Rajasthan State v. Gurbachan Singh & Ors.

Supreme Court of India · 07 Dec 2022
Sanajiv Khanna; Sudhanshu Dhulia
Criminal Appeal No 2201 of 2011
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court restored Gurbachan Singh's murder conviction under Section 302 read with Section 34 IPC, holding that he shared common intention with co-accused despite limited individual role.

Full Text
Translation output
'प्रतिवेद्य '
भारत का उच्चतम न्यायालय
आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपील संख्या 2201/2011
राजस्थान राज्य ……
अपीलकर्ता
बनाम
गुरबचन सिंह और अन्य ...…
प्रतिवादी
निर्णय
संजीव खन्ना , ज.
JUDGMENT

1. आदेश दिनांक 01/05/2009 द्वारा, विशेष अनुमति याचिका में नोटिस प्रथम प्रतिवादी - गुरबचन सिंह तक ही सीमित था। अन्य प्रतिवादियों क े खिलाफ विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी गई। हमारा ध्यान दिनांक 17.12.2008 क े उस आदेश की ओर आक ृ ष्ट किया जाता है, जिसमें मनजीत कौर को बरी किए जाने क े खिलाफ दायर आपराधिक विविध याचिका संख्या 19754/2008 खारिज की जाती है।मनजीत कौर और जांगिड़ कौर क े खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा भरोसा किया गया मामला और सबूत एक जैसे हैं। हमारी राय है और हम दोहराते हैं कि अभियोजन जांगिड़ कौर क े खिलाफ अपना मामला स्थापित करने में सक्षम नहीं रहा है। जांगीर कौर को बरी करने की चुनौती खारिज की जाती है।

2. आरोप पत्र क े अनुसार अभियोजन पक्ष का मामला है कि तेजा सिंह अपने भाई हरभजन सिंह (पीडब्लू-1) क े साथ एक तरफ और गुरबचन सिंह सह-दोषियों और भाइयों दर्शन सिंह, बलवीर सिंह और मंजीत सिंह क े साथ दूसरी तरफ भूमि क े विभाजन क े विवाद में उलझे हुए थे। 06/11/2000 को लगभग शाम 5 बजे गुरबचन सिंह और बलवीर सिंह जल निर्माण विभाग क े भूखंड पर हल जोत रहे थे। तेजा सिंह ने इस पर आपत्ति जताई थी, जिसक े बाद एक गांव की बैठक आयोजित की गई, जिसमें गुरबचन सिंह और बलवीर सिंह दोनों गुस्से में अपने घर चले गए थे। उसी दिन शाम साढ़े सात बजे हरभजन सिंह (पीडब्ल्यू-1) और जसवीर कौर (पीडब्ल्यू-2) गांव क े गुरुद्वारे जा रहे थे। उस समय तेजा सिंह को गुरुद्वारा क े पास सोहन लाल की आटा मिल से आते देखा गया था। इसक े बाद, गुरबचन सिंह और बलवीर सिंह, मंजीत सिंह और दर्शन सिंह, जो क्रमशः 'लाठी', 'टोका', क ु ल्हाड़ी और 'गंडासी' से लैस थे, ने तेजा सिंह को पीटा और घायल कर दिया, जिससे उसी स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना में हरभजन सिंह (पीडब्लू-1) भी घायल हो गया था।

3. प्रथम सूचना रिपोर्ट 1 (संक्षेप में, "एफआईआर”) उसी दिन दायर की गई थी, जिसमें गुरबचन सिंह, दर्शन सिंह, बलवीर सिंह और मनजीत सिंह क े नामों का उल्लेख है, और जांगिड़ कौर व मनजीत कौर क े नाम भी हैं, जो कथित तौर पर घटना स्थल पर मौजूद थे। हालांकि, प्राथमिकी क े अनुसार, जांगिड़ कौर और मनजीत कौर को किसी भी तरह क े मौखिक या शारीरिक प्रक ृ ति क े विशिष्ट कार्यों क े लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था।

4. ट्रायल कोर्ट ने दिनांक 07/11/2001 क े फ ै सले क े तहत भारतीय दंड संहिता, 18602 (संक्षेप में, "भा.दं.सं.”) क े निम्नलिखित प्रावधानों क े तहत गुरबचन सिंह क े साथ-साथ बलवीर सिंह, मनजीत सिंह, दर्शन सिंह और जांगिड़ कौर पर मुकदमा चलाया और उन्हें दोषी ठहराया: (क) धारा 302 सपठित धारा 149 भा.दं.सं. - आजीवन कारावास और जुर्माना 1000 रुपये/- प्रत्येक, 2 महीने की डिफ़ॉल्ट शर्त क े साथ साधारण कारावास। (ख) धारा 324 सपठित धारा 149 भा.दं.सं.- डेढ़ साल का कठोर कारावास और 500 रुपये का जुर्माना- प्रत्येक, 1 महीने की डिफ़ॉल्ट शर्त क े साथ, साधारण कारावास। (ग) धारा 323 सपठित धारा 149 भा.दं.सं.- 3 माह का कठोर कारावास और 100 रुपये का जुर्माना, 7 दिन की डिफ़ॉल्ट शर्त क े साथ, साधारण कारावास; और (घ) धारा 148 भा.दं.सं.- एक साल का कठोर कारावास और प्रत्येक पर 100/- रुपये का जुर्माना, 7 दिन की डिफ़ॉल्ट शर्त क े साथ, साधारण कारावास । मंजीत कौर पर वर्ष 2004 में अलग से मुकदमा चलाया गया था, क्योंकि वह फरार हो गई थी। उसे ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था, जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था। उनक े मामले में बरी होने का फ ै सला अंतिम हो गया है।

5. गुरबचन सिंह, बलवीर सिंह, मंजीत सिंह, दर्शन सिंह और जांगिड़ कौर की अपील पर, जोधपुर में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने दिनांक 04.04.2008 क े निर्णय क े अनुसार, जांगिड़ कौर द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया और उसे बरी कर दिया। गुरबचन सिंह की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया क्योंकि भा.दं.सं. की धारा 302 सपठित 149, धारा 147, धारा 148, धारा 324 सपठित 149, और धारा 323 सपठित 149 क े तहत उनकी दोषसिद्धि रद्द कर दी गई थी और उसे तेजा सिंह को लगी चोटों क े लिए भा.दं.सं. की धारा 323 क े तहत दोषी ठहराया गया है, और उन्हें रिहा करने का निर्देश दिया गया था, क्योंकि उसने अपराध क े लिए प्रदान की गई अधिकतम सजा भुगत ली थी। भा.दं.सं. की धारा 149 और 148 क े तहत बलवीर सिंह, मंजीत सिंह और दर्शन सिंह की सजा को रद्द कर दिया गया था, हालांकि, धारा 302 क े तहत उनकी सजा को भा.दं.सं. की धारा 34 की मदद से बनाए रखा गया था। हरभजन सिंह (पी डबल्यू-1) को लगी चोटों क े लिए IPC की धारा 34 क े साथ धारा 324 क े तहत उनकी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी गई थी।

6. ऐसा प्रतीत होता है कि बलवीर सिंह, मंजीत सिंह और दर्शन सिंह ने अपनी दोषसिद्धि और अधिरोपित दंडादेश को चुनौती नहीं दी है, जो अंतिम रूप ले चुका है।

7. इस प्रकार, राजस्थान राज्य द्वारा इस अपील में हमारे सामने प्रश्न यह है कि क्या उच्च न्यायालय द्वारा आईपीसी की धारा 302 पठित अन्य प्रावधानों क े तहत गुरबचन सिंह को दी गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द करना न्यायोचित था, क े वल आईपीसी की धारा 323 क े तहत दोषी ठहराकर, इस खोज क े मद्देनजर कि उसने तेजा सिंह की मौत का कारण बनने क े लिए बलवीर सिंह, मनजीत सिंह और दर्शन सिंह क े साथ सामान्य इरादा साझा नहीं किया, क्योंकि उसने क े वल उसक े पैरों पर 'लाठी' से घाव किया था।

