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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार
दीवानी अपील संख्या 4822/2022
(@विशेष अनुमति याचिका (दीवानी) संख्या 17539/2016)
मेसर्स सराफ एक्सपोर्ट्स ---- अपीलार्थी (गण)
बनाम
आयकर आयुक्त, जयपुर-III ----- प्रतिवादी (गण)
निर्णय
एम. आर. शाह, न्यायाधीश
JUDGMENT
1. राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर द्वारा दिनांक 04.02.2016 को 2014 की खंड पीठ आयकर अपील संख्या 7 में पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश जिसक े द्वारा उच्च न्यायालय ने राजस्व द्वारा दायर की गई उक्त अपील को स्वीकार किया है और यह अभिनिर्धारित किया है कि निर्धारिती ड्यूटी ड्रॉबैक स्कीम (जिसे इसक े बाद 'ड्यूटी ड्रॉबैक' कहा गया है) क े तहत प्राप्तियों क े संबंध में आयकर अधिनियम, 1961 (जिसे इसक े बाद "अधिनियम, 1961" कहा गया है) की धारा 80-IB क े तहत कटौती का हकदार नहीं है से व्यथित और असंतुष्ट होकर और ड्यूटी एन्टाइटलमेंट पास बुक स्कीम (जिसे इसमें इसक े बाद '' डीईपीबी '' कहा गया है) क े हस्तांतरण पर, निर्धारिती ने वर्तमान अपील प्रस्तुत की है।
2. संक्षेप में वर्तमान अपील क े लिए तथ्य इस प्रकार हैं:- 2.[1] निर्धारिती, एक साझेदारी फर्म, लकड़ी की हस्तशिल्प वस्तुओं क े निर्माण और निर्यात क े व्यवसाय में लगा हुआ था। निर्धारण वर्ष 2008-09 क े लिए, निर्धारिती ने 30.09.2008 को अपनी आय शून्य घोषित करते हुए अपनी विवरणी दाखिल की, जिसमें डीईपीबी क े खाते में 70,197/- रुपये और ड्यूटी ड्रॉबैक क े अंतर्गत प्राप्तियों क े खाते में 76,27,636/- रुपये की कटौती का दावा किया गया। 2.[2] निर्धारिती ने उपरोक्त राशियों की प्राप्तियों को लाभ और हानि खाते में जमा किया और अधिनियम, 1961 की धारा 28 (iiic) और 28 (iiib) क े तहत व्यवसाय या पेशे क े लाभ/अभिलाभ क े रूप में इसका दावा किया। निर्धारिती को अधिनियम, 1961 की धारा 143 (2) क े तहत एक नोटिस जारी किया गया था। 2.[3] दिनांक 24.11.2010 क े आदेश द्वारा, उपायुक्त ने कटौतियों को नामंजूर कर दिया जैसा कि दावा किया गया था। जैसा कि दावा किया गया है, छ ू ट को अस्वीकार करने वाले उपायुक्त क े आदेश को आयकर आयुक्त (अपील) द्वारा बरकरार रखा गया। हालांकि, आयकर अपीलीय अधिकरण (आईटीएटी) ने दिनांक 17.12.2013 क े आदेश द्वारा निर्धारिती द्वारा दायर की गई अपील स्वीकार की और यह पाया कि लिबर्टी इंडिया बनाम आयकर आयुक्त, (2009) 9 एससीसी 328: (2009) 317 आईटीआर 218 (एससी) क े मामले में इस न्यायालय का फ ै सला Per Incuriam (कानून या तथ्यों की उपेक्षा वाला) कहा जा सकता है और डीईपीबी योजना और ड्यूटी ड्रॉबैक योजना क े तहत राशि की प्राप्ति पर दावे क े अनुसार कटौती की अनुमति दी। 2.[4] आक्षेपित निर्णय और आदेश द्वारा तथा लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में इस न्यायालय क े निर्णय और आयकर आयुक्त, कर्नाटक बनाम स्टर्लिंग फ ू ड्स, मंगलोर (1999) 4 एस. सी. सी. 98 क े मामले में इस न्यायालय क े निर्णय पर भरोसा करते हुए उच्च न्यायालय ने राजस्व द्वारा की गई अपील को स्वीकार कर लिया है और अधिनियम, 1961 की धारा 80-IB क े अधीन दावा की गई कटौतियों को नामंजूर करते हुए उपायुक्त द्वारा पारित आदेश को बहाल कर दिया है। उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश वर्तमान अपील का विषय है। 3 निर्धारिती की ओर से पेश हुए विद्वान वकील ने आयकर आयुक्त बनाम मेघालय स्टील्स लिमिटेड, (2016) 6 एससीसी 747: (2016) 383 आईटीआर 217 (एससी), क े मामले मे इस न्यायालय क े निर्णय पर भरोसा किया है। 3.[1] यह कहा गया है की धारा 80-IB क े तहत "से व्युत्पन्न" का अर्थ जैसा कि लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) में निर्धारित किया गया, को मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क माननीय न्यायालय द्वारा विस्तृत कर दिया है। 3.[2] आगे यह कहा गया है कि लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) का निष्कर्ष इस निष्कर्ष पर आधारित है कि धारा 80-IB क े तहत 'से व्युत्पन्न' औद्योगिक उपक्रम क े व्यवसाय क े साथ एक 'प्रथम डिग्री' संबंध की आवश्यकता है, जबकि डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक का स्रोत शुल्क छ ू ट योजना/सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 75 क े तहत दिए गए प्रोत्साहन हैं।''प्रथम डिग्री' की कसौटी को लागू करते हुए, इस न्यायालय ने लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक से प्राप्तियों की धारा 80-IB क े तहत कटौती नहीं की जा सकती है। 3.[3] आगे यह कहा गया है कि बाद में, मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में, इस े समक्ष मुद्दा यह था कि क्या सरकार द्वारा अनुदत्त परिवहन, ब्याज और बिजली सब्सिडी धारा 80-IB क े तहत कटौती किए जाने की हकदार थी और इस माननीय न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि उपरोक्त सब्सिडी पर राशि की प्राप्तियां धारा 80-IB क े तहत कटौती किए जाने की हकदार थी। यह कहा गया है कि उपरोक्त मामले में, इस न्यायालय क े समक्ष, राजस्व ने यह तर्क देने क े लिए लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) पर भरोसा किया कि सब्सिडीज का स्रोत सरकार थी और इसलिए, इसे निर्धारिती क े साथ प्रत्यक्ष संबंध/करीबी संबंध क े रूप में नहीं माना जा सकता है। यह निवेदन किया गया कि, हालांकि, इस न्यायालय ने उक्त तर्क को खारिज कर दिया है और अभिनिर्धारित किया है कि यह तथ्य कि सरकार सब्सिडी का “तात्कालिक स्रोत” है, तब तक प्रासंगिक नहीं है जब तक कि सब्सिडी पूरी तरह या आंशिक रूप से प्रतिपूर्ति की जाती है, उत्पादों क े निर्माण या बिक्री में निर्धारिती द्वारा वास्तव में वहन की गई लागत, क्योंकि, धारा 80-IB में संदर्भित लाभ या अभिलाभ का अर्थ शुद्ध लाभ है, अर्थात, विनिर्माण लागत और बिक्री लागत की कटौती क े बाद प्राप्त लाभ। 3.