Em Kashor v. Kashav & Ors.

Delhi High Court · 29 Mar 2023
Sudhanshu Dhulia; J. B. Pardiwala
Civil Appeal No 1948/2013
civil appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that a second eviction petition is barred by res judicata if the landlord-tenant relationship was not established in the first petition dismissed on merits, and upheld dismissal under Order 7 Rule 11 CPC.

Full Text
Translation output
ितवे
भारतीय सव च यायालय
िस वल अपीलीय अिधका रता
िस वल अपील सं 1948/2013
ेम कशोर व अ य .....अपीलाथ (गण)
बनाम
काश व अ य ..... यथ (गण)
िनणय
या., जे.बी. पारद वाला:
यह अपील, वशेष अनुमित ारा, द ली कराया िनयं ण अिधिनयम, 1958
(सं ेप म, 'अिधिनयम 1958') क
े ावधान क
े तहत दायर बेदखली यािचका क

मूल वाद (मकान मािलक) क
े कहने पर है तथा द ली उ च यायालय ारा
दनांक 04.05.2010 को िस वल पुनर ण यािचका सं या 1332/2002 म पा रत
िनणय और ड क
े खलाफ िनदिशत है, जसक
े ारा उ च यायालय ने
ितवाद ( करायेदार) ारा दायर पुनर ण यािचका को अनुमित द , जससे
िस वल या सं हता (सी.पी.सी.) क
े आदेश 7 िनयम 11 क
े ावधान क
े तहत
वादप को इस आधार पर खा रज कर दया गया क बेदखली यािचका पूव-
याय क
े िस ांत ारा व जत थी।
त या मक मै स
JUDGMENT

2. इस अपील को ज म देने वाले त य को सं ेप म नीचे दया जा सकता है।

3. अपीलाथ गण का मामला यह है क यहाँ यथ गण को गाँव ढ का, क ं सवे कप, द ली म थत मकान सं. 163 (पुरानी सं. 143) वाली संप क े संबंध म बजली, पानी तथा हाउस टै स को छोड़कर, 27.12.1987 पर 1050/- पए क े मािसक कराए पर करायेदार क े प म शािमल कया गया था। अपीलाथ गण क े अनुसार, करायेदार आवासीय उ े य क े िलए थी। उनका यह भी मामला है क कराया फरवर, 1993 तक विधवत भुगतान कया गया था।

4. अपीलाथ गण क े पता ने 27,800/- क े कराये क े बकाया क े भुगतान क े िलए यथ गण को दनां कत 04.03.1996 का एक मांग नो टस दया। अपीलाथ गण क े अनुसार, यथ गण को विधवत नो टस दया गया था। तथा प कराए क े बकाया का भुगतान नह ं कया गया।

5. ऊपर उ ल खत ऐसी प र थितय म, अपीलाथ गण क े पता ने अिधिनयम 1958 क धारा 14(1)(क) क े तहत 1996 क बेदखली यािचका सं या 149 क े साथ एक बेदखली यािचका दायर क ।

6. उ बेदखली यािचका म, यथ गण ने अपना िल खत बयान दायर कया और मकान मािलक और करायेदार क े संबंध से इनकार कया ।

7. अिभलेख पर उपल ध साम ी से यह तीत होता है क यथ गण ारा मकान मािलक और करायेदार क े संबंध से इनकार करते हुए िल खत बयान दायर कए जाने क े बाद, वाद प कार क े बीच मकान मािलक और करायेदार क े संबंध को था पत करने क े उ े य से कराया िनयं क क े सम उप थत होने म वफल रहे । वाद को मकान मािलक और करायेदार क े संबंध को था पत करने क े िलए सबूत पेश करने क े कई अवसर दए गए थे । रकॉड से पता चलता है क वाद को सा य तुत करने का अंितम अवसर 09.09.1997 पर और फर 01.11.1997 पर दया गया था ।

8. ऊपर उ ल खत ऐसी प र थितय म, कराया िनयं क िन निल खत आदेश दनांक 27.01.1998 पा रत करने क े िलए आगे बढ़ाः- "27.1.1998 वतमानः यािचकाकता क े अिधव ा ी. चंदर शेखर। अिध. यािचकाकता तुत करता है क आज कोई गवाह नह ं आया है और न ह बुलाया गया है । आगे थगन क े िलए कोई आधार नह ं है । यािचकाकता को अंितम अवसर 9.9.97 और फर 1.11.97 पर दया गया था । फर भी यािचकाकता ने गवाह बुलाने क परवाह नह ं क है । इस कार या.सा बंद कया जाता है । चूँ क मकान मािलक करायेदार का संबंध वयं ववाद म है और यािचकाकता इस त य को था पत करने क े िलए कोई सबूत पेश करने म वफल रहा है, इसिलए मेर राय है क मामले को.सा. क े िलए आगे तय करने का कोई मतलब नह ं है । इस कार यािचका खा रज कर द जाती है य क यािचकाकता अपना मामला था पत करने म वफल रहा है । फाइल भेजी जाए । एसड /- 27.1.1998 आर. करण नाथ कराया िनयं क द ली"

9. यह ववाद म नह ं है क बेदखली यािचका को खा रज करने वाले उपरो आदेश क े खलाफ कोई अपील नह ं क गई थी । मूल वाद, अथात, समी िसंह क े जीवन काल क े दौरान, अिधिनयम 1958 क धारा 14(1)(क) क े तहत कोई नई बेदखली यािचका दायर नह ं क गई थी ।

10. समी िसंह (मूल वाद ) क े िनधन क े बाद, हत म उ रािधकार होने का दावा करने वाले अपीलाथ गण ने अिधिनयम 1958 क धारा 14 (1)(क) क े तहत यथ गण क े खलाफ 2001 क बेदखली यािचका सं या 136 क े प म पंजीकृ त एक और बेदखली यािचका दायर क, जसम अ य बात क े साथ-साथ 01.03.1993 से नो टस जार होने क तार ख अथात 18.05.2001 तक क े कराए क े बकाया का दावा कया गया था । यथ गण ारा यहां एक िल खत बयान दायर कया गया था जसम यह ख अपनाया गया था क समी िसंह (पहली बेदखली यािचका का मूल वाद ) अथात अपीलाथ गण क े हत म पूववत प कार क े संबंध को सा बत करने म वफल रहा था और ऐसी प र थितय म, इसे दूसर बेदखली यािचका म फर से खोलने क अनुमित नह ं द जा सकती है य क यह पूव- याय क े िस ांत ारा व जत होगा।

11. ऐसा तीत होता है क इसम यथ गण ने िस..सं क े आदेश 7 िनयम 11 क े ावधान क े तहत एक आवेदन को ाथिमकता द जसम कहा गया था क 2001 क बेदखली यािचका सं या 136 को पूव- याय क े िस ांत ारा व जत कया गया था और तदनुसार िशकायत को खा रज कर दया जाना चा हए ।

12. अित र कराया िनयं क ने 23.07.2002 दनां कत आदेश क े मा यम से वादप को अ वीकार करने से इनकार कर दया । अित र कराया िनयं क ने वादप को अ वीकार करने क े िलए यथ गण ारा दायर आवेदन को अ वीकार करते हुए यह वचार रखा क अिधिनयम 1958 क धारा 14(1)(अ) क े तहत दायर दूसर बेदखली यािचका कायवाह क े अलग कारण पर 18.05.2001 दनां कत एक नए नो टस क े आधा रत थी और ऊपर िन द 27.01.1998 दनां कत आदेश म प कार क े संबंध क े संबंध म यो यता क े आधार पर कोई िन कष नह ं िनकला था । ऐसी प र थितय म अित र कराया िनयं क ने यह वचार कया क पूव- याय क े अिभवाक कानूनी प से मा य नह ं है । िस..सं. क े आदेश 7 िनयम 11 (घ) क े तहत आवेदन को तदनुसार खा रज कर दया गया था ।

13. अित र कराया िनयं क ारा पा रत आदेश से असंतु यथ गण ने द ली उ च यायालय म 2002 क िस वल पुनर ण यािचका सं या 1332 दायर करक े इसे चुनौती द ।

14. उ च यायालय ने िस वल पुनर ण यािचका को वीकार कर िलया और 2001 क बेदखली यािचका सं या 136 क े वाद को इस आधार पर खा रज कर दया क यह पूव- याय क े िस ांत से भा वत था। उ च यायालय ने यथ गण ारा दायर िस वल पुनर ण यािचका को वीकार करते हुए कहा क- "17. वतमान मामले म, यथ गण/मकान मािलक क े पूववत हतधारक ी समी िसंह अिधिनयम क धारा 14 (1)(क) क े तहत उनक े ारा दायर पहली बेदखली यािचका म प कार क े बीच मकान मािलक और करायेदार क े िलए कोई सबूत पेश करने म वफल रहे । चूं क उ िनणय कसी भी प ारा अपील म नह ं िलया गया था, इसिलए इसे अंितम प दया गया । सा य देने का अवसर दए जाने और यायालय म कोई सा य तुत करने म वफल रहने क े कारण, इसे सं हता क धारा 11 क े उ े य क े िलए िस वल या सं हता क े आदेश XVII िनयम 3 क े तहत यो यता पर िनणय क े प म िलया जाना चा हए ।

18. उ रवत बेदखली यािचका दायर करक े, यथ गण को य प म ऐसा करने क अनुमित नह ं द जा सकती है जो वे अ य प से नह ं कर सकते थे । सबूत पेश करने म वफलता, जसक े प रणाम व प सबूत क े अभाव म यथ गण क े दावे को खा रज कर दया जाता है, वा तव म, यो यता पर िनणय है । जैसा क यािचकाकता ने सबूत पेश कया था, जसे अदालत ने अपया सबूत माना था और इसे उ आधार पर खा रज कर दया था । ऐसी थित म लागू कानूनी उ है, 'गैर य और गैर अ त वह न' औसत अनुपात ' । यह एक ऐसा िनयम है जो उन चीज पर लागू होता है, जो दखाई नह ं देती ह, और उन चीज पर लागू होता है जो मौजूद नह ं ह । इसिलए, कराए क े बकाया का दावा करने क े अपने अिधकार को बनाए रखने क े िलए, य द ी समी िसंह को यह सा बत करने क आव यकता थी क वह यािचकाकता का मकान मािलक था, ले कन वह ऐसा करने म वफल रहा, कराया िनयं क क े पास सबूत पेश न करने क े कारण उसक े खलाफ मु े का फ ै सला करने क े अलावा कोई वक प नह ं था । दूसरे श द म, जो दखाई नह ं देता है, उसे अ त वह न माना जाना चा हए ।

19. इन प र थितय म, कराया िनयं क क े दनांक 27.01.1998क े िनणय को, मामले क यो यता क े आधार पर िनणय क े प म िलया जाना चा हए । क े वल इसिलए क दूसर बेदखली यािचका म यथ गण ारा न क े वल उस अविध क े िलए, जसक े िलए पहली बेदखली यािचका दायर क गई थी, ब क 18-05-2001 उ रवत अविध क े िलए भी कराए क े बकाया का दावा करते हुए कायवाह का कारण तुत कया गया है, यह मानने का आधार नह ं हो सकता है क दूसर बेदखली यािचका बनाए रखने यो य थी । पहले क कायवाह म प कार क े बीच मकान मािलक और करायेदार का संबंध था पत नह ं कया गया था और यह बात दूसर यािचका म य प से और काफ हद तक जार है जसम कराए क े बकाया का दावा करने क े िलए आधार यथ गण (यािचकाकताओं) का ख है क वे यािचकाकता क े मकान मािलक ह । पहली यािचका म पा रत अपने आदेश दनांक 27.01.1998 म कराया िनयं क ारा वापस कए गए िन कष को यो यता क े आधार पर िन कष माना जाना चा हए और िनणायक प से िनणय िलया जाना चा हए, जो कृ ित म अंितम ह और यथ गण ारा दायर क गई दूसर बेदखली यािचका पर पूव- याय क बाधा क े प म काय करते ह ।

55,905 characters total

20. उपरो त य और प र थितय को यान म रखते हुए, इस यायालय क राय है क दनां कत 23.07.2002 का आ े पत आदेश कानून क े अनुसार नह ं है और इसे कायम नह ं रखा जा सकता है । इसिलए उ आदेश को दर कनारऔर आमा य घो षत कया जाता है । यािचकाकता ारा िस..सं क े आदेश VII िनयम 11 क े तहत दायर आवेदन को अनुमित द जाती है । यह अिभिनधा रत कया जाता है क अिधिनयम क धारा 14 (1)(क ) क े तहत यथ गण ारा दायर दूसर बेदखली यािचका को पूव- याय क े िस ांत ारा व जत होने क े कारण खा रज कया जा सकता है । तदनुसार आदेिशत।” (जोर दया गया)

15. उ च यायालय ारा पा रत उपरो आदेश से असंतु होकर, अपीलाथ गण, जो वचाराधीन संप क े वैध मािलक और मकान मािलक होने का दावा करते ह, वतमान अपील क े मा यम से इस यायालय क े सम आए ह । अपीलाथ गण क ओर से तुितयाँ

16. अपीलािथय क ओर से उप थत व ान अिधव ा ने बल प से तुत कया क उ च यायालय ने यह वचार रखने म एक गंभीर ु ट क क 2001 क दूसर बेदखली यािचका सं या 136 कानूनी प से बनाए रखने यो य नह ं थी य क यह पूव- याय क े िस ांत से भा वत थी। वह तुत करते है क िस..सं. क े ावधान क े तहत वाद को खा रज नह ं कया जा सकता था य क यायपािलका क े मु े को कानून और त य का एक िमि त सवाल कहा जा सकता है । वह तुत करते है क 2001 क बेदखली यािचका सं या 136 क े वाद म ऐसा कोई कथन नह ं है जसक े आधार पर यह कहा जा सक े क बेदखली यािचका कानून क े कसी भी ावधान ारा व जत है ।

17. व ान अिधव ा ने आगे तुत कया क उ च यायालय ने िस..सं. क े आदेश 17 िनयम 3 क े िस ांत को लागू करने म भी ु ट क य क पहली बेदखली यािचका म कराया िनयं क ारा दनाक ं 27.01.1998 को पा रत पहला आदेश यो यता क े आधार पर नह ं था और इसिलए, मकान मािलक और करायेदार क े संबंध क े कोई िन कष नह ं दया गया था जसे दूसर बेदखली यािचका म प कारो क े बीच बा यकार कहा जा सकता है ।

18. ऊपर उ ल खत ऐसी प र थितय म, व ान अिधव ा ाथना करता है क उसक अपील म गुणागुण होने क े कारण, इसक अनुमित द जा सकती है और आ े पत आदेश को दर कनार कर दया जा सकता है । यथ सं या 1 क ओर से तुितयाँ

19. दूसर ओर, यथ सं या 1 क ओर से उप थत व ान अिधव ा ने यह तुत करते हुए वतमान अपील का बल वरोध कया क उ च यायालय ारा आ े पत आदेश पा रत करने म कानून क कसी भी ु ट क बात न करने म कोई ु ट नह ं कह जा सकती है ।

20. वह तुत करते है क मुकदमे क े पहले दौर म, वग य समी िसंह (मूल वाद ) को मकान मािलक करायेदार संबंध था पत करने क े िलए कराया िनयं क ारा पया समय और अवसर दए गए थे । तथा प, समी िसंह यायालय क े सामने पेश होने म वफल रहे और उस स ब ध म कोई सबूत पेश करने म भी वफल रहे । ऐसी प र थितय म कराया िनयं क ारा बेदखली यािचका को खा रज करना उिचत था ।

21. व ान अिधव ा तुत करते है क उ च यायालय ने सह ढंग से पाया क मुकदमेबाजी क े पहले दौर म कराया िनयं क ारा पा रत आदेश दनांक 27.01.1998 को िस..सं. क े आदेश 17 िनयम 3 क े ावधान क े तहत कहा जा सकता है और य द ऐसा है, तो यह िन कष क मूल वाद अथात समी िसंह मकान मािलक करायेदार संबंध था पत करने म समथ नह ं थे, गुणागुण क े आधार पर कहा जा सकता है । वह तुत करते है क एक बार इस तरह का िन कष रकॉड म आ जाने क े बाद, अपीलकता बाद म समी िसंह ारा हत म उ रािधकार क े प म दावा करते हुए उसी आधार पर एक नई बेदखली यािचका को दायर नह ं कर सकते थे य क यह पूव- याय क े िस ांत से भा वत होगा । वह तुत करते है क उ च यायालय ने िस..सं. क े आदेश 7 िनयम 11(घ) क े ावधान क े तहत बेदखली यािचका क े वादप को सह ढंग से खा रज कर दया ।

22. तुितय क े समथन म यथ सं या 1 क ओर से उप थत व ान अिधव ा ने िन निल खत िनणय पर भरोसा रखा हैः-

1. भारत संघ बनाम नानक िसंह, एआईआर 1968एससी 1370:(1968) 2 एससीआर 887

2. स यधन घोषाल व अ य. बनाम ीमती. देवरा जन देवी व अ य., एआईआर 1960 एससी 941:(1960) 3 एससीआर

3. हर दयाल बनाम राम गुलाम, एआईआर (31) 1944 अवध

4. नीला बनाम पुनुन, एआईआर 1936 लाहौर 385

5. गो वंदोस कृ णदोस बनाम कावतनगर क े राजा व अ य., एआईआर 1929 म ास 404

6. ओम काश गु ा बनाम रतन िसंह, (1964) 1 एससीआर

7. गुलाबचंद छोटालाल पा रख बनाम गुजरात रा य, एआईआर 1965 एससी 1153 व ेषण

23. प कारो क े व ान अिधव ा को सुनने क े बाद और अिभलेख पर साम ी को देखने क े बाद, एकमा सवाल जो हमारे वचार क े िलए आता है वह यह है क या उ च यायालय ारा बेदखली यािचका को इस आधार पर को खा रज करना उिचत था क दूसर बेदखली यािचका पूव- याय क े िस ांत ारा व जत थी।

24. िस..सं. का आदेश 7 िनयम 11 इस कार हैः- "11. वादप क अ वीकृ ित- िन निल खत मामल म वाद प खा रज कर दए जायगे:- (क ) जहां यह कारवाई क े कारण का खुलासा नह ं करता है; (ख) जहां दावा क गई राहत का कम मू यांकन कया गया है, और वाद, यायालय ारा िनधा रत कए जाने वाले समय क े भीतर मू यांकन को सह करने क े िलए यायालय ारा अपे त होने पर, ऐसा करने म वफल रहता है; (ग) जहां दावा कया गया राहत उिचत प से मू यवान है, ले कन वादप को अपया प से मुहर वाले कागज पर वापस कर दया जाता है, और वाद, यायालय ारा िनधा रत कए जाने वाले समय क े भीतर आव यक टांप-पेपर क आपूित करने क े िलए यायालय ारा आव यक होने पर, ऐसा करने म वफल रहता है; (घ) जहां वादप म दए गए बयान से तीत होता है क वाद कसी कानून ारा व जत है; (ङ) जहां यह ितिल प म दा खल नह ं कया गया है; (च) जहां वाद िनयम 9 क े ावधान का पालन करने म वफल रहता हैः बशत क मू यांकन म सुधार या अपे त टा प-पेपर क आपूित क े िलए यायालय ारा िनधा रत समय को तब तक नह ं बढ़ाया जाएगा जब तक क यायालय, दज कए जाने वाले कारण से, यह संतु नह ं हो जाता है क वाद को यायालय ारा िनधा रत समय क े भीतर, मू यांकन म सुधार करने या आव यक टा प- पेपर क आपूित करने क े िलए, जैसा भी मामला हो, असाधारण कृ ित क े कसी भी कारण से रोका गया था और इस तरह क े समय को बढ़ाने से इनकार करने से वाद क े साथ गंभीर अ याय होगा।"

25. िस..सं. क े आदेश 7 िनयम 11 (घ) म ावधान है क वादप को अ वीकृ त कर दया जाएगा "जहां वादप म दए गए बयान से तीत होता है क वाद कसी क़ानून ारा व जत है।’’ इसिलए, यह तय करने क े िलए क या मुकदमा कसी कानून ारा व जत है, वादप म दए गये बयान को समझना होगा । इस तरह क े आवेदन पर िनणय लेते समय यायालय को क े वल वादप म दए गए बयान को ह यान म रखना चा हए । वाद कसी भी कानून ारा व जत है अथवा नह ं, यह वादप म दए गए बयान से िनधा रत कया जाना चा हए और यह मामले म िल खत बयान स हत कसी अ य साम ी क े आधार पर इस मु े पर िनणय लेने क े िलए खुला नह ं है । आदेश 7 िनयम 11 (घ) िस..सं. क या या पर पूव िनणय का उ लेख करने क े िलए आगे बढ़ने से पहले, हम िस..सं. क धारा 11 का उ लेख करना अिनवाय पाते ह जो पूव- याय को प रभा षत करती हैः- "11. पूव- याय.- कोई भी यायालय ऐसे कसी भी वाद अथवा मु े का वचारण नह ं करेगा जसम य प से और अहम प से स ब धत मामला एक ह प क े बीच या उन प कारगण क े बीच एक पूव वाद म रहा हो, जनक े तहत वे या उनम से कोई दावा करता है, उसी शीषक क े तहत मुकदमा करते हुए, ऐसे उ रवत वाद क सुनवाई क े िलए स म यायालय म या वह वाद जसमे ऐसा मु ा बाद म उठाया गया हो, और ऐसे यायालय ारा सुना गया हो और अंततः िनणय िलया गया हो।”

26. िस..सं. क धारा 11 पूव- याय क े िनयम को प करती हैः एक यायालय कसी भी वाद अथवा मु े पर सुनवाई नह ं करेगी जसम सीधे तौर पर स ब धत मामले को य अथवा अ य प से ‘पूव वाद’ म सुना और तय कया गया हो । इसिलए पूव- याय क े मु े पर िनणय लेने क े उ े य से यह आव यक है क पछले वाद (जो वाद म उठाया गया है) म इसी मु े पर िनणय िलया गया हो । यह आव यक है क हम आदेश 7 िनयम 11 क े तहत वादप क अ वीकृ ित क े िलए आधार क े प म पूव- याय का उ लेख करने से पहले, पूव- याय पर िनणय लेते समय इस यायालय ारा क गई या का उ लेख कर । यायामूित आर. सी. लाहोट (त कालीन व ान मु य यायाधीश क े प म) ने वी. राजे र बनाम ट.सी. सरवनबावा, (2004) 1 एससीसी 551 म दो यायाधीश क पीठ क ओर से बोलते हुए, पूव- याय क े अिभवाक और उन ववरण पर चचा क जो अिभवाक को सा बत करने क े िलए आव यक ह गे । यायालय ने अिभिनधा रत कया क पूव- याय क े अिभवाक पर िनणय देते समय अिभवाको, मु और ‘पूव वाद’ क े िनणय क ितय का उ लेख करना आव यक है:- "11. पूव- याय का िनयम उ रवत वाद क सुनवाई करने वाले यायालय क े अिधकार े क जड़ पर हार नह ं करता है । यह सावजिनक नीित पर आधा रत िनणय ारा वबंध का िनयम है क मुकदमेबाजी क े िलए एक अंितमता होगी और कसी को भी एक ह कारण क े िलए दो बार परेशान नह ं कया जाना चा हए । x x x x

13. न क े वल अिभवाक दए जाने है, ब क पछले मामले म अिभवचन, मु और िनणय क ितयां पेश करक े इसक पु क जानी है । हो सकता है क कसी दए गए मामले म क े वल पछले वाद म फ ै सले क ित ह पूव- याय क े माण क े प म दायर क गई हो और िनणय म व तृत अथवा अपे त ववरण म अिभवाको और मु का ववरण शािमल हो, ज ह पया माण क े प म िलया जा सकता ह l ले कन जैसा क सैयद मोह मद सेली ल बई बनाम मोह मद हनीफा [(1976) 4 एससीसी 780] म बताया गया, पूव- याय क े का िनणय करने का मूल तर का पहले प कारो क े मामले का िनधारण करना है जैसा क उनक े पछले वाद क े संबंिधत अिभवचन म सामने रखा गया था और फर यह पता लगाना है क िनणय ारा या िनणय िलया गया था जो पूव- याय क े प म काय करता है । िनणय म उ ल खत अिभवचन म लगाए गए आरोप क े सारांश से ह अिभवचन क े बारे म अटकल लगाना जो खम भरा है । गुरब स िसंह बनाम भूरालाल [एआईआर 1964 एससी 1810:(1964) 7 एससीआर 831] म स वंधान पीठ ने िस वल या सं हता क े आदेश 2 िनयम 2 क े तहत पूव- याय क े अिभवाक तथा वबंधन क े अिभवाक को एक समान रखते हुए यह अिभिनधा रत कया क पछले वाद म वादप का माण जो ितबंध बनाने क े िलए िनधा रत है, उसे रकॉड पर लाया जाना चा हए । अिभवाक मूल प से दो वाद म कायवाह क े कारण क पहचान पर आधा रत है और इसिलए, यह बचाव प क े िलए आव यक है जो पछले वाद म कायवाह का कारण था पत करने म बा य उ प न करता है । इस तरह क े अिभवचनो को क े वल अटकल अथवा अनुमान लगाने क या ारा िनधा रत करने क े िलए नह ं छोड़ा जा सकता है क पछले अिभवचन म या त य बताए गए थे । काली कृ ण टैगोर बनाम प रषद म भारत क े िलए रा य सिचव [(1887-88) 15 आइ.ए 186:आईएलआर 16 कलक ा 173] म वी काउंिसल क े उनक े माननीय यायाधीश ने बताया क पूव- याय क े अिभवाक सुिन त कये बना िनधा रत नह कये जा सकते क पछले वाद म या मामले थे और या सुना और िनणय िलया गया था। कहने क आव यकता नह है, इ ह पछले वाद क े अिभवचन, मु और िनणय को देखकर ह पता लगाया जा सकता ह।’’

27. वी. राजे र (उपयु ) क े मामले म इस यायालय ने कहा क पूव- याय का िनयम उ रवत वाद क सुनवाई करने वाले यायालय क े अिधकार े क े मूल पर हार नह ं करता है । यह मुकदमे को अंितम प देने क सावजिनक नीित पर आधा रत वबंधन का एक िनयम है । पूव- याय क े अिभवाक क ु छ त य क े माण पर आधा रत होते है और फर इस तरह पाए गए त य पर कानून को लागू कया जाता है । इसिलए, यह आव यक है क व ास क नींव अिभवचन म रखी जानी चा हए और फर मु े को तैयार कया जाना चा हए और उस पर वचार कया जाना चा हए ।

28. इस तर पर, उन िनणय का उ लेख करना आव यक होगा जो वशेष प से इस सवाल से संबंिधत ह क या पूव- याय वादप को अ वीकार करने का आधार हो सकता है। कमला व अ य बनाम क े. ट. ई र सा, (2008) 12 एस. सी. सी. 661 म, वचारण यायाधीश ने वभाजन क े एक वाद म वादप को खा रज करने क े िलए एक आवेदन को अनुमित द और उ च यायालय ारा इसक पु क गई थी । यायमूित एस. बी. िस हा ने दो यायाधीश क पीठ क ओर से बोलते हुए िस..सं. क े दायरे क जांच क और कहाः- "21. सं हता क े आदेश 7 िनयम 11 (घ) का सीिमत अनु योग है। यह दखाया जाना चा हए क वाद कसी भी कानून क े तहत व जत है । इस तरह का िन कष वादप म कए गए कथन से िनकाला जाना चा हए । हमार राय म, आदेश 7 िनयम 11 क े विभ न खंड को िमि त नह ं कया जाना चा हए ।जब क कसी मामले म, वादप क अ वीकृ ित क े िलए आवेदन उसक े विभ न उपखंड म िन द एक से अिधक आधार पर दायर कया जा सकता है, उस भाव क े िलए एक प िन कष पर पहुंचना आव यक है । सं हता क े खंड (घ) को लागू करने क े िलए जो ासंिगक होगा, वे वादप म कए गए कथन ह । उस उ े य क े िलए, कोई जोड़ या घटाव नह ं हो सकता है । यायालय क ओर से अिधकार े क अभाव को विभ न चरण म और सं हता क े विभ न ावधान क े तहत लागू कया जा सकता है । सं हता का आदेश 7 िनयम 11 एक है, आदेश 14 िनयम 2 दूसरा है ।

22. सं हता क े आदेश 7 िनयम 11 (घ) को लागू करने क े उ े य से, कसी भी माण क मा ा पर वचार नह ं कया जा सकता है । मामलो क े गुणागुण क े आधार पर प कार क े बीच उ प न होने वाले मु े इस तर पर यायालय क े दायरे म नह ं ह गे। उ ावधान क े तहत सभी मु े कसी आदेश क वषय-व तु नह ं ह गे । " यायालय ने आगे अिभिनधा रत कया:- "23. पूव- याय क े िस ांत, लागू होने पर, सं हता क धारा 12 क े म ेनजर अ य वाद पर रोक लगा दगे। कानून और त य क े िमि त वाले म न क े वल वादप क जांच क आव यकता हो सकती है, ब क अ य सा य भी हो सकते है और पहले क े वाद म पा रत आदेश को या तो ारंिभक मु े क े प म अथवा अंितम सुनवाई म िलया जा सकता है, ले कन उ का िनधारण उस तर पर नह ं कया जा सकता है ।

24. यह कहना एक बात है क उनक े सामने वादप म कए गए कथन क े कसी कायवाह क े कसी कारण का खुलासा नह ं करते ह, ले कन यह कहना दूसर बात है क तथा प यह कायवाह क े कारण का खुलासा करता है, ले कन यह एक कानून ारा व जत है ।

25. इस यायालय और विभ न उ च यायालय ारा दए गए िनणय इस संबंध म समान नह ं ह । ले कन, फर यापक िस ांत जसे इससे िनकाला जा सकता है, वह यह है क उस तर पर अदालत कसी भी सा य पर वचार नह ं करेगी या त य या कानून क े ववा दत म वेश नह ं करेगी । य द यायालय का अिधकार े कसी भी कानून ारा व जत पाई जाती है, जसका अथ है क उसक े वषय-व तु, वादप क अ वीकृ ित क े िलए आवेदन पर वचार कया जाना चा हए । "

29. इस यायालय क े िनणय क एक पं म उपरो कोण का लगातार पालन कया गया है । चच ऑफ ाइ ट चै रटएबल ट व एजुक े शनल चै रटेबल सोसाइट बनाम पो नयममैन एजुक े शनल ट, (2012) 8 एससीसी 706 म यायामूित पी. सतिशवम (त कालीन व ान मु य यायाधीश क े प म) ने दो यायाधीश क पीठ क ओर से बोलते हुए कहा कः- "10. [...] उपरो से यह प है क जहां वादप कायवाह क े कारण का खुलासा नह करता, दावा क गई राहत का यायालय ारा अनुमत समय क े भीतर कम मू यांकन कया जाता है और उसे सह नह ं कया जाता है, यायालय ारा िनधा रत समय क े भीतर अपया प से मुहर लगाई जाती है और उसे ठ क नह ं कया जाता है, कसी भी कानून ारा व जत, आव यक ितय को संल न करने म वफल रहा और वाद िनयम 9 क े ावधान का पालन करने म वफल रहा, यायालय क े पास इसे अ वीकार करने क े अलावा कोई अ य वक प नह ं है । उपरो ावधान को पढ़ने से यह भी प होता है क सं हता क े तहत श का योग मुकदमे क े कसी भी चरण म या तो वाद दज करने से पहले या ितवा दय को स मन जार करने क े बाद या मुकदमे क े समापन से पहले कसी भी समय कया जा सकता है ।

11. इस थित को इस यायालय ारा सलीम भाई बनाम महारा रा य [(2003) 1 एस. सी. सी. 557] मामले म समझाया गया था, जसम सं हता क े आदेश 7 िनयम 11 पर वचार करते हुए इसे िन नानुसार अिभिनधा रत कया गया थाः (एससीसी पी. 560, पैरा 9) "9. आदेश 7 िनयम 11 िस.. सं. क े अवलोकन से यह प होता है क ासंिगक त य जन पर उसक े तहत एक आवेदन पर िनणय लेने क े िलए गौर करने क आव यकता है, वे वादप म अिभकथन ह । वचारण यायालय मुकदमा दज करने से पहले या मुकदमे क े समापन से पहले कसी भी समय ितवाद स मन जार करने क े बाद वाद क े कसी भी चरण म आदेश 7 िनयम 11 िस..सं. क े तहत श का योग कर सकती है । आदेश 7 िस..सं. क े िनयम 11 क े खंड (क) और (घ) क े तहत एक आवेदन पर िनणय लेने क े उ े य क े िलए, वाद म अिभकथन प ह; िल खत बयान म ितवाद ारा कये गये अिभवाक उस तर पर पूर तरह से अ ासंिगक ह गी, इसिलए, आदेश 7 िनयम 11 िस. सं. क े तहत आवेदन पर िनणय िलए बना िल खत बयान दायर करने का िनदश वचारण यायालय ारा े ािधकार क े योग को छ ू ने वाली या मक अिनयिमतता नह ं हो सकती है। यह प है क आदेश 7 िनयम 11 पर वचार करने क े म म, िनचली अदालत को वाद म दए गए कथन पर गौर करना होगा और वाद क े कसी भी चरण म वचारण यायालय ारा इसका योग कया जा सकता है । यह भी प है क िल खत कथन म कए गए कथन मह वह न ह और वाद म कए गए कथन /अिभवचन क जांच करना यायालय का कत य है । दूसरे श द म, इस तरह क े आवेदन पर िनणय लेने म जस बात पर यान देने क आव यकता है, वह है वाद म कए गए कथन । उस तर पर, िल खत बयान म ितवाद ारा कये गये अिभवचन पूर तरह से अ ासंिगक ह और मामले का िनणय क े वल वादप क े कथन पर कया जाना है । रा टकोस ेट व क ं पनी िलिमटेड बनाम गणेश ोपट [(1998) 7 एससीसी 184] तथा मायार (एच. क े.) िलिमटेड बनाम वेसल एम. वी. फॉ यून ए स ेस [(2006) 3 एससीसी 100] ।म इन िस ांत को दोहराया गया है ।"

30. इसी तरह, सौिम क ु मार सेन बनाम यामल क ु मार सेन, (2018) 5 एससीसी 644 म, िस..सं. क े तहत एक आवेदन दायर कया गया था जसम दावा कया गया था क वाद प को इस आधार पर अ वीकार कर दया गया था क वाद पूव- याय ारा व जत था । वचारण यायाधीश ने आवेदन को खा रज कर दया और उ च यायालय ारा पुनर ण म वचारण यायालय क े फ ै सले क पु क गई । यायामूित ए. क े. सीकर ने उ च यायालय क े फ ै सले क पु करते हुए कहाः- "9. पहली बार म, यह देखा जा सकता है क जहाँ तक थायी और अिनवाय िनषेधा ा से राहत का सवाल है यह कायवाह क े एक अलग कारण पर आधा रत है। साथ ह वचारण यायालय ारा उस तरह क राहत पर तभी वचार कया जा सकता है जब वाद इस तरह का वाद लाने क े िलए अपनी अिध थित था पत करने म समथ हो । य द अपीलकता ारा अपने िल खत कथन म कए गए कथन सह ह, तो ऐसा वाद बनाए रखने यो य नह ं हो सकता है, य क अपीलकता क े अनुसार यह पछले दो वाद म पहले ह यह िनणय िलया जा चुका है क यथ 1 -वाद अपना ह सा लेने क े बाद साझेदार फम से बहुत पहले सेवािनवृ हो गया था और यह अपीलकता (या अपीलकता और यथ 2) है जो मैसस सेन इंड ज क े मामल का बंधन करने का हकदार है । तथा प, इस तर पर, जैसा क उ च यायालय ारा सह बताया गया है, िल खत बयान म बचाव म नह ं जाया जा सकता है । क े वल आदेश 7 िनयम 11 िस..सं. क े तहत आवेदन पर िनणय लेने क े उ े य से वाद प पर गौर करना होगा । यह संभव है क चतुराई से तैयार कए गए वादप म, वाद ने 2008 क े वाद सं या 268 क े बारे म ववरण नह ं दया है, जो उसक े खलाफ तय कया गया है । उ ह ने 1995 क े वाद सं या 103 क े बारे म उ लेख करना पूण तरह से छोड़ दया है, जस िनणय ने अंितमता ा कर ली है । उस अथ म, वाद - यथ 1 दमन और िछपाने का दोषी हो सकता है, य द अपीलकता ारा कए गए कथन अंततः सह पाए जाते ह । तथा प, कानून क े था पत िस ांत क े अनुसार, आदेश 7 िनयम िस..सं क े तहत आवेदन पर िनणय लेते समय िल खत बयान म पेश कए गए ऐसे बचाव पर वचार नह ं कया जा सकता है ।" कमला (उपयु ) का उ लेख करते हुए, यायालय ने आगे कहा कः- "12. …अपीलकता ने पहले क े दो मामल का उ लेख कया है जो यथ 1 ारा दायर कए गए थे और जसम वह वफल रहे । ये याियक अिभलेख ह । अपीलकता पहले क े दो मुकदम म अिभवचन क मा णत ितय क े साथ-साथ उन कायवा हय म अदालत ारा पा रत िनणय क ितयां दा खल करक े आसानी से अपने कथन क स यता दिशत कर सकता है । वा तव म, िस वल यायाधीश (किन भाग) ारा पा रत 31-3-1997 क े आदेशो क ितयाँ, िस वल यायाधीश (किन भाग) ारा पा रत ड को बरकरार रखते हुए िस वल यायाधीश (व र भाग) ारा पा रत 31-3-1998 क े िनणय क ित िस वल यायाधीश, किन भाग ारा 2008 क े वाद सं या 268 म पा रत 31-7-2014 क े िनणय और ड क ित अपीलकता ारा रकॉड पर रखी गई है । पहले वाद का फ ै सला करते समय, वचारण यायालय ने एक प िन कष दया क प कार क े बीच ह ता रत समझौता ापन क े अनुसार, यथ 1 ने क ु ल 2,00,000 पये क रािश वीकार क थी और इसिलए, उ वाद को वबंधन,अिध यजन और उपमित और अिध यजन क े िस ांत ारा व जत कया गया था । इस तरह क े मामले म, तथा प अपीलकता ारा आदेश 7 िनयम 11 िस..सं. का सहारा लेना उिचत नह था, साथ ह, वचारण यायालय, मु को तैयार करने क े बाद, उन मु को उठा सकती है जो वाद क पोषणनीयता से संबंिधत ह और पहली बार म उसी पर िनणय ले सकती है । इस तरह से अपीलकता, या उस मामले क े िलए प कार को लंबी कायवाह क अनाव यक पीड़ा से मु कया जा सकता है, य द अपीलकता अंततः अपनी तुितय म सह पाया जाता है ।’’

31. सौिम क ु मार सेन (उपयु ) क े मामले म यह यायालय एक ऐसे मामले क जांच कर रहा था जसम ितवाद ने िस..सं क े तहत वचारण यायालय क े सम एक आवेदन दायर कया था जसम अदालत से अनुरोध कया गया था क वह पूव- याय क े आधार पर वादप को खा रज कर दे । अधीन थ यायालय ने ऐसी ाथना को खा रज कर दया था जस पर ितवाद ने इस अदालत का दरवाजा खटखटाया था । इस यायालय ने इस मु े पर अपने विभ न िनणय का उ लेख करते हुए ऐसे आदेश को यह कहते हुए बरकरार रखा क य द अपीलकता ारा िल खत बयान म कए गए कथन सह ह, तो वाद पोषणीय नह ं हो सकता है । तथा प, इस तर पर, जैसा क इस यायालय ारा उिचत प से अिभिनधा रत कया गया है, िल खत बयान म बचाव म नह ं जाया जा सकता है । िस..सं क े तहत आवेदन पर िनणय लेने क े उ े य से वादप पर गौर करना होगा ।

32. यह अिभिनधा रत करते हुए क अपीलकता ारा "आदेश 7 िनयम 11 का सहारा" लेना उिचत नह ं है, इस यायालय ने कहा क वचारण यायालय, मु को तैयार करने क े बाद, उन मु को उठा सकता है जो वाद क पोषणनीयता से संबंिधत ह और उ ह पहली बार म तय कर सकता है । यायालय ने अिभिनधा रत कया क इस कारवाई से अपीलकता को लंबी कायवाह य से बचने म मदद िमलेगी ।

33. उपरो ािधका रय क े अवलोकन पर, िस..सं क े आदेश 7 िनयम 11 (घ) क े तहत एक आवेदन पर िनणय लेने क े िलए मागदशक िस ांत को सं ेप म इस कार तुत कया जा सकता हैः- (i) कसी वाद को इस आधार पर अ वीकार करने क े िलए क वाद कसी भी कानून ारा व जत है, क े वल वादप म दए गये कथन को संदिभत करना होगा; (ii) वाद म ितवाद ारा कए गए बचाव पर आवेदन क े गुणागुण तय करते समय वचार नह ं कया जाना चा हए । (iii) यह िनधा रत करने क े िलए क या कोई वाद पूव- याय ारा व जत है, यह आव यक है क (i) ' पछला वाद' तय हो, (ii) उ रवत वाद म मु े य और काफ हद तक पूववत वाद क े मु े म थे; (iii) पूववत वाद उ ह ं प कारो अथवा प कारो क े बीच था जनक े मा यम से वे दावा करते ह, उसी शीषक क े तहत मुकदमा करते हो; और (iv) क इन मु पर िनणय िलया गया था और अंत म उ रवत वाद का पर ण करने क े िलए स म अदालत ारा िनणय िलया गया था; और (iv) चूं क पूव- याय क े अिभवाक को िनर त करने क े िलए ‘ पछले वाद’ म अिभवचन, मु और िनणय पर वचार क आव यकता होती है, ऐसे अिभवाक आदेश 7 िनयम 11 (घ) क े दायरे से बाहर होग, जहां क े वल वादप म दए गए बयान का ह अवलोकन करना होगा । (दे खएः ीह र हनुमंतसदास टोटला बनाम हेमंत व ठल कामत, (2021)9 एससीसी 99)

34. िस..सं क धारा 11 क े तहत पूव- याय क े सामा य िस ांत म िनणय क िन य िन ाय ा क े िनयम होते ह, ले कन पूव- याय को लागू करने क े िलए, उ रवत वाद म जो मामला य व काफ हद तक ववाद म है वो वह मामला होना चा हए जो पछले वाद म य और काफ हद तक ववा दत था । इसक े अलावा, वाद का िनणय गुणागुण क े आधार पर कया जाना चा हए था और िनणय अंितम होना चा हए था । जहाँ पूववत वाद को वचारण यायालय ारा े ािधकार क े अभाव क े कारण खा रज कर दया जाता है, या वाद क उप थित क यित म क े िलए, या प कार क े असय जन अथवा क ु सय जन वाले या बहुप ीयता क े आधार पर, या इस आधार पर क वाद बुर तरह से तैयार कया गया था, या कसी तकनीक गलती क े आधार पर, या वाद क ओर से ोबेट या शासन प या उ रािधकार माण प तुत करने म वफलता क े िलए जब वाद को ड का अिधकार देने क े िलए कानून ारा इसक आव यकता होती है, या लागत क े िलए ितभूित दान करने म वफलता क े िलए, या अनुिचत मू यांकन क े आधार पर, या कसी वादप पर अित र यायालय शु क का भुगतान करने म वफलता क े िलए जसका कम मू यांकन कया गया था, या कायवाह ं कारण क े अभाव क े िलए, या इस आधार पर क यह अविधपूव है और बखा तगी क पु अपील (य द कोई हो) म क जाती है, िनणय, गुणागुण पर नह ं होने क े कारण, उ रवत वाद म पुनर याियक नह ं होगा।

35. वतमान मामले म, बेदखली यािचका का वरोध करने क े िलए ितवा दय क े पूव- याय आधार क जांच करने से पहले, कई पहलुओं को गौर से देखना पड़ सकता है । या इस तरह का मु ा पछले वाद म मह वपूण प से मु ा था और इसी तरह क े अ य सामने आ सकते ह । ऐसी प र थितय म िस..सं. क े आदेश 7 िनयम 11 क े तहत श यां उपल ध नह ं ह गी । इसिलए, उ च यायालय ने वादप को खा रज करने म ु ट क ।

36. वतमान अपील म हम जो बुिनयाद तय करने क आव यकता है, वह यह है क या वग य समी िसंह ारा दायर पहला वाद अथात बेदखली यािचका सं या 149/1996 को गुणागुण क े आधार पर खा रज कर दया गया था । दूसरे श द म कह तो या कराया िनयं क ारा बेदखली यािचका सं या 149/1996 को खा रज करते हुए दज कया गया िन कष क बेदखली यािचका खा रज कए जाने क े यो य है य क वाद समी िसंह प कार क े बीच मकान मािलक और े संबंध को था पत करने म वफल रहे थे, को गुणागुण क े आधार पर कहा जा सकता है ता क दूसर बेदखली यािचका सं या 136/2001 को पूव- याय क े िस ांत पर पोषणीय नह ं रखा जा सक े ।

37. उ च यायालय ने यह वचार य कया क पहला मुकदमा अथात बेदखली यािचका सं या 149/1996 को िस..सं क े आदेश 17 आदेश 3 क े ावधान क े तहत खा रज कया जा सकता है और इसिलए, मकान मािलक और े संबंध क े संबंध म उसम दज िन कष को गुणागुण पर कहा जा सकता है और इस कार उ रवत कायवाह म बा यकार कहा जा सकता है ।

38. उपरो संदभ म, हम िस..सं क े मशः आदेश 17 िनयम 2 और 3 क े ावधान पर वचार कर सकते ह जो इस कार ह◌ः “आदेश 17 िनयम 2 और 3:

2. य द प िनधा रत दन उप थत होने म वफल रहते ह तो या.--जहां, कसी भी दन जस दन वाद क सुनवाई थिगत क जाती है, प कार या उनम से कोई भी उप थत होने म वफल रहता है, उस दन यायालय आदेश IX ारा उस ओर से िनदिशत तर क म से कसी एक म वाद का िनपटारा करने क े िलए आगे बढ़ सकता है या ऐसा अ य आदेश दे सकता है जो वह उिचत समझे । प ीकरण- जहां कसी भी प क े सा य या सा य का एक अहम ह सा पहले ह दज कया जा चुका है और ऐसा प कसी भी दन पेश होने म वफल रहता है जस दन वाद क सुनवाई थिगत क जाती है, तो यायालय अपने ववेकािधकार पर मामले म आगे बढ़ सकता है जैसे क ऐसा प मौजूद था ।

3. कसी भी प ारा सा य आ द तुत करने म वफल होने क े बावजूद यायालय आगे बढ़ सकता है - जहां कसी वाद का कोई प कार, जसे समय दया गया है, अपना सा य तुत करने, या अपने गवाह क उप थित का कारण बनने, या वाद क आगे क गित क े िलए आव यक कोई अ य काय करने म वफल रहता है, जसक े िलए समय दया गया है, यायालय, इस तरह क े यित म क े बावजूद, (क) य द प उप थत ह, तो वाद पर तुरंत िनणय लेने क े िलए आगे बढ़; अथवा (ख) य द प कार अथवा उनम से कोई भी अनुप थत है, तो िनयम 2 क े तहत कारवाई कर’’ ।

39. िस..सं क े आदेश 17 िनयम 2 म यह ावधान है क जहां कसी भी दन, जस दन वाद क सुनवाई थिगत क जाती है, प कार या उनम से कोई भी उप थत होने म वफल रहता है, वहां यायालय आदेश IX ारा उस ओर से िनदिशत तर क म से कसी एक म वाद का िनपटारा करने क े िलए आगे बढ़ सकता है अथवा ऐसा अ य आदेश दे सकता है जो वह उिचत समझे ।

40. िस..सं. क े आदेश 17 िनयम 2 म संल न प ीकरण म यह ावधान है क जहां कसी भी प क े सा य या सा य का एक अहम ह सा पहले ह दज कया जा चुका है और ऐसा प कसी भी दन पेश होने म वफल रहता है जस दन वाद क सुनवाई थिगत क जाती है, तो यायालय अपने ववेकािधकार पर मामले को आगे बढ़ा सकता है जैसे क ऐसा प मौजूद था ।

41. तथा प, िस..सं क े आदेश 17 िनयम 3 म यह ावधान है क जहां कसी वाद का कोई प कार जसे समय दया गया है, अपना सा य तुत करने म वफल रहता है, या अपने गवाह क उप थित का कारण बनता है, या वाद क आगे क गित क े िलए आव यक कोई अ य काय करने म वफल रहता है, जसक े िलए समय क अनुमित द गई है, यायालय, इस तरह क यित म क े बावजूद, (क) य द प कार उप थत ह, तो वाद पर तुरंत िनणय लेने क े िलए आगे बढ़ सकता है, अथवा (ख) य द प कार, या उनम से कोई अनुप थत है, तो िनयम 2 क े तहत आगे बढ़ सकता है ।

42. िस..सं क े आदेश 17 िनयम 2 और आदेश 17 िनयम 3 का दायरा बी. जानक रामैया चे ट बनाम ए. क े. पाथसारथी व अ य., (2003) 5 एससीसी 641, क े मामले म इस यायालय क े सम वचार क े िलए आया, जसम यायामूित अ रजीत पसायत ने पीठ क ओर से बोलते हुए पैरा 7 से 10 म िन नानुसार अिभिनधा रत कयाः- "7. यह िनधा रत करने क े िलए क या आदेश 9 क े तहत उपाय खोया है या नह यह देखना आव यक है क या पहली बार म यायालय ने िनयम 2 क े प ीकरण का सहारा िलया था ।

8. प ीकरण अदालत को अपने ववेकािधकार पर ऐसे मामले म आगे बढ़ने क अनुमित देता है जहां कसी भी प क े सा य का अहम ह सा पहले ह दज कया जा चुका है और ऐसा प कसी भी दन पेश होने म वफल रहता है जस दन वाद क सुनवाई थिगत क जाती है । जैसा क ावधान वयं दशाता है, यायालय को द गई ववेकाधीन श का योग कसी द गई प र थित म कया जाना है । ावधान क े लागू होने क े िलए, यायालय को वयं संतु होना होगा कः (क) कसी भी मुकदमा क े सा य का अहम ह सा पहले ह दज कया जा चुका है; (ख) ऐसा प कसी भी दन पेश होने म वफल रहा है; और (ग) वह दन है जस दन वाद क सुनवाई थिगत क जाती है । िनयम 2 यायालय को आदेश 9 म दए गए कसी भी तर क े को अपनाने या ऐसा आदेश देने क अनुमित देता है जो वह उिचत समझता है जब कसी भी दन जस दन वाद क सुनवाई थिगत क जाती है, प कार या उनम से कोई भी उप थत होने म वफल रहता है । प ीकरण िनयम क े तहत द गई सामा य श क े िलए एक अपवाद क े प म है, जो अदालत को िन द प र थित क े तहत काय करने का ववेकािधकार दान करता है, अथात जहां कसी भी प क े सा य या सा य का एक अहम ह सा पहले ह दज कया जा चुका है और ऐसा प उस तार ख को उप थत होने म वफल रहता है जस दन वाद क सुनवाई थिगत कर द गई है । य द ऐसी त या मक थित है, तो यायालय अपने ववेकािधकार पर मान सकता है क ऐसा प मौजूद था । आदेश 9 िनयम 3 क े तहत यायालय यह िनदश देते हुए आदेश दे सकती है क वाद तब खा रज कया जाए जब वाद सुनवाई क े िलए बुलाए जाने पर कोई भी प उप थत न हो । िनयम 2, 6 और 8 म वाद को खा रज करने क े अ य ावधान भीं ह । हम मु य प से िनयम 6 ारा तय क गई थित से िचंितत ह । प ीकरण म मह वपूण श द "मामले क े साथ आगे बढ़" ह । अतः त य क े आधार पर येक मामले म यह देखा जाना चा हए क या प ीकरण यायालय ारा लागू कया गया था या नह ं ।

9. िनयम 2 म यु अिभ य "जैसा उिचत समझे वैसा आदेश दे’’ आदेश 9 ारा उस ओर से िनदिशत तर क म से एक को अपनाने क े वक प क े प म ह । आदेश 17 िनयम 3 (ख) क े तहत, अदालत क े िलए एकमा रा ता िनयम 2 क े तहत आगे बढ़ना है, जब कोई प अनुप थत हो । इसका प ीकरण यायालय को िनयम 3 क े तहत आगे बढ़ने का ववेकािधकार देता है, भले ह कोई प अनुप थत हो । ले कन इस तरह क े माग को क े वल तभी अपनाया जा सकता है जब अनुप थत प पहले ह सा य या उसक े एक अहम ह से का नेतृ व कर चुका हो । य द थित ऐसी नह ं है, तो यायालय क े पास िनयम 2 म दए गए अनुसार आगे बढ़ने क े अलावा कोई वक प नह ं है । िनयम 2 और 3 अलग-अलग और अलग-अलग प र थितय म काम करते ह । िनयम 2 तब लागू होता है जब थगन आम तौर पर दया जाता है और कसी वशेष उ े य क े िलए नह ं । दूसर ओर, िनयम 3 वहां काम करता है जहां िनयम म उ ल खत उ े य म से एक क े िलए थगन दया गया है । जब क िनयम 2 िन द तर क म से एक म वाद क े िनपटारे क बात करता है, िनयम 3 यायालय को वाद पर तुरंत फ ै सला करने का अिधकार देता है । तथा प, दोन िनयम क े बीच बुिनयाद अंतर यह है क पहले वाले म, कोई भी प सुनवाई म उप थत होने म वफल रहा है, जब क बाद वाले म प ने तथा प उप थत होने क े बावजूद कसी एक या अिधक गणना कए गए यित म को कया है । िनयम 2 और िनयम 3 क े प ीकरण का संयु भाव यह है क यायालय को ववेकािधकार दान कया गया है । द श अनुमत है और अिनवाय नह ं है । प ीकरण एक मा य ावधान क कृ ित म है, जब द गई प र थितय म, अनुप थत प को उप थत माना जाता है ।

10. प ीकरण म मह वपूण अिभ य "जहां सा य अथवा कसी प क े सा य का एक अहम ह सा" है । वहाँ इस वधायी अिभ य म एक सकारा मक उ े य है । इसका प अथ यह ह क अिभलेख पर मौजूद सा य अनुप थत प क े ख को सा बत करने और वाद क े िनपटारे क े िलए पया है l अनुप थत प को इस प उ े य क े िलए उप थत माना जाता है । यायालय प ीकरण क े तहत काय करते हुए मामले म आगे बढ़ सकता है य द वह थम या थित है । अदालत को इस आव यक पहलू क े बारे म येक मामले क े त य पर संतु होना होगा । यायालय क े िलएउस प र े य म अपनी संतु दज़ करना भी अिनवाय होगा। यह नह ं कहा जा सकता है क प ीकरण को े िलए सा य या सा य क े अहम ह से क आव यकता बना कसी उ े य क े है । य द अिभलेख पर सा य वाद क े िलए पया है, तो वाद को थिगत करने अथवा िनणय को टालने क कोई आव यकता नह ं ह । "

43. ितवाद भय करम पच मा बनाम क े. ीरामुलु, एआईआर 1918 मैड 143 (एफबी) म म ास उ च यायालय क े पूण यायपीठ क े िनणय और म रयािनसा बनाम रामकलपा गोरिसन, आईएलआर 34 क ै ल 235 म कलक ा उ च यायालय का िनणय, गोपी कशन बनाम रामू, एआईआर 1964 राज 147 म राज थान उ च यायालय और िश म पा इर पा िशवांगी बनाम बसिलंग पा क ु शनापा क ुं भार, एआईआर 1943 बॉ बे 321:1943 एससीसी ऑनलाइन बीओएम 16: आईएलआर 1944 बॉ बे 1 (एफ बी) म बॉ बे उ च यायालय क पूण याय पीठ पर वचार कया गया।

44. गोपी कशन (उपयु ) क े मामले म राज थान उ च यायालय क पूण पीठ ने िन निल खत ट पणी क ः- "8. ितवाद भय करम पच मा बनाम कािमसे ट ीरामुलु, एआईआर 1918 मैड 143 (एफबी) म म ास उ च यायालय क पूण यायपीठ ने अिभिनधा रत कया है क िस वल या सं हता क े आदेश XVII क े िनयम 2 और 3 पर पर अन य ह । जहां िनयम 2 क शत को पूरा कया जाता है, भले ह िनयम 3 ारा प रक पत प र थितयां मौजूद ह और लागू ह, िनयम 2 को लागू कया जाना चा हए । जन कारण से व ान यायाधीश को यह वर यता देने क े िलए राजी कया गया, वे ह क जब कोई प उप थत होने क े साथ-साथ सा य तुत करने या कोई ऐसा काय करने म वफल रहा है जसक े िलए उसे समय दया गया था, तो प क अनुप थित म यह मान लेना अ यायपूण होगा क सा य तुत करने या काय करने म उसक वफलता अनुिचत थी य क वह अनुप थत था और इसिलए, सा य तुत करने म या मुकदमे क गित को आगे बढ़ाने म काय करने म अपनी वफलता क े िलए कोई प ीकरण देने म असमथ था । सा या ने मांग क क यायालय को मामले को क े वल अनुप थत का मानते हुए आदेश XVII िनयम 2 िस वल या सं हता क े तहत आगे बढ़ना चा हए । म ास उ च यायालय क इस पूण यायपीठ क े सद य सी. जे. वािलस ने तथा प एक अलग वचार य कया क िनयम 2 और 3 पार प रक प से अन य नह ं थे । एम. अगैया बनाम मोह मद अ दुल कर म, ए आईआर 1961 आं देश 201 आं देश उ च यायालय का एक पूण यायपीठ का िनणय है, जसने ा-ितवाद क े मामले, एआईआर 1918 म ास 143 (2) (एफबी) म म ास उ च यायालय ारा िलए गए कोण को अपनाया है । आं देश उ च यायालय ने अ य उ च यायालय क े फ ै सल का उ लेख नह ं कया है ज ह ने वपर त कोण अपनाया है । मा ा युन बनाम मा, आये िमंट, एआईआर 1937 रंगून 437, म रंगून उ च यायालय, नागपुर उ च यायालय ने िभओराज जेठमल बनाम जनादन म नागोराव; एआईआर 1933 नागपुर 370 म और भोपाल क े याियक आयु क े यायालय हशमत राय बनाम लाल चंद, ए. आई. आर. 1952 भोपाल 43 ने म ास उ च यायालय क े समान कोण अपनाया है ।

9. कलक ा उ च यायालय ारा िलया गया दूसरा कोण मा रयािन सा बनाम रामकलपा गोिसन, आई. एल. आर. 34 कलक ा 235 म िस वल या सं हता, 1882 क धारा 157 और 158 क े बीच संबंध पर वचार कया गया, जो 1908 क िस वल या सं हता क े मशः आदेश XVII िनयम 2 और 3 क े अनु प है और यह वचार य कया क धारा 158 क े अनु योग क े िलए साम ी का अ त व आव यक था जो आदेश XVII क े िनयम 3 क े अनु प है । इस मामले म मु े तैयार कए गए और विभ न थगन क े बाद मामला 10 माच, 1905 को सुनवाई क े िलए आया । वाद ने गवाह क े िलए या मांगी और ा क, ले कन चूं क वे मुकदमे क े िलए िनधा रत ितिथ पर पेश नह ं हुए, इसिलए वाद ने उनम से एक क े िलए िगर तार वारंट जार करने का अनुरोध कया । इस आवेदन को अ वीकार कर दया गया था । वाद क े अिधव ा ने यायालय को सूिचत कया क उसक े पास मामले म पेश होने क े िलए आगे कोई िनदश नह ं ह और अधीन थ यायाधीश ने अिभयोजन क े अभाव म वाद को खा रज कर दया । जब वाद ने धारा 102 (आदेश IX िनयम 8) क े तहत बखा तगी क े आदेश को र करने क े िलए आवेदन कया तो ितवाद ने ारंिभक आप जताई क वाद धारा 102 क े तहत नह ं ब क धारा 158 (आदेश XVII िनयम 3) क े तहत खा रज कया गया था और इसक े प रणाम व प वाद का उपचार समी ा क े िलए था न क बहाली क े िलए । अंततः वाद ने उ च यायालय म अपील क । व ान यायाधीश ने कहा,-- "यह प है क धारा 157 का दायरा धारा 158 से काफ अलग है । धारा 158 एक ऐसे मामले पर वचार करती तीत होती है जसम यायालय क े सम वाद क े िनणय पर आगे बढ़ने म स म बनाने क े िलए साम ी है ।…….. धारा 158 म जो ावधान कया गया है, वह यह है क कसी प ारा उसे जो िनदश दया गया था, उसक े िन पादन म यित म करने क े मा त य से वाद क े वाद को खा रज नह ं कया जाएगा, य द वह यित म करने वाला प कार था, या ितवाद क े खलाफ दावे क ड, य द ितवाद वह य था, जसने यित म क थी; श द ' वतः यित म क े बावजूद' प प से इंिगत करते ह क यायालय को यित म क े बावजूद वाद क े िलए ऐसी साम ी क े आधार पर आगे बढ़ना है उसक े सम मौजूद ह । दूसर ओर, धारा 157 वाद क े िनपटारे क बात करती है, और िन संदेह ऐसे मामले शािमल करती ह जनम यायालय क े सम गुणागुण पर िनणय देने म स म बनाने क े िलए कोई साम ी नह ं हो सकती है, उदाहरण क े िलए, य द धारा 97, 98, 99 खंड (क) और 102 म वचार क गई घटना, य प, य द धारा 100, खंड (क) म उ ल खत आक मकता होती है, तो यायालय क े सम साम ी होगी, और गुणागुण पर िनणय होगा ।……………. "

45. िशवराम पा इर पा िशवांगी (उपयु ) मामले म बॉ बे उ च यायालय क े पूण यायपीठ क े फ ै सले पर भी वचार कर सकते ह जहां िन निल खत अिभिनधा रत कया गया था:- "आदेश III, िनयम 1 म प कारगण क उप थित क े बारे म सामा य ावधान यह है क कोई प य गत प से या कसी मा यता ा अिभकता ारा अथवा उसक ओर से उप थत होने, आवेदन करने या काय करने वाले अिधव ा ारा उप थत हो सकता है । इ ह कानून क े कसी भी अ य प ावधान क े अधीन बनाया जाता है । ऐसा प ावधान आदेश 5, िनयम 1 म है, जहां एक ितवाद ारा पेश होने का तर का या तो (क) य गत प से, या (ख) एक अिधव ा ारा विधवत िनदश दया गया है और वाद से संबंिधत सभी भौितक का उ र देने म समथ है, या (ग) ऐसे सभी का उ र देने म समथ कसी य क े साथ एक अिधव ा ारा कहा गया है । पहली अनुसूची क े प सं या 1 और 2 प रिश ख म दए गए स मन प म भी वह िनदश ह । जहाँ, इसिलए, ितवाद य गत प से उप थत नह ं होता है और उसक े अिधव ा को िनदश देने क े िलए कोई और नह ं है, क े वल एक य जसक े ारा उप थत होने क े िलए कहा जा सकता है वह एक अिधव ा है जसे विधवत िनदश दया जाना चा हए और सभी भौितक का उ र देने म समथ होना चा हए । अतः, य द वाद सुनवाई क े कसी भी दन यायालय म उप थत होता है, ले कन उसे इस बारे म कोई िनदश नह ं है क मामले को क ै से आगे बढ़ाया जाए, तो ितवाद क उप थित नह ं होती है । या कसी वाद को विधवत िनदश दया जाता है, यह त य का है, ले कन य द वह इस आधार पर मुकदमे म भाग लेने से इनकार करता है क उसक े पास कोई िनदश नह ं है और फर थगन क े िलए आवेदन करने क े बाद या कए बना मामले से पीछे हट जाता है, तो ितवाद क े खलाफ आगे क सभी कायवाह एकतरफा हो जाती है । य द इसक े बाद यायालय वाद को सा य देने क े िलए कहता है और फर उसक े प म एक ड पा रत करता है, तो इसे एक एकतरफा ड माना जाना चा हए । ितवाद तब आदेश IX, िनयम 13 क े तहत इसे अलग करने क े िलए आवेदन करने क े िलए वतं होगा……’’

46. गोपी कशन (उपयु ) म राज थान उ च यायालय क पूण यायपीठ ने एक उदाहरण दया क आदेश 17 का िनयम 2 अथवा िनयम 3 कब लागू होगा । हम पूण यायपीठ क ासंिगक ट प णय को िन नानुसार उ ृत करते ह:- "18. िनयम 2 यायालय को, कसी प क े अनुप थित होने क थित म, आदेश 9 ारा िनदिशत तर क म से कसी एक म वाद का िनपटारा करने या ऐसा अ य आदेश देने का ववेकािधकार दान करता है जो वह उिचत समझता है । तथा प, िनयम 3 म ऐसी थित क प रक पना क गई है जहां एक प जसे सा य तुत करने या वाद क आगे क गित क े िलए आव यक कसी अ य काय क े दशन क े िलए समय दया गया है और ऐसा प सा य तुत करने या उस काय को करने म वफल रहता है जसक े िलए यायालय को अनुमित द गई हो इस तरह क े यित म क े बावजूद वाद पर तुरंत फ े िलए आगे बढ़ । जब कोई प कार जसे सा य तुत करने या कसी अ य काय क े िन पादन क े िलए समय दया गया है, वह भी कट नह ं होता है तो यह प प से दोहरे यित म का मामला है । प कार न क े वल वह करने म वफल रह है जसक े िलए उसे समय दया गया था, ब क वह उप थत होने म भी वफल रह है । हमार राय म यह दोहरे यित म मामले को आदेश XVII िनयम 3 क े दायरे से दूर नह ं करती है । हम पूण यायपीठ म ास मामले म द गई या या से सहमत नह ं ह क िनयम 2 और 3 पर पर अन य ह । हमारे सामने भी ऐसे मामले हो सकते ह, जनम कसी प को सा य तुत करने क े िलए समय दया गया था, ले कन प न क े वल सा य तुत करने म वफल रहा, ब क खुद भी अनुप थत रहा और यह नह ं कहा जा सकता है क आदेश XVII िनयम 3 ऐसे मामले म लागू नह ं हो सकता है।

19. विभ न कारण से कलक ा उ च यायालय क े कोण को अपनाने वाले िनणय क एक लंबी ृंखला म यह माना गया है क आदेश XVII िनयम 3 क े तहत एक वाद पर िनणय लेने क े िलए साम ी का अ त व आव यक है । अिधिनयम क भाषा प प से साम ी क े अ त व को इसक े अनु योग क े िलए एक आव यक शत क े प म इंिगत नह ं करती है । यह या या प प से 'िनणय' श द से भा वत हुई है जसका अथ है गुणागुण पर िनणय लेना । रामकरन क े मामले म, आईएलआर (1953) 3 राज 798 इस यायालय क े व ान यायाधीश ने िस वल या सं हता क े आदेश XX िनयम 4 क े ावधान ारा यह मानने क े िलए भा वत महसूस कया क साम ी का अ त व आव यक था और य क क े वल अिभवचन और मु े रकॉड पर थे, उ ह ने राय द क बखा तगी को आदेश XVII िनयम 2 क े तहत एक माना जाना चा हए । दूसर ओर, अमरिसंह क े मामले, 1953 राज एलड यू 365 म, व ान यायाधीश का वचार था क जहां वाद वाद म उस पर लगाए गए बोझ का िनवहन करने म वफल रहा, तो ता कक िन कष यह था क वाद को खा रज कर दया जाना चा हए चाहे साम ी मौजूद हो या नह ं । कसी भी िनणय ने आदेश XVII िनयम 3 क े संचालन क े िलए आव यक साम ी क सट क मा ा को इंिगत करने का यास नह ं कया है । इस तरह क े काय क क ठनाई क सराहना करना सरल है । विभ न कार क े मामल और थित क ज टलताओं म सावभौिमक िनयम का िनमाण एक ऐसा काय है जसे ा करना आसान नह ं है । संक े त, ‘’तथा प रामकरण क े मामले, आईएलआर (1953) 3 राज 798 म ह क साम ी का अथ रकॉड पर 'सा य' हो सकता है । इसक े बाद जो प सवाल उठता है वह यह है क या सा य का अभाव आदेश XVII िनयम 3 क यो यता को पूर तरह से बाहर कर सकती है? इस तरह क े यापक ताव को िनधा रत करना मु कल है । आदेश XVII िनयम 3 का इरादा जैसा क देखा गया है क एक प सा य तुत करने या वाद क गित को आगे बढ़ाने क े िलए क ु छ करने क े िलए समय मांगता है और दोन म से कसी एक को करने म चूक करता है, एक यायालय वाद का तुरंत फ ै सला कर सकता है । हमारे वचार से, यह कहना बहुत यापक है क कसी भी मामले म जहां सा य का नेतृ व नह ं कया गया है, िनयम 3 लागू नह ं होगा । पर ण यह होना चा हए क या वह यायालय जसक े सम वाद साम ी क े आधार पर लं बत है, वाद पर तुरंत िनणय लेने क थित म है, इसक े बावजूद क कोई प कार यित म म है । प कारगण क े अिभवचन और उनसे उ प न होने वाले मु े क ु छ मामल म यायालय को वाद पर तुरंत िनणय लेने म स म बना सकते ह । मान ली जए क एक वचन प पर एक वाद म जसक े िन पादन से ितवाद ारा इनकार नह ं कया गया है और ितवाद सा य तुत करने क े िलए समय मांगने पर वचार करने का अनुरोध करता है । समय क अनुमित दे द जाती ले कन वह सा य पेश करने म चूक करता है । या पर ा य िलखत अिधिनयम क धारा 118 म िन हत कानूनी अनुमान को यान म रखते हुए मुकदमे का फ ै सला नह ं कया जा सकता है? एक वपर त मामले म ितवाद िन पादन से इनकार करता है और वाद को िन पादन सा बत करने क े िलए समय दया जाता है और वह चूक करता है । या वाद का िनणय वाद ारा उस पर रखे गए सबूत क े बोझ का िनवहन करने म कए गए यित म क े आधार पर नह ं कया जा सकता है? पहले ांत म शायद यह कहा जा सकता है क वचन प िन पादन, जसक े बारे म वीकार कया गया है, सबूत का गठन करता है और िनयम 3 क यो यता को े िलए रकॉड पर साम ी है । दूसरे ांत म; तथा प, िन पादन को वीकार नह ं कया गया है, प प से कोई सा य नह ं है । वाद अपना कत य िनभाने म वफल रहता है । या हम कह सकते ह क वाद का िनपटारा आदेश XVII िनयम 2 क े अनुसार आदेश IX क े अनुसार कया जाना चा हए? इसका उ र प प से नकारा मक है य क आदेश IX क े तहत प रक पत प र थितयाँ ांत म द गई थितय से अलग ह । या यह कहा जा सकता है क यायालय ऐसा अ य आदेश पा रत कर सकता है जो वह आदेश 17 क े िनयम 2 म िनधा रत करता है? ऐसा आदेश इस तरह क थित म वाद क अनुप थित क े िलए मामले को थिगत करने क े अलावा और क ु छ नह ं हो सकता है । इसिलए, य द वाद अवसर दए जाने क े बावजूद अिभवचन और प रणामी मु को देखते हुए उस पर लगाए गए बोझ का िनवहन करने म वफल रहता है, तो मामले को उसक े सा य क े अनंत काल तक थिगत नह ं कया जा सकता है और कसी न कसी तर पर यायालय को सा य क े अभाव म इसका िनणय लेना पड़ता है । यहाँ तक क एक ववा दत वाद म भी कभी-कभी सा य क े अभाव म मु का फ ै सला कया जाता है और इसी तरह पूरे वाद म भी हो सकता है । इसिलए, हमार राय म साम ी क े अ त व का मतलब आव यक प से सा य का अ त व नह ं है । य द कसी वाद का िनणय उसक े सम साम ी पर सा य क कमी क े बावजूद कया जा सकता है तो आदेश XVII िनयम 3 को मामले को िनयं त करने क े िलए कहा जा सकता है । अिभलेख पर साम ी को तकनीक अथ देने और सा य क े बराबर करने क आव यकता नह ं है । येक मामले क प र थितयाँ यायालय म िन हत ववेकािधकार क े योग को विनयिमत करगी । यह यायालय को अपने ववेकािधकार का योग करना है और बना अ प ता क े यह इंिगत करना है क वह आदेश XVII िनयम 3 क े तहत अपनी श य का योग कर रहा है या नह ं । यह सह है क िनयम 3 का आवेदन एक चूक करने वाले प क े भ व य क े उपाय को ितबंिधत करता है और एक स त ावधान है, और इसिलए, इसे सावधानी और याियक संयम क े साथ लागू कया जाना चा हए, इसिलए रामकरन क े मामले, आईएलआर (1953) 3 राज 798 को उपरो संशोधन क े साथ पढ़ा जाना चा हए । तथा प, अमरिसंह क े मामले, 1953 राज एलड यू 365 म अपनाए गए तक को कोई अपवाद नह ं माना जा सकता है ।

47. इस कार पूण यायपीठ ने यह वचार य कया क य द वाद अवसर दए जाने क े बावजूद अिभवचन और प रणामी मु क े म ेनजर उस पर लगाए गए बोझ का िनवहन करने म वफल रहता है, तो मामले को उसक े सा य क े अनंत काल तक थिगत नह ं कया जा सकता है और यायालय को कसी न कसी तर पर सा य क े अभाव म िनणय लेना चा हए । पूण याय पीठ ने यह वचार य कया क साम ी क े अ त व का मतलब आव यक प से सा य का अ त व नह ं होगा । य द वाद का िनणय उसक े सम मौजूद साम ी पर सा य क कमी क े बावजूद कया जा सकता है, तो ऐसी प र थितय म िस..सं. का आदेश 17 िनयम 3 मामले को िनयं त करेगा ।

48. राज थान उ च यायालय ारा द गई उपरो उ काश चंदर मनचंदा बनाम जानक मनचंदा, (1986) 4 एससीसी 699, क े मामले म इस यायालय क े फ ै सले क े वपर त तीत होती है, जसम इस यायालय ने िन निल खत प म पाया:- "6. …….यह प है क ऐसे मामल म जहां कोई प अनुप थत है, क े वल िनयम 2 क े तहत आगे बढ़ने क े िलए आदेश 17 (3) (ख) म उ ल खत माग है । इसिलए यह प है क ितवाद क अनुप थित म म, यायालय क े पास िनयम 2 क े तहत आगे बढ़ने क े अलावा कोई वक प नह ं था, इसी तरह िनयम 2 क भाषा जो अब है, यह भी प प से बताती है क य द कोई भी प कार उप थत होने म वफल रहता है, तो यायालय को आदेश 9 क े तहत िनदिशत तर क म से एक म वाद का िनपटारा करने क े िलए आगे बढ़ना होगा । िनयम 2 का प ीकरण यायालय को िनयम 3 क े तहत आगे बढ़ने का ववेकािधकार देता है, भले ह कोई प अनुप थत हो, ले कन यह ववेकािधकार क े वल उन मामल म सीिमत है जहां एक प जो अनुप थत है, ने क ु छ सा य का नेतृ व कया हो अथवा उनक े सा य क े अहम ह से क जांच क हो । इसिलए यह प है क य द कसी िन त ितिथ पर कोई एक प अनुप थत रहता है और उस प क े िलए उस ितिथ तक कसी भी सा य क जांच नह ं क गई है, तो यायालय क े पास िस वल या सं हता क े आदेश 9 क े तहत िनधा रत तर क म से कसी एक म आदेश 17 िनयम 2 क े अनुसार मामले का िनपटारा करने क े िलए आगे बढ़ने क े अलावा कोई वक प नह ं है । इसिलए यह प है क िस वल या सं हता क े आदेश 17 िनयम 2 और 3 म इस संशोधन क े बाद कोई संदेह नह ं है और इसिलए कसी भी ववाद क कोई संभावना नह ं है । मामले क े इस कोण से यह प है क जब 30 अ टूबर 1985 को वतमान मामले म जब मामला बुलाया गया था, तो ितवाद क े िलए कोई भी उप थत नह ं था । यह भी प है क उस तार ख तक वाद का सा य दज कया गया है ले कन ितवाद क े िलए कोई सा य दज नह ं कया गया था । ितवाद को क े वल इस तार ख या पहले क तार ख को शु करना था जब मामला थिगत कर दया गया था । इसिलए यह प है क 30 अ टूबर, 1985 क तार ख तक जब वचारण यायालय ने ितवाद का मामला समा कर दया था, तब तक ितवाद क ओर से कोई सा य रकॉड म नह ं था । इसिलए मामले क े इस कोण म आदेश 17 िनयम 2 का प ीकरण ब क ु ल भी लागू नह ं था । जा हर तौर पर जब ितवाद अनुप थत था आदेश 17 िनयम 2 ने क े वल यायालय को आदेश 9 क े तहत दान कए गए कसी भी तर क े से मामले का िनपटारा करने क े िलए आगे बढ़ने क अनुमित द ।

7. यह भी प है क आदेश 17 िनयम 3 जैसा क यह है, इस मामले क े त य पर लागू नह ं था य क उस तार ख को जब ितवाद का सा य समा कया गया था, कोई भी ितवाद क ओर से पेश नह ं हुआ था । मामले क े इस कोण म इस बात पर ववाद नह ं कया जा सकता क यायालय ने जब गुणागुण क े आधार पर वाद का िनपटारा करने क े िलए आगे बढ़ा तो एक ु ट क थी । दुभा य से समी ा आवेदन पर भी, व ान वचारण यायालय आदेश 17 िनयम 2 और 3 क े बारे म ववाद म चला गया जो संशोधन से पहले मौजूद था और समी ा आवेदन को खा रज कर दया और अपील पर, उ च यायालय ने भी दुभा य से एक श द से सीिमत अपील को खा रज कर दया ।‘’

49. इस कार काश चंदर मनचंदा (उपयु ) म इस यायालय ारा अिधकिथत उ यह है क सा य अभाव म भी िनयम 3 क े तहत आगे बढ़ना यायालय क े ववेकािधकार क े भीतर होगा, ले कन ऐसा ववेकािधकार क े वल उन मामल म सीिमत है जहां एक प जो वरोध कर रहा है उसने क ु छ सा य का नेतृ व कया है अथवा पया भाग क जांच क है ।

50. आइए हम इस यायालय ारा िनधा रत उपरो उ को वतमान मामले क े त य पर लागू कर । मामले म, पहली बेदखली यािचका दायर कए जाने क े बाद, ितवा दय ने मकान मािलक और करायेदार क े संबंध से इनकार करते हुए अपना िल खत बयान दायर कया । िल खत बयान क े रकॉड म आने क े बाद, वाद ारा आगे कोई सबूत नह ं दया गया । जो क ु छ भी अिभलेख म था वह वादप म अिभवचन क े प म था । अित र कराया िनयं क का वचार था क िल खत बयान क े रकॉड म आने क े बाद, यह वाद का कत य था क वह मकान मािलक करायेदार क े संबंध को था पत या सा बत करे और कोई सबूत पेश करने म वफल रहने क े बाद, मुकदमा खा रज होने यो य था और तदनुसार खा रज कर दया गया था । उ च यायालय ने अित र कराया िनयं क क े आदेश क या या या यूँ कहे क आदेश 17 क े िनयम 3 क े तहत एक आदेश क े प म या या क और इसिलए, यह वचार कया क मकान मािलक और े संबंध क े संबंध म िन कष को गुणागुण क े आधार पर कहा जा सकता है ।

51. हम डर है क उ च यायालय ने यह वचार रखने म ु ट क क अित र कराया िनयं क ारा पा रत आदेश को िस.. सं. क े आदेश 17 क े तहत श य का योग करते हुए पा रत कया गया आदेश कहा जा सकता है ।

52. िस..सं. क े आदेश 17 क े तहत अदालत को कसी प क े यित म क े गुणागुण पर वाद का फ ै सला करने क श एक कठोर श है जो िनवारण क े िलए असफल प क े उपचार को गंभीर प से ितबंिधत करती है । इसका उपयोग क े वल असाधारण मामल म ह कया जाना चा हए । मामले क गित से जुड़ कसी भी चीज़ क े िलए सहयोग करने क तैयार क े बना भौितक उप थित गुण-दोष क े आधार पर वाद का िनणय लेने म कोई उपयोगी उ े य पूरा नह ं करती है और यह अभाव से भी बदतर है । कसी भी आक मकता म, मशः िनयम 2 या 3 का सहारा लेने या यित म क े बावजूद िनयिमत प से वाद पर िनणय लेने क े िलए थगन देने का ववेकािधकार हमेशा यायालय क े पास होता है । िनयम 2 और 3 मशः क े वल ावधान को स म कर रहे ह । गुणागुण क े आधार पर वाद का िनणय करने क े िलए क े वल िनयम 3 म उ ल खत शत का अ त व ह पया नह ं होगा । गुणागुण पर िनणय लेने क े िलए क ु छ साम ी होनी चा हए, भले ह साम ी क तकनीक प से सा य क े प म या या नह ं क जा सकती है । कभी-कभी ऐसे मामल म िनणय अिभवचन, द तावेज और सबूत क े बोझ क े आधार पर हो सकता है । फर भी, यायालय क े िलए यह सराहनीय है क वह िनणय ारा यह इंिगत करे क िनणय यित म क े िलए है या गुणागुण क े आधार पर है । िनयम 3 ारा तय कए गए मामल म या िनयम 2 क े प ीकरण म यायालय का एकमा वक प क े वल गुणागुण पर िनणय लेना नह ं है । य द ऐसी या या द जाती है, तो यह उस य क े िलए एक अनुिचत वर यता होगी जो जानबूझकर अनुप थत रहता है, उस य क तुलना म जो तुत करता है ले कन मामले को आगे बढ़ाने म असमथ है । 'आ वभाव' और 'उप थित' क े अ छ तरह से मा यता ा अथ ह । वे य गत प से या मामले क े संचालन क े उ े य से उिचत प से अिधकृ त अिधव ा ारा उप थित का संक े त देते ह । िनयम 3 क े वल तभी लागू होता है जब उप थित मामले क े साथ आगे बढ़ने क े िलए होती है, ले कन िनयम 2 म उ ल खत तीन तर क म से कसी एक म यित म कया जाता है या िनयम 2 का प ीकरण उ रत कया जाता है । वे ऐसे मामले ह जनम यायालय क े पास गुणागुण क े आधार पर मामले का फ े िलए क ु छ साम ी है न क ऐसे मामले जहां िनणय क े वल यित म क े िलए हो सकता है । यह मशः िनयम 2 और 3 क े संयु अ ययन और प ीकरण से प है । इस मामले म, इनम से कोई भी शत मौजूद नह ं थी और िनणय प प से यित म क े िलए था । क े वल िनयम 2 लागू होता है । (देखे: आर. रवीं न बनाम एम. राजमा णकम, 2006 एससीसी ऑनलाइन म ास 169)

53. इस िनणय क े पैरा 8 म िन द कराया िनयं क ारा दनां कत 27.01.1998 ारा पा रत आदेश का भी एक अलग कोण है । आइए हम एक बार फर कराया िनयं क ारा पा रत आदेश को बार क से पढ़ । आदेश दो भाग म है । पहले भाग म कराया िनयं क कहता है क वाद का अिधव ा मौजूद है । फर, वह यह देखने क े िलए आगे बढ़ता है क वाद क े अिधव ा ने एक बयान दया क आज कोई गवाह नह ं आया है और न ह उ ह बुलाया गया है । कराया िनयं क ने आगे कहा क कसी भी आधार पर आगे क े थगन क े िलए अनुरोध नह ं कया गया है । इसक े बाद, वह कहता है क वाद को अंितम अवसर 09.09.1997 पर और उसक े बाद 01.11.1997 पर दया गया था । तथा प, वाद ने अपने गवाह को बुलाने क परवाह नह ं क । ऐसी प र थितय म कराया िनयं क ने बेदखली यािचका क कायवाह बंद कर द । कराया िनयं क ारा दनां कत 27.01.1998 आदेश म उपयोग कए गए सट क श द ये ह◌ः "इस कार या.सा समा कर दया जाता है ।’’ आदेश क े दूसरे भाग म, कराया िनयं क इसक े बाद यह देखने क े िलए आगे बढ़ता है क चूं क मकान मािलक- करायेदार का संबंध ववाद म है और वाद इस तरह क े िलए कोई सबूत पेश करने म वफल रहा है, इसिलए उसे सबूत दज करने क े िलए मामले को आगे बढ़ाने का कोई अ छा कारण नह ं िमला । ऐसी प र थितय म, उ ह ने बेदखली यािचका को खा रज कर दया, य क कहा जा सकता है क वाद अपना मामला था पत करने म वफल रहा है । अंत म, उ ह ने पाया क फाइल े षत क जाए ।

54. मामले क सुनवाई क े चरण म, िस..सं. का आदेश 17 लागू हुआ । उस आदेश क े तहत थिगत सुनवाई क तार ख पर, य द कोई प अनुप थत था, तो यायालय या तो आदेश 9 क े तहत काय करेगा या अ यथा जैसा वह उिचत समझेगा; अथवा य द कोई प मौजूद था ले कन उसने सबूत पेश नह ं कया, तो वह सबूत क े लाभ क े बना वाद का तुरंत फ े िलए आगे बढ़ेगा । यह अंितम बात इस बात क े समान है क यायालय को यह कहना था क वाद पूण प से अथवा आंिशक प से सा बत हुआ था या नह ं और तदनुसार ड पा रत करना था ।

55. ववादा पद सवाल यह है क या बेदखली यािचका को यित म क े िलए खा रज कर दया गया था, जो बखा तगी िन त प से कायवाह क े उसी कारण पर था पत होने पर एक नया वाद रोक देगी। जन श द को हमने ऊपर उ ृत कया है, उनका िन त प से मतलब यो यता अथवा यित म पर बखा तगी नह ं है । हमारे सामने यह तक दया गया था क आदेश को क े वल इस अथ म िलया जाना चा हए क आदेश 17 क े तहत आदेश संभवतः या हो सकता है और क ु छ और नह ं । हम इस तरह क े तुितकरण से भा वत नह ं ह । आदेश का उ े य यित म क े िलए अथवा गुणागुण क े आधार पर बखा तगी नह ं था और इसका अथ इसक े अलावा कोई अ य नह ं िलया जा सकता है क यह या था । यह सामा य पदावली म है; कानूनी पदावली म नह ं और इसे इसक े सामा य अथ से अलग नह ं कया जा सकता है। इसका सामा य अथ यह है क कायवाह बंद कर द गई थी और वाद को लं बत नह ं माना जाएगा । बाद का ववरण अनाव यक होगा य द आदेश वाद क े अंितम िनपटान म से एक था । आदेश का उ े य वाद का अंितम िनपटान नह था । इसने क े वल कायवाह को रोक दया । इससे यादा क ु छ नह ं कया । यह िस..सं. क े आदेश 9 िनयम 8 और आदेश 17 िनयम 3 क े उ तर क े अथ क े भीतर वाद का अंितम िनणय नह ं है ।

56. प रणाम व प, अपील सफल हो जाती है और इसक े ारा इसक अनुमित द जाती है । इसिलए आ े पत िनणय और ड को दर कनार कर दया जाता है । इसम दो बात जोड़ने क ज रत नह ं है । सबसे पहले, हमने पूव- याय क े िस ांत क यो यता या अ यथा या उस मामले क े िलए लं बत वाद म कसी अ य ववादा पद मु े क े स ब ध म वरोधी दलील पर कोई राय य नह ं क है । दूसरा, इस िनणय म कहा गया क ु छ भी संबंिधत ितवाद गण को ारंिभक मु े क े प म इस तरह क े मु े पर िनणय लेने क े िलए यायालय से अनुरोध करने से नह ं रोक े गा । इस तरह क े आवेदन पर प प से इसक े गुणागुण क े आधार पर िनणय िलया जाएगा, जसक े बारे म भी हमने कोई राय य नह ं क थी । वाद को पुनज वत कया जाता है ।

57. लागत क े बारे म कोई आदेश नह ं होगा ।

58. लं बत आवेदन, य द कोई हो, का भी िनपटारा कर दया जाता है । ………………………..... या. (सुधांशु धूिलया) ………………………...... या. (जे. बी. पारद वाला) नई द ली; 29 माच, 2023 Translation has been done through AI Tool: SUVAS) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language is meant for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purpose. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation. अ वीकरण: देशी भाषा म िनणय का अनुवाद मुक ेबाज़ क े सीिमत योग हेतु कया गया है ता क वो अपनी भाषा म इसे समझ सक एवं यह कसी अ य योजन हेतु योग नह ं कया जाएगा| सम त कायालयी एवं यावहा रक योजन हेतु िनणय का अं ेज़ी व प ह अिभ मा णत माना जाएगा और काया वयन तथा लागू कए जाने हेतु उसे ह वर यता द जाएगी।