Jagtar Singh Pudasain Singh v. Jagtar Singh Pudasain Singh

High Court of Punjab and Haryana · 17 Apr 2023
Ajay Rastogi; Bela M. Dwivedi
2008 Civil Appeal No 1497; 2008 Civil Appeal No 1498
2023 INSC 373
civil appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that the right of pre-emption survives until lawful partition is completed by a written order, allowing the plaintiff to maintain his claim despite earlier dismissal by lower courts.

Full Text
Translation output
रपोट करने यो य
भारत के उ तम यायालय म
िसिवल अपीलीय े ािधकार
2008 क िसिवल अपील सं या 1497
झ बर संह (मृतक) कानूनी उ रािधका रय और अ य के मा यम से ...........अपीलकता
बनाम
जगतार संह पु दशन संह ..... ितवादी
के साथ
2008 क िसिवल अपील सं या 1498
बालक राम पु ी संतू एवं अ य .......अपीलकता
बनाम
जगतार संह पु दशन संह ..... ितवादी
िनणय
बेला एम
बेला एम
बेला एम
बेला एम. ि वेदी
ि वेदी
ि वेदी
ि वेदी, जे
जे
जे
जे.
JUDGMENT

1. दोन अपील पंजाब और ह रयाणा उ यायालय, चंडीगढ़ ारा आरएसए सं या 1470/1983 और आरएसए सं या 1557/1983 म पा रत सामा य/आम (common) िनणय और आदेश दनांक 17.08.2007 से उ प होती ह, िजसके तहत उ यायालय ने मूल वादी जगतार संह (वतमान ितवादी के पूवज / पूववत ) ारा दायर उ अपील को वीकार करते ए उनके ारा दायर िसिवल सूट सं या 420/1981 और 421/1981 को िड कर दया, िजसम वह मूल ितवा दय झ बर संह और अ य (वतमान अपीलकता के पूवज / पूववत ) के िखलाफ पूव य का अिधकार / अ क अिधकार / शुफा का अिधकार (right of preemption) का दावा करते ए, वाद भूिम के क जे के िलए िड क मांग कर रहा था। वतमान अपीलकता और ितवादी को मशः मूल ितवादी झ बर संह और मूल वादी जगतार संह के कानूनी उ रािधकारी के प म ित थािपत कया गया है।

2. वतमान अपील को ज म देने वाले त या मक मै स िन ानुसार ह:- (2.1) वादी जगतार संह ारा ितवादी झ बर संह एवं अ य के िव दीवानी वाद सं या 420/1981 दायर कया गया था, 12 बीघे के प रमाण वाली भूिम के संबंध म, जो उस भूिम के 240/819 व िह से को ोितत करता है, िजसका प रमाण 40 बीघे 19 िब वा है, जैसा क वाद के पैरा 1 म व णत है।उ भूिम मूल प से एक जीत संह के वािम व म थी, िजसने इसे 2023 INSC 373 ितवादी झ बर संह और अ य को 46,500/- पये क एवज म पंजीकृत िव य िवलेख दनांक 07.04.1980 ारा बेच दया था। (2.2) िसिवल सूट सं या 421/1981 भी वादी जगतार संह ारा 10 बीघा 18 िब वा के प रमाण वाली भूिम के संबंध म दायर कया गया था जो 40 बीघा और 19 िब वा के प रमाण वाली भूिम के 218/819 व िह से का ितिनिध व करती है जैसा क मूल प से जीत संह और उनक प ी पीर कौर के वािम व वाले वाद के पैरा 1 म व णत है, िजसने ितवादी झ बर संह और अ य को पंजीकृत िब िवलेख दनांक 24.04.1980 के तहत 42,500 / - पये के मू य पर बेचा था। (2.3) दनांक 06.04.1981 को वादी जगतार संह ने वाद भूिम के क जे क मांग करते ए उ दो वाद इस आधार पर फाइल कए क उसे संयु खेवट म सह-िह सेदार के प म उन िव य िवलेख को ी-ए ट करने का े अिधकार था (पूव य का अिधकार) (superior right to pre-empt), हालां क उ वामी जीत संह ारा वादी को िब क कोई सूचना नह दी गई थी। ितवादी झ बर संह और अ य ने ी-ए ट करने के े अिधकार था (पूव य का अिधकार) (superior right to pre-empt), के वादी के दावे को नकारते ए मुकदम का िवरोध कया। (2.4) उ वाद के लंिबत रहने के दौरान, 25.05.1982 को, ितवादी झ बर संह ने सहायक कले टर, तहसील िपहोवा के सम िवभाजन का एक मामला la[;k 78@Vhih दायर कया, िजसम वादी जगतार संह ने अपनी आपि यां दज कराई थी.सहायक कले टर, तहसील, कु े ने िन िलिखत आदेश दनांक 25.05.1982 को िन ानुसार पा रत कया:- - ''........इसिलए जगतार संह और अ य लोग क आपि य को खा रज कया जाता है और िवभाजन के तरीके क पुि क जाती है, जो पहले ही तैयार कया जा चुका है। न शा बे पहले से ही फाइल म संल है य क यह पहले से ही तैयार कया जा चुका है।इसिलए, न शा बे के बारे म आपि य के िलए इस मामले को 31.05.82 को सूचीब कया जाना है। (2.5) त प ात् दनांक 31.07.1982 को सहायक कल टर, तहसील िपहोवा ने िन िलिखत आदेश पा रत कया:- - “आज फाइल पेश क गई है।"पा टय के वक ल मौजूद ह, पटवारी और कानूनगो भी मौजूद ह, िज ह ने पहले के आदेश के अनुसार भूखंड के माग और सीमा के िलए ावधान कया है और िजसके बारे म पा टय को समझाया गया है।पहले इन भूखंड के िलए कोई माग नह था। फर भी खसरा 802/1 और 806 ाम कमोदा से ाम योितसर तक माग दया गया है जो इन गांव को जोड़ता है।दूसरा माग 4-5 एकड़ के बाद पूव दशा म है और य द इन भूखंड को कोई अ य माग नह िमला तो यह इस तरह के माग के िलए सही थान है।िवभाजन के न शा बे के अनुसार िवभाजन वीकृत कया जाता है िजसका िववरण इस कार है: नाम आवं टत खसरा क सं या

1. झ बर संह, बालक राम, सरदार राम, अफसर राम, शेर संह, संतू पु ान िश बू, सभी छह भाग बराबर ह 790/2-792/2-792/1/2-800 2-16, 3-14 0-4 4-0 801 783/2-802/1-806/1 4-0 0-6 3-16 3-16 कुल: 22 बीघा 12 िब वा

2. जगतार संह, णव संह, पल वंदर संह, तरसेम संह पु ान दशन संह। सभी चार भाग बराबर ह। 788-789-783/1-784 3-8 4-11 3-14 4-0 787 2-2 कुलः 17 बीघा 15 िब वा ऊपर के अलावा, नंबर 1 के िलए 802/1-806-790/1-792/1 0-4 0-4 0-2 x नंबर 2 के िलए 792/1 0-2 कुलः 0 - 12 िब वा अब अपील के िलए समय समा होने के बाद इस मामले को 30/8/82 को सूचीब कया जाना है।खुली अदालत म उ ा रत। 31-7-82 एसडी/- ए. सी. ि तीय ेणी िपहोवा" (2.6) यह आगे उभर कर आता है क उसके बाद ितवादी झ बर संह ने ायल कोट के सम एक आवेदन दायर कया था िजसम अ य बात के साथ-साथ वाद म िलिखत बयान म संशोधन क मांग क गई थी क वाद क लंिबतता के दौरान वाद भूिम सिहत संयु खाता को एसी-1 ेड, िपहोवा ारा दनांक 31.07.1982 के आदेश ारा िवभािजत कर दया गया था। इस तरह के संशोधन के प रणाम व प, मुकदमे म दनांक 28.09.1982 के आदेश के तहत ायल कोट ारा एक अित र मु ा तैयार कया गया, " या वाद भूिम का िवभाजन कया गया है ? (2.7) दनांक 12.10.1982 को कले टर गुहला ने सहायक कले टर, िपहोवा ारा पा रत आदेश दनांक 31.07.1982 के िव उ जगतार संह एवं अ य ारा दायर अपील को खा रज कर दया। दनांक 19.10.1982 को उ जगतार संह ने आयु के सम पुनरी ण आवेदन दायर कया था, िजसम आयु ने ारंभ म दनांक 31.07.1982 के आदेश के या वयन के िव दनांक 16.11.1982 तक के िलए थगनादेश दया था, तथािप उ थगन को उसके बाद बढ़ाया नह गया था। (2.8) दोन वाद 420/1981 और 421/1981 िसिवल यायाधीश, एसजेआईआईसी कैथल ारा दनांक 01.12.1982 के िनणय और िड ारा खा रज कर दए गए, िजसम अ य बात के साथ-साथ यह भी कहा गया था क िववाद म खेवट आदेश दनांक 31.07.1982 के अनुसार अब संयु नह रह गया था और यह क वादी ने िनणय और िड पा रत करने क ितिथ पर सह-भागीदार के प म संयु ि थित खो दी थी। वादी जगतार संह ारा क गई थम अपील भी अित र िजला यायाधीश, कु े ारा िनणय और िड दनांक 08.04.1983 ारा खा रज कर दी गई। (2.9) तथािप, वादी जगतार संह ारा उ थम अपीलीय यायालय के िनणय और िड य के िखलाफ दायर क गई आरएसए सं या 1470/83 और आरएसए सं या 1557/83 को उ यायालय ारा दनांक 17.08.2007 के आ ेिपत सामा य िनणय और आदेश ारा अनुमित दी गई।

3. पंजाब भूिम राज व अिधिनयम, 1887 (इसके बाद 'राज व अिधिनयम'के प म संद भत) क धारा 121 म िनिहत ावधान पर भरोसा करते ए अपीलकता (मूल ितवा दय ) के िलए उपि थत िव ान व र वक ल ी नर ा ने तुत कया क िवभाजन के पूरा होने के प ात् राज व अिधकारी का िवभाजन का िलखत तैयार करने और िवभाजन के भावी होने क तारीख िनयत करने का काय केवल एक िन पादक या मं ालयी काय था। जैसे क "न शा बे"पहले से ही तैयार कया गया था जब सहायक कले टर ने आदेश पा रत कया था, और िवभाजन के तरीके के संबंध म ितवादी (मूल वादी जगतार संह) क आपि य को उनके आदेश दनांक 25.05.1982 ारा पहले ही खा रज कर दया गया था, उ "न शा बे"क पुि क गई थी, और उसके बाद पा टय के बीच भूिम के अंितम आवंटन के िलए उ "न शा बे"को "न शा ज़ीम"के प म माना जाना था। उनके अनुसार, उसके बाद सहायक कले टर ने 31.07.1982 को िवभाजन को वीकार करते ए आदेश पा रत कया था, और 12.10.1982 को कले टर के सम जगतार संह ारा दायर उ आदेश के िखलाफ अपील को खा रज कर दया गया था, और इसिलए पूव- य का अिधकार भी य द वाद दायर करने क ितिथ पर वादी जगतार संह के प म मौजूद था, तो 01.12.1982 को दीवानी वाद म िड पा रत करने क ितिथ पर जीिवत नह रहा। उ ह ने आगे कहा क पंजाब ी-ए शन ए ट, 1913 (िजसे इसम इसके बाद ीए शन ए ट कहा गया है) के तहत ीए शन का अिधकार एक कमजोर कार का अिधकार है और थािपत कानूनी ि थित के अनुसार, ी-ए शन का अिधकार न केवल वाद दािखल करने क तारीख को होना चािहए, बि क िड पा रत होने क तारीख को भी अि त व म रहना चािहए। ी ा ने हर देवी बनाम राम जस और अ य (1974 पी पी. एल एल एल एल. जे जे जे जे. 345); लाला राम बनाम िव ीय आयु, ह रयाणा (1991 एससीसी ऑनलाइन पी एंड एच 1105); ीतम संह बनाम जसकौर संह (1992 एससीसी ऑनलाइन पी एंड एच 676) और मुंशी बनाम ह रयाणा िव ीय आयु, ह रयाणा ह रयाणा, चंडीगढ़ (1993 एससीसी ऑनलाइन पी एंड एच 1086) म पंजाब और ह रयाणा उ यायालय के फै सल पर, अपनी तुितय के समथन के िलए, भरोसा कया है।

4. इसके िवपरीत, अपीला थय क ओर से क गई तुितय का िवरोध करते ए यथ क ओर से पेश ए िव ान व र अिधव ा ी राजीव भ ला ने तुत कया क राज व अिधिनयम क धारा 121 के अनुसार, िवभाजन सहायक कले टर ारा िवभाजन क िलखत म अिधसूिचत क जाने वाली तारीख को भावी होता है न क 'न शा बे'या 'न शा ज़ीम'क तैयारी क तारीख को।उनके अनुसार, उ ितिथ राज व का भुगतान करने के िलए पा टय के दािय व का िनधारण करने और अिधकार के रकॉड म वािम व अिधकार को दज करने के उ े य से भी मह वपूण है। ी भ ला ने ह रयाणा भूिम अिभलेख िनयमावली, 2013 म िनिहत िविभ ोफामा पर भरोसा करते ए कहा क सह-भागीदार क ि थित के िवभाजन और िव छेद/ पृथ रण को सहायक कले टर ारा केवल राज व अिधिनयम क धारा 121 और िनयमावली के खंड 18.12 से 18.14 के अनुसार अिधसूिचत कया जा सकता है।िव ान व र अिधव ा ी ा ारा अपीला थय के िलए िजन िनणय पर भरोसा कया गया था, उनम िव ान व र अिधव ा ी भ ला ने तुत कया क उ मामल म सह-अंशधारी क ि थित िवभाजन क िलखत म दी गई तारीख को समा हो गई थी, जब क वतमान मामले म न तो िवभाजन का िलखत तैयार कया गया था और न ही राज व अिधिनयम क धारा 121 के अनुसार सहायक कले टर ारा तारीख िनधा रत क गई थी, और इसिलए यह नह कहा जा सकता था क िवभाजन क कायवाही वाद म पा रत िड य क तारीख से पहले समा हो गई थी। िबशन संह और अ य बनाम खज़ान संह (1) {एआईआर एआईआर एआईआर एआईआर 1958 एससी 838} के मामले म इस यायालय के फै सले पर भरोसा करते ए उ ह ने तुत कया क पूव य का अिधकार / अ क अिधकार (right of pre-emption) ित थापन का अिधकार है और पुनखरीद का अिधकार नह है और इसिलए वादी को अपीलकता- ितवा दय के प म िन पा दत िब िवलेख को मुकदम म चुनौती देने क आव यकता नह थी।

5. प कार के िव ान वक ल ारा उठाए गए ित ं ी तक क बेहतर समझ के िलए, पूव- य अिधिनयम (Pre-emption Act) और राज व अिधिनयम म िनिहत कुछ ावधान को संद भत करना फायदेमंद होगा।पूव- य अिधिनयम (Pre-emption Act) क धारा 4 पूव य के अिधकार / अ क अिधकार (right of preemption) से संबंिधत है जो िन ानुसार है: पूव य ( ी-ए शन) आवेदन का अिधकार. - पूव य ( ी-ए शन) / अ य के अिधकार का अथ होगा कसी ि का कृिष भूिम या गाँव क अचल संपि या शहरी अचल संपि को अ य ि य क वरीयता म ा करने का अिधकार, और यह ऐसी भूिम के संबंध म केवल िब के मामले म और ऐसी संपि के संबंध म केवल िब के मामले म या ऐसी संपि को भुनाने के अिधकार के फोर लोजर के मामले म उ प होता है। इस धारा म कुछ भी एक यायालय को यह अिभिनधा रत करने से नह रोकेगा क एक िब /िव य से िभ ता प यत/किथत प र याग असल म िव य ही है। "

6. धारा 15 ि य क कुछ ेिणय के प म पूव य के अिधकार / अ क अिधकार (right of pre-emption) के िनिहत होने से संबंिधत है।इसका ासंिगक भाग िन ानुसार पुन: तुत कया गया है:- - "15. ऐसे ि िजनम कृ िष भूिम और गाँव क अचल संपि क िब के संबंध म पूव य का अिधकार / अ क अिधकार (right of pre-emption) िनिहत है ~ (1) कृिष भूिम और गाँव क अचल संपि के संबंध म पूव य का अिधकार / अ क अिधकार (right of pre-emption) िनिहत होगा- (क)……. ([k) जहां िब / िव य संयु भूिम या संपि म से एक िह से क है और संयु प से सभी सह-िह सेदार ारा नह क जाती है, -पहला, िव ेता या िव ेता के बेट या बे टय या बेट के बेटे या बे टय के बेट म; दूसरे, िव ेता या िव ेता के भाइय या भाई के पु म; तीसरे, िव ेता या िव ेता के िपता के भाई या िपता के भाई के पु म चौथा, अ य सह-शेयर (सह िह सेदार/ सह-अंशधारी) म; पांचवां, उन का तकार / करायेदार म जो िव ेता या िव ेता के करायेदारी के तहत बेची गई भूिम या संपि या उसके िह से को रखते ह; (ग)....”

7. ी-ए टर को नो टस देने क या धारा 19 म िनधा रत क गई है और ी-ए टर ारा िव ेता/वडर को नो टस देने क या धारा 20 म िनधा रत क गई है। ी-ए शन ए ट क धारा 21 म कहा गया है क ी- ए शन के अिधकार का हकदार कोई भी ि, जब िब या पुरोबंध पूरा हो गया है, उस अिधकार को लागू करने के िलए एक मुकदमा ला सकता है।

8. जहां तक पंजाब भू-राज व अिधिनयम म िनिहत ावधान का संबंध है, अ याय IX "िवभाजन"से संबंिधत है। इसक धारा 111 के अनुसार, िवभाजन के िलए आवेदन भूिम के कसी भी संयु मािलक या करायेदारी के कसी भी संयु करायेदार ारा कया जा सकता है िजसम अिधभोग का अिधकार अि त व म है, राज व अिधकारी को उसम उि लिखत प रि थितय म कया जा सकता है।धारा 111 के तहत आवेदन ा करने पर राज व अिधकारी ारा पालन क जाने वाली या धारा 113 से 120 म िनधा रत है।

9. अ य के िनपटान और अपील से संबंिधत धारा 118 िन ानुसार है िन ानुसार है:- - "118. अ य का िन तारण:-(1) जब संपि के बंटवारे या िवभाजन करने के तरीके के बारे म कोई हो, तो राज व-अिधकारी, ऐसी चोट के बाद, जैसा क वह आव यक समझे, पर अपने िनणय और िनणय के अपने कारण को बताते ए एक आदेश दज करेगा। (2) उप-धारा (1) के तहत एक आदेश क तारीख से पं ह दन के भीतर एक अपील क जा सकती है, और, जब इस तरह क अपील को ाथिमकता दी जाती है और उसके संि थत होने क सूचना राज व-अिधकारी को मािणत क जाती है [उस ािधकारी ारा िजसके िलए अपील क गई है], राज व अिधकारी अपील के िन तारण तक कायवाही पर रोक लगायेगा। (3)…… (4)……”

10. धारा 121 जो िवभाजन के िलखत जो िवभाजन के िलखत/द तावेज से संबंिधत है द तावेज से संबंिधत है द तावेज से संबंिधत है द तावेज से संबंिधत है, हमारे उ े य के िलए ासंिगक होने के कारण िन ानुसार पुन पा दत क जाती है िन ानुसार पुन पा दत क जाती है: "121. िवभाजन क िलखत/द तावेज:- जब एक िवभाजन पूरा हो जाता है, तो राज व अिधकारी िवभाजन क िलखत/द तावेज तैयार करवाएगा, और िजस तारीख को िवभाजन भावी होना है, उसे उसम दज कया जाएगा। ”

11. धारा 123 राज व अिधकारी के ह त ेप के िबना कए गए िवभाजन क पुि से संबंिधत है जो िन ानुसार है है है है: "123. िनजी तौर पर क गई िवभाजन क पुि:- -(1) कसी भी मामले म िजसम राज व-अिधकारी के ह त ेप के िबना एक िवभाजन कया गया है, और पाट िवभाजन क पुि करने वाले आदेश के िलए राज व-अिधकारी को आवेदन कर सकती है। (2) आवेदन ा होने पर, राज व-अिधकारी मामले क जांच करेगा, और य द वह पाता है क िवभाजन वा तव म कया गया है, तो वह इसक पुि करने वाला आदेश दे सकता है और धारा 119, 120, 121 और 122 के तहत आगे बढ़ सकता है, या उन धारा म से कसी के अधीन, जैसी क प रि थितयां अपेि त ह, उसी कार आगे कायवाही कर सकेगा मानो िवभाजन इस अ याय के अधीन वयं को कए गए आवेदन पर कया गया था। ”

12. शु आत म, यह यान दया जा सकता है क वादी जगतार संह, वतमान ितवादी के पूववत, ने खुद को िव ेता जीत संह के साथ संयु खेवट म सह-िह सेदार होने का दावा करते ए मुकदमा दायर कया था और वाद भूिम के क जे के संबंध म ितवादी झ बर संह और अ य के िव इस आधार पर राहत क मांग क थी क सह-िह सेदार के प म उसे िव य को पूव य/ शुफा (pre-empt) करने का एक बेहतर अिधकार था और उसे ऐसी िब /िव य क तारीख को या उससे पहले वाद भूिम के िब /िव य क कोई सूचना नह दी गई थी।ब त ही ढीले ढंग से तैयार कए गए वाद म, वादी ने न तो यह दलील दी थी क वह कैसे सह-भागीदार था, न ही उसने उ जीत संह, वाद भूिम के मािलक, िजसके साथ उसने सह-िह सेदार होने का दावा कया था, को प कार नह बनाया था, और िजसने वाद क भूिम ितवादी झ बर संह व अ य को बेच दी थी।यह कहने क आव यकता नह है क ी-ए शन/पूव य के एक वाद म, िव ेता अथात, वाद भूिम का वामी िजसने किथत तौर पर वादी को िब का कोई नो टस नह दया था जैसा क पूव य/ ी-ए शन अिधिनयम क धारा 19 के तहत दया जाना आव यक है और िजनके/िजसके िखलाफ िब /िव य को पूव य/ शुफा (pre-empt) के अिधकार का दावा कया गया है, वह एक उिचत प होगा, य द आव यक नह भी है, तो भी मुकदमे म शािमल मु पर पूण और अंितम िनणय के िलए वह एक उिचत पाट होगी।

13. जैसा क इस यायालय ारा उ उ उ उ.. आवास एवं िवकास प रषद बनाम ान देवी (2) {एआईआर एआईआर एआईआर एआईआर 1995 एससी 724}, म माना गया है क आव यक प कार वह है िजसके िबना भावी ढंग से कोई आदेश नह दया जा सकता है; और एक उिचत प कार वह है िजसक अनुपि थित म एक भावी आदेश दया जा सकता है ले कन कायवाही म शािमल पर पूण और अंितम िनणय के िलए िजसक उपि थित आव यक है। जब वादी जगतार संह ारा मािलक जीत संह के साथ भूिम म सह-िह सेदार के प म िब के पूव य/ शुफा (pre-empt) करने के अिधकार का दावा कया गया था, यह आरोप लगाते ए क धारा 19 म िनिहत अिनवाय ावधान का अथात ी - ए टर को नो टस देने के िलए, मािलक या िव ेता जीत संह ारा अनुपालन नह कया गया था, पाट ितवादी के प म उनक उपि थित अ य ितवा दय झ बर संह और अ य के साथ, प कार के बीच िववाद को भावी प से और अंितम प से िनपटाने के िलए वांछनीय थी।हालां क, आदेश I, िनयम 9 म कहा गया है क कोई भी मुकदमा गलत पा टय / प कार या असंब पा टय / प कार के होने के कारण ख़ा रज नह होगा, अदालत ारा यह सुिनि त करने के िलए यान रखा जाना चािहए क सभी प, चाहे वह वादी हो या ितवादी, िजनक उपि थित मुकदमे म शािमल मु पर पूण और अंितम िनणय के िलए आव यक है, अदालत के सम ह। यही कारण है क अदालत को आदेश 1, िनयम 10, सीपीसी के अनुसार कायवाही के कसी भी चरण म प कार को हटाने या जोड़ने का अिधकार है।

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14. आगे, वतमान मामले म पूरी तरह से अ प और ढीले ढंग से तैयार कए गए वादप के संबंध म, यायालय संिहता के आदेश VI, िनयम 2(1) म िनिहत दलील के मूल और मूलभूत (का डनल) िनयम को फर से लागू करने के िलए लोिभत/लालाियत है, िजसके अनुसार येक यािचका (अथात्, वादप या िलिखत कथन) म ताि वक त य के संि प म एक कथन होना चािहए, िजस पर प कार, अपने दावे या ितर ा के िलए अिभवचन करता है, जैसा भी मामला हो।िनःसंदेह, अिभवचन म ऐसे सा य शािमल नह होने चािहए िजनके ारा ऐसे भौितक त य को सािबत कया जाना है, फर भी वाद हेतुक अथात् ताि वक त य को तुत करने के िलए आव यक त य का उ लेख कया जाना चािहए।एकल ताि वक त य का िवलोपन वाद हेतुक का अधूरा कारण होगा यािन कारवाई का कारण अधूरा रह जाएगा और उस ि थित म दावे का कथन िविध क दृि से बुरा हो जाएगा।

15. अब, जहां तक िब /िव य के पूव य/ शुफा (pre-emption) के अिधकार का संबंध है, यह यान दया जा सकता है क यह एक ब त ही कमजोर अिधकार है और इसे सभी वैध तरीक से परािजत कया जा सकता है। इस यायालय ने 1958 म िबशन संह और अ य बनाम खज़ान संह और अ य (उपयु ) के मामले म िब /िव य के पूव य/ शुफा (pre-emption) के अिधकार क परेखा िनधा रत क थी। उ उ उ उसम चार यायाधीश क याय पीठ ारा यह मत कया गया था क - 11............... ी-ए शन का अिधकार बेची जाने वाली व तु का अिधकार नह है, बि क बेचे जाने वाली व तु के ताव का अिधकार है।इस अिधकार को ाथिमक या अंत निहत अिधकार कहा जाता है।(2) पूव-िनयोजक को िव य क गई व तु का अनुसरण करने का ि तीयक अिधकार या उपचारा मक अिधकार है।(3) यह ित थापन का अिधकार है कंतु पुनः य का नह अथात पूव-िनयो ा पूरा सौदा करता है और मूल िव ेता क ि थित म कदम रखता है।(4) यह बेची गई पूरी संपि का अिध हण करने का अिधकार है न क बेची गई संपि का िह सा।(5) अिधमान अिधकार का सार होने के कारण वादी को ितवादी या उसके थान पर ित थािपत ि से बेहतर अिधकार होना चािहए।(6) अिधकार एक ब त कमजोर अिधकार होने के कारण, इसे सभी वैध तरीक से परािजत कया जा सकता है, जैसे क कसी व र या समान अिधकार के दावेदार को उसके थान पर ित थािपत करने क अनुमित देना।"

16. उपरो ि थित को इस यायालय ारा बारासात ने अ पताल बनाम कौ तभ मंडल 3 वाले मामले म दोहराया गया था और हाल ही म रघुनाथ (मृत मृत मृत मृत) के मामले म एलआरस बनाम राधा मोहन (मृत मृत मृत मृत) के मामले म एलआरस के मा यम से और अ य 4, िजसम िन िलिखत प म यह मत कया गया हैः- "14. हमने उपरो मु े पर िवचार कया है और इसे िनधा रत करने के िलए, हमने, शु आत म ही, बारासात आई हॉि पटल मामले [बारासात आई हॉि पटल बनाम कौ तभ मंडल, (2019) 19 एससीसी 767:(2020) 4 एससीसी (सीआईवी) 810] म िनणय दया था।इस कार, हमने पूव िनणय के पैरा 10 म पहले के याियक दृि कोण का उ लेख कया है।पूव-अिधकार के ऐितहािसक प र े य से पता चलता है क यह रवाज पर आधा रत मुि लम शासन के आगमन के कारण अपनी उ पि करता है, िजसे बड़े पैमाने पर भारत के उ र म ि थत िविभ यायालय म वीकार कया गया। याियक घोषणा ारा पूव- िनयोजक को दो अिधकार होने का अिभिनधा रत कया गया है।पहला, अंत निहत या ाथिमक अिधकार, जो बेचने के बारे म एक चीज क पेशकश का अिधकार है और बेची गई चीज का पालन करने का ि तीयक या उपचारा मक अिधकार है।यह एक ि तीयक अिधकार है, जो मूल खरीदार के थान पर ित थापन का केवल एक अिधकार है।पूव-िनयोजक यह दखाने के िलए बा य है क उसके पास न केवल खरीदार क तरह अ छे अिधकार है, बि क यह अ छे के अिधकार से बेहतर है और वह भी उस समय जब पूव-िनयोजक अपने अिधकार का योग करता है। हमारे िवचार म, इस अवलोकन को नोट करना ासंिगक है और हम एक बार फर इस बात पर जोर देते ह क अिधकार एक ब त कमजोर अिधकार है और इस कार, उ तर या समान अिधकार के दावे सिहत सभी वैध तरीक से परािजत होने म स म है।

17. इस मोड़ पर, यह उ लेख करना भी उिचत होगा क इस त य के अलावा क हक-शुफ़ा का अिधकार ब त कमजोर अिधकार है और सभी वैध तरीक से परािजत होने म स म है, पूव यािधकारी को यह थािपत करना चािहए क उसे िब क तारीख को, वाद फाइल करने क तारीख को और यायालय ारा िड पा रत करने क तारीख को हकशफ़ा ारा लेना का अिधकारथा। पूव यािधकारी या दावेदार-वादी को, जो िव य क तारीख को िव य को पूव- िनयोिजत करने के अिधकार का दावा करता है, यह भी सािबत करना होगा क ऐसा अिधकार थम यायालय क िड के पा रत होने तक बना रहेगा।य द दावेदार-वादी उस अिधकार को खो देता है या वादी वाद के यायिनणयन से पहले दावेदार के बराबर या उससे ऊपर अपने अिधकार म सुधार करता है, तो हक शुफ़ा का वाद िवफल हो जाएगा।

18. इस यायालय ने 1971 से भगवान दास (मृत मृत मृत मृत) ारा एलआरस और अ य बनाम चेत राम 5 के मामले म कानून के इस ताव को अ छी तरह से तय कया है। उ मामले म, इस यायालय ने रामजी लाल और अ य बनाम पंजाब रा य और अ य 66 एयर 1966 पी एंड एच 374 वाले मामले म पंजाब उ यायालय के पूण यायपीठ के िविन य का अनुमोदन कया था, िजसने यह िनणय दया था क िड क तारीख तक हकशफ़ा ारा लेने के िलए पूव यािधकारी को अपनी अहता बनाए रखनी चािहए।

19. याम सुंदर और अ य बनाम राम कु मार और अ य 7 7 (2001) 8 एससीसी 24 के मामले म भी संिवधान पीठ इस मु े क जांच करते समय क या हक-शुफ़ा के वाद म, ीए टर को िब क तारीख को और थम यायालय क िड क तारीख को ीए ट करने का अिधकार होना चािहए, और या उस अिधकार क हािन िड क तारीख के बाद या तो अपने वयं के काय ारा या उसके िनयं ण से परे कसी काय ारा या िवधान म कसी प ा वत प रवतन ारा, जो पहली बार के यायालय क िड के िखलाफ दायर अपील के लंिबत रहने के दौरान वतन म संभािवत है, कुछ िस ांत िनधा रत कए गए ह, जो पंजाब ह रयाणा और उ यायालय ारा रामजी लाल बनाम पंजाब रा य म दए गए पूण पीठ के िनणय सिहत िविभ िनणय का िव ेषण करने के बाद पूव-ए टर के अिधकार को भािवत करेगा या नह ।

10. िनणय क थम ेणी म िन द पूव िविन य के िव ेषण पर, जो िविधक िस ांत उभरते ह वे िन िलिखत हः

1. ीए टर को िव य क तारीख, वाद फाइल करने क तारीख और यायालय ारा िड पा रत करने क तारीख को ीए ट करने का अिधकार अव य होना चािहए।

2. ऐसे ीए पटर, जो िव य क तारीख को िव य को ीए पट करने के अिधकार का दावा करता है, यह सािबत करना चािहए क ऐसा अिधकार थम यायालय क िड के पा रत होने तक बना रहा। य द दावेदार उस अिधकार को खो देता है या कोई ितवादी वाद के यायिनणयन से पहले दावेदार के अिधकार के बराबर या उससे ऊपर अपने अिधकार म सुधार करता है, तो हक-शुफ़ा के िलए वाद िवफल हो जाना चािहए।

3. एक ीए पटर, िजसे वाद के दायर कए जाने क तारीख और िड पा रत कए जाने क तारीख को िव य को ीए ट करने का अिधकार है, थम यायालय क िड के प ात् ऐसे अिधकार क हािन से उसके हक-शुफ़ा के वाद के अिधकार या अनुर णीयता पर कोई भाव नह पड़ेगा।

4. एक ीए पटर, िजसने िव य क तारीख, वाद फाइल करने क तारीख और थम यायालय ारा िड पा रत करने क तारीख को अपने अिधकार को सािबत करने के प ात् थमतः यायालय ारा पूव भाव के िलए िड अिभ ा कर ली है, िड के िव फाइल क गई अपील के लंिबत रहने के दौरान प ातवत िवधान ारा ऐसा अिधकार तब तक नह छीना जा सकता है जब तक क ऐसे िवधान का भूतल ी भाव न हो।"

20. उपरो कानूनी ि थित को यान म रखते ए, आइए हम इस बात क जांच कर क या ीए पटर अथात् वादी जगतार संह ने मूल वामी-िव ेता जीत संह ारा िव य िवलेख के िन पादन क तारीख से लेकर वाद दािखल करने क तारीख तक और पहली बार यायालय ारा िड पा रत करने क तारीख तक हक-शुफ़ा करने के अपने े अिधकार को थािपत कया था। 21 त य को पुनः तुत करते ए, ऐसा तीत होता है क उ वादी जगतार संह, वतमान ितवादी के पूववत, ने 06.04.1981 को वाद को दायर कया था, िजसम संयु खेवट म सह- िह सेदार होने के आधार पर िब को रोकने के अपने व र अिधकार का दावा करते ए वादप म अ य बात के साथ-साथ यह आरोप लगाया गया था क वाद भूिम के मूल वामी जीत संह ने ितवादी झ बर संह और अ य, वतमान अपीलकता के पूवव तय के प म, वादी को कोई नो टस दए िबना, 07.04.1980 और 24.04.1980 को पंजीकृत िव य िवलेख को िन पा दत कया था। चूं क यह िववा दत नह था क वादी जगतार संह वष 1978-1979 के िलए जमाबंदी (अनुल क पी-1) के अनुसार संयु खेवट म सह-िह सेदार था, इसिलए यह सुरि त प से अिभिनधा रत कया जा सकता है क वादी को गत िव य िवलेख के िन पादन क तारीख को और वाद दािखल करने क तारीख को भी पूव- भाव का अिधकार था।

22. तथािप, मु य मु ा जो हमारे सम िवचाराथ आया है, वह यह है क या वादी जगतार संह को िनचली अदालत ारा िड पा रत करने क तारीख अथात 01.12.1982 को पूव िनणय करने का अिधकार था।

23. जैसा क पहले कहा गया है, वाद के लंिबत रहने के दौरान, ितवादी झ बर संह ने सहायक कले टर के सम गत भूिम के संबंध म िवभाजन का मामला सं या 78/टीपी दायर कया था, िजसम वादी जगतार संह ने अपनी आपि यां दायर क थ ।सहायक कले टर ने दनांक 25.05.1982 के आदेश ारा जगतार संह क आपि य को अ वीकार कर दया था और "न शा बी" के बारे म आपि य के िलए 31.05.1982 को मामला सूचीब कया था, जो पहले से ही तैयार था और फाइल के साथ संल था।अिभलेख से पता चलता है क 31.07.1982 को सहायक कले टर ने प कार क उपि थित म भूखंड के माग और सीमा का उपबंध कया और 'न शा बी' के अनुसार िवभाजन का यौरा देते ए आदेश पा रत कया िजसम यह उ लेख कया गया था क कौन सा खसरा नंबर झ बर संह को आवं टत कया जाएगा और कौन सा खसरा नंबर जगतार संह को आवं टत कया जाएगा।

24. िवचारण यायालय ने पंजाब और ह रयाणा उ यायालय के िविभ फै सल पर िवचार- िवमश करने के प ात् यह अिभिनधा रत कया क सहायक कले टर ारा दनांक 31.07.1982 को पा रत आदेश के अनुसार िववाद म खेवट अब संयु नह रहा था और वादी ने उस तारीख को सह-िह सेदार क अपनी ि थित खो दी थी।इसिलए, िवचारण यायालय के अनुसार, वादी के पास िड क तारीख को सह-िह सेदार का दजा नह था।वादी जगतार संह ारा पेश क गई अपील म थम अपीलीय यायालय ने, िवचारण यायालय ारा पा रत िनणय और िड य क पुि करते ए और वादी क अपील को खा रज करते ए दनांक 08.04.1983 के िनणय और िड ारा अिभिनधा रत कया क जैसे ही 31.07.1982 का आदेश सहायक कले टर ारा पा रत कया गया था, प कार के बीच संयु संबंध समा हो गया था और यह क वादी िववाद म भूिम का सह-िह सेदार नह रहा था।

25. तथािप, मूल वादी जगतार संह ारा तुत दूसरी अपील म उ यायालय ने िनचले दो यायालय ारा अिभिलिखत समवत िन कष को उलट दया और अ य बात के साथ-साथ यह अिभिनधा रत करते ए क िड के पा रत होने क तारीख को राज व अिधकारी ारा िवभाजन का कोई िलखत नह ख चा गया था और इसिलए यह नह कहा जा सकता था क प कार क संयु ि थित समा हो गई थी या वादी ने हक-शुफ़ा का अपना े अिधकार खो दया था। उ यायालय ने आ ेिपत आदेश पा रत करते समय ीतम संह बनाम जसकौर संह 8 वाले मामले म अपने पूव िनणय का अनुसरण कया था।

26. हमारी राय म, उ यायालय ारा आ ेिपत आदेश म कए गए दृि कोण पर अिभमत देना क ठन है क चूं क िवचारण यायालय ारा िड पा रत करने क तारीख को िवभाजन का कोई िलखत नह ख चा गया था, इसिलए प कार क संयु ि थित समा नह ई थी। प कार के िव ान अिधव ा ारा पंजाब भू-राज व अिधिनयम और ह रयाणा भू-अिभलेख मैनुअल म िनिहत ावधान पर िविधवत िवचार करने के बाद, यह प प से सामने आता है क भू-राज व अिधिनयम क धारा 118 के अनुसार, जब संपि को िवभािजत करने या िवभाजन करने के तरीके के बारे म कोई सवाल है, तो राज व अिधकारी को ऐसी जांच के बाद, जो वह आव यक समझता है, पर अपना िनणय बताते ए एक आदेश दज करना और िनणय के िलए अपने कारण को दज करना आव यक है। धारा 118 क उपधारा 2 म संपि के िवभाजन के या िवभाजन करने के तरीके पर राज व अिधकारी के िनणय से अपील कए जाने का ावधान है।इस कार, भूिम राज व अिधिनयम क धारा 118 (2) के तहत पा रत अपील म आदेश के िखलाफ कोई और अपील का ावधान नह है। धारा 119, धारा 112 के खंड 2 म िन द िवभाजन से अपव जत संपि के शासन से संबंिधत है, िजससे हमारा कोई संबंध नह है। धारा 120 िवभाजन के बाद राज व और कराए के िवतरण से संबंिधत ावधान के बारे म है।

27. सुसंगत धारा 121 म कहा गया है क जब िवभाजन पूरा हो जाएगा तो राज व अिधकारी िवभाजन का एक िलखत तैयार कराएगा और उस तारीख को, िजसको िवभाजन भावी होना है, उसम अिभिलिखत कराएगा।य द धारा 121 म अंत व उ उपबंध को बारीक से पढ़ा जाए तो यह प प से तीत होता है क यह िवभाजन के पूरा होने के बाद राज व अिधकारी ारा अपनाई जाने वाली या के बारे म है।इसका अथ यह है क िवभाजन के बाद राज व अिधकारी को िवभाजन क एक िलखत तैयार करानी होगी और उसम उस तारीख को अं कत करना होगा िजस तारीख को िवभाजन भावी होना है।इसिलए, जब संपि के िवभाजन के पर धारा 118 म अनु यात जांच, या िवभाजन करने का तरीका राज व अिधकारी ारा कया जाता है, और ऐसे िनणय के कारण के साथ पर उसके िनणय को बताते ए एक आदेश पा रत कया जाता है, तो िवभाजन को अपील के िनणय के अधीन रहते ए पूरा माना जाता है जो धारा 118 क उप-धारा 2 म अनु यात ऐसे आदेश के िखलाफ दायर कया जा सकता है।

28. यह नोट करना ासंिगक है क पंजाब भूिम राज व अिधिनयम क धारा 117 राज व अिधकारी को कसी संपि म, िजसके वािम व क मांग क गई है, या तो वयं ारा या स म यायालय ारा िनधा रत कए जाने वाले को िन द करने के पर िनणय करने का िववेकािधकार दान करती है।इस कार, िवभाजन के मामल म राज व अिधकारी क अिधका रता िसिवल यायालय के साथ समवत है।अतः, भू-राज व अिधिनयम क धारा 121 का िनवचन करने के योजन के िलए, यायालय सुरि त प से आदेश 20, िनयम 18 सी. पी. सी. म अंत व उपबंध से एक सादृ य िनकाल सकता है, जो संपि के िवभाजन के िलए िड पा रत करने से संबंिधत या से संबंिधत है।उ ावधान इस कार हैः - "18. संपि के िवभाजन या उसम कसी िह से के पृथक क जे के िलए वाद म िड । िड । िड । िड ।- -जहां यायालय संपि के िवभाजन के िलए या उसम िह से के पृथक् क जे के िलए िड पा रत करता है, वहां - (1) य द और जहां तक वह िड सरकार को राज व के भुगतान के िलए िनधा रत कसी संपदा से संबंिधत है, तो िड संपि म िहतब कई प कार के अिधकार क घोषणा करेगी, ले कन ऐसी घोषणा के अनुसार और धारा 54 के उपबंध के साथ कले टर या उसके ारा इस संबंध म ितिनयु कसी राजपि त अधीन थ ारा ऐसे िवभाजन या पृथ रण का िनदेश देगी; (2) य द और जहां तक ऐसी िड कसी अ य थावर संपि या जंगम संपि से संबंिधत है, तो यायालय, य द िवभाजन या पृथ रण िबना अित र जांच के सुिवधाजनक प से नह कया जा सकता है, तो संपि म िहतब अनेक प कार के अिधकार क घोषणा करते ए और ऐसे अित र िनदेश देते ए एक ारंिभक िड पा रत कर सकता है जो अपेि त हो।"

29. शुब करण बुबना उफ शुब करण साद बुबना बनाम सीता सरन बुबना और अ य 9 (2009) 3 एससीसी (सीआईवी सीआईवी सीआईवी सीआईवी) 820 के मामले म इस यायालय को आदेश 20, िनयम 18 म िनिहत किथत ावधान पर िवचार करने का अवसर िमला और यह िन िलिखत प म देखा गयाः- "7.... कसी शेयर के िवभाजन या पृथ रण के वाद म, थम चरण म यायालय यह िनणय करता है क या वादी का वाद संपि म िह सा है और या वह िवभाजन और पृथक् क जे का हकदार है।इन दोन मु पर िनणय एक याियक काय का योग है और पहले चरण के िनणय को संिहता के आदेश 20 िनयम 18 (1) के तहत िड कहा जाता है और इसे संिहता के आदेश 20 िनयम 18 (2) के तहत ारंिभक िड माना जाता है।माप और सीमा के अनुसार पा रणािमक िवभाजन, िनयम 18 (1) के तहत भौितक िनरी ण, माप, गणना और िवभाजन के िविभ मप रवतन/संयोजन/िवक प पर िवचार करने के िलए आव यक एक मंि तरीय या शासिनक काय माना जाता है और िनयम 18 (2) के तहत अंितम िड का िवषय है।

30. य द उ उपमा िवभाजन से संबंिधत पंजाब भू-राज व अिधिनयम म अंत व उपबंध के िलए लागू क जाती है तो हमारी यह राय है क जब स पि के िवभाजन और िवभाजन के तरीके के पर राज व अिधकारी ारा धारा 118 के अधीन कोई िनणय िलया जाता है तो प कार के अिधकार और ाि थित िविनि त हो जाती है और िवभाजन पूरा हो गया समझा जाता है।इस तर पर, ऐसे िनणय को िड के प म माना जाना आव यक है।भू-राज व अिधिनयम क धारा 121 म यथा अनु यात िवभाजन िलखत तैयार करने क पा रणािमक कारवाई केवल राज व अिधकारी के सम संि थत िवभाजन के मामले को पूरी तरह िनपटाने के िलए कया जाने वाला मं ालयी या शासिनक काय होगा। इसिलए, एक बार धारा 118 के तहत राज व अिधकारी ारा िवभािजत क जाने वाली संपि और िवभाजन के तरीके पर िनणय लेने के बाद, ऐसे िनणय क तारीख पर पा टय क संयु ि थित, अपील म िनणय के अ यधीन, य द कोई हो, अलग हो जाएगी। उसके बाद िवभाजन का एक िलखत तैयार करने क प रणामी कारवाई होगी।इसिलए केवल इसिलए नह कहा जा सकता था क िवभाजन का द तावेज तैयार नह कया गया था, यह नह कहा जा सकता था क िवभाजन पूरा नह आ था या पा टय क संयु ि थित को नह तोड़ा गया था।

31. भूिम राज व अिधिनयम क धारा 121 के पहले भाग म कहा गया है क जब कोई िवभाजन पूरा हो जाता है।इसका अथ यह है क जब बंटवारे क जाने वाली संपि य और िवभाजन के तरीके से संबंिधत मु े का िनणय राज व अिधकारी ारा कया जाएगा, तो िवभाजन क िलखत तैयार करने और िवभाजन क तारीख दज करने के िलए धारा 121 का उ रा लागू होगा।धारा 121 के उ रा म िनिहत के प म क जाने वाली ऐसी कारवाई केवल एक िन पादक काय या शासिनक काय होगा, जो राज व अिधकारी के सम पाट ारा संि थत िवभाजन के मामले को पूरी तरह से िनपटाने के िलए कया जाएगा। जैसा क िसिवल वाद म िड के मामले म होता है, यायिनणयन िववाद के मामले के संबंध म प कार के अिधकार का िनणायक प से िनणय करता है, हालां क िड ारंिभक होगी जब वाद को पूरी तरह से िनपटाने से पहले आगे क कायवाही करनी होगी।इसी तरह, जब राज व अिधकारी ारा धारा 118 के तहत िनणय िलया जाता है, तो िवभाजन पूरा हो जाएगा, अिधिनयम के तहत िनधा रत सीमा अविध के बाद पा टय क संयु ि थित अलग हो जाएगी और संयु नह रहेगी।िवभाजन का िलखत तैयार करने क आगे क कायवाही केवल एक िन पादक या मं ालयी काय होगा जो िवभाजन के मामले को पूरी तरह से िनपटाने के िलए कया जाएगा।

32. जहां तक वतमान मामले के त य का संबंध है, सहायक कले टर अथात्, संबंिधत राज व अिधकारी ने दनांक 25.05.1982 के आदेश ारा वादी जगतार संह और अ य लोग ारा िवभाजन के तरीके के संबंध म उठाई गई आपि य को अ वीकार कर दया था और तदनुसार िवभाजन के तरीके क पुि क थी।उस दन न शा बी पहले से ही फाइल के साथ संल था और न शा बी के बारे म आपि य क सुनवाई के िलए यह मामला 31.05.1982 को सूचीब कया गया था।31.07.1982 को सहायक कले टर ने अ य बात के साथ-साथ यह कहते ए आदेश पा रत कया क पटवारी और कानूगो उपि थत थे, और उ ह ने प कार को लॉट के माग और सीमा के बारे म समझाया था, और यह क न शा बी के अनुसार, िवभाजन वीकार कया गया था।उ आदेश म दोन प अथात झ बर संह और अ य तथा जगतार संह को आवं टत खसर क सं या के यौरे का भी उ लेख कया गया है। उ "न शा बी" के अनुसार िवभाजन को वीकार करने के बाद दल का संयु दजा समा हो गया था।बेशक, 31.07.1982 दनां कत किथत आदेश को वादी जगतार संह ारा कले टर के सम एक अपील के प म चुनौती दी गई थी, िजसने 12.10.1982 दनां कत आदेश ारा उसे खा रज कर दया था. कले टर के उ आदेश को उ जगतार संह ारा आयु के सम पुनरी ण आवेदन दािखल करके चुनौती दी गई थी।हालां क, आयु ने शु म 31.07.1982 से 16.11.1982 तक के आदेश के संचालन के िखलाफ थगन क अनुमित दी थी, बेशक उ थगन को उसके बाद आगे नह बढ़ाया गया था।इन प रि थितय म, प कार क संयु टेटस 31.07.1982 को समा हो गई थी जब सहायक कल टर ने आदेश पा रत कया था और जब 19.10.1982 को कले टर ारा इसक पुि क गई थी। िनचली अदालत और अपीलीय अदालत ने इन प रि थितय म सही फै सला सुनाया था क वादी जगतार संह को िड क तारीख यानी 01.12.1982 को सह-िह सेदार का दजा ा नह था और वाद म िड के पा रत होने क तारीख तक उसका अिधकार नह बचा था।हमारी राय म उ यायालय ने पंजाब ी-ए शन ए ट और लड रेवे यू ए ट के ावधान क गलत ा या और ायल कोट और अपीलीय कोट ारा पा रत फै सल और िड य को र करने म बड़ी गलती क है।

33. इस मामले क दृि से, उ यायालय ारा पा रत आ ेिपत सामा य आदेश को खा रज और अपा त कया जाना चािहए और तदनुसार अपा त कया जाता है।तदनुसार दोन अपील क अनुमित दी जाती है।..... जे. [अजय र तोगी]..... जे. [बेला एम. ि वेदी] नई द ली; 17.04.2023 vLohdj.k%& LFkkuh; Hkk’kk esa vuqokfnr fu.k;Z oknh ds lhfer mi;ksx ds fy, gS rkfd og viuh Hkk’kk esa bls le> lds vkSj fdlh vU; m|s”; ds fy, bldk mi;ksx ugha fd;k tk ldrk gSA lHkh O;ogkfjd vkSj vkf/kdkfjd m|s”;ks ds fy, fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd gksxk vkSj fu’iknu vkSj dk;kZUo;u ds m)s”; ds fy, mi;qDr jgsxkA