[4] यह निवेदन किया गया है कि इस न्यायालय ने विनिर्दिष्ट रूप से धारा 28 (iii) (b) का अवलंब लिया और दोहराया कि किसी स्कीम क े अधीन निर्यात क े विरुद्ध सरकार से प्राप्त कोई नकद सहायता 'व्यवसाय या पेशे क े लाभ या अभिलाभ' शीर्ष क े अधीन आयकर से प्रभार्य है। कि इस न्यायालय ने आयकर आयुक्त बनाम धरम पाल प्रेमचंद लिमिटेड, (2009) 317 आईटीआर 353 (दिल्ली) क े मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय क े निर्णय को यह अभिनिर्धारित करते हुए अनुमोदित किया कि धारा 80-IB क े तहत कटौती का दावा करने क े उद्देश्य से व्यवसाय से व्युत्पन्न लाभ पर पहुंचने में उत्पाद शुल्क क े रिफ ं ड (वापसी) को अपवर्जित नहीं किया जाना चाहिए। 3.[5] आगे यह तर्क दिया गया है कि कि इसलिए, मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में इस न्यायालय द्वारा अधिकथित विधि को लागू करते हुए, धारा 80-IB क े अधीन अभिव्यक्ति "किसी व्यवसाय से व्युत्पन्न लाभ या अभिलाभ" मे लागत की कोई प्रतिपूर्ति शामिल होगी, भले ही ऐसे स्रोत की तत्काल प्रतिपूर्ति सरकार या उसकी नीति हो। 3.[6] निर्धारिती की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह निवेदन किया गया है कि टॉपमैन एक्सपोर्ट्स बनाम आयकर आयुक्त, मुंबई, (2012) 3 एस. सी. सी. 593 क े मामले में, यह अभिनिर्धारित किया गया है कि डीईपीबी/ड्यूटी ड्राबैक निर्माण की लागत से संबंधित हैं और आयात की लागत क े साथ इसका सीधा संबंध है। कि उक्त दृष्टिकोण बी. देसराज बनाम आयकर आयुक्त, सलेम, (2010) 14 एससीसी 510 क े मामले में पहले लिए गए दृष्टिकोण क े अनुरूप है, जिसमें यह अभिनिर्धारित किया गया था कि ड्यूटी ड्रॉबैक धारा 28 (iii) (b) क े तहत नकद सहायता की प्रक ृ ति में था। 3.[7] आगे यह निवेदन किया गया है कि टॉपमैन एक्सपोर्ट्स (पूर्वोक्त) क े मामले में, यह अभिनिर्धारित किया गया है कि डीईपीबी किसी निर्यातक को उसक े आयातों पर सीमा शुल्क का भुगतान करने क े लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता है और यह निर्यात किए जाने और डीईपीबी स्कीम क े अधीन आवेदन किए जाने क े पश्चात् प्राप्य है। इस न्यायालय ने यह भी अभिनिर्धारित किया है कि डीईपीबी में भी लागत का तत्व है क्योंकि इसे प्राप्त करने की लागत शून्य नहीं है क्योंकि इसे निर्यात उत्पाद की आयात सामग्री पर सीमा शुल्क का भुगतान करक े प्राप्त किया जाता है। यह तर्क दिया गया है कि टॉपमैन एक्सपोर्ट्स (पूर्वोक्त) क े निर्णय का बाद में एसीजी एसोसिएटेड क ै प्सूल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम आयकर आयुक्त, सेंट्रल-IV, मुंबई (2012) 3 एससीसी 321 विकास कालरा बनाम आयकर आयुक्त- VII, नई दिल्ली, (2012) 3 एससीसी 611 और निसान एक्सपोर्ट बनाम आयकर आयुक्त, (2014) 14 एससीसी 152 क े मामलों में अनुसरण किया गया है। 3.[8] यह तर्क दिया गया है कि, इसलिए, मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) और टॉपमैन एक्सपोर्ट्स (पूर्वोक्त) में विधि क े विकास को ध्यान में रखते हुए डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक धारा 80-IB की सीमा क े भीतर "किसी व्यवसाय से प्राप्त लाभ और अभिलाभ" हैं। 3.[9] निर्धारिती की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह प्रकथन किया गया है कि विभिन्न उच्च न्यायालयों ने यह दृष्टिकोण अपनाया है कि आय का '' तत्काल स्रोत '' निर्धारक नहीं है।
4. श्री बलबीर सिंह, विद्वान एएसजी ने वर्तमान अपील का विरोध करते हुए तर्क दिया है कि लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) और स्टर्लिंग फ ू ड्स, मंगलोर (पूर्वोक्त) क े फ ै सले क े दृष्टिकोण मे, वर्तमान अपील में शामिल मुद्दा, निर्धारिती क े खिलाफ पूरी तरह से कवर किया गया है। यह निवेदन किया गया है कि इसलिए, पूर्वोक्त दो निर्णयों में, इस माननीय े निर्णयों पर भरोसा करते हुए और उनका अनुसरण करते हुए, उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित करने में कोई त्रुटि नहीं की है कि निर्धारिती डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं क े माध्यम से प्राप्त राशि पर धारा 80-IB क े तहत कटौतियों का हकदार नहीं है। 4.[1] जहां तक मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े निर्णय पर निर्धारिती द्वारा किए गए भरोसे का संबंध है, यह निवेदन किया गया है कि मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में, इस न्यायालय ने लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) या स्टर्लिंग फ ू ड्स, मंगलोर (पूर्वोक्त) क े मामले में निर्णय से असहमति या अस्वीक ृ ति नहीं जताई है। यह निवेदन किया गया है कि अन्यथा भी, उक्त निर्णय डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं क े तहत राशि की प्राप्ति क े मामले में लागू नहीं होंगे क्योंकि इसे "व्यवसाय या पेशे क े लाभ और अभिलाभ" शीर्ष क े तहत आने वाली आय नहीं कहा जा सकता है। 4.[2] श्री बलबीर सिंह, विद्वान एएसजी ने हमें अधिनियम, 1961 की धारा 28 और धारा 80- IB की योजना से अवगत कराया। यह निवेदन किया गया है कि जहां तक धारा 28 का संबंध है, यह "व्यवसाय या पेशे क े लाभ और अभिलाभ" क े शीर्ष क े अंतर्गत आने वाली आय क े बारे में बात करती है। इससे पहले नकद सहायता, ड्यूटी ड्रॉबैक, डीईपीबी योजना क े हस्तांतरण पर लाभ क े रूप में सरकार से प्रोत्साहन क े माध्यम से प्राप्ति क े संबंध में विवाद हुआ करता था, कि क्या ये प्राप्तियां पूंजीगत प्राप्तियां थीं या राजस्व प्राप्तियां थीं और क्या ये कर योग्य होंगी। यह कि अनिश्चितता को विराम देने क े लिए, विधायिका ने धारा 28 में खंड (iiia), (iiib), (iiic), (iiid) और (iiie) अंतःस्थापित करक े उक्त प्रोत्साहनों को व्यवसाय या पेशे क े लाभ और अभिलाभ शीर्ष क े अधीन कर योग्य बना दिया है। 4.[3] आगे यह निवेदन किया गया है कि धारा 80-IB, अवसंरचनात्मक विकास उपक्रमों से भिन्न कतिपय 'औद्योगिक उपक्रमों' से लाभ और अभिलाभ की बाबत कटौतियों क े लिए उपबंध करती है। यह धारा निम्नलिखित औद्योगिक उपक्रमों पर लागू होती है जो उक्त धारा क े तहत कटौती क े लिए योग्य हैं:- क) विनिर्माण और उत्पादन में लघु उद्योग ख) औद्योगिक रूप से पिछड़े राज्य और पूर्वोत्तर क्षेत्र में उपक्रम ग) जहाज घ) होटल ड़) कोल्ड स्टोरेज प्लांट और कोल्ड चेन च) खनिज तेल और प्राक ृ तिक गैस छ) आवास परियोजनाएं ज) वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास झ) खाद्य पदार्थों का प्रसंस्करण, संरक्षण और पैक े जिंग ञ) मल्टीप्लेक्स थिएटर ट) कन्वेंशन सेंटर ठ) ग्रामीण और विशिष्ट क्षेत्रों में अस्पताल 4.