुप्ता लल्लन प्रसाद द्वारा र्ैयार की गई जब्र्ी सूची की गवाह थीं, जब मृर्का के अंर्वास्त्र जब्र् धकए गए थे। भाग क छ. पक्षद्रोही गव ह धनम्नधलधखर् गवाहोंने शुरूमेंअधियोजनपक्षका समथानधकया लेधकनबादमेंउन्हेंपक्षद्रोही घोधषर् कर धदया गया: क. पावार्ी देवी, अधियोजन साक्षी सं. 1 (मृर्का की मां) ख. धविूधर् िूषण राय, अधियोजन साक्षी सं. 2 (मृर्का के दादा) ग. मृत्युंजय राय, अधियोजन साक्षी सं. 3 घ. संजय कुमार, अधियोजन साक्षी सं. 4 ङ. सुनील कुमार रॉय, अधियोजन साक्षी सं. 5 और च. बाल कृष्ण राय, अधियोजन साक्षी सं. 10 ii. बचार्व पक्ष द्वारा प्रस्तुत गर्वाहों की गर्वाही का अर्वलोकन क. धीरेंद्र र य, बच व स क्षी सां. 1
22. नारंगी गांव के धनवासी िीरेंद्र राय ने साक्ष्य धदया धक प्रधर्वादी के धवरुि झूठा मामला दजा धकया गया हैऔर काशी राय और प्रधर्वादी के बीच िूधम की धसंचाई संबंिी कुछ धववाद था। उन्होंने गवाही दी धक जब वे मृर्का के घर में गए, र्ो देखा धक पीध़िर्ा जल रही थी लेधकन उसने आग बुझाने का प्रयास नहीं धकया। उनके अनुसार, उस समय मृर्का के पररवार का कोई िी सदस्य वहां मौजूद नहीं था। भाग क
23. प्रधर्परीक्षण के दौरान सवालों के जवाब में उन्होंने कहा धक उि मामले के अनुसंिान के दौरान गांव में गए हुए पुधलसकधमायों को उन्होंने कोई बयान नहीं धदया था। ख. दशरथ भतव री, बच व स क्षी सां. 2
24. नारंगी गांव के धनवासी दशरथ धर्वारी ने बयान धदया धक उसने मृर् मधहला को जलने के बाद देखा था और वह बोलने की धस्थधर् में नहीं थी। ग. ब लमुकुांद र य, बच व स क्षी सां. 3
25. नारंगी गांव के धनवासी बालमुकुंद राय ने गवाही दी धक वह खाना बनाने के दौरान दुघाटना में जल गई थी। iii. सि न्यायालय का त्रनर्णय
26. सत्र न्यायालय ने धदनांक 10 अक्टूबर, 2006 को पाररर् आदेश के द्वारा प्रधर्वादी को िारर्ीय दंड संधहर्ा (िा.दं.सं.) की िारा 302, 341, 376 और 448 के र्हर् अपरािों के धलए दोषी ठहराया। सत्र न्यायालय ने धदनांक 11 अक्टूबर 2006 को पाररर् आदेश के द्वारा िा.दं. सं. की िारा 302 के र्हर् दंडनीय अपराि करने के कारण प्रधर्वादी को आजीवन कठोर कारावास और िा.दं. सं. की िारा 376 के र्हर् दंडनीय अपराि करने के कारण 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। यह िी धनदेश धदया धक दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। िा.दं.सं. की िारा 341 और 448 के र्हर् धकए गए दंडनीय अपरािों के धलए अलग सजा की आवश्यकर्ा नहीं समझी गई। भाग क
27. अधिलेख पर उपलब्ि साक्ष्यों की धववेचना र्था धवधि के धसिांर्ों के आिार पर सत्र न्यायालय ने धनम्नधलधखर् धबंदुओंके अनुसार दोषधसधि की: क. बचाव पक्ष के इस कथन को स्वीकार नहीं धकया गया धक मृत्युसे पूवा मृर्का का बयान दजा करर्े समय उसकी मानधसक धर्टनेस का कोई प्रमाण नहीं था; क्योंधक डॉ. आर. के. पांडेय ने प्रमाधणर् धकया था धक मृर्का बयान देने के धलए मानधसक रूप से सक्षम थी। ख. बचाव पक्ष ने र्का धदया धक मृर्का के पररवार के सदस्यों को पक्षद्रोही गवाह घोधषर् धकया गया था, धजससे अधियोजन पक्ष का मामले में दम नहीं रहा। न्यायालय ने इसे स्वीकार नहीं धकया क्योंधक न्यायालय का मानना है धक अधियोजन पक्ष का कहना यह नहीं था धक पक्षद्रोही गवाह इस मामले की घटना के चश्मदीद गवाह थे, बधल्क पक्षद्रोही गवाहों का परीक्षण करने का उद्देश्य यह साधबर् करना था धक मृर्का ने अपने पररवार वालों को बर्ाया धक आरोपी ने उसके साथ बलात्कार धकया और उसे जला डाला। सत्र न्यायालय ने यह िी कहा धक पक्षद्रोही गवाहों को ररश्वर् देकर अथवा जान-माल की िमकी देकर आरोपी के धखलार् गवाही न देने के धलए राजी धकया जा सकर्ा है। केवल इस एक र््य से अधियोजन पक्ष का मामला बेदम साधबर् नहीं होर्ा। ग. धकसी पुधलस अधिकारी के द्वारा मृत्युकाधलक कथन दजा करने पर रोक नहीं है। घ. अधियोजन साक्षी सं. 11 ने बयान धदया धक डॉ. बी. के. पांडेय ने प्रमाधणर् धकया धक मृर्का मानधसक और शारीररक रूप से स्वस्थ थी। जबधक वह डॉ. आर. के. पांडेय भाग क (अधियोजन साक्षी सं. 6) थे। यह केवल धलखने में हुई गलर्ी मात्र थी। इसधलए बचाव पक्ष का यह र्का स्वीकार नहीं धकया गया धक बी. के. पांडेय नामक एक डॉक्टर सदर अस्पर्ाल में ड्यूटी पर थे और उन्होंने यह प्रमाधणर् करने से इनकार कर धदया था धक मृर्का बयान देने के धलए शारीररक और मानधसक रूप से सक्षम थी। ङ. डॉ. आर. के. पांडेय ने बयान धदया धक मृर्का गहन पी़िा में थी, परंर्ु इसका अथा यह नहीं है धक वह अनुसंिान अधिकारी को बयान देर्े समय पूरी र्रह से होश में नहीं थी। च. डॉ. मीनू मुखजी ने बयान धदया धक उन्हें बलात्कार का कोई संकेर् नहीं धमला। परंर्ु इससे यह सुधनधिर् नहीं होर्ा धक प्रधर्वादी ने मृर्का का बलात्कार धकया था या नहीं। धचधकत्सा अधिकाररयों के मंर्व्य से र््यों के गवाहों का महत्व कम नहीं हो जार्ा। छ. घटनास्थल से जब्र् की गई बोर्ल रासायधनक धवश्लेषण के धलए नहीं िेजी गई। परंर्ु इससे यह धनष्कषा नहीं धनकलर्ा है धक प्रधर्वादी ने मृर्का के ऊपर धमट्टी का र्ेल नहीं डाला था। सत्र न्यायालय ने कहा है धक मृत्युकाधलक कथन स्वैधच्छक और धवश्वसनीय था र्था इसमें धकसी र्रह की कोई कमी नहीं थी। अर्िः यह धनणाय धदया गया धक अधियोजन पक्ष ने मामले को युधियुि संदेह से परे साधबर् कर धदया और प्रधर्वादी को मृत्युकाधलक कथन के आिार पर िा.दं.सं. की िारा 302, 341, 376 और 448 के अिीन दंडनीय अपराि के धलए दोषी करार धदया। भाग क iv. अपील पर उच्च न्यायालय का त्रनर्णय
28. प्रधर्वादी ने झारखंड उच्च न्यायालय में अपील दाधखल की। धदनांक 27 जनवरी, 2018 को पाररर् र्ैसले में उच्च न्यायालय ने धनम्नधलधखर् कारणों से सत्र न्यायालय के र्ैसले को रद्द कर धदया और प्रधर्वादी को बरी कर धदया: क. मृर्का के पररवार वालों को पक्षद्रोही गवाह घोधषर् धकया गया था। ख. डॉ. आर. के. पांडेय ने मुख्य परीक्षण के दौरान कहा धक मृत्यु पूवा बयान उनकी उपधस्थधर् में दजा धकया गया था। हालांधक, उन्होंने प्रधर्परीक्षण के दौरान अपनी बार् का खंडन करर्े हुए कहा धक वह उस कमरे के बगल में एक अन्य रोगी को देख रहे थे, धजसमें मृर्का का इलाज धकया जा रहा था। इसधलए, मृत्युकाधलक कथन उनकी उपधस्थधर् में दजा नहीं धकया गया था। ग. डॉ. आर. महर्ो ने प्रधर्परीक्षण के दौरान एक प्रश्न के उत्तर में कहा धक पीध़िर्ा के पररवार को बेहर्र उपचार के धलए बोकारो बना अस्पर्ाल ले जाने की सलाह दी गई थी लेधकन वे उसे नहीं ले गए। घ. मृर्का का बयान मृत्युपूवा कथन के रूप में ग्राह्य नहीं है। इसके धलए मोती त्रसंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य[2] के मामले में धदए गए धनणाय का प्रमाण धदया गया। ङ. डॉ. मीनू मुखजी (अधियोजन साक्षी सं. 9) ने जब पीध़िर्ा की जांच की र्ो उन्हेंसंिोग का कोई संकेर् नहीं धमला।
2. एआईआर 1964 एससी 900 भाग ि इनकारणों से,उच्च न्यायालयने धनणायधदया धकअधियोजनपक्ष प्रधर्वादी के धवरुि आरोपों को युधियुि संदेह से परे साधबर् करने में धवर्ल रहा। अपीलकर्ाा ने संधविान के अनुच्छेद 136 के र्हर् इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग धकया और उच्च न्यायालय के र्ैसले को चुनौर्ी दी। इस कायावाही के धलए 2 जनवरी, 2019 को नोधटस जारी धकया गया था। ि. मुद्दे
29. पक्षकारों की ओर से दी गई प्रस्र्ुधर्यों के आिार पर, धनणाय के धलए दो प्रश्न उठर्े हैं: क. क्या मृर्का का बयान िारर्ीय साक्ष्य अधिधनयम, 18723 की िारा 32 (1) के र्हर् प्रासंधगक है? ख. क्या अधियोजन पक्ष ने प्रधर्वादी के धखलार् आरोपों को युधियुि संदेह से परे साधबर् धकया है?
3. साक्ष्य अधिधनयम भाग- ग ग. प्रस्तुत तकण
30. श्री धवष्णु शमाा ने अपीलकर्ाा की ओर से बहस की। उनके र्का इस प्रकार थे: क. उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों पर सही ढंग से धवचार नहीं धकया। डॉ. आर. के. पांडेय मृर्का के बगल वाली मेज पर रोगी देख रहे थे, न धक उस कमरे के बगल वाले कमरे में, धजसमें मृर्का िर्ी थी। ख. मृर्का का पोस्टमाटाम मृत्यु के 12 घंटे के िीर्र धकया गया। पोस्टमॉटाम ररपोटा में बर्ाया गया है धक बहुर् अधिक जल जाने के कारण उत्पन्न सेधप्टसीधमया उसकी मौर् का कारण था।
31. अपीलकर्ाा की ओर से प्रस्र्ुर् र्कों का प्रधर्वादी पक्ष ने धवरोि धकया। उनके अधिविा श्री ब्रज धकशोर धमश्रा ने धनम्नधलधखर् र्का धदए: क. यद्यधप मृत्युकाधलक कथन यह इंधगर् करर्ा है धक प्रधर्वादी ने मृर्का के साथ बलात्कार धकया, परंर्ु मेधडकल बोडा की ररपोटा में कहा गया है धक इस संबंि में कोई धनधिर् राय नहीं दी जा सकर्ी। यह धसि करने के धलए धक प्रधर्वादी ने मृर्का के साथ बलात्कार धकया, मृत्युकाधलक कथन के अलावा और कोई साक्ष्य नहीं है। ख. घटना की धशकायर् दजा कराए जाने के लगिग एक महीने बाद पीध़िर्ा की मृत्युहुई। इसधलए अनुसंिान अधिकारी को मृर्का द्वारा धदया गया बयान मृत्युकाधलक कथन नहीं माना जा सकर्ा। भाग- घ घ. त्रर्वश्लेषर् i. मृतका का बयान भारतीय साक्ष्य अत्रित्रनयम 1872 की िारा 32 (1) के तहत प्रासंत्रगक है। क. पीभ़ित की मृत्यु जलने के क रण ही हुई
32. डॉ. आर. महर्ो (अधियोजन साक्षी सं. 8) द्वारा र्ैयार की गई पोस्टमॉटाम ररपोटा में कहा गया है धक पीध़िर्ा की मृत्यु का कारण सेधप्टसीधमया था, जो पीध़िर्ा के गंिीर रूप से जलने के कारण उत्पन्न हुआ था। बचाव पक्ष ने इस धनष्कषा की सत्यर्ा पर सवाल उठाने की कोधशश की है।
33. प्रधर्परीक्षण के दौरान एक सवाल के जवाब में डॉ. आर. महर्ो ने कहा धक उन्हें स्पष्ट रूप से याद है धक मृर्का का इलाज कर रहे डॉक्टर ने उसे बोकारो बना अस्पर्ाल रेर्र कर धदया था। र्ब िी उसे उस अस्पर्ाल में नहीं ले जाया गया। सत्र न्यायािीश के समक्ष सुनवाई के दौरान मृर्का को बोकारो बना अस्पर्ाल िेजने वाले डॉक्टर का कहीं नाम नहीं धलया गया है और उसे साक्ष्य देने के धलए बुलाया िी नहीं गया। उच्च न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान प्रधर्वादी के वकील ने र्का धदया धक मृर्का को बोकारो बना अस्पर्ाल में नहीं ले जाना एक महत्वपूणा धवचारणीय धबंदु है। उन्होंने र्का धदया धक इस र््य के कारण यह साधबर् नहीं हो सका धक मृर्का की मृत्यु जलने के कारण हुई थी। इस र्का से ऐसा प्रर्ीर् होर्ा है धक यधद र्थाकधथर् अज्ञार् डॉक्टर की (बोकारो बना अस्पर्ाल में ले जाने की) सलाह मान ली गई होर्ी, र्ो पीध़िर्ा की मृत्यु नहीं हुई होर्ी। जैसा धक उच्च न्यायालय के धनणाय में उल्लेख भाग- घ धकया गया है, उच्च न्यायालय ने इस र्का को स्वीकार धकया और धनणाय धदया धक मृत्यु का कारण धसि न होने के कारण मृर्का का कथन वास्र्धवक मृत्युकाधलक कथन नहीं माना जा सकर्ा।
34. डॉ. आर. महर्ो के इस बयान पर धवश्वास धकया गया है धक धकसी डॉक्टर ने मृर्का को बोकारो बना अस्पर्ाल रेर्र धकया था। इस धवश्वास के आिार पर यह कहने की कोधशश की गई है धक ऐसा धनधिर् रूप से हुआ था और इस पर ध्यान नहीं धदया गया। बचाव पक्ष के वकील ने डॉ. आर. महर्ो की गवाही पर धवश्वास करर्े हुए साधबर् करने की कोधशश की है धक: क. एक अज्ञार् डॉक्टर ने मृर्का की जांच की। ख. उस डॉक्टर ने सलाह दी धक मृर्का का इलाज बोकारो बना अस्पर्ाल में धकया जाए। ग. उस डॉक्टर ने मृर्का को बोकारो बना अस्पर्ाल के धलए रेर्र कर धदया। घ. मृर्का और उसके पररवार ने यह सलाह नहीं मानी। ङ. यधद उसका इलाज सदर अस्पर्ाल के बजाय बोकारो बना अस्पर्ाल में धकया गया होर्ा, र्ो पीध़िर्ा की मौर् नहीं हुई होर्ी। डॉ. आर. महर्ो का बयान (केवल उर्ना ही, धजसमें वे कहर्े हैं धक धकसी धचधकत्सक ने कधथर् रूप से मृर्का को बोकारो बना अस्पर्ाल में रेर्र धकया था) साक्ष्य अधिधनयम की िारा 60 को ध्यान में रखर्े हुए स्वीकाया नहीं है। भाग- घ िारा 60 में प्राविान है धक मौधखक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाधहए: “ मौधखक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाधहए – मौधखक साक्ष्य, समस्र् अवस्थाओं में चाहे वे कैसी ही हों, प्रत्यक्ष ही होगा, अथाार््:- यधद वह धकसी देखे जा सकने वाले र््य के बारे में है, र्ो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहर्ा है धक उसने उसे देखा; यधद वह धकसी सुने जा सकने वाले र््य के बारे में है, र्ो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहर्ा है धक उसने उसे सुना; यधद वह धकसी ऐसे र््य के बारे में है धजसका धकसी अन्य इंधद्रय द्वारा या धकसी अन्य रीधर् से बोि हो सकर्ा था, र्ो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहर्ा है धक उसने उसका बोि उस इंधद्रय द्वारा या उस रीधर् से धकया; यत्रद र्वह त्रकसी राय के, या उन आिारों के, त्रजन पर र्वह राय िाररत है, बारे में है, तो र्वह उस व्यत्रि का ही साक्ष्य होगा जो र्वह राय उन आिारों पर िारर् करता है: परन्र्ु धवशेषज्ञों के धवचार, जो सामान्यर्िः धविय के धलए प्रस्थाधपर् की जाने वाली धकसी पुस्र्क में अधिव्यि हैं, और वे आिार, धजन पर ऐसी राय आिाररर् हैं, यधद रचधयर्ा मर गया है, या वह धमल नहीं सकर्ा है या वह साक्ष्य देने के धलए असमथा हो गया है या उसे इर्ने धवलम्ब या व्यय के धबना धजर्ना न्यायालय अयुधियुि समझर्ा है, साक्षी के रूप में बुलाया नहीं जा सकर्ा हो, ऐसी पुस्र्कों को पेश करके साधबर् धकए जा सकेंगे: भाग- घ परन्र्ु यह िी धक यधद मौधखक साक्ष्य दस्र्ावेज से धिन्न धकसी िौधर्क चीज के अधस्र्त्व या दशा के बारे में है, र्ो न्यायालय, यधद वह ठीक समझे, ऐसी िौधर्क चीज का अपने धनरीक्षणाथा पेश धकया जाना अपेधक्षर् कर सकेगा । (इस पर जोर धदया गया है)
35. यहां अप्रत्यक्ष रूप से यह साधबर् करने की कोधशश की गई हैधक धकसी अज्ञार् डॉक्टर ने मृर्का को बोकारो बना अस्पर्ाल रेर्र धकया था। डॉ. आर. महर्ो के प्रधर्परीक्षण में से यह र््य धनकालने की कोधशश की गई है धक मृर्का के सवोत्तम उपचार हेर्ु उि अज्ञार् धचधकत्सक की राय ही महत्वपूणा थी। यह र््य साक्ष्य अधिधनयम की िारा 60 के प्राविानों के अनुसार स्वीकाया नहीं है, धजसमें कहा गया है धक कोई िी मौधखक साक्ष्य, जो धकसी धवचार के संबंि में है, उि धवचार को रखने वाले व्यधि का प्रत्यक्ष साक्ष्य ही होना चाधहए। उनकी गवाही (का यह धबंदु धजसमें कहा गया है धक पीध़िर्ा को धकसी डॉक्टर द्वारा बोकारो बना अस्पर्ाल रेर्र धकया गया था) अस्वीकाया है और अनुश्रुर् साक्ष्य ही माना जाएगा। र्थाधप, उसकी गवाही के मुख्य परीक्षण और प्रधर्परीक्षण के दौरान उसके अन्य उत्तरों में कोई दोष नहीं है। उनकी गवाही में उनकी अपनी राय और उन आिारों का धजि है, धजन आिारों पर उन्होंने उि राय कायम की है। उसकी गवाही का शेष िाग, धजसमें पीध़िर्ा की मृत्यु का कारण िी शाधमल है, धनस्संदेह स्वीकाया है। डॉ. आर. महर्ो ने स्पष्ट रूप से कहा है धक पीध़िर्ा की मृत्यु का कारण जलने के कारण उत्पन्न हुआ सेधप्टसीधमया है।
36. उच्च न्यायालय, मोती त्रसंह (पूवोि) वाले मामले में इस न्यायालय के धनणाय के आिार पर इस धनष्कषा पर पहुंचा है धक पीध़िर्ा का कथन मृत्युकाधलक कथन के रूप में मान्य भाग- घ नहीं है। उि मामले में, आरोपी पर पीध़िर् को गोली मारने का आरोप था। पीध़िर् को अस्पर्ाल में िर्ी कराया गया, उसका इलाज धकया गया और बाद में उसे अस्पर्ाल से छुट्टी दे दी गई। गोली लगने से घायल होने के कुछ सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई और पोस्टमॉटाम से पहले ही उनका अंधर्म संस्कार कर धदया गया। इसधलए इस न्यायालय ने यह धनणाय धदया था धक पीध़िर् की मृत्यु के कारण से संबंधिर् कोई साक्ष्य अधिलेख पर उपलब्ि नहीं है। पररणामस्वरूप, उसके कथन को साक्ष्य अधिधनयम की िारा 32 (1) के र्हर् उसकी मृत्यु के कारण, काया या पररधस्थधर् संबंिी कथन नहीं माना गया था। उच्च न्यायालय का मोर्ी धसंह (पूवोक्र्) मामले पर िरोसा करना गलर् है क्योंधक वर्ामान मामले में अन्त्यपरीक्षण प्रधर्वेदन स्थाधपर् करर्ा है धक पीध़िर्ा की मृत्यु जलन के कारण उत्पन्न हुई सेप्टीसीधमया है। अर्िः वर्ामान मामले में पीध़िर्ा का बयान वास्र्व में उसकी मृत्यु के कारण और उन पररधस्थधर्यों के संबंि मेंप्रासंधगकहै,धजनके पररणामस्वरूपउसकी मृत्युहुई,जैसाधकअगले खंड में धवस्र्ार से बर्ाया गया है। ख. मृतक क बय न उसकी मृत्युके क रण और क यय की पररभथथभतयों से सांबांभधत है, भजसके पररण मथवरूप उसकी मृत्यु हुई।
37. साक्ष्य अधिधनयम की िारा 32 में यह प्राविान है धक कुछ धवशेष मामलों में उन व्यधियों के बयान सुसंगर् होंगे, धजन्हें गवाही के धलए नहीं बुलाया जा सकर्ा (और इसधलए वे प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं दे पाए)। मृत्युकाधलक कथन को िारा 32 की उपिारा (1) के र्हर् स्वीकाया बर्ाया गया है: भाग- घ
32. र्वे दशाएँत्रजनमें उस व्यत्रि द्वारा सुसंगत तथ्य का त्रकया कथन सुसंगत है, जो मर गया है या त्रमल नहीं सकता, इत्यात्रद -- सुसंगत तथ्यों के त्रलत्रित या मौत्रिक कथन, जो ऐसे व्यत्रि द्वारा त्रकए गए थे, जो मर गया है या धमल नहीं सकर्ा है या जो साक्ष्य देने के धलए असमथा हो गया है या धजसकी हाधजरी इर्ने धवलम्ब या व्यय के धबना उपाप्त नहीं की जा सकर्ी, धजर्ना मामले की पररधस्थधर्यों में न्यायालय को अयुधियुि प्रर्ीर् होर्ा है त्रनम्नत्रलत्रित दशाओंमें स्र्वयमेर्व सुसंगत है:- (1) जबधक वह मृत्यु के कारण से संबंधिर् है -- जबत्रक र्वह कथन त्रकसी व्यत्रि द्वारा अपनी मृत्यु के कारर् के बारे में या उस संव्यर्वहार की त्रकसी पररत्रस्थत्रत के बारे में त्रकया गया है, त्रजसके फलस्र्वरूप उसकी मृत्यु हई, तब उन मामलों में, त्रजनमें उस व्यत्रि की मृत्यु का कारर् प्रश्नगत हो । ऐसे कथन सुसंगर् हैं चाहे उस व्यधि को, धजसने उन्हें धकया है, उस समय जब वे धकए गए थे, मृत्यु की प्रत्याशंका थी या नहीं और चाहे उस कायावाही की, धजसमें उस व्यधि की मृत्यु का कारण प्रश्नगर् होर्ा है, प्रकृधर् कैसी ही क्यों न हो।” (इस पर जोर धदया गया है)
38. िारा 32 के र्हर्, सुसंगर् र््यों के बयान (धलधखर् या मौधखक) अपने आप में ही सुसंगर् र््य हैं यधद वे बयान धनम्नधलधखर् प्रकार के लोगों द्वारा धदए जार्े हैं: क. कोई व्यधि जो मर चुका हो ख. कोई व्यधि धजसकी खोज न की जा सके भाग- घ ग. कोई व्यधि जो साक्ष्य देने में असमथा हो या घ. कोई व्यधि धजसको न्यायालय में धबना धवलंब या खचा के उपधस्थर् नहीं धकया जा सके । उपिारा (1) का अथा यह है धक ऐसे मामलों में, जहां धकसी व्यधि की मृत्यु का कारण प्रश्नगर् हो, र्ो उस व्यधि का बयान सुसंगर् होगा यधद वह बयान धनम्नधलधखर् से संबंधिर् हो: क. मृत्यु का कारण अथवा ख. उस संव्यवहार की धकसी पररधस्थधर्, धजसके पररणामस्वरूप मृत्यु हुई।
39. वर्ामान मामले में, पीध़िर्ा का बयान िारा 32 की उपिारा (1) में धनिााररर् शर्ें पूरा करर्ा है क्योंधक यह बयान उस संव्यवहार की पररधस्थधर् के बारे में है, धजसके र्लस्वरूप उसकी मृत्यु हुई। ऐसा इसधलए है क्योंधक बयान में स्पष्ट रूप से कहा गया है धक प्रधर्वादी ने उस पर धमट्टी का र्ेल डाला और आग लगा दी। पोस्टमॉटाम ररपोटा में िी कहा गया है धक मौर् का कारण सेप्टीसीधमया है, जो मृर्का के गंिीर रूप से जल जाने कारण हुई है। मृर्का के बयान से पर्ा चलर्ा है धक प्रधर्वादी द्वारा उसके ऊपर धमट्टी का र्ेल धछ़िक कर जला देने के पररणामस्वरूप ही वह जली थी।
40. इसके अलावा, मृर्का के बयान से यह िी पर्ा चलर्ा है धक प्रधर्वादी ने उसे जलाने से पहले उसके साथ बलात्कार धकया। यह घटना उस संव्यवहार की पररधस्थधर्यों का वणान है, धजसके पररणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई। इसधलए मृर्का का बयान, उपिारा 32 (1) की शर्ों को पूरा करर्ा है और अपने आप में ही सुसंगर् र््य है। इस अपील पर धनणाय देने के भाग- घ धलए इसे मृत्युकाधलक कथन माना जाएगा। ग. मृत्युक भलक कथन की थवीक ययत और प्र म भणकत
41. इस आशय का कोई धनयम नहीं है धक धकसी मधजस्रेट के बजाय पुधलस अधिकारी द्वारा दजा धकए जाने पर मृत्युकाधलक कथन अस्वीकाया होगा।4 यद्यधप आदशा पररधस्थधर्यों में मृत्युकाधलक कथन दंडाधिकारी द्वारा ही दजा धकया जाना चाधहए, र्थाधप ऐसा नहीं कहा जा सकर्ा धक कोई मृत्युकाधलक कथन केवल इसधलए स्वीकाया नहीं होगा धक वह एक पुधलसकमी द्वारा दजा धकया गया है। यह मुद्दा धक क्या धकसी पुधलसकमी द्वारा दजा धकया गया बयान स्वीकाया है, यह प्रत्येक मामले के र््यों एवं पररधस्थधर्यों पर धवचार करके ही धनणाय धकया जाना चाधहए।
42. िुशहाल रार्व बनाम बम्बई राज्य[5] वाले मामले में इस न्यायालय के द्वारा मानदंड र्ैयार धकया है, धजसके आिार पर मृत्युकाधलक बयानों का मूल्यांकन धकया जा सकर्ा हैिः "16... (1) ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी धनयम नहीं बनाया जा सकर्ा धक कोई मृत्युकाधलक बयान दोषधसधि का एकमात्र आिार नहीं होगा, जब र्क धक उस बयान की पुधष्ट नहीं हो जार्ी। (2) प्रत्येक मामले का धनणाय उस मामले की उन पररधस्थधर्यों को ध्यान में रखर्ेहुएउसके र््योंके आिारपरहीधकयाजानाचाधहए,धजनपररधस्थधर्यों में मृत्युकाधलक कथन दजा धकया गया था।
4. कनााटक राज्य बनाम शरीर् (2003) 2 एससीसी 473, िागीरथ बनाम हररयाणा राज्य (1997) 1 एससीसी 481
5. एआईआर 1958 एससी 22 भाग- घ (3) ऐसा कोई धसिांर् नहीं बनाया जा सकर्ा हैधक मृत्युकाधलक कथन अन्य साक्ष्यों की र्ुलना में कमजोर सबूर् होर्ा है। (4) यह धक मृत्युकाधलक कथन उसी आिार ख़िा होर्ा हैधजस प्रकार साक्ष्य का दूसरा अंश और इससे संबंधिर् पररधस्थधर्यों के आिार पर और साक्ष्यों के मूल्यांकन हेर्ु धनिााररर् धसिांर्ों के अनुसार ही धनणाय धकया जाना चाधहए। (5) यह धक मृत्युकाधलक कथन, जो सक्षम मधजस्रेट द्वारा प्रश्नोत्तरी के रूप में यथासंिव बयान देने वाले के ही शब्दों में उधचर् रीधर् से दजा धकया गया हो, उसमृत्युकाधलककथनकीर्ुलना मेंअच्छामानाजाएगा,जो केवलमौधखक साक्ष्य पर आिाररर् र्था मानव स्मृधर् और मानव चररत्र की दुबालर्ाओंसे ग्रस्र् हो। और (6) मृत्युकाधलक कथन की धवश्वसनीयर्ा का परीक्षण करर्े समय न्यायालय को मृत्यून्मुख व्यधि को अवलोकन के धलए प्राप्त अवसर जैसी पररधस्थधर्यों को ध्यान में रखना होगा। उदाहरण के धलए, यधद अपराि रार् में धकया गया हो, र्ो पयााप्त प्रकाश था या नहीं, उस व्यधि स्मरण शधि ठीक बर्ाई गई है या नहीं, जब वह बयान दे रहा था उस समय पररधस्थधर्यां उसके धनयंत्रण से बाहर होने के कारण वह बयान देने में सक्षम था या नहीं, यधद उसने आधिकाररक ररकॉडा के अलावा और िी मृत्युकाधलक कथन दजा करने के कई अवसर थे, र्ो यह बयान पूरी र्रह से सुसंगर् रहा है और बयान सबसे पहले अवसर पर दजा धकया गया हो, र्था यह धहर्बि पक्षों द्वारा उसे धसखाए जाने का नर्ीजा नहीं था।"
43. इस र््य से, धक मृत्युकाधलक कथन प्रश्नोत्तरी शैली में नहीं है, उसकी स्वीकायार्ा या उसकी प्रामाधणकर्ा पर कोई प्रिाव नहीं प़िर्ा, जैसा धक राम त्रबहारी यादर्व बनाम त्रबहार राज्य[6] के मामले में धनणाय धदया धकया गया है: " “9... सामान्यर्: मृत्युकाधलक कथन प्रश्नोत्तरी शैली में दजा धकया जाना
6. (1998) 4 एससीसी 517 भाग- घ चाधहए, लेधकन अगर यधद कोई मृत्युकाधलक कथन धवस्र्ृर् न हो, केवल कुछ वाक्य हों और वह बयान दार्ा के वास्र्धवक शब्दों में हो, र्ो उस बयान का धसर्ा प्रश्नोत्तरीशैलीमेंनहोनाउसकीस्वीकायार्ायाधवश्वसनीयर्ाकाआिार नहीं हो सकर्ा।"
44. इसके अधर्ररि, जैसा धक इसी न्यायालय द्वारा सुररंदर कु मार बनाम पंजाब राज्य[7] वाले मामले में िी कहा गया था धक मृत्युकाधलक कथन को हमेशा प्रश्नोत्तरी रूप में दजा करना हमेशा संिव नहीं होर्ा है: "19 जहां र्क हमारे समक्ष इस मामले का संबंि है, हम केवल इर्ना ही कह सकर्े हैं धक मृत्युकाधलक कथन दजा करने के धलए कोई धनधिर् प्रारूप धनिााररर् नहीं है। वास्र्धवकर्ा यह है धक ऐसा कोई प्रारूप धनिााररर् िी नहीं धकया जा सकर्ा। इसधलए, यह अधनवाया नहीं है धक मृत्युकाधलक कथन प्रश्नोत्तरी रूप में ही दजा धकया जाए। कुछ ऐसे अवसर िी होर्े हैं, जब ऐसा करना संिव हो और कुछ अन्य मामलों में ऐसा करना संिव न हो। र्ात्काधलक धस्थधर् में अथवा बयान दजा करर्े समय पीध़िर् व्यधि के ददा और पी़िा के कारण ऐसा करना संिव नहीं िी हो सकर्ा है।"
45. अपने र्ैसले में उच्च न्यायालय ने यह गलर् कहा है धक प्रधर्परीक्षण के दौरान डॉ. आर. के. पांडेय ने कहा धक वे बगल के कमरे में दूसरे मरीज की जांच कर रहे थे, जब मृत्युकाधलक कथन दजा धकया जा रहा था। प्रधर्परीक्षण के अधिलेख से स्पष्ट होर्ा है धक डॉ. आर. के. पांडेय ने कहा था धक वे बगल की मेज पर धकसी रोगी की जांच कर रहे थे (जबधक उच्च न्यायालय ने गलर्ी करर्े हुए कहा धक वे बगल के कमरे में रोगी की जांच कर रहे थे)। उच्च न्यायालय ने गलर्ी से इसी र््य पर िरोसा करर्े हुए धनष्कषा धनकाल धलया धक पीध़िर्ा
7. (2012) 12 एससीसी 120 भाग- घ का बयान मृत्युकाधलक कथन के रूप में स्वीकार नहीं धकया जा सकर्ा है। प्रधर्परीक्षण के दौरान डॉ. आर. के. पांडेय से पूछे गए सवालों के जवाब से यह स्पष्ट हो जार्ा है धक मृत्युकाधलक कथन को इस आिार पर अस्वीकार नहीं धकया जा सकर्ा धक बयान दजा करर्े समय वे दूसरे कमरे में थे - स्पष्ट है धक वे उसी कमरे में थे और उनकी उपधस्थधर् में लल्लन प्रसाद ने मृत्युकाधलक कथन दजा धकया था। लल्लन प्रसाद और डॉ. आर. के. पांडेय दोनों ने ही परीक्षण के दौरान यह बार् प्रमाधणर् की है।
46. डॉ. आर. के. पांडेय ने यह िी कहा है धक मृर्का बयान देने के धलए शारीररक और मानधसक रूप से सक्षम थी और उन्होंने इसे धलधखर् रूप से िी प्रमाधणर् धकया है। मृत्युकाधलक कथन को पीध़िर्ा के शब्दों में ही दजा धकया गया, उसे पढ़ कर सुनाया गया, उसके बाद उसने उस पर हस्र्ाक्षर धकए। हमारे पास यह धवश्वास करने का कोई आिार नहीं है धक बयान धसखाया हुआ था अथवा मृर्का बयान देने में असमथा थी। अधिलेख से इस बार् का िी कोई संकेर् नहीं धमलर्ा है धक मृर्का और प्रधर्वादी के बीच कोई दुश्मनी थी, धजसके कारण मृर्का घटनाओं का झूठा धववरण देगी और प्रधर्वादी को गलर् र्रीके से र्ंसाएगी।
47. इसके अलावा, लल्लन प्रसाद यह याद नहीं रख सके धक मृर्का को सामान्य वाडा में िर्ी धकया गया था या आईसीयू में। इस र््य से मृत्युकाधलक कथन झूठा साधबर् नहीं होर्ा क्योंधक डॉ. आर के पांडेय ने यह गवाही दी है धक उि बयान उनके सामने ही दजा धकया गया था। भाग- घ
48. इसधलए हमें धवश्वास है धक यह मृत्युकाधलक कथन स्वैधच्छक रूप धदया गया था और सही है। मृर्का मानधसक रूप से सक्षम थी जब उसने लल्लन प्रसाद को यह बयान धदया। ii. अत्रभयोजन पक्ष ने मामले को प्रत्रतर्वादी के त्रिलाफ युत्रियुि संदेह से परे सात्रबत कर त्रदया है।
49. मृत्यु पूवा धदए गए बयान से यह स्पष्ट हो जार्ा है धक प्रधर्वादी ने मृर्का के साथ बलात्कार धकया, उस पर धमट्टी का र्ेल डाला और उसे आग लगा दी। मौर् का कारण सेधप्टसीधमया था, जो जलने के पररणामस्वरूप हुआ था। अर्िः पीध़िर्ा की मृत्यु, प्रधर्वादी द्वारा उसे जलाए जाने का सीिा पररणाम थी। अधिलेख पर ऐसा कुछ िी नहीं है जो प्रधर्वादी के दोष के बारे में युधियुि संदेह पैदा करे।
50. प्रधर्वादी के धवद्वान वकील ने धनवेदन धकया है धक मेधडकल बोडा को बलात्कार का कोई सबूर् नहीं धमला है और इसधलए प्रधर्वादी मृर्का के साथ बलात्कार का दोषी नहीं है। मेधडकल बोडा द्वारा र्ैयार की गई ररपोटा में कहा गया है धक संिोग की संिावना से इंकार नहीं धकया जा सकर्ा, परंर्ु इस संबंि में कोई धनधिर् राय िी नहीं दी जा सकर्ी। बलात्कार धकए जाने के बारे में धचधकत्सीय साक्ष्य के अिाव में यह नहीं माना जा सकर्ा धक मृर्का का बलात्कार नहीं धकया गया था। उसके मृत्युकाधलक कथन में स्पष्ट रूप से कहा गया है धक प्रधर्वादी ने उसे जलाने से पहले उसके साथ बलात्कार धकया। ऐसा कोई धनयम नहीं है धक मृत्युकाधलक कथन अन्यथा संधदग्ि न हो र्ब िी उस बयान को धचधकत्सकीय अथवा अन्य धकसी साक्ष्य से संपुष्ट करना होगा। भाग- घ
51. त्रर्वष्र्ु बनाम महाराष्र राज्य[8] वाले मामले में इस न्यायालय ने यह धनणाय धदया था धक धकसी िी र््य की सत्यर्ा धसि करने में धचधकत्सा धवशेषज्ञ की राय धनणाायक नहीं होगी: "धचधकत्सा अधिकारी की राय न्यायालय की सहायर्ा के धलए है क्योंधक वह उस र््य का गवाह नहीं है और धचधकत्सा अधिकारी द्वारा धदया गया साक्ष्य वास्र्व में सलाह की प्रकृधर् का होर्ा है, वह र््य के गवाहों से अधिक महत्वपूणा नहीं होर्ा।"
52. उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम सागर यादर्व[9] वाले मामले में इस न्यायालय ने यह धनणाय धदया धक न र्ो कानून का कोई धनयम है और न ही यह धववेकसम्मर् है धक धकसी मृत्युकाधलक कथन के आिार पर र्ब र्क कारावाई नहीं की जा सकर्ी जब र्क उसकी पुधष्ट न कर ली जाए:
13. यह एक स्थाधपर् र््य है धक कानूनी रूप में, धकसी मृत्युकाधलक कथन पर धबना धकसी संपुधष्ट के कारावाई की जा सकर्ी है। (खुशहाल राव बनाम बॉम्बे राज्य [एआईआर 1958 एससी 22:1958 एससीआर 552:1938 धिधमनल लॉ जनाल 106]; हरबंस धसंह बनाम पंजाब राज्य [एआईआर 1962 एससी 439:1962 सप्लीमेंरी (1) एससीआर 104:(1962) 1 धिधमनल लॉ जनाल 479); गोपाल धसंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य [(1972) 3 एस. सी. सी. 268:1972 एससीसी (धिधमनल) 513:(1972 धिधमनल लॉ जनाल 1045,]) यह धववेकसम्मर् िी नहीं हैधक ऐसा कोई कठोर कानून हो धक धकसी मृत्युकाधलक कथन के आिार पर र्ब र्क कारावाई नहीं की जा सकर्ी, जब र्क उसकी पुधष्ट न की जाए। अदालर् का प्राथधमक प्रयास यह पर्ा लगाना है धक क्या मृत्युकाधलक कथन सही है। यधद बयान सही है
8. (2006) 1 एससीसी 283
9. (1985) 1 एससीसी 552 भाग- घ र्ो इसकी पुधष्ट का कोई प्रश्न ही नहीं उठर्ा। पुधष्ट की आवश्यकर्ा केवल र्ब है जब मृत्युकाधलक कथन की पररधस्थधर्यां स्पष्ट या धवश्वसनीय न हो। र्ब न्यायालय स्वयं आश्वस्र् होने के धलए मृत्युकाधलक कथन की संपुधष्ट की र्लाश कर सकर्ा है।"
53. अधियोजन साक्षी सं. 1 से 5 और अधियोजन साक्षी सं. 10 (मृर्का के पररवार वाले और उसके अन्य पररधचर् व्यधि) सत्र न्यायालय में कायावाही के दौरान पक्षद्रोही घोधषर् कर धदए गए थे। पीध़िर्ा की मृत्यु के बाद (या उससे पहले िी) धवधिन्न कारणों से गवाहों का पलट जाना आम बार् है। रमेश बनाम हररयार्ा राज्य10 के मामले में इस न्यायालय ने गवाहों के पलट जाने के धलए उत्तरदायी धनम्नधलधखर् कुछ कारण बर्लाए थे:
44. धवधिन्न मामलों का धवश्लेषण करने पर धनम्नधलधखर् कारण बर्ाए जा सकर्े हैं, धजससे गवाह अदालर् के समक्ष अपनेबयान से मुकर जार्े हैंऔर पक्षद्रोही हो जार्े हैं: (i) डराना/िमकी देना। (ii) धवधिन्न र्रीकों का प्रलोिन देना। (iii) आरोधपयों द्वारा बाहुबल और िन बल का उपयोग। (iv) झूठे गवाहों का उपयोग। (v) धवचारण में लगने वाला अत्यधिक समय। (vi) अनुसंिान और धवचारण के दौरान गवाहों के सामने आने वाली बािाएं। (vii) साक्षी के पक्षद्रोही होने की जांच के धलए कोई स्पष्ट धविान न होना।....
48. उपयुाि कारणों के अलावा, गवाहों के पक्षद्रोही होने का एक और
10. (2017) 1 एससीसी 529 भाग- घ महत्वपूणा कारण 'समझौर्े की प्रवृधत्त' िी बर्ाई जा सकर्ी है। बलात्कार के धवचारणों में ऐसी प्रवृधत्त पर धटप्पणी करर्े हुए, प्रर्ीक्षा बख्शी ने अपनी पुस्र्क [जधस्टस इज ए सीिे ट: 'कॉम्प्रोमाइज इन रेप रायल्स' (2010) 44, अंक 3, िारर्ीय समाजशास्त्र में योगदान, पृष्ठ 207-233] में इस समस्या को इस प्रकार धलखा है: "... यहां गवाहों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है, जो आर्ंक को सामाधजक-कानूनी समझौर्े की सौदेबाजी में बदल देर्ा है । यही कारण है धक यधद पीध़िर्ा अपनी धजजीधवषा नहीं खोर्ी, र्ो िी अधियोजन पक्ष के गवाह मुकदमे के धवचारण का समय आने र्क अकसर ही अपने बयान से पलट जार्े हैं।... "
54. इन कारकों के अलावा, जो गवाह मृर्का/पीध़िर्ा को जानर्े हैं, वे िी पलट जार्े हैं क्योंधक वे िी अपनी धजंदगी जीना चाहर्े हैं। धकसी धप्रयजन के बलात्कार और मृत्यु के समय की पररधस्थधर्यों के बारे में साक्ष्य देना अत्यंर् पी़िादायक होर्ा है, र्था आपराधिक न्याय प्रणाली की िीमी गधर् इस पी़िा को और िी अधिक बढ़ा देर्ी है।
55. मृर्का के पररवार सधहर् कुछ अन्य गवाहों को पक्षद्रोही घोधषर् धकया गया है, केवल इर्ना ही अधियोजन पक्ष के मामले को संधदग्ि बनाने के धलए पयााप्त नहीं है। अधियोजन पक्ष का मामला यह नहीं था धक पक्षद्रोही गवाह अपराि के चश्मदीद गवाह थे बधल्क उन गवाहों की गवाही यह साधबर् करने के धलए मुख्य रूप से सुसंगर् थी धक मृर्का ने बार-बार अलग- अलग लोगों से कहा धक प्रधर्वादी ने उससे बलात्कार धकया और उसकी हत्या की। मृत्युकाधलक कथन के समय की प्रामाधणकर्ा धसि करने वाले साक्ष्यों का अिाव, अधियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करर्ा। जैसा धक पहले िी कहा जा चुका है, मृत्यु पूवा बयान पीध़िर्ा के शब्दों में दजा धकया गया था और उसे पढ़ कर सुनाया गया था, भाग- घ उसके बाद उसने हस्र्ाक्षर धकए थे।
56. िीरेंद्र राय (बचाव साक्षी सं. 1) ने गवाही दी धक प्रधर्वादी के धखलार् झूठा मामला दायर धकया गया था, लेधकन वे अपनी इस बार् के धलए कोई धवश्वसनीय कारण नहीं दे पाए। हम इस बार् से सहमर् नहीं हैं धक िूधम की धसंचाई संबंिी धकसी छोटे-से धववाद के कारण मृर्का प्रधर्वादी पर बलात्कार के झूठे आरोप लगाएगी या उसके द्वारा जलाए जाने के बारे में झूठ बोलेगी, धवशेष रूप से र्ब, जब िूधम की धसंचाई संबंिी कधथर् धववाद में पक्षकार िी नहीं थी।
57. दशरथ धर्वारी (बचाव साक्षी सं. 2) ने गवाही दी धक जल जाने के बाद मृर्का बोलने में सक्षम नहीं थी। यह स्पष्ट रूप से गलर् है, जैसा धक लल्लन प्रसाद और डॉ. आर. के. पांडेय दोनों की गवाही से साधबर् होर्ा है। डॉ. आर. के. पांडेय ने प्रमाधणर् धकया है धक मृर्का शारीररक और मानधसकरूप से सक्षम थी और जब उसका बयान लल्लन प्रसाद ने दजा धकया, उस समय वे वहीं उपधस्थर् थे। डॉ. आर. के. पांडेय को प्रधर्वादी के प्रधर् कोई दुिाावना नहीं थी, न ही बचाव पक्ष ने ऐसा कुछ कहा है। उनके पास पीध़िर्ा के स्वास््य के बारे में झूठी गवाही देने या उसका बयान दजा धकए जाने के समय धर्टनेस का झूठा प्रमाण पत्र देने का कोई कारण नहीं था।
58. बालमुकुंद राय (बचाव साक्षी सं. 3) ने गवाही दी धक मृर्का खाना पकाने के दौरान जल गई थी। हम इसे पूरी र्रह से अधवश्वसनीय मानर्े हैं। अधिलेख में ऐसा कोई कारण नहीं है, धजससे ऐसा लगे धक मृर्का के द्वारा प्रधर्वादी को र्ंसाने के धलए कहानी गढ़ी गई है। भाग- घ इसके अलावा,ऐसािीकोईसंकेर्नहींहैधककधथर्दुघाटनाके समयबालमुकुंदरायपीध़िर्ा के घर में मौजूद थे। यधद उसने दुघाटना देखी है, र्ो सवाल उठर्ा है धक जब िीरेंद्र राय ने कधथर् रूप से पीध़िर्ा के घर में प्रवेश धकया, उस समय वे कहां थे। मृत्युकाधलक कथन, बालमुकुंद राय की गवाही से ज्यादा प्रामाधणक है और उि बयान में वधणार् घटनाओंको ही हम सत्य मानर्े हैं।
59. उपयुाि कारणों से, हम पार्े हैं धक अधियोजन पक्ष ने सत्र न्यायालय के समक्ष मामले को युधियुि संदेह से परे साधबर् धकया है। उपरोि कारणों से, उच्च न्यायालय को सत्र न्यायालय के धनणाय को पलटना नहीं चाधहए था। यद्यधप यह न्यायालय उच्च न्यायालयों द्वारा पाररर् दोषमुधि के आदेशों में सामान्यर्िः हस्र्क्षेप नहीं करर्ा है, र्थाधप पूणा न्याय करने और र्था न्याय की हत्या पर रोक लगाने के धलए दोषमुधि के आदेशों को पलटने के धलए अपनी धवशेष शधियों का प्रयोग कर सकर्ा है।11 इसधलए हम 27 जनवरी, 2018 को उच्च न्यायालय द्वारा पाररर् धनणाय को अपास्र् करर्े हैं और सत्र न्यायालय द्वारा धदनांक 10 अिूबर 2006 को पाररर् धनणाय को धर्र से बहाल करर्े हैं धजसमें प्रधर्वादी को िा.दं.सं. की िारा 302, 341, 376 और 448 के र्हर् दंडनीय अपरािों के धलए दोषी ठहराया गया है। इसके साथ ही धदनांक 11 अिूबर 2006 को पाररर् आदेश को िी हम पुनबाहाल करर्े हैं, धजसमें प्रधर्वादी को िा.दं.सं. की िारा 302 के र्हर् दंडनीय अपराि करने के कारण आजीवन कारावास और िा.दं.सं. की िारा 376 के र्हर् दंडनीय अपराि करने के कारण
11. सर्बीर बनाम सूरर् धसंह (1997) 4 एससीसी 192 पंजाब राज्य बनाम अजायब धसंह (2005) 9 एससीसी 94 भाग- ङ 10 साल के कठोर कारावास की सजा दी गई है। ये सजाएं साथ-साथ चलनी हैं। प्रधर्वादी को सजा पूरी करने के धलए र्ुरंर् धहरासर् में ले धलया जाए। ङ. त्रिप्पत्रर्यां
60. पीध़िर्ा को संिोग करने की आदर् थी या नहीं, यह पर्ा लगाने के धलए जांच करर्े समय मेधडकल बोडा ने एक जांच की, धजसे ‘दो उंगली परीक्षण’ कहर्े हैं। इस न्यायालय ने बलात्कार और यौन उत्पी़िन के आरोप के मामलों में धकए जाने वाले इस शमानाक और घृधणर् परीक्षण करने की बार-बार धनंदा की है। इस कधथर् परीक्षण का कोई वैज्ञाधनक आिार नहीं हैऔर यहन ही बलात्कार को प्रमाधणर् न ही मलामर् करर्ा है। बधल्क इससे वे मधहलाएं धर्र से पीध़िर् होर्ीं हैं और उन्हें दुबारा आघार् पहुंचर्ा है, जो शायद यौन उत्पी़िन का धशकार हुई ं। केवल इर्ना ही नहीं, यह उनकी गररमा को ठेस पहुंचाने का काया िी है। दो उंगधलयों का परीक्षण या योधन पूवा परीक्षण धबलकुल नहीं धकया जाना चाधहए।
61. त्रललू बनाम हररयार्ा राज्य12 वाले मामले में इस न्यायालय ने यह धनणाय धदया धक ‘दो अंगुली परीक्षण’ धनजर्ा, सम्मान और गररमा के अधिकार का हनन करर्ा हैिः 13.... बलात्कार पीध़िर्ाओंको इस प्रकार की कानूनी सहायर्ा के हकदार हैं, धजससे उन्हें दुबारा आघार् न लगे र्था उनके शारीररक या मानधसक सम्मान को ठेस न पहुंचे। वे ऐसी रीधर् से धकए जाने वाले धचधकत्सा प्रधिया के िी हकदार हैं जो उनके सहमधर् के अधिकार का सम्मान करर्ा है। धचधकत्सा प्रधियाएं ऐसी रीधर् से नहीं की जानी चाधहए, जो िूर, अमानवीय अथवा अपमानजनक व्यवहार हो र्था धलंग आिाररर् धहंसा के मामलों में
12. (2013) 14 एससीसी 643 भाग- ङ पीध़िर्ा का स्वास््य सवोच्च प्राथधमकर्ा होनी चाधहए। यौन धहंसा के पीध़िर्ों को ऐसी सेवाएं उपलब्ि कराना राज्य के धलए आवश्यक है। उनकी सुरक्षा सुधनधिर् करने के धलए उधचर् उपाय धकए जाने चाधहए और उनकी धनजर्ा पर कोई मनमाना या गैरकानूनी हस्र्क्षेप नहीं होना चाधहए।
14. इस प्रकार, उपरोि बार्ों को ध्यान में रखर्े हुए धनिःसंदेह कहा जा सकर्ा है धक ‘दो अंगुली परीक्षण’ और इसकी व्याख्या बलात्कार पीध़िर्ाओंकी धनजर्ा, शारीररक और मानधसक सम्मान र्था गररमा का हनन करर्ी है।"
62. धकसी मधहला को 'संिोग की आदर्' है या अभ्यस्र् है, यह धनिााररर् करने के धलए अप्रासंधगक हैं धक क्या धकसी खास मुकदमें में िा.दं.सं. की िारा 375 के संघटक उपधस्थर् हैं या नहीं। र्थाकधथर् परीक्षण इस गलर् िारणा पर आिाररर् है धक यौन रूप से सधिय मधहला का बलात्कार नहीं धकया जा सकर्ा। सच सबसे अधिक महत्वपूणा है- आरोपी ने धकसी मधहला का बलात्कार धकया या नहीं, यह धनणाय करर्े समय उस मधहला के पूवावर्ी यौन जीवन से कोई लेना-देना नहीं है। केवल इर्ना ही नहीं, धकसी मधहला के साक्ष्य की प्रामाधणकर्ा उसके पूवा यौन जीवन पर धनिार नहीं करर्ा। यह धपर्ृसत्तात्मक और सेधक्सस्ट धवचार है धक कोई मधहला जब कहर्ी है धक धक उसके साथ बलात्कार धकया गया, र्ो केवल इस कारण से उस पर धवश्वास नहीं धकया जा सकर्ा धक वह यौन रूप से सधिय है।
63. धविाधयका ने आपराधिक धवधि (संशोिन) अधिधनयम 2013 को पाररर् करर्े समय स्पष्ट रूप से इस र््य को स्वीकार धकया और अन्य बार्ों के साथ-साथ िारा 53ए को साक्ष्य अधिधनयम में सधम्मधलर् धकया। साक्ष्य अधिधनयम की िारा 53ए के अनुसार, यौन अपरािों के अधियोजनों में पीध़िर्ा के चररत्र या धकसी व्यधि के साथ उसके धपछले यौन अनुिव सहमधर् या सहमधर् की गुणवत्ता के मुद्दे के धलए सुसंगर् नहीं होंगे। भाग- ङ
64. स्वास््य एवं पररवार कल्याण मंत्रालय ने यौन धहंसा के मामलों में धचधकत्सा प्रदार्ाओं के धलए धदशा-धनदेश जारी धकए हैं।13 इस धदशाधनदेश में 'दो-अंगुली परीक्षण' को प्रधर्बंधिर् धकया गया है: बलात्कार/यौन धहंसा धसि करने के धलए योधन परीक्षण आम र्ौर पर 'दो उंगली परीक्षण' ही समझा जार्ा है, नहीं धकया जाना चाधहए। योधन के आकार का यौन धहंसा के मामले से कोई लेना-देना नहीं है। योधन-परीक्षण केवल वयस्क मधहलाओंका ही धकया जा सकर्ा है जब धचधकत्सकीय रूप से ऐसा करना आवश्यक हो। योधन धझल्ली की जांच िी अनावश्यक है क्योंधक साइधकल चलाने, घु़िसवारी करने, हस्र्मैथुन जैसे कई कारणों से धझल्ली र्ट सकर्ी है। यधद धझल्ली नहीं िी र्टी हो, र्ब िी ऐसा धनधिर् रूप से नहीं कहा जा सकर्ा है धक यौन धहंसा नहीं हुई है और र्टी धझल्ली यह साधबर् नहीं करर्ी धक पूवाकाल में संिोग हुआ ही है। इसधलए यौन धहंसा के मामलों में अनुसंिान के पररणाम दजा करर्े समय योधन धझल्ली को िी जननांगों का एक िाग ही माना जाना चाधहए। केवल वही बार्ें दजा की जानी चाधहए, जो अपराि की घटना (जैसे हाल का कटा हुआ, रिस्राव, सूजन आधद) से संबंधिर् हों।"
65. हालांधक इस मामले में दो अंगुधलयों का परीक्षण एक दशक से अधिक समय पहले धकया गया था, लेधकन यह खेदजनक है धक यह आज िी जारी है।
66. हम केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों को धनदेश देर्े हैं धक: क. स्वास््य एवं पररवार कल्याण मंत्रालय के द्वारा धनरूधपर् धदशा-धनदेश सिी सरकारी और धनजी अस्पर्ालों में पररचाधलर् करना सुधनधिर् धकया जाए।
13. स्वास््य और पररवार कल्याण मंत्रालय, िारर् सरकार, यौन धहंसा के पीध़िर्ों के धलए मेधडको- लीगल के यर (19 माचा 2014) भाग- ङ ख. यौन उत्पी़िन और बलात्कार पीध़िर्ाओं की जांच हेर्ु अंगीकृर् की जाने वाली उधचर् प्रधिया के बारे में जानकारी देर्े हुए धचधकत्साकधमायों के धलए कायाशालाएं आयोधजर् करे। ग. यौन उत्पी़िन और बलात्कार पीध़िर्ाओंकी जांच करर्े समय अपनाई जाने वाली प्रधियाओंमें "दो उंगली परीक्षण" या योधन परीक्षण धनिााररर् नहीं है, यह सुधनधिर् करर्े हुए मेधडकल स्कूलों के पाठ्यिम की समीक्षा करें।
67. इसर्ैसलेकीएकप्रधर् सधचव,स्वास््यऔरपररवारकल्याणमंत्रालय,िारर्सरकार को िेजी जाए। िारर् सरकार के स्वास््य और पररवार कल्याण मंत्रालय के सधचव इस धनणाय की प्रधर्यां प्रत्येक राज्य के प्रिान सधचव (सावाजधनक स्वास््य धविाग) को िेजेंगे। प्रत्येक राज्य के स्वास््य धविागों के प्रिान सधचव िी इस र्ैसले के िाग ङ में धदए गए धनदेशों का कायाान्वयन सुधनधिर् करेंगे। प्रत्येक राज्य के गृह धविाग के सधचव इस संबंि में पुधलस महाधनदेशकों को धनदेश जारी करेंगे। पुधलस महाधनदेशक इन धनदेशों की सूचना पुधलस अिीक्षकों को देंगे।
68. कोई िी व्यधि जो इस न्यायालय के धनदेशों का उल्लंघन करके (यौन अपराि के कधथर् धशकार व्यधि की जांच करर्े समय) 'दो उंगली परीक्षण' या योधन परीक्षण करेगा, वह कदाचार का दोषी होगा।
69. उपरोि शर्ों के अनुसार, अपील में की गई प्राथाना स्वीकार की जार्ी है।
70. यधद कोई आवेदन लंधबर् हो, र्ो उसका िी धनपटारा धकया जार्ा है।..........................न्याया. [डॉ िनंजय वाई चंद्रचू़ि]..........................न्याया. (धहमा कोहली) नई धदल्ली। 31 अक्टूबर, 2022 अस्र्वीकरर्: धहन्दी िाषा में अनूधदर् धनणाय का उपयोग इर्ना ही है धक वादी इसे अपनी िाषा में समझ सके । इसका उपयोग धकसी अन्य उद्देश्य के धलए नहीं धकया जा सकर्ा। सिी व्यावहाररक और आधिकाररक कायों में र्था धनष्पादन और कायाान्वयन के धलए उि धनणाय का अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।