Dinesh Kumar v. Haryana State

Supreme Court of India · 04 May 2023
Sudhanshu Dhulia; Sanjay Kumar
Criminal Appeal No 530 of 2022
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court allowed the appeal and acquitted the appellant, holding that the circumstantial evidence and last seen theory were insufficient to sustain conviction due to gaps in the chain of evidence and failure to properly investigate material facts.

Full Text
Translation output
रपोटयो य
भारत के उ तम यायालय म
आपरािधक अपीलीय े ािधकार
2022 क आपरािधक अपील सं या 530
दनेश कु मार ......अपीलकता
अपीलकता
अपीलकता
अपीलकता
बनाम
ह रयाणा रा य .......... उ रदातागण
िनणय
सुधांशु धूिलया , जे
जे.
JUDGMENT

1. अपीलकता और एक मांगे राम को भारतीय दंड संिहता ('आईपीसी') क धारा 34 के साथ प ठत धारा 302/364/392/394/201 के तहत अपराध के िलए, िव ान अित र स यायाधीश, जगाधरी, ह रयाणा ारा 2000 के स परी ण सं या 47 म दोषी ठहराया गया था।उ ह भारतीय दंड संिहता क धारा 302 के तहत आजीवन कारावास क सजा सुनाई गई और शेष दोषिसि पर 11.07.2003 के आदेश के अनुसार कम सजा सुनाई गई।इसके बाद दोन ने पंजाब और ह रयाणा उ यायालय म अलग-अलग अपील दायर क ।अपनी अपील के लंिबत रहने के दौरान सह-अिभयु मांगे राम का 24.10.2004 को िनधन हो गया और उसक अपील दनांक 11.05.2017 के आदेश ारा समा हो गई। वतमान अपीलकता क अपील खा रज कर दी गई और उ यायालय ने 31 मई, 2017 के अपने आदेश के मा यम से िनचली अदालत क दोषिसि और सजा को बरकरार रखा। इस यायालय के सम उनक एसएलपी को 28.03.2022 को अनुमित दी गई थी। हमने अपीलाथ क ओर से व र अिधव ा ी ए. िसराजु ीन और ह रयाणा रा य के िव ान अित र महािधव ा ी दनेश च यादव को िव तार से सुना है।

2. अिभयोजन का मामला पूरी तरह से प रि थितज य सा य पर आधा रत है।अंितम बार देखे गए "सा य" और अपीलकता ारा दी गई जानकारी से क गई खोज। इस मामले के त य इस कार हः-

3. मृतक गुरमेल संह ह रयाणा के यमुनानगर िजले के गांव धीमो का रहने वाला था।08.05.2000 क सुबह वह अपने ै टर पर अपने गांव से पास के गांव 'दादूपुर' (जो 15-20 कलोमीटर क दूरी पर है) के िलए रवाना ए। दादूपुर म उ ह अपनी बहन और बहनोई/जीजा से िमलना था। दनांक 08.05.2000 को समय 2.00 बजे से सायं 5.30 बजे के बीच, वह अपनी बहन और बहनोई/जीजा के साथ था और अपने बहनोई/जीजा (पीड लू-1) के अनुसार वह दनांक 08.05.2000 को सांय 5.30 बजे उनके घर से चला गया था।गुरमेल संह कभी अपने गांव नह लौटा।इस बीच, मृतक का भाई हरबंस संह (दोन भाई धीमो गांव म अपने प रवार के साथ रह रहे थे) 11.05.2000 (तीन दन बाद) को अपने भाई के ठकाने के बारे म अपनी बहन से पूछताछ करने के िलए गांव दादूपुर जाता है, जब उसे बताया जाता है क मृतक ने 08.05.2000 को ही लगभग 5.30 बजे उनके घर से चला गया था। हरबंस संह इसके बाद 11 मई, 2000 को शाम 4 बजे पीएस बू रया, िजला यमुना नगर (ह रयाणा) म एफ. आई. आर. दज कराई ।वह एफ. आई. आर. म कहता है क गुरमेल संह उसका भाई है और दोन िधमो गांव म एक संयु प रवार के प म रहते ह। फर वह बताता है क कैसे उसका भाई 08.05.2000 क सुबह अपनी बहन से िमलने के िलए अपने ै टर पर अपने गांव से चला गया, ले कन तब से वापस नह आया।वह बताता है क जब वह अपने भाई क तलाश कर रहा था, तो वह दादूपुर गांव के पे ोल पंप पर अपने पड़ोसी करनजीत संह से िमला, िजसने उसे सूिचत कया क उसने गुरमेल संह को अपने ै टर पर 8 मई 2000 को लगभग 7 बजे मांगे राम और दनेश (दोन आरोपी) के साथ देखा था, जो पास के गांव के िनवासी थे।वह इन दोन ि य के बारे म पता लगाने के िलए तुरंत उन गांव म गए, जब उ ह सूिचत कया गया क वे 08.05.2000 से लापता ह। फर वह अपनी एफ. आई. आर. म कहता है क ये दो ि मांगे राम और दनेश आवारा ह और उ ह ने उसके भाई को लूटने के िलए उसका अपहरण कर िलया है।इसके बाद पुिलस ने भारतीय दंड संिहता क धारा 364 के तहत 11.05.2000 को एक मामला दज कया। मृतक का शव अगले दन यानी 12.05.2000 को दोपहर 1.30 बजे एक नहर से बरामद कया था।उसी दन जांच क गई और शव को पो टमॉटम के िलए भेज दया गया। डॉ. सुमेश गग (पीड यू-4) और डॉ. अशोक कुमार शमा ारा िसिवल अ पताल, जगाधरी म 12.05.2000 को लगभग 4:15 बजे पो टमॉटम कया गया।शरीर कई जगह से चमड़ी उखड़ने के साथ सूजा आ पाया गया।मृतक के सभी चार अंग म रगर मो टस पाया गया, ले कन गदन म अनुपि थत था।मृतक क जीभ और ह ठ गहरे लाल रंग के थे और सूजे ए थे और आगे मुंह और नथुन से लाल रंग का झाग िनकल रहा था।थायराइड और हाइओइड उपाि थ के ऊपर गदन के चार ओर 53 स. मी. x 8 स. मी. का अि थबंध िच न था।िलगेचर के िनशान का आधार कठोर था और िलगेचर के िनशान के कनारे पीले और चमप क तरह थे।पो टमॉटम रपोट म आगे कहा गया है क शरीर पर मौजूद िलगेचर के िनशान मृ युपूव गला घ टने का खुलासा करते ह। पे रका डयम को संकुल पाया गया, दय का बायां क खाली पाया गया और दय के दाएं क म थोड़ा खून पाया गया।अंततः मृ यु का कारण गला घ टने के कारण दम घुटना था जो कृित म मृ युपूव था। शरीर के पो टमॉटम परी ण से पता चलता है क रगर मो टस शरीर के सभी चार अंग म मौजूद था, ले कन गदन म नह था।यह इस त य का संकेत था क रगर मो टस शरीर से पीछे हट रहा था।आम तौर पर कह तो मृ यु के एक से दो घंटे के भीतर रगर मो टस शु हो जाता है और लगभग 12 घंटे म िसर से पैर तक िवकिसत हो जाता है। रगर मो टस फर उसी म म गायब हो जाता है अथात पहले िसर से, फर गदन और फर शरीर के िनचले िह से तक।उ र भारत म स दय म रगर मो टस 24 से 48 घंटे और ग मय म 18 से 36 घंटे रहता है।वैसे भी, कई वे रएबल (variable) ह।शरीर क संरचना और मृतक का वा य, यह त य क इसे ठंडे पानी म रखा गया था और गम से दूर रखा गया था, सभी कठोरता क या को धीमा कर दगे1 मोदी ारा िच क सा यायशा और िवषा ता िव ान क एक पा पु तक (अ याय 15, पृ 342) । ठंडे पानी म डूबे शरीर म रगर मो टस देर से गायब होता है2 उ (अ याय 15, पृ 342)। इस मामल म, मृतक का शरीर नहर से बरामद कया गया था और इसिलए इस संभावना से पूरी तरह से इंकार नह कया जा सकता है क रगर मो टस अभी भी शरीर म रहेगा, ले कन यह कह भी प नह कया गया है।हालां क मृतक क मृ यु का सही समय सामने नह आया है, ले कन अिभयोजन प का मामला यह है क उसक ह या आरोपी ( दनेश कुमार और मांगे राम) ने 08.05.2000 को ही कर दी थी।य द ऐसा है तो शरीर म लगभग 90 घंटे तक कठोरता बनी रहती है, जो असामा य है। इसके अलावा, अिभयोजन प ने इस कारक को प नह कया है, और बचाव प ने िनि त प से इस पहलू पर डॉ. सुमेश गग (पीड लू-4) से सवाल नह कया है। ले कन इस पहलू के मह व को यान म रखते ए यह सवाल अिभयोजन प से और िवशेष प से उस डॉ टर से पूछा जाना चािहए था िजसने पो टमाटम कया था। य द ितर ा ारा नह कया गया होता तो यह भारतीय सा य अिधिनयम, 1872 (सं ेप म 'अिधिनयम') क धारा 165 के अधीन यायालय म िनिहत शि य के अधीन यायालय ारा सा ी से पूछा जाना चािहए था। ले कन हम थोड़ी देर म इस पर प ंचगे।

4. इस बीच सह-अपराधी मांगे राम को 12.05.2000 को िगर तार कर िलया गया और उसके ारा पुिलस को दी गई जानकारी के आधार पर अगले दन अथात् 13.05.2000 को उसे उस थान पर ले जाया गया जहां उसने और दनेश कुमार ने मृतक क ह या क थी।इस थान से, दो जोड़ी च पल बरामद क ग िजनम से एक अपीलकता ( दनेश कुमार) क थी और दूसरी सह-आरोपी मांगे राम क ।इस थान से मृतक के जले ए बाल भी बरामद कए गए थे।इसके बाद मांगेराम पुिलस दल को नहर म ले गए जहां से शव को िगरा दया गया।

5. 14.05.2000 को (यानी, अगले दन) मांगे राम पुिलस दल को उस थान पर ले गए जहां मृतक का ै टर उसके और दनेश कुमार ारा छोड़ दया गया था। फर भी, जब तक पुिलस दल उस थान पर प ंचा, तब तक थानीय पुिलस ारा ै टर का पता लगाया जा चुका था और वह उ र देश के सहारनपुर के रामपुर पुिलस टेशन म उनक िहरासत म था।जांच अिधकारी ने ै टर को थानीय पुिलस से अपने क जे म ले िलया।

6. वतमान अपीलकता को 14.05.2000 को 'नंदगढ़' गांव से िगर तार कया गया था।उसके खुलासे पर उसके आवास से एक कलाई घड़ी, 'परना' (पगड़ी) और 250/- पये के करसी नोट बरामद कए गए जो किथत तौर पर मृतक से संबंिधत थे। इसके बाद वह पुिलस को उसी थान पर ले गया जहां सह-अपराधी मांगे राम उ ह पहले दो थान पर ले गया था, अथात्, वह थान जहां मृतक क ह या क गई थी और वह थान जहां ै टर छोड़ दया गया था3 इस बीच एफ. आई. आर. (तारीख 11.05.2000) म धारा एस.34 के साथ धारा एस. 392/394/302 जोड़ी गई। ।

7. अंितम बार देखे गए सा य करनजीत संह (पीड लू 10) के ह जो िशकायतकता (पीड लू 11) का पड़ोसी है। पीड लू 10 ने 08.05.2000 को लगभग शाम 7:00 बजे दो अिभयु दनेश कुमार और मांगे राम के साथ मृतक को देखा था। य दश के अनुसार मृतक ै टर चला रहा था और दो अथात् अपीलकता और मांगेराम ै टर के मडगाड पर बैठे थे।

8. जैसा क हम देख सकते ह क अिभयोजन का मामला दो पा रि थितक सा य पर आधा रत है: (क) पुिलस अिभर ा म दया गया कटन और उसके आधार पर क गई खोज और (बी) पीड लू 10 के प म अंितम बार देखे गए सा य।पा रि थितक सा य के मामले म उ े य भी मह वपूण है।जहां तक उ े य का संबंध है, अिभयोजन प का मामला है क दो अिभयु ने मृतक क ह या केवल उसका ै टर चुराने के िलए क थी।इस मामले म मृतक एक 42 साल का अ छे कद काठी का आदमी था िजसक ऊ ं चाई 6 फ ट 2 इंच थी (पो टमॉटम रपोट दनांक 12.05.2000)।अिभयोजन प का मामला यह है क मृतक का दो अिभयु ने उसके ै टर के िलए अपहरण कया और उसक ह या कर दी, िजसे उ ह ने उसे मारने के बाद मृतक से लूट िलया था।अब यह ै टर आरोिपय ने कसी भी मामले म याग दया था, और 12.05.2000 को उनम से एक को पकड़े जाने तक इसे बरामद करने के िलए कुछ नह कया था।सं ेप म, 'उ े य' ब त िव सनीय नह है। अपीलकता ारा पुिलस िहरासत म रहते ए कए गए खुलासे, िजसके कारण कुछ खोज, जैसे क वह थान जहां चोरी का ै टर छोड़ दया गया था, वह थान जहां किथत अपराध कया गया था, और वह थान जहां शरीर को नहर म फका गया था, और 'परणा', जले ए बाल, कलाई क घड़ी और 250/- पये के करसी नोट भी िमले। सा य अिधिनयम क धारा 27 िन ानुसार हैः अिभयु से ा जानकारी कतनी सािबत क जा सकती है-बशत, जब कसी त य को कसी अपराध के आरोपी ि से ा जानकारी के प रणाम के प म पुिलस अिधकारी क िहरासत म कट कया जाता है, तो ऐसी जानकारी क इतनी मा ा, चाहे वह एक सं वीकृित के बराबर हो या नह, जो प प से उस त य से संबंिधत हो िजसक खोज क गई है, सािबत क जा सकती है।" उपरो ावधान से पता चलता है क खोज एक अलग त य का होना चािहए, त य जो पुिलस िहरासत म एक के कटीकरण से पता चला है।अभी तक, सह-अिभयु मांगे राम ारा क गई पूव खोज म ये त य पहले से ही पुिलस के सं ान म थे।सह-अिभयु मांगे राम को 12.05.2000 को िगर तार कया गया और 12,13 और 14 मई को इन खोज का नेतृ व कया गया।वतमान अपीलकता को 14 मई, 2000 को िगर तार कया गया था और उसके ारा क गई किथत खोज बाद म समय पर क गई थ ।सह-अिभयु मांगे राम के संकेत पर क गई खोज को वतमान अपीलकतागण के िखलाफ नह पढ़ा जा सकता है। य द अिभयु ारा अपनी अिभर ा म रहते ए पुिलस को कटन कया गया है और ऐसे कटन से त य का पता चलता है तो उस खोज को अिधिनयम क धारा 27 के संदभ म अिभयु के िव सा य के प म पढ़ा जाना चािहए।इस सब के साथ, इस तरह क खोज क िविश िवशेषता यह होनी चािहए क इस तरह के कटीकरण से एक अलग त य क खोज होनी चािहए।चोरी कए गए ै टर क बरामदगी, वह थान जहां ह या क गई थी और वह थान जहां नहर म शव फका गया था, ऐसे त य थे जो पहले से ही पुिलस क जानकारी म थे, य क यह अिभयोजन का मामला है क सह-अिभयु मांगे राम, िजसे वतमान अपीलकता क िगर तारी से 2 दन पहले पुिलस ारा िगर तार कया गया था, ने इससे पहले 12,13 और 14 मई, 2000 को समान खोज का नेतृ व कया था।इसिलए, इसके बाद कए गए इस खुलासे और खोज को वतमान अपीलकता के िखलाफ नह पढ़ा जा सकता है।पहले से ही खोजे गए त य क कोई 'खोज' नह हो सकती।करसी नोट, कलाई घड़ी, पणा और बाल क खोज बाक है।बाल क फोरिसक रपोट म केवल यह कहा गया है क यह मानव का है।करसी नोट क पहचान वा तव म मृतक के साथ नह क जा सकती है।जो बचा है वह घड़ी और 'परणा' है, िजसक पहचान मृतक के साथ क गई है। दूसरा, अंितम बार देखा गया सा य है।यह पी ड लू 10 करतार संह के प म है जो िशकायतकता का पड़ोसी है और िजसने अपीलकता को सह-अिभयु मांगे राम के साथ 08.05.2000 को शाम के लगभग 7.30 बजे मृतक के साथ देखा था।

9. वीकार क गई ि थित यह है क मृतक का शव चार दन बाद अथात् 12.05.2000 को दोपहर म नहर से बरामद कया गया था और उसी दन यानी 12.05.2000 को शाम 4.15 बजे पो टमॉटम कया गया था।पो टमॉटम रपोट के अनुसार, मृ यु पो टमाटम से 48 घंटे से अिधक समय पहले ई थी, िजसका अथ है क मृ यु 10.05.2000 को शाम 4 बजे से पहले ई थी।हालां क ऑटो सी रपोट म आमतौर पर मौत का सटीक समय नह बताया गया है, ले कन केवल एक अनुमािनत समय या अविध का संकेत दया गया है, फर भी वतमान मामले म सामा य प रि थितय म, मृ यु 10 मई, 2000 या 9 मई, 2000 को होनी चािहए थी।इतना ही नह, अिभयोजन का मामला यह है क मृतक 8 मई, 2000 को खुद ही मारा गया था।य द ऐसा है तो यह अिभयोजन का कत था क वह यह समझाए क मृ यु के चार दन के बाद भी शरीर म कठोरता कैसे बनी रही।शरीर म 90 घंटे तक कठोरता रहने क संभावना को पूरी तरह से खा रज नह कया जा सकता है, ले कन अिभयोजन प ने कभी भी इसक ा या नह क ।अिभयोजन प का यह कत था क वह उन असामा य प रि थितय क ा या करे िजसके तहत मई के महीने म 90 घंटे तक भी शरीर म कठोरता बनी रही। उ यायालय ने केवल पी ड लू के सा य पर भरोसा कया है, डॉ. सुमेश गग, िज ह ने पो टमाटम कया था, िज ह ने अपनी राय दी थी क मौत पो टमाटम के समय से 48 घंटे से अिधक समय पहले ई थी, और इसिलए मृतक को मांगे राम और वतमान अपीलकता ारा 08.05.2000 को मार दया गया था, जो उ यायालय ारा कहा गया हैः पीड लू-4 सुमेश गग के अनुसार, िज ह ने डॉ. अशोक कुमार शमा के साथ 12.05.2000 को गुरमेल संह के मृत शरीर का पो टमाटम कया था। चोट और मृ यु के बीच संभािवत अविध िमनट के भीतर और मृ यु और पो टमॉटम के बीच 48 घंटे से अिधक थी।इस कार, यह पता चलता है क गुरमेल संह क ह या 08 मई, 2000 को अिभयु मांगे राम और दनेश कुमार ारा क गई थी।"

10. िवचारण यायालय इस पहलू के ित सचेत थी कंतु फर उसने इस पहलू पर इस कारण यान नह दया क ितर ा ारा इस पर कोई नह उठाया गया था, जो क िवचारण यायालय ारा यह कहा गया थाः "मने पो टमॉटम रपोट देखी है।इस पर गौर करने से पता चलता है क रगर मो टस सूजन के कारण सभी चार अंग म मौजूद था, न क सामा य प से।बचाव प का यह कत था क वह मृत शरीर का पो टमाटम करने वाले डॉ टर से पूछे क या कठोरता क उपि थित इस त य का संकेत है क मृतक क उसके शव क जांच के छतीस घंटे के भीतर ह या कर दी गई थी।ले कन ऐसा कोई सवाल डॉ टर से नह पूछा गया।डॉ टर ने अपने बयान म कहा था क मौत और पो टमॉटम के बीच का समय 48 घंटे से अिधक था और डॉ टर के इस बयान को उसक ॉस ए जािमनेशन म चुनौती नह दी गई थी।इसिलए बचाव प के वक ल क दलील वीकार नह क जा सकती।"

11. हम भय है क ितवाद क ॉस-ए जािमनेशन म कमजोरी को इंिगत करके पीठासीन यायाधीश अ य प से िवचारण म ही कमजोरी को वीकार करते है। हम ऐसा इसिलए कहते ह य क अिधिनयम क धारा 165 के तहत एक ायल जज के पास कसी भी प म, कसी भी समय, कसी भी गवाह या प कार से कसी भी ासंिगक या अ ासंिगक त य के बारे म कोई भी सवाल पूछने क जबरद त शि होती है। वा तव म ऐसा करना िवचारण यायाधीश का कत है य द यह महसूस कया जाता है क कसी गवाह से कुछ मह वपूण और िनणायक पूछे जाने बाक है। मुकदमे का उ े य मामले क स ाई तक प ंचना है।अिधिनयम क धारा 165 इस कार हैः "165. पूछने या पेश करने का आदेश देने क यायाधीश क शि यायाधीश ासंिगक त य का पता लगाने या उिचत सबूत ा करने के िलए कसी भी समय कसी भी प म कसी भी गवाह या प कार से कोई भी पूछ सकता है और कसी भी द तावेज या चीज को तुत करने का आदेश दे सकता है और न तो प कार और न ही उनके एजट ऐसे कसी भी या आदेश पर कोई आपि करने के हकदार ह गे, न ही यायालय क अनुमित के िबना, ऐसे कसी के उ र म दए गए कसी भी गवाह क ितपरी ा कर सकते हःबशत क िनणय इस अिधिनयम ारा घोिषत ासंिगक त य पर आधा रत और िविधवत सािबत होःपर तु यह भी क यह धारा कसी यायाधीश को कसी का उ र देने के िलए कसी सा ी को िववश करने के िलए या ऐसा कोई द तावेज पेश करने के िलए ािधकृत नह करेगी िजसे ऐसा सा ी धारा 121 से 131, दोन धारा के अधीन उ र देने या पेश करने से इंकार करने का हकदार होगा, य द ितकूल प कार ारा पूछा गया था या द तावेज क मांग क गई थी, न ही यायाधीश ऐसा कोई पूछेगा जो कसी अ य ि के िलए धारा 148 या 149 के अधीन पूछना अनुिचत होगा और न ही वह इसम इसके पूव अपव जत मामल के िसवाय कसी अ य द तावेज के ाथिमक सा य का प र याग करेगा।" आपरािधक मुकदमे म पीठासीन यायाधीश क शि यां और मामले क स ाई तक प ंचने का उसका कत यायमू त ओ. िच पा रे ी ारा िलिखत इस यायालय के एक मौिलक िनणय म िनधा रत कया गया है, जो राम चं बनाम ह रयाणा रा य है4 1981 AIR 1036 । यायमू त ओ. िच पा रे ी ने उ िनणय म आं देश उ यायालय के एक यायाधीश के प म उनके ारा दए गए अपने पहले के िनणय 5 सेशन यायाधीश, ने लोर बनाम इंथा रम ा रे ी, आईएलआर 1972 एपी 683 और 1972 सीआरआई एलजे 14 85 का उ लेख कया, जहां यह कहा गया थाः येक आपरािधक मुकदमा खोज क एक या ा है िजसम स य ही खोज है।पीठासीन यायाधीश का यह कत है क वह स ाई क खोज करने और याय के उ े य को आगे बढ़ाने के िलए अपने िलए खुले हर रा ते का पता लगाए।इस योजन के िलए उसे सा य अिधिनयम क धारा 165 ारा गवाह से पूछने के अिधकार के साथ अिभ प से िविनिहत कया गया है।वा तव म यायाधीश को दया गया अिधकार इतना ापक है क वह कसी भी प म, कसी भी समय, कसी भी गवाह या प कार से ासंिगक या अ ासंिगक कसी भी त य के बारे म कोई भी पूछ सकता है।दंड या संिहता क धारा 172 (2) अदालत को कसी मामले म पुिलस डायरी मंगाने और उसका उपयोग मुकदमे म मदद के िलए करने म स म बनाती है। सेशन यायाधीश ारा किम टंग मिज ेट क कायवाही के रकॉड का भी अ ययन कया जा सकता है ता क उसे मुकदमे म और अिधक सहायता िमल सके।" आपरािधक मुकदमे के पीठासीन यायाधीश का कत एक दशक या रकॉ डग मशीन के प म कायवाही को देखना नह है, बि क उसे स ाई का पता लगाने के िलए गवाह से सवाल पूछकर बुि म ापूण स य िच पैदा करके मुकदमे म भाग लेना है।" जो स बनाम नेशनल कोल बोड 6 (1957) 2 एआयीआयी इआर 155: (1957) 2 ड लूअलआर 760: मामले म लाड डे नंग के एक िनणय का उ लेख करते ए िव ान यायाधीश ने कहा था क यह यायाधीश का कत है क वह गवाह से सवाल पूछे जब कसी भी बंदु को प करना आव यक हो जाए िजसे नजरअंदाज कर दया गया है या अ प छोड़ दया गया है, तो वह आगे कहते हः "हम लाड डे नंग से आगे बढ़कर कह सकते ह क यह यायाधीश का कत है क वह स ाई क खोज करे और इस उ े य के िलए वह कसी भी प म, कसी भी समय, कसी भी गवाह या प कार से कसी भी ासंिगक या अ ासंिगक त य के बारे म कोई भी पूछ सकता है (धारा 165, सा य अिधिनयम)।ले कन उसे ऐसा िबना कसी प पात के संकेत के और गवाह को डराए या धमकाए िबना, सरकारी अिभयोजक और बचाव प के वक ल के काय का अनाव यक अित मण कए िबना करना चािहए।उसे अिभयोजन और बचाव प को अपने साथ ले जाना चािहए। अदालत, अिभयोजन प और बचाव प को एक ऐसी टीम के प म काम करना चािहए िजसका ल य याय हो, एक ऐसी टीम िजसका क ान यायाधीश हो। यायाधीश को गायक-म डल के संचालक क तरह ि व के बल पर अपनी टीम को उकसाना चािहए क वह उतावले लोग को वश म करके सौहादपूण ढंग से काम करे, डरपोक लोग को ो सािहत करे, युवा, चापलूस और (sic) बुजुग के साथ ष ं करे। हमारी सुिवचा रत राय म अिभयोजन इस मामले म मह वपूण लंक थािपत करने म िवफल रहा है, जो पा रि थितक सा य के मामले म ब त मह वपूण है। 90 घंटे के बाद शरीर म मौजूद रगर मो टस असामा य है, हालां क कुछ प रि थितय म यह संभव है।यह अिभयोजन प का कत था क वह इसक ा या करे।बचाव प भी इस पर सवाल उठाने म िवफल रहा और यायालय चुप रहा।आइए अब हम अंितम बार देखे गए सा य पर फर से गौर कर।

12. अंितम बार देखा गया सा य पा रि थितक सा य के मामले म सा य का एक अ यंत मह वपूण िह सा बन जाता है, िवशेष प से जब आरोपी को अंितम बार मृतक के साथ देखा गया था और मृतक के शरीर का पता चला था, या इस मामले म मृतक क मृ यु के समय के बीच िनकट िनकटता होती है। इसका मतलब यह नह है क िजन मामल म अंितम बार देखे गए समय और मृतक क मृ यु के बीच लंबा अंतराल होता है, वहां अंितम बार देखे गए सा य का मू य समा हो जाता है।ऐसा नह होगा, ले कन फर यह सािबत करने के िलए अिभयोजन पर ब त भारी बोझ डाला जाता है क मृतक के शरीर क इस अविध के दौरान और मृतक के शरीर क खोज या मृतक क मृ यु के समय के दौरान, अिभयु के अलावा कसी अ य ि क मृतक तक प ंच नह हो सकती थी।वतमान मामले म अंितम बार एक साथ देखी गई प रि थितयां अपने आप म अपराध का आधार नह बन सकती ह (देखः अंजन कुमार शमा और अ य बनाम असम रा य 7 (2017) 14 एससीसी 359-पैरा 19)। अंितम बार एक साथ देखी गई प रि थितय से यह अप रवतनीय िन कष नह िनकलता क अपराध आरोपी ने ही कया है।अिभयोजन प को आरोपी और कए गए अपराध के साथ इस संपक को थािपत करने के िलए कुछ और करना चािहए।िवशेष प से, वतमान मामले म जब अंितम बार एक साथ देखी गई प रि थितय और मृ यु के अनुमािनत समय के बीच कोई करीबी िनकटता नह है, तो अंितम बार देखा गया सा य कमजोर हो जाता है (देख: म लेश पा बनाम कनाटक रा य 8 (2007) 13 एससीसी 399-पैरा 23)। िनजाम और एक अ य बनाम राज थान रा य वाले मामले म[9] (2016) 1 एससीसी 550, जहां अंितम बार एक साथ देखा गया था और मृतक के शरीर क खोज के बीच समय का अंतर लंबा था, यह माना गया था क इस अविध के दौरान कुछ अ य ह त ेप क संभावना से इनकार नह कया जा सकता है। जहां अंितम बार देखा गया समय और मृ यु का समय पया है, जैसा क वतमान मामले म है, वहां इस िन कष पर प ंचना खतरनाक होगा क अिभयु ह या के िलए िज मेदार है।ऐसे मामल म 'अंितम बार देखा गया िस ांत' के आधार पर दोषिसि करना असुरि त है और अिभयोजन ारा पेश कए गए अ य प रि थितय और सा य से संपुि क तलाश करना सुरि त होगा।यहां अ य प रि थितयां तथाकिथत खोज ह, और इनम से अिधकांश, जैसा क हमने पहले ही चचा क है, सा य अिधिनयम क धारा 27 क आव यकता को पूरा करने म िवफल ह। 12 मई 2000 को शाम 4:15 बजे कए गए पो ट मॉटम के अनुसार, पो ट मॉटम से 48 घंटे पहले मौत ई थी, िजसका अथ है क यह 10.05.2000 को शाम 4:00 बजे से पहले थी।यह मानते ए क मृ यु एक दन पहले यानी 09.05.2000 को ई है, फर भी अंितम बार देखा गया जो 08.05.2000 को शाम 7:00 बजे और 09.05.2000 क सुबह के बीच एक लंबा अंतर है। गोवा रा य बनाम संजय ठकरान 10 (2007) 3 एससीसी 755 के मामले म, जहां अंितम बार देखे गए सा य म, मृत शरीर क बरामदगी केवल कुछ घंटे पहले ई थी, इसे िव सनीय नह माना गया था। इस यायालय ने अजीत संह बनाम महारा रा य 11 (2011) 14 एससीसी 401 वाले मामले म इस बात पर फर से जोर दया था, जहां इस बात पर जोर दया गया था क पीिड़त को अंितम बार जीिवत देखा गया था और मृतक के शरीर क खोज के बीच का समय िनकटता का होना चािहए, ता क अपराध का लेखक होने के नाते कसी अ य ि को इससे इंकार नह कया जा सकता है।इस मामले म, भले ही हम अंितम बार देखे गए समय और पो टमॉटम के अनुसार मृ यु के अनुमािनत समय के बीच समय ल, जो पो टमॉटम के समय से 48 घंटे से आगे जाएगा और मृ यु का समय 9 मई, 2000 क सुबह तक बढ़ाया जा सकता है, जो अभी भी समय अंतराल के बारे म अिभयोजन से प ीकरण मांगता है, जैसा क मृतक को अंितम बार 08.05.2000 को 7:00 बजे दोन अिभयु के साथ देखा गया था। िनचली अदालत और उ यायालय ने इस मामले के मह वपूण पहलू को नजरअंदाज कर दया है।दोन यायालय ने अिधिनयम क धारा 103 पर भरोसा कया है और अिभिनधा रत कया है क चूं क अिभयु को अंितम बार मृतक के साथ देखा गया था और वह दंड या संिहता क धारा 313 के तहत अपने बयान म मृतक के साथ अपनी उपि थित का कोई उिचत प ीकरण देने म स म नह रहा है, इसिलए इसे अिभयु के िखलाफ पढ़ा जाना चािहए और इसिलए इसे प रि थितज य सा य क ृंखला म एक अित र कड़ी के प म माना जाना चािहए।वतमान मामले म िनचली अदालत और उ यायालय के िन कष म यह सबसे मह वपूण पहलू तीत होता है िजसने िनचली अदालत के साथ-साथ उ यायालय को भी अिभयु के अपराध को सािबत करने म मदद क ।हालां क, हम डर है क यह अिधिनयम क धारा 106 का पूरी तरह से गलत पाठ है। अिधिनयम क धारा 101 सबूत का भार अिभयोजन पर डालती है। इसका पाठ इस कार हैः

101. सबूत का भार-जो कोई यह चाहता है क कोई यायालय त य के अि त व पर िनभर कसी कानूनी अिधकार या दािय व के बारे म िनणय दे, तो उसे यह सािबत करना होगा क वे त य मौजूद ह।जब कोई ि कसी त य के अि त व को सािबत करने के िलए बा य होता है, तो यह कहा जाता है क सबूत का बोझ उस ि पर पड़ता है। अिधिनयम क धारा 106 धारा 101 के िलए एक अपवाद बनाती है और इसका पाठ इस कार हैः

106. िवशेष प से ान के भीतर त य सािबत करने का बोझ-जब कोई त य िवशेष प से कसी ि के ान के भीतर होता है, तो यह सािबत करने का बोझ उस पर होता है। अिधिनयम क धारा 106 िनयम का एक अपवाद है जो अिधिनयम क धारा 101 है, और यह केवल एक सीिमत अथ म लागू होता है जहां सा य क कृित ऐसी है जो िवशेष प से उस ि क जानकारी के भीतर है और फर उस त य को सािबत करने का बोझ उस ि पर पड़ता है। सबूत का बोझ हमेशा अिभयोजन पर होता है।यह अिभयोजन प है िजसे अपने मामले को संदेह से परे सािबत करना है।अिधिनयम क धारा 106 उस ि थित को नह बदलती है।यह केवल कितपय प रि थितय क थापना पर कसी त य के कटन का भार डालता है।हमारे पास पी ड लू 10 (करनजीत संह) क गवाही पर संदेह करने का कोई कारण नह है, "अंितम बार देखा" का एकमा गवाह।दंड या संिहता क धारा 313 के तहत अपने बयान म, जब अपीलकता से सह- अिभयु मांगे राम के साथ 08.05.2000 को मृतक के साथ होने के बारे म सवाल कया गया, तो अपीलकता ारा उसके ठकाने के बारे म कोई प ीकरण नह दया गया। यही कारण है क यह अिभिनधा रत कया गया है क अिभयु अिधिनयम क धारा 106 के तहत अपने बोझ का िनवहन करने म स म नह है और इसिलए इसे अपीलाथ के िखलाफ सा य क ृंखला म एक अित र लंक के प म पढ़ा जाना चािहए। हालां क, हमारे िवचार से, अिधिनयम क धारा 106 वतमान मामले के त य और प रि थितय के तहत यहां तक नह आएगी।

13. यान देने यो य बात यह है क अिधिनयम क धारा 106 केवल तभी लागू होती है जब अिभयोजन ारा अ य त य थािपत कए गए ह ।इस मामले म, जब अंितम बार देखा गया सा य कमजोर आधार पर है, पी ड लू10 ारा अंितम बार देखा गया समय और मृतक क मृ यु के समय के बीच लंबे अंतराल को देखते ए, अिधिनयम क धारा 106 अजीब त य और मामले क प रि थितय के तहत लागू नह होगी।

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14. जहां तक वसूली का संबंध है, वसूली फर से कमजोर है।किथत अपराध का थान और ै टर क बरामदगी या वह थान जहां ै टर छोड़ दया गया था, का खुलासा सह-अिभयु ारा वतमान अपीलकता क िगर तारी के समय तक कर दया गया था। इसिलए, घटना के थान या उस थान के बारे म खुलासा करना जहां ै टर छोड़ दया गया था, कोई मायने नह रखता है।जहां तक अपीलकता के िनवास से घड़ी, 250/- पये के करसी नोट, बाल और 'पणा' क बरामदगी का संबंध है, मु ा नोट और बाल क पहचान मृतक के साथ नह क गई है। आपरािधक मुकदमे म अिभयोजन प को अपने मामले को संदेह से परे सािबत करना होता है।इस भारी बोझ को अिभयोजन प ारा हटाया जाना है।पा रि थितक सा य के मामले म यह और भी क ठन हो जाता है।वतमान मामले म, पा रि थितक सा य क कृित कमजोर है।अिभयु पर अपराध का आरोप िस करने के िलए, सा य क ृंखला पूरी क जानी चािहए और ृंखला को एक और केवल एक िन कष क ओर इशारा करना चािहए, जो यह है क केवल अिभयु ने अपराध कया है और कसी और ने नह ।हम डर है क अिभयोजन इस बोझ को पूरा नह कर पाया है। पा रि थितक सा य के मामले म यायालय ारा िजन कारक पर िवचार कया जाना है, वे ब त अ छी तरह से थािपत ह, ले कन फर भी ये कारक जो अंजन कुमार शमा (उपरो ) से पुनः तुत कए जा रहे ह, वे इस कार हः (1) वे प रि थितयां िजनसे दोष का िन कष िनकाला जाना है, पूरी तरह से थािपत क जानी चािहए।संबंिधत प रि थितयां "ज र" "या" "चािहए" और नह " थािपत क जा सकती ह"; (2) इस कार थािपत त य को केवल अिभयु के अपराध क प रक पना के अनु प होना चािहए, अथात् उ ह कसी अ य प रक पना पर ा या मक नह कया जाना चािहए िसवाय इसके क अिभयु दोषी है; (3) प रि थितयां िन ायक कृित और वृि क होनी चािहए; (4) उ ह हर संभव प रक पना को अपव जत कर देना चािहए, िसवाय उस प रक पना के िजसे सािबत कया जाना है; और (5) सा य क ऐसी ृंखला होनी चािहए जो अिभयु क िनद िषता से संगत िन कष के िलए कोई युि यु आधार न छोड़े और यह द शत करे क सभी मानवीय संभा ता म काय अिभयु ारा कया गया होगा।

15. हमारे सुिवचा रत िवचार म, वतमान मामले म अिभयोजन प अपने मामले को युि यु संदेह से परे सािबत करने म स म नह रहा है। अंितम बार देखा गया सा य केवल एक बंदु तक ले जाता है और आगे नह ।यह एक पूरी ृंखला बनाने के िलए इसे आगे जोड़ने म िवफल रहता है।हमारे पास केवल अंितम बार देखा गया सा य है, जैसा क हमने देखा है क मामले क प रि थितय म, अंितम बार देखा गया समय और मृ यु के संभािवत समय के बीच क लंबी अविध के कारण इसका वजन काफ कम हो जाता है।अिधिनयम क धारा 27 के तहत हम िजसे खोज कह सकते ह, वह है 'परणा' क खोज और मृतक क घड़ी।यह सा य अपीलकता पर दोष तय करने के िलए पया नह है। ऐसे मामले म जहां अपराध का कोई य गवाह नह है, अिभयोजन को प रि थितज य सा य के आधार पर अपना मामला तैयार करना होगा।यह अिभयोजन प पर ब त भारी बोझ है। अिभयोजन ारा एक क गई प रि थितय क ृंखला को ृंखला को पूरा करना चािहए, जो केवल एक िन कष क ओर इशारा करती है क यह अिभयु है िजसने अपराध कया है, और कोई नह । येक सा य जो सबूत क ृंखला को पूरा करता है, उसे ठोस आधार पर खड़ा होना चािहए।हमारी सुिवचा रत राय म, इस मामले म अिभयोजन ारा रखा गया सा य पा रि थितक सा य के मामले म अपेि त मानक पा रत नह करता है।

16. अतः यह अपील सफल होती है।िनचली अदालत और उ यायालय के मशः 11.03.2007 और 31.05.2017 के आदेश को िनर त कया जाता है।अपीलकता अब जेल म है, उसे तुरंत रहा कया जाये जब तक क उसक उपि थित कसी अ य मामले म आव यक न हो।........ जे जे जे जे. [सुधांशु सुधांशु धूिलया ]....... जे जे जे जे. [संजय संजय कु मार ] नई द ली 04 मई, 2023. मद सं या 1501 कोट नंबर 11 से शन II-B भारत के उ यायालय म या का रकॉड आपरािधक अपील सं या ( ) 530/2022 दीनेश कु मार अपीलकता (गण गण गण गण) बनाम ह रयाणा रा य ितवादी (गण गण गण गण ) (आईए आईए सं या 96201/2022- फाइल करने क अनुमित अनुमित. द तावेज द तावेज द तावेज द तावेज. त य त य त य त य/अनुल क अनुल क अनुल क अनुल क ) तारीखः 04-05-2023 इस मामले को आज िनणय सुनाने के िलए बुलाया गया था। अपीलकता के िलए ी ए ए.िसराजु ीन िसराजु ीन िसराजु ीन िसराजु ीन, व र अिधव ा (एससीएलएससी एससीएलएससी एससीएलएससी एससीएलएससी ) ी नरेश कु मार कु मार, ए ओ आर ी क त वासन वासन, एडवोके ट ितवादीगण के िलए ी दनेश च यादव यादव, ए ए ए ए. ए ए ए ए. जी। ी ए ए.एस एस एस एस. ऋिष ऋिष ऋिष ऋिष, एडवोके ट ी ई र चंद चंद, एडवोके ट ी एम एम. के के के के. बंसल बंसल बंसल बंसल, एडवोके ट डॉ डॉ डॉ डॉ. मोिनका गुसैन गुसैन, एओआर माननीय ी यायमू त सुधांशु धूिलया ने िहज लाडिशप और माननीय यायमू त ी संजय कु मार क पीठ का फै सला सुनाया। अपील क अनुमित दी जाती है और अपीलकता को ह ता रत रपोट यो य िनणय के संदभ म तुरंत जारी कया जाता है है,जो जो फाइल पर रखा जाता है। लंिबत आवेदन आवेदन,य द य द कोई हो हो, िनपटाए जाएंगे। (िनमला िनमला नेगी ) (िव ा िव ा नेगी ) कोट मा टर ( ी ी) सहायक रिज ार vLohdj.k%& LFkkuh; Hkk’kk esa vuqokfnr fu.k;Z oknh ds lhfer mi;ksx ds fy, gS rkfd og viuh Hkk’kk esa bls le> lds vkSj fdlh vU; m|s”; ds fy, bldk mi;ksx ugha fd;k tk ldrk gSA lHkh O;ogkfjd vkSj vkf/kdkfjd m|s”;ks ds fy, fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd gksxk vkSj fu’iknu vkSj dk;kZUo;u ds m)s”; ds fy, mi;qDr jgsxkA