Rajasthan State v. Asharam @ Ashumal

Supreme Court of India · 17 Apr 2023
Sanjiiv Khanna; M. M. Sundresh
Criminal Appeal No 1156 of 2023 @ SLP (Criminal) No 2044 of 2022
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court set aside the High Court's order allowing additional evidence under Section 391 CrPC to summon a police officer as witness, holding that such power must be exercised sparingly and only when necessary for just decision.

Full Text
Translation output
रिपोर्टेबल
भारत का सर्वोच्च्च न्यायालय
आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपीलीय संख्या 1156/2023
(विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 2044/2022 से उत्पन्न)
राजस्थान राज्य - अपीलकर्ता (ओं)
बनाम
आशाराम @आशुमल - प्रतिवादी (ओं)
निर्णय
संजीव खन्ना, न्यायाधीश
JUDGMENT

1. अनुमति दी गई।

2. राजस्थान राज्य द्वारा दायर की गई वर्तमान अपील में राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर (संक्षेप में 'उच्च न्यायालय') द्वारा दिनांक 10.02.2022 को पारित निर्णय पर आपत्ति व्यक्त की गई है, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (संक्षेप में, 'सी.आर.पी.सी.') की धारा 391 के तहत प्रत्यर्थी-आशाराम उर्फ आशुमल द्वारा दायर आवेदन (डी. बी. आपराधिक अपील संख्या 123/2018 में डी. बी. आपराधिक विविध आवेदन संख्या 1/2021) को मंजूरी दी गई है, और अजय पाल लांबा, जो अगस्त 2013 में पुलिस उपायुक्त (पश्चिम), जोधपुर, राजस्थान के पद पर तैनात थे और जिन्होनें 'गनिंग फॉर द गॉडमैनः आसाराम बापू की सजा के पीछे की कहानी' (संक्षेप में 'पुस्तक') नामक पुस्तक को लिखा, को तलब करने और साक्ष्य दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।

3. प्रत्यर्थी-आशाराम उर्फ आशुमल पर दिनांक 06.11.2013 को आरोप-पत्र दायर किया गया था और लगभग पांच साल तक चलने वाले विचारण के बाद, न्यायाधीश, विशेष न्यायालय, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (संक्षेप में, 'पोक्सो अधिनियम'), जोधपुर, राजस्थान द्वारा दिनांक 25.04.2018 को पारित निर्णय के अनुसार, उसे भारतीय दंड संहिता, 1860, की धारा 370 (4), 342, 354-ए, 376 (2) (एफ), 376-डी, 506, 509/34 और 120-बी, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 (संक्षेप में, 'किशोर न्याय अधिनियम') की धारा 23 और 26, और पोक्सो अधिनियम की धारा 5 (एफ)/6, 5(जी)/6 और 8 के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है। उन्हें अलग-अलग अवधियों के लिए सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई और उनके शेष नैसर्गिक जीवन के लिए आजीवन कारावास की सजा जुर्माने और डिफ़ॉल्ट शर्तों के साथ सुनाई गई है।

4. इससे पहले, पीड़ित ने 19 व 20.08.2013 की दरमियानी रात को 11:55 बजे एक हस्तलिखित शिकायत (प्रदर्श पी-4) दी थी, जिसके अनुसरण में दिनांक 20.08.2013 को कमला मार्के ट पुलिस थाना, सेण्ट्रल डिस्ट्रीक्ट, दिल्ली में 2.30 बजे 'जीरो' प्राथमिकी (प्रदर्श पी-11) दर्ज की गई। पीड़ित से बात की गई और उसने एक गैर-सरकारी संगठन (संक्षेप में, एन. जी. ओ.) के साथ बातचीत की और एन. जी. ओ. द्वारा एक प्रतिवेदन (प्रदर्श डी-4) दिनांकित 20.08.2013 तैयार किया गया। उसी दिन, पीड़िता नई दिल्ली में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित हुई थी और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत उसका बयान (प्रदर्श पी-7) दर्ज किया गया था। जैसा कि अपराध जोधपुर में किया गया था, अतः जांच सक्षम अधिकार क्षेत्र के पुलिस थाने को स्थानांतरित कर दी गई थी और इसके परिणामस्वरूप, दिनांक 21.08.2013 को शाम 6:15 बजे प्राथमिकी संख्या 122/2013 (प्रदर्श पी-106) पुलिस थाना महिला पश्चिम, जोधपुर जिला, राजस्थान में दर्ज की गई।

5. मामले की जांच चंचल मिश्रा, तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (संक्षेप में, 'एसीपी') (पश्चिम), जोधपुर, राजस्थान द्वारा की गई थी, जिन्होंने पी.डब्ल्यू.-43 के रूप में गवाही दी है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जांच अधिकारी चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) ने दिनांक 21.08.2013 को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत पीड़िता का बयान दर्ज किया था। किसी कारण से, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत 21.08.2013 को दर्ज किए गए पीड़िता के पूरे बयान को प्रदर्श डी-2 (क्या दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अधीन अभिलिखित संपूर्ण कथन को प्रदर्शित किया जा सकता है और साक्ष्य में पढ़ा जा सकता है या नहीं, यह वर्तमान अपील की विषय वस्तु नहीं है और हम इस पहलू पर कोई टिप्पणी या विचार नहीं कर रहे हैं।) के रूप में चिह्नित किया गया है। जांच अधिकारी चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) से दिनांक 09.07.2015 और 03.03.2016 के बीच कु ल ग्यारह तिथियों पर परीक्षण और प्रति परीक्षण किया गया। पीड़िता, जिसने पी.डब्ल्यू.-5 के रूप में अभिसाक्ष्य दिया है, से दिनांक 11.04.2014 और 13.06.2014 के बीच कु ल ग्यारह तिथियों पर परीक्षण और प्रति परीक्षण किया गया।

6. चूंकि हमारे विचार के लिए एक सीमित मुद्दा उठता है और यह ध्यान में रखते हुए कि प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल द्वारा की गई अपील उच्च न्यायालय के समक्ष न्यायनिर्णयन के लिए लंबित है, हम विस्तृत रूप से साक्ष्य का उल्लेख करने से बचेंगे और इसके गुण दोष पर कोई राय व्यक्त करने से बचेंगे, हालांकि हम खुद को अपने सामने उठाए गए मुद्दे के रिकॉर्ड तक ही सीमित रखेंगे।

7. 2021 में (आवेदन दाखिल करने की सही तारीख अभिलेख पर उपलब्ध नहीं है), प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 के तहत एक आवेदन (संक्षेप में, 'आवेदन') दायर किया, जिसमें आक्षेपित निर्णय पारित किया गया है, उसमें आरोप लगाया गया है कि पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5 ) 'कु टिया' के रूप में वर्णित घर के अंदर कभी नहीं गई और इसलिए, प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल के खिलाफ पूरा मामला कि उसने पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) का यौन शोषण और बलात्कार किया था, झूठा और मनगढ़ंत है। आवेदन में दावा किया गया है कि पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) को पुलिस द्वारा दिनांक 22.08.2013 को घटनास्थल पंचनामा/नक्शा मौका के लिए पहली बार 'कु टिया ए' में लाया गया था, जिस दौरे का विधिवत वीडियो (प्रदर्श पी-70) बनाया गया था और उसके बाद, कॉम्पैक्ट डिस्क (आर्टिकल-16) द्वारा एक प्रतिलेखन तैयार किया गया था, और नक्शा मौका (प्रदर्श पी-13 और पी-14) तैयार किए गए थे। यह आरोप लगाया गया है कि दिनांक 22.08.2013 को जिस दिन पंचनामा घटना स्थल /नक्शा मौका तैयार किया गया, पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) को उससे एक दिन पूर्व दिखाए गए अपराध स्थल की वीडियोग्राफी के आधार पर प्रशिक्षित किया गया था। इस संदर्भ में, आवेदन में दर्ज है कि राजस्थान के जोधपुर में तत्कालीन पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) अजय पाल लांबा ने पुस्तक में खुलासा किया है कि उन्होंने दिनांक 21.08.2013 को जब 'कु टिया' पर वे पहली बार गए उस दौरान अपने मोबाइल फोन से अपराध स्थल का एक वीडियो रिकॉर्ड किया था, जो नक्शा मौका (प्रदर्श पी-13 और पी-14) बनाने की दिनांक 22.08.2013 से ठीक एक दिन पहले का था। आवेदन में दावा किया गया है कि नक्शा मौका (प्रदर्श पी-13 और पी-14) गलत हैं और उन्हें खारिज कर दिया जाना चाहिए। यह आरोप लगाया गया है कि वीडियो रिकॉर्डिंग (आर्टिकल-15) और दिनांक 21.08.2013 को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) के बयान (प्रदर्श डी-2) के बीच विसंगति है। यदि 'कु टिया' का विवरण, जैसा कि पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) द्वारा दिया गया है, जो अभियोजन पक्ष के वाद के अनुसार, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत पहली बार दिनांक 21.08.2013 को उसके बयान (प्रदर्श डी-2) में दिया गया था, को झूठा मान कर अस्वीकार कर दिया जाता है, तो अभियोजन पक्ष दिनांक 15.08.2013 को अपराध स्थल पर पीड़िता (पीडब्लू-5) की उपस्थिति को प्रतिवादी-आशाराम @आशुमल के साथ जोड़ने में समर्थ नहीं होगा, जिस तारीख को अपराध कथित रूप से किया गया था।

8. आक्षेपित निर्णय पुस्तक के एक भाग के उद्धरणों को संदर्भित करता है, जिसमें अजय पाल लांबा ने कहा है कि 2022 की अपराध के बारे में जानकारी होने पर उन्होंने तुरंत कार्रवाई की और स्कै न करने और घटनास्थल की जांच करने के लिए एक पुलिस दल भेजा। अजय पाल लांबा ने सब-इंस्पेक्टर मदन बेनीवाल को जांच पूरी होने तक पूरे परिसर को सील और सुरक्षित करने के लिए कहा था। इसके साथ ही दिनांक 10.02.2022 को दिए गए आक्षेपित फै सले में अजय पाल लांबा के दावे को उद्धृत किया गया है- “किसी भी स्थिति में, यह मानना बहुत गलत नहीं होगा कि प्राथमिकी दर्ज करने में हुए विलंब के कारण बहुत अधिक फोरेंसिक साक्ष्य [अपराध स्थल पर] नहीं पाए जाएंगे..., ” क्योंकि अपराध दिनांक 15.08.2013 को हुआ था, जबकि प्राथमिकी संख्या 122/2013 (प्रदर्श पी-106) दिनांक 21.08.2013 को दर्ज की गई थी। फिर भी, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 के तहत अजय पाल लांबा को तलब करने और साक्ष्य दर्ज करने के आवदेन को अनुमति मुख्य रूप से पुस्तक में अजय पाल लांबा के निम्नलिखित बयान पर भरोसा करते हुए दी गई है:- "जब मैं वहां था, मैंने सोचा कि मेरे मोबाइल फोन पर उस स्थान का एक वीडियो बनाना समझदारी होगी, अगर मुझे जांच के दौरान किसी बिंदु पर इसका उल्लेख करने की आवश्यकता हुई, और इसलिए, मैंने यह किया।"

9. आक्षेपित निर्णय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 और 391 से संबंधित निर्णयों को संदर्भित करता है, यह कहना कि उच्च न्यायालय के लिए यह टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी कि क्या पीड़ित (पी.डब्ल्यू.-5) को अपराध स्थल की कु छ वीडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर सिखाया गया था, जैसा कि अजय पाल लांबा द्वारा लिखित पुस्तक में उल्लेख किया गया है, उनका परीक्षण और रिकॉर्डिंग साक्ष्य के तौर पर इस तथ्य के मद्देनजर महत्वपूर्ण है कि बचाव पक्ष ने पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) और जांच अधिकारी चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) को निश्चित सुझाव दिए थे कि अपराध स्थल की वीडियो रिकॉर्डिंग पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) को दिखाई गई थी और उसके आधार पर पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) को अपराध स्थल से परिचित कराया गया था। आक्षेपित निर्णय में कहा गया है कि बचाव पक्ष ने 'जीरो' प्राथमिकी (प्रदर्श पी-11) में पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) द्वारा दिए गए पहले वृतांत और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत पीड़ित (पी.डब्ल्यू.-5) के बयान (प्रदर्श पी-7) के बीच विरोधाभासों पर और इसी के संदर्भ में दिनांक 21.08.2013 को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत हुए बयान (प्रदर्श डी-2), जिनको जांच अधिकारी चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) द्वारा दर्ज करना बताया गया था, जिसमें अपराध के स्थान/दृश्य का एक सजीव विवरण शामिल है पर भरोसा किया था। उच्च न्यायालय का मानना है कि निचली अदालत ने बचाव पक्ष के इस तर्क को खारिज कर दिया था कि अपराध स्थल की वीडियोग्राफी पुलिस द्वारा दिनांक 21.08.2013 को की गई थी और उसे पीड़ित (पी.डब्ल्यू.-5) को दिखाया गया था, और इसके परिणामस्वरूप पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) के अपराध स्थल के विवरण पर उसके बयान, प्रदर्श डी-2, जो जांच अधिकारी - चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दिया था के मद्देनजर भरोसा किया। तदनुसार, उच्च न्यायालय ने आवेदन को स्वीकार कर लिया और निर्देश दिया कि निम्नलिखित कारणों से अजय पाल लांबा को एक गवाह के रूप में समन किया जाएः “..... अब इस पुस्तक के प्रकाशन के साथ, जिसे ऊपर संदर्भित किया गया है, बचाव पक्ष को यह दावा करने का अधिकार है कि अपराध स्थल का वीडियो निर्विवाद रूप से रिकॉर्ड किया गया था, जो अदालत को आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त है कि न्याय के हित में और मामले के न्यायासंगत निर्णय के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 के तहत श्री अजय पाल लांबा को तलब करना और इस मामले में अदालत के गवाह के रूप में परीक्षण करना और बचाव पक्ष के साथ-साथ अभियोजन पक्ष को भी प्रति परीक्षण करने देना नितांत आवश्यक है।"

10. हमारी राय में, आक्षेपित निर्णय उचित नहीं है, और तथ्यों और कानून, दोनों तरह से गलत है। यह तर्क के वल अटकलों पर आधारित है, और वह भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 के दायरे और उद्देश्य को समझे बिना। जैसा कि ऊपर कहा गया है, हम गुण दोष के आधार पर टिप्पणियां नहीं करना चाहते हैं, हालांकि प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल द्वारा लिए गए रुख को ध्यान में रखते हुए, हमें निचली अदालत के फै सले में की गई प्रासंगिक टिप्पणियों को पुनः प्रस्तुत करना है, जिसकी ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया गया था, और प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल की ओर से पेश होने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा अपनी दलीलों के समर्थन में निर्भरता रखी गई थी। निचली अदालत के निर्णय का प्रासंगिक हिस्सा (हम यह देख सकते हैं कि विचारण न्यायालय के दिनांक 25.04.2018 के निर्णय के अनुच्छेदों का संख्या अंकन गलत प्रतीत होता है।) इस प्रकार हैः “298. मेरी विनम्र राय में परिस्थितियां, गवाहों से ज्यादा बयां करती हैं। उल्लेखनीय है कि पी.डब्ल्यू.- 43 चंचल मिश्रा जांच अधिकारी ने अपने बयान में बताया है कि घटना स्थल का निरीक्षण करने के बाद घटना स्थल का नक्शा प्रदर्श पी-13, घटना स्थल की निरीक्षण फर्द और घटना स्थल का नक्शा मौका और प्रदर्श पी -14 हालात मौका पीड़िता की निशादेही के आधार पर तैयार किया गया। उनका कहना है कि उन्होंने घटना स्थल की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराई। घटना स्थल की वीडियोग्राफी के बाद गवाह ने बताया कि प्रतिलेखन सी.डी. आर्टिकल-16 तैयार किया गया। पी.डब्ल्यू.-30 पप्पाराम ने कहा कि उपरोक्त पीड़ित द्वारा बताई गई परिस्थितियों की वीडियोग्राफी की सीडी उनकी उपस्थिति में तैयार की गई। उन्होंने कहा कि उन्होंने लैपटॉप पर उपरोक्त सी. डी. को चलाया और कं प्यूटर पर पीड़ित द्वारा बताई गई परिस्थितियों को टाइप किया। उन्होंने सीलबंद सी. डी. के प्रतिलेखन फर्द को क्रमशः प्रदर्श पी.-69 और प्रदर्श पी.-70 के रूप में साक्ष्य में प्रदर्शित करके साबित किया। गवाह पी.डब्ल्यू.-30 रामदेव ने भी उपरोक्त गवाहों के बयानों की पुष्टि की है। इस संबंध में बचाव पक्ष ने प्रदर्श डी-103 और प्रदर्श डी-104 पर जोर देते हुए तर्क दिया है कि सूरसागर थाने के थानेदार श्री मदन बेनीवाल और उनके पुलिस कर्मचारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे। घटनास्थल की वीडियोग्राफी करने के बाद उन्होंने अगले दिन पीड़िता को दिखाया। इसलिए, पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कु टिया के अंदर की परिस्थितियों का उल्लेख किया। मेरी विनम्र राय में इन दलीलों में कोई सार नहीं है। यह सही है कि प्रदर्श डी.-103 और प्रदर्श डी.-104 से प्रतीत होता है कि सूरसागर थाने के कर्मी और थानेदार मदन बेनीवाल घटनास्थल पर गए थे, लेकिन उन्होंने घटना स्थल की वीडियोग्राफी की होगी या घटना स्थल का अवलोकन किया होगा, ऐसा उपरोक्त दोनों दस्तावेजों से प्रतीत नहीं होता है।

299. हमने प्रतिलेखन की फर्द प्रदर्श पी -69 को ध्यान से देखा है, जिसका एक हिस्सा प्रदर्श पी-70 प्रिंट आउट है।

300. दिनांक 22.08.2013 के उपर्युक्त फर्द के अनुसार, कमरे के निरीक्षण के समय, घटना स्थल के निरीक्षण के वक्त, कु टिया के कक्ष और गुसलखाने की वीडियोग्राफी गवाह द्वारा संचालित किया गया और पीड़ित द्वारा बताए गए अनुसार घटना के स्थान की परिस्थितियों का विवरण टाइप करने के बाद, कं प्यूटर से प्रिंट आउट लिया गया और प्रतिलेखन का विस्तृत दस्तावेज के स फाइल में शामिल किया गया है। हमने प्रदर्श पी-70 प्रतिलेखन (प्रतिलेखन का प्रिंट आउट) पढ़ा।

301. यह स्पष्ट है कि जांच अधिकारी ने सावधानी बरतते हुए पीड़िता को हरिओम फार्म हाउस में ले जाकर उससे उसका विवरण पूछा है, उसे कु टिया के अंदर ले जाए बिना और उसकी वीडियोग्राफी की है। बिना अंदर गए विवरण का उपर्युक्त वीडियो का प्रतिलेखन प्रदर्श पी-70 है। उपर्युक्त प्रतिलेखन प्रदर्श पी-70 में हमने प्रदर्श पी-13 और प्रदर्श पी-14 से और फोटोग्राफ प्रदर्श पी-16 से प्रदर्श पी-32 से कु टिया के अंदर ले जाने के बारे में पीड़िता द्वारा बताए गए तथ्यों का मिलान किया। कु टिया के अंदर का विवरण, जो बिना अंदर गए पीड़िता द्वारा बताया गया है, वही परिस्थितियां नक्शा मौका और हालात मौका से और तस्वीरों से दिखाई देती हैं और उससे मेल खाती है। मेरी विनम्र राय में इस साक्ष्य से यह साबित होता है कि पीड़िता कमरे के अंदर गई थी और बाथरूम में भी गई थी। ऐसी स्थिति में बचाव पक्ष का यह बयान विश्वसनीय नहीं है कि पीड़िता ने कु टिया में प्रवेश भी नहीं किया होगा।

301. बचाव पक्ष ने कहा है कि दिनांक 22.08.2013 को दैनिक भास्कर में कमरे की तस्वीर प्रकाशित की गई थी और प्रतिपरीक्षा में पीड़िता से पूछा गया था कि इस कारण वह कमरे के अंदर के बारे में जानती थी। यह पीड़िता का स्पष्ट बयान है कि यह कहना गलत है कि समाचार पत्र में फोटो प्रकाशित होने के कारण उसे उस कमरे के बारे में पता चला। उसने बताया कि कमरे में क्या चीजें थीं और वह कहां थी, जिसका विवरण प्राथमिकी, एनजीओ के प्रतिवेदन, और दण्ड प्रक्रिया संहिता 164 के बयानों में नहीं दिया गया है। साक्षी का कथन यह है कि एनजीओ की रिपोर्ट में बिस्तर और रोशनी के संबंध में लिखा है और उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 में कमरे की रोशनी और बिस्तर के बारे में भी बताया है और कमरे में ताला लगाने का विवरण भी है। इस प्रकार गवाह ने स्पष्ट रूप से इस बात से इनकार किया है कि उसे समाचार पत्र में फोटो प्रकाशित करने के बाद कमरे की अंदरूनी चीजों के बारे में पता चला होगा।

302. बचाव पक्ष का बयान है कि किसी को भी कु टिया के अंदर जाने की अनुमति नहीं थी, जबकि उपरोक्त विचार-विमर्श से यह स्पष्ट हो गया है कि कु टिया के अंदर गए बिना पीड़िता ने कु टिया के पूरे आंतरिक विवरण को बताया है, जो पूर्णतया सही पाया गया है। जिरह में पीड़िता को यह इंगित किया गया कि उसने आरोपी आसाराम के शाहजहांपुर के हरिद्वारा स्थित कु टिया को देखा होगा, जिससे उसने इनकार किया है। इस स्थिति में अब यह स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी बचाव पक्ष की है कि बिना अंदर गए पीड़िता को कु टिया की सही और वास्तविक आंतरिक स्थिति के बारे में कै से पता चला? यह कानून का स्पष्ट सिद्धांत है कि कोई व्यक्ति झूठ बोल सकता है लेकिन परिस्थितियां कभी झूठ नहीं बोलतीं। उपरोक्त उल्लिखित परिस्थितियां न्यायालय के समक्ष यह सच्चाई व्यक्त कर रही हैं कि पीड़िता को उपर्युक्त कु टिया के अंदर भेजा गया था, जबकि बचाव पक्ष के अनुसार किसी को भी जाने की अनुमति नहीं थी।

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303. इसलिए, अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा है कि पीड़िता घटना के स्थान पर स्थित उपर्युक्त कु टीया में गई थी, इसका अर्थ है कि उपरोक्त कमरे में पीड़ित गई थी यह साक्ष्य द्वारा साबित होती है ।"

11. ऊपर दर्ज किए गए विशिष्ट निष्कर्षों को स्पष्ट करने के लिए, और प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल द्वारा उठाए गए तर्क और उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आधार/तर्क को अस्वीकार करने के लिए, हम निचली अदालत के निर्णय के अनुछेद 62 का उल्लेख करेंगे, जो जांच अधिकारी- चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) की गवाही को संदर्भित करता है, कि वह दिनांक 21.08.2013 को जोधपुर आयुक्तालय में एसीपी के रूप में तैनात थी। प्राथमिकी संख्या 122/2013 (प्रदर्श पी-106) के दर्ज होने के बाद, उसे पीड़िता की दो मेडिकल रिपोर्ट (क्रमशः प्रदर्श पी-1 से पी-3 और प्रदर्श पी-12), दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत पीड़िता (पी.डब्ल्यू.5) के बयान (प्रदर्श पी-7) की प्रति आदि प्राप्त हुए। इसके बाद जांच अधिकारी चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत पीड़िता (पी.डब्ल्यू.5) के बयान (प्रदर्श डी -2) लिये। इसके बाद जांच अधिकारी चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) ने घटना स्थल का दौरा किया। स्पष्ट है कि यह अभियोजन पक्ष का वाद और वृत्तान्त नहीं है कि पुलिस दल/अधिकारियों ने दिनांक 21.08.2013 को घटना स्थल या अपराध स्थल का दौरा नहीं किया था। जब हम विचारण अदालत के निर्णय में उद्धृत अनुछेदों को संदर्भित करते हैं, अनुछेद 301 में विशेष रूप से व्यक्त किया गया है कि जिस कमरे में कथित घटना हुई थी, उसकी एक तस्वीर दिनांक 22.08.2013 को दैनिक भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित की गई थी, जिसमें हम एक पुलिस अधिकारी को देख सकते हैं। इसलिए दिनांक 21.08.2013 को कु टिया में पुलिस टीम की मौजूदगी विवादित नहीं है, यह एक स्वीकार्य स्थिति है। जैसा कि ऊपर उद्धृत किया गया है, विचारण अदालत द्वारा अनुच्छेद 298 से 303 में अभिनिर्धारित अभियोजन का वाद यह है कि पीड़िता (पी.डब्ल्यू.5) को सिखाया नहीं गया था और इसलिए, 'कु टिया' के विवरण के बारे में उसके द्वारा पुलिस को कमरे या गुसलखाने के अंदर ले जाये बिना बताया गया था। अभियोजन पक्ष का यह वृतांत और पक्ष, जिसे कि निचली अदालत ने स्वीकार किया है, इस आधार पर नहीं है कि पुलिस दल दिनांक 21.08.2013 को कमरे या गुसलखाने के अंदर नहीं गया था, बल्कि इस तर्क को खारिज करके है कि किसी पुलिस अधिकारी या जांच अधिकारी ने पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) को कमरे और गुसलखाने का वर्णन और विवरण देने के लिए उकसाया या सिखाया था। निचली अदालत द्वारा दर्ज किया गया यह निष्कर्ष पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) के साथ-साथ जांच अधिकारी चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) के साक्ष्य की विस्तृत जांच पर आधारित है। क्या यह निष्कर्ष सही है, इस अपील में इसका परीक्षण किया जाएगा, यद्यपि आक्षेपित आदेश में अदालत के गवाह के रूप में अजय पाल लांबा को तलब करने और उनका परीक्षण करने के लिए दिए गए तर्क को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि अजय पाल लांबा ने कथित तौर पर अपने मोबाइल फोन पर एक वीडियो रिकॉर्ड किया था। पुस्तक में अजय पाल लांबा द्वारा दिए गए बयान, जैसा कि ऊपर उद्धृत किया गया है, जिस पर प्रतिवादी - आशाराम @आशुमल के वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा बहुत अधिक भरोसा किया गया है, में कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है कि वीडियो, जिसे उसने कथित रूप से अपने मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड किया था, उसे जांच अधिकारी-चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) को सौंप दिया था, या यह कि उसने इसे पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) को दिखाया था। हमारी राय में, जब अभियोजन पक्ष ने कहा कि दिनांक 21.08.2013 को पुलिस दल ने घटना स्थल अर्थात 'कु टिया' का दौरा किया था, तो अजय पाल लांबा से इस आधार पर पूछताछ करने की याचिका कि उन्होंने कथित रूप से अपने मोबाइल फोन पर 'कु टिया' का एक वीडियो रिकॉर्ड किया था, वर्तमान मामले के तथ्यात्मक मैट्रिक्स के लिए पूरी तरह से महत्वहीन और अप्रासंगिक है। इसके अलावा, अदालत में शपथ के तहत किसी गवाह द्वारा दिया गया बयान साक्ष्य के रूप में शामिल होता है। जांच के दौरान किसी पुलिस अधिकारी द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज किए गए बयानों को साक्ष्य के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है, हालांकि आरोपी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 162 के प्रावधान के संदर्भ में बयान के एक हिस्से का उपयोग कर सकता है।

12. हम इस बात की जांच नहीं कर रहे हैं कि क्या प्रतिवादी - आशाराम @आशुमल की दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त सबूत और तत्व है, जो निचली अदालत के फै सले के अनुच्छेद 298 से 303 में संदर्भित साक्ष्य और तत्व से स्वतंत्र है। हम इन पहलुओं पर विचार नहीं करना चाहता क्योंकि ये गुण-दोष के प्रश्न हैं, जिन पर उच्च न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के विरुद्ध आपराधिक अपील का न्यायनिर्णयन करते समय विचार किया जाना चाहिए।

13. इसी तरह, अपीलकर्ता-राजस्थान राज्य की ओर से, यह प्रस्तुत किया गया कि अजय पाल लांबा ने एक विशिष्ट अस्वीकरण दिया था और कहा था कि पुस्तक घटनाओं का एक नाटकीय संस्करण है। उपर्युक्त निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए हमें इस पहलू की जांच करने की आवश्यकता नहीं है।

14. राजेश्वर प्रसाद मिश्रा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (1966) 1 एस० सी० 178 में इस न्यायालय ने यह राय व्यक्त की है कि चूंकि विभिन्न कारणों से अतिरिक्त साक्ष्य आवश्यक हो सकता है, इसलिए विधायिका ने अपीलीय न्यायालय के ऐसे विवेकाधिकार को कम करने से परहेज किया है। अपीलीय स्तर पर अतिरिक्त साक्ष्य को अभिलेख पर कब लिया जा सकता है, इसकी कसौटी यह नहीं है कि इसकी अभाव में निर्णय सुनाने में असंभवता या असमर्थता है, बल्कि यह है कि क्या ऐसे अतिरिक्त साक्ष्य के बिना न्याय की विफलता होगी। इस विवेकाधिकार का प्रयोग हल्के में नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसमें सतर्क ता और सावधानी बरतने की आवश्यकता है, क्योंकि इसका प्रयोग के वल उन मामलों में किया जाना चाहिए, जहां अपीलीय न्यायालय, अच्छे और न्यायोचित आधार पर, यह पाता है कि अतिरिक्त साक्ष्य को अभिलेख पर लिए बिना न्याय की विफलता होगी। हालाँकि एक बार यह शर्त पूरी हो जाने के बाद, प्राप्त साक्ष्य के प्रकार पर कोई प्रतिबंध नहीं है, जो औपचारिक या सारवान् हो सकता है।

15. जाहिरा हबीबुल्ला एच. शेख और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2004) 4 एससीसी 158, में इस न्यायालय ने विवेकाधिकार के प्रयोग के पहलू पर विस्तार से विचार किया है, जिसमें अदालतों द्वारा संतुलन बनाए रखने की जरूरत को रेखांकित किया है ताकि न्याय करने के लिए अतिरिक्त साक्ष्य के अधिकार से इनकार न किया जा सके, और अभियुक्त के साथ-साथ अभियोजन पक्ष की निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के महत्व को उजागर किया गया है। निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार कानून सम्यक प्रक्रिया और सत्य की पुष्टि की अवधारणा में निहित है। इसी प्रकार, न्याय की विफलता हो सकती है यदि अपीलीय स्तर पर अतिरिक्त साक्ष्य की अनुमति देने के इस विवेकाधिकार का उपयोग नियमित और उदार तरीके से किया जाता है, और न्यायालय द्वारा बिना इस बात की संतुष्टि किए किया जाता है कि प्रार्थना में रिकॉर्ड पर लाई जाने वाले तत्वों के मूल्य, विश्वसनीयता और स्वीकार्यता पर विचार करने के लिए आवश्यक तर्क संगतता और वास्तविकता के निशान हैं।

16. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 और 391 दोनों अतिरिक्त सबूत लेने के लिए अदालत की शक्ति से संबंधित है। पहली परीक्षण के चरण में और निर्णय सुनाए जाने से पहले; और दूसरी निचली अदालत द्वारा फै सला सुनाए जाने के बाद अपीलीय स्तर पर। यह कहना पूरी तरह से सही नहीं हो सकता है कि समान विचार दोनों स्थितियों के लिए लागू होगा क्योंकि दोनों चरणों में अंतर होता है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के दो भाग हैं-पहला भाग न्यायालय को जांच, विचारण या अन्य कार्यवाहियों के किसी भी चरण में, चाहे व्यक्ति साक्षी के रूप में सूचीबद्ध है या उपस्थित है पर साक्षी के रूप में उसे तलब नहीं किया गया है, ऐसे किसी भी साक्षी को तलब करने की शक्ति देता है। दूसरा, निचली अदालत के पास पहले से परीक्षित किए गए किसी भी व्यक्ति को वापस बुलाने और फिर से परीक्षण करने की शक्ति है यदि उसका साक्ष्य मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिए आवश्यक प्रतीत होता है। दूसरी ओर, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 के अधीन विवेकाधिकार को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 की तुलना में कु छ अधिक सीमित रूप में पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि अपीलीय न्यायालय विचारण न्यायालय द्वारा मुकदमा चलाने वाले व्यक्ति के संबंध में दोषी होने या अन्यथा निष्कर्ष पर आने के बाद किसी अपील पर विचार कर रहा है। अपीलीय न्यायालय साक्ष्यों की गहराई से और विस्तार से जांच कर सकता है, फिर भी उसके पास निचली अदालत की सभी शक्तियां नहीं हैं क्योंकि वह उन मामलों से निपटता है जिनमें निर्णय पहले ही सुनाया जा चुका है।

17. राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) बनाम शिव कु मार यादव और अन्य (2016) 2 एससीसी 402 इस बात पर जोर देता है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के तहत विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए, न्यायालय को, साक्षी को वापस बुलाने के लिए आवेदन पर विचार करते समय, इस तर्क से प्रभावित नहीं होना चाहिए कि के वल वह अभियुक्त जो अभिरक्षा में है, कार्यवाहियों के दीर्घावधि से पीड़ित होगा, क्योंकि यह विधिमान्य नहीं होगा और न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करेगा। यह न के वल विलंब का मामला है बल्कि जब पीड़ित/गवाहों को परीक्षण के लिए बुलाया जाता है तो उन्हें कठिनाई होती है। यदि न्यायोचित निर्णय के लिए आवश्यक हो तो निश्चित रूप से प्रत्याह्वान करने की अनुमति है और जिसके लिए एक ठोस कारण होना चाहिए कि इसके बिना निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होगी। न्याय की विफलता को रोकने के लिए विवेकाधिकार का विवेकपूर्ण प्रयोग किया जाना चाहिए और इसका प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जाना चाहिए। हमारी राय में, अपीलीय न्यायालय को अपील की सुनवाई में देरी करने की इच्छा या विरोधाभासी साक्ष्य की संभावना का पता लगाने के लिए अतिरिक्त साक्ष्य को प्रस्तुत करने की चेष्टा के प्रयास के बारे में अधिक नहीं तो समान रूप से सतर्क होना चाहिए। जबकि अतिरिक्त साक्ष्य के लिए प्रार्थना को वास्तविक त्रुटि या अन्यथा को ठीक करने के लिए की अनुमति दी जानी चाहिए और एक पक्षकार विरोधी पक्षकार की ओर से बिना किसी गलती के आगे के अवसर के लिए हकदार हो सकता है, वापस बुलाने का अनुरोध वास्तविक होना चाहिए और साक्षी को होने वाली कठिनाई और कार्यवाही में दीर्घावधि सहित प्रासंगिक विचारों के साथ सावधानीपूर्वक संतुलित किया जाना चाहिए। त्वरित सुनवाई का अधिकार, जिसमें अपील का त्वरित निपटान भी शामिल है, के वल अभियुक्त का विशिष्ट अधिकार नहीं है, बल्कि सामान्य रूप से समाज और विशेष रूप से पीड़ित के प्रति न्यायालय का दायित्व है। अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से समझौता किए बिना एक आरोपी के अधिकारों और एक पीड़ित व्यक्ति और समाज के हितों और अधिकारों के बीच संतुलन को इस न्यायालय ने गिरीश कु मार सुनेजा बनाम कें द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2017) 14 एससीसी 809, पी. पोन्नुसामी बनाम तमिलनाडु राज्य 2022 एससीसी ऑनलाइन एससी 1543 और पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अमिया कु मार (2004) 13 एस. सी. सी. 671 में रेखांकित किया है। यह कहा जाता है कि प्रत्येक आपराधिक मामला, खोज की एक यात्रा है, जिसमें सत्य की खोज की जाती है। (देखिए रितेश तिवारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य, (2010) 10 एससीसी 677) सत्य को अभिनिश्चित करने की प्रक्रिया में प्रक्रियाओं और साक्ष्य के नियमों के अनुपालन की आवश्यकता होती है। एक अच्छी तरह से रूपांकित की गई प्रणाली में, औपचारिक कानूनी सत्य के न्यायिक निष्कर्ष मौलिक सत्य के साथ मेल खाने चाहिए। यह तब होता है जब कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विवादित तथ्यों का कु शलता से पता लगाया जाता है। इसके अलावा, आपराधिक मुकदमे में, तथ्य को स्थापित करने के लिए सबूत का बोझ अभियोजन पर है, जिसे उचित संदेह से परे साबित किया जाना है। अपील में अतिरिक्त साक्ष्य लेने की शक्ति का प्रयोग अन्याय और न्याय की विफलता को रोकने के लिए किया जाना चाहिए और इस प्रकार, प्रार्थना की स्वीकृ ति को आवश्यक बनाने वाले अच्छे और वैध कारणों के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए।

18. जब हम उपरोक्त उक्ति को उपर्युक्त अनुच्छेद 11 में यथा निर्धारित वर्तमान मामले के तथ्यात्मक आव्यूह और पृष्ठभूमि पर लागू करते हैं, तो हम नहीं सोचते कि यह अतिरिक्त साक्ष्य की अनुमति देने की कसौटी पर खरा उतरता है । दूसरी ओर, आपराधिक अपील, जो उच्च न्यायालय के समक्ष सुने जाने के लिए तैयार है, पर सुनवाई नहीं हुई और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 391 के अधीन घटना घटित होने के आठ साल बाद अतिरिक्त साक्ष्य के अभिलेखन के लिए आवेदन करके उसमें विलंब किया गया है। यदि हम दिए गए कारणों को ध्यान से देखें, जिन्हें आक्षेपित निर्णय में समर्थन मिला है, तो हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि मुख्य गवाहों, पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-5) और/या जांच अधिकारी-चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) के अतिरिक्त साक्ष्य को दर्ज करने के लिए और आवेदन हो सकते हैं, जिनका पीड़िता (पी.डब्ल्यू.-43) के साथ-साथ जांच अधिकारी-चंचल मिश्रा (पी.डब्ल्यू.-43) के मामले में ग्यारह अवसरों पर लंबी अवधि के लिए पहले ही परीक्षण किया जा चुका है। यह प्रयास पूरे मामले को फिर से खोलने और अपीलीय चरण में इन गवाहों की फिर से जांच की मांग करने का है।

19. प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल ने अन्य बातों के साथ साथ, लगभग 9 साल और 7 महीने के कारावास का सामना करने के आधार पर सजा के निलंबन के लिए एक आवेदन (डी. बी. क्रिमिनल मिस.सजा का तृतीय निलंबन आवेदन (अपील) संख्या 220/2022) दायर किया था। उच्च न्यायालय ने दिनांक 07.07.2022 के आदेश द्वारा इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बचाव पक्ष ने अतीत में कई स्थगनों की मांग की है, सजा के निलंबन के लिए पिछले दो आवेदन खारिज कर दिए गए हैं और प्रतिवादी-आशाराम @आशाराम @आशुमल गुजरात में एक अन्य मुकदमे में अभी भी हिरासत में है। उच्च न्यायालय के दिनांक 07.07.2022 के आदेश को चुनौती देने वाली डायरी संख्या 33636/2022 वाली विशेष अनुमति याचिका में अपीलकर्ता द्वारा लिया गया एक आधार यह है कि प्रत्यर्थी-आशाराम @आशुमल द्वारा दायर की गई अपील की सुनवाई तब तक नहीं की जा सकती है, जब तक कि अजय पाल लांबा का साक्ष्य दर्ज नहीं हो जाता है, क्योंकि उच्च न्यायालय ने कहा है कि अपील के न्यायसंगत निर्णय के लिए अतिरिक्त साक्ष्य नितांत आवश्यक है।

20. उपरोक्त निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए, अपील स्वीकार की जाती है, और आक्षेपित निर्णय को रद्द कर दिया जाता है। हम उच्च न्यायालय से अपील पर त्वरित सुनवाई के लिए विचार करने का अनुरोध करते हैं, क्योंकि प्रत्यर्थी आशाराम उर्फ आशुमल पहले ही लगभग दस वर्षों से कै द की सजा भुगत चुका है। हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान निर्णय में की गई टिप्पणियां उठाए गए मुद्दों के निपटान के लिए हैं, और आपराधिक अपील का निर्णय उच्च न्यायालय द्वारा यहां दर्ज किसी भी टिप्पणियों और निष्कर्षों से प्रभावित हुए बिना किया जाएगा। न्यायाधीश (संजीव खन्ना) न्यायाधीश (एम एम सुंदरेश) नई दिल्ली 17 अप्रैल, 2023 यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास' के जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय पक्षकार को उसकी भाषा में समझाने के सीमित उपयोग के लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य के लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों के लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन के उद्देश्य से भी अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।