Full Text
भार क
े सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या 9697-9698 वर्ष$ 2014
हरिर प्रकाश शुक्ला और अन्य ... अपीलार्थी1 (गण)
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य ... प्रत्यर्थी1 (गण)
सह
अवमानना याति<का (सिसविवल) संख्या 209-210 वर्ष$ 2021
हरिर प्रकाश शुक्ला और एक अन्य ... याति<काक ा$ (गण)
बनाम
प्रखर विमश्रा और एक अन्य ... कथिर्थी अवमानक ा$
(गण)/प्रत्यर्थी1 (गण)
विनण$य
न्यायमूर्ति क
ृ ष्ण मुरारी,
JUDGMENT
1. व $मान अपीलें उच्च न्यायालय, इलाहाबाद (इसक े बाद "उच्च न्यायालय" क े रूप में संदर्भिभ ) द्वारा पारिर विकए गए 04.02.2013 विदनांविक आक्षेविप आदेश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और विनण$य क े खिखलाफ दायर की गई हैं, सिTसक े ह व $मान मामले क े प्रत्यर्भिर्थीयों द्वारा दायर रिरट याति<का को अनुमति दी गई र्थीी। थ्य
2. सुविव ा क े खिलए व $मान अपीलों क े विनण$य क े खिलए आवश्यक प्रासंविगक थ्यों का उल्लेख यहां विकया Tा रहा है।
3. व $मान अपीलक ा$गण वादग्रस् भूविम क े भूविम र हैं और उनका कब्Tा है। अपीलार्भिर्थीयों क े अनुसार, वर्ष$ 1952 में त्कालीन Tमींदार द्वारा उनक े पक्ष में एक स्र्थीायी पट्टा विनष्पाविद विकए Tाने क े बाद से उक्त भूविम का उपयोग उनक े द्वारा क ृ विर्ष उद्देश्यों क े खिलए विकया Tा रहा है।
4. यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक अपीलक ा$ओं क े कब्Tे वाली भूविम सविह वादग्रस् भूविम क े विहस्से को आरतिक्ष वन घोविर्ष विकया गया र्थीा और उक्त भूविम का दूसरा विहस्सा आरतिक्ष वन क े रूप में घोविर्ष करने क े खिलए वन अति विनयम की ारा 4 क े ह एक अति सू<ना क े अ ीन र्थीा।
5. उक्त भूविम की इस रह की घोर्षणा ने स्र्थीानीय विनवासिसयों को बेदखल करने का अथिभयान शुरू विकया, और इसक े खिखलाफ, बनवासी सेवा आश्रम से प्राप्त एक पत्र क े आ ार पर, स्र्थीानीय विनवासिसयों क े दावे क े संबं में इस न्यायालय में एक रिरट याति<का दायर की गई।
6. इस न्यायालय ने, उपयु$क्त रिरट याति<का में विदनांक 20.11.1986 क े विनण$य और आदेश क े माध्यम से, उक्त विववाविद भूविम पर व्यविक्तयों क े दावों पर विनण$य लेने क े उद्देश्य से उच्च न्यायालय क े एक सेवाविनवृत्त न्याया ीश और दो अति कारिरयों वाली एक उच्च शविक्त प्राप्त सविमति क े गठन का विनदkश विदया और बाद में, वन बंदोबस् अति कारी द्वारा दावों की सुनवाई करने का विनदkश विदया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
7. उपयु$क्त विनण$य क े आ ार पर, व $मान अपीलक ा$ओं ने वन बंदोबस् अति कारी क े समक्ष अपने दावे दाखिखल विकए और दोनों पक्षों द्वारा विकए गए अभ्यावेदन पर उति< विव<ार करने क े बाद, वन बंदोबस् अति कारी ने माना विक उक्त भूविम 1385 फसली से पहले भी अपीलक ा$ओं क े कब्Tे में र्थीी और इस प्रकार, उक्त भूविम पर उनका सही दावा है।
8. उपयु$क्त आदेश से व्यथिर्थी होकर, व $मान प्रत्यर्भिर्थीओं ने अपर सिTला न्याया ीश क े समक्ष अपील की, हालांविक विदनांक 04.04.1991 क े एक सुविव<ारिर आदेश क े माध्यम से, उसे खारिरT कर विदया गया।
9. अपील खारिरT होने क े बाद, व $मान अपीलक ा$ओं ने उपयु$क्त आदेश को लागू करने क े खिलए एक प्रार्थी$ना पत्र दाखिखल विकया और विवद्वान अपर सिTला न्याया ीश ने विदनांक 23.03.2005 क े आदेश क े ह उक्त प्रार्थी$ना-पत्र को अनुमति दी और व $मान अपीलक ा$ओं को भूविम रों क े रूप में अंविक करने का विनदkश विदया।
10. प्रत्यर्थी1 वन विवभाग ने ब 04.04.1991 विदनांविक आदेश क े खिखलाफ एक पुनरीक्षण दायर विकया, हालांविक यह देख े हुए विक पुनरीक्षण की प्रक ृ ति एक अपील की प्रक ृ ति में अति क र्थीी, इसे 08.12.2005 विदनांविक आदेश द्वारा खारिरT कर विदया।
11. उक्त खारिरT करने क े बावTूद, वन विवभाग ने पुनरीक्षण क े उपयु$क्त आदेश क े खिखलाफ वापस लेने क े खिलए एक आवेदन दायर विकया, हालांविक, वापस लेने क े खिलए उक्त आवेदन को विदनांक 08.12.2005 क े आदेश क े माध्यम से भी खारिरT कर विदया गया र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
12. उक्त आदेशों से व्यथिर्थी होकर, प्रत्यर्थी1 वन विवभाग ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक रिरट याति<का दायर की और 04.02.2013 विदनांविक विनण$य और आदेश क े माध्यम से, इसको अनुमति दी गई और अपीलार्भिर्थीयों को बेदखल करने का विनदkश विदया गया।
13. उक्त आदेश क े खिखलाफ, अपीलक ा$ओं ने पुनरीक्षण याति<का दायर की सिTसे 08.02.2013 क े आदेश द्वारा खारिरT कर विदया गया र्थीा।हालाँविक अपीलार्भिर्थीयों की बेदखली पर 20.03.2013 क रोक लगा दी गई र्थीी ाविक वे इस न्यायालय का दरवाTा खटखटाने में सक्षम हो सक ें ।
14. उच्च न्यायालय क े उपयु$क्त आक्षेविप आदेश क े खिखलाफ, अपीलक ा$ओं ने व $मान अपीलों को दायर विकया है। विवश्लेर्षण
15. हमने अपीलार्भिर्थीयों क े खिलए श्री अविनल कौथिशक और प्रत्यर्भिर्थीयों क े खिलए विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री एस.आर. सिंसह, सिTनकी सहाय ा श्री कमलेंद्र विमश्रा ने की, को सुना।
16. प्रारंभ में, व $मान अपीलों क े विनण$य क े खिलए, यह हमारी सुविव<ारिर राय है विक विनम्नखिलखिख दो मुद्दे हमारे विव<ार क े खिलए उत्पन्न हो े हैं।
I. क्या बनवासी सेवा आश्रम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य[1] क े विनण$य में दी गई राह क े वल अनुसूति< Tाति /अनुसूति< TनTाति /अन्य विपछड़े समुदायों पर लागू हो ी है?
1. 1986 4 एससीसी 753 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
II. क्या उच्च न्यायालय, भार क े संविव ान क े अनुच्छेद 226 क े ह अपनी अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए, अपने विनष्कर्ष{ पर आने क े खिलए प्रस् ु विकए गए साक्ष्य का विफर से मूल्यांकन कर सक ा र्थीा? विववाद्यक I- क्या बनवासी सेवा आश्रम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य[2] क े विनण$य में दी गई राह क े वल अनुसूति< Tाति /अनुसूति< TनTाति /अन्य विपछड़े समुदायों पर लागू हो ी है?
17. बनवासी सेवा आश्रम (उपरोक्त) क े मामले में, सिTसमें भूविम पर रहने वाले क ु छ आविदवासी समुदायों को वन अति विनयम क े ह ारा 4 अति सू<ना क े अ ीन होने क े आ ार पर उनक े घरों से बेदखल विकया Tा रहा र्थीा, इस न्यायालय ने कहा विक उक्त विनवासिसयों को वन अति कारी द्वारा उनक े दावों की सुनवाई करने का अति कार र्थीा और वन अति कारी क े पास ही मामले क े गुण- दोर्ष को देखने और विनवासिसयों क े दावों पर विनण$य लेने की शविक्त र्थीी।
18. उपयु$क्त बनवासी सेवा क े विनण$य (उपरोक्त) को, Tब विवस् ार से पढ़ा Tा ा है, ो यह प ा <ल ा है विक यह वादग्रस् भूविम क े विनवासिसयों को क े वल उति< प्राति करण द्वारा सुने Tाने का एक प्रवि•यात्मक अति कार प्रदान कर ा है, न विक भूविम क े कब्Tे/विनवास का ात्वित्वक अति कार प्रदान कर ा है। सरल शब्दों में, इसका म लब यह होगा विक यह न्यायालय, उक्त विनण$य दे े समय, प्रत्येक दावे क े गुण-दोर्ष पर नहीं गया, बत्विल्क इसने दावों की सुनवाई क े खिलए क े वल एक उपयुक्त मं< प्रदान विकया।
19. हमारी राय में, इस रह क े फ ै सले का उद्देश्य ात्वित्वक न्याय क े उद्देश्य को आगे बढ़ाना है और यह सुविनति• करना है विक अति सूति< भूविम पर वै दावे वाले
2. 1986 4 एससीसी 753 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रत्येक पक्ष को विवस् ार से सुना Tाए और स्र्थीानीय विनवासिसयों को बेदखल करने की कोई मनमानी शविक्त राज्य को नहीं दी Tाए।
20. यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक वन समुदायों में न क े वल मान्य ा प्राप्त आविदवासी और अन्य विपछड़े समुदायों क े लोग शाविमल हैं, बत्विल्क उक्त भूविम में रहने वाले अन्य समूह भी शाविमल हैं।ये अन्य समूह, सिTन्हें कई सामासिTक- राTनीति क और आर्भिर्थीक कारणों से वनवासी समुदाय क े रूप में कानून क े ह मान्य ा नहीं विमल ी है, वे भी उक्त वन समुदायों का एक अथिभन्न अंग हैं और यह उनक े कामकाT क े खिलए आवश्यक हैं।इसक े अलावा, पूव$Tों क े Tमाने से ही उनक े वन विनवासी होने क े कई उदाहरण भी हो सक े हैं, हालांविक दस् ावेTों की कमी क े कारण, वे इसे साविब करने में समर्थी$ नहीं हैं।
21. यद्यविप हम इस थ्य से अवग हैं विक व $मान अपीलक ा$गण विपछड़े समुदाय से नहीं हैं और न ही वे ऐसा होने का दावा कर े हैं, र्थीाविप उपयु$क्त बनवासी विनण$य (उपरोक्त), यविद क े वल क ु छ मान्य ा प्राप्त वन समुदायों को लाभात्विन्व करने क े खिलए संकीण$ रीक े से व्याख्या की Tा ी है, ो कई अन्य समुदायों को बहु नुकसान होगा। पुनरावृखित्त क े खिलए, यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक बनवासी विनण$य (उपरोक्त), क े वल एक सक्षम प्राति कारी द्वारा सुने Tाने का अति कार प्रदान कर ा है और यविद ऐसा प्राति करण विकसी दावे को अस्वीकार कर दे ा है, ो उक्त दावा विनवास स्र्थील की भूविम क े खिखलाफ विवद्यमान नहीं रह सक ा है।
22. हमारी राय में, सुनवाई का यह अति कार वादग्रस् भूविम क े कब्Tे का दावा करने वाले सभी लोगों को विदया Tाना <ाविहए और कब्Tे का ात्वित्वक अति कार उक्त सुनवाई क े दौरान सक्षम प्राति कारी द्वारा विदया Tा सक ा है या अस्वीकार विकया Tा सक ा है, अर्थीा$ ् सुनवाई का अति कार सभी को प्राप्त होना <ाविहए Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और कब्Tे का अति कार उन लोगों को प्राप्त होना <ाविहए सिTनक े पास वै दावा है।
23. इसक े अलावा, वन अति विनयम की ारा 4 क े ह अति सूति< विकसी भी भूविम पर कब्Tा करने का अति कार न क े वल आविदवासी समुदायों और अन्य वन विनवासी समुदायों क सीविम है, बत्विल्क विनवास क े प्रमाण, मूल कब्Tे की ारीख आविद पर भी आ ारिर है। यविद उक्त भूविम में रहने का अति कार क े वल कु छ समुदायों क ही सीविम नहीं है, ो ऐसे दावों पर सुनवाई का अति कार उसी क क ै से सीविम हो सक ा है।
24. इसखिलए उपयु$क्त <<ा$ओं क े आलोक में, हम विववाद्यक संख्या I को अपीलार्भिर्थीयों क े पक्ष में मान े हैं। विववाद्यक-II क्या उच्च न्यायालय, भार क े ह अपनी अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए, अपने विनष्कर्ष{ पर आने क े खिलए साक्ष्य का विफर से मूल्यांकन कर सक ा र्थीा?
25. उच्च न्यायालय द्वारा रिरट अति कारिर ा में पारिर आक्षेविप आदेश से पहले, अपीलक ा$ओं क े पास अ ीनस्र्थी न्यायालयों द्वारा विदए गए विनण$यों क े माध्यम से उनक े पक्ष में दो समव 1 विनष्कर्ष$ र्थीे।अपीलक ा$ओं ने प्रमुख साक्ष्य द्वारा वादग्रस् भूविम पर अपना अति कार साविब कर विदया र्थीा और सम्यक ् प्रवि•या क े माध्यम से, दोनों अ ीनस्र्थी न्यायालयों द्वारा इसकी सत्य ा का परीक्षण विकया गया र्थीा। हालाँविक उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्भिर्थीयों द्वारा विदए Tा रहे साक्ष्य क े विबना, विदनांक 04.02.2013 क े आक्षेविप आदेश और विनण$य क े माध्यम से समव 1 विनष्कर्ष{ को रद्द कर विदया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
26. इस न्यायालय ने विवथिभन्न विनण$यों में यह अथिभविन ा$रिर विकया है विक उच्च न्यायालय, भार क े संविव ान की ारा 226 क े ह अपनी अं र्निनविह शविक्तयों का प्रयोग कर े हुए, साक्ष्य और थ्यों क े विनष्कर्ष$ पर पहुँ<ने का विफर से मूल्यांकन नहीं कर सक ा है, Tब क विक मूल आदेश पारिर करने वाले प्राति कारी ने अपनी अति कारिर ा से बाहर, ऐसा नहीं विकया हो, या यविद विनष्कर्ष$ स्पष्ट रूप से विवक ृ र्थीे।
27. बी. क े. मुविनराTू बनाम कना$टक राज्य[3] क े मामले में, इस न्यायालय ने भार क े ह उच्च न्यायालय की शविक्तयों की व्याख्या कर े हुए कहा विक इसका उपयोग साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन करने क े खिलए ब क नहीं विकया Tा सक ा Tब क विक विन<ली अदाल द्वारा मूल्यांकन विकए गए थ्य की त्रुविट प्रकट न हो और ऐसी त्रुविट गंभीर अन्याय का कारण न बनी हो।
28. इसक े अलावा, क ृ ष्णानंद बनाम <कबंदी विनदेशक[4] क े मामले में, इस न्यायालय ने एक समान थ्यों की परिरत्विस्र्थीति में, सिTसमें विन<ली अदाल ों क े समव 1 विनष्कर्ष{ को उच्च न्यायालय द्वारा अपनी रिरट अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए खारिरT कर विदया गया र्थीा, यह अथिभविन ा$रिर विकया विक अनुच्छेद 226 क े ह साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन क े वल उन मामलों में विकया Tा सक ा है Tहां विन<ली अदाल द्वारा मूल आदेश उसकी अति कारिर ा से बाहर पारिर विकया गया र्थीा या यविद विन<ली अदाल ों क े विनष्कर्ष$ स्पष्ट रूप से विवक ृ र्थीे।
29. यह हमारी राय है विक Tहां क व $मान मामले का संबं है, विन<ली अदाल ों क े समव 1 विनष्कर्ष$ न ो विवक ृ हैं, न ही उक्त अदाल ों ने अपनी अति कारिर ा क े बाहर काय$ विकया है।ऐसे परिरदृश्य में, सिTसमें कोई भी श $ पूरी
3. 2008 4 एससीसी 451
4. 2015 1 एससीसी 553 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA नहीं हुई र्थीी, उच्च न्यायालय रिरट अति कारिर ा में साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन नहीं कर सक ा र्थीा और एक थिभन्न विनष्कर्ष$ पर नहीं आ सक ा र्थीा।
30. यह ध्यान विदया Tाना <ाविहए विक विव<ारण क े <रण में, साक्ष्य का पुरःस्र्थीापन और ग्रहण एक कठोर प्रवि•या से गुTर ा है, सिTसमें प्रस् ु विकए गए साक्ष्य का प्रत्येक भाग बहु सख् Tां< क े अ ीन है और प्रत्येक पक्ष को कानून द्वारा स्र्थीाविप प्रवि•या द्वारा उक्त साक्ष्य की सत्य ा का परीक्षण करने का अवसर विदया Tा ा है।हर स् र पर साक्ष्य की वै ा पर सवाल उठाया Tा ा है और विवरो ी पक्ष को अदाल में अपने संदेह रख े हुए उक्त साक्ष्य पर सवाल उठाने का अति कार विदया Tा ा है।कानून में सबू ों की Tां< करने की ऐसी व्यवस्र्थीा, रिरट अति कारिर ा क े ह अपनी शविक्तयों का प्रयोग कर े समय उच्च न्यायालय क े खिलए उपलब् नहीं है और इसखिलए विन<ली अदाल ों द्वारा पुविष्ट विकए गए सबू ों को क े वल दुल$भ मामलों में ही उच्च न्यायालयों द्वारा उलट विदया Tाना <ाविहए।
31. उपयु$क्त <<ा$ओं क े आलोक में, हम विववाद्यक संख्या II को अपीलार्भिर्थीयों क े पक्ष में मान े हैं।
32. व $मान मामले में, हमारे द्वारा ैयार विकए गए दोनों विववाद्यकों का Tवाब व $मान अपीलार्भिर्थीयों क े पक्ष में विदया गया है, अर्थीा$, बनवासी सेवा विनण$य (उपरोक्त) क े ह विदया गया अनु ोर्ष व $मान अपीलार्भिर्थीयों क े खिलए उपलब् है और हमारी राय में, उच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 क े ह अपनी अं र्निनविह शविक्तयों का प्रयोग कर े हुए विकए गए साक्ष्य का पुनमू$ल्यांकन विवति की दृविष्ट से दोर्षपूण$ है और इसे विनरस् विकया Tा सक ा है।
33. इसक े अलावा, अपीलार्भिर्थीयों की ओर से दायर अवमानना याति<काओं को भी हमारे संज्ञान में लाया गया है। हालाँविक, <ूंविक विव<ारा ीन विववाद अपीलार्भिर्थीयों क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पक्ष में ारिर विकया गया है, इसखिलए अवमानना याति<काएं अनुप्रयोज्य हो Tा ी हैं।
34. इस रह की विटप्पथिणयों क े आलोक में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विदनांक 04.02.2013 का आक्षेविप आदेश और विनण$य कायम रखने क े खिलए योग्य नहीं है और इसखिलए इसे रद्द विकया Tा ा है।वन बंदोबस् अति कारी और अपर सिTला न्याया ीश द्वारा पारिर आदेशों की पुविष्ट की Tा ी है। दनुसार, अपीलों को अनुमति दी Tा ी है और अवमानना याति<काओं को खारिरT विकया Tा ा है।
35. थ्यों और परिरत्विस्र्थीति यों में, हम ख<{ क े खिलए कोई आदेश नहीं दे े हैं। …………............................. (न्यायमूर्ति क ृ ष्ण मुरारी) …………............................. (न्यायमूर्ति अहसनुद्दीन अमानुल्ला) नई विदल्ली; 5 Tुलाई 2023. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA