Uttar Pradesh State v. Rajmati Singh

Supreme Court of India · 07 Dec 2022
S. R. Sundar; J. K. Maheshwari
Civil Appeal No. 9329 of 2022 @ SLP (C) No. 28128 of 2017
administrative appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that a long-delayed claim for reinstatement and service benefits is barred by limitation and set aside the High Court's order directing reinstatement, emphasizing strict adherence to limitation and administrative discipline.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
भार क
े सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय अति कारिर ा
सिसविवल अपील संख्या 9329/2022
(एसएलपी (सी) संख्या 28128/2017 से उत्पन्न)
उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य। … अपीलक ा3गण
बनाम
राजम ी सिंसह ... प्रत्यर्थी<
विनण3य
JUDGMENT

1. विवलंब माफ विकया जा ा है।

2. अनुमति प्रदान की जा ी है।

3. उत्तर प्रदेश राज्य और शिशक्षा खण्ड पीठ में उसक े प्राति कारी इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ द्वारा विदनांक 24.01.2017 को पारिर उस विनण3य से व्यशिर्थी हैं सिजसमें प्रत्यर्थी< को सेवा में जारी रखने की घोषणा की गई र्थीी, इस प्रकार, उसे वे न सविह सभी पारिरणाविमक लाभों का हकदार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बनाया गया र्थीा। उत्तर प्रदेश सरकार को इस स्थिTर्थीति क े लिलए सिजम्मेदार बेसिसक शिशक्षा विवभाग क े अति कारिरयों का प ा लगाने क े लिलए जांच करने की अनुमति दी गई है, सिजसक े कारण सभी पारिरणाविमक लाभों क े सार्थी बहाली का आदेश विदया गया और सिजम्मेदार अति कारिरयों से पूरी राशिश की वसूली का आदेश विदया गया है।

4. थ्यों का संक्षेप में उल्लेख विकया जा सक ा है।

5. प्रत्यर्थी< को 28.01.1971 को कन्या करमोत्तर जूविनयर हाई Tक ू ल, गौरा, रायबरेली में अप्रशिशतिक्ष सहायक शिशतिक्षका क े रूप में विनयुक्त विकया गया र्थीा। उन्हें 04.08.1973 को उपयु3क्त पद से मूल प्रशिशक्षण पाठ्यक्रम (संतिक्षप्त 'बीटीसी' क े लिलए) पूरा करने क े लिलए मुक्त कर विदया गया र्थीा। सिजस पद पर प्रत्यर्थी< को काय3काल क े आ ार पर विनयुक्त विकया गया र्थीा, उसे जारी रखने क े लिलए, विवभाग क े विनदeशों क े अनुसार, इस पाठ्यक्रम को पूरा करना एक आवश्यक ा र्थीी। प्रत्यर्थी< ने बीटीसी प्रशिशक्षण प्रमाणपत्र प्रT ु नहीं विकया, लेविकन ऐसा प्र ी हो ा है विक उसने इसक े बजाय बीएड प्रमाणपत्र प्रT ु विकया र्थीा, सिजसक े आ ार पर उन्हें वष[3] 1974 में अपनी सेवा को विफर से शुरू करने की अनुमति नहीं दी गई र्थीी। प्रत्यर्थी< की सेवाओं को समाप्त करने का कोई औपचारिरक आदेश पारिर नहीं विकया गया र्थीा, लेविकन इस थ्य को ध्यान में रख े हुए विक वह एक अप्रशिशतिक्ष शिशतिक्षका र्थीी और Tवीक ृ रूप से उसे अपने क 3व्यों से मुक्त विकया गया र्थीा, उसका संविवदात्मक विनयोजन समाप्त हो गया।

6. ऐसा प्र ी हो ा है विक प्रत्यर्थी< ने अभ्यावेदन विदए र्थीे, सिजनको प्राति कारिरयों द्वारा अनदेखा कर विदया गया र्थीा। अगले कई दशकों क, Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds प्रत्यर्थी< ने अपना अभ्यावेदन देना जारी रखा, लेविकन राह पाने क े लिलए विकसी न्यातियक/अ 3 न्यातियक न्यायाति करण में नहीं गयीं। उन्होंने अं ः वष[3] 2009 क े आसपास, सूचना क े अति कार अति विनयम, 2005 क े लागू होने क े बाद राज्य सूचना आयोग, उत्तर प्रदेश क े समक्ष एक शिशकाय दज[3] कराई और उनकी शिशकाय क े आ ार पर आयोग ने 5 माच[3], 2009 को एक आदेश पारिर विकया, सिजसमें सिजला बेसिसक शिशक्षा अति कारी, रायबरेली को प्रत्यर्थी< क े अभ्यावेदनों पर विनण3य क े बारे में प्रत्यर्थी< को सूतिच करने का विनदeश विदया गया।

7. राज्य सूचना आयोग क े पूव क्त आदेश से सिजला बेसिसक शिशक्षा अति कारी विदनांक 04.06.2009 को एक संसूचना (पी-2) जारी करने क े लिलए मजबूर हुआ सिजसमें एक संतिक्षप्त इति हास है विक क ै से प्रत्यर्थी< आवश्यक बीटीसी प्रमाण पत्र प्रT ु करने में विवफल रहा और उसे अपनी सेवा को विफर से जारी रखने की अनुमति नहीं दी गई। यह आदेश, विकसी भी रह से, प्रत्यर्थी< द्वारा विदए गए अभ्यावेदनों पर नए सिसरे से विवचार करने या गुणागुण क े आ ार पर उनकी अTवीक ृ ति नहीं मानी जाएगी। इसमें क े वल 1973-1974 की घटनाओं क े बारे में इति हास को संसूतिच विकया गया र्थीा जब प्रति वादी ने एक छोटी अवति क े लिलए काम विकया र्थीा।

8. यह दावा कर े हुए विक विदनांक 04.06.2009 का पत्र उसे बहाली से इनकार करने क े बराबर है, प्रत्यर्थी< ने 03.06.2010 को राज्य लोक सेवा अति करण (संक्षेप में, 'अति करण') का दरवाजा खटखटाया, लेविकन उसकी दावा यातिचका 11.06.2010 को खारिरज कर दी गई क्योंविक वह परिरसीमा द्वारा वर्जिज र्थीी। प्रत्यर्थी< ने एक पुनर्विवलोकन यातिचका दायर की, लेविकन इसे Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 13.08.2010 को खारिरज कर विदया गया। इसक े बाद, प्रत्यर्थी< ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, सिजसने विदनांक 02.07.2012 क े आदेश द्वारा अति करण को मामले पर नए सिसरे से गुण-दोष क े आ ार पर विवचार करने का विनदeश विदया। इसक े बाद न्यायाति करण ने 13.12.2013 को एक आदेश पारिर विकया सिजसमें अपीलार्थी< -अति कारिरयों को विनदeश विदया गया विक वे प्रत्यर्थी< द्वारा विदए गए अभ्यावेदनों पर विवचार करें और उनका विनपटारा करें। इन विनदeशों क े अनुपालन में, सिजला बेसिसक शिशक्षा अति कारी ने 05.04.2014 को प्रत्यर्थी< द्वारा विदए गए अभ्यावेदन पर विवचार विकया और इसे खारिरज कर विदया। सार रूप में, वाT व में प्रत्यर्थी< को भेजी गयी यह पहली संसूचना र्थीी सिजसमें Tपष्ट रूप से बहाली/विफर से सेवा में रखने क े उसक े दावे को खारिरज कर विदया गया र्थीा, क्योंविक पूव[3] की संसूचना में गुण-दोष क े आ ार पर कोई अशिभविन ा3रण नहीं विकया र्थीा।

