Man Singh v. Shamim Ahmad

Delhi High Court · 05 Apr 2023
Avinruno Bose; Suanshu Gulilya
Civil Appeal No 1874/2015
property appeal_dismissed Significant

AI Summary

A tenant must pay increased rent directly to the landlord after valid notice; continued deposit of old rent in court does not prevent eviction under the Uttar Pradesh Urban Buildings Act, 1972.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
भार क
े सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या 1874/2015
मान सिंसह ... अपीलक ा)
बनाम
शमीम अहमद (मृ ) द्वारा विवति क प्रति विनति ... प्रत्यर्थी3(गण)
विनण)य
न्यायमूर्ति सु ांशु ूलिलया,
JUDGMENT

1. यह एक विकरायेदार की अपील है जो लघु वाद न्यायालय से विकराये और बेदखली की काय)वाही से उत्पन्न हुई है। मकान मालिलक क े बेदखली क े मुकदमे को स्वीकार कर लिलया गया और विकरायेदार की जे.एस.सी.सी. पुनरीक्षण और रिरट यातिJका को क्रमशः खारिरज कर विदया गया। इस न्यायालय द्वारा 11.2.2015 को अनुमति प्रदान की गई र्थीी और क ु छ श O क े अ ीन आक्षेविप आदेश पर रोक लगा दी गई र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

2. प्रश्नग परिरसर (जिजसे ए स्मिस्मनपश्चा ् 'परिरसर' कहा गया है) कोटला, गंगोह- टाउन, नुक ु र- हसील, जिजला-सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में स्मिस्र्थी एक दुकान है जो व )मान अपीलक ा) को 165/- रुपये प्रति माह क े माजिसक विकराए पर 06.01.1982 को विकराए पर विदया गया र्थीा। बाद में विकराया बढ़ाकर 195 रुपये प्रति माह कर विदया गया और वि]र 01.01.1990 से यह 250 रुपये प्रति माह कर विदया गया। यह एक स्वीक ृ स्मिस्र्थीति है। र्थीाविप हमें यहाँ रिरकॉर्ड) करना Jाविहए विक मकान मालिलक क े विकराए को 300/- रुपये प्रति माह क बढ़ाए जाने क े दावे को विकरायेदार द्वारा अस्वीकार कर विदया गया र्थीा, यद्यविप विवJारण न्यायालय और पुनरीक्षण न्यायालय ने बढ़े हुए विकराए पर मकान मालिलक क े पक्ष में अपने विनष्कर्ष) विदए हैं।

3. अपीलार्थी3 का मामला यह है विक वह 250/- रुपए प्रति माह क े माजिसक विकराए पर दुकान में विकरायेदार र्थीा। जून 1993 में, मकान मालिलक ने विकराया स्वीकार करने से इनकार कर विदया, जिजसे ब विकरायेदार द्वारा मनीऑर्ड)र क े माध्यम से भुग ान विकया गया र्थीा, जिजसको इंकार करने क े पृष्ठांकन क े सार्थी वापस लौटा विदया गया र्थीा। इन परिरस्मिस्र्थीति यों में, जब मकान मालिलक द्वारा विकराया लेने से इनकार कर विदया जा रहा र्थीा, ो विकरायेदार ने जिसविवल जज (जूविनयर तिर्डवीजन) (ए स्मिस्मनपश्चा ् 'न्यायालय' क े रूप में संदर्भिभ ) क े न्यायालय में विकराया जमा करना शुरू कर विदया। 750/- रुपये की नराशिश जो 250/- रुपये प्रति माह की दर से मई, जून और जुलाई क े लिलए विकराया र्थीा, जो इस प्रकार जमा विकया गया और विकरायेदार ने न्यायालय में जमा करना जारी रखा।

