मुख्य प्रबंधक, राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम v. विनोद कुमार शर्मा

Supreme Court of India · 25 Sep 2018
अभय मनोहर सप्रे; एस. अब्दुल नजीर
सिविल अपील संख्या 9957/2018
labor appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court allowed the employer's appeal against dismissal of service, set aside the High Court order for lack of proper reasoning, and remanded the matter for fresh adjudication.

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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
सिविल अपीलीय क्षेत्राधिकार
सिविल अपील संख्या 9957/2018
(विशेष अनुमति याचिका (दीवानी) संख्या 26347/2018 से उत्पन्न)
(डी. संख्या 23039/2018)
मुख्य प्रबंधक, राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम, अलवर
….. अपीलार्थी (गण)
बनाम
विनोद क
ु मार शर्मा ….. उत्तरदाता (गण)
निर्णय
अभय मनोहर सप्रे, न्यायाधीश
JUDGMENT

1. अनुमति प्रदान की गई ।

2. यह अपील 06.02.2018 को विशेष अपील रिट संख्या 1960/2017 मे राजस्थान उच्च न्यायालय, बेंच जयपुर की खंड पीठ द्वारा पारित अंतिम निर्णय और आदेश क े खिलाफ दायर की गई है। जिसक े द्वारा उच्च न्यायालय ने इसमें अपीलकर्ता द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और इस प्रकार एस. बी. सिविल रिट याचिका संख्या 14368/2011 में उक्त उच्च न्यायालय क े एकल न्यायाधीश द्वारा दिनांक 18.08.2017 को पारित आदेश की पुष्टि की, जो औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा दिनांक 25.07.2011 को पारित अधिनिर्णय से उत्पन्न हुआ। जिससे उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और इस प्रकार एकल पीठ सिविल रिट याचिका संख्या 14368/2011 में उक्त उच्च न्यायालय क े एकल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश दिनांक 18.08.2017 की पुष्टि की, जो औद्योगिक न्यायाधिकरण सह मजिस्ट्रेट कोर्ट, अलवर द्वारा पारित अधिनिर्णय दिनांकित 25/07/2011 से उत्पन्न हुआ।

3. यहां नीचे अपील क े निपटान क े लिए क ु छ तथ्यों का उल्लेख करने की आवश्यकता है।

4. अपीलकर्ता नियोक्ता राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम है।प्रतिवादी क ं डक्टर क े पद पर अपीलकर्ता क े साथ सभी प्रासंगिक समय पर काम करने वाला कर्मचारी है।

5. विवाद प्रतिवादी को ड्यूटी क े दौरान उसक े द्वारा किए गए कदाचार क े आधार पर सेवाओं से बर्खास्त करने से संबंधित है। प्रतिवादी की बर्खास्तगी आंतरिक जांच पर आधारित है।

6. प्रतिवादी की बर्खास्तगी क े संबंध में विवाद को उसकी वैधता और सत्यता तय करने की दृष्टि से प्रतिवादी कर्मचारी क े कहने पर औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा निपटाया गया था।

7. फिर इसे पहले दो चरण में उच्च न्यायालय में ले जाया गया था, जिसक े कारण अंततः अपीलकर्ता द्वारा यहां दायर अपील में खण्ड पीठ द्वारा आक्षेपित आदेश पारित किया गया और अब अंततः यह उच्च न्यायालय द्वारा उनकी अपील को खारिज करने क े खिलाफ नियोक्ता (राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम) की पहल पर इस न्यायालय क े समक्ष है।

8. हमने पक्षकारों क े विद्वान अधिवक्ता को सुना और खण्ड पीठ क े आक्षेपित आदेश का अवलोकन किया।

9. हम यह देखने क े लिए विवश हैं कि आक्षेपित आदेश को पढ़ने पर, इस तथ्य को समझना बहुत मुश्किल है, इसक े उचित परिप्रेक्ष्य में तथ्यात्मक और कानूनी विवाद की सराहना करना तो दूर की बात है, कारणों का पता लगाना संभव नहीं है।

10. आक्षेपित आदेश ने न तो तथ्यों को ठीक से निर्धारित किया है और न ही अधिकरण क े निष्कर्षों को स्पष्ट रूप से और एकल न्यायाधीश व न ही दोनों अधिवक्ताओं द्वारा आग्रह किए गए किसी भी प्रस्तुतीकरण पर विचार किया और न ही इस मामले में उत्पन्न होने वाले मुद्दों पर इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून को ध्यान में रखते हुए नियोक्ता (यहाँ अपीलकर्ता) द्वारा दायर अपील को खारिज करने का औचित्य सिद्ध करने क े लिए इसका तर्क दिया गया है।

11. संक्षेप में, हम खण्ड पीठ द्वारा दिए गए निष्कर्ष क े समर्थन में तथ्यों क े संक्षिप्त विवरण और अप्रमाणित तर्क की सराहना करने में समर्थ नहीं हैं।

12. इन कारणों से, हम मामले में उत्पन्न होने वाले तथ्यात्मक और कानूनी मुद्दों की जांच नहीं करना चाहते हैं और इसक े बजाय अपील को मंजूर करते हैं, आक्षेपित आदेश को दरकिनार करते हुए मामले को उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ को भेज देते हैं ताकि हमारे द्वारा की गई उपरोक्त टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए योग्यता क े आधार पर नए सिरे से अपील पर निर्णय लिया जा सक े ।

13. इस प्रकार अपील सफल होती है और तदनुसार मंजूर की जाती है।आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया जाता है। कानून क े अनुसार गुणागुण क े आधार पर नए सिरे से अंतर-न्यायालय अपील का निर्णय करने क े लिए मामला खंडपीठ को भेजा जाता है। चूंकि हम मामले को खंडपीठ को भेजने क े लिए एक राय बनाते हैं, इसलिए हम मामले क े गुणागुण में जाने से बचते हैं और इसलिए, उच्च न्यायालय हमारी किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना अपील का फ ै सला करेगा।

14. हम उच्च न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि वह अपील पर यथासंभव शीघ्र, अधिमानतः 6 माह क े भीतर निर्णय दे। न्यायाधीश [अभय मनोहर सप्रे] न्यायाधीश [एस. अब्दुल नजीर] नई दिल्ली; 25 सितंबर, 2018 (यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास' क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है।) अस्वीकरण: यह निर्णय वादी क े प्रतिबंधित उपयोग क े लिए उसकी भाषा में समझाने क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।