Jyoati Jagaran Manch v. SDMC & Ors.

Supreme Court of India · 27 Dec 2018
S. Abdul Nazir
Civil Appeal Nos. 10866-10867 of 2010 and connected matters
civil appeal_allowed Landmark

AI Summary

The Supreme Court adjudicated the Ayodhya land dispute, awarding the disputed site to Ram Lalla for temple construction and directing alternative land for mosque, while declaring certain acquisition laws unconstitutional.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय न्यायक्षेत्र
सिसविवल अपील सं. 10866-10867 / 2010
एम सिसद्दीक (मृ ) द्वारा विवति*क प्रति वि+ति* .... अपीलार्थी-
ब+ाम
महं सुरेश दास एवं अन्य .... प्रत्यर्थी-
सह
सिसविवल अपील सं. 4768-4771 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 2636 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 821 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 4739 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 4905-4908 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 2215 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 4740 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 2894 / 2011 mn~?kks"k.kk
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सह
सिसविवल अपील सं. 6965 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 4192 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 5498 / 2011
सह
सिसविवल अपील सं. 7226 / 2011
और सह
सिसविवल अपील सं. 8096 / 2011
वि+ र्ण: य
अ+ुक्रमणिर्णका
A. परिरचय
B. वादों का संतिक्षप्त विववरर्ण
C. साक्ष्यः संक्षेप में
D. 1856-7 का परिरर्णाम
D.1 दीवार पर प्रति विक्रया
D.2 1934-1949 क
े बीच की अवति*
E. *ारा 145 क
े ह काय:वाविहयाँ
F. विववि+श्चय क
े विबन्दु mn~?kks"k.kk
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G. ी+ उत्कीर्ण:+
H. न्यातियक समीक्षा और इस्लामी विवति* में मस्जिस्Sद की विवशेष ाएं
I. उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम
J. न्यातियक व्यविXत्व
J.1 विवति* का विवकास
J.2 मूर्ति याँ और न्यातियक व्यविXत्व
J.3 प्रर्थीम वादी का विवति*क व्यविXत्व
J.4 दूसरे वादी का विवति*क व्यविXत्व
K. वाद का विवश्लेषर्ण
L. वाद 1: गोपाल सिंसह विवशारद
L.1 दलीलें
L.2 उच्च न्यायालय क
े विवषय और वि+ष्कष:
L.3 विवश्लेषर्ण
M. वाद 3: वि+म ही अखाड़ा
M.1 दलीलें
M.2 वाद 3 और वाद 5 में विवरो*
M.3 उच्च न्यायालय क
े विवषय और वि+ष्कष:
M.4 वाद 3 में परिरसीमा
M.5 वि+म ही साक्षीगर्णों क
े मौखिखक साक्ष्य
M.6 वि+म ही अखाड़ा का आं रिरक अहा े पर कब्Sे का दावा
मस्जिस्Sद से संबंति* दस् ावेSी साक्ष्य (1934-1949)
N. वाद 5: देवी देव ा mn~?kks"k.kk
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N.1 पक्षकारों की श्रृंखला
N.2 उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा कोई प्रति वाद +हीं
N.3 अणिभकर्थी+
N.4 खिलखिख कर्थी+
N.5 उच्च न्यायालय क
े विवषय और वि+ष्कष:
N.6 सेवाय : मुकदमा कर+े का विवशेषाति*कार
एक उपासक या विह बद्ध व्यविX द्वारा विकया गया वाद
वि+म ही अखाड़ा और सेवाय ी अति*कार
N.7 वाद 5 में परिरसीमा
शाश्व अवयस्क ा का क
:
N.8 1885 का वाद और प्रांग्न्याय
N.9 पुरा त्व रिरपोर्ट:
N.10 विववाविद ढाँचे की प्रक
ृ ति और अ+ुप्रयोग : मौखिखक
साक्ष्य।
N.11 विववाविद संरच+ा की स्वीरें
N.12 विवष्र्णु हरिर उत्कीर्ण:+
N.13 आस्र्थीा और विवश्वास का ध्रुव ारा
यात्रा विववरर्ण, गSेविर्टयर र्थीा पुस् क
ें
यात्रा विववरर्ण, गSेविर्टयर र्थीा पुस् क
ें का सास्जिक्ष्यक मूल्य
N.14 इति हासकारों की रिरपोर्ट:
O. वाद 4: सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड:
O.1 वादपत्र का विवश्लेषर्ण mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
O.2 खिलखिख कर्थी+
O.3 उच्च न्यायालय क
े विवषय और वि+ष्कष:
O.4 वाद 4 में परिरसीमा
O.5 अ+ुप्रयोज्य विवति*क व्यवस्र्थीा और न्याय, साम्या और
सद्विववेक
O.6 अ+ुदा+ और मान्य ा
O.7 विववाद और कब्Sे को पुष्ट कर+े वाले वाद
1885 क
े वाद का प्रभाव
1934 और 1950 क
े बीच की घर्ट+ाएँ
O.8 +माज़ का प्रमार्ण
O.9 1949 में मूर्ति यों को रख+ा
O.10 +ाज़ुल भूविम
O.11 उपयोगक ा: द्वारा वक्फ
O.12 कब्Sा और प्रति क
ू ल कब्Sा
O.13 विव+ष्ट अ+ुदा+ का सिसद्धां
O.14 विववाविद परिरसर का *ूमपर्ट-1858 की दीवार
O.15 वाद 4 में साक्ष्यों का विवश्लेषर्ण
O.16 मुस्जिस्लमों का कब्Sा हक का दावा
P. स्वत्व पर विवश्लेषर्ण
P.1 वाद 4 और 5 में साक्ष्यों का क्रम-बं*+।
P.2 स्वत्व पर वि+ष्कष:
Q. अ+ु ोष और विदशावि+द†श mn~?kks"k.kk
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A. परिरचय
JUDGMENT

1. ये पहली अपीलें दो *ार्मिमक समुदायों क े बीच विववाद पर क े स्जिन्ˆ हैं सिS+में से दो+ों, अयोध्या शहर में 1500 वग: गS की भूविम पर स्वाविमत्व का दावा कर े हैं। विववाविद संपखित्त का हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े खिलए बहु महत्व रख ा है। हिंहदू समुदाय इसे भगवा+ विवष्र्णु क े अव ार भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में दावा कर ा है। मुस्जिस्लम समुदाय इसे प्रर्थीम मुगल सम्रार्ट बाबर द्वारा वि+र्मिम ऐति हासिसक बाबरी मस्जिस्Sद क े स्र्थील क े रूप में दावा कर ा है। हमारे देश की भूविम आक्रमर्णों और वैम+स्यों का साक्षी है। विफर भी वे भार क े इस विवचार में समाविह हो गए विक वे प्रत्येक को, Sो भी यहाँ आया, चाहे वह व्यापारी, यात्री अर्थीवा विवSे ा क े रूप में हो। इस देश का इति हास और संस्क ृ ति सत्य की खोS, भौति क, राS+ीति क और आध्यात्म क े माध्यम से विवरो* कर+े का घर रहा है। इस न्यायालय को अप+े वि+र्णा:यक काय: को पूर्ण: कर+े क े खिलए कहा Sा ा है Sहां यह दावा विकया Sा ा है विक सत्य क े खिलए दो खोS अन्य की स्व ंत्र ा पर प्रभाव र्डाल े हैं अर्थीवा का+ू+ क े शास+ का उल्लंघ+ कर े हैं।

2. इस न्यायालय को विववाद क े समा*ा+ क े रूप ः काय: विदया गया है, सिSसकी उत्पखित्त उ +ी ही पुरा+ी है सिS +ा स्वयं भार क े विवचार। विववाद से Sुड़ी घर्ट+ाओं में मुगल साम्राज्य, औपवि+वेणिशक शास+ और व:मा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संवै*ावि+क शास+ पद्धति का विवस् ार है। संवै*ावि+क मूल्य इस राष्ट्र की आ*ारणिशला ब+ा े हैं और इस न्यायालय क े समक्ष सु+वाई क े अड़ ालीस विद+ों क े माध्यम से व:मा+ शीष:क विववाद क े वै* संकल्प की सुविव*ा प्रदा+ कर े हैं। इ+ अपीलों में विववाद चार वि+यविम वादों से उद्भू हो ा है सिSन्हें 1950 और 1989 क े बीच दायर विकया गया र्थीा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े समक्ष, मौखिखक और दस् ावेSी दो+ों विवस् ृ साक्ष्य रखे गए, Sो 4304 पृष्ठों क े र्थीे। इस वि+र्ण:य को अपीलों में चु+ौ ी दी गई है।

3. विववाविद भूविम को कोर्ट राम चंˆ क े गांव का विहस्सा अर्थीवा Sैसा विक अयोध्या में रामकोर्ट, परग+ा हवेली अव* में हसील सदर फ ै Sाबाद सिSले क े रूप में कहा Sा ा है। 6 विदसंबर 1992 क उस स्र्थीा+ पर एक पुरा+ी मस्जिस्Sद र्थीी। राम क े भXों क े खिलए इस स्र्थीा+ का *ार्मिमक महत्व है, Sो मा+ े हैं विक भगवा+ राम का Sन्म विववाविद स्र्थीा+ पर हुआ र्थीा। इस कारर्ण से, हिंहदू विववाविद स्र्थील को राम Sन्मभूविम अर्थीवा राम Sन्मस्र्थीा+ (या+ी भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+) क े रूप में संदर्भिभ कर े हैं। विहन्दुओं +े दावा विकया है विक विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम को समर्मिप एक प्राची+ मंविदर मौSूद र्थीा, सिSसे मुगल सम्रार्ट बाबर द्वारा भार ीय उप महाद्वीप पर विवSय पा+े पर ध्वस् कर विदया गया र्थीा। दूसरी ओर, मुस्जिस्लमों +े क: विदया विक मस्जिस्Sद खाली Sमी+ पर बाबर क े आदेश पर या उसक े द्वारा ब+ाई गई र्थीी। यद्यविप हिंहदुओं क े खिलए स्र्थीा+ क े महत्व से इ+कार +हीं विकया Sा ा है, यह मुस्जिस्लमों का मामला है विक विववाविद संपखित्त पर हिंहदुओं का कोई माखिलका+ा दावा मौSूद +हीं है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

4. 1950 में एक हिंहदू पुSारी द्वारा फ ै Sाबाद में सिसविवल न्याया*ीश क े समक्ष एक वाद दायर विकया गया, गोपाल सिंसह विवशारद +े घोषर्णा की विक उ+क े *म: और प्रर्थीा क े अ+ुसार, वह मूर्ति यों क े पास मुख्य Sन्मभूविम मंविदर में प्रार्थी:+ा कर+े का हकदार है।

5. वि+म ही अखाड़ा हिंहदुओं में एक *ार्मिमक संप्रदाय का प्रति वि+ति*त्व कर ा है, सिSसे रामा+ंद बैरागी क े रूप में Sा+ा Sा ा है। सभी वस् ुग समय पर, वि+म विहयों का दावा है विक वे विववाविद स्र्थील पर संरच+ा क े प्रभारी और प्रबं*क र्थीे, उ+क े अ+ुसार 29 विदसंबर 1949 क 'मंविदर' र्थीा, सिSस ति णिर्थी पर दंर्ड प्रविक्रया संविह ा 1898 की *ारा 145 क े ह क ु क— का आदेश विदया गया र्थीा। वास् व में, वे देव ा की सेवा में सेवादार क े रूप में दावा कर े हैं, अप+े मामलों का प्रबं*+ कर े हैं और भXों से प्रसाद प्राप्त कर े हैं। 1959 का वाद 'मंविदर' क े प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए है।

6. उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: ऑफ वक़्फ़ (“सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड:”) और अयोध्या क े अन्य मुस्जिस्लम वि+वासिसयों +े विववाविद स्र्थील पर अप+े हक की घोषर्णा क े खिलए 1961 में वाद दायर विकया। उ+क े अ+ुसार पुरा+ा ढांचा एक मस्जिस्Sद र्थीा सिSसका वि+मा:र्ण मुगल सम्रार्ट बाबर क े अ+ुदेश पर सोलहवीं श ाब्दी क े ीसरे दशक में उप महाद्वीप पर विवSय पा+े क े बाद मीर बाकी द्वारा विकया गया र्थीा Sो उसकी से+ा का से+ापति र्थीा। मुस्जिस्लम इस बा से इंकार कर े हैं विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण एक +ष्ट हुए मंविदर क े स्र्थील पर विकया गया र्थीा। उ+क े अ+ुसार, 23 विदसंबर 1949 क मस्जिस्Sद में वि+बा:* रूप से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इबाद की गई र्थीी, Sब हिंहदुओं क े एक समूह +े इस्लामी *ार्मिमक संरच+ा को +ष्ट कर+े, क्षति और अवहेल+ा कर+े क े इरादे से अप+ी ी+ प्रमुख संरच+ा क े दायरे में मूर्ति यों को रखकर इसे अपविवत्र कर विदया र्थीा। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: स्वत्व का दावा और यविद आवश्यक हो ो कब्Sे क े खिलए एक तिर्डक्री की घोषर्णा कर ा है।

7. 1989 में वाद विमत्र द्वारा देव ा (“भगवा+ श्री राम विवराSमा+”) और भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ (“स्र्थीा+ श्री राम Sन्मभूविम”) की ओर से एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया। यह वाद इस दावे पर दायर विकया गया है विक का+ू+ मूर्ति और Sन्म-स्र्थीा+ दो+ों को न्यातियक संस्र्थीाओं क े रूप में मान्य ा दे ा है। यह दावा है विक Sन्म स्र्थीा+ को पूSा क े उद्देश्य क े रूप में पविवत्र विकया Sा ा है, Sो भगवा+ राम की विदव्य भाव+ा को व्यX कर ा है। इसखिलए, मूर्ति की रह (सिSसे का+ू+ एक न्यातियक इकाई क े रूप में मान्य ा दे ा है), देव ा क े Sन्म का स्र्थीा+ एक विवति*क व्यविX हो+े का दावा विकया Sा ा है, अर्थीवा Sैसा विक का+ू+ी रूप से वर्भिर्ण है, एक न्यातियक स्जिस्र्थीति रख+े क े खिलए। विववाविद स्र्थील पर वि+षे*ाज्ञा राह क े सार्थी स्वत्व की घोषर्णा मांगी गई है।

8. ये वाद, हिंहदू उपासकों द्वारा एक अन्य मुकदमे क े सार्थी, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा फ ै Sाबाद सिसविवल न्यायालय से स्वयं को मुकदमे क े विवचारर्ण क े खिलए स्र्थीा+ां रिर विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय +े चार वादों से उद्भू मूल काय:वाही में एक वि+र्ण:य विदया और ये अपील 30 सिस ंबर 2010 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विद+ांविक की पूर्ण: पीठ क े वि+र्ण:य से उद्भू हुई। उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर वादों को वर्जिS कर विदया गया र्थीा। यह अव*ारिर कर+े क े बावSूद विक उ+ दो वादों को समया+ुसार वर्जिS कर विदया गया र्थीा, उच्च न्यायालय +े 2:1 विवभाS+ क े फ ै सले में अव*ारिर विकया विक हिंहदू और मुस्जिस्लम पक्ष विववाविद परिरसर क े संयुX *ारक र्थीे। उ+में से प्रत्येक को विववाविद संपखित्त क े एक ति हाई का हकदार ठहराया गया र्थीा। वि+म ही अखाड़ा को शेष एक ति हाई प्रदा+ विकया गया। वाद विमत्र क े माध्यम से मूर्ति और भगवा+ राम क े Sन्म -स्र्थीा+ द्वारा लाए गए वाद में उस प्रभाव क े खिलए एक प्रारंणिभक तिर्डक्री पारिर की गई र्थीी।

9. अपील य कर+े से पूव:, इस मुकदमेबाSी क े विवविव* इति हास में हुई महत्वपूर्ण: घर्ट+ाओं को वि+*ा:रिर कर+ा आवश्यक है, सिSसका विवस् ार लगभग सा दशक क है।

10. विववाविद स्र्थील दशकों क विववाद की Sड़ रहा है। 1856-57 में, ढाँचा क े आसपास हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच दंगे हुए। औपवि+वेणिशक सरकार +े छह या सा फीर्ट की ऊ ं चाई वाली वि£ल-ई ंर्ट दीवार स्र्थीाविप करक े का+ू+ और व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+े क े खिलए दो+ों समुदायों क े बीच सामंSस्य बढ़ा+े का प्रयास विकया। इससे परिरसर को दो भागों में विवभासिS विकया Sा सक ा है: आं रिरक भाग सिSसका उपयोग मुस्जिस्लम समुदाय द्वारा विकया Sाएगा और बाहरी विहस्से या अहा ा सिSसका उपयोग हिंहदू समुदाय द्वारा विकया Sाएगा। बाहरी अहा े में हिंहदुओं क े खिलए *ार्मिमक महत्व की अ+ेक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संरच+ाएं हैं, Sैसे विक सी ा रसोई और रामचबू रा। स+् 1877 में उपवि+वेशवादी सरकार +े बाहरी अहा े क े उत्तरी छोर पर एक दूसरा दरवाSा खोला सिSसे हिंहदुओं को वि+यंत्रर्ण और प्रबं* क े खिलए विदया गया। विद्वभाS+, Sैसा विक अणिभलेख विदखा ा है, +े म णिभन्न ा का समा*ा+ +हीं विकया और एक या दूसरे पक्ष द्वारा दूसरे को अलग कर+े क े खिलए बहु प्रयास विकए गए।

11. S+वरी 1885 में, महं रघुबर दास, राम Sन्मस्र्थीा+ क े महं हो+े का दावा कर े हुए, उप-न्याया*ीश, फ ै Sाबाद क े समक्ष एक वाद[1] (“1885 का वाद”) संस्जिस्र्थी विकया। उन्हों+े Sो राह मांगी र्थीी वह बाहरी अहा े में स्जिस्र्थी रामचबू रा पर एक मंविदर ब+ा+े की अ+ुमति र्थीी, सिSसमें सत्रह फीर्ट बाई- एक फीर्ट की माप हुई र्थीी। वाद क े सार्थी एक मा+तिचत्र लगाया गया र्थीा। 24 विदसंबर 1885 को, विवचारर्ण न्याया*ीश +े यह देख े हुए वाद को खारिरS कर विदया विक मंविदर क े प्रस् ाविव वि+मा:र्ण क े कारर्ण दो+ों समुदायों क े बीच दंगों की संभाव+ा र्थीी। हालांविक, विवचारर्ण न्याया*ीश +े अवलोक+ विकया विक चबू रे पर हिंहदुओं क े कब्Sे और स्वाविमत्व क े विवषय में कोई सवाल अर्थीवा संदेह +हीं हो सक ा है। 18 माच: 1886 को, S+पद न्याया*ीश +े विवचारर्ण न्यायालय[2] क े वि+र्ण:य क े विवरूद्ध अपील को खारिरS कर विदया, परन् ु विवचारर्ण न्यायालय क े वि+र्ण:य में वि+विह चबू रे को हिंहदुओं क े स्वाविमत्व से संबंति* अवलोक+ों को खारिरS कर विदया। 1 +वंबर 1886 को, अव* क े न्यातियक आयुX +े दूसरी अपील[3] को यह देख े हुए खारिरS कर विदया विक महं चबू रा क े स्वाविमत्व क े स्वत्व को संस्जिस्र्थी कर+े क े साक्ष्य प्रस् ु कर+े में 1 (OS No. 61/280 of 1885)

2 Civil Appeal No. 27/1885 3 No 27 of 1886 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवफल रहे र्थीे। 1934 में दो+ों समुदायों क े बीच एक और र्टकराव हुआ। घर्ट+ा क े दौरा+ मस्जिस्Sद की गुंबद का ढाँचा क्षति £स् हो गया और बाद में औपवि+वेणिशक सरकार की खच† पर उसकी मरम्म की गई।

12. विववाद 22 और 23 विदसंबर, 1949 की रा को एक +ये चरर्ण में पहुंचा, Sब मस्जिस्Sद को लगभग पचास या साठ लोगों क े एक समूह द्वारा अपविवत्र विकया गया, सिSन्हों+े उसक े ाले खोल विदए और भगवा+ राम की मूर्ति यों को क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे स्र्थीाविप विकया। घर्ट+ा क े संबं* में प्रर्थीम सूच+ा रिरपोर्ट: (“एफ.आई.आर.”) दS: की गई र्थीी। विद+ांक 29 विदसंबर, 1949 को अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट, फ ै Sाबाद-सह-अयोध्या +े स्जिस्र्थीति को एक आकस्जिस्मक प्रक ृ ति मा+ े हुए दंर्ड प्रविक्रया संविह ा 18984 (“सीआरपीसी 1898”) की *ारा 145 क े ह एक प्रारंणिभक आदेश Sारी विकया। इसक े सार्थी ही, एक क ु क— आदेश Sारी विकया गया र्थीा और फ ै Sाबाद +गर वि+गम बोर्ड: क े अध्यक्ष विप्रया दत्त राम को आं रिरक अहा े क े प्राप क े रूप में वि+युX विकया गया र्थीा। विद+ांक 5 S+वरी 1950 को प्राप +े आं रिरक अहा े का काय:भार संभाला और कु क: संपखित्तयों की एक सूची ैयार की। मसिSस्र्ट्रेर्ट +े सं ुविष्ट दS: कर+े पर एक प्रारंणिभक आदेश पारिर विकया विक दो+ों समुदायों क े बीच ढाँचे पर पूSा और स्वाविमत्व क े दावों पर विववाद से शांति भंग हो+े की संभाव+ा होगी। विह *ारकों को अप+े खिलखिख 4 Sहां भूविम या Sल से संबद्ध विववादों से परिरशांति भंग हो+ा संभाव्य है वहां प्रविक्रया— (1) Sब कभी विकसी कायपा:लक मसिSस्र्ट्रेर्ट का, पुखिलस अति*कारी की रिरपोर्ट: से या अन्य इखित्तला पर समा*ा+ हो Sा ा है विक उसकी स्र्थीा+ीय अति*कारिर ा क े अंदर विकसी भूविम या Sल या उसकी सीमाओं से संबद्धमा ऐसा विववाद विवद्यमा+ है, सिSससे परिरशांति भंग हो+ा संभाव्य है, ब वह अप+ा ऐसा समा*ा+ हो+े क े आ*ारों का कर्थी+ कर े हुए और ऐसे विववाद से संबद्ध पक्षकारों से यह अपेक्षा कर े हुए खिलखिख आदेश देगा विक वे विववि+र्मिदष्ट ारीख और समय पर स्वयं या प्लीर्डर द्वारा उसक े न्यायालय में हासिSर हों और विववाद की विवषयवस् ु पर वास्जिस् वक कब्Sे क े थ्य क े बारे में अप+े-अप+े दावों का खिलखिख कर्थी+ पेश करें। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बया+ दS: कर+े की अ+ुमति दी गई र्थीी। मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश क े ह क े वल दो या ी+ पुSारिरयों को भोग और पूSा Sैसे *ार्मिमक अ+ुष्ठा+ों को कर+े क े खिलए उस स्र्थीा+ क े अंदर Sा+े की अ+ुमति दी गई र्थीी Sहां मूर्ति यों को रखा गया र्थीा। सामान्य S+ ा क े प्रति वि+ति*यों को प्रवेश कर+े से प्रति बंति* विकया गया र्थीा और उन्हें क े वल वि£ल-ई ंर्ट की दीवार से परे दश:+ की अ+ुमति दी गई र्थीी। वादों का संस्र्थी+

13. विद+ांक 16 S+वरी, 1950 को एक हिंहदू भX, गोपाल सिंसह विवशारद[5], (“वाद 1”) द्वारा फ ै Sाबाद में सिसविवल न्याया*ीश क े समक्ष एक वाद चलाया गया, सिSसमें आरोप लगाया गया विक उन्हें सरकार क े अति*कारिरयों द्वारा विववाविद स्र्थील क े आं रिरक अहा े में पूSा कर+े क े खिलए प्रवेश कर+े से रोका Sा रहा र्थीा। एक घोषर्णा में यह मांग की गई र्थीी विक वादी को अप+े *म: (“स+ा + *म:”) क े संस्कारों और सिसद्धां ों क े अ+ुसार “मुख्य S+मभूविम” में मूर्ति यों क े पास, आं रिरक अहा े क े भी र, वि+बा:* प्रार्थी:+ा कर+े की अ+ुमति प्रदा+ की Sाए। उसी ति णिर्थी को, वाद में एक अं रिरम व्यादेश Sारी की गई र्थीी। विद+ांक 19 S+वरी, 1950 को मूर्ति यों को विववाविद स्र्थील से हर्टा+े और पूSा क े प्रदश:+ में हस् क्षेप कर+े से रोक+े क े खिलए व्यादेश को संशोति* विकया गया र्थीा। संशोति* क े रूप में विद+ांक 3 माच:, 1951 को विवचारर्ण न्यायालय +े अं रिरम आदेश की पुविष्ट की। विद+ांक 26 मई, 1955

5 Regular Suit No 2 of 1950. Subsequently renumbered as Other Original Suit (OOS) No 1 of 1989. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को अं रिरम आदेश क े विवरूद्ध अपील[6] को इलाहाबाद उच्च न्यायालय +े खारिरS कर विदया र्थीा।

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14. विद+ांक 5 विदसंबर, 1950 को एक अन्य वाद परमहंस रामचंˆ दास[7] (“वाद 2”) द्वारा सिसविवल न्याया*ीश, फ ै Sाबाद क े समक्ष संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, Sो वाद 1 क े समा+ ही राह की मांग कर रहे र्थीे। बाद में विद+ांक 18 सिस ंबर, 1990 को वाद 2 वापस ले खिलया गया।

15. विद+ांक 1 अप्रैल 1950 को विववाविद परिरसर का +क्शा ैयार कर+े क े खिलए वाद 1 में एक न्यायालय आयुX वि+युX विकया गया र्थीा। विद+ांक 25 Sू+, 1950 को आयुX +े विववाविद परिरसर की दो +क्शा +Sरी क े सार्थी एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की, सिSन्हें +क्शा सं. 1 और 2 क े रूप में विवचारर्ण न्यायालय में कहा गया र्थीा। रिरपोर्ट: और +क्शे दो+ों स्र्थील पर स्जिस्र्थीति का संक े दे े हैं और +ीचे पु+प्र:स् ुति विकया Sा ा है: आयुX की रिरपोर्ट: “रिरपोर्ट: महोदय, मुझे उपरोX मामले में आयुX वि+युX विकया गया र्थीा ाविक वाद में पैमा+े पर इलाक े और भव+ की +क्शा +Sरी ैयार की Sा सक े । 6 FAFO No 154 of 1951 7 Regular Suit no 25 of 1950 (subsequently renumbered as Other Original Suit (OOS) No 2 of 1989) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द+ुसार, न्यायालय क े आदेश क े अ+ुपाल+ में, मैं+े विद+ांक 16.4.50 को और विफर विद+ांक 30.4.50 को पक्षों क े अति*वXा को यर्थीोतिच +ोविर्टस दे+े क े बाद इलाक े का दौरा विकया, और मौक े पर आवश्यक माप विकए। मेरी यात्रा क े पहले विद+ कोई भी पक्ष मौSूद +हीं र्थीा, लेविक+ दूसरे विद+ प्रति वादी सं. 1 श्री अSीमुल्ला खा+ और श्री हबीब अहमद खा+ अति*वXा क े सार्थी मौSूद र्थीे। दोपहर में Sब माप का काय: पहले ही समाप्त हो चुका र्थीा ब प्रति वादी सं. 1 +े एक आवेद+ प्रस् ु कर उसक े सार्थी संलग्न विकया। +क्शा संख्या 1 +क्शा संख्या 2 की ुल+ा में बड़े पैमा+े पर आक ृ ति ABCDEF द्वारा विदखाए गए वाद में भव+ का प्रति वि+ति*त्व कर ी है, Sो भव+ को उसक े इलाक े क े सार्थी दशा: ी है। +क्शा सं. 1 क े अवलोक+ से यह प ा चल ा है विक भव+ को दो द्वार विमले हैं, एक पूव: में और दूसरा उत्तर में Sो क्रमशः "ह+ुम द्वार" और "सिंसहद्वार" क े +ाम से Sा+ा Sा ा है। भव+ का मुख्य प्रवेश द्वार "ह+ुमम द्वार" है। इस द्वार पर "1-श्री Sन्मभूविम वि+त्य यात्रा" +ामक एक णिशलालेख Sमी+ पर स्र्थीाविप है और श्री ह+ुमा+Sी का एक बड़ा रंगी+ तिचत्र द्वार क े शीष: पर स्र्थीाविप है। इस प्रवेश द्वार क े मेहराब की ऊ ँ चाई 10' सिSस पर दो काले कसौर्टी पत्र्थीर स् ंभों पर विर्टका हुआ है सिS+में से प्रत्येक की ऊ ँ चाई 4' Sो A और ब B क े रूप में राशी हुई है और क्रमशः Sय और विवSय की प्रति माएं उत्कीर्ण: हैं। बाहरी दीवार पर इस द्वार क े दतिक्षर्ण में एक पत्र्थीर की छविव Sो 5' लंबी है, सिSसे "वराह भगवा+" कहा Sा ा है। उत्तरी द्वार, सिSसे "सिंसहद्वार" क े +ाम से Sा+ा Sा ा है सिSसकी ऊ ं चाई 19'6" है, गरूड़ की ऊपरी छविवयां बीच में और दो+ों ओर दो सिंसह हैं। मुख्य द्वार पर प्रवेश कर+े पर भी री भव+ क े पूव- और उत्तरी विक+ारे पर पक्का ल है, सिSसे पूव- ल क े उत्तर में GHJKL DGB अक्षरों से तिचवि- विकया गया है, एक +ीम का पेड़ है, और इसक े दतिक्षर्ण में भंर्डारा (रसोई) है। इसक े अति रिरX दतिक्षर्ण में एक ऊ ं चा पक्की मंच Sो 17' x 21' और 4' ऊ ं चा है, सिSसे "राम चबू रा" कहा Sा ा है, सिSस पर एक छोर्टा मंविदर है सिSसमें राम और Sा+की की मूर्ति यां स्र्थीाविप हैं। दतिक्षर्ण-पूव- को+े ई में एक +ीम-पीपल का संयुX पेड़ है, Sो अ*:-वृत्ताकार पक्क े मंच से तिघरा हुआ है, सिSस पर पंचमुखी महादेव, पाव: ी, गर्णेश और +ंदी की संगमरमर की मूर्ति यां स्र्थीाविप हैं। उत्तरी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ल पर एक 8' x 9' का पक्का मंच है, सिSसे “सी ा रसोई” कहा Sा ा है, इस मंच पर एक पक्का चूल्हा है, सिSसमें चौका और बेल+ है, सिSसे संगमरमर से ब+ाया गया है, Sो इस रफ संबद्ध है। चूल्हे क े पूव: में राम, लक्ष्मर्ण, भर और शत्रुघ्+ क े संगमरमर क े चार Sोड़े पदतिचन्ह हैं। भी री (मुख्य) भव+ क े साम+े पक्का अहा ा दीवारों से तिघरा हुआ है NHJK को लोहे की सलाखों से O और P में दो लोहे क े छड़ से ब+े द्वार क े सार्थी अं ःखस्जि°र्ड है, Sैसा विक +क्शा सं.[1] में दर्भिश है। इस अहा े क े दतिक्षर्णी छोर पर 14 सीविढ़याँ हैं, Sो विक भव+ छ की ओर Sा ी हैं, और सीविढ़यों क े दतिक्षर्ण में एक ऊ ं चा पक्का मंच है Sो 2' ऊ ँ चा है, सिSसक े दतिक्षर्ण-पतिश्चम को+े में एक यूरिर+ल है Sो U द्वारा तिचवि- है। ी+ मेहराबदार द्वार हैं- X, Y और Z; Sो मुख्य भव+ क Sा े हैं, Sो ी+ भागों में विवभासिS है, सिS+में Q और R पर मेहराब हैं। मेहराब Y क े ऊपर एक छज्जा (अ+ुमावि+ छ ) है। ी+ मेहराब, Y, Q और R 12 काले कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभों पर विर्टका हुआ है, सिSसमें प्रत्येक की ऊ ँ चाई 6' है, सिSसमें +क्शा सं.[1] में c से n क क े अक्षरों क े सार्थी तिचवि- विकया गया है। स् ंभों पर e से m में कमल क े फ ू लों की +क्काशी है। इस स् ंभ में शंकर भगवा+ की छविव ांर्डव +ृत्य क े रूप में है और एक अन्य विवक ृ छविव है। J स् ंभ में ह+ुमा+Sी की उत्कीर्भिर्ण प्रति मा र्थीी। स् ंभ N को भगवा+ क ृ ष्र्ण की मूर्ति क े रूप में प्रति विष्ठ विकया गया है, सिSसक े सार्थी ही अन्य स् ंभों में तिचत्रों की +क्काशी भी की गई है, Sो विमर्टी हुई हैं। उत्तर-पतिश्चमी को+े में भव+ क े मध्य भाग में दो सीविढ़यों क े सार्थी पक्का मंच है, सिSस पर बाल राम (णिशशु राम) की मूर्ति स्र्थीाविप है। Sैसा विक +क्शा सं.[1] में अलग से दर्भिश है, भव+ क े ी+ विहस्सों क े शीष: पर ी+ गुंबद हैं Sो प्रत्येक अष्टकोर्ण आ*ार पर है। + ो कोई मी+ार है और + ही भव+ में कोई गुसलखा+ा है। भव+ क े आसपास एक पक्का माग: है सिSसे परिरक्रमा क े रूप में Sा+ा Sा ा है, Sैसा विक +क्शा सं. 1 और 2 में पीले रंग में विदखाया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरक्रमा क े पतिश्चम में भूविम लगभग 20' कम है, Sबविक उत्तरी विदशा में पक्की सड़क लगभग 18' कम है। मुहल्ले पर विमली अन्य ढाँचों को उ+क े उतिच स्र्थीा+ों पर +क्शा सं.[2] में दर्भिश है। S और T अक्षर द्वारा दर्भिश भूविम सा*ुओं की झोपविड़यों और *ू+ी से आच्छाविद है। T अक्षर द्वारा दर्भिश भूविम क े दतिक्षर्ण और उसक े वि+कर्ट एक ऊ ं चा मंच है, Sो दीवारों से परिरबद्ध है, Sो 4' 6“ ऊ ँ चा है और पतिश्चम की ओर Sा+े वाले माग: को ”शंकर चबू रा“ क े रूप में Sा+ा Sा ा है, सिSसे “सी ा क ू प“ क े +ाम से Sा+ा Sा ा है, इस पर एक विर्ट+ शेर्ड ब+ाया गया है और एक पाषार्ण णिशला “3-सी ा क ू प“ क े णिशलालेख क े सार्थी इसक े वि+कर्ट स्र्थीाविप विकया गया है। इस क ू प क े दतिक्षर्ण-पतिश्चम में एक और पाषार्ण णिशला भूविम में “4-सुविमत्रा भव+“ +ामक णिशलालेख क े सार्थी स्र्थीाविप विकया गया है। सुविमत्रा भव+ क े उन्न मंच पर शेष+ाग की मूर्ति क े सार्थी एक पाषार्ण णिशला Sमी+ पर स्र्थीाविप विकया गया है। +क्शा सं. 2 में उसिल्लखिख विवणिभन्न समाति*यों और अन्य ढाँचों क े +ाम सा*ुओं और मौक े पर मौSूद अन्य लोगों द्वारा विदए गए र्थीे। +क्शा सं. 1 और 2 Sो इस रिरपोर्ट: क े विहस्से हैं, पक्षों क े अति*वXा को विदए गए दो +ोविर्टस और प्रति वादी सं. 1 द्वारा प्रस् ु आवेद+ संलग्न हैं। ससम्मा+ उपस्जिस्र्थी, महोदय, आपका परम् आज्ञाकारी, णिशव शंकर लाल, फ ै Sाबाद। प्लीर्डर 25.5.50 आयुX।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

16. विद+ांक 17 विदसंबर, 1959 को फ ै Sाबाद क े दीवा+ी न्याया*ीश क े समक्ष वि+म ही अखाड़ा +े अप+े महं ("वाद 3") क े माध्यम से वाद[8] संस्जिस्र्थी विकया सिSसमें दावा विकया गया र्थीा विक Sन्मस्र्थीा+ क े मामलों का प्रबं* कर+े का उसका “आत्यंति क अति*कार” और मसिSस्र्ट्रेर्ट की क ु क— क े आदेश द्वारा और *ारा 145 क े ह प्राप की वि+युविX से मंविदर पर गहरा असर पड़ा र्थीा। वाद 3 में मंविदर क े प्रबं* और प्रभार को वादी को सौंप+े क े खिलए एक तिर्डक्री मांगी गई र्थीी।

17. विद+ांक 18 विदसंबर, 1961 को फ ै Sाबाद क े दीवा+ी न्याया*ीश क े समक्ष सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और अयोध्या क े +ौ मुस्जिस्लम वि+वासिसयों +े मूर्ति यों को हर्टाकर कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए और बाबरी मस्जिस्Sद का विववाविद स्र्थील साव:Sवि+क मस्जिस्Sद र्थीा, को उद्घोविष कर+े की माँग कर े हुए एक वाद[9] दायर विकया।

18. विद+ांक 6 S+वरी, 1964 को वाद 1, 3 और 4 का परीक्षर्ण समेविक विकया गया र्थीा और वाद 4 को प्रमुख मामला ब+ाया गया र्थीा।

19. विद+ांक 25 S+वरी, 1986 को उमेश चंˆ द्वारा विवचारर्ण न्यायालय क े समक्ष वि£ल-ई ंर्ट की दीवार पर लगाए गए ाले खोल+े और S+ ा को आं रिरक अहा े क े भी र दश:+ कर+े की अ+ुमति प्रदा+ कर+े क े खिलए एक आवेद+ दायर विकया गया र्थीा। विद+ांक 1 फरवरी 1986 को सिSला 8 Regular Suit No 26 of 1959 (subsequently renumbered as OOS No. 3 of 1989)

9 Regular Suit No. 12 of 1961 (subsequently renumbered as OOS No. 4 of 1989) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्याया*ीश +े ाले खोल+े और ढाँचे क े अंदर भXों को दश:+ कर+े क े खिलए वि+द†श Sारी विकए। उपरोX आदेश को चु+ौ ी दे+े वाले उच्च न्यायालय क े समक्ष दायर रिरर्ट यातिचका10 में, विद+ांक 3 फरवरी 1986 को एक अं रिरम आदेश पारिर विकया गया र्थीा सिSसमें वि+द†श विदया गया र्थीा विक अगले आदेश क, संपखित्त की प्रक ृ ति Sो मौSूद है उसमें ब्दीली +हीं की Sाएगी।

20. विद+ांक 1 Sुलाई, 1989 को विववाविद परिरसर को स्वत्व और प्रति वाविदयों को मंविदर क े वि+मा:र्ण पर कोई आपखित्त उठा+े अर्थीवा हस् क्षेप कर+े से रोक+े की घोषर्णा कर+े क े खिलए एक वाद विमत्र क े माध्यम से दीवा+ी न्याया*ीश, फ ै Sाबाद क े समक्ष देव ा (”भगवा+ श्री राम विवराSमा+”) और Sन्म स्र्थीा+ (”स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम, अयोध्या”) द्वारा वाद11 (”वाद 5”) लाया गया। वाद 5 को अन्य वादों क े सार्थी विवचारिर विकया गया।

21. विद+ांक 10 Sुलाई, 1989 को सभी वाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया। विद+ांक 21 Sुलाई, 1989 को वादों क े विवचारर्ण क े खिलए उच्च न्यायालय क े मुख्य न्याया*ीश द्वारा ी+ न्याया*ीशों की न्यायपीठ का गठ+ विकया गया। उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा आवेद+ पर, उच्च न्यायालय +े विद+ांक 14 अगस् 1989 को एक अं रिरम आदेश पारिर विकया, सिSसमें पक्षकारों को विववाद में संपखित्त क े संबं* में यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रख+े का वि+द†श विदया गया। 10 Civil Misc. Writ No. 746 of 1986

11 Regular Suit No. 236 of 1989 (subsequently renumbered as OOS No. 5 of 1989) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

22. काय:वाही क े लंब+ क े दौरा+, उत्तर प्रदेश राज्य +े विववाविद परिरसर और क ु छ आस-पास क े क्षेत्रों से युX 2.77 एकड़ क्षेत्र का अति*£हर्ण विकया। यह भूविम अS:+ अति*वि+यम, 1894 (“भूविम अS:+ अति*वि+यम”) की *ारा 4(1), 6 और 17(4) क े ह विद+ांक 7 अक्र्टूबर, 1991 और 10 अX ू बर, 1991 की अति*सूच+ाओं द्वारा प्रभाविव र्थीा। यह अति*£हर्ण 'अयोध्या में यावित्रयों को विवकास और सुविव*ाएं प्रदा+ कर+े क े खिलए ' र्थीा। अति*£हर्ण को चु+ौ ी दे े हुए उच्च न्यायालय क े समक्ष एक रिरर्ट यातिचका दायर की गई र्थीी। विद+ांक 11 विदसंबर 1992 क े वि+र्ण:य और आदेश द्वारा अति*£हर्ण को अपास् विकया गया र्थीा।

23. विद+ांक 6 विदसंबर 1992 को स्र्थील पर स्जिस्र्थीति में पया:प्त बदलाव हुआ। भीड़ +े मस्जिस्Sद, चहारदीवारी, और रामचबू रे को +ष्ट कर विदया। इससे पूव: क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे स्र्थील पर एक मंविदर की एक अस्र्थीायी ढाँचे का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। वहां मूर्ति यों को स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। क ें ˆ सरकार द्वारा अति*£हर्ण और इस्माइल फारुकी का मामला

24. क ें ˆ सरकार +े अयोध्या अति*वि+यम 1993 ("अयोध्या अति*£हर्ण अति*वि+यम 1993") में क ु छ क्षेत्र क े अति*£हर्ण +ामक का+ू+ द्वारा विववाविद परिरसर सविह लगभग 68 एकड़ क्षेत्र का अति*£हर्ण विकया। *ारा 3 और 4 में उ+ सभी वादों की न्यू+ीकरर्ण परिरकस्जिल्प की गई र्थीी Sो उच्च न्यायालय क े समक्ष लंविब र्थीे। इसक े सार्थी ही, भार क े राष्ट्रपति +े संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 143 क े ह इस न्यायालय का संदभ: विदया र्थीा। वह संदभ: यह र्थीा विक “उस क्षेत्र में राम Sन्म भूविम और बाबरी मस्जिस्Sद (इस रह क े परिरसर में आं रिरक और बाहरी अहा े क े परिरसर सविह ) क े वि+मा:र्ण से पूव: एक हिंहदू मंविदर अर्थीवा कोई हिंहदू *ार्मिमक ढाँचा मौSूद र्थीा, सिSस पर ढाँचा ब+ा है......।“

25. इलाहाबाद उच्च न्यायालय और 1993 क े अति*वि+यम की वै* ा को चु+ौ ी दे े हुए इस न्यायालय क े समक्ष रिरर्ट यातिचका दायर की गई र्थीी। राष्ट्रपति द्वारा सभी यातिचकाओं और संदभ: को एक सार्थी सु+ा गया और 24 अक्र्टूबर 1994 विद+ांविक क े वि+र्ण:य द्वारा वि+र्ण- विकया गया। इस न्यायालय की संविव*ा+ पीठ का वि+र्ण:य, सिSसका शीष:क र्डॉ. एम इस्माइल फारुकी ब+ाम यूवि+य+ ऑफ इंतिर्डया12 है, +े *ारा 4(3) अव*ारिर विकया, Sो सभी लंविब वादों को असंवै*ावि+क घोविष कर+े क े खिलए उपसम+ प्रदा+ कर ा है। शेष 1993 क े अति*वि+यम को वै* अव*ारिर विकया गया। संविव*ा+ पीठ +े राष्ट्रपति क े संदभ: का Sवाब दे+े से इ+कार कर विदया और, परिरर्णामस्वरूप, विववाविद परिरसर क े संबं* में सभी लंविब वादों और काय:वाविहयाँ पु+S-विव हो गई। क ें ˆ सरकार को यर्थीास्जिस्र्थीति को बरकरार रख+े क े खिलए एक वै*ावि+क प्राप क े रूप में वि+युX विकया गया र्थीा और वाद में विकए Sा+े वाले अति*वि+र्ण:य क े संदभ: में विववाविद क्षेत्र को सौंप+ा र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संविव*ा+ पीठ द्वारा विदए गए वि+ष्कष: +ीचे विदया गया है: "96.... (1)(क) अति*वि+यम की *ारा 4 की उप*ारा (3) सभी लंविब वादों और विवति*क काय:वाविहयों को पक्षकारों क े बीच विववादों क े समा*ा+ क े खिलए वैकस्जिल्पक विववाद समा*ा+ ंत्र का उपबं* विकए विब+ा समाप्त कर ी है। यह विवति* क े शास+ की उपेक्षा क े खिलए विववाद क े समा*ा+ क े खिलए न्यातियक उपाय की समाविप्त है। इसखिलए, अति*वि+यम की *ारा 4 की उप-*ारा (3) असंवै*ावि+क और अमान्य है। (1)(ख) अति*वि+यम क े शेष उपबं* हमारे द्वारा विकए गए सतिन्नमा:र्ण पर विकसी अविवति*मान्य ा से £स् +हीं हैं। अति*वि+यम की *ारा 4 की उप- *ारा (3) शेष अति*वि+यम से अलग है। द+ुसार, शेष अति*वि+यम की संवै*ावि+क वै* ा क े खिलए चु+ौ ी को उप-*ारा 4 की उप-*ारा(3) क े सिसवाय खारिरS कर विदया है. (2) इस्लामी देशों में लागू मुस्जिस्लम विवति* क े ह विकसी मस्जिस्Sद की प्रास्जिस्र्थीति को ध्या+ में रख े हुए, पंर्थीवि+रपेक्ष भार में लागू मुस्जिस्लम विवति* क े ह विकसी मस्जिस्Sद की प्रस्जिस्र्थीति विकसी *म: की उपास+ा क े विकसी अन्य स्र्थीा+ क े समा+ है और विकसी अन्य *म: क े पूSा स्र्थील क े बराबर है; और राज्य की संप्रभु ा या विवशेषाति*कार शविX को अन्य *मÂ क े पूSा स्र्थीलों की ुल+ा में अति*£हर्ण से अति*क उन्मुविX प्राप्त +हीं है। (3) विववाविद क्षेत्र से संबंति* लंविब वाद और अन्य काय:वाविहयां, सिS+क े भी र ढाँचा (ऐसे ढाँचे क े आं रिरक और बाह्य अहा े का परिरसर सविह ), सिSन्हें आम ौर पर राम Sन्मभूविम-बाबरी मस्जिस्Sद कहा Sा ा है, उस विववाद क े न्यायवि+र्ण:य+ क े खिलए पु+S-विव की Sा ी हैं, सार्थी में अं रिरम आदेश विदए गए हैं, सिसवाय उस सीमा क Sो अं रिरम आदेश अति*वि+यम की *ारा 7 क े उपबं*ों द्वारा संशोति* विकए गए हैं। (4) अति*वि+यम की *ारा 3 क े गुर्ण पर क े न्ˆ सरकार में उX विववाविद क्षेत्र क े वि+विह ार्थी:, अति*वि+यम की *ारा 7 की उप*ारा (2) क े ह उसमें यर्थीास्जिस्र्थीति बरकरार रख+े की अपेक्षा कर+े वाले *ारा 7 क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ+ुसार उसक े प्रबं*+ और प्रशास+ क े खिलए क:व्य सविह का+ू+ी प्राप क े रूप में सीविम है। वै*ावि+क प्राप क े रूप में क ें ˆ सरकार का क:व्य अंति म वि+र्ण:य क े काया:न्वय+ क े खिलए वाद में विकए गए अति*वि+र्ण:य+ क े संदभ: में, अति*वि+यम की *ारा 6 क े अ+ुसार विववाविद क्षेत्र को सौंप+ा है। यह वह उद्देश्य है सिSसक े खिलए विववाविद क्षेत्र का अति*£हर्ण विकया गया है। (5) वादों में और अं रिरम आदेश कर+े में न्यायालयों की शविX अति*वि+यम की *ारा 7 की परिरति* से बाहर क े क्षेत्र क सीविम और प्रति बंति* है। (6) अति*वि+यम की *ारा 3 क े गुर्ण पर क े न्ˆ सरकार में अति*वि+यम द्वारा अर्जिS विववाविद क्षेत्र से णिभन्न सतिन्नकर्ट क्षेत्र क े वि+विह ार्थी:, Sब क विक अति*वि+यम की *ारा 6 क े अ+ुसार विकसी न्यास क े विकसी प्राति*कारी या अन्य वि+काय या न्यासिसयों में इसक े आगे वि+विह +हीं हो Sा ा है, अति*वि+यम की *ारा 7 की उप-*ारा (1) क े अ+ुसार उसका प्रबं*+ और प्रशास+ की शविX क े सार्थी सुवि+तिश्च है।अति*वि+यम की *ारा 6 क े अ+ुसार, विववाविद क्षेत्र क े अति रिरX, सतिन्नकर्ट क्षेत्र क े वि+विह ार्थी: उसक े अति*£हर्ण क े उद्देश्य क े दृविष्टग उस समय और उसक े अS:+ क े प्रयोS+ को ध्या+ में रख े हुए उपदर्भिश रीति से की Sा+ी चाविहए। (7) अति*वि+यम की *ारा *ारा 3 और *ारा 6 में "वि+विह " शब्द क े अर्थी: को विवणिभन्न संदभÂ में समझा Sा+ा चाविहए। (8) अति*वि+यम की *ारा 8 क े न्ˆ सरकार में पूर्ण: या वि+विह संपखित्त क े माखिलकों को प्रति कर क े संदाय क े खिलए अणिभप्रे है, सिSसका स्वत्व ऐसे विववाद में +हीं है Sो विववाविद क्षेत्र से अति*क है Sो क े वल पु+स्र्थीा:विप वादों का विवषय है। यह विववाविद क्षेत्र पर लागू +हीं हो ा है, वाद में क:व्य क े सार्थी इसे माखिलक को बहाल कर+े क े खिलए विकए गए अति*वि+र्ण:य+ क े संदभ: में सिSस स्वत्व को वादों में अति*वि+र्ण- विकया Sा+ा है और सिSसक े संबं* में Sैसा विक संक े विदया गया है क ें ˆ सरकार क े वल वै*ावि+क प्राप है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (9) सतिन्नकर्ट क्षेत्र क े विकसी भी विहस्से क े अति*£हर्ण की इस आ*ार पर यह चु+ौ ी है विक लंबी अवति* से स्र्थीायी विववाद को वि+पर्टा+े क े वि+*ा:रिर उद्देश्य को प्राप्त कर+े क े खिलए अ+ावश्यक है और इस स् र पर Sांच +हीं की Sा सक ी है। हालांविक, विववाद क े अति*वि+र्ण:य+ पर वि+*ा:रिर विकए गए उद्देश्य क े खिलए अ+ावश्यक समुतिच क्षेत्र पर पाए गए क्षेत्र को वि+र्मिववाद माखिलकों को बहाल विकया Sा+ा चाविहए। (10) विववाविद क्षेत्र क े सतिन्नकर्ट क्षेत्र में क ु छ *ार्मिमक संपखित्तयों क े अS:+ क े खिलए अविववाविद स्वाविमयों द्वारा चु+ौ ी की अस्वीक ृ ति, इस स्जिस्र्थीति पर, यविद आवश्यक हो ो बाद क े उतिच स्जिस्र्थीति पर, उ+की संपखित्त को क े न्ˆ सरकार द्वारा विववाद क े अति*वि+र्ण:य+ पर अपेतिक्ष समुतिच क्षेत्र से अति*क अविवस्जिच्छन्न प्रति *ारर्ण क े मामलों में, उ+की चु+ौ ी का +वीकरर्ण कर+े क े खिलए उन्हें प्रदा+ की गइ: स्व ंत्र ा क े सार्थी है। (11) परिरर्णाम ः, भार क े राष्ट्रपति द्वारा भार क े संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 143(1) क े ह विदया गया विवशेष संदभ: सं. 1/ 1993 वि+रर्थी:क और अ+ावश्यक है और उत्तर विदया Sा+ा आवश्यक +हीं है। इस कारर्णवश, हम बहु ससम्मा+ इसका उत्तर दे+े और उसको वापस कर+े क े खिलए इ+कार कर े हैं। (12) उX अति*वि+यम की संवै*ावि+क वै* ा और विवशेष संदभ: की पोषर्णीय ा से संबंति* प्रश्न इ+ श Â में य विकए गए हैं।" उच्च न्यायालय क े समक्ष काय:वाही

26. विद+ांक 24 Sुलाई 1996 को उच्च न्यायालय क े समक्ष मौखिखक साक्ष्य की रिरकॉर्डिंर्डग प्रारम्भ हुआ। सु+वाई क े दौरा+, उच्च न्यायालय +े विद+ांक 23 अक्र्टूबर, 2002 को भार ीय पुरा त्व सव†क्षर्ण (“ए एस आई”) को एक वैज्ञावि+क अन्वेषर्ण कर+े क े खिलए वि+देश Sारी विकए और भूविम भेदक क+ीकी या भू-विवविकरर्ण विवज्ञा+ (“Sी.पी.आर.”) द्वारा विववाविद स्र्थील का सव†क्षर्ण mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया गया। 17 फरवरी, 2003 विद+ांविक की Sी.पी.आर. रिरपोर्ट: में विवणिभन्न प्रकार की “असंगति याँ” उपदर्भिश की गई हैं Sो विववाविद स्र्थील क े बड़े भाग में फ ै ले स् ंभ, +ींव, दीवार णिशला और फश: Sैसी “प्राची+ और समकाली+ संरच+ाओं” से संबद्ध हो सक ी हैं। आगे क े विवश्लेषर्ण की सुविव*ा क े खिलए, उच्च न्यायालय +े विद+ांक 5 माच:, 2003 को ए.एस.आई. को विववाविद स्र्थील की खुदाई कर+े का वि+द†श विदया। चौदह सदस्यीय र्टीम का गठ+ विकया गया र्थीा, और एक +क्शा +Sरी ैयार की गई र्थीी सिSसमें यह दशा:या गया र्थीा विक खाइयों की सं. वि+*ा:रिर की Sाए और खुदाई की Sाए। 22 अगस् 2003 को, ए.एस.आई. +े अप+ी अंति म आख्या प्रस् ु की। उच्च न्यायालय +े आख्या पर आपखित्तयां सु+ीं।

27. मौखिखक और वृत्ततिचत्र दो+ों साक्ष्य उच्च न्यायालय क े समक्ष दS: विकए गए र्थीे। एक न्याया*ीश क े रूप में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े उल्लेख विकया विक उच्च न्यायालय +े 13,990 पृष्ठों की 533 प्रदश:वि+यों और 87 गवाहों क े Sमा हो+े से पूव: कहा र्थीा। इसक े अलावा, अति*वXा +े संस्क ृ, हिंहदी, उदू:, फारसी, ुक—, फ्र ें च और अं£ेSी में हSार से अति*क पुस् कों क े संदभ: पर अवलम्ब खिलया है, Sो इति हास, संस्क ृ ति, पुरा त्व और *म: Sैसे विवविव* विवषयों से संबंति* हैं। उच्च न्यायालय +े यह सुवि+तिश्च विकया विक असंख्य पुरा ास्जित्वक णिशल्पकृ ति यों को अणिभलेख कक्ष में रखा Sाए। इस+े दS:+ों सीर्डी और अन्य अणिभलेख प्राप्त विकए, सिSसे उच्च न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों +े व्यवस्जिस्र्थी विकया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उच्च न्यायालय का वि+र्ण:य

28. विद+ांक 30 सिस ंबर 2010 को न्यायमूर्ति एस. यू. खा+, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: की पूर्ण: पीठ +े फ ै सला सु+ाया, Sो अपील में है। न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ और न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े विववाविद परिरसर क े संयुX *ारकों क े रूप में-मुस्जिस्लम, विहन्दू और वि+म ही अखाड़े '' ी+ों प्रकार क े पक्षकारों'' को अव*ारिर विकया और उ+में से प्रत्येक को प्रारंणिभक तिर्डक्री में एक ति हाई विहस्सा आवंविर्ट विकय. न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ +े वि+म्+खिलखिख प्रकार से अव*ारिर विकया: '' द+ुसार, ी+ों प्रकार क े पक्षकारों या+ी मुस्जिस्लम, हिंहदू और वि+म ही अखाड़ा को संपखित्त/परिरसर क े संयुX स्वत्व *ारकों क े विववाद में पूSा क े खिलए एक ति हाई विहस्से का उपयोग और प्रबं*+ कर+े क े खिलए वाद सं. 1 में न्यायालय द्वारा वि+युX प्लीर्डर/आयुX श्री णिशव शंकर लाल द्वारा वि+र्मिम +क्शा योS+ा-1 में ए बी सी र्डी ई एफ द्वारा वर्भिर्ण है। इस आशय का प्रारंणिभक तिर्डक्री पारिर की Sा ी है। हालांविक, आगे यह घोविष विकया गया विक क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे का विहस्सा Sहां व:मा+ में मूर्ति को मंविदर में रखा गया है अंति म तिर्डक्री में हिंहदुओं को आवंविर्ट विकया Sाएगा। आगे यह वि+द†णिश विकया गया विक वि+म ही अखाड़ा को उस विहस्से सविह वह विहस्सा आवंविर्ट विकया Sाएगा Sो शब्दों द्वारा उX मा+तिचत्र में राम चबू रा और सी ा रसोई को विदखाया गया है। हालांविक यह आगे स्पष्ट विकया गया है विक भले ही ी+ों पक्षों को एक ति हाई विहस्सा घोविष विकया गया हो परन् ु यविद समुतिच अंश आवंविर्ट कर े समय विहस्से में क ु छ मामूली समायोS+ विकया Sा+ा है ो वही mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sाएगा और प्रति क ू ल रूप से प्रभाविव पक्ष को क ें ˆ सरकार द्वारा अति*गृही की गई वि+कर्टव - भूविम क े क ु छ विहस्से को आवंविर्ट करक े मुआवज़ा विदया Sा सक ा है। पक्षकार ी+ मही+े क े भी र मेट्स और बाउंर्ड द्वारा वास् विवक विवभाS+ क े खिलए अप+े सुझाव दाखिखल कर+े क े खिलए स्व ंत्र हैं। मा++ीय मुख्य न्याया*ीश से आवश्यक वि+द†शों को प्राप्त कर अंति म तिर्डक्री ैयार कर+े क े खिलए कोई सुझाव/आवेद+ दाखिखल कर+े क े ुरं बाद सूचीबद्ध करें। इस्माइल फारूकी (1994(6) *ारा 360) क े सव च्च न्यायालय क े वि+र्ण:य क े अ+ुसार आS क प्रचखिल यर्थीास्जिस्र्थीति में इसक े सभी विववरर्ण में ी+ मही+े की अवति* क े खिलए ब+ाए रखा Sाएगा Sब क विक यह आदेश पूव: में संशोति* अर्थीवा खाली +हीं विकया Sा ा।" न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े भाग ः वाद सं. 1 और 5 की तिर्डक्री दी। वाद सं. 3 और 4 को सीमा द्वारा बाति* कर विदया गया र्थीा। विवद्वा+ न्याया*ीश +े वि+म्+खिलखिख वि+द†शों क े सार्थी वि+ष्कष: वि+काला: "4566... (i) यह घोविष विकया Sा ा है विक वह क्षेत्र, Sो ी+ गुंबदाकार ढांचे क े क े न्ˆीय गुंबद द्वारा आच्छाविद है, या+ी वह विववाविद ढांचा, भगवा+ राम Sन्म स्र्थीा+ और भगवा+ राम का Sन्म स्र्थील देव हो+े क े कारर्ण विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार वादी गर्ण (वाद-5) से सम्बस्जिन्* है और प्रति वादी गर्ण द्वारा उसमें कोई भी हस् क्षेप या व्यव*ा+ +ही विकया Sाएगा। इस क्षेत्र को इस वि+र्ण:य क े खिलए परिरणिशष्ट 7 में अक्षरों एए बीबी सीसी र्डीर्डी द्वारा विदखाया गया है। (ii) चूँविक परिरणिशष्ट 7 (उपरोX (i) क े सिसवाय) में बी सी र्डी एल क े Sे एच Sी द्वारा दशा:ए गए आं रिरक अहा े क े भी र का क्षेत्र दो+ों समुदायों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े सदस्यों का है या+ी विहन्दुओं (यहां वादीगर्ण, वाद-5) और मुसलमा+ों द्वारा इसका प्रयोग दशकों और श ास्जिब्दयों से विकया Sा रहा र्थीा। हालाँविक, यह स्पष्ट विकया गया है विक वादीगर्णों क े विहस्से क े उद्देश्य से, वाद-5 क े इस विदशावि+द†श ह Sो क्षेत्र (i) से आच्छाविद विकया गया है, उसे भी सस्जिम्मखिल विकया Sाएगा। (iii) बाह्य अहा े में राम चबू रा (परिरणिशष्ट 7 में ईई एफएफ SीSी एचएच) सी ा रसोई (परिरणिशष्ट 7 में एमएम ए+ए+ ओओ पीपी) और भंर्डार (परिरणिशष्ट 7 में आईआई SेSे क े क े एलएल) क े रूप में ढांचों द्वारा आच्छाविद क्षेत्र में वि+म ही अखाड़ा (प्रति वादी सं. 3) क े विहस्से में घोविष विकया गया है और वे विकसी व्यविX क े अभाव में कब्Sे में बेह र स्वत्व क े हकदार होंगे। (iv) चूँविक इसका उपयोग आम ौर पर हिंहदू व्यविXयों द्वारा दो+ों स्र्थीा+ों पर पूSा क े खिलए विकया Sा ा है इसखिलए बाह्य अहा े (परिरणिशष्ट 7 में ए Sी एच Sे क े एल ई एफ) (उपरोX (iii) द्वारा आच्छाद+ को छोड़कर) क े भी र खुले क्षेत्र को वि+म ही अखाड़ा (प्रति वादी सं. 3) और वादीगर्णों (वाद-5) द्वारा साझा विकया Sाएगा। (iv-क) हालांविक यह स्पष्ट विकया Sा ा है विक मुस्जिस्लम पक्षकारों का भाग परिरसर क े क ु ल क्षेत्रफल क े एक ति हाई (1/3) से कम +हीं होगा और यविद आवश्यक हो ो उसे बाहरी आंग+ का कु छ क्षेत्र विदया Sा सक े गा। यह भी स्पष्ट विकया Sा ा है विक मेट्स और बाउंर्ड द्वारा विवभाS+ कर े समय, यविद क ु छ मामूली समायोS+ विवणिभन्न पक्षों क े विहस्से क े संबं* में विकए Sा+े हैं, ो प्रभाविव पक्ष को उस क्षेत्र Sो भार सरकार क े अति*£हर्ण क े ह है उससे अपेतिक्ष भूविम को आवंविर्ट करक े मुआवज़ा विदया Sा सक ा है। (v) वह भूविम Sो भार सरकार क े पास उपलब्* है, Sो अयोध्या अति*वि+यम, 1993 क े अ*ी+ वे पक्षकार Sो संपखित्त क े बेह र उपभोग क े खिलए वाद में सफल हैं उ+को उपरोX संबंति* पक्षकारों को ऐसी रीति से उपलब्* कराई Sाएगी सिSससे विक सभी ी+ों पक्षकार उस क्षेत्र, सिSसक े वे हकदार हैं, का उपयोग एक-दूसरे क े अति*कारों में लोगों क े पृर्थीक ् वि+ग:म+ और प्रवेश क े खिलए वि+बा:* रूप से प्रविवविष्ट कर सक ें । इस प्रयोS+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े खिलए संबंति* पक्ष भार सरकार से संपक: कर सक े हैं Sो उपरोX वि+द†शों क े अ+ुसार काय: करेगा और र्डॉ. इस्माइल फारुकी (उपरोX) में शीष: न्यायालय क े वि+र्ण:य में भी वि+विह है। (vi) यर्थीापूव X (i से v) प्रभाव क े खिलए भाग ः प्रारंणिभक और भाग ः अंति म तिर्डक्री पारिर की गयी है। सूर्ट -5 भाग क े खिलए उपरोX सीमा क तिर्डक्री की गई है। विवशेष काया:ति*कारी, लख+ऊ में अयोध्या बेंच अर्थीवा रसिSस्र्ट्रार, लख+ऊ बेंच को, Sैसा भी मामला हो, इस आशय का एक आवेद+ प्रस् ु करक े मेट्स और बाउंर्ड द्वारा वि+द†णिश रीक े से विववाद में संपखित्त क े वास् विवक विवभाS+ क े खिलए अप+े सुझाव दS: कर+े क े खिलए स्व ंत्र हैं। (vii) ी+ माह की अवति* क े खिलए अर्थीवा Sब क अन्यर्थीा वि+देश + विदया Sाए, Sो भी पूव: र हो, पक्षकार विववाद में संपखित्त क े बाब आS क यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रखेंगे ” न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: +े वाद 5 को इसक े संपूर्ण: ा में तिर्डक्री विकया र्थीा। वाद 3 और 4 को सीमारेखा द्वारा बाति* कर े हुए खारिरS कर विदया गया र्थीा। न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: +े यह वि+ष्कष: वि+काला: "वादी का वाद तिर्डक्री विकया गया है, लेविक+ सामान्य लाग क े सार्थी। इसक े द्वारा यह घोविष विकया Sा ा है विक अयोध्या में श्री राम Sन्मभूविम का पूरा परिरसर Sैसा विक वाद क े संलग्नक सं. 1 और 2 में वर्भिर्ण वादी सं. 1 और 2 क े देव ा हैं।प्रति वादीगर्णों को स्र्थीाई रूप से संदर्भिभ स्र्थील पर राम Sन्म भूविम अयोध्या में मंविदर क े वि+मा:र्ण में विकसी भी रह की आपखित्त कर+े अर्थीवा विकसी भी रह की आपखित्त कर+े या बा*ा र्डाल+े से रोक विदया Sा ा है।" पक्षकारों +े उच्च न्यायालय क े फ ै सले क े विवरूद्ध इस न्यायालय क े समक्ष कई सिसविवल अपील और विवशेष अ+ुमति यातिचकाओं को प्रार्थीविमक ा दी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस न्यायालय क े समक्ष काय:वाही

29. विद+ांक 9 मई 2011 को, इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की बेंच +े कई अपील स्वीकार विकया और इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य और तिर्डक्री क े संचाल+ पर रोक लगा दी। अपील क े लंब+ क े दौरा+, पक्षकारों को इस्माइल फारुकी मामले में Sारी वि+द†शों क े अ+ुसार विववाविद परिरसर क े संबं* में यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रख+े क े खिलए वि+द†णिश विकया गया र्थीा। अणिभलेखागार को पक्षकारों को तिर्डसिSर्टल रिरकॉर्ड: की इलेक्र्ट्रॉवि+क प्रति यां प्रदा+ कर+े क े खिलए वि+द†णिश विकया गया र्थीा।

30. विद+ांक 10 सिस ंबर 2013, 24 फरवरी 2014, 31 अक्र्टूबर 2015 और 11 अगस् 2017 को, इस न्यायालय +े इलाहाबाद उच्च न्यायालय से साक्ष्य और कÂ का तिर्डसिSर्टल रिरकॉर्ड: और पक्षकारों को अ+ुवाविद प्रति यां प्रस् ु कर+े का सम्म+ कर े हुए वि+द†श Sारी विकए। विद+ांक 10 अगस् 2015 को, इस न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों की बेंच +े कविमश्नर, फ ै Sाबाद तिर्डवीS+ को अस्र्थीाई ढाँचे पर पुरा+ी ति रपाल को बदल+े की अ+ुमति दी, सिSसक े ह मूर्ति यों को एक ही आकार और गुर्णवत्ता की +ई चादर क े सार्थी रखा गया र्थीा।

31. विद+ांक 5 विदसंबर 2017 को, इस न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों की बेंच +े इस दलील को खारिरS कर विदया विक इस्माइल फारुकी क े मामले में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संविव*ा+ पीठ क े क ु छ अवलोक+ों क े दृविष्टग आक्षेविप वि+र्ण:य क े विवरूद्ध यातिचका को वृहद पीठ में भेSा Sा+ा चाविहए। विद+ांक 14 माच: 2018 को, ी+ न्याया*ीशों की बेंच +े कÂ को सु+ा विक इस्माइल फारुकी क े वि+र्ण:य पर पु+र्मिवचार कर+े की आवश्यक ा है अर्थीवा +हीं।विद+ांक 27 सिस ंबर 2018 को, 2:1 क े बहुम से इस न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों की बेंच +े पु+र्मिवचार क े खिलए इस्माइल फारुकी क े मामले में वि+र्ण:य को संदर्भिभ कर+े से इ+कार कर विदया और सु+वाई क े खिलए आक्षेविप +र्ण:य क े विवरूद्ध यातिचका को सूचीबद्ध विकया।

32. प्रशासवि+क आदेश 8 S+वरी 2019 विद+ांविक द्वारा सव च्च न्यायालय वि+यमावली, 2013 क े आदेश VI वि+यम 1 क े प्राव*ा+ों क े अ+ुसार, भार क े मुख्य न्याया*ीश +े अपील की सु+वाई क े खिलए पांच न्याया*ीशों की बेंच का गठ+ विकया। विद+ांक 10 S+वरी 2019 को, रसिSस्र्ट्री को अणिभलेखों का वि+रीक्षर्ण कर+े क े खिलए वि+द†णिश विकया गया र्थीा और यविद आवश्यक हो, ो आति*कारिरक अ+ुवादकों को संलग्न करें। विद+ांक 26 फरवरी 2019 को, इस न्यायालय +े अपील में उठाए गए मुद्दों को एक स्र्थीायी समा*ा+ ला+े की संभाव+ा का प ा लगा+े क े खिलए वि+युX और वि+गरा+ी क े खिलए पक्षकारों को संदर्भिभ विकया। विद+ांक 8 माच: 2019 को (i)न्यायमूर्ति फकीर मोहम्मद इब्राविहम कलीफ ु ल्ला, इस न्यायालय क े पूव: न्याया*ीश (ii) श्री श्री रविव शंकर; और (iii) श्रीराम पान्चू, वरिरष्ठ अति*वXा सविह मध्यस्र्थीों का एक पै+ल का गठ+ विकया गया र्थीा।मध्यस्र्थी ा की काय:वाही को पूर्ण: कर+े क े खिलए मध्यस्र्थीों को विदए गए समय को विद+ांक 10 मई 2019 क बढ़ाया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीा। विद+ांक 2 अगस् 2019 को कोई समझौ ा +हीं हुआ र्थीा, अपील की सु+वाई विद+ांक 6 अगस् 2019 से प्रारम्भ हो+े क े खिलए वि+द†णिश की गई र्थीी। सु+वाई क े दौरा+, मध्यस्र्थीों क े पै+ल द्वारा एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की गई र्थीी विक क ु छ पक्षकार विववाद को वि+पर्टा+े क े खिलए इच्छ ु क र्थीे। इस न्यायालय +े अप+े आदेश 18 सिस ंबर 2019 विद+ांविक से यह अवलोविक विकया विक Sब सु+वाई आगे बढ़ेगी ो यविद कोई पक्षकार विववाद को वि+पर्टा+े की इच्छा रख े हैं ो उ+क े खिलए इस न्यायालय क े समक्ष मध्यस्र्थीों को स्र्थीा+ां रिर कर+ा और समझौ ा कर+ा खुला र्थीा, यविद यह आया र्थीा। विद+ांक 16 अक्र्टूबर 2019 को अपीलों क े समूह में अंति म क: विदए गए। उसी विद+, मध्यस्र्थी ा पै+ल +े “सविमति की अंति म रिरपोर्ट:” शीष:क से एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की सिSसमें कहा गया र्थीा विक व:मा+ विववाद क े खिलए कु छ पक्षकारों द्वारा एक समझौ ा विकया गया र्थीा। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े अध्यक्ष श्री Sुफ़र अहमद फारुकी द्वारा इस समझौ े पर हस् ाक्षर विकए गए र्थीे। यद्यविप समझौ े क े ह सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: विववाविद भूविम पर अप+े सभी अति*कारों, विह ों और दावों को त्याग+े क े खिलए सहम हो गया, यह अ+ुबस्जिन्* क ु छ श Â की पूर्ति क े अ*ी+ र्थीा। मध्यस्र्थी ा पै+ल से इस न्यायालय द्वारा प्राप्त वि+पर्टा+ समझौ े को व:मा+ विववाद क े खिलए सभी पक्षकारों द्वारा सहम अर्थीवा हस् ाक्षरिर +हीं विकया गया है। इसक े अलावा, यह क े वल क ु छ श Â को पूरा कर+े पर सश: है। इसखिलए, समझौ े को विववाद क े खिलए पक्षकारों क े बीच सश: अर्थीवा वि+तिश्च अ+ुबं* +हीं मा+ा Sा सक ा है। हालांविक, हम इस न्यायालय द्वारा सौंपे गए काय: को प्रारम्भ कर+े में मध्यस्र्थी ा पै+ल क े सदस्यों द्वारा विकए गए ईमा+दार प्रयासों की सराह+ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर े हैं। एक स्व ंत्र और स्पष्ट संवाद क े खिलए एक सामान्य मंच पर विववादों को एक सार्थी ला+े में, मध्यस्र्थीों +े एक काय: विकया है सिSसकी सराह+ा कर+े की आवश्यक ा है। हम उ+ पक्षकारों की भी सराह+ा कर े हैं सिSन्हों+े मध्यस्र्थी ा की काय:वाही को आगे बढ़ा+े का प्रयास विकया।

33. इस न्यायालय क े समक्ष पक्षकारों क े विवणिभन्न कÂ की Sांच कर+े से पूव:, हम सव:प्रर्थीम प्रविक्रयात्मक इति हास, मूलभू दावों और राह में इस न्यायालय क े समक्ष ी+ वादों की दलीलों में प्रार्थी:+ा की गई। वाद 1-ओओएस सं. 1/ 1989 (सामान्य वाद 2/1950)

34. यह वाद विद+ांक 13 S+वरी, 1950 को अयोध्या क े वि+वासी गोपाल सिंसह विवशारद द्वारा 'स+ा + *म: क े अ+ुयायी' क े रूप में अप+ी क्षम ा क े अ+ुसार गविठ विकया र्थीा:

(i) Sन्मभूविम मंविदर में वि+बा:* "*म: और प्रर्थीा क े अ+ुसार" भगवा+ राम क े दश:+ और पूSा कर+े क े खिलए अप+े हक की घोषर्णा; और (ii) एक स्र्थीायी और शाश्व वि+षे*ाज्ञा प्रति वादी सं. 1 से 10 को मूर्ति यों की ओर Sा+े वाले रास् े को बंद कर+े अर्थीवा पूSा और दश:+ में हस् क्षेप कर+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और उस स्र्थीा+ से देव ा और अन्य मूर्ति यों को हर्टा+े से रोक ी है, Sहां वे स्र्थीाविप विकए गए र्थीे। प्रति वादी सं. 1 से 5 अयोध्या क े मुस्जिस्लम वि+वासी हैं; प्रति वादी सं. 6 उत्तर प्रदेश राज्य का है; प्रति वादी सं. 7 फ ै Sाबाद का उपायुX है; प्रति वादी सं. 8 फ ै Sाबाद का अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट, है; प्रति वादी सं. 9 फ ै Sाबाद का पुखिलस अ*ीक्षक, है; प्रति वादी सं. 10 सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: से और प्रति वादी सं. 11 वि+म ही अखाड़े से सम्बस्जिन्* है। वाद 1 में वादी का मामला यह है विक अयोध्या क े वि+वासी क े रूप में वे "Sन्मभूविम क े उस स्र्थीा+ पर" भगवा+ राम की मूर्ति और चरर्ण पादुका (पद छाप) की पूSा कर रहे र्थीे। वाद में वर्भिर्ण 'विववाविद स्र्थील' की सीमाएँ इस प्रकार हैं: "विववाविद स्र्थील पूव:: राम Sन्म भूविम का चबू रा और कोषागार पतिश्चम:पर ी उत्तर: सी ा रसोई दतिक्षर्णः पर ी” वाद 1 क े खिलए कार:वाई की वSह विद+ांक 14 S+वरी 1950 को उत्पन्न हुआ र्थीा, Sब सरकार क े कम:चारिरयों पर आरोप लगाया गया विक वे वादी को "स्र्थील क े अंदर Sा+े से" और उ+क े पूSा कर+े क े अति*कार का प्रयोग कर+े से अवै* रूप से रोका र्थीा। यह आरोप लगाया गया र्थीा विक “राज्य” +े प्रति वादी सं. 1 से 5 द्वारा प्रति वि+ति*त्व विकए गए मुस्जिस्लम वि+वासिसयों क े इशारे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर इस कार:वाई को अंगीक ृ विकया,सिSसक े परिरर्णामस्वरूप हिंहदुओं को उ+क े “पूSा क े न्यायसंग अति*कार” से वंतिच विकया गया र्थीा। वादी +े स्वीकार विकया विक भगवा+ राम की मूर्ति सविह मूर्ति यों को हर्टा विदया Sाएगा। ये काय:वाविहयां ''वादी क े अति*कार और स्वत्व पर प्रत्यक्ष आक्रमर्ण'' कर+े का अणिभकर्थी+ विकया गया र्थीा और यह कहा गया र्थीा विक यह का+ू+ क े विवपरी "दम+कारी क ृ त्य" है.

35. वाद में वि+विह आरोपों से इ+कार कर े हुए, प्रति वादी सं. 1 से 5 +े अप+े खिलखिख बया+ों में यह कहा विक: (i) वह संपखित्त, सिSसक े संबं* में मामला संस्जिस्र्थी विकया गया है, Sन्मभूविम +हीं है विकन् ु सम्रार्ट बाबर द्वारा ब+ाई गई मस्जिस्Sद है। मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण वष: 1528 में मुगल सम्रार्ट बाबर क े वि+द†शों पर उसक े उप-महाद्वीप पर विवSय पा+े क े बाद मीर बाकी +े विकया, Sो बाबर की से+ा का कमांर्डर र्थीा। (ii) मस्जिस्Sद को मुसलमा+ों क े खिलए वक्फ क े रूप में समर्मिप विकया गया र्थीा, सिSन्हें वहां प्रार्थी:+ा कर+े का अति*कार है। सम्रार्ट बाबर +े मस्जिस्Sद क े रख- रखाव और खच: क े खिलए वार्मिषक अ+ुदा+ विदया, सिSसे अव* क े +वाब और विब्रविर्टश सरकार +े Sारी रखा और उसे परिरष्क ृ विकया। (iii) 1885 का वाद क े वल रामचबू रे क े संबं* में महं रघुबर दास द्वारा स्वाविमत्व की घोषर्णा क े खिलए र्थीा अ ः यह दावा है विक संपूर्ण: भव+ का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रति वि+ति*त्व S+मस्र्थीा+ क े खिलए वि+रा*ार र्थीा। विद+ांक 24 विदसंबर, 1885 को वाद खारिरS हो+े क े परिरर्णामस्वरूप, ''चबू रे से संबंति* मामले को स्वीकार +हीं विकया गया र्थीा''; (iv) उत्तर प्रदेश मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम, 1936 क े ह वि+युX मुख्य आयुX वक्फ +े मस्जिस्Sद को सुन्नी वक्फ अणिभवि+*ा:रिर विकया र्थीा; (v) मस्जिस्Sद का कब्Sा सदैव मुस्जिस्लमों का पास में ही रहा है। यह स्जिस्र्थीति वष: 1528 में आरंभ हुई और उसक े पश्चा ् भी Sारी रही और परिरर्णामस्वरूप “ प्रति क ू ल कब्Sे क े रूप में....उस संपखित्त का कब्Sा मुस्जिस्लमों क े पास में है”; प्रति वादी सं. 1 से 5 अयोध्या क े मुस्जिस्लम वि+वासी हैं; प्रति वादी सं. 6 उत्तर प्रदेश राज्य का है; प्रति वादी सं. 7 फ ै Sाबाद का उपायुX है; प्रति वादी सं. 8 फ ै Sाबाद का अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट, है; प्रति वादी सं. 9 फ ै Sाबाद का पुखिलस अ*ीक्षक, है; प्रति वादी सं. 10 सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: से और प्रति वादी सं. 11 वि+म ही अखाड़े से सम्बस्जिन्* है। (vi) बाबरी मस्जिस्Sद में सिSस हिंबदु पर क े न्ˆीय गुंबद क े +ीचे कोई प्रति मा +हीं र्थीी वहां विद+ांक 16 विदसंबर, 1949 क +माज़ अदा की गई र्थीी। यविद विकसी व्यविX +े मस्जिस्Sद क े अंदर विकसी मूर्ति को दुभा:व+ापूर्ण: आशय से स्र्थीाविप विकया ो ''मस्जिस्Sद का अप्रति ष्ठा Sाविहर है और अणिभयुX व्यविXय अणिभयोसिS हो+े का उत्तरदायी है;'' mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) पूSा कर+े क े खिलए अर्थीवा दश:+ हे ु मस्जिस्Sद में प्रवेश कर+े क े खिलए वादी या विकसी अन्य व्यविX का कोई भी प्रयास विवति* का अति क्रमर्ण होगा। सीआरपीसी 1898 की *ारा 145 क े ह काय:वाही प्रारम्भ की गई र्थीी; और (viii) बाबरी मस्जिस्Sद को Sन्मस्र्थीा+ क े स्र्थील क े रूप में दावा कर+े वाला व:मा+ वाद वि+रा*ार है, काफी लंबे समय क, भगवा+ राम एवं अन्य की मूर्ति यों वाला एक अन्य मंविदर, Sो भगवा+ राम क े Sन्मस्र्थीा+ का वास् विवक स्र्थीा+ है। राज्य, प्रति वादी सं. 6 द्वारा खिलखिख बया+ दायर विकया गया र्थीा, सिSसमें वि+म्+खिलखिख कर्थी+ प्रस् ु विकया गया: (i) वाद की संपखित्त सिSसे बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ा Sा ा है, मुस्जिस्लमों द्वारा लंबे समय क मस्जिस्Sद का इबाद क े प्रयोS+ार्थी: प्रयोग विकया गया और उसका उपयोग भगवा+ राम क े मंविदर क े रूप में +हीं विकया गया है; (ii) विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 की रा को भगवा+ राम की मूर्ति यों को मस्जिस्Sद क े भी र लोक विह और शांति क े खिलए स्र्थीाविप विकया गया। विद+ांक 23 विदसंबर 1949 को, सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट +े सीआरपीसी 1898 की *ारा 144 क े ह एक आदेश पारिर विकया, सिSससे विववाविद संपखित्त को कु क: कर े हुए *ारा 145 क े ह अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा पारिर समा+ ति णिर्थी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का आदेश विदया गया। ये आदेश साव:Sवि+क शांति ब+ाए रख+े क े खिलए पारिर विकए गए र्थीे; और (iii) सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट +े संपखित्त क े प्राप क े रूप में श्री विप्रया दत्त राम को +गरपाखिलका बोर्ड:, फ ै Sाबाद-सह-अयोध्या का अध्यक्ष वि+युX विकया। इसी प्रकार का खिलखिख कर्थी+ अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट प्रति वादी सं. 8, और पुखिलस अ*ीक्षक प्रति वादी सं. 9, द्वारा दायर विकए गए र्थीे। प्रति वादी सं. 10, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े अप+ा खिलखिख कर्थी+ दS: कराया सिSसमें कहा गया विक: (i) विववाविद भव+ भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ +हीं है और इसमें कोई प्रति माएं कभी स्र्थीाविप +हीं की गई ं; (ii) वाद की संपखित्त में एक मस्जिस्Sद र्थीी सिSसे सम्रार्ट बाबर क े शास+-काल क े दौरा+ वि+र्मिम बाबरी मस्जिस्Sद कहा Sा ा र्थीा, सिSन्हों+े इसक े रखरखाव और खच: हे ु वार्मिषक अ+ुदा+ विदया र्थीा और उन्हें अव* और विब्रविर्टश सरकार क े +वाब द्वारा स और परिरष्क ृ विकया गया र्थीा। (iii) विद+ांक 22-23 विदसंबर, 1949 की रा को मूर्ति यां गुप्त रूप से मस्जिस्Sद में लाई गई ं; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) वष: 1528 से विद+ांक 29 विदसंबर 1949 को *ारा 145 क े ह मस्जिस्Sद क े क ु क— की ति णिर्थी क मस्जिस्Sद क े वल मुस्जिस्लमों क े कब्Sे में रहा र्थीा। उन्हों+े वि+यविम रूप से 21 विदसंबर, 1949 क इबाद और विद+ांक 16 विदसंबर, 1949 क शुक्रवार की +माS अदा की। (v) मस्जिस्Sद में वक्फ का गुर्ण र्थीा और उसका स्वाविमत्व ईश्वर में वि+विह र्थीा; (vi) वादी को महं रघुबर दास (वादी को पूव:व - हो+े का वर्भिर्ण विकया गया र्थीा) द्वारा संस्जिस्र्थी 1885 क े वाद क े रूप में मस्जिस्Sद को भगवा+ राम की Sन्मभूविम क े रूप में दावा कर+े से रोक विदया गया र्थीा सिSसको क े वल मस्जिस्Sद क े बाहर सत्रह x इक्कीस फीर्ट +ाप े हुए रामचबू रा क सीविम कर विदया गया र्थीा। (vii) वहाँ पहले से ही एक राम Sन्मस्र्थीा+ मंविदर मौSूद र्थीा, Sो बाबरी मस्जिस्Sद से र्थीोड़ी दूरी पर है। प्रति वादी सं. 1 से 5 क े खिलखिख बया+ क े खिलए वादी क े प्रत्युत्तर में, यह दावे क े सार्थी कहा गया र्थीा विक वष: 1934 से विववाविद स्र्थील का कभी भी मस्जिस्Sद क े रूप में उपयोग +हीं विकया गया है। आगे कहा गया र्थीा विक यह "साव:Sवि+क ज्ञा+" र्थीा Sो हिंहदुओं क े +ैति क प्रक ृ ति द्वारा स रूप से अति*कार में है, सिSससे प्रति वाविदयों का दावा समाप्त हो गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाद 3-ओओएस सं. 3/1989 (सामान्य वाद सं. 26/1959)

36. यह वाद विद+ांक 17 विदसंबर 1959 को महं Sग दास क े माध्यम से वि+म ही अखाड़ा द्वारा Sन्मभूविम मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार से प्राप को हर्टा+े और वादी को प्रदा+ कर+े क े खिलए एक तिर्डक्री की मांग कर े हुए दायर की गई र्थीी। वाद 3 में प्रति वादी सं. 1 प्राप है; प्रति वादी सं. 2 उत्तर प्रदेश राज्य है; प्रति वादी सं. 3 उपायुX, फ ै Sाबाद है; प्रति वादी सं. 4 सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट, फ ै Sाबाद है; प्रति वादी सं. 5 पुखिलस अ*ीक्षक, फ ै Sाबाद है; प्रति वादी सं. 6 से 8 अयोध्या क े मुस्जिस्लम वि+वासी हैं; प्रति वादी सं. 9 सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: है और प्रति वादी सं. 10 उमेश चंˆ पांर्डे हैं। वाद हे ुक विद+ांक 5 S+वरी 1950 को उत्पन्न हुआ र्थीा Sब Sन्मभूविम मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार को सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा हर्टा विदया गया र्थीा और प्राप को सुपुद: विकया गया र्थीा। वि+म ही अखाड़ा +े क: विदया विक: (i) अयोध्या में, "प्राची+ काल से" विवद्यमा+ प्राची+ मठ या अखाड़ा या रामा+ंदी बैराविगयों क े अखाड़ा वि+म ही कहला े हैं। यह साव:Sवि+क प्रकृ ति का एक *ार्मिमक संस्र्थीा+ है; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

(ii) Sन्मस्र्थीा+, सामान्य ः सिSसे Sन्मभूविम क े रूप में Sा+ा Sा ा है Sो विक भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है और Sो हमेशा वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रबंति* विकया Sा ा है;

(iii) Sन्मस्र्थीा+ प्राची+ म से प्राची+ है Sो विक रेखातिचत्र में ए बी सी र्डी अक्षरों द्वारा दर्भिश चहारदीवारिरयों क े भी र स्जिस्र्थी है Sो उस वाद में संलग्न है सिSसमें ई एफ Sी क े पी ए+ एम एल ई अक्षरों द्वारा तिचवि- "मंविदर भव+" है। ई एफ Sी एच आई Sे क े एल ई अक्षरों द्वारा वि+रूविप इमार मुख्य Sन्मभूविम मंविदर है, Sहां लक्ष्मर्ण, ह+ुमा+ और साखिलगराम क े सार्थी भगवा+ राम की मूर्ति यां स्र्थीाविप की गई हैं। मंविदर का वि+मा:र्ण वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में है और क े वल हिंहदुओं को मंविदर में प्रवेश कर+े और पैसे, विमठाईयाँ, फ ू ल और फल Sैसे अ+ुष्ठा+ कर+े की अ+ुमति दी गई है। इस प्रकार वि+म ही अखाड़ा अप+े पुSारिरयों क े माध्यम से अ+ुष्ठा+ों को £हर्ण कर ा है। (iv) वि+म ही अखाड़ा बैराविगयों क े रामा+ंदी पंर्थी का एक पंचाय ी मठ है Sो एक *ार्मिमक संप्रदाय है। 19 माच:, 1949 विद+ांविक को वि+म ही अखाड़ा क े रीति -रिरवाSों को पंSीक ृ विवलेख द्वारा खिलखे गए। (v) वि+म ही अखाड़ा कई मंविदरों का स्वाविमत्व और प्रबं*+ कर ा है; (vi) वष: 1934 से विकसी मुस्जिस्लम को मंविदर भव+ में प्रवेश कर+े की अ+ुमति +हीं दी गई; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) दंर्ड प्रविक्रया संविह ा 1898 की *ारा 145 क े उपबं*ों क े अ*ी+ काय: कर े हुए, सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट +े मुख्य मंविदर और उसमें सभी लेखों को विद+ांक 5 S+वरी, 1950 को प्रर्थीम प्रति वादी क े प्रभार में प्राप क े रूप में रखा। परिरर्णामस्वरूप, वाविदयों को गल रीक े से मंविदर क े प्रबं*+ और आरोप से वंतिच विकया गया है।

37. अयोध्या क े मुस्जिस्लम वि+वासी प्रति वादी सं. 6 से 8 की ओर से दायर खिलखिख कर्थी+ में कहा गया र्थीा विक वष: 1528 में सम्रार्ट बाबर द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा और इसे वक्फ क े रूप में गविठ विकया गया र्थीा, सिSसमें मुस्जिस्लमों को इबाद कर+े का प्रस् ाव विकया गया र्थीा। इसक े अति रिरX, वि+म्+खिलखिख क: प्रस् ु विकया गया: (i) वष: 1885 का वाद रघुबर महं दास द्वारा रामचबू रे क ही सीविम र्थीा और उप-न्याया*ीश फ ै Sाबाद द्वारा उसे खारिरS कर विदया गया र्थीा; (ii) मस्जिस्Sद की संपखित्त उ.प्र. मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम 1936 क े ह वक्फ क े रूप में गविठ की गई र्थीी; (iii) वष: 1528 से मस्जिस्Sद का कब्Sा लगा ार मुस्जिस्लमों क े पास ही रहा है सिSसक े परिरर्णामस्वरूप वाविदयों क े समस् अति*कार समाप्त कर विदये गए; (iv) मस्जिस्Sद क े पूव- और उत्तरी विक+ारों पर मुस्जिस्लम कब्रें हैं; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) विद+ांक 16 विदसंबर, 1949 क संपखित्त में लगा ार +माS अदा की गई र्थीी और यविद कोई मूर्ति स्र्थीाविप की गई है ो मस्जिस्Sद की प्रकृ ति +हीं बदल Sाएगी; और (vi) एक अन्य मंविदर अयोध्या में है सिSसे भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ मंविदर कह े हैं Sो काफी समय से अस्जिस् त्व में है। विद+ांक 6 विदसंबर, 1992 को इस प्रकर्थी+ को शाविमल कर+े क े खिलए वाद में संशो*+ विकया गया विक ''मुख्य मंविदर को क ु छ असामासिSक त्वों +े ध्वस् कर विदया, सिS+क े पास कोई *म:, Sाति या संप्रदाय +हीं र्थीा''। वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रति वादी सं. 6 से 8 क े संयुX खिलखिख बया+ में दायर प्रति क ृ ति में, एक अलग Sन्मस्र्थीा+ मंविदर क े अस्जिस् त्व से इ+कार कर विदया गया र्थीा। यह कहा गया विक Sन्मस्र्थीा+ मंविदर Sन्मभूविम मंविदर क े उत्तर में स्जिस्र्थी है। प्रति वादी सं. 9 द्वारा सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा आरोपों से इ+कार कर े हुए वाद में एक खिलखिख बया+ दायर विकया गया र्थीा। प्रति वादी सं. 10, उमेश चंˆ पांर्डे द्वारा दायर खिलखिख बया+ में, वि+म्+खिलखिख क: प्रस् ु विकया गया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

(i) Sन्मस्र्थीा+ "पूSा का एक पविवत्र स्र्थीा+" है और लंबे समय क श्री राम लला विवराSमा+ क े देव ा का है। देव ा क े पास मंविदर का स्वाविमत्व है। राम Sन्मभूविम क े प्रमुख देव ा भगवा+ राम हैं। (ii) वि+म ही अखाड़ा +े Sन्मस्र्थीा+ को कभी प्रबंति* +हीं विकया; (iii) वष: 1857 में, विब्रविर्टश सरकार +े एक आं रिरक बाड़ा ब+ाकर और उसक े भी र की चहारदीवारी को मस्जिस्Sद क े रूप में वर्भिर्ण करक े इमार को विवभासिS कर+े का प्रयास विकया, लेविक+ कोई भी "सच्चे मुस्जिस्लम" वहाँ इबाद +हीं कर सक ा र्थीा; (iv) कसौर्टी स् ंभों और देवी देव ाओं क े उत्कीर्ण:+ों की उपस्जिस्र्थीति से संक े विमल ा है विक स्र्थील का उपयोग प्रार्थी:+ा क े खिलए “सच्चे मुस्जिस्लम” द्वारा +हीं विकया Sा सक ा है; (v) वस् ु ः वह स्र्थीा+ ऐसे विहन्दू मंविदर द्वारा अवरुद्ध र्थीा सिSसमें उस देव ा की पूSा हुई र्थीी; (vi) वि+म ही अखाड़ा का वाद स+् 1959 में संस्जिस्र्थी विकए गए परिरसीमा द्वारा बाति* र्थीा, यद्यविप वाद हे ुक विद+ांक 5 S+वरी, 1950 को उत्पन्न हुआ; और (vii) वि+म ही अखाड़ा *ारा 145 क े ह काय:वाही में शाविमल +हीं हुआ और + ही उन्हों+े अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेश क े विवरूद्ध कोई पु+रीक्षर्ण दायर विकया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+म ही अखाड़ा *ारा 145 क े ह काय:वाविहयों में सस्जिम्मखिल +हीं हुआ और + ही उन्हों+े अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेश क े विवरुद्ध पु+रीक्षर्ण फाइल विकया। वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रति वादी सं. 10 को खिलखिख बया+ में दायर प्रति क ृ ति में, संप्रदाय की स्र्थीाप+ा का एक विवस् ृ विववरर्ण र्थीा। सा वीं श ाब्दी ईसवी क े शंकराचाय: की परंपरा क े बाद, रामा+ुSचाय: और बाद में रामा+ंद द्वारा मठ को स्र्थीाविप कर+े की प्रर्थीा का पाल+ विकया गया। रामा+ंद +े वैष्र्णव क े एक पंर्थी स्र्थीाविप विकया सिSसे 'रामत्स' कहा Sा ा है, Sो भगवा+ राम की पूSा कर े हैं। रामा+ंदी पंर्थी क े बैराविगयों क े आध्यास्जित्मक गुरूओं +े ी+ 'अतिन्नस' +ाम ः (i) वि+म ही; (ii) विदगंबर; और (iii) वि+वा:र्णी अखाड़ों की स्र्थीाप+ा की। ये अखाड़े पंचाय ी मठ हैं। वि+म ही अखाड़ा का राम Sन्मस्र्थीा+ मंविदर पर स्वाविमत्व है, Sो भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ से संबंति* है। *ारा 145 क े ह काय:वाही प्रारम्भ हो+े क बाह्य बाड़े का स्वाविमत्व और प्रबं*+ वि+म ही अखाड़ा द्वारा विकया गया र्थीा। वाद 4-ओओएस 4/1989 (सामान्य वाद सं. 12/1961)