[4] आगे यह निवेदन किया गया है कि कटौती की गणना क े संबंध में धारा 80-IB में उपयोग की गई भाषा क े अनुसार, कटौती निर्धारिती की क ु ल सकल आय में शामिल 'उल्लिखित किसी भी व्यवसाय से प्राप्त किसी भी लाभ और अभिलाभ' पर लागू होगी। उक्त धारा' की व्याख्या करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उपयोग किए गए शब्द हैं “से व्युत्पन्न” न कि “क े कारण (क े लिए जिम्मेदार)”। दिए गए खंड में" "क े लिए जिम्मेदार" "शब्दों को" "से व्युत्पन्न" "शब्दों क े विपरीत एक व्यापक अर्थ दिया गया है, जिनकी व्याख्या" "प्रथम डिग्री स्रोतों" "तक सीमित होने क े रूप में की गई है। यह निवेदन किया गया है कि 'से व्युत्पन्न' शब्दों की एक सीमित व्याख्या की गई है। 4.[5] यह तर्क दिया गया है कि धारा 80-IB में प्रयुक्त '' से व्युत्पन्न '' अर्थ को इकाई विनिर्दिष्ट पढ़ा जाना चाहिए और इसे ''स्वतंत्र' रूप से" नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि धारा 80-IB क े खंड में प्रयुक्त शब्द '' औद्योगिक उपक्रम '' हैं। इसलिए, मुख्य मुद्दा अधिनियम की धारा 80-IB में 'से व्युत्पन्न' शब्दों की व्याख्या से संबंधित है। यह निवेदन किया गया है कि धारा 80-IB सपठित धारा 28 क े उचित अध्ययन पर और धारा 80-IB की सही व्याख्या पर, डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं को व्यवसाय उपक्रम से आय प्राप्त करने वाला नहीं कहा जा सकता है और इसलिए, ड्यूटी ड्रॉबैक की ऐसी प्राप्ति पर धारा 80-IB क े तहत कटौती स्वीकार्य नहीं होगी। 4.[6] यह निवेदन किया गया है कि स्टर्लिंग फ ू ड्स, मैंगलोर (पूर्वोक्त) क े मामले में, इस मुद्दे पर निर्णय देते हुए कि क्या क ें द्र सरकार की निर्यात संवर्धन योजना क े तहत आयात पात्रता की कमाई पर, धारा 80 एचएच क े तहत कटौती की अनुमति होगी या नहीं, इस न्यायालय ने धारा 80 एचएच में उपयोग किए गए शब्दों "से व्युत्पन्न" को एक सीमित व्याख्या दी और यह पाया गया कि चूंकि 'से व्युत्पन्न' शब्दों का उपयोग किया गया है, इसलिए यह ऐसे लाभ और अभिलाभ क े स्रोत पर जाने का सुझाव देगा। 4.[7] यह निवेदन किया गया है कि लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में, इस न्यायालय ने "से व्युत्पन्न" लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौती पर विस्तार से विचार किया है। उक्त निर्णय में, इस न्यायालय ने डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक पर चर्चा की है और उसक े बाद यह अभिनिर्धारित किया है कि, ड्यूटी ड्रॉबैक और डीईपीबी लाभों को, धारा 80-IB क े उद्देश्य क े लिए, डेबिट की गई वस्तुओं क े निर्माण की लागत क े खिलाफ, लाभ और हानि खाते में क्र े डिट नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस तरह की छ ू ट, लाभ और औद्योगिक उपक्रम क े बीच प्रथम डिग्री संबंध से परे आय क े स्वतंत्र स्रोत का गठन करेगा। 4.[8] जहां तक मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क निर्धारिती द्वारा किए गए भरोसे का संबंध है, यह निवेदन किया गया है कि मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) में प्रश्न तीन सब्सिडियों से संबंधित था, अर्थात् क) परिवहन सब्सिडी, ख) ब्याज सब्सिडी और ग) विद्युत सब्सिडी।इस न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि चूंकि ये सब्सिडी सीधे विनिर्माण की लागत को प्रभावित करती हैं, इसलिए उनका उपक्रम क े लाभ और अभिलाभ क े बीच सीधा संबंध है। चूंकि इन सब्सिडी का सीधा संबंध है, इसलिए उन्हें औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त किया जा सकता है। यह निवेदन किया गया है कि यद्यपि उक्त निर्णय में, इस न्यायालय ने लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में निर्णय को कानून की दृष्टि से खराब नहीं ठहराया है, पैरा 20 में, इस न्यायालय ने यह भी कहा है कि चूंकि कोई निर्यात नहीं है, इसलिए डीईपीबी की कोई पात्रता नहीं है। इसलिए, भारत क े भीतर किसी उत्पाद क े निर्माण और/या बिक्री से इसका संबंध निकटतम या प्रत्यक्ष नहीं है, बल्कि एक कदम दूर है। यह पाया गया है कि डीईपीबी पात्रता क े पीछे का उद्देश्य, जैसा कि इस न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है, निर्यात उत्पाद की आयात सामग्री पर सीमा शुल्क भुगतान की घटनाओं को तटस्थ करना है। ऐसे परिदृश्य में, यह नहीं कहा जा सकता है कि इस तरह की शुल्क छ ू ट योजना औद्योगिक उपक्रम या व्यवसाय द्वारा किए गए लाभ और अभिलाभ से प्राप्त की गई है। यह निवेदन किया गया है कि, इसलिए, उपरोक्त क े आलोक में, मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में लिया गया निर्णय वर्तमान मामले में लागू नहीं होगा क्योंकि यह क े वल उपरोक्त सब्सिडी से संबंधित है। आगे यह निवेदन किया गया है कि यद्यपि बाध्यकारी होने क े बावजूद, आईटीएटी ने लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) और स्टर्लिंग फ े मामले में इस न्यायालय क े निर्णयों का अनुसरण नहीं किया और इसलिए उच्च न्यायालय ने लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) और स्टर्लिंग फ े निर्णयों क े अनुसरण में आईटीएटी द्वारा पारित आदेश को न्यायोचित रूप से रद्द कर दिया है। यह निवेदन किया गया है कि इसलिए, उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। 4.[9] उपर्युक्त तर्क देते हुए, यह प्रार्थना की जाती है कि वर्तमान अपील को खारिज कर दिया जाए।
5. संबंधित पक्षों क े विद्वान अधिवक्ताओं को विस्तार से सुना।
6. संक्षिप्त प्रश्न, जो इस न्यायालय क े विचारार्थ रखा गया है, यह हैः - क्या डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं से प्राप्त आय/लाभ पर, निर्धारिती, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80-IB क े तहत कटौती का हकदार है और क्या ऐसी आय को औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त आय कहा जा सकता है?
7. उपर्युक्त मुद्दे/प्रश्न पर विचार करते समय, धारा 28 और धारा 80-IB क े प्रासंगिक भाग को संदर्भित किए जाने की आवश्यकता है, जो निम्नलिखित हैं: - "28. व्यवसाय या पेशे से लाभ तथा अभिलाभ:- निम्नलिखित आय" "व्यवसाय या पेशे से लाभ तथा अभिलाभ" "शीर्ष क े तहत आयकर क े लिए प्रभार्य होगी-" XXXXXXXX (iii क) आयात और निर्यात (नियंत्रण) अधिनियम, 1947 (18/1947) क े अधीन किए गए आयात (नियंत्रण) आदेश, 1955 क े अधीन स्वीक ृ त किए गए लाइसेंस की बिक्री पर लाभ। (iii ख) भारत सरकार की किसी योजना क े अंतर्गत निर्यात क े विरूद्ध किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त या प्राप्य नकद सहायता (चाहे जिस नाम से हो)। (iii ग) सीमा शुल्क और क ें द्रीय उत्पाद शुल्क वापसी नियम, 1971 क े तहत निर्यात क े खिलाफ किसी भी व्यक्ति को वापसी क े रूप में चुकाया गया या देय सीमा शुल्क या उत्पाद शुल्क। (iii घ) विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992 (22/1992) की धारा 5 क े अधीन तैयार और घोषित निर्यात और आयात नीति क े अधीन ड्यूटी एन्टाइटलमेंट पास बुक स्कीम, जो ड्यूटी रिमिशन स्कीम है, क े अंतरण पर कोई लाभ। (iii-ड) विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992 (22/1992) की धारा 5 क े अधीन तैयार और घोषित निर्यात और आयात नीति क े अधीन शुल्क मुक्त पुनःपूर्ति प्रमाणपत्र, जो ड्यूटी रिमिशन स्कीम है, क े अंतरण पर कोई लाभ। XXXXXXXX 80 -IB. अवसंरचना विकास उपक्रमों से भिन्न कतिपय औद्योगिक उपक्रमों से लाभ और अभिलाभ की बाबत कटौती: - 1) जहां किसी निर्धारिती की क ु ल सकल आय मे, उपखंड (3) से उपखंड (11), (11-A) और (11B) में निर्दिष्ट किसी व्यवसाय से व्युत्पन्न कोई लाभ और अभिलाभ (ऐसे कारोबार को इसमें इसक े पश्चात् पात्र व्यवसाय कहा गया है) सम्मिलित है, वहां, निर्धारिती की क ु ल आय की संगणना करने में, इस खंड क े उपबंधों क े अनुसार और उनक े अधीन रहते हुए, ऐसे लाभ और अभिलाभ की रकम में से ऐसे प्रतिशत क े बराबर और इस खंड में विनिर्दिष्ट निर्धारण वर्षों की ऐसी संख्या क े लिए कटौती अनुज्ञात की जाएगी। 2) यह धारा किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम को लागू होती है जो निम्नलिखित सभी शर्तों को पूरा करता है, अर्थात्ः - (I) इसका गठन पहले से विद्यमान किसी व्यवसाय क े विभाजन या पुनर्निर्माण द्वारा नहीं किया गया हैः बशर्ते, यह शर्त किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम क े संबंध में लागू नहीं होगी जो किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम क े निर्धारिती द्वारा पुनर्स्थापन, पुनर्निर्माण या पुनरुद्धार क े परिणामस्वरूप बनाया गया है जैसा कि धारा 33- बी में संदर्भित है, उन परिस्थितियों में और उस धारा में निर्दिष्ट अवधि क े भीतर; (ii) इसका गठन पहले किसी प्रयोजन क े लिए प्रयुक्त मशीनरी या संयंत्र क े नए व्यवसाय क े अंतरण द्वारा नहीं किया गया है। (iii) यह किसी वस्तु या चीज का विनिर्माण या उत्पादन करता है, जो ग्यारहवीं अनुसूची की सूची में विनिर्दिष्ट वस्तु या चीज नहीं है, या भारत क े किसी भाग में एक या अधिक शीत भंडारण संयंत्र या संयंत्रों का प्रचालन करता हैः बशर्ते, इस खंड की शर्त, उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी लघु औद्योगिक उपक्रम या किसी औद्योगिक उपक्रम क े संबंध में इस प्रकार लागू होगी मानो 'ग्यारहवीं अनुसूची की सूची में निर्दिष्ट कोई वस्तु या वस्तु नहीं होने' शब्दों को छोड़ दिया गया हो। स्पष्टीकरण 1. –खंड (ii) क े प्रयोजनों क े लिए, निर्धारिती क े अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भारत क े बाहर उपयोग की गई कोई भी मशीनरी या संयंत्र को किसी भी उद्देश्य क े लिए पहले इस्तेमाल की गई मशीनरी या संयंत्र क े रूप में नहीं माना जाएगा, यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाती हैं, अर्थात्ः– (क) ऐसी मशीनरी या संयंत्र का निर्धारिती द्वारा अधिष्ठापन की तारीख से पूर्व किसी भी समय भारत में उपयोग नहीं किया गया था। (ख) ऐसी मशीनरी या संयंत्र को भारत से बाहर किसी देश से भारत में आयात किया जाता है और (ग) निर्धारिती द्वारा मशीनरी या संयंत्र क े अधिष्ठापन की तारीख से पूर्व किसी अवधि क े लिए किसी व्यक्ति की क ु ल आय की संगणना करने में इस अधिनियम क े उपबंधों क े अधीन ऐसी मशीनरी या संयंत्र की बाबत अवक्षय क े कारण कोई कटौती अनुज्ञात नहीं की गई है या अनुज्ञेय नहीं है। स्पष्टीकरण 2. –जहां किसी औद्योगिक उपक्रम की दशा में, किसी प्रयोजन क े लिए पूर्व में प्रयुक्त कोई मशीनरी या संयंत्र या उसका कोई भाग किसी नए व्यवसाय को अंतरित किया जाता है और इस प्रकार अंतरित मशीनरी या संयंत्र या उसक े भाग का क ु ल मूल्य उस व्यवसाय में प्रयुक्त मशीनरी या संयंत्र क े क ु ल मूल्य क े बीस प्रतिशत से अधिक नहीं होता है, वहां इस उप-धारा क े खंड (ii) क े लिए उसमें विनिर्दिष्ट शर्त का अनुपालन किया गया समझा जाएगा। (iv) ऐसे मामले में जहां औद्योगिक उपक्रम वस्तुओं या चीजों का विनिर्माण या उत्पादन करता है, उपक्रम बिजली की सहायता से की जाने वाली विनिर्माण प्रक्रिया में दस या अधिक कामगारों को रोजगार देता है या बिजली की सहायता क े बिना की जाने वाली विनिर्माण प्रक्रिया में बीस या अधिक कामगारों को रोजगार देता है। (3) किसी औद्योगिक उपक्रम की दशा में कटौती की राशि निम्नलिखित शर्तों की पूर्ति क े अधीन रहते हुए, प्रारंभिक निर्धारण वर्ष से प्रारंभ होने वाले दस क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों (या बारह क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों में जहां निर्धारिती सहकारी सोसाइटी है) की अवधि क े लिए ऐसे औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त लाभों और अभिलाभों का पच्चीस प्रतिशत (या तीस प्रतिशत जहाँ निर्धारिती एक क ं पनी है) होगी, अर्थात्:– (i) यह किसी भी समय, 1 अप्रैल, 1991 से आरंभ होने वाली और 31 मार्च, 1995 को समाप्त होने वाली अवधि क े दौरान या ऐसी अतिरिक्त अवधि क े दौरान, जो क े न्द्रीय सरकार, सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी विशिष्ट उपक्रम क े संदर्भ में विनिर्दिष्ट करे, विनिर्माण या उत्पादन, वस्तुओं या चीजों का या ऐसे संयंत्र या संयंत्रों का प्रचालन आरंभ करती है। (ii) जहां वह लघु औद्योगिक उपक्रम वाला औद्योगिक उपक्रम है, वहां वह 1 अप्रैल, 1995 को प्रारंभ होने वाली और 31 मार्च, 2002 को समाप्त होने वाली अवधि क े दौरान किसी भी समय वस्तुओं या चीजों का विनिर्माण या उत्पादन या अपने शीतागार संयंत्र का प्रचालन प्रारंभ करता है, जो उप-धारा (4) या उप-धारा (5) में विनिर्दिष्ट नहीं है। (4) आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट औद्योगिक रूप से पिछड़े राज्य में किसी औद्योगिक उपक्रम की दशा में कटौती की रकम आरंभिक निर्धारण वर्ष से आरंभ होने वाले पांच निर्धारण वर्षों क े लिए ऐसे औद्योगिक उपक्रम से व्युत्पन्न लाभों और अभिलाभों का सौ प्रतिशत और तत्पश्चात् ऐसे औद्योगिक उपक्रम से व्युत्पन्न लाभों और अभिलाभों का पच्चीस प्रतिशत (या जहां निर्धारिती क ं पनी है वहां तीस प्रतिशत) होगी: बशर्ते कि कटौती की क ु ल अवधि दस क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों (या लगातार बारह निर्धारण वर्षों जहां निर्धारिती एक सहकारी समिति है) से अधिक न हो, इस शर्त को पूरा करने क े अधीन रहते हुए कि वह 1 अप्रैल, 1993 को आरंभ होने वाली और 31 मार्च, 2004 को समाप्त होने वाली अवधि क े दौरान वस्तुओं या चीजों का विनिर्माण या उत्पादन या अपने शीतागार संयंत्र या संयंत्रों का प्रचालन आरंभ करती हैः बशर्ते कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में ऐसे उद्योगों की दशा में, जिन्हें क े न्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए, कटौती की राशि दस निर्धारण वर्षों की अवधि क े लिए लाभ और अभिलाभ का शत-प्रतिशत होगी और ऐसे मामले में कटौती की क ु ल अवधि दस निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं होगीः बशर्ते कि धारा 80 IC की उप धारा (2) में निर्दिष्ट किसी उपक्रम या उद्यम को इस उप धारा क े अधीन 1 अप्रैल, 2004 को आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पश्चात्वर्ती वर्ष क े लिए कोई कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी। बशर्ते कि जम्मू-कश्मीर राज्य में किसी औद्योगिक उपक्रम की दशा में, पहले परंतुक क े उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो '' 31 मार्च, 2004 '' अंकों, अक्षरों और शब्दों क े स्थान पर ''31 मार्च, 2012'' अंकों, अक्षरों और शब्दों को रख दिया गया हो; बशर्ते कि इस उप धारा क े अधीन जम्मू-कश्मीर राज्य क े किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम को, जो तेरहवीं अनुसूची क े भाग C में विनिर्दिष्ट किसी वस्तु या चीज क े विनिर्माण या उत्पादन में लगा हुआ है, कोई कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी। (5) ऐसे औद्योगिक रूप से पिछड़े जिलों जो क े न्द्रीय सरकार, सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट विहित दिशा निर्देशों को ध्यान में रखते हुए, 'क' श्रेणी क े औद्योगिक रूप से पिछड़े जिले या 'ख' श्रेणी क े औद्योगिक रूप से पिछड़े जिले क े रूप में इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, में अवस्थित किसी औद्योगिक उपक्रम की दशा में कटौती की रकम निम्नलिखित होगी - (i) आरंभिक निर्धारण वर्ष से आरंभ होने वाले पांच निर्धारण वर्षों क े लिए 'क' श्रेणी क े पिछड़े जिले में अवस्थित किसी औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त लाभों और अभिलाभों का शत-प्रतिशत और तत्पश्चात् किसी औद्योगिक उपक्रम क े लाभों और अभिलाभों का पच्चीस प्रतिशत (या जहां निर्धारिती क ं पनी है वहां तीस प्रतिशत): ु ल अवधि दस क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों से या जहां निर्धारिती सहकारी सोसाइटी है वहां बारह क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं होगीः बशर्ते कि औद्योगिक उपक्रम 1 अक्टूबर, 1994 को आरंभ होने वाली और 31 मार्च, 2004 को समाप्त होने वाली अवधि क े दौरान किसी भी समय वस्तुओं या चीजों का विनिर्माण या उत्पादन या अपने शीतागार संयंत्र या संयंत्रों का प्रचालन आरंभ करता है। (ii) आरंभिक निर्धारण वर्ष से आरंभ होने वाले तीन निर्धारण वर्षों क े लिए 'ख' श्रेणी क े पिछड़े जिले में अवस्थित किसी औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त लाभों और अभिलाभों का शत-प्रतिशत और तत्पश्चात् किसी औद्योगिक उपक्रम क े लाभों और अभिलाभों का पच्चीस प्रतिशत (या जहां निर्धारिती क ं पनी है वहां तीस प्रतिशत): ु ल अवधि आठ क्रमवर्ती मूल्यांकन वर्षों से अधिक न हो (या जहां निर्धारिती एक सहकारी समिति है, बारह क्रमवर्ती मूल्यांकन वर्ष): बशर्ते कि औद्योगिक उपक्रम 1 अक्टूबर, 1994 को आरंभ होने वाली और 31 मार्च, 2004 को समाप्त होने वाली अवधि क े दौरान किसी भी समय वस्तुओं या चीजों का विनिर्माण या उत्पादन या अपने शीतागार संयंत्र या संयंत्रों का प्रचालन आरंभ करता है। XXXXXXXX
7. 1 इस प्रकार,धारा 28(iiid) और (iiie) क े अनुसार, ड्यूटी ड्रॉबैक क े हस्तांतरण और डीईपीबी योजनाओं आदि क े हस्तांतरण पर कोई भी लाभ 'व्यवसाय या पेशे क े लाभ और अभिलाभ' शीर्ष क े तहत आयकर क े लिए प्रभार्य होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि पहले नकद सहायता, ड्यूटी ड्रॉबैक, डीईपीबी योजना क े हस्तांतरण पर लाभ आदि क े रूप में सरकार से प्रोत्साहन क े रूप में प्राप्ति क े बारे में विवाद हुआ करता था, यानी कि क्या ये प्राप्तियां पूंजीगत प्राप्ति या राजस्व प्राप्ति थीं और इस प्रकार, कर योग्य होंगी। हालांकि, इसक े बाद, विवाद को विराम देने क े लिए, विधायिका ने खंड 28 (iiia), (iiib), (iiiic), (iiid) और (iiie)) को शामिल करक े उक्त प्रोत्साहनों को 'व्यवसाय और पेशे क े लाभ और अभिलाभ' शीर्ष क े तहत कर योग्य बनाया है। 7.[2] धारा 80-IB कतिपय औद्योगिक उपक्रमों से लाभ और अभिलाभ की बाबत कटौतियों का उपबंध करती है। इसलिए, धारा 80- IB क े तहत कटौती का दावा करने क े लिए, यह धारा 80-IB में उल्लिखित औद्योगिक उपक्रमों से प्राप्त "लाभ और अभिलाभ" पर होना चाहिए। इस न्यायालय द्वारा लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में, एक समान प्रश्न पर विचार किया गया और विशेष रूप से डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं से लाभ क े संबंध में। 7.[3] डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं पर विचार करने क े बाद लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में अंततः यह पाया गया और अभिनिर्धारित किया गया कि डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक योजनायें ऐसे प्रोत्साहन हैं जो क ें द्र सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं से या सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 75 से आते हैं और इसलिए, प्रोत्साहन लाभ धारा 80-IB क े तहत पात्र व्यवसाय से प्राप्त लाभ नहीं हैं। यह देखा गया है कि वे ऐसे उपक्रमों क े सहायक लाभों की श्रेणी में आते हैं। 7.[4] इसी प्रकार का विचार ड्यूटी ड्रॉबैक क े संबंध में भी व्यक्त किया गया था।इसक े बाद उपर्युक्त निर्णय क े पैराग्राफ 43 में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि धारा 80-IA/80-IB क े उद्देश्यों क े लिए लाभ और हानि खाते में डेबिट की गई वस्तुओं क े खिलाफ ड्यूटी ड्रॉबैक, डीईपीबी लाभ, छ ू ट आदि को जमा नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस तरह की छ ू ट (क्र े डिट) लाभ और औद्योगिक उपक्रम क े बीच प्रथम डिग्री संबंध से परे आय क े एक स्वतंत्र स्रोत का गठन करेगा। इस प्रकार, यह अभिनिर्धारित किया गया है कि ड्यूटी ड्रॉबैक प्राप्तियां/डीईपीबी लाभ, अधिनियम, 1961 की धारा 80-IB क े प्रयोजन क े लिए पात्र औद्योगिक उपक्रमों क े शुद्ध लाभ का हिस्सा नहीं हैं। प्रासंगिक चर्चाएं पैराग्राफ 24,28 से 36, 38, 39, 41, 43 और 45 में हैं, जो निम्नलिखित हैं:- “24. धारा 80-IB का विश्लेषण करने से पहले, एक प्रस्तावनात्मक टिप्पणी क े रूप में, यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 1961 क े अधिनियम में मोटे तौर पर दो प्रकार क े कर प्रोत्साहनों का प्रावधान है, अर्थात् निवेश से जुड़े प्रोत्साहन और लाभ से जुड़े प्रोत्साहन। अध्याय VI-A जो कर कटौतियों क े रूप में प्रोत्साहनों का प्रावधान करता है, अनिवार्य रूप से लाभ से जुड़े प्रोत्साहनों की श्रेणी में आता है।इसलिए, जब धारा 80-IA/80-IB पात्र व्यवसाय से व्युत्पन्न लाभ का उल्लेख करती है, तो यह उस व्यवसाय का स्वामित्व नहीं है जो प्रोत्साहनों को आकर्षित करता है। धारा 80-आईए/80-IB क े तहत जो बात प्रोत्साहन को आकर्षित करती है वह लाभ (प्रचालन लाभ) का उत्पादन है। XXXXXXXX
28. मामलों क े वर्तमान समूह में, निर्धारण क े लिए जो विवाद उठता है वह यह हैः क्या डीईपीबी क्र े डिट/ड्यूटी ड्रॉबैक प्राप्ति प्रथम डिग्री स्रोतों क े भीतर आती है ?
29. निर्धारिती(ओं) क े अनुसार, डीईपीबी क्र े डिट/ड्यूटी ड्रॉबैक प्राप्ति, खरीद (लागत तटस्थता) क े मूल्य को कम कर देती है, इसलिए यह प्रथम डिग्री स्रोत क े भीतर आती है क्योंकि यह शुद्ध लाभ को आनुपातिक रूप से बढ़ाती है।
30. दूसरी ओर, विभाग क े अनुसार, डीईपीबी क्र े डिट/ड्यूटी ड्रॉबैक प्राप्ति प्रथम डिग्री स्रोत क े भीतर नहीं आती है क्योंकि उक्त प्रोत्साहन भारत सरकार द्वारा अधिनियमित प्रोत्साहन योजनाओं या सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 75 से आती है। इसलिए, विभाग क े अनुसार, वर्तमान मामलों में, प्रथम डिग्री स्रोत सीमा शुल्क अधिनियम की प्रोत्साहन योजना/प्रावधान है। इस संबंध में विभाग, स्टर्लिंग फ ू ड्स [(1999) 4 एससीसी 98:(1999) 237 आईटीआर 579] मामले में इस न्यायालय क े निर्णय पर अत्यधिक भरोसा करता है।
31. इसलिए, वर्तमान मामलों में, जिसमें हमें एक औद्योगिक उपक्रम क े पात्र व्यवसाय की जांच करने की आवश्यकता है, हमें विनिर्माण क े लाभ क े स्रोत का पता लगाने की आवश्यकता है।(देखें सीआईटी बनाम किर्लोस्कर ऑयल इंजिन लिमिटेड [(1986) 157 आईटीआर 762 (बॉम)]
32. धारा 80-IA/80-IB क े अपने विश्लेषण को जारी रखते हुए यह उल्लेख किया जा सकता है कि धारा 80-IB की उप-धारा (13) धारा, 80 IA की उप-धारा (5) और उप-धारा (7) से (12) क े प्रावधानों की प्रयोज्यता प्रदान करती है, जहाँ तक हो सकता है, धारा 80-IB क े तहत पात्र व्यवसाय क े लिए लागू। इसलिए, आरंभ में, हमने कहा कि एक सामान्य योजना क े रूप में धारा 80-I, 80-IA और 80-IB को पढ़ने की आवश्यकता है।
33. धारा 80-IA की उप-धारा (5) क े अवलोकन पर यह देखा गया है कि इसमें किसी पात्र व्यवसाय क े लाभ की संगणना करने की रीति का उपबंध किया गया है। तदनुसार, ऐसे लाभों की गणना इस प्रकार की जानी चाहिए मानो ऐसा पात्र व्यवसाय ही निर्धारिती की आय का एकमात्र स्रोत हो। अतः, पात्र व्यवसाय क े लाभों को कम करने या बढ़ाने क े लिए अपनाई गई युक्तियों को नामंजूर किया जाना चाहिए, धारा 80-IA की उप-धारा (5) क े सबसे महत्वपूर्ण उपबंधों को ध्यान में रखते हुए जिन्हें धारा 80-IB में भी पढ़ा जाना आवश्यक है [धारा 80-IB(13) देखें]। हम दोहरा सकते हैं कि धारा 80-I, 80-IA और 80-IB में एक सामान्य योजना है और यदि ऐसा है तो यह स्पष्ट है कि उक्त धाराओं में कटौतियों क े रूप में प्रोत्साहनों का प्रावधान है जो लाभ से जुड़े हैं न कि निवेश से।
34. धारा 80-IA और 80-IB क े विश्लेषण पर यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी औद्योगिक उपक्रम, जो उप-धारा (2) को पूरी करने पर पात्र हो जाता है, निर्दिष्ट तिथि (तारीखों) क े बाद ऐसे औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त लाभ की सीमा तक ही उप-धारा (1) क े तहत कटौती क े हकदार होंगे। इसलिए, पात्रता क े अलावा, उपधारा (1) लाभ क े एक निर्दिष्ट प्रतिशत तक कटौती की मात्रा को सीमित करने का अभिप्राय रखती है। यह ""औद्योगिक उपक्रम क े कारण लाभ"" क े विपरीत "औद्योगिक उपक्रम से व्युत्पन्न" शब्दों का महत्व है।
35. डीईपीबी एक प्रोत्साहन है। यह शुल्क छ ू ट योजना क े तहत दिया जाता है। मूल रूप से, यह एक निर्यात प्रोत्साहन है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि डीईपीबी का उद्देश्य निर्यात उत्पाद की आयात सामग्री पर सीमा शुल्क भुगतान की घटनाओं को तटस्थ करना है। यह तटस्थता निर्यात उत्पाद क े खिलाफ सीमा शुल्क को क्र े डिट द्वारा प्रदान की जाती है। डीईपीबी क े तहत, कोई निर्यातक मुक्त रूप से परिवर्तनीय मुद्रा में किए गए निर्यात क े एफओबी मूल्य क े प्रतिशत क े रूप में साख क े लिए आवेदन कर सकता है। साख क े वल निर्यात उत्पाद क े लिए और कच्चे माल, घटकों आदि क े आयात क े लिए डीजीएफटी द्वारा निर्दिष्ट दरों पर उपलब्ध है। इस योजना क े तहत डीईपीबी क्र े डिट की गणना, बुनियादी सीमा शुल्क और इस तरह क े डीम्ड आयात पर देय विशेष अतिरिक्त शुल्क क े अनुसार निर्यात उत्पाद की डीम्ड आयात सामग्री को ध्यान में रखकर की जानी है।
36. इसलिए, हमारे विचार में, डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक वे प्रोत्साहन हैं जो क ें द्र सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं से या सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 75 से आते हैं। इसलिए, प्रोत्साहन लाभ धारा 80-IB क े तहत पात्र व्यवसाय से प्राप्त लाभ नहीं हैं। वे ऐसे उपक्रमों क े सहायक लाभों की श्रेणी में आते हैं। XXXXXXXX
38. सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 75 और क े न्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 37, भारत सरकार को किसी निर्धारिती द्वारा अदा किए गए सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क क े पुनर्भुगतान का प्रावधान करने क े लिए सशक्त करती है। रिफ ं ड (वापसी), किसी विशेष वर्ग की सामग्री या निर्दिष्ट वर्ग क े निर्यात वस्तुओं क े निर्माण में उपयोग की जाने वाली वस्तुओं क े विवरण पर शुल्क की औसत राशि का भुगतान है। नियमों में, किसी आयातक-सह- निर्माता द्वारा वास्तव में अदा की गई सीमा शुल्क या क ें द्रीय उत्पाद शुल्क क े अंकगणितीय रूप क े बराबर राशि क े रिफ ं ड (वापसी) की परिकल्पना नहीं की गई है। सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 75 की उप-धारा (2) में किसी विशेष व्यापार में प्रचलित सभी परिस्थितियों पर विचार करने और आयातित माल क े विभिन्न वर्गों में से प्रत्येक क े संबंध में प्रासंगिक तथ्यों की स्थिति क े आधार पर, ड्रॉबैक की राशि निर्धारित करने की आवश्यकता है। मूल रूप से, ड्यूटी ड्रॉबैक प्राप्ति का स्रोत सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 75 और क ें द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 37 मे निहित है।
39. ड्यूटी ड्रॉबैक और डीईपीबी की छ ू ट की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए, हम संतुष्ट हैं कि शुल्क की छ ू ट, भारत सरकार द्वारा बनाए गए सीमा शुल्क अधिनियम/योजनाओं में वैधानिक/नीतिगत प्रावधानों क े कारण है। इन परिस्थितियों में, हम मानते हैं कि इस तरह क े प्रोत्साहनों क े माध्यम से प्राप्त लाभ, धारा 80-IB में 'औद्योगिक उपक्रम से व्युत्पन्न लाभ' की अभिव्यक्ति क े भीतर नहीं आते हैं। XXXXXXXX
41. खरीद की लागत में शुल्क और कर (कर अधिकारियों से उद्यम द्वारा बाद में वसूल किए जाने वाले करों को छोड़कर), आंतरिक भाड़ा और अन्य व्यय शामिल हैं, अधिग्रहण क े लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। इसलिए खरीद की लागत निर्धारित करने में व्यापार छ ू ट, छ ू ट, ड्यूटी ड्रॉबैक और इसी तरह की वस्तुओं की कटौती की जाती है। इसलिए ड्यूटी ड्रॉबैक, छ ू ट आदि को वस्तुओं की खरीद या विनिर्माण की लागत क े समायोजन (जमा) क े रूप में नहीं माना जाना चाहिए। उन्हें राजस्व या आय की अलग-अलग मदों क े रूप में माना जाना चाहिए और तदनुसार उनका लेखा-जोखा रखा जाना चाहिए। (डॉल्फी डिसूजा द्वारा भारतीय लेखांकन मानक और जीएएपी का पृष्ठ 44 देखें)। XXXXXXXX 43 इसलिए, हमारा विचार है कि धारा 80-IA/80-IB क े उद्देश्यों क े लिए लाभ और हानि खाते में डेबिट किए गए माल क े खिलाफ ड्यूटी ड्रॉबैक, डीईपीबी लाभ, छ ू ट आदि को जमा नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस तरह की छ ू ट (क्र े डिट) लाभ और औद्योगिक उपक्रम क े बीच प्रथम डिग्री संबंध से परे आय क े स्वतंत्र स्रोत का गठन करेगा। XXXXXXXX
45. इन परिस्थितियों में, हम यह अभिनिर्धारित करते हैं कि 1961 क े अधिनियम की धारा 80I/80IA/80IB क े लिए पात्र औद्योगिक उपक्रम क े शुद्ध लाभ में ड्यूटी ड्रॉबैक प्राप्ति/डीईपीबी लाभ शामिल नहीं हैं। तदनुसार, अपीलों को लागत क े बारे में बिना किसी आदेश क े खारिज कर दिया जाता है। 7.[5] इसक े पूर्व, कर दायित्व क े निर्धारण क े प्रयोजन क े लिए "औद्योगिक उपक्रमों से व्युत्पन्न लाभ और अभिलाभ" का व्यवहार स्टर्लिंग फ ू ड्स, मंगलोर (पूर्वोक्त) क े मामले में इस न्यायालय क े समक्ष विचार क े लिए आया था, जिसका लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में इस न्यायालय द्वारा अनुसरण किया गया था। स्टर्लिंग फ े मामले में, पैराग्राफ 7 और 13 में यह पाया गया है और इस प्रकार अभिनिर्धारित किया गया - " 7. इसलिए, सवाल यह था कि क्या आयात पात्रताओं की बिक्री से निर्धारिती द्वारा प्राप्त आय, समुद्री खाद्य क े प्रसंस्करण क े अपने औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त लाभ और अभिलाभ थी। उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आयात पात्रता को बेचकर निर्धारिती ने जो आय अर्जित की थी, वह लाभ और अभिलाभ नहीं थी जो उसे अपने औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त हुई थी।इस प्रयोजन क े लिए, उसने क ै म्बे इलेक्ट्रिक सप्लाई इंडस्ट्रियल को-ऑपरेटिव लिमिटेड बनाम सीआईटी [(1978) 2 एससीसी 644:1978 एससीसी (कर) 119:(1978) 113 आईटीआर 84] क भरोसा किया, वहाँ यह अभिनिर्धारित किया गया था कि अभिव्यक्ति "क े कारण (क े लिए जिम्मेदार)" आयात में अभिव्यक्ति " से व्युत्पन्न" से व्यापक थी। व्यापक आयात की अभिव्यक्ति, अर्थात् "क े कारण (क े लिए जिम्मेदार)" का उपयोग उस समय किया गया था जब विधायिका का उद्देश्य व्यवसाय क े वास्तविक संचालन क े अलावा अन्य स्रोतों से प्राप्तियों को कवर करना था। उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने पाया कि धारा 80-HH का लाभ प्राप्त करने क े लिए निर्धारिती को यह स्थापित करना था कि लाभ और अभिलाभ उसक े औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त किए गए थे और यह पर्याप्त नहीं था कि अर्जित लाभ और औद्योगिक उपक्रम क े बीच एक वाणिज्यिक संबंध स्थापित किया गया था। औद्योगिक उपक्रम को ही लाभ का स्रोत होना था। औद्योगिक उपक्रम क े व्यवसाय को प्रत्यक्ष रूप से वह लाभ प्राप्त करना था। औद्योगिक उपक्रम को उस लाभ का प्रत्यक्ष स्रोत होना चाहिए न कि किसी अन्य लाभ को अर्जित करने का साधन। "स्रोत" शब्द क े अर्थ का भी संदर्भ दिया गया था और यह अभिनिर्धारित किया गया था कि निर्यात को प्रोत्साहित करने की योजना क े तहत निर्धारिती द्वारा अर्जित की गई आयात पात्रता क ें द्र सरकार द्वारा प्रदान की गई थी। इसलिए, आयात पात्रता की बिक्री, से उत्पन्न होने वाले लाभ और अभिलाभ क े संदर्भ में स्रोत क ें द्र सरकार की योजना थी, न कि निर्धारिती का औद्योगिक उपक्रम। XXXXXXXX
13. हमें नहीं लगता कि आयात पात्रता का स्रोत निर्धारिती का औद्योगिक उपक्रम है। इन परिस्थितियों में, आयात पात्रता का स्रोत क े वल क ें द्र सरकार की निर्यात संवर्धन योजना ही कहा जा सकता है जिसक े तहत निर्यात पात्रता उपलब्ध हो जाती है। 'से व्युत्पन्न' शब्दों क े प्रयोग क े लिए लाभ और अभिलाभ तथा औद्योगिक उपक्रम क े बीच सीधा संबंध होना चाहिए। वर्तमान मामले में, संबंध प्रत्यक्ष नहीं है, बल्कि क े वल आनुषंगिक है। औद्योगिक उपक्रम प्रसंस्क ृ त समुद्री भोजन का निर्यात करता है। ऐसे निर्यात क े कारण, निर्यात संवर्धन योजना लागू होती है। इसक े तहत निर्धारिती आयात पात्रता का हकदार है, जिसे वह बेच सकता है। हमारे विचार में, उसक े विक्रय प्रतिफल को निर्धारिती क े औद्योगिक उपक्रम से प्राप्त लाभ और अभिलाभ क े रूप में नहीं माना जा सकता है। 7.[6] इसलिए, स्टर्लिंग फ ू ड्स, मंगलोर (पूर्वोक्त) और लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क न्यायालय द्वारा अधिकथित विधि का अनुसरण करते हुए, उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित करने में कोई त्रुटि नहीं की गई है कि डीईपीबी और ड्यूटी ड्रॉबैक दावों से लाभ होने पर, निर्धारिती धारा 80-IB क े अधीन कटौतियों का हकदार नहीं होगा क्योंकि ऐसी आय को धारा 28 (iiid) और (iiie) क े अनुसार औद्योगिक उपक्रम से व्युत्पन्न आय और अन्यथा नहीं कहा जा सकता है, ऐसी आय कर क े लिए प्रभार्य है। 7.[7] जहां तक मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े अनुवर्ती निर्णय पर निर्धारिती क े विद्वान अधिवक्ता द्वारा किए गए भरोसे का संबंध है, शुरुआत में, यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में, यह तीन सब्सिडी का मामला था, अर्थात् क) परिवहन सब्सिडी, (ख) ब्याज सब्सिडी, और (ग) विद्युत सब्सिडी और इस संदर्भ में इस न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया और अभिनिर्धारित किया कि चूंकि ये सब्सिडी सीधे विनिर्माण की लागत को प्रभावित करती है, उनका उपक्रम क े लाभ और अभिलाभ से सीधा संबंध है और चूंकि इन सब्सिडी का सीधा संबंध है, इसलिए कहा जा सकता है कि औद्योगिक उपक्रम से व्युत्पन्न की गई हैं। यह उल्लेख किया जाना है कि मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में, इस न्यायालय ने लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में निर्णय पर ध्यान दिया था, हालांकि, इस न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) का मामला एक निर्यात प्रोत्साहन से संबंधित था, जो लागत क े एक तत्व की प्रतिपूर्ति से बहुत दूर है। लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में निर्णय पर विचार करते समय, इस न्यायालय ने ड्यूटी एंटाइटेलमेंट पास बुक और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं में अंतर किया और विशेष रूप से कहा कि डीपीईबी/ड्यूटी ड्राबैक स्कीम अपने उत्पादों क े निर्माण या बिक्री क े लिए किसी औद्योगिक उपक्रम क े व्यवसाय से संबंधित नहीं है और डीईपीबी की पात्रता क े वल तभी उत्पन्न होती है जब उपक्रम उक्त उत्पाद का निर्यात करता है, अर्थात, इसक े निर्माण या उत्पादन क े बाद। पैराग्राफ 20 में, मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में, डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक से प्राप्त लाभ को अलग करते हुए, निम्नलिखित रूप से अभिनिर्धारित किया गया हैः "20. लिबर्टी इंडिया [लिबर्टी इंडिया बनाम सीआईटी, (2009) 9 एससीसी 328] इस क्रम में चौथा निर्णय होने से भी राजस्व को मदद नहीं मिलती। यह न्यायालय जिसक े लिए चिंताशील था वो निर्यात प्रोत्साहन से संबंधित था, जो लागत क े एक तत्व की प्रतिपूर्ति से बहुत दूर है। डीईपीबी ड्रॉबैक योजना किसी औद्योगिक उपक्रम क े उत्पादों क े निर्माण या बिक्री क े व्यवसाय से संबंधित नहीं है। डीईपीबी की पात्रता तभी उत्पन्न होती है जब उपक्रम उक्त उत्पाद का निर्यात करने क े लिए आगे बढ़ता है, अर्थात, इसका निर्माण या उत्पादन करने क े बाद। सारगर्भित तरीक े से, यदि कोई निर्यात नहीं होता है तो डीईपीबी की कोई पात्रता नहीं है और इसलिए भारत क े भीतर किसी उत्पाद क े निर्माण और/या बिक्री क े साथ इसका संबंध निकटतम या प्रत्यक्ष नहीं है, बल्कि यह एक कदम दूर है। इसक े अलावा, डीईपीबी पात्रता क े पीछे का उद्देश्य, जैसा कि इस न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है, निर्यात उत्पाद की आयात सामग्री पर सीमा शुल्क भुगतान की घटनाओं को तटस्थ करना है, जो निर्यात उत्पाद क े खिलाफ सीमा शुल्क को क्र े डिट द्वारा प्रदान किया जाता है। ऐसे परिदृश्य में, यह नहीं कहा जा सकता है कि इस तरह की शुल्क छ ू ट योजना, औद्योगिक उपक्रम या व्यवसाय द्वारा किए गए लाभ और अभिलाभ से व्युत्पन्न है। इस प्रकार, कथित निर्णय क े पैराग्राफ 20 से, यह देखा जा सकता है कि इस न्यायालय ने लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े निर्णय को अस्वीकार नहीं किया। यहां तक कि मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में भी, इस न्यायालय ने स्टर्लिंग फ ू ड्स, मंगलोर (पूर्वोक्त) क े मामले में पहले क े निर्णय पर विचार नहीं किया। इस प्रकार, लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) और स्टर्लिंग फ े मामलों में इस न्यायालय का निर्णय, जो इस प्रकार डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं पर हैं, हस्तगत मुद्दे का समाधान करता है। यह नहीं कहा जा सकता कि मेघालय स्टील्स लिमिटेड (पूर्वोक्त) क े मामले में लिया गया निर्णय स्टर्लिंग फ ू ड्स, मैंगलोर (पूर्वोक्त) और लिबर्टी इंडिया (पूर्वोक्त) क े मामले में लिए गए निर्णयों क े विपरीत है। इसक े विपरीत, पैराग्राफ 20 में की गई टिप्पणियों को राजस्व क े पक्ष में और निर्धारिती क े खिलाफ कहा जा सकता है।
8. उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए और उपर्युक्त कारणों से, उच्च न्यायालय ने न्यायोचित रूप से अभिनिर्धारित किया है कि प्रत्यर्थी-निर्धारिती, डीईपीबी की राशि क े साथ-साथ ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं पर धारा 80-IB क े तहत कटौतियों का हकदार नहीं है। हम अभिनिर्धारित करते है कि डीईपीबी/ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं से अर्जित लाभ पर निर्धारिती अधिनियम, 1961 की धारा 80-IB क े तहत कटौती का हकदार नहीं है। किसी भी उच्च न्यायालय क े किसी भी विपरीत निर्णय को अच्छा कानून नहीं माना जाता है. वर्तमान अपील को खारिज किया जाना चाहिए और तदनुसार खारिज किया जाता है। हालांकि, मामले क े तथ्यों और परिस्थितियों में, लागत क े बारे में कोई आदेश नहीं होगा। न्यायाधीश (एम. आर. शाह) न्यायाधीश (बी. वी. नागरत्ना) नई दिल्ली, 10 अप्रैल, 2023 अस्वीकरण: स्थानीय भाषा में अनुवादित निर्णय, वादी क े प्रतिबंधित उपयोग क े लिए, उसकी भाषा में समझाने क े लिए है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।