8. प्रासंगिक रूप से, उच्च न्यायालय ने गुरबचन सिंह द्वारा की गई अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित अभिनिर्धारित किया हैः "अब प्रश्न अभियुक्त गुरबचन क े बारे में रहता है जो प्रत्यक्ष गवाही क े अनुसार 'लाठी' से लैस था और उसे बरामद भी कर लिया गया था। प्रदर्श 41 क े माध्यम से उसक े द्वारा दी गयी सूचना क े पश्चात और इसे प्रदर्श 23 क े द्वारा बरामद किया गया और यह मानव रक्त से भी सनी हुई थी। हरभजन सिंह खुद घायल हैं जिसकी चोट रिपोर्ट प्रदर्श 15 डॉ. मोहन लाल गुप्ता द्वारा तैयार की गई थी। चोट की रिपोर्ट क े अनुसार उन्हें अपने शरीर पर आठ चोटें मिली हैं, जिनमें से एक धारदार हथियार से है और हरभजन सिंह क े बयान क े अनुसार, उक्त चोट आरोपी बलवीर सिंह द्वारा 'टोका' से उस समय कारित की गयी, जब वह अपने भाई को बचाने क े लिए मौक े पर पहुंचा था। गुरबचन सिंह ने अपने शरीर पर लाठी से प्रहार किया। चश्मदीद गवाहों की गवाही से यह सुरक्षित रूप से अनुमान लगाया जा सकता है कि आरोपी गुरबचन सिंह सामान्य इरादे को साझा नहीं कर रहा था क्योंकि वह क े वल 'लाठी' से लैस था और मृतक क े शरीर पर जो भी चोटें लगी थी, जिससे उसकी मृत्यु हुई, वो मृतक क े शरीर क े मार्मिक अंगों पर लगी थी।"

9. उपरोक्त तर्क स्वीकार करता है और हमारी राय में सही है कि गुरबचन सिंह घटना स्थल पर बलवीर सिंह, मनजीत सिंह और दर्शन सिंह क े साथ मौजूद थे, जब हिंसा हुई थी, जिसक े परिणामस्वरूप तेजा सिंह की मृत्यु 06/11/2000 को लगभग 7:30 बजे हुई। हरभजन सिंह (पी डब्ल्यू-1), तेजा सिंह का भाई, अपनी पत्नी जसवीर कौर (पी डब्ल्यू-2) क े साथ गाँव में गुरुद्वारे जा रहे थे, गुरुद्वारे क े पास सोहन लाल की आटा चक्की से तेजा सिंह को आते देखा था। इसक े बाद गुरबचन सिंह, दर्शन सिंह, बलवीर सिंह और मंजीत सिंह ने तेजा सिंह को अभिवादन किया था। हरभजन सिंह (पीडब्लू-1) और उनकी पत्नी जसवीर कौर (पीडब्लू-2) ने गवाही दी है कि गुरबचन सिंह लाठी लेकर आया था, जबकि दर्शन सिंह को क ु ल्हाड़ी क े साथ देखा गया था, बलवीर सिंह 'टोका' क े साथ और मनजीत सिंह 'गंडासी' क े साथ। उन्होंने तेजा सिंह को घेर लिया था। गुरबचन सिंह ने तेजा सिंह क े पैरों पर 'लाठी' मारी थी, जिससे वो गिर पड़ा । इसक े बाद, गुरबचन सिंह और सह-दोषियों ने तेजा सिंह को पीटा और घायल कर दिया। बलवीर सिंह ने तेजा सिंह क े सिर पर चोट लगाने क े लिए विशेष रूप से एक 'टोका', एक तेज धार वाले हथियार का उपयोग किया था। इसका उद्देश्य और कारण भाइयों क े बीच जमीन का विवाद था, और 06.11.2000 को शाम 5 बजे की घटना, जब तेजा सिंह ने गुरबचन सिंह और बलवीर सिंह द्वारा जल कार्य विभाग क े भूखंड की जुताई पर आपत्ति जताई थी, और गाँव की बैठक जहाँ गुस्सा भड़क गया, गुरबचन सिंह और बलवीर सिंह गुस्से में बैठक छोड़कर चले गए। यह उचित है कि हरभजन सिंह (पी डब्लू-1) भी हिंसा क े दौरान घायल हो गया था।

10. डॉ. मोहन लाल गुप्ता, (पीडब्लू-9) द्वारा साबित की गई पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट, जिसे प्रदर्श पी-14 क े रूप में चिह्नित किया गया था, मे तेजा सिंह क े सिर पर विभिन्न आकारों की 8 हड्डियों की गहरी चोटों का उल्लेख किया गया था।उन्होंने यह भी अभिसाक्ष्य दिया था कि ये चोटें क ु ल्हाड़ी, टोका, गंडासी, लाठी और आदि जैसे धारदार हथियारों क े कारण हो सकती थीं, जो सामान्य रूप से मृत्यु का कारण बनने क े लिए पर्याप्त थे।

11. उपर्युक्त स्थिति को देखते हुए, हमारा विचार है कि भा.दं.सं. की धारा 34 अर्थात् समान आशय स्पष्ट रूप से गुरबचन सिंह क े मामले में आक ृ ष्ट है, जिसका मामला विभेद नहीं किया जा सकता है, जिससे कि उसे ऐसे व्यक्ति क े रूप में अपवर्जित किया जा सक े जिसका दर्शन सिंह, बलवीर सिंह और मनजीत सिंह क े साथ समान आशय नहीं था।भा.दं.सं. की धारा 34 एक सह-अपराधी को, जिसने अपराध में भाग लिया था, संयुक्त दायित्व क े सिद्धांत पर समान रूप से उत्तरदायी बनाती है। भा.दं.सं. की धारा 34 को लागू करने क े लिए सह-अपराधियों क े बीच एक समान आशय होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि उद्देश्य और समान डिजाइन का समुदाय होना चाहिए। सामान्य आशय क्षण क े आवेग में और घटना क े दौरान ही बन सकता है। सामान्य आशय आवश्यक रूप से एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है और इस प्रकार, सामान्य रूप से प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं होंगे।इसलिए, अधिकांश मामलों में, एक समान आशय है या नहीं, यह साबित तथ्यों से निष्कर्ष निकालकर निर्धारित किया जाना चाहिए। रचनात्मक इरादे पर क े वल तभी पहुंचा जा सकता है जब न्यायालय यह अभिनिर्धारित कर सकता है कि अभियुक्त ने सामान्य आशय को आगे बढ़ाने क े लिए परिणाम की पूर्व कल्पना की होगी।

12. आक्षेपित निर्णय में यह मत व्यक्त किया गया है कि गुरबचन सिंह क े आचरण से सामान्य आशय का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि वह क े वल 'लाठी' से लैस था और क े वल तेजा सिंह क े पैरों पर मारा था। तथापि, हमारा यह मत है कि तेजा सिंह को घायल करने और उसकी मृत्यु कारित करने का सामान्य आशय गुरबचन सिंह क े आचरण और कार्रवाई से प्राप्त किया जा सकता है। सबसे पहले, यह हरभजन सिंह (पी डब्लू-1) और जसवीर कौर (पी डब्लू-2) क े बयानों क े साथ पढ़े गए आक्षेपित फ ै सले क े उद्धृत पैराग्राफ से निगमित है कि गुरबचन सिंह अन्य लोगों क े साथ 'लाठी' लेकर तैयार होकर आए थे, जिनक े पास 'टोका', फरसा और 'गंडासी' था। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि गुरबचन सिंह क े कब्जे से खून से सनी 'लाठी' बरामद की गयी थी। साक्ष्य सह-प्रतिभागियों/सह-दोषियों क े साथ अपराध करने में गुरबचन सिंह की भागीदारी को स्थापित करता है। दूसरा, गुरबचन सिंह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने तेजा सिंह पर लाठी से हमला किया और उन्हें चोट पहुंचाई। अंत में, गुरबचन सिंह ने सह-दोषियों क े साथ, तेजा सिंह क े सिर पर 8 कटे हुए घाव और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों पर चोटें पहुंचाई ं, जैसा कि पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट (प्रदर्श 14) में दर्ज है। प्रत्यक्षदर्शियों क े बयान से स्पष्ट होता है कि गुरबचन सिंह ने क े वल एक लाठी नहीं मारी, जैसा कि बचाव पक्ष द्वारा कहा जा रहा है, लेकिन वह नीचे गिरने क े बाद भी मृतक को लाठी मारता रहा। यह उसने अन्य सह-दोषियों, बलवीर सिंह, मनजीत सिंह और दर्शन सिंह क े साथ किया, जिन्होंने 'टोका', क ु ल्हाड़ी और 'गंडासी' से चोटें पहुँचाई थीं। ये तथ्य सिद्ध करते हैं कि गुरबचन सिंह ने अन्य सह-दोषियों क े साथ चोट पहुंचाने क े समान इरादे साझा किए थे, और अपराध सामान्य इरादे को आगे बढ़ाने क े लिए किया गया था, जिसक े कारण तेजा सिंह की मौत हो गई थी। इसलिए, गुरबचन सिंह सहित वे सभी आपराधिक क ृ त्य क े लिए जिम्मेदार होंगे, यानी भा.दं.सं. की धारा 302 क े तहत अपराध, चाहे उन्होंने कोई भी भूमिका निभाई हो।

13. पूर्वोक्त को दर्ज करते हुए, हम उच्च न्यायालय द्वारा भा.दं.सं. की धारा 302 क े तहत गुरबचन सिंह को बरी करने क े आक्षेपित निर्णय को खारिज करते हैं, और उसे भा.दं.सं. की धारा 302 सपठित धारा 34 क े तहत तेजा सिंह की हत्या क े लिए दोषी ठहराया जाता है। हरभजन सिंह (पी डब्ल्यू -1) को लगी चोटों क े लिए भा.दं.सं. की धारा 324 क े तहत गुरबचन सिंह की दोषसिद्धि भी कायम है । भा.दं.सं. की धारा 302 सपठित धारा 34 क े तहत अपराध क े लिए, हम गुरबचन सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित सजा क े आदेश को बहाल करते हैं। साथ ही 1,000/- रुपये का जुर्माना, इस शर्त क े साथ कि अदम अदायगी की स्थिति में, उन्हें दो महीने की अवधि क े लिए साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 428 का लाभ दिया जायेगा। हालांकि, हम उच्च न्यायालय द्वारा लिए गए दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं कि भा.दं.सं. की धारा 148 क े साथ पठित धारा 149 क े तहत दोषसिद्धि को बनाए नहीं रखा जा सकता है क्योंकि भा.दं.सं. क े इन प्रावधानों को आकर्षित करने क े लिए गैरकानूनी असेंबली की आवश्यकता, संतोषजनक नही है ।

14. गुरबचन सिंह शेष सजा काटने क े लिए 21 दिनों क े भीतर आत्मसमर्पण करेगा। यदि गुरबचन सिंह उक्त अवधि क े भीतर आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो अधिकारी/अदालत गुरबचन सिंह को हिरासत में लेने क े लिए कानून क े अनुसार कार्रवाई करेगी, ताकि वह शेष सजा काट सक े ।

15. अपील पूर्वोक्त शर्तों में अनुज्ञात है।

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16. लंबित आवेदन, यदि कोई हो, का निस्तारण किया जाएगा। ………………....… जे. (संजीव खन्ना) ………………....... जे. (सुधांशु धूलिया) नई दिल्ली 07 दिसंबर, 2022 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.