4. मकान मालिलक द्वारा 05.04.1995 को एक नोविटस विदया गया, जो स्वीक ृ रूप से 10.04.1995 को विकरायेदार/अपीलार्थी3 को प्राप्त हुआ र्थीा, जिजसमें Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मकान मालिलक ने मई 1993 से विकराए की मांग की र्थीी। इस नोविटस क े बाद भी मकान मालिलक को विकराया अदा नही विकया गया और परिरणामस्वरूप मकान मालिलक ने 01.05.1993 क े बाद से विकराये क े बकाये क े आ ार पर, बकाया विकराये और बेदखली क े लिलए लघु वाद न्याया ीश, सहारनपुर क े न्यायालय में एक जे.एस.सी.सी. मुकदमा संख्या 179/1995 दायर विकया। वादपत्र में मकान मालिलक द्वारा यह अशिभकर्थीन विकया गया र्थीा विक यद्यविप पहले दुकान का माजिसक विकराया 250/- रुपये प्रति माह र्थीा, लेविकन बाद में वर्ष) 1993 में एक मौलिखक समझौ े द्वारा से, पक्षकारों क े बीJ यह सहमति हुई र्थीी विक हर साल रु. 25/- प्रति माह की वृतिo होगी और इसलिलए यह 01.05.1993 क े बाद से प्रति माह 275/- रुपये और 01.05.1994 क े बाद से प्रति माह 300/- रुपये हो गया और इस प्रकार, विकराएदार-अपीलक ा) विकराए में Jूक कर रहा र्थीा। Jूंविक इस विकराए का भुग ान नहीं विकया गया है, इसलिलए विकरायेदारी पहले से ही जारी नोविटस पर समाप्त हो गई और इसलिलए मकान मालिलक ने बेदखली क े आदेश की मांग की।

5. अपने उत्तर में, अपीलक ा) ने इस बा से इंकार विकया विक विकराए में 25/- रूपये प्रति माह की वार्षिर्षक वृतिo क े लिलए पक्षकारों क े बीJ कोई मौलिखक समझौ ा र्थीा।वास् विवक और स्वीक ृ विकराया 250/- रूपये प्रति माह है, जो मई 1993 से न्यायालय में विवति व रूप से भुग ान विकया जा रहा है और उसक े बाद लगा ार जमा विकया जा रहा है और विकराएदार कभी भी विकराए क े भुग ान क े लिलए Jूकक ा) नहीं रहा है। इस स्मिस्र्थीति में, विवति क े उस प्राव ान का उल्लेख करना आवश्यक है जो व )मान मामले में लागू हो ा है। वह कानून जो इस क्षेत्र में लागू हो ा है, वह उत्तर प्रदेश शहरी भवन (विकराए पर देने, विकराया और बेदखली का विवविनयमन) अति विनयम, 1972 (जिजसे ए स्मिस्मनपश्चा ् "1972 का अति विनयम संख्यांक 13" कहा गया है) है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