9. प्रत्यर्थी< ने 5 अप्रैल 2014 की संसूचना और 13 विदसंबर, 2013 क े अति करण क े आदेश को चुनौ ी दे े हुए विफर से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय ने आक्षेविप विनण3य द्वारा, जैसा विक पहले कहा गया है, अति करण क े विदनांक 13.12.2013 क े आदेश को संशोति विकया है और प्रत्यर्थी< को वे न सविह सभी पारिरणाविमक लाभों क े सार्थी सेवा में जारी रखने की घोषणा की गयी है।

10. हमारे विवचार क े लिलए जो प्रश्न आ ा है वह यह है विक क्या प्रत्यर्थी< का दावा अत्यति क विवलंब, अप्रचलिल, पुराना और विवलंब व देरी क े सिसद्धां द्वारा वर्जिज है और एक दीवानी दावे क े रूप में, क्या यह परिरसीमा विवति द्वारा वर्जिज र्थीा? Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

11. उपयु3क्त प्रश्न क े उत्तर का प ा लगाने क े लिलए कु छ थ्यों को दोहराने की आवश्यक ा है। प्रत्यर्थी< को आश्यक बीटीसी पाठ्यक्रम करने क े लिलए प्रत्यक्ष रूप से 04-08-1973 को मुक्त विकया गया र्थीा। कशिर्थी ौर पर, उन्हें बी. एड. तिडग्री पूरी करने क े बाद वष[3] 1974 में सेवा में वापस आने की अनुमति नहीं दी गई र्थीी। उन्होंने एक क े बाद एक कई अभ्यावेदन विदए, लेविकन विकसी भी न्यातियक या अ 3 न्यातियक मंच में जाना उतिच नहीं समझा। सूचना का अति कार अति विनयम, 2005 क े अति विनयमन क े बाद ही, सिजसक े ह राज्य सूचना आयोग का गठन विकया गया र्थीा, प्रत्यर्थी< ने अपने अभ्यावेदनों पर हुए विनण3य को जानने क े लिलए एक विनदeश जारी करने क े लिलए उक्त आयोग क े समक्ष आवेदन विकया। आयोग ने 05.03.2009 को एक आदेश पारिर विकया सिजसमें अपीलक ा3-प्राति कारिरयों से प्रत्यर्थी< क े अभ्यावेदनों पर विनण3य संसूतिच करने क े लिलए कहा गया और इसी पृष्ठभूविम में, सिजला बेसिसक शिशक्षा अति कारी द्वारा विदनांक 04.06.2009 को पत्र जारी विकया गया र्थीा, सिजसने प्रत्यर्थी< क े अनुसार उसक े लंविब दावे को पुनज<विव विकया।

12. हमारे सुविवचारिर दृविष्टकोंण में, प्रत्यर्थी< से विकसी स क 3 नागरिरक की रह, विवशेष रूप से यह देख े हुए विक वह समाज क े आर्थिर्थीक या सामासिजक रूप से विपछड़े वग• से संबंति नहीं है, उतिच समय क े भी र एक समुतिच मंच क े समक्ष अपने अति कारों का दावा करना अपेतिक्ष र्थीा। बार-बार विकए गए अभ्यावेदन से न ो वाद हे ुक बन ा है और न ही यह इसे पुनज<विव कर ा है, यविद यह भू काल में पहले से ही उत्पन्न हो गया हो। प्रत्यर्थी< की कविठनाइयां वहीं समाप्त नहीं हो ी हैं, यह देख े हुए विक उसकी सेवाओं को समाप्त कर विदया गया र्थीा जब उसे वष[3] 1974 में अपने क 3व्यों को विफर से Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds जारी रखने से इनकार कर विदया गया र्थीा। इस प्रकार, उसे अपनी सेवा को जारी रखने की घोषणा की मांग करने या अपनी बहाली क े लिलए परमादेश का एक रिरट जारी करने की आवश्यक ा र्थीी। उसने ऐसा कु छ भी नहीं विकया।सूचना आयोग सेवा विववादों को विनपटाने का मंच नहीं है। यह एक ऐसा मंच नहीं र्थीा जो या ो प्रत्यर्थी< क े अति कारों की घोषणा कर सक ा र्थीा या कोई सेवा लाभ प्रदान कर सक ा र्थीा।इस प्रकार राज्य सूचना आयोग क े समक्ष प्रत्यर्थी< द्वारा उठाया गया यह कदम विनरर्थी3क र्थीा। इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है विक प्रत्यर्थी< अपने अति कारों क े प्रति सोया हुआ र्थीा और उसने 33 वष• से अति क की लंबी अवति क े लिलए अपने अवसर(अति कार) को गवाया।

13. हमारी यह सुविवचारिर राय है विक प्रत्यर्थी< ने इस संबं में आपलित्तयां उठाने क े अपने अति कारों का अति त्यजन विकया और यह समझा जा ा है विक उसने अपनी नौकरी का परिरत्याग कर विदया है।

14. अगला सवाल जो विवचार क े लिलए आ ा है वह यह है विक क्या सेवाओं की समाविप्त या नौकरी क े परिरत्याग क े विकसी डीम्ड आदेश को प्रत्यर्थी< द्वारा वष[3] 2010 में अति करण क े समक्ष चुनौ ी दी जा सक ी है? इस बा पर कोई विववाद नहीं हो सक ा विक उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अति करण) अति विनयम, 1976 की ारा 5 क े ह इस रह की चुनौ ी अत्यति क समयबाति र्थीी।

15. अति करण द्वारा 11.06.2010 को लिलया गया दृविष्टकोण कानूनी रूप से सही और क 3 संग र्थीा। विफर भी उच्च न्यायालय ने, प्रत्यर्थी< की रिरट यातिचका में विदनांक 02.07.2012 क े आदेश द्वारा अति करण क े आदेश को Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds रद्द कर विदया। उच्च न्यायालय क े आदेश क े परिरशीलन से प ा चल ा है विक व 3मान मामले क े थ्यों क े संदभ[3] में न ो विवलंब क े सिसद्धां ों पर विवचार विकया गया र्थीा और न ही परिरसीमा विवति पर विवचार विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय ने विवति क प्रTर्थीापना की Tवेच्छया अनदेखी की और इस आ ार पर आगे बढ़ा विक अति करण क े समक्ष दावा यातिचका दायर करने में प्रत्यर्थी< की ओर से कोई गल ी नहीं र्थीी क्योंविक "आक्षेविप आदेश 04.06.2009 को पारिर विकया गया र्थीा xx xx xx"। उच्च न्यायालय ने इस थ्य की पूरी रह से अनदेखी की विक यह प्रत्यर्थी< द्वारा विदए गए अभ्यावेदनों पर पारिर आदेश नहीं र्थीा, बस्थि…क राज्य सूचना आयोग द्वारा जारी विनदeशों क े कारण मजबूरी में उसे भेजी गयी एक संसूचना र्थीी। कशिर्थी संसूचना ने विकसी भी रह से प्रत्यर्थी< क े पक्ष में वाद हे ुक को पुनज<विव नहीं विकया।

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16. पूरी विनष्पक्ष ा से और इस परिरस्थिTर्थीति में, प्रत्यर्थी< की ओर से पेश विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता ने "बेसिसक शिशक्षा परिरषद और एक अन्य बनाम सुगना देवी (श्रीम ी) और अन्य" (2004) 9 एससीसी 68 क े मामले में इस न्यायालय क े विनण3य पर अवलम्ब लिलया है।

17. सुगना देवी क े मामले में, विवचार क े लिलए उठाया गया एकमात्र मुद्दा यह र्थीा विक क्या उन्हें सहायक शिशक्षक क े रूप में विनयुक्त विकया गया र्थीा या नहीं और यविद हां, ो क्या उनकी सेवाओं को अवै रूप से समाप्त कर विदया गया र्थीा। इस न्यायालय ने उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए थ्य क े विनष्कष[3] को बरकरार रखा सिजसने वे न क े भुग ान, Tर्थीानां रण आदेशों, विनयुविक्त रिरपोट• और उससे उसक े प्रमाण पत्रों आविद की मांग कर े हुए प्राति कार पत्र क े संबं में, अशिभलेख पर विवचार करने क े बाद यह माना विक सुगना देवी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds वाT व में एक शिशक्षक क े रूप में काम कर रही र्थीीं। आगे यह भी माना गया विक कोई औपचारिरक आदेश पारिर विकए विबना उनकी सेवाओं को समाप्त नहीं विकया जा सक ा है। परिरणामTवरूप, इस न्यायालय ने उच्च न्यायालय द्वारा "उनकी सेवाविनवृलित्त की ारीख से पहले क े अंति म ीन वष• क े वे न क े बराबर मुआवजा" देने क े लिलए जारी विनदeशों को बरकरार रखा।

18. "भार संघ और अन्य बनाम रसेम सिंसह" (2008) 8 एससीसी 652 में, इस न्यायालय ने विनम्नलिललिख रूप में Tर्थीाविप सिसद्धां ों का सारांश विदयाः "7. संक्षेप में, सामान्य ः विवलस्थिम्ब सेवा संबं ी दावे को विवलंब व देरी (जहां रिरट यातिचका दायर करक े अनु ोष की मांग की जा ी है) या परिरसीमा (जहां प्रशासविनक अति करण क े समक्ष प्रार्थी3ना- पत्र द्वारा अनु ोष की मांग की जा ी है) क े आ ार पर अTवीकार कर विदया जाएगा। उक्त विनयम क े अपवादों में से एक स अपक ृ त्य से संबंति मामले हैं। जहां कोई सेवा संबं ी दावा विकसी स गल ी(अपक ृ त्य) पर आ ारिर है, वहां उस ारीख से सिजस ारीख को विनरं र अपक ृ त्य शुरू हुआ, राह प्रदान की जा सक ी है, भले ही अनु ोष मांगने में काफी देरी हो, यविद इस रह का विनरं र अपक ृ त्य हाविन क े विनरं र स्रो का सृजन कर ा है। लेविकन इस अपवाद का एक अपवाद है। यविद शिशकाय विकसी ऐसे आदेश या प्रशासविनक विनण3य क े संबं में है जो कई अन्य लोगों से संबंति है या प्रभाविव कर ी है और यविद मुद्दे को विफर से खोलने से ीसरे पक्ष क े विनT ारिर अति कारों पर प्रभाव पड़ेगा, ो दावे Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds पर विवचार नहीं विकया जाएगा। उदाहरण क े लिलए, यविद मुद्दा वे न या पेंशन क े भुग ान या पुनर्विन ा3रण से संबंति है, ो देरी क े बावजूद राह दी जा सक ी है क्योंविक यह ीसरे पक्ष क े अति कारों को प्रभाविव नहीं कर ा है। किंक ु यविद दावे में वरिरष्ठ ा या प्रोन्नति आविद से संबंति मुद्दे शाविमल हैं, जो दूसरों को प्रभाविव कर े हैं, ो विवलंब क े कारण दावा पुराना हो जाएगा और विवलंब/परिरसीमा का सिसद्धां लागू होगा। जहां क विपछली अवति क े लिलए बकाया राशिश की वसूली क े परिरणामTवरूप राह का संबं है, स अपक ृ त्य से संबंति सिसद्धां लागू होंगे। परिरणामTवरूप, उच्च न्यायालय बकाया से संबंति परिरणामी राह को आम ौर पर रिरट यातिचका दायर करने की ारीख से ीन साल पहले क सीविम कर देंगे।"

19. इस मामले क े थ्यों से विमल े जुल े, "सी जैकब बनाम विनदेशक, भूविवज्ञान व खनन और अन्य" (2008) 10 एससीसी 115 क े मामले में, इस न्यायालय ने यह पा े हुए विक कम3चारी ने अचानक 20 वष• क े बाद अपनी सेवाओं की समाविप्त क े आदेश को चुनौ ी दी और सभी पारिरणाविमक लाभों का दावा विकया, यह अशिभविन ा3रिर विकया विक मांगी गई राह अग्राह्य र्थीी। इस संबं में कानूनी स्थिTर्थीति विनम्नलिललिख शब्दों में विन ा3रिर की गई र्थीीः "10. राह क े लिलए सरकार का प्रत्येक अभ्यावेदन गुण-दोष क े आ ार पर लागू नहीं विकया जा सक ा है। ऐसे मामलों से संबंति अभ्यावेदन, जो पुराने हो गए हैं या परिरसीमा द्वारा वर्जिज हैं, दावे Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क े गुण-दोष की जांच विकए विबना क े वल उसी आ ार पर अTवीकार विकए जा सक े हैं। विवभाग से असंबद्ध अभ्यावेदनों क े संबं में, जबाव क े वल यह सूतिच करने क े लिलए हो सक ा है विक यह मामला विवभाग से संबंति नहीं है या उपयुक्त विवभाग को सूतिच करने क े लिलए है। अपूण[3] विववरणों क े सार्थी दायर अभ्यावेदनों का जबाव प्रासंविगक विववरण मांग कर विदया जा सक ा है। ऐसे अभ्यावेदनों का जबाव नया वाद हे ुक उत्पन्न नहीं कर सक ा या पुराने या मृ दावे को पुनज<विव नहीं कर सक ा है।

11. जब विकसी न्यायालय/अति करण द्वारा अभ्यावेदन पर विवचार करने का कोई विनण3य विदया जा ा है ो सामान्य ः विनदेशिश व्यविक्त गुणागुण क े आ ार पर मामले की जांच कर ा है, क्योंविक ऐसा करने में असफल ा अवज्ञा क े समान हो सक ी है। जब न्यायालय या अति करण क े विनदेश क े अनुपालन में, दावे या अभ्यावेदन पर विवचार कर े हुए और उसे नामंजूर कर े हुए कोई आदेश पारिर विकया जा ा है ो ऐसा कोई आदेश न ो पुराने दावे को पुनज<विव कर ा है और न ही नए वाद हे ुक को जन्म देने क े लिलए विकसी प्रकार क े "न्यातियक संबं की अशिभTवीक ृ ति " क े बराबर है।

12. जब कोई सरकारी कम3चारी दूसरी नौकरी लेने क े लिलए या व्यविक्तग मामलों में भाग लेने क े लिलए सेवा छोड़ दे ा है और छ ु ट्टी या इT ीफा या Tवैस्थिच्छक सेवाविनवृलित्त क े लिलए कोई पत्र भेजने की जहम नहीं उठा ा है और अशिभलेख उसे सेवा में होना नहीं Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विदखा ा है, ो वह दो दशकों क े बाद यह अभ्यावेदन नहीं कर सक ा विक उसे वापस सेवा में लिलया जाना चाविहए।न ही ऐसे कम3चारी को सेवा में लगा हुआ माना जा सक ा है, सिजससे पूरी अवति को पेंशन क े उद्देश्य क े लिलए अह3क सेवा माना जा सक े । यह न्याय का उपहास होगा।

13. जहां कोई कम3चारी अनति क ृ रूप से अनुपस्थिTर्थी रह ा है और अचानक 20 वष• क े बाद उपस्थिTर्थी हो ा है और यह मांग कर ा है विक उसे वापस ले लिलया जाना चाविहए और न्यायालय की शरण में जा ा है, वहां विवभाग क े पास Tवाभाविवक रूप से उस समय क कम3चारी से संबंति कोई अशिभलेख नहीं होगा या नहीं हो सक ा है। ऐसे मामलों में, जब विनयोक्ता जांच क े अशिभलेख और बखा3T गी/हटाए जाने क े आदेश को पेश करने में विवफल रह ा है, ो अदाल अशिभलेख पेश नहीं करने क े लिलए विनयोक्ता क े लिखलाफ प्रति क ू ल विनष्कष[3] नहीं विनकाल सक ी है, न ही सेवा की समाविप्त या कम3चारी की लाभप्रद दूसरी नौकरी को नजरअंदाज करक े, 20 वष• क े लिलए विपछले वे न क े सार्थी प्रत्यक्ष बहाली कर सक ी है। ऐसे मामलों में गल सहानुभूति अनुशासन (?)हीन ा को प्रोत्साविह करेगी गल ी करने वाले कम3चारी को अन्यायपूण[3] रीक े से समृद्ध बनाएगी और इसक े परिरणामTवरूप सरकारी खजाने की बबा3दी होगी। कई बार विपछली वे न क े विनयविम आदेश क े परिरणामTवरूप, विवत्तीय बोझ की सीमा क े बारे में भी मस्थिT ष्क का उपयोग नहीं हो ा है।" Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

20. पूव क्त उद्धृ कानूनी सिसद्धां ों क े सार्थी इस मामले में थ्यों क े संचयी प्रभाव को ध्यान में रख े हुए, हम सं ुष्ट हैं विक प्रत्यर्थी< का दावा पुराना, अत्यति क विवलंविब, समय वर्जिज है और इसे ीन दशकों की अवति क े बाद अति करण या उच्च न्यायालय द्वारा Tवीकार नहीं विकया जाना चाविहए र्थीा।

21. हम दोहरा े हैं विक विकसी न्यातियक मंच द्वारा अनुतिच सहानुभूति और कशिर्थी उदार दृविष्टकोण क े महत्वपूण[3] प्रति क ू ल परिरणाम हो सक े हैं। इससे न क े वल उदासीन कम3चारिरयों क े मन में अवै अपेक्षाएं पैदा हो ी हैं, बस्थि…क सरकारी खजाने पर भी अनुतिच बोझ पड़ ा है। इ ना ही नहीं, न्यायालय द्वारा मात्र सास्थिम्यक आ ारों पर विदखायी गयी क ृ पा, कानून की अवहेलना कर ा है, साव3जविनक सेवाओं में अनुशासनहीन ा पैदा कर ा है और असु ाय[3] कम3चारी अपनी अनुपस्थिTर्थीति की अवति या क 3व्य की अवहेलना क े लिलए लाभांश की लाश शुरू कर दे े हैं। हालांविक यह सुझाव देने क े लिलए कोई सबू नहीं है विक प्रत्यर्थी< जानबूझकर अपने क 3व्य से अनुपस्थिTर्थी र्थीी, थ्य Tवयं ब ा े हैं विक वह ीन दशकों से अति क समय से कानून क े ह प्राव ाविन विकसी उपचार की सहाय ा लेने में विवफल रही। हम इस बा को दुबारा कह सक े हैं विक प्रत्यर्थी< ने मुस्थिश्कल से 2½ साल की अवति क े लिलए अTर्थीायी आ ार पर एक अप्रशिशतिक्ष शिशक्षक क े रूप में काम विकया र्थीा और उच्च न्यायालय क े आक्षेविप विनण3य क े संदभ[3] में, उसे सभी सेवाविनवृत्त लाभों क े अलावा 40 साल से अति क का बकाया वे न प्राप्त करने का हकदार ठहराया गया है। इसलिलए हमारा विवचार है विक उच्च न्यायालय को अपीलार्थिर्थीयों क े लिखलाफ प्रति क ू ल विनष्कष[3] नहीं विनकालना चाविहए र्थीा या यह साविब करने क े लिलए उन पर पूरा दातियत्व नहीं डालना Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds चाविहए र्थीा विक प्रत्यर्थी< ने अनुतिच रूप से क 3व्यों(सेवा) को विफर से शुरू करने से इनकार विकया र्थीा। इस संबं में उच्च न्यायालय का दृविष्टकोण पूरी रह से गल है और कानून क े Tर्थीाविप सिसद्धां ों क े विवपरी है। इस प्रकार आक्षेविप विनण3य कायम नहीं रह सक ा है और इसे रद्द विकया जा सक ा है।

22. ऐसा करने क े बाद, आइए हम अपीलार्थिर्थीयों क े आचरण पर भी गौर करें। यह सच है विक राज्य सूचना आयोग क े पास सेवा विववाद में हT क्षेप करने और विदनांक 05.03.2009 जैसा अनुतिच आदेश पारिर करने का कोई अति कार नहीं र्थीा। हालांविक अति करण ने उस त्रुविट को सु ारा और प्रत्यर्थी< क े दावों को सीमा द्वारा वर्जिज होने क े कारण अTवीकार कर विदया। उच्च न्यायालय ने 02.07.2012 क े आक्षेविप विनण3य द्वारा इस आदेश को रद्द कर विदया र्थीा। अपीलार्थी< चुपचाप बैठे रहे और विबना विकसी विवरो क े उस विनण3य को Tवीकार कर लिलया। उक्त विनण3य ने, एक रह से, अंति म रूप प्राप्त कर लिलया है, हालांविक यह कानूनी रूप से कायम रहने योग्य नहीं है। उस विनण3य को Tवीकार करने क े बाद, अपीलार्थिर्थीयों को अगले परिरणाम का सामना करने क े लिलए ैयार विकया जाना चाविहए र्थीा, जो उन्हें उस समय विमला जब अति करण ने उन्हें प्रत्यर्थी< क े अभ्यावेदनों का नए सिसरे से फ ै सला करने का विनदeश विदया। इसने 30 साल से अति क समय क े बाद एक मृ दावे को पुनज<विव कर विदया। अपीलार्थिर्थीयों से अपेतिक्ष र्थीा विक वे घटनाओं क े प्रभावों और परिरणामों को ुरं समझ लें, लेविकन वे 02.07.2012 क े विनण3य पर चुप रहे। इन परिरस्थिTर्थीति यों क े ह, अपीलक ा3 ऐसे समय में प्रत्यर्थी< में आशा जगाने क े लिलए आंशिशक रूप से सिजम्मेदार हैं जब वह सेवाविनवृत्त होने की उम्र क े करीब र्थीी। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

23. सभी थ्यों और परिरस्थिTर्थीति यों क े संचयी प्रभावों को ध्यान में रख े हुए, जबविक हमने उच्च न्यायालय क े विदनांक 24.01.2017 क े आक्षेविप विनण3य को रद्द कर विदया है और प्रत्यर्थी< की बहाली, सेवाविनवृलित्त लाभ या बकाया वे न आविद क े दावे को अTवीकार कर विदया है; हम अपीलार्थिर्थीयों को विनदeश दे े हैं विक वे इस आदेश की प्रति क े प्राप्त होने की ारीख से दो महीने की अवति क े भी र प्रत्यर्थी< को रु. 5,00,000/- (पांच लाख) की राशिश का एकमुश् भुग ान करें।

24. अपील को पूव क्त श • में अनुमति दी जा ी है।.......................................... (न्यायमूर्ति सूय[3] कां ).......................................... (न्यायमूर्ति जे. क े. महेश्वरी) नई विदल्ली; 07 विदसंबर, 2022. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds