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ितवे
भारतीय सव च यायालय म
िस वल अपीलीय अिधका रता
िस वल अपील सं या 2012/2013
ी राक
े श रमन ... अपीलाथ
बनाम
ीमती क वता ... यथ
िनणय
या.,सुधांशु धूिलया,
JUDGMENT
1. यह अपील हंदू ववाह अिधिनयम, 1955 क धारा 13 (इसक े बाद "अिधिनयम" क े प म संदिभत) क े तहत अपीलाथ ारा अित र जला यायाधीश (उ र), तीस हजार यायालय, द ली क े यायालय म शु क गई तलाक क कायवाह से शु हुई है। उनक े वाद का िनणय कया गया और दनांक पृ सं. 2 02.05.2009 को अित र जला यायाधीश (उ र) क े आदेश ारा ववाह को भंग कर दया गया। इसक े बाद यथ /प ी ने द ली उ च यायालय क े सम अपील दायर क, जसने वचारण यायालय क े आदेश को र कर दया और पित क यािचका खा रज कर द । उ आदेश से असंतु, अपीलाथ /पित ने इस यायालय क े सम एक वशेष अनुमित यािचका दायर क है, जसम 26.02.2013 को अनुमित द गई थी।
2. अपीलाथ और यथ क शाद 16.04.1994 को द ली म हंदू र ित- रवाज से हुई थी। अफसोस क बात है क उनक े वैवा हक जीवन म वैवा हक कलह पनपने म देर नह ं लगी। अपीलाथ का कहना है क उसक प ी अपने छोटे से घर म खुश नह ं थी, और प ी ने उसक े खलाफ घृणा पद, यहां तक क अपमानजनक भाषा इ तेमाल क । यह भी आरोप लगाया गया है क िसतंबर, 1994 म, उसने अपने पित को बना कसी भी पूव सूचना क े अपना गभपात कराया (इस आरोप को प ी ने नकार दया था और यह उसक े खलाफ कभी सा बत नह ं हो सका)। िसतंबर 1994 म, फर से उसने अपना वैवा हक घर छोड़ा, ले कन शुभिचंतक और र तेदार क े कए गए यास क े कारण, वे (दोन ) माच 1995 से एक साथ रहने लगे। ऐसा फर से लंबे समय तक नह ं चल पाया, 16.02.1998 को उसने अपना वैवा हक घर छोड़ दया, और 16/17.02.1998 को पृ सं. 3 थानीय पुिलस म िशकायत दज कराई। माच 1998 म, वह इस शत पर अपने पित क े साथ रहने क े िलए राज़ी हो गई क अपीलाथ दूसरा आवास लेगा और प रणाम व प अ ैल, 1998 म एक और घर कराये पर ले िलया गया और दोन नए घर म एक साथ रहने लगे। ले कन फर, 24.08.1998 को, अपीलाथ ने आरोप लगाया क उसे उसक प ी और प ी क े भाई (साले) ने पीटा था। 29.11.1998 को उसे पूर रात उसक े ह घर से बाहर रखा गया। 17.12.1998 को उसने अपना वैवा हक घर छोड़ दया और अपीलाथ और उसक े भाई क े खलाफ आनंद पवत पुिलस टेशन, नई द ली म भारतीय दंड सं हता क धारा 498A/406 क े तहत थम सूचना रपोट (FIR) दज कराई। अपीलाथ और उसक े भाई को उसी दन िगर तार कर िलया गया, जब वे एक ववाह समारोह म मौजूद थे, और यह उसक े 15 से 20 दो त क मौजूदगी म कया गया था। बाद म दोन को जमानत पर रहा कर दया गया, हालां क प ी बात पर अड़ रह और यहां तक क उसने इनक जमानत र करने क े िलए एक आवेदन भी दया। इसक े बाद प ी ने अपीलाथ / पित और उसक े प रवार क े सद य क े खलाफ भारतीय दंड सं हता (IPC) क धारा 323 और 324 सहप ठत धारा 34 क े तहत िशकायत दज क, हालां क, बाद म उन दोन को मुकदमे से बर कर दया गया। यथ ने दंड या सं हता क धारा 150 सहप ठत धारा 107 क े तहत अपीलाथ क े खलाफ कायवाह भी शु क । इसक े बाद उसने अपने भरण-पोषण क े िलए हंदू द क और भरण-पोषण अिधिनयम, 1956 क धारा 18 क े तहत पृ सं. 4 यािचका दायर क ।
3. अपनी प ी ारा छोड़ दए जाने और उस पर लगाए गए कई मुकदम से बो झल अपीलाथ ने वैवा हक संबंध को ख म करने का फ ै सला कया। इस कार उ ह ने 20.09.2002 को अित र जला यायाधीश, उ र द ली क े सम हंदू ववाह अिधिनयम, 1955 क धारा 13(1) (आईए) और (आईबी) क े तहत ववाह व छेद क े िलए अपनी यािचका दायर क, अ य बात क े साथ, त य क े अनुसार, जैसा क पछले पैरा ाफ म बताया गया है।
4. यथ ने इस बात से इनकार कया क उसने कभी अपने पित को 'छोड़ा' या उस पर कोई ू रता दखाई। उनक े अिधव ा ने कहा क उ ह ने िसफ कानून क े तहत उपल ध कानूनी रा त का सहारा िलया। उ ह ने आरोप लगाया क उसक े गहने जो उसक े ' ीधन' थे, वो छ न िलए गए और कभी वापस नह ं दए गए, और इस तरह वह भारतीय दंड सं हता (आईपीसी) क धारा 498ए और 406 क े तहत अपने पित क े खलाफ मुकदमा दज करने क े िलए मजबूर हो गई। उनका कहना यह भी था क उ ह ने सुलह क े िलए हर मुम कन कोिशश क, ले कन अपीलाथ क े असहयोग क े कारण, म य थता और समझौते क सभी कोिशश नाकामयाब रह ं। उसने इस बात से इनकार कया है क उसने अपना गभपात पृ सं. 5 कराया।
5. दनांक 15-10-2003 को प रवार यायालय ने ू रता और प र याग से जुड़े मुकदम बनाए। वचारण यायालय ने पित क े प म ू रता क े साथ-साथ प र याग पर अपना फ ै सला दया और ववाह व छेद क े िलए एक िनणय पा रत कया गया।
6. उ च यायालय अपील म इस िन कष पर पहुंचा क एकमा इस त य से क यथ ने 29.11.1998 को अपने पित को उनक े घर म वेश करने क अनुमित नह ं द, इससे यह सा बत नह ं होगा क उसका इरादा सहवास को हमेशा क े िलए ख म करना था और इसिलए प र याग पर ववाह व छेद का आधार नह ं बना। जहां तक भारतीय दंड सं हता क धारा 323, 324 और 498ए क े तहत विभ न िशकायत दज करने का सवाल है, उ च यायालय का वचार था क क े वल ऐसी िशकायत दज करना, या उनक े प रणाम व प बर हो जाना ू रता नह ं होगी, य क प ी क े वल कानून क े तहत उपल ध अपने अिधकार को इ तेमाल कर रह थी। इसक े अलावा, यह भी देखना होगा क ये िशकायत कन हालात म दज क ग । पृ सं. 6
7. हमने अपीलाथ /पित क े व ान व र अिधव ा ी एस.क े. ं गटा और यथ /प ी क े व ान अिधव ा ी एस.क े. भ ला को व तार से सुना है और रकॉड म मौजूद साम ी का अवलोकन कया है।
8. यह मुकदमा प रवार यायालय से लेकर उ च यायालय और अब आ खरकार इस यायालय तक पहुंच गया है। द ली उ च यायालय का िनणय 08.04.2011 का है, जो बारह वष पुराना है। हम उन सभी त य पर वचार करना होगा जो अभी हमारे सामने ह। हमारे वचार से जन त य को यान म रखना चा हए, वे ह: (i) क यह "द पित" लगभग पछले 25 वष से अलग रह रहा है, और इन सभी वष म उनक े बीच कोई सहवास नह ं हुआ है। (ii) ववाह से कोई संतान नह ं है, और यह द पित मु कल से 4 वष तक पित-प ी क े प म साथ रहा। (iii) यायालय ारा सुलह या समझौते क े िलए बार-बार कए गए यास वफल रहे।
9. शु आती चरण म ह वचारण यायालय ने प कार को म य थता क े िलए भेजा था, जो सफल नह ं हुआ। इस यायालय ने दोन को म य थता क े िलए भी भेजा था, जो नाकाम रहा। मामले को फर से लोक अदालत म समझौते क े िलए भेजा गया ले कन कोई प रणाम नह ं िनकला। 11.04.2015 को, इस यायालय ने फर से प कार से एक साथ रहने क संभावनाएं तलाशने का अनुरोध कया, पृ सं. 7 ले कन क ु छ भी नह ं हुआ। फर 09.05.2015 को इस यायालय ने प से आपसी समझौता करने को कहा, ले कन कोई फायदा नह ं हुआ। दूसरे श द म, सुलह या समझौते क दशा म यायालय और म य थ क हर एक कोिशश नाकाम हो गई है। अब भी हमने प क औपचा रक सुनवाई से पहले प कार से मौजूदा हालात जानने क कोिशश क । अपीलाथ ने प प से कहा है क कसी भी समझौते या सुलह क कोई गुंजाइश नह ं है और उ ह ने अनुरोध कया क इस मामले म इसक े गुणागुण क े आधार पर िनणय िलया जाए, जब क यथ क े अिधव ा ने इस यायालय को बताया क यथ अपनी शाद बचाना चाहेगी और उ ह ने एक बार फर म य थता क े िलए वनती क । उनका कहना यह भी था क तलाक का कोई आधार नह ं है और द ली उ च यायालय क े सु वचा रत फ ै सले को बरकरार रखा जाना चा हए।
10. हमारे सामने मौजूद पित-प ी पछले 25 वष से अलग-अलग रह रहे ह। ववाह से कोई संतान नह ं है। दोन प क ओर से ू रता और प र याग क े गंभीर आरोप ह और पछले 25 से अिधक वष म दोन क े बीच कई मुकदमे चल रहे ह। अपीलाथ और यथ क े बीच का यह कड़वाहट भरा र ता, जसम पछले 25 वष म शांित का कोई पल नह ं आया है, यह क े वल कागज़ी वैवा हक र ता है। सच तो यह है क यह र ता बहुत पहले ह ख म हो चुका है। पृ सं. 8
11. उ च यायालय ने माना है क अपीलाथ -पित क े खलाफ क े वल आपरािधक मामले दज करने से ू रता नह ं होगी। फर भी, यथ -प ी ारा अपीलाथ -पित क े खलाफ दायर आपरािधक मामल बहुत अिधक ह जनका ऊपर ज़ कया गया है। इन सभी मामल म अंत म अपीलाथ पित को या तो आरोपमु कर दया गया या बर कर दया गया, अगर द ली उ च यायालय क े फ ै सले क घोषणा से पहले नह ं, ले कन िन त प से द ली उ च यायालय क े फ ै सले क घोषणा क े बाद। इसक े अलावा, इस यायालय क तीन यायाधीश क पीठ ने नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली1 म माना है क कसी वैवा हक मामले म एक प ारा दूसरे प क े खलाफ बार-बार आपरािधक मुकदमा दायर करना ू रता माना जाएगा और इसी बात को क े. ीिनवास राव बनाम ड.ए. द पा2 म इस यायालय क एक खंडपीठ ने दोहराया था।
12. एक अ य पहलू जस पर हम यान देना चा हए, वह यह है क पछले 25 वष से अपीलाथ और यथ अलग-अलग रह रहे ह, और उ ह ने सहवास नह ं कया है। प क े बीच सुलह क कोई गुंजाइश नह ं है। वा तव म दोन क े बीच कोई संबंध नह ं है और जैसा क विध आयोग ने अपनी 71वीं रपोट म ऐसी शाद क े बारे म कहा है, जो एक ऐसी शाद है जो वा तव म टूट गई है, और पृ सं. 9 िसफ कानून ारा वीकृ ित िमलनी बाक है। यह बात विध आयोग ने अपनी 217वीं रपोट म भी दोहराई थी।
13. ऐसी ह प र थितय म, इस यायालय ने आर. ीिनवास क ु मार बनाम आर. शामेथा3, मुनीश क कड़ बनाम िनिध क कड़[4] और नेहा यागी बनाम ले टनट कनल द पक यागी क े मामले म यह माना है क एक असुधाय ववाह वह ववाह है जहां पित और प ी काफ समय से अलग रह रहे ह और उनक े फर से एक साथ रहने क कोई संभावना नह ं है। उपरो सभी तीन मामल म, इस यायालय ने भारत क े सं वधान क े अनु छेद 142 क े तहत अपने अिधकार का योग करते हुए ववाह क े अपूरणीय वघटन क े आधार पर ववाह को ख म कर दया है, जसका अ यथा हंदू ववाह अिधिनयम क े तहत कोई अ त व नह ं है।
14. नवीन कोहली (सु ा) म, इस यायालय ने भारत संघ से एक सश अनुशंसा क है क वह हंदू ववाह अिधिनयम क े तहत तलाक क े आधार क े प म ववाह क े अपूरणीय वघटन को शािमल करने पर वचार करे। पृ सं. 10
15. उनक े बीच कई अदालती लड़ाइयां हु और म य थता और सुलह म बार- बार वफलताएं कम से कम इस त य का माण ह इस दंप क े बीच अब कोई संबंध नह ं बचा है, यह वा तव म एक ऐसी शाद है जो अपूरणीय प से टूट गई है।
16. यायालय क े सम वैवा हक मामले एक अलग चुनौती पेश करते ह, कसी भी अ य क े वपर त, य क हम मानवीय संबंध को भावनाओं क े पुिलंदे क े साथ, इसक े सभी दोष और कमज़ो रय क े साथ देख रहे ह। हर मामले म पित या प ी क े " ू रता" या दोषपूण आचरण को इंिगत करना संभव नह ं है। र ते क कृ ित, प का एक-दूसरे क े ित सामा य यवहार या दोन का लंबे समय तक अलग रहना एक ासंिगक कारक ह जस पर यायालय को अव य वचार करना चा हए। समर घोष बनाम जया घोष म इस यायालय क तीन यायाधीश क पीठ ने व तार से बताया था क अिधिनयम क धारा 13 (1) (आईए) क े तहत ू रता या होगी। उपरो िनणय म एक मह वपूण दशािनदश ू रता का िनधारण करने म एक यायालय क े कोण पर आधा रत है। यहां जस बात क जांच क जानी है वह संपूण वैवा हक संबंध है, चूं क ू रता कसी हंसक काय या काय म ह नह ं हो सकती है, ले कन कसी मौजूदा मामले म उसे अपमानजनक िन दा, िशकायत, आरोप, ताने आ द से समझा जाना चा हए। यायालय ने इं लड क े पृ सं. 11 है सबर क े कानून (वॉ यूम 13, 4सं करण, पैरा 1269, पृ 602) म वैवा हक संबंध म ू रता क प रभाषा पर भरोसा कया जसे यहां पुन: तुत कया जाना चा हए: ू रता क े सभी मामल म सामा य िनयम यह है क संपूण वैवा हक संबंध पर वचार कया जाना चा हए, और इस िनयम का वशेष मह व है जब ू रता म हंसक कृ य नह ं ब क अपमानजनक िन दा, िशकायत, आरोप या ताने शािमल ह । ऐसे मामल म जहां कोई हंसा नह ं क जाती है, याियक िनणय पर वचार करना इस नज़ रए से अवांछनीय है क कृ य या आचरण क क ु छ े णय को कृ ित या गुणव ा क े प म बनाया जा सक े जो उ ह ू रता क सभी प र थितय म स म या असमथ बना दे; य क ू रता क िशकायत का आकलन करने म उसक कृ ित क े बजाय आचरण का भाव सबसे मह वपूण है। या पित या प ी एक दूसरे क े ित ू रता क े दोषी रहे ह, यह अिनवाय प से त य का सवाल है और पहले से िनधा रत मामल का, य द कोई हो, बहुत कम मह व है। यायालय को प कार क शार रक और मानिसक थित क े साथ-साथ उनक सामा जक थित को भी यान म रखना चा हए, और एक पित या प ी क े य व और आचरण क े दूसरे क े दमाग पर भाव पर वचार करना चा हए, उस कोण से पित-प ी क े बीच सभी घटनाओं और झगड़ का मू यांकन करना चा हए; इसक े अलावा, किथत आचरण क जांच िशकायतकता क सहनश क मता और उस मता क े बारे म दूसरे पित/प ी को कस हद तक पता पृ सं. 12 है, क े आलोक म क जानी चा हए। ू रता क े िलए ेषपूण इरादा मह वपूण नह ं है ले कन जहां यह होती है वहां यह एक मह वपूण कारक है।” मौजूदा मामले म द ली उ च यायालय का मानना है क क े वल प ी ारा आपरािधक मामला दायर करना ू रता नह ं है, य क यह भी देखा जाना चा हए क कन प र थितय म मामले दज कए गए थे, यह एक ऐसा िन कष है जसे हम पूर तरह से नज़रअंदाज़ नह ं करना चाहते ह, असल म कानून क े प सुझाव क े प म यह सह हो सकता है, ले कन फर हम मामले क े उन सभी त य क भी बार क से जांच करनी चा हए जो अब हमारे सामने ह। जब हम उन त य पर वचार करते ह जो आज मौजूद ह, तो हम इस बात से आ त होते ह क इस ववाह क े जार रहने का मतलब ू रता का जार रहना होगा, जो अब एक-दूसरे पर थोपी जाती है। हंदू ववाह अिधिनयम क े तहत कसी ववाह का अपूरणीय वघटन ववाह क े व छेद का आधार नह ं हो सकता है, ले कन ू रता है। कसी ववाह को अ य बात क े साथ-साथ, तलाक क ड ारा इस आधार पर भंग कया जा सकता है, जब दूसरे प ने " ववाह संप न होने क े बाद यािचकाकता क े साथ ू रता भरा बताव कया हो"।7 हमार सु वचा रत राय म, एक वैवा हक संबंध जो पछले क ु छ वष म और अिधक कड़वा और उ हो गया है, इससे दोन प पर ू रता ह होती है और क ु छ नह ं। इस टूट हुई शाद का पृ सं. 13 दखावा करना दोन प क े साथ ू रता होगी। एक ववाह जो अपूरणीय प से टूट गया है, हमार राय म दोन प क े िलए ू रता है, य क इस तरह क े र ते म येक प दूसरे क े साथ ू रता से यवहार कर रहा है। इसिलए अिधिनयम क धारा 13 (1) (आईए) क े तहत यह ववाह व छेद का आधार है।
17. इस अिधिनयम क े तहत ू रता को प रभा षत नह ं कया गया है। तब भी, जस संदभ म इसका योग कया गया है, जो ववाह व छेद क े िलए एक आधार है, यह दशाता है क इसे वैवा हक संबंध म 'मानवीय आचरण' और ' यवहार' क े प म देखा जाना चा हए। समर घोष (सु ा) क े मामले पर वचार करते समय इस यायालय ने कहा क ू रता शार रक भी हो सकती है और मानिसक भी हो सकती है: "46... य द यह शार रक है, तो यह त य और ड ी से संबिधत है। य द यह मानिसक है, तो जांच ू र यवहार क कृ ित और फर जीवनसाथी क े दमाग पर इस तरह क े यवहार क े भाव क े बारे म शु होनी चा हए। अगर इससे यह उिचत आशंका पैदा हुई क दूसरे क े साथ रहना हािनकारक या अपमानजनक होगा, अंततः आचरण क कृ ित और िशकायत करने वाले पित या प ी पर इसक े भाव को यान म रखते हुए िन कष िनकाला जाना चा हए। पृ सं. 14 ू रता अनजाने म भी हो सकती है:... इरादा न होने से मामले म कोई फक नह ं पड़ना चा हए, अगर मानवीय मामल म सामा य समझ से, जस काय क िशकायत क गई है उसे ू रता माना जा सकता है। ू रता म इरादा हो ये ज़ र नह ं है। प कार को इस आधार पर राहत देने से इनकार नह ं कया जा सकता क चाह कर या जानबूझकर कोई दु यवहार नह ं कया गया है।'' हालां क इस यायालय ने अंततः मानिसक ू रता क े क ु छ उदाहरण दए। इनम से क ु छ इस कार ह: (i) प कार क े पूण वैवा हक जीवन पर वचार करने पर, ती मानिसक पीड़ा, वेदना और दुःख जो प क े िलए एक-दूसरे क े साथ रहना असंभव बनाएंगे, मानिसक ू रता क े यापक मापदंड क े अंतगत आ सकते ह। (xii) बना कसी शार रक अ मता या वैध कारण क े काफ समय तक संभोग करने से इनकार करने का एकतरफा िनणय मानिसक ू रता क ेणी म आ सकता है। (xiii) ववाह क े बाद पित या प ी म से कसी एक का ववाह से ब चा पैदा न करने का एकतरफा िनणय ू रता क ेणी म आ सकता है। पृ सं. 15 (xiv) जहां िनरंतर अलहदगी क एक लंबी अविध रह है, वहां यह िन कष िनकाला जा सकता है क वैवा हक बंधन ठ क नह ं हो सकता है। कानूनी बंधन म बंधे होने क े बावजूद भी शाद एक का पिनक कहानी बन जाती है। उस संबंध को तोड़ने से इनकार करक े, ऐसे मामल म कानून, ववाह क प व ता क पूित नह ं करता है; इसक े वपर त, यह प क भावनाओं और संवेदनाओं क े ित बहुत कम स मान दशाता है। ऐसी थितय म, इससे मानिसक ू रता हो सकती है। (जोर दया गया)
18. हमारे सामने एक ववा हत दंप है जो बमु कल चार साल तक एक दंप क े प म एक साथ रहा और जो अब पछले 25 वष से अलग रहा है। ववाह से कोई संतान नह ं है। वैवा हक संबंध पूर तरह से टूट चुका है और ठ क नह ं कया जा सकता है। बेशक यह र ता ख म हो जाना चा हए य क इसक े जार रहने से दोन प कार पर ू रता हो रह है। लंबे समय तक एक साथ न रहना और अलग-अलग रहना और सभी मायने वाले संबंध का पूर तरह से टूटना और दोन क े बीच मौजूद कड़वाहट को 1955 अिधिनयम क धारा 13 (1) (आईए) क े तहत ू रता समझा जाना चा हए। इसिलए, हम मानते ह क कसी दए गए मामले म, जैसे क मौजूदा मामला, जहां वैवा हक संबंध अपूरणीय प से टूट गया है, जहां लंबे समय तक साथ न रहकर अलग-अलग रहने क थित है (जैसा क मौजूदा पृ सं. 16 मामले म पछले 25 वष से है), प क े बीच कई अदालती मामल क े साथ; तो ऐसे ' ववाह' को बरकरार रखने का मतलब क े वल उस ू रता को मंजूर देना होगा जो एक-दूसरे पर थोपी जा रह है। हम इस बात से भी प रिचत ह क इस ववाह क े व छेद से क े वल दोन प भा वत ह गे य क ववाह से कोई संतान नह ं है।
19. इन प र थितय म, हम वचारण यायालय क े आदेश को बरकरार रखते ह, भले ह हमारे आदेश म हमारे ारा दए गए अलग-अलग आधार ह, और हम उ च यायालय क े आदेश को र कर देते ह और अपीलाथ /पित को तलाक का िनणय देते ह। उनका ववाह समा हो जाएगा।
20. मगर इस बात को यान म रखते हुए क अपीलाथ /पित जीवन बीमा िनगम का कमचार है, जैसा क हम बार म सूिचत कया गया है और उसका वतमान वेतन. 1,00,000/ (एक लाख पये) ित माह से यादा है, हम इसे उिचत एवं उपयु मानते ह वह यथ /प ी को थायी गुजारा भ ा क े प म 30,00,000/ (तीस लाख पये) क रकम दे। 30,00,000 पये (तीस लाख पये) क यह रकम आज से चार स ाह क अविध क े भीतर, इस यायालय क र ज म यथ क े नाम पर जमा क जाएगी। तलाक का आदेश इस रािश क े पृ सं. 17 जमा होने क ितिथ से ह लागू होगा। ऐसी जमा रािश क थित म, र ज, यथ /प ी क साख क पु करने क े बाद, इस यायालय को आगे संदिभत कए बना यथ /प ी को रािश का भुगतान करेगी। उपरो जानकार क े साथ, यह अपील वीकार क जाती है।..……….…………………. या., [सुधांशु धूिलया]..……….…………………. या., [जे.बी. पारद वाला] नई द ली। 26 अ ैल, 2023. पृ सं. 18 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS) अ वीकरण: देशी भाषा म िनणय का अनुवाद मुक ेबाज़ क े सीिमत योग हेतु कया गया है ता क वो अपनी भाषा म इसे समझ सक एवं यह कसी अ य योजन हेतु योग नह ं कया जाएगा| सम त कायालयी एवं यावहा रक योजन हेतु िनणय का अं ेज़ी व प ह अिभ मा णत माना जाएगा और काया वयन तथा लागू कए जाने हेतु उसे ह वर यता द जाएगी। Disclaimer: The translated judgment in vernacular language is meant for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purpose. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.