Full Text
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपील संख्या 2203/2010
राधे श्याम और अन्य … अपीलार्थी (गण)
बनाम
राजस्थान राज्य … प्रतिवादी
निर्णय
अभय एस. ओका, न्यायाधीश
तथ्यात्मक पहलू
JUDGMENT
1. अपील क्रमशः अभियुक्त संख्या 9, 2 और 1 द्वारा की गई है, जिन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 148 और धारा 302 सपठित धारा 149 क े तहत दंडनीय अपराधों क े लिए दोषी ठहराया गया है। अभियोग पत्र में नामजद 29 आरोपी थे, जिनमें से आरोपी संख्या 1, 2, 5, 7, 9, 15, 17 और 20 को सत्र न्यायालय ने दोषी करार दिया था और बाकी 21 को बरी कर दिया था। आक्षेपित निर्णय द्वारा, उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है।
2. मृतक रघुनाथ सिंह क े परिवार और क ु छ अभियुक्त जो अहीर समुदाय क े थे, क े बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी और जिन्होंने आज़ाद पार्टी क े नाम से एक पार्टी बनाई थी। घटना 16 अप्रैल 1976 की है। अभियोजन साक्षी 6 शिव राज सिंह, जो मृतक रघुनाथ सिंह का भाई है, ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (प्राथमिकी) दर्ज कराई। अहीरों क े एक समूह ने मृतक पर हमला किया। अभियोजन पक्ष क े मामले क े अनुसार, अभियोजन साक्षी संख्या 2, 3 और 4 चश्मदीद गवाह थे। विचारण न्यायालय ने अभियोजन साक्षी 2 की गवाही को खारिज कर दिया, लेकिन अभियोजन साक्षी 3 क ृ ष्णा, नाबालिग, जो मृतक की बेटी थी, और अभियोजन साक्षी 4 क ं वरबाई, जो मृतक की मां है, की गवाही पर विश्वास किया। पक्षकारों क े तर्क
3. अपीलकर्ताओं की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने कहा कि अभियोजन साक्षी-3 एक बाल साक्षी है जिसक े साक्ष्य को बहुत सावधानी से जाँच करने की आवश्यकता है। अभियोजन साक्षी-3 क ृ ष्णा क े साक्ष्य और विशेष रूप से उसकी जिरह की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हुए, उसने निवेदन किया कि उसकी गवाही को विश्वसनीय नहीं ठहराया जा सकता है, खासकर जब अदालत में गवाह द्वारा की गई अभियुक्त की शिनाख़्त अत्यधिक संदिग्ध हो। इसक े अलावा, अभियोजन साक्षी-4 अदालत में एक भी अभियुक्त की पहचान नहीं कर सकी और इसलिए, उसकी गवाही पर भरोसा करना असुरक्षित था। उन्होंने यह भी बताया कि विद्वान मजिस्ट्रेट को प्राथमिकी भेजने में 3 दिन की देरी हुई थी। मृतक क े परिवार और जिस राजनीतिक दल से अभियुक्त थे, क े बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी और इसलिए, इन तीन दिनों की अवधि क े दौरान, अभियुक्तों को झूठा फ ं साया गया होगा।
4. राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने आग्रह किया कि बाल साक्षी (अभियोजन साक्षी-3) से किये गए प्रारंभिक प्रश्नों क े उत्तरों क े अवलोकन से पता चलता है कि गवाह क े पास अच्छी बुद्धि और समझ थी। उसने तर्क दिया कि यद्यपि उसने आरोपी संख्या 1 की रामचंदर क े बेटे क े रूप में सही ढंग से शिनाख़्त की, गलती से उसने मोडू (बरी किए गए अभियुक्त) क े नाम का उल्लेख किया, जो भी एक रामचंदर का पुत्र था। उन्होंने तर्क दिया कि यह एक मामूली विसंगति है जो अभियोजन साक्षी-3 क े कथन को नकारने क े लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि अभियोजन साक्षी-4 क ं वरबाई ने पांच लोगों को आरोपी बनाया है। उन्होंने कहा कि अभियोजन साक्षी-4 अभियुक्तों को उनक े नाम क े संदर्भ में पहचानने में सक्षम नहीं थी। उन्होंने कहा कि समय क े बीतने क े कारण यह आसानी से हो सकता है। इसलिए, वह कहेगा कि उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय द्वारा निकाले गए निष्कर्ष, अपीलकर्ताओं क े अपराध क े संबंध में, दोषपूर्ण नहीं हो सकते। कारण और निष्कर्ष
5. हम पाते हैं कि अभियोजन का मामला क े वल अभियोजन साक्षी-3 क ृ ष्णा और अभियोजन साक्षी-4 क ं वरबाई की गवाही पर निर्भर है। अभियोजन साक्षी-3 की उम्र उसक े साक्ष्य क े अभिलेखन क े समय 12 वर्ष थी। अभियोजन साक्षी-3 क े साक्ष्य को क े वल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसकी उम्र 12 वर्ष थी। हालांकि, एक बाल साक्षी होने क े नाते उसक े सबूत को बहुत सावधानीपूर्वक मूल्यांकन की आवश्यकता है, इस तथ्य पर विचार करते हुए कि एक बाल गवाह को हमेशा आसानी से पढ़ाया जा सकता है। इसलिए, हमने उसक े वक्तव्य की सावधानीपूर्वक जांच की है। मुख्य परीक्षण में, उसने कहा कि उसने देखा कि 30-35 व्यक्ति उसक े पिता (मृतक) क े साथ मारपीट कर रहे थे। उसने कहा कि उसने रघुनाथ (आरोपी संख्या 1); श्यामा (आरोपी संख्या 8); भवाना (भवानी) आरोपी संख्या 20; मोडू और चतुर्भुज (आरोपी संख्या 15) की पहचान की। मोडू क े नाम से दो आरोपी हैं (आरोपी संख्या 2 और आरोपी संख्या 14)। हालांकि, उसने श्यामा (आरोपी संख्या 8) का नाम लिया, उसने उसे भवाना (भवानी क े ) भाई क े रूप में वर्णित किया। जैसा कि अभियुक्तों क े नाम से देखा जा सकता है कि भवाना काना अहीर का पुत्र है और अभियुक्त संख्या 9 राधे श्याम भी काना अहीर का पुत्र है। कटघरे में मौजूद आरोपियों की पहचान क े लिए एक बेहद अजीबोगरीब प्रक्रिया अपनाई गई। अभियुक्त, जिनक े नाम अभियोजन साक्षी-3 द्वारा लिए गए थे, को कटघरे क े बाहर खड़े रहने क े लिए कहा गया था और अन्य को कटघरे में रहने क े लिए कहा गया था। जब पांचों अभियुक्तों को कटघरे से बाहर लाया जा रहा था, गवाह को कोर्ट हॉल से बाहर रहने क े लिए कहा गया। यह प्रक्रिया अभियुक्तों क े लिए अनुचित थी क्योंकि इसका उद्देश्य नाबालिग गवाह द्वारा पांच अभियुक्तों की आसानी से शिनाख्त करने की सुविधा प्रदान करना था। इस तरह की प्रक्रिया अभियुक्तों क े लिए उचित नहीं है। बयान में कहा गया है कि अभियोजन साक्षी-3 ने आरोपी राधे श्याम (आरोपी संख्या 9) को श्यामा कहकर काना क े बेटे क े रूप में पहचाना। उसने आरोपी भवाना पुत्र काना, मोडू पुत्र नाथू और चतुर्भुज को ओंकार क े पुत्र क े रूप में सही पहचाना। उसने आरोपी संख्या 1 रघुनाथ की पहचान मोदू क े रूप में रामचंदर क े बेटे क े रूप में की। प्रतिपरीक्षा में, जब उससे एक अदालती सवाल किया गया, जिसमें उसे यह बताने क े लिए कहा गया कि उसने मोडू की पहचान यह कहकर क्यों की है कि वह रघुनाथ है, तो गवाह ने जवाब दिया कि वह समय बीतने क े कारण भूल गई थी। एक सवाल क े जवाब में कि राधेश्याम कौन था, उसने जवाब दिया कि वह एक ब्राह्मण था और आरोपी नहीं है। उसने स्वीकार किया कि उसकी दादी ने उसे बताया था कि उनक े परिवार का अहीरों से झगड़ा हुआ था, जिन्होंने आज़ाद पार्टी बनाई है। उसने यह भी स्वीकार किया कि उसकी दादी ने उन्हें पार्टी बनाने वाले व्यक्तियों क े रूप में मोडू, भवन, चतुर्भुज और रघुनाथ क े नाम बताए थे। उसने कहा कि उसने अपना बयान दर्ज कराते हुए पुलिस को बताया था कि आज़ाद पार्टी क े 30-35 लोग उसक े पिता क े साथ मारपीट कर रहे थे। जिस तरह से नाबालिग गवाह ने आरोपी की शिनाख़्त की, क े वल उसकी गवाही क े आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना असुरक्षित हो जाता है।
6. अब हम अभियोजन साक्षी-4 क ं वरबाई क े बयान को देखते हैं, जो मृतक की मां है। उसक े कथन क े अनुसार अभियोजन साक्षी-3 क ृ ष्णा रोते हुए उसक े पास आई और कहा कि 30-35 व्यक्ति उसक े पिता को पीट रहे थे। जब वह मौक े पर पहुंची तो देखा कि उसका बेटा (रघुनाथ) दर्द से रो रहा है। उसने कहा कि उसकी उपस्थिति में, गोपाल (आरोपी संख्या 17) ने मृतक क े कान पर वार किया। उसने कहा कि आरोपी नंबर 20 ने उसक े बेटे की बांह और बाई ं बगल पर लाठी से वार किया। उसने कहा कि आरोपी संख्या 1 रघुनाथ, आरोपी संख्या 7 प्रताप और आरोपी संख्या 5 ने भी उसक े बेटे पर लाठी वार किया। जब उससे पूछा गया कि क्या वह 30- 35 अभियुक्तों को उनक े नाम से पहचान सकती है, तो उसका जवाब था कि वह उनक े नाम और उनक े पिता क े नाम भी जानती है और वह उन्हें पहचानने की स्थिति में थी। इसक े बाद उन्होंने कई नाम बताए। जब उसे आरोपियों की शिनाख़्त करने क े लिए बुलाया गया, तो वह किसी भी आरोपी को उनक े नाम क े संदर्भ में शिनाख़्त नहीं कर सकी। विद्वान न्यायाधीश ने बयान में उल्लेख किया कि अभियोजन साक्षी-4 किसी भी अभियुक्त की शिनाख़्त नहीं कर सकी। विद्वान सत्र न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणी इस प्रकार है: "टिप्पणी: गवाह ने आरोपी क े पास जाकर, बार-बार चारों ओर घूमकर, सामने धक े ल कर और पीछे वाले क े पास जाकर देखने की, पहचानने की कोशिश की और कभी आरोपी क े पास क ु छ देर खड़े होकर आगे बढ़ी ताकि लौटने पर किसी को पहचान सक े, यह भी कहा कि क ु छ अंधेरा होने क े कारण दृष्टि स्पष्ट नहीं है। अदालत में दो ट्यूबलाइट जल रही हैं जिससे पर्याप्त रोशनी है और एक ट्यूबलाइट अभियुक्तों की तरफ है। गवाह ने कहा हालांकि रौशनी काफी है और चेहरे भी दिख रहे हैं लेकिन यह आकलन नहीं किया जा रहा है कि ये लोग कौन हैं.'' इसक े बाद अभियोजन साक्षी-4 से पूछा गया कि उपस्थित लोगों में से आरोपी कौन थे। उसने कहा कि वे सभी वहां थे लेकिन शिनाख्त क े लिए उनक े चेहरे स्पष्ट नहीं थे।
7. इस प्रकार, अभियोजन साक्षी-4, जो चश्मदीद गवाह होने का दावा करती है, अदालत में नाम से एक भी अभियुक्त की शिनाख्त नहीं कर सकी, हालांकि उसने दावा किया कि वह अभियुक्तों को उनक े नाम क े साथ-साथ उनक े पिता क े नाम से पहचानने की स्थिति में थी।
8. हम पहले ही नाबालिग गवाह अभियोजन साक्षी-3 क े साक्ष्य पर चर्चा कर चुक े हैं। उसकी गवाही से पता चलता है कि वह कम से कम दो आरोपियों की शिनाख्त करते समय भ्रमित हो गई थी, हालांकि पांच आरोपी जिनका उसने कथित तौर पर नाम लिया था, उन्हें शेष आरोपियों से अलग खड़ा किया गया था। अभियोजन साक्षी-3 क ृ ष्णा का कथन, जब अभियुक्त की पहचान की बात आती है, विश्वास नहीं दिखाता। किसी भी मामले में, इस तरह की गवाही क े आधार पर अभियुक्त को दोषी ठहराना बहुत असुरक्षित है, खासकर, जब विचारण न्यायालय द्वारा माना गया एकमात्र अन्य चश्मदीद गवाह (अभियोजन साक्षी-4) अदालत में एक भी अभियुक्त की शिनाख्त नहीं कर सका। विद्वान विचारण न्यायाधीश ने पाया कि अदालत कक्ष में पर्याप्त रोशनी थी और अभियुक्तों क े चेहरे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे।
9. इसलिए, हमारी सुविचारित राय है कि मृतक क े हमलावरों क े रूप में नामित अभियुक्तों की पहचान न्यायालय में एक युक्तियुक्त संदेह से परे स्थापित नहीं की गई है। फिर जो बचता है वह अभियुक्तों की निशादेही पर हमले क े हथियारों की कथित बरामदगी का सबूत है। क े वल कथित बरामदगी क े आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
10. इसलिए, आक्षेपित निर्णयों और आदेशों क े तहत अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि रद्द की जाती है और अपास्त की जाती है और अपीलकर्ताओं को उनक े खिलाफ लगाए गए आरोपों से बरी किया जाता है। अपीलकर्ता जमानत पर हैं। उनक े ज़मानत-पत्र रद्द किए जाते हैं। तद्नुसार अपील स्वीकार की जाती है। न्यायाधीश [अभय एस ओका] न्यायाधीश [राजेश बिंदल] नई दिल्ली 12 अप्रैल 2023। अस्वीकरण: स्थानीय भाषा में अनुवादित निर्णय, वादी क े प्रतिबंधित उपयोग क े लिए, उसकी भाषा में समझाने क े लिए है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।