6. ारा 20 की उप ारा (2) क े अ ीन, अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी, ारा 20 की उप ारा 2 (क) में विदए गए आ ारों क े आ ार पर विकसी भवन से विकरायेदार की बेदखली क े लिलए मुकदमा संस्मिस्र्थी विकया जा सक ा है जो विनम्नानुसार हैः "(2) विकरायेदारी क े विन ा)रण क े बाद विकसी भवन से विकसी विकरायेदार को बेदखल करने क े लिलए मुकदमा विनम्नलिललिख में से एक या अति क आ ारों पर संस्मिस्र्थी विकया जा सक ा है, अर्थीा) ्ः (क) यह विक विकराएदार पर कम से कम Jार महीने का विकराया बकाया है और वह मांग की नोविटस क े ामील की ारीख से एक महीने क े भी र मकान मालिलक को उसका भुग ान करने में विव]ल रहा हैः" इसलिलए विकरायेदार द्वारा विकराए का भुग ान न करने का आ ार कम से कम Jार महीने का होना Jाविहए और जिजसे मांग की नोविटस की ामील क े एक महीने क े भी र भुग ान नहीं विकया गया हो। इसक े अलावा, जब यह विकराया अदा नहीं विकया जा ा है और मकान मालिलक बेदखली क े लिलए अपना मुकदमा दायर कर ा है, ब भी कानून विकरायेदार को इस दातियत्व से मुक्त होने का एक और अवसर प्रदान कर ा है, जो विक मुकदमे की पहली सुनवाई से पहले, पूरे विकराए और बकाये का भुग ान करने पर हो ा है। यह ारा 20 की उप ारा (4) में है जो इस प्रकार हैः "20 (4).उप ारा (2) क े खंर्ड (क) में उजिल्ललिख आ ार पर बेदखली क े विकसी मुकदमे में, यविद मुकदमे की पहली सुनवाई क े समय विकराएदार भवन क े उपयोग और अति भोग क े लिलए उसक े द्वारा देय विकराए और नुकसान की पूरी राशिश (उपयोग और अति भोग क े लिलए ऐसी नुकसान की गणना विकराए क े रूप में उसी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दर पर की जाएगी) और उस पर नौ प्रति श वार्षिर्षक की दर से उस पर ब्याज क े सार्थी और उसक े संबं में मकान मालिलक क े वाद व्यय में से विकराएदार द्वारा ारा 30 की उप ारा (1) क े ह पहले से जमा की गई विकसी भी राशिश को काटने क े बाद, शेर्ष का विबना श ) भुग ान कर ा है या [मकान मालिलक को दे ा है या न्यायालय में जमा कर ा है] ो न्यायालय उक्त आ ार पर बेदखली क े लिलए तिर्डक्री पारिर करने क े बजाय विकराएदार को उक्त आ ार पर बेदखली विकए जाने क े उसक े दातियत्व से अवमुक्त करने का आदेश पारिर कर सक े गाः बश | विक इस उप- ारा की कोई भी बा विकरायेदार क े संबं में लागू नहीं होगी, जिजसने या जिजसक े परिरवार क े विकसी सदस्य ने उसी नगर, नगरपालिलका, अति सूतिJ क्षेत्र या कस्बे क े क्षेत्र में कोई आवासीय भवन बनाया हुआ है या अन्यर्थीा रिरक्त स्मिस्र्थीति में अर्जिज विकया है या अज)न क े पश्चा ् खाली कर विदया है। [स्पष्टीकरण.इस उप- ारा क े प्रयोजनों क े लिलए- (क) पद "पहली सुनवाई" का अर्थी) प्रति वादी पर ामील विकए गए सम्मन में उजिल्ललिख विकसी पैरवी या काय)वाही क े लिलए प्रर्थीम विदनांक से है; (ख) पद "वाद व्यय" क े अं ग) विकसी प्रति वाविद वाद क े लिलए करा ेय काउंसेल ]ीस की आ ी राशिश भी है।]" जैसा विक हम पहले ही ऊपर उल्लेख कर Jुक े हैं, अपीलार्थी3/विकरायेदार का मामला यह रहा है विक मकान मालिलक द्वारा विकराया लेने से इनकार करने पर, वह Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसे "न्यायालय" में जमा करने क े लिलए विववश र्थीा। 1972 क े अति विनयम संख्या 13 में ारा 30 क े ह विकरायेदार को अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी उस स्मिस्र्थीति में अदाल में विकराया जमा कराने का प्राव ान विकया गया है जब मकान मालिलक विकराया लेने से मना कर रहा हो। "30. क ु छ परिरस्मिस्र्थीति यों में न्यायालय में विकराया जमा करना:- (1) यविद कोई ऐसा व्यविक्त जो अपने को विकसी भवन का विकरायेदार होने का दावा कर ा है, उसक े अशिभकशिर्थी मकान मालिलक को भवन क े संबं में विकराये क े रूप में कोई राशिश दे ा है और कशिर्थी मकान मालिलक उसे स्वीकार करने से इंकार कर ा है, ो वह व्यविक्त विन ा)रिर रीक े से ऐसी राशिश जमा कर सक ा है और ऐसे भवन क े संबं में विकसी भी पश्चा ्व 3 अवति क े लिलए उसक े कर्थीनानुसार देय होने वाले विकराये को लगा ार ब क जमा कर ा या कर सक ा है जब क विक मकान मालिलक इस बीJ उसे लिललिख नोविटस देकर विकराया स्वीकार करने की अपनी इच्छा प्रकट न करे। (2) जहां विकसी भवन क े संबं में विकराया प्राप्त करने क े हकदार व्यविक्त क े बारे में कोई सद्भावपूण) संदेह या विववाद उत्पन्न हुआ है, वहां विकराएदार भी उन परिरस्मिस्र्थीति यों को ब ा े हुए विकराया जमा कर सक ा है जिजनक े ह ऐसा जमा विकया गया है और जब क ऐसे संदेह का विकसी सक्षम न्यायालय क े विनण)य द्वारा या पक्षकारों क े बीJ समझौ े द्वारा दूर नहीं विकया जा ा है, ऐसे भवन क े संबं में बाद में देय होने वाला विकराया जमा करना जारी रख सक ा है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (3) उप ारा (1) या उप ारा (2) में विनर्षिदष्ट जमा की जाने वाली राशिश क्षेत्राति कार रखने वाले मुस्मिन्स] क े न्यायालय में जमा की जायेगी। (4) उप ारा (1) क े अ ीन कोई नराशिश जमा विकए जाने पर न्यायालय ऐसी जमा नराशिश की सूJना र्थीाकशिर्थी मकान मालिलक पर ामील कराएगा और जमा की गई नराशिश उस व्यविक्त द्वारा इस विनविमत्त न्यायालय में विकए गए आवेदन पर विनकाली जा सक े गी। (5) उप ारा (2) क े अ ीन कोई नराशिश जमा विकए जाने पर, न्यायालय जमा नराशिश की सूJना संबंति व्यविक्त या व्यविक्तयों पर ामील कराएगा और जमा की गई नराशिश को उस व्यविक्त क े ]ायदे क े लिलए ारिर करेगा जो विकसी सक्षम न्यायालय द्वारा या संबo पक्षकारों क े बीJ विकसी समझौ े द्वारा उसे पाने का हकदार पाया जाए और वह नराशिश ऐसे व्यविक्त को संदेय होगी। (6) पूव क्त रूप से जमा की गई नराशिश क े संबं में यह समझा जाएगा विक उसे जमा करने वाले व्यविक्त ने उप ारा (1) में विनर्षिदष्ट दशा में उस व्यविक्त को जिजसक े हक में वह जमा विकया गया है या उप ारा (2) में विनर्षिदष्ट दशा में मकान मालिलक को उस नराशिश का भुग ान ऐसे जमा विकए जाने क े विदनांक को कर विदया है।” (प्रभाव वर्ति )