38. विद+ांक 18 विदसंबर, 1961 को सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और अयोध्या क े +ौ मुस्जिस्लम वि+वासिसयों द्वारा वाद 4 की संस्जिस्र्थी की गई र्थीी। यह प्रकर्थी+ विकया गया है विक सीपीसी क े आदेश 1 वि+यम 8 क े ह एक आवेद+ क े सार्थी संपूर्ण: मुस्जिस्लम समुदाय की ओर से वाद की स्र्थीाप+ा की गई है। संशोति* क े रूप में, वाद में वि+म्+खिलखिख राह ें मांगी गई हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "(a) इस आशय की एक घोषर्णा यह है विक संपखित्त से Sुड़े रेखातिचत्र में अक्षरों ए बी सी र्डी से इंविग संपखित्त साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है, सिSसे आम ौर पर "बाबरी मस्जिस्Sद" क े +ाम से Sा+ा Sा ा है और यह विक मस्जिस्Sद से सर्टी हुई भूविम में एक साव:Sवि+क मुस्जिस्लम कविब्रस् ा+ है Sो रेखातिचत्र में अक्षरों ई क े Sी एच से दशा:ए गए पैरा 2 में तिर्डक्री की Sा सक ी है। (b) यह विक न्यायालय की राय में कब्Sे क े परिरदा+ को उतिच उपचार समझा Sा ा है ो उ+ मूर्ति यों और अन्य लेखों को, सिSन्हें हिंहदू मस्जिस्Sद में रख सक े हैं, हर्टाकर वाद में मस्जिस्Sद और कविब्रस् ा+ क े कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए एक तिर्डक्री प्रति वाविदयों क े विवरुद्ध वादी क े पक्ष में पारिर की Sा+ी चाविहए। (bb) यह विक वै*ावि+क प्राप को उस पर ब+ाए गए अ+ति*क ृ ढांचों को हर्टाकर वाद की अ+ुसूची 'क' में वर्भिर्ण विववाविद संपखित्त को सौंप+े का आदेश विदया Sाएगा।" [+ोर्ट: प्रार्थी:+ा (bb) उच्च न्यायालय क े आदेश 25 मई, 1995 विद+ांविक क े अ+ुसरर्ण में वाद में संशो*+ द्वारा की गइ: र्थीी]। वाद 4 में प्रति वादी सं. 1 गोपाल सिंसह विवशारद हैं; प्रति वादी सं. 2 राम चंˆ दास परम हंस हैं; प्रति वादी सं. 3 वि+म ही अखाड़ा हैं, प्रति वादी सं. 4 महं रघु+ार्थी दास हैं; प्रति वादी सं. 5 उ.प्र. राज्य हैं; प्रति वादी सं. 6 कलेक्र्टर, फ ै Sाबाद हैं; प्रति वादी सं. 7 सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट, फ ै Sाबाद हैं; प्रति वादी सं. 8 फ ै Sाबाद की पुखिलस अ*ीक्षक हैं; प्रति वादी सं. 9 विप्रयादत्त राम हैं; प्रति वादी सं. 10 अध्यक्ष, अखिखल भार हिंहदू महासभा हैं; प्रति वादी सं. 13 *रम दास हैं; प्रति वादी सं. 17 रमेश चंˆ वित्रपाठी हैं; और प्रति वादी सं. 20 मद+ मोह+ गुप्ता हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह वाद इस प्रकर्थी+ पर आ*ारिर है विक अयोध्या में एक प्राची+ ऐति हासिसक मस्जिस्Sद है सिSसे आम ौर पर बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में Sा+ा Sा ा है, सिSसका वि+मा:र्ण 433 वष: पूव: बाबर +े भार पर विवSय प्राप्त कर+े और उसक े राज्य क्षेत्रों पर अति*पत्य कर+े क े पश्चा विकया र्थीा। यह मा+ा गया है विक मस्जिस्Sद को सामान्य रूप से मुस्जिस्लमों क े इबाद क े स्र्थील क े रूप में और *ार्मिमक समारोहों क े प्रदश:+ क े खिलए ब+ाया गया र्थीा। मस्जिस्Sद क े मुख्य वि+मा:र्ण को अक्षरों ए बी सी र्डी द्वारा वर्भिर्ण विकया गया है Sो विक वाद पर +क्शे को संलग्न विकया गया है। सर्टी हुई भूविम एक कविब्रस् ा+ है। वादी क े अ+ुसार, मस्जिस्Sद और कविब्रस् ा+ दो+ों ईश्वर में वि+विह है और मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े बाद से मुस्जिस्लमों द्वारा +माS अदा कर+े क े खिलए Sबविक कविब्रस् ा+ को दफ+ा+े क े खिलए इस् ेमाल विकया गया है। वाद में कणिर्थी है विक मस्जिस्Sद की मुख्य इमार क े बाहर एक चबू रे में हिंहदू पूSा की Sा रही र्थीी सिSसे 17x21 फीर्ट माप विकया गया र्थीा, सिSस पर छाव+ी क े रूप में एक छोर्टी लकड़ी की संरच+ा र्थीी। चबू रे पर मंविदर क े वि+मा:र्ण की अ+ुमति महं रघुबर दास द्वारा वष: 1885 क े वाद की उविX में सस्जिम्मखिल है सिSसे खारिरS कर विदया गया र्थीा। वाद 4 में वादी का क: है विक महं +े स्वयं की ओर से Sन्मस्र्थीा+ और इसमें रुतिच रख+े वाले सभी व्यविXयों पर वाद दायर विकया, और वि+र्ण:य पूर्ण: न्याय क े रूप में संचाखिल हो ा है क्योंविक यह मामला सी*े और काफी हद क बाबरी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व पर र्थीा, और मस्जिस्Sद से सर्टे भूविम पर मंविदर ब+ा+े क े खिलए हिंहदुओं का अति*कार र्थीा। वाविदयों क े अ+ुसार, प्रति वाविदयों द्वारा यह स्वीकार विकए विब+ा विक उस स्र्थील पर कणिर्थी रूप से एक हिंहदू मंविदर मौSूद र्थीा, सिSसमें मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण 433 वष: पूव: सम्रार्ट बाबर द्वारा विकया गया र्थीा, मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण से प्रारम्भ हो+े वाले और लंबे और स कब्Sा हो+े से मुस्जिस्लमों +े ब क कब्Sा विकया Sब क विक अप+ा स्वत्व पूर्ण: +हीं कर खिलया। ब वादी दंप्रसं 1898 की *ारा 145 क े ह काय:वाविहयों का संदभ: दे+े क े खिलए आगे बढ़ ा है। 1950 क े वाद 2 में वि+षे*ाज्ञा क े व्यादेश क े परिरर्णामस्वरूप, हिंहदुओं को मस्जिस्Sद क े भी र रखी मूर्ति यों की पूSा कर+े की अ+ुमति दी गई, परन् ु मुस्जिस्लमों को प्रवेश कर+े से रोक विदया गया। वादीगर्णों क े अ+ुसार, वाद क े खिलए वाद हे ुक विद+ांक 23 विदसंबर 1949 को उत्पन्न हुआ Sब कणिर्थी रूप से हिंहदुओं +े मस्जिस्Sद में गल रीक े से प्रवेश विकया और मस्जिस्Sद क े अंदर मूर्ति रखकर इसे दूविष कर विदया। क्षति को प्रक ृ ति में Sारी रख े हुए दावा विकया गया। Sैसा विक राज्य क े विवरूद्ध, वाद हे ुक विद+ांक 29 विदसंबर 1949 को उत्पन्न हुआ, Sब संपखित्त सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा क ु क: की गई र्थीी सिSस+े प्राप को कब्Sा सौंप विदया र्थीा। प्राप +े विद+ांक 5 S+वरी 1950 को पदभार £हर्ण विकया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाद में Sो राह का दावा विकया गया है, वह उपरोX प्रकर्थी+ों पर आ*ारिर है। अवि+वाय: ः वाविदयों का मामला इस दलील पर आगे बढ़ ी है विक: (i) मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण वाद से 433 वष: पूव: साव:Sवि+क इबाद स्र्थील क े रूप में बाबर द्वारा विकया गया र्थीा और मुस्जिस्लमों द्वारा स इबाद कर+े क े खिलए उपयोग विकया गया र्थीा; और (ii) यहां क विक यह मा+ े हुए विक यह एक अं र्मि+विह मंविदर र्थीा सिSसे मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए रास् ा दे+े हे ु ध्वस् विकया गया र्थीा, मुस्जिस्लमों +े प्रति क ू ल कब्Sे से अप+ा स्वत्व पूर्ण: कर खिलया। इस आ*ार पर, वादी स्वत्व की घोषर्णा का दावा कर े हैं और इस घर्ट+ा में इस रह की प्रार्थी:+ा कब्Sे क े तिर्डक्री क े खिलए आवश्यक है।

39. गोपाल सिंसह विवशारद, प्रर्थीम प्रति वादी (Sो वाद 1 में भी वादी हैं), द्वारा दायर खिलखिख बया+ में, यह कहा गया है विक यविद मस्जिस्Sद मुस्जिस्लमों क े कब्Sे में र्थीा ो यह वष: 1934 में समाप्त हो गया। हिंहदू वष: 1934 क े बाद कब्Sा हो+े का दावा कर े हैं और उ+क े कब्Sे को प्रति क ू ल कब्Sे में ैयार विकया Sा+ा कहा गया है। खिलखिख बया+ क े अ+ुसार, स+् 1934 से मस्जिस्Sद में कोई इबाद +हीं की गई र्थीी। इसक े अलावा, विकसी भी व्यविXग हिंहदू अर्थीवा महं को संपूर्ण: हिंहदू समुदाय का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए +हीं कहा Sा सक ा है। हिंहदू पूSा को ढाँचे क े अंदर कर+ा Sारी रखा गया है, सिSसे वष: 1934 से मंविदर क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है और सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश क े बाद S+वरी 1950 से मा+ा Sा ा है। एक अति रिरX खिलखिख बया+ में, एक दलील दी गई है विक उ.प्र. मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम 1936 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*कारा ी है। यह प्रकणिर्थी है विक अति*वि+यम क े ह कोई भी वि+*ा:रर्ण गैर-मुस्जिस्लमों क े विवरूद्ध स्वत्व क े प्रश्न को य कर+े क े खिलए काय: +हीं कर सक ा है। आगामी खिलखिख बया+ में कहा गया है विक हिंहदुओं +े पुरा + काल से ही Sन्मभूविम स्र्थील की पूSा की है; Sन्मभूविम मंविदर कभी भी मुस्जिस्लमों क े कब्Sे में +हीं र्थीा और यविद वह कब्Sे में र्थीा भी ो वष: 1934 में यह बंद हो गया र्थीा। वाद को परिरसीमा द्वारा बाति* कर विदया गया। वष: 1885 क े वाद क े संबं* में, यह प्रस् ु विकया गया है विक वादी प्रति वि+ति* क्षम ा में वाद +हीं कर रहा र्थीा और क े वल अप+े व्यविXग विह का अ+ुसरर्ण कर रहा र्थीा। वि+म ही अखाड़ा का खिलखिख कर्थी+ मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व से इ+कार कर ा है। वि+म ही अखाड़ा द्वारा कहा गया है विक वह महं रघुबर दास द्वारा दायर विकसी भी वाद से अ+णिभज्ञ र्थीा। इसक े अ+ुसार, इस स्र्थील पर कभी मस्जिस्Sद +हीं र्थीी और इसखिलए 23 विदसंबर 1949 क मुस्जिस्लम समुदाय क े पास +माज़ अदा कर+े का कोई अवसर +हीं र्थीा। यह आ£ह विकया गया है विक बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में वर्भिर्ण संपखित्त क्या है और हमेशा Sन्मभूविम मंविदर क े भी र हिंहदू देव ाओं की मूर्ति याँ स्र्थीाविप रही हैं। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार, वष: 1885 क े वाद में मंविदर पर रामचबू रा को न्यातियक रूप से मान्य ा दी गई र्थीी। यह आ£ह विकया गया र्थीा विक Sन्मभूविम मंविदर हमेशा वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में र्थीा और विकसी और को +हीं बस्जिल्क हिंहदुओं को पूSा और प्रार्थी:+ा कर+े की अ+ुमति दी गई र्थीी। वि+म ही अखाड़ा क े प्रति वि+ति* द्वारा चढ़ावा प्राप्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर+ा अणिभकणिर्थी है। क ु क— क े बाद, क े वल वि+म ही अखाड़े क े पुSारिरयों को मंविदर में मूर्ति यों की पूSा कर+े का दावा विकया गया है। खिलखिख कर्थी+ में कम से कम 1934 से ढाँचे में मुस्जिस्लमों की इबाद से इ+कार विकया गया है और यह आ£ह विकया गया है विक वाद 4 को सीविम करक े रोक विदया गया है। अति रिरX खिलखिख बया+ में, वि+म ही अखाड़ा +े इस बा से इ+कार विकया है विक वष: 1885 क े वाद में वि+ष्कष: पूव:न्याय क े रूप में काय: कर े हैं। इस आरोप से इ+कार विकया Sा ा है विक मुस्जिस्लमों +े प्रति कू ल कब्Sे से अप+ा स्वत्व पूर्ण: विकया है। उत्तर प्रदेश राज्य +े अप+े खिलखिख कर्थी+ में इस प्रभाव क े खिलए दायर विकया विक सरकार विववाविद संपखित्त में विदलचस्पी +हीं रख ी और प्रति वाद कर+े का प्रस् ाव +हीं कर ी है। दसवें प्रति वादी अखिखल भार ीय हिंहदू महासभा की ओर से दायर खिलखिख कर्थी+ में यह प्रकणिर्थी है विक भार +े स्व ंत्र ा प्राप्त कर+े पर मूल हिंहदू का+ू+ का पु+रुद्धार विकया है, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप वादी विकसी भी का+ू+ी या संवै*ावि+क अति*कार का दावा +हीं कर सक े हैं। अति रिरX खिलखिख कर्थी+ में दसवें प्रति वादी +े विद+ांक 22 विदसंबर 1949 की घर्ट+ा से इ+कार विकया और दावा विकया विक मूर्ति याँ अ+ाविदकाल से विवचारा*ी+ स्र्थीा+ पर अस्जिस् त्व में र्थीीं। खिलखिख बया+ क े अ+ुसार, यह स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है और Sन्म स्र्थीा+ पर कोई मस्जिस्Sद +हीं ब+ाई Sा सक ी र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अणिभराम दास और *रम दास Sो उ+क े चेला हो+े का दावा कर े हैं, का खिलखिख कर्थी+ राम Sन्मभूविम स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की वै* ा पर सवाल उठा े हैं। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार, यह स्र्थील हिंहदू पूSा स्र्थीलों से तिघरा हुआ और भूविमबद्ध है और इसखिलए ऐसी इमार मुस्जिस्लम विवति* में वै* मस्जिस्Sद +हीं हो सक ी। खिलखिख कर्थी+ में इस आ*ार पर वै* वक्फ में शाविमल है विक एक वक्फ प्रति क ू ल कब्Sे पर आ*ारिर +हीं हो सक ा है। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार, राम Sन्मभूविम में विवक्रमाविदत्य क े शास+ क े पूव: एक प्राची+ मंविदर र्थीा, सिSसे मीर बाकी +े ध्वस् कर विदया र्थीा। यह प्रकणिर्थी है विक राम Sन्मभूविम अविव+ाशी है क्योंविक देव ा विदव्य और अमर हैं। मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े विवरो* में यह प्रस् ु विकया गया है विक यह क्षेत्र देव ाओं क े कब्Sे में है और ी+ गुंबददार संरच+ा में हिंहदू पूSा स्र्थीलों से गुSर+े क े अति रिरX कोई भी प्रवेश +हीं कर सक ा है। अन्य हिंहदू प्रति वाविदयों द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ व्यापक रूप से इसी रह क े विवचारों का पाल+ कर े हैं। हिंहदू पक्षकारों क े खिलखिख कर्थी+ों क े खिलए प्रत्युत्तर दायर विकया गया र्थीा। वाद 5-ओओएस सं. 5/1989 (सामान्य वाद सं. 236/1989)

40. वि+म्+खिलखिख राह का दावा कर े हुए वाद को विद+ांक 1 Sुलाई 1989 को स्र्थीाविप विकया गया र्थीा: "(A) अयोध्या में श्री राम Sन्मभूविम का संपूर्ण: परिरसर, वादी देव ाओं से संबद्ध है, Sैसा विक संलग्नक I, II और III में वर्भिर्ण और तिचवित्र विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (B) श्री राम Sन्म भूविम, अयोध्या में +ए मंविदर भव+ क े वि+मा:र्ण में विकसी भी रह की बा*ा र्डाल+े, या विकसी भी रह का व्यव*ा+ र्डाल+े अर्थीवा मौSूदा भव+ों और ढाँचों आविद को ध्वस् कर+े और हर्टा+े क े बाद, प्रति वाविदयों क े विवरूद्ध एक शाश्व व्यादेश उX उद्देश्य क े खिलए ऐसा कर+े क े खिलए, Sहाँ क आवश्यक या समीची+ हो सक ा है, वहाँ क उपचार करें।” यह वाद "श्री राम Sन्मभूविम में भगवा+ श्री राम विवराSमा+, अयोध्या सिSसे भगवा+ श्री रामलला विवराSमा+ भी कह े हैं", क े +ाम से स्र्थीाविप विकया गया है। इस प्रकार वर्भिर्ण देव ा पहले वादी है। दूसरे वादी को "स्र्थीा+ श्री राम S+भूविम, अयोध्या" कहा Sा ा है। दो+ों वाविदयों का प्रति वि+ति*त्व वाद विमत्र क े रूप में इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े पूव: न्याया*ीश श्री देवकी +ंद+ अ£वाल +े विकया र्थीा। पहले और दूसरे वादी क े वाद विमत्र को ीसरे वादी क े रूप में प्रस् ु विकया गया है। वाद क े प्रति वाविदयों में शाविमल हैं: (i) वि+म ही अखाड़ा Sो वाद 3 में वादी है; (ii) सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड:, वाद 4 में वादी; (iii) अयोध्या क े विहन्दू और मुस्जिस्लम वि+वासी; और (iv) उत्तर प्रदेश राज्य, कलक्र्टर और वरिरष्ठ पुखिलस अ*ीक्षक। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अखिखल भार ीय हिंहदू महासभा और श्री राम Sन्मभूविम न्यास क े रूप में वर्भिर्ण न्यास सविह कई अन्य हिंहदू संस्र्थीाएं वाद क े पक्षकार हैं Sैसे विक णिशया सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: है। वाद 5 में मुख्य ः यह प्रकणिर्थी है विक: (i) प्रर्थीम और विद्व ीय वादी न्यातियक व्यविX हैं: भगवा+ राम उस स्र्थीा+ क े अति*ष्ठा ा देव ा हैं और यह स्र्थीा+ स्वयं पूSा का प्र ीक है; (ii) वादपत्र क े प्रयोS+ क े खिलए राम Sन्मभूविम की पहचा+ श्री णिशव शंकर लाल द्वारा ैयार विकए गए भव+, परिरसर और आस-पास क े क्षेत्र की योS+ाओं पर आ*ारिर है, सिSन्हें वाद 1/1950 में फ ै Sाबाद क े दीवा+ी न्याया*ीश द्वारा आयुX क े रूप में वि+युX विकया गया र्थीा; (iii) वादपत्र में दीवा+ी न्यायालय क े समक्ष गविठ पूव: र वादों का संदभ: शाविमल है और यह विक *ारा 145 क े ह काय:वाविहयों में वि+युX प्राप द्वारा देव ाओं की पूSा क े खिलए *ार्मिमक समारोहों की देखभाल की गई। यद्यविप देव ा की सेवा और पूSा को संचाखिल विकया गया परन् ु श्रद्धालुओं को क े वल बैरिरयर क े पीछेे से ही दश:+ कर+े की अ+ुमति है। (iv) यह आरोप लगा े हुए विक ईश्वर की प्रार्थी:+ा अ+ुतिच रूप से की गयी है, यह कहा गया है विक "अयोध्या में श्री राम Sन्मभूविम पर पुरा+े ढांचे को हर्टा+े क े बाद" श्रद्धालु एक +ए मंविदर क े वि+मा:र्ण कर+े क े इच्छ ु क हैं। Sन्मभूविम की संपखित्त और मामलों क े प्रबं*+ क े उद्देश्य क े खिलए विद+ांक 18 विदसंबर, 1985 को न्यास क े विवलेख का गठ+ विकया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) यद्यविप, भगवा+ राम और राम Sन्मभूविम क े अति*ष्ठा ा देव ा दो+ों को एक विवणिशष्ट व्यविXत्व वाला न्यातियक व्यविX हो+े का दावा विकया Sा ा है, परन् ु उ+में से विकसी को भी पूव:व - वादों का पक्षकार +हीं ब+ाया गया र्थीा। परिरर्णामस्वरूप, उ+ वादों में पारिर तिर्डविक्रयां देव ाओं को आबद्ध +हीं करेंगी; (v) लोक अणिभलेख यह स्र्थीाविप कर े हैं विक विववाविद परिरसर में भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा और वे मा+व रूप में विवष्र्णु क े अव ार क े रूप में अव रिर हुए र्थीे; (vii) स्वयं वह स्र्थीा+-राम Sन्मस्र्थीा+-पूSा कर+े की वस् ु है चूँविक यह भगवा+ राम क े रूप में पूज्य विदव्य भाव+ा को व्यX कर ा है। इस प्रकार देव ा और Sन्म स्र्थीा+ दो+ों क े पास एक न्यातियक चरिरत्र है। विहन्दू परमात्मा क े आत्मा की पूSा कर े हैं + विक मूर्ति क े रूप में उसक े भौति क स्वरूप की। पूSा की Sा+े वाली यह आत्मा अविव+ाशी है। इस आत्मा का प्रति वि+ति*त्व कर े हुए, राम Sन्मभूविम एक स्र्थीा+ क े रूप में देव ा क े रूप में पूSा Sा ा है और इसखिलए यह एक विवति*क व्यविX है। (viii) अप+े भXों द्वारा ''एक अचल ईश्वर'' की पूSा का वास् विवक और वि+रं र प्रदश:+ इसक े अस्जिस् त्व क े खिलए आवश्यक +हीं है चूँविक भूविम द्वारा वि+रूविप देव ा अविव+ाशी है; (ix) राम Sन्मभूविम पर विवक्रमाविदत्य क े शास+काल में एक प्राची+ मंविदर र्थीा। मंविदर आंणिशक रूप से +ष्ट हो गया र्थीा और सम्रार्ट बाबर क े से+ापति मीर बाकी +े एक मस्जिस्Sद ब+ा+े का प्रयत्+ विकया। मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए उपयोग की Sा+े वाली अति*कांश साम£ी मंविदर से प्राप्त की गई सिSसमें उसक े कसौर्टी स् ंभ सविह हिंहदू देवी-देव ाओं को उत्कीर्ण: विकया गया र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (x) फ ै Sाबाद गSेविर्टयर क े 1928 वें संस्करर्ण में यह अणिभखिलखिख है विक वष: 1528 में अप+ी विवSय क े दौरा+ बाबर +े प्राची+ मंविदर को +ष्ट कर विदया और उस स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण करवाया। वष: 1855 में हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े बीच विववाद र्थीा। गSेविर्टयर में अणिभखिलखिख है विक विववाद क े बाद, मस्जिस्Sद क े साम+े एक बाह्य बाड़े को स्र्थीाविप विकया गया र्थीा, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप आं रिरक अहा े का उपयोग हिंहदुओं क े खिलए वि+विषद्ध र्थीी। परिरर्णामस्वरूप, उन्हों+े बाह्य अहा े में एक चबू रे पर प्रार्थी:+ा की। (xi) वह स्र्थीा+ देव ाओं से संबंति* है और कोई वै* वक्फ कभी +हीं ब+ाया गया र्थीा अर्थीवा ब+ाया Sा सक ा र्थीा; (xii) प्राची+ मंविदर क े विव+ाश पर Sो ढांचा खड़ा विकया गया र्थीा, वह मंविदर की साम£ी का उपयोग कर े हुए मस्जिस्Sद का गठ+ +हीं कर ा है। मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े बावSूद, राम Sन्मभूविम उस देव ा क े कब्Sे में +हीं रह गया Sो विवणिभन्न प्र ीकों क े माध्यम से भXों द्वारा पूSा Sा ा रहा है। (xiii) मस्जिस्Sद क े भव+ का उपयोग क े वल विहन्दू पूSा क े आस-पास क े स्र्थीा+ों से होकर विकया Sा सक ा है। इसखिलए राम Sन्मभूविम में देव ाओं की उपास+ा युगों से चल ी रही है। (xiv) वष: 1934 क े पश्चा ् मस्जिस्Sद में कोई इबाद +हीं की गई है विद+ांक 22-23 विदसंबर 1949 की रा में, भगवा+ राम की मूर्ति यों को क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे उतिच अ+ुष्ठा+ क े सार्थी स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। उस स्जिस्र्थीति पर, एक प्रार्थीविमकी पर कार:वाई कर े हुए, अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा दंप्रसं की *ारा 145 क े ह काय:वाही शुरू की गई और विद+ांक 29 विदसंबर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1949 को एक प्रारंणिभक आदेश पारिर विकया गया। एक प्राप वि+युX विकया गया र्थीा, सिSसक े बावSूद वादी देव ाओं क े कब्Sे में गड़बड़ी +हीं की गयी र्थीी; (xv) वादी, विकसी पूव: मुकदमेबाSी क े पक्षकार +हीं र्थीे और इसखिलए वे पूव: की काय:वाविहयों क े परिरर्णाम से आबद्ध +हीं हैं; और (xvi) अयोध्या में राम Sन्मभूविम सिSसमें अति*ष्ठा ा देव ा क े अलावा, अन्य मूर्ति यों और देव ाओं क े सार्थी-सार्थी इसकी संपखित्तयों से सम्बस्जिन्* एकमात्र पहचा+ क े सार्थी अणिभन्न परिरसर गविठ हो ा है। मुस्जिस्लमों का दावा विब्रविर्टश द्वारा अव* क े विवलय क े बाद स्र्थीाविप भी री चहारदीवारी क े भी र संलग्न क्षेत्र क ही सीविम है। वादपत्र में विद+ांक 6 विदसंबर 1992 को मस्जिस्Sद ढाँचे क े विवध्वंस का विववरर्ण है और उसक े बाद हो+े वाले घर्ट+ाक्रम में एक अध्यादेश की घोषर्णा शाविमल है और बाद में भूविम क े अति*£हर्ण क े खिलए संसद द्वारा अति*वि+यविम एक का+ू+ है।

41. वि+म ही अखाड़ा द्वारा खिलखिख खिलखिख कर्थी+ में, यह कहा गया है विक: (i) भगवा+ राम की मूर्ति राम Sन्मभूविम में +हीं बस्जिल्क राम Sन्मभूविम मंविदर में स्र्थीाविप की गई है। वि+म ही अखाड़ा +े राम Sन्मभूविम मंविदर क े प्रभार और प्रबं*+ क े खिलए एक वाद की स्र्थीाप+ा की है;

(ii) Sबविक भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ विववाद में +हीं है, वहीं यह राम Sन्मभूविम मंविदर है Sो विववाद में है। मुस्जिस्लम इसे मस्जिस्Sद हो+े का दावा कर े हैं Sबविक वि+म ही अखाड़ा इसे अप+े प्रभार और प्रबं*+ क े खिलए एक मंविदर हो+े का दावा कर ा है। राम Sन्मभूविम मंविदर "स्र्थीा+ राम Sन्मभूविम" (भगवा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA राम का Sन्म स्र्थीा+), अयोध्या क े मोहल्ला राम कोर्ट +ामक स्र्थीा+ पर स्जिस्र्थी है। (iii) वि+म ही अखाड़ा विववाविद मंविदर में स्र्थीाविप भगवा+ राम की मूर्ति क े सेवाय है और यविद आवश्यक हो ो उन्हें मंविदर की Sीर्ण द्धार और पु+र्मि+मा:र्ण का विवशेष अति*कार है; और (iv) “राम Sन्मभूविम स्र्थीा+” न्यातियक व्यविX +हीं है। वाद 5 क े वाविदयों क े पास मुकदमा कर+े का कोई वास् विवक स्वत्व +हीं है। प्रति वादी +े उत्तर दे े हुए कहा विक संपूर्ण: परिरसर वि+म ही अखाड़ा से संबंति* है। इसखिलए, खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार वादी को घोषर्णा कर+े का कोई अति*कार +हीं है। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार: (i) + ो पहला और + ही दूसरा वादी न्यातियक व्यविX हैं; (ii) विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम का कोई अति*ष्ठा ा देव ा +हीं है; (iii) मूर्ति यों को गुप्त रूप से विद+ांक 22-23 विदसंबर, 1949 की रा को मस्जिस्Sद क े भी र रखा गया र्थीा। + ो कोई अति*ष्ठा ा देव ा है और + ही Sन्मस्र्थीा+; (iv) 1885 का वाद महं रघुबर दास +े अयोध्या क े Sन्मस्र्थीा+ क े महं क े रूप में एक मंच अर्थीवा चबू रे पर मंविदर स्र्थीाविप कर+े की अ+ुमति मांग+े क े खिलए गविठ विकया गया र्थीा। +क्शे में मस्जिस्Sद का तिचत्रर्ण चबू रा क े पतिश्चमी विहस्से में विकया गया र्थीा। यह वाद अयोध्या और फ ै Sाबाद क े अन्य महं ों और हिंहदुओं की ओर से गविठ विकया गया र्थीा। वाद खारिरS कर विदया गया र्थीा। पहली और दूसरी अपील भी खारिरS कर दी गई। चूंविक पूव: क े वाद में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दावा क े वल मस्जिस्Sद क े बाहर सत्रह x इक्कीस फीर्ट क स्वीकाय: चबू रे क ही सीविम र्थीा, इसखिलए व:मा+ मुकदमे में दावा वर्जिS है। (v) बाबरी मस्जिस्Sद से सौ गS से भी कम दूरी पर स्जिस्र्थी Sन्मस्र्थीा+ मंविदर क े रूप में Sा+ा Sा+े वाला यह एक अन्य मंविदर भी है; (vi) विकसी मौSूदा मंविदर क े स्र्थील पर अर्थीवा उसक े विवध्वंस पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा; (vii) सम्रार्ट बाबर क े शास+ काल में भूविम राज्य से संबंति* र्थीी और मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण रिरX भूविम पर विकया गया र्थीा Sो विकसी व्यविX से संबंति* +हीं र्थीी; (viii) सम्रार्ट बाबर, Sो सुन्नी मुसलमा+ र्थीा, उसक े शास+ काल में इसक े वि+मा:र्ण क े समय से ही इस ढांचे का उपयोग हमेशा से मस्जिस्Sद क े रूप में विकया गया है। (ix) मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े पश्चा ् से विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 क मुस्जिस्लमों का कब्Sा अबाति* और अविवस्जिच्छन्न र्थीा। इसखिलए, इसक े विवपरी विकसी भी कणिर्थी अति*कार को प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा समाप्त कर विदया गया मा+ा Sा ा है; (x) वि+यविम रूप से विद+ांक 22 विदसंबर 1949 क मस्जिस्Sद में प्रति विद+ पाँच बार इबाद विकया Sा ा र्थीा और विद+ांक 16 विदसंबर 1949 क शुक्रवार की +माS अदा की Sा ी र्थीी; (xi) विद+ांक 22-23 विदसंबर, 1949 को क ु छ बैराविगयों +े Sबर+ मस्जिस्Sद में प्रवेश विकया और क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे एक मूर्ति स्र्थीाविप कर दी। यह विद+ांक 23 विदसंबर, 1949 को इबाद क े खिलए मस्जिस्Sद में उपस्जिस्र्थी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुस्जिस्लमों को ज्ञा+ हुआ सिSसक े बाद दंप्रसं 1898 की *ारा 145 क े ह काय:वाही प्रारम्भ की गई। भव+ का कब्Sा प्राप क े पास विद+ांक 5 S+वरी 1950 से ब+ा हुआ है; (xii) वाद 5 का ीसरा वादी स्वयं को सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा संस्जिस्र्थी वाद क े पक्षकार क े रूप में अणिभयोसिS कर सक ा र्थीा। ऐसा कर+े में विवफल रह+े पर ीसरा वादी देव ाओं क े वाद विमत्र क े रूप में वाद 5 को वि+वा:ह +हीं कर सक ा; (xiii) ीसरा वादी कभी भी मूर्ति यों क े प्रबं*+ और पूSा से संबंति* +हीं रहा है और वह स्वयं को भगवा+ राम का वाद विमत्र हो+े का दावा +हीं कर सक ा;

(xiv) Sैसा विक प्रर्थीम वादी द्वारा वर्भिर्ण है विक कोई अति*ष्ठा ा देव ा +हीं है और यह कह+ा गल है विक पदतिचन्ह (“चरर्ण”) और अन्य ढाँचे एकमात्र पहचा+ क े सार्थी एक अणिभन्न परिरसर को संस्जिस्र्थी कर ी हैं; (xv) मस्जिस्Sद की अव*ारर्णा में यह परिरकल्प+ा की गई है विक +ीचे र्थीा ऊपर का संपूर्ण: क्षेत्र अल्लाह को समर्मिप है। इसखिलए, यह + क े वल मस्जिस्Sद की संरच+ा है बस्जिल्क वह भूविम भी है सिSस पर वह स्र्थीाविप है Sो सव:शविXमा+ अल्लाह को समर्मिप है; (xvi) प्रश्नग स्र्थील का भगवा+ राम क े Sन्मस्र्थीा+ से कोई संबं* +हीं है और उसका राम Sन्मभूविम क े कणिर्थी "स्र्थीा+" से कोई महत्व +हीं है; (xvii) वाद हे ुक का कारर्ण विदसम्बर 1949 में ब प्रोद्भू हो+ा मा+ा Sा ा है Sब संपखित्त क ु क: की गई र्थीी और Sब मुस्जिस्लमों +े मस्जिस्Sद में पूSा कर+े क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विहन्दुओं क े दावे का स्पष्ट रूप से खंर्ड+ विकया र्थीा. अ ः, वाद परिरसीमा द्वारा वर्जिS है; (xviii) वाद का विवषय वक्फ क े रूप में रसिSस्र्ट्रीक ृ संपखित्त है Sो उत्तर प्रदेश मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम, 1960 की *ारा 30 क े ह सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा अ+ुरतिक्ष है Sो राSस्व अणिभलेखों में इस प्रकार दर्भिश है; और (xix) पुरा त्व विवशेषज्ञ यह उपदर्भिश कर े हैं विक 700 ई.पू. क े पूव: स्जिस्र्थीति में + ही मा+व वि+वास का कोई वि+शा+ है और + ही कोई साक्ष्य है विक बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर कोई विकला, महल अर्थीवा प्राची+ मंविदर विवद्यमा+ है। प्रति वादी सं. 5 Sो अयोध्या क े मुस्जिस्लम वि+वासी है, की ओर से दायर खिलखिख कर्थी+ में यह क: प्रस् ु विकया गया है विक: (i) सोलहवीं श ाब्दी में वि+मा:र्ण क े बाद से ही परिरसर सदैव एक मस्जिस्Sद रहा है और इसका उपयोग क े वल +माS अदा कर+े क े खिलए विकया गया है; (ii) कसौर्टी स् ंभों क े अस्जिस् त्व से इ+कार विकया गया है। बाबरी मस्जिस्Sद में मुस्जिस्लमों क े अति रिरX विकसी और +े इबाद +हीं विकया। इसकी स्र्थीाप+ा से विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 क मस्जिस्Sद में +माS अदा की गई। (iii) बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण ऐसे मंविदर क े स्र्थील पर +हीं विकया गया र्थीा सिSसे सम्रार्ट बाबर क े आदेश पर ध्वस् विकया गया र्थीा; (iv) अयोध्या में मौSूद राम Sन्मस्र्थीा+ मंविदर णिभन्न है और प्रश्नग परिरसर से अलग है। (iv) 1885 क े वाद का वि+ष्कष: पूव:न्याय क े रूप में काय: कर े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विद+ांक 6 विदसंबर 1992 को बाबरी मस्जिस्Sद क े विवध्वंस क े परिरर्णामस्वरूप वादपत्र में संशो*+ों से वि+पर्ट+े क े खिलए प्रति वादी सं. 4 और 5 की ओर से एक अति रिरX खिलखिख कर्थी+ दायर विकया गया र्थीा। अयोध्या क े मुस्जिस्लम वि+वासी प्रति वादी सं. 6 क े खिलखिख कर्थी+ में प्रति वादी सं. 5 क े खिलखिख कर्थी+ को अप+ाया गया है। अखिखल भार ीय हिंहदू महासभा क े अध्यक्ष, प्रति वादी सं. 11 क े खिलखिख कर्थी+ +े वादपत्र में मांगी गई श Â क े अ+ुसार एक तिर्डक्री को प्रस् ु विकया है। हिंहदू और मुस्जिस्लम प्रति वाविदयों द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ बड़े पैमा+े पर उसी से संबंति* लाइ+ों का पाल+ कर े हैं।

42. प्रति वादी सं. 24, राSक ु मार अंSुम क़ादेर द्वारा खिलखिख बया+ इस प्रकार दायर विकया गया है: "(a) वादी द्वारा व:मा+ में दावा विकया Sा रहा स्र्थील क े वल विद+ांक 22.12.1949 से राम Sन्मभूविम क े रूप में Sा+ा Sा रहा है। (b) बाबरी मस्जिस्Sद ढांचे क े बाह्य अहा े में रामचबू रा क े वल वष: 1885 से राम Sन्मभूविम क े रूप में Sा+ा Sा ा है। (c) गली क े उस पार बाबरी मस्जिस्Sद क े साम+े Sन्मस्र्थीा+ स्र्थील रसोई मंविदर को पारंपरिरक रूप से प्राची+ काल से ही राम Sन्मभूविम कहा Sा ा है।" प्रति वादी सं. 24 क े अ+ुसार: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) वष: 1855 में अहा े क े एक को+े में बाबरी मस्जिस्Sद क े ढाँचे क े बाहर एक स्र्थीा+ को Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में दावा विकया गया र्थीा। उस स्जिस्र्थीति में, सत्रह x इक्कीस फीर्ट क े माप+ क्षेत्र को रामचबू रे क े रूप में +ामांक+ कर े हुए विवभासिS विकया गया र्थीा। (ii) विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 को Sन्मस्र्थीा+ का दावा रामचबू रे से मस्जिस्Sद क े मुख्य गुंबद क े +ीचे एक स्र्थीा+ पर स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया। (iii) वष: 1855 से पूव:, बाबरी मस्जिस्Sद क े साम+े एक र्टीले पर वि+र्मिववाविद रूप से राम Sन्मस्र्थीा+ पुरा+े Sन्मस्र्थीा+ सी ा रसोई मंविदर र्थीा; (iv) प्रति वादी सं. 24 क े अ+ुसार, वि+म्+खिलखिख ी+ स्र्थीलों को अब भगवा+ राम क े Sन्म का संभाविव स्र्थीा+ मा+ा Sा ा है, अर्थीा: ्: (a) वष: 1949 से मुख्य गुम्बद क े +ीचे स्जिस्र्थी बाबरी मस्जिस्Sद; (b) वष: 1855 से बाबरी मस्जिस्Sद क े प्रांगर्ण में रामचबू रा; और (c) पुरा+े राम Sन्मस्र्थीा+ मंविदर में Sहां सी ा रसोई भी स्जिस्र्थी है।

(v) Sबविक विब्रविर्टश सरकार द्वारा प्रकाणिश फ ै Sाबाद गSेविर्टयर क े 1928 क े संस्करर्ण में एक सप्ताह क े खिलए अयोध्या में सम्रार्ट बाबर रुक े हुए, प्राची+ मंविदर को +ष्ट कर+े और +ष्ट मंविदर की साम£ी क े सार्थी बाबरी मस्जिस्Sद ब+ा+े का वर्ण:+ है, यह इति हास का एक थ्य है विक बाबर कभी अयोध्या +हीं आया। सम्रार्ट बाबर क े संस्मरर्ण बाबर-+ामा में अयोध्या आ+े, मंविदर को +ष्ट कर+े या मस्जिस्Sद ब+ा+े का कोई उल्लेख +हीं विकया गया है। प्रति वादी सं 24 कह ा है विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "हालाँविक, सब क ु छ कह+े और कर+े क े बाद, यह सबसे सम्मा+S+क रूप से प्रस् ु विकया Sा ा है विक यविद क े वल इस दावे को साविब विकया Sा ा है विक एक मंविदर को ध्वस् विकया गया र्थीा और बाबरी मस्जिस्Sद को मंविदर की भूविम पर ब+ाया गया र्थीा, ो यह प्रति वादी और अन्य सभी मुस्जिस्लम प्रसन्न ापूव:क मस्जिस्Sद को ध्वस् कर देंगे और आगे से मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए भूविम वापस कर देंगे।" (vi) बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण मीर बाकी द्वारा खाली भूविम पर विकया गया र्थीा + विक पूव:-विवद्यमा+ मंविदर क े खंर्डहरों पर। चूंविक मीर बाकी णिशया मुस्जिस्लम र्थीे, इसखिलए वष: 1528 में उ+क े वंशSों को 'हक्क-ए-मु ावल्ली' स्व ः ही विमल गई। हालाँविक, णिशया और सुन्नी दो+ों +े बाबरी मस्जिस्Sद में +माS अदा की। Sब अयोध्या में णिशया आबादी कम हो गयी ो सुन्नी मुस्जिस्लमों को णिशया मु ावल्ली +े वष: 1925 से मस्जिस्Sद में अप+ी दैवि+क Sमा कर+े की अ+ुमति दी। बाबरी मस्जिस्Sद क े सुन्नी इमाम +े विद+ांक 22 विदसंबर 1949 को अंति म +माज़ अदा की। प्रति वादी सं. 25 क े खिलखिख कर्थी+ में कहा गया है विक: (i) बाबरी मस्जिस्Sद हमेशा मस्जिस्Sद क े रूप में उपयोग की Sा ी रही है, सिSसमें उसक े वि+मा:र्ण क े बाद से विद+ांक 22 विदसंबर 1949 क ही +माS अदा की गई र्थीी; और (ii) विद+ांक 22-23 विदसंबर 1949 की रा को क ु छ व्यविXयों +े अवै* रूप से मस्जिस्Sद में अति क्रमर्ण विकया सिSसक े परिरर्णामस्वरूप एक प्रार्थीविमकी दS: की गई और *ारा 145 क े ह काय:वाविहयां आरंभ की गई ं। दीवा+ी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायालय क े समक्ष दीवा+ी वाद क े लंब+ क े दौरा+ एक प्राप वि+युX विकया गया र्थीा और यर्थीास्जिस्र्थीति को स रख+े का वि+द†श विदया गया र्थीा। वाद में वाद विबन्दुओं क े शीष:क

43. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अवलोक+ विकया विक चार वादों में मुद्दों को बड़े पैमा+े पर वि+म्+खिलखिख विबन्दुओं क े ह वग-क ृ विकया Sा सक ा है: “(a) सिस.प्र.सं. की *ारा 80 क े ह सूच+ा (b) *ार्मिमक सम्प्रदाय (c) पूव:न्याय, अति*त्याग और विवबं*+ (d) 13/1936 का वक्फ अति*वि+यम आविद। (e) वाद क े प्रति वि+ति* स्वरूप, न्यास, सिस.प्र.सं. की *ारा 91, पक्षकारों क े असंयोS+, मूल्यांक+/अपया:प्त न्यायालय शुल्क/अति*मूल्य+ और विवशेष खचÂ Sैसे विवविव* मुद्दे। (f) व्यविX और अवति*-विववाविद भव+ का वि+मा:र्ण कब और विकसक े द्वारा विकया गया (g) ईश्वर, उ+की प्रास्जिस्र्थीति, अति*कार आविद। (h) परिरसीमा (i) कब्Sा/प्रति क ू ल कब्Sा (j) स्र्थील Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में, मंविदर का अस्जिस् त्व और विवध्वंस यविद कोई हो। (k) मस्जिस्Sद क े प्रक ृ ति (l) संपखित्त की पहचा+ (m) विवणिशष्ट अ+ु ोष अति*वि+यम की बा*ा (n) अन्य, यविद कोई हो।"

C. साक्ष्यः संक्षेप में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

44. विवचारर्ण क े दौरा+ न्यायालय क े समक्ष बहु सारी साम£ी आई। उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल का वि+र्ण:य दस् ावेSी साक्ष्यों 13 को स्पष्ट रूप से दशा: ा है। विवचारर्ण क े दौरा+ पक्षकारों क े दस् ावेSी प्रदशÂ में 533 प्रदश: समाविवष्ट हैं सिS+का संतिक्षप्त वग-करर्ण इस प्रकार है:

1. वादीगर्ण (वाद-1) - प्रदश: सं. 1 से 34 (क ु ल 34)

2. वादीगर्ण (वाद-3) - प्रदश: सं. 1 से 21 (क ु ल 21)

3. वादीगर्ण (वाद-4) - प्रदश: सं. 1 से 128 (क ु ल 128)

4. वादीगर्ण (वाद-5) - प्रदश: सं. 1 से 132 (क ु ल 132)

5. प्रति वादीगर्ण (वाद-1) - प्रदश: सं. A[1] से A72 (क ु ल 73)

6. प्रति वादीगर्ण (वाद-4) - (i) प्रदश: सं. A[1] से A16 (ii) प्रदश: सं. M[1] से A[7] (iii) प्रदश: सं. B[1] से B16 (iv) प्रदश: सं. J[1] से J31 (v) प्रदश: सं. T1-T[6] (vi) प्रदश: सं. V[1] (vii) प्रदश: सं. Q[1] से Q[6] (क ु ल 16) (क ु ल 7) (क ु ल 16) (क ु ल 32) (क ु ल 6) (क ु ल 1) (क ु ल 6)

7. प्रति वादीगर्ण (वाद-5) - (i) प्रदश: सं. C[1] से C11 (ii) प्रदश: सं. D[1] से D38 (iii) प्रदश: सं. E[1] से E[8] (क ु ल 11) (क ु ल 38) (क ु ल 12) क ु ल योग - 533 इ+ प्रदशÂ में मुख्य ः शाविमल हैं:- (i) *ार्मिमक £न्र्थी; (ii) यात्रावृत्त 13 2010 (ADJ), Vol. I, pages 624-662 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) गSेविर्टयर; (iv) स् ंभों पर णिशलालेखों क े अ+ुवाद; (v) पुरा त्वीय उत्ख++ की आख्या; (vi) विवध्वंस से पूव: की छायातिचत्र; और (vii) विववाविद स्र्थील पर पाए गए णिशल्पक ृ ति क े विववरर्ण। उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल का वि+र्ण:य वि+म्+खिलखिख विबन्दुओं क े ह चार वादों में मौखिखक साक्ष्य को सारर्णीबद्ध कर ा है: "274. (1) मौखिखक गवाही: इ+ वादों क े पक्षकारों +े एक या अन्य विवषय पर अणिभसाक्ष्य दे े हुए 88 सातिक्षयों को प्रस् ु विकया। मुख्य ः, इ+ गवाहों को वि+म्+ा+ुसार वग-क ृ विकया गया है:

275. (क) वादी द्वारा सूर्ट-4 में प्रस् ु गवाह: (I) थ्यों क े गवाह:

1. पी.र्डब्ल्यू. 1 श्री मो. हाणिशम

2. पी.र्डब्ल्यू. 2 हाSी महबूब अहमद

3. पी.र्डब्ल्यू. 3 फारूक अहमद

4. पी.र्डब्ल्यू. 4 मो. यासी+

5. पी.र्डब्ल्यू. 5 श्री अब्दुल रहमा+

6. पी.र्डब्ल्यू. 6 मो. यू+ुस सिसद्दीकी

7. पी.र्डब्ल्यू. 7 श्री हश्म उल्लाह अंसारी

8. पी.र्डब्ल्यू. 8 श्री अब्दुल अSीज़

9. पी.र्डब्ल्यू. 9 सईद अखलक अहमद

10. पी.र्डब्ल्यू. 10 मो. इदरीस

11. पी.र्डब्ल्यू.11 मो. बुरहा+ुद्दी+

12. पी.र्डब्ल्यू. 12 राम शंकर उपाध्याय

13. पी.र्डब्ल्यू. 13 सुरेश चंˆ विमश्रा

14. पी.र्डब्ल्यू. 14 Sलील अहमद

15. पी.र्डब्ल्यू. 21 र्डॉ. एम. हाणिशम विक़दवई mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

16. पी.र्डब्ल्यू. 23 मो. क़ासिसम अंसारी

17. पी.र्डब्ल्यू. 25 मो. सिसब् े +क़वी (II) विवशेषज्ञ साक्षी (इति हासकार)

18. पी.र्डब्ल्यू. 15 सुशील श्रीवास् व

19. पी.र्डब्ल्यू. 18 प्रो. सुविवरा Sायसवाल

20. पी.र्डब्ल्यू. 20 प्रो. णिशरी+ मुसावी (III) विवशेषज्ञ साक्षी (पुरा त्ववेत्ता)

21. पी.र्डब्ल्यू. 16 प्रो. सूरS भा+

22. पी.र्डब्ल्यू. 24 प्रो. र्डी. मंर्डल

23. पी.र्डब्ल्यू. 27 र्डॉ. शीरी+ एफ. रत्+ागर

24. पी.र्डब्ल्यू. 28 र्डॉ. सी ा राम रॉय

25. पी.र्डब्ल्यू. 29 र्डॉ. Sया मे++

26. पी.र्डब्ल्यू. 30 र्डॉ. आर. सी. ठाकर+

27. पी.र्डब्ल्यू. 31 र्डॉ. अशोक दत्ता

28. पी.र्डब्ल्यू. 32 र्डॉ. सुविप्रया वमा: (IV) वि+Sी आयुX

29. पी.र्डब्ल्यू. 17 ज़फर अली सिसद्दीकी (V) विवशेषज्ञ गवाह (*ार्मिमक मामले)

30. पी.र्डब्ल्यू. 19 मौला+ा अ ीक अहमद

31. पी.र्डब्ल्यू. 22 मो. खाखिलद +क़ी

32. पी.र्डब्ल्यू. 26 कल्बे Sावेद

276. (ख) वादी द्वारा वाद-5 में प्रस् ु साक्षी: (I) थ्यों क े गवाह:

1. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 1 महं परमहंस राम चंˆ दास

2. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 2 श्री र्डी.ए+. अ£वाल

3. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 4 हरिरहर प्रसाद ति वारी

4. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 5 राम +ार्थी विमश्रा उफ: ब+ारसी पंर्डा

5. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 6 हौसिसला प्रसाद वित्रपाठी

6. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 7 श्री राम सूर ति वारी

7. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 8 अशोक चंˆ चर्टS-

8. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 12 कौशल विकशोर विमश्रा

9. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 13 +ारद सर+ (II) विवशेषज्ञ साक्षी (पुरा त्ववेत्ता)

10. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 3 र्डॉ. एस.पी. गुप्ता mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

11. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 14 र्डॉ. राक े श ति वारी

12. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 17 र्डॉ. आर. +ागास्वामी

13. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 18 श्री अरुर्ण क ु मार शमा:

14. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 19 श्री राक े श दत्ता वित्रवेदी (III) विवशेषज्ञ साक्षी (पुरालेखवेत्ता और इति हासकार)

15. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 9 र्डॉ. र्टी.पी. वमा: (IV) विवशेषज्ञ साक्षी (पुरालेखवेत्ता)

16. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 10 र्डॉ. वोल्यूविवल व्यासरायशास्त्री रमेश

17. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 15 र्डॉ. एम.ए+. कट्टी (V) विवशेषज्ञ साक्षी (इति हासकार)

18. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 11 र्डॉ. स ीश चंˆ विमत्तल (VI) विवशेषज्ञ गवाह (*ार्मिमक मामले)

19. ओ.पी.र्डब्ल्यू. 16 Sगद्गुरु रामा+ंदाचाय: स्वामी राम भˆाचाय:

277. (ग) वादी द्वारा वाद-1 में प्रस् ु साक्षी: (I) थ्यों क े साक्षी:

1. र्डी.र्डब्ल्यू. 1/1 श्री राSेंˆ सिंसह

2. र्डी.र्डब्ल्यू. 1/2 श्री क ृ ष्र्ण चंˆ सिंसह

3. र्डी.र्डब्ल्यू. 1/3 श्री सहदेव प्रसाद दुबे

278. (घ) वादी द्वारा वाद-3/1989 में प्रस् ु साक्षी: (I) थ्यों क े साक्षी:

1. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/1 महं भास्कर दास

2. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/2 श्री राSा राम पांर्डे

3. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/3 श्री सत्य +ारायर्ण वित्रपाठी

4. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/4 महं णिशव सर+ दास

5. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/5 श्री रघु+ार्थी प्रसाद पांर्डे

6. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/6 श्री सी ा राम यादव

7. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/7 महं रामSी दास

8. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/8 पं. श्याम सुंदर विमश्रा उफ: बड़कऊ महराS

9. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/9 श्री राम अासरे यादव

10. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/11 श्री भा+ु प्र ाप सिंसह

11. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/12 श्री राम अक्षयबर पांर्डे

12. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/13 महं राम सुभाग शास्त्री mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

13. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/15 +रेंˆ बहादुर सिंसह

14. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/16 श्री णिशव भीख सिंसह

15. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/17 श्री मा ा बदल ति वारी

16. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/18 श्री आचाय: महं बंसी*र दास उफ: उविड़या बाबा

17. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/19 श्री राम विमल+ सिंसह

18. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/20 महं राSा रामचंˆ -आचाय: (II) अन्य:

19. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/10 श्री प ेश्वरी दत्त पांर्डे

20. र्डी.र्डब्ल्यू. 3/14 Sगद् गुरु रामा+ंदाचाय: स्वामी हया:चाय:

279. (ङ) वाद-4 में प्रति वादी 2/1 द्वारा प्रस् ु साक्षी: (I) थ्यों क े साक्षी:

1. र्डी.र्डब्ल्यू. 2/1-3 महं राम विवलास दास वेदान् ी (II) अन्य:

2. र्डी.र्डब्ल्यू. 2/1-1 श्री राSेंˆ

3. र्डी.र्डब्ल्यू. 2/1-2 श्री राम सर+ श्रीवास् व

280. (च) वाद-4 में प्रति वादी 13/1 द्वारा प्रस् ु साक्षी: (I) विवशेषज्ञ साक्षी (इति हासकार):

1. र्डी.र्डब्ल्यू. 13/1-3 र्डॉ. विबश+ बहादुर (II) अन्य:

2. र्डी.र्डब्ल्यू. 13/1-1 महं *म: दास

3. र्डी.र्डब्ल्यू. 13/1-2 महं अव* विबहारी दास पाठक

281. (छ) वाद-4 में प्रति वादी 17 द्वारा प्रस् ु साक्षी: (I) थ्यों क े साक्षी:

1. र्डी.र्डब्ल्यू. 17/1 श्री रमेश चंˆ वित्रपाठी

282. (S) वाद-4 में प्रति वादी 20 द्वारा प्रस् ु साक्षी: (I) थ्यों क े साक्षी:

1. र्डी.र्डब्ल्यू. 20/1 श्री शणिश कां रू ं गर्टा

2. र्डी.र्डब्ल्यू. 20/4 श्री एम.एम. गुप्ता (II) विवशेषज्ञ साक्षी (*ार्मिमक मामले)

3. र्डी.र्डब्ल्यू. 20/2 स्वामी अवमुX े श्वर+ और सरस्व ी

4. र्डी.र्डब्ल्यू. 20/3 ब्रम्चारी राम रक्षा+ंद (III) विवशेषज्ञ साक्षी (पुरा त्ववेत्ता) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

5. र्डी.र्डब्ल्यू. 20/5 श्री Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व

283. (i) वाद-3 में प्रति वादी 6/1 द्वारा प्रस् ु साक्षी: (I) विवशेषज्ञ साक्षी (पुरा त्ववेत्ता):

1. र्डी.र्डब्ल्यू. 6/1-2 श्री मो. आविबद (II) अन्य:

2. र्डी.र्डब्ल्यू. 6/1-1 श्री हाSी महबूब अहमद।" सिस.प्र.सं. क े आदेश X वि+यम 2 क े ह कर्थी+

45. मुकदमे की सु+वाई क े दौरा+, विवचारर्ण न्यायालय +े दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा, 190814 (“सी.पी.सी.”) क े आदेश X वि+यम 2 क े उपबं*ों क े ह पक्षकारों और उ+क े प्लीर्डर क े कर्थी+ अणिभखिलखिख विकए। विद+ांक 8 अगस् 1962 को, यह सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से कहा गया र्थीा विक: “वाद में प्रति वाविद संपखित्त सव:शविXमा+ अल्लाह को समर्मिप संपखित्त है और बड़े पैमा+े पर मस्जिस्Sद संपूर्ण: मुस्जिस्लम समुदाय क े उपयोग क े खिलए है।” 14 2. पक्षकार की मौखिखक परीक्षा, अर्थीवा पक्षकार क े सहयोगी-(1) मुकदमे की पहली सु+वाई में, यह न्यायालय- (क) वाद में विववाविद विवषयों को स्पष्ट कर+े की दृविष्ट से, व्यविXग रूप से या न्यायालय में उपस्जिस्र्थी वाद क े पक्षकारों में मौखिखक रूप से परीक्षा करेगा, Sो वह उतिच समझे; और (ख) विकसी भी व्यविX क े मुकदमे की मौखिखक रूप से Sांच कर सक ा है, Sो विक वाद से संबंति* विकसी भी सारवा+ प्रश्न का उत्तर दे+े में सक्षम है, सिSसक े द्वारा विकसी भी व्यविX को न्यायालय में प्रस् ु विकया Sा ा है अर्थीवा न्यायालय में उपस्जिस्र्थी हो ा है। (2) विकसी पश्चा व - सु+वाई में, न्यायालय विकसी पक्षकार या न्यायालय में उपस्जिस्र्थी विकसी पक्षकार या विकसी व्यविX का मौखिखक रूप से परीक्षर्ण कर सक े गा, Sो वाद से संबंति* विकसी सारवा+ प्रश्न का उत्तर दे+े में समर्थी: हो, सिSसक े द्वारा ऐसा पक्षकार अर्थीवा उसका प्लीर्डर सार्थी रख ा है। (3) न्यायालय यविद उतिच समझ ा है ो विकसी भी पक्षकार द्वारा सुझाए गए इस वि+यम प्रश्नों क े ह परीक्षा क े अ+ुक्रम में रख सक े गा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विद+ांक 28 अगस् 1963 को सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा यह कहा गया र्थीा विक विवकल्प में भले ही प्रति वाविदयों का संपखित्त में कोई अति*कार र्थीा, यह समय की कमी से समाप्त हो गया और वादी (सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड:) +े प्रति क ू ल कब्Sे का स्वत्व प्राप्त कर खिलया र्थीा। विद+ांक 11 S+वरी 1996 को श्री Sफरयाब सिSला+ी का कर्थी+, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की रफ से उपस्जिस्र्थी वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा को इस आशय क े खिलए दS: विकया गया विक: "यह विक मस्जिस्Sद अयोध्या में रामकोर्ट क े +ाम से प्रसिसद्ध मोहल्ला, कोर्ट रामचंˆ क े 1931 क े खसरा क े +ाज़ुल प्लॉर्ट सं. 583 पर स्जिस्र्थी र्थीी।" विद+ांक 22 अप्रैल 2009 को वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा श्री ज़फ़रयाब सिSला+ी क े वि+म्+खिलखिख कर्थी+ को सिसप्रसं क े आदेश X वि+यम 2 क े ह अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा: "इस मामले क े उद्देश्य क े खिलए बाल्मीविक रामायर्ण में वर्भिर्ण अर्थीवा व:मा+ क े अ+ुसार अयोध्या में भगवा+ राम क े Sन्म क े संबं* में भगवा+ राम क े भXों क े विवश्वास पर कोई विववाद +हीं है। हालांविक, यह विववाविद और इ+कार विकया गया है विक बाबरी मस्जिस्Sद का स्र्थीा+ भगवा+ राम क े Sन्म का स्र्थीा+ र्थीा। इस बा से भी इ+कार विकया गया विक विकसी भी समय बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर कोई राम Sन्मभूविम मंविदर र्थीा। उन्नीसवीं श ाब्दी क े उत्तरा*: से वि+म ही अखाड़ा का अस्जिस् त्व भी विववाविद +हीं है। हालाँविक, यह इ+कार विकया गया और विववाविद है विक वि+म ही अखाड़ा विवशेष रूप से अयोध्या में 16 वीं श ाब्दी ईस्वी अर्थीवा 1528 ईस्वी में अस्जिस् त्व में र्थीा और यह भी इ+कार विकया गया विक विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 क बाबरी मस्जिस्Sद की इमार में कोई भी मूर्ति याँ +हीं र्थीीं।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुस्जिस्लम पक्षकारों का प्रति वि+ति*त्व कर+े वाले अन्य अति*वXा की ओर से इसी रह क े कर्थी+ विकये गए र्थीे। अन्य शब्दों में, इस न्यायालय क े समक्ष हिंहदुओं क े आस्र्थीा और विवश्वास क े संबं* में कोई विववाद +हीं है Sैसा विक वाल्मीविक क े रामायर्ण में वर्भिर्ण है विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ है। यह विववाविद है विक क्या बाबरी मस्जिस्Sद क े क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे विववाविद स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है। मुस्जिस्लम पक्षकारों +े बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर राम Sन्मभूविम मंविदर क े अस्जिस् त्व को स्पष्ट रूप से +कार विदया है। इस पृष्ठभूविम क े सार्थी, दस् ावेSी साक्ष्य क े मुख्य पहलुओं का उल्लेख कर+ा आवश्यक हो Sा ा है Sो अणिभलेख पर प्रकर्ट विकया गया है।

46. वष: 1856-7 में एक सांप्रदातियक दंगा हुआ। ऐति हासिसक लेखों से संक े विमल ा है विक इस दंगे का क े न्ˆ विबन्दु ह+ुमा+गढ़ी और बाबरी मस्जिस्Sद र्थीा। क ु छ लेख यह ब ा े हैं विक घर्ट+ा से पूव:, मुस्जिस्लमों और हिंहदुओं की पूSा क े उद्देश्य क े खिलए मस्जिस्Sद क े क्षेत्र क पहुंच र्थीी। औपवि+वेणिशक सरकार की सत्ता का हस् ां रर्ण क े सार्थी यह घर्ट+ा काफी वि+कर्ट र्थीी। इस घर्ट+ा क े कारर्ण मस्जिस्Sद क े बाहर एक वि£ल-ई ंर्ट की दीवार से ब+ी एक रेलिंलग स्र्थीाविप हुई। इसका उद्देश्य स्र्थील पर शांति और विवति* व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+े क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA होगा। रेलिंलग +े आं रिरक अहा े (सिSसमें मस्जिस्Sद का ढाँचा स्जिस्र्थी र्थीा) का विद्वभाS+ विकया और बाह्य अहा े में शेष क्षेत्र शाविमल र्थीा। रेलिंलग का समन्वायोS+ आं रिरक और बाह्य चहारदीवारी पर माखिलका+ा अति*कारों का वि+*ा:रर्ण +हीं र्थीा बस्जिल्क दो+ों समुदायों क े बीच शांति व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+े क े खिलए विकया गया र्थीा। वि+र्ण:य का यह खंर्ड विववाविद स्र्थील पर वष: 1856- 7 क े बाद क े प्रभावी दस् ावेSी साक्ष्य, आं रिरक और बाह्य चहारदीवारी में वि+रं र झड़प, विवणिभन्न विववाविदयों क े बीच की काय:वाही और आं रिरक अहा े में हिंहदुओं द्वारा पूSा कर+े का दावा कर ा है। साक्ष्य वि+म्+खिलखिख प्रकार हैं: (i) विद+ांक 28 +वंबर, 1858 को शी ल दुबे Sो अव*15 क े र्थीा+ेदार र्थीे, द्वारा एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की गई र्थीी। रिरपोर्ट: में एक घर्ट+ा की बा कही गई सिSसक े दौरा+ एक वि+हंग सिसख +े मस्जिस्Sद क े अंदर हव+ और पूSा का आयोS+ विकया र्थीा, सिSस+े एक *ार्मिमक प्र ीक की स्र्थीाप+ा की र्थीी। रिरपोर्ट: में कहा गया है: "आS पंSाब क े वि+वासी श्री वि+हांग सिंसह फकीर खालसा +े गुरु गोहिंबद सिंसह क े हव+ और पूSा का आयोS+ विकया और मस्जिस्Sद परिरसर में श्री भगवा+ का प्र ीक स्र्थीाविप विकया। प्र ीक की स्र्थीाप+ा क े समय, सुरक्षा क े खिलए 25 सिसख वहां ै+ा र्थीे। इसखिलए यह आवश्यक प्र ी हुआ। आपकी उन्नति हो। प्रसन्न ा।” (ii) मस्जिस्Sद16 क े मुअखिज्जम सैयद मोहम्मद ख ीब द्वारा एक आवेद+ प्रस् ु विकया गया र्थीा। आवेद+ का विवषय र्थीा+ेदार अव* की रिरपोर्ट: र्थीी। आवेद+ में 15 प्रदश: 19 16 प्रदश: 20 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कहा गया विक ''महं वि+हांग सिंसह फकीर'' "अव* में स्जिस्र्थी Sन्म स्र्थीा+ मस्जिस्Sद" में दंगा कर रहा र्थीा. आवेद+ में कहा गया है: ''मेहराब और विमम्बर क े पास, उन्हों+े इस मामले क े अन्दर पृथ्वी चबू रे का वि+मा:र्ण लगभग चार उंगखिलयों से माप े हुए और उसमें क ं कड़ों(क ं क्रीर्ट) द्वारा भरकर विकया है। प्रकाश व्यवस्र्थीा की गई है... और लगभग 11/4 गS चबू रे की ऊ ं चाई बढ़ा+े क े बाद मूर्ति की एक छविव रख दी गई और उसक े पास एक गड्ढा खोद+े क े बाद, मुंर्डेर की दीवार को पक्का ब+ाया गया है। वहां रोश+ी और पूSा क े खिलए अविग्न प्रज्वखिल की गई है और होम वहीं हो रहा है। संपूर्ण: मस्जिस्Sद में कोयले से 'राम राम' खिलख विदया गया है। क ृ पया, न्याय करें। यह मुस्जिस्लमों पर हिंहदुओं का खुला अत्याचार और अत्यति*क म+मा+ा है और + विक हिंहदुओं का। पहले Sन्मस्र्थीा+ का प्र ीक सैकड़ो वषÂ से र्थीा और विहन्दुओं +े पूSा की र्थीी। अव* सरकार क े र्थीा+ेदार णिशव गुलाम क े षड्यंत्र क े कारर्ण बैराविगयों +े रा भर में एक "बाखिलश् " की ऊ ं चाई क एक चबू रा वि+र्मिम विकया Sब क व्यादेश क े आदेश Sारी +हीं विकए गए। उस समय उपायुX +े र्थीा+ेदार को वि+लंविब कर विदया और बैराविगयों पर Sुमा:+ा लगाया गया। अब चबू रे को लगभग 11/4 गS क उठाया गया है। इस प्रकार स्पष्ट ः ज्याद ी साविब हुई है। इसखिलए, यह अ+ुरो* विकया गया है विक को वाल सिसर्टी मु:Sा खा+ को आदेणिश विकया Sा सक ा है विक वह खुद मौक े पर Sाएं और +ए वि+मा:र्णों का वि+रीक्षर्ण करें और उन्हें ध्वस् (उसी प्रकार) कर दें और हिंहदुओं को वहां से बाहर कर दें; प्र ीक और मूर्ति को वहां से हर्टा विदया Sा सक ा है और दीवारों पर खिलख+ा *ोया Sा सक ा है।" आवेद+ की अन् व:स् ु से संक े विमल ा है विक इस समय क मस्जिस्Sद क े अंदर एक चबू रे का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा सिSसमें एक मूर्ति रखी गई र्थीी। आग Sलाई गई र्थीी और पूSा की व्यवस्र्थीा की गई र्थीी। वि+ःसंदेह रेलिंलग आं रिरक अहा े अर्थीवा मस्जिस्Sद क े अहा े क +हीं पहुंच पा ी र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) र्थीा+ेदार द्वारा 1 विदसंबर 1858 को वि+हंग सिंसह फ़कीर को सम+ कर े हुए एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की गई, Sो मस्जिस्Sद Sन्म स्र्थीा+17 क े भी र वि+वास कर रहा है।रिरपोर्ट: में कहा गया है विक उन्हों+े "उX फकीर" क े खिलए सम्म+ खिलया र्थीा और उसकी भत्स:+ा की गई र्थीी सिSसक े बावSूद वह इस बा पर Sोर दे े रहे विक ''हर स्र्थीा+ वि+रंकर का है;'' (iv) र्थीा+ेदार द्वारा सम+18 की ामील को उपदर्भिश कर े हुए विद+ांक 6 विदसंबर, 1858 को एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की गई र्थीी। (v) मोहम्मदी शाह Sो रामकोर्ट मोहल्ले क े वि+वासी हैं, को 9 अप्रैल, 1860 विद+ांविक को एक आवेद+ विकया गया र्थीा सिSसमें £ाम रामकोर्ट क े संबं* में पट्टे क े स्र्थीग+ की मांग की गई र्थीी, Sब क विक यह वि+र्ण:य +हीं खिलया गया र्थीा विक भूविम +Sूल भूविम19 है अर्थीवा +हीं; (vi) विद+ांक 5 +वंबर, 1860 को उपायुX को "बाबरी मस्जिस्Sद अव* क े भी र"20 ब+ाए गए चबू रे को हर्टा+े क े खिलए एक आवेद+ विकया गया र्थीा। आवेद+ में णिशकाय और मांगी गई राह वि+म्+खिलखिख उद्धरर्ण में इंविग की गई है: "इसक े अलावा, Sब मोअखिज्ज+ अज़ा+ कर ा है ो विवपक्षी पक्षकार शंख (शंख/+ाक़ ू स) बSा+ा प्रारम्भ कर दे ा है। ऐसा पहले कभी +हीं हुआ। मैं यह प्रार्थी:+ा कर+ा चाहूँगा विक आप दो+ों पक्षों क े खिलए न्याया*ीश हैं। 17 प्रदश: 21 18 प्रदश: 22 19 प्रदश: 23 20 प्रदश: 31 15 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवपरी पक्ष को उसक े गैरका+ू+ी क ृ त्य से रोका Sा+ा चाविहए और उतिच Sांच क े बाद +ववि+र्मिम चबू रे को, Sो कभी मौSूद +हीं र्थीा, क ृ पया ध्वस् विकया Sाए औरएक बं*+ को विवपरी पक्ष से इस आशय से वि+ष्पाविद विकया Sाए विक वह गैरका+ू+ी और अवै* रूप से मस्जिस्Sद की संपखित्त में हस् क्षेप +हीं करेगा और अज़ा+ क े समय शंख (शंख /+ाक़ ू स) +हीं बSाएगा।" (vii) आवेद+ से संक े विमल ा है विक इस समय +माज़ मस्जिस्Sद में की Sा रही र्थीी। मोअखिज्ज+ क े अज़ा+ क े समय हिंहदुओं द्वारा शंख बSाई Sा ी र्थीी। एक विववादास्पद स्जिस्र्थीति पैदा हो रही र्थीी। फल ः वि+हंग सिसख को स्र्थील से बाहर कर विदया गया और अणिभलेख को पोविष विकया गया। (viii) वष: 1877 अर्थीवा उसक े आसपास बाह्य अहा े का अन्य दरवाSा पूव: विदशा में विवद्यमा+ द्वार क े अति रिरX प्रशास+ द्वारा उत्तरी स्र्थील पर खोले Sा+े की अ+ुज्ञा दी गई र्थीी। उपायुX +े Sन्मस्र्थीा+21 की दीवार खोले Sा+े क े विवरूद्ध णिशकाय दS: कर+े से इ+कार कर विदया। उपायुX का आदेश कह ा है विक: "हाल ही में Sन्म-स्र्थीा+ की दीवार में एक द्वार खोला गया है Sो बाबरी मस्जिस्Sद में +हीं बस्जिल्क साम+े की दीवार में एक रेलिंलग द्वारा मस्जिस्Sद से विवभासिS है। यह द्वार Sन्म-स्र्थीा+ क े आगं ुकों को अ+ुक ू ल विद+ों में एक अलग माग: दे+े क े खिलए आवश्यक र्थीा। यह क े वल एक द्वार का खोला Sा+ा र्थीा, इसखिलए लोगों का Sमघर्ट (मूल ः भीड़) अत्यति*क र्थीा और Sीव+ ख रे में र्थीा। मैं+े खुल+े वाले स्र्थीा+ का आकल+ स्वयं विकया और विकसी भी यूरोप अति*कारी को प्रति वि+युविX कर+े की कोई आवश्यक ा +हीं पड़ी। यह यातिचका क े वल उस दूसरे दरवाSे को खोल+े अर्थीवा बंद कर+े क े खिलए +हीं बस्जिल्क मस्जिस्Sद क े व्यविXयों की प्रसन्न ा 21 प्रदश: 15 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर वि+भ:र करक े हिंहदुओं को +ाराS कर+े का एक प्रयास है सिSसमें मुस्जिस्लमों को कोई अणिभरूतिच +हीं हो सक ी।" (प्रभाव वर्ति* ) यह विद+ांक 13 विदसंबर 1877 को एक अपील को खारिरS कर े हुए आयुX द्वारा स्वीकार विकया गया र्थीा विक: "लोक सुरक्षा क े विह में उपायुX द्वारा खोले गए प्रश्नग द्वार क े खिलए मैं हस् क्षेप कर+े से इन्कार कर ा हूं। अपील खारिरS की Sा ी है।" (ix) न्यायमूर्ति अ£वाल +े विवशेष रूप से मोअखिज्ज+ क े आवेद+ 30 +वंबर, 1858 विद+ांविक सविह उपरोX दस् ावेSी साक्ष्य से संक े विकया है। आवेद+ में मेहराब और विमम्बर क े पास चबू रे क े वि+मा:र्ण की णिशकाय की गई र्थीी, सिSस पर एक मूर्ति स्र्थीाविप की गई र्थीी। यह णिशकाय उस पूSा को संदर्भिभ कर ी है Sो आग Sला+े और पूSा कर+े क े द्वारा की Sा रही र्थीी। पत्र में खिलखा है विक पहले Sन्मस्र्थीा+ का प्र ीक सैकड़ों वषÂ से अस्जिस् त्व में र्थीा और विहन्दुओं +े पूSा की र्थीी। न्यायमूर्ति अ£वाल +े उल्लेख विकया है विक इस दस् ावेS की वास् विवक ा वाद में वादी द्वारा विववाविद +हीं की गई है अर्थीवा यह उस व्यविX द्वारा खिलखा गया है सिSसकी पहचा+ विववाविद +हीं र्थीी। विवद्व न्याया*ीश +े अव*ारिर विकया विक दस् ावेज़ में स्वीकारोविX अन् र्मिवष्ट हैं Sो यह प्रमाणिर्ण कर े हैं विक हिंहदुओं +े बाह्य अहा े में सी ा रसोई और आन् रिरक अहा े में रामचबू रे सविह विववाविद भव+ क े अंदर स रूप से प्रार्थी:+ाएँ की र्थीीं। हालाँविक, काय:वाही क े दौरा+ वाद 4 में वादी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की रफ से प्रस् ु विवद्वा+ अति*वXा श्री मो. वि+Sामुद्दी+ पाशा +े प्रदश: क े अ+ुवाद को चु+ौ ी दी है। (x) मोहम्मद असगर +े 374/943 वष: 188223 क े महं रघुबर दास, वि+म ही अखाड़ा क े विवरूद्ध वाद गविठ की, सिSसमें बाबरी मस्जिस्Sद क े दरवाSे क े पास फसली वष: 1288 में राम +वमी क े अवसर पर कार्ति क मेला आयोसिS कर+े हे ु चबू रे और ख क े उपयोग क े खिलए विकराए का दावा विकया गया। उप-न्याया*ीश, फ ै Sाबाद द्वारा विद+ांक 18 Sू+ 1883 को वाद खारिरS कर विदया गया। (xi) वष: 1856-7 में रेलिंलग का वि+मा:र्ण आं रिरक और बाह्य अहा े क े बीच अलगाव का एक पैमा+े क े चल े बाह्य अहा े में रेलिंलग क े वि+कर्ट हिंहदुओं द्वारा एक चबू रे का वि+मा:र्ण हुआ। रामचबू रा +ामक मंच विहन्दुओं क े खिलए पूSा स्र्थील ब+ गया। (xii) विद+ांक 29 S+वरी, 1885 को स्वयं को "अयोध्या में Sन्मस्र्थीा+ का महं " वर्भिर्ण कर े हुए महं रघुबर दास द्वारा मुंसिसफ, फ ै Sाबाद क े न्यायालय में एक वाद चलाया गया। एकमात्र प्रति वादी Sो परिरषद24 में भार क े राज्य सतिचव र्थीे। मुकदमे में Sो राह मांगी गई र्थीी वह एक व्यादेश र्थीी Sो प्रति वादी को 17x21 फीर्ट क े मा++े वाले चबू रे क े ऊपर मंविदर क े वि+मा:र्ण में बा*ा र्डाल+े से रोक+ा र्थीा। वादपत्र में कहा गया विक अयोध्या में Sन्मस्र्थीा+ *ार्मिमक महत्व का स्र्थीा+ है और वादी उस स्र्थीा+ का महं है। चरर्ण पादुका को चबू रा पर तिचपका विदया गया और इसक े बगल में ब+े एक छोर्टे से मंविदर की पूSा की गई। वादी +े कहा विक अप्रैल 1883 में, उपायुX, 23 प्रदश: 24 24 मुकदमे की प्रमाणिर्ण प्रति खिलविप वाद 1 में प्रदश: ए-22 है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA फ ै Sाबाद +े मुस्जिस्लमों की आपखित्त पर काय: विकया, एक मंविदर क े वि+मा:र्ण में बा*ा र्डाली। एक बाउंर्ड्री रेलिंलग क े भी र "मस्जिस्Sद" क े रूप में वर्भिर्ण ी+ गुंबददार संरच+ा को विदखा े हुए एक मा+तिचत्र संलग्न विकया गया र्थीा। वादपत्र में संलग्न मा+तिचत्र में उत्तर और पूव- विदशा पर बाह्य अहा े में दो प्रवेश द्वारों का संक े विदया गया है। मस्जिस्Sद क े मु वल्ली क े रूप में मोहम्मद असगर को वाद क े दूसरे प्रति वादी क े रूप में प्रत्यारोविप विकया गया र्थीा। उन्हों+े विद+ांक 22 विदसंबर, 1885 को एक खिलखिख कर्थी+ दायर विकया सिSसमें कहा गया र्थीा विक बाबर +े एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण करक े वक्फ ब+ाया और दरवाSे क े ऊपर “अल्लाह” शब्द उत्कीर्भिर्ण करवाया र्थीा। बाबर +े भी इसक े रखरखाव क े खिलए अ+ुदा+ घोविष विकया र्थीा। मोहम्मद असगर +े क: प्रस् ु विकया विक मस्जिस्Sद क े परिरसर में भूविम क े उपयोग क े खिलए कोई अ+ुमति प्रदा+ +हीं गई र्थीी। यह प्रकणिर्थी र्थीा विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की ारीख से वष: 1856 क कोई चबू रा +हीं र्थीा और इसका वि+मा:र्ण क े वल 1857 में विकया गया र्थीा। मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए प्रार्थी:+ा का विवरो* विकया गया र्थीा; और उपरोX वाद को उप-न्याया*ीश +े विद+ांक 24 विदसंबर 1885 को खारिरS कर विदया र्थीा। विवचारर्ण न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक: (क) चबू रा वादी क े कब्Sे में र्थीा, सिSसे दूसरे प्रति वादी द्वारा विववाविद +हीं विकया गया र्थीा; (ख) उस क्षेत्र को एक दीवार की रेलिंलग द्वारा विवभासिS विकया गया र्थीा, सिSसमें प्रमुख ढांचे को बाह्य अहा े से अलग विकया गया र्थीा, Sहां हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े बीच विकसी भी विववाद को रोक+े क े खिलए चबू रा मौSूद र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ग) 1885 में हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े बीच हुए दंगों क े कारर्ण रेलिंलग का वि+मा:र्ण आवश्यक हो गया र्थीा; (घ) विवभाS+ इस प्रकार विकया गया विक मुस्जिस्लमों क े द्वारा अंदर और विहन्दुओं क े द्वारा बाहर प्रार्थी:+ा की Sा सक े; (ङ) चूंविक मस्जिस्Sद और मंविदर Sा+े का क्षेत्र वही र्थीा परं ु वह स्र्थीा+ Sहां हिंहदुओं +े पूSा की र्थीी वह उ+क े कब्Sे में र्थीी और उसक े स्वाविमत्व क े विवषय में कोई विववाद +हीं हो सक ा र्थीा; और (च) यद्यविप वह व्यविX Sो माखिलक है और सिSसका कब्Sा र्थीा वह वि+मा:र्ण कर+े का हकदार है, विकसी मस्जिस्Sद से इ +े वि+कर्ट मंविदर ब+ा+े की अ+ुज्ञा दे+े से विहन्दू और मुस्जिस्लमों क े बीच गंभीर विववाद हो सक ा है और विवति* व्यवस्र्थीा की समस्या पैदा हो सक ी है। इस आ*ार पर वाद खारिरS कर विदया गया। विवचारर्ण न्यायालय की तिर्डक्री क े विवरूद्ध, महं रघुबर दास द्वारा एक अपील दायर की गई र्थीी, Sबविक मोहम्मद असगर द्वारा आपखित्तयां दायर की गई र्थीीं। S+पद न्याया*ीश क े वि+र्ण:य 18/26 माच: 1886 विद+ांविक द्वारा वादी की अपील को खारिरS कर विदया गया। S+पद न्याया*ीश +े यह अव*ारिर विकया विक यह "अत्यति*क दुभा:ग्यपूर्ण:" र्थीा विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण उस भूविम पर विकया Sा+ा चाविहए Sो विवशेष ः हिंहदुओं द्वारा पविवत्र अणिभवि+*ा:रिर की गई र्थीी हिंक ु वि+मा:र्ण 358 वष: पूव: विकया गया र्थीा, इस प्रविक्रया को बदल+े क े खिलए बहु देर हो चुकी र्थीी। वाद को इस आ*ार पर खारिरS कर विदया गया र्थीा विक ऐसी कोई क्षति +हीं हुई र्थीी Sो वादी को कार:वाई का अति*कार दे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक े । मोहम्मद असगर की आपखित्तयों पर, S+पद न्याया*ीश +े यह अव*ारिर विकया विक विवचारर्ण न्यायालय का वि+ष्कष: यह र्थीा विक वादी विववाविद भूविम का अवावश्यक स्वामी र्थीा और वह वि+ष्कासिस हो+ा चाविहए। दूसरी अपील विद+ांक 1 +वंबर 1886 को अव* क े न्यातियक आयुX द्वारा इस आ*ार पर खारिरS कर दी गई र्थीी विक (i) यह अणिभलेख पर विदखा+े क े खिलए क ु छ भी +हीं र्थीा विक वादी प्रश्नग भूविम का स्वामी र्थीा; और (ii) पक्षकारों को यर्थीास्जिस्र्थीति अशां कर+े की अ+ुमति दे+ा सव:र्थीा अ+ुतिच र्थीा, विवशेष ः Sब मस्जिस्Sद लगभग 350 वषÂ से अस्जिस् त्व में र्थीी। न्यातियक आयुX +े अव*ारिर विकया विक: "बा बस इ +ी सी है विक अयोध्या क े हिंहदू श्री राम चंˆ की Sन्मस्र्थीली कहे Sा+े वाले अयोध्या में कणिर्थी पविवत्र स्र्थीा+ पर एक +या मंविदर अर्थीवा संगमरमर का म°र्डपम् ब+ा+ा चाह े हैं। अब यह स्र्थीा+ सम्रार्ट बाबर की *माãन्* ा और वि+रंक ु श ा क े कारर्ण लगभग 350 वष: पूव: वि+र्मिम एक मस्जिस्Sद क े चारों ओर क े मैदा+ क े परिरसर क े भी र स्जिस्र्थी है, सिSस+े हिंहदुओं क े पौराणिर्णक कर्थीा क े अ+ुसार इस पविवत्र स्र्थीा+ को मस्जिस्Sद क े स्र्थील क े रूप में चु+ा र्थीा। ऐसा प्र ी हो ा है विक विहन्दुओं को मस्जिस्Sद से सर्टे अहा े क े भी र क ु छ स्र्थीा+ों क पहुंच+े क े बहु सीविम अति*कार प्राप्त हैं और उ+क े पास कई वषÂ से दुरा£हपूव:क उ+ अति*कारों को बढ़ा+े और संलग्नक में वर्भिर्ण दो स्र्थीा+ों पर भव+ों को स्र्थीाविप कर+े का प्रयास विकया Sा रह है: (क) सी ा की रसोई (ख) राम चंˆ की Sन्म भूविम। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA काय:कारी प्राति*कारिरयों +े दुरा£हपूव:क इ+ अति क्रमर्णों से इ+कार विकया है और 'यर्थीास्जिस्र्थीति ' क े विकसी भी परिरव:+ को पूर्ण: ः म+ा विकया है। मुझे लग ा है विक यह उ+की ओर से बहु ही बुतिद्धमत्तापूर्ण: और उतिच प्रविक्रया है और मेरा यह म है विक दीवा+ी न्यायालयों +े वादी क े दावे को उतिच ढंग से खारिरS कर विदया है।” यह मुद्दा विक क्या वाद में वि+ष्कष: पूव:न्याय क े रूप में काय: करेंगे, वि+र्ण:य क े पश्चा व - अ+ुभाग में वि+पर्टा Sाएगा। वष: 1855-56 में Sो र्टकराव हुआ उसका + ीSा ई ंर्ट की दीवार और मस्जिस्Sद क े बाहर रेलिंलग का हो+ा र्थीा। अहा े क े इस विवभाS+ को आन् रिरक भाग Sो रेलिंलग क े भी र और बाह्य भाग उसक े परे विवभासिS विकया गया है। बाह्य भाग में स्जिस्र्थी स्र्थीा+ों की विहन्दुओं द्वारा पूSा की Sा ी र्थीी, उ+में से रामचबू रा और सी ा रसोई र्थीे। दो प्रवेश द्वार (उत्तर और पूव: में) बाह्य अहा े क पहुँच प्रदा+ कर े हैं। मस्जिस्Sद में प्रवेश बाह्य अहा े क अणिभगम हिंबदुओं क े माध्यम से र्थीा। D.[2] 1934-1949 क े बीच की अवति*

47. वष: 1934 में एक और सांप्रदातियक घर्ट+ा हुई सिSसक े दौरा+ मस्जिस्Sद को क्षति पहुँची र्थीा सिSसे बाद में पु+स्र्थीा:विप कर विदया गया। दस् ावेSी साक्ष्य Sो अणिभलेख पर प्रस् ु विकया गया है Sो यह दशा: ा है विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) औपवि+वेणिशक प्रशास+ +े मस्जिस्Sद क े क्षति £स् ढांचे की मरम्म और +वी+ीकरर्ण क े काय: को मंSूरी दी; (ii) मस्जिस्Sद को हुई क्षति क े खिलए विहन्दुओं पर Sुमा:+ा अति*रोविप विकया गया र्थीा; (iii) पु+स्र्थीा:प+ का काय: ऐसे मुस्जिस्लम ठेक े दार को सौंपा गया र्थीा सिSसक े पास अवै वि+क विबलों क े भुग ा+ पर और विकए गए काय: क े सत्याप+ क े खिलए पत्राचार का आदा+-प्रदा+ हुआ र्थीा; (iv) यह मु वल्ली क े सार्थी बकाए वे + क े भुग ा+ पर मस्जिस्Sद क े पेश इमाम द्वारा दावा विकया गया र्थीा; और (v) मरम्म क े काय: पर प्रशास+ द्वारा +माS प्रारम्भ कर+े की व्यवस्र्थीा की अ+ुमति दी गई। (वाद 4 में, र्डॉ. राSीव *व+ और श्री Sफरयाब सिSला+ी +े मस्जिस्Sद की स्जिस्र्थीति और +माS क े काय: क े संक े क े रूप में इस दस् ावेSी साक्ष्य पर अवलम्ब खिलया है)।

48. माच: और विदसंबर 1949 क े बीच कई घर्ट+ाएं घर्टीं। विद+ांक 19 माच: 1949 को वि+म ही अखाड़े क े पंचों द्वारा कणिर्थी रूप से अखाड़े क े रीति - रिरवाSों को खिलख+े में कमी ला+े क े खिलए काय: को वि+ष्पाविद विकया गया र्थीा। इस दस् ावेS25 में "Sन्मभूविम का मंविदर" क े संबं* में वि+म्+खिलखिख उपबं* शाविमल र्थीे, सिS+में से प्रबं*+ को अखाड़े में वि+विह कर+े का दावा विकया गया र्थीा: 25 वाद 3 में प्रदश: 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ''अयोध्या शहर क े राम घार्ट मोहल्ले में Sन्म भूविम मंविदर स्जिस्र्थी है, Sो इस अखाड़े क े बैठक क े अं ग: आ ा है और इसका संपूर्ण: प्रबं*+ इस अखाड़े पर विवश्वास कर ा है। यह महं और प्रबं*क क े रूप में अखाड़े क े महं क े +ाम पर है। यह अयोध्या का मूर्ति की पूSा का सवा:ति*क प्रति विष्ठ और भव्य मंविदर है। भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ हो+े क े कारर्ण यह अयोध्या का मुख्य मंविदर है। यहां भगवा+ राम ललाSी और अन्य देव ा भी स्र्थीाविप हैं।''

49. वाद 4 में वादी की रफ से प्रस् ु वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े अप+े कÂ क े दौरा+ यह आ£ह विकया विक उत्तर प्रदेश राज्य क े अति*कारिरयों क े बीच संचार का आदा+-प्रदा+ प्रदर्भिश कर ा है विक उ+क े पास मस्जिस्Sद क े अन्दर योS+ाबद्ध रीक े से मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर+े क े बारे में पूव: सूच+ा र्थीी सिSसक े कारर्ण मस्जिस्Sद का अपविवत्रीकरर्ण हुआ। इसक े बावSूद, यह क: प्रस् ु विकया गया विक प्रशास+ +े इस रह की घर्ट+ा को हो+े से रोक+े क े खिलए कोई कदम +हीं उठाया। इसखिलए इस पृष्ठभूविम में उ+ घर्ट+ाओं का उल्लेख आवश्यक है सिS+क े कारर्ण विद+ांक 22-23 विदसंबर 1949 को घर्ट+ा हुई: (i) विद+ांक 12 +वंबर, 1949 को उस क्षेत्र में पुखिलस दल ै+ा विकया गया र्थीा; (ii) फ ै Sाबाद क े पुखिलस अ*ीक्षक क ृ पाल सिंसह +े विद+ांक 29 +वंबर, 1949 को फ ै Sाबाद क े उपायुX क े. क े. +ायर और सिSलाति*कारी को एक पत्र द्वारा संबोति* कर े हुए कहा विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "मैं आS शाम अयोध्या में बाबरी मस्जिस्Sद और Sन्मस्र्थीा+ क े परिरसर में गया। मैं+े देखा विक मस्जिस्Sद क े चारों ओर अ+ेक "हव+ क ुं र्ड" ब+ाए गए हैं। उ+में से क ु छ का वि+मा:र्ण वहां पहले से मौSूद पुरा+े वि+मा:र्णों पर विकया गया है।''... मुझे Sन्म स्र्थीा+ क े पास ई ं र्ट और चू+ा भी पड़ा विमला। उ+क े पास एक बहु बड़ा हव+ क ुं र्ड ब+ा+े का प्रस् ाव है Sहां बहु बड़े पैमा+े पर पूर्ण:मासी को की:+ और यज्ञ आयोसिS होगा। बाहर से कई हSार हिंहदू बैरागी और सा*ू भी इसमें भाग लेंगे। उ+की यह भी इच्छा है विक वे पूर्ण:मासी क व:मा+ की:+ Sारी रखें। यह योS+ा मस्जिस्Sद को इस प्रकार घेर ी हुई प्र ी हो ी है विक मुस्जिस्लमों क े खिलए प्रवेश बहु मुस्जिश्कल होगा और अं ः उन्हें मस्जिस्Sद छोड़+े क े खिलए मSबूर विकया Sा सक ा है। ऐसी अफवाह है विक पूर्ण:मासी पर हिंहदुओं द्वारा देव ा स्र्थीाविप कर+े क े उद्देश्य से मस्जिस्Sद में प्रवेश कर+े का प्रयत्+ विकया Sाएगा। (प्रभाव वर्ति* ) (iii) विद+ांक 10 विदसंबर, 1949 को वक्फ वि+रीक्षक मोहम्मद इब्राविहम +े मस्जिस्Sद क े सतिचव को एक रिरपोर्ट: सौंपी सिSसमें कहा गया र्थीा विक हिंहदुओं और सिसखों क े भय क े कारर्ण मुस्जिस्लमों को मस्जिस्Sद में ईसा की +माज़ (रा में +माS) अदा कर+े से रोका Sा रहा है और मस्जिस्Sद क े ख रे की आशंका यह र्थीी विक: "फ ै Sाबाद शहर में Sांच क े बाद यह प ा चला विक विहन्दुओं और सिसखों क े भय क े कारर्ण कोई भी मस्जिस्Sद में ईसा की +माज़ अदा +हीं कर ा। यविद संयोग से मस्जिस्Sद आ+े वाले विकसी भी व्यविX को हिंहदुओं द्वारा *मकाया और परेशा+ विकया Sा ा है ो.... (उसी प्रकार).... कई +म्बरदार हैं... (उसी प्रकार)..… यविद कोई मुस्जिस्लम मस्जिस्Sद में है और उसे परेशा+ और दुव्य:वहार विकया Sा ा है। मैं+े मौक े पर पूछ ाछ की Sो ब ा ी है विक उX आरोप सही हैं। स्र्थीा+ीय लोगों +े कहा विक हिंहदुओं क े कारर्ण मस्जिस्Sद बहु ख रे में है....(उसी प्रकार).... इससे पहले विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वे मस्जिस्Sद की दीवार को +ुकसा+ पहुंचा+े का प्रयास करें, यह उतिच लग ा है विक उपायुX फ ै Sाबाद को द+ुसार सूतिच विकया Sा सक ा है, ाविक कोई भी मुस्जिस्लम Sो मस्जिस्Sद में Sा रहा हो, परेशा+ विकया Sा सक ा है। मस्जिस्Sद एक शाही स्मारक है और इसे सुरतिक्ष रखा Sा+ा चाविहए।" (प्रभाव वर्ति* ) (iv) विद+ांक 16 विदसंबर, 1949 को क े.क. +ैय्यर +े उत्तर प्रदेश सरकार क े गृह सतिचव गोहिंवद +ारायर्ण को एक पत्र भेSा सिSसमें कहा गया र्थीा विक विवक्रमाविदत्य द्वारा वि+र्मिम स्र्थील पर एक "भव्य मंविदर" र्थीा सिSसे बाबर +े मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए ध्वस् कर विदया र्थीा सिSसे बाबरी मस्जिस्Sद कह े हैं। पत्र में कहा गया विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में मंविदर की वि+मा:र्ण साम£ी का उपयोग विकया गया र्थीा और हिंहदुओं को दो दीवारों क े को+े पर स्र्थील क े कब्Sे को बहाल हो+े से पूव: एक लंबा समय बी चुका र्थीा। पत्र में हाखिलया घर्ट+ाओं का संदभ: अणिभखिलखिख विकया और यह कहा गया विक: "इस वष: संभव ः अक्र्टूबर अर्थीवा +वंबर में क ु छ कब्र-र्टीले आंणिशक रूप से बैराविगयों द्वारा +ष्ट कर विदए गए र्थीे Sो इस पविवत्र स्र्थीा+ क े सार्थी ही मुस्जिस्लम संस्र्थीाओं में बहु +ाराSगी र्थीी। विद+ांक 12.11.49 को इस स्र्थीा+ पर एक पुखिलस दल ै+ा विकया गया र्थीा। दल अभी भी अति*काति*क संख्या में है। कब्र-र्टीलों को +ष्ट कर+े क े अन्य प्रयास हुए र्थीे। चार व्यविXयों को पकड़ा गया और मामले उ+क े विवरूद्ध काय:वाही की Sा रही है परं ु काफी समय से इस प्रकार का कोई प्रयास +हीं विकया गया है। फ ै Sाबाद क े अति*कांश मुस्जिस्लम इ+ घर्ट+ाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस् ु कर े आ रहे हैं और बड़े पैमा+े पर इस रिरपोर्ट: को व्यापक ा प्रदा+ कर रहे हैं विक कब्रों को व्यवस्जिस्र्थी रूप से ध्वस् विकया Sा रहा है। यह एक पूर्ण: ः झूठी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अफवाह है Sो इस क्षेत्र क े कब्Sे अर्थीवा विकसी उच्चरिरत्र क े अति*कारों से हिंहदुओं को सुरतिक्ष रख+े की इच्छा से स्पष्ट या प्रेरिर है। इस विहसाब से मुस्जिस्लमों की व्य£ ा हाखिलया +वमी रामायर्ण क े पाठ से बढ़ गई र्थीी, सिSसमें हSारों विहन्दुओं +े +ौ विद+ क रामायर्ण का भविXपरक पाठ विकया र्थीा। इस अवति* में उ+ मुस्जिस्लमों का शुक्रवार भी समाविह र्थीा Sो विक मस्जिस्Sद में +माज़ पढ़+े क े खिलए Sा+ा चाह े र्थीे उन्हें पुखिलस द्वारा सुरतिक्ष रूप से अ+ुरतिक्ष विकया गया। Sहां क मैं इस स्जिस्र्थीति को समझ+े में सक्षम रहा हूं विक अयोध्या क े मुस्जिस्लम इस मुद्दे पर एक अ+ीसुर रहमा+ क े अपवाद से दूर हैं, Sो अक्सर उन्मादी संदेश प्रेविष कर ा है सिSससे यह प्रभाव हो ा है विक बाबरी मस्जिस्Sद और कब्रें विवध्वंस हो+े क े ख रे में हैं।" +ैय्यर को पुखिलस अ*ीक्षक क े पत्र क े बावSूद मस्जिस्Sद क े खिलए ख रे की कोई आशंका +हीं र्थीी, सिSसमें उ+ योS+ाओं का विवणिशष्ट संदभ: र्थीा Sो मस्जिस्Sद में प्रवेश कर+े और इसक े उपक्षेत्रों क े भी र मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए सविक्रय र्थीे। (v) विद+ांक 22-23 विदसम्बर, 1949 की रावित्र को विहन्दू मूर्ति यों को संविदग्* रूप से बाबरी मस्जिस्Sद क े भी र 50-60 व्यविXयों क े समूह द्वारा स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। विववाविद स्र्थील क े आं रिरक अहा े क े अंदर मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा की णिशकाय कर े हुए एक प्रार्थीविमकी दS: की गई र्थीी। भार ीय दंर्ड संविह ा की *ारा 147, 295, 448 क े ह अपरा*ों की णिशकाय विद+ांक 23 विदसंबर 1949 को रा क े 7:00 pm बSे उप-वि+रीक्षक राम देव दुबे द्वारा दS: की गई र्थीी। प्रार्थीविमकी में अणिभखिलखिख विकया गया विक कांस्र्टेबल सं. 7 मा ा प्रसाद से प्राप्त Sा+कारी पर, परिरवादी सुबह 7:00 am बSे विववाविद स्र्थील पर पहुंचा र्थीा और यह प ा चला र्थीा विक 50 या 60 व्यविXयों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की भीड़ +े मस्जिस्Sद परिरसर में लगे हुए ाले ोड़ विदए र्थीे और दीवारों पर हिंहदू देव ाओं क े +ामों को खिलख+े क े अति रिरX मूर्ति यों को अंदर स्र्थीाविप विकया र्थीा। इसक े बाद 5000 व्यविX की:+ कर+े क े खिलए एकत्र हुए र्थीे। यह अणिभकणिर्थी विकया गया र्थीा विक अभय राम दास, राम शुक ु ल दास, णिशव दश:+ दास और लगभग 50-60 व्यविXयों +े मस्जिस्Sद में प्रवेश करक े और मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर े हुए अति चार का काय: विकया र्थीा, सिSससे मस्जिस्Sद को अपविवत्र विकया Sा सक े । न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ क े वि+र्ण:य में सिSलाति*कारी की रिरपोर्ट: /र्डायरी का संदभ: प्रस् ु कर े हुए कहा गया है विक विद+ांक 23 विदसंबर 1949 को दो अर्थीवा ी+ व्यविXयों को भोग चढ़ा+े की अ+ुमति देकर भीड़ को वि+यंवित्र विकया गया र्थीा। (v) क े. क े. +ैय्यर +े Sीव+ खो+े क े भय से राज्य सरकार क े मूर्ति यों को हर्टा+े क े वि+द†श का विवरो* विकया। विद+ांक 25 विदसंबर, 1949 को क े. क. +ैय्यर +े अणिभखिलखिख विकया विक पूSा और भोग सामान्य रूप में विकया गया र्थीा। मूर्ति यों को हर्टा+े क े वि+द†शों क े बावSूद, क े. क े. +ैय्यर +े यह कह े हुए म+ा कर विदया विक “यविद सरकार अभी भी इस बा पर Sोर दे ी है विक इ+ थ्यों क े आलोक में हर्टाया Sा+ा चाविहए ो मैं स्वयं को विकसी अन्य अति*कारी द्वारा प्रति स्र्थीाविप कर+े का अ+ुरो* करू ं गा।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) क े. क े. +ैय्यर +े विद+ांक 26 और 27 विदसंबर, 1949 को उत्तर प्रदेश सरकार क े मुख्य सतिचव भगवा+ सहाय को दो पत्रों को संबोति* कर े हुए कहा विक विद+ांक 23 विदसंबर, 1949 को हुई यह घर्ट+ा घर्ट+ाओं क े उपरोX कर्थी+ क े आ*ार पर “अ+ुमोतिच और अपरिरव:+ीय” र्थीी। उपरोX दस् ावेSी थ्य क े आ*ार पर वरिरष्ठ विवद्व अति*वXा र्डॉ. *व+ +े यह क: प्रस् ु विकया विक: (a) विववाविद स्र्थील पर मस्जिस्Sद र्थीी; (b) राज्य प्राति*कारिरयों +े उस ढांचे को मस्जिस्Sद क े रूप में अणिभस्वीकृ विकया और उसे लगा ार अप+े आं रिरक संसूच+ाओं में मस्जिस्Sद क े रूप में संदर्भिभ विकया; (c) विद+ांक 10 विदसंबर, 1949 को वक्फ आयुX की रिरपोर्ट: से वि+म्+खिलखिख विबन्दु साम+े आ े हैं: "(a) हिंहदुओं का मंविदर अहा े क े बाहर र्थीा। +माज़ बाबरी मस्जिस्Sद में पढ़ी Sा रही र्थीी क्योंविक मुस्जिस्लम उपासकों को हिंहदू समुदाय क े सदस्यों द्वारा परेशा+ विकया Sा रहा र्थीा।" (d) राज्य प्राति*कारिरयों +े विहन्दू समुदाय क े सदस्यों द्वारा मस्जिस्Sद और इबाद कर+े वाले व्यविXयों को दी गई *मकी को अणिभस्वीक ृ विकया; (e) राज्य प्राति*कारी मस्जिस्Sद और उपासकों को संभाविव अपमा+/आक्रमर्ण का पूवा:भास ो दे सक े हैं विकन् ु ऐसी घर्ट+ा को र्टाल+े क े खिलए कोई कदम +हीं उठा सक े। (f) राज्य क े अति*कारिरयों क े आं रिरक संचार से यह स्पष्ट है विक मस्जिस्Sद को अपविवत्र कर+े की योS+ा ब+ाई गई र्थीी क्योंविक पुखिलस अ*ीक्षक +े पुखिलस उपायुX को सूतिच विकया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (g) मूर्ति को स्र्थीाविप कर+े क े आशय से विहन्दुओं द्वारा मस्जिस्Sद में प्रवेश करा+े की योS+ा र्थीी; (h) विद+ांक 22-23 विदसंबर, 1949 का अपविवत्रीकरर्ण एक वि+योसिS हमला र्थीा, सिSसका बीS विद+ांक 19 माच:, 1949 को "कस्र्टम र्डीर्ड" क े सार्थी बोया गया र्थीा, Sब राम Sन्मभूविम मंविदर का उल्लेख प्रर्थीम बार विकया गया र्थीा; और (i) इसक े पश्चा ् राज्य क े अति*कारिरयों +े राज्य सरकार क े आदेशों क े बावSूद गुप्त रूप से स्र्थीाविप मूर्ति यों को हर्टा+े से इ+कार कर विदया और मस्जिस्Sद को अपविवत्र कर+े वाले अवांणिछ ों क े सार्थी उ+क े गठबं*+ की पुविष्ट की।

50. विद+ांक 29 विदसंबर 1949 को, फ ै Sाबाद सह अयोध्या क े अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा दं.प्र.सं. 1898 की *ारा 145 क े ह प्रारंणिभक आदेश Sारी विकया गया र्थीा। इसक े सार्थी ही स्जिस्र्थीति को आपा स्जिस्र्थीति क े रूप में मा+ े हुए, क ु क— का आदेश Sारी विकया गया र्थीा और विववाविद स्र्थील को श्री विप्रया दत्त राम को सौंपा गया र्थीा Sो +गर बोर्ड: क े अध्यक्ष र्थीे। विद+ांक 29 विदसंबर 1949 का आदेश +ीचे विदया गया है: ''चूँविक मैं माक: °र्डेय सिंसह मसिSस्र्ट्रेर्ट प्रर्थीम श्रेर्णी और अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट, फ ै Sाबाद-सह-अयोध्या क े पुखिलस स्रो ों से प्राप्त सूच+ाओं और अन्य विवश्वस+ीय स्रो ों से पूर्ण: ः सं ुष्ट हूं विक अयोध्या में हिंहदू और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुस्जिस्लमों क े बीच स्वाविमत्व और पूSा क े अति*कारों क े प्रश्न पर और मेरे अति*कार-क्षेत्र की स्र्थीा+ीय सीमा क े अं ग: मोहल्ला राम कोर्ट में स्जिस्र्थी भव+ में बाबरी मस्जिस्Sद और Sन्मभूविम मंविदर में विवणिभन्न दावे विकए गए, सिSससे शांति भंग हो+े की संभाव+ा है। मैं इसक े द्वारा +ीचे वर्भिर्ण पक्षकारों को वि+द†णिश कर ा हूं विक: (1) ऐसे मुस्जिस्लम Sो अयोध्या क े सद्भावी वि+वासी हैं अर्थीवा Sो विववाविद सम्पखित्त में स्वाविमत्व अर्थीवा पूSा क े अति*कार का दावा कर े हैं; (2) ऐसे विहन्दू Sो अयोध्या क े सद्भावी वि+वासी हैं अर्थीवा Sो विववाविद संपखित्त में स्वाविमत्व अर्थीवा पूSा क े अति*कार का दावा कर े हैं; विद+ांक 17 S+वरी को प्रा ः 11 बSे अयोध्या पुखिलस र्थीा+े में व्यविXग रूप से या प्लीर्डर द्वारा मेरे साम+े हासिSर हों और विववाविद विवषय क े वास् विवक कब्Sे क े थ्य क े संबं* में अप+े-अप+े दावों क े खिलखिख बया+ दें। और वि+र्ण:य लंविब हो+े क े दौरा+ मामला आपा काली+ में से एक हो+े क े +ा े मैं उX भव+ों को क ु क: कर ा हूं। क ु क— की कार:वाई ुरं स्र्टेश+ अति*कारी, अयोध्या पुखिलस स्र्टेश+ द्वारा की Sाएगी, Sो फ ै Sाबाद-सह-अयोध्या क े +गरपाखिलका सविमति क े अध्यक्ष, श्री विप्रया दत्त राम को क ु क: संपखित्तयों का प्रभार विदया Sाएगा, Sो उसक े बाद प्राप क े रूप में होंगे और विववाविद संपखित्त की संरक्षर्ण क े खिलए इसकी व्यवस्र्थीा करेंगे। प्राप क ु क— क े दौरा+ एक योS+ा को विववाविद संपखित्त क े प्रबं*+ हे ु अ+ुमोद+ क े खिलए प्रस् ु करेगा और प्रबं*+ की लाग को पक्षकारों द्वारा इस विववाद में समय-समय पर य विकए Sा सक े हैं। यह आदेश, प्रकाश+ क े खिलए विववाविद पक्षकारों क े वास् विवक +ाम और प े क े संबं* में Sा+कारी क े अभाव में होगा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

1. द इंगखिलश दैवि+क, “द लीर्डर” इलाहाबाद,

2. द उदू: साप्ताविहक “अख् र” फ़ ै ज़ाबाद

3. विहन्दी साप्ताविहक “विवरX” अयोध्या. इस आदेश की प्रति यां विववाविद भव+ों की दीवारों और अयोध्या पुखिलस र्थीा+े क े सूच+ा पट्ट में भी तिचपका दी Sाएंगी। उन् ीस विदसंबर, 1949 को अयोध्या में मेरे हार्थी में इस पर न्यायालय की मुहर दी गई।

51. प्राप +े विद+ांक 5 S+वरी 1950 को काय:भार संभाला और संपखित्तयों की एक सूची ब+ाई Sो क ु क: की गई र्थीी। मस्जिस्Sद में आखिखरी +माज़ विद+ांक 16 विदसंबर 1949 को अदा की गई। प्राप +े वि+म्+खिलखिख लेखों की एक सूची ब+ाई: “1. ठाक ु र Sी की मूर्ति याँ। 1-(क) श्री राम लला Sी की दो मूर्ति याँ, एक बड़ी और एक दूसरी छोर्टी। (ख) श्री शाखिल£ाम Sी की छह मूर्ति याँ।

2. दो फीर्ट ऊ ं ची चांदी की राSगद्दी।

3. ह+ुमा+ Sी की एक मूर्ति । 4 (क) Sम:+ चांदी का एक ग्लास। (ख) चांदी का एक छोर्टा ग्लास। (ग) चाँदी का एक बड़ा ग्लास।

5. एक गरूड़ घंर्टी।

6. एक *ूपदा+।

7. एक आर ी का पात्र।

8. एक लैंप स्र्टैंर्ड।

9. "हुस्रा" और एक चंद+। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

10. राम Sा+की की दो बड़ी स्वीरें।

11. चार फ ू लदा+।

12. बˆी+ार्थी Sी की एक (छोर्टी) स्वीर।

13. रामचंˆ Sी की एक छोर्टी स्वीर।

14. ईश्वर क े आभूषर्ण रामलला क े दो छत्र और ह+ुमा+ Sी का एक छत्र और आठ देव ा।

15. भव+-अहा े और चहारदीवारी क े सार्थी ी+ गुंबदाकार भव+, Sो वि+म्+ा+ुसार परिरबद्ध है। उत्तर-परिरसर में छठी अहा ा और वि+म ही अखाड़ा सस्जिम्मखिल है। दतिक्षर्ण-खाली भूविम और "परिरक्रमा" (परिरक्रमा पर्थी) पूव:-वि+म ही अखाड़ा, और मंविदर परिरसर क े अहा े क े कब्Sे में राम मंविदर क े अन् ग: 'चबू रा'। पतिश्चम- परिरक्रमा (परिरक्रमा पर्थी)

16. पी ल का छोर्टा ग्लास

17. चंद+ क े खिलए "फ ू ल" (विमश्र*ा ु) की एक कर्टोरी।

18. "पंच पास" और एक पी ल की प्लेर्ट।

19. पी ल का एक छोर्टा प्लेर्ट।

20. लकड़ी का एक छोर्टा बोर्ड:।" फ ै Sाबाद में विवचारर्ण न्यायालय क े समक्ष सिसविवल वाद की काय:वाही क े दौरा+, प्लीर्डर णिशव शंकर लाल को इलाक े और भव+ का +क्शा ैयार कर+े क े खिलए आयुX क े रूप में वि+युX विकया गया र्थीा। आयुX +े विद+ांक 25 मई 1950 को एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की, सिSसमें दो +क्शों को शाविमल विकया गया, सिSन्हें +क्शा सं. 1 और 2 क े रूप में मा+ा गया र्थीा, सिSन्हें वि+र्ण:य क े पूव: भाग में ऊपर उसिल्लखिख विकया गया है।

52. आयुX की रिरपोर्ट: में प्रमुख विवशेष ाएं वि+म्+खिलखिख हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) विववाविद स्र्थील पर दो प्रवेश द्वारों की स्जिस्र्थीति, सिSन्हें ह+ुम द्वार और सिंसह द्वार क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है; (ii) ह+ुम द्वार क े प्रवेश हिंबदु पर दो काले कसौर्टी पाषार्ण स् ंभों की उपस्जिस्र्थीति सिSसमें Sय और विवSय की उत्कीर्भिर्ण छविवयां हैं; (iii) सिंसह द्वार क े ऊपर दो+ों विक+ारों पर शेरों को Sकड़े हुए 'गरूर्ण' क े तिचत्र; (iv) बाहरी दीवार पर शूकर ('वाराह') की उत्कीर्भिर्ण पाषार्ण प्रति मा, Sो ह+ुम द्वार क े दतिक्षर्ण में है; (v) एक छोर्टे से मंविदर से युX रामचबू रे की 17 x 21 फीर्ट माप+ क े सार्थी भगवा+ राम और Sा+की की मूर्ति याँ; (vi) दतिक्षर्ण-पूव- को+े पर, पंचमुखी महादेव, पाव: ी, गर्णेश और +ंदी की मूर्ति यों से युX +ीम -पीपल वृक्ष से Sुड़ा एक अ*:-वृत्ताकार चबू रा; (vii) भगवा+ राम, लक्ष्मर्ण, भार और शत्रुघ्+ क े पद तिचन्हों सविह सी ा रसोई +ामक चबू रा; (viii) अां रिरक और बाह्य अहा े को अलग कर+े वाली रेलिंलग। (ix) मस्जिस्Sद क े ी+ मेहराबों को सहारा दे+े वाले बारह काले कसौर्टी पाषार्ण स् ंभों की उपस्जिस्र्थीति सिSसमें वि+म्+खिलखिख +क्काशी की गई हैं: (a) कमल क े फ ू ल; (b) ांर्डव +ृत्य; (c) भगवा+ ह+ुमा+; और (d) भगवा+ क ृ ष्र्ण। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (अन्य स् ंभों पर उत्कीर्ण:+ विमर्टा विदये गए र्थीे); (x) गुंबदाकार ढांचे क े क े न्ˆीय भाग में दो पद तिचन्ह क े सार्थी चबू रे पर स्जिस्र्थी णिशशु भगवा+ राम की मूर्ति स्र्थीाविप की गई है; (xi) विववाविद ढाँचे क े चारों ओर एक परिरक्रमा; और (xii) सा*ुओं/बैराविगयों की क ु विर्टयों सविह विववाविद स्र्थील क े आसपास क े ढाँचे का अस्जिस् त्व और दीवार को “सी ा-क ू प” कहा गया है। च. विववि+श्चय क े हिंबदु इ+ अपीलों में विववि+श्चय क े खिलए वि+म्+खिलखिख हिंबदु उत्पन्न हो े हैं: (i) क्या वाद 3, 4 और 5 अर्थीवा उ+में से कोई परिरसीमा द्वारा वर्जिS है (ii) क्या वाद 81/280 वष: 1885 में विववि+र्ण- वादों 1, 3 और 5 में पूव: न्याय क े रूप में लागू होगा; (iii) (a) क्या विहन्दू मंविदर विववाविद स्र्थील पर विवद्यमा+ र्थीा (b) क्या मंविदर को बाबर द्वारा ध्वस् विकया गया र्थीा अर्थीवा वष: 1528 में बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए उसक े इशारे पर उसक े से+ापति मीर बाकी +े विकया र्थीा; (c) क्या मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण मंविदर क े अवशेषों और उसक े उपयोगी साम£ी द्वारा विकया गया र्थीा; और (d) उपरोX (a) (b) और (c) पर विववि+श्चय से उद्भू विवति*क परिरर्णाम यविद हैं, ो क्या हैं; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) क्या विववाविद संपखित्त प्राची+ काल से भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार है (v) (a) क्या वाद 5 में प्रर्थीम और विद्व ीय वादी न्यातियक व्यविX हैं (b) क्या ृ ीय वादी वाद विमत्र क े रूप में प्रर्थीम और विद्व ीय वादी का प्रति वि+ति*त्व कर+े का हकदार र्थीा; (vi) (a) क्या वि+म ही अखाड़ा +े विववाविद परिरसर में भगवा+ राम क े सेवाय हो+े का अप+ा दावा स्र्थीाविप विकया है; (b) यविद (a) सकारात्मक है ो क्या वाद 5 की स्जिस्र्थीर ा क े खिलए वि+म ही अखाड़ा की आपखित्त वै* है;

(vii) Sैसा विक वाद 4 में वादपत्र में अणिभवच+ विकया गया र्थीा, क्या विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की मध्य रावित्र क े दौरा+ हिंहदू मूर्ति यों को बाबरी मस्जिस्Sद क े क ें ˆीय गुंबद क े अन् ग: प्रति ष्ठाविप विकया गया र्थीा; (viii) (a) क्या न्यायालय को यह अव*ारिर कर+े का अति*कार है विक क्या विद+ांक 6 विदसंबर, 1992 से पूव: विववाविद स्र्थील पर विवद्यमा+ ी+ गुम्बदाकार ढाँचा इस्लामी सिसद्धां ों क े अ+ुसार मस्जिस्Sद र्थीी; (b) यविद (a) का उत्तर सकारात्मक है ो क्या विववाविद स्र्थील पर ी+ गुंबदाकार ढाँचा इस्लामी सिसद्धां ों क े अ+ुसार वि+र्मिम की गई र्थीी; (ix) (a) क्या इसक े वि+मा:र्ण क े समय वक्फ क े रूप में ी+ गुंबदाकार ढाँचे का लोकाप:र्ण हुआ र्थीा; (b) उपयु:X (a) क े विवकल्प क े रूप में, वाद 4 में वाविदयों द्वारा विकया गया दावा विक क्या साव:Sवि+क उपयोगक ा: द्वारा वक्फ है; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (x) क्या वाद 4 में वाविदयों +े अप+े प्रति क ू ल कब्Sे क े वैकस्जिल्पक मामले में प्रति स्र्थीाविप विकया है; (xi) क्या मुस्जिस्लमों और हिंहदुओं +े उपास+ा का दावा स्र्थीाविप विकया है और विववाविद संपखित्त पर उ+का हक है; (xii) क्या वाद 4 में वाविदयों +े विववाविद संपखित्त क े खिलए अप+ा हक स्र्थीाविप विकया है; (xiii) क्या वाद 5 में वादी +े विववाविद संपखित्त में अप+े हक को स्र्थीाविप विकया है; (xiv) क्या उच्च न्यायालय +े वि+म ही अखाड़ा, वाद 4 क े वाविदयों और वाद 5 क े वाविदयों क े बीच समा+ विहस्सों में विववाविद संपखित्त को ी+ विवभाS+ क े खिलए प्रारंणिभक तिर्डक्री पारिर कर+े में न्यायोतिच ठहराया र्थीा;

(xv) Sैसा वाद में दावा विकया गया है विक क्या वाद 1 में वादी राह का हकदार है; और (xvi) क्या वाद 1, 3, 4 और 5 में, यविद कोई हो ो राह दी Sा+ी चाविहए इ+ हिंबदुओं का विवश्लेषर्ण विकया Sाएगा और इस वि+र्ण:य क े दौरा+ वि+पर्टा Sाएगा। व्यविXग वादों में मुद्दों का विवश्लेषर्ण कर+े से पूव:, विववाद में क ु छ मामलों पर सबसे आगे चचा: कर+ा उपयुX होगा क्योंविक वे संपूर्ण: मामले क े सभी पहलू को परिरपूर्ण: कर े हैं। छ. ी+ उत्कीर्ण:+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

53. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और वाद 4 में अन्य वाविदयों का मामला यह है विक अयोध्या शहर में, ''भार पर विवSय पा+े क े बाद 433 वष: पूव: सम्रार्ट बाबर द्वारा वि+र्मिम बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ी Sा+े वाली एक प्राची+ ऐति हासिसक मस्जिस्Sद मौSूद है और अयोध्या शहर सविह उसक े राज्य क्षेत्र पर कब्Sा कर खिलया गया।'' यह दलील दी गई है विक मस्जिस्Sद सामान्य रूप से मुस्जिस्लमों क े उपयोग क े खिलए इबाद क े स्र्थीा+ क े रूप में और *ार्मिमक समारोहों क े प्रदश:+ क े खिलए र्थीी। मस्जिस्Sद और उससे सर्टे कविब्रस् ा+ को "सव:शविXमा+ में" वि+विह है और मस्जिस्Sद को अप+े उत्कीर्ण:+ क े समय क े बाद से मुस्जिस्लमों द्वारा इबाद क े खिलए इस् ेमाल विकया गया है। इस प्रकार, वादी क े संबं* में एक सकारात्मक मामला साम+े आया है विक: (I) विकसी मस्जिस्Sद का अस्जिस् त्व; (ii) वष: 1961 में संस्जिस्र्थी वाद में 433 वष: पूव: बाबर द्वारा मस्जिस्Sद का सतिन्नमा:र्ण; (iii) पूSा स्र्थील क े रूप में और *ार्मिमक समारोहों क े खिलए मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण; और (iv) +माज़ अदा कर+े क े प्रयोS+ क े खिलए उसक े वि+मा:र्ण क े बाद से मस्जिस्Sद का उपयोग।

54. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अप+े वि+र्ण:य में अणिभखिलखिख विकया विक यह सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से प्रस् ु अति*वXा द्वारा स्वीकार विकया गया विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की ति णिर्थी विववि+तिश्च कर+े और मस्जिस्Sद पर स्र्थीाविप कणिर्थी उत्कीर्ण:+ों को बाबर से संबंति* कर+े का एकमात्र आ*ार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है, Sैसा विक गSेविर्टयस: और अन्य दस् ावेSों में संदर्भिभ है। प्रस् र 1435 में, विवद्व न्याया*ीश +े अवलोविक विकया विक: "व्यापक रूप से, वास् व में हम पा े हैं विक श्री सिSला+ी द्वारा भी यह स्वीकार विकया गया है विक विववाविद भव+ क े वि+मा:र्ण की अवति* विववि+तिश्च कर+े और विववाविद भव+ में स्र्थीाविप कणिर्थी उत्कीर्ण:+ों का सम्रार्ट बाबर क े सार्थी सह-संबं* कर+े का एकमात्र आ*ार है/हैं Sैसा विक क ु छ गSेविर्टयर आविद में वि+र्मिदष्ट विकया गया है।" अब उच्च न्यायालय क े समक्ष और व:मा+ काय:वाविहयों क े दौरा+, इस बा पर बहस हुई विक क्या मस्जिस्Sद पर कणिर्थी उत्कीर्ण:+ों क े विवषय साविब हुए हैं। अखिखल भार ीय श्री राम Sन्मभूविम पु+रूद्धार सविमति की ओर से प्रस् ु विवद्वा+ अति*वXा श्री पी. ए+. विमश्रा +े उत्कीर्ण:+ों की प्रामाणिर्णक ा पर प्रश्न उठाया है। उन्हों+े इस बा पर संदेह कर+े की मांग की विक क्या मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण 1528 ईस्वी में अर्थीवा बाबर क े इशारे पर विकया गया र्थीा।

55. फ्यूहरर द्वारा इस विवषय पर अवलम्ब खिलया गया पहला दस् ावेS सिSसका शीष:क “द शक— आर्मिकर्टेक्चर ऑफ Sौ+पुर विवद +ोट्स ऑ+ Sा़फराबाद, सहे -महे ए°र्ड अदर प्लेस इ+ विद +ाद:+:-वेस्र्ट+: प्रॉविवन्सेस ए°र्ड अव*"26 र्थीा। पुस् क का मूल संस्करर्ण वष: 1889 में प्रकाणिश हुआ र्थीा और वष: 1994 में एएसआई +े इसका पु+प्र:काश+ विकया र्थीा। अध्याय X में ी+ उत्कीर्ण:+ संख्याओं XL, XLI, और XLII का उल्लेख है। इ+ ी+ उत्कीर्ण:+ों से प ा चल ा है विक फ्यूहरर +े एक राय ब+ाई र्थीी विक वष: 1523 26 Führer, Alois Anton, Edmund W. Smith, and James Burgess, The Sharqi architecture of Jaunpur: with notes on Zafarabad, Sahet- Mahet and other places in the North-Western provinces and Oudh (1994) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ईस्वी अर्थीवा विहज़री वष: 930 में अयोध्या में बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। उत्कीर्ण:+ सं. XL का विववरर्ण क ें ˆीय मेहराब क े ऊपर अरबी में और वि+म्+खिलखिख शब्दों में कलीमा को दो बार प्रस् ु विकया गया है: "अल्लाह क े सिसवा कोई ईश्वर +हीं है और मुहम्मद साहब उसक े पैगम्बर हैं।" उत्कीर्ण:+ सं. XLI विमम्बर पर पाया गया र्थीा और फारसी में खिलखा गया र्थीा। अं£ेSी में अ+ुवाविद उत्कीर्ण:+ वि+म्+खिलखिख प्रकार से है: "1. विवश्व सम्रार्ट बाबर क े आदेश द्वारा,

2. आसमा+ क े समा+ उन्न,

3. मSबू इमार वि+र्मिम र्थीी।

4. मंगलकारी श्रेष्ठ मीर खा+ द्वारा।

5. ऐसी +ींव,

6. और दुवि+या का ऐसा राSा हमेशा रहे।" प्रवेश द्वार क े ऊपर उत्कीर्ण:+ सं. XLII पाया गया। फारसी में भी इस उत्कीर्ण:+ का अ+ुवाद इस प्रकार विकया गया है: "1. दयावा+, अंश, ईश्वर क े +ाम पर।

2. उस हस् ी क े +ाम से Sो............उत्पखित्तक ा: उसको कलम द्वारा अमर कर दे ा है। 3........

4. विवश्व का ऐसा प्रसिसद्ध सम्रार्ट सिSसका अस्जिस् त्व पृथ्वी क े खिलए प्रसन्न ा का उदाहरर्ण है।

5. उस शाही दरबार का एक विवशाल +वाब है Sो ख़ाक़ा+ (ची+ी शासकों की उपाति*) Sैसा सौभाग्यवश और विद्व ीय फ़गक़ु र (ची+ी शासकों की उपाति*) है।

6. *म: क े इस महद (गहवारे अर्थीा: मस्जिस्Sद) क े आ*ार की शुभ ति णिर्थी 930 विहSरी प्र ी करो। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

7. ऐ! खुदा संसार क े बादशाह क े सार्थी उसका ाS, सिंसहास+, भाग्य और Sीव+ सदैव बाकी रहे।

8. बाबर सम्रार्ट संसार में +ेविकयों क े पुष्पों की वषा: कर ा रहे और उसे सफल ा विमल ी रहे।

9. शास+ का सलाहकार और देश का प्रशासक Sो इस मस्जिस्Sद क े विकले का आ*ार रख+े वाला है।

10. ति णिर्थी का यह विक ा और मस्जिस्Sद का विववरर्ण वि+ब:ल गुलाम फ हुल्लाह गौरी को कम्ज़ोर खिलविप द्वारा खिलखा गया। उत्कीर्ण:+ों को सन्दर्भिभ कर+े क े बाद फ्यूहरर +ोर्ट कर ा है विक: ''Sन्मस्र्थीा+म में रामचंˆ का पुरा+ा मंविदर बहु अच्छा रहा होगा, क्योंविक इसक े कई स् ंभों का उपयोग मुस्जिस्लमों द्वारा बाबर की मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में विकया गया है। ये मSबू, सघ+, गहरे रंग वाले या काले पत्र्थीर क े हैं, सिSन्हें मूल रूप से कसौर्टी “र्टच-स्र्टो+ स्लेर्ट” कहा Sा ा है और विवणिभन्न उपकरर्णों क े सार्थी राशा Sा ा है। वे सा से आठ फीर्ट लंबे, आ*ार पर वगा:कार, क ें ˆस्र्थी और उत्क ृ ष्ट, और मध्यव - रूप में गोल अर्थीवा अष्टभुS हैं।"

56. दस् ावेSी साक्ष्य का दूसरा भाग सिSसमें इ+ उत्कीर्ण:+ों का कणिर्थी रूप से "बाबर-+ामा" में अ+ुवाद विकया गया है। ए.एस. बेवरिरS द्वारा विकया गया अ+ुवाद प्रर्थीम बार वष: 192127 में प्रकाणिश हुआ र्थीा। पुस् क क े अति रिरX, पक्षकारों द्वारा काय:वाही क े खिलए इसक े कु छ पन्नों क े अंश प्रदर्भिश विकए गए र्थीे। 27 विवखिलयम एर्स्किस्क+, Sॉ+ लेर्डे+ और ए+ेर्ट सुसान्ना बेवरिरS, अं£ेSी में बाबर-+ामा (बाबर का संस्मरर्ण), लंद+: लूSैक एंर्ड क ं प+ी (वष: 2006 में लो प्राइस पस्जिब्लक े शन्स, विदल्ली द्वारा पु+मु:ˆर्ण) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरणिशष्ट (यू) दो उत्कीर्ण:+ों को संदर्भिभ कर ा है; एक अां रिरक और दूसरा मस्जिस्Sद क े बाहर। परिरणिशष्ट (यू) क े पृष्ठों की छायाप्रति वाद 4 में परिरणिशष्ट T[3] क े रूप में तिचवि- की गई र्थीी।

57. बेवरिरS +े अप+ी पत्+ी द्वारा विकए गए अ+ुरो* पर फ ै Sाबाद क े उपायुX क े माध्यम से उत्कीर्ण:+ का विवषय प्राप्त विकया। बेवरिरS +ोर्ट कर े हैं विक विवषय वस् ु की प्रति खिलविप को ैयार कर+े क े दौरा+ उस+े कु छ परिरव:+ विकए र्थीे। मस्जिस्Sद क े अंदर क े उत्कीर्ण:+ की विवषय वस् ु, Sैसा विक बेवरिरS +े उद्धृ विकया र्थीा, वि+म्+खिलखिख प्रकार से है: "(1) सम्रार्ट बाबर क े आदेशा+ुसार सिSसका न्याय एक ऐसी इमार है Sो आकाश क े महल से Sा विमली है। (2) भाग्यवा+ +वाब मीर बाकी +े फरिरश् ों क े उ र+े क े इस स्र्थीा+ की आ*ार णिशला रखी। (3) इसक े आ*ार का वष: चूँविक एक खैर बाकी (शाश्व भलाई) है। अ ः मेरा यह कर्थी+ स्पष्ट हुआ।" मस्जिस्Sद क े बाहर क े उत्कीर्ण:+ की विवषय वस् ु वि+म्+खिलखिख प्रकार है: "1. उसक े +ाम से Sो सबसे महा+ बुतिद्धमा+ है Sो सारे संसार का स्त्रष्टा एवं सेर्थीा+ की क ै द से मुX है।

2. उसकी प्रशंसा क े बाद मोहम्मद मुस् फा सल्लल्लाहो अलैविह वसल्लम पर दरूद हो Sो दो+ों संसार क े +विबयों क े सरदार हैं।

3. बाबर कलंदर का यह चरचा सारे संसार में व्यापक है विक वह एक सफल सम्रार्ट हैं।'' बेवरिरS +े कहा विक मस्जिस्Sद क े बाहर दूसरा उत्कीर्ण:+ अ*ूरा र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

58. उत्कीर्ण:+ों क े समर्थी:+ में विवषय वस् ुओं का ीसरा समूह"एविप£ाविफया इंतिर्डका-अरेविबक-पर्भिशय+ सस्जिप्लमेंर्ट (इ+ क ं र्टीन्यूएश+ ऑफ एविप£ाविफया इंर्डो-मोस्लेविमका) 1964 और 1965"28 (1987 में पु+मु:विˆ ) में प्रकाणिश हुआ। यह एएसआई क े महावि+देशक द्वारा प्रकाणिश विकया गया है और इसमें बाबर क े उत्कीर्ण:+ों का संदभ: है। इस विवषय का श्रेय मौलवी एम अशरफ हुसै+ को है और इसका संपाद+ Sेर्ड ए देसाई द्वारा विकया गया है। इस संस्करर्ण का परिरचयात्मक +ोर्ट यह कह ा है विक: "लेखक द्वारा इस लेख का एक अपूर्ण: मसौदा Sो मेरा पूव:व - र्थीा, मेरे काया:लय में विवविव* पत्रों क े बीच पाया गया। वष: 1953 में अप+ी सेवावि+वृखित्त क े समय, उन्हों+े एक +ोर्ट छोड़ा र्थीा विक यह उ+क े उत्तराति*कारी द्वारा परिरशो*+ क े बाद प्रकाणिश विकया Sा सक ा है। परिरर्णामस्वरूप, +वी+ थ्यों और संदभÂ को समावेश कर+े और व्यापक परिरशो*+ और संपाद+ क े बाद भी यहां उसी प्रकार प्रकाणिश विकया गया है। मेरे सहयोगी पुरालेख सहायक-संपादक श्री एस.ए.रहीम की सहाय ा से अध्यय+ की Sाँच, सु*ार एवं पूरक भी विकया गया है।" बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण संबं*ी विवषय में वि+म्+खिलखिख विववरर्ण शाविमल हैं: ''ए. फ्यूहरर क े अ+ुसार +दी र्ट से एक +य+ाणिभराम दृश्य को दशा: ी हुई बाबरी-मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विहSरी संव ् 930 (1523-24 ईस्वी) में विकया गया र्थीा, लेविक+ उसक े कालक्रमा+ुसार, Sो उसे पूर्ति विकए गए उत्कीर्ण:+ों क े गल पढ़+े पर आ*ारिर है वह त्रुविर्टपूर्ण: है। बाबर +े इब्राविहम लोदी को क े वल विहSरी संव ् 933 (1526 ईस्वी) में परासिS विकया, और इसक े अलावा वि+मा:र्ण का वष:, +ीचे वर्भिर्ण ी+ में से दो उत्कीर्ण:+ों, स्पष्ट ः विहSरी संव ् 935 (1528-29 ईस्वी) में दS: विकया गया है। दोबारा, Sैसा विक उ+क े द्वारा कहा गया है विक यह मीर 28 Epigraphia Indica, Arabic and Persian Supplement (in continuation of Epigraphia Indo-oslemica) (Z A Desai Eds), Archaeology Survey of India (1987) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खा+ द्वारा वि+र्मिम +हीं विकया गया र्थीा। ऐसा लग ा है विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण का आदेश विहSरी संव ् 934 ( 1527-28 ईस्वी) को अयोध्या में बाबर क े रह+े क े दौरा+ Sारी विकया गया र्थीा लेविक+ इसक े पूर्ण: हो+े का कोई उल्लेख बाबर +ामा में +हीं विकया गया है। हालांविक, यह याद विकया Sा सक ा है विक वष: विहSरी संव ् 934 ( 1527-28 ईस्वी) क े खिलए उ+की र्डायरी क ु छ +हीं ब ा ी है और अव* क े संबं* में पाठकों को अं*ेरे में रख ी है।" यह पुस् क उस रीति का विहसाब भी प्रदा+ कर ी है सिSसमें लेखक +े फ ै Sाबाद क े सईद बदरूल हस+ से एक उत्कीर्ण:+ों को स्याही की छाप ब+ा+े का काय: विकया र्थीा: "मस्जिस्Sद में अ+ेक उत्कीर्ण:+ हैं। पूव- मुखा£ पर एक छज्जा है, सिSसक े +ीचे क ु रा+ क े शब्द और उसक े ऊपर फ़ारसी पद्य में एक उत्कीर्ण:+ है। क ें ˆीय मेहराब पर *ार्मिमक पाठों Sैसे विक कलीमा (प्रर्थीम म ) इत्याविद उत्कीर्भिर्ण है। मंच क े दतिक्षर्णी मुख पर पूव: से ही स्र्थीाविप णिशलापट्ट र्थीी Sो फारसी पद्य में उद्धृ र्थीी। मंच क े दांए रफ की दीवार में ब+ी फारसी पद्य में एक अन्य उत्कीर्ण:+ भी र्थीा। इ+में से, अंति म उसिल्लखिख दो पुरालेख गायब हो गए हैं। वष: 1934 ईस्वी में कणिर्थी ौर पर सांप्रदातियक बब:र ा में उन्हें बुरी रह से +ष्ट कर विदया गया र्थीा, परन् ु सौभाग्य से, मैं फ े Sबाद क े सईद बदरुल हस+ से उ+में से एक को स्याही की छाप ब+ा+े में सफल रहा। मुस्जिस्लम समुदाय द्वारा बहाल व:मा+ उत्कीर्ण:+ + क े वल +स ालीक (फारसी) अक्षरों से Sड़े र्थीे बस्जिल्क शायद बहाल कर+े वाले लोगों द्वारा उतिच ढंग से समझ+े की अक्षम ा क े कारर्ण मूल से णिभन्न भी र्थीे। ऊपर वर्भिर्ण ऐति हासिसक पुरालेखों क े पाठ और अ+ुवाद, एक क े मामले को छोड़कर, फ्यूहरर और श्रीम ी बेवरिरS द्वारा प्रकाणिश विकए गए र्थीे, लेविक+ उ+की रच+ाएं इ +ी अ*ूरी, त्रुविर्टपूर्ण: और पाठ से णिभन्न हैं विक इस लेख में उ+का समावेश + क े वल वांछ+ीय है बस्जिल्क अवि+वाय: भी है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +ीचे सुपविठ पुरालेख एक णिशलापट्ट पर उत्कीर्ण: हुआ र्थीा, सिSसकी माप लगभग 68 सेमी 48 सेमी र्थीी। सिSसे मस्जिस्Sद क े मंच क े दतिक्षर्णी भाग में ब+ाया गया र्थीा, परन् ु Sैसा विक ऊपर वर्भिर्ण है अब खत्म हो गया है। यह फ़ ै Sाबाद क े सईद बदरूल हस+ से प्राप्त मुˆांक+ से संपाविद है। इसक े ी+ पंविX पाठ में फ़ारसी में छह पद्य हैं, Sो फ ू लदार विक+ारों क े अंदर व्यावहारिरक +स्ख अक्षरों में उत्कीर्भिर्ण हैं। यह सम्रार्ट बाबर क े आदेशा+ुसार मीर बाकी द्वारा मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण को अणिभखिलखिख कर ा है और काला+ुक्रम में विहSरी संव ् 935 (1528-29 ईस्वी) ब ा ी है।" लेखक का कह+ा है विक मस्जिस्Sद की मंच क े दतिक्षर्णी ओर 68 X 48 सेमी माप वाले णिशलापट्ट पर एक उत्कीर्ण:+ र्थीा, परन् ु मूल रूप से गायब हो गया र्थीा। यह उद्धरर्ण उपरोX स्याही की छाप से प्राप्त विकया गया है। Sो उद्धृ विकया गया है वह ऊपर उसिल्लखिख स्याही से प्राप्त संस्करर्ण है। पहले उत्कीर्ण:+ का पाठ इस प्रकार र्थीा: "(1) सम्रार्ट बाबर क े आदेशा+ुसार सिSसका न्याय एक ऐसी इमार है Sो आकाश क े महल से Sा विमली है। 2) भाग्यवा+ +वाब मीर बाकी +े फरिरश् ों क े उ र+े क े स्र्थीा+ की आ*ारणिशला रखी। (3) वह खैर बाकी (सदैव रह+े वाला एक भला कार+ामा) है और उसक े आ*ार का वष: यूं स्पष्ट हुआ Sब मैं+े कहा "बवुद खैर बाकी"।" दूसरे उत्कीर्ण:+ क े संबं* में, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल का वि+र्ण:य यह ब ा ा है विक: "1449. फ्यूहरर क े उत्कीर्ण:+ सं. XLI में उन्हों+े उल्लेख विकया है विक उसी विमम्बर पर (विववाविद भव+ क े दाविह+ी ओर) मस्जिस्Sद क े अंदर पाया गया र्थीा सिSसे मौलवी एफ. अशरफ हुसै+ द्वारा दूसरे उत्कीर्ण:+ क े रूप में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कहा गया है। इसमें छह लाइ+ों में ी+ विद्वपद हैं। वह (हुसै+) स्पष्ट रूप से "पुरालेखीय ाखिलका" का अवलोक+ कर े हुए उX णिशलालेख क े गैर अस्जिस् त्व को स्वीकार कर े हैं, सिSसे मंच क े दाविह+ी रफ की दीवार में ब+ाया गया र्थीा, अब अस्जिस् त्व में +हीं है, और इसखिलए, उत्कीर्ण:+ का पाठ यहां फ्यूहरर क े काय: से उद्धृ विकया गया है, उसी वSह से, इसका उदाहरर्ण +हीं विदया Sा सका है। हालांविक, हुसै+/देसाई फ्यूहरर द्वारा उत्कीर्ण:+ की व्याख्या से सहम +हीं र्थीे और उन्हों+े अवलोक+ विकया विक फ्यूहरर की व्याख्या गलति यों से मुX प्र ी +हीं हो ी है।" ीसरे उत्कीर्ण:+ का पाठ वि+म्+खिलखिख प्रकार से है: "(1) उस (खुदा) की प्रशंसा क े बाद मोहम्मद मुस् फा सल्लाल्लाहो अलैविह वसल्लम पर दरूद हो Sो +विबयों क े सरदार और दुवि+या क े सव:श्रेष्ठ हैं। (2) बाबर कलंदर का चरचा सारे संसार में है विक वह एक सफल सम्रार्ट है। उ+की प्रशंसा क े बाद, दुआएँ विकसी एक (अर्थीा: पैगंबर) पर हो+ा चाविहए, Sो सभी पैगम्बरों क े प्रमुख हैं और विवश्व में सव:श्रेष्ठ हैं। क़लंदर- Sैसे विक बाबर (अर्थीा: सत्यविप्रय) विवश्व प्रति विष्ठ हो गए हैं चूँविक उ+क े समय में दुवि+या +े समृतिद्ध प्राप्त की। (3) वह ऐसा सम्रार्ट है विक सिSस+े सा ों देशों पर विवSय प्राप्त कर खिलया, आकाश क े समा+ पृथ्वी को भी अप+े कब्Sे में कर खिलया। उस शाही दरबार का एक विवशाल +वाब है सिSसका +ाम मीर बाकी है विद्व ीय आसिसफ (आसिसफ उपाति* रख ा है) शास+ का सलाहकार और उसक े देश का प्रशासक Sो इस मस्जिस्Sद और विकले का आ*ार रख+े वाला है। (4) ऐ ख़ुदा संसार में उसका ाS, सिंसहास+, भाग्य और Sीव+ सदैव बाकी रहे। इस युग क े इस इमार की बुवि+याद की शुभ ति णिर्थी की वि+शा+ी 935 ईस्वी है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बादशाह और पैगंबर क े खुदा की स् ुति पूर्ण: हुई। अल्लाह उसे रोश+ करे। ुच्छ लेखक और विव+म्र प्रार्णी ईर्थीुल्लाह मोहम्मद गोरी द्वारा खिलखिख ।" फ़्यूहरर द्वारा उसिल्लखिख उत्कीर्ण:+ों क े संबं* में, क ु छ महत्वपूर्ण: पहलुओं का उल्लेख कर+े की आवश्यक ा है। Sबविक दूसरे उत्कीर्ण:+ में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए बाबर क े आदेश का संदभ: सस्जिम्मखिल है, वि+मा:र्ण क े खिलए मीर खा+ (मीर बाकी +हीं) उत्तरदायी है। ीसरे उत्कीर्ण:+ में विहSरी 930 में स्र्थीाविप मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की +ींव का उल्लेख है Sो 1523 ईस्वी से मेल खा ी है। यह बाबर द्वारा आक्रमर्ण और पा+ीप क े युद्ध से पूव: र्थीा सिSसक े परिरर्णामस्वरूप इब्राविहम लो*ी की पराSय हुई। बेवरिरS क े काय: क े संबं* में, यह स्पष्ट है विक उस+े + ो मूल पाठ देखा र्थीा और + ही उस+े स्वयं उत्कीर्ण:+ों क े पाठ का अ+ुवाद विकया र्थीा। बेवरिरS +े अप+े पत्+ी क े माध्यम से फ ै Sाबाद क े उपायुX से उत्कीर्ण:+ों का एक र्थीाकणिर्थी पाठ प्राप्त विकया। बेवरिरS +े दावा विकया विक उस+े अप+ी पत्+ी द्वारा प्रारम्भ विकए गए पत्राचार क े माध्यम से पाठ की एक प्रति प्राप्त की Sो औपवि+वेणिशक सरकार में एक आईसीएस अति*कारी र्थीा। उस+े + ो मूल पढ़ी र्थीी और + ही यह इंविग कर+े क े खिलए विक उसे अ+ुवाद कर+े की स्जिस्र्थीति में र्थीी। बेवरिरS का कह+ा है विक उस+े "अणिभव्यविX की श Â में क ु छ मामूली परिरव:+ " विकए। बेवरिरS +े क्या बदलाव विकए हैं इसकी व्याख्या +हीं की गई है। उ+क े अ+ुसार, दो उत्कीर्ण:+ों का पाठ अपूर्ण: र्थीा और यह सुपाठ्य +हीं र्थीा। फ़्यूहरर द्वारा प्रदा+ विकए गए पाठ से प ा चल ा है विक वष: 1528 ईस्वी में मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं हुआ र्थीा। उत्कीर्ण:+ सं. XLI में मीर खा+ क े +ाम का उल्लेख है Sबविक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उत्कीर्ण:+ सं. XLII में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण को विहSरी 930 क े रूप में संदर्भिभ विकया गया है।

59. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अशरफ हुसै+ और Sेर्ड. ए. देसाई क े काय: का सन्दभ: ले े हुए, उ+की सर्टीक ा, शुद्ध ा और वास् विवक ा क े संबं* में एएसआई क े प्राति*कार क े ह पाठ प्रकाणिश कर+े में लेखक की "दोषपूर्ण: और पूर्ण: गल बया+ी" पर गंभीर से ध्या+ विदया विक: "1463. हम उस रीक े से बहु व्याक ु ल हैं सिSस रह से अशरफ हुसै+/देसाई +े कणिर्थी उत्कीर्ण:+ों क े पदों को एक त्रुविर्टही+ प्राति*कार प्रदा+ कर+े का प्रयत्+ विकया है, Sो वे विववाविद भव+ पर मौSूद हो+े का दावा कर े हैं, हालांविक बार-बार कहा गया है विक मूल पाठ गायब हो गया है। इस पाठ को सच्चाई का रंग दे+े का प्रयास कर े हुए में लेखक की ओर से दोषपूर्ण: और पूर्ण: गल बया+ी लेख+ को स ही रूप से पढ़+े से पूर्ण: ः स्पष्ट है। वास् व में हमें यह Sा+कर कष्ट है विक इस विवषय की सर्टीक ा, शुद्ध ा और वास् विवक ा की परवाह विकए विब+ा, एएसआई भार सरकार क े अति*कार क े ह प्रकाणिश पुस् क में इस रह की दोषपूर्ण: साम£ी को प्रकाणिश कर+े की अ+ुमति दी गई है।.…इ+ दो+ों उत्कीर्ण:+ों में से, या+ी एक +े मंच क े दतिक्षर्णी विदशा पर हो+े का दावा विकया और दूसरे को मंच की दाविह+ी ओर की दीवार क े रूप में अवलोक+ द्वारा अ+ुपलब्* हो+े पर कहा गया है, "Sो विक इ+में से अंति म वर्भिर्ण दो पुरालेख गायब हो गए हैं"। मौलवी अशरफ हुसै+ क े अ+ुसार गायब हो+े का यह समय 1934 ईस्वी र्थीा Sब अयोध्या में सांप्रदातियक दंगे हुए। हालांविक, उन्हों+े दावा विकया विक फ ै Sाबाद क े सैयद बदरुल हस+ क े दो उत्कीर्ण:+ों में से एक पर स्याही की छाप लग गई र्थीी। सैयद बदरुल हस+ क े बारे में विक वह कौ+ र्थीे, उ+की स्जिस्र्थीति क्या र्थीी, विकस रीक े से उन्हों+े उX उत्कीर्ण:+ की उस स्याही की छाप को विकस प्रकार प्राप्त विकया और इसक े सही हो+े की प्रामाणिर्णक ा क्या है Sब उत्कीर्ण:+ का मूल पाठ ज्ञा +हीं है। वष: 1934 में खो+े का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दावा कर+े वाले विववाविद भव+ में पाए गए उत्कीर्ण:+ क े सही पाठ क े रूप में प्राप्त पाठ से संबंति* कर+े क े खिलए क ु छ भी +हीं है।" उच्च न्यायालय +े अवलोविक विकया विक दो उत्कीर्ण:+, Sो मंच क े दतिक्षर्णी विदशा और मंच क े दाविह+ी ओर दीवार पर उपलब्* +हीं र्थीे। अशरफ हुसै+ क े अ+ुसार, वष: 1934 में सांप्रदातियक दंगे क े दौरा+ पुरालेख गायब हो गए। हालाँविक, सिSस व्यविX से यह प्राप्त विकया गया र्थीा, उसकी पहचा+ या उसक े बारे में व्याख्या विकए बगैर कणिर्थी रूप से "स्याही की छाप" पर अवलस्जिम्ब कर+े की मांग की गयी र्थीी। उच्च न्यायालय की आलोच+ा आ*ार ही+ +हीं है। सिSस व्यविX से स्याही की छापों को प्राप्त की गई र्थीी उसकी पहचा+ +हीं ब ाई गई र्थीी। + ही उस रीक े क े बारे में कोई स्पष्टीकरर्ण र्थीा सिSसमें उस+े बदले में इसे प्राप्त विकया र्थीा। अशरफ हुसै+ और Sेर्ड. ए. देसाई द्वारा संकखिल पाठ में अ+ुवाद क े सार्थी उस व्यविX द्वारा प्राप्त पाठ को संबद्ध कर+े क े खिलए वास् व में क ु छ भी +हीं र्थीा। उच्च न्यायालय +े अवलोविक विकया विक: “1464... Sब मूल उत्कीर्ण:+ पूव: में ही खो गया र्थीा और उसक े सार्थी पु+स्र्थीा:विप विकए गए उत्कीर्ण:+ क े पाठ को सत्याविप कर+े क े खिलए कु छ भी +हीं र्थीा और + ो बहाल विकए गए व्यविX पर अवलम्ब खिलया Sा सक ा है और + ही यह समझा Sा सक ा है विक कणिर्थी रूप से की गई बहाली की ुल+ा क ै से हो सक ी है.......मूल…" इस पृष्ठभूविम में, उच्च न्यायालय +े अवलोविक विकया विक: "1466... उपरोX उत्कीर्ण:+ क े संबं* में अशरफ हुसै+ द्वारा Sो पाठ, विववरर्ण और Sो क ु छ भी स्र्थीाविप विकया गया र्थीा वह अविवश्वस+ीय है और विवश्वस+ीय ा का अभाव है। हम इस स् र पर यह अवलोक+ कर+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े खिलए विववश हैं विक ऐति हासिसक घर्ट+ाओं क े मामले में और वह भी Sब यह एक *ार्मिमक महत्व रख ा है और इस मामले +े दो समुदायों क े बीच गंभीर विववादों को भी देखा है, Sो लोग इति हास से Sुड़े हुए हैं..... कोई भी लेख+ ैयार कर+े क े पूव:, बहु साव*ा+ीपूव:क उन्हें Sांच+ा, प्रति Sाँच कर+ा और सत्याविप कर+ा चाविहए क्योंविक परिरर्णामी रूप से उ+क े लेख+ क े खिलए घा क और अपूरर्णीय हो सक े हैं।"

60. णिशया सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: ब+ाम सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: ऑफ वक्फ29 क े मामले में 26 माच: 1946 विद+ांविक को दीवा+ी न्याया*ीश क े एक वि+द†शा+ुसार उत्कीर्ण:+ का चौर्थीा संस्करर्ण उभर कर आया। उ+ वि+द†शों क े अ+ुसरर्ण में, श्री (Sr.) ए. अख् र अब्बास क े +ाम से एक व्यविX +े उत्कीर्ण:+ को पढ़ा और वि+रीक्षर्ण +ोर्ट ैयार विकया। हालांविक, उच्च न्यायालय +े यह उल्लेख विकया विक 30 माच:, 1946 विद+ांविक क े वि+र्ण:य में विदए गए पाठ में यह कहा गया है विक प्रर्थीम उत्कीर्ण:+ में, “शाह बाबर क े आदेश द्वारा अमीर मीर बाकी +े विहSरी संव ् 923 अर्थीा: 1516- 17 ईस्वी में फरिरश् ों क े विवश्राम स्र्थील का वि+मा:र्ण विकया र्थीा "। दूसरे उत्कीर्ण:+ क े संबं* में, "विहSरी संव ् 935 अर्थीा: 1528-29 ईस्वी में इस्फहा+ क े मीर बाकी" का संदभ: है। उच्च न्यायालय +े अवलोविक विकया विक इस बा से अवग +हीं कराया गया र्थीा विक क्या संपूर्ण: बाबर-+ामा में विकसी मीर बाकी इस्फाहा+ी का संदभ: र्थीा, यद्यविप बाकी श्क ें र्डी का संदभ: र्थीा। इसक े अति रिरX दो+ों में से एक पट्ट +या र्थीा और उसे मूल पट्ट क े खिलए बदल विदया गया र्थीा Sो वष: 1934 क े सांप्रदातियक दंगों क े दौरा+ ध्वस् कर विदया गया र्थीा। साक्ष्य की उपरोX 29 Regular Suit No 29 of 1945 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्जिस्र्थीति पर, उच्च न्यायालय +े उत्कीर्ण:+ों क े प्रति लेखों की वास् विवक ा और प्रामाणिर्णक ा पर संदेह विकया, Sो इससे पूव: अवलस्जिम्ब र्थीे।

61. इस स् र पर, " ुSुक-ए-बाबरी"30 का संदभ: दे+ा आवश्यक है। बाबर-+ामा में 899 विहSरी (1494 ईस्वी) से प्रारम्भ हो+े वाली बाबर की दैवि+क र्डायरी शाविमल है। बाबर क े Sीव+काल क े अठारह वष: का विववरर्ण विवणिभन्न अवति*यों में उपलब्* है। बाबर 1526 ईस्वी में भार आया र्थीा। उसकी मृत्यु क उपलब्* विववरर्ण वि+म्+खिलखिख अवति*यों क े खिलए है, (न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल द्वारा +ोर्ट विकया गया): "1487...

1. 1 सफर 932 विहSरी (17 +वंबर 1525 ईस्वी) से 12 राSब 934 विहSरी (2 अप्रैल 1528 ईस्वी) क।

2. 3 मुहर:म 934 विहSरी (18 सिस ंबर 1528 ईस्वी) से 3 मोहर:म 936 विहSरी (7 सिस ंबर 1529 ईस्वी) क।" 2 अप्रैल 1528 से 17 सिस ंबर 1528 क की अवति* क े अणिभलेख गायब हैं। इस अवति* में से, 2 अप्रैल 1528 से 15 सिस ंबर 1528 क की अवति* 934 विहSरी की र्थीी Sबविक 15 सिस ंबर 1528 से 17 सिस ंबर 1528 क की अवति* 935 विहSरी की र्थीी। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े उच्च न्यायालय में उल्लेख विकया विक महत्वपूर्ण: वष: 935 विहSरी र्थीा और गायब अणिभलेख क े वल ी+ विद+ों का र्थीा। 30 Rashid Akhtar Nadvi, Tuzk e Babri, Lahore: Sang e Mil (1995) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बाबर +े विद+ांक 20 अप्रैल 1526 को पा+ीप में इब्राविहम लो*ी को परासिS विकया र्थीा। विद+ांक 28 माच:, 1528 को बाबर घाघरा और सरयू +विदयों क े संगम पर पहुंचा। विद+ांक 2 अप्रैल 1528 की ति णिर्थी क े संदभ: क े बाद, विद+ांक 15 सिस ंबर 1528 क एक अन् राल है।

62. बेवरिरS क े बाबर-+ामा का अ+ुवाद आगरा और ग्वाखिलयर सविह कई स्र्थीा+ों पर भव+ों क े वि+मा:र्ण में णिशल्पकारों क े रोSगार को वि+र्मिदष्ट कर ा है: ''1533… हिंहदुस् ा+ में एक और अच्छी बा यह है विक इसमें हर रह क े असंख्य और अं ही+ कामगार लोग हैं। प्रत्येक काय: को कर+े क े खिलए एक वि+तिश्च वग: (Sामई) हो ी है, सिSस+े विप ा से पुत्र क उस काय: को विकया है। ति मूर बेग की पत्र्थीर की मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े सम्बन्* में ज़फ़र-+ामा में खिलख े हुए मुल्ला शराफ इस थ्य पर Sोर दे े हैं विक इस पर अSरबैSा+, फारस, हिंहदुस् ा+ और अन्य देशों से पत्र्थीर कार्ट+े वाले 200 व्यविXयों +े काय: विकया। लेविक+ आगरा में और क े वल आगरा क े पत्र्थीर कार्ट+े वाले 680 व्यविXयों +े मेरे भव+ों पर प्रति विद+ काय: विकया; Sबविक आगरा, सिसकरी, विबया+ा, दुलपुर, ग्वाखिलयर और क ु इल में मेरे भव+ों पर पत्र्थीर कार्ट+े वाले 1491 व्यविXयों +े काय: विकया। इसी प्रकार हिंहदुस् ा+ में हर रह क े असंख्य णिशल्पकार और कामगार हैं।'' इस संदभ: में, न्यायमूर्ति अ£वाल +े अवलोविक विकया विक: "1534. बाबर-+ामा में ग्वाखिलयर क े मंविदर, विदल्ली की मस्जिस्Sद, आगरा, ग्वाखिलयर सविह और अन्य कई स्र्थीा+ों स्र्थीा+ों का उल्लेख है लेविक+ यह सत्य है विक + ो अव* क्षेत्र में बाबर द्वारा विकसी भी *ार्मिमक स्र्थील क े ध्वस् ीकरर्ण कर+े का उल्लेख है और + ही यह विदखा+े क े खिलए कु छ भी है विक वह या ो अयोध्या में प्रवेश विकया र्थीा या विकसी भव+ वि+मा:र्ण और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवशेष ः अयोध्या में मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण क े खिलए कोई वि+द†श Sारी विकया र्थीा।" सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े अति*वXा श्री सिSला+ी क े दलीलों को उच्च न्यायालय +े वि+र्ण:य क े प्रस् र 1577 में अणिभखिलखिख विकया विक चूंविक बाबर स्वयं अयोध्या में प्रवेश +हीं विकया र्थीा, इसखिलए उसक े द्वारा मंविदर का विवध्वंस और मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण से सम्बस्जिन्* कोई प्रश्न ही +हीं र्थीा। बाबर- +ामा क े अभाव में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े संदभ: में पूव: -विवश्लेविष उत्कीर्ण:+ों को अप्रति विष्ठ कर+े क े खिलए एक कारक क े रूप में अवलस्जिम्ब विकया गया है। वि+रीक्षर्ण की इस पंविX को साव*ा+ीपूव:क पढ़ा Sा+ा चाविहए सिSसे ऐति हासिसक पाठ से +कारात्मक वि+ष्कष: वि+काल े समय प्रयोग विकया Sा+ा चाविहए।

63. विवद्वा+ अति*वXा श्री पी. ए+. विमश्रा +े "इंतिर्डय+ र्टेक्स्ट्स सीरीS- स्र्टोरिरया र्डो मोगोर इंतिर्डया 1653-1708"31 शीष:क से वि+क्कोलाओ म+ुक्की क े काय: का विवचार विकया सिSसका अं£ेSी अ+ुवाद विवखिलयम इरविव+ +े विकया र्थीा। म+ुक्की +े औरंगSेब द्वारा "+ष्ट विकए गए प्रमुख मंविदरों" की पहचा+ की, उ+में से एक र्थीे: (i) माएसा (मायापुर); (ii) मा ुरा (मर्थीुरा); (iii) क ै स्जिक्सस (काशी); और (iv) हSुविदया (अSुध्या)।

31 Manucci, Niccol, and William Irvine, Storia do Mogor; or, Mogul India, 1653-1708, J. Murray: London (1907). mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA म+ुक्की एक यात्री र्थीा Sो औरंगSेब क े शास+काल में भार आया र्थीा। इसक े अति रिरX म+ुक्की क े काय: में अबुल फSल अल्लामी द्वारा रतिच "आइ+-ए-अकबरी"32 भी शाविमल है। अाइ+-ए-अकबरी अव* प्रां से संबंति* है और अयोध्या भगवा+ राम से इसक े संबं* को संदर्भिभ कर ा है। पाठ में शहर क े +Sदीक "छह और सा गS की लंबाई में दो कब्रें संदर्भिभ हैं"। इस पाठ में अ+ेक ीर्थी: स्र्थीा+ों की पहचा+ की गई। यह विवशेष ः अयोध्या की बा है Sहां चैत्र मास में एक *ार्मिमक उत्सव आयोसिS विकया Sा ा है। श्री विमश्रा +े आ£ह विकया विक अयोध्या में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण का आइ+-ए-अकबरी में कोई संदभ: +हीं है। इस पाठ में कु छ ऐसे +गर हैं Sो ईश्वरत्व प्राप्त हैं, सिS+में से काशी और अयोध्या हैं। उच्च न्यायालय +े आदेश 18 माच: 2010 विद+ांविक से साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 57(13) क े प्राव*ा+ों क े ह उपरोX पाठ पर अवलम्ब ले+े की अ+ुमति दी।

64. वाद 4 में वादीगर्णों की ओर से अपील कर+े वाले विवद्वा+ अति*वXा श्री पी. ए+. विमश्रा और श्री मोहम्मद वि+Sामुद्दी+ पाशा द्वारा मुख्य रूप से आ£ह विकए गए उपरोX दलीलों को खस्जि°र्ड कर े हुए क: विदया विक मीर बाकी की पहचा+ पर एक अ+ावश्यक भ्रम पैदा कर+े की मांग की गई र्थीी। उन्हों+े क: विदया विक उन्हें बाबर -+ामा में वि+म्+खिलखिख शीष:कों/प्रत्ययों द्वारा Sा+ा Sा ा है:

32 Ab al-Faz l ibn Mub rak and H. Blochmann, The Ain i Akbari, 1873, Calcutta: Rouse (Reprint of 1989 published by Low Price Publications, Delhi) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) बाकी शरघवाल-''मध्य एणिशयाई शास+ का उच्च अति*कारी, Sो सभी काविज़यों और मुल्ला से सव परिर है''। (देखें "बाबर+ामा", ए. एस. बेवरिरS द्वारा अ+ुवाविद, 1921, पृष्ठ 463)। (ii) बाकी हिंमगबाशी-एक हSार व्यविXयों क े से+ापति (देखें "बाबर+ामा", ए. एस. बेवरिरS द्वारा अ+ुवाविद, 1921, पृष्ठ 590); और (iii) बाकी स्जिश्कन् ी– ाशक ं द से सम्बन्* (देखें "बाबर+ामा", ए. एस. बेवरिरS द्वारा अ+ुवाविद, 1921, पृष्ठ 601) श्री पाशा +े आ£ह विकया विक बाबरी मस्जिस्Sद क े दरवाSे क े ऊपर का उत्कीर्ण:+ मीर बाकी आसिसफ सा+ी क े रूप में पढ़ा Sा ा है, सिSसे फ ै Sाबाद क े S+पद न्याया*ीश +े णिशया वक्फ बोर्ड: और सुन्नी वक्फ बोर्ड: क े बीच वाद में वष: 1946 क े अप+े आदेश में 'इस्फ़हा+ी' क े रूप में गल समझा।

65. इस दलील क े समर्थी:+ में उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु की गई साम£ी को वि+*ा:रिर कर+े क े बाद विक वष: 1528 में मीर बाकी द्वारा उप-महाद्वीप पर विवSय क े बाद सम्रार्ट बाबर क े वि+द†श पर मस्जिस्Sद का वि+्मा:र्ण विकया गया र्थीा, वि+ष्कषÂ का विवश्लेषर्ण कर+ा यहाँ आवश्यक हो Sा ा है Sो उच्च न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों द्वारा प्राप्त विकया गया है विक: (i) न्यायमूर्ति एस यू खा+ न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ +े अव*ारिर विकया विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "मुस्जिस्लम यह साविब +हीं कर पाए हैं विक Sमी+ बाबर की र्थीी, सिSसक े आदेश से मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा।" इसक े अलावा, विवद्व न्याया*ीश +े यह अव*ारिर विकया विक फ्यूहरर, बेवरिरS और Sेर्ड. ए. देसाई द्वारा अ+ुवाविद मस्जिस्Sद क े उत्कीर्ण:+ प्रामाणिर्णक +हीं र्थीे इसखिलए क े वल इ+ उत्कीर्ण:+ों क े आ*ार पर यह अव*ारिर +हीं विकया Sा सका विक या ो विववाविद भव+ बाबर द्वारा या बाबर क े आदेश से या यह विक इसका वि+मा:र्ण वष: 1528 में विकया गया र्थीा। न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ +े विवशेष रूप से अव*ारिर विकया विक: "इस सम्बन्* में विवस् ृ कारर्ण मेरे विवद्वा+ बन्*ु न्यायमूर्ति एस. अ£वाल, द्वारा विदए गए हैं सिS+क े सार्थी मैं पूर्ण: ः सहम हूं"। हालांविक, न्यायमूर्ति खा+ +े "वि+ष्कषÂ का सार" शीष:क से अप+े वि+ष्कष: क े अ+ुक्रम में यह अव*ारिर विकया विक: "1. विववाविद ढाँचे को बाबर द्वारा अर्थीवा उसक े आदेश से मस्जिस्Sद क े रूप में वि+र्मिम विकया गया र्थीा।

2. यह प्रत्यक्ष प्रमार्ण से सिसद्ध +हीं हो ा है विक बाबर का सम्बन्* विववाविद परिरसर सविह मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर+े वाले व्यविXयों अर्थीवा सिSसक े आदेशों क े ह वि+र्मिम मस्जिस्Sद से र्थीा।" वि+ष्कष: क े उपरोX हिंबदु सं. 1 का वि+ष्कष: पूव: क े वि+ष्कषÂ क े विवपरी है विक यह अव*ारिर +हीं विकया Sा सका है विक या ो मस्जिस्Sद को बाबर द्वारा या बाबर क े आदेशों क े ह या यह विक इसका वि+मा:र्ण वष: 1528 में विकया गया र्थीा। हिंबदु सं. 1 का वि+ष्कष: भी विवणिशष्ट अवलोक+ क े विवपरी है विक न्यायमूर्ति mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एस. यू. खा+ उत्कीर्ण:+ों की प्रामाणिर्णक ा क े अभाव क े संबं* में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े फ ै सले क े अ+ुरूप ही र्थीे। (ii) न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े यह अव*ारिर विकया विक: "1679...इस वि+ष्कष: को अणिभखिलखिख कर+ा कविठ+ है विक विववाविद भव+ का वि+मा:र्ण वष: 1528 ईस्वी में या बाबर द्वारा या उसक े आदेश पर विकया गया र्थीा, चूँविक उX वि+ष्कष: पर आ+े क े खिलए कोई विवश्वस+ीय साम£ी उपलब्* +हीं है। इसक े विवपरी, प्रातियक ा की प्र*ा+ ा से प ा चल ा है विक विववाविद भव+ का वि+मा:र्ण कु छ समय बाद विकया गया र्थीा और उत्कीर्ण:+ों को बाद में वि+य विकया गया र्थीा, परन् ु दो+ों की सर्टीक अवति* का प ा लगा+ा मुस्जिश्कल है.…....

1681. विकसी भी ठोस थ्य क े अभाव में, संबंति* मुगल सम्रार्ट या विकसी और क े शास+, सिSसक े दौरा+ उपरोX वि+मा:र्ण हुआ र्थीा उसक े सही काल को दशा:+े क े खिलए हम इस पहलू पर कोई सकारात्मक वि+ष्कष: अणिभखिलखिख कर+े से परहेS कर रहे हैं सिसवाय विववाविद भव+ क े, हमारे अ+ुसार विववाविद भव+ सम्रार्ट बाबर क े शास+ क े बहु बाद में वि+र्मिम हुआ होगा और उत्कीर्ण:+ों को उसक े बाद वि+य विकया गया र्थीा और इसक े पश्चा यही कारर्ण है विक इस अवति* में भी संबंति* व्यविX क े +ाम क े बारे में भी क ु छ विवसंगति यां हुई हैं। उत्कीर्ण:+ों में परिरव:+, प्रत्याव:+ या फ े रबदल की संभाव+ा से इंकार +हीं विकया Sा सक ा है" वाद में विवरतिच मुद्दों क े उत्तर दे े समय न्यायमूर्ति अ£वाल +े अव*ारिर विकया विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "1682... (क) मुद्दा सं. 6 (वाद-1) और मुद्दा सं. 5 (वाद-3) क े उत्तर +कारात्मक में विदए गए हैं। प्रति वादी यह सिसद्ध कर+े में विवफल रहे हैं विक विववाविद संपखित्त 1528 ईस्वी में.... सम्रार्ट बाबर द्वारा वि+र्मिम की गई र्थीी। द+ुसार, यह प्रश्न उत्पन्न +हीं हो ा है और इसक े उत्तर की कोई आवश्यक ा +हीं है विक क्या बाबर +े 'मस्जिस्Sद' क े रूप में विववाविद संपखित्त का वि+मा:र्ण विकया है। (ख) मुद्दा सं. 1 (क) (वाद-4) का उत्तर +कारात्मक में विदया गया है। वादीगर्ण यह सिसद्ध कर+े में विवफल रहे हैं विक विववाविद भव+ बाबर द्वारा वि+र्मिम की गई र्थीी। इसी प्रकार प्रति वादी सं. 13 भी यह सिसद्ध कर+े में विवफल रहा है वि+मा:र्ण मीर बाकी द्वारा विकया गया र्थीा। आगे का प्रश्न यह है विक इसे कब और विकसक े द्वारा ब+ाया गया वि+तिश्च रूप से +हीं कहा Sा सक ा क्योंविक + ो कोई दलील + ही कोई साक्ष्य और + ही इस पहलू पर एक ठोस वि+ष्कष: पर पहुंच+े क े खिलए हमारे साम+े कोई थ्य है। हालांविक, सुविवज्ञ अ+ुमा+ क े सिसद्धां को लागू कर े हुए हमारा विवचार है विक विववाविद भव+ का वि+मा:र्ण संभव ः 1659 से 1707 ई. क े बीच अर्थीा: ् औरंगSेब क े शास+काल में विकया Sा सक ा है" उपरोX वि+ष्कषÂ क े अंति म भाग में, न्याया*ीश +े यह अणिभखिलखिख विकया विक Sब ढाँचा दलील या साक्ष्य क े अभाव में वि+र्मिम विकया गया र्थीा ो वि+तिश्च रूप से थ्य क े वि+ष्कष: में पहुँच+ा संभव +हीं र्थीा। उपरोX अवलोक+ क े अं में "सुविवज्ञ अ+ुमा+" को थ्य क े वि+ष्कष: क े आ*ार पर प्राप्त +हीं विकया Sा सक ा विक ढाँचा शायद औरंगSेब द्वारा वष: 1659-1707 क े बीच वि+र्मिम की गई र्थीी। (iii) न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: +े अप+े फ ै सले क े दौरा+ यह वि+ष्कष: वि+काला विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "इस प्रकार, विवशेषज्ञों की राय क े आ*ार पर, अणिभखिलखिख साक्ष्य पर, परिरस्जिस्र्थीति Sन्य साक्ष्य और ऐति हासिसक वर्ण:+ से..., यह प ा चल ा है विक मंविदर को ध्वस् कर विदया गया र्थीा और बाबर क े आदेश से मीर बाकी द्वारा पुरा+े हिंहदू मंविदर स्र्थील पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। मुद्दा सं. 1 और 1(क) प्रति वाविदयों क े पक्ष में और वादी क े विवरूद्ध घोविष हैं।"

66. उच्च न्यायालय परिरकल्प+ा क े आ*ार पर उत्कीर्ण:+ों की प्रामाणिर्णक ा को लेकर विववाद में पड़ गया विक उत्कीर्ण:+ यह ब ा+े का एकमात्र आ*ार र्थीा विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर +े विकया र्थीा। न्यायमूर्ति अ£वाल इस वि+ष्कष: पर पहुंचे विक उत्कीर्ण:+ प्रामाणिर्णक +हीं र्थीे और इसखिलए इस वि+ष्कष: पर +हीं पहुँचा Sा सका विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण वष: 1528 ईस्वी में बाबर क े इशारे पर या उसक े द्वारा विकया गया र्थीा। Sैसा विक हम+े उल्लेख विकया है, न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ क े वि+र्ण:य क े पाठ का क: न्यायमूर्ति अ£वाल क े दृविष्टकोर्ण क े अ+ुरूप र्थीा परन् ु विफर भी उ+का अंति म वि+ष्कष: कारर्णों क े पूव: भाग क े अ+ुरूप +हीं है विक विववाविद ढाँचे का वि+मा:र्ण मस्जिस्Sद क े रूप में बाबर द्वारा या बाबर क े आदेश पर विकया गया र्थीा न्यायमूर्ति शमा: +े अव*ारिर विकया विक मीर बाकी +े मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर क े आदेश से विकया र्थीा।

67. हालांविक, मूल मुद्दा यह है विक क्या उच्च न्यायालय क े खिलए पक्षकारों की दलीलों क े आ*ार पर इस घ+े Sंगल में प्रवेश कर+ा आवश्यक र्थीा। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: (वाद 4) द्वारा संस्जिस्र्थी वाद में, मामला यह है विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर +े अयोध्या शहर सविह क्षेत्रों पर विवSय और कब्Sे क े बाद विकया र्थीा। उल्लेख+ीय है विक वाद विमत्र क े माध्यम से भगवा+ राम और राम mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sन्मभूविम की ओर से संस्जिस्र्थी वाद 5 इस आ*ार पर भी आगे बढ़ ा है विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण मीर बाकी +े विकया र्थीा Sो बाबर की से+ाओं का से+ापति र्थीा। वाद 5 में वादपत्र में यातिचका इस प्रकार है: "23. इति हास की पुस् क ें र्थीा विवश्वस+ीय प्रामाणिर्णक ा क े साव:Sवि+क अणिभलेख वि+र्मिववाद रूप से यह स्र्थीाविप कर े हैं विक श्री राम Sन्मभूविम अयोध्या में महाराSा विवक्रमाविदत्य का एक प्राची+ मंविदर र्थीा। उस मंविदर को आंणिशक रूप से +ष्ट कर विदया गया और बाबर की से+ा क े से+ापति मीर बाकी +े शस्त्रों क े बल से मस्जिस्Sद ब+ा+े का प्रयत्+ विकया। उपयोग की गई लगभग सभी साम£ी मंविदर से ली गई र्थीी, सिSसमें इसक े स् ंभ भी शाविमल र्थीे, Sो कसौर्टी से ब+े र्थीे, सिSसमें हिंहदू देवी-देव ाओं की +क्काशीदार आक ृ ति र्थीी। विहन्दुओं +े बहु विवरो* विकया और समय समय पर मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण को रोक+े क े खिलए कई युद्ध लड़े। आS क इसमें मी+ारें +हीं हैं और वज़ू क े खिलए पा+ी क े संचय+ का कोई स्र्थीा+ +हीं है। इ+ युद्धों में कई लोग मारे गये। ऐसा अंति म युद्ध वष: 1855 में हुआ। बाबर क े समय में मीर बाक़ी द्वारा वि+र्मिम भव+ सविह श्री राम Sन्म भूविम उस समय हिंहदुओं क े कब्Sे और वि+यंत्रर्ण में र्थीी।" (प्रभाव वर्ति* ) उपरोX उद्धरर्ण क े ुरं बाद की दलील का मूलपद फ ै Sाबाद गSेविर्टयर क े 1928 संस्करर्ण का संदभ: है। गSेविर्टयर का मूलपद को वादपत्र में शाविमल विकया गया है और इस प्रकार पढ़ ा है: "23...वष: 1528 में बाबर अयोध्या आया और एक सप्ताह क े खिलए यहाँ रुका। उस+े प्राची+ मंविदर को +ष्ट कर विदया और उसक े स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद ब+वायी सिSसे अभी क बाबरी मस्जिस्Sद कहा Sा ा है। पुरा+े ढांचे की साम£ी को मोर्टे ौर पर वि+योसिS विकया गया र्थीा, और कई mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स् ंभ अच्छे संरक्षर्ण में हैं, वे सघ+ रूप से गहरे काले पत्र्थीर क े हैं, सिSन्हें देसी कसौर्टी कहा Sा ा है और विवणिभन्न उपकरर्णों क े सार्थी राशा Sा ा है।"

68. वादी क े अ+ुसार वाद 5 की दलील प्रदर्भिश कर ा है विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर की से+ा क े से+ापति मीर बाकी +े विकया र्थीा। इसखिलए वाद 4 और वाद 5 दो+ों की दलील में अवि+वाय: रूप से इस थ्य से संबंति* कोई विववाद +हीं र्थीा विक मस्जिस्Sद को वष: 1528 ईस्वी में बाबर द्वारा या उसक े इशारे पर ब+ाया गया र्थीा। वाद 5 का यह मामला है विक हिंहदुओं +े मस्जिस्Sद पर कब्Sा और वि+यंत्रर्ण ब+ाए रखा। यह पूर्ण: ः एक अलग मामला है सिSस पर फ ै सला विकया Sा+ा है। लेविक+, वाद 4 और वाद 5 में दो+ों की दलीलों से मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की ति णिर्थी या उत्पखित्त क े बारे में कोई विववाद प्र ी +हीं हो ा है। इसक े अ+ुसार वाद 3 में वि+म ही अखाड़ा +े यह स्वीकार +हीं विकया विक यह ढाँचा एक मस्जिस्Sद है, ढाँचा हमेशा ही हिंहदू मंविदर रहा है सिSसे हमेशा ही वि+म विहयों द्वारा संचाखिल विकया गया है। वि+म विहयों +े मंविदर हो+े का दावा कर े हुए मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व को ही विववाविद विकया। वाद 3 में उत्पन्न हो+े वाली दलीलों सबू ों और मुद्दों का आकल+ कर े समय वि+म विहयों क े मामले पर अलग से विवचार विकया Sाएगा। परन् ु वाद 4 और वाद 5 में दलीलों क े आ*ार पर उत्कीर्ण:+ों की प्रामाणिर्णक ा क े संबं* में विववाद की कोई व्यावहारिरक प्रासंविगक ा +हीं होगी। इस दृविष्टकोर्ण को अप+ा+े का एक और कारर्ण है। अंति म विवश्लेषर्ण में, क्या मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण वष: 1528 में विकया गया र्थीा (Sैसा विक वाद 4 और वाद 5 में वादी क े दो+ों समूहों +े दलील दी है) अर्थीवा उसक े बाद अवि+वाय: रूप mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA से प्रति पक्षों क े कÂ पर कोई अन् र +हीं होगा। वाद 4 में वादी +े इस न्यायालय क े समक्ष कहा है विक सिS+ अणिभलेखों पर वे पूSा संबंति* अप+े दावे में अवलम्ब ले े हैं उ+का उपयोग और कब्ज़ा लगभग वष: 1860 से प्रारम्भ हुआ। यह स्जिस्र्थीति हो+े क े +ा े, मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की सर्टीक ति णिर्थी एक ऐसा मामला है सिSसमें वाद 4 और 5 में हो+े वाली दलीलों और प्रति योविग ा कर+े वाले हिंहदू और मुस्जिस्लम द्वारा इस न्यायालय क े समक्ष अप+ाए गए श्रेर्णी क े संबं* में विववाद क े परिरर्णाम की कोई व्यावहारिरक प्रासंविगक ा +हीं है।

69. वाद 5 (अखिखल भार ीय श्री राम Sन्मभूविम पु+रूद्धार सविमति ) में प्रति वादी संख्या 20 की रफ से प्रस् ु विवद्वा+ अति*वXा श्री पी. ए+. विमश्रा यह प्रदर्भिश कर+े क े खिलए पुरSोर प्रयास विकया विक बाबरी मस्जिस्Sद में इस्लामी न्यायशास्त्र क े ह वै* मस्जिस्Sद की आवश्यक विवशेष ाओं का अभाव है। ये क: अवि+वाय: ः दो थ्यों से संबंति* हैं: (I) विकसी मस्जिस्Sद का स्र्थीा+, वि+मा:र्ण और प्रारूप पर प्रभाव र्डाल+े वाली विवशेष ाएं; और (ii) वै* समप:र्ण क े खिलए आवश्यक ाएँ। इस खंर्ड में, कÂ क े प्रर्थीम भाग में संबोति* विकया गया है। क्या वाद 4 में एक अलग खंर्ड में वै* समप:र्ण संबोति* होगा। श्री विमश्रा +े आ£ह विकया विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बाबरी मस्जिस्Sद को वै* मस्जिस्Sद +हीं मा+ा Sा सक ा क्योंविक इसमें स्र्थीा+, प्रारूप और वि+मा:र्ण क े संबं* में आवश्यक विवशेष ाओं का अभाव र्थीा।

70. वाद 4 में उच्च न्यायालय से पूव: वि+म्+खिलखिख मुद्दों को विवरतिच विकया गया र्थीा: वाद 4 में मुद्दा सं. 1-Sैसा विक वादीगर्णों द्वारा दावा विकया गया र्थीा विक क्या प्रश्नग भव+ को वादपत्र से संलग्न रेखांविक +क्शे में एक मस्जिस्Sद क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया र्थीा; यविद उत्तर सकारात्मक है ो: (a) इसे कब और विकसक े द्वारा ब+ाया गया र्थीा-Sैसा विक वादीगर्णों द्वारा कणिर्थी है विक इसे बाबर द्वारा वि+र्मिम विकया गया र्थीा या प्रति वादी सं. 13 द्वारा कणिर्थी है विक इसे मीर बाकी द्वारा वि+र्मिम विकया गया र्थीा। और (b) क्या भव+ का वि+मा:र्ण ध्वस् कर+े क े बाद एक कणिर्थी हिंहदू मंविदर स्र्थील पर विकया गया र्थीा, Sैसा विक प्रति वादी संख्या 13 द्वारा अणिभकणिर्थी विकया गया र्थीा, यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव। मुद्दा सं. 19(d)- क्या प्रश्नग भव+ में इस्लाविमक का+ू+ क े ह एक मस्जिस्Sद +हीं हो सक ी, इस स्जिस्र्थीति में यह स्वीकार विकया गया है विक इसमें मी+ारें +हीं र्थीीं। मुद्दा सं. 19(e) - क्या प्रश्नग भव+ का+ू+ी रूप से एक मस्जिस्Sद +हीं हो सक ी Sैसा विक वादीगर्णों क े रूप में स्वयं यह दशा: े हैं विक यह ी+ रफ से कविब्रस् ा+ से तिघरा हुआ र्थीा। मुद्दा सं. 19(f) - क्या प्रश्नग भव+ क े अंदर और बाहर क े स् ंभों में हिंहदू देवी-देव ाओं की छविवयां हैं। यविद यह वि+ष्कष: सकारात्मक है ो क्या उस mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रश्नग भव+ में इस्लाम क े सिसद्धां ों क े ह मस्जिस्Sद का स्वरूप +हीं हो सक ा है।

71. प्रति वादी सं. 20 का खिलखिख कर्थी+ इस दावे का आ*ार प्रदा+ कर ा है विक बाबरी मस्जिस्Sद +े इस्लाविमक न्यायशास्त्र में एक मस्जिस्Sद क े खिलए आवश्यक विवशेष ाओं को पूरा या पाल+ +हीं विकया है: "...(1) इस विववाविद मस्जिस्Sद क े मकबरे को यविद पीछे से देख+ा हो ो प ा चल ा है विक यह पंˆहवीं श ाब्दी में ुर्मिकयों द्वारा विवकसिस शैली में +हीं है और + ही उस शैली में मस्जिस्Sद का महराब पाया गया है। इस प्रकार विववाविद मस्जिस्Sद में कोई मकबरा +हीं है Sैसा विक अन्य मस्जिस्Sदों में सामान्य या पाया Sा ा है। (2) उत्तरी दरवाSे पर एक दूसरे की ओर मुख विकए हुए दो बाघ हैं। वे छलाँग लगा+े की शैली में हैं और उ+की पूछँ उसी शैली में हैं Sब एक बाघ छलांग ले ा है। इ+ दो+ों बाघों क े बीच एक मोर है। यह मस्जिस्Sद की विवशेष ा +हीं है। (3) विवणिभन्न हिंहदू मूर्ति याँ तिचवित्र है या उ+क े उत्कीर्ण: विववाविद मस्जिस्Sद में पाए Sा े हैं (4) विववाविद मस्जिस्Sद में +माज़ पढ़+े का कोई प्राव*ा+ +हीं है। आS क इसमें कोई मी+ार +हीं हैं, वSू क े खिलए पा+ी क े भंर्डारर्ण का कोई स्र्थीा+ +हीं है। (5) पविवत्र क ु रा+ में वर्भिर्ण मुस्जिस्लम आस्र्थीा मंविदर को ध्वस् कर+े क े पश्चा ् मंविदर स्र्थील पर मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की अ+ुज्ञा +हीं दे ी है। (6) बाबर +े कभी भी विववाविद मस्जिस्Sद की सम्पखित्त अल्लाह को समर्मिप +हीं की। यहां क विक यह स्वीकार विकए विब+ा मा++ा विक बाबर +े विववाविद मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया, विफर भी यह अति चार करक े, भगवा+ क े वि+वास स्र्थीा+, मंविदर को ध्वस् करक े या ो बाबर द्वारा या अव* क े प्रशासक मीर बाकी क े इशारे पर विकया गया है, समप:र्ण पूरी रह से अवै* और शून्य है। पुरा+े मंविदर की साम£ी बड़े पैमा+े पर मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में काम में ली गयी र्थीी और कु छ मूल स् म्भ अभी भी अच्छे संरक्षर्ण में हैं। वे विवणिभन्न हिंहदी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +क्कासी(बस-रिरलीफ्स) को *ारर्ण विकए हुए काले पत्र्थीर (कसौर्टी) क े हैं। मुख्य संरच+ा की बाहरी बीम, चंद+ की लकड़ी की है, स् ंभों की ऊ ं चाई 7 से 8 फीर्ट है, आ*ार का आकार, मध्य खंर्ड और णिशखर(क ै विपर्टल) वगा:कार है, बाकी गोल या अष्टभुSाकार है। …... बाद में औरंगSेब +े अयोध्या क े मंविदरों को भी अपविवत्र कर विदया सिSससे हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच लंबे समय क कर्टु ा फ ै ल गई। बाद में Sन्मस्र्थीा+ पर बलपूव:क कब्Sा भी कर खिलया और ह+ुमा+गढ़ी पर भी हमला कर विदया। मौलवी अमीर अली क े +े ृत्व में हमले और Sवाबी हमला Sारी रहा।(फ ै Sाबाद गSेविर्टयर 1960 का पेS 352 देखें) (7) मस्जिस्Sद को प्रशांति क े स्र्थीा+ पर और ऐसे स्र्थीा+ क े पास ब+ाया Sा+ा चाविहए Sहां विवशाल और बड़ी संख्या में मुस्जिस्लम S+संख्या हो। इस्लाम क े सिसद्धान् ों क े अ+ुसार एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण उस स्र्थीा+ पर +हीं विकया Sा सक ा Sो मंविदरों द्वारा चारों ओर से तिघरा हुआ हो, Sहां संगी की ध्ववि+, शंख या घ°र्टा घरिरयाल हमेशा उस स्र्थीा+ की प्रशांति को भंग कर े हो। (8) एक मस्जिस्Sद में अज़ा+ को बुला+े क े खिलए मी+ार हो+ी चाविहए। बैले क े अ+ुसार "Sब इबाद कर+े वालों की एक सभा मस्जिस्Sद में अ+ुमति क े सार्थी प्रार्थी:+ा कर ी है, अर्थीा: ् अणिभव्यविX(तिर्डलेवरी)। लेविक+ यह एक श: है विक प्रार्थी:+ा अज़ा+ या वि+यविम बुलावे क े सार्थी हो ी है और साव:Sवि+क हो ी है और वि+Sी +हीं हो ी है, हालांविक इसक े खिलए एक सभा हो+ी चाविहए, विफर भी अगर यह इज़ाह क े विब+ा है और प्रार्थी:+ा साव:Sवि+क क े बSाय वि+Sी है, ो सच्चे अ+ुयातियओं क े अ+ुसार वह स्र्थीा+ कोई मस्जिस्Sद +हीं है।" वास् व में पहली अद्ध:सदी की लड़ाई क े बाद एक मी+ार क े विब+ा कोई मस्जिस्Sद +हीं है। (पी. आर. गर्णपति अय्यर का लॉ रिरलेंहिंर्टग र्टू विहन्दू और मोहम्र्ड+ एन्र्डाउमेन्ट्स, विद्व ीय संस्करर्ण, अध्याय 1918, पृष्ठ 388 देखिखए)। (9) व:मा+ वाद में मुस्जिस्लमों द्वारा विकए गए दावे क े अ+ुसार, भव+ बगल से कविब्रस् ा+ से तिघरा हुआ है सिSसे गंS शाविहदा+ कहा Sा ा है। फ ै Sाबाद गSेविर्टयर में भी S+मस्र्थीा+ क े गेर्ट पर पचहत्तर मुसलमा+ों क े दफ+ और 1855 की लड़ाई क े बाद गंS शाविहदा+ क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +ाम से Sा+े Sा+े वाले स्र्थीा+ का उल्लेख है। यद्यविप श्री राम Sन्मभूविम या इसक े अहा े या संबंति* क्षेत्र में विपछले 50 वषÂ से अति*क समय से भव+ क े पास कहीं भी कोई कब्रें +हीं हैं और यविद भव+ विब्रविर्टश समय क े दौरा+ एक कविब्रस् ा+ से तिघरा हुआ र्थीा, ो उ+क े द्वारा अव* क े विवलय क े र्थीोड़े समय बाद भव+ मस्जिस्Sद +हीं हो सक ा है और अंति म संस्कार की प्रार्थी:+ाओं को छोड़कर प्रार्थी:+ा कर+े क े खिलए एक मस्जिस्Sद क े रूप में उपयोग +हीं विकया Sा सक ा है।"

72. उपरोX चु+ौ ी को क ु छ मुस्जिस्लम गवाहों क े साक्ष्य का अवलम्ब+ ले े हुए सबल कर+े की मांग की गई है। इ+ गवाहों क े बया+ों क े प्रासंविगक विहस्सों को सु+वाई क े दौरा+ ध्या+ आकर्मिष विकया गया है और +ीचे पु+: प्रस् ु विकया गया है: (i) मोहम्मद इदरीस (पी र्डब्ल्यू-10) गवाह क े अ+ुसार: "बल द्वारा ब+ाई गई विकसी भूविम पर वि+र्मिम भव+ मस्जिस्Sद +हीं होगी। इसखिलए, इसक े वै* या +ाSायS हो+े का कोई सवाल ही +हीं है। इस्लाम में पूSा स्र्थील को ध्वस् कर+ा वि+विषद्ध है। इसखिलए, इसको ोड़+े और इसक े बदले एक मस्जिस्Sद ब+ा+े का कोई सवाल ही +हीं है। यविद विकसी भी विगरे हुए मंविदर का मलबा उसक े माखिलक द्वारा बेचा Sा ा है, ो ऐसी साम£ी खरीदकर मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण पर कोई रोक +हीं है। यह एक और बा है विक वे इस मलबे को Sबर+ हणिर्थीयाकर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं कर सक े।" म+ुष्य, Sा+वरों, पतिक्षयों या मूर्ति यों की छविवयों क े तिचत्रर्ण पर, गवाह +े कहा: "यविद विकसी इमाम को यह ज्ञा+ है विक पशुओं और पतिक्षयों क े तिचत्र, देवप्रति मा या म+ुष्यों की मूर्ति यों या प्रति माओं क े तिचत्र, या विकसी भी स्त्री की सी*ी या क ु विर्टल छविवयां या प्रति माएं विकसी भी संरच+ा में उक े री गयी हैं, ो वह +माज़ अदा कर+े से पहले इस रह क े उत्कीर्ण: को हर्टा+े कर+े का प्रयास करेगा। लेविक+ अगर वह ऐसा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं कर ा, ब भी +माS अदा होगी। मैं+े पहले ही ऐसी +माS की स्जिस्र्थीति और प्रभावकारिर ा क े बारे में बा की है। कु छ परिरस्जिस्र्थीति यों में यह मकरूह होगा और क ु छ परिरस्जिस्र्थीति यों में ऐसा +हीं होगा। यविद इमाम इस प्रकार क े तिचत्रों और आक ृ ति यों को हर्टा+े की कोणिशश +हीं कर े है, ो यह उसकी ओर से अपरा* होगा। इसी प्रकार 'शरीय ' में यह भी उल्लेख विकया गया है विक यविद मस्जिस्Sद की दीवारों या स् ंभों पर विकसी भी Sीव का तिचत्र या मूर्ति मौSूद है, ो वहाँ भी अदा की गयी +वाS क ु छ स्जिस्र्थीति यों में मकरूह (अवांछ+ीय) होगा। 'विफक़ह' की 'विहदाया' में इसका उल्लेख विमल ा है।" (ii) मोहम्मद बुरहा+ुद्दी+ (PW-11) "यह सच है विक विकसी और की Sमी+ पर Sबरदस् ी मस्जिस्Sद ब+ा+े पर प्रति बं* है। यविद विकसी भूविम पर विकसी का स्वाविमत्व साविब है, ो माखिलक की सहमति क े अभाव में मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया Sाएगा।... यविद कोई संपखित्त गैर -मुस्जिस्लम या यहां क विक एक मुस्जिस्लम की है, ो विकसी भी परिरस्जिस्र्थीति में उसको ध्वस् करक े मस्जिस्Sद को Sबर+ वहां +हीं ब+ाया Sा सक ा है। यविद यह साविब हो Sा ा है, ो मस्जिस्Sद को विवति*क/उतिच +हीं मा+ा Sाएगा।" गवाह +े स्वयं को स्वच्छ कर+े का काय: या वSू की व्यवस्र्थीा क े बारे में ब ाया: ' ैमूम' (वSू का विवकल्प) करक े भी +माS अदा की Sा सक ी है, यविद 'वSू' +हीं विकया गया है और मस्जिस्Sद में 'वज़ू' कर+े की कोई व्यवस्र्थीा +हीं है और पा+ी भी दूर क े स्र्थीा+ों पर भी दस् याब(उपलब्*) +हीं है।... मैं+े ऐसी मस्जिस्Sदों को भी देखा है Sहां 'वज़ू' कर+े की कोई व्यवस्र्थीा +हीं र्थीी।" मा+व और अन्य छविवयों पर, गवाह +े कहा: "Sब कोई भी मुस्जिस्लम एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +ए सिसरे से करेगा, ो वह विकसी भी Sीविव व्यविX की स्वीर +हीं लगायेगा, चाहे वह पशु-पक्षी हो या पुरुष-स्त्री हो या देव ा-देव ा हो, सिSसे उसक े अंदर दशा:या गया हो और यविद वह ऐसा कर ा है, ो वह एक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपरा*ी होगा। हालाँविक, इसे अभी भी एक मस्जिस्Sद कहा Sाएगा यविद अन्य 'शराय ' को अवलोक+ विकया Sा ा है।" इस बा पर विक विकसी इमार क े विवध्वंस पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया Sा सक ा है, गवाह +े कहा: "यह सच है पैगम्बर क े 'इहकाम'(अ+ुमोद+) क े अ+ुसार यविद विकसी भी इमार को ध्वस् कर विदया Sा ा है और मस्जिस्Sद को उसक े मलबे से ब+ाया Sा ा है, ो वह मकरूह(आवंछ+ीय) है।" (iii) मो खाखिलद +ादवी (पीर्डब्ल्यू-22) गवाह +े कहा: "यह सच है विक विकसी भी *म: से संबंति* पूSा स्र्थील को Sबर+ ध्वस् करक े एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया Sाएगा। इसी रह इसका वि+मा:र्ण विकसी अन्य *म: से संबंति* पूSा स्र्थील को Sबर+ हड़पकर +हीं विकया Sा सक ा है।" साक्षी क े अ+ुसार, यविद विकसी विवशेष *म: से संबंति* पूSा का स्र्थीा+ ध्वस् हो Sा ा है, ो यह उस आस्र्थीा क े खिलए पूSा का स्र्थीा+ रहेगा और यविद यह साविब हुआ विक एक विववाविद स्र्थील पर एक मंविदर को मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए Sबर+ ध्वस् कर विदया गया र्थीा, ो मंविदर को मंविदर क े रूप में मा+ा Sा ा रहेगा: "यह कह+ा सही है विक यविद विकसी विवशेष *म: से संबंति* पूSा का स्र्थीा+ ध्वस् हो Sा ा है, ो यह उस आस्र्थीा से ही संबंति* पूSा का स्र्थीा+ रहेगा। यह कह+ा सही है विक मंविदर अप+ा चरिरत्र +हीं खोएगा और मस्जिस्Sद ब+ा+े क े खिलए ध्वस् हो+े पर भी मंविदर ब+े रहेगा। यविद विकसी मस्जिस्Sद को ध्वस् कर विदया Sा ा है और उसक े स्र्थीा+ पर एक मंविदर का वि+मा:र्ण विकया Sा ा है, ो मस्जिस्Sद मस्जिस्Sद ब+ी रहेगी। यविद यह साविब हो Sा ा है विक विववाविद स्र्थील पर एक मंविदर र्थीा, सिSसे Sबर+ ध्वस् कर विदया गया र्थीा, ो ऐसे मंविदर को मंविदर क े रूप में मा+ा Sाएगा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) णिशया सम्प्रदाय क े सिसब े मो. +कवी (PW-25) गवाह क े अ+ुसार: "vii. एक स्र्थीा+ पर दो पृर्थीक उपास+ा भव+ या दो *म: विवद्यमा+ +हीं हो सक े हैं। xv. मस्जिस्Sद में तिचत्रों वाले तिर्डSाइ+ विकए गए कपड़ों की रह ही प्रति हिंबब, स्वीर, तिचत्र, मूर्ति याँ आविद का भी वि+षे* है। xvii. संगी क े उपकरर्ण अर्थीा: ् घंर्टी आविद मस्जिस्Sद या उसक े आसपास क े क्षेत्र में स्वीकाय: +हीं है। xviii. Sहां घंर्टी बS ी है या शंख बSाये Sा े हैं, वहां प्रार्थी:+ा +हीं की Sा ी।"

73. श्रीमा+ विमश्रा +े हदीस क े शब्दों पर वि+भ:र ा रख े हुए आ£ह विकया विक इस्लामी का+ू+ क े वि+म्+खिलखिख महत्वपूर्ण: सिसद्धां ों का उल्लंघ+ र्थीा: (i) अज़ा+ को विद+ में कम से कम दो बार बुलाया Sा+ा चाविहए; (ii) मस्जिस्Sद में वज़ू या स्वयं को *ुल+े का स्र्थीा+ हो+ा चाविहए; (iii) मस्जिस्Sद में मूर्ति यों, फ ू लों की तिर्डSाइ+ या मा+व रूप की दृश्य प्रति माएं +हीं हो+ी चाविहए; (iv) मस्जिस्Sद क े चारों ओर या उसक े आसपास क े क्षेत्र में घंर्टी बSा+े की अ+ुज्ञा +हीं है; (v) भूविम क े एक भूखंर्ड पर, दो *ार्मिमक स्र्थीा+ अ+ुज्ञेय +हीं हैं; (vi) मस्जिस्Sद में या उसकी वि+कर्ट ा में रसोईघर में भोS+ ैयार कर+े की अ+ुमति +हीं है; (vii) मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए भूविम हड़पी हुई +हीं हो+ी चाविहए; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (viii) कोइ: कब्र मस्जिस्Sद की वि+कर्ट ा में स्जिस्र्थी +हीं हो+ी चाविहए। इ+ कÂ को वाद 4 में वादी की ओर से पेश विवद्व अति*वXा श्री मोहम्मद वि+Sामुद्दी+ पाशा द्वारा अप+े मौखिखक कÂ क े दौरा+ और खिलखिख कÂ दो+ों में अस्वीकार विकया गया है। श्री पाशा +े आ£ह विकया: (i) इस प्रश्न पर विक क्या वज़ू मस्जिस्Sद में आवश्यक है: (क) बाबरी मस्जिस्Sद क े पास वज़ू क े खिलए तिचस्जिन्ह एक विवणिशष्ट स्र्थीा+ र्थीा; (ख) हदीस क े अ+ुसार विकसी प्रसंग में, मस्जिस्Sद में आ+े से पूव: घर पर वज़ू कर+ा श्रेयस्कर है; (ग) हदीस, सिSसका हवाला विदया गया है, कह ा है विक शुक्रवार को स्+ा+ कर+ा अवि+वाय: है या इंविग कर ा है विक वज़ू क ै से विकया Sा+ा है; (ii) इस प्रश्न पर विक क्या स्वीरें या तिचत्रर्ण विकसी मस्जिस्Sद क े चरिरत्र से अलग हैं: (क) प्रति षे* का प्रयोS+ यह सुवि+तिश्च कर+ा है विक उपासक प्रार्थी:+ा से अलग + रहे; (ख) एक मुसलमा+ यह दावा कर सक ा है विक स्वीर प्रार्थी:+ा में विवघ्+ र्डाल रही है, कोई बाहरी व्यविX यह दावा +हीं कर सक ा है विक मस्जिस्Sद में छविवयों की उपस्जिस्र्थीति क े कारर्ण प्रार्थी:+ा मकरूह है; और (ग) वि+S-व वस् ुओं क े तिचत्र विवशेष रूप से अस्वीक ृ +हीं विकए Sा े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) मी+ारों क े सम्बन्* में: (क) इस्लाम की पहली मस्जिस्Sद में + ो गुम्बद र्थीे + ही मी+ारें र्थीीं; और (ख) बड़ी संख्या में मस्जिस्Sदों में, उस अवति* सविह, मी+ारें +हीं हैं। (iv) विपलर/स् ंभों की उपस्जिस्र्थीति पर कोइ: पूर्ण: व्यादेश +हीं है; (v) एक भूविम में दो विक़बला +हीं हो सक े हैं। यह हदीस की गल व्याख्या है सिSसका अर्थी: है विक राज्य में दो *म: +हीं हो सक े। (vi) इस दावे पर विक पास में घंर्टी +हीं हो+ी चाविहए: (क) विकसी S+संख्या वाले शहर में व्यावहारिरक रूप में ऐसे व्यादेश का पाल+ विकए Sा+े में असमर्थी: है; (ख) मंविदरों क े आसपास क े मस्जिस्Sदों और घंविर्टयों का बS+ा भार में असामान्य +हीं र्थीा; और (ग) इस्लाम का सूफ़ी विवचार अन्य *मÂ का अति*क अ+ुक ू लक है। (vii) कब्रों की उपस्जिस्र्थीति क े संबं* में, 1885 क े वादपत्र में संलग्न +क्शे से प ा चल ा है विक मस्जिस्Sद क े पतिश्चमी मुख क े साम+े कोई कब्रें +हीं हैं। हदीस इंविग कर ा है विक कब्र की ओर मुख करक े +माS अदा +हीं कर+ी चाविहए; और (viii) विकसी भी मामले में Sो कब्रों क े संबं* में स्वीकाय: है या +हीं है, यह सूविफयों और वहाबी क े मध्य बहु विववाविद है Sो इस विबन्दु पर *ुर विवरो*ी हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अं में, श्री पाशा +े क: विदया विक 'मकरूह' की अव*ारर्णा का अर्थी: क ु छ ऐसा है Sो अवांछ+ीय है, लेविक+ वि+विषद्ध +हीं है, यह एक विवशुद्ध आध्यास्जित्मक विवचार है Sो सव:शविXमा+ अल्लाह को आरा*+ा विप्रय ब+ा ा है। श्री पाशा +े श्री विमश्रा द्वारा दी गई व्याख्या को खारिरS कर े हुए इंविग विकया है विक श्री विमश्रा +े सम£ रूप से और उ+क े संदभ: में *ार्मिमक £ंर्थीों को पढ़े विब+ा हदीस क े क ु छ पहलुओं पर चुहिं+दा रूप से भरोसा S ाया है।

74. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अवलोक+ विकया विक सम्रार्ट क े रूप में बाबर क े पास एक स्व ंत्र संप्रभु क े रूप में पूर्ण: शविX र्थीी: "3389.... हमारे विवचार में, बाबर की स्जिस्र्थीति सव च्च शविX रख+े वाले स्व ंत्र प्रभुसत्ता सम्पन्न सम्रार्ट की र्थीी। यह सव च्च, अवि+यंवित्र और वि+रपेक्ष र्थीा, विकसी क े प्रति Sवाबदेह +हीं र्थीा। चाहे आक्रमर्णकारी हो या क ु छ और, थ्य यह है विक वह उस क्षेत्र का सव च्च अति*कारी र्थीा सिSसे उस+े Sी ा र्थीा। कोई उसे प्रश्नग +हीं कर सक ा र्थीा।" न्याया*ीश +े अवलोक+ विकया विक "क्या विववादास्पद इमार एक मस्जिस्Sद है, एक मस्जिस्Sद मा+ा Sा ा है, एक मस्जिस्Sद हो+े का विवश्वास विकया Sा ा है और मस्जिस्Sद क े रूप में प्रयोग विकया Sा ा है, को शरीय क े सिसद्धां ों क े संदभ: में +हीं बस्जिल्क समय काल में लोगों क े अ+ुसार क ै से विवश्वास विकया Sा ा है और अप+ा आचरर्ण विकया Sा ा है, क े रूप में वि+र्ण- विकया Sा+ा चाविहए। उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक क्या मुसलमा+ों +े इसक े वि+मा:र्ण क े ुरं बाद मस्जिस्Sद का इस् ेमाल इबाद कर+े क े खिलए विकया र्थीा, विकसी भी रह से साविब +हीं विकया गया र्थीा, लेविक+ यह संक े दे+े क े खिलए सबू र्थीे विक 1856-57 में विवभाS+ की दीवार स्र्थीाविप हो+े क े बाद मुसलमा+ +माS अदा कर+े क े खिलए मस्जिस्Sद गये र्थीे। क्या +माS अदा हुई र्थीी, साविब +हीं mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हुई र्थीी, लेविक+ यह स्र्थीाविप विकया गया र्थीा विक 1857 से, 16 विदसंबर 1949 को अंदरू+ी आंग+ में अंति म +माS अदा कर+े क मुसलमा+ इबाद कर+े क े खिलए मस्जिस्Sद गये र्थीे। इसखिलए, क्या भव+ शरीय क े सिसद्धां ों क े अ+ुसार एक मस्जिस्Sद हो सक ी है, इसका कोई महत्व +हीं र्थीा चूँविक उ+ लोगों का आचरर्ण सिSन्हों+े विवश्वास विकया और पूSा की, वे प्रश्नग संपखित्त क े प्रयोग और प्रक ृ ति का वि+*ा:रर्ण कर+े क े खिलए वि+*ा:रक कारक होंगे। बाबर या औरंगSेब (सिSस+े भी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया र्थीा) का अति*कार वि+रपेक्ष र्थीा और अदाल यह Sांच +हीं कर सक ी विक क्या मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण शरीय क े सिसद्धां ों क े अ+ुसार या इसक े विवपरी विकया गया र्थीा: "3404... क्या बाबर या औरंगSेब या कोई और, वे सव च्च प्राति*कारी र्थीे। क्या उ+की काय:वाही इस्लाम क े सिसद्धां ों क े अ+ुरूप र्थीी या +हीं, हमारे विवचार में, इ +ी श ास्जिब्दयों क े बाद चु+ौ ी दे+े योग्य +हीं है विवशेष रूप से Sब वे सव च्च अति*कारी न्याय की विकसी भी प्रर्णाली क े अ*ी+स्र्थी +हीं र्थीे। अन्यर्थीा भी, हम इस बा की Sांच +हीं कर सक े हैं विक क्या उन्हों+े स्र्थीा+ को मस्जिस्Sद क े रूप में +ाविम कर सही या गल रीक े से वि+मा:र्ण विकया है, खासकर Sब कम से कम स्र्थीा+ीय लोग प्रति वि+ति*त्व से विवश्वास कर े हैं, Sो भी हो, Sो वि+मा:र्ण विकया गया है, वह एक मस्जिस्Sद का है।" न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े दृविष्टकोंर्ण में: "3405. Sो क ु छ लगभग 200 से अति*क वषÂ में हुआ, हम स्पष्ट रूप से इस दृविष्टकोर्ण पर हैं, इस न्यायालय की न्यातियक Sांच का विवषय +हीं हो सक ा है, Sो संविवति* की रच+ा है Sो प्रर्णाली में विववाविद भव+ क े संभव ः वि+मा:र्ण क े लगभग सौ से अति*क वषÂ क े बाद अस्जिस् त्व में आयी। सभी विवशेषज्ञ *ार्मिमक गवाहों +े स्वीकार विकया है विक यविद एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया Sा ा है, ो Sीविव प्राणिर्णयों की स्वीर या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA छविवयों Sैसे मा+व छविवयों या Sा+वारों की छविवयों को वहां ब+े रह+े की अ+ुमति +हीं दी Sाएगी। विववाविद इमार क े वि+मा: ा +े अन्यर्थीा सोचा, विफर भी इस्लाम क े अ+ुयातिययों +े +माज़ क े उद्देश्य से परिरसर का उपयोग कर+े में संकोच +हीं विकया। क्या ऐसे व्यविXयों का विवश्वास, Sो इस रह की इबाद क े खिलए परिरसर Sा े र्थीे, श्रेष्ठ है या ही+ है, क्या +माज़ वि+यविम या लगा ार या कभी-कभार और समयान् राल पर हो ी र्थीी, इसका कोई परिरर्णाम +हीं होगा। पया:प्त होगी यविद मुस्जिस्लम द्वारा +माज़ हो ी र्थीी। विववाविद भव+ को यह Sा+ े हुए विक यह एक मस्जिस्Sद है, विहन्दूओं द्वारा पूSा कर+ा क ु छ और है लेविक+ उस आ*ार पर सिSस रह से विववाविद भव+ को विपछले लगभग 250 वषÂ से अति*क Sा+ा Sा ा है बदला +हीं Sा सक ा है।" 1860 से 16 विदसंबर 1949 क हालांविक समयान् राल पर, मुसलमा+ों द्वारा +माS अदा कर+ा उच्च न्यायालय क े दृविष्टकोर्ण में महत्वपूर्ण: र्थीी।

75. उपरोX दृविष्टकोर्ण का विवरो* कर े हुए, श्री विमश्रा द्वारा यह आ£ह विकया गया है विक उच्च न्यायालय का संप्रेक्षर्ण अस क: ा क े कारर्ण है और यह विक अव* का+ू+ अति*वि+यम 1876 की *ारा 3 क े संदभ: में, *ार्मिमक उपयोग या संस्र्थीा+ों क े मामलों पर वि+र्ण:य इस्लामी का+ू+ या, Sैसा भी मामला हो, हिंहदू का+ू+ क े अ+ुसार य विकया Sा+ा चाविहए।

76. अवि+वाय: रूप से, इस न्यायालय क े समक्ष सिS+ कÂ का आ£ह विकया गया है, उन्हें यह प ा कर+े क े खिलए *म:शास्त्रीय सिसद्धां की यात्रा शुरू कर+े और सिसद्धां को लागू कर+े की आवश्यक ा है विक क्या मस्जिस्Sद क े स्र्थीा+ या वि+मा:र्ण क े खिलए हदीस द्वारा वि+*ा:रिर विवशेष ाओं में से प्रत्येक एक को पूरा विकया गया है।

77. कÂ क े दौरा+, यह वि+कलकर आया है विक श्री पी ए+ विमश्रा द्वारा वर्भिर्ण इस्लाम का चरम और यहां क विक पूर्ण: दृविष्टकोर्ण भी *म:शास्त्र क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मामले पर इस्लाविमक का+ू+ की एकमात्र उपलब्* वि+व:च+ क े रूप में साम+े +हीं आ ा है। इसखिलए, थ्यों और परिरस्जिस्र्थीति यों क े विदए गए सेर्ट में, इस न्यायालय क े खिलए *म:शास्त्र क े क्षेत्र में प्रवेश कर+ा और हदीस क े व्याख्याकार की भूविमका £हर्ण कर+ा अ+ुतिच है। असली परीक्षर्ण यह है विक Sो लोग विवश्वास और पूSा कर े हैं, उन्हें उस स्र्थीा+ क े *ार्मिमक प्रभाव में विवश्वास है Sहां वे प्रार्थी:+ा कर े हैं। विकसी स्र्थीा+ पर +माS अदा कर+े में उपासक क े आस्र्थीा और विवश्वास को Sो उपासकों क े खिलए एक मस्जिस्Sद है, को चु+ौ ी +हीं दी Sा सक ी है। इस न्यायालय क े खिलए इस आ*ार पर प्रश्न कर+ा अ ार्मिक होगा विक एक सच्चा मुस्जिस्लम उस स्र्थीा+ पर इबाद +हीं करेगा Sो श्री विमश्रा द्वारा चुहिं+दा रूप से विदए गए सिसद्धां की चरम व्याख्या को पूरा +हीं कर ा है। इस न्यायालय को, एक *म:वि+रपेक्ष संस्र्थीा+ क े रूप में, एक संवै*ावि+क शास+ क े ह स्र्थीाविप विकया गया है, सिSसे *म:शास्त्रीय सिसद्धां की कई संभाविव व्याख्याओं में से एक को चु++े से बच+ा चाविहए और उपासक क े विवश्वास और आस्र्थीा को स्वीकार कर+े क े सुरतिक्ष रास् े को स्र्थीविग कर+ा चाविहए। उपरोX सभी, *म: का पाल+ संस्क ृ ति और सामासिSक संदभ: क े अ+ुसार बदल ा रह ा है, इस्लाम कोई अपवाद +हीं है। यह वास् व में हमारे बहुल समाS की ाक है। सांस्क ृ ति क समावेश+ एक महत्वपूर्ण: कारक है Sो *म: क े पाल+ क े रीक े को आकार दे ा है। भार में प्रचखिल *ार्मिमक आस्र्थीाओं की बहुल ा में, सांस्क ृ ति क समावेश+ को *ार्मिमक सिसद्धां की विव+ाशकारी विवशेष ा क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है। इसक े विवपरी, यह प्रविक्रया उस देश क े वास् विवक चरिरत्र को मSबू और पुष्ट कर ी है Sो *ार्मिमक आस्र्थीाओं mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और विवचारों की विवविव* ा को समायोसिS, सविहष्र्णु और सम्मा+ द्वारा अप+ी एक ा को संरतिक्ष कर+े में सक्षम है। श्री विमश्रा द्वारा प्रस् ु कÂ को खारिरS कर+े में कोई संकोच +हीं हो सक ा है। हमारा न्यायालय एक संवै*ावि+क आदेश से अप+े अस्जिस् त्व पर आ*ारिर है। हमें पूर्ण: और चरम रूप में *ार्मिमक सिसद्धां की व्याख्या कर+े और उपासकों की आस्र्थीा पर सवाल उठा+े क े खिलए अदाल को प्रभाविव कर+े क े विकसी भी प्रयास को दृढ़ ा से अस्वीकार कर+ा चाविहए। संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 25 में अं र्मि+विह मूल्यों क े विव+ाश क े रूप में क ु छ +हीं होगा।

78. संसद +े उपास+ा स्र्थील (विवशेष उपबं*) अति*वि+यम, 199133 अति*वि+यविम विकया। इस अति*वि+यम की *ारा 3, *ारा 6 और *ारा 8 क े उपबं* अति*वि+यम+ की ति णिर्थी (18 सिस म्बर 1991) को ुरं प्रवृत्त हुए Sबविक इसक े शेष उपबं* 11 Sुलाई, 1991 को प्रवृत्त हुए मा+े Sा े हैं। प्रमुख शीष:क का+ू+ ब+ा+े में संसद की मंशा को उSागर कर ा है, यह इसक े खिलए है: "विकसी उपास+ा स्र्थील का संपरिरव:+ प्रति विषद्ध कर+े क े खिलए और 15 अगस्, 1947 को यर्थीाविवद्यमा+ विकसी उपास+ा स्र्थील क े *ार्मिमक स्वरूप को ब+ाए रख+े र्थीा उससे संसX या उसक े आ+ुषंविगक विवषयों का उपबं* कर+े क े खिलए अति*वि+यम" दो उद्देश्यों को पूरा कर+े क े खिलए का+ू+ ब+ाया गया है। पहले, यह उपास+ा क े विकसी स्र्थीा+ क े संपरिरव:+ पर रोक लगा ा है। ऐसा कर+े में, यह भविवष्य में यह अवि+वाय: ब+ा ा है विक साव:Sवि+क उपास+ा स्र्थील क े स्वरूप को 33 "उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बदला +हीं Sाएगा। दूसरा, यह 15 अगस् 1947 को, Sब भार +े औपवि+वेणिशक शास+ से स्व ंत्र ा प्राप्त की र्थीी, यर्थीाविवद्यमा+ का+ू+ उपास+ा क े प्रत्येक स्र्थीा+ क े *ार्मिमक स्वरूप को ब+ाए रख+े क े खिलए एक सकारात्मक दातियत्व दे+ा चाह ा है।

79. 'उपास+ा स्र्थील' को *ारा 2 (ग) में परिरभाविष विकया गया है: "2(ग) "उपास+ा स्र्थील" से कोई मंविदर, मस्जिस्Sद, गुरुद्वारा, विगरSाघर, मठ या विकसी *ार्मिमक संप्रदाय या उसक े अ+ुभाग का, चाहे वह विकसी भी +ाम से ज्ञा हो, लोक *ार्मिमक उपास+ा का कोई अन्य स्र्थील अणिभप्रे है।" *ारा 2(क) में उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम प्राव*ा+ कर ा है विक "इस अति*वि+यम का प्रारंभ" का अर्थी: 11 Sुलाई 1991 को प्रारंभ है। *ारा 3 विकसी *ार्मिमक संप्रदाय या उसक े विकसी अ+ुभाग क े विकसी उपास+ा स्र्थील को विकसी अन्य *ार्मिमक संप्रदाय या उसी *ार्मिमक संप्रदाय क े विकसी अन्य पंर्थी में संपरिरव:+ पर रोक लगा ा है: "3. उपास+ा स्र्थीलों क े संपरिरव:+ का वS:+-कोई भी व्यविX विकसी *ार्मिमक संप्रदाय या उसक े विकसी अ+ुभाग क े विकसी उपास+ा स्र्थील का उसी *ार्मिमक संप्रदाय क े णिभन्न अ+ुभाग क े या विकसी णिभन्न *ार्मिमक संप्रदाय या उसक े विकसी अ+ुभाग क े उपास+ा स्र्थील में संपरिरव:+ +हीं करेगा।" *ारा 4, 15 अगस् 1947 को यर्थीाविवद्यमा+ उपास+ा स्र्थील क े *ार्मिमक स्वरूप को संरतिक्ष कर ी है: "4. कति पय उपास+ा स्र्थीलों क े *ार्मिमक स्वरूप क े बारे में घोषर्णा और न्यायालयों, आविद की अति*कारिर ा का वS:+-(1) यह ए द्वारा घोविष विकया Sा ा है विक 15 अगस् 1947 को विवद्यमा+ उपास+ा स्र्थील का *ार्मिमक स्वरूप वैसा ही ब+ा रहेगा Sैसा वह उस विद+ विवद्यमा+ र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (2) यविद इस अति*वि+यम क े प्रारंभ पर, 15 अगस् 1947 को विवद्यमा+ विकसी उपास+ा स्र्थील क े *ार्मिमक स्वरूप क े संपरिरव:+ क े बारे में कोई वाद, अपील या अन्य काय:वाही विकसी न्यायालय, अति*करर्ण या अन्य प्राति*कारी क े समक्ष लस्जिम्ब है ो वह उपशविम हो Sाएगी और ऐसे विकसी मामले की बाब कोई वाद, अपील या अन्य काय:वाही ऐसे प्रारंभ पर या उसक े पश्चा ् विकसी न्यायालय, अति*करर्ण या अन्य प्राति*कारी क े समक्ष +हीं होगी: परं ु यविद इस आ*ार पर विक ऐसे विकसी स्र्थील क े *ार्मिमक स्वरूप में 15 अगस् 1947 क े पश्चा ् संपरिरव:+ हुआ है, संस्जिस्र्थी या दायर विकया गया कोई वाद, अपील या अन्य काय:वाही इस अति*वि+यम क े प्रारंभ पर लस्जिम्ब है, ो ऐसा वाद, अपील या अन्य काय:वाही इस प्रकार उपशविम +हीं होगी और ऐसे प्रत्येक वाद, अपील या अन्य काय:वाही का वि+पर्टारा उप*ारा (1) क े उपबं*ों क े अ+ुसार विकया Sाएगा। (3) उप*ारा (1) और उप*ारा (2) की कोई बा वि+म्+खिलखिख को लागू +हीं होगी,- (क) उX उप-*ाराओं में वि+र्मिदष्ट कोई उपास+ा स्र्थील, Sो प्राची+ स्मारक र्थीा पुरा त्वीय स्र्थील और अवशेष अति*वि+यम 1958 (1958 का 24) या त्समय प्रवृत्त विकसी अन्य विवति* क े अन् ग: आ+े वाला कोई प्राची+ और ऐति हासिसक स्मारक या कोई पुरा त्वीय स्र्थील या अवशेष है; (ख) उप*ारा (2) में वि+र्मिदष्ट विकसी मामले की बाब कोई वाद, अपील या अन्य काय:वाही, सिSसका इस अति*वि+यम क े प्रारंभ क े पूव: विकसी न्यायालय, अति*करर्ण या अन्य प्राति*कारी द्वारा अंति म रूप से विववि+श्चय, परिरवि+*ा:रर्ण या वि+पर्टारा कर विदया गया है; (ग) ऐसे विकसी मामले क े बारे में कोई विववाद Sो ऐसे प्रारंभ क े पूव: पक्षकारों द्वारा आपस में य हो गया है; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (घ) ऐसे विकसी स्र्थील का कोई संपरिरव:+ Sो ऐसे प्रारंभ क े पूव: रSामंदी द्वारा विकया गया है; (ङ) ऐसे प्रारंभ क े पूव: ऐसे विकसी स्र्थील का विकया गया कोई संपरिरव:+, Sो त्समय प्रवृत्त विकसी विवति* क े अ*ी+ परिरसीमा द्वारा वर्जिS हो+े क े कारर्ण विकसी न्यायालय, अति*करर्ण या अन्य प्राति*कारी क े समक्ष चु+ौ ी दे+े योग्य +हीं है। (प्रभाव वर्ति* ) उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम में उपास+ा स्र्थील सिSसे "आम ौर पर राम Sन्म भूविम- बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में Sा+ा Sा ा है" और इससे सम्बस्जिन्* विकसी वाद, अपील या काय:वाही पर इसक े प्राव*ा+ों की प्रयोज्य ा से छ ू र्ट है। *ारा 5 वि+*ा:रिर कर ी है: "5.अति*वि+यम का राम Sन्मभूविम-बाबरी मस्जिस्Sद को लागू + हो+ा-इस अति*वि+यम की कोई बा उत्तर प्रदेश राज्य क े अयोध्या में स्जिस्र्थी राम Sन्मभूविम-बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में सामान्य या ज्ञा स्र्थीा+ या उपास+ा स्र्थील को और उX स्र्थीा+ या उपास+ा स्र्थील से संबंति* विकसी वाद, अपील या अन्य काय:वाही को लागू +हीं होगी।" *ारा 6 में *ारा 3 क े उपबं*ों का उल्लंघ+ कर+े और उपशम+ क े काय: या प्रयास क े खिलए ी+ वष: क े कारावास और अर्थी: द°ड़ का उपबं* है: "6. *ारा 3 क े उल्लंघ+ क े खिलए दंर्ड-(1) Sो कोई *ारा 3 क े उपबं*ों का उल्लंघ+ करेगा, वह कारावास से, सिSसकी अवति* ी+ वष: क ही हो सक े गी, दंर्ड+ीय होगा और Sुमा:+े से भी दंर्ड+ीय होगा। (2) Sो कोई उप*ारा (1) क े अ*ी+ दंर्ड+ीय कोई अपरा* कर+े का प्रयत्+ करेगा या ऐसा अपरा* कराएगा और ऐसे प्रयत्+ में अपरा* कर+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की विदशा में कोई काय: करेगा, वह उस अपरा* क े खिलए उपबंति* दंर्ड से दंर्ड+ीय होगा। (3) Sो कोई उप*ारा (1) क े अ*ी+ दंर्ड+ीय विकसी अपरा* का दुष्प्रेरर्ण करेगा या उसे कर+े में आपराति*क षड्यंत्र का पक्षकार होगा, चाहे ऐसा अपरा* ऐसी दुष्प्रेरर्णा क े परिरर्णामस्वरूप या ऐसे आपराति*क षड्यंत्र क े अ+ुसरर्ण में विकया गया हो या + विकया गया हो, वह भार ीय दंर्ड संविह ा (1860 का 45) की *ारा 116 में विकसी बा क े हो े हुए भी, उस अपरा* क े खिलए उपबंति* दंर्ड से दंर्ड+ीय होगा।" *ारा 7 उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम को अध्यारोही बल और प्रभाव प्रदा+ कर ी है: "7. अति*वि+यम का अन्य अति*वि+यविमति यों पर अध्यारोही हो+ा-इस अति*वि+यम क े उपबं*, त्समय प्रवृत्त विकसी अन्य विवति* या इस अति*वि+यम से णिभन्न विकसी विवति* क े आ*ार पर प्रभावी विकसी खिलख में उससे असंग विकसी बा क े हो े हुए भी, प्रभावी होंगे।"

80. का+ू+ दो अर्टल और अवि+वाय: मा+दंर्ड लागू कर ा है: (i) *ारा 3 द्वारा विकसी *ार्मिमक संप्रदाय या विकसी संप्रदाय क े विकसी वग: की उपास+ा स्र्थील का उसी *ार्मिमक संप्रदाय क े विकसी णिभन्न वग: की या विकसी विवणिशष्ट *ार्मिमक संप्रदाय की उपास+ा स्र्थील में संपरिरव:+ पर वS:+ अति*रोविप विकया Sा ा है। सभी *मÂ और संप्रदायों की साव:Sवि+क *ार्मिमक उपास+ा स्र्थीलों को शाविमल कर+े क े खिलए "उपास+ा स्र्थील" अणिभव्यविX व्यापक संभव शब्दों में परिरभाविष विकया गया है; और (ii) विवति* उपास+ा क े प्रत्येक स्र्थीा+ क े *ार्मिमक स्वरूप को, Sैसा वह 15 अगस्, 1947 को विवद्यमा+ र्थीा, ब+ाए रख ी है। इस प्रयोS+ को प्राप्त कर+े क े खिलए, यह 15 अगस्, 1947 को विवद्यमा+ उपास+ा क े विकसी स्र्थीा+ क े *ार्मिमक स्वरूप क े संपरिरव:+ क े संबं* में वादों और विवति*क mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA काय:वाविहयों क े उपशम+ का उपबं* कर ा है इसक े सार्थी ही, उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम +ए मुकदमों या का+ू+ी काय:वाही क े संस्र्थी+ पर वS:+ लगा ी है। एकमात्र अपवाद इस आ*ार पर विवति* क े प्रारंभ पर लंविब वादों, अपीलों या काय:वाविहयों क े मामले में है विक उपास+ा स्र्थील का संपरिरव:+ 15 अगस् 1947 क े पश्चा ् हुआ र्थीा। *ारा 4 की उप*ारा (2) का परं ुक उ+ वादों, अपीलों और विवति*क काय:वाविहयों को बचा ा (व्यावृति कर ा ) है Sो अति*वि+यम क े प्रारंभ की ारीख पर लंविब हैं यविद वे वि+र्मिदष्ट ति णिर्थी क े पश्चा ् उपास+ा स्र्थील क े *ार्मिमक स्वरूप क े संपरिरव:+ से संबंति* हैं। *ारा 4 की उप-*ारा (3) हालांविक यह वि+*ा:रिर कर ी है विक विपछले दो उप-खंर्ड लागू +हीं होंगे: (क) 1958 क े अति*वि+यम 24 या विकसी अन्य विवति* द्वारा शासिस प्राची+ और ऐति हासिसक स्मारक या पुरा त्व स्र्थील या अवशेष; (ख) कोइ: वाद या विवति*क काय:वाही, सिSसका अंति म रूप से वि+र्ण:य+, य या वि+पर्टारा विकया गया है; (ग) कोई विववाद Sो अति*वि+यम क े प्रारंभ से पूव: पक्षकारों द्वारा सुलझाया गया है; (घ) अति*वि+यम क े प्रारंभ क े पूव: सम्मति द्वारा उपास+ा स्र्थील का संपरिरव:+; और (ड़) अति*वि+यम क े प्रारंभ से पूव:, उपास+ा स्र्थील का कोई संपरिरव:+ सिSसक े संबं* में वाद हे ूक परिरसीमा से वर्जिS होगा। *ारा 5 वि+*ा:रिर कर ा है विक अति*वि+यम राम Sन्मभूविम–बाबरी मस्जिस्Sद और उससे संबंति* विकसी वाद, अपील या काय:वाही पर लागू +हीं होगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA + ीS+, एक विवणिशष्ट अपवाद है सिSसे व:मा+ विववाद क े संबं* में उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम क े प्राव*ा+ों द्वारा ब+ाया गया है। संसद का आशय

81. 10 सिस ंबर 199134 को लोकसभा में क ें ˆीय गृह मंत्री द्वारा का+ू+ ब+ा+े क े उद्देश्य को समझाया गया: "हम इस विव*ेयक को प्रेम, शांति और सौहाद: की अप+ी गौरवशाली परंपराओं को प्रदा+ कर+े और विवकसिस कर+े क े एक उपाय क े रूप में देख े हैं। ये परंपराएं एक सांस्क ृ ति क विवरास का विहस्सा हैं, सिSस पर प्रत्येक भार ीय को बहु गव: है। सभी आस्र्थीाओं क े खिलए सविहष्र्णु ा अ+ं काल से हमारी महा+ सभ्य ा की विवशेष ाएं हैं। स्व ंत्र ा से पहले की अवति* क े दौरा+, एक ा, सौहाद: और परस्पर सम्मा+ की ये परंपराएं अत्यति*क +ाव में र्थीीं, Sब औपवि+वेणिशक सत्ता +े देश में सांप्रदातियक विवभाS+ को सविक्रय रूप से सृसिS और प्रोत्साविह कर+े का प्रयास विकया र्थीा। स्व ंत्र ा क े बाद हम+े अ ी क े घावों को भर+े की विदशा में प्रयास विकया और सांप्रदातियक एक ा र्थीा अप+े प्राची+ गौरव क े प्रति सद्भाव+ा की परंपराओं को पु+ः स्र्थीाविप कर+े का प्रयास विकया। हम बड़े पैमा+े पर सफल भी हो चुक े हैं, हालांविक यह स्वीकार विकया Sा+ा चाविहए, क ु छ दुभा:ग्यपूर्ण: अवरो* हुए है। ऐसे अवरो*ों से ह ोत्साविह हो+े क े बSाय, भविवष्य क े खिलए उ+से सबक ले+ा हमारा क:व्य और प्रति बद्ध ा है।" (प्रभाव वर्ति* ) क ें ˆीय गृह मंत्री +े संक े विदया विक Sो का+ू+ उपास+ा स्र्थील क े Sबर+ संपरिरव:+ को प्रति बंति* कर+ा चाह ा है, वह "+ए विववादों को पैदा कर+े और पुरा+े विववादों को बढा+े क े खिलए +हीं र्थीा, Sो लोगों द्वारा लंबे समय से भुलाए गए र्थीे... बस्जिल्क उस उद्देश्य को प्राप्त कर+े को सुविव*ाS+ाक ब+ा ा है 34 लोक सभा वाद-विववाद, खंर्ड V, सं. 41-49, पृष्ठ 448 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिSसक े खिलए ब+ाया गया है।"35 15 अगस् 1947 की वि+र्मिदष्ट ारीख क े समर्थी:+ में बोल े हुए, एक सदस्य (श्रीम ी माखिल+ी भट्टाचाया:) +े व्याख्या की36: "लेविक+ मुझे लग ा है विक यह 15 अगस् 1947 वि+र्णा:यक है, क्योंविक उस ारीख को हमें अ ी और सभी क े खिलए इस रह की बब:र ा को पीछे छोड़ े हुए एक आ*ुवि+क, लोक ांवित्रक और संप्रभु राज्य क े रूप में उभर+ा र्थीा। उस ारीख से, हम+े अप+े आप को सुणिभन्न भी विकया....राज्य क े रूप में सिSसका कोई आति*कारिरक *म: +हीं है और Sो सभी विवणिभन्न *ार्मिमक संप्रदायों को समा+ अति*कार दे ा है। इसखिलए इससे पहले Sो क ु छ भी हुआ हो, हम सभी यह आशास्जिन्व र्थीे विक उस ारीख से अ ी में वापस Sा+ा +हीं चाविहए।" (प्रभाव वर्ति* )

82. संसद द्वारा 1991 में अति*वि+यविम उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम संविव*ा+ क े मूलभू मूल्यों की रक्षा और सुरक्षा कर े हैं। प्रस् ाव+ा विवचार, अणिभव्यविX, विवश्वास, *म:, आस्र्थीा और उपास+ा की स्व ंत्र ा की रक्षा कर+े की आवश्यक ा को रेखांविक कर ी है। यह मा+वीय गरिरमा और भाईचारे पर बल दे ा है। सभी *ार्मिमक म ों की समा+ ा क े प्रति सविहष्र्णु ा, सम्मा+ और स्वीक ृ ति बं*ु ा का एक मौखिलक वि+यम है। यह विवशेष रूप से 12 सिस ंबर 1991 को राज्य सभा37 क े समक्ष अप+े संबो*+ क े दौरा+ क ें ˆीय गृह मंत्री द्वारा विवशेष रूप से विदया गया र्थीा यह कह े हुए: "मै विवश्वास कर ा हूँ विक भार अप+ी सभ्य ा क े खिलए Sा+ा Sा ा है और विवश्व संस्क ृ ति क े खिलए भार का सबसे बड़ा सहयोग सविहष्र्णु ा क े प्रकार, समझ, समायोS+ भाव+ा का प्रकार और सव:देशीय दृविष्टकोंर्ण है यह विदखा ा है… 35 लोक सभा वाद विववाद, ख°ड़ v, सं. 41-49, पृष्ट 448 36 लोक सभा वाद विववाद, ख°ड़ v सं. 41-49, पृष्ट 443-444 37 राज्य सभा का वाद विववाद, ख°ड़ सीएलएक्स, पृष्ट 519-520 और 522 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अद्वै दश:+... स्पष्ट कह ा है विक ईश्वर और हमारे बीच कोई अं र +हीं है। हमें यह अ+ुभव कर+ा होगा विक ईश्वर क े वल मस्जिस्Sद में या मस्जिन्दर में ही +हीं है, बस्जिल्क ईश्वर व्यविX क े हृदय में है........ सभी यह समझ लें विक वह संविव*ा+ क े प्रति अप+ी वि+ष्ठा रख े हैं, देश की एक ा क े प्रति वि+ष्ठा रख े हैं: बाकी चीSें अ ास्जित्वक हैं।" 15 अगस् 1947 को यर्थीाविवद्यमा+ साव:Sवि+क उपास+ा स्र्थीलों क े *ार्मिमक स्वरूप क े संरक्षर्ण की गारंर्टी प्रदा+ कर+े और साव:Sवि+क उपास+ा स्र्थील क े संपरिरव:+ क े खिखलाफ, संसद +े वि+*ा:रिर विकया विक औपवि+वेणिशक शास+ से स्व ंत्र ा हर *ार्मिमक समुदाय को विवश्वास प्रदा+ करक े अ ी क े अन्याय को ठीक कर+े क े खिलए एक संवै*ावि+क आ*ार प्रस् ु कर ी है विक उ+क े उपास+ा स्र्थील संरतिक्ष विकए Sाएंगे और उ+क े स्वरूप में बदलाव +हीं विकया Sाएगा। का+ू+ राज्य क े सार्थी-सार्थी राष्ट्र क े प्रत्येक +ागरिरक को भी संबोति* कर ा है। इसक े मा+दंर्ड उ+ लोगों को बाध्य कर े हैं Sो हर स् र पर राष्ट्र क े मामलों को वि+यंवित्र कर े हैं। वे मा+दंर्ड अ+ुच्छेद 51 क क े अ*ी+ मूल क:व्यों को काया:स्जिन्व कर े हैं और प्रत्येक +ागरिरक को भी सकारात्मक अति*देश दे े हैं। राज्य +े का+ू+ ब+ाकर, संवै*ावि+क प्रति बद्ध ा और पंर्थीवि+रपेक्ष ा व सभी *मÂ की समा+ ा को ब+ाए रख+े क े खिलए अप+े संवै*ावि+क दातियत्वों को लागू विकया है, Sो संविव*ा+ क े मूलभू विवशेष ाओं का एक भाग है। उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम भार ीय संविव*ा+ क े ह पंर्थीवि+रपेक्ष ा क े प्रति हमारी प्रति बद्ध ा को लागू कर+े क े खिलए एक वि+बा:* दातियत्व लागू कर े हैं। इसखिलए का+ू+ भार ीय राS+ीति की पंर्थीवि+रपेक्ष विवशेष ाओं की रक्षा क े खिलए ब+ाया गया एक विव*ायी सा*+ है, Sो संविव*ा+ की मूल विवशेष ाओं में से एक है। गैर-पश्चगम+ मौखिलक संवै*ावि+क सिसद्धां ों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की एक मूलभू विवशेष ा है सिSसमें पंर्थीवि+रपेक्ष ा एक मुख्य घर्टक है। इस प्रकार उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम एक विव*ायी हस् क्षेप है Sो हमारे पंर्थीवि+रपेक्ष मूल्यों की एक अवि+वाय: विवशेष ा क े रूप में गैर -पश्चगम+ को संरतिक्ष कर ा है। संवै*ावि+क मूल्य क े रूप में पंर्थीवि+रपेक्ष ा

83. एस आर बोम्मई ब+ाम भार संघ38 में इस न्यायालय की +ौ न्याया*ीशों की पीठ क े फ ै सले में, Sस्जिस्र्टस बीपी Sीव+ रेड्डी +े अव*ारिर विकया: "304.... सामासिSक न्याय, विवश्वास, आस्र्थीा या उपास+ा की स्व ंत्र ा और स्जिस्र्थीति और अवसर की समा+ ा क े सांविव*ावि+क वादे को क ै से प्राप्त विकया Sाये Sब क विक राज्य अप+े विवचार से व्यविX क े *म:, आस्र्थीा या विवश्वास को हुए क ु ल विमलाकर उसक े अति*कारों, उसक े क:व्यों और उसक े अति*कारों से परहेS कर ा है ? इस प्रकार *म:वि+रपेक्ष ा *ार्मिमक सविहष्र्णु ा क े वि+स्जिष्क्रय रवैये से अति*क है। यह सभी *मÂ क े समा+ व्यवहार की एक सकारात्मक अव*ारर्णा है। इस दृविष्टकोर्ण को क ु छ लोगों +े *म: क े प्रति र्टस्र्थी ा क े रूप में या एक परोपकारी र्टस्र्थी ा क े रूप में वर्भिर्ण विकया है। यह पतिश्चमी उदारवादी विवचार द्वारा विवकसिस एक अव*ारर्णा हो सक ी है या ऐसा हो सक ा है, Sैसा विक क ु छ कह े हैं, समय क े सभी हिंबदुओं पर भार ीय लोगों क े सार्थी एक स्र्थीायी विवश्वास हो सक ा है। वह ास्जित्वक +हीं है। ास्जित्वक यह है विक यह एक संवै*ावि+क लक्ष्य है और संविव*ा+ का एक आ*ारभू ढाँचा है Sैसा विक क े शवा+ंद भार ी [क े सवा+ंद भार ी ब+ाम क े रल राज्य, (1973) 4 एससीसी 225: 1973 सप्लीमेंर्ट एससीआर 1] और इंविदरा ए+. गां*ी ब+ाम राS +ारायर्ण [1975 सप्लीमेंर्ट एससीसी 38 (1994) 3 एससीसी 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1: (1976) 2 एससीआर 347] में पुविष्ट की गई। सा*ारर्ण शब्दों में, इस संवै*ावि+क +ीति से असंग कोई भी कदम असंवै*ावि+क है।" उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम आं रिरक रूप से एक पंर्थीवि+रपेक्ष राज्य क े दातियत्वों से संबंति* हैं। यह सभी *मÂ की समा+ ा क े प्रति भार की प्रति बद्ध ा को दशा: ा है। उपरोX सभी, उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम एक सत्यवि+ष्ठ क:व्य की पुविष्ट है Sो सभी *मÂ की समा+ ा को एक आवश्यक संवै*ावि+क मूल्य क े रूप में संरतिक्ष और सुरतिक्ष कर+े क े खिलए राज्य पर र्डाला गया र्थीा, यह एक मा+क है Sो संविव*ा+ की एक मूलभू विवशेष ा हो+े की प्रास्जिस्र्थीति रख ा है। एक उद्देश्य उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम क े अति*वि+यम+ में अं र्मि+विह है। का+ू+ हमारे इति हास और राष्ट्र क े भविवष्य की बा कर ा है। Sैसे विक हम अप+े इति हास से परिरतिच हैं और राष्ट्र को इसका साम+ा कर+े की Sरूर है, स्व ंत्र ा अ ी क े घावों को भर+े क े खिलए एक वि+र्णा:यक क्षर्ण र्थीा। ऐति हासिसक गलति यों को का+ू+ को अप+े हार्थीों में लेकर लोगों द्वारा दूर +हीं विकया Sा सक ा है। साव:Sवि+क उपास+ा स्र्थील क े स्वरूप को संरतिक्ष कर+े में, संसद +े विकसी अवि+तिश्च शब्दों में आदेश +हीं विदया है विक इति हास और इसकी गलति यों का उपयोग व:मा+ और भविवष्य का दम+ कर+े क े खिलए सा*+ क े रूप में +हीं विकया Sाएगा।

84. न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: द्वारा उपास्र्थी+ा स्र्थील अति*वि+यम पर की गई विर्टप्पणिर्णयां का+ू+ की योS+ा क े विवपरी हैं क्योंविक वे संवै*ावि+क मूल्यों क े ढांचे क े खिलए हैं। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े वि+म्+ प्रकार अवलोक+ विकया:

"1 (ग). *ारा 9 बहु व्यापक है। विकसी भी *ार्मिमक न्यायालयों की अ+ुपस्जिस्र्थीति में कोई भी *ार्मिमक विववाद संज्ञेय है , सिसवाय बहु ही दल ु :भ मामलों के , Sहां मांगी गई उद्घोषर्णा *ार्मिमक कृत्य का गठ+ कर ी है। उपास+ा स्र्थील (विवशेष प्राव*ा+) अति*वि+यम 1991 उ+ मामलों को

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं रोक ी है Sहां अति*वि+यम से पहले की अवति* क े खिलए घोषर्णा माँगी Sा ी है या उस अति*कार क े प्रव:+ क े खिलए हो Sो अति*वि+यम क े लागू हो+े से पहले मान्य ा प्राप्त र्थीी।" न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: का उपरोX वि+ष्कष: *ारा 4(2) क े प्राव*ा+ों क े विबल्क ु ल विवपरी है। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: उपरोX विर्टप्पणिर्णयों में मा+ े हैं विक उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम वि+म्+खिलखिख प्रक ृ ति क े मामलों को चला+े से +हीं रोक े गी अर्थीा: ्:

(i) Sहां कोइ: घोषर्णा उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम क े प्रव:+ से पूव: की अवति* क े खिलए मांगी Sा ी है; या

(ii) Sहां विकसी अति*कार क े प्रव:+ की मांग की Sा ी है सिSसे उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम क े प्रव:+ क े पूव: मान्य ा प्राप्त र्थीी।

85. *ारा 4(1) स्पष्ट रूप से वि+*ा:रिर कर ी है विक 15 अगस् 1947 को विवद्यमा+ उपास+ा स्र्थील का *ार्मिमक स्वरूप वैसा ही ब+ाए रखा Sाएगा। *ारा 4(2) विवशेष रूप से इस बा पर विवचार कर ी है विक 15 अगस् 1947 को विवद्यमा+ उपास+ा स्र्थील क े *ार्मिमक स्वरूप क े संपरिरव:+ क े संबं* में, उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम क े प्रारम्भ की ति णिर्थी पर विकसी न्यायालय, अति*करर्ण या प्राति*कारी क े समक्ष लंविब सभी वाद, अपील और का+ू+ी काय:वाही उपशविम हो Sाएंगी और इस रह क े मामले क े संबं* में कोई मुकदमा, अपील या काय:वाही अति*वि+यम क े प्रारम्भ हो+े क े बाद +हीं रहेगा। उप-*ारा (2) क े परन् ुक में एकमात्र अपवाद यह है विक Sहाँ एक वाद, अपील या काय:वाही इस आ*ार पर संस्जिस्र्थी की Sा ी है विक उपास+ा स्र्थील क े *ार्मिमक स्वरूप का संपरिरव:+ 15 अगस् 1947 क े बाद हुआ र्थीा और इस रह की काय:वाही उपास+ा स्र्थील अति*वि+यम क े प्रारम्भ पर लंविब mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीी। स्पष्ट रूप से, वै*ावि+क अति*देश क े बावSूद, न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: द्वारा Sो अपवाद विकया गया है, वह का+ू+ की श Â क े विवपरी है और इसखिलए गल है।

86. अपीलों क े व:मा+ समूह में विवति*क विववाद क े क ें ˆ में सवाल यह है विक क्या वाद 5 में प्रर्थीम व विद्व ीय वादी- "भगवा+ श्री राम विवराSमा+" और "स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम, अयोध्या" अलग-अलग विवति*क व्यविXत्व रख े हैं या दूसरे शब्दों में "न्यातियक व्यविX" हैं। भार क े न्यायालयों +े मा+ा है विक हिंहदू मूर्ति याँ विवति*क व्यविX हैं। इस वि+र्ण:य क े दौरा+ इस सिसद्धां क े अर्थी: और महत्व की Sांच की Sाएगी। इस हिंबदु पर यह ध्या+ दे+ा आवश्यक है विक विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम की भौति क मूर्ति यों द्वारा प्रति वि+ति*त्व क े रूप में वाद 5 में प्रर्थीम वादी('भगवा+ श्री राम विवराSमा+') का विवति*क व्यविXत्व विकसी भी पक्षकार द्वारा विववादास्पद +हीं है। हालांविक क्या विद्व ीय वादी ('स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम') एक न्यातियक व्यविX है, हमारे साम+े मौखिखक काय:वाही में विववाद का विवषय रहा है।

87. व:मा+ मामले में हमें दो महत्वपूर्ण: प्रश्नों का उत्तर दे+े की आवश्यक ा है: पहला, एक हिंहदू मूर्ति को विदया गया विवति*क व्यविXत्व की सर्टीक आकृ ति क्या हैं? दूसरे शब्दों में, एक प्राक ृ ति क व्यविX क े विवति*क व्यविXत्व क े समा+ हिंहदू मूर्ति को अदाल ों द्वारा दी गई क ृ वित्रम विवति*क व्यविXत्व विकस हद क है? दूसरा, क्या एक मू: प्रक ृ ति की संपखित्त (इस मामले में भूविम) को एक अलग विवति*क व्यविXत्व मा+ा Sा सक ा है? इ+ प्रश्नों का उत्तर दे+े क े खिलए, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवति*क व्यविXत्व को मान्य ा दे+े या प्रदा+ कर+े क े का+ू+ी +वाचार में अं र्मि+विह दो+ों वास् विवक उद्देश्य को समझ+ा आवश्यक है और न्यायालयों +े हिंहदू मूर्ति यों को विवति*क व्यविXत्व को क्यों प्रदा+ विकया है। विवति*क विवषयः अति*कारों, स्वत्वों, क:व्यों और दातियत्वो को मान्य ा दे+ा।

88. एक का+ू+ी प्रर्णाली का मूलभू सिसद्धां यह है विक उसे उ+ विवषयों को मान्य ा दे+ा होगा सिSसे वह शासिस कर+ा चाह ा है। यह का+ू+ द्वारा णिभन्न विवति*क इकाइयों या 'विवति*क व्यविXयों' को मान्य ा दे+े क े खिलए विकया Sा ा है। विवति*क व्यविX हो+े क े खिलए का+ू+ द्वारा एक विवषय क े रूप में मान्य ा दी Sा+ी चाविहए Sो अति*कारों, स्वत्वों, दातियत्वों और क:व्यों को समाविवष्ट कर ा है। का+ू+ विवति*क व्यविXयों क े व्यवहार और एक दूसरे क े संबं* में उ+क े व्यवहार को सी*े विववि+यविम कर सक ा है। इसखिलए एक विवति*क व्यविX हो+े क े खिलए का+ू+ क े ह क ु छ अति*कारों और क:व्यों क े अति*कारी हो+े और अन्य विवति*क व्यविXयों क े सार्थी का+ू+ी रूप से प्रव:+ीय कर+े योग्य संबं*ों में संलग्न हो+े में सक्षम हो+ा चाविहए। विवति*क व्यविX कौ+ है या क्या है यह का+ू+ी प्रर्णाली का काय: है। विवति*क व्यविXयों को ब+ा+े या मान्य ा दे+े की क्षम ा हमेशा ऐति हासिसक परिरस्जिस्र्थीति यों क े आ*ार पर णिभन्न हो ी है। मान्य ा दे+े क े खिलए का+ू+ी प्रर्णाखिलयों की शविX और इसखिलए विवति*क व्यविXत्व को अस्वीकार कर+े क े खिलए भी इति हास में मा+व अति*कारों क े मौखिलक उल्लंघ+ों को +ष्ट कर+े क े खिलए इस् ेमाल विकया गया है। रॉस्को पाउ°र्ड "विवति*शास्त्र" में वि+म्+खिलखिख उद्धरर्ण में इसका उल्लेख कर े हैं: "सभ्य भूविमओं में यहाँ क विक आ*ुवि+क दुवि+या में भी ऐसा हुआ है विक सभी म+ुष्य विवति*क व्यविX +हीं र्थीे। रोम+ विवति* में एंर्टोवि+यस पीS क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संविव*ा+ क गुलाम व्यविX +हीं र्थीे। उन्हें + ो परिरवार का अति*कार और + ही पै ृक सम्पखित्त का अति*कार प्राप्त र्थीा। वह एक वस् ु र्थीा, और Sा+वरों की रह, संपखित्त क े अति*कारों का विवषय हो सक ा र्थीा।.... फ्रांसीसी उपवि+वेशों में, दास ा को समाप्त कर+े से पहले, 23 अप्रैल 1833 क े क़ा+ू+ द्वारा दासों को विवति*क व्यविXयों की श्रेर्णी में रखा गया र्थीा और 1845 क े क़ा+ू+ द्वारा क ु छ हद क विवस् ारिर न्यातियक क्षम ा प्राप्त की गई र्थीी। संयुX राज्य अमेरिरका में गृह युद्ध क अ+ेक राज्यों में स्व ंत्र +ी£ों लोग विब+ा विवति*क अति*कार क े मुX मा+व र्थीे।"39 इस न्यायालय द्वारा णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क कमेर्टी, अमृ सर ब+ाम सोम +ार्थी दास40 में पाउ°र्ड क े संप्रेक्षर्ण को उद्धरिर विकया गया, Sहां इस न्यायालय क े दो न्याया*ीशों की पीठ को यह अव*ारर्ण कर+ा पड़ा विक क्या "गुरू £ंर्थी साविहब" का विवति*क व्यविXत्व है। 'कौ+ विवति*क व्यविX है' की चचा: कर े हुए न्यायमूर्ति ए पी विमश्रा +े संप्रेतिक्ष विकया: "11..... यविद हम विवणिभन्न देशों में "व्यविX" क े इति हास का प ा लगा े हैं ो हम आश्चय:S+क रूप से पा े हैं विक यह अलग -अलग समय पर अलग-अलग अ+ुमावि+ है।...

13. समाS क े विवकास क े सार्थी, Sहां व्यविX की परस्पर विक्रया कम हो गई,... व्यविXयों क े एक बड़े समुदाय क े सहयोग की आवश्यक ा र्थीी। इस प्रकार, वि+गमों और क ं पवि+यों Sैसे संस्र्थीा+ों को ब+ाया गया र्थीा, ाविक वांणिछ परिरर्णाम प्राप्त कर+े में समाS की मदद की Sा सक े । राज्य, +गर वि+गम, क ं प+ी आविद का गठ+ भी विवति* की सभी रच+ाएं हैं और ये "विवति*क व्यविX" मा+व विवकास में आवश्यक ाओं से उत्पन्न हुए हैं। दूसरे शब्दों में, उन्हें एक का+ू+ी इकाई क े रूप में का+ू+ में मान्य ा दे+े क े खिलए ब+ाया गया र्थीा।" 39 रॉस्को पाउ°र्ड, भाग IV, 1959 संस्करर्ण 40 (2000) 4 एससीसी 146 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

89. दुवि+या भर में का+ू+ी प्रर्णाखिलयां अं*काल से व:मा+ क विवकसिस हुई ं, Sहां प्राक ृ ति क व्यविXयों को विवति*क व्यविXत्व से म+ा कर विदया गया, संवै*ावि+क लोक ंत्रों में लगभग सभी प्राक ृ ति क व्यविX भी विवति* की दृविष्ट में विवति*क व्यविX हैं। का+ू+ी प्रर्णाखिलयों +े प्राक ृ ति क व्यविXयों से परे का+ू+ी व्यविXत्व की अव*ारर्णा को भी बढ़ाया है। यह 'क ृ वित्रम विवति*क व्यविX' या 'न्यातियक व्यविX' क े सृS+ से हुआ है, Sहां एक वस् ु या चीS Sो प्राक ृ ति क +हीं है, विफर भी का+ू+ में विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा प्राप्त है। इस प्रति मा+ क े दो उदाहरर्ण हैं, Sहां प्राक ृ ति क व्यविXयों क े समुदाय को सामूविहक रूप से एक अलग विवति*क व्यविXत्व (एक सहकारी सविमति या वि+गम क े मामले में) प्रदा+ विकया Sा ा है और Sहां वि+S-व वस् ु (SहाS क े मामले में) को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। प्राक ृ ति क व्यविXयों क े अलावा अन्य वस् ुओं को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा एक का+ू+ी विवकास है Sो अच्छी रह से मान्य ा प्राप्त है इसकी आS अदाल ों द्वारा कु छ व्याख्या हो ी है। विफर भी का+ू+ी विवकास अच्छी रह से प्रलेखिख है। साम°र्ड अप+े काय: में शीष:क "विवति*शास्त्र" में +ोर्ट कर े हैं: "इसक े विवपरी, का+ू+ में ऐसे व्यविX हैं Sो पुरुष +हीं हैं। एक संयुX स्र्टॉक क ं प+ी या एक +गर वि+गम का+ू+ी चिंच + में एक व्यविX है। यह सच है विक यह क े वल एक काल्पवि+क है, वास् विवक व्यविX +हीं है; लेविक+ यह एक काल्पवि+क आदमी +हीं है। यह व्यविXत्व है, मा+व स्वभाव +हीं है, सिSसे का+ू+ द्वारा वि+काय वि+गम को क ृ वित्रम रूप से आरोविप विकया Sा ा है। Sहां क का+ू+ी सिसद्धां का सवाल है, एक व्यविX कोई भी है सिSसे का+ू+ अति*कारों और क:व्यों क े समर्थी: मा+ ा है। ऐसा कोई भी Sो सक्षम है विक वह एक व्यविX है, चाहे वह इंसा+ हो या + हों, और ऐसा कोई भी Sो सक्षम +हीं है, व्यविX +हीं है, भले ही वह एक आदमी हो। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्यविX वह सारवा+ है सिSसक े अति*कार और क:व्य गुर्ण हैं। यह क े वल इस संबं* में है विक व्यविXयों का न्यातियक महत्व है और यह विवशेष दृविष्टकोर्ण है सिSससे व्यविXत्व को का+ू+ी मान्य ा प्राप्त हो ी है। लेविक+ विवश्लेषर्ण में हम इससे एक कदम आगे बढ़ सक े हैं। कोई भी अति*कार क े खिलए सक्षम +हीं है, Sब क विक विह ों में भी सक्षम + हो Sो दूसरों क े क ृ त्यों से प्रभाविव हो सक े हैं। प्रत्येक अति*कार क े खिलए इस प्रक ृ ति का अं र्मि+विह विह शाविमल है। इसी रह कोई भी क:व्यों में सक्षम +हीं है, Sब क विक उ+ क ृ त्यों में भी सक्षम + हो सिS+क े द्वारा दूसरों क े विह ों को प्रभाविव विकया Sा सक ा है। अति*कारों और क:व्यों को विवशेष ा दे+ा, इसखिलए उ+क े आवश्यक आ*ारों क े रूप में विह ों और कायÂ को विवशेष ा दे+ा है। ब विकसी को भी एक व्यविX क े रूप में का+ू+ क े उद्देश्यों क े खिलए परिरभाविष विकया Sा सक ा है, सिSसे विह ों व अति*कारों, कायÂ व क:व्यों की क्षम ा विवति* प्रदा+ कर ी है।"41 (प्रभाव वर्ति* )

90. एक विवति*क व्यविX क े पास विह ों, अति*कारों और क:व्यों को वह+ कर+े की क्षम ा हो ी है। सामंर्ड विवति*क व्यविXत्व और भौति क काया क े बीच एक महत्वपूर्ण: अं र कर े हैं, सिSस पर का+ू+ी व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है: "का+ू+, व्यविXयों को ब+ा+े में, हमेशा क ु छ वास् विवक चीS को Sीवत्व करक े ऐसा कर ा है। ऐसे व्यविX का इस हद क एक वास् विवक अस्जिस् त्व है, और यह क े वल उसका व्यविXत्व है Sो काल्पवि+क है। वास् व में, इसक े खिलए कोई सैद्धांति क आवश्यक ा +हीं है, क्योंविक यविद का+ू+ ऐसा समझे, ो विवशुद्ध रूप से काल्पवि+क को व्यविXत्व प्रदा+ कर सक ा है और विफर भी उ+ लक्ष्यों को प्राप्त कर ी है सिS+क े खिलए व्यविXत्व का यह काल्पवि+क विवस् ार ब+ाया गया है। र्थीाविप, व्यविXकरर्ण विवचार और वार्णी की सादगी क े खिलए इ +ा प्रेरिर कर ा है विक उसकी सहाय ा हमेशा स्वीकार की Sा ी है। व्यविXक ृ वस् ु को का+ू+ी व्यविX की काया कहा Sा सक ा है; यह वह काया है सिSसमें का+ू+ एक काल्पवि+क व्यविXत्व का आशय र्डाल दे ा है। 41 Sे र्डब्ल्यू, विवति*शास्त्र, स्र्टीवे+ और हेय+े (1913) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA …. विवति*क व्यविX, का+ू+ की म+मा+ी रच+ा हो+े क े +ा े, इ +े प्रकार क े हो सक े हैं, सिS +ा का+ू+ चाहे। वे Sो हमारी अप+ी प्रर्णाली द्वारा वास् विवकः मान्य ा प्राप्त हैं, हालांविक, सभी एक ही वग: अर्थीा: ् वि+गम या वि+काय कॉप रेर्ट क े भी र आ े हैं। एक वि+गम व्यविXयों का एक समूह या श्रृंखला है सिSसे का+ू+ी परिरकल्प+ा द्वारा स्वयं एक व्यविX क े रूप में मा+ा Sा ा है और व्यवहार विकया Sा ा है। यविद, हालांविक, हम अप+ी स्वयं की अन्य प्रर्णाखिलयों का ध्या+ दे े हैं, ो हम पा े हैं विक विवति*क व्यविXत्व की अव*ारर्णा इसकी प्रयोज्य ा में इ +ी सीविम +हीं है..."42 (प्रभाव वर्ति* ) विवति*क व्यविXत्व मा+व स्वभाव +हीं है। विवति*क व्यविXत्व विकसी वस् ु या काया को क ु छ अति*कारों और क:व्यों क े एक मूर्ति मा+ क े रूप में का+ू+ द्वारा मान्य ा का गठ+ कर ा है। अति*कार और क:व्य Sो आम ौर पर प्राक ृ ति क व्यविXयों को प्रदा+ विकए Sा े हैं, वे चयवि+ स्जिस्र्थीति यों में वि+S-व वस् ुओं या समूह को प्रदा+ विकया Sा ा है, सिSससे क ृ वित्रम विवति*क व्यविX का वि+मा:र्ण हो ा है। एक क ृ वित्रम विवति*क व्यविX उस सीमा क एक विवति*क व्यविX है, सिSस हद क का+ू+ चाहे वह संविवति* द्वारा या न्यातियक वि+व:च+ द्वारा उन्हें विदए गए अति*कारों और क:व्यों को मान्य ा दे ा है। सामंर्ड स्पष्ट रूप से +ोर्ट कर े है विक क ृ वित्रम विवति*क व्यविXयों को विदए गए अति*कार और क:व्य अं ः प्राक ृ ति क व्यविXयों क े विह ों और लाभों का प्रति वि+ति*त्व कर े हैं। वास् व में, यह इस रह की वस् ुओं या समूह से प्राक ृ ति क व्यविXयों द्वारा प्राप्त सारवा+ लाभों क े कारर्ण ठीक है विक विव*ायकों और अदाल ों को ऐसी वस् ुओं या समूहों को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े पर विवचार कर+े क े खिलए कहा Sा ा है। 42 Sे. र्डब्लू. साम°ड़, विवति*शास्त्र, स्र्टीवे+ और हेय+े (1913) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

91. विवशुद्ध रूप से सैद्धांति क स् र पर, इस बा पर कोई प्रति बं* +हीं है विक विकसे का+ू+ी व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा सक ा है। वह उद्देश्य महत्वपूर्ण: है सिSसे प्राप्त कर+े क े खिलए विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। इस उद्देश्य को प्राप्त कर+े क े खिलए, विवति*क व्यविXत्व को एक अमू: विवचार को भी प्रदा+ विकया Sा सक ा है। हालाँविक, सामंर्ड +ोर्ट कर े हैं विक विवति*क व्यविXत्व को आम ौर पर उ+ वस् ुओं को प्रदा+ विकया Sा ा है Sो आम आदमी की भाषा में विवचार और अणिभव्यविX की सादगी क े खिलए पहले से ही व्यविXत्व या मा+व रूपां रर्ण का विवषय हैं। यह सवाल विक क्या विवति*क व्यविXत्व एक SहाS, मूर्ति या पेड़ को प्रदा+ विकया Sा ा है, का+ू+ी रूप से समीची+ है और चु+ी गई वस् ु प्रदत्त विवति*क व्यविXत्व क े चरिरत्र का वि+*ा:रर्ण +हीं कर ी है। विवति*क व्यविXत्व का चरिरत्र विवति*क व्यविXत्व को प्रदा+ करक े प्राप्त विकए Sा+े वाले उद्देश्य से वि+*ा:रिर विकया Sा ा है। इस प्रकार विवति*क व्यविXत्व और भौति क काया क े बीच एक अं र है Sो ब का+ू+ी व्यविXत्व का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए आ ा है। विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े काय: द्वारा, काया को क ु छ अति*कारों और क:व्यों वाले एक अलग विवति*क व्यविX को मू: रूप दे+े क े रूप में का+ू+ में Sीवं विकया Sा ा है।

92. विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ करक े, का+ू+ी प्रर्णाखिलयों +े प्राक ृ ति क व्यविXयों से परे एक 'विवति*क व्यविX' की परिरभाषा का विवस् ार विकया है। इस रह ब+ाए गए विवति*क व्यविXयों क े पास मा+व प्रक ृ ति +हीं हो ी है। लेविक+ उ+का विवति*क व्यविXत्व क़ा+ू+ द्वारा या अदाल ों द्वारा उ+को विदए गए अति*कारों और क:व्यों को शाविमल कर ी है Sो ऐसे व्यविXत्व क े प्रदा+ द्वारा प्राप्त विकए Sा+े वाले उद्देश्य को प्राप्त कर+े क े खिलए हैं। यह उ+ परिरस्जिस्र्थीति यों को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समझ+े क े खिलए महत्वपूर्ण: है सिS+में विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया गया है और इसक े परिरर्णामस्वरूप सिS+ वि+S-व वस् ुओं को यह प्रदा+ विकया Sा ा है, उन्हें अति*कार और क:व्य विदए गए हैं। वि+गम

93. सबसे व्यापक रूप से मान्य ा प्राप्त क ृ वित्रम विवति*क व्यविX क ं प+ी विवति* में वि+गम है। हालांविक, उ+ परिरस्जिस्र्थीति यों को समझ+े क े प्रयोS+ों क े खिलए सिS+क े ह अदाल ों +े विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया है, वि+गम का उदाहरर्ण सीविम उपयोग का है। का+ू+ में पहचा+ क े प्रयोS+ों क े खिलए एक इकाई क े रूप में व्यविXयों क े सामूविहक व्यवहार कर+े का विवचार उ +ा ही पुरा+ा है सिS +ा विक मा+व सभ्य ा। इस रह की मान्य ा क े उदाहरर्णों की अति*क ा संघ, साझेदारी और प्रारंणिभक अवि+गविम व्यवसायों क े आगम+ से मा+व इति हास में विवकीर्ण: है। Sैसा विक विफखिलप ब्लुमग: +े अप+ी पुस् क शीष:क "वि+गम विवति* क े खिलए बहुराष्ट्रीय चु+ौ ी" में खिलख े हैं: "Sब क्राउ+ +े अं ः णिशल्प संघ और व्यापारिरक क ं पवि+यों को चार्ट:र कर+ा शुरू विकया-पहली व्यापार वि+गम- पंˆहवीं श ाब्दी में, वि+गम की का+ू+ी प्रक ृ ति की समझ पहले से ही सारवा+ रूप से मौSूद र्थीी।....उ+क े पहले इस इति हास क े सार्थी, सत्रवहीं श ाब्दी क े शुरूआ में सर इर्डवर्ड: कोर्ड +े खिलख े हुए,...और ब्लैकस्र्टो+ व कीर्ड अठारहवीं श ाब्दी क े अन् में खिलख े हुए आत्मविवश्वास से इस बा पर Sोर दे सक े र्थीे विक वि+गम क्या र्थीा, इसे क ै से ब+ाया गया र्थीा, और इसक े संगठ+ से क्या का+ू+ी विवशेष ाएं वि+कल ी र्थीीं। हालांविक उ+क े मस्जिस् ष्क में मुख्य रूप से *ार्मिमक संस्र्थीा और +गर वि+गम र्थीे, उ+की विर्टप्पर्णी व्यापार वि+गमों पर भी पूरी रह लागू हो ी र्थीी।"43 (प्रभाव वर्ति* ) 43 विफखिलप ब्लुमबग:, वि+गम विवति* को बहुराष्ट्रीय चु+ौ ी: +वी+ वि+गम व्यविXत्व क े खिलए खोS, ऑक्सफोर्ड: विवश्वविवद्यालय प्रेस (1993),पृष्ठ 3 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का+ू+ी मान्य ा क े प्रयोS+ों क े खिलए एक एकल इकाई क े रूप में उद्यविमयों क े एक सामूविहक क े रूप में व्यवहार कर+े की न्यातियक अव*ारर्णा पहले से ही अच्छी रह से स्र्थीाविप र्थीी Sब पहला व्यवसाय वि+गम अस्जिस् त्व में आया र्थीा और अदाल ों द्वारा परीक्षर्ण क े खिलए +हीं र्थीे। लेखक आगे कह े हैं: "उन्नीसवीं श ाब्दी में सही हो+े क, इंग्लैंर्ड और संयुX राज्य अमेरिरका दो+ों में व्यावसातियक उद्देश्यों क े खिलए एक वि+गम की मान्य ा, वि+गम प्रास्जिस्र्थीति दे+े क े खिलए एक विवणिशष्ट शासकीय वि+र्ण:य अपेतिक्ष र्थीा। इंग्लैंर्ड में, इस+े क्राउ+ या संसद क े एक अति*वि+यम से एक प्रक ृ ति का रूप खिलया। संयुX राज्य अमेरिरका में इसे एक विव*ायी अति*वि+यम की आवश्यक ा र्थीी।... एक श ाब्दी से अति*क समय पहले सामान्य वि+गम+ विवति*यों की साव:भौविमक विवSय से, क ु छ फॉम: भरकर और क ु छ शुल्क और करों का भुग ा+ करक े वि+गमों का गठ+ विकया Sा सक ा र्थीा। राज्य की भूविमका प्रविक्रयाओं क े एक सामान्य विववि+द†श और सांविवति*क औपचारिरक ाओं क े सार्थी वि+गविम ों क े अ+ुपाल+ की एक प्रशासवि+क स्वीक ृ ति क े खिलए +ार्टकीय रूप क सिसमर्ट गई।"44 (प्रभाव वर्ति* ) एक वि+गम का स्व ंत्र विवति*क व्यविXत्व कभी भी अदाल ों द्वारा मान्य ा पर वि+भ:र +हीं रहा है। वि+गम का विवति*क व्यविXत्व मूल रूप से सरकार क े सकारात्मक काय: द्वारा प्रदा+ विकया गया र्थीा। बाद क े वषÂ में, Sैसा विक वि+गम+ व्यवसाय कर+े का पसंदीदा रीका ब+ गया, वि+गविम व्यविXत्व को वि+गम+ क े सामान्य क़ा+ू+ों द्वारा प्रदा+ विकया गया, सिSस+े विकसी भी व्यविX को क ु छ वै*ावि+क श Â की सं ुविष्ट क े अ*ी+ क ं प+ी वि+गम+ की अ+ुमति दी। ये ऐति हासिसक घर्ट+ाक्रम वि+गविम व्यविXत्व क े आ*ार क े रूप में सरकार क े सकारात्मक काय: से हर्टकर वै*ावि+क ढांचे क े वि+मा:र्ण को रेखांविक कर े हैं, सिSसक े ह इसे प्रदा+ विकया गया। हालाँविक, यह विवति*क व्यविXत्व क े 44 विफखिलप ब्लुमबग:, वि+गम विवति* को बहुराष्ट्रीय चु+ौ ी: +वी+ वि+गम व्यविXत्व क े खिलए खोS, ऑक्सफोर्ड: विवश्वविवद्यालय प्रेस (1993),पृष्ठ 22 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रदा+ीकरर्ण को रेखांविक कर+े वाले कारर्णों को रेखांविक +हीं कर ा है और व:मा+ स्जिस्र्थीति में बहु कम सहाय ा कर ा है। Sलया+

94. व:मा+ उद्देश्यों क े खिलए एक और प्रासंविगक उदाहरर्ण एक Sलया+ को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा है। समुˆी *ारर्णाति*कार और सव:बन्*ी कायÂ की अव*ारर्णाएँ समुˆी का+ू+ क े स्र्थीाविप वि+यम हैं। समुˆी *ारर्णाति*कार एक Sलया+ क े कारर्ण हुए गल काय: या क्षति क े मामले में उत्पन्न हो सक ा है Sो दावेदार को SहाS की 'वस् ु' पर प्रभार दे ा है। आरोप को 'सव:बन्*ी काय:वाही' द्वारा विक्रस्र्टलीक ृ विकया Sा ा है, सिSसक े ह Sलया+ को सी*े विवति*क व्यविX क े रूप में आगे बढ़ाया Sा ा है। 1881 में सर SॉS: Sेसल एमआर +े द सिसर्टी ऑफ मक्का45 में इसे समझाया Sहां उन्हों+े संप्रेतिक्ष विकया: "आप इंग्लैंर्ड में और अति*कांश देशों में Sलया+ क े विवरूद्ध काय:वाही कर सक े हैं। इस रह क े Sलया+ क े माखिलक क े विवरूद्ध लेख Sारी विकये Sा सक े है, और शायद माखिलक कभी भी उपस्जिस्र्थी +हीं हो और आपको शुरू से अन् क विब+ा विकसी एक व्यविX क े +ाम क े Sलया+ क े विवरूद्ध अप+ा वि+र्ण:य प्राप्त हो ा है। यह सव:बन्*ी काय:वाही है और यह पूरी रह से साफ Sाविहर है विक वि+र्ण:य Sलया+ क े विवरूद्ध है।" र्डी आर र्थीॉमस +े अप+ी पुस् क शीष:क "मैरीर्टाइम खिलअन्स"46 में Sलया+ों को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े इति हास का प ा लगाया है। वह अव*ारर्णा क े विवकास को समझा+े में दो सिसद्धां ों- 'व्यविXकरर्ण सिसद्धां ' और 'प्रविक्रयात्मक सिसद्धां ' की बा कर े हैं: 45 द सिसर्टी ऑफ मक्का 5 पी.र्डी. 106 46 र्डी आर र्थीॉमस, मैरीर्टाइम खिलअन्स इ+ विब्रविर्टश णिशहिंपग लॉ: ख°ड़ 14 (स्र्टीवे+ व सन्स लंद+ 1980) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "पहला [सिसद्धां ], सिSसे आम ौर पर व्यविXकरर्ण सिसद्धां क े रूप में गढ़ा गया र्थीा, एक Sलया+ को व्यविXत्व विदए Sा+े की न्यातियक क+ीक समुˆी *ारर्णाति*कार की ऐति हासिसक उत्पखित्त और विवकास का प ा लगा ा है Sो मध्यकाली+ समय से प्राप्त हुई है। इस सिसद्धां क े ह एक SहाS व्यविXक ृ है और अपक ृ त्य कर+े व अ+ुबं* कर+े की क्षम ा क े सार्थी एक अलग न्यातियक इकाई क े रूप में मा+ा Sा ा है। Sलया+ दातियत्व का स्रो और सीमा दो+ों है।... दूसरा सिसद्धां, सिSसे प्रविक्रयात्मक सिसद्धां क े रूप में Sा+ा Sा ा है, इस आ*ार पर आ*ारिर है विक समुˆी *ारर्णाति*कार एक पो की विगरफ् ारी की प्रविक्रया से विवकसिस हुई है ाविक वस् ु क े माखिलक की उपस्जिस्र्थीति को मSबूर विकया Sा सक े और सुरक्षा प्राप्त की Sा सक े ।... यद्यविप यह हिंबदु अवि+तिश्च ा से मुX +हीं है, शायद यह मामला है विक एक समुˆी *ारर्णाति*कार एक सारवा+ अति*कार है, Sबविक सव:बन्*ी काय:वाही का एक वै*ावि+क अति*कार मूल ः एक प्रविक्रयात्मक उपचार है। सव:बन्*ी काय:वाही क े वै*ावि+क अति*कार की उपलब्* ा क े पीछे उद्देश्य एक दावेदार को क्षेत्राति*कार पा+े में सक्षम ब+ा+ा और दावे क े खिलए सुरक्षा क े रूप में वस् ु प्रदा+ कर+े में सक्षम ब+ा+ा है।"47 (प्रभाव वर्ति* )

95. एक सीविम विवति*क व्यविXत्व क े प्रदा+ीकरर्ण और प्रदा+ीकरर्ण द्वारा प्राप्त न्यायवि+र्ण:य+ उपयोविग ा क े बीच एक प्रत्यक्ष संबं* है। अदाल ें Sलया+ की भौति क संपखित्त को एक विवति*क व्यविX क े रूप में मा+ ी हैं सिSसक े खिखलाफ क ु छ कार:वाई की Sा सक ी है। Sलया+ को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर े हुए SहाS क े माखिलकों की उपस्जिस्र्थीति या उपलब्* ा की स्व ंत्र काय:वाही कर+े की अ+ुमति दी Sा ी है, Sो बहु से मामलों में दुवि+या क े अन्य विहस्सों में हो सक े हैं। Sैसा विक एक SहाS क े वल एक संतिक्षप्त अवति* क े खिलए 47 र्डी आर र्थीॉमस, मैरिरर्टाइम खिलय+ इ+ विब्रविर्टश णिशहिंपग लॉSः ख°ड़ 14 ( स्र्टीवे+ व सन्स लंद+ 1980) पृष्ठ 7 और 38 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बंदरगाह में हो सक ा है, एक सव:बन्*ी काय:वाही दावेदार को पूव:-वि+र्ण:य सुरक्षा सुवि+तिश्च कर+े की अ+ुमति दे ी है। इस प्रकार, यहां क विक एक अणिभव्यX व्यविXकरर्ण की अ+ुपस्जिस्र्थीति भी, विवति*क व्यविX क े रूप में Sलया+ क े विवरूद्ध काय:वाही, +ौसे+ा विववादों क े प्रभावी अति*वि+र्ण:य+ को सुवि+तिश्च कर ी है।

96. एम वी एखिलSाबेर्थी ब+ाम हरवा+ इन्वेस्र्टमेंर्ट एंर्ड र्ट्रेचिंर्डग प्राइवेर्ट खिलविमर्टेर्ड48 में, इस न्यायालय +े +ौसे+ा विवति* क े इस सिसद्धां क े अं र्मि+विह आ*ार को +ोविर्टस विकया। दो न्याया*ीशों की पीठ की ओर से न्यायमूर्ति र्थीॉमे+ +े अणिभव्यX कर े हुए अांग्ल अदाल ों द्वारा +ौसे+ा क्षेत्राति*कार क े अ+ुप्रयोग का प ा लगाया: "44. सव:बन्*ी +ौसे+ा काय:वाही की अति महत्वपूर्ण: और विवणिशष्ट विवशेष ा यह है विक Sलया+ या उसक े माखिलकों की राष्ट्रीय ा या व्यवसाय या अति*वास क े स्र्थीा+ या उसक े माखिलकों क े वि+वास स्र्थीा+ या वह स्र्थीा+ Sहां कार:वाई का कारर्ण पूरी रह से या आंणिशक रूप से उत्पन्न हुआ, की परवाह विकए विब+ा, इस क्षेत्राति*कार को SहाS की विगरफ् ारी द्वारा विकसी भी समुˆी दावे क े संबं* में र्टीय अति*कारिरयों द्वारा मा+ा Sा सक ा है।" ".… +ौसे+ा में पो का एक विवति*क व्यविXत्व हो ा है, एक लगभग वि+गविम क्षम ा, सिSसमें + क े वल अति*कार हो े हैं, बस्जिल्क दातियत्व भी (कभी-कभी माखिलक से अलग) हो े हैं, सिSसे सव:बन्*ी उपचारों में अर्थीा: ् सम्पखित्त क े विवरुद्ध सार्थी ही सार्थी व्यविXबन्*ी उपचारों में अर्थीा: ् व्यविXग पक्षकारों क े विवरूद्ध उपयुX मामलों में +ौसे+ा क े खिलए पो क े विवरूद्ध तिर्डक्री और प्रविक्रया द्वारा प्रवर्ति विकया Sा सक ा है Sो उसक े सभी विह बद्ध और अ+न्य ः विवश्व पर बाध्यकर है।...." (बे+ेतिर्डक्र्ट, द लॉ ऑफ़ अमेरिरक+ एर्डविमरखिलर्टी,[6] वाँ संस्करर्ण, ख°ड़ 1 पी. 3)

45. +ौसे+ा विवति* माखिलक क े विवरूद्ध आगे बढ़+े क े खिलए एक व्यविXबन्*ी अति*कार से अलग SहाS या काग क े खिखलाफ आगे बढ़+े क े खिलए 48 1993 सप्लीमेंर्ट (2) एससीसी 433 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दावेदार पर एक सव:बन्*ी अति*कार प्रदा+ कर ा है। वि+र्ण:य को प्रवर्ति कर+े क े खिलए सुरक्षा प्राप्त कर+े क े खिलए SहाS की विगरफ् ारी को क े वल एक प्रविक्रया क े रूप में मा+ा Sा ा है.…" (प्रभाववर्ति* ) इस दृविष्ट में, एक SहाS क े विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ीकरर्ण +े व्यापार वि+तिश्च ा और समीची+ ा क े उद्देश्य को बढ़ावा विदया। Sलया+ क े विवरूद्ध तिर्डक्री उसक े सभी विह बद्धों पर बाध्यकर है और उसकी चलायमा+ प्रकृ ति क े बावSूद पूव:-वि+र्ण:य सुरक्षा सुवि+तिश्च कर+े की आवश्यक ा को पूरा कर ा है। विब्रर्टे+ और भार क े अलावा, SहाSों क े खिलए विवति*क व्यविXत्व क े आरोपर्ण का व्यापक रूप से सभी क्षेत्राति*कारों में उपयोग विकया गया है। अमेरिरकी अदाल ों क े दृविष्टकोर्ण का तिचत्रर्ण कर े हुए प्रोफ े सर र्डगलस लिंलर्ड इस अव*ारर्णा क े विवकास का प ा लगा े हैं: "Sैसा विक संयुX राज्य अमेरिरका +े राष्ट्र क े व्यापार और वाणिर्णज्य क े बड़े भाग में सार्थी ही सार्थी व्यविXयों क े अति*कांश सामान्य परिरवह+ में अप+ी पहली श ाब्दी में प्रवेश विकया, Sो खुले समुˆ या देश क े प्रचुर अं द†शीय समुˆी SलमागÂ पर हुए। संविव*ा+ +े +ौसे+ा और समुˆी क्षेत्राति*कार क े सभी मामलों में संघीय न्यातियक शविX को विवस् ारिर विकया। … [विब्रग Sेम्स वैल्स ब+ाम संयुX राज्य अमेरिरका] मामले +े उस मुद्दे को उठाया Sो शीघ्र ही एक सामान्य मुद्दा ब+ रहा र्थीा: क्या संघीय विवति* का अति क्रमर्ण कर+े क े खिलए विकसी अमेरिरकी पंSीक ृ पो की हिं+दा की Sा+ी चाविहए। न्यायालय +े विब्रग की हिं+दा अपरिरहाय: मा+ा। उल्लेख+ीय थ्य यह है विक Sबविक इस मामले को पो क े +ाम से विकया गया र्थीा, + ो 'समुˆी *ारर्णाति*कार' और + ही सव:बन्*ी, प्रकर्ट हो ा है, और ऐसा कोई सुझाव +हीं है विक SहाS स्वयं, इसक े प्रभारी लोगों क े बSाय, अपरा*ी र्थीा... एक पो क े +ाम से उसक े विवरूद्ध काय:वाही कर+ा, हालांविक, पो क े व्यविXकरर्ण को सत्याविप +हीं कर ा। न्यायालय +े एक पो क े +ाम से उसक े विवरूद्ध काय:वाही को उससे विह बद्ध सभी को शाविमल कर े हुए "वाद क े खिलए पक्षकार" क े रूप में मा+ा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA... *ारर्णाति*कार क े प्रव:+ से सम्बस्जिन्* कई मामलों +े संघीय अदाल ों को परेशा+ विकया र्थीा Sब Sलया+ में विह बद्ध प्र*ा+ों (माखिलक, प्रमुख) को कणिर्थी ौर पर गल काम कर+े की पूव: Sा+कारी या कोई सविक्रय भूविमका +हीं र्थीी। अणिभकरर्ण का पारंपरिरक का+ू+, अणिभक ा: क े रूप में Sलया+ क े सार्थी, सिSम्मेदारी और वसूली क े एक सुसंग वि+यम क े खिखलाफ काय: कर ा र्थीा... दन् कर्थीाओं, साविहत्य, और कविव ाओं में Sलया+ की विवणिशष्ट प्राणिर्णकवाद को देख े हुए, संघीय अदाल ों +े अप+े न्यातियक विववेक में Sलया+ की प्राणिर्णकवाद की वास् विवक ा क े अ+ुक ू ल+ क े "मा+सिसक रीक े " को स्वीकार कर+े हे ू अप+ी अव*ारर्णा में मामूली परिरव:+ विकया। सिसद्धां +े अदाल ों को समुˆी का+ू+ पर "पया:वरर्ण का वि+यंत्रर्ण" विदया Sो उ+की कमी र्थीी... Sलया+ क े व्यविXत्व क े सिसद्धां से सव च्च न्यायालय +े अणिभकरर्ण क े सम्बन्* को उलर्ट विदया, सिSससे अणिभक ा: क े बSाय Sलया+ प्रमुख ब+ा। इस रह, एक सुसंग, काय: कर+े योग्य +ौसे+ा क्षेत्राति*कार क े "वांछ+ीय परिरर्णाम" संभव प्र ी हो े हैं। Sलया+ क े व्यविXत्व का सिसद्धां, या+ी उन्नीसवीं श ाब्दी क े अमेरिरकी +ौसे+ा का+ू+ का एक क ें ˆीय हॉलमाक: ब+ गया क्योंविक यह सव च्च न्यायालय को "विवश्वास क े रास् े में अच्छा" प्र ी हुआ.... यह विवचार +ए अमेरिरकी गर्ण ंत्र की महत्वपूर्ण: सामासिSक और राS+ीति क Sरूर ों को पूरा कर+े क े खिलए सव च्च न्यायालय क े व्यावहारिरक प्रयासों विवशेष रूप से Sस्जिस्र्टस माश:ल और स्र्टोरी से उत्पन्न हुआ,।"49 (प्रभाव वर्ति* )

97. अमेरिरकी अदाल ों का अ+ुभव यह र्थीा विक अपरा*क ा: SहाSों क े माखिलक वि+यविम रूप से अदाल ों क े क्षेत्राति*कार से बच े र्थीे। उस समय की विवद्यमा+ विवति* परिरस्जिस्र्थीति यों से वि+पर्ट+े में अपया:प्त र्थीी। अमेरिरकी सव च्च न्यायालय क े न्याया*ीशों +े इसखिलए Sलया+ को मूर्ति मा+ ब+ा+े क े मौSूदा गैर-का+ू+ी अभ्यास का उपयोग विकया और अप+े क्षेत्राति*कार क े भी र 49 र्डगलस लिंलर्ड, प्रैगेमेविर्टज्म एंर्ड एंर्थीोपोमोरविफज्मः रिरकन्सीहिंवग द र्डॉस्जिक्र्ट्र+ ऑफ द पस:+ैखिलर्टी ऑफ द णिशप, 22 यू.एस.एफ. मार.ल.Sे. 39 (2009) पृष्ठ 91 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sलया+ों को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ करक े इसे का+ू+ी महत्व विदया। गौर लब है विक अणिभकरर्ण का मौSूदा का+ू+ +ौसे+ा विवति* की अ+ूठी विवशेष ाओं से वि+पर्ट+े क े खिलए ैयार +हीं र्थीा। Sलया+ों क े विवरूद्ध काय:वाही को अ+ुमति दे+े से यह एक सा*+ ब+ा सिSसक े माध्यम से Sलया+ों और उसक े कायÂ में विह बद्ध लोगों क े दातियत्वों, हालांविक न्यायालयों क े क्षेत्राति*कार से बाहर, को समुˆी पो क े व्यविXत्व क े का+ू+ द्वारा मान्य ा से पूरा विकया Sाएगा। आंग्ल +ौसे+ा अदाल ों क े मामले में शायद ज्यादा ही, अमेरिरकी अ+ुभव दशा: ा है विक Sलया+ों को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा ऐति हासिसक परिरस्जिस्र्थीति यों, मौSूदा का+ू+ में कविमयों और समुˆी दावों पर व्यावहारिरक रूप से और प्रभावी रूप से अति*वि+र्ण- कर+े क े खिलए अदाल ों की आवश्यक ा का एक परिरर्णाम र्थीा। कई मामलों क े दौरा+, अमेरिरकी सव च्च न्यायालय +े समुˆी दावों को अति*वि+र्ण- कर+े क े प्रयोS+ों क े खिलए Sलया+ को एक अलग का+ू+ी व्यविX ब+ाकर गुर्णारोपर्ण और अणिभकरर्ण की व्यावहारिरक कविठ+ाइयों को हल विकया। इति हास, आवश्यक ा और सुविव*ा

98. ये अवलोक+ +ौसे+ा विवति* क े दायरे से परे भी सच हैं। येल लॉ S+:ल50 में 1928 में प्रकाणिश 'लीगल पस:+ैखिलर्टी' +ामक एक महत्वपूर्ण: लेख में ब्रायंर्ट स्जिस्मर्थी +े कहा विक आम ौर पर, अति*कारों और क:व्यों क े विवषय प्राक ृ ति क व्यविX हैं। हालाँविक, वह इस बा पर ध्या+ दे ा है विक: "...क ु छ कारर्ण या अन्य क े खिलए, Sलया+ या एक न्यासी या संरक्षक क े रूप में कई क्षम ाओं में एक मा+व हो+े या एक भागीदार या एक वि+गम क े रूप में मा+वों क े समुदाय में एकल 50 ब्रायंर्ट स्जिस्मर्थी, विवति*क व्यविXत्व, 37 येल एल. Sे. (1928) पृष्ठ 287,295 और 296 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क्षम ा Sैसे वि+S-व वस् ुओं से वि+पर्ट+े क े खिलए यह सुविव*ाS+क या आवश्यक हो Sा ा है। उदाहरर्ण क े खिलए, एक व्यापारी, सिSस+े एक Sलयात्रा क े खिलए आपूर्ति प्रस् ु की है, या एक बॉस स्र्टीवर्डोर सिSस+े SहाS का +वी+ीकरर्ण विकया है, वह पो क े माखिलक क +हीं पहुंच सक े हैं, Sो अति*कार क्षेत्र से बाहर है। स्पष्ट समा*ा+ SहाS पर ही प्राप्त कर+ा है और इसक े माध्यम से, माखिलक क े दातियत्वों को सं ुष्ट कर+ा है। लेविक+ इस उद्देश्य क े खिलए विवति*शास्त्र की एक +ई प्रर्णाली ैयार कर+े क े खिलए, +ए रूपों और सिसद्धां ों और प्रविक्रयाओं को पूरा कर+े क े खिलए, पेशे की सुपयोविग ा को बहु गंभीर कर देगा। इसका विवकल्प न्याया*ीशों क े खिलए एक SहाS और एक आदमी क े बीच असंग म भेदों क े खिलए अप+ी आँखें बंद कर+ा और SहाS को ऐसे मा++ा है Sैसे विक यह एक अपलेख की रक्षा क े उद्देश्य से एक आदमी र्थीा।... यह वि+तिश्च रूप से सच है विक मा+व विवषयों क े अलावा अन्य में विवति*क व्यविXत्व का लाभ और भार, अंति म विवश्लेषर्ण पर, म+ुष्यों क े खिलए परिरर्णाम है, Sो, हमें कोई संदेह +हीं है, विक उपरोX से लेखकों का क्या म लब है। लेविक+ अव*ारर्णा की उपयोविग ा ही, विवशेष रूप से वि+गविम व्यविXत्व क े मामले में, इस थ्य में वि+विह है विक यह इस अंति म विवश्लेषर्ण क े खिलए आवश्यक ा से बच ा है। लेविक+, हालांविक का+ू+ी व्यविXत्व का काय:, Sैसा विक उद्धरर्ण से प ा चल ा है, व्यवहार को विववि+यविम कर+ा है, यह क े वल उस विवषय क े आचरर्ण को विववि+यविम कर+े क े खिलए ही +हीं है सिSसे इसे प्रदा+ विकया गया है; इसे विवषय की ओर या एक- दूसरे की ओर म+ुष्यों क े आचरर्ण को भी विववि+यविम कर+ा है। यह Sलया+ को एक का+ू+ी व्यविX ब+ा+े क े खिलए समाS क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उद्देश्यों को सूर्ट कर ा है, इसखिलए +हीं विक SहाS का आचरर्ण कोई अलग होगा, वि+तिश्च रूप से, बस्जिल्क क्योंविक इसका व्यविXत्व क ु छ विवशेष मामलों में अप+े माखिलक या अन्य म+ुष्यों क े आचरर्ण को वि+यंवित्र कर+े क े खिलए एक प्रभावी सा*+ है।" (प्रभाव वर्ति* ) उपरोX उद्धरर्ण सामंर्ड की विर्टप्पणिर्णयों की पुविष्ट कर ा है विक काया का विवकल्प (या+ी वस् ु) सिSस पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है वह सख् का+ू+ी सिसद्धां पर आ*ारिर +हीं है, बस्जिल्क ऐति हासिसक परिरस्जिस्र्थीति यों, का+ू+ी आवश्यक ा और सुविव*ा का एक परिरर्णाम है। ऐति हासिसक परिरस्जिस्र्थीति यों में अदाल ों को विवणिशष्ट थ्यात्मक स्जिस्र्थीति यों पर वि+र्ण:य ले+े की आवश्यक ा हो ी है। अमरीकी +ौसे+ा विवति* में, संयुX राज्य अमेरिरका क े सव च्च न्यायालय को +ौसे+ा क्षेत्राति*कार प्रदा+ कर+े से समुˆी अणिभया+ में वृतिद्ध से समुˆी दावों से Sुड़े मामलो की बाढ़ आ गयी। उस समय क े विवद्यमा+ का+ू+ +े अदाल को इ+ +ए दावों पर प्रभावी ढंग से अति*वि+र्ण- कर+े की अ+ुमति +हीं दी, सिSससे अ+ुतिच, बे ुक या विवक ृ परिरर्णाम आये। इसखिलए, अदाल ों द्वारा का+ू+ी +वाचार का सहारा खिलया गया र्थीा। लिंलर्ड और स्जिस्मर्थी दो+ों +े SहाS की विवणिशष्ट ा से उत्पन्न हो+े वाली कई समस्याओं पर प्रकाश र्डाला- एक पो Sो कई क्षेत्राति*कारों से होकर यात्रा कर रहा है, सिSसक े माखिलक उ+से अलग अन्य अति*कार क्षेत्र में वि+वास कर सक े हैं Sहां उ+क े खिखलाफ कार:वाई कर+े की मांग की Sा ी है और Sलया+ क े संचाल+ का या वि+यंत्रर्ण का बहु कम ज्ञा+ हो ा है। SहाS को विवति*क व्यविXत्व क े प्रदा+ीकरर्ण +े SहाS क े व्यवहार को +हीं बदला। हालांविक इस+े एक का+ू+ी ढांचा ैयार विकया है सिSसक े ह प्राकृ ति क mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्यविXयों और SहाS क े बीच अन् ःविक्रया को सामासिSक स् र पर परिरर्णाम प्राप्त कर+े क े खिलए विववि+यविम विकया Sा सक ा है Sो का+ू+ी रूप से और सं ोषS+क हैं।

99. दो+ों लेखकों +े ध्या+ विदया विक SहाS क े मौSूदा व्यविXकरर्ण को ब+ा+े क े खिलए अदाल ों की आवश्यक ा हो ी है लेविक+ विवश्वास की एक छोर्टी अव*ारर्णा का परिरव:+, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप अदाल ों क े खिलए महत्वपूर्ण: का+ू+ी लाभ हो े हैं। यह हिंबदु का+ू+ी महत्व की ुल+ा में अति*क ऐति हासिसक है क्योंविक यह +हीं कहा Sा सक ा है विक Sहां विकसी वस् ु का कोई व्यविXकरर्ण +हीं है, एक अदाल को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े से रोक विदया Sा ा है। क: ः राज्य क े क ृ त्यों द्वारा वि+गम को प्रदत्त स्व ंत्र विवति*क व्यविXत्व में कहीं अति*क संकल्प+ात्मक परिरव:+ अं व:खिल र्थीी। विफर भी इसे आवश्यक मा+ा गया और ब से वि+गमों क े का+ू+ में एक मूलभू सिसद्धां में विक्रस्र्टलीक ृ हो गया।

100. विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े का एक और कारर्ण मौSूद है। वस् ुएँ कति पय विह ों का प्रति वि+ति*त्व कर ी हैं और कु छ लाभों को प्रदा+ कर ी हैं। क ु छ वस् ुओं क े मामले में लाभ ास्जित्वक होगा। लाभ Sो विवशुद्ध रूप से ास्जित्वक है, से परे आगे बढ़ सक ा है। एक क ृ वित्रम विवति*क व्यविX चाहे कोई Sलया+ या क ं प+ी हो, वास् व में इ+ लाभों का आ+ंद +हीं ले सक ा है। ऐसे लाभों क े अंति म लाभार्थी- प्राक ृ ति क व्यविX हैं। हालांविक, प्रत्येक मामले में, क ृ वित्रम विवति*क व्यविX और ऐसे क ृ वित्रम व्यविX से लाभ प्राप्त कर+े वाले प्राक ृ ति क व्यविXयों क े बीच अं र कर+े क े खिलए एक अदाल की आवश्यक ा हो ी है, विवशेष रूप से Sब वि+गमों और SहाSों क े बढ़ े उपयोग क े सार्थी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA युखिग्म विकया Sा ा है, ो यह लगा ार कर रहा है। यह हमें विवति*क व्यविXत्व-सुविव*ा प्रदा+ कर+े क े ीसरे औतिचत्य की ओर ले Sा ा है वस् ुओं को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा ऐति हासिसक रूप से दावों क े व्यावहारिरक अति*वि+र्ण:य को सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए +ीति का एक शविXशाली उपकरर्ण रहा है। एक का+ू+ी ढांचे का वि+मा:र्ण करक े, इस+े विववादों क े एक उभर े वग: पर वि+र्ण:य ले+े क े खिलए आवश्यक उपकरर्णों से अदाल को सुसखिज्ज विकया। इस+े न्याया*ीशों को क ृ वित्रम और प्राक ृ ति क व्यविXयों क े बीच अं र को कम कर+े की अ+ुमति देकर काफी न्यातियक प्रयास और समय बचा खिलया Sहां यह प्रासंविगक +हीं र्थीा। विवति*क व्यविXत्व को विदया Sा+ा इस प्रकार का+ू+ी आवश्यक ा और सुविव*ा का एक उपकरर्ण र्थीा। विवति*क व्यविXत्व मा+व प्रक ृ ति या मा+व विवशेष ाओं को +हीं दशा: ा है। विवति*क व्यविXत्व का+ू+ में क ु छ अति*कारों और क:व्यों की एक मान्य ा है। एक वस् ु, विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकए Sा+े क े बाद भी, कोई भी इच्छा व्यX +हीं कर सक ी है, लेविक+ यह प्राक ृ ति क व्यविXयों को विमल+े वाले क ु छ विह ों, अति*कारों या लाभों का प्रति वि+ति*त्व कर ा है। न्यायालय का+ू+ में गोचर कविमयों को दूर कर+े और व्यावहारिरक अति*वि+र्ण:य+ की सुविव*ा क े खिलए विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर े हैं। क ृ वित्रम विवति*क व्यविXयों (विवति*क व्यविXत्व क े सार्थी संलग्न) को अति*कार और क:व्य देकर, का+ू+ आवश्यक ा और सुविव*ा दो+ों को हल और पूरा कर ा है। विवस् ार द्वारा, अदाल ें प्राक ृ ति क व्यविXयों क े दावों को प्रभावी ढंग से अति*वि+र्ण- कर+े क े खिलए विवति*क व्यविXत्व दे ी हैं, सिSस काया(काप:स) द्वारा प्रभाविव या लाभ उत्पन्न हो े हैं उ+को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। इस सिसद्धां का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मूला*ार यह है विक न्यायालयों द्वारा काया को विदए गए अति*कार का+ू+ में विवद्यमा+ कविमयों को दूर कर+े और दावों को क ु शल ापूव:क अति*वि+र्ण- कर+े की आवश्यक ा क सीविम हैं।

101. इस सिसद्धां को विफखिलप ब्लुमग: द्वारा संतिक्षप्त रूप से व्यX विकया गया है: "उ+क े विवशेष का+ू+ी अति*कारों और दातियत्वों से विवणिशष्ट, का+ू+ी इकाई का प्रत्येक वग: अविद्व ीय है। इ+में व्यविXयों, समुˆी पो ों, भौति क वस् ुओं, भागीदारी, संघों, विवशेष खा ों, *+, आर्भिर्थीक विह समूहों और सरकारी एSेंसिसयों, सार्थी ही वि+गम और कॉप रेर्ट समूह Sैसे विवणिभन्न का+ू+ी विवषय शाविमल हैं। प्रत्येक मामले में, इकाई की का+ू+ी मान्य ा की परिरति* का सीमांक+ कर+े वाले अति*कारों और सिSम्मेदारिरयों का आरोपर्ण सामासिSक का+ू+ ब+ा+े वाले सभी कारकों को दशा: ा है Sैसे: का+ू+ का ऐति हासिसक विवकास, बदल े मूल्य और विह, सामासिSक- आर्भिर्थीक और राS+ीति क शविXयाँ, और वैचारिरक *ाराएँ। क ु छ मूलभू मुद्दे हैं। प्रर्थीम ः, + ो का+ू+ी अति*कार और + ही का+ू+ी इकाईयां "हवा में" विवद्यमा+ हैं। का+ू+ी अति*कारों को एक का+ू+ी इकाई से संबंति* हो+ा चाविहए Sो उ+का प्रयोग कर सक ी है। इसक े अलावा, का+ू+ी अति*कारों और सिSम्मेदारिरयों की कोई व्यापक सूची +हीं हो सक ी है Sो का+ू+ी इकाई क े रूप में विकसी विवशेष विवषय की मान्य ा पर स्वचाखिल रूप से अस्जिस् त्व में आ ी है। विबल्कु ल विवपरी । यह विवणिशष्ट अति*कारों और दातियत्वों (मुख्य ः अति*कार) को एक-एक करक े मान्य ा प्रदा+ कर ा है Sो का+ू+ी इकाई की न्यातियक रूपरेखा को आकार दे ा है सिSसक े खिलए उ+का सृS+ विकया गया है। Sब का+ू+ विकसी विवशेष अति*कार को मान्य ा प्रदा+ कर ा है या एक प्रकस्जिल्प का+ू+ी इकाई पर एक विवशेष सिSम्मेदारी लगा ा है, ो यह आरोपर्ण की सीमा क एक का+ू+ी इकाई क े रूप में मान्य ा का गठ+ कर ा है। विवति* वि+मा: ा-चाहे विव*ायक, प्रशासक, या न्याया*ीश- क े विवचार में इकाई की ऐसी मान्य ा क े आ*ार पर अन्य अति*कार और दातियत्व मौSूद हो सक े हैं या +हीं हो सक े हैं, ये इस क्षेत्र में उस समय की का+ू+ की अं र्मि+विह +ीति यों और उद्देश्यों को पूरा करेंगे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसक े अलावा, Sैसा विक समाS बदल ा है, का+ू+ी पहचा+ की अव*ारर्णा और उ+को विदए गए का+ू+ी परिरर्णाम अवि+वाय: रूप से बदल भी Sा े हैं।"51 (प्रभाव वर्ति* ) सभी का+ू+ी इकाइयाँ एक Sैसी +हीं हैं। का+ू+ी व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा विवणिशष्ट आवश्यक ाओं को पूरा कर ा है Sो इसकी मान्य ा को सही ठहरा े हैं। विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा स्वचाखिल रूप से का+ू+ी अति*कारों का एक समूह प्रदा+ +हीं कर ा है। विवति*क व्यविXत्व की रूपरेखा अर्थीा: ् विवति*क व्यविXत्व, Sो विवति*क व्यविXत्व प्रदत्त वस् ु से Sुड़ी है, अति*कारों और दातियत्वों को उ+ विवणिशष्ट कारर्णों को ध्या+ में रख े हुए वि+*ा:रिर विकया Sा+ा चाविहए सिