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भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय अति कारिर ा
सिसविवल अपील संख्या 7086-7087 वर्ष! 2009
सावि$र अली खान ...... अपीलक ा! (गण)
$नाम
सैयद मो. अहमद अली खान एवं अन्य ...... प्रति वादी (गण)
विनण!य
न्यायमूर्ति क
े . एम. जोसेफ
JUDGMENT
1. इलाहा$ाद उच्च न्यायालय द्वारा सिसविवल पुनरीक्षण संख्या 595 और 596 वर्ष! 2003 में पारिर आदेश क े खिखलाफ अपीलें दायर की गई है। पुनरीक्षण प्रति वादी द्वारा हमारे समक्ष वक्फ $ोर्ड! द्वारा पारिर आदेश क े विवरुद्ध दायर विकया गया था। पहले प्रति वादी ने पुनश्च, कलेक्टर, $ुलंदशहर द्वारा पारिर आदेश को विवर्षय में रखा। कलेक्टर द्वारा पारिर आदेश वक्फ अति विनयम, 1995 (ए श्मिOमनपश्चा 'अति विनयम' क े रूप में संदर्भिभ ) की ारा 52(2) क े अन् ग! पारिर विकया गया था। अं में, हमें इस स् र पर यह इंविग करना चाविहए विक कलेक्टर वक्फ $ोर्ड! क े विनयंत्रक द्वारा विववाविद भूविम का कब्जा प्राप्त करने और वक्फ $ोर्ड! को देने क े खिलए उद्घोर्षणा “क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनण!य वादी क े अपनी भार्षा में समझने हे ु विन$\ति प्रयोग क े खिलए है और विकसी अन्य उद्देOय क े खिलए प्रयोग नहीं विकया जा सक ा है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देOयों क े खिलए, विनण!य का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिणक माना जाएगा था विनष्पादन और विdयान्वयन क े उद्देOयों क े खिलए मान्य होगा।" 2023 INSC 368 विदए गए अनुरो क े आ ार पर काय! कर रहे थे। यह अनुरो अति विनयम की ारा 52(1) क े ह विकया गया था।
2. न्यायाति करण द्वारा पारिर आदेश द्वारा, इसने विवणिभन्न आ ारों पर कलेक्टर द्वारा पारिर आदेश को अपास् कर विदया था। पूव क्त आदेश क े खिखलाफ अपीलक ा!ओं द्वारा दायर पुनरीक्षण में उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आक्षेविप आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने विटiब्यूनल द्वारा पारिर आदेश की पुविj की है, हालांविक, इस आ ार पर विक अपीलों में पहले प्रति वादी ने प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व को सिसद्ध विकया था।
3. हमने अपीलक ा! की ओर से विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री सलमान खुशnद और प्रथम प्रति वादी की ओर से विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री पी.एस. पटवाखिलया और विद्व ीय प्रति वादी- सहायक सवoक्षण आयुक्त, वक्फ, $ुलंदशहर और च ुथ! प्रति वादी-कलेक्टर, वक्फ, $ुलंदशहर की ओर से विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री एस.आर. सिंसह को सुना। थ्य
4. हम विनम्नखिलखिख वंशावली चाट! को प्रस् ु करक े अारंभ कर े हैं: सैयद मो. अक$र अली खान कासिसम अली खान सैयद कासिसम अली खान सैयद रजा अली खान सैयद सुजा अली खान सज्जाद अली खान सैयद मो. अली खान (प्रति वादी सं.1) मो. अहमद अली खान ( प्रति वादी सं.1) उद्देOय क
5. पक्षकार णिशया मुश्मिस्लम हैं। मोहम्मद अक$र अली खान ने 26.07.1934 क े एक विवलेख द्वारा वक्फ-अलल-औलाद $नाया। उन्होंने खुद को पहले मु वल्ली क े रूप में विनयुक्त विकया। हालांविक, उन्होंने वर्ष! 1948 में एक नलक ू प और क ु छ विनकटव n भूविम क े सं$ं में एक वि$dी विवलेख विनष्पाविद विकया। अक$र अली खान क े पुत्रों में से एक, कासिसम अली खान ने ओएस नं$र 1 वर्ष! 1950 क े माध्यम से वि$dी विवलेख का विवरो विकया। विवचारण न्यायालय ने उक्त मुकदमे में तिर्डdी प्रदान विकया और उच्च न्यायालय ने 11.07.1962 को विदए अपने विनण!य द्वारा तिर्डdी की पुविj की। उच्च न्यायालय ने अपने फ ै सले क े दौरान यह माना विक, अक$र अली खान ने णिशया मुसलमान से यथा अपेतिक्ष, जो वह थे, एक वै और प्रभावी वक्फ $नाया था। 16.12.1958 को, अक$र अली खान का विन न हो गया। वह अपने पीछे ीन $ेटों को छोड़ गए- कासिसम अली खान, कासिजम अली खान और रजा अली खान। ऐसा प्र ी हो ा है विक कासिसम अली खान ने मु वल्ली क े रूप में पदभार संभाला था। उनका नाम वक्फ क े रसिजस्टर में दज! विकया गया था। हालांविक, उनक े छोटे भाई, यानी कासिजम अली खान और रजा अली खान संपखि} क े सं$ं में राजस्व रिरकॉर्ड! में भूविम र क े रूप में अपना नाम दज! करा खिलया था। इसक े कारण कासिसम अली खान द्वारा विफर से दूसरा मुकदमा विकया गया, यानी ओएस नं$र 421 वर्ष! 1959। उन्होंने एक उद्घोर्षणा की मांग की विक वाद अनुसूची संपखि} एक वक्फ संपखि} थी। उन्होंने आगे अपने दो भाइयों क े नामों को हटाने क े अनु ोर्ष की माँग की। उक्त मुकदमे को 21.05.1962 को वादी क े पक्ष में सुनाया गया। कावि€म अली खान ने 14.10.1960 को मुकदमे क े लंवि$ रहने क े दौरान अपने कणिथ एक ति हाई विहस्से को मोहम्मद अहमद अली खान को स्थानां रिर कर विदया जो र€ा अली खान का $ेटा होने क े कारण उनका भ ीजा था। इसे पहली वि$dी कहा जाएगा। उद्देOय क
6. एक अपील में रिरमांर्ड क े $ाद, ज$ मुकदमा लंवि$ था, गांव में चक$ंदी की काय!वाही शुरू हुई। कानून क े ह, मुकदमे को रद्द कर विदया जाना था। वाद को समाप्त कर विदया गया था। श्री कासिसम अली खान ने अन्य पुत्रों, अथा!, उनक े भाइयों क े नामों को हटाने की मांग कर े हुए आपखि} दायर की। यह इस आ ार पर विकया गया था विक संपखि}यां वक्फ संपखि}यां थीं। चक$ंदी अति कारी ने आपखि} को स्वीकार कर खिलया। उन्होंने विनदoश विदया विक वक्फ की प्रविवविj राजस्व रिरकॉर्ड! में की जाए। यह उनका क ! था विक वक्फ क े विनमा!ण पर, संपखि} सव!शविक्तमान में विनविह हो गई और पहली वि$dी विनष्प्रभावी हो गई। श्री कासिसम अली खान और श्री रजा अली खान द्वारा दायर अपील $ंदो$स् अति कारी द्वारा खारिरज कर दी गई। उनक े द्वारा दायर पुनरीक्षण भी आदेश विदनांविक 29.01.1969 द्वारा खारिरज कर विदया गया। हालांविक, ऐसा प्र ी हो ा है विक उप विनदेशक, चक$ंदी क े आदेश क े ह सं$ं में $हाली की मांग करने वाला एक आवेदन दायर विकया गया था। उसे 02.03.1972 को खारिरज कर विदया गया था। हालांविक, $हाली क े खिलए एक और आवेदन दायर विकया गया था। उक्त $हाली आवेदन में यह कहा गया है विक, 13.02.1974 को ीन भाइयों, अथा!, कासिसम अली खान, कासिसम अली खान और र€ा अली खान क े $ीच एक समझौ ा विकया गया था। समझौ ा इस आ ार पर हुआ विक वक्फ एक कागजी लेनदेन था। आगे यह आ ार था विक वक्फ पर कभी कार!वाई नहीं की गई और आगे कहा गया विक भूखंर्डों क े भूविम र कासिसम अली खान, रजा अली खान और मोहम्मद अहमद अली खान (अंति म $ाहरी) एक ति हाई क े विहस्सेदार थे। उप सिजलाति कारी चक$न्दी ने समझौ ा स्वीकार कर विदनांक 29.01.1969 क े मेरिरट पर हुए आदेश को रद्द कर े हुए समझौ े क े आ ार पर पुनरीक्षण का विनस् ारण कर विदया। उ}र प्रदेश मुश्मिस्लम वक्फ अति विनयम, 1960 (ए श्मिOमनपश्चा संक्षेप में '1960 अति विनयम' क े रूप में संदर्भिभ ) की ारा 49 ए क े अथ! में वक्फ $ोर्ड! से अनुमति नहीं ली गई। णिशया उद्देOय क वक्फ $ोर्ड! पक्षकार नहीं था। हम यह भी पा े है विक 02.03.1972 विदनांविक आदेश को अपास् कर विदया गया था। श्री कासिसम अली खान द्वारा 26.09.1974 को समझौ े क े आ ार पर एक और वि$dी विवलेख विनष्पाविद विकया, जो उनक े भ ीजे, श्री सैयद मोहम्मद अली खान, जो श्री रजा अली खान क े एक अन्य पुत्र थे, क े पक्ष में अपना एक ति हाई विहस्सा देने क े खिलए विकया गया था सिजसे ए श्मिOमनपश्चा विद्व ीय वि$dी क े रूप में संदर्भिभ विकया गया। श्री सैयद शुजा अली खान, जो कासिसम अली खान क े पुत्र थे, ने रिरट यातिचका (सी) संख्या 5874 वर्ष! 1974 दायर की, सिजसमें तिर्डप्टी विनदेशक, चक$ंदी द्वारा पारिर 12.09.1974 क े आदेश को चुनौ ी दी गई थी। 01.05.1988 को, ऐसा प्र ी हो ा है विक श्री कासिसम अली खान ने मु वल्ली क े पद से इस् ीफा दे विदया। अपीलक ा! का पक्ष यह है विक श्री सुजा अली खान मु वल्ली $न गए। श्री सुजा अली खान द्वारा दायर रिरट यातिचका वापस ले ली गई। इसक े $ाद, श्री सज्जाद अली खान, जो श्री कासिसम अली खान क े एक अन्य पुत्र थे और सिजन्होंने वक्फ क े लाभाथn क े रूप में दावा विकया था, ने उ.प्र. णिशया वक्फ $ोर्ड! क े समक्ष एक परिरवाद दायर विकया। उन्होंने अपने विप ा श्री कासिसम अली खान और अपने चाचा, श्री कासिसम अली खान द्वारा वक्फ संपखि} क े हस् ां रण पर सवाल उठाया। उन्होंने रिरट यातिचका (सी) संख्या 5874 वर्ष! 1974 को वापस लेने क े अलावा उप विनदेशक, चक$न्दी क े समक्ष उनक े द्वारा विकए गए समझौ े को भी संदेह क े घेरे में लाने का प्रयास विकया। वक्फ $ोर्ड! $ोर्ड! क े विनयंत्रक ने आदेश विदनांविक 16.07.1997 पारिर विकया। उक्त आदेश द्वारा, उन्होंने अति विनयम की ारा 52 (1) को लागू विकया और कलेक्टर को अनति क ृ कब्जेदारों श्री सैयद मोहम्मद अहमद अली खान और श्री मोहम्मद अली खान, जो श्री र€ा अली खान क े पुत्र थे,से विववाविद भूविम का कब्जा वापस लेकर देने का विनदoश विदया। वे अपील में पहले उ}रदा ा हैं और उन्हें इस रह संदर्भिभ विकया गया है। इसी पर कलेक्टर उद्देOय क ने विदनांक 31.12.1997 का आदेश पारिर विकया, सिजसमें प्रति वाविदयों को ीस विदनों क े भी र संपखि} का कब्जा $ोर्ड! को सौंपने का विनदoश विदया गया। अपील में इस आदेश को पहले प्रति वाविदयों अथा! कणिथ अनति क ृ कब्जेदारों द्वारा अपर सिजला जज, $ुलंदशहर क े समक्ष चुनौ ी दी गई। उक्त अपीलों को अति रिरक्त सिजला न्याया ीश द्वारा स्वीकार विकया गया। अपीलक ा! ने रिरट यातिचका (सी) संख्या 23414 वर्ष! 1998 दायर विकया, सिजसमें कहा गया था विक क्षेत्राति कार वक्फ न्यायाति करण क े पास था न विक अपर सिजला न्याया ीश क े पास। इस क ! को उच्च न्यायालय का समथ!न विमला और यह पाया गया विक अपर सिजला न्याया ीश क े पास क्षेत्राति कार नहीं था। अपर सिजला न्याया ीश क े आदेश को अपास् कर विदया गया। इसक े $ाद, प्रथम प्रति वादी ने वक्फ न्यायाति करण क े समक्ष अपील संख्या 2 वर्ष! 2002 और अपील संख्या 3 वर्ष! 2002 दायर की। आदेश विदनांविक 28.03.2003 द्वारा, वक्फ न्यायाति करण ने अपील की अनुमति दी और कलेक्टर क े आदेश को अपास् कर विदया गया। उक्त आदेश की ही, उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आक्षेविप आदेश द्वारा पुविj की गई है सिजसक े द्वारा, अपीलक ा! द्वारा दायर पुनरीक्षण यातिचकाएं खारिरज की गई ं । वक्फ न्यायाति करण क े विनष्कर्ष!
7. I. अति विनयम की ारा 52 (1) क े ह, $ोर्ड! को जांच करने क े $ाद पहले विन ा!रिर रीक े से सं ुj होना था विक संपखि} वक्फ रसिजस्टर में दज! है और आगे यह विक $ोर्ड! की पूव! अनुमति क े वि$ना संपखि} को अलग कर विदया गया था। इसक े $ाद कब्जा वापस लेने क े खिलए मामला कलेक्टर क े पास भेजा जाना चाविहए। उद्देOय क ii. रिरकॉर्ड! और अपीलक ा! द्वारा दायर एक सत्य प्रति (कागजा संख्या 42 सी और 53 सी2) का अवलोकन करने क े $ाद, यह पाया गया विक आदेश में यह उल्लेख नहीं विकया गया था विक $ोर्ड! ने कोई जांच की थी। iii. जांच करने क े $ाद $ोर्ड! ने स्वंय को सं ुj नहीं विकया। यह विनष्कर्ष! $ोर्ड! से मांगे गए रिरकॉर्ड! में कोई स$ू नहीं होने क े आ ार पर दज! विकया गया था। iv. रिरकॉर्ड! में शाविमल एक वरिरष्ठ वक्फ इंस्पेक्टर की रिरपोट! पर विवचार विकया गया और यह पाया गया विक वरिरष्ठ वक्फ इंस्पेक्टर ने वास् व में यह नहीं देखा था विक संपखि} वक्फ रसिजस्टर में दज! की गई थी या नहीं। विनयंत्रक ने अति विनयम की ारा 52(1) में विन ा!रिर विन ा!रिर प्रविdया क े अनुसार स्वयं को सं ुj नहीं विकया था। v. अपनाई गई प्रविdया अवै थी। अति विनयम क े ह विनयंत्रक क े रूप में कोई अति कारी नहीं जाना जा ा है। $ोर्ड! द्वारा ारा 52 (1) क े ह शविक्त का प्रयोग विकया जा सक ा है। यह स्थाविप करने क े खिलए कोई अति सूचना प्रस् ु नहीं की गई थी विक $ोर्ड! ने विनयंत्रक क े रूप में विकसी अति कारी को अपनी शविक्तयाँ हस् ां रिर की। विनयंत्रक द्वारा पारिर आदेश अति कारिर ा रविह था। vi. क े वल सा विदनों की अवति दी गई थी, जो विक अवै है। vii. वक्फ $ोर्ड! क े समक्ष अपीलक ा! द्वारा दायर यातिचका में प्रति वाविदयों क े कब्जे को स्पj रूप से स्वीकार विकया गया था। आगे यह भी स्वीकार विकया गया था विक प्रति वादी संपखि} का उपयोग अपने विह क े खिलए और अपनी विनजी संपखि} क े रूप में कर रहे थे। प्रति क ू ल कब्जे क े माध्यम से प्रति वादी माखिलक $न गए थे। उ.प्र. अति विनयम की ारा 49 ए और अति विनयम की ारा 51 क े अपवाद थे। दोनों अति विनयम वक्फ क े विवर्षय पर विवशेर्ष अति विनयम थे। ऐसा कोई विनरपेक्ष विनयम नहीं उद्देOय क था विक विकसी संपखि} को स्थानां रिर नहीं विकया जा सक ा क्योंविक प्रति क ू ल कब्जे क े आ ार पर विकसी व्यविक्त को नए अति कार प्राप्त हो गए हों। उच्च न्यायालय क े विनष्कर्ष!
8. i. अपीलक ा! क े इस क ! में मेरिरट है विक उपविनदेशक, चक$न्दी क े सामने विकया गया समझौ ा कपटपूण! होने क े कारण वक्फ को परासिज नहीं कर सका। एक $ार वक्फ, हमेशा क े खिलए वक्फ हो ा है। ii. वक्फ $ोर्ड! की अनुपश्मिस्थति में उपविनदेशक, चक$न्दी द्वारा पारिर समझौ ा अति विनयम 1960 की ारा 69 क े आलोक में पारिर आदेश अवै था। iii. 29.06.1974 को श्री कासिसम अली खान द्वारा विनष्पाविद वि$dी (दूसरी वि$dी) इस कारण से भी अवै थी विक 1960 उ.प्र. अति विनयम की ारा 49 ए क े ह वक्फ $ोर्ड! की कोई अनुमति नहीं ली गई थी। समान रूप से, श्री कासिसम अली खान द्वारा वर्ष! 1960 में विनष्पाविद वि$dी (पहली वि$dी), जो एक लाभाथn थे, सिजन्हें वक्फ संपखि} $ेचने का कोई अति कार नहीं था, शून्य था। iv. श्री सैयद मोहम्मद अहमद अली खान और श्री सैयद मोहम्मद अली खान वक्फ अल-अल-औलाद में लाभाथn थे। अपीलक ा! क े इस क ! को खारिरज कर े हुए विक एक लाभाथn को वक्फ संपखि} पर प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व प्राप्त नहीं हो ा, यह पाया गया विक प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व प्राप्त विकया जा सक ा है। v. श्री मोहम्मद इस्माइल फारूकी $नाम भार संघ एवं अन्य[1] और मश्मिस्जद शाविहद गंज क े रूप में जानी जाने वाली मश्मिस्जद,एवं अन्य $नाम णिशरोमणिण गुरुद्वारा
उद्देOय क प्र$ं क सविमति, अमृ सर एवं अन्य[2] क े मामलों का अवलं$ ले े हुए यह पाया गया विक प्रति क ू ल कब्जे से वक्फ संपखि} पर स्वत्व प्राप्त विकया जा सक ा है। vi. न्यासी सं$ं में कोई व्यविक्त या सिजसमें विकसी टiस्ट की संपखि} विनविह हो, टiस्ट की संपखि} पर प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व का दावा नहीं कर सक ा। उक्त सिसद्धान् क े आ ार पर मु वल्ली वक्फ पर प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व का दावा नहीं कर सक ा। संपखि} [देखें फकीर मो. शाह $नाम काजी फसीहुद्दीन अंसारी एवं अन्य[3] ]। यह विक एक सह माखिलक भी टiस्ट संपखि} पर प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व प्राप्त नहीं कर सक ा है, विवति में सुस्थाविप है। vii. एक लाभाथn सह-स्वामी नहीं हो ा है और, इसखिलए, यह सिसद्धां विक एक सह-स्वामी दूसरे सह-स्वामी क े विहस्से पर प्रति क ू ल कब्जे से अति कार प्राप्त नहीं कर सक ा, एक लाभाथn पर लागू नहीं हो ा। लाभाथn क े पास टiस्ट में संपखि} नहीं थी। viii. "वक्फ क े हर मामले में, चाहे साव!जविनक हो या विनजी, संपखि} ईश्वर में विनविह हो ी है या त्समय प्रवृ} एक संस्था या आर्भिथक नींव क े रूप में वक्फ में ही। " उच्च न्यायालय ने उपरोक्त दृविjकोण से समथ!न प्राप्त विकया जो पूण! पीठ द्वारा मोअ}र रजा एवं अन्य $नाम संयुक्त विनदेशक चक$ंदी, उ.प्र. क ैं प $रेली व अन्य[4] क े मामले में रिरपोट! विकया गया था। ix. खिलविमटेशन एक्ट, 1963 क े अनुच्छेद 96 में अन्य $ा ों क े साथ -साथ, मूल्यवान प्रति फल क े खिलए विपछले प्र$ं क द्वारा हस् ां रिर कब्जे को पुनप्रा!प्त
4 AIR 1970 Allahabad 509 उद्देOय क करने क े खिलए एक मुश्मिस्लम ार्मिमक या मा!थ! संस्था क े प्र$ं क द्वारा एक मुकदमे क े खिलए $ारह वर्ष! की अवति का उप$ं विकया गया है। श्री कासिसम अली खान द्वारा विनष्पाविद वि$dी (पहली वि$dी) इसक े दायरे में नहीं आएगी क्योंविक वह मु वल्ली/मैनेजर नहीं थे। x. श्री कासिसम अली खान, सिजन्हें मु वल्ली क े रूप में नोट विकया गया था,द्वारा 1974 में विनष्पाविद वि$dी विवलेख क े सं$ं में, न्यायालय सीमा अति विनयम, 1963 क े अनुच्छेद 65 और 96 क े परस्पर प्रभाव पर विवचार विकया। यह पाया गया विक अनुच्छेद 96 एक शून्य हस् ां रण क े मामले में लागू नहीं होगा। एक वै ाविनक आवOयक ा क े उल्लंघन क े कारण एक हस् ां रण क े शून्य होने क े मामले में, हस् ांरिर ी का प्रति क ू ल कब्जा हस् ां रण की ारीख से शुरू होगा। यविद कब्जे की प्राविप्त क े खिलए मुकदमा अनुच्छेद 65 क े ह $ारह वर्ष! की अवति क े भी र दायर नहीं विकया गया था, $ंदो$स् ी संपखि} की प्राविप्त का प्र$ं क का अति कार परिरसीमा अति विनयम की ारा 27 क े ह समाप्त हो जाएंगे। xi. अनुच्छेद 96 की सही व्याख्या यह है विक इसक े दायरे को कब्जे की प्राविप्त क े खिलए ऐसे मुकदमों क सीविम रखा जाए, जहां परिरसीमा अति विनयम की ारा 27 क े ह कब्जा वापस लेने का अति कार खो नहीं गया था। दूसरे शब्दों में, यह पाया गया है विक अनुच्छेद 96 क े वल शून्यकरणीय हस् ान् रण क े सं$ं में उपयोगी होगा। xii. अति करण का यह विनष्कर्ष! सही पाया गया विक उ}रदा ाओं ने प्रति क ू ल कब्जे से माखिलकाना हक हासिसल विकया था। वक्फ अति विनयम, 1954 की ारा 66 जी पर आ ारिर विववाद को खारिरज कर विदया गया था, हालांविक यह ीस साल की अवति क े खिलए प्रदान विकया गया था। यह था इस आ ार पर विक उक्त अति विनयम उ}र प्रदेश में कभी भी लागू नहीं विकया गया था। उद्देOय क xiii. अति विनयम की ारा 107, सिजसमें परिरसीमा अति विनयम शाविमल नहीं है, अपीलक ा! क े खिलए $हु कम उपयोगी पाई गई। प्रति क ू ल कब्जे वाला व्यविक्त मु वल्ली क े माध्यम से दावा नहीं कर ा है। अति विनयम की ारा 107 को लागू करक े प्रति क ू ल कब्जे द्वारा प्रति वादीगण द्वारा अर्जिज अति कार खत्म नही हो सक ा। xiv. विटiब्यूनल द्वारा व्यक्त विकया गया विवचार विक वक्फ $ोर्ड! जांच करने क े खिलए $ाध्य था और ऐसी जांच नहीं की गई थी, गल पाया गया था। अपीलक ा! का यह क ! विक वक्फ पंजीक ृ था, पर विववाद नहीं विकया गया है, और यह भी विववाविद नहीं था विक वि$dी क े खिलए कोई पूव! मंजूरी नहीं थी, में मेरिरट पायी गयी। xv. यह नोट विकया गया विक इंस्पेक्टर की रिरपोट! में, यह कहा गया है विक वक्फ को वक्फ संख्या 1456 क े रूप में पंजीक ृ विकया गया था, सिजस उविक्त को गल स्थाविप नहीं की गयी। आगे यह पाया गया विक प्रति वादीगण ने ऐसा कोई पक्ष नहीं रखा विक वक्फ वक्फ क े रसिजस्टर में पंजीक ृ नहीं था। इसखिलए, विनयंत्रक क े आदेश की आवOयक ा नहीं थी, यह पाया गया, ारा 52 क े ह कोई जांच नहीं होने क े आ ार पर इसे रद्द कर विदया गया। यह भी पाया गया विक इसे इस रह से रद्द नहीं विकया जा सक ा था इस आ ार पर विक विववेक का प्रयोग नहीं विकया गया था। xvi. खिखल्ली राम $नाम राजस्थान राज्य[5] में रिरपोट! विकए गए विनण!य का प्रभाव यह पाया गया विक कलेक्टर द्वारा पारिर आदेश क े खिखलाफ अपील में वक्फ रसिजस्टर में प्रविवविj पर सवाल नहीं उठाया जा सक ा है। आदेश क े खिखलाफ अपील अति विनयम क े ह कलेक्टर न्यायाति करण क े समक्ष हो ा है। न्यायाति करण क े पास व्यापक शविक्तयाँ हैं और यह प्रश्न में जा सक ा है। न्यायाति करण $ोर्ड! द्वारा
उद्देOय क जारी विकये गए अनुरो आदेश की वै ा पर विवचार कर सक ा है। यह विवचार अमीना खा ून $नाम ृ ीय अपर सिजला जज फरू ! खा$ाद और अन्य[6] क े मामले में एकल न्याया ीश द्वारा अपने विनण!य में व्यक्त विकया गया है। उच्च न्यायालय उक्त विवचार से सहम था। xvii. विटiब्यूनल द्वारा इस आ ार पर नोविटस को दोर्षपूण! पाया जाना त्रुविटपूण! था विक ीस विदनों का नोविटस नहीं विदया गया था। उच्च न्यायालय ने इसे एक गल ी माना और कहा विक कोई पूवा!ग्रह नहीं हुआ क्योंविक ीस विदनों की अवति की समाविप्त से पहले उनक े विनष्कासन क े खिलए कोई कदम नहीं उठाया गया था। । xviii. प्रति वाविदयों का यह क ! विक वक्फ क े वरिरष्ठ विनरीक्षक द्वारा दी गई रिरपोट! एक पक्षीय रिरपोट! थी और उन्हें कोई अवसर नहीं विदया गया था, थ्यात्मक रूप से सही पाया गया था। हालांविक, यह पाया गया विक विनयंत्रक ने पाया था विक विवचारा ीन संपखि} वक्फ संपखि} थी, वक्फ पंजीक ृ था और अं में, अनुमति क े अभाव में स्थानां रण अमान्य था। यह विवविनर्मिदj रूप से पाया गया विक मुद्दे से सं$ंति थ्यों पर कोई विववाद नहीं है। प्रति वादीगण, विवशेर्ष रूप से विटiब्यूनल द्वारा विदए गए पूण! अवसर को ध्यान में रख े हुए, विवशेर्ष रूप से ज$ यह क ! नहीं विदया गया विक वक्फ पंजीक ृ नहीं था या संपखि} वक्फ संपखि} नहीं थी या हस् ां रण से पहले अनुमति ली गई थी, क े प्रति कोई पूवा!ग्रह नहीं है। xix. हालांविक, यह पाया गया था विक इस विनष्कर्ष! क े मद्देनजर विक प्रति वाविदयों ने प्रति क ू ल कब्जे से माखिलकाना हक हासिसल विकया था, पुनरीक्षण यातिचकाओं में कोई मेरिरट नहीं थी और दनुसार, उन्हें खारिरज कर विदया गया था। अपीलक ा! की दलीलें 6 1987 All LJ 1282 उद्देOय क
9. i. अपीलक ा! क े विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता, श्री सलमान खुशnद ने क ! विदया विक परिरसीमा अति विनयम का अनुच्छेद 96 लागू हो ा है। परिरसीमा की अवति 1996 1996 से या उस ारीख से शुरू होगी, ज$ अपीलक ा! श्री सज्जाद अली खान को मु वल्ली विनयुक्त विकया गया था। चूंविक 01.05.1988, ज$ श्री कासिसम अली खान ने इस् ीफा विदया था या व !मान मु वल्ली श्री सज्जाद अली खान की विनयुविक्त की ति णिथ से $ारह वर्ष! समाप्त नहीं हुए थे। इसखिलए, श्री सैयद मोहम्मद अहमद अली खान प्रति क ू ल कब्जे से माखिलकाना हक प्राप्त नहीं कर सक े। ii. परिरसीमा अति विनयम का अनुच्छेद 65 लागू नहीं हुआ। श्री सैयद अहमद अली खान का दावा 13.02.1974 क े समझौ े पर आ ारिर था। यह 14.10.1960 क े वि$dी विवलेख पर आ ारिर नहीं था। उक्त वि$dी विवलेख क े ह अति कार,यविद कोई हो, चक$न्दी की काय!वाही क े दौरान और ीनों चक$न्दी न्यायालयों क े विनण!यों क े दौरान उनक े द्वारा कोई आपखि} नहीं विकये जाने को देख े हुए, विनराक ृ हो गया। iii. श्री सैयद मोहम्मद अली खान क े प्रति क े दावे क े सं$ं में, यह क ! विदया गया है विक अनुच्छेद 65 एक सामान्य अनुच्छेद था और अनुच्छेद 96 लागू होगा। अपीलक ा! को मु वल्ली विनयुक्त विकया गया था। अवति $ शुरू होगी, ज$ उसे इस रूप में विनयुक्त विकया गया या 1996 में उस ति णिथ से ज$ उनक े द्वारा परिरवाद दायर विकया गया था। iv. उच्च न्यायालय ने यह विनष्कर्ष! विनकालने में गल ी की विक वक्फ का अति कार परिरसीमन अति विनयम की ारा 27 क े आ ार पर समाप्त हो गया। जैसा विक कब्जे क े खिलए मुकदमा पहले क े मु वल्ली से हस् ां रिर ी क े खिखलाफ था, कब्जा पहले उद्देOय क की परिरसीमा सीमा अति विनयम क े अनुच्छेद 134 $ी क े ह मृत्यु की ारीख या पहले क े मु वल्ली क े इस् ीफ े से,$ारह वर्ष! की समाविप्त पर, जैसा विक अनुच्छेद 96 में उप$ं विकया गया है, से प्रति क ू ल हो जाएगा न विक वि$dी विवलेख की ारीख से। v. अपीलक ा! ने आगे क ! विदया है विक प्रति वादी लाभाथn होने क े ना े, वक्फ संपखि} पर प्रति क ू ल कब्जे से, माखिलकाना हक प्राप्त नहीं कर सक े। vi. विनम्नखिलखिख विनण!यों का अवलं$ खिलया गया था: a. छेदी लाल विमश्रा (मृ क) द्वारा विवति क प्रति विनति $नाम सिसविवल जज, लखनऊ एवं अन्य[7]; b. क े.एस. विवश्वम अय्यर (मृ क) द्वारा विवति क प्रति विनति $नाम राज्य वक्फ $ोर्ड!, मद्रास[8]; और c. वली मोहम्मद (मृ क) द्वारा विवति क प्रति विनति $नाम रहम $ी (श्रीम ी) एवं अन्य[9] ।
10. अपील में प्रति वादी संख्या 1 की ओर से उपश्मिस्थ विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता, श्री पी.एस. पटवाखिलया ने विनम्नखिलखिख क ! विदया है: कोई वै वक्फ नहीं $नाया गया है क्योंविक वक्फ ने उस पर कभी कार!वाई नहीं की। उसने णिशया मुसलमानों से सं$ंति मुश्मिस्लम कानून क े ह यथा आवOयक संपखि} से खुद को कभी अलग नहीं विकया। कानून क े ह, यह अविनवाय! है विक कब्जे क े चरिरत्र में $दलाव होना चाविहए। वकीफ
उद्देOय क द्वारा नामां रण रिरकॉर्ड! में कोई $दलाव नहीं विकया गया। संपखि} 16.12.1958 को उनकी मृत्यु क व्यविक्त क े नाम पर रही। त्पश्चा संपखि} को उनक े ीन $ेटों क े नाम पर अं रिर कर विदया गया। वक्फ विदनांक 26.07.1934 क े उद्देOय का अवलं$ खिलया गया है। इसमें संक े विदया गया है: "अन्य $ा ों क े साथ वक्फ का उद्देOय" अपने पूव!जों क े नाम को कायम रखने क े उद्देOय से और मेरी सं ानों और उनकी सं ानों और परिरवार और उनकी सं ानों क े रिरO ेदारों और उनकी अनुपश्मिस्थति में णिशया गरी$, दरिरद्र, दुखी और सैयदों को लाभ पहुंचाने क े उद्देOय से- मोहम्मर्डन कानून क े ह इस उद्देOय क े खिलए, 1913 क े अति विनयम 6 क े अनुसार, मैंने एक औपचारिरक कथन (सिसघा) द्वारा शरिरया क े अनुसार ए द्द्वारा अपनी संपखि} से $ाहर कर े हुए 'वक्फ ु ल औलाद (सं ान क े खिलए टiस्ट) विवलेख खिलखकर विनम्नखिलखिख संपखि} को वक्फ (टiस्ट) में दे ा हूं,...... " वक्फ विवलेख का खंर्ड ई अन्य $ा ों क े साथ उप$ं कर ा है: "ई. भगवान न करे विक मेरी पीढ़ी पूरी रह से नj हो जाए और वहां कोई न $चे और न ही मेरी पत्नी पाकीजा $ेगम या कोई अन्य पत्नी जीविव रहे, ो ऐसी श्मिस्थति में दान की गई संपखि} से होने वाली आय, सिजसका प्र$ं सविमति क े सदस्य करेंगे सुविव ा संकलन क े शीर्ष! A में मा!थ! मामलों क े खिलए खच! विकया जाना चाविहए।”
11. यह आगे क ! विदया गया है विक सौ $ीघे क े एक छोटे खंर्ड को छोड़कर, जो व !मान मामले की विवर्षय वस् ु है, सभी संपखि} $ेची जा चुकी है। वास् व में, उद्देOय क वकीफ ने स्वयं विकसी श्री मंजूर हसन को एक विहस्सा $ेच विदया। लगभग 4272 $ीघे अक$र अली खान क े $ेटों द्वारा $ेचे गए हैं। न ो अपीलक ा! और न ही वक्फ $ोर्ड! ने आपखि} की। वक्फ विवलेख में इस् ेमाल की जा रही वक्फ संपखि} की आय $काया ऋण चुकाने क े खिलए परिरकश्मिल्प है। इसखिलए, यह वै वक्फ नहीं था। वक्फ 24.07.1934 को $नाया गया था, उस समय, मुसलमान वक्फ वै ीकरण अति विनयम, 1913 लागू था। अति विनयम में वक्फ क े पंजीकरण का प्राव ान नहीं था। इसक े $ाद ही, मुसलमान वक्फ अति विनयम, 1923 को अति विनयविम विकया गया था। इसक े ह, ारा 2 (ई) क े आ ार पर, वक्फ अल-औलाद को 1923 अति विनयम क े संचालन से $ाहर रखा गया था। इसक े आगे, 1930 में, मुसलमान वक्फ वै ीकरण अति विनयम, 1930 अति विनयविम विकया गया था, सिजसने क े वल यह घोविर्ष विकया विक 1913 अति विनयम, 1913 अति विनयम क े प्रारंभ से पहले $नाए गए वक्फ पर लागू हो ा है। इसक े $ाद ही उ}र प्रदेश मुश्मिस्लम वक्फ अति विनयम, 1936 (ए श्मिOमनपश्चा '1936 अति विनयम' क े रूप में संदर्भिभ ) और 1960 का अति विनयम अति विनयविम विकया गया। न ो 1936 और न ही 1960 क े अति विनयम थ्यों पर लागू हो े हैं। इसखिलए, यह क ! विदया गया है विक अपीलक ा! का यह क ! नहीं हो सक ा विक कणिथ वक्फ 1936 क े अति विनयम या 1960 क े अति विनयम क े ह दज! विकया गया था। वक्फ का उद्देOय सं ानों और उनकी सं ानों को और उनकी अनुपश्मिस्थति में णिशया गरी$ों को लाभाश्मिन्व करना है। 1936 का अति विनयम लागू नहीं हुआ था और 1936 क े ह वक्फ को पंजीक ृ नहीं विकया जा सक ा था। 26.07.1934 क े वक्फ विवलेख का कोई ार्मिमक या मा!थ! उद्देOय नहीं है। फजलुल रब्$ी प्र ान $नाम पतिश्चम $ंगाल राज्य और अन्य10 क इस न्यायालय क े फ ै सले का अवलं$ खिलया गया है। वक्फ पंजीक ृ न होने क े 10 1965 3 SCR 307 / AIR 1965 SC 1722 उद्देOय क कारण, अति विनयम क े ह सारांश प्रविdया प्रयोज्य नहीं थी। यह भी णिशकाय की गई है विक कणिथ पंजीकरण क े सं$ं में अपीलक ा!ओं क े अलग-अलग संस्करण हैं। एक ओर, यह क ! विदया गया है विक पंजीकरण वास् व में 1934 में विकया गया था, उस समय 1923 का अति विनयम लागू था। उक्त अति विनयम में, विवशेर्ष रूप से वक्फ-अलल-औलाद को इसक े दायरे से $ाहर करने क े अलावा पंजीकरण से सं$ंति विकसी भी प्राव ान का उप$ं नहीं था। सुनवाई क े दौरान आगे यह $ ाया गया है विक यह क ! विदया गया है विक 1936 एक्ट क े ह रसिजस्टiेशन कराया गया था। विवणिशj अपवज!न क े मद्देनजर, ारा 2 (2) (i) क े अनुसार, यह लागू नहीं हो ा है क्योंविक पूरी आय परिरवार क े सदस्यों क े लाभ क े खिलए जा रही थी। 1936 क े अति विनयम, ारा 38 में क े ह विन ा!रिर विकसी भी दर पर एक प्रविdया है। उसी का पालन नहीं विकया गया है। ीसरा संस्करण, यह $ ाया गया है विक वक्फ 1960 अति विनयम क े ह पंजीक ृ विकया गया था। विनयंत्रक की एक रिरपोट!, सिजस पर पहली $ार इस न्यायालय में अवलं$ खिलया गया था और सिजस पर विटiब्यूनल ने विवश्वास नहीं विकया था, आ ार नहीं हो सक ी। विफर भी, क्योंविक पूरी आय वकीफ क े वंशजों को समर्मिप थी, जो दायरे से $ाहर थी, 1960 अति विनयम क े अनुसार, दावा विनरा ार था। यहां विफर से, ारा 29 में पंजीकरण क े खिलए प्रविdया का उप$ं था। उसी क े अनुरूप नहीं होने क े कारण, यह नहीं कहा जा सक ा है विक वक्फ 1960 अति विनयम क े ह पंजीक ृ विकया गया था। 1960 क े े लागू न होने क े कारण, ारा 69 में अति विनयविम वक्फ से सं$ंति मुकदमे या काय!वाही क े समझौ े पर रोक लागू नहीं थी। ारा 45 ख में वर्भिण वक्फ संपखि}यों की प्राविप्त क े खिलए सारांश प्रविdया उपलब् नहीं थी। उद्देOय क वक्फ क े पंजीकरण को स्थाविप करने क े खिलए कणिथ ौर पर वक्फ क े रसिजस्टर क े उद्धरण पर कोई भरोसा नहीं विकया जा सक ा है सिजसे प्रति वादी संख्या 4- कलेक्टर द्वारा पहली $ार इस न्यायालय क े समक्ष प्रत्यु}र कथन करने में प्रस् ु विकया गया था। पंजीकरण प्रमाणन की ति णिथ 08.07.2008 है, जो उच्च न्यायालय द्वारा आदेश पारिर करने क े $ाद थी। यहां विफर से, अति विनयम की ारा 36 क े ह प्रविdया का पालन नहीं विकया गया। अविनवाय! रूप से विनर्मिदj विकए जाने वाले विववरण गाय$ थे। वै पंजीकरण की अनुपश्मिस्थति में, अति विनयम की ारा 52 में उप$ंति सारांश प्रविdया अपीलक ा!ओं क े खिलए उपलब् नहीं थी। अपीलक ा!ओं को 22 साल की अवति क े $ाद, 1974 क े समझौ े को चुनौ ी देने से रोक विदया गया है। समझौ े क े पक्षकारों ने उसी पर कार!वाई की। दूसरा वि$dी हुई। अं रणक ा! का पुत्र होने क े कारण अपीलक ा! को रोक विदया गया। सुजा अली खान द्वारा दायर यातिचका का खारिरज विकये जाने पर $ल नहीं विदया गया, इस कारण आदेश विदनांविक 12.09.1974 अंति म हो गया। प्रति वादीगण क े पास स, विन$ा! कब्जा था। खिलविमटेशन एक्ट अति विनयम क े प्रभाव में आने क, मोहम्मर्डन कानून क े ह वक्फ संपखि}यों पर लागू था, सिजसक े ह, ारा 107 विवशेर्ष रूप से खिलविमटेशन एक्ट, 1963 की प्रयोज्य ा पर रोक लगा ी थी। 1940 XXI ILR 493 में विप्रवी काउंसिसल क े विनण!य पर अवलं$ खिलया गया। इसक े अलावा, र्डॉ. एम. इस्माइल फारूकी एवं अन्य $नाम भार संघ11 में इस न्यायालय क े विनण!य से समथ!न प्राप्त विकया गया है। परिरसीमा अति विनयम, 1963 की ारा 107 अपनी प्रयोज्य ा में अग्रगामी थी। हमारा ध्यान टी. काखिलयामूर्ति (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय क े विनण!य की ओर आकर्मिर्ष विकया गया है। प्रति वाविदयों क े पास पहले वि$dी विवलेख क े $ाद से दो-ति हाई संपखि} का कब्जा है और शेर्ष एक
उद्देOय क ति हाई 1974 में उनक े कब्जे में आया। इस रह क े कब्जे को स्थाविप करने वाले दस् ावेजी साक्ष्य में विनम्नखिलखिख शाविमल हैं: i. विनयंत्रक, वक्फ $ोर्ड! का आदेश विदनांविक 16.07.1997; ii. वि$dी विवलेख विदनांविक 26.09.1974; iii. सिजला एवं सत्र न्याया ीश, $ुलंदशहर क े समक्ष प्रति वादी द्वारा दायर अपील (संख्या 4 वर्ष! 1998) में अणिभकथन; iv. सिजला न्याया ीश द्वारा पारिर आदेश विदनांविक 30.05.1998; v. वक्फ अपील संख्या 3 वर्ष! 2002; vi. न्यायाति करण क े आदेश क े विनष्कर्ष!; vii. आक्षेविप विनण!य में अपीलक ा! द्वारा प्रति वाविदयों क े कब्जे की स्वीकारोविक्त और, अं में, viii. अपीलक ा! द्वारा जमा की गई ारीखों की सूची में पर अवलं$ खिलया गया है, जो इंविग कर ा है विक कलेक्टर का आदेश कब्जे की प्राविप्त क े खिलए था।
12. इस प्रकार, यह क ! विदया गया है विक प्रति वादीगण क े पास 1960 क े $ाद से दो-ति हाई का कब्जा है और 1974 क े $ाद से शेर्ष एक-ति हाई और अति विनयम क े लागू होने से पहले प्रति वादीगण क े अति कार उत्पन्न हुए। 1974 से विगन ी करने पर भी प्रति वादीगण का स्वत्व 1986 में पूरा हो गया अथा! 1974 से 12 साल $ाद। इस प्रकार, परिरसीमा अति विनयम, 1963 वास् व में लागू होगा क्योंविक विवरो ी कब्जे क े कारण अति विनयम की ारा 107 क े लागू होने से पहले स्वत्व परिरपक्व हो गया था। उद्देOय क
13. इसक े $ाद यह $ ाया गया है विक मु वल्ली की विनयुविक्त से परिरसीमा की नए सिसरे से शुरुआ नहीं हुई। सैयद यूसुफ यार खान एवं अन्य $नाम सैयद मोहम्मद यार खान एवं अन्य12 क े मामले में इस न्यायालय का विनण!य उक्त पक्ष का खंर्डन करने खिलए रखा गया। उच्च न्यायालय ने व !मान मामले में परिरसीमा अति विनयम, 1963 क े अनुच्छेद 65 को ठीक ही लागू विकया था। अपील में पहला प्रति वादी लाभाथn नहीं हैं, यह आगे $ ाया गया है विक विकसी वै वक्फ की स्थापना नहीं हुई। यह सुझाने क े खिलए कोई साक्ष्य नहीं है विक उक्त वक्फ कोई आय उत्पन्न कर रहा था सिजसे लाभार्भिथयों क े $ीच विव रिर विकया जा रहा था। इसका म ल$ था विक मूल वाकीफ क े ीन $ेटे लाभाथn नहीं थे और उनक े साथ ऐसा व्यवहार नहीं विकया गया था। यह भी $ ाया गया है विक वक्फ क े लाभाथn को प्रति क ू ल कब्जे का दावा करने से रोकने क े खिलए कानून में कोई रोक नहीं है। रोक क े वल एक मु वल्ली पर लागू हो ा है। यह इस कारण से है विक मु वल्ली की न्यासीय भूविमका हो ी है। यह अंति म रूप से इंविग विकया गया है, विक स्वत्व और प्रति क ू ल कब्जे दोनों का अणिभवचन करने का पहले प्रति वादी क े पास विवकल्प है। एम. सिसद्दीक (मृ ) द्वारा विवति क प्रति विनति (राम जन्मभूविम मंविदर मामला) $नाम महं सुरेश दास एवं अन्य13 और कना!टक वक्फ $ोर्ड! $नाम भार सरकार एवं अन्य14 क े मामलों का अवलं$ खिलया गया। प्रति वादी संख्या 2 और 4 क े क !
14. प्रति वादी संख्या 2 और 4 dमशः सहायक सवoक्षण आयुक्त वक्फ, $ुलंदशहर और कलेक्टर, वक्फ, $ुलंदशहर हैं। विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री एस.आर. सिंसह ने 12 (1967) 2 SCR 318
उद्देOय क क ! विदया विक $ोर्ड! की पूव! अनुमति क े वि$ना अक$र अली क े ीनों $ेटों द्वारा विदया गया समझौ ा आवेदन यथा अति विनयम, 1960 में अणिभकश्मिल्प अति विनयम, 1960 की ारा 69 क े दृविjग, पोर्षणीय नहीं है। चक$न्दी उपविनदेशक क े विदनांक 29.01.1969 क े आदेश था विदनांक 02.03.1972 क े आदेश को रद्द करने का आदेश अवै था। वक्फ $ोर्ड! क े विनयंत्रक ने वक्फ $ोर्ड! क े समक्ष णिशकाय पर जांच की। उन्होंने पाया विक विववाविद संपखि} वक्फ संपखि} थी जो इस रूप में वक्फ क े रसिजस्टर में पंजीक ृ थी। आगे यह पाया गया विक $ोर्ड! की मंजूरी प्राप्त विकए वि$ना संपखि} को अवै रूप से $ेचा गया था। सिजस पर, विनयंत्रक ने कलेक्टर को कब्जा प्राप्त करने क े खिलए अति याचना जारी की। उच्च न्यायालय ने ठाक ु र मोहम्मद इस्माइल $नाम ठाक ु र सावि$र अली15 क े मामले में इस न्यायालय क े विनण!य का अवलं$ खिलया, विक वक्फ-अलल-औलाद में, संपखि} सव!शविक्तमान में स्थानां रिर हो गयी लेविकन विफर भी पुनरीक्षण को इस पर विवचार विकए वि$ना खारिरज कर विदया विक क्या स्वत्व प्रति क ू ल कब्जे से हासिसल विकया जा सक ा है। उन्होंने इंविग विकया विक उच्च न्यायालय ने इस सवाल पर विवचार नहीं विकया विक क्या परिरसीमा े अनुच्छेद 65 और 96 को अल्लाह / सव!शविक्तमान क े खिखलाफ प्रयोग विकया जा सक ा है। उप विनदेशक द्वारा चक$न्दी द्वारा पारिर आदेश अति विनयम 1960 की ारा 69 क े अ ीन स्वीक ृ ति से वंतिच होने क े कारण शून्य था। इसका परिरणाम यह हुआ विक चक$न्दी प्राति कारिरयों क े पहले क े विनण!यों को $हाल कर विदया गया, सिजसमें यह माना गया विक विवचारा ीन वक्फ एक वै वक्फ था। उ.प्र. जो चक$ंदी अति विनयम, 1953 की ारा 49 उसी मुद्दे पर विटiब्यूनल द्वारा विवचार विकए जाने पर रोक लगा ा है, जो सिसविवल कोट! क े जाल में थे। अति विनयम की ारा 51 (1) और ारा 51 (ए) क े ह दोनों वि$dी शुरू से ही शून्य थी। विफर से, ठाक ु र मोहम्मद इस्माइल (उपरोक्त) और अहमद जी.एच.
उद्देOय क आरिरफ एवं अन्य $नाम न कर आयुक्त, कलक}ा16 क े मामलों में विनण!यों का सहारा खिलया गया। लाभाथn/मु वल्ली को वक्फ संपखि} को स्थानां रिर करने का कोई अति कार नहीं था। परिरसीमा अति विनयम की ारा 107 क े मद्देनजर परिरसीमा अति विनयम का अनुच्छेद 65 अति विनयम की काय!वाही पर लागू नहीं हो ा। आगे क ! विदया गया है विक अनुच्छेद 65 मुकदमों पर लागू हो ा है। यह काय!वाही पर लागू नहीं हो ा है। इसखिलए, परिरसीमा अति विनयम, 1963 की ारा 27 वक्फ संपखि} पर लागू नहीं हो ी है जो विक सव!शविक्तमान में विनविह है। छेदी लाल विमश्रा (मृ ) $नाम सिसविवल जज, लखनऊ व अन्य17 क े मामले में इस न्यायालय क े विनण!य का सहारा खिलया गया। वक्फ विवलेख का पैराग्राफ-34 ए, सिजसमें 500/- रुपये मा!थ! उद्देOयों पर खच! करने पर विवचार विकया गया है और पैराग्राफ-34 ई, जो इस $ा पर विवचार कर ा है विक यविद वकीफ क े सभी वंशज मर जा े हैं, ो, वक्फ का उपयोग मा!थ! उद्देOयों क े खिलए विकया जाएगा, वक्फ को 'वक्फ' की परिरभार्षा क े ह लाया गया। एक शून्य दस् ावेज क े रूप में, वि$dी विवलेख और समझौ ा, जैसा विक मामला है, अपास् विकए जाने की आवOयक ा से रविह, दोनों अपीलों में प्रति वादी सं. 1 को भी राज्य क े खिखलाफ प्रति क ू ल कब्जे स्वत्व सिसद्ध होना नहीं कहा जा सक ा सिजसक े खिलए अवति 30 वर्ष! है। मुकदमे$ाजी 1997 में शुरू हुई, यानी की कपटपूण! समझौ ा और शून्य वि$dी विवलेख की ारीख से 23 साल पहले। यह क ! इस थ्य पर आ ारिर है विक वक्फ संपखि} का प्र$ं न अल्लाह की ओर से वक्फ $ोर्ड! द्वारा विकया जा ा है जो कानून क े ह सरकार क े अ ीक्षण क े अ ीन आ ा है। विवश्लेर्षण
15. उठाए गए क® और थ्यों क े आ ार पर, विनम्नखिलखिख $ा ों पर ध्यान विदया जा ा है:
1. क्या वै णिशया वक्फ था और क्या वह पंजीक ृ था?
2. क्या समझौ ा विदनांक 13.02.1974 और आदेश विदनांक 12.09.1974 है। क्या वे मान्य हैं या शून्य हैं?
3. हमारे सामने दो अपीलों, पहली विदनांक 14.10.1960 को और दूसरी 26.09.1974 में क्या पहले प्रति वादी क े पक्ष में दो वि$dी शून्य हैं?
4. क्या कार!वाई परिरसीमा द्वारा वर्जिज है?
5. क्या उच्च न्यायालय यह प ा लगाने में सही था विक कार!वाई रोक दी गई थी क्योंविक यह परिरसीमा अति विनयम का अनुच्छेद 96 नहीं है, जो लागू हो ा है लेविकन अनुच्छेद 65 है? थ्यों में उक्त लेखों क े $ीच परस्पर विdया क्या है?
6. परिरसीमा अति विनयम, 1963 की ारा 27 का थ्यों में क्या प्रभाव है?
7. क्या अति विनयम की ारा 107 विकसी भी दर पर समय सीमा को हटा ी है?
16. आक्षेविप आदेश में उच्च न्यायालय ने विटiब्यूनल क े विनष्कर्ष® की पुविj की है विक दोनों मामलों में प्रति वादी संख्या 1 ने प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व प्राप्त विकया है। यह इस आ ार पर है विक पहली वि$dी वर्ष! 1960 में हुई थी और दूसरी वि$dी वर्ष! 1974 में प्रभावी हुई थी। यह अति विनयम विदनांक 1.1.1996 से प्रभावी हुआ। आगे यह पाया गया विक अवति दो वि$dी विवलेखों की ारीखों से शुरू हुई क्योंविक वि$dी शून्य थी। आगे का विनष्कर्ष! यह है विक परिरसीमा अति विनयम, 1963 का अनुच्छेद 96 वर्ष! 1960 की पहली वि$dी पर लागू नहीं हुआ। उक्त वि$dी उस समय प्रभावी हुई ज$ कासिसम का स$से $ड़ा भाई मु वल्ली था। वि$dी एक ऐसे उद्देOय क व्यविक्त द्वारा की गई थी जो दूसरे शब्दों में मु वल्ली नहीं था। इसखिलए, अनुच्छेद 96 लागू नहीं हुआ। जहां क दूसरी वि$dी का सं$ं है, यह विदनांक 26.09.1974 को कासिसम कासिसम अली खान द्वारा अपने भ ीजे को अपना एक ति हाई अति कार देने क े खिलए लागू विकया गया था, जो अन्य अपील में प्रथम प्रति वादी है। उच्च न्यायालय का आगे क ! यह है विक दूसरा वि$dी विवलेख मु वल्ली द्वारा विनष्पाविद विकया गया था। इसक े $ाद अदाल ने अनुच्छेद 65 और 96 क े अन् ग! क्षेत्र का सीमांकन विकया।अदाल ने $ परिरसीमा अति विनयम, 1963 की ारा 27 को भी ध्यान में रखा। न्यायालय ने पाया विक उतिच व्याख्या यह थी विक अनुच्छेद 96 को कब्जा लेने क े खिलए सूट क ही सीविम रखा जाना था, जहां परिरसीमा अति विनयम, 1963 की ारा 27 क े ह कब्जा वापस लेने का अति कार पहले ही खो नहीं गया था। दूसरे शब्दों में यह पाया गया विक अनुच्छेद 96 शून्यकरणीय स्थानान् रण पर लागू हो ा है। उक्त आ ार पर, यह पाया गया विक दूसरी वि$dी शून्य हस् ां रण क े मामले का प्रति विनति त्व कर ी है और यह पाया गया विक अनुच्छेद 96 ने अपीलक ा! की सहाय ा नहीं की। यह भी पाया गया विक प्रति क ू ल कब्जे से वक्फ पूण! स्वत्व लाभाथn को कोई $ा ा नहीं है। एक मु वल्ली, एक टiस्टी या एक सह- माखिलक क े मामले में विनस्संदेह ऐसी $ा ा मौजूद थी। उपरोक्त में से कोई लाभाथn नहीं था। इस प्रकार, इस आ ार पर काय!वाही कर े हुए विक दोनों अपीलों में प्रथम प्रति वादी वक्फ क े लाभाथn थे और वि$dी सिजसक े ह उन्होंने दावा विकया था विक वे शून्य पाए गए थे, परिरसीमा अति विनयम क े अनुच्छेद 65 क े ह अपेतिक्ष परिरसीमा की अवति वि$dी की ारीख से प्रारम्भ हुई थी। इसका आशय यह था विक ज$ अति विनयम का आरम्भ विदनांक 01.01.1996 को हुआ, ो स्वत्व प्रति क ू ल कब्जे से पहले प्रति वादी क े पास विनविह था। आगे यह पाया गया है विक अति विनयम की ारा 107 सिजसक े ह परिरसीमा अति विनयम अति विनयम पर लागू नहीं था, अपीलक ा! क े मामले को नहीं $चा सका। उद्देOय क
17. यह उतिच है विक हम परिरसीमा अति विनयम क े प्रासंविगक प्राव ानों को संदर्भिभ कर े हैं। परिरसीमन अति विनयम की ारा 27 में प्राव ान है विक विकसी संपखि} पर कब्जे क े खिलए विकसी व्यविक्त द्वारा मुकदमा दायर करने क े खिलए सीविम अवति क े विन ा!रण पर, ऐसी संपखि} पर उसका अति कार समाप्त हो जाएगा। परिरसीमा अति विनयम, 1963 का अनुच्छेद 65 इस प्रकार है: " वाद का वण!न परिरसीमा काल वह समय, ज$ से काल चलना आरम्भ हो ा है
65. हक क े आ ार पर स्थावर सम्पखि} या उसमें क े विकसी विह क े कब्जे क े खिलए। $ारह वर्ष! ज$ प्रति वादी का कब्जा वादी क े प्रति क ू ल हो जा ा है। स्पjीकरण-इस अनुच्छेद क े प्रयोजनों क े खिलए- (क) जहां विक वाद शेर्षभोगी, या (भू-स्वामी से णिभन्न) उ}रभोगी, या वसीय दार द्वारा है, वहां प्रति वादी का कब्जा क े वल $ प्रति क ू ल हो गया समझा जाएगा ज$विक, यथाश्मिस्थति, शेर्षभोगी, उ}रभोगी या वसीय दार को सम्पदा में कब्जे का हक उद्भू हो ा है; (ख) जहां विक दावा विहन्दू या मुश्मिस्लम नारी की मृत्यु पर स्थावर सम्पखि} क े कब्जे क े हकदार विहन्दू या मुश्मिस्लमद्वारा हो, वहां प्रति वादी का कब्जा क े वल $ प्रति क ू ल हो गया समझा जाएगा ज$ उस नारी की मृत्यु हो ीहै; (ग) जहां विक वाद विकसी तिर्डdी क े विनष्पादन में हुए विवdय क े d े ा द्वारा हो, वहां यविद विनणn ऋणी उद्देOय क विवdयकी ारीख को $ेकब्जा था, ो d े ा उस विनणn ऋणी का प्रति विनति समझा जाएगा, जो $ेकब्जा था। "
18. भार ीय परिरसीमा अति विनयम, 1908 का अनुच्छेद 134 ख अनुच्छेद 96 क क्षेत्र को ारण करने वाला पूव!व n प्राव ान था, सिजसे वर्ष! 1963 में प्रति स्थाविप विकया गया था। विनम्नखिलखिख ाखिलका परिरसीमा अति विनयम, 1908 क े अनुच्छेद 134 ख और परिरसीमा अति विनयम, 1963 क े अनुच्छेद 96 को विन ा!रिर कर ी है: "परिरसीमा अति विनयम, 1908 का अनुच्छेद 134-$ी काल 134 ख - विकसी हिंहदू, मुसलमान या $ौद्ध ार्मिमक या मा!थ! $ंदो$स् ी क े प्र$ं क द्वारा $ंदो$स् ी में शाविमल स्थावर संपखि} क े कब्जे को पुनप्रा!प्त करने क े खिलए सिजसे विपछले प्र$ं क द्वारा एक मूल्यवान विवचार क े खिलए स्थानां रिर विकया गया है। $ारह वर्ष! अं रणक ा! की मृत्यु, इस् ीफा या विनष्कासन। " परिरसीमा अति विनयम, 1963 का अनुच्छेद 96 काल विहन्दू, मुश्मिस्लम या $ौद्ध ार्मिमक या खैरा ी विवन्यास $ारह वर्ष! अन् रक की मृत्यु, उसक े उद्देOय क क े प्र$न् क द्वारा, विवन्यास में समाविवjउसजंगम या स्थावर सम्पखि} क े कब्जे क े प्रत्युद्धरणक े खिलए जो पूव! न प्र$न् क द्वारामूल्यवान प्रति फलाथ! अन् रिर कर दी गई है । पद-त्याग या हटाए जाने की ारीख, याविवन्यास क े प्र$न् क क े रूप में वादी की विनयुविक्त की ारीख जो भी पश्चात्व n हो । "
19. इस न्यायालय क े टी. काखिलयामूर्ति और अन्य $नाम फाइव गोरी थैक्कल वक्फ और अन्य18 में विदए गए फ ै सले से दो लेखों क े $ीच अं र को नोट विकया गया है। जो इस प्रकार है: "35....... हमने ध्यान से दो अनुच्छेदों अथा! ् परिरसीमा अति विनयम, 1963 का अनुच्छेद 96 और परिरसीमा अति विनयम, 1908 का अनुच्छेद 134 $ी का उल्लेख विकया है, और हम पा े हैं विक वे एक दूसरे से अलग हैं जहां क 1908 अति विनयम क े ह स्थानां रणक ा! की मृत्यु, त्यागपत्र या विनष्कासन से 12 वर्ष! चलना था, 1963 क े ह 12 साल की उक्त अवति मृत्यु, त्यागपत्र या हस् ां रणक ा! को हटाने की ारीख, या $ंदो$स् ी क े प्र$ं क क े रूप में वादी की विनयुविक्त की ारीख, जो भी $ाद में हो, से चलनी थी।"
20. जहां क पहली वि$dी का सं$ं है, वि$dी मु वल्ली या वक्फ क े प्र$ं क द्वारा प्रभाविव नहीं की गई थी। वि$dी मु वल्ली क े भाई द्वारा प्रभाविव की गई थी। इसखिलए, उच्च न्यायालय का यह विनष्कर्ष! सही है विक अनुच्छेद 96 अपीलक ा! की सहाय ा क े खिलए नहीं आएंगे।
21. जहां क दूसरी वि$dी का सं$ं है, विनस्संदेह, मु वल्ली द्वारा वि$dी विवलेख विदनांक 26.09.1974 द्वारा विनष्पाविद विकया गया था। यह उसक े द्वारा विनष्पाविद
उद्देOय क एक समझौ ा है जो विदनांक 13.02.1974 को ीन भाइयों क े $ीच हुआ था। जैसा विक हमने देखा है, समझौ ा विदनांक 12.09.1974 क े आदेश क े कारण उप विनदेशक (चक$ंदी) द्वारा पारिर विकया जा रहा था, सिजसमें विदनांक 20.09.1969 क े आदेश द्वारा संशो न को खारिरज कर विदया गया था, साथ ही पहले $हाली आवेदन विदनांक 02.03.1972 को भी खारिरज कर विदया गया था। यविद उक्त वि$dी वै पाई जा ी है, ो जाविहर है, अपीलक ा! विवफल हो जाएगा। यविद दूसरी ओर, वि$dी शून्य है, ो सवाल यह होगा विक क्या वि$dी की ारीख से 12 साल $ाद शुरू की गई काय!वाही समय क े भी र हो। यविद परिरसीमा अति विनयम, 1963 क े अनुच्छेद 96 क े ह आश्रय की मांग कर े हुए, परिरसीमा की अवति मु वल्ली क े इस् ीफ े की ारीख से शुरू हो ी है, ो 12 साल की अवति 01.05.1988, ज$ कासिसम अली खान, मु वल्ली ने इस् ीफा दे विदया था, से शुरू नहीं होगी? $, 12 साल की अवति क े वल वर्ष! 2000 में समाप्त हो जाएगी। क्या यह नहीं कहा जा सक ा है विक कार!वाई वर्जिज नहीं थी? यहीं पर उच्च न्यायालय ने क ! विदया विक अनुच्छेद 96 एक शून्य वि$dी पर लागू होने क े खिलए नहीं है। $जाय इसक े यह शून्यकरणीय वि$dी पर लागू हो ा है।
22. इसमें कोई संदेह नहीं हो सक ा है विक वक्फ संपखि} प्रति क ू ल कब्जे से स्वत्व क े अति ग्रहण की विवर्षय वस् ु हो सक ी है (देखें एआईआर 1940 पीसी 116)। हालांविक एक मु वल्ली प्रति क ू ल कब्जे से वक्फ संपखि} पर अति कार हासिसल नहीं कर सक ा है, इस पर कोई प्रश्न नहीं है। (देखें एआईआर 1956 एससी 713)।
23. उच्च न्यायालय ने पाया विक अनुच्छेद 96 लागू नहीं होगा क्योंविक यह एक शून्य वि$dी का मामला है और शून्यीकरण वि$dी का मामला नहीं है। क ! चिंच ामणिण साहू (एलआर द्वारा मृ ) और अन्य $नाम कविमश्नर ऑफ उड़ीसा हिंहदू उद्देOय क ार्मिमक $ंदो$स् ी, उड़ीसा और अन्य19 में उड़ीसा उच्च न्यायालय क े विनण!य में प्रस् ु क ! पर आ ारिर है। उक्त मामले में, उच्च न्यायालय की खंर्डपीठ विनम्नखिलखिख थ्यों पर विवचार कर रही थी: एक मठ क े महं ने क ु छ स्थायी पट्टों को विनष्पाविद विकया। यह उड़ीसा हिंहदू $ंदो$स् ी अति विनयम, 1939 की ारा 58 क े अनुसार आयुक्त की मंजूरी क े वि$ना था। इस रह क े पट्टे उपरोक्त प्राव ान क े विवपरी थे। महं को $ाद में $खा!स् कर विदया गया। काय!कारी आयुक्त द्वारा विनयुक्त मठ क े अति कारी ने उक्त अति विनयम की ारा 68 क े अन् ग! कब्जा वसूली हे ु काय!वाही प्रारम्भ की, सिजसे स्वीक ृ कर खिलया गया। उन्होंने अति विनयम की ारा 25 क े अन् ग! कब्जा वसूली हे ु काय!वाही भी प्रारम्भ की। आयुक्त ने ारा 25 क े ह काय!वाही की अनुमति दी और अपीलक ा! को $ेदखल करने क े खिलए कलेक्टर को एक मांग पत्र जारी करने का विनदoश विदया, सिजसक े $ाद यह दावा कर े हुए घोर्षणा क े खिलए एक वाद लाया विक उसने विन$ा! कब्जे से विकरायेदारी का अचूक अति कार हासिसल कर खिलया था और विनर्षे ाज्ञा की मांग की थी। हम विनम्नखिलखिख विनष्कर्ष! पर ध्यान दे सक े हैं: "8. प्रश्नग विववाद परिरसीमा और प्रति क े सं$ं में है। थ्य का विनष्कर्ष! यह है विक वादी पट्टे की सं$ंति ारीखों अथा! 26.7.1943, 8.1.1944 और 15.7.1944 से भूविम उसक े कब्जे में था। उड़ीसा हिंहदू ार्मिमक $ंदो$स् ी अति विनयम, 1951 की ारा 25 क े ह काय!वाही 30.10.69 को अनुमति दी गई थी और कलेक्टर को 19 AIR 1983 Orissa 205 उद्देOय क कब्जा देने क े खिलए विनदoश जारी विकया गया था। 12 वर्ष! की समाविप्त क े $ाद परिरसीमन द्वारा वादी को $ेदखल करने का अति कार वर्जिज होगा जो 1956 क है यविद प्रारंणिभक हिं$दु सं$ंति पट्टों की ारीखें होंगी। हालांविक, यविद यह अव ारिर विकया जा ा है विक वादी का प्रति क ू ल कब्जा महं की $खा!स् गी क े $ाद ही शुरू होगा, ो अति कार 1969 में वसूली समय पर होगी। प्रत्यथnगणों की ओर से यह क ! विदया गया है विक लागू करने क े खिलए सही अनुच्छेद नए परिरसीमा अति विनयम का अनुच्छेद 96 है। दूसरी ओर, अपीलाथn की ओर से यह क ! विदया गया है विक नए सीमा अति विनयम का अनुच्छेद 65 शासी अनुच्छेद है। अनुच्छेद 65 या अनुच्छेद 96 की प्रयोज्य ा इस $ा पर विनभ!र करेगी विक क्या स्थानां रण शुरू से ही शून्य था या क े वल शून्यकरणीय था। XXX XXX XXX
10. एक वै ाविनक प्राव ान क े उल्लंघन में विकया गया एक स्वत्व - अन् रण जो लोक विह में अति विनयविम है, शून्य है। स्वीकाय! रूप से स्थायी पट्टे ारा 58 (1) का उल्लंघन कर े हुए विदए गए थे, जो पूव! मंजूरी क े वि$ना पांच साल से अति क क े खिलए पट्टे देने पर रोक लगा ा है। इसखिलए, स्थायी पट्टों द्वारा अं रण शून्य है। इस दृविjकोण से इस न्यायालय क े पूव! क े फ ै सलों से हम $ने हुए हैं। ना$ा विकशोर पांर्डा $नाम $ुलेंद्र, (1974-40 कट एलटी 1152), सिजसे ऊपर संदर्भिभ विकया गया है, क े मामले में माननीय न्यायमूर्ति एस.क े. रे (जैसा वह $ थे) ने अव ारिर विकया विक ारा 58 (1) क े अविनवाय! प्राव ानों क े स्पj उल्लंघन में $नाया गया एक स्थायी पट्टा शून्य है। अजु!न जेना $नाम चै न्य ठाक ु र (1978) 45 कट एलटी 461 क े मामले में $ाद क े एकल पीठ क े फ ै सले में, माननीय न्यायमूर्ति $ी.क े. रे ने भी अव ारिर विकया विक पुराने अति विनयम की ारा 58 (1) क े प्राव ानों क े उल्लंघन में उद्देOय क सृसिज पट्टा शून्य है। इस प्रस् ाव क े खिलए, माननीय न्यायमूर्ति ने श्री तिचरंजीलाल पटवारी $नाम आयुक्त हिंहदू ार्मिमक $ंदो$स् ी, उड़ीसा, भुवनेश्वर (1974) 40 कट एलटी 41 मामले में इस न्यायालय क े खंर्डपीठ क े पूव! क े फ ै सले पर अवलम्$ खिलया। गुलाम अली साहा $नाम सुल् ान खान (1966) 32 कट एलटी 510: (एआईआर 1967 उड़ीसा 55) क े मामले में माननीय न्यायमूर्ति जी.क े. विमश्रा (जैसा वह $ थे) द्वारा विनणn इस न्यायालय क े एक अन्य एकल पीठ क े फ ै सले में न्यायालय की अनुमति क े वि$ना वक्फ संपखि} क े स्वत्व -अं रण की वै ा का प्रश्न विवचार क े खिलए आया और यह अव ारिर विकया विक स्वत्व-अं रण भले ही विवचार क े खिलए हो शुरू से ही शून्य था। मश्मिस्जद शहीद गंज $नाम एस.जी.पी. कमेटी, अमृ सर, एआईआर 1940 पीसी 116 में विप्रवी काउंसिसल द्वारा विन ा!रिर सिसद्धां ों पर अवलम्$ ले े हुए आगे अव ारिर विकया गया विक पुराने परिरसीमा अति विनयम का अनुच्छेद 144 प्रति क ू ल कब्जे द्वारा स्वत्व क े अति ग्रहण क े मामले में लागू हो ा है। विदनांक 3 अगस्, 1970 को विनस् ारिर विद्व ीय अपील संख्या 361/1966 (सां$री $ेवा $नाम उड़ीसा $ोर्ड! ऑफ वक्फ ् ) में इस े एक अप्रति वेद्य विनण!य में माननीय न्यायमूर्ति आर.एन. विमश्रा (जैसा वह $ थे) ने वक्फ अति विनयम की ारा 36-ए क े प्राव ानों क े उल्लंघन में मु वल्ली द्वारा विकए गए स्वत्व-अं रण की वै ा पर विवचार विकया गया और यह अव ारिर विकया विक वक्फ अति विनयम क े े उल्लंघन में दी गई एक स्थायी पट्टा प्रारंभ से ही शून्य है (देखें प्रस् र 8)। "
24. त्पश्चा, न्यायालय ने एक प्रश्न प्रस् ु विकया विक क्या यह अनुच्छेद 65 या अनुच्छेद 96 था, जो लागू हुआ। इस पर न्यायालय ने यह ारिर विकया:- उद्देOय क "12. यह अनुच्छेद मूल्यवान विवचार क े खिलए एक हस् ां रण को संदर्भिभ कर ा है। एक अं रण जो प्रारम्भ से ही शून्य है, कानून की न€र में कोई अं रण नहीं है और इसखिलए इस अनुच्छेद क े दायरे में नहीं आएगा। यह अनुच्छेद स्पj रूप से उन मामलों पर लागू हो ा है जहां स्थानां रण से $चा जा सक ा है या शून्य हो सक ा है। लेविकन अगर स्थानां रण प्रारम्भ से ही शून्य है ो नए परिरसीमा अति विनयम का अनुच्छेद 65 लागू होगा। अं रण की ति णिथ क े $ाद से हस् ां रिर ी का कब्जा अं रण की ति णिथ से प्रति क ू ल हो जा ा है, क्योंविक अं रिर ी क े पास था संपखि} क े सं$ं में कोई अति कार नहीं था और वह क े वल अति dमी था। XXX XXX XXX
14. श्रीविनवास रेति»यार $नाम एन. रामास्वामी रेति»यार एआईआर 1966 एससी 859 में न्यायमूर्ति क े समक्ष विनण!य क े खिलए प्रश्न था विक "क्या अनुच्छेद 134-$ी विपछले प्र$ं क द्वारा विकए गए अं रणों क े $ीच विकसी भी अं र की इस आ ार पर अनुमति दे ा है विक अं रिर संपखि} ार्मिमक $ंदो$स् ी से सं$ंति है और उनक े द्वारा $नाई गई संपखि} इस आ ार पर है विक उक्त संपखि} उनकी अपनी विनजी संपखि} है?" माननीय न्यायमूर्ति ने अव ारिर विकया विक अनुच्छेद 134-$ी इस रह क े विकसी भी भेद की अनुमति नहीं दे ा है। यह अव ारिर विकया गया था विक विपछले प्र$ं क द्वारा संपखि} क े साथ अपने सं$ं क े सं$ं में विकए गए अभ्यावेदन की प्रक ृ ति, जो विक हस् ां रण की विवर्षय-वस् ु है, अनुच्छेद 134- $ी क े उद्देOय क े खिलए अप्रासंविगक है।यह प्रश्न विक क्या यह अनुच्छेद शून्य या शून्यकरणीय लेनदेन पर लागू हो ा है, उस मामले में विवचार करने क े खिलए उत्पन्न नहीं हुआ।" (प्रभाव वर्ति ) उद्देOय क
25. चूंविक एआईआर 1966 एससी 859 का संदभ! विदया गया था और इसे प्रति विष्ठ विकया गया था, इसखिलए हम उक्त विनण!य को संदर्भिभ कर सक े हैं। इस े समक्ष जो क ! विदया गया था, वह यह था विक ज$ एक प्र$ं क द्वारा एक प्र$ं क क े रूप में नहीं $श्मिल्क एक व्यविक्त क े रूप में स्थानां रण विकया जा ा है, ो इस रह का स्थानां रण प्रारम्भ से ही शून्य हो ा है, हस् ां रण की ति णिथ से स्थानां रिर ी का कब्जा प्रति क ू ल था और इसखिलए, ऐसी श्मिस्थति में, परिरसीमा अति विनयम, 1908 का अनुच्छेद 134-B, व !मान परिरसीमा अति विनयम क े अनुच्छेद 96 का पूव!व n अनुच्छेद, उस अं र क े साथ जो हमने ीसरे स् ंभ में नोट विकया है, लागू नहीं होगा। वास् व में इस न्यायालय ने विप्रवी काउंसिसल क े दो विनण!यों 1900 27 भार ीय अपील 69 (ई.सी.) और 37 भार ीय अपील 147 ईसी पर ध्यान विदया और उक्त क ! का समथ!न विकया। पूव! क े मामलों (27 भार ीय अपील 69 ई.सी. क े सं$ं में यह पाया गया है विक विप्रवी काउंसिसल ने अव ारिर विकया है विक जहां एक ार्मिमक $ंदो$स् ी क े वंशानुग न्यासिसयों ने प्र$ं न क े अपने वंशानुग अति कार को $ेच विदया और दान की गई संपखि} को स्थानां रिर कर विदया और यविद दूसरे को प्रदान करने वाला कोई रिरवाज नहीं था ो वि$dी शून्य थी। आगे यह नोट विकया गया विक विप्रवी काउंसिसल सीमा अति विनयम, 1908 क े अनुच्छेद 124 क े मामले पर विवचार कर रही थी। आगे यह पाया गया विक जो $ेचा गया वह वंशानुग काया!लय और संपखि} भी थी, हालाँविक, मंविदर की अचल संपखि}यों को भी $ेच विदया गया था। आगे क ! यह था विक यह पुराने अति विनयम का अनुच्छेद 144 था जो 12 साल क े प्रति क े $ाद मुकदमे पर रोक लगाने क े खिलए संचाखिल था। न्यायालय ने कलक}ा उच्च न्यायालय में राय क े क ु छ णिभन्न ा पर ध्यान विदया। यह आगे संदेह में चला गया विक क्या पहला विनण!य, 27 भार ीय अपील 69 (ईसी) इस विनष्कर्ष! का उद्देOय क ने ृत्व कर सक ा है विक यविद संपखि} का एक विहस्सा इस आ ार पर एक ार्मिमक $ंदो$स् ी क े प्र$ं क द्वारा स्थानां रिर विकया गया था विक यह उसका था ो उ}राति कारी प्र$ं क का अति कार खो सक ा है। इसक े $ाद, न्यायालय ने पाया विक इस मामले को परिरसीमा अति विनयम, 1908 क े अनुच्छेद 134 $ी क े संदभ! में देखा जाना चाविहए। इस न्यायालय ने पाया विक इससे अनुच्छेद 134 $ी क े आवेदन पर कोई फक ! नहीं पड़ ा है, यविद हस् ां रण इस आ ार पर विकया जा ा है विक संपखि} $ंदो$स् ी की नहीं $श्मिल्क प्र$ं क की है। उ}राति कारी प्र$ं क को सावि$ करने क े खिलए जो क ु छ भी आवOयक था, वह विनम्नखिलखिख थ्यों में पाया गया: "(1) यह विक संपखि} ार्मिमक $ंदो$स् ी की है; (2) यह विक यह विपछले प्र$ं क द्वारा स्थानां रिर विकया गया था; और (3) यह विक स्थानां रण एक मूल्यवान विवचार क े खिलए था। संपखि} क े साथ उसक े सं$ं से सं$ंति विपछले प्र$ं क द्वारा विकए गए प्रति विनति त्व का स्वरूप, जो विक अं रण की विवर्षय वस् ु है, अनुच्छेद 134-$ी क े उद्देOय क े खिलए अप्रासंविगक है।"
26. चिंच ामणिण साहू (मृ, द्वारा विवति क प्रति विनति ) (उपरोक्त) में उड़ीसा उच्च न्यायालय ने इस आ ार पर उपरोक्त विनण!य को अलग विकया विक यह न्यायालय इस प्रश्न पर विवचार नहीं कर रही थी विक क्या अनुच्छेद 134 $ी शून्य या शून्यकरणीय लेनदेन पर लागू हो ा है क्योंविक यह उत्पन्न नहीं हुआ था।
27. अपीलक ा!ओं ने अन्य उच्च न्यायालयों क े क ु छ विनण!यों पर अवलम्$ ले े हुए क ! विदया है विक वे एक अलग सिसद्धां विन ा!रिर कर े हैं। तिचन्ना जीयंगर मठ, ति रुपथ $नाम सी.वी. पुरुर्षो}म और अन्य20 में विवद्वान एकल न्याया ीश ने अनुच्छेद 134 ए, अनुच्छेद 134 $ी, 134 सी और भार क े विवति
उद्देOय क आयोग की ीसरी रिरपोट! क े संदभ! में भी अनुच्छेद क े इति हास का प ा लगाया। उक्त भाग इस प्रकार है: "12. विवति आयोग ने परिरसीमा अति विनयम, 1908 से सं$ंति अपनी ीसरी रिरपोट! में पैराग्राफ 123 में विनम्नानुसार अवलोकन विकया: "अनुच्छेद 134-$ी द्वारा कवर विकए गए मुकदमों क े खिलए परिरसीमा का प्रारंणिभक हिं$दु स्थानां रणक ा! की मृत्यु, त्यागपत्र या विनष्कासन की ति णिथ है। इसने क ु छ मामलों में क ु छ कविठनाइयों को जन्म विदया है। इस प्रकार, एक $ंदो$स् ी आयुक्त दशकों क े $ाद विपछले प्र$ं कों में से एक द्वारा स्वत्व-अं रण को चुनौ ी देना आवOयक पा सक ा है; या, एक प्र$ं क की मृत्यु, इस् ीफ े या हटाने और उसक े उ}राति कारी की विनयुविक्त क े $ीच 12 वर्ष! से अति क का अं र हो सक ा है। ऐसे मामलों में, प्र$ं क क े रूप में वादी की विनयुविक्त की ति णिथ को परिरसीमा क े खिलए प्रारंणिभक हिं$दु $नाना अति क साम्यपूण! होगा। लेविकन ऐसे मामले और परिरश्मिस्थति यां हो सक ी हैं जहां मौजूदा प्राव ान संस्था क े खिलए अति क अनुक ू ल हो सक े हैं। दोनों आकश्मिस्मक ाओं क े खिलए प्रदान करने क े खिलए, $ाद की दो ति णिथयों को सीमा क े शुरुआ ी हिं$दु क े रूप में खिलया जाना चाविहए।"
28. न्यायालय ने क® और कारणों क े कथन पर भी अवलम्$ खिलया। यह श्रीविनवास (उपरोक्त) को भी संदर्भिभ कर ा है। इसक े अलावा, न्यायालय ने संशो न से पहले कानून की श्मिस्थति को इस प्रकार विन ा!रिर विकया: "23. उपरोक्त चचा! से कानून की विनम्नखिलखिख श्मिस्थति उभर ी है। एक मठ का महं अपने जीवनकाल से परे सुविनतिश्च करने क े खिलए मठ संपखि} क े सं$ं में कोई विदलचस्पी पैदा करने में अक्षम है। उद्देOय क वह क े वल कानूनी आवOयक ा या संपखि} लाभ क े खिलए संपखि} को स्थायी रूप से स्वत्व-अं रण कर सक ा है। उसक े द्वारा विकए गए स्वत्व-अं रण क े मामले में, जो कानूनी आवOयक ा या लाभ क े खिलए नहीं था, उक्त स्वत्व-अं रण उसक े उ}राति कारी क े उदाहरण पर शून्य हो जा ा है। अलगाव पर सवाल उठाने का अति कार उ}राति कारी की मृत्यु पर ही उ}राति कारी को विमल ा है। प्रति क ू ल परिरत्यागक ा! का कब्जा भी क े वल उसकी मृत्यु की ारीख से ही चलना शुरू हो ा है और $ क नहीं। मंविदर की भूविम का स्थायी पट्टा भी इस प्रकार का अन्य संdामण है। यविद यह कानूनी आवOयक ा या लाभ क े खिलए नहीं है ो यह मठ क े खिलए $ाध्यकारी नहीं है। वाद हे ुक जो एक $ार उपार्जिज हो जा ा है, जारी रह ा है। मया!दा क े कानून द्वारा विन ा!रिर अवति क े अं में उस संपखि} क े सं$ं में मठ का अति कार समाप्त हो जाएगा। उसका पक्ष। उ}राति कारी की विनयुविक्त को कभी भी सीमा की एक नई शुरुआ देने क े खिलए नहीं माना गया था, कानून क े ह जैसा विक यह 1963 से पहले था। यह कानूनी आवOयक ा क े खिलए विकया गया अलगाव था या नहीं, यह प्रत्येक मामले क े थ्यों और परिरश्मिस्थति यों क े आ ार पर एक प्रश्न था।”
29. त्पश्चा, विवद्वान न्याया ीश ने अनुच्छेद 134 $ी क े वास् विवक अथ! को प्रकट करना जारी रखा: "24. ज$ वर्ष! 1963 में परिरसीमा अति विनयम में संशो न विकया गया था $ कानून की श्मिस्थति ऐसी थी। विव ातियका को मौजूदा कानून और अदाल ों द्वारा उस समय लागू कानून की व्याख्या क े $ारे में प ा होना उद्देOय क चाविहए। यविद एक शून्यकरणीय संdामण पर सवाल उठाने का अति कार है एक हिंहदू या मुश्मिस्लम ार्मिमक या मा!थ! $ंदो$स् ी क े सं$ं में एक मठ या ार्मिमक संस्था को मना कर विदया जा ा है, ऐसी संस्था एक $ार सभी क े खिलए संपखि} खो दे ी है। चूंविक राज्य ऐसी संस्थाओं की संपखि}यों की सुरक्षा और रखरखाव में रुतिच रख ा था, इसने वर्ष! 1963 में उस उद्देOय की प्राविप्त क े खिलए एक संशो न विकया। विवति आयोग, सिजसे उस प्रश्न पर विवचार करने क े खिलए विनयुक्त विकया गया था, ने सुझाव विदया विक हिंहदू, मुश्मिस्लम और $ौद्ध ार्मिमक या मा!थ! $ंदो$स् क े मामले में, ऐसे संdामण को दूर करने क े खिलए उ}राति कारी महं द्वारा लाए गए काय® क े खिलए एक नई शुरुआ की जानी चाविहए, जो कानूनी आवOयक ा या संस्था क े लाभ क े खिलए नहीं $नाए गए थे।विव ानमंर्डल ने भी उस विवचार को स्वीकार विकया और अनुच्छेद 96 क े कॉलम 3 में लगाया, सिजसमें पहले क े वल विनम्नखिलखिख शब्द थे: "मृत्यु, इस् ीफा या अं रणक ा! को हटाने क े खिलए "विनम्नखिलखिख शब्द: "अं रणक ा! की मृत्यु, इस् ीफा या विनष्कासन" विनम्नखिलखिख शब्द: "या $ंदो$स् ी क े रूप में वादी की विनयुविक्त की ति णिथ, जो भी $ाद में हो"। विव ातियका इस थ्य से भी अवग थी विक वर्ष! 1963 से पहले क े विनण!यों द्वारा विन ा!रिर कानून क े अनुसार, एक $ंदो$स् ी द्वारा प्र$ं क क े रूप में वादी की विनयुविक्त की ति णिथ ने उसे उस उद्देOय क े खिलए परिरसीमा की नई शुरुआ नहीं दी। यह क े वल इस रह क े कानून की व्याख्या में महसूस की गई स्पj कविठनाइयों का समा ान करने क े खिलए विकया गया था, सिजसक े $ारे में यह संशो न लाया गया है। इस संशो न क े आ ार पर, अगर वादी को मुकदमा दायर करने की ारीख से 12 साल क े भी र विनयुक्त विकया गया था, ो वह विकसी भी संdामण पर सवाल उठा सक ा है, जो कानूनी आवOयक ा क े खिलए नहीं $नाया गया था या विपछले प्र$ं क द्वारा म्यूट को लाभ नहीं विदया गया था। थ्य यह है विक मृत्यु की ारीख से 12 उद्देOय क साल $ी चुक े हैं, इस् ीफा देने या स्थानां रण प्र$ं क को हटाने से संपखि} की वसूली से इस रह क े मुकदमे में अणिभयोगी क े रास् े में खड़ा नहीं होगा। यह संशो न क े अंति म ीन शब्दों से स्पj है, जो भी $ाद में हो', जान$ूझकर विव ानमंर्डल द्वारा पेश विकया गया। विकसी $ंदो$स् ी की चल या अचल संपखि} क े कब्जे को पुनप्रा!प्त करने क े खिलए, अदाल ों को हिंहदू, मुश्मिस्लम या $ौद्ध ार्मिमक या मा!थ! $ंदो$स् ी जो विपछले प्र$ं क द्वारा मूल्यवान विवचार क े खिलए संdामण का विवर्षय था, क े विकसी भी प्र$ं क द्वारा की गई विकसी भी कार!वाई क े खिलए क़ानून क े सादे शब्दों को लागू करना होगा। यह भी स्पj है विक हस् ां रण प्र$ं क को वादी का त्काल पूव!व n होना जरूरी नहीं है, जो इस रह का मुकदमा दायर कर ा है। अनुच्छेद 96 को पढ़ने से ऐसा विनष्कर्ष! नहीं विनकाला जा सक ा है। यह पया!प्त है यविद अलगाव विपछले प्र$ं क द्वारा विकया गया हो। पहला स् ंभ यह नहीं कह ा है विक यह विपछले प्र$ं क द्वारा विकया जाना चाविहए।"
30. राज्य वक्फ $ोर्ड!, मद्रास में, जी.ओ. एमएस. संख्या 2031, विदनांक 20 नवं$र, 1961 और जी. ओ. एमएस. द्वारा विनयुक्त संख्या 2264, विदनांक 30 विदसं$र, 1967, विद स्पेशल ऑविफसर फार वक्फ्स मद्रास $नाम सुब्रमण्यम और अन्य21 में विमलनार्डु सरकार द्वारा अति dविम, विवद्वान न्याया ीश अन्य $ा ों क े साथ-साथ, विनम्नखिलखिख थ्यों पर विवचार कर रहे थे: मुक़दमे कणिथ ौर पर वक़्फ़ से सं$ंति संपखि}यों की वसूली क े खिलए दायर विकए गए थे, सिजन्हें परिरसीमा क े आ ार पर खारिरज कर विदया गया था। न्यायालय ने अनुच्छेद 96 क े ीसरे कॉलम क े $ाद क े विहस्से को आकर्मिर्ष विकया और पाया विक मुकदमा समय क े भी र था। उक्त मामले में, वास् व में, वक्फ $ोर्ड! 21 AIR 1977 Madras 79 उद्देOय क वादी था। एकल न्याया ीश ने पाया विक वक्फ $ोर्ड! का गठन क े वल वर्ष! 1953 में विकया गया था। वाद क े वल वर्ष! 1967 में संश्मिस्थ विकए गए थे। $ोर्ड! क े भी र प्र$ं क की भूविमका सौंपने में अनुच्छेद 96 क े ीसरे स् ंभ में 'प्र$ं क विनयुक्त' का अथ! भी, न्यायालय ने तिचन्ना जीयंगर मठ (उपरोक्त) में विवद्वान एकल न्याया ीश क े विनण!य से समथ!न प्राप्त विकया। हम विनम्नखिलखिख क® पर ध्यान दे सक े हैं: "6. विवद्वान अति वक्ता का क ! यह है विक क े वल ज$ वक्फ $ोर्ड! वक्फ क े प्रत्यक्ष प्र$ं न को ग्रहण कर ा है, ो इसे एक प्र$ं क कहा जा सक ा है जैसा विक नए अति विनयम क े अनुच्छेद 96 में ीसरे स् ंभ द्वारा विवचार विकया गया है और वह इ ना लं$ा है चूंविक प्रत्यक्ष प्र$ं न की कोई ारणा नहीं है, इसखिलए वक्फ $ोर्ड! को प्र$ं क नहीं कहा जा सक ा है। मैं एक दृविjकोण से इस क ! को स्वीकार करने में असमथ! हूं। न ो वक्फ अति विनयम की ारा 42 और न ही ारा 43-ए सिजस पर विनभ!र ा रखी गई है, शब्द "प्र$ं क" का उपयोग कर ा है। शब्द, "प्र$ं क" एक ार्मिमक या मा!थ! $ंदो$स् ी क े सं$ं में कला का शब्द नहीं है। उक्त शब्द उस व्यविक्त को दशा! ा है जो प्रशासन क े प्रभारी हैं $ंदो$स् ी या संपखि} का प्र$ं न या दान क े प्रदश!न की विनगरानी कर ा है और यह शब्द $हु व्यापक और सामान्य अथ® में से एक है। थ्य क े अनुसार, न्यायमूर्ति नटराजन क े फ ै सले ने ारा 15 (2) में विनविह प्राव ानों को संदर्भिभ विकया है। वक्फ अति विनयम की ारा 15 (1) में प्राव ान है विक विकसी भी विनयम क े अ ीन जो उक्त अति विनयम क े ह $नाया जा सक ा है, राज्य में सभी वक्फ का सामान्य अ ीक्षण राज्य क े खिलए स्थाविप $ोर्ड! में विनविह होगा; और यह $ोर्ड! का क !व्य होगा विक वह अति विनयम क े ह अपनी शविक्तयों का प्रयोग करे ाविक यह सुविनतिश्च विकया जा सक े विक उसक े अ ीक्षण क े ह वक्फ ठीक से $नाए, विनयंवित्र और प्रशासिस हैं और उसकी आय को उन उद्देOयों क े खिलए विवति व लागू उद्देOय क विकया जा ा है सिजनक े खिलए ऐसे वक्फ $नाए गए थे या अणिभप्रे थे। उप- ारा (2) या ारा 15, उदाहरण क े माध्यम से उप- ारा (1) द्वारा प्रद} शविक्तयों की व्यापक ा पर प्रति क ू ल प्रभाव र्डाले वि$ना, क ु छ विनर्मिदj शविक्तयों की भी गणना कर ी है। इस रह की एक विनर्मिदj शविक्त ारा 15 (2) (एच) में विनविह है, जो वक्फ $ोर्ड! को विकसी भी वक्फ की खोई हुई संपखि}यों की वसूली क े खिलए उपाय करने में सक्षम $ना ी है। उप- ारा 15 (2) (i) भी वक्फ $ोर्ड! को वक्फ से सं$ंति कानून की अदाल में मुकदमे और काय!वाही की स्थापना और $चाव करने में सक्षम $ना ी है। वक्फ अति विनयम की ारा 15 (1) और 15 (2) का संयुक्त प्रभाव विनतिश्च रूप से वक्फ संपखि} क े कब्जे की वसूली क े उद्देOय से वक्फ $ोर्ड! को प्र$ं क क े रूप में नाविम करने क े खिलए पया!प्त होगा। और फलस्वरूप इसे विनतिश्च रूप से नए परिरसीमा अति विनयम क े अनुच्छेद 96 क े ीसरे स् ंभ द्वारा विवचारिर "प्र$ं क" कहा जा सक ा है और यविद ऐसा माना जा ा है, ो क़ानून क े ह वक्फ $ोर्ड! क े गठन को विनतिश्च रूप से वक्फ $ोर्ड! की वक्फ क े रूप में विनयुविक्त क े रूप में माना जा सक ा है, क्योंविक शब्द भी, "विनयुविक्त" शब्द की रह, "प्र$ं क" कला का शब्द नहीं है और इसखिलए इसका सामान्य, प्राक ृ ति क और सामान्य अथ! प्राप्त करना है।”
31. इससे पहले विक हम अं में इस प्रश्न पर विनण!य लें विक क्या अनुच्छेद 96 शून्य लेनदेन क े सं$ं में लागू होगा, हम क ु छ अन्य पहलुओं पर विवचार करना उतिच समझ े हैं। प्रश्नग वक्फ विदनांक 26.07.1934 को अक$र अली खान द्वारा $नाया गया है। यह अपीलक ा! का मामला है विक इसे नं$र 1476 पर वक्फ अल औलाद क े रूप में पंजीक ृ विकया गया था। दूसरे वि$dी विवलेख क े हस् ां रणक ा!, कासिसम विदनांक 16.02.1958 को उनक े विप ा अक$र अली खान की मृत्यु हो जाने पर अली खान ने मु वल्ली क े रूप में पदभार संभाला। यह विववाद में नहीं है उद्देOय क विक कासिसम अली खान ने वर्ष! 1950 क े ओएस 1 की स्थापना की सिजसमें उन्होंने अपने विप ा अक$र अली खान और वक्फ संपखि} क े एक विहस्से क े अं रिर ी को पक्षकार $नाया, जो उनक े विप ा द्वारा प्रभाविव विकया गया था। वादी क े पक्ष में विवचारण न्यायालय की तिर्डdी को उच्च न्यायालय द्वारा विदनांक 11.07.1962 क े विनण!य द्वारा पुविj की गई। फ ै सले ने विवचारण न्यायालय क े इस दृविjकोण की पुविj की विक एक वै वक्फ था। उच्च न्यायालय द्वारा यह स्पj रूप से पाया गया है विक मुश्मिस्लम कानून क े ह एक णिशया द्वारा वक्फ क े विनमा!ण क े सं$ं में सभी कानूनी आवOयक ाओं को पूरा विकया गया था। यह माना गया विक अक$र अली खान ने 26.07.1934 को एक वक्फ-अलल-औलाद $नाया जो कानून में प्रभावी था। इसखिलए वक़ीफ़, जो पहले मु वल्ली भी थे, और उनक े $ेटे कासिसम अली खान क े $ीच, उच्च न्यायालय क े फ ै सले में विनष्कर्ष! स्पj रूप से मान े हैं विक एक वै वक्फ था। उनक े $ेटे अक$र अली खान की मृत्यु क े $ाद कासिसम अली खान ने मु वल्ली क े रूप में पदभार संभाला। उन्होंने 1959 क े ओएस 421 की स्थापना की। इसमें उनक े भाई प्रति वादी थे, जैसे कासिसम अली खान और र€ा अली खान। सिजसने उक्त वाद का अवसर विदया। यह वाद क े लंवि$ होने क े दौरान अथा!, 14.10.1960 को है, प्रति वाविदयों में से एक कासिजम अली खान ने हमारे सामने एक अपील में अपने कणिथ, एक ति हाई अति कार को पहले प्रति वादी क स्थानां रिर कर विदया। मुकदमा तिर्डdी विकया गया। उच्च न्यायालय ने प्रति वाविदयों द्वारा दायर अपील में, आदेश विदनांक 25.09.1963 द्वारा मामले को वापस प्रति प्रेविर्ष कर विदया। हालाँविक, ज$ ऐसा था, यूपी चक$ंदी अति विनयम, 1953 क े ह चक$ंदी की काय!वाही शुरू हो गई थी। उक्त अति विनयम क े प्राव ानों क े ह, चक$ंदी शुरू होने पर मुकदमे में काय!वाही समाप्त हो जाएगी। इसक े $ाद चक$न्दी अति कारी, सिजसका विनण!य $न्दो$स् अति कारी क े समक्ष अपीलीय हो ा है और $ाद वाले प्राति करण क े विनण!य को उपविनदेशक द्वारा पुनरीक्षण में संशोति उद्देOय क विकया जा सक ा है, सिजसका आति पत्य हो ा है। दनुसार मुकदमे में वादी कासिसम अली खान अपने भाइयों क े नाम दज! विकए जाने क े खिखलाफ अपनी आपखि}यां रखीं। कासिसम अली खान की आपखि}यों को योग्य ा क े साथ पाया गया। परिरणामस्वरूप, भाइयों क े नामों को विनदoणिश विकया गया हटा विदया जाए और उनक े स्थान पर वक्फ का नाम दज! करने का विनदoश विदया जाए। आदेश योग्य ा क े आ ार पर पारिर विकया गया था। अन्य $ा ों क े साथ यह इस प्रकार है: "3. यह विक मैं पा ा हूं विक वक्फ पक्षकारों क े $ीच स्वीक ृ है। विववाविद भूविम सर थी। वक्फ क े विनष्पादन क े $ाद, सर को पूव!-स्वाविमत्व काO कारी में परिरवर्ति विकया जाना चाविहए था। यह अनुमान लगाया जा सक ा था विक पूव!-स्वाविमत्व विकरायेदारी क े अति कार जो अं ः विनविह होने की ति णिथ क े ठीक $ाद सरदारी में परिरवर्ति हो गए, वे वक्फ से सं$ंति नहीं थे और विफर आवेदकों क े अपने विप ा क े उ}राति कारिरयों क े $ने रहने का औतिचत्य था। लेविकन वह श्मिस्थति, ज$ वक्फ में $नाये गए पक्षकारों क े विप ा, विववाविद भूविम जो सर थी, को स्वाविमत्व वाली विकरायेदारी में परिरवर्ति नहीं विकया गया था और विनविह होने की ति णिथ क े $ाद भूविम री दज! की गई थी। इसखिलए, यह विनष्कर्ष! विनकाला जाना चाविहए विक भूविम में पूण! अति कार ईश्वर को हस् ां रिर कर विदए गए थे और इसखिलए, उतिच रीका यह था विक विवपक्षी पक्षकार को मु वल्ली क े रूप में दज! विकया जाए और आवेदकों क े नामों को हटा विदया जाए। विनयविम अदाल ों में मुकदमे$ाजी में, दीवानी न्यायालय ने भी यही विवचार रखा था लेविकन इन अदाल ों में मामला अंति म नहीं हो सका। इन परिरश्मिस्थति यों में, मैं इस विनष्कर्ष! पर पहुंचा हूं विक विनचली अदाल ों क े आदेश सही हैं और इसमें कोई हस् क्षेप नहीं विकया जाना चाविहए।” उद्देOय क
32. प्रति वादी, अथा!, कासिसम अली खान और र€ा अली खान ने एक $हाली आवेदन दायर विकया, जो आदेश विदनांक 02.03.1972 द्वारा खारिरज कर विदया गया था। विफर भी एक और $हाली आवेदन दायर विकया गया था। यह उसी में है विक 13.02.1974 को कासिसम अली खान, कासिसम अली खान और रजा अली खान ीनों भाइयों क े $ीच समझौ ा हुआ। उन्होंने वक्फ को भंग करने का दावा विकया। उन्होंने घोर्षणा की विक यह प्रभावी नहीं हुआ है। यह इस समझौ े पर आ ारिर था विक दूसरा $हाली आवेदन को अनुमति दी गई थी। पुनरीक्षण को खारिरज करने और $हाली को खारिरज करने वाले पहले क े आदेशों को उप विनदेशक द्वारा अपास् कर विदया गया था। विदनांक 13.02.1974 क े समझौ े ने उसी क े खिलए आ ार $नाया। यह उक्त समझौ े पर काय! कर रहा है और उस पर पारिर आदेश कासिसम अली खान ने विदनांक 12.09.1974 क े वि$dी विवलेख द्वारा अपने भ ीजे को अपना एक ति हाई विहस्सा देने का दावा विकया।
33. 1960 का अति विनयम लागू था। अति विनयम की ारा 69 विनम्नानुसार है: "69. मु वसिल्लयों द्वारा या उनक े विवरुद्ध वादों में समझौ ा करने पर रोक।- वक्फ संपखि} क े हक या मु वसिल्लयों क े अति कारों से सं$ंति विकसी वक्फ क े मु वल्ली द्वारा या उसक े विवरुद्ध विकसी न्यायालय में लंवि$ कोई वाद या काय!वाही $ोर्ड! की स्वीक ृ ति क े वि$ना समझौ ा नहीं की जाएगी। "
34. साथ ही उक्त अति विनयम की ारा 49 ए और 49 $ी क े प्राव ान विनम्नानुसार है: "49 ए. वक्फ की अचल संपखि} का हस् ां रण विवलेख या खिलख में विनविह विकसी भी $ा क े $ावजूद, यविद कोई हो, सिजसक े द्वारा वक्फ $नाया गया है, उद्देOय क (i) वि$dी, उपहार, $ं क या विवविनमय क े माध्यम से कोई हस् ां रण नहीं; या (ii) पट्टे क े खिलए क ृ विर्ष भूविम क े मामले में ीन वर्ष! से अति क की अवति क े खिलए, या गैर क ृ विर्ष क े मामले में एक वर्ष! से अति क की अवति क े खिलए और या वक्फ की विकसी अचल संपखि} क े विनमा!ण क े खिलए $ोर्ड! की पूव! मंजूरी क े वि$ना मान्य होगा।" 49-$ी. ारा 49-ए क े उल्लंघन में स्थानां रिर वक्फ संपखि} की वसूली- (1) यविद $ोर्ड! इस रह से जांच करने क े $ाद सं ुj है विक ारा 30 क े ह $नाए गए वक्फ क े रसिजस्टर में एक वक्फ की संपखि} क े रूप में दज! की गई अचल संपखि} को $ोर्ड! की पूव! मंजूरी क े वि$ना ारा 49-ए क े प्राव ानों का उल्लंघन कर े हुए स्थानां रिर कर विदया गया है, वह उस कलेक्टर को, सिजसक े अति कार क्षेत्र में संपखि} श्मिस्थ है, संपखि} का कब्जा प्राप्त करने और उसे देने क े खिलए एक अनुरो भेज सक ा है। (2) उप- ारा (1) क े ह एक मांग प्राप्त होने पर, कलेक्टर आदेश की ामील की ारीख से ीस विदनों की अवति क े भी र $ोर्ड! को संपखि} देने क े खिलए संपखि} क े कब्जे वाले व्यविक्त को विनदoश दे े हुए एक आदेश पारिर करेगा। (3) उप- ारा (2) क े ह पारिर प्रत्येक आदेश की ामील की जाएगी- (ए) इसे विनविवदा देकर या र्डाक द्वारा उस व्यविक्त को भेजकर सिजसक े खिलए यह अणिभप्रे है; या उद्देOय क ($ी) यविद ऐसा व्यविक्त नहीं पाया जा सक ा है, ो उसे उसक े अंति म ज्ञा विनकाय या व्यवसाय क े विकसी विवणिशj भाग पर तिचपका कर, या विकसी वयस्क पुरुर्ष सदस्य या उसक े परिरवार क े नौकर को देकर या उसे देकर या उसे विकसी विवणिशj स्थान पर तिचपका कर संपखि} का वह विहस्सा सिजससे यह सं$ंति है: $श o विक सिजस व्यविक्त पर आदेश ामील विकया जाना है वह अवयस्क है, उसक े अणिभभावक या उसक े विकसी वयस्क सदस्य या सेवक पर की गई सेवा अवयस्क की सेवा समझी जाएगी। (4) उप- ारा (2) क े ह कलेक्टर क े आदेश से व्यणिथ कोई व्यविक्त, आदेश की ामील की ारीख से ीस विदनों की अवति क े भी र, सिजला न्याया ीश क े न्यायालय में अपील कर सक ा है, सिजसक े अति कार क्षेत्र में संपखि} श्मिस्थ है। (5) सिजला न्याया ीश या ो स्वयं अपील का विनस् ारण कर सक ा है या इसे अपने प्रशासविनक विनयंत्रण क े ह विकसी भी अपर सिजला न्याया ीश या सिसविवल न्याया ीश क े न्यायालय में स्थानां रिर कर सक ा है और ऐसी विकसी अपील को वापस भी ले सक ा है और या ो उसका विनस् ारण कर सक ा है या विकसी को स्थानां रिर कर सक ा है, जो अपर सिजला न्याया ीश या सिसविवल न्याया ीश क े अन्य न्यायालय उनक े प्रशासविनक विनयंत्रण में हो और हर मामले में अदाल का विनण!य अंति म होगा। (6) जहां उप- ारा (2) क े ह पारिर आदेश का अनुपालन न विकया गया हो और ऐसे आदेश क े खिखलाफ अपील करने का समय वि$ना विकसी अपील क े समाप्त हो गया है या उस समय क े भी र की गई अपील, यविद कोई हो, को खारिरज कर विदया जा ा है, उद्देOय क कलेक्टर उस संपखि} का कब्जा प्राप्त करेगा सिजसक े सं$ं में आदेश विदया गया है, इस उद्देOय क े खिलए आवOयक $ल का उपयोग करक े, और विफर इसे $ोर्ड! को सौंपेगा। (7) इस ारा क े ह अपने काय® का प्रयोग करने में कलेक्टर ऐसे विनयमों द्वारा विनदoणिश होंगे जो राज्य सरकार द्वारा इस सं$ं में $नाए जा सक े हैं।”
35. ारा 49 ए और 49 $ी को 1960 क े अति विनयम में 1971 क े यूपी अति विनयम 28 क े माध्यम से र्डाला गया था। इसखिलए, कासिसम अली खान द्वारा अपने भ ीजे क े पक्ष में विदनांक 26.09.1974 को वि$dी विवलेख, $ोर्ड! की पूव! मंजूरी क े वि$ना वि$dी क े खिखलाफ विनर्षे क े रूप में, अवै था। यह वह $ा है जो इस सवाल को जन्म दे ी है विक क्या वि$dी शून्य है क्योंविक यह एक वै ाविनक जनादेश क े उल्लंघन में थी। यविद यह ऐसे विकसी कारण से शून्य है, ो क्या यह अं रिर ी द्वारा प्रति क ू ल कब्जे की अवति की शुरुआ और संचालन क े खिलए माग! प्रशस् करेगा। क्या यह परिरसीमा अति विनयम क े अनुच्छेद 65 को लागू करने क े खिलए दरवाजे नहीं खोल खोलेगा? यविद ऐसा है, ो अति विनयम क े 01.01.1996 को लागू होने क े $ाद, अति विनयम की ारा 52 क े ह शविक्त का आह्वान करने क े खिलए, वर्ष! 1997 में दायर की गई णिशकाय की अनुमति नहीं होगी?
36. अति विनयम की ारा 52, जो वक्फ $ोर्ड! क े विनयंत्रक और कलेक्टर द्वारा कार!वाई का स्रो है, ारा 51 की अगली कड़ी है। अन्य $ा ों क े साथ-साथ, ारा 51 (1), 2013 क े अति विनयम 27 द्वारा इसक े प्रति स्थापन से पहले, इस प्रकार है: "51(1). वक्फ विवलेख में विनविह विकसी भी $ा क े $ावजूद, विकसी भी अचल संपखि} का कोई भी उपहार, वि$dी, विवविनमय या $ं क, जो विक उद्देOय क वक्फ संपखि} है, शून्य होगा, ज$ क विक इस रह क े उपहार, वि$dी, विवविनमय या $ं क $ोर्ड! की पूव! मंजूरी से प्रभावी नहीं हो ा है: $श o विक विकसी भी मश्मिस्जद, दरगाह या खानगाह को त्समय प्रवृ} विकसी कानून क े अनुसार उपहार में, $ेचा, $दला या विगरवी नहीं रखा जाएगा।"
37. हम क े वल यह नोविटस कर सक े हैं विक 2013 क े अति विनयम 27 द्वारा प्रति स्थाविप ारा 51 (1) (ए), प्राव ानों क े अ ीन वि$dी, उपहार, विवविनमय या $ं क या वक्फ संपखि} क े हस् ां रण को शून्य घोविर्ष कर ी है। अति विनयम की ारा 52 में प्राव ान है विक जैसा विक विन ा!रिर विकया जा सक ा है, यविद $ोर्ड! कोई जांच करने क े $ाद सं ुj हो जा ा है विक ारा 36 क े ह $नाए गए वक्फ क े रसिजस्टर में दज! वक्फ वक्फ की अचल संपखि} को अति विनयम की ारा 51 या 56 क े उल्लंघन में $ोर्ड! की पूव! मंजूरी क े वि$ना स्थानां रिर कर विदया गया है, यह उस स्थान क े कलेक्टर को कब्जे को प्राप्त करने और सौंपने क े खिलए अनुरो भेज सक ा है सिजसमें संपखि} श्मिस्थ है। कलेक्टर आदेश की प्राविप्त से 30 विदनों क े भी र $ोर्ड! को संपखि} सौंपने क े खिलए कब्जे वाले व्यविक्त को विनदoश देने क े खिलए एक आदेश पारिर करने क े खिलए $ाध्य है। यह इस प्राव ान क े ह है विक विववाविद आदेश पारिर विकया गया।
38. यह ध्यान विदया जाएगा विक अति विनयम विदनांक 01.01.1996 को प्रभावी हुआ। अन्य $ा ों क े साथ साथ ारा 52 $ोर्ड! क े कलेक्टर को एक मांग भेजने का अति कार दे ा है, अगर संपखि} ारा 51 क े उल्लंघन में $ोर्ड! की पूव! मंजूरी क े वि$ना स्थानां रिर की गई है। हमने देखा है विक ारा 51 में प्राव ान विकया गया है विक $ोर्ड! की पूव! मंजूरी क े वि$ना संपखि} की कोई भी वि$dी, जो वक्फ संपखि} है, शून्य उद्देOय क होगी। इस मामले में दो वि$dी 01.01.1996 से पहले हुई थी। पहली वि$dी 14.10.1960 की है ज$विक दूसरी वि$dी 13.09.1974 की है।
39. अति विनयम की ारा 112 विनरसन और वि$dी क े खिलए प्राव ान कर ी है। यह इस प्रकार है: "112. विनरसन और व्यावृखि}- (1) वक्फ अति विनयम, 1954 (1954 का 29) और वक्फ (संशो न) अति विनयम, 1984 (1984 का 69) ए द्द्वारा विनरसिस विकए जा े हैं। (2) इस रह क े विनरसन क े $ावजूद, उक्त अति विनयमों क े ह की गई कोई भी कार!वाई या की गई कार!वाई को इस अति विनयम क े सं$ंति े ह विकया गया या खिलया गया माना जाएगा। (3) यविद, इस अति विनयम क े प्रारंभ से ठीक पहले, विकसी राज्य में, उस राज्य में लागू है, ो कोई भी कानून जो इस अति विनयम क े अनुरूप है, वह सं$ंति कानून विनरस् हो जाएगा: $श o विक ऐसा विनरसन उस सं$ंति कानून क े विपछले संचालन को प्रभाविव नहीं करेगा, और उसक े अ ीन, सं$ंति कानून द्वारा या उसक े ह प्रद} विकसी भी शविक्त क े प्रयोग में की गई कोई भी कार!वाई या की गई कार!वाई को प्रयोग विकया गया या खिलया गया माना जाएगा। इस अति विनयम द्वारा या इसक े ह प्रद} शविक्तयों का जैसे विक यह अति विनयम उस विदन लागू था सिजस विदन ऐसी चीजें की गई थीं या कार!वाई की गई थी।"
40. 1960 क े अति विनयम की ारा 49 $ी अति विनयम की ारा 52 क े समान है। दूसरे शब्दों में, यह प्राव ान कर ा है विक $ोर्ड!, यविद 1960 क े अति विनयम की ारा 49 ए का उल्लंघन कर े हुए स्थानां रण कर ा है, ो कब्जे की वसूली क े उद्देOय क खिलए कलेक्टर को मांग भेज सक ा है। 1960 क े अति विनयम की ारा 49 ए भी अति विनयम की ारा 51 (1) में प्रदान की गई समान श ® पर प्रदान कर ी है विक वक्फ में विनविह संपखि} की वि$dी क े खिलए $ोर्ड! की पूव! स्वीक ृ ति आवOयक थी। जहाँ क 1971 क े अति विनयम 28 द्वारा ारा 49A और 49B को सश्मिम्मखिल विकया गया और दूसरी वि$dी 1974 में हुई, जो 1960 क े अति विनयम में ारा 49A और 49B क े सश्मिम्मखिल होने क े $ाद है, इसखिलए वास् व में शविक्त, ारा 49 $ी क े ह कब्जे की वसूली क े खिलए कार!वाई करने क े खिलए $ोर्ड! क े पास विनविह है। अति विनयम की ारा 112 (3) क े ह, हम इस आ ार पर आगे $ढ़ े हैं विक 1960 का अति विनयम विनरसिस माना जाएगा। हालांविक, प्राव ान यह घोर्षणा कर ा है विक विनरसन सं$ंति कानून क े विपछले संचालन को प्रभाविव नहीं करेगा। सं$ंति कानून, में यह मामला ारा 49 ए सपविठ ारा 49 $ी है। उसक े ह शविक्त क े प्रयोग में की गई कार!वाई को अति विनयम क े ह शविक्तयों क े प्रयोग में की गई कार!वाई क े रूप में माना जाएगा। अति विनयम क े ह शविक्तयों को अति विनयम की ारा 52 से प्रवाविह माना जाना चाविहए। उक्त उद्देOय क े खिलए, ारा 112 (3) क े प्राव ान में प्राव ान है विक अति विनयम क े प्राव ान, जो इस मामले में ारा 52 होंगे, को क़ानून की विक ा$ में माना जाना चाविहए।
41. लेविकन विफर क्या यह कहा जा सक ा है विक 1960 अति विनयम की ारा 49 $ी क े ह $ादलों क े सं$ं में कोई कार!वाई नहीं की गई है और इसखिलए, अति विनयम की ारा 112 (3) में कोई आवेदन नहीं हो सक ा है? हम आगे $ढ़ े हैं इस आ ार पर विक, शविक्त का पालन करने क े कारणों क े रूप में मौजूद है, अपीलक ा! सुविनतिश्च आ ार पर विवफल होंगे।
42. एक क ! विदया गया है विक प्रश्नग वक्फ-अलल औलाद को अति विनयम क े ह वक्फ क े रूप में नहीं माना जा सक ा है। यह पहले प्रति वादी का मामला है उद्देOय क विक मुसलमान वक्फ वै ीकरण अति विनयम, 1913 में वक्फ क े पंजीकरण क े खिलए प्राव ान नहीं विकया गया था। हालांविक मुश्मिस्लम वक्फ अति विनयम, 1923 को अति विनयविम विकया गया था, वक्फ-अलल-औलाद को इसक े संचालन से $ाहर रखा गया था। न ही 1936 को अति विनयम और न ही 1960 अति विनयम लागू हो ा है और अपीलक ा! यह दावा नहीं कर सक ा है विक वक्फ अति विनयमन क े ह पंजीक ृ विकया गया था। कोई ार्मिमक या मा!थ! उद्देOय नहीं है। 1936 क े अति विनयम में विवणिशj $विहष्करण क े मद्देनजर, यह क ! विदया गया है विक अति विनयम वक्फ पर लागू नहीं हो ा क्योंविक पूरी आय वक्फ क े सदस्यों क े लाभ क े खिलए जानी थी।
43. प्रश्नग वक्फ अक$र अली खान द्वारा विदनांक 26.07.1934 क े विवलेख द्वारा $नाया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है, यह एक वक्फ-अलल-औलाद है। एक वक्फ-अलल-औलाद मोहम्मद कानून क े ह एक वक्फ है। यह विप्रवी काउंसिसल थी, सिजसने अब्दुल फ ह मोहम्मद इशाक $नाम रसोमी र चौ री22 क यह माना था विक यविद दान भ्रामक है या इ ना छोटा है, ो इसे वक्फ क े रूप में नहीं माना जा सक ा है। इस फ ै सले क े कारण मुसलमान वक्फ वै ीकरण अति विनयम, 1913 पारिर हुआ। उक्त अति विनयमन की ारा 3 और 4 इस प्रकार हैं: "3. मुश्मिस्लम आस्था को मानने वाले विकसी भी व्यविक्त क े खिलए यह वक्फ $नाने क े खिलए वै होगा जो अन्य सभी मामलों में मुश्मिस्लम कानून क े े अनुसार अन्य उद्देOयों क े खिलए विनम्नखिलखिख क े खिलए है: (ए) पूण! या आंणिशक रूप से रखरखाव और समथ!न क े खिलए अपने परिरवार, $च्चों या वंशजों और 22 22 Indian Appeals 76 उद्देOय क ($ी) जहां वक्फ $नाने वाला व्यविक्त हनफी मुसलमान है, अपने जीवनकाल क े दौरान अपने स्वयं क े रखरखाव और समथ!न क े खिलए या समर्मिप संपखि} क े विकराए और मुनाफ े में से अपने ऋणों क े भुग ान क े खिलए भी। $श o विक ऐसे मामलों में अंति म लाभ स्पj रूप से या विनविह रूप से गरी$ों क े खिलए या मुश्मिस्लम कानून द्वारा मान्य ा प्राप्त विकसी अन्य उद्देOय क े खिलए एक स्थायी चरिरत्र क े म!, पविवत्र या मा!थ! उद्देOय क े खिलए आरतिक्ष है।
4. ऐसा कोई भी वक्फ सिसफ ! इसखिलए अमान्य नहीं माना जाएगा क्योंविक उसमें गरी$ों या अन्य ार्मिमक, पविवत्र या स्थायी प्रक ृ ति क े मा!थ! उद्देOयों क े खिलए आरतिक्ष लाभ को वक्फ $नाने वाले व्यविक्त क े परिरवार, $च्चों या वंशजों क े विवलुप्त होने क स्थविग कर विदया जा ा है।"
44. इसक े $ाद मुसलमान वक्फ अति विनयम, 1923 पारिर विकया गया।यह पूरे विब्रविटश भार पर लागू हो ा था। ारा 2 (ड़) में विनविह वक्फ की परिरभार्षा इस प्रकार हैः "2(ड़) 'वक्फ' का अथ! है मुसलमान कानून द्वारा ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! क े रूप में मान्य ा प्राप्त विकसी उद्देOय क े खिलए मुश्मिस्लम म! को मानने वाले विकसी व्यविक्त द्वारा विकसी संपखि} का स्थायी रूप से समप!ण, लेविकन इसमें कोई ऐसा वक्फ शाविमल नहीं है, जैसा विक मुसलमान वक्फ वै ा अति विनयम, 1913 की ारा 3 में वर्भिण है, सिजसक े ह विकसी लाभ क े खिलए उस व्यविक्त द्वारा, सिजसक े द्वारा वक्फ $नाया गया था, खुद क े खिलए त्समय दावा विकया जा ा है या उसक े परिरवार या वंशजों में से कोई भी दावा कर ा है।” उद्देOय क
45. 1923 क े अति विनयम की ारा 3 मु वल्ली को सक्षम न्यायालय को कति पय विवणिशविjयों वाला कथन प्रस् ु करने क े खिलए $ाध्य कर ी है।कथन की सूचना को ारा 4 क े ह प्रकाणिश विकया जाना था।1923 क े अति विनयम में खा ों की लेखा-परीक्षा और मु वल्ली द्वारा विकए जा सकने वाले व्यय का प्राव ान शाविमल विकया गया। ारा 10 में जुमा!ने का प्राव ान है।क ु छ वक्फों को ारा 12 क े ह इसक े दायरे से $ाहर रखा गया था।संयुक्त प्रां में, सिजसका अथ! है आगरा और अव क े संयुक्त प्रां, 1936 का अति विनयम अति विनयविम विकया गया। इसकी ारा 2 इस प्रकार हैः "2(1). इसमें अन्यथा विनर्मिदj क े सिसवाय, यह अति विनयम सभी वक्फों पर लागू होगा, चाहे इस अति विनयम क े लागू होने से पहले $नाए गए हों या $ाद में, सिजसकी संपखि} का कोई भी विहस्सा संयुक्त प्रां में श्मिस्थ है।" (2) यह अति विनयम विनम्न पर लागू नहीं होगाः - (i) विकसी विवलेख द्वारा सृसिज ऐसा वक्फ, यविद कोई हो, सिजसक े विन$ं नों क े अ ीन वक्फ विवलेख क े अं ग! आने वाली संपखि} की सरकार को संदेय भू-राजस्व और उपकरों की कटौ ी क े पश्चा ् क ु ल आय का कम से कम 75 प्रति श, वाविकफ या उसक े वंशजों या उसक े परिरवार क े विकसी सदस्य क े फायदे क े खिलए त्समय संदेय हैः (ii) क े वल विनम्नखिलखिख प्रयोजनों में से विकसी एक क े खिलए सृसिज एक वक्फः (क) वाविकफ या उसक े वंशजों या उसक े विकसी सदस्य क े अलावा विकसी अन्य व्यविक्त क े भरण-पोर्षण और सहाय ा क े खिलए, (ख) वाविकफ या उसक े विकसी सदस्य या उसक े विकसी पूव!ज की पुण्यति णिथ से सं$ंति ार्मिमक समारोहों को मनाने क े खिलए; उद्देOय क (ग) विनजी इमाम$ाड़ों, कब्रों और कविब्रस् ानों क े रख-रखाव क े खिलए, या (घ) ज$ वाविकफ हनफी मुसलमान है ो वाविकफ क े भरण-पोर्षण और सहारे या उसक े ऋण क े भुग ान क े खिलए और (iii) अनुसूची में उसिल्लखिख वक्फ क े खिलए।परन् ु यविद विकसी ऐसे वक्फ का मु वल्ली, सिजसे यह अति विनयम लागू नहीं हो ा है, गल रीक े से $ेच दे ा है या $ं क कर दे ा है या अपने विवरुद्ध तिर्डdी क े विनष्पादन में $ेच दे ा है या अन्यथा संपूण! वक्फ संपखि} या उसक े विकसी भाग को नj कर दे ा है, ो क े न्द्रीय $ोर्ड! इस अति विनयम क े सभी या विकसी भी उप$ं को ऐसे वक्फ को ऐसे समय क े खिलए लागू कर सक ा है जो वह आवOयक समझे। स्पjीकरण- कोई वक्फ, सिजसे मूल रूप से इस अति विनयम क े लागू होने से छ ू ट प्राप्त है, $ाद में विकसी भी कारण से इस रह क े लागू होने क े अ ीन हो सक ा है, उदाहरण क े खिलए, इसकी आय का एक $ड़ा प्रति श साव!जविनक मा!थ! संस्थाओं क े खिलए विवलेख की श ® क े ह उपलब् होने क े कारण।
46. 1936 क े अति विनयम की ारा 3 (1) में 'वक्फ' को विनम्नखिलखिख रूप में परिरभाविर्ष विकया गया हैः "3(1) 'वक्फ' का अथ! है मुसलमान कानून या प्रथा द्वारा ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! क े रूप में मान्य ा प्राप्त विकसी उद्देOय क े खिलए विकसी संपखि} का स्थायी रूप से समप!ण या अनुदान और जहां वक्फ का कोई विवलेख उद्देOय क नहीं है, इसमें उपयोगक ा! द्वारा वक्फ शाविमल है और वाविकफ का अथ! है कोई भी व्यविक्त जो ऐसा समप!ण या अनुदान कर ा है।”
47. 1936 क े अति विनयम की ारा 38 (1) इस प्रकार हैः"38(1) प्रत्येक वक्फ चाहे इस अति विनयम क े अ ीन हो या नहीं और चाहे इस अति विनयम क े लागू होने से पहले या $ाद में $नाया गया हो, उसे उस संप्रदाय क े क ें द्रीय $ोर्ड! क े काया!लय में पंजीक ृ विकया जाएगा सिजससे वक्फ का सं$ं है।(प्रभाव वर्ति )48. यह विनःसंदेह सच है विक फजलुल रब्$ी प्र ान (उपरोक्त) क े मामले में इस प्रश्न क े संदभ! में विक क्या वक्फ पतिश्चम $ंगाल संपदा अज!न अति विनयम, 1953 क े पारिर होने से प्रभाविव हुए थे और उसमें, प्रश्नग वक्फ ' मा!थ! प्रयोजन' और ' ार्मिमक प्रयोजन' शब्दों की परिरभार्षा क े भी र आ े हैं, न्यायालय ने विनम्नानुसार अणिभविन ा!रिर विकयाः "13. इन मामलों ने भार में आंदोलन को जन्म विदया और मुसलमान वक्फ विवति मान्यकरण अति विनयम, 1913 (1913 का 6) पारिर विकया गया।इसने मुसलमानों क े अपने परिरवारों, $च्चों और वंशजों क वक्फ क े माध्यम से संपखि} को व्यवश्मिस्थ करने क े अति कारों की घोर्षणा की।विवति मान्यकरण अति विनयम क े खिलए "वक्फ" "शब्द की परिरभार्षा इस प्रकार की गई थी- "विकसी व्यविक्त द्वारा विकसी भी संपखि} का स्थायी समप!ण जो मुसलमान कानून द्वारा ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! क े रूप में मान्य ा प्राप्त हो।" इसने वक्फ शब्द को व्यापक अथ! विदया, लेविकन क े वल उन्हें अमान्य ा से $ाहर लाने क े उद्देOय से, जो अन्यथा अश्मिस् त्व में हो ी और जो पहले से ही अति क ृ रूप से अश्मिस् त्व में थी। उद्देOय क
14. इन दो अति विनयमों क े पारिर होने क े $ाद वक्फ, सिजसमें उद्देOय सामान्य अथ! में मा!थ! क े विदखावे क े वि$ना वाविकफों क े परिरवारों का उन्नयन करना था, वै और सविdय हो गये।हिंक ु विवति मान्यकरण अति विनयम का आशय ' मा!थ!' शब्द को एक नया अथ! देना नहीं था, जो सामान्य $ोलचाल की भार्षा में एक ऐसा शब्द है जो विकसी व्यविक्त को आवOयक परिरश्मिस्थति यों में विदया जा ा है और कानून क े अनुसार साव!जविनक विह क े खिलए दान देने का द्यो क है। अपने आपको या स्वजन व सं$ंति यों को एक विनजी उपहार सराहनीय और पविवत्र हो सक ा है लेविकन कानूनी रूप से एक मा!थ! नहीं है और भार में अदाल ों ने कभी भी ऐसे उपहारों को ार्मिमक या मा!थ! उद्देOयों क े खिलए नहीं माना है यहां क विक मुश्मिस्लम विवति ने भी नहीं माना है। सैयद मोविहउद्दीन अहमद $नाम सोविफया खा ून [44 सीर्डब्ल्यूएन 974] में फ ै सला सुनाया गया था विक न ो वक्फ विवति मान्यकरण अति विनयम 1913 और न ही शरीय अति विनयम 1937 में " मा!थ! उद्देOय" क े अथ! पर विप्रवी काउंसिसल क े फ ै सलों को विनरस् करने का प्रभाव था।”
49. इसमें कोई संदेह नहीं है विक न्यायालय वक्फ -अल-औलाद क े एक मामले पर विवचार कर रहा था।विनण!य को अविनवाय! रूप से प्रश्नग अति विनयम में उप$ंति ' ार्मिमक और मा!थ! प्रयोजन' की परिरभार्षा क े संदभ! में देखा जाना चाविहए।
50. प्रश्नग वक्फ विदनांक 26.07.1934 का है।1936 का अति विनयम, े लागू होने से पहले या $ाद में $नाए गए वक्फ पर लागू हो ा है। हालांविक, ारा 2(2) घोर्षणा कर ी है विक अति विनयम क ु छ वक्फ पर लागू नहीं होगा।इनमें एक वक्फ शाविमल था, सिजसक े ह क ु छ राणिशयों की कटौ ी क े $ाद उद्देOय क क ु ल आय का कम से कम 75 प्रति श, वाविकफ या उसक े वंशजों क े लाभ क े खिलए त्समय देय था।हालांविक, 1936 क े अति विनयम की ारा 38(1) में यह स्पj विकया गया है विक प्रत्येक वक्फ, चाहे अति विनयम क े अ ीन हो या न हो और चाहे वह 1936 क े $ाद $नाया गया हो या $ाद में, पंजीक ृ होगा।इस आ ार पर आगे $ढ़ना विक विदनांक 16.07.1934 का वक्फ, वक्फ अल-औलाद था और जो, ारा 2(2)(i) क े अनुसार, 1936 क े े अ ीन नहीं था, यह ारा 38(1) को ध्यान में रख े हुए अविनवाय! रूप से पंजीकरण योग्य था। 1936 क े ह पंजीक ृ कोई भी वक्फ 1960 क े ह पंजीक ृ माना जाएगा।अथा! ् हालांविक 1936 का अति विनयम कति पय वक्फों पर लागू नहीं हो ा था, हिंक ु ज$ ारा 38 क े अ ीन रसिजस्टiीकरण की $ा आ ी है, ो प्रत्येक वक्फ क े खिलए पंजीक ृ होना अविनवाथ! था (i) चाहे वह अति विनयम क े अ ीन हो या न हो और (ii) चाहे अति विनयम से पूव! सृसिज विकया गया हो या $ाद में विकया गया हो।इस प्रकार, विदनांक 16.07.1934 क े वक्फ का पंजीकरण, वास् व में 1936 क े अति विनयम की ारा 38 क े ह अविनवाय! था।
51. श्री पी. एस. पटवाखिलया, विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता द्वारा यह प्रति वाद विकया गया है विक वास् व में कोई वक्फ नहीं था जैसा विक विवति में ज्ञा है और प्रश्नग वक्फ ने क े वल वाविकफ क े लाभ क े खिलए संपूण! आय क े संविव रण पर विवचार विकया था।इस थ्य क े अलावा विक मुकदमे$ाजी क े पहले दौर में इस प्रश्न ने उच्च न्यायालय सविह सिसविवल न्यायालय का ध्यान आकर्मिर्ष विकया, सिजसमें यह पाया गया विक णिशया कानून क े दृविjकोण से एक वै वक्फ था और चक$ंदी प्राति करणों ने भी यह पाया विक वक्फ भी क था ज$ क उप विनदेशक, चक$ंदी ने क े वल भाइयों क े $ीच समझौ े क े आ ार पर मामले पर दो$ारा गौर नहीं विकया था, उद्देOय क वक्फ की श ® में मा!थ! उद्देOयों क े खिलए एक विनतिश्च राणिश अलग करने की परिरकल्पना की गई थी, जैसा विक प्रत्यथn संख्या 2 और 4 क े विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री एस.आर. सिंसह ने ठीक ही उठाया था। इस सं$ं में, हम दस् ावे€ में इस श ! को देख े हैं विक 500/- रुपये की राणिश मोहर!म क े पविवत्र महीने में मुअश्मिË€न और मश्मिस्जद और इमाम$ाड़ा में रोशनी करने, मजखिलस अशरा जैसे मा!थ! उद्देOयों पर खच! की जाएगी।इसमें कोई संदेह नहीं है विक अवणिशj खंर्ड है, जो प्रकट कर ा है विक वाविकफ ने यह प्राव ान विकया है विक यविद वंशज अश्मिस् त्व में नहीं रहे, ो दान की गई संपखि} से होने वाली आय का प्र$ं न एक सविमति द्वारा विकया जाएगा जो मा!थ! उद्देOयों क े खिलए खच! की जानी है।
52. उ.प्र. सुन्नी सेंटiल $ोर्ड! ऑफ वक्फ और एक अन्य $नाम हसन जहां $ेगम और एक अन्य23 क े मामले में इलाहा$ाद उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ को इस क ! पर विवचार करना था विक वक्फ -अलल-औलाद क े मामले में, 1960 क े अति विनयम की ारा 3(11) में 'वक्फ' शब्द की परिरभार्षा को ध्यान में रख े हुए, क्या पूरी संपखि} ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! उद्देOय क े खिलए समर्मिप थी, जैसा विक 'वक्फ' शब्द को परिरभाविर्ष कर े हुए ारा 3(11) में परिरकश्मिल्प है या क े वल सीविम सीमा क, यानी उस आय की सीमा क जो इस रह क े खिलए विन ा!रिर की गई थी। इस सं$ं में हम विनम्नखिलखिख चचा! पर ध्यान दें सक े हैंः " 5...$हु सम्मान क े साथ, हम अपने आप को विवद्वान एकल न्याया ीश द्वारा खिलए गए दृविjकोण से सहम कर पाने में असमथ! हैं,
उद्देOय क जैसा विक हमें लग ा है विक संपखि} की सीमा आय क े आ ार पर विन ा!रिर नहीं की जा सक ी है। समप!ण को देखा जाना चाविहए, यविद पूरी संपखि} दो उद्देOयों क े खिलए समर्मिप की जा ी है, अथा! ्, म!विनरपेक्ष उद्देOयों क े खिलए और ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! उद्देOयों क े खिलए, ो पूरी संपखि} को दोनों उद्देOयों क े खिलए समर्मिप माना जाएगा।ज$ क यह विन ा!रिर करना संभव नहीं होगा विक संपखि} को ार्मिमक, पविवत्र और मा!थ! उद्देOयों क े खिलए विकस हद क समर्मिप विकया गया है, $ क पूरी संपखि} को ईश्वर को समर्मिप और वक्फ की विवर्षय-वस् ु माना जाएगा।संपखि} को अपवर्जिज करने क े खिलए यह ज्ञा होना चाविहए या वक्फ क े विवलेख से विन ा!रिर होना चाविहए विक कोई विवशेर्ष संपखि} या उसका विहस्सा समर्मिप नहीं है।यातिचकाक ा!ओं- प्रत्यर्भिथयों क े विवद्वान अति वक्ता ने क ! विदया विक समप!ण की सीमा का विन ा!रण करने क े खिलए आय ही मानदंर्ड है।लेविकन, हम पा े हैं विक वक्फ की परिरभार्षा में आय क े $ारे में नहीं $श्मिल्क संपखि} क े $ारे में विवचार विकया गया है।प्रासंविगक शब्द 'उस सीमा क जहां क संपखि} समर्मिप है' हैं। आय संपखि} से उत्पन्न हो ी है और यह समय-समय पर अलग-अलग हो सक ी है। यह ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! उद्देOयों क े खिलए विन ा!रिर राणिश से अति क हो सक ी है या उससे कम हो सक ी है।यह भी संभव नहीं है विक राणिश क े सापेक्ष संपखि} आवंविट की जाए या यह कहा जाए विक यह राणिश विकसी विवशेर्ष विहस्से या संपखि} से या उस संपखि} क े एक विवशेर्ष अनुपा से आनी चाविहए।पूरी संपखि}, जो वक्फ की विवर्षय-वस् ु है, ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! उद्देOयों को पूरा करने क े खिलए उ}रदायी है।यविद पूरी संपखि}, जो वक्फ की विवर्षय-वस् ु है, खच® को पूरा करने क े खिलए उद्देOय क उ}रदायी है, ो यह नहीं कहा जा सक ा विक वक्फ या समप!ण पूरी संपखि} में से क ु छ अविन ा!रिर और अविनतिश्च संपखि} क े खिलए ही है, जो वक्फ की विवर्षय-वस् ु है।हमारी राय में, ज$ क विक ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! उद्देOयों क े खिलए वक्फ -अल-औलाद की विवर्षय वस् ु वाली संपखि} में से संपखि} की सीमा विन ा!रिर करना संभव नहीं है, $ क पूरी संपखि} वक्फ अति विनयम क े अथ! क े भी र वक्फ की विवर्षय वस् ु होगी।सीमा विन ा!रिर करने का प्रश्न व्यावहारिरक रूप से क े वल उस मामले में उत्पन्न हो सक ा है सिजसमें कई संपखि}यां हैं और उनमें से कु छ को ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! क े रूप में मान्य ा प्राप्त उद्देOयों क े खिलए विन ा!रिर विकया गया है और अन्य को वक्फ या उसक े लाभ क े खिलए विन ा!रिर विकया गया है।यह उस मामले में भी उत्पन्न हो सक ा है जहां विकसी संपखि} या संपखि} क े एक विहस्से को दो उद्देOयों क े खिलए विन ा!रिर विकया गया है।व !मान मामले में दोनों में से विकसी भी वक्फ में ऐसा कोई विनदoश नहीं है।पूरी संपखि} ार्मिमक, पविवत्र और मा!थ! उद्देOयों क े खिलए समर्मिप की गई है।यह भी कहा जा सक ा है विक वह संपखि} जो ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! उद्देOयों क े खिलए समर्मिप की गई है, वह पूरी ही संपखि} है। इसखिलए, विवलेख क े ह पूरी संपखि} को वक्फ अति विनयम की ारा 3 (11) क े अथ! में वक्फ माना जाएगा।"
53. हमें लग ा है विक उपरोक्त दृविjकोण सही दृविjकोण का प्रति विनति त्व कर ा है, और आय की सीमा जो इस उद्देOय क े खिलए अलग रखा गया है, चाहे वह ार्मिमक, पविवत्र या मा!थ! हो, थ्यों पर पूरी संपखि} क े समप!ण से अलग नहीं हो सक ा। उद्देOय क
54. एक अन्य क ! यह विदया गया है विक वक्फ संपखि} क े $ड़े विहस्से को मूल वाविकफ क े $ेटों द्वारा संdाम्य कर विदया गया था और क े वल लगभग 100 $ीघा जो हमारे समक्ष अपीलों की विवर्षय वस् ु थी, $ची रही।हमारा विवचार है विक यह क ! इस हिं$दु से अलग है।यह थ्य विक वक्फ की संपखि} को इस रह से विनपटाया गया है, जो विक अवै है, या यह विक उस पर सवाल नहीं उठाया गया था, हमें इस विनष्कर्ष! से विवचखिल नहीं कर सक ा है विक वै वक्फ था या जो संपखि} वक्फ की शेर्ष रह गई थी, उसका कानून क े अनुसार विनपटारा विकया जाएगा।उप विनदेशक (चक$ंदी) क े समक्ष समझौ ा और उसक े आ ार पर आदेश, 1960 क े अति विनयम की ारा 69 क े खिखलाफ है, इसखिलए वक्फ क े $ारे में चक$ंदी अति कारी और $ंदो$स् ी अति कारी द्वारा पारिर आदेश पुनः लागू होंगे।
55. दो प्रश्न शेर्ष हैं।पहला प्रश्न, सिजस पर हमें विवचार करना चाविहए, वह यह है विक क्या वक्फ का कोई लाभाथn वक्फ की संपखि} क े सं$ं में प्रति क े क ! क े $ल पर सफल हो सक ा है।उच्च न्यायालय ने इस आ ार पर काय!वाही की है विक मु वल्ली प्रति क ू ल कब्जे से हक प्राप्त करने में समथ! नहीं हो सक ा है।साथ ही, इस सं$ं में एक न्यासी और एक सह-माखिलक को भी प्रति $ंति विकया गया है, यह नोट विकया गया है।यह पाया गया है विक हालांविक वक्फ का लाभाथn, जो न ो वक्फ संपखि} का न्यासी है और न ही सह-माखिलक है, प्रति क ू ल कब्जे से स्वाविमत्व प्राप्त कर सक ा है, भले ही यह वक्फ की संपखि} हो।56. वक्फ क े लाभाथn को वक्फ क े खिलए अजन$ी नहीं कहा जा सक ा।इसमें कोई संदेह नहीं है विक लाभाथn को उसकी श्मिस्थति में मु वल्ली क े साथ नहीं जोड़ा जाना चाविहए।मु वल्ली वक्फ का प्र$ं क है।हमें याद रखना चाविहए विक विवति में, वक्फ की संपखि} ईश्वर में विनविह हो ी है।मु वल्ली क े वल प्र$ं क क े रूप में काय! कर ा है।परिरसीमा अति विनयम की उद्देOय क ारा 10 क े खिलए, इसमें कोई संदेह नहीं विक, उसे एक न्यासी क े रूप में माना जा ा है।प्रति क े अणिभवाक क े खिलए, विनःसंदेह अपेतिक्ष आशय अथा! ् कब्जे का आशय होना चाविहए। यह अपेतिक्ष अवति क े वास् विवक कब्जे क े अलावा है।क्या लाभाथn वक्फ की संपखि} में वैश्वासिसक क्षम ा रख े हैं, जो उन्हें प्रति क े दावे को आगे $ढ़ाने से रोक े गी?इस संदभ! में 'वैश्वासिसक क्षम ा' का क्या अथ! है? एक लाभाथn वक्फ विवलेख क े संदभ! में लाभ प्राप्त करने का हकदार होगा।क्या वक्फ संपखि} क े सं$ं में उसकी कोई $ाध्य ा है?दूसरे शब्दों में, क्या कोई क !व्य है सिजसका पालन उसे इस थ्य क े आ ार पर करना चाविहए विक उसे वक्फ क े ह लाभाथn $नाया गया है ?क्या पक्षद्रोही हक का दावा, प्रति क ू ल कब्जे का गठन करने क े खिलए एक अपरिरहाय! आवOयक ा है और लाभाथn की श्मिस्थति क े साथ असंग है?प्रति क े मामले में, चूंविक एक आवOयक ा यह है विक कब्जा वास् विवक स्वामी क े विवरूद्ध होना चाविहए और चूंविक वास् विवक स्वामी ईश्वर है, इसखिलए आवOयक ा यह होगी विक ऐसे व्यविक्त में ईश्वर क े विवरूद्ध स्वाविमत्व रखने क े खिलए आवOयक आशय होना चाविहए।सह-स्वामी क े मामले में, क े वल स्वयं में हक का दावा करना शायद ही पया!प्त हो क्योंविक सह - स्वामी का कब्जा सभी सह-स्वाविमयों की ओर से कब्जा माना जा ा है, विनष्कासन का मामला सफल ापूव!क स्थाविप हो जाने पर सह-स्वामी सफल होने का हकदार होगा।
57. हम 'मुश्मिस्लम विवति क े सिसद्धां ' (22 वां संस्करण) पर मुल्ला का विनम्नखिलखिख कथन देख सक े हैंः "207 विवdय या $ं क रखने की मु वल्ली की शविक्त- न्यायालय की अनुमति क े वि$ना मु वल्ली को वक्फ की संपखि} या उसक े विकसी विहस्से को $ं क करने, $ेचने या विवविनमय का कोई अति कार नहीं उद्देOय क है, ज$ क विक उसे वक्फ क े विवलेख द्वारा स्पj रूप से ऐसा करने का अति कार न विदया गया हो।"
58. इसक े $ाद विवद्वान लेखक अति विनयम की ारा 51(1) का उल्लेख कर े हैं सिजसक े ह $ोर्ड! की पूव! मंजूरी प्राप्त करने क े $ाद विवdय विकया जा सक ा है। अति विनयम की ारा 51 में उप- ारा (1 क) को शाविमल करक े 2013 क े संशो न अति विनयम द्वारा लाए गए परिरव !न पर भी ध्यान विदया गया है सिजसक े द्वारा अन्य $ा ों क े साथ-साथ विवdय को शून्य घोविर्ष विकया गया है।विवdय क े खिखलाफ प्रति $ं पर, ज$ क विक इसे वक्फ विवलेख द्वारा स्पj रूप से अति क ृ नहीं विकया जा ा है, शीर्ष!क "अनति क ृ संdामण और परिरसीमा" क े ह विवचार विकया गया है और यह इस प्रकार है: "मु वल्ली को हस् ग वक्फ संपखि} का पालन करने क े खिलए और ऐसी संपखि} क े अनति क ृ हस् ां रण को रद्द करने क े खिलए और अं रिर ी से उसक े कब्जे को पुनप्रा!प्त करने क े खिलए विकसी मुकदमे क े खिलए परिरसीमा की अवति क े सं$ं में कानून, 1929 क े अति विनयम 1 द्वारा संशोति और परिरवर्ति विकया गया था। इन संशो नों में मूल अति विनयम (परिरसीमा अति विनयम, 1908) की ारा 10 में अनुच्छेद 2 को जोड़ना और अनुच्छेद 48 ख, 134 क, 134 ख और 134 ग का अं ःस्थापन शाविमल है।"
59. हमने परिरसीमा अति विनयम, 1908 क े अनुच्छेद 134 ख क े ात्पय! और उ}राति कारी उप$ं, अथा! ् परिरसीमा अति विनयम, 1963 क े अनुच्छेद 96 में विकए गए परिरव !न पर पहले ही ध्यान विदया है। उद्देOय क
60. अविनसुर रहमान और अन्य $नाम शेख अ$ुल हया 24 क े मामले में, उच्च न्यायालय की खण्र्ड पीठ को उस प्रश्न पर विवचार करने का अवसर विमला सिजसका हम सामना कर रहे हैं। न्यायालय ने विनम्नखिलखिख अणिभविन ा!रिर विकयाः "7. मुखजn की विवख्या पुस् क, विहन्दू लॉ ऑफ रिरखिलसिजयस एंर्ड चेरिरटेवि$ल टiस्ट क े दूसरे संस्करण क े पृष्ठ 274 पर उक्त कलक}ा विनण!य को संदर्भिभ विकया गया था और आगे पृष्ठ 282 पर यह दर्भिश विकया गया था विक अनति क ृ हस् ां रण क े मामले में परिरसीमा विकसी संपखि} क े सं$ं में कब्जे क े विनविह हो े ही शुरू हो जाएगी। पृष्ठ 282 पर उनक े अपने शब्दों को उद्धृ करने क े खिलएः इन मामलों से विनकलने वाला सही सिसद्धां यह है विक जैसे ही हस् ांरिर ी संपखि} में वि$ना विकसी अति कार(स्वत्व) क े होगा, उसका कब्जा प्रति क ू ल हो जाएगा।यविद अं रण आरम्भ ः ही शून्य है ो अं रण की ारीख से ही अं रिर ी का कब्जा प्रति क ू ल हो ा है। दूसरी ओर, यविद यह शून्य नहीं है, लेविकन क े वल उ}रव n प्र$ं क की ओर से शून्यकरणीय है, $ क कब्जा प्रति क ू ल नहीं हो सक ा ज$ क विक हस् ां रण करने वाले प्र$ं क का पद समाप्त नहीं हो जा ा।”
8. दूसरे शब्दों में, परिरसीमा अति विनयम क े अनुच्छेद 144 या अनुच्छेद 134 ख की प्रयोज्य ा इस $ा पर विनभ!र करेगी विक क्या अं रण आरम्भ ः ही शून्य था या क े वल उ}रव n प्र$ं क क े कहने पर शून्यकरणीय था।9. ऐसा अं रण, जो आरम्भ ः ही शून्य है, विवति की दृविj में अं रण ही नहीं है और इसखिलए वह अनुच्छेद 134 ख की परिरति
उद्देOय क क े भी र नहीं आएगा।इसक े अलावा, यह अनुच्छेद विकसी $ंदो$स् ी( म!दाय) क े प्र$ं क द्वारा विकए गए हस् ां रण को संदर्भिभ कर ा है।यविद कोई व्यविक्त संपखि} को अपनी विनजी संपखि} मान े हुए हस् ां रिर कर ा है, ो यह मानना कविठन है विक क े वल इसखिलए विक वह हस् ां रण की ारीख को $ंदो$स् ी का प्र$ं क है और संपखि} $ंदो$स् ी की संपखि} है, ऐसा हस् ां रण उस अनुच्छेद की परिरति क े भी र आना चाविहए।अपीलार्भिथयों की ओऱ से श्री हुसैन एआईआर 1946 कलक}ा 473 क े $ाद क े विकसी विनण!य का हवाला नहीं दे सक े जो उनक े इस चरम दावे क े समथ!न में हो विक उस विनण!य में प्रति पाविद सिसद्धां की 1929 क े संशो न क े $ाद विकए गए शून्य(अवै ) स्थानां रणों क े सं$ं में कोई प्रयोज्य ा नहीं है।दूसरी ओर, उड़ीसा उच्च न्यायालय की खण्र्ड पीठ ने गोहिंवद जीव ठाक ु र $नाम सुरेन्द्र जेना, एआईआर 1961 उड़ीसा 102 में उस विवविनश्चय क े सिसद्धां को लागू विकया और यह अणिभविन ा!रिर विकया विक आरम्भ ः शून्य अं रण अनुच्छेद 134 ख की परिरति क े $ाहर हैं; ऐसे मामले में अं रिर ी मात्र अति dमी है और $ारह वर्ष® क े प्रति क ू ल कब्जे से उसका हक(स्वत्व) पूण! हो जाएगा। सम्मान सविह मैं इस विवचार से सहम हूं।राजाराम $नाम रामानुजम अय्यंगर, एआईआर 1963 मद्रास 213, क े प्रस् र 4 और 5 में भी इसी आशय का मद्रास का विवविनश्चय है।”
61. इसखिलए, जो सिसद्धां विनकल ा है, वह यह है।अनुच्छेद 96 क े ह विकसी मुकदमे को आने क े खिलए, प्र$ं क द्वारा अं रण होना चाविहए सिजसमें एक वक्फ का मु वल्ली भी शाविमल है।यह एक मूल्यवान प्रति फल क े खिलए होना चाविहए।अन् रण क े खिलए इसका न हुआ होना आवOयक है।यह एक शून्य संव्यवहार नहीं होना चाविहए।यही कारण है विक एक शून्य संव्यवहार को अं रण नहीं माना जा ा।मुल्ला उद्देOय क (उपरोक्त) में समझा गया एक अनति क ृ संdामण, सिजसका हमने उल्लेख विकया है, अथा! ् अन् रण जो एक मु वल्ली द्वारा विकया गया था, सिजसक े खिलए वक्फ विवलेख में कोई प्राति कार नहीं था, एक ऐसे अं रण का गठन करेगा सिजसे अनुच्छेद 134- ख और अनुच्छेद 96 लागू हो े।वक्फ से सं$ंति कानूनों क े आगमन क े साथ, सिजसमें उ}र प्रदेश में 1960 का अति विनयम शाविमल था, मु ावल्ली सं$ंति $ोर्ड! की पूव! मंजूरी प्राप्त करने क े खिलए $ाध्य था।ऐसे मामलों में जहां $ोर्ड! की पूव! मंजूरी क े वि$ना 1960 क े ह अं रण विकया जा ा है, अं रण शून्य होगा। यही कारण है विक पूव! मंजूरी की आवOयक ा एक विनतिश्च और श्रेष्ठ उद्देOय क े साथ परिरकश्मिल्प एक वै ाविनक आदेश है और सिजसक े उल्लंघन का परिरणाम शून्य संव्यवहार हो सक ा है। ऐसा कोई प्राव ान नहीं है जो इस रह क े विवdय की वै ा को सक्षम $ना ा हो। वास् व में, प्रत्यथn संख्या 2 और 4 का रुख यह है विक अं रण शून्य थे।इसखिलए अति कारिरयों ने भी इस आ ार पर कार!वाई की है विक संव्यवहार शून्य था और इसखिलए हम कणिथ नींव पर आगे $ढ़ सक े हैं।62. इस आ ार पर आगे $ढ़ना विक 1974 में विनष्पाविद विवdय एक शून्य संव्यवहार था, हम चिंच ामणिण साहू (मृ क द्वारा विवति क प्रति विनति ) (उपरोक्त) और अविनसुर रहमान (उपरोक्त) द्वारा खिलए गए दृविjकोण को अनुमोविद करने क े खिलए इच्छ ु क हैं, सिजसका हमने उल्लेख विकया है और यह अणिभविन ा!रिर विकया है विक विकसी शून्य संव्यवहार क परिरसीमा अति विनयम, 1963 क े अनुच्छेद 96 का अवलं$ नहीं खिलया जा सक ा है। कणिथ आ ार पर काय!वाही कर े हुए आक्षेविप आदेश को त्रुविटपूण! नहीं कहा जा सक ा है। उद्देOय क
63. हमारा विवचार है विक प्रति क ू ल कब्जे द्वारा हक क े अज!न का दावा करने वाले वक्फ क े लाभाथn क े विवरुद्ध कोई प्रति $ं नहीं लगाया जा सक ा।वक्फ अति विनयम, 1955 की ारा 2(ट) इस प्रकार हैः "2(ट) "वक्फ में विह $द्ध व्यविक्त" "से कोई भी व्यविक्त जो वक्फ से कोई भी आर्भिथक या अन्य लाभ प्राप्त करने का हकदार है और इसमें शाविमल हैं- (झ) कोई भी व्यविक्त सिजसे मश्मिस्जद, ईदगाह, इमाम$ाड़ा, दरगाह, खानकाह, पीरखाना और कर$ला, मक$रा, कविब्रस् ान या वक्फ से जुड़े विकसी अन्य ार्मिमक संस्थान में इ$ाद करने या कोई ार्मिमक अनुष्ठान करने या वक्फ क े अ ीन विकसी ार्मिमक या मा!थ! संस्थान में भाग लेने का अति कार है; (ii) वक्फ और वक्फ का कोई वंशज और मु वल्ली;
64. हालांविक वह ऐसा व्यविक्त हो सक ा है सिजसे ारा 2(ट) क े अथ! क े ह विकसी वक्फ में इस थ्य क े कारण 'विह $द्ध' माना जा सक ा है विक वह आर्भिथक या अन्य लाभ का प्राप्तक ा! है और वह वाविकफ का वंशज भी हो सक ा है, यह उसे न्यासी क े रूप में वर्भिण करने से $हु दूर है। लाभाथn को वक्फ विवलेख क े संदभ! में लाभ विमल सक ा है।उसे इस सं$ं में अति कार विदए जा सक े हैं।
65. क्या यह कहा जा सक ा है विक वक्फ का लाभाथn एक विवश्वासी है या एक वैश्वासिसक सं$ं है और इसखिलए वह प्रति क ू ल कब्जे से वक्फ की संपखि} का हक प्राप्त नहीं कर सक ा है?'विवश्वासी' शब्द को परिरभाविर्ष नहीं विकया गया है, इसी प्रकार 'वैश्वासिसक सं$ं ' को भी परिरभाविर्ष नहीं विकया गया है। उद्देOय क वास् व में, भार ीय न्यास अति विनयम, 1882 की ारा 88 में अन्य $ा ों क े साथ-साथ यह उप$ं विकया गया है विक एक व्यविक्त जो विवश्वास की प्रक ृ ति में है और दूसरे क े विह ों की रक्षा करने क े खिलए $ाध्य है, ऐसी प्रक ृ ति का उपयोग करक े, लाभ प्राप्त नहीं कर सक ा है और उस व्यविक्त को लाभ देने का विवरो नहीं कर सक ा है, सिजसक े विह की रक्षा करने क े खिलए वह $ाध्य है। क ें द्रीय माध्यविमक णिशक्षा $ोर्ड! और एक अन्य $नाम आविदत्य $ंदोपाध्याय और अन्य25 में, हालांविक सूचना का अति कार अति विनयम, 2005 क े संदभ! में, यह सवाल उठा विक क्या एक परीक्षा विनकाय सूचना का अति कार अति विनयम, 2005 की ारा 8 (1)(ड़) क े अथ! क े ह एक वैश्वसासिसक सं$ं में मूल्यांविक उ}र पुश्मिस् का रख ा है। विनण!य क े दौरान, इस न्यायालय ने, अन्य $ा ों क े साथ-साथ, विनम्नखिलखिख रूप में अणिभविन ा!रिर विकयाः "38. शब्द "विवश्वासी" और "वैश्वासिसक सं$ं " विवणिभन्न क्षम ाओं और सं$ं ों को संदर्भिभ कर े हैं, सिजसमें एक सामान्य क !व्य या दातियत्व शाविमल है।"
38.1. ब्लैक की लॉ तिर्डक्शनरी (7 वां संस्करण, पृष्ठ 640) "वैश्वासिसक सं$ं " को इस प्रकार परिरभाविर्ष कर ी हैः "वैश्वासिसक सं$ं -एक ऐसा सं$ं सिजसमें एक व्यविक्त अपने सं$ं क े दायरे में आने वाले मामलों में दूसरे क े लाभ क े खिलए काय! करने क े क !व्य क े अ ीन है। न्यासी-लाभाथn, संरक्षक-प्रति पाल्य, अणिभक ा!-स्वामी और वकील- मुवविक्कल जैसे वैश्वासिसक सं$ं ों क े खिलए देख-रेख क े सव च्च क !व्य की
उद्देOय क आवOयक ा हो ी है।वैश्वासिसक सं$ं आम ौर पर चार श्मिस्थति यों में से एक में उत्पन्न हो े हैंः (1) ज$ एक व्यविक्त दूसरे व्यविक्त की विनष्ठा पर भरोसा कर ा है, जो परिरणामस्वरूप पहले व्यविक्त पर श्रेष्ठ ा या प्रभाव प्राप्त कर ा है, (2) ज$ एक व्यविक्त दूसरे व्यविक्त पर विनयंत्रण और सिजम्मेदारी ग्रहण कर ा है, (3) ज$ एक व्यविक्त का सं$ं क े दायरे में आने वाले मामलों पर दूसरे व्यविक्त क े खिलए काय! करने या सलाह देने का क !व्य हो ा है, या (4) ज$ कोई विवणिशj सं$ं हो सिजसे वैश्वासिसक क !व्यों क े रूप में परंपराग मान्य ा दी गयी है जैसे एक वकील और एक मुवविक्कल या एक शेयर दलाल और एक ग्राहक।" xxx xxx xxx
39. "विवश्वासी" शब्द ऐसे व्यविक्त को संदर्भिभ कर ा है सिजसे सद्विवश्वास व सत्यविनष्ठा से दूसरे क े फायदे क े खिलए काय! करने का क !व्य है, जहां ऐसा अन्य व्यविक्त क !व्य का विनव!हन करने वाले व्यविक्त में भरोसा और विवशेर्ष विवश्वास रख ा है।" "वैश्वासिसक सं$ं " शब्द का उपयोग एक श्मिस्थति या संव्यवहार का वण!न करने क े खिलए विकया जा ा है जहां एक व्यविक्त (लाभाथn) अपने मामलों, व्यवसाय या संव्यवहार(ओं) क े सं$ं में दूसरे व्यविक्त (विवश्वासी) में पूण! विवश्वास रख ा है।" यह शब्द एक ऐसे व्यविक्त को भी संदर्भिभ कर ा है जो विकसी अन्य (लाभाथn) क े खिलए न्यास में कोई चीज ारण कर ा है।विवश्वासी(व्यविक्त) से उम्मीद की जा ी है विक वह विवश्वास क े साथ और लाभाथn क े लाभ क े खिलए काय! करेगा और लाभाथn या लाभाथn से सं$ंति चीजों क े साथ संव्यवहार करने में सद्भाव और विनष्पक्ष ा का उपयोग करेगा। उद्देOय क यविद लाभाथn ने विकसी वस् ु को न्यास में रखने या सौंपी गई वस् ु क े सं$ं में या संदभ! में क ु छ काय® को विनष्पाविद करने क े खिलए विवश्वासी व्यविक्त(न्यासी) को क ु छ सौंपा है, ो न्यासी को विवश्वास में काय! करना होगा और उससे विकसी ीसरे पक्ष को उस वस् ु या जानकारी का खुलासा नहीं करने की उम्मीद की जा ी है।40. क ु छ ऐसे सं$ं भी हो े हैं जहां दोनों पक्षों को एक दूसरे को लाभाथn क े रूप में मान े हुए एक वैश्वासिसक क्षम ा में काय! करना पड़ ा है।इसक े उदाहरण इस प्रकार हैं - एक भागीदार क े सापेक्ष अन्य भागीदार और एक विनयोजक क े सापेक्ष कम!चारी।एक कम!चारी सिजसक े पास अपने रोजगार क े दौरान व्यवसाय या व्यापार क े रहस्य या विनयोक्ता से सं$ंति गोपनीय जानकारी है, उससे एक विवश्वासी क े रूप में काय! करने की उम्मीद की जा ी है और वह दूसरों को इसका खुलासा नहीं कर सक ा है।इसी प्रकार, यविद विनयोक्ता या वरिरष्ठ अति कारी या विकसी विवभाग क े प्रमुख क े अनुरो पर, कोई कम!चारी अपना व्यविक्तग विववरण और जानकारी प्रदान कर ा है, सिजसे विवश्वास में रखा जाना है, ो विनयोक्ता, वरिरष्ठ अति कारी या विवभागीय प्रमुख से विवश्वासी(न्यासी) क े रूप में ऐसी व्यविक्तग जानकारी को विवश्वास में रखने की उम्मीद की जा ी है, सिजसका उपयोग या खुलासा क े वल भी विकया जा सक ा है ज$ कम!चारी का आचरण या काय! विनयोक्ता क े खिलए प्रति क ू ल पाया जा ा है।"
66. अ ः एक विवश्वासी को ऐसा व्यविक्त माना जा सक ा है जो दूसरे क े विह की रक्षा करने क े क !व्य का भार ग्रहण कर ा है।वैश्वासिसक सं$ं एक दूसरे क े प्रति विवश्वास व्यक्त करने पर आ ारिर हो े हैं।वक्फ क े लाभाथn को वक्फ विवलेख क े अनुसार अति कार प्राप्त हो े हैं।. उद्देOय क हम दूसरे क े विह ों की रक्षा क े खिलए विकसी भी क !व्य को समाप्त करने में असमथ! हैं।विनस्संदेह यह कहा जा सक ा है विक चूंविक वक्फ में संपखि} ईश्वर में विनविह हो ी है, इसखिलए यह विवचार का विवर्षय है और विनस्संदेह काय! को इस रीक े से करने का नैति क क !व्य है विक वक्फ क े उद्देOय को पूरा विकया जाए।लेविकन लाभाथn एक न्यासी की रह नहीं है, जो न्यासी क े रूप में अपने चरिरत्र को ारण कर ा है, न्यासी क े रूप में अपने चरिरत्र को त्याग दे ा है और एक अति dमणकारी या पक्षद्रोही हक का दावा करने वाले व्यविक्त का रूप रख ले ा है है।भार ीय न्यास अति विनयम की ारा 14 इस प्रकार हैः "14. न्यासी को लाभाथn क े विह क े प्रति क ू ल स्वाविमत्व स्थाविप नहीं करना चाविहए- न्यासी को अपने खिलए या विकसी अन्य क े खिलए लाभाथn क े विह क े प्रति क ू ल न्यास संपखि} क े खिलए विकसी भी हक की स्थापना या सहाय ा नहीं करनी चाविहए।"
67. ऐसा नहीं है विक लाभाथn का विवdय से पहले विकसी भी क्षम ा में संपखि} पर कब्जा था।
68. वास् व में, इस मामले में, हम देख सक े हैं विक दूसरे विवdय में, पूव! मु वल्ली अथा! ्, कासिसम अली खान ने एक समझौ े और उप विनदेशक, चक$न्दी क े आदेश क े $ल पर विवdय विवलेख विकया, सिजसक े ह उन्होंने अपने अति कार में एक ति हाई अति कार रखने क े रूप में काय! करने का दावा विकया। हम इस $ा को ध्यान में रख े हैं विक इसमें कोई संदेह नहीं है विक श्रीविनवास (उपरोक्त) में इस न्यायालय ने जो प्रति पाविद विकया है, उसको ध्यान में रख े हुए, अनुच्छेद 96 की प्रयोज्य ा क े खिलए यह $हु कम मायने रख ा है विक अं रणक ा! वक्फ संपखि} को अपनी संपखि} होने का दावा कर े हुए हस् ां रण कर ा है।हिंक ु यह एक ऐसा मामला है जहां शून्य ा इस थ्य क े कारण उत्पन्न हो ी है विक सिजसे वक्फ संपखि} उद्देOय क पाया गया है उसे स्थायी वै ाविनक जनादेश क े विवपरी संdाम्य कर विदया गया है। हमने 1960 क े अति विनयम की ारा 69 और उसक े प्रभाव पर भी गौर विकया है।
69. यह क ! विक अति विनयम की ारा 107 अपीलक ा! को परिरसीमा की रोक को समाप्त करने में सहाय ा करेगी, हमें प्रभाविव नहीं कर ी।विनस्संदेह, अति विनयम की ारा 107 यह घोर्षणा कर ी है विक परिरसीमा अति विनयम, 1963 की कोई भी $ा विकसी वक्फ में शाविमल अचल संपखि} क े कब्जे या ऐसी संपखि} में विकसी विह क े कब्जे क े खिलए विकसी मुकदमे पर लागू नहीं होगी।
70. यह अति विनयम 01.01.1996 को प्रवृ} हुआ।पहला विवdय 14.10.1960 को विकया गया था।दूसरा विवdय 26.09.1974 को विकया गया।जहां क पहले विवdय का सं$ं है, हमने पहले ही पाया है विक अनुच्छेद 96 को लागू नहीं विकया जा सक ा है क्योंविक हस् ां रण मु ावल्ली द्वारा विकए जाने का ात्पय! नहीं था। अनुच्छेद 65 को लागू करने क े खिलए रास् ा खुला था।जहां क दूसरे विवdय का सं$ं है जो वर्ष! 1974 में प्रभावी हुई थी, हमारे इस विनष्कर्ष! क े मद्देनजर विक अनुच्छेद 96 लागू नहीं था, क े वल अनुच्छेद 65 ही स्वीक ृ ति क े योग्य प्र ी हो ा है।अनुच्छेद 65 को लागू करना और प्रति क ू ल कब्जा अं रण की ारीख से शुरू होगा, इसखिलए 12 साल की समाविप्त पर अथा! ् 1986 में परिरसीमा अति विनयम की ारा 27 को लागू करने से, जो भी हक ारा 65 क े अथ! में $ना रहा, समाप्त हो जाएगा।यह अति विनयम 01.01.1996 से प्रभावी हुआ था।हम ारा 107 क े अणिभप्राय को यह नहीं समझ सक े हैं विक यह एक विवलुप्त हक को पुनजnविव करेगा क्योंविक कानून क े ह दूसरे विवdय की ारीख से समय क े चलने(शुरू होने) क े रास् े में कोई भी $ा ा नहीं थी।
71. इसमें कोई संदेह नहीं है, परिरसीमन का कानून वही है जो वाद की ति णिथ पर प्रचखिल है (देखें सी. $ीपथुम्मा और अन्य $नाम वेलसारी शंकरनारायण उद्देOय क कदम$ोखिलथय और अन्य26 )। 1997 को ारीख क े रूप में मान े हुए, सिजस पर मुकदमा दायर विकया गया है और अति विनयम को लागू करना, जो वादी को परिरसीमा कानून की रोक हटाने में सक्षम $ना ा है, इसका म ल$ यह नहीं हो सक ा है विक जो पूव!व n कानून से समाप्त हो गया था, वह विफर से जीविव हो जाएगा।इस सं$ं में, हम टी. कखिलयामूर्ति (उपरोक्त) में इस न्यायालय क े विनण!य को ध्यान में रख े हैंः "40. इस पृष्ठभूविम में, आइए अ$ हम देखें विक क्या इस ारा का कोई भू लक्षी प्रभाव है।यह सुस्थाविप है विक विकसी भी कानून का यह अथ! नहीं लगाया जाएगा विक वह भू लक्षी प्रभाव से लागू है ज$ क विक उसकी भार्षा ऐसी न हो सिजसमें इस रह का विनष्कर्ष! विनकल ा हो।इस विनयम का अपवाद प्रविdया से सं$ंति कानून हैं।इसका अथ! यह होगा विक परिरसीमा विवति, एक प्रविdयात्मक विवति होने क े ना े, इस अथ! में भू लक्षी प्रभाव में है विक यह अति विनयमन क े समय लंवि$ काय!वाविहयों पर भी लागू होगा और उसक े $ाद शुरू हुई काय!वाविहयों पर भी लागू होगी, भले ही नए उप$ं ों क े लागू होने से पहले वाद हे ुक उत्पन्न हो गया हो। हालांविक, यह ध्यान विदया जाना चाविहए विक इस विनयम का भी एक महत्वपूण! अपवाद है।जहां नए प्राव ान क े लागू होने से पहले, उस समय लागू परिरसीमा कानून क े ह मुकदमा का अति कार वर्जिज है और एक विनविह अति कार दूसरे को प्राप्त हो गया है, ो नया प्राव ान वर्जिज अति कार को पुनजnविव नहीं कर सक ा है या अर्जिज विनविह अति कार को छीन नहीं सक ा है।"
72. यह क ! विदया गया है विक न्यायालय विकसी मुकदमे पर विवचार नहीं कर रहा है और मामला अति विनयम की ारा 52 क े ह काय!वाही से उत्पन्न हो ा है।यह
उद्देOय क क ! विदया गया है विक ारा 52 क े सं$ं में मुकदमे क े खिलए परिरसीमा का वज!न लागू नहीं हो ा है।हमने ध्यान विदया है विक उच्च न्यायालय में $हस मुख्य रूप से इस प्रश्न क े इद!-विगद! क ें विद्र थी विक क्या अनुच्छेद 96 लागू होगा और इसे लागू करने पर, अपीलक ा! अति विनयम की ारा 27 सपविठ अनुच्छेद 65 क े प्रभाव से $च सक ा है। हमने पाया है विक अनुच्छेद 96 लागू नहीं हो ी है।यहां क विक े ह विकसी काय!वाही क े सं$ं में चाहे वह ारा 52 हो, यविद कार!वाई विकए जाने की ारीख क, संपखि} का हक(स्वत्व) परिरसीमा अति विनयम की ारा 27 क े आ ार पर कब्जा रखने वाले व्यविक्त में विनविह था, ो उस अर्जिज विकए गए अति कार की अनदेखी करना स्वीकाय! नहीं हो सक ा।टी. कखिलयामूर्ति (उपरोक्त) का विनण!य थ्यों पर लागू होगा और कार!वाई वर्जिज है।
73. उपयु!क्त चचा! का परिरणाम यह है विक अपीलों में मेरिरट नहीं है और वे खारिरज हो जाऐंगी। पक्षकार अपने-अपने खच® को वहन करेंगे।...................................... [न्यायमूर्ति क े. एम. जोसेफ]................................ [न्यायमूर्ति ऋविर्षक े श रॉय] नई विदल्ली; विदनांकः 13 अप्रैल 2023 उद्देOय क