7. मकान मालिलक का मामला यह है विक विकरायेदार को (10.05.1995 को) विदनांक 05.04.1995 का नोविटस विदया गया र्थीा, और उसने एक महीने की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विन ा)रिर अवति क े भी र विकराया देने से इनकार कर विदया र्थीा, उसकी विकरायेदारी समाप्त हो गई र्थीी और इसलिलए उसने बेदखली क े लिलए सहारनपुर क े लघु मुकदमा न्यायालय क े न्याया ीश क े समक्ष एक मुकदमा दायर विकया र्थीा। पूरे समय क े दौरान विकरायेदार की स्मिस्र्थीति यह रही है विक उसक े लिलए 10.05.1995 विदनांविक नोविटस प्राप्त करने पर या अति विनयम की ारा 20(4) क े ह पहली सुनवाई पर विकराया जमा करने का कोई अवसर नहीं र्थीा, इसका सी ा सा कारण यह र्थीा विक उसने कभी भी विकराये क े भुग ान में Jूक नहीं की र्थीी, क्योंविक 250/- रुपये प्रति माह की दर से पूरा विकराया उसक े द्वारा अति विनयम की ारा 30 क े ह अदाल में जमा विकया जा रहा र्थीा। लघु वाद न्यायालय क े न्याया ीश ने यह विनष्कर्ष) विनकाला विक विकरायेदार पर विकराया बकाया र्थीा, यह अशिभविन ा)रिर कर े हुए विक विकराया रु. 300/- प्रति माह र्थीा न विक रु. 250/- प्रति माह, जो स्वीक ृ रूप से कभी भी कहीं जमा नहीं विकया गया है, और परिरणाम ः विकरायेदार क े विवरुo बेदखली और विकराये की वसूली की तिर्डक्री पारिर की गई। इसक े बाद विकरायेदार ने जिजला न्याया ीश, सहारनपुर क े समक्ष जेएससीसी पुनरीक्षण दायर विकया, जिजसे 31.07.2003 को खारिरज कर विदया गया और बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा भी उसकी रिरट यातिJका को 17.02.2012 को खारिरज कर विदया गया।

8. र्थीाविप, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बढ़े हुए विकराए पर विवJारण न्यायालय और सत्र न्यायालय क े विनष्कर्षO को अपास् कर विदया है।उच्च न्यायालय ने अशिभविन ा)रिर विकया विक भू-स्वामी द्वारा ब ाए गए 'मौलिखक करार' क े विवर्षय में विवJारण न्यायालय क े समक्ष कोई साक्ष्य नहीं रखा गया र्थीा, जिजसमें विकराए को 250/- रुपए प्रति माह से 275/- रुपए प्रति माह और त्पश्चा ् 300/- रुपए प्रति माह और इसी प्रकार आगे भी विकराए की आवति क वृतिo का उपबं विकया गया र्थीा।Jूंविक पक्षकारों क े बीJ र्थीाकशिर्थी मौलिखक समझौ ा साविब नहीं हुआ Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीा, इसलिलए यह माना जाएगा विक पक्षकारों क े बीJ सही विकराया रु. 250/- प्रति माह र्थीा, जिजसका भुग ान अति विनयम की ारा 30 क े ह न्यायालय में विकरायेदार द्वारा विकया जा रहा र्थीा।

9. इसक े बाद उच्च न्यायालय ने विदनांक 05.04.1995 की नोविटस क े बाद विवति स्मिस्र्थीति य करने की काय)वाही की।अति विनयम की ारा 30 में यह प्राव ान है विक मकान मालिलक द्वारा विकराया लेने से मना करने पर विकराया न्यायालय में जमा विकया जा सक ा है, लेविकन यह स्मिस्र्थीति क े वल मकान मालिलक द्वारा विकराया लेने की अपनी इच्छा व्यक्त करने क ही बनी रहेगी। विकराया प्राप्त करने की इस इच्छा को विकरायेदार द्वारा 10.05.1995 को प्राप्त उनकी 05.04.1995 विदनांविक नोविटस में देखा जाना Jाविहए। उच्च न्यायालय ने इस पहलू पर विवJार विकया और अशिभविन ा)रिर विकया विक एक बार जब मकान मालिलक द्वारा विकरायेदार को 05.04.1995 को (अपीलक ा) को 10.04.1995 को प्राप्त) बढ़ी हुई दर पर विकराया मांगने का नोविटस भेजा विदया गया, ो विकरायेदार क े पास विकराया न्यायालय में जमा करने क े बजाय, मकान मालिलक क े पास जमा करने क े अलावा और कोई विवकल्प नहीं र्थीा। वह स्वीक ृ विकराया (अर्थीा) ् 250/- रुपये) जमा करा सक ा र्थीा, न विक बढ़ा हुआ विकराया (अर्थीा) ् 300/- रुपये), लेविकन जमा मकान मालिलक को विकया जाना र्थीा।

10. ऐसा नहीं विकया गया र्थीा और विकरायेदार का बJाव विक उसने न्यायालय में 'स्वीक ृ विकराया' जमा करना जारी रखा, उसक े बJाव क े काम नहीं आएगा क्योंविक एक बार जब मकान मालिलक ने विकराया स्वीकार करने की अपनी इच्छा व्यक्त कर दी र्थीी, जो 05.04.1951 विदनांविक मांग की उसकी नोविटस में व्यक्त विकया गया र्थीा, ो ऐसा विकराया मकान मालिलक को विदया जाना र्थीा, न विक न्यायालय में। हमारा यह सुविवJारिर म है विक इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवद्वान एकल न्याया ीश द्वारा विदया गया क ), जो उच्च न्यायालय क े पूण) न्यायालय क े विनण)य का अनुसरण कर ा है, सही ढंग से कानून को विन ा)रिर कर ा है। ारा 30 प्रति वादी को न्यायालय में स्वीक ृ विकराया जमा करने का अवसर दे ी है, लेविकन यह व्यवस्र्थीा क े वल ब क जारी रह ी है जब क विक मकान मालिलक विकराया सी े प्राप्त करने की अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर ा है।

11. आइए ारा 30 की उप ारा (1) की वि]र से जांJ करें जिजसक े ह विकरायेदार न्यायालय में विकराया जमा कर सक ा है।उपयु)क्त उपबं ों का उल्लेख पहले ही विकया जा Jुका है किंक ु हम इस उपबं की अंति म कु छ पंविक्तयों पर बल देना Jाहेंगे जो इस प्रकार हैंः '... जब क मकान मालिलक इस बीJ विकरायेदार को लिललिख नोविटस द्वारा उसे स्वीकार करने की अपनी इच्छा न ज ाये।' दूसरे शब्दों में, विकरायेदार क े वल ब क न्यायालय में विकराया जमा कर सक ा है, जब क विक मकान मालिलक ने विकराया स्वीकार करना से मना कर विदया हो। एक बार जब मकान मालिलक विकराया स्वीकार करने की अपनी इच्छा व्यक्त कर ा है, जो विक व )मान मामले में वह विदनांक 05.04.1995 (10.04.1995 को प्राप्त) की नोविटस की ामील करक े कर ा है, ो विकरायेदार क े पास विकराया मकान मालिलक को जमा करने क े अलावा कोई विवकल्प नहीं है।अपीलक ा) द्वारा ऐसा नहीं विकया गया है।

12. इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विदनांक 17.02.2012 क े अपने आक्षेविप विनण)य में जिजस पूण) पीठ क े विनण)य का संदभ) विदया गया है वह गोकरन सिंसह बनाम प्रर्थीम अपर जिजला और सत्र न्याया ीश, हरदोई और अन्य[1] का है।पूण) पीठ क े

1. 2000 एससीसी ऑनलाइन ऑल 174 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समक्ष ीन प्रश्न र्थीे, वे सभी 1972 क े अति विनयम संख्याक 13 से संबंति र्थीे। इस समय हमारा जिजन प्रश्नों से सरोकार है, उनमें से एक यह हैः "एक ऐसे मामले में जहां मकान मालिलक ने पहले सही दर पर विकराया स्वीकार करने से इनकार कर रहा र्थीा और उच्च दर पर विकराए का दावा कर रहा र्थीा और विकरायेदार ने पूव) में मकान मालिलक क े इनकार करने क े परिरणामस्वरूप ारा 30 क े ह अदाल में विकराया जमा कराया र्थीा और उसक े बाद मकान मालिलक ने वि]र से उच्च दर पर मांग की औपJारिरक नोविटस दी, ो क्या विकरायेदार को मकान मालिलक को सही दर पर विकराया विदए विबना, ारा 30 (1) क े ह विकराया सी े जमा करने का अति कार है।" इस विवर्षय पर संपूण) विवति पर JJा) करने क े पश्चा ्, इस प्रश्न पर पूण) पीठ द्वारा विदया गया विनष्कर्ष) इस प्रकार हैः

37. (2) यविद मकान मालिलक सही दर पर विकराया लेने से इंकार कर रहा है और अति क दर पर विकराया लेने का दावा कर रहा है, विकराएदार ने पूव) में मकान मालिलक क े इनकार करने क े परिरणामस्वरूप ारा 30 क े अ ीन न्यायालय में विकराया जमा विकया और यविद उसक े बाद मकान मालिलक उच्च दर पर मांग की औपJारिरक नोविटस दे ा है और विकराया प्राप्त करने की अपनी इच्छा व्यक्त कर ा है, ो नोविटस प्राप्त होने क े बाद विकरायेदार को कम से कम मकान मालिलक को उसक े द्वारा स्वीक ृ दर पर विकराया देने की बाध्य ा है और उसे अति विनयम की ारा 30 (1) क े अ ीन विकराया सी े जमा करने का कोई अति कार नहीं है।” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

13. अपीलाक ा) क े विवद्वान अति वक् ा श्री. यू.क े. उविनयाल ने अजय अग्रवाल और अन्य बनाम हर गोकिंवद प्रसाद सिंसघल और अन्य[2] क े मामले में इस न्यायालय क े बाद क े विनण)य पर अवलम्ब लिलया। हमें र्डर है विक उक्त मामले क े थ्य पूरी रह से अलग र्थीे। उपरोक्त उoृ वाद में, विकरायेदार को अति विनयम की ारा 20 की उप- ारा (4) का लाभ विदया गया, क्योंविक उसने सुनवाई की ारीख से पहले 'स्वीक ृ विकराया' जमा कर विदया र्थीा। न्यायालय क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या ारा 20 की उप- ारा (4) का लाभ प्राप्त करने क े लिलए विकरायेदार विकराए की बढ़ी हुई दर, जैसा विक मकान मालिलक द्वारा दावा विकया गया र्थीा, जमा करने क े लिलए उत्तरदायी र्थीा, या क्या उसे दातियत्व से मुक्त विकया जाएगा यविद वह स्वीक ृ विकराया जमा कर ा है। इस न्यायालय की यह राय र्थीी, जो वास् व में कानून की य स्मिस्र्थीति र्थीी, विक यविद कोई विकरायेदार ारा 20 की उप- ारा 4 क े ह स्वीक ृ विकराया जमा कर ा है, ो उसे लाभ विमलेगा। उपयु)क्त उoृ विनण)य क े प्रस् र 19 में इस स्मिस्र्थीति को स्पष्ट विकया गया है।

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19. विकराए में समय-समय पर वृतिo क े लिलए कशिर्थी समझौ े क े बारे में विकसी भी उतिJ साक्ष्य की अनुपस्मिस्र्थीति में, मकान मालिलक की ओर से विकए गए इस रह की वृतिo पर सहमति की कहानी या ारा 20(4) क े प्राव ानों क े लिलए इसकी प्रयोज्य ा को स्वीकार करना मुस्मिश्कल हो जा ा है। Jूंविक मकान मालिलक क े अपुष्ट बयान क े अलावा, अशिभलेख पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, ो हमारे पास अपीलक ा)-विकरायेदारों की इस कहानी को स्वीकार करने क े अलावा कोई अन्य विवकल्प नहीं है विक पक्षकार अति क म 100 रुपये प्रति माह क माजिसक विकराया बढ़ाने क े लिलए सहम हुए र्थीे और वह भी दुकान क े कमरे क े नवीकरण क े बाद और उसमें एक

2. (2005) 13 एससीसी 145 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शटर लगाने क े बाद विकया गया र्थीा। यविद ऐसा है, ो अपीलक ा) भी ारा 20 (4) क े संरक्षण क े हकदार होंगे, क्योंविक 100 रुपये प्रति माह की दर से बकाया स्वीक ृ विकराए को विकरायेदार द्वारा अति विनयम क े ऐसे प्राव ान क े ह विन ा)रिर समय क े भी र विवति व जमा कर विदया गया र्थीा।

14. अपीलक ा) क े विवद्वान अति वक्ता श्री उविनयाल ने कशिर्थी मामले क े सार्थी समान ा विनकालने की कोशिशश की और यह क ) देंगे विक व )मान मामले में भी विकरायेदार स्वीक ृ विकराया जमा कर रहा है। हालांविक, जैसा विक हम पहले ही देख Jुक े हैं विक दोनों मामलों क े थ्य पूरी रह से अलग हैं। इसलिलए उपयु)क्त मामले का व )मान मामले में कोई उपयोग नहीं है।

15. इसलिलए हमें अपील में कोई औतिJत्य नहीं विमल ा है, जो ए द्द्वारा खारिरज की जा ी है। सभी अं रिरम आदेश विनरस् हो जाएंगे। …………………………….. [न्यायमूर्ति अविनरुo बोस] …………………………….. [न्यायमूर्ति सु ांशु ूलिलया] नई विदल्ली, 05 अप्रैल 2023. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA