भारतीय खाद्य निगम कार्यकारी कर्मचारी यूनियन v. त्रिनयोक्ता अर्थायत्

Supreme Court of India · 03 Jul 2023
कृष्प्र् मुरारी; संजय कुमार
त्रसत्रर्वल अपील संख्या 4152/2023 (@ त्रर्वशेष अनुमत्रत त्रसत्रर्वल यात्रचका संख्या 3656/2021)
labor appeal_dismissed Significant

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The Supreme Court held that FCI management cannot repudiate long-accepted reinstatement and back wages awarded to illegally terminated workers, applying the principle of approbate and reprobate.

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पत्रिकाओंमें छपने योग्य
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
त्रसत्रर्वल अपीलीय क्षेिात्रिकार
त्रसत्रर्वल अपील संख्या 4152/2023
(@ त्रर्वशेष अनुमत्रत त्रसत्रर्वल यात्रचका संख्या 3656/2021)
श्रत्रमक
भारतीय खाद्य त्रनगम काययकारी कमयचारी यूत्रनयन
के संयुक्त सत्रचर्व (कल्याण) के माध्यम से ............अपीलार्थी
बनाम
त्रनयोक्ता अर्थायत्
भारतीय खाद्य त्रनगम प्रबंिन एर्वं अन्य ...........उत्तरदातागण
सार्थ में
त्रसत्रर्वल अपील संख्या 4153/2023
(@ त्रर्वशेष अनुमत्रत त्रसत्रर्वल यात्रचका संख्या 13620/2021)
त्रनणयय
संजय कुमार, न्याया.
JUDGMENT

1. अनुमति प्रदान की जािी है।

2. झारखंड उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा एल.पी.ए. संख्या 80/2019 में तदनांक 17.12.2020 को पाररि एक ही तनर्णय के तिरुद्ध की गई ये दोनों अपीलें संयुक्त रूप से तनपटान तकए जाने योग्य हैं।

3. श्रम मंत्रालय, भारि सरकार ने औद्योतगक तििाद अतितनयम, 1947 की िारा 10(1)(डी) के िहि अपने आदेश तदनांक 12.01.1996 के िहि भारिीय खाद्य तनगम के कायणकारी कमणचारी यूतनयन द्वारा उठाए गए 21 अतनयतमि श्रतमकों के मामले के औद्योतगक तििाद को न्यायतनर्णयन के तलए संदतभणि तकया है। इस तििाद को केंद्र सरकार के औद्योतगक न्यायातिकरर् संख्या 2, िनबाद (आगे इसे 'न्यायातिकरर्' कहा जाएगा) भेज तदया गया और संदभण संख्या 128/1996 के रूप में अंतकि तकया गया। उक्त संदभण की अनुसूची में समािान हेिु तििाद को इस प्रकार दजण तकया गया है: 'क्या भारिीय खाद्य तनगम, पटना प्रबंिन द्वारा कारणिाई करके श्री शतश शंकर और 20 अन्य (सूची संलग्न) की छंटनी उतचि और तितिसम्मि है? यतद नहीं, िो संबंतिि श्रतमक तकस प्रकार के राहि के हकदार हैं?'

4. न्यायातिकरर् के समक्ष दोनों पक्षों की ओर से एक-एक गिाह का परीक्षर् कराया गया। भारिीय खाद्य तनगम (एफसीआई) के प्रबंिन की ओर से प्रदशण-M[1] से M[7] तचतिि तकए गए िथा श्रतमकों की ओर से प्रदशण-W[1] से W12 िक को तचतिि तकया गया। दलीलों और साक्ष्यों पर तिचार करने के बाद, न्यायातिकरर् ने पाया तक तिचारािीन 21 श्रतमकों को पटना में एफसीआई द्वारा अतनयतमि श्रतमकों के रूप में काम पर रखा गया था और अिैि रूप से उनकी छंटनी कर दी गई थी, क्योंतक उन्हें न िो नोतटस तदया गया था और न ही मुआिजा। इसके अलािा न्यायातिकरर् ने यह भी पाया तक अतनयतमि श्रतमकों की को पुन: बहाल करने एिं उन्हें तनयतमि करने का तनदेश देने िाले उसके फैसले को उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा था,अिः न्यायातिकरर् ने राय दी तक इन 21 श्रतमकों की सेिाएं भी तनयतमि की जानी चातहए चूंतक चिुथण श्रेर्ी के पदों पर ररतक्तयां उपलब्ि थीं। परंिु श्रतमकों ने लंबे समय िक काम नहीं तकया था, इसतलए न्यायातिकरर् ने उनके तपछले िेिन के अतिकार पर रोक लगा दी। पररर्ामस्िरूप, न्यायातिकरर् ने तदनांक 18.03.1997 को एक आदेश पाररि तकया, तजसमें कहा गया तक एफसीआई प्रबंिन द्वारा इन श्रतमकों की छंटनी करने की कारणिाई को न्यायसंगि नहीं ठहराया जा सकिा। साथ ही प्रबंिन को तनदेश तदया तक उन्हें तफर से बहाल करे और छंटनी की िारीख यानी 10.05.1990 से ही चिुथण श्रेर्ी के पदों पर तनयतमि करे िथा उनके तपछले िेिन का 75% भुगिान भी तनतिि समय सीमा के भीिर करे।

5. उक्त तनर्णय से असंिुष्ट होकर एफसीआई प्रबंिन ने झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष सीडब््यूजेसी सं. 953/1998 (आर) दायर तकया। इस ररट यातचका में 05.08.1999 को न्यायातिकरर् के तनर्णय पर इस शिण पर अंिररम रोक लगा दी गई तक एफसीआई श्रतमकों को अंतिम प्रदत्त पूरी मजदूरी का भुगिान जारी रखेगा। इसके बाद, प्रबंिन ने कहा तक िे केिल न्यूनिम मजदूरी के हकदार हैं और उन्हें प्रति श्रतमक 507 रुपये प्रति माह का भुगिान करना शुरू कर तदया। ऐसा होने पर श्रतमकों ने अिमानना िाद एमजेसी केस संख्या 371/2000 दायर तकया। इस अिमानना मामले का तनपटान 12.05.2000 को तकया गया, तजसमें कहा गया तक यतद एफसीआई प्रबंिन ने स्थगन आदेश तदनांक 05.08.1999 में ितर्णि शिण का पालन दो सप्ताह के भीिर नहीं तकया, िो यह स्ििः तनष्प्प्रभािी हो जाएगा और श्रतमक पंचाट को लागू करने के तलए कदम उठाने के हकदार होंगे। इसके बाद प्रबंिन ने उक्त पंचाट लागू करिे हुए 10/17.11.2000, 24/26.11.2000 और 27.11.2000 तदनांतकि आदेशजारीतकए।श्रतमकों को तनयतमि सेिा में आमेतलिकरतलया गया और 10.05.1990 से 18.03.1997 िक के तपछले िेिन का 75% और उसके बाद की अिति के तलए चिुथण श्रेर्ी के तलए लागू पूर्ण िेिन का भुगिान शुरू तकया गया। यह अनुपालन ररट यातचका के अंतिम तनर्णय आने के शिण पर रखा गया था।

6. हालााँतक, झारखंड उच्च न्यायालय के एक तिद्वान न्यायािीश ने तदनांक 01.11.2018 के अपने आदेश द्वारा सीडब््यूजेसी संख्या 953/1998 (आर) को खाररज कर तदया। तिद्वान न्यायािीश ने न्यायातिकरर् के फैसले को बरकरार रखा और कहा तक संबंतिि श्रतमकों ने तपछले 12 महीनों में एफसीआई पटना में 240 तदनों िक काम तकया था और उसके बाद औद्योतगक तििाद अतितनयम, 1947 की िारा 25 एफ के अतनिायण प्राििानों का पालन तकए तबना ही उन्हें काम करने से रोक तदया गया था। इसके अलािा, तिद्वान न्यायािीश ने यह भी कहा तक प्रबंिन ने श्रतमकों के इस दािे का खण्डन नहीं तकया है तक इसी प्रकार के पूिण के एक मामले में कुछ लोगों को उच्च न्यायालय द्वारा पाररि आदेश के अनुसार सेिा में तनयतमि तकया गया था और उसने तिचारािीन श्रतमकों के मामलों को तनयतमि तकए गए श्रतमकों के मामले का उससे अलग होने का कोई कारर् नहीं बिाया है। ऐसा कहने के बाद, तिद्वान न्यायािीश ने कहा तक कोई अतनयतमि श्रतमक, तजसने तपछले कैलेंडर िर्ण में 240 तदनों िक काम तकया था, केिल िभी पुनबणहाल तकए जाने का हकदार होगा, यतद तबना तकसी नोतटस या (उसके बदले) मुआिजे के उसकी सेिा समाप्त कर दी गई हो, जैसा तक औद्योतगक तििाद अतितनयम, 1947 की िारा 25एफ के िहि प्राििान तकया गया है परंिु िह तनयतमिीकरर् की मांग करने का हकदार नहीं होगा। चूंतक प्रबंिन ने ररट यातचका में पाररि अंिररम आदेश में लगाई गई शिों का पालन तकए तबना आक्षेतपि पंचाट का अनुपालन करने काफैसलातकयाथा औरचूंतकसंबंतििश्रतमकतपछले18िर्ोंसेअतिकसमयसेआक्षेतपि पंचाट का लाभ उठा रहे थे, अिः तिद्वान न्यायािीश ने राय दी तक यतद अब उनकी तस्थति बदल दी जािी है, िो उन्हें बहुि कतठनाई होगी। िदनुसार, तिद्वान न्यायािीश ने पंचाट को पूरी िरह बरकरार रखिे हुए ररट यातचका को खाररज कर तदया।

7. उसके बाद प्रबंिन ने इस मामले की एलपीए संख्या 80/2019 के रूप में झारखंड उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ के समक्ष अपील की। खंडपीठ ने तदनांक 17.12.2020 के तनर्णय के द्वारा आक्षेतपि आदेश को संशोतिि तकया और पंचाट को इस सीमा िक खाररज करिे हुए श्रतमकों को तनयतमि करने का तनदेश तदया। यह संशोिन इस आिार पर तकया गया था तक औद्योतगक तििाद के संदभण में तनयतमिीकरर् के तलए कोई शिण नहीं है, इसतलए ऐसी राहि बरकरार नहीं रखी जा सकिी। खंडपीठ ने तिद्वान एकल न्यायािीश द्वारा पाररि के उस आदेश को अपास्ि कर तदया तजसमें उन्होंने सेिा तनयतमि करने का तनदेश देने से इनकार कर तदया था, और अपील का तनपटान कर तदया, लेतकन तपछले िेिन का 75% भुगिान करने के तनदेश पर कुछ नहीं कहा।

8. दोनों पक्षों ने खंडपीठ के फैसले के तखलाफ इस न्यायालय के समक्ष अपील की है। एफसीआई के कायणकारी कमणचारी यूतनयन ने अपनी सेिाओं को तनयतमि करने से इनकार करने से व्यतथि होकर संबंतिि श्रतमकों की ओर से अपील दायर की है, जबतक एफसीआई प्रबंिन ने श्रतमकों की पुनबणहाली और तपछले िेिन का 75% भुगिान करने के तनदेश के तखलाफ अपील की है। श्रतमकों की ओर से दायर एसएलपी (सी) 3656/2021 पर सुनिाई करिे हुए इस न्यायालय ने 08.03.2021 को नोतटस जारी करके खंडपीठ के तनर्णय पर रोक लगा दी थी। इस स्थगन आदेश की अिज्ञा का आरोप लगािे हुए अिमानना यातचका (सी) संख्या 366/2021 दायर की गई थी और 26.07.2022 को कुछ तटप्पतर्यां करके उसका तनपटान कर तदया गया था।

9. गौरिलब है तक खंडपीठ के तदनांक 17.12.2020 के फैसले के पैरा 12 में दजण है तक एफसीआई प्रबंिन के तिद्वान िकील ने पंचाट के उस भाग पर आपतत्त नहीं जिाई, तजसके िहि पुनबणहाली और 75% िक तपछले िेिन के भुगिान के तनदेश तदए गए थे। प्रबंिन केिल तनयतमिीकरर्सेसंबंतिि आदेश सेव्यतथि था।िास्िि में,खंडपीठ के समक्ष की गईअपील में प्रबंिन ने मुख्य रूप से श्रतमकों के तनयतमिीकरर् पर ही आपतत्त की थी और पुनबणहाली के मुद्दे का संदभण बहुि सीतमि था। तकसी भी तस्थति में, खंडपीठ के स्पष्ट अतभलेखन के आलोक में प्रबंिन ने पुनबणहाली और तपछले िेिन के भुगिान के तनदेश िक आपतत्त नहीं जिाई है िो प्रबंिन को इस मुद्दे को इस न्यायालय के समक्ष उठाने का अतिकार नहीं है। इसतलए, इन मुद्दों को उठाने िाली एफसीआई प्रबंिन द्वारा दायर अपील इस संतक्षप्त आिार पर खाररज करने योग्य है।

10. जहां िक श्रतमकों की ओर से दायर अपील का संबंि है, उसमें उठाया गया एकमात्र मुद्दा उन श्रतमकों को तनयतमि करने और ऐसी राहि देने की पंचाट की सीमा की िैििा है। इस स्िर पर, हम देखिे हैं तक यद्यतप तिद्वान एकल न्यायािीश ने स्ियं यह तनष्प्कर्ण तनकाला है तक न्यायातिकरर् द्वारा सेिा में तनयतमिीकरर् का आदेश नहीं तदया जाना चातहए था, तफर भी उन्होंने इसमें हस्िक्षेप नहीं तकया क्योंतक इस बीच, श्रतमकों ने लगभग 18 साल िक तनयतमि सेिा प्रदान की थी और इसतलए उस स्िर पर हस्िक्षेप करना उनके तलए कतठन होिा। िथातप, खंडपीठ ने कहा तक एक बार जब न्यायालय इस तनष्प्कर्ण पर पहुंचिा है तक कोई गलि आदेश पाररि तकया गया था, िो उसे बरकरार रखने के बजाय उस गलिी को सुिारना ही श्रेष्ठ होगा। हालााँतक खंडपीठ ने उन पररतस्थतियों पर तिचार नहीं तकया, जो न्यायातिकरर् के पंचाट को बरकराररखिेसमयतिद्वान न्यायािीश के समक्षथीं,जैसे-एफसीआईप्रबंिनने ररटयातचका के लंतबि रहने के दौरान पंचाट में दी गई राहि को पूरी िरह से लागू करने का फैसला तकया था और श्रतमकों ने 18 िर्ों िक इसका लाभ भी उठाया। इस संबंि में पंचाट के अनुपालन में प्रबंिन द्वारा जारी कायाणलय आदेश तदनांक 24/26.11.2000 प्रासंतगक है, तजसमें अंतकि है: भारिीय खाद्य तनगम तजला कायाणलय: उत्तरी गांिी मैदान (गया) संदभण: सं. स्था.10[सी/एल-सह-श्रेर्ी-IV]/2000/1927 24/26.11.2000 कायायलय आदेश आई.डी. िाद सं. 128/96 में सीजीआईटी िनबाद द्वारा तदनांक 18.03.1997 को पाररि पंचाट िथा माननीय उच्च न्यायालय, पटना एिं रांची द्वारा सीडब््यूजेसी संख्या 953/98[आर] में पाररि अंिररम आदेश तदनांक 5.8.1999 और उसके बाद एमजेसी संख्या 371/2000 में पाररि आदेश तदनांक 12.05.2000 के अनुसार और िररष्ठ क्षेत्रीय प्रबंिक, एफसीआई, पटना के कायाणलय आदेश संख्या स्था.30[88]/94-भाग-II तदनांक 10.11.2000 के अनुपालन में तनम्नतलतखि पूिण-अतनयतमि श्रतमकों को तदनांक 10.05.90 से चिुथण श्रेर्ी [चौकीदार] में पुनबणहाल तकया जािा है। । िे 10.05.1990 से 18.03.1997 िक तपछले िेिन का 75% और उसके बाद चुिथण श्रेर्ी के तनिाणररि िेिन पाने के हकदार होंगे। इसके अलािा, उपरोक्त आदेश माननीय उच्च न्यायालय, पटना, रांची पीठ के समक्ष लंतबि सीडब््यूजेसी संख्या 953/98 के तनर्णय के अिीन होगा। उन्हें इस आदेश की प्रातप्त की िारीख से 10 [दस] तदनों के भीिर ड्यूटी पर ररपोटण करने का तनदेश तदया जािा है। क्र. सं. नाम

1. श्री शतश शंकर. …..

21. श्री अजय कुमार. ह0/- तजला प्रबंिक[प्रभारी]....'

11. इसके बाद एफसीआई प्रबंिन ने 27.11.2000 को एक शुतद्धपत्र जारी तकया, जो काफी महत्िपूर्ण है। शुतद्धपत्र इस प्रकार है: भारिीय खाद्य तनगम क्षेत्रीय कायाणलय,पटना-1 संदभण:सं. स्था.30[88]/94-भाग-II तदनांक: 27.11.2000 शुतद्धपत्र एफएसडी, चंदौिी में कायणरि श्री शतश शंकर और 20 अन्य अतनयतमि श्रतमकों की बहाली के संबंि में तदनांक 10/17.11.2000 को जारी समसंख्यक कायाणलय आदेश की पंतक्त 6 में उत्लतखि शब्द "पुनबणहाल" को "आमेतलि" पढा जाए। एसडी/- क्षेत्रीय प्रबंिक...'

12. उ्लेखनीय है तक एफसीआई प्रबंिन के तलए आिश्यक यह था तक िह सीडब््यूजेसी सं. 953/1998 (आर) में तदनांक 05.08.1999 के अंिररम आदेश के अनुसार संबंतिि श्रतमकों को औद्योतगक तििाद अतितनयम, 1947 की िारा 17बी के अनुपालन और उक्त ररट यातचका का तनपटान होने िक उन्हें अंतिम प्रदत्त मजदूरी का भुगिान करिे। इसके बाद, एमजेसी केस संख्या 371/2000 में पाररि तदनांक 12.05.2000 के अंतिम आदेश के द्वारा प्रबंिन को केिल यह नोतटस तदया गया तक यतद दो सप्ताह के भीिर सशिण स्थगन आदेश का अनुपालन नहीं तकया गया, िो उक्त स्थगन आदेश तनरस्ि हो जाएगा और कमणचारी पंचाट को लागू करने की मांग करने के तलए स्ििंत्र होंगे। इस तस्थति में, एफसीआई प्रबंिन ऐसा सुतनतििकरने के बाद संबंतििश्रतमकों को अंतिम प्रदत्त मजदूरी का भुगिान जारी रखसकिा था। इस ररट यातचका के लंतबि रहने के दौरान उसके अंिररम आदेश के अनुपालन में इिनी कारणिाई ही पयाणप्त होिी। तफर भी एफसीआई प्रबंिन ने ऐसी कारणिाई नहीं की। प्रबंिन ने अपनी मजी से न केिल कायाणलय आदेश तदनांक 10/17.11.2000 और 24/26.11.2000 के िहि संबंतिि श्रतमकों को न केिल पुनबणहाल कर तदया, बत्क एक कदम और आगे बढकर तदनांक 27.11.2000 को शुतद्धपत्र जारी कर उक्त श्रतमकों को तनयतमि सेिा में 'आमेतलि' भी कर तदया। इस प्रकार, इस ररट यातचका में केिल सशिण अंिररम सुरक्षा ही प्रदान की गई थी, िब भी एफसीआई प्रबंिन ने स्िेच्छा से पचाट को संपूर्ण रूप से लागू करने का तनर्णय तलया।

13. एफसीआई के प्रबंिन की इस दलील में दम नहीं है और इसे स्िीकार नहीं तकया जा सकिा तक उसे अिमानना की िमकी देकर पंचाट का पालन करने के तलए मजबूर तकया गया था क्योंतक एमजेसी केस संख्या 371/2000 में अिमानना की कायणिाही तदनांक 12.05.2000 को ही बंद कर दी गई थी और बहुि बाद में यानी निंबर 2000 में 'बहाली' और 'आमेलन' के आदेश जारी तकए गए। स्ियं ही ऐसी कारणिाई कर ली गई और इसे लंतबि ररट यातचका के तनर्णय के अिीन भी रखा गया। िो अब प्रश्न उठिा है तक क्या एफसीआई प्रबंिन को इस अंतिम चरर् में सबकुछ बदल देने की अनुमति दी जा सकिी है। इस बाि का भी कोईप्रमार् नहीं हैतकप्रबंिन ने पंचाटके अनुपालनके बादकम-से-कम इसररटयातचका के शीघ्र तनपटान की मांग भी की हो, तजसके तनर्णय के अिीन िह आदेश जारी तकया गया था। इससे इिर, प्रबंिन ने निंबर 2018 में ररट यातचका के खाररज होने िक अथाणि 18 िर्ों िक यथातस्थति बने रहने तदया।

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14. इस िथ्यात्मक पररदृश्य को देखिे हुए, हमारी राय है तक झारखंड उच्च न्यायालय के तिद्वान न्यायािीश ने पंचाट को बरकरार रखिे हुए इस ररट यातचका को तजस आिार पर खाररज तकया, िह पूरी िरह से उतचि था। भारि संघ और अन्य बनाम एन. मुरुगेसन और अन्य [(2022) 2 एससीसी 25] में इस न्यायालय ने कहा था तक 'एप्रोबेट' और 'ररप्रोबेट' शब्दों का अथण है तक तकसी भी पक्ष को एक ही चीज़ को एक ही साथ स्िीकार भी करने और अस्िीकार भी करने की अनुमति नहीं दीजासकिी,क्योंतकचुनािकातसद्धांि'एप्रोबेट'और'ररप्रोबेट'कीअििारर्ामेंअंितनणतहि है। अथाणि, तकसी व्यतक्त को तकसी तलतखि दस्िािेज पर सिाल उठािे हुए उसी समय उसका लाभ लेने की अनुमति नहीं दी जा सकिी। यह भी कहा गया था तक इस तसद्धांि में तनष्प्पक्षिा का एक ित्ि अंितनणतहि है और यह तकसी पक्ष के आचरर् से संबंतिि तिबंि का एक प्रकार है।

15. मौजूदा मामले में, एफसीआई प्रबंिन ने न्यायातिकरर् द्वारा पाररि पंचाट को चुनौिी देिे हुए ररट यातचका दायर की है परंिु उसी आदेश में सशिण अंिररम राहि प्राप्त करके प्रबंिन ने आक्षेतपि पंचाट को लागू तकया जबतक ऐसा करने के तलए कोई बाध्यिा नहीं थी। जैसा तक यहां पहले बिाया गया है, प्रबंिन केिल श्रतमकों को सेिा में पुन: बहाल करने िक ही नहीं रुका, बत्क आगे बढकर उन्हें तनयतमि सेिा में आमेतलि भी कर तलया। तदनांक 05.08.1999 के अंिररम आदेश के अनुसार सेिा में इस िरह का आमेलन तब्कुल भी आिश्यक नहीं था और इसतलए, इसे पूरी िरह से एफसीआई के प्रबंिन द्वारा स्िेच्छा से की गई कारणिाई ही माना जाएगा। िास्िि में, एफसीआई प्रबंिन ने, चाहे जो भी कारर् रहे हों, पंचाट को पूरी िरह से स्िीकार करने और लागू करने का फैसला तकया, और तफर इस अनुपालन को ररट यातचका के तनर्णय के अिीन भी कर तदया। अंि में, ररट यातचका के शीघ्र तनपटान के तलए समय पर उपाय नहीं तकए जाने के कारर् यह मामला और अतिक उलझ गया और 18 साल लंबा समय बीि गया, तजसे तिद्वान न्यायािीश ने तनर्ाणयक रूप से महत्ि तदया और हमारी सुतिचाररि राय में, यह सही भी था। तकसी मामले में तकसी भी पक्ष को उसी कायण को चुनौिी देने की अनुमति नहीं दी जा सकिी है, तजसे उसने अपनी इच्छा से तकया हो; इससे लाभ प्राप्त करे; तिरोिी पक्ष को अपनी तस्थति प्रभािी ढंग से बदलने के तलए प्रेररि करे; और िह भी बहुि लंब समय बीि जाने के बाद उसे चुनौिी दे।

16. श्रतमकों को दो दशकों से अतिक समय िक अपने लाभ के तलए तनयतमि सेिा में रखने के बाद, प्रबंिन अब उस पंचाट को जारी रखने से मना करने और अपनी चुनौिी देने के अपने अतिकार का दािा नहीं कर सकिा है, केिल इसतलए तक उसने काफी समय पहले पंचाट के अनुपालन को सशिण बना तदया है। तनयतमि सेिा में आमेलन के आलोक में, इन श्रतमकों ने, तजन्होंने अन्य कहीं और रोजगार के अिसरों का तिक्प चुना होिा, अपनी तस्थति बदल ली और एफसीआई के साथ बने रहे। उन्हें उस पद पर रखने के बाद, अब एफसीआई प्रबंिन के तलए अपना फैसला पलटने का कोई रास्िा नहीं रह गया है। दुभाणग्य से, प्रबंिन की अपील पर सुनिाई करिे समय खंडपीठ ने इन महत्िपूर्ण पहलुओंको नजरअंदाज कर तदया। मामले के उस दृतष्टकोर् में, खंडपीठ द्वारा उठाए गए कानूनी रूप से िजनदार लेतकन तनतिि रूप रूप से तिद्वत्तापूर्ण दृतष्टकोर् को स्िीकार करके, हम िथ्यात्मक तस्थति की अनदेखी करिे हुए दो दशकों से अतिक समय से बनी हुई तस्थति को बदलने के इच्छुक नहीं हैं।

17. श्रतमकों की ओर से एफसीआई के कायणकारी कमणचारी यूतनयन द्वारा दायर अपील में कई गई प्राथणना स्िीकार की जािी है और झारखंड उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पाररि एलपीए नंबर 80/2019 में तदनांक 17.12.2020 के फैसले को अपास्ि तकया जािा है। पररर्ामस्िरूप, तिद्वान न्यायािीश द्वारा सीडब््यूजेसी संख्या 953/1998 (आर) में पाररि आदेश तदनांक 01.11.2018 और केंद्र सरकार औद्योतगक न्यायातिकरर् संख्या 2, िनबाद द्वारा संदभण संख्या 128/1996 में पाररि आदेश तदनांक 18.03.1997 को पुनबणहाल तकया जािा है, जो इस न्यायालय द्वारा एसएलपी (सी) संख्या 3656/2021 में अिमानना यातचका (सी) संख्या 366/2021 में पाररि तदनांक 26.07.2022 के आदेश में की गई तटप्पतर्यों के अिीन होगी। एफसीआई प्रबंिन द्वारा दायर अपील खाररज की जािी है। दोनों अपीलों में लंतबि आई.ए., (यतद कोई हो,) समाप्त मानी जाएगी। संबंतिि पक्ष अपनी-अपनी लागि स्ियं िहन करेंगे। ………………………………………...न्याया. [कृष्प्र् मुरारी] ………………………………………... न्याया. [संजय कुमार] नयी तद्ली; 3 जुलाई 2023. अस्र्वीकरण: तहन्दी भार्ा में अनूतदि तनर्णय का उपयोग इिना ही है तक िादी इसे अपनी भार्ा में समझ सके। इसका उपयोग तकसी अन्य उद्देश्य के तलए नहीं तकया जा सकिा। सभी व्यािहाररक और आतिकाररक कायों में िथा तनष्प्पादन और कायाणन्ियन के तलए उक्त तनर्णय का अंग्रेजी संस्करर् ही मान्य होगा।