मो. असफाक आलम v. झारखंड राज्य एवं अन्य

Supreme Court of India · 31 Jul 2023
एस. रर्वीन्र भट्ट; अरत्रर्वंद कुमार
आपरात्रिक अपील संख्या 2207/2023
criminal appeal_allowed Significant

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The Supreme Court held that arrest under Section 498A IPC should not be automatic and granted anticipatory bail, directing strict adherence to procedural safeguards to prevent arbitrary arrests.

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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
आपरात्रिक अपीलीय क्षेिात्रिकार
आपरात्रिक अपील संख्या 2207/2023
[त्रर्वशेष अनुमत्रत यात्रचका (सीआरएल) संख्या 3433/2023 से उत्पन्न]
मो. असफाक आलम ...अपीलकताा
बनाम
झारखंड राज्य एर्वं अन्य। ...उत्तरदातागण
त्रनणाय
एस. रर्वीन्र भट्ट, न्याया.
JUDGMENT

1. इस न्यायालय ने सुनवाई की पिछली तारीख, यानी 26.07.2023 को इस न्यायालय ने इस पवशेष अनुमपत यापिका के िक्षकारों के अपिवक्ताओंकी दलीलें सुनी थीं। िरंतु िंपक आक्षेपित आदेश की प्रकृपत पवपशष्ट है, अतः इस मामले को रोक कर रखा गया था, तापक आज इसकी उद्घोषणा की जा सके।

2. वांपछत पवशेष अनुमपत प्रदान की जाती है। अिीलकताा को अपिम जमानत देने से इनकार पकया गया है और अदालत के समक्ष आत्मसमिाण करके पनयपमत जमानत लेने का पनदेश पदया गया है, पजससे वे व्यपथत हैं।

3. कुछ आवश्यक तथ्य इस प्रकार हैंपक अिीलकताा और दसरे प्रपतवादी (इसके बाद क्रमशः "शौहर और बीवी" कहा जाएगा) का पनकाह 5.11.2020 को हुआ था। अिीलकताा का आरोि है पक प्रपतवादी-बीवी खुश नहीं थी और उसके पिता उनके बीि हस्तक्षेि करते थे तथा उस िर और उसके िररवार वालों िर दबाव डालते थे। इसके िलते बीवी के िररवार के पखलाफ पशकायत दजा कराई गई पक अिीलकताा के िररवार को िमकी दी जा रही है। आरोि लगाया गया है पक लललता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य[1] के मामले में िांि जजों की बेंि द्वारा पदए गए पनदेशों का िालन न करते हुए, संबंपित िुपलस थाना2 द्वारा अिीलकताा, उसके भाई एवं अन्य के पखलाफ भारतीय दंड संपहता, 1860 (आईिीसी) की िारा 498 ए, 323/504/506 तथा दहेज प्रपतषेि अपिपनयम की िारा 3 और 4 के तहत अिराि करने की पशकायत के साथ प्राथपमकी (एफआईआर) दजा की गई।

4. अिीलकताा को पगरफ्तारी की आशंका थी और इसपलए उसने सत्र न्यायािीश, गुमला, झारखंड के समक्ष दंड प्रपक्रया संपहता, 1973 ( सीआरिीसी ) की िारा 438 के तहत अपिम जमानत के पलए आवेदन पकया था, िरंतु उनका जमानत आवेदन 28.06.2022 को खाररज कर पदया गया। इसके बाद अिीलकताा ने 05.07.2022 को अपिम जमानत के पलए झारखंड उच्ि न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इस दौरान, अिीलकताा ने जांि में भी सहयोग पकया और जांि िरी होने के बाद सत्र न्यायािीश के समक्ष आरोि ित्र दायर पकया गया।

1. [2013] 14 एससीआर 713

2. गुमला मपहला थाना काण्ड संख्या 07/2022[3]

5. सत्र न्यायालय द्वारा 01.10.2022 को संज्ञान पलया गया। सत्र न्यायालय ने इस आदेश में कहा पक 08.08.2022 को उच्ि न्यायालय ने अंतररम आदेश के साथ अिीलकताा को संरक्षण पदया था और पनदेश पदया था पक उसे पगरफ्तार न पकया जाए। जब 18.01.2023 को उच्ि न्यायालय द्वारा आवेदन िर अगली सुनवाई की गई, तो पबना कोई सिना पदए लंपबत अपिम जमानत खाररज कर दी गई और उच्ि न्यायालय ने अिीलकताा को सक्षम न्यायालय के समक्ष आत्मसमिाण करके पनयपमत जमानत लेने का पनदेश पदया। उच्ि न्यायालय के आक्षेपित आदेश[3] के प्रासंपगक उद्धरणइस प्रकार हैं: “इस मामले के तथ्यों, पररलथिलतयों और लवद्वान अलिवक्ता की दलीलों पर लवचार करने पर मैंने पाया लक यालचकाकताा के लिलाफ गंभीर आरोप हैं लक इस मामले के दर्ा होने के तुरंत बाद ही सूचक के पररवार के सदथयों के लिलाफ आपरालिक मामले दर्ा करके क्रूरता की र्ा रही है।” यालचकाकताा के लिलाफ उपलब्ि सामग्री तिा लवद्वान वकीलों की दलीलों एवं आरोपों की गंभीरता को ध्यान में रिते हुए, मैं यालचकाकताा को अलग्रम र्मानत का लवशेषालिकार देने का इच्छुक नहीं हं, इसे िाररर् लकया र्ाता है। यालचकाकताा को लनदेश लदया र्ाता है लक लनचली अदालत के समक्ष आत्मसमपाण करके लनयलमत र्मानत के ललए आवेदन करें। लनचली अदालत इस आदेश से प्रभालवत हुए लबना गुण-दोष के आिार पर इस मामले पर लवचार करेगी।

3. ए.बी.ए. सं. 5771/2022 पदनांक 18.01.2023

6. अिीलकताा का तका है पक संपविान द्वारा व्यपक्तगत स्वतंत्रता को महत्व पदया गया है। आरोि ित्र दापखल करने से िहले पगरफ्तारी की आवश्यकता तब होती है जब अपभयुक्त की पहरासत में जांि या िछताछ आवश्यक होती है अथवा गंभीर अिरािों के उन मामलों में, जहां अपभयुक्त द्वारा गवाहों को प्रभापवत करने की संभावना होती है। पवद्वान अपिवक्ता का तका है पक यह ठीक है पक पगरफ्तारी की जा सकती है, िरंतु यह अपनवाया नहीं है पक हरमामले मेंपगरफ्तारी होनी ही िापहए।अपिवक्ता ने इसबात िरजोर पदया हैपकपगरफ्तार करने की शपक्त होना और इस शपक्त का उपित प्रयोग करना दोनों अलग िीजें हैं, और इस अंतर को हमेशा ध्यान में रखा जाना िापहए। इस प्रकार वे यह तका देते हैं पक इस संबंि में सीआरिीसी की िारा 41ए की प्रपक्रयात्मक आवश्यकताओंका हमेशा ध्यान रखा जाना िापहए।

7. पवद्वान अपिवक्ता ने अनेश कुमार बनाम लबहार राज्य एवं एक अन्य[4], सतेंद्र कुमार अंलतल बनाम केंद्रीय र्ांच ब्यूरो एवं अन्य[5] तथा लसद्धािा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य[6] में इस न्यायालय द्वारा पदए गए पनणायों को आिार बनाकर अिनी दलीलों िर बल पदया। उन्होंने बात िर भी प्रकाश डाला है पक अगर अनुसंिान अपिकारी को लगता है पक अपभयुक्त फरार हो सकता है या समन की अवज्ञा कर सकता है, तभी उसे पहरासत में लेने की आवश्यकता होती है। 8.राज्य की ओर से िेश हुए पवद्वान वकील ने पनवेदन पकया है पक दरअसल आरोि ित्र दायर

4. [2014] 8 एससीआर 128

5. [2022] 10 एससीआर 351

6. (2022) 1 एससीसी 676 कर पदए जाने मात्र से कोई अपभयुक्त अपिम जमानत िाने का अपिकारी नहीं हो जाता, यह हमेशा न्यायालय के पववेकािीन रहता है। न्यायालय पकसी अपभयुक्त को उसके िवा आिरण के आिार िर गवाहों को प्रभापवत करने या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना िर हमेशा पविार करता ही है। उन्होंने इस बात िर भी प्रकाश डाला है पक प्रपतवादी ने, जो इस मामले में पशकायतकताा है, आरोि लगाया था पक शादी के लगभग डेढ़ महीने बाद से ही ससुराल में अिीलकताा औरउसके ररश्तेदार लगातार उसका उत्िीड़न कर रहे हैं। इतना ही नहीं, उसे जान से मारने की िमकी भी दी गई थी। अपिवक्ता ने यह भी कहा है पशकायतकताा के अनुसार, िमकी का स्तर इस हद तक बढ़ गया था पक उसे इस तरह का इंजेक्शन लगाया जाएगा पजससे जांि में िता िलेगा पक उसकी मृत्यु पदल का दौरा िड़ने से हुई थी। विश्लेषण

9. इस अदालत ने जमानत देने के पलए अिने पववेक का प्रयोग करते समय हमेशा ही व्यपक्तगत स्वतंत्रता के अपिकार िर जोर पदया है। कई मामलों की एक लंबी श्ृंखला के द्वारा यह स्थापित पकया गया हैपक आम तौर िर जमानत दे दी जानी िापहए। गंभीर मामलों में-जो सीआरिीसी (िारा 437)के प्राविानों मेंपनपदाष्ट हैं,पजनमें लंबी सजा वालेअिराि तथा अन्य पवशेष अिरािों से संबंपित आरोि शापमल हैं, न्यायालय को अिने पववेक का प्रयोग करने में सतका और साविान रहना िापहए। जब पकसी मामले में जमानत या अपिम जमानत की मांग की जाती है, तो न्यायालय को पजन बातों िर सवाापिक ध्यान रखा जाना िापहए, वे हैं - अिराि की प्रकृपत और गंभीरता, अनुसंिान के दौरान अपभयुक्त द्वारा सबतों को हापन िहुंिाने, गवाहों को िमकी देने या प्रभापवत करने की कोपशश करके जााँि प्रपक्रया में बािा डालने की संभावना हो, अपभयुक्त के न्याय प्रपक्रया के दौरान फरार होने की संभावना हो या ऐसी ही कोई अन्य संभावना हो। पविारण के दौरान, अदालत हमेशा पनिााररत प्रपक्रया के अिीन िलती है, और वह जैसा आवश्यक समझे, वैसी शता लगा सकती है, तापक मुकदमे में अपभयुक्त की उिपस्थपत और भागीदारी सुपनपित हो सके । अदालत को हर मामले में इन व्यािक पसद्धांतों का िालन करना ही िापहए।

10. िांि जजों की बेंि द्वारा सुशीला अग्रवाल बनाम लदल्ली राज्य[7] के मामले में पविार करते समय इस अदालत को गुरबख्श लसंह लसलब्बया बनाम पंर्ाब राज्य[8] मामले सपहत अिने पिछले कई पनणायों की समीक्षा करने का अवसर प्राप्त हुआ, पजसमें यह भी तय करना था पक क्या पगरफ्तारी से िवा जमानत आदेश को सीपमत करना आवश्यक है, पवशेषकर तब, जब आरोि-ित्र दायर पकया जा िुका हो। अदालत (एम.आर. शाह, न्याया.) ने, अन्य बातों के अलावा अिने फैसले में कहा पक: “7.6. इस प्रकार, गुरबख्श लसंह लसलब्बया [ गुरबख्श लसंह लसलब्बया बनाम पंर्ाब राज्य, (1980) 2 एससीसी 565: 1980 एससीसी (आपरालिक) 465] मामले में इस न्यायालय की संलविान पीठ द्वारा की गई लिप्पलणयों को ध्यान में रिते हुए, यलद पयााप्त कारण मौर्ूद हों, तो प्रािलमकी दर्ा करने के बाद न्यायालय के आदेश के कायाान्वयन को आदेश के अंतगात आने वाले मामले में छोिी अवलि तक सीलमत कर सकताहैऔर आवेदक को ऐसे मामले में सीआरपीसी की िारा 437 या 439 के तहत र्मानत का आदेश प्राप्त करने के ललए लनदेश लदया र्ा सकता है। संलविान पीठ ने आगे कहा लक इसे एक

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7. 2020 (2) एससीआर 1

8. 1980] 3 एससीआर 383 अपररवतानीय लनयम के रूप में पालन करने की आवश्यकता नहीं है। आगे यह कहा गया लक सामान्य लनयम में आदेश के पालन को लकसी लनलित समयावलि सीलमत नहीं करना चालहए। हमारी राय यह है लक संबंलित अदालत द्वारा लगरफ्तारी से पूवा र्मानत का आदेश देते समय ही शतें लनिााररत की र्ा सकती हैं। पररलथिलतयों को ध्यान में रिते हुए इन शतों में समय की अवलि के संबंि में आदेश के पालन को सीलमत करना शालमल है, लवशेष रूप से वह चरण लर्स पर "अलग्रम र्मानत'' आवेदन दायर लकया र्ाता है, अिाात्, क्या यह एफआईआर दर्ा होने से पहले के चरण में है या उस चरण में र्ब एफआईआर दर्ा की गई है और र्ांच चल रही है या उस चरण में है र्ब र्ांच पूरी हो गई है और आरोप पत्र दालिल लकया र्ा चुका है। हालााँलक, र्ैसा लक यहााँ ऊपर कहा गया है, सामान्य लनयम में समय की अवलि के संबंि में आदेश को सीलमत नहीं करना चालहए। (इस पनणाय के लेखक द्वारा) व्यक्त पकए गए पविार इस प्रकार थे: “85.3. सीआरपीसी की िारा 438 अदालतों को र्ांच या पूछताछ आलद के दौरान या एफआईआर दर्ा करने या लकसी गवाह के बयान दर्ा करने पर समय के संदभा में राहत देने वाली शतों को लागू करने के ललए बाध्य नहीं करती है। अलग्रम र्मानत देने के ललए लकसी आवेदन पर लवचार करते समय अदालत को अपराि की प्रकृलत, व्यलक्त की भूलमका, र्ांच के दौरान उसके प्रभालवत होने की संभावना या सबूतों के साि छेड़छाड़ (गवाहों को डराने- िमकाने सलहत), न्याय से भागने की संभावना (आलद) पर लवचार करना होगा (र्ैसे लक देश छोड़ना) । अदालतों के ललए उलचत है लक - वे सीआरपीसी की िारा 437(3) में वलणात शतें लगाएं [िारा 438(2) के आिार पर]। अन्य प्रलतबंि लगाने वाली शतों को लागू करने की आवश्यकता का लनणाय प्रत्येक मामले के आिार पर और राज्य या र्ांच एर्ेंसी द्वारा पेश की गई सामग्री के आिार पर करना। ऐसी लवशेष या अन्य शतें तभी लगाई र्ा सकती हैं र्ब मामला ऐसा हो, लेलकन सभी मामलों में इसे लनयलमत तरीके से नहीं लगाया र्ाना चालहए। इसी तरह, अलग्रम र्मानत को सीलमत करने वाली शतें तभी दी र्ा सकती हैं, यलद वे लकसी मामले या मामलों के तथ्यों के अनुसार आवश्यक हों; तिालप, ऐसी सीलमत शतें हमेशा लागू नहीं की र्ा सकतीं। *********************************

85.4. अलग्रम र्मानत देनी है या नहीं देनी है, इसका आकलन करते समय अदालतों को आम तौर पर अपराि की प्रकृलत और गंभीरता, आवेदक की भूलमका और मामले के तथ्यों आलद पर ठीक से लवचार करना चालहए। र्मानत देना या न देना अदालत के लववेक पर लनभार है; और यलद र्मानत दी र्ाती है, तो लकस प्रकार की लवशेष शतें लगाई र्ानी हैं (या नहीं लगाई र्ानी हैं) यह उस मामले के तथ्यों पर लनभार करता है, और अदालत के लववेक के अिीन भी है।

85.5. अलभयुक्त के आचरण और व्यवहार को ध्यान में रिते हुए आरोप- पत्र दालिल होने के बाद भी अलग्रम र्मानत लवचारण के अंत तक र्ारी रह सकती है। साि ही अलग्रम र्मानत के आदेश का अिा यह नहीं ललया र्ाना चालहए लक इससे अलभयुक्त को आगे और अपराि करने और लफर लगरफ्तारी से राहत का दावा करने की छूि लमल र्ाती है। इसे उस अपराि या घिना तक ही सीलमत रिा र्ाना चालहए, लर्स घिना के संबंि में लगरफ्तारी से रोक की मांग की गई है। यह भलवष्य की लकसी अपराि संबंिी घिना के ललए प्रभावी नहीं होगा। *********************************

87. हमारे गणतंत्र का इलतहास - और वाथतव में, थवतंत्रता आंदोलन ने लदिाया है लक कैसे मनमानी लगरफ्तारी और अलनलितकालीन लहरासत की संभावना और सुरक्षा उपायों की कमी के कारण लोग आर्ादी की मांग के ललए एकर्ुि हुए। रौलि एक्ि को याद कीलर्ए, इसके लिलाफ कैसे देशव्यापी लवरोि प्रदशान हुए, र्ाललयांवाला बाग नरसंहार और कई अन्य घिनाएं हुई ं, र्हां आम र्नता (लवरोि करने के) अपने अलिकार का प्रयोग कर रही िी, लेलकन उन्हें बेरहमी से कुचल लदया गया और अंततः लंबे समय के ललए र्ेल में डाल लदया गया। बार-बार नागररकों को परेशान और अपमालनत करने के ललए और कई बार शलक्तशाली व्यलक्तयों के लहत में (अपरािों की कोई र्ांच लबना लकए) मनमाने ढंग से और भारी-भरकम लगरफ्ताररयों के कारण ही िारा 438 को अलिलनयलमत लकया गया। लवलि आयोग के कई प्रलतवेदनों और अनुशंसाओं के बावर्ूद, मनमानी और आिारहीन लगरफ़्ताररयााँ अभी भी व्यापक रूप से दृलिगोचर होतीं हैं। संसद ने लवशेष रूप से अवलि के संबंि में, या आरोप पत्र दायर होने तक, या गंभीर अपरािों में, लगरफ्तारी से पूवा या अलग्रम र्मानत देने में अदालतों की शलक्त या लववेक को कम करना उलचत नहीं समझा है। इसललए, यह समार् के व्यापक लहत में नहीं होगा यलद न्यायालय, न्यालयक व्याख्या द्वारा, उस शलक्त के प्रयोग को सीलमत करता है। इसका ितरा यह होगा लक िीरे-िीरे, लर्से परामशा दे-देकर लववेक को व्यापक रिा गया है, बहुत ही संकीणा और अज्ञात रूप से छोिे-से लहथसे में लसमि र्ाएगा, इस प्रकार इस प्राविान का उद्देश्य ही लवफल हो र्ाएगा, र्ो इन 46 वषों में समय की कसौिी पर िरा उतरा है।''

11. अपिवक्ता द्वारा उद्धृत यह पनणाय कई प्रकार के मामलों में िुपलस की शपक्तयों, अदालत के पववेक और कताव्यों के संबंि में उियोगी और मल्यवान हैं, पजनमें आईिीसी की िारा 498ए एवं अन्य वैवापहक अिरािों से संबंपित मामले भी शापमल हैं। अनेश कुमार (उपरोक्त) के मामले में, कहा गया है पक: “9. उपरोक्त प्राविान को सामान्य रूप से पढ़ने पर ही थपि हो र्ाता है लक सात वषा से कम अवलि के कारावास (र्ुमााने के साि या लबना र्ुमााने के) या सात वषा तक की सर्ा से दंडनीय अपराि के अलभयुक्त को पुललस अलिकारी द्वारा केवल इस बात पर लगरफ्तार नहीं लकया र्ा सकता है लक अमुक व्यलक्त ने उपरोक्तानुसार दंडनीय अपराि लकया है। ऐसे मामलों में लगरफ्तारी से पहले पुललस अलिकारी को यह सुलनलित करना होता है लक ऐसे व्यलक्त को आगे कोई अपराि करने से रोकने के ललए या मामले की उलचत र्ांच के ललए या अलभयुक्त को अपराि के सबूत गायब करने से रोकने के ललए या ऐसे सबूतों के साि लकसी भी तरह से छेड़छाड़ करने या लकसी गवाह को प्रलोभन, िमकी या वादा करके उसे अदालत या पुललस अलिकारी के सामने ऐसे तथ्यों का िुलासा करने से रोका र्ा सके; या र्ब तक ऐसे अलभयुक्त व्यलक्त को लगरफ्तार नहीं लकया र्ाता, र्ब भी आवश्यक हो, अदालत में उसकी उपलथिलत सुलनलित नहीं की र्ा सकती, तो ऐसी लगरफ्तारी आवश्यक है। ये वे लनष्कषा हैं लर्न पर कोई भी तथ्यों के आिार पर पहुंच सकता है। कानून पुललस अलिकारी को ऐसी लगरफ्तारी करते समय तथ्यों को बताने और उन कारणों को लललित रूप में दर्ा करने का आदेश देता है लर्सके कारण वह उपरोक्त प्राविानों में से लकसी एक के तहत आने वाले लनष्कषा पर पहुंचा। कानूनन पुललस अलिकाररयों को लगरफ्तारी न करने के कारणों को लललित रूप में दर्ा करने की आवश्यकता होती है। असल में, लगरफ्तारी से पहले पुललस अलिकारी को िुद से एक सवाल र्रूर पूछना चालहए लक लगरफ्तारी क्यों? क्या सचमुच इसकी आवश्यकता है? यह लकस उद्देश्य की पूलता करेगा? इससे कौन सा उद्देश्य प्राप्त होगा? इन सवालों का समािान होने और ऊपर बताई गई एक या अन्य शतें पूरी होने के बाद ही लगरफ्तारी की शलक्त का प्रयोग लकया र्ाना चालहए। र्ुमााने में, लगरफ्तारी से पहले पुललस अलिकाररयों के पास र्ानकारी और सामग्री के आिार पर यह लवश्वास करने का कारण होना चालहए लक अलभयुक्त ने अपराि लकया है। इसके अलावा, पुललस अलिकारी को इस बात से भी संतुि होना होगा लक सीआरपीसी की िारा 41 के िंड (1) के उप- िंड (ए) से (ई) तक उलल्ललित एक या अलिक उद्देश्यों के ललए लगरफ्तारी आवश्यक है। अदालत ने उन सभी मामलों में, जहां जमानत देने का प्रश्न उठता है, िुपलस अपिकाररयों और अदालतों द्वारा िालन पकए जाने हेतु मल्यवान पनदेश भी जारी पकए। इसके अलावा, अदालत ने लसद्धािा (उपयुाक्त) के मामले में अिने फैसले में व्यपक्तगत स्वतंत्रता की प्रिानता को रेखांपकत पकया था: “10. हमें ध्यान देना चालहए लक व्यलक्तगत थवतंत्रता हमारे संवैिालनक अलिकार का एक महत्वपूणा पहलू है। र्ांच के दौरान लकसी अलभयुक्त को लगरफ्तार करने की आवश्यकता तब होती है र्ब लहरासत में उससे पूछताछ आवश्यक हो या वह अपराि र्घन्य हो या गवाहों को प्रभालवत करने की संभावना हो या अलभयुक्त के फरार होने की संभावना हो। चूंलक लगरफ्तारी की र्ा सकती है और वह वैि भी है, तो के वल इसीललए लकसी की लगरफ्तारी नहीं की र्ानी चालहए। लगरफ्तार करने की शलक्त के अलथतत्व और इसके प्रयोग के औलचत्य के बीच अंतर का ध्यान रिना ही चालहए। यलद लगरफ्तारी को लनयलमत बना लदया र्ाए, तो इससे व्यलक्त की प्रलतष्ठा और आत्म-सम्मान को अपूरणीय क्षलत हो सकती है। यलद र्ांच अलिकारी के पास यह लवश्वास करने का कोई कारण नहीं है लक अलभयुक्त भाग र्ाएगा या समन की अवज्ञा करेगा और वाथतव में, उसने पूरी र्ांच प्रलक्रया में सहयोग लकया है तो हम यह समझ नहीं पा रहे लक पुललस अलिकारी पर अलभयुक्त को लगरफ्तार करने की बाध्यता क्यों होनी चालहए।

12. इस मामले में इस न्यायालय की राय है पक इसमें ऐसी कोई सनसनीखेज पवशेषता या तत्व नहीं हैं जो अिीलकताा को अपिम जमानत देने से वंपित करते हों। महत्विणा बात यह नहीं है पक शौहर-बीवी के बीि समझौता होने से िहले ही वैवापहक ररश्ते में खटास आ गई, बपल्क यह है पक इस स्तर िर अिीलकताा के पखलाफ लगाए गए आरोि सही हैं या आंपशक रूि से सि हैं, जो कम से कम इस अदालत के पलए तो अनुमान का ही पवषय हैं। हालााँपक, जहां तक ररकॉडा की बात है, पजस समय अपिम जमानत लंपबत थी, उसे दो भागों में पवभापजत पकया जा सकता है - िहला, जब पकसी अंतररम आदेश के माध्यम से उसे कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की गई थी (अप्रैल 2022 और 08.08.2022 के बीि)। दसरा, 08.08.2022 को उच्ि न्यायालय ने एक आदेश पदया पजसमें िुपलस को सीआरिीसी की िारा 438 के तहत उसके आवेदन के लंपबत रहने के दौरान उसे पगरफ्तार न करने का प्रभावी पनदेश पदया गया । गौरतलब है पक जांि िरी हो गई थी, और 08.08.2022 के बाद आरोि ित्र दायर पकया गया था, और वास्तव में सत्र न्यायािीश द्वारा 01.10.2022 को संज्ञान पलया गया था। ये कारक महत्विणा थे, और उच्ि न्यायालय ने इन कारकों िर ध्यान पदया, लेपकन उनकी व्याख्या पबलकुल अलग तरीके से की। ररकॉडा से िता िलता है पक अिीलकताा ने 08.08.2022 से िहले, जब उसे कोई सुरक्षा नहीं दी गई थी तब भी उसने जांि में सहयोग पकया और 08.08.2022 के बाद, जब उसे आरोिित्र दापखल होने और 01.10.2022 को उस मामले के संज्ञान तक सुरक्षा प्राप्त थी, तब भी सहयोग पकया। इस प्रकार, जब आरोि ित्र दायर पकया गया था और कम से कम अपभयुक्तों की ओर से कोई बािा नहीं थी, तो अदालत को अिरािों की प्रकृपत, आरोिों और उनके द्वारा पकए गए अिरािों की अपिकतम सजा को ध्यान में रखना िापहए था और पनपित रूि से जमानत दे दी जानी िापहए थी। हालााँपक, अदालत ने ऐसा नहीं पकया, बपल्क मशीनी रूि से खाररज कर पदया और इतना ही नहीं, घाव िर नमक पछड़कने के पलए अिीलकताा को पविारण न्यायालय के समक्ष आत्मसमिाण करने और पनयपमत जमानत लेने का पनदेश भी दे पदया। इसपलए, इस अदालत की रायमें उच्ि न्यायालय ने इस तरह का अजीब दृपष्टकोण अिनाकर गलती की। इसपलए, जमानत को खाररज करने और अिीलकताा को आत्मसमिाण करने और बाद में जमानत मांगने का पनदेश देने का आक्षेपित आदेश कायम नहीं रखा जा सकता और इसे रद्द पकया जाता है। समाप्त करने से िहले, अदालत कायावाही संिन्न करने वाली सभी अदालतों को अनेश कुमार (उपरोक्त) में पनिााररत कानन का सख्ती से िालन करने का पनदेश देती है और साथ ही साथ अन्य पनदेशों को भी दोहराती है:

"I. 11. इस फैसले में हमारा प्रयास यह सुपनपित करना है पक िुपलस अपिकारी अपभयुक्त को अनावश्यक रूि से पगरफ्तार न करें और दंडापिकारी आकपस्मक और यंत्रवत् पहरासत की िुपष्ट न करें। हमने ऊिर जैसा कहा है, वैसा सुपनपित करने के पलए हम पनम्नपलपखत पनदेश देते हैं:

11.1. सभी राज्य सरकारें अिने िुपलस अपिकाररयों को पनदेश दें पक आईिीसी की िारा 498-ए के तहत मामला दजा होने िर मशीनी रूि से पगरफ्तारी न करें, बपल्क सीआरिीसी की िारा 41 के तहत पनिााररत मािदंडों के तहत पगरफ्तारी की आवश्यकता िर िहले स्वयं संतुष्ट हो लें;

11.2. सभी िुपलस अपिकाररयों को िारा 41(1 )( बी)(ii) में पनपदाष्ट उि-िाराओंकी एक सिी प्रदान की जाए;

11.3. िुपलस अपिकारी- अपभयुक्त को आगे भी पहरासत में रखने के पलए दंडापिकारी के समक्ष अिेपषत/िेश करते समय पवपिवत भरी हुई जांि सिी भी अिेपषत करेगा और उन कारणों और तथ्यों को प्रस्तुत करेगा पजनके कारण पगरफ्तारी आवश्यक हुई;

11.4. अपभयुक्त की पहरासत की िुपष्ट करते समय दंडापिकारी उिरोक्त शतों के अनुसार िुपलस अपिकारी द्वारा प्रस्तुत ररिोटा का अवलोकन करेगा और संतुष्ट होने के बाद ही दंडापिकारी उस पहरासत को अपिकृत करेगा;

11.5. पकसी अपभयुक्त को पगरफ़्तार न करने का पनणाय, पकसी मामले के दजा होने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर दंडापिकारी को पलपखत रूि में भेजा जाएगा, पजसकी एक प्रपत दंडापिकारी को दी जाएगी, पजसे पजले के िुपलस अिीक्षक द्वारा बताए गए कारणों से बढ़ाया जा सकता है;

11.6. मामला दजाहोनेकी तारीखसेदो सप्ताहके भीतरअपभयुक्त को सीआरिीसी की िारा 41-ए के तहत उिपस्थत होने की सिना दी जाएगी, पजसे पजले के िुपलस अिीक्षक द्वारा पलपखत रूि में पदए गए कारणों से बढ़ाया भी जा सकता है;

11.7. उिरोक्त पनदेशों का िालन न करने िर संबंपित िुपलस अपिकारी िर पवभागीय कारावाई की जाए तथा स्थानीय क्षेत्रापिकार वाले उच्ि न्यायालय के समक्ष संपस्थत अदालत की अवमानना के पलए दंपडत भी पकए जा सकेंगे।

11.8. संबंपित न्यापयक दंडापिकारी द्वारा उिरोक्त कारणों िर पविार पकए पबना पहरासत को अपिकृत करने िर संबंपित उच्ि न्यायालय द्वारा पवभागीय कारावाई की जाएगी।

12. इसके साथ ही साथ यह भी स्िष्ट पकया जाता है पक उिरोक्त पनदेश केवल आईिीसी की िारा 498-ए या दहेज पनषेि अपिपनयम की िारा 4 के तहत मामले िर ही लाग नहीं होंगे, बपल्क ऐसे सभी मामलों िर भी लाग होंगे पजन अिरािों में सजा की अवपि सात वषा से कम हैया सात वषातक ही बढ़ाने योग्य है, (जुमााने के साथ या उसके पबना)।"

II. उच्ि न्यायालय उिरोक्त पनदेशों को अपिसिनाओं और पदशापनदेशों के रूि में तैयार करेगा पजनका िालन सत्र अदालतों और पवपभन्न अिरािों से पनिटने वाली अन्य सभी आिरापिक अदालतों द्वारा पकया जाएगा।

III. इसी प्रकार, सभी राज्यों के िुपलस महापनदेशक यह सुपनपित करेंगे पक उिरोक्त पनदेशों के संदभा में सख्त पनदेश जारी पकए जाएं। उच्ि न्यायालय और सभी राज्यों के िुपलस महापनदेशक, दोनों ही यह सुपनपित करेंगे पक आज से आठ सप्ताह के भीतर प्रत्येक राज्य में सभी पनिली अदालतों और िुपलस अपिकाररयों के मागादशान के पलए ऐसे पदशापनदेश और पनदेश/पवभागीय िररित्र जारी पकए जाएं।

13. उिरोक्त शतों के अनुसार अिील में की गई प्राथाना स्वीकार की जाती है। अिीलकताा को ऐसे पनयमों और शतों के अिीन जमानत िर ररहा करने का पनदेश पदया जाता है जैसा पविारण न्यायालय उपित समझे। सभी राज्यों के उच्ि न्यायालयों और िुपलस अपिकाररयों को उपल्लपखत समय सीमा के भीतर उिरोक्त िैरा में बताए गए तरीके से उिरोक्त पनदेशों का अनुिालन करना आवश्यक है।...…....................................न्याया.। [एस. रर्वीन्र भट्ट] …...................................... न्याया.। [अरत्रर्वंद कु मार] नई त्रदल्ली; 31 जुलाई 2023 अस्र्वीकरण: पहन्दी भाषा में अनपदत पनणाय का उियोग इतना ही है पक वादी इसे अिनी भाषा में समझ सके। इसका उियोग पकसी अन्य उद्देश्य के पलए नहीं पकया जा सकता। सभी व्यावहाररक और आपिकाररक कायों में तथा पनष्िादन और कायाान्वयन के पलए उक्त पनणाय का अंिेजी संस्करण ही मान्य होगा।