Full Text
भार ीय सव च्च न्यायालय
आपराति क अपीलीय आति कारिर ा
आपराति क अपील संख्या ........... 2023
विवशेष अनुमति याति$का (वि&.) संख्या 2063/2023 से उद्भू
जि. ेंद्र क
ु मार रोडे ... अपीलार्थी4
बनाम
भार संघ ... प्रत्यर्थी4
विन र्ण9 य
न्यायमूर्ति सं.य करोल
JUDGMENT
1. अनुमति प्रदान की गई।
2. हमारे विव$ार क े लिलए.ो प्रश्न उठ े हैं वे हैं-पहला, विव$ारर्ण क े अभिभलेखों की अनुपस्थिMर्थीति में क्या अपीलीय न्यायालय दोषजिसतिO को बरकरार रख सक ा र्थीा और.ुमा9ने की राभिश को बढ़ा सक ा र्थीा?और दूसरा, क्या दंड प्रवि&या संविह ा, 1973 की ारा 385 क े ह प्रयुक्त भाषा को देख े हुए, व 9मान स्थिMर्थीति भार क े संविव ान क े अनुच्छेद 21 क े ह आरोपी क े मौलिलक अति कारों का उल्लंघन है उद्घोषर्णा “क्षेत्रीय भाषा में अनुवाविद विनर्ण9य वादी क े अपनी भाषा में समझने हे ु विनबbति प्रयोग क े लिलए है और विकसी अन्य उद्देश्य क े लिलए प्रयोग नहीं विकया.ा सक ा है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों क े लिलए, विनर्ण9य का अंग्रे.ी संMकरर्ण प्रामाभिर्णक माना.ाएगा र्थीा विनष्पादन और वि&यान्वयन क े उद्देश्यों क े लिलए मान्य होगा।"
3. ऊपर दी गई अपील दास्थिkडक अपील संख्या 625/1999 में 23.11.2022 विदनांविक क े इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ द्वारा पारिर अंति म विनर्ण9य से उद्भू है जि.सक े द्वारा विवशेष न्याया ीश, (भ्रष्टा$ार विनवारर्ण अति विनयम, 1988) लखनऊ द्वारा अपीलार्थी4 को मुकदमा संख्या 7/1996 को बरकरार रखा गया।
4. व 9मान वाद क े प्रभावी विनर्ण9य को सुविव ा.नक बनाने क े लिलए, विवद्वान अ ीनMर्थी न्यायालयों द्वारा विदए गए विनर्ण9यों की सराहना करना आवश्यक है।
5. विव$ारर्ण न्यायालय ने अपने विनर्ण9य 04.12.1999 विदनांविक में अपीलार्थी4 को भ्रष्टा$ार विनवारर्ण अति विनयम, 1988 (ए स्थिMमनपश्चा संक्षेप में पीसी अति विनयम) की ारा 7,13 (1) और 13 (2) क े ह दोषी ठहराया।अभिभलेख पर साक्ष्य का विवश्लेषर्ण करने क े बाद, अ ीनMर्थी न्यायालय ने विनम्नलिललिख विनष्कष[9] विनकालाः “अभिभयो.न पक्ष यह साविब करने में सफल रहा है विक अभिभयुक्त.े. क े. रोडे ने उत्तर रेलवे, लखनऊ में सहायक वाभिर्णस्थिxयक प्रबं क क े रूप में एक लोक सेवक क े पद पर काम कर े हुए मुख्य विzकz विनरीक्षक श्री.य प्रकाश नारायर्ण उपाध्याय से उनक े लिखलाफ.ारी आरोप पत्र का विनM ारर्ण क े लिलए विदनांक 03.05.95 को पां$ सौ रुपये की मांग की र्थीी और उन्हें विदनांक 03.05.95 को रिरश्व ले े हुए रंगे हार्थीों पकड़ा गया र्थीा और उन्हें लोक सेवक क े रूप में ैना रह े हुए भ्रष्ट और अवै रीक े से अपने लाभ क े लिलए अपने पद का दुरुपयोग कर े हुए.े.पी.एन. उपाध्याय से 500 रुपये (पां$ सौ रुपये) प्राप्त विकये र्थीे। इस प्रकार, अभिभयुक्त क े विवरूO पीसी अति विनयम 1988 की ारा 7,13 (1) और 13 (2) क े ह अपरा साविब हो ा है और वह इन आरोपों क े लिलए दंतिड होने क े लिलए उत्तरदायी है। अभिभयुक्त.मान पर है और उसक े.मान बन् पत्र को उन्मोति$ विकया.ा ा है।अभिभयुक्त को ुरं विहरास में लिलया.ाना $ाविहए।" (प्रभाव वर्ति )
6. इस प्रकार अभिभलिललिख करने क े बाद, विव$ारर्ण न्यायालय ने अपीलार्थी4 को पी. सी. अति विनयम की ारा 7 क े ह एक वष[9] क े कठोर कारावास और पां$ सौ रुपये क े.ुमा9ने (इसक े उल्लंघन में, छह महीने क े अति रिरक्त कारावास) और पी. सी. अति विनयम की ारा 13 (2) क े ह दो साल और पां$ सौ रुपये क े कठोर कारावास (इसक े उल्लंघन में, छह महीने क े अति रिरक्त कारावास) की स.ा सुनाई। उच्च न्यायालय क े समक्ष काय9वाही
7. दोषजिसतिO और दंडादेश क े विनर्ण9य का विवरो कर े हुए विदनांक 07.12.1999 को उच्च न्यायालय ने याति$काक ा9 की अपील को Mवीकार कर लिलया। 04.03.2016 विदनांविक आदेश क े अवलोकन से प ा $ल ा है विक विव$ारर्ण क े अभिभलेख को बार-बार समन करने क े बाव.ूद, संबंति अदाल से कोई.वाब नहीं विमला और इसक े परिरर्णामMवरूप, जि.ला न्याया ीश को एक Mपष्टीकरर्ण देने और अभिभलेख को पुनः ैयार करने क े लिलए कदम उठाने क े लिलए कहा गया। 7.[1] अभिभलेख से आगे प ा $ल ा है विक "संपूर्ण[9] अभिभलेख खो गया है और इसका प ा नहीं लगाया.ा सक ा है" और "पुनर्निनर्निम दM ावे.ों" क े रूप में भे.े गए दM ावेज़ संबंति विव$ारर्ण न्यायालय अभिभलेख ैयार नहीं कर े हैं।वे न ही विनयमों क े अनुसार पाए गए और न ही क ें द्रीय.ां$ ब्यूरो द्वारा समर्थिर्थी पाए गए।
8. उच्च न्यायालय ने पूव[9] में यह नोz करने क े बाव.ूद विक अभिभलेखों का पुनर्निनमा9र्ण विनयमों क े अनुसार नहीं र्थीा और अभिभलेख पर सामग्री की अनुपलब् ा की Mवीकाय[9] ा, जि.सक े लिलए यहाँ अपीलक ा9 विकसी भी रह से जि.म्मेदार नहीं र्थीा, विदनांक 23.11.2022 क े आक्षेविप विनर्ण9य क े माध्यम से दोषजिसतिO को बरकरार रखा।महत्वपूर्ण[9] बा यह है विक दलीलों क े बाव.ूद, न्यायालय ने दोषजिसतिO क े मेरिरz पर $$ा9 नहीं की।
9. हालांविक, दोषजिसतिO को बरकरार रखा गया र्थीा और वी.क े. वमा9 बनाम क ें द्रीय.ां$ ब्यूरो1 में इस अदाल क े फ ै सले को ध्यान में रख े हुए, स.ा को पहले से ही कम कर विदया गया र्थीा और.ुमा9ना बढ़ाकर पच्चीस ह.ार रुपये कर विदया गया र्थीा। व 9मान अपील
10. दोषजिसतिO क े आदेश को बरकरार रखे.ाने से व्यभिर्थी होकर, अपीलार्थी4 ने व 9मान अपील दायर विकया है। अभिभलेख पर यह Mपष्ट है विक अभिभलेख को कभी भी पूरी रह से पुनर्निनर्निम नहीं विकया.ा सका, विवशेष रूप से संबंति जि.ला न्यायालय द्वारा। हालाँविक, न्यायालय ने आंभिशक रूप से पुनर्निनर्निम अभिभलेख में पया9प्त ा पाई, जि.समें क े वल क ु छ दM ावे. शाविमल र्थीे,.ैसे विक प्रार्थीविमकी और गुर्ण-दोष क े आ ार पर दोषजिसतिO को बरकरार रखा।
11. अपीलार्थी4 क े विवद्वान अति वक्ता का कहना है विक इस मुद्दे पर कानून य हो गया है, और ऐसे अभिभलेख की अनुपस्थिMर्थीति में, दोषजिसतिO को दृढ़ आ ार पर नहीं कहा.ा सक ा है और इसे दरविकनार विकया.ा सक ा है। विवद्वान अति वक्ता ने श्याम देव पाkडेय व अन्य बनाम विबहार राxय[2], यूपी राxय बनाम अभय रा. सिंसह व अन्य[3] पर अवलम्ब लिलया।
उन्होंने आगे उच्च न्यायालय क े फ ै सलों अर्थीा9 ् विदल्ली उच्च न्यायालय क े रमेश कौभिशक बनाम विदल्ली राxय[4]; इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े रघुवीर सहाय और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राxय[5], अव ेश राय और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राxय[6] और े. पाल सिंसह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राxय[7] पर अवलम्ब लिलया। इस न्यायालय द्वारा विव$ार
12. विकसी भी रह का दृढ़ विवश्वास विकसी व्यविक्त क े $रिरत्र को Mर्थीायी रूप से ति$वि‹ कर ा है।इस मामले की विवभिशष्ट परिरस्थिMर्थीति यों में यह अनुति$ होगा।यह कहना नहीं है विक 1995 क पाँ$ सौ रुपये एक छोzी या महत्वहीन राभिश र्थीी; हालाँविक,.ब आवश्यक सामग्री की अनुपस्थिMर्थीति में क े कारर्ण अपील की संभावना समाप्त हो.ा ी है, ो मामले का.ाय.ा लेने और विफर यर्थीास्थिMर्थीति बनाए रखने या पलzने क े लिलए जि.सक े अवलोकन और विव$ार की आवश्यक ा हो ी है, ो संदेह का लाभ अभिभयुक्त को विदया.ाना $ाविहए,.ब वह विकसी भी रह से इसक े लिलए जि.म्मेदार नहीं है।
13. हमें इस बा पर विव$ार करना $ाविहए विक क्या उच्च न्यायालय क े समक्ष विव$ारर्ण न्यायालय क े अभिभलेख की अनुपलब् ा और दोषजिसतिO को बरकरार रखना, इसक े अभाव क े बाव.ूद, भार क े अनुच्छेद 21 क े ह विनविह अभिभयुक्तों क े.ीवन और Mव ंत्र ा क े अति कार का उल्लंघन कर ा है। 1979 की दास्थिkडक अपीलीय संख्या. 786 6 1984 की दास्थिkडक अपीलीय संख्या. 346 7 2015 एस. सी. सी. ऑनलाइन सभी 6581
14. यह सुविव$ारिर है विक आपराति क अभिभयो.न में "कानून द्वारा Mर्थीाविप प्रवि&या" का पालन करना एक पविवत्र आवश्यक ा है।
15. न्यायमूर्ति एम. ए$. होसकोz बनाम महाराष्ट्र राxय[8] ( ीन न्याया ीशों की पीठ) में न्यायमूर्ति क ृ ष्र्णा अय्यर ने न्यायालय क े लिलए लिलख े हुए यह म व्यक्त विकया विकः "11. संक्षेप में,.ैसा विक दkड प्रवि&या संविह ा में पाव ान है, सत्र न्यायालय से उच्च न्यायालय में पहली अपील अनुच्छेद 21 में इस मूल्य को बरकरार रख ी है।”
16. यह भी देखा गया विक अपील क े अति कार को फलदायी बनाने वाला प्रत्येक कदम अविनवाय[9] है, और प्रत्येक कार9वाई या विनस्थिष्&य ा.ो इसे बाति कर ी है, अनुति$ और असंवै ाविनक है।
17. मनु शमा9 बनाम राxय (राष्ट्रीय रा. ानी क्षेत्र विदल्ली)9 (दो न्याया ीशों की पीठ) क े मामले में इस न्यायालय ने यह भी उल्लेख विकया है विक विवति की सम्यक प्रवि&या में विव$ारर्ण में विनष्पक्ष ा को शाविमल विकया.ाएगा। न्यायालय अभिभयुक्त को सभी दM ावे.ों और बयानों को प्राप्त करने और मामले से संबंति अभिभलेखों को प्रM ु करने क े लिलए आवेदन करने का अति कार दे ा है।
18. यविद विव$ारर्ण $रर्ण में दM ावे.ों को प्रM ु करने का अति कार मौ.ूद है ो यह एक Mवाभाविवक परिरर्णाम है विक अपील में बैठे उच्च न्यायालय को उन दM ावे.ों से लाभ उठाना $ाविहए।इस न्यायालय की सुविव$ारिर राय में, यह उपरोक्त पविवत्र आवश्यक ा की मांग है।
19..ैसा विक हमने पहले उल्लेख विकया है, व 9मान मामले में प्रयासों क े बाव.ूद गवाह क े बयान, सीआरपीसी की ारा 313 क े ह बयान.ैसे दM ावे. न ो उपलब् हैं और न ही उनका पुनर्निनमा9र्ण विकये.ाने योग्य है।इसलिलए, ऐसे दM ावे.ों की अनुपस्थिMर्थीति में में दोषजिसतिO को बनाए रखना कानून और विनष्पक्ष ा सम्यक प्रवि&या क े अनुरूप नहीं कहा.ा सक ा है।
20. एक बार.ब अनुच्छेद 21 क े ह विकसी अति कार का उल्लंघन Mर्थीाविप हो.ा ा है, ो यह विनMसंदेह दोषजिसतिO को दरविकनार करने क े लिलए पया9प्त है।विफर भी, इस संबं में कानून की प्रवि&या क्या कह ी है, इसकी सराहना करना आवश्यक है।आलिखरकार, यह नहीं कहा.ा सक ा विक विनष्पक्ष कानूनी प्रवि&या क े अभाव में व्यविक्तग Mव ंत्र ा का हनन अनुच्छेद 21 की पविवत्र ा का अपमान है। इस आशय क े लिलए, एम. ए$. होसकोz (ऊपरोक्त) की पीठ ने कहाः "24. हम मेनका गां ी क े महत्व का अनुसरर्ण कर सक े हैं और विनष्कष[9] को Mपष्ट कर सक े हैं।मेनका गां ी मामले में यह विन ा9रिर विकया गया है विक विनष्पक्ष कानूनी प्रवि&या क े विबना व्यविक्तग Mव ंत्र ा को कम नहीं विकया.ा सक ा है।यह सुMर्थीाविप करने क े लिलए पया9प्त है विक एक क ै दी,.ो न्यायालय की स.ा पाने से अपनी Mव ंत्र ा से वंति$ है, लेविकन इस रह क े फ ै सले क े लिखलाफ अपील करने का हकदार है, अनुच्छेद 21 क े ह अपने संरक्षर्ण क े विहMसे क े रूप में और.ैसा विक अपील करने क े अपने वै ाविनक अति कार में विनविह है, अपनी अपील ैयार करने और बहस करने क े लिलए अति वक्ता लेने क े अति कार का दावा कर सक ा है।”
21. व 9मान मामला दंड प्रवि&या संविह ा, 1973 की ारा 385 द्वारा शाजिस हो ा है, जि.से संदभ[9] में आसानी क े लिलए इस प्रकार प्रM ु विकया.ा ा हैः “385. अपीलों की सुनवाई की प्रवि&या संतिक्षप्त रूप से खारिर. नहीं की.ा ी है। - (1) यविद अपीलीय न्यायालय अपील को संतिक्षप्त रूप से खारिर. नहीं कर ा है, ो वह उस समय और Mर्थीान की सू$ना देगा जि.स पर ऐसी अपील की सुनवाई की.ाएगी - (i) अपीलार्थी4 या उसक े वकील को; (ii) ऐसे अति कारी को जि.न्हें राxय सरकार इस ओर से विनयुक्त करे; (iii) यविद अपील भिशकाय क ा9 को भिशकाय पर Mर्थीाविप मामले में दोषजिसतिO क े विनर्ण9य से है; (iv) यविद अपील अभिभयुक्त को ारा 377 या ारा 378 क े ह है, और ऐसे अति कारी, भिशकाय क ा9 और अभिभयुक्त को अपील क े आ ार की एक प्रति भी प्रM ु करेगी।(2) अपीलीय न्यायालय ब मामले क े अभिभलेख क े लिलए भे.ेगा और पक्षों को सुनेगा, यविद ऐसा अभिभलेख पहले से ही उस न्यायालय में उपलब् नहीं है:बश — विक यविद अपील क े वल स.ा की सीमा या वै ा क े बारे में है, ो न्यायालय अभिभलेख भे.े विबना अपील का विनM ारिर कर सक ा है। (3).हां विकसी दोषजिसतिO से अपीलार्थी4 का एकमात्र आ ार स.ा की कभिर्थी गंभीर ा है, वहां अपीलार्थी4 न्यायालय की अनुमति क े अलावा, विकसी अन्य आ ार क े समर्थी9न में सुनवाई नहीं करेगा।”
22. प्राव ान को क े वल पढ़ने से यह Mपष्ट हो.ा ा है विक.ब अपीलों को सरसरी ौर पर खारिर. नहीं विकया.ा ा है, अपीलीय न्यायालय उन मामलों को छोड़कर अ ीनMर्थी न्यायालय क े रिरकॉड[9] की मांग करेगा.हां विव$ार क े लिलए प्रश्न एक वाक्य की वै ा है। विनMसंदेह अपील न्यायालय पर यह बाध्य ा है विक वह अभिभलेख मांगे और विफर अपने समक्ष विकसी मामले क े गुर्ण-दोष की.ां$ करने क े लिलए आगे बढ़े।.ैसा विक प्रर्थीमदृष्टया देखा.ा सक ा है, हमारे सामने ऐसा नहीं है।
23. इस मुद्दे पर पूव[9] क े मामलों में से क्वीन इंप्रेस बनाम लिखम सिंसह 10 क े मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय का विनर्ण9य है, जि.समें जि.ला न्याया ीश खोए हुए अभिभलेखों का प ा लगाने या उन्हें खो.ने में विवफल रहा। न्यायालय ने कहा विक अभिभलेखों क े इस नुकसान ने अपीलक ा9 को उच्च न्यायालय द्वारा सुनवाई का अति कार खो विदया है, जि.सका वह हकदार है।ऐसी स्थिMर्थीति यों में, नए जिसरे से विव$ारर्ण का आदेश देने क े अलावा कोई अन्य उपाय नहीं ब$ा है।लिखम सिंसह (उपरोक्त) क े विनर्ण9य क े बाद अभय रा. सिंसह (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय ने फ ै सला सुनाया है।
24. उपयु9क्त आवश्यक ा ारा 423 क े ह पुरानी संविह ा (दंड प्रवि&या संविह ा, 1898, जि.से अब विनरजिस कर विदया गया है) में भी पाई.ा ी है।1898 संविह ा की ारा 423, दंड प्रवि&या संविह ा, 1898 की ारा 385 से मेल खा ी है।
25. विप्रवी काउंजिसल ने किंकग-एम्पेरर बनाम दाहू राउ 11 में कहा विक.हां एक स.ा क े लिखलाफ अपील की.ा ी है, एक बार सारांश बखा9M गी विवफल हो.ा ी है, ारा 423 क े रिरकॉड[9] क े लिलए भे.ने क े प्राव ान Mपष्ट रूप से "अनुमति " हैं, और उस M र पर संशो न क े लिलए कोई.गह नहीं हो सक ी है। यह इस न्यायालय द्वारा श्याम देव पांडे (उपरोक्त) में यह देख े हुए दोहराया गया है विक विनम्नलिललिख शब्दों में, अ ीनMर्थी न्यायालय क े अभिभलेख इस प्रकार हैः 10 1889 A.W.N. 55
"18. ारा 423 पर आ े हुए, जि.से पहले ही ऊपर उOृ विकया.ा $ुका है, यह मेरिरz क े आ ार पर अपील का विनM ारर्ण करने में अपीलीय न्यायालय की शविक्तयों से संबंति है।अपीलीय न्यायालय क े लिलए यह अविनवाय[9] है विक वह मामले क े अभिभलेख क े लिलए भे.े, यविद यह पहले से ही न्यायालय क े समक्ष नहीं है।इस आवश्यक ा का अनुपालन करना आवश्यक है ाविक न्यायालय न क े वल विनर्ण9य क े संदभ[9] में बस्थिल्क उन अभिभलेखों क े संदभ[9] में भी अपील विकए गए आदेश या विनर्ण9य की शुO ा पर विनर्ण9य ले सक े.ो विनर्ण9य क े आ ार होंगे।विनर्ण9य में द.[9] विनष्कषš की शुO ा, उनक े लिखलाफ विकए गए विवरो क े आ ार पर, साक्ष्य मौलिखक और दM ावे.ी और उद्देश्य क े लिलए प्रासंविगक अन्य सामविग्रयों क े संदभ[9] क े विबना विनर्ण9य नहीं लिलया.ा सक ा है।"इस रह क े अभिभलेख" का संदभ[9] "इस रह क े अभिभलेख को देखने क े बाद" अपीलीय न्यायालय द्वारा भे.े गए मामले क े अभिभलेख में है।” 26 विबश्वनार्थी घोष बनाम पतिश्चम बंगाल राxय12 (दो न्याया ीशा ीशों की पीठ) क े मामले में इस न्यायालय ने यह म व्यक्त विकया विक एक अपीलीय न्यायालय अपने समक्ष अभिभलेख और अभिभयो.न पक्ष द्वारा प्रM ु साक्ष्य क े विबना दोषजिसतिO की अनुमति देना न्याय का घोर अवहेलना है।
27. इस न्यायालय ने अभय रा. सिंसह (उपरोक्त) (दो न्याया ीशों की पीठ) में आईपीसी 1860 की ारा 302 क े ह विव$ारर्ण न्यायालय द्वारा दोषजिसतिO पर विव$ार कर े हुए मामले को उच्च न्यायालय द्वारा नए जिसरे से विव$ार करने क े लिलए भे. े हुए अव ारिर विकया:
"8. कई उच्च न्यायालयों द्वारा यह लगा ार विव$ार रखा गया है विक.ब अभिभलेख आग या प्राक ृ ति क या अप्राक ृ ति क आपदाओं क े कारर्ण नष्ट हो.ा े हैं, ो पुनर्निनमा9र्ण का आदेश विदया.ाना $ाविहए।क्वीन एम्प्रेस बनाम लिखम सिंसह [1889 ए. डब्ल्यू. एन. 55] में यह विव$ार रखा गया र्थीा विक दkड प्रवि&या संविह ा 1898 (संक्षेप में "पुरानी संविह ा") की ारा 423 (1) क े प्राव ानों ने अदाल क े लिलए सुनवाई क े समय अभिभलेख प्राप्त करना और उसकी.ां$ करना अविनवाय[9] बना किंदया र्थीा।.ब ऐसा करना सभव नहीं र्थीा, ो एकमात्र उपलब् राM ा पुनर्निनमा9र्ण क े विनद—श की र्थीी।उक्त दृविष्टकोर्ण को छह दशक से भी पहले सेवुगापेरुमल रे [ए. आई. आर. 1943 मैड 391 (2) 44 वि&. एल..े.
611) में दोहराया गया र्थीा,:44 &ी. एल..े. 611)इसक े बाद भी कई उच्च न्यायालयों ने इस विव$ार को दोहराया है।
9. उच्च न्यायालय ने प्रासंविगक पहलुओं और विव$ारों को ध्यान में नहीं रखा और अ$ानक इस विनष्कष[9] पर पहुं$ा विक पुनर्निनमा9र्ण क े वल इसलिलए संभव नहीं र्थीा क्योंविक सत्र न्याया ीश से कोई प्रति वि&या नहीं र्थीी। पुनर्निनमा9र्ण का आदेश विदनांक 1-11-1993 को विदया गया र्थीा और उच्च न्यायालय का विनर्ण9य दास्थिkडक अपीलीय सं 1970/1979 विदनांक 25- 2-1994 में।आदेश का पालन दास्थिkडक अपीलीय सं 1962/1979 का विनM ारर्ण विदनांक 16-8-1995 को विकया गया।यह Mपष्ट नहीं है विक उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय से अभिभलेखों क े पुनर्निनमा9र्ण क े बारे में.ानकारी देने की आवश्यक ा क्यों नहीं. ाई; और/या Mवयं सकारात्मक विदशा-विनद—श.ारी करक े पहल कर ा है विक क ै से, रीकों और प्रयासों की प्रक ृ ति, प्रयासों और काय[9] को प्रभावी ढंग से न्याय क े सव त्तम विह में उद्देश्य को प्राप्त करने क े लिलए और अं ः विकसी भी $ूक से न्याय की अवहेलना से ब$ने क े लिलए विकया.ा ा है, इस संबं में विनस्थिष्&य ा या अनुति$ या असाव ानीपूर्ण[9] कार9वाई; विवशेष रूप से ब.ब उच्च न्यायालय द्वारा लगभग एक दशक क आवश्यक आदेश पारिर करने क े लिलए कोई कार9वाई नहीं की गई.ब उसे रिरकॉड[9] क े नष्ट होने की सू$ना विमली।यविद उच्च न्यायालय द्वारा Mवीक ृ विकया गया माग[9] संविदग् व्यविक्तयों और न्याया ीश क े विवरोति यों को प्रोत्साविह करेगा और कानून का उल्लंघन करने वालों को न्याया ीश क े सामान्य और सामान्य &म में पद— क े पीछे आने वाले असामाजि.क त्वों क े सार्थी विमलकर काम करने की अनुमति देगा।
10. इसलिलए, हम उच्च न्यायालय क े आदेश का विवरो कर े हैं और मामले को नए जिसरे से विव$ार क े लिलए वापस भे. े हैं।इस मोड़ पर यह ध्यान विदया.ाना $ाविहए विक प्रत्यर्थी4गर्णों में से एक i.e. इस न्यायालय क े समक्ष अपील विव$ारा ीन रहने क े दौरान ओम पाल की मृत्यु हो गई है।उच्च न्यायालय अभिभयो.न ए.ेंसी क े सार्थी-सार्थी ब$ाव पक्ष और उनक े संबंति अति वक्ता की सहाय ा से सभी उपलब् या संभाविव स्रो ों से हमारे विनर्ण9य की प्राविप्त की ति भिर्थी से छह महीने की अवति क े भी र अभिभलेखों क े पुनर्निनमा9र्ण का विनद—श देगा।यविद यह संभव है विक अभिभलेखों का पुनर्निनमा9र्ण विकया.ाए ाविक उच्च न्यायालय Mवयं संविह ा की ारा 386 क े ह परिरकस्थिल्प रीक े से अपीलों की सुनवाई और विनM ारर्ण कर सक े, ो अपीलों की पुनः सुनवाई करें और उनक े गुर्ण- दोष क े आ ार पर और कानून क े अनुसार उनका विनM ारर्ण करें।यविद यह पाया.ा ा है विक पुनर्निनमा9र्ण व्यावहारिरक नहीं है, लेविकन पुनर्निव$ार का आदेश देकर न्याया ीश क े विह को बेह र रीक े से पूरा विकया.ा सक ा है-उस राM े को अपनाएं और विफर से मुकदमे की सी ी सुनवाई करें- और उस $रर्ण से कानून अपना सामान्य काम करेगा।यविद क े वल उच्च न्यायालय को अपील सुनने और विनपzाने की सुविव ा क े लिलए पुनर्निनमा9र्ण संभव नहीं है और सत्र न्यायालय द्वारा पुनप9रीक्षर्ण और नए न्यायविनर्ण9यन की आगे की प्रवि&या भी अत्यं महत्वपूर्ण[9] बुविनयादी े नुकसान क े कारर्ण असंभव हो गई है - उस मामले और स्थिMर्थीति में ही, आक्षेविप विनर्ण9य में विदए गए विनद—श लागू होंगे और मामला बंद हो.ाएगा।अपीलों का दनुसार विनM ारर्ण विकया.ा ा है।”
28. हाल ही में, इस न्यायालय ने नं.य राय उपनाम गुड्डू राय बनाम विबहार राxय13 (दो न्याया ीशों) में बानी सिंसह बनाम उत्तर प्रदेश राxय14 में विदए गए एक विनर्ण9य पर विनम्नलिललिख रूप में ध्यान विदया है- "14. हमने इस न्यायालय क े उक्त दो विनर्ण9यों में व्यक्त विव$ार पर साव ानीपूव9क विव$ार विकया है और हम कह सक े हैं विक श्याम देव [(1971) 1 SCC 855: 1971 SCC (Cri) 353: AIR 13 2022 SCC Online 880 14 (1996) 4 SCC 720 1 3 1971 SC 1606] मामले में एक छोzे से Mपष्टीकरर्ण को छोड़कर.ो हम उल्लेख करना आवश्यक समझ े हैं वह यह विव$ार विकया गया- ारा 385 की सरल भाषा यह Mपष्ट कर ी है विक यविद अपीलीय न्यायालय संतिक्षप्त बखा9M गी क े लिलए अपील को उपयुक्त नहीं मान ा है, ो उसे अभिभलेख क े लिलए 'अवश्य' बुलाना $ाविहए और ारा 386 आदेश दे ी है विक अभिभलेख प्राप्त होने क े बाद, अपीलीय न्यायालय अभिभयुक्त या उसक े अति वक्ता को सुनने क े बाद अपील का विनM ारर्ण कर सक ा है। इसलिलए, ारा 385-386 की सरल भाषा गैर-अभिभयो.न क े लिलए अपील को खारिर. करने पर विव$ार नहीं कर ी है।इसक े विवपरी,
संविह ा में अभिभलेख क े अवलोकन और.ां$ क े बाद मेरिरz क े आ ार पर अपील क े विनM ारर्ण की परिरकल्पना की गई है।कानून Mपष्ट रूप से उम्मीद कर ा है विक अपीलीय न्यायालय मेरिरz क े आ ार पर अपील का विनपzारा करेगा, न क े वल विनर्ण9य में विन$ली अदाल क े क 9 पर विव$ार करक े, बस्थिल्क अभिभलेख पर साक्ष्य क े सार्थी क 9 की.ां$ करक े इस दृविष्टकोर्ण से विक विन$ली अदाल द्वारा द.[9] क 9 और विनष्कष[9] अभिभलेख पर सामग्री क े अनुरूप हैं।”
29. समान परिरस्थिMर्थीति यों वाले मामले में, हम नोविzस कर े हैं विक इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सी ा राम और अन्य बनाम राxय15 में यह अव ारिर विकया है विक.ब पूरा अभिभलेख खो गया र्थीा या नष्ट हो गया र्थीा और अभिभलेख का पुनर्निनमा9र्ण संभव नहीं र्थीा, ो अपीलीय न्यायालय पुनः परीक्षर्ण का आदेश देगा, बश — घzना की समय अं राल ति भिर्थी और अपील की सुनवाई की ति भिर्थी कम हो। यविद यह एक लंबी प्रवि&या है और/या ारा 161 क े ह गवाहों की प्रार्थीविमकी, बयान और अन्य प्रासंविगक काग.ा उपलब् नहीं हैं, ो अपीलीय न्यायालय को विफर से सुनवाई का आदेश नहीं देना $ाविहए।
30. विवभिभन्न उच्च न्यायालयों द्वारा विदए गए कई विनर्ण9यों में, इस प्रभाव क े समान विव$ार व्यक्त विकया गया है विक विन$ली अदाल क े अभिभलेख क े अभाव में दोषजिसतिO को बरकरार नहीं रखा.ा सक ा है।सी ा राम (उपरोक्त) ध्यान दें में रख े हुए, अपरा की घzना और अपील पर अं ः विनर्ण9य लेने क े बी$ क े समय को ध्यान में रख े हुए, इन अदाल ों ने माना है विक आवश्यक दM ावे.ों.ैसे विक प्रार्थीविमकी या गवाह क े बयानों की अनुपस्थिMर्थीति में में, एक पुनर्निव$ारर्ण को भी न्याया ीश क े उद्देश्यों को पूरा करने वाला नहीं कहा.ा सक ा है। [खलील 15 1981 Cr.LJ, 65 अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राxय16; वीर पाल बनाम राxय17; हीरा लाल बनाम उत्तर प्रदेश राxय18 और भुंडा और अन्य बनामउत्तर प्रदेश राxय19 ]
31. व 9मान मामले में, उच्च न्यायालय क े आक्षेविप विनर्ण9य में सी. बी. आई. का बयान द.[9] विकया गया है विक रिरकॉड[9] "खो गए हैं"।"पुनर्निनर्निम " अभिभलेख में विनम्नलिललिख शाविमल हैंः i. आई. आर. सी. 18 (ए)/95 एल. क े. ओ. की प्रार्थीविमकी; ii.श्री.े. पी. एन. उपाध्याय की भिशकाय विदनांक 03.05.1995 उपाध्याय, सीआईzी, वारार्णसी (2 पृष्ठ); iii.24.03.1995 (एक पृष्ठ) विदनांविक S.F. II की फोzोकॉपी iv. प्रीz्रैप ज्ञापन विदनांक 3.5.95 (4 पृष्ठ); v. रिरकवरी मेमो विदनांक 3.5.1995 (5 पृष्ठ) vi. खो. सू$ी विदनांक 3.5.95 (5 पृष्ठ); vii. श्री.े. पी. एन. उपाध्याय क े आरोप पत्र (एस. एफ. ए. आई.) और नोzशीz वाली एक फाइल। (पृष्ठ 1 से 6 और नोzशीz पीपी2); viii.खो. सू$ी विदनांक 4.5.95 (1 पत्रक); ix. Mर्थील यो.ना विदनांक 3.5.95 (1 पत्रक); x. विवविव मसौदा आरोप पत्र आविद वाले पत्र (7 शीz); xi.मं.ूरी आदेश विदनांक 28.12.95 ारा 385 की उप- ारा 2 में यह अपेक्षा की गई है विक न्यायालय द्वारा प्राप्त े आलोक में पक्षों की सुनवाई की.ाए।दM ावे.ों में विनMसंदेह मेरिरz क े आ ार पर अपील को ठीक से समझने क े लिलए आवश्यक दM ावे. शाविमल करने की आवश्यक ा हो ी है।यहां क विक अभिभयो.न और ब$ाव दोनों गवाहों क े बयानों को भी विफर से ैयार नहीं विकया गया है और अदाल क े लिलए उपलब् नहीं हैं।मेरिरz क े आ ार पर अपील क े विनM ारर्ण की यह स्थिMर्थीति अभिभलेख क े अवलोकन क े बाद ही बनी सिंसह (उपरोक्त) मामले में ीन न्याया ीशों की पीठ द्वारा रखी गई है।
32. हमारे सुविव$ारिर विव$ार में, अ ीनMर्थी न्यायालय, पारMपरिरक रूप से विवरो ाभासी दृविष्टकोर्ण अपना े हुए, अभिभयुक्त को स.ा सुनाने क े गुर्ण-दोष क े आ ार पर अपील पर विनर्ण9य लेने क े लिलए यह भूल े हुए आगे बढ़ा विक $ुनौ ी भी े लिलए र्थीी।और विफर भी अपील क े गुर्ण-दोष पर ध्यान नहीं विदया, े विनर्ण9य को विवभिशष्ट $ुनौ ी दी।पूरा दृविष्टकोर्ण अवै और गल है।सबसे पहले, यह देखा.ा ा है विक अभिभलेख गायब र्थीा, और विफर यह अपीलार्थी4 पर इसे प्रM ु करने की जि.म्मेदारी डाल ा है।
33. उपरोक्त $$ा9 क े आलोक में अपील में अभिभयुक्त अपीलीय न्यायालय द्वारा अभिभलेख का अवलोकन करने का अति कार रख ा है और इसलिलए, क े वल उस पर ध्यान देकर एक दृढ़ विवश्वास को बनाए रखना विक अभिभयुक्त क े अ वक्ता क े पास अपील दालिखल करने क े समय अभिभलेख नहीं होना "संविदग् " है और.ैसा विक उच्च न्यायालय ने अव ारिर विकया है यह विक अपील अभिभलेख को देखे विबना दायर की गई होगी, "कोई भी विवश्वास नहीं कर सक ा", सही नहीं है। अपील अ ीनMर्थी न्यायालय का काय[9] दोषजिसतिO को कायम रखने क े लिलए अ ीनMर्थी न्यायालय क े विनर्ण9य पर विनभ9र होना नहीं है, बस्थिल्क उसक े समक्ष उपलब् अभिभलेख क े आ ार पर,.ो उसक े समक्ष अ ीनMर्थी न्यायालय से विवति व बुलाए गए हैं और उसक े समक्ष विदए गए कš क े आ ार पर, उस पर विकसी विनष्कष[9] पर पहुं$ना है।
34. थ्यों क े दृविष्टग, प्रश्नग कभिर्थी अपरा 21.3.1995 को विकया गया र्थीा, और विव$ारर्ण न्यायालय का विनर्ण9य 7.12.1999 को विदया गया र्थीा। अपरा को 28 साल से अति क समय बी $ुका है।.ैसा विक पहले ही संक े विदया.ा $ुका है, अ ीनMर्थी न्यायालयों क े प्रयासों क े बाव.ूद, प्रासंविगक अ ीनMर्थी न्यायालयों क े रिरकॉड[9] का पुनर्निनमा9र्ण नहीं विकया.ा सका है। इसलिलए,.ैसा विक ऊपर $$ा9 की गई है, हमारे सुविव$ारिर दृविष्टकोर्ण में, पुनः विव$ारर्ण का आदेश देना न्यायविह में नहीं है और यह विकसी भी सार्थी9क उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा। न्यायालय द्वारा बी $ुक े समय को ध्यान में रखा.ाना $ाविहए, और अभय रा. सिंसह (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय द्वारा दी गई $े ावनी को मानकर.ैसा विक सी ाराम (उपरोक्त) क े मामले में ठीक ही विकया गया र्थीा, हम इस पर बल दे सक े हैं। विनष्कष[9]
35. अनुच्छेद 21 क े ह अति कारों क े संरक्षर्ण में विनष्पक्ष कानूनी प्रवि&या की अनुपस्थिMर्थीति में विकसी भी प्रति बं से Mव ंत्र ा की सुरक्षा शाविमल है। विनष्पक्ष कानूनी प्रवि&या में अपील दायर करने वाले व्यविक्त क े लिलए अ ीनMर्थी न्यायालय द्वारा विनकाले गए विनष्कषš पर सवाल उठाने का अवसर शाविमल है। ऐसा भी विकया.ा सक ा है.ब रिरकॉड[9] अपील न्यायालय क े पास उपलब् हो। यह दंड प्रवि&या संविह ा की ारा 385 का अति देश है। इसलिलए, इस न्यायालय क े सुविव$ारिर दृविष्टकोर्ण में, एक सी ा सूत्र विन ा9रिर करना विववेकसम्म नहीं है, हम मान े हैं विक मामले क े विवभिशष्ट थ्यों और परिरस्थिMर्थीति यों पर विनभ9र क ु छ मामलों में ारा क े.नादेश का पालन न करने क े परिरर्णामMवरूप भार क े अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा,.ो हम व 9मान मामले में पा े हैं।
36. ारा 385 की भाषा से प ा $ल ा है विक इसक े द्वारा शाजिस अपील न्यायालय को संबंति अ ीनMर्थी न्यायालय से मामले क े रिरकॉड[9] की मांग करना $ाविहए। यही एक दातियत्व है, एक क 9व्य क े सार्थी शविक्त, और ऐसे रिरकॉडš क े परिरशीलन क े बाद ही विकसी अपील पर विनर्ण9य लिलया.ाएगा।
37. उपरोक्त क े मद्देन.र, अपील को Mवीक ृ ति प्रदान की.ा ी है। विवशेष न्याया ीश (भ्रष्टा$ार विनवारर्ण अति विनयम, 1988), लखनऊ द्वारा वाद सं. 7/1996 में पारिर 07.12.1999 विदनांविक आक्षेविप विनर्ण9य और दोषजिसतिO, उसकी विवषयवM ु को अपाM विकया.ा ा है।
38. आक्षेविप विनर्ण9य में आरोपी को बढ़े हुए.ुमा9ने क े रूप में 25,000 रुपये का भुग ान करने का विनद—श विदया गया र्थीा। उपरोक्त को देख े हुए,.ुमा9ना, $ाहे वह विकसी भी राभिश का हो, यविद.मा विकया गया है, ो अपीलक ाा9र्थी4 को वापस विकया.ाना $ाविहए।
39. व 9मान अनुमति याति$का से हzने से पहले एक और महत्वपूर्ण[9] मुद्दे पर विव$ार विकया.ाना $ाविहए, यानी रिरकॉडš का तिडजि.zलीकरर्ण। प्रौद्योविगकी, व 9मान समय में े.ी से विववाद समा ान और विनर्ण9य की प्रर्णालिलयों क े सार्थी.ुड़ गई है,.ो इस ओर इशारा कर ी है, जि.ससे प्रौद्योविगकी और कानून क े बी$ पूरक और अनुपूरक दोनों रह की परMपर वि&या हो ी है।
40. विदनांक 24.9.2021 को, भार क े सव च्च न्यायालय की विवद्व ई-सविमति ने तिडजि.zल संरक्षर्ण क े लिलए एक एस.ओ.पी..ारी विकया। तिडजि.zलीकरर्ण प्रवि&या क े $रर्ण-दर-$रर्ण काया9न्वयन में अठारह $रर्ण शाविमल हैं। मुख्य रूप से, इसक े लिलए सभी उच्च न्यायालयों को न्यातियक तिडजि.zल रिरपॉजि.zरी (.े. डी. आर.) क े सार्थी-सार्थी इसक े लिलए मानकीक ृ प्रर्णाली Mर्थीाविप करने की आवश्यक ा है; प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक तिडजि.zलीकरर्ण प्रकोष्ठ की Mर्थीापना की.ानी है ाविक इस मामले में विदन-प्रति विदन क े आ ार पर प्रगति की विनगरानी की.ा सक े; विवशेष सेवाओं क े लिलए वेंडर क े सार्थी अनुबं ों का प्रबं न करना सेल का काम है; उच्च न्यायालयों को हM ां रिर विकए गए डेzा पर नज़र रखने और जि.ला न्यायालयों को Mर्थीानां रिर विकए गए रिरकॉड[9] क े प्रत्येक सेz क े लिलए प्राविप्तयों की सुविव ा क े लिलए एक ऑनलाइन डेzा z्रैकिंकग प्रर्णाली; जि.ला न्यायालयों क े पास एक Mव ंत्र रिरकॉड[9] बनाए रख े हुए माजिसक आ ार पर उच्च न्यायालय को Mर्थीानां रिर विकए गए सभी डेzा का बैकअप होना $ाविहए।
41. इसमें संदेह नहीं विकया.ा सक ा है विक यविद विव$ारर्ण न्यायालय क े रिरकॉड[9] ठीक से संरतिक्ष विकए.ा े, ो व 9मान अपील में यह मुद्दा उत्पन्न नहीं हो ा विक क्या उच्च न्यायालय विन$ली अदाल क े अभिभलेख का अवलोकन विकए विबना दोषजिसतिO को बरकरार रख सक ा र्थीा। इस थ्य का न्यातियक संज्ञान लिलया.ा सक ा है विक.ारी विकए गए एस.ओ.पी. क े अनुसार, विवशेष सेवा प्रदान करने वाली विन.ी संMर्थीाओं को अनुबंति विकया गया है, और इसलिलए इस रह क े रिरकॉड[9] क े महत्व और अविनवाय[9] ा को ध्यान में रख े हुए, न्यातियक प्रवि&या क े सु$ारू सं$ालन को सुविव ा.नक बनाने वाले सभी रिरकॉडš की उति$ सुरक्षा और विनयविम अद्य न ा सुविनतिश्च करने क े लिलए जि.म्मेदारी और.वाबदेही की एक म.बू प्रर्णाली विवकजिस की.ानी $ाविहए और इसे बढ़ावा विदया.ाना $ाविहए।
42. इसलिलए, यह न्यायालय विनम्नलिललिख विनद—श.ारी करना उति$ समझ ा हैः
1. उच्च विव$ारर्णों क े महाविनबं क यह सुविनतिश्च करेंगे विक आपराति क मुकदमे क े सार्थी-सार्थी दीवानी मुकदमों क े सभी मामलों में, सभी जि.ला न्यायालयों में अभिभलेखों का तिडजि.zलीकरर्ण विवति व विकया.ाना $ाविहए, अति मान ः प्रवि&या विवति क े ह अपील दायर करने क े लिलए विन ा9रिर समय क े भी र।
2. संबंति जि.ला न्याया ीश, एक बार तिडजि.zलीकरर्ण की प्रर्णाली क े सार्थी-सार्थी तिडजि.zल रिरकॉड[9] क े प्रमार्णीकरर्ण की प्रर्णाली उनक े न्याया ीश रह े लागू हो.ाने पर, यह सुविनतिश्च करें विक इस रह क े तिडजि.zल रिरकॉड[9] का.ल्द से.ल्द सत्यापन विकया.ाए।
3. उपयुक्त विनद—शों क े लिलए संबंति उच्च न्यायालयों को समय -समय पर भे.ी.ाने वाली रिरपोzš क े सार्थी तिडजि.zल रिरकॉड[9] क े रजि.Mzर का विनरं र अद्य न रिरकॉड[9] रखा.ाएगा।
4. अन् ःव 4 आवेदन, यविद कोई हो, विनM ारिर विकया.ा ा/.ा े हैं। ……………………………... [न्यायमूर्ति क ृ ष्र्ण मुरारी] ……………………………... [न्यायमूर्ति सं.य करोल] ारीखः 24 अप्रैल, 2023; Mर्थीानः नई विदल्ली