Aarti Didhikshat v. Sushil Kumar Mishra

Supreme Court of India · 18 May 2023
K. M. Joseph; R. Subhash Reddy
SLP (C) No 13564 of 2021
civil appeal_dismissed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that failure to deposit decree amount or furnish valid security as mandated under Section 17 of the Provincial Small Cause Courts Act renders an application to set aside a unilateral decree incompetent and liable to be dismissed.

Full Text
Translation output
समक्ष भारतीय सर्वो च्च न्यायालय
सिसविर्वोल अपीलीय क्षेत्राधि कार
सिसविर्वोल अपील सं. ------र्वोर्ष 2023
एसएलपी (सी) संख्या 13564/2021 से उद्भूत)
आरती दीधिक्षत एर्वों एक अन्य ...... अपीलकता (गण)
बनाम
सुशील क
ु मार विमश्रा एर्वों अन्य ...... प्रधितर्वोादी (गण)
विनणय
न्यायमूर्तित क
े . एम. जोसेफ
JUDGMENT

1. अनुमधित प्रदान की गई।

2. प्रधितर्वोादी संख्या 1 से 4 ने अपीलकताओं क े खि@लाफ एक पक्षीय धिAक्री प्राप्त की। धिAक्री बेद@ली,बकाया विकराया, करों, क्षधितपूर्तित आविद की र्वोसूली क े खिलए थी। यह धिAक्री 18.10.2012 को पारिरत की गई थी। अपीलकताओं ने विदनांक 06.05.2014 को आदेश IX विनयम 13 सपविLत ारा 151 सिसविर्वोल प्रविक्रया संविहता (एतश्मिNमनपश्चात 'सीपीसी' क े रूप में संदर्भिभत) क े तहत आर्वोेदन दायर विदया सिजसमें यह दार्वोा विकया गया था विक उन्हें धिAक्री क े बारे में विनष्पादन कायर्वोाही क े समय 05.04.2014 को जानकारी हुई। इसे 4C क े रूप में अंविकत विकया गया था। उसी विदन, प्रांतीय लघु र्वोाद न्यायालय अधि विनयम 1887 ( एतश्मिNमनपश्चात उद्घोर्षणा “क्षेत्रीय भार्षा में अनुर्वोाविदत विनणय र्वोादी क े अपनी भार्षा में समझने हेतु विनब\धि त प्रयोग क े खिलए है और विकसी अन्य उद्देNय क े खिलए प्रयोग नहीं विकया जा सकता है। सभी व्यार्वोहारिरक और सरकारी उद्देNयों क े खिलए, विनणय का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिणक माना जाएगा तथा विनष्पादन और विक्रयान्र्वोयन क े उद्देNयों क े खिलए मान्य होगा।" 'अधि विनयम' क े रूप में संदर्भिभत) की ारा 17 क े तहत एक आर्वोेदन दायर विकया गया था।

3. अधि विनयम की ारा 17 इस प्रकार है: "17. सिसविर्वोल प्रविक्रया संविहता का लागू होना.- (1) सिसविर्वोल प्रविक्रया संविहता, 1908 (1908 का 5) में विन ारिरत प्रविक्रया, जहां तक अन्यथा उस संविहता द्वारा या इस अधि विनयम द्वारा उपबंधि त विकया गया है,] उसक े द्वारा संज्ञेय सभी मुकदमों में और इस तरह क े मुकदमों से उत्पन्न होने र्वोाली सभी कायर्वोाविहयों में एक लघु र्वोाद न्यायालय में अपनाई जाने र्वोाली प्रविक्रया: बशतm विक आर्वोेदक, धिAक्री को अपास्त करने क े आदेश क े खिलए सिजसे एकपक्षीय रूप से पारिरत विकया गया हो या विनणय की समीक्षा क े खिलए, आर्वोेदन देते समय, या तो अदालत में धिAक्री क े तहत या विनणय क े अनुसरण में देय राणिश जमा करेगा, या धिAक्री क े विनष्पादन या विनणय क े अनुपालन क े रूप में ऐसी प्रधितभूधित देगा जो न्यायालय, उसक े द्वारा इस संबं में विकए गए विपछले आर्वोेदन पर, विनदmणिशत करे। (2) जहां कोई व्यविp उप- ारा (1) क े परंतुक क े तहत प्रधितभू क े रूप में उत्तरदायी हो गया हो, प्रधितभूधित की र्वोसूली सिसविर्वोल प्रविक्रया संविहता, 1908 (1908 का 5) की ारा 145 द्वारा उपबंधि त क े रूप में की जा सकती है। " (प्रभार्वो र्वोर्ति त) उद्देNय क

4. ारा 17 क े तहत आर्वोेदन की प्रासंविगक अन्तर्वोस्तु और मांगी गई राहत इस प्रकार थी: "3. यह विक आर्वोेदक माननीय न्यायालय से प्राथना करते हैं विक न्याय क े विहत में 98,624/- (रुपये अLानर्वोे हजार छह सौ चौबीस मात्र) सिजसमें धिAविक्रअल राणिश, मुआर्वोजा, विकए गए व्यय आविद शाविमल हैं, की क ु ल राणिश जमा करने / भुगतान करने की अनुमधित दें सिजसमें से उत्तर प्रदेश अधि विनयम संख्या 13 सन् 1972 की ारा 30(1) क े अन्तगत रू0 12,600/- (बारह हजार छ: सौ मात्र) की राणिश पहले ही जमा करायी जा चुकी है एर्वों शेर्ष राणिश रू0 86,024 / - (रुपये णिछयासी हजार चौबीस मात्र), है, सिजसक े खिलए, आर्वोेदक रुपये 50,000/- ( पचास हजार रुपये मात्र) की राणिश की प्रधितभूधित प्रस्तुत करने का और माननीय न्यायालय क े समक्ष शेर्ष राणिश जमा करने का इरादा र@ते हैं ।

4. यह विक आर्वोेदक रुपये 36,024/- (रुपये छत्तीस हजार चौबीस मात्र), की नकद राणिश जमा करने क े खिलए विनविर्वोदा आर्वोेदन संलग्न कर रहे हैं। ऐसी राणिश जमा कराने हेतु विनविर्वोदा पारिरत करना न्याय विहत में उधिचत होगा। प्राथना अतः इस माननीय न्यायालय से विर्वोनम्र विनर्वोेदन है विक आर्वोेदकों द्वारा प्रस्तुत प्रांतीय लघु र्वोाद अधि विनयम, 1800 की ारा 17 क े अनुपालन में आर्वोेदन क े साथ संलग्न विनविर्वोदा पारिरत करक े रुपये उद्देNय क 50,000 /- (रुपये पचास हजार क े र्वोल) की प्रधितभूधित राणिश जमा करने/प्रस्तुत करने की अनुमधित प्रदान करें। । "

5. इस एश्मिzलक े शन को 8C क े रूप में क्रमांविकत विकया गया। तत्पश्चात् विदनांक 12.05.2014 को इस प्राथना क े साथ एक आर्वोेदन दाखि@ल विकया गया विक नगर विनगम क े स्र्वोाविमत्र्वो र्वोाली विकराए की दुकान क े रूप में प्रधितभूधित को अणिभले@ में खिलया जाए। इस आर्वोेदन को अनुमधित या स्र्वोीक ृ धित 24.05.2014 को दी गई यह विर्वोर्वोाद का एक ऐसा बिंबदु है सिजस पर ध्यान विदया जाना चाविहए और विर्वोचार विकया जाना चाविहए। प्रधितभू कोई अणिभर्षेक दीधिक्षत (इस अपील में 7 र्वोां प्रोफामा प्रधितर्वोादी) था। यह 14 सी क े रूप में क्रमांविकत आर्वोेदन था। विदनांक 23.09.2015 को, ट्रायल कोट ने अधि विनयम की ारा 17 क े तहत दायर आर्वोेदन 8 सी को @ारिरज कर विदया। आदेश, अन्य बातों क े साथ, विनम्नानुसार है: "उपरोp तक• /बहसों क े आलोक में, मैंने रिरकॉA फ़ाइल का ध्यानपूर्वोक विनरीक्षण विकया और पाया विक बहाली आर्वोेदन यानी 08 सी को 06.05.2014 को ही प्रस्तुत विकया गया था, लेविकन इस आर्वोेदन की तत्कालीन पीLासीन अधि कारी क े समक्ष पुवि„ नहीं की गई थी, लेविकन आर्वोेदन यानी 8 सी जमा करने क े बाद, इसे े समक्ष आर्वोेदन अथात् 14 सी प्रस्तुत विकया गया है, सिजसे न्यायालय द्वारा 24.05.2015 को स्र्वोीकार विकया गया था, लेविकन इसक े साथ आर्वोNयक मुआर्वोजा जमा नहीं विकया गया था। इसखिलए, आर्वोेदन अथात, 08 सी पर आर्वोेदन यानी 14 सी जमा करने क े बाद विफर से आदेश पारिरत करने की कोई प्रासंविगकता नहीं उद्देNय क रह गई थी। उपरोp परिरश्मिस्थधितयों में, आर्वोेदन यानी 08 सी बेकार हो गया है क्योंविक आर्वोेदन 14 सी पहले से ही तत्कालीन पीLासीन अधि कारी द्वारा 24.05.2014 को स्र्वोीकार विकया जा चुका है। इसखिलए, इस स्तर पर, आर्वोेदन यानी 08 सी की कोई प्रासंविगकता नहीं है और इसे @ारिरज विकया जाना चाविहए।"

6. इस आदेश को अपीलकताओं द्वारा उच्च न्यायालय क े समक्ष पुनरीक्षण दायर करक े चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश क े विनम्नखिलखि@त भाग पर ध्यान देना प्रासंविगक है: "पुनरीक्षण याचीगण क े विर्वोद्वान र्वोरिरष्ठ अधि र्वोpा श्री उमेश नारायण शमा और उनक े सहयोगी विर्वोद्वान अधि र्वोpा श्री शैलेन्द्र क ु मार को और विर्वोपक्षी क े विर्वोद्वान र्वोरिरष्ठ अधि र्वोpा श्री Aब्ल्यू. एच. @ान र्वो उनक े सहयोगी विर्वोद्वान अधि र्वोpा श्री आनंद श्रीर्वोास्तर्वो को सुना। र्वोतमान पुनरीक्षण 23.09.2015 विदनांविकत आदेश क े खि@लाफ दायर विकया गया है सिजसे विर्वोद्वान अपर सिजला न्याया ीश/विर्वोशेर्ष न्याया ीश (ईसी अधि विनयम) कानपुर नगर द्वारा विर्वोविर्वो मामला संख्या 11/74/2014 में पारिरत विकया गया, सिजसमें आर्वोेदन पत्र संख्या 8-सी लघुर्वोाद न्यायालय अधि विनयम की ारा 17 क े तहत पुनरीक्षण याधिचयों क े द्वारा दायर विकया गया था सिजसे लघुर्वोाद क े स संख्या 27/2012 में पारिरत एकपक्षीय विनणय और धिAक्री विदनांविकत 18.10.2013 क े कारण @ारिरज कर विदया गया है। प्रधितर्वोादी पुनरीक्षण याधिचयों क े विर्वोद्वान अधि र्वोpा ने तक विदया है विक एससीसी र्वोाद में पुनरीक्षण याधिचयों को कोई नोविटस तामील नहीं की गई थी उद्देNय क और प्रधितर्वोादी-पुनरीक्षण याधिचयों क े खि@लाफ एकतरफा आदेश पारिरत विकया गया और विनष्पादन कायर्वोाविहयों में भी कोई नोविटस नहीं दी गई थी सिजसक े खि@लाफ आदेश IX विनयम 13 सीपीसी क े तहत आर्वोेदन विकया गया। विर्वोद्वान अधि र्वोpा ने आगे तक विदया विक लघु र्वोाद न्यायालय अधि विनयम की ारा 17 क े तहत आर्वोेदन दायर विकया गया था जो विक लंविबत है जोविक र्वोै ाविनक अर्वोधि क े भीतर दायर की गई थी। विर्वोद्वान अधि र्वोpा ने आगे तक विदया है विक विफर से र्वोै ाविनक अर्वोधि क े तहत एक और आर्वोेदन दायर विकया गया था, सिजसमें प्रधितभू को स्र्वोीकार विकया गया था, सिजसे एक र्वोर्ष क े बाद विर्वोद्वत अ ीनस्थ न्यायालय ने स्र्वोीकार कर खिलया था। इसक े बाद पहले आर्वोेदन पत्र सं. 8 ग को आक्षेविपत आदेश द्वारा @ारिरज कर विदया गया जो र्वोतमान पुनरीक्षण में आक्षेविपत है। विर्वोपक्षी की ओर से विर्वोद्वान र्वोरिरष्ठ अधि र्वोpा श्री Aब्ल्यू एच @ान र्वो उनक े सहयोगी विर्वोद्वान अधि र्वोpा श्री आनंद श्रीर्वोास्तर्वो का कहना है विक एक बार प्रधितभू को स्र्वोीकार कर खिलए जाने क े बाद, पहले का आर्वोेदन विनरथक हो गया है जो र्वोतमान संशो न में आक्षेविपत आदेश है, इसखिलए पुनरीक्षण याधिचयों को कोई भी प्रधितक ू लता नहीं विमली है। पक्षकारों क े विर्वोद्वान अधि र्वोpा द्वारा दी गई दलीलों क े मद्देनजर इस न्यायालय की राय है विक एक बार प्रधितभू को अ ीनस्थ न्यायालय द्वारा स्र्वोीकार कर खिलए जाने पर जैसा विक विर्वोपक्षी क े विर्वोद्वान अधि र्वोpा श्री Aब्ल्यू.एच.@ान द्वारा भी कहा गया है, इस मामले को शीघ्रता से विनण‹त करने का विनदmश विदया जा सकता है, तद्नुसार इसे इस कारण विनदmणिशत विकया जाता है। उपरोp विनदmशों क े साथ, इस पुनरीक्षण को विनस्तारिरत विकया जाता है।” उद्देNय क

7. यह आदेश विदनांक 03.12.2015 को पारिरत विकया गया था। उp आदेश क े आ ार पर विर्वोचारण न्यायालय ने विदनांक 07.12.2016 क े आदेश द्वारा उच्च े आदेश को ध्यान में र@ते हुए पाया विक अपीलकताओं ने अधि विनयम की ारा 17 क े तहत आर्वोेदन प्रस्तुत विकया है। सीपीसी क े आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन पेश करने क े समय अधि विनयम, और हालांविक आर्वोेदन संख्या 14 सी क े आ ार पर आर्वोेदन 8 सी को आदेश विदनांविकत 23.09.2015 द्वारा @ारिरज कर विदया गया था, इस विनणय क े मद्देनजर क े दारनाथ बनाम मोहन लाल क े सरर्वोरी एर्वों अन्य में न्यायालय ने पाया विक अपीलकता ने धिAक्री की राणिश जमा करने क े संबं में अधि विनयम की ारा 17 (1) का अनुपालन विकया था और उच्च े प्रधितभूधित 'स्र्वोीकार विकए जाने क े आदेश को ध्यान में र@ते हुए भी ' यह पाया गया विक अपीलकताओं द्वारा प्रस्तुत प्रधितभूधित भी पयाप्त थी। आगे यह पता चला विक अपीलकताओं पर समन की तामील का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था। इसखिलए, आदेश IX विनयम 13, (4C) क े तहत आर्वोेदन को 1500 रुपये की लागत क े साथ अनुमधित दी गई थी। बदले में, इस आदेश को अपर सिजला न्याया ीश, कानपुर (शहरी) क े समक्ष चुनौती दी गई थी। विदनांक 01.08.2017 क े आदेश द्वारा आदेश विदनांक 07.12.2016, 23.09.2015 एर्वों 04.10.2016 क े आदेशों को '@ारिरज' कर विदया गया तथा अन्य बातों क े साथ-साथ यह पाया गया विक: "26. न्याधियक दृ„ांत अथात क े दारनाथ (ऊपरोp) क े मामले में इस न्यायालय क े स्प„ दृवि„कोण से, माननीय सर्वो च्च न्यायालय ने सिसद्धांत स्थाविपत विकया, ऐसा सिसद्धांत पूरी तरह से माननीय उच्च न्यायालय की @ंAपीL द्वारा न्याधियक उद्धरण यानी राजक ु मार उद्देNय क म@ीजा (ऊपरोp) क े मामले में स्प„ विकया गया। यविद यह उपरोp दोनों कानूनी सिसद्धांतों क े विर्वोपरीत कोई पूर्वो स्थाविपत कानूनी सिसद्धांत है, तो ऐसी परिरश्मिस्थधितयों में, इसे स्थाविपत सिसद्धांत पर र्वोरीयता नहीं दी जा सकती है। यह अविनर्वोाय है और पुनरीक्षण आर्वोेदन पर विर्वोचार करने से पहले, विर्वोद्वान विर्वोचारण न्यायालय को अर्वोNय ही इस तथ्य से संतु„ होना चाविहए विक उपरोp ारा 17 का पालन विकया गया है या नहीं? और इस तरह की संतुवि„ को बाद क े चरण क े खिलए नहीं छोड़ा जा सकता है। र्वोतमान मामले में, प्रांतीय लघु र्वोाद अधि विनयम की ारा 17 क े तहत आर्वोेदन पत्र संख्या 28C प्रस्तुत विकया गया था। र्वोास्तर्वो में आज तक, उस पर कोई आदेश पारिरत नहीं विकया गया है और 23.09.2015 को आर्वोेदन को इस आ ार पर @ारिरज कर विदया गया है विक पहले से ही आर्वोेदन अथात दस्तार्वोेज संख्या 34 सी पर आदेश पारिरत विकया जा चुका है। आर्वोेदन यानी दस्तार्वोेज सं. 34 सी को क े र्वोल इस आशय से प्रस्तुत विकया गया था विक प्रधितभूधित को रिरकॉA पर खिलया जाना है, सिजसे न्यायालय द्वारा स्र्वोीकार विकया गया था, इसका मतलब है विक प्रधितभू को रिरकॉA पर ले खिलया गया था, लेविकन इस आदेश पर विर्वोचार नहीं विकया जा सकता है विक प्रधितभूधित को पयाप्त विर्वोचार/अनुमाविनत करक े स्र्वोीकार विकया गया था। तत्पश्चात पुन: जब न्यायालय क े विनदmश पर प्रधितर्वोादी की ओर से आर्वोेदन पत्र अथात दस्तार्वोेज सं. 90 सी और 102 सी प्रस्तुत विकया गया, ऐसी परिरश्मिस्थधितयों में इस तरह क े आर्वोेदनों पर कोई उधिचत आदेश पारिरत नहीं विकया गया था। यविद इन परिरश्मिस्थधितयों में उद्देNय क यह दे@ा जाता है, तो प्रधितभू स्र्वोीकार करने क े खिलए कोई आदेश नहीं विदया गया है, इसक े अभार्वो में, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है विक यह प्रांतीय लघुर्वोाद अधि विनयम की ारा 17 क े प्रार्वो ान का विकसी भी श्मिस्थधित में अनुपालन नहीं करता है। लेविकन क े दारनाथ क े मामले में माननीय सर्वो च्च न्यायालय द्वारा स्थाविपत सिसद्धांत क े रूप में विक न्यायालय की ओर से आदेश पारिरत करने में देरी करने की श्मिस्थधित में प्रधितर्वोादी को दोर्षी या धिAफॉल्टर घोविर्षत नहीं विकया जा सकता है, र्वोतमान मामले में भी, यह पुनरीक्षण न्यायालय प्रधितर्वोाविदयों को दोर्षी / धिAफॉल्टर घोविर्षत नहीं कर सकता है।

27. क्या प्रधितर्वोादी ने प्रांतीय लघु र्वोाद न्यायालय अधि विनयम की ारा 17 क े प्रार्वो ानों का पालन विकया या नहीं? यह एक तथ्य का प्रश्न है और इसे क े र्वोल विर्वोद्वान विर्वोचारण न्यायालय द्वारा ही तय/अधि विनर्भिणत विकया जा सकता है। ऐसी परिरश्मिस्थधितयों में, यह विर्वोधि क े स्थाविपत सिसद्धांत क े अनुसार नहीं था उपरोp ारा 17 क े अनुपालन क े संबं में Lोस विनष्कर्ष क े विबना पुनरीक्षण याधिचकाकता को कानून क े प्रार्वो ान और आक्षेपधित आदेश रद्द करने योग्य है। "

8. तत्पश्चात् विनम्नखिलखि@त आदेश विदया गया: "पुनरीक्षण स्र्वोीकार विकया जाता है। आक्षेविपत आदेश विदनांक 07.12.2016 और आदेश विदनांक 23.09.2015 और 04.10.2016 को क्रमशः @ारिरज विकया जाता है और यह विनचली उद्देNय क अदालत को विनदmश है विक सबसे पहले र्वोादी की आपखित्तयों क े आलोक में, प्रांतीय लघुर्वोाद अधि विनयम की ारा 17 या जमा राणिश पर अपनी रिरपोट क े संबं में गैर -अनुपालन और प्रस्तुत प्रधितभू यानी दस्तार्वोेज़ संख्या 16C/36C क े बाद धिAक्री पारिरत करें।" और उसक े बाद पुनरीक्षण याधिचका पर पक्षकारों की सुनर्वोाई पर कानून क े विन ारिरत प्रार्वो ानों क े अनुसार उधिचत आदेश पारिरत करें। र्वोतमान मामले क े तथ्यों और परिरश्मिस्थधितयों में, पक्षकार अपने-अपने @च का र्वोहन करेंगी। रिरकॉA फ़ाइल र्वोापस करें। पक्षकारों को 24.08.2017 को विर्वोद्वत विर्वोचारण न्यायालय क े समक्ष उपश्मिस्थत होने का विनदmश विदया जाता है। "

9. उपरोp आदेश क े आ ार पर विर्वोचारण न्यायालय ने विदनांक 11.02.2019 क े आदेश द्वारा ारा 17 क े अन्तगत विदनांक 06.05.2014 क े आर्वोेदन और विदनांक 12.05.2015 क े आर्वोेदन को भी @ारिरज कर विदया। अपीलकताओं द्वारा प्रदान विकया गया प्रधितभू भी @ारिरज कर दी गई थी। अपीलकताओं द्वारा दायर पुनरीक्षण में एAीजे द्वारा आदेश विदनांक 26.02.2021 द्वारा इस आदेश की पुवि„ की गई। यह पाया गया विक एAीजे द्वारा पारिरत आदेश विदनांविकत 01.08.2017 विर्वोचारण े खिलए बाध्यकारी था। हम विनम्नखिलखि@त तक• पर ध्यान देते हैं: “...उपरोp संपूण बहस क े आ ार पर यह स्प„ है विक आर्वोेदक सं. 3 अथात् अणिभर्षेक दीधिक्षत उस दुकान की भूविम का स्र्वोामी नहीं है सिजसक े पुनरीक्षणर्वोाविदयों/आर्वोेदकों की आर्वोेदक सं. 3 अथात् अणिभर्षेक दीधिक्षत को दुकान क े प्रधितभू क े रूप में प्रस्तुत विकया गया था एर्वों दुकान की उपरोp भूविम का स्र्वोाविमत्र्वो नगर विनगम कानपुर उद्देNय क महानगर, कानपुर में विनविहत है। अतः सिसविर्वोल प्रविक्रया संविहता की ारा 145 क े प्रार्वो ानों क े तहत प्रधितभूधित को उp दुकान को बेचकर र्वोसूली नहीं की जा सकती है क्योंविक दुकान की उp भूविम पर नगर विनगम, कानपुर महानगर, कानपुर का स्र्वोाविमत्र्वो अधि कार विनविहत है। आर्वोेदक सं. 3 अथात् अणिभर्षेक दीधिक्षत उp दुकान की भूविम का स्र्वोामी नहीं है।...... माननीय उच्च न्यायालय की @ंAपीL द्वारा न्याधियक उद्धरण/ विनणय अथात राजक ु मार म@ेजा एर्वों अन्य बनाम मैसस एस.क े.एस. एंA क ं पनी एर्वों अन्य, 2012 (3) ए.आर.सी. 117 में स्थाविपत सिसद्धांत क े अनुसार, अब इस स्तर पर प्रधितभू पेश करने क े खिलए पुनरीक्षण याधिचयों को समय सीमा प्रदान/विर्वोस्तारिरत नहीं की जा सकती क्योंविक अब, प्रधितभू पेश करने की सीमा अर्वोधि समाप्त हो गई है। इस तरह, यह स्प„ है विक आर्वोेदकों/पुनरीक्षण याधिचयों ने प्रांतीय लघुर्वोाद अधि विनयम की ारा 17 क े प्रार्वो ानों का पूरी तरह पालन नहीं विकया है। "

10. इसक े बाद अपीलकताओं ने एAीजे द्वारा पारिरत आदेश विदनांक 01.08.2017, विर्वोचारण न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश विदनांक 11.02.2019 और एAीजे द्वारा पारिरत आदेश विदनांक 26.02.2021 को चुनौती देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े समक्ष एक रिरट याधिचका दायर की। विनष्पादन मामले में एAीजे द्वारा पारिरत 09.03.2021 विदनांविकत आदेश, सिजसमें एकपक्षीय धिAक्री क े आ ार पर अपीलकताओं को बेद@ल करने का आदेश विदया गया था, को भी चुनौती दी गई थी। उद्देNय क

11. आक्षेविपत आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने उp रिरट याधिचका को @ारिरज कर विदया है। अन्य बातों क े साथ-साथ, उच्च न्यायालय द्वारा यह पाया गया विक प्रधितभू को मुp करने क े खिलए कोई आर्वोेदन दायर नहीं विकया गया था। बश्मिल्क प्रधितभूधित देने क े खिलए अनुमधित मांगी गई थी। आगे यह पाया गया विक ारा 17 की आर्वोNयकता अविनर्वोाय है और प्रधितभू प्रस्तुत विकए विबना आर्वोेदन दाखि@ल करना और उससे छ ू ट क े खिलए कोई प्राथना नहीं करना अपीलकताओं क े खि@लाफ जाएगा। यह पाया गया विक क े र्वोल एक आर्वोेदन (14 सी) विदनांक 12.05.2014 को दायर विकया गया था, सिजसमें प्राथना क े र्वोल 'आर्वोेदन को अणिभले@ में र@ने' की थी। विदनांक 24.05.2014 को आर्वोेदन को अणिभले@ पर र@ने का आदेश पारिरत विकया गया था। यह पाया गया विक आर्वोेदन (14 सी), सीपीसी क े आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन दाखि@ल करने क े बाद विकया गया था। विदनांक 24.05.2014 को 50,000 / - रुपये की राणिश की प्रधितभूधित जमा की गई थी। यह पाया गया विक क े दारनाथ (उपरोp) क े मामले में इस न्यायालय यह ारिरत नहीं विकया है विक जहां अक्षम प्रधितभू प्रस्तुत विकया गया हो, न्यायालय उससे छ ू ट दे सकता है। यह भी पाया गया विक अपीलकताओं द्वारा अर्वोलंविबत विनणय लागू नहीं होंगे क्योंविक विदनांक 23.09.2015 क े आदेश से पहले उधिचत प्रधितभू देने क े खिलए विर्वोचारण न्यायालय क े समक्ष प्राथना करने क े बजाय, अपीलकताओं ने मुकदमेबाजी का सहारा खिलया और विकसी भी स्तर पर उन्होंने विर्वोधि क े अनुसार प्रधितभू प्रस्तुत नहीं विकया। यह पाया गया विक विर्वोधि क े प्रश्न क े संबं में एक अधि र्वोpा द्वारा रिरयायत, पक्षकार क े खिलए बाध्यकारी नहीं थी। यह र्वोादीगण क े र्वोरिरष्ठ अधि र्वोpा क े कथन क े आ ार पर अपीलकताओं की दलीलों पर विर्वोचार करने क े कारण है जो हाईकोट क े आदेश सिजसे हमने उधिद्धृत विकया है,से परिरलधिक्षत होता है। उद्देNय क

12. हमने अपीलकताओं की ओर से श्री प्रणय क ु मार महापात्र को सुना। हमने प्रत्यथ‹ की ओर से विर्वोद्वान र्वोरिरष्L अधि र्वोक्ता एस.आर. सिंसह को भी सुना। अपीलकताओं क े तक

13. अपीलकताओं ने सीपीसी क े आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन क े साथ-साथ अधि विनयम की ारा 17 क े तहत एक ही विदन, यानी 06.05.2014 को आर्वोेदन विदया था। विर्वोचारण न्यायालय ने ारा 17 क े तहत 06.05.2014 विदनांविकत आर्वोेदन पर कोई आदेश पारिरत नहीं विकया था। ारा 17 क े तहत आर्वोेदन उसी विदन दायर विकया जा रहा है सिजस विदन आदेश IX विनयम 13 क े तहत एक आर्वोेदन क े दारनाथ (उपरोp) क े मामले में इस न्यायालय क े विनणय क े संदभ में र्वोै रूप से दायर विकया गया था। न्यायालय द्वारा ारा 17 क े तहत 06.05.2014 विदनांविकत आर्वोेदन पर आदेश पारिरत न करना गलत था। न्यायालय की गलती क े कारण अपीलकताओं को क„ नहीं विदया जा सकता। 24.05.2014 को, प्रधितभूधित को रिरकॉA पर लेने क े खिलए दायर आर्वोेदन को स्र्वोीकार कर खिलया गया। आर्वोेदन (14 सी) में प्राथना को ‘रिरकॉA पर ले खिलया गया।’ ारा 17 क े तहत विदनांक 06.05.2014 का पहले का आर्वोेदन विर्वोचारण क े खिलए लंविबत था। सिजस प्रधितभूधित को स्र्वोीकार विकया गया था, र्वोह दुकान संख्या 25 थी। उसे नगर परिरर्षद, कानपुर द्वारा आर्वोंविटत विकया गया था। आर्वोंटन क े खिलए, रु. 85,000 / - की राणिश स्थानीय विनकाय द्वारा प्राप्त विकया गया था, सिजसे जमा कर विदया गया था। एक बार प्रधितभूधित स्र्वोीकार कर खिलए जाने पर, विन ारिरत अर्वोधि क े बाद पाई जाने र्वोाली कोई भी कमी, अपीलकताओं क े सामने नहीं लाई जा सकती। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूण पीL द्वारा भगर्वोानदास अरोड़ा बनाम प्रथम एAीजे रामपुर क े मामले में विदए गए विनणय का अर्वोलंब खिलया गया। इसक े अलार्वोा, भगर्वोान दास अरोड़ा बनाम प्रथम अपर सिजला न्याया ीश, रामपुर एर्वों अन्य क े उद्देNय क मामले में इस न्यायालय क े विनणय का अर्वोलंब खिलया गया। विर्वोचारण न्यायालय ने दो साल बाद अथात, 29.03.2015 को प्रधितभूधित क े संबं में 'अपयाप्त प्रधितभूधित' कहते हुए आदेश पारिरत विकया। विर्वोचारण न्यायालय को विन ारिरत अर्वोधि क े भीतर 'पयाप्त प्रधितभूधित' क े संबं में विनदmश देना था। यविद र्वोह पारिरत विकया गया होता और विर्वोचारण न्यायालय 'पयाप्त प्रधितभूधित ' क े संबं में सर्वोाल उLाता है,तो अपीलकता न्यायालय क े आदेश क े विबना अन्य प्रधितभूधित या नकदी जमा न करता । उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश विदनांक 03.12.2015 पर अर्वोलंब खिलया गया है। उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश को दे@ते हुए, पदानुक्रविमत व्यर्वोस्था में, एAीजे ने उच्च न्यायालय क े आदेश की अनदे@ी करक े गलती की। हमें ध्यान आता है विक एAीजे का आदेश विदनांविकत 01.08.2017 को भी रिरट याधिचका में उच्च े समक्ष चुनौती दी गई थी। मामले क े मेरिरट पर विर्वोचार विकया जाना चाविहए। प्रधितर्वोादी सं. 1 से 6 क े तक

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14. ारा 17 क े तहत आर्वोNयकताएं अविनर्वोाय हैं। प्रधितभूधित विदनांक 06.05.2014 को नहीं बश्मिल्क 24.05.2014 को दायर की गई थी। इसखिलए, ारा 17 (1) क े परंतुक की अविनर्वोाय शत का पालन नहीं विकया गया था। न्यायालय को आर्वोेदन अन्तगत ारा 17 (8 सी) विदनांविकत 06.05.2014 पर प्रधितभूधित की प्रक ृ धित का संक े त देते हुए एक आदेश पारिरत करना चाविहए था जो धिAक्री क े खिलए पयाप्त होता। हालांविक, यह तक विदया गया था विक यह स्प„ नहीं है विक अपीलकताओं ने ारा 17 क े तहत विदनांक 06.05.2014 क े आर्वोेदन पर क्यों बल नहीं विदया और प्रधितभूधित क े खिलए अन्य आर्वोेदन दायर विकया। इसखिलए, न्यायालय की ओर से ारा 17 क े तहत विदनांविकत 06.05.2014 आर्वोेदन पर आदेश पारिरत करने में विर्वोफलता अपीलकताओं को यह दार्वोा करने का अधि कार उद्देNय क देने र्वोाला कारक नहीं हो सकता है विक एक आदेश क े अभार्वो में, र्वोे पूर्वोाग्रह से ग्रसिसत थे। यह इस कारण से है विक उन्हें अधि विनयम की ारा 17 (2) क े संबं में ज्ञात होना चाविहए विक प्रधितभूधित ऐसी होनी चाविहए जो विर्वोधि में प्रर्वोतनीय हो। जो प्रधितभूधित दी गई, उसमें दुकान का कमरा शाविमल था, जो नगर विनगम का था, न विक श्री अणिभर्षेक दीधिक्षत (प्रधितभू) का, जो तीसरा रिरट याधिचकाकता था और सिजसे अपील में प्रोफामा प्रधितर्वोादी संख्या 7 क े रूप में विद@ाया गया है। प्रधितभूधित प्रर्वोतनीय नहीं थी। प्रधितभूधित प्रदान करने की समय सीमा समाप्त हो गई थी। जबविक ारा 17 क े तहत आर्वोेदन आदेश IX विनयम 13 क े साथ दायर विकया जा सकता है, प्रधितभूधित आर्वोेदन क े साथ दायर विकया जाना चाविहए। अन्यथा, न्यायालय क े खिलए यह पता लगाना संभर्वो नहीं होगा विक जो प्रधितभूधित दायर की गई थी, र्वोह अधि विनयम में थी या नहीं। यह मानने पर भी विक ारा 17 (2) क े अनुरूप प्रधितभूधित बाद में प्रस्तुत की जा सकती है, बाद में प्रस्तुत प्रधितभूधित विर्वोधि में प्रर्वोतनीय नहीं थी। आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन इस आ ार पर @ारिरज नहीं विकया गया है विक प्रधितभूधित प्रस्तुत नहीं की गई थी लेविकन इस आ ार पर विक 12.05.2014 को दी गई प्रधितभूधित (आर्वोेदन 14 सी) र्वोै प्रधितभूधित नहीं थी। इसखिलए, यह दलील विक अपीलकता न्यायालय की गलती क े कारण पीविड़त नहीं हो सकते, उत्पन्न नहीं होता है। विर्वोश्लेर्षण; 3 विनणय; क े दारनाथ (उपरोp)

15. हम अधि विनयम की ारा 17 पहले ही रे@ांविकत कर चुक े हैं। यह ध्यान देना आर्वोNयक है विक क े दारनाथ (उपरोp) में, अन्य बातों क े साथ -साथ, इस न्यायालय ने विनम्नखिलखि@त ारिरत विकया: "8. प्रार्वो ान को क े र्वोल पढ़ने से पता चलता है विक विर्वो ाधियका ने अविनर्वोाय रूप में परंतुक की भार्षा को अपनाने क े खिलए चुना है और उद्देNय क हम विनदmणिशका क े रूप में परंतुक की प्रक ृ धित की व्याख्या, विनर्वोचन और ारिरत करने का कोई कारण नहीं दे@ते हैं। लघु र्वोाद न्यायालय द्वारा पारिरत एकपक्षीय धिAक्री को अपास्त करने क े आर्वोेदन या उसक े फ ै सले की समीक्षा का आर्वोेदक क े साथ धिAक्री या विनणय क े अनुसरण में र्वोांधि त राणिश होना चाविहए। जमा करने क े खिलए प्रार्वो ान प्रधितभूधित प्रदान करने की अनुमधित और उसकी प्रक ृ धित क े खिलए न्यायालय क े विनदmश की मांग करने र्वोाले आर्वोेदक द्वारा विपछले आर्वोेदन क े अ ीन न्यायालय द्वारा अपने विर्वोर्वोेक से छ ू ट दी जा सकती है। प्रार्वो ान उस समय सीमा का उपबं नहीं करता है सिजसक े द्वारा छ ू ट क े खिलए आर्वोेदन दायर विकया जा सकता है। हमें लगता है विक यह विकसी भी समय एकपक्षीय धिAक्री को अपास्त करने या समीक्षा और न्यायालय को आर्वोेदन की प्रस्तुधित क े समय तक दायर विकया जा सकता है। इसे विपछले आर्वोेदन क े रूप में माना जा सकता है। आर्वोेदक का दाधियत्र्वो छ ू A क े खिलए आर्वोेदन को देना है। इसक े बाद अदालत को एक त्र्वोरिरत आदेश देना होगा। उधिचत आदेश पारिरत करने में अदालत की ओर से देरी आर्वोेदक क े खि@लाफ नहीं मानी जाएगी क्योंविक न्यायालय की गलती क े कारण विकसी को क„ नहीं होना चाविहए।

9. मौजूदा मामले में, एकपक्षीय धिAक्री को अपास्त करने क े खिलए आर्वोेदन क े साथ आर्वोेदक द्वारा धिAक्री क े तहत देय राणिश को अदालत में जमा नहीं विकया गया था। आर्वोेदक ने जमा राणिश क े छ ू ट क े खिलए कोई आर्वोेदन भी नहीं विदया था और धिAक्री क े विनष्पादन क े खिलए ऐसी प्रधितभूधित प्रस्तुत करने क े खिलए न्यायालय की अनुमधित उद्देNय क नहीं मांगी थी जो न्यायालय ने विनदmश विदया हो। इसखिलए धिAक्री को अपास्त करने का आर्वोेदन अक्षम था। इस पर विर्वोचार और इसे स्र्वोीक ृ धित नहीं दी जानी चाविहए थी। राम भरोसे क े मामले में पूण पीL

16. चूंविक अपीलकताओं ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूण पीL क े फ ै सले का भी अर्वोलंब खिलया है, इसखिलए हम उसे अथात राम भरोसे बनाम गंगा सिंसह को संदर्भिभत करना उधिचत समझते हैं। उच्च न्यायालय की पूण पीL विनम्नखिलखि@त तथ्यों पर विर्वोचार कर रही थी: आदेश IX विनयम 13 क े साथ धिAक्री राणिश को कर्वोर करने क े खिलए एक प्रधितभूधित बांA था। एक प्रश्न यह था विक क्या आर्वोेदन इस कारण अपोर्षणीय था विक अधि विनयम की ारा 17 क े संदभ में धिAक्री राणिश जमा करने या प्रधितभूधित दाखि@ल करने क े संबं में न्यायालय का विनदmश प्राप्त नहीं विकया गया था। तीन अलग-अलग राय दी गई। न्याया ीश मु@ज‹ द्वारा प्रस्तुत राय में, हम इसका उल्ले@ करना उधिचत समझते हैं "17. अब मैं दूसरे बिंबदु पर विर्वोचार करता हूं। प्रांतीय लघु र्वोाद न्यायालय अधि विनयम की ारा 17 को सी े तौर पर पढ़ने पर, एक फ ै सले को रद्द कराने क े खिलए आर्वोेदक को इन चीजों को करना होगा: सबसे पहले उसे आर्वोेदन करना चाविहए सिजस न्यायालय में र्वोह आर्वोेदन करने का प्रस्तार्वो करता है, उसे यह बताने क े खिलए विक आर्वोेदक क े आर्वोेदन में र्वोर्भिणत परिरश्मिस्थधितयों में विकस प्रकार की प्रधितभूधित न्यायालय को उसे प्रस्तुत करने की आर्वोNयकता होगी। उद्देNय क आमतौर पर न्यायालय नकद प्रधितभूधित की मांग करेगा, लेविकन यह आर्वोेदक क े अभ्यार्वोेदन पर संतु„ हो सकता है विक नकद प्रधितभूधित से छ ु टकारा पाया जा सकता है। दुलभ मामलों में, जैसा विक नीचे विदए गए झब्बू विमसिसर क े मामले में मेरे फ ै सले में मेरे द्वारा विदए गए उदाहरण में, न्यायालय नकद प्रधितभूधित लेने से इनकार कर सकता है और अन्य प्रकार की प्रधितभूधित लेने पर जोर दे सकता है और विर्वोर्वोाद की ही चल संपखित्त पर जोर दे सकता है। जब न्यायालय अपना विनदmश देता है, अथात्, क्या आर्वोेदक को नकद प्रधितभूधित देनी है या विकसी अन्य प्रकार की प्रधितभूधित देनी है, तो आर्वोेदक को प्रधितभूधित क े साथ -साथ धिAक्री को रद्द करने क े खिलए अपना आर्वोेदन प्रस्तुत करना चाविहए। विफर उसक े कतव्य समाप्त हो जाते हैं। दायर की गई प्रधितभूधित की अदालत द्वारा जांच की जाएगी, और न्यायालय यह दे@ेगा विक प्रधितभूधित उसक े खिलए संतोर्षजनक है या नहीं। विफर एक नोविटस र्वोादीगण को भेजी जाएगी विक क्यों न धिAक्री अपास्त कर दी जाए। यही दृवि„कोण मैंने झब्बू विमसिसर बनाम हर्वोलदार धितर्वोारी क े मामले में र@ा था।

18. यद्यविप विनयम ( ारा 17, लघु र्वोाद न्यायालय अधि विनयम) क े अनुसार एक पक्षीय धिAक्री अपास्त करने क े खिलए विदए जाने र्वोाले े समय प्रधितभूधित की आर्वोNयकता होती है, इस न्यायालय में मोती लाल राम चंद्र दास बनाम दुगा प्रसाद मनु/यूपी/0193/1930: AIR1930A11830 क े मामले में यह ारिरत विकया गया विक आर्वोेदन विकए जाने क े बाद भी प्रधितभूधित प्रदान की जा सकती है, बशतm प्रधितभूधित 30 विदनों की सीमा क े उद्देNय क भीतर दी जाए। इस विनणय में मैं भी एक पक्षकार था। यह विर्वोचार अन्य उच्च न्यायालयों द्वारा भी अपनाया गया था: दे@ें र्वोी.एम. असन मोहम्मद साविहब बनाम एम.ई. रहीम साविहब [1920] 43 मैA. 579, जेनु मुची बनाम बुधि राम मुची [1905] 32 क ै ल. 339 और नारायण बनाम पूदन मनु/ओयू/0001/1929। इस विनणय का कारण यह है विक पहले विकए गए आर्वोेदन को उस तारी@ को माना जा सकता है सिजस विदन प्रधितभूधित प्रस्तुत की गई थी, क्योंविक परिरसीमा की अर्वोधि अभी तक समाप्त नहीं हुई है, और यह एक मात्र औपचारिरकता होगी (सिजसमें छ ू ट दी जा सकती है) आर्वोेदक विनदmश देने क े खिलए विक र्वोह उस विदन एक नया आर्वोेदन दाखि@ल करने जब उसने प्रधितभूधित विदया। xxx xxx xxx

20. जहां कोई आर्वोेदक, न्यायालय क े विनदmश क े खिलए औपचारिरक रूप से आर्वोेदन विकए विबना, एक पक्षीय धिAक्री को रद्द करने क े खिलए आर्वोेदन करता है और इसक े साथ प्रधितभूधित प्रस्तुत करता है और न्यायालय दूसरे पक्ष को नोविटस जारी करने का विनदmश देता है, तो यह माना जाना चाविहए विक न्यायालय इस तथ्य से अर्वोगत है विक आर्वोेदक ने ारा 17, लघु र्वोाद न्यायालय अधि विनयम क े तहत अपेधिक्षत प्रधितभूधित प्रस्तुत की है।आर्वोेदक द्वारा अपने प्राथना-पत्र और हलफनामे (यविद कोई हो) में बताई गई परिरश्मिस्थधितयों में, न्यायालय द्वारा यह आदेश विक नोविटस जारी की जानी चाविहए, को न्यायालय क े प्रस्तुत प्रधितभूधित क े अनुमोदन क े रूप में माना जाना चाविहए। हम यह भी मान सकते हैं विक, न्यायालय ने विनविहताथ से आर्वोेदक को विनदmश विदया विक उसे र्वोास्तर्वो में उसक े द्वारा प्रस्तुत विकए गए प्रकार की प्रधितभूधित प्रस्तुत करनी चाविहए।यह उस पर काबू उद्देNय क पाने का अधि क प्रयास नहीं है सिजसे कानून क े कविLन विनदmश माना जा सकता है। यविद न्यायालय उपरोp मामले में नोविटस जारी करने क े बजाय, इस प्राथना-पत्र को @ारिरज कर देता है क्योंविक उसका विनदmश प्राप्त नहीं हुआ है, और यविद परिरसीमा पहले ही समाप्त नहीं हुई है, तो यह आर्वोेदक क े पास विर्वोकल्प होगा विक र्वोह एक नया आर्वोेदन करे और ऐसी प्रधितभूधित प्रस्तुत करे जैसा विक न्यायालय विनदmश दे।कोई पक्ष न्यायालय क े काय से पीविड़त नहीं हो सकता है और इसखिलए हमें इस श्मिस्थधित को स्र्वोीकार करना चाविहए विक न्यायालय ने र्वोास्तर्वो में प्रस्तुत प्रधितभूधित को प्रस्तुत करने क े खिलए कानून क े अनुसार विनदmश विदया है, जहां न्यायालय प्रत्यथ‹ क े प्राथना-पत्र को स्र्वोीकार करने क े बजाय विनदmश देता है विक एक नोविटस जारी विकया जाना चाविहए।

23. इसखिलए मैं सिजस विनष्कर्ष पर पहुँचता हूँ र्वोह यह है विक उधिचत माग यह है विक प्रधितभूधित की प्रक ृ धित क े बारे में उसका विनदmश प्राप्त करने क े खिलए न्यायालय में आर्वोेदन करे और विफर एक पक्षीय धिAक्री को रद्द करने क े खिलए न्यायालय द्वारा विनदmणिशत प्रधितभूधित की प्रक ृ धित क े साथ आर्वोेदन करना है। प्रस्तुत प्रधितभूधित को े विनदmशों का पालन करना चाविहए और न्यायालय यह दे@ेगा विक प्रधितभूधित उसकी संतुवि„ क े खिलए पयाप्त है। लेविकन जहां न्यायालय विबना विकसी प्रश्न क े प्रधितभूधित को स्र्वोीकार करता है और जारी करने क े खिलए एक नोविटस का विनदmश देता है, र्वोह आर्वोNयक विनविहताथ से एक विनदmश देता है विक प्रधितभूधित उसक े द्वारा विनदmणिशत प्रक ृ धित की होनी चाविहए और यह विक प्रस्तुत प्रधितभूधित उसकी नजर में पयाप्त हो।” न्यायमूर्तित बॉयज़ द्वारा खिलया गया दृवि„कोण, जहाँ तक प्रासंविगक है, विनम्नखिलखि@त पैराग्राफ में विनविहत हैः उद्देNय क "37. इससे विनष्कर्ष यह विनकलता है विक आर्वोेदन करने में विकसी भी प्रारंणिभक दोर्ष को धिAक्री- ारक को नोविटस जारी करने क े आर्वोेदक क े रास्ते में आने की अनुमधित नहीं दी जानी चाविहए, बशतm विक एक आर्वोेदन दायर विकया गया हो और आगे यह विक नकद जमा विकया गया हो, या, यविद न्यायालय ने ऐसा अनुमधित दी है, तो 30 विदनों की समाविप्त से पहले प्रधितभूधित दी गई हो। इसखिलए इस ारा की एक उधिचत और व्यार्वोहारिरक व्याख्या इस प्रकार हैः (1) आर्वोेदक को 30 विदनों क े भीतर या तो नकद क े साथ या इस कथन क े साथ अपना आर्वोेदन दायर करना चाविहए विक र्वोह प्रधितभूधित देने क े खिलए तैयार है (और बाद क े मामले में, र्वोह विनधिश्चत रूप से, प्रधितभूधित का प्रस्तार्वो दे सकता है और न्यायालय क े खिलए पूछ सकता है (2) उस मामले में जहां र्वोह प्रधितभूधित देना चाहता है, यविद न्यायालय (प्रधितभूधित) का विनदmश देने से इनकार करता है, तो उसे [30 विदनों क े भीतर नकद जमा करना होगा, अन्यथा उसका आर्वोेदन [अस्र्वोीकार कर विदया जाएगा। (3) यविद न्यायालय प्रधितभूधित का विनदmश देने क े खिलए सहमत होता है, तो (क) र्वोह (पहले से दी गई प्रधितभूधित पर विर्वोचार करेगा, यविद इसे देने का प्रस्तार्वो विकया गया है; या (@) अपनी संतुवि„ क े खिलए प्रधितभूधित बताना चाविहए जो 30 विदनों क े भीतर दाखि@ल की जानी चाविहए। (4) यविद आर्वोेदक र्वोास्तर्वो में कोई विनदmश नहीं मांगता है या यविद आर्वोेदक कोई विनदmश मांगता है, तो न्यायालय र्वोास्तर्वो में कोई विनदmश नहीं देता है, लेविकन र्वोास्तर्वो में न्यायालय नोविटस जारी करता है, तो यह माना जाएगा विक न्यायालय ने नकद जमा करने या जैसा भी मामला हो, दी गई प्रधितभूधित को मंजूरी दे दी है। (5) यविद 30 विदनों क े भीतर दाखि@ल विकया जाता है और न्यायालय द्वारा नोविटस जारी करक े अणिभव्यp रूप से या विर्वोर्वोधिक्षत रूप से स्र्वोीकार विकया जाता है, तो आर्वोेदन एक अच्छा आर्वोेदन है, हालांविक धिAक्री- ारक क े पास विर्वोकल्प होगा विक र्वोह प्रधितभूधित की प्रक ृ धित में भूविम की पयाप्तता को चुनौती दे और न्यायालय आदेश 9, विनयम 9 क े तहत ऐसी उद्देNय क अधितरिरp शत¥ लगाये जो र्वोह उधिचत समझे। बहस क े दौरान यह सुझार्वो विदया गया है विक यविद न्यायालय अपना विनदmश देने में देरी करता है, या पहले से ही दी गई प्रधितभूधित को अणिभव्यp रूप से या विर्वोर्वोधिक्षत रूप से अनुमोविदत करता है, तो कविLनाई उत्पन्न हो सकती है, जब तक विक आर्वोेदक को विनदmश का पालन करने का उधिचत अर्वोसर विमलने से पहले परिरसीमा की अर्वोधि समाप्त हो गई थी। यह एक ऐसा मामला नहीं है सिजस पर हमें अब विर्वोचार करना है, लेविकन एक उपयुp मामले में न्यायालय क े पास स्र्वोंय अधि कार होगा विक र्वोह ारा 151, सिसविर्वोल प्रविक्रया संविहता द्वारा इसक े खिलए आरधिक्षत अपनी अंतर्निनविहत शविpयों पर विर्वोचार करे और उनका प्रयोग करे।” मुख्य न्याया ीश सुलेमान ने अन्य न्याया ीशों क े साथ सहमधित व्यp की विक संशो न को @ारिरज विकया जाना चाविहए और उन्होंने अन्य बातों क े साथ- साथ इस प्रकार अणिभविन ारिरत विकयाः "46. इसमें कोई संदेह नहीं है विक परंतुक की भार्षा सही नही है और "अपना आर्वोेदन प्रस्तुत करते समय" अणिभव्यविp और "जैसा विक न्यायालय विनदmश दे" अणिभव्यविp क े बीच क ु छ स्प„ विर्वोसंगधित है ।यविद हम दोनों अणिभव्यविpयों को शाश्मिब्दक रूप से लेते हैं, तो दोनों चीजें विबल्क ु ल एक साथ नहीं हो सकती हैं। लेविकन आर्वोेदन प्रस्तुत करने से पहले या आर्वोेदन प्रस्तुत करने क े Lीक बाद न्यायालय का विनदmश प्राप्त विकया जा सकता है।

47. यह मेरे खिलए विबल्क ु ल स्प„ है विक विन ारिरत अर्वोधि क े बाद कोई आर्वोेदन प्रस्तुत नहीं विकया जा सकता है, और न ही उस अर्वोधि की समाविप्त क े बाद उद्देNय क नकद या प्रधितभूधित जमा की जा सकती है। न्यायालय को समय बढ़ाने का कोई विर्वोर्वोेकाधि कार नहीं विदया गया है। यविद समय क े भीतर जमा की गई प्रधितभूधित बाद में विकसी भी तरह से दोर्षपूण या असंतोर्षजनक पाई जाती है, तो न्यायालय क े पास अर्वोधि की समाविप्त क े बाद इसक े खिलए एक नए प्रधितभूधित को प्रधितस्थाविपत करने का विनदmश देने की कोई शविp नहीं है।

52. बेशक, यह सर्वोाल विक क्या प्रधितभूधित पयाप्त और संतोर्षजनक है, 30 विदनों की अर्वोधि क े दौरान अंततः विन ारिरत करने की आर्वोNयकता नहीं है।र्वोास्तर्वो में, र्वोादी धिAक्री- ारक बाद में आ सकता है और इसकी पयाप्तता को चुनौती दे सकता है।क े र्वोल यह तथ्य विक बाद में यह पाया जाता है विक प्रधितभूधित पयाप्त थी, समय क े भीतर प्रधितभूधित की जमा राणिश को विकसी भी तरह से दोर्षपूण नहीं बनाएगा।” भगर्वोानदास (उपरोp)

17. जहाँ तक भगर्वोानदास (पूर्वो p) में इस न्यायालय क े विनणय का संबं है, प्रासंविगक तथ्य इस प्रकार थेः मुकदमे पर 06.08.1977 को एकपक्षीय आज्ञविप्त पारिरत की गयी। अपीलकता ने अधि विनयम की ारा 17 क े परन्तुक क े तहत उp विदन एक प्राथना-पत्र विदया विक उसे धिAक्री क े तहत देय नकदी क े बदले धिAक्री क े विनष्पादन क े खिलए ऐसी प्रधितभूधित प्रस्तुत करने की अनुमधित दी जाये। उसी विदन, न्यायालय ने उसे इस शत क े अ ीन अनुमधित प्रदान की र्वोह आंणिशक रूप से नकद जमा करे और शेर्षराणिश क े खिलए प्रधितभूधित दे। इसक े पश्चात् 31.08.1977 को, उन्होंने एकपक्षीय धिAक्री को अपास्त करने क े खिलए आदेश IX विनयम 13 क े अ ीन आर्वोेदन प्रस्तुत विकया। उन्होंने 31.08.1977 को नकद भी जमा विकया। उद्देNय क 21.09.1977 को प्रधितभूधित बं पत्र में इंविगत एक दोर्ष क े आ ार पर, न्यायालय ने अपीलकता को त्रुविट को Lीक करने का विनदmश विदया, सिजसमें प्रधितभूधित बं पत्र में मुहर की कमी शाविमल थी।अपीलकता ने उp आदेश का अनुपालन विकया।इन तथ्यों में, न्यायालय ने यह मत व्यp विकया विक अपीलकता का आर्वोेदन इस आ ार पर गलत तरीक े से @ारिरज कर विदया गया था विक बं पत्र में कानूनी दुबलता थी क्योंविक स्टाम्प अधि विनयम क े तहत उस पर मुहर लगाने क े बजाय उस पर Rs.2/क े न्यायालय शुल्क क े साथ मुहर लगाई गई थी। हमारा विनष्कर्ष

18. जब अधि विनयम की ारा 17 क े तहत, अन्य बातों क े साथ- साथ, लघु र्वोाद न्यायालय द्वारा एकपक्षीय धिAक्री पारिरत की जाती है, तो आर्वोेदक, जो एक-पक्षीय धिAक्री को रद्द करने क े खिलए आर्वोेदन प्रस्तुत करता है, विनम्नखिलखि@त काय करने क े खिलए बाध्य हैः क. उसे धिAक्री क े तहत देय राणिश अदालत में जमा करनी होगी; @. र्वोैकश्मिल्पक रूप से, उसे इस संबं में अपने द्वारा विकए गए 'विपछले आर्वोेदन पर' धिAक्री क े विनष्पादन क े खिलए प्रधितभूधित देनी चाविहए;

19. क े दारनाथ (पूर्वो p) में इस न्यायालय क े विनणय को ध्यान में र@ते हुए, ारा 17 क े परंतुक में 'विपछले आर्वोेदन पर' शब्दों को एक आर्वोेदन समझा गया है, सिजसे सीपीसी क े आदेश IX विनयम 13 क े साथ विकया जा सकता है। 06.05.2014 को, उसी विदन न्यायालय ने 19.07.2014 को तारी@ क े रूप में विनयत करते हुए नोविटस जारी करने का आदेश विदया। विनष्पादन की कायर्वोाही 19.07.2014 तक रोक दी गई थी।र्वोास्तर्वो में यह कहा जा सकता है विक अधि विनयम की ारा 17 क े बाद ही नोविटस जारी उद्देNय क करने की अनुमधित थी। अपीलकताओं ने उसी विदन सीपीसी क े आदेश IX विनयम 13 और अधि विनयम की ारा 17 क े तहत एक आर्वोेदन दायर विकया था।यविद ारा 17 क े तहत आर्वोेदन नकद जमा क े साथ था, तो आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन, र्वोास्तर्वो में, पोर्षणीय होता। ारा 17 क े तहत दायर 06.05.2014 क े आर्वोेदन में विर्वोर्वोाद उत्पन्न हुआ, अपीलकताओं ने Rs.98, 624/- की क ु ल राणिश में से Rs.50, 000/- की राणिश क े खिलए प्रधितभूधित जमा करने/प्रस्तुत करने की अनुमधित मांगी थी। उp आर्वोेदन पर कोई आदेश पारिरत नहीं विकया गया था। 12.05.2014 को, अपीलकता ने एक प्राथनापत्र (14 सी) प्रस्तुत विकया।उसमें, अपीलकता ने एक दुकान कक्ष क े रूप में प्रधितभूधित प्रस्तुत की, सिजसमें श्री अणिभर्षेक दीधिक्षत, इस अपील में प्रत्यथ‹, विकरायेदार थे, लेविकन नगर विनगम, ल@नऊ माखिलक था।उp आर्वोेदन पर, न्यायालय ने 24.05.2014 को एक आदेश पारिरत विकया।यह इस प्रकार हैः- "आदेश 24.05.2014 आज विनण‹त ऋणी Aॉ. आरती दीधिक्षत की ओर से प्रधितभूधित को अणिभले@ पर लेने क े खिलए आर्वोेदन प्रस्तुत विकया गया है। आदेश पारिरत विकया गया। अनुमधित प्रदान की जाती है।"

20. अपीलार्भिथयों का तक यह प्रतीत होता है विक विदनांक 06.05.2014 का आर्वोेदन क्रम में था क्योंविक यह आदेश IX विनयम 13 क े साथ दायर विकया गया था और यह क े दारनाथ (पूर्वो p) में विन ारिरत कानून क े अनुरूप है। एक बार ऐसा आर्वोेदन दायर होने क े बाद, आदेश पारित करना न्यायालय का कर्तरत करना न्यायालय का कतव्य था। अपीलार्भिथयों क े अनुसार न्यायालय का उद्देNय क कतव्य था विक र्वोह दर्भिशत करें विक क्या प्रधितभूधित देने की अनुमधित प्रदान करने क े खिलए प्रस्तुत आर्वोेदन को अनुमधित दी गई थी और प्रधितभूधित विकस रूप में दी जानी चाविहए। चूंविक कोई आदेश पारिरत नहीं विकया गया था, इसखिलए अपीलकताओं ने अपनी ओर से आर्वोेदन दायर विकया और विकराए की दुकान क े रूप में प्रधितभूधित प्रस्तुत करने का इरादा था। उच्च न्यायालय ने विदनांक 03.12.2015 क े अपने आदेश में पक्षकारों क े अधि र्वोpा की इस दलील को स्र्वोीकार कर खिलया विक 25.04.2015 को न्यायालय द्वारा जमानत स्र्वोीकार कर ली गई थी और मामले पर शीघ्रता से विनणय लेने का विनदmश विदया गया था और उp आ ार पर विर्वोचारण न्यायालय ने आदेश IX विनयम 13 क े अ ीन आर्वोेदन को अनुमधित दी थी।यह आदेश एAीजे द्वारा विदनांक 01.08.2017 क े आदेश द्वारा इस आ ार पर रद्द कर विदया गया विक विदनांक 24.05.2014 क े आदेश का मतलब यह नहीं था विक प्रधितभूधित स्र्वोीकार कर ली गई थी।विर्वोचारण न्यायालय को विदनांक 06.05.2014 क े आर्वोेदन पर इसक े गुणार्वोगुण क े आ ार पर विर्वोचार करना था।आदेश इस विनष्कर्ष क े बाद विदया गया था विक विदनांक 12.05.2014 क े आर्वोेदन पर प्रधितभूधित को स्र्वोीकार करते हुए कोई आदेश पारिरत नहीं विकया गया था।यह ध्यान विदया जाना चाविहए विक अपीलार्भिथयों ने विदनांक 01.08.2017 क े आदेश को चुनौती नहीं दी।विदनांक 01.08.2017 क े आदेश क े अनुसार, विर्वोचारण न्यायालय को विदनांक 11.02.2019 क े आदेश द्वारा अपीलकताओं क े मामले में कोई मेरिरट नहीं विमली और ारा 17 क े अन्तगत विदनांक 06.05.2014 क े तहत दायर े साथ-साथ विदनांक 12.05.2014 क े आर्वोेदन को भी @ारिरज कर विदया और प्रधितभूधित @ारिरज कर दी गयी। इसी आदेश को एAीजे द्वारा विदनांक 26.02.2021 क े आदेश द्वारा और विफर उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेविपत आदेश द्वारा विफर से बरकरार र@ा गया है। उद्देNय क

21. अधि विनयम की ारा 17 की शाश्मिब्दक व्याख्या पर, जो ारा 17 क े तहत आर्वोेदन को आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन से पहले दायर विकए जाने पर विर्वोचार करता है, क्या अपीलकताओं का मामला बनता है।पहला प्रश्न, सिजस पर हमें विर्वोचार करना होगा, र्वोह यह है विक क्या आर्वोेदन ारा 17 क े अनुरूप है।क्या आर्वोेदक ने 06.05.2014 को कोई प्रधितभूधित प्रस्तुत की थी? इसका उत्तर क े र्वोल नकारात्मक ही हो सकता है। अपीलकता ने इस प्रकार जमा राणिश से छ ू ट देने की मांग नहीं की। [क े दारनाथ (पूर्वो p) क े प्रस्तर-9 को दे@ें]। अतः अपीलकता ने उp अथ में ारा 17 की अविनर्वोाय अपेक्षा का अनुपालन नहीं विकया था।अगली प्राथना में यह अनुरो विकया गया था विक अपीलकता को ारा 17 क े अनुरूप धिAक्री क े तहत देय Rs.50, 000/- की राणिश क े खिलए प्रधितभूधित जमा करने/प्रस्तुत करने की अनुमधित दी जाये? ारा 17 क े तहत ऐसी प्राथना पर न्यायालय का क्या कतव्य था? क्या स्थानीय विनकाय से संबंधि त विकराए की दुकान र्वोाली प्रधितभूधित को प्रस्तुत करना ारा 17 का पयाप्त अनुपालन था?विदनांक 12.05.2014 क े आर्वोेदन और विदनांक 25.05.2014 क े आदेश का क्या प्रभार्वो है जो स्प„ रूप से 06.05.2014 (आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन की तारी@) क े बाद है।

22. आक्षेविपत आदेश में उच्च न्यायालय ने पाया विक मुचलक े से छ ू ट देने क े खिलए कोई आर्वोेदन दायर नहीं विकया गया था और इसे अपीलार्भिथयों क े खि@लाफ पढ़ा जाएगा।उच्च न्यायालय तीन मौकों पर इस विटzपणी पर कायम रहा।हमें यह अर्वोNय दे@ना चाविहए विक अधि विनयम की ारा 17 क े परंतुक में यह विर्वोचार विकया गया है विक एक पक्षीय धिAक्री को रद्द करने की मांग करने र्वोाले आर्वोेदक को अन्य बातों क े साथ-साथ या तो प्रश्नगत राणिश जमा करनी होगी या प्रधितभूधित देनी होगी। क े दारनाथ (उपरोp) में इस न्यायालय ने जो विन ारिरत विकया था, र्वोह यह था विक उद्देNय क जमा करने क े प्रार्वो ान को न्यायालय द्वारा छोड़ा जा सकता है।दूसरे शब्दों में, आर्वोेदक जमा राणिश से छ ू ट की मांग कर सकता है और ऐसी प्रधितभूधित प्रस्तुत करने क े खिलए अनुमधित ले सकता है जैसा विक न्यायालय विनदmश दे।इसखिलए, उच्च न्यायालय इस आ ार पर कायर्वोाही में सही नहीं था विक अपीलकताओं ने मुचलक े (प्रधितभूधित) से छ ू ट क े खिलए कोई आर्वोेदन नहीं विकया था। इसमें कोई संदेह नहीं है विक एक स्थान पर, उच्च न्यायालय कहता है विक जमानत या प्रधितभूधित क े रूप में जमा की जाने र्वोाली राणिश की छ ू ट क े खिलए कोई प्राथना नहीं की गयी है। अपीलार्भिथयों ने प्राथना की विक र्वोे Rs.50000/- की प्रधितभूधित जमा करने/प्रस्तुत करने की अनुमधित दें जो धिAक्रीत राणिश का विहस्सा था। इसे विर्वोर्वोधिक्षत रूप से ारा 17 क े अथ क े भीतर एक विनदmश की मांग क े रूप में माना जा सकता है।इसमें कोई संदेह नहीं है विक एक आर्वोेदक उस प्रधितभूधित का प्रस्तार्वो भी कर सकता है जो र्वोह देना चाहता है।र्वोास्तर्वो में, आम तौर पर, सीपीसी क े े तहत आर्वोेदन से पहले नकद जमा करने से छ ू ट क े खिलए और प्रधितभूधित प्रस्तुत करने क े खिलए एक आर्वोेदन विकया जाना चाविहए। इस पर पारिरत आदेश पर, आर्वोेदक को उसी का पालन करना होगा और उस समय प्रधितभूधित प्रस्तुत करनी होगी जब र्वोह आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन करता है।चूंविक ारा 17 क े तहत एक आर्वोेदन जो र्वोास्तर्वो में क े र्वोल नकद जमा करने क े अभार्वो में ही आर्वोNयक है, आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन की तारी@ तक दायर विकया जा सकता है जैसा विक क े दारनाथ (पूर्वो p) में अणिभविन ारिरत विकया गया है, सामान्यतः ऐसे आर्वोेदन क े साथ प्रधितभूधित उपलब् कराई जानी चाविहए।इसक े बाद यह पहलू सामने आता है विक आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन 30 विदनों क े भीतर दायर विकए जा सकते हैं जैसा विक परिरसीमा अधि विनयम क े अनुच्छेद 123 में उपबश्मिन् त है।विनस्संदेह, जमा या प्रधितभूधित 30 विदनों क े भीतर प्रस्तुत की जानी चाविहए जैसा विक राम भरोसे उद्देNय क (पूर्वो p) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूण पीL द्वारा अणिभविन ारिरत विकया गया है। यह इस आ ार पर है विक आर्वोेदन आदेश IX विनयम 13 क े तहत 30 र्वोें विदन तक विकया जा सकता है, लेविकन साथ ही, परंतुक की शत¥, अथात्, जमा या प्रधितभूधित आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन प्रस्तुत करते समय प्रस्तुत की जानी चाविहए।लेविकन यविद आदेश IX विनयम 13 क े साथ ारा 17 क े तहत आर्वोेदन दायर विकया जा सकता है, तो यविद प्रधितभूधित प्रस्तुत करने क े खिलए विनदmश की आर्वोNयकता है और न्यायालय अनुमधित और समय देता है, तो े तहत आर्वोेदन की तारी@ क े बाद ही प्रधितभूधित प्रस्तुत करना संभर्वो हो सकता है।जैसा विक इस न्यायालय द्वारा क े दारनाथ (पूर्वो p) में अणिभविन ारिरत विकया गया है, न्यायालय से अपेक्षा की जाती है विक र्वोह उस आर्वोेदन पर शीघ्र आदेश पारिरत करे जो ारा 17 क े अ ीन दायर विकया जा सकता है जो आदेश IX विनयम 13 क े अ ीन आर्वोेदन की तारी@ का हो सकता है।न्यायालय की ओर से कोई भी देरी आर्वोेदक पर प्रधितक ू ल प्रभार्वो नहीं Aाल सकती है।

23. इस मामले में, अपीलार्भिथयों ने अधि विनयम की ारा 17 क े तहत और आदेश IX विनयम 13 क े तहत उसी विदन, अथात् 06.05.2014 को आर्वोेदन दायर विकया।आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन, विनष्पादन कायर्वोाही में 05.05.2014 को प्राप्त एक पक्षीय धिAक्री क े ज्ञान पर आ ारिरत है।06.05.2014 को विकसी प्रधितभूधित की पेशकश नहीं की गई थी।यद्यविप इस प्रकार का विनदmश अणिभव्यp रूप से नहीं माँगा गया था, लेविकन प्रधितभूधित प्रस्तुत करने क े खिलए अनुमधित मांगी गई थी, यह कहा जा सकता है विक र्वोस्तुतः अपीलार्भिथयों ने ारा 17 क े अथ क े भीतर विनदmश की मांग की थी।हमने पहले ही पाया है विक उच्च न्यायालय ने यह विनष्कर्ष विनकालने में त्रुविट की थी विक अपीलकताओं ने उद्देNय क प्रधितभूधित से छ ू ट की मांग नहीं की थी और इसखिलए स्प„ रूप से अपीलकताओं क े खि@लाफ ऐसा ही माना था।जब अपीलकताओं ने प्रधितभूधित प्रस्तुत करने की अनुमधित मांगी, यविद अनुमधित दी गई थी और प्रधितभूधित प्रस्तुत करने का विनदmश उसी तारी@ को विदया गया था और समय क े भीतर इसका पालन विकया गया था, तो अपीलाथ‹ ारा 17 का अनुपालन कर रहे थे। ारा 17 क े तहत विदनांक 06.05.2014 क े आर्वोेदन पर कोई आदेश पारिरत नहीं विकया गया था।6 विदनों क े भीतर, 12.05.2014 को, अपीलकताओं ने स्र्वोयं प्रधितभूधित प्रस्तुत करने का इरादा जताया। मुचलका(प्रधितभूधित) अणिभर्षेक दीधिक्षत (तीसरा रिरट याधिचकाकता जो अपील में 7 र्वोां प्रत्यथ‹ है) का था। हालांविक प्रधितभूधित एक दुकान थी।दुकान का स्र्वोाविमत्र्वो प्रधितभू क े पास नहीं था। ल@नऊ नगर विनगम इसका माखिलक था। प्रधितभू एक विकरायेदार था। ारा 17 क े तहत प्रधितभू द्वारा प्रदान की जाने र्वोाली प्रधितभूधित को सिसविर्वोल प्रविक्रया संविहता की ारा 145 क े प्रार्वो ानों क े तहत लागू विकया जाना है जैसा विक अधि विनयम की ारा 17 (2) में विर्वोचार विकया गया है। सीपीसी की ारा 145 में अन्य बातों क े साथ-साथ यह प्रार्वो ान विकया गया है विक प्रधितभू द्वारा प्रदान की गई प्रधितभूधित को संपखित्त की विबक्री को प्रभाविर्वोत करक े लागू विकया जा सकता है।इस मामले में अदालतों ने अणिभविन ारिरत विकया है विक प्रधितभू क े माध्यम से अपीलार्भिथयों द्वारा प्रदान की गई प्रधितभूधित ारा 17 (2) क े संबं में कानून में ग्राह्य नहीं है क्योंविक दुकान नगर विनगम, ल@नऊ की है और इसे प्रधितभूधित को लागू करने क े खिलए नहीं बेचा जा सकता है।

24. हालांविक यह सच है विक 06.05.2014 को ारा 17 क े तहत आर्वोेदन पर कोई आदेश पारिरत नहीं विकया गया था, तथ्य यह है विक अपीलार्भिथयों ने @ुद ही प्रधितभूधित प्रस्तुत की जैसा विक कहा गया है। उच्च न्यायालय का तक है विक इस प्रकार प्रदान की गई प्रधितभूधित दो आ ारों पर अस्र्वोीकाय थी। सबसे पहले, यह उद्देNय क 06.05.2014 को आदेश IX विनयम 13 क े साथ प्रस्तुत नहीं विकया गया था। दूसरा, यह पाया गया है विक यह कानून में ग्राह्य नहीं था।

25. यह सच है विक उच्च न्यायालय ने 03.12.2015 विदनांविकत आदेश में यह पाया विक "अ ीनस्थ न्यायालय द्वारा प्रधितभूधित को स्र्वोीकार विकया गया था।" यह र्वोादी क े अधि र्वोpा की दलीलों को स्र्वोीकार करने क े माध्यम से है। इसी आ ार पर मामले को र्वोापस प्रधितप्रेविर्षत कर विदया गया था। प्रधितप्रेर्षण क े बाद, विर्वोचारण न्यायालय ने अपीलार्भिथयों द्वारा दायर आर्वोेदन और आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन को भी स्र्वोीकार कर खिलया।जैसा विक हमने ध्यान विदया है इसे एAीजे द्वारा रद्द कर विदया गया है और विदनांक 01.08.2017 क े आदेश द्वारा मामले र्वोापस प्रधितप्रेविर्षत कर विदए गए हैं।इस आदेश को अपीलार्भिथयों द्वारा चुनौती नहीं दी गई थी।इसक े बाद अदालतों ने समान रूप से पाया विक ारा 17 का पालन नहीं विकया गया था।उच्च न्यायालय क े विदनांक 03.12.2015 क े पहले क े आदेश को यह पाते हुए उलट विदया गया विक पहले दौर में उच्च न्यायालय क े समक्ष एक व्यापक बयान था विक प्रस्तुत की गई प्रधितभूधित स्र्वोीकार कर ली गई थी।उच्च न्यायालय ने आगे पाया विक र्वोास्तर्वो में 12.05.2014 विदनांविकत आर्वोेदन में की गई प्राथना क े र्वोल प्रधितभूधित को अणिभले@ पर लेने क े खिलए थी। विदनांक 25.04.2014 क े आदेश से क े र्वोल यह पता चलता है विक क े र्वोल प्रधितभूधित को अणिभले@ पर खिलया गया था।यह भी पाया गया विक विदनांक 12.05.2014 का आर्वोेदन 06.05.2014 क े बाद दायर विकया गया था और यह ारा 17 क े तहत एक र्वोै आदेश का आ ार नहीं हो सकता है।

26. हम न्यायालयों से सहमत हैं विक अपीलार्भिथयों द्वारा विकराए की दुकान क े रूप में दी गई प्रधितभूधित को कानूनी रूप से प्रधितभूधित क े रूप में स्र्वोीकार नहीं विकया जा सकता है।यह विबल्क ु ल स्प„ है।विदनांक 24.05.2014 क े आदेश से यह स्प„ नहीं उद्देNय क है विक न्यायालय ने प्रधितभूधित की पयाप्तता पर अपने मश्मिस्तष्क का प्रयोग विकया था या विक क्या यह स्र्वोीकार करने योग्य प्रधितभूधित थी।यविद प्रधितभूधित दी जाती है, जो बाद में अस्र्वोीकाय पाई जाती है, भले ही र्वोह परिरसीमा अधि विनयम क े अनुच्छेद 123 क े अथ क े भीतर 30 विदनों क े भीतर हो, तो यह ारा 17 का अनुपालन नहीं करेगी [राम भरोसे (पूर्वो p) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूण पीL की विटzपणिणयों को दे@ें]।

27. हालांविक यह सच है विक न्यायालय की ओर से 06.05.2014 विदनांविकत आर्वोेदन पर आदेश पारिरत करने में विर्वोफलता हो सकती है, अपीलकताओं ने इस मामले में 12.05.2014 को प्रधितभूधित प्रस्तुत की। इसखिलए हम इस आ ार पर आगे बढ़ते हैं विक धिAक्री की जानकारी की तारी@ क े 30 विदनों क े भीतर, जैसा विक अपीलार्भिथयों द्वारा अणिभकणिथत है, लेविकन आदेश IX विनयम 13 क े तहत आर्वोेदन की तारी@ क े बाद, अपीलार्भिथयों ने प्रधितभूधित प्रस्तुत कर दी है। हम इस तथ्य से अर्वोगत हैं विक 06.05.2014 को न्यायालय द्वारा कोई आदेश पारिरत नहीं विकया गया था। यहां तक विक प्रधितभूधित पर विर्वोचार करने क े खिलए आगे बढ़ते हुए भी हम पाएंगे विक यह कानून में स्प„ रूप से अस्र्वोीकाय है। उच्च न्यायालय क े विदनांक 03.12.2015 क े आदेश क े प्रभार्वो को अधि र्वोpा द्वारा दी गई रिरयायत क े संदभ में समझा जाना चाविहए और यह अधि विनयम की ारा 17 क े तहत कानून की आर्वोNयकता को पूरा नहीं कर सकता है। हम इस तथ्य से अनणिभज्ञ नहीं हो सकते विक अपीलार्भिथयों ने विदनांक 01.08.2017 क े अधितरिरp सिजला न्याया ीश क े आदेश को चुनौती नहीं दी। विर्वोचारण न्याया ीश इससे बाध्य थे क्योंविक अपीलार्भिथयों ने विदनांक 01.08.2017 क े आदेश को चुनौती नहीं दी थी। तथ्य यह है विक अपीलकताओं ने, प्रधितप्रेर्षण की कायर्वोाही में भाग लेने क े बाद विदनांक 01.08.2017 क े आदेश को एक रिरट में चुनौती दी, ऐसा प्रतीत होता है विक उद्देNय क अपीलकताओं क े मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है। यह विर्वोलंविबत चुनौती क े कारण और इसमें शाविमल पहले क े आदेश की प्रक ृ धित दोनों क े कारण है।

28. उp तथ्यों से, विदनांक 01.08.2017 क े आदेश को ध्यान में र@ते हुए और प्रधितभूधित को अस्र्वोीकाय पाए जाने से, हम विर्वोशेर्ष अनुमधित द्वारा उत्पन्न अपील में कोई मेरिरट नहीं पाते हैं। अपील @ारिरज मानी जाएगी। लागत क े खिलए कोई आदेश नहीं होगा। ……………...............… [न्यायमूर्तित क े.एम. जोसेफ] ……………...............… [न्यायमूर्तित ऋविर्षक े श रॉय] नई विदल्ली विदनांकः 18 मई 2023. उद्देNय क