Harir Prakash Shukla v. State of Uttar Pradesh

High Court of Allahabad · 05 Jul 2023
Krishna Murari; Ahsanuddin Amanulla
Civil Appeal Nos. 9697-9698 of 2014
property appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that forest land claims by Scheduled Castes and other backward communities are protected under the principles laid down in Banvasi Seva Ashram, and High Courts cannot reappraise evidence under Article 226 to overturn concurrent findings of fact by competent authorities.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
भार क
े सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या 9697-9698 वर्ष$ 2014
हरिर प्रकाश शुक्ला और अन्य ... अपीलार्थी1 (गण)
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य ... प्रत्यर्थी1 (गण)
सह
अवमानना याति<का (सिसविवल) संख्या 209-210 वर्ष$ 2021
हरिर प्रकाश शुक्ला और एक अन्य ... याति<काक ा$ (गण)
बनाम
प्रखर विमश्रा और एक अन्य ... कथिर्थी अवमानक ा$
(गण)/प्रत्यर्थी1 (गण)
विनण$य
न्यायमूर्ति क
ृ ष्ण मुरारी,
JUDGMENT

1. व $मान अपीलें उच्च न्यायालय, इलाहाबाद (इसक े बाद "उच्च न्यायालय" क े रूप में संदर्भिभ ) द्वारा पारिर विकए गए 04.02.2013 विदनांविक आक्षेविप आदेश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और विनण$य क े खिखलाफ दायर की गई हैं, सिTसक े ह व $मान मामले क े प्रत्यर्भिर्थीयों द्वारा दायर रिरट याति<का को अनुमति दी गई र्थीी। थ्य

2. सुविव ा क े खिलए व $मान अपीलों क े विनण$य क े खिलए आवश्यक प्रासंविगक थ्यों का उल्लेख यहां विकया Tा रहा है।

3. व $मान अपीलक ा$गण वादग्रस् भूविम क े भूविम र हैं और उनका कब्Tा है। अपीलार्भिर्थीयों क े अनुसार, वर्ष$ 1952 में त्कालीन Tमींदार द्वारा उनक े पक्ष में एक स्र्थीायी पट्टा विनष्पाविद विकए Tाने क े बाद से उक्त भूविम का उपयोग उनक े द्वारा क ृ विर्ष उद्देश्यों क े खिलए विकया Tा रहा है।

4. यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक अपीलक ा$ओं क े कब्Tे वाली भूविम सविह वादग्रस् भूविम क े विहस्से को आरतिक्ष वन घोविर्ष विकया गया र्थीा और उक्त भूविम का दूसरा विहस्सा आरतिक्ष वन क े रूप में घोविर्ष करने क े खिलए वन अति विनयम की ारा 4 क े ह एक अति सू<ना क े अ ीन र्थीा।

5. उक्त भूविम की इस रह की घोर्षणा ने स्र्थीानीय विनवासिसयों को बेदखल करने का अथिभयान शुरू विकया, और इसक े खिखलाफ, बनवासी सेवा आश्रम से प्राप्त एक पत्र क े आ ार पर, स्र्थीानीय विनवासिसयों क े दावे क े संबं में इस न्यायालय में एक रिरट याति<का दायर की गई।

6. इस न्यायालय ने, उपयु$क्त रिरट याति<का में विदनांक 20.11.1986 क े विनण$य और आदेश क े माध्यम से, उक्त विववाविद भूविम पर व्यविक्तयों क े दावों पर विनण$य लेने क े उद्देश्य से उच्च न्यायालय क े एक सेवाविनवृत्त न्याया ीश और दो अति कारिरयों वाली एक उच्च शविक्त प्राप्त सविमति क े गठन का विनदkश विदया और बाद में, वन बंदोबस् अति कारी द्वारा दावों की सुनवाई करने का विनदkश विदया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

7. उपयु$क्त विनण$य क े आ ार पर, व $मान अपीलक ा$ओं ने वन बंदोबस् अति कारी क े समक्ष अपने दावे दाखिखल विकए और दोनों पक्षों द्वारा विकए गए अभ्यावेदन पर उति< विव<ार करने क े बाद, वन बंदोबस् अति कारी ने माना विक उक्त भूविम 1385 फसली से पहले भी अपीलक ा$ओं क े कब्Tे में र्थीी और इस प्रकार, उक्त भूविम पर उनका सही दावा है।

8. उपयु$क्त आदेश से व्यथिर्थी होकर, व $मान प्रत्यर्भिर्थीओं ने अपर सिTला न्याया ीश क े समक्ष अपील की, हालांविक विदनांक 04.04.1991 क े एक सुविव<ारिर आदेश क े माध्यम से, उसे खारिरT कर विदया गया।

9. अपील खारिरT होने क े बाद, व $मान अपीलक ा$ओं ने उपयु$क्त आदेश को लागू करने क े खिलए एक प्रार्थी$ना पत्र दाखिखल विकया और विवद्वान अपर सिTला न्याया ीश ने विदनांक 23.03.2005 क े आदेश क े ह उक्त प्रार्थी$ना-पत्र को अनुमति दी और व $मान अपीलक ा$ओं को भूविम रों क े रूप में अंविक करने का विनदkश विदया।

10. प्रत्यर्थी1 वन विवभाग ने ब 04.04.1991 विदनांविक आदेश क े खिखलाफ एक पुनरीक्षण दायर विकया, हालांविक यह देख े हुए विक पुनरीक्षण की प्रक ृ ति एक अपील की प्रक ृ ति में अति क र्थीी, इसे 08.12.2005 विदनांविक आदेश द्वारा खारिरT कर विदया।

11. उक्त खारिरT करने क े बावTूद, वन विवभाग ने पुनरीक्षण क े उपयु$क्त आदेश क े खिखलाफ वापस लेने क े खिलए एक आवेदन दायर विकया, हालांविक, वापस लेने क े खिलए उक्त आवेदन को विदनांक 08.12.2005 क े आदेश क े माध्यम से भी खारिरT कर विदया गया र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

12. उक्त आदेशों से व्यथिर्थी होकर, प्रत्यर्थी1 वन विवभाग ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक रिरट याति<का दायर की और 04.02.2013 विदनांविक विनण$य और आदेश क े माध्यम से, इसको अनुमति दी गई और अपीलार्भिर्थीयों को बेदखल करने का विनदkश विदया गया।

13. उक्त आदेश क े खिखलाफ, अपीलक ा$ओं ने पुनरीक्षण याति<का दायर की सिTसे 08.02.2013 क े आदेश द्वारा खारिरT कर विदया गया र्थीा।हालाँविक अपीलार्भिर्थीयों की बेदखली पर 20.03.2013 क रोक लगा दी गई र्थीी ाविक वे इस न्यायालय का दरवाTा खटखटाने में सक्षम हो सक ें ।

14. उच्च न्यायालय क े उपयु$क्त आक्षेविप आदेश क े खिखलाफ, अपीलक ा$ओं ने व $मान अपीलों को दायर विकया है। विवश्लेर्षण

15. हमने अपीलार्भिर्थीयों क े खिलए श्री अविनल कौथिशक और प्रत्यर्भिर्थीयों क े खिलए विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री एस.आर. सिंसह, सिTनकी सहाय ा श्री कमलेंद्र विमश्रा ने की, को सुना।

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16. प्रारंभ में, व $मान अपीलों क े विनण$य क े खिलए, यह हमारी सुविव<ारिर राय है विक विनम्नखिलखिख दो मुद्दे हमारे विव<ार क े खिलए उत्पन्न हो े हैं।

I. क्या बनवासी सेवा आश्रम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य[1] क े विनण$य में दी गई राह क े वल अनुसूति< Tाति /अनुसूति< TनTाति /अन्य विपछड़े समुदायों पर लागू हो ी है?

1. 1986 4 एससीसी 753 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

II. क्या उच्च न्यायालय, भार क े संविव ान क े अनुच्छेद 226 क े ह अपनी अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए, अपने विनष्कर्ष{ पर आने क े खिलए प्रस् ु विकए गए साक्ष्य का विफर से मूल्यांकन कर सक ा र्थीा? विववाद्यक I- क्या बनवासी सेवा आश्रम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य[2] क े विनण$य में दी गई राह क े वल अनुसूति< Tाति /अनुसूति< TनTाति /अन्य विपछड़े समुदायों पर लागू हो ी है?

17. बनवासी सेवा आश्रम (उपरोक्त) क े मामले में, सिTसमें भूविम पर रहने वाले क ु छ आविदवासी समुदायों को वन अति विनयम क े ह ारा 4 अति सू<ना क े अ ीन होने क े आ ार पर उनक े घरों से बेदखल विकया Tा रहा र्थीा, इस न्यायालय ने कहा विक उक्त विनवासिसयों को वन अति कारी द्वारा उनक े दावों की सुनवाई करने का अति कार र्थीा और वन अति कारी क े पास ही मामले क े गुण- दोर्ष को देखने और विनवासिसयों क े दावों पर विनण$य लेने की शविक्त र्थीी।

18. उपयु$क्त बनवासी सेवा क े विनण$य (उपरोक्त) को, Tब विवस् ार से पढ़ा Tा ा है, ो यह प ा <ल ा है विक यह वादग्रस् भूविम क े विनवासिसयों को क े वल उति< प्राति करण द्वारा सुने Tाने का एक प्रवि•यात्मक अति कार प्रदान कर ा है, न विक भूविम क े कब्Tे/विनवास का ात्वित्वक अति कार प्रदान कर ा है। सरल शब्दों में, इसका म लब यह होगा विक यह न्यायालय, उक्त विनण$य दे े समय, प्रत्येक दावे क े गुण-दोर्ष पर नहीं गया, बत्विल्क इसने दावों की सुनवाई क े खिलए क े वल एक उपयुक्त मं< प्रदान विकया।

19. हमारी राय में, इस रह क े फ ै सले का उद्देश्य ात्वित्वक न्याय क े उद्देश्य को आगे बढ़ाना है और यह सुविनति• करना है विक अति सूति< भूविम पर वै दावे वाले

2. 1986 4 एससीसी 753 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रत्येक पक्ष को विवस् ार से सुना Tाए और स्र्थीानीय विनवासिसयों को बेदखल करने की कोई मनमानी शविक्त राज्य को नहीं दी Tाए।

20. यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक वन समुदायों में न क े वल मान्य ा प्राप्त आविदवासी और अन्य विपछड़े समुदायों क े लोग शाविमल हैं, बत्विल्क उक्त भूविम में रहने वाले अन्य समूह भी शाविमल हैं।ये अन्य समूह, सिTन्हें कई सामासिTक- राTनीति क और आर्भिर्थीक कारणों से वनवासी समुदाय क े रूप में कानून क े ह मान्य ा नहीं विमल ी है, वे भी उक्त वन समुदायों का एक अथिभन्न अंग हैं और यह उनक े कामकाT क े खिलए आवश्यक हैं।इसक े अलावा, पूव$Tों क े Tमाने से ही उनक े वन विनवासी होने क े कई उदाहरण भी हो सक े हैं, हालांविक दस् ावेTों की कमी क े कारण, वे इसे साविब करने में समर्थी$ नहीं हैं।

21. यद्यविप हम इस थ्य से अवग हैं विक व $मान अपीलक ा$गण विपछड़े समुदाय से नहीं हैं और न ही वे ऐसा होने का दावा कर े हैं, र्थीाविप उपयु$क्त बनवासी विनण$य (उपरोक्त), यविद क े वल क ु छ मान्य ा प्राप्त वन समुदायों को लाभात्विन्व करने क े खिलए संकीण$ रीक े से व्याख्या की Tा ी है, ो कई अन्य समुदायों को बहु नुकसान होगा। पुनरावृखित्त क े खिलए, यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक बनवासी विनण$य (उपरोक्त), क े वल एक सक्षम प्राति कारी द्वारा सुने Tाने का अति कार प्रदान कर ा है और यविद ऐसा प्राति करण विकसी दावे को अस्वीकार कर दे ा है, ो उक्त दावा विनवास स्र्थील की भूविम क े खिखलाफ विवद्यमान नहीं रह सक ा है।

22. हमारी राय में, सुनवाई का यह अति कार वादग्रस् भूविम क े कब्Tे का दावा करने वाले सभी लोगों को विदया Tाना <ाविहए और कब्Tे का ात्वित्वक अति कार उक्त सुनवाई क े दौरान सक्षम प्राति कारी द्वारा विदया Tा सक ा है या अस्वीकार विकया Tा सक ा है, अर्थीा$ ् सुनवाई का अति कार सभी को प्राप्त होना <ाविहए Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और कब्Tे का अति कार उन लोगों को प्राप्त होना <ाविहए सिTनक े पास वै दावा है।

23. इसक े अलावा, वन अति विनयम की ारा 4 क े ह अति सूति< विकसी भी भूविम पर कब्Tा करने का अति कार न क े वल आविदवासी समुदायों और अन्य वन विनवासी समुदायों क सीविम है, बत्विल्क विनवास क े प्रमाण, मूल कब्Tे की ारीख आविद पर भी आ ारिर है। यविद उक्त भूविम में रहने का अति कार क े वल कु छ समुदायों क ही सीविम नहीं है, ो ऐसे दावों पर सुनवाई का अति कार उसी क क ै से सीविम हो सक ा है।

24. इसखिलए उपयु$क्त <<ा$ओं क े आलोक में, हम विववाद्यक संख्या I को अपीलार्भिर्थीयों क े पक्ष में मान े हैं। विववाद्यक-II क्या उच्च न्यायालय, भार क े ह अपनी अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए, अपने विनष्कर्ष{ पर आने क े खिलए साक्ष्य का विफर से मूल्यांकन कर सक ा र्थीा?

25. उच्च न्यायालय द्वारा रिरट अति कारिर ा में पारिर आक्षेविप आदेश से पहले, अपीलक ा$ओं क े पास अ ीनस्र्थी न्यायालयों द्वारा विदए गए विनण$यों क े माध्यम से उनक े पक्ष में दो समव 1 विनष्कर्ष$ र्थीे।अपीलक ा$ओं ने प्रमुख साक्ष्य द्वारा वादग्रस् भूविम पर अपना अति कार साविब कर विदया र्थीा और सम्यक ् प्रवि•या क े माध्यम से, दोनों अ ीनस्र्थी न्यायालयों द्वारा इसकी सत्य ा का परीक्षण विकया गया र्थीा। हालाँविक उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्भिर्थीयों द्वारा विदए Tा रहे साक्ष्य क े विबना, विदनांक 04.02.2013 क े आक्षेविप आदेश और विनण$य क े माध्यम से समव 1 विनष्कर्ष{ को रद्द कर विदया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

26. इस न्यायालय ने विवथिभन्न विनण$यों में यह अथिभविन ा$रिर विकया है विक उच्च न्यायालय, भार क े संविव ान की ारा 226 क े ह अपनी अं र्निनविह शविक्तयों का प्रयोग कर े हुए, साक्ष्य और थ्यों क े विनष्कर्ष$ पर पहुँ<ने का विफर से मूल्यांकन नहीं कर सक ा है, Tब क विक मूल आदेश पारिर करने वाले प्राति कारी ने अपनी अति कारिर ा से बाहर, ऐसा नहीं विकया हो, या यविद विनष्कर्ष$ स्पष्ट रूप से विवक ृ र्थीे।

27. बी. क े. मुविनराTू बनाम कना$टक राज्य[3] क े मामले में, इस न्यायालय ने भार क े ह उच्च न्यायालय की शविक्तयों की व्याख्या कर े हुए कहा विक इसका उपयोग साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन करने क े खिलए ब क नहीं विकया Tा सक ा Tब क विक विन<ली अदाल द्वारा मूल्यांकन विकए गए थ्य की त्रुविट प्रकट न हो और ऐसी त्रुविट गंभीर अन्याय का कारण न बनी हो।

28. इसक े अलावा, क ृ ष्णानंद बनाम <कबंदी विनदेशक[4] क े मामले में, इस न्यायालय ने एक समान थ्यों की परिरत्विस्र्थीति में, सिTसमें विन<ली अदाल ों क े समव 1 विनष्कर्ष{ को उच्च न्यायालय द्वारा अपनी रिरट अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए खारिरT कर विदया गया र्थीा, यह अथिभविन ा$रिर विकया विक अनुच्छेद 226 क े ह साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन क े वल उन मामलों में विकया Tा सक ा है Tहां विन<ली अदाल द्वारा मूल आदेश उसकी अति कारिर ा से बाहर पारिर विकया गया र्थीा या यविद विन<ली अदाल ों क े विनष्कर्ष$ स्पष्ट रूप से विवक ृ र्थीे।

29. यह हमारी राय है विक Tहां क व $मान मामले का संबं है, विन<ली अदाल ों क े समव 1 विनष्कर्ष$ न ो विवक ृ हैं, न ही उक्त अदाल ों ने अपनी अति कारिर ा क े बाहर काय$ विकया है।ऐसे परिरदृश्य में, सिTसमें कोई भी श $ पूरी

3. 2008 4 एससीसी 451

4. 2015 1 एससीसी 553 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA नहीं हुई र्थीी, उच्च न्यायालय रिरट अति कारिर ा में साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन नहीं कर सक ा र्थीा और एक थिभन्न विनष्कर्ष$ पर नहीं आ सक ा र्थीा।

30. यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक विव<ारण क े <रण में, साक्ष्य का पुरःस्र्थीापन और ग्रहण एक कठोर प्रवि•या से गुTर ा है, सिTसमें प्रस् ु विकए गए साक्ष्य का प्रत्येक भाग बहु सख् Tां< क े अ ीन है और प्रत्येक पक्ष को कानून द्वारा स्र्थीाविप प्रवि•या द्वारा उक्त साक्ष्य की सत्य ा का परीक्षण करने का अवसर विदया Tा ा है।हर स् र पर साक्ष्य की वै ा पर सवाल उठाया Tा ा है और विवरो ी पक्ष को अदाल में अपने संदेह रख े हुए उक्त साक्ष्य पर सवाल उठाने का अति कार विदया Tा ा है।कानून में सबू ों की Tां< करने की ऐसी व्यवस्र्थीा, रिरट अति कारिर ा क े ह अपनी शविक्तयों का प्रयोग कर े समय उच्च न्यायालय क े खिलए उपलब् नहीं है और इसखिलए विन<ली अदाल ों द्वारा पुविष्ट विकए गए सबू ों को क े वल दुल$भ मामलों में ही उच्च न्यायालयों द्वारा उलट विदया Tाना <ाविहए।

31. उपयु$क्त <<ा$ओं क े आलोक में, हम विववाद्यक संख्या II को अपीलार्भिर्थीयों क े पक्ष में मान े हैं।

32. व $मान मामले में, हमारे द्वारा ैयार विकए गए दोनों विववाद्यकों का Tवाब व $मान अपीलार्भिर्थीयों क े पक्ष में विदया गया है, अर्थीा$, बनवासी सेवा विनण$य (उपरोक्त) क े ह विदया गया अनु ोर्ष व $मान अपीलार्भिर्थीयों क े खिलए उपलब् है और हमारी राय में, उच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 क े ह अपनी अं र्निनविह शविक्तयों का प्रयोग कर े हुए विकए गए साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन विवति की दृविष्ट से दोर्षपूण$ है और इसे विनरस् विकया Tा सक ा है।

33. इसक े अलावा, अपीलार्भिर्थीयों की ओर से दायर अवमानना याति<काओं को भी हमारे संज्ञान में लाया गया है। हालाँविक, <ूंविक विव<ारा ीन विववाद अपीलार्भिर्थीयों क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पक्ष में ारिर विकया गया है, इसखिलए अवमानना याति<काएं अनुप्रयोज्य हो Tा ी हैं।

34. इस रह की विटप्पथिणयों क े आलोक में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विदनांक 04.02.2013 का आक्षेविप आदेश और विनण$य कायम रखने क े खिलए योग्य नहीं है और इसखिलए इसे रद्द विकया Tा ा है।वन बंदोबस् अति कारी और अपर सिTला न्याया ीश द्वारा पारिर आदेशों की पुविष्ट की Tा ी है। दनुसार, अपीलों को अनुमति दी Tा ी है और अवमानना याति<काओं को खारिरT विकया Tा ा है।

35. थ्यों और परिरत्विस्र्थीति यों में, हम ख<{ क े खिलए कोई आदेश नहीं दे े हैं। …………............................. (न्यायमूर्ति क ृ ष्ण मुरारी) …………............................. (न्यायमूर्ति अहसनुद्दीन अमानुल्ला) नई विदल्ली; 5 Tुलाई 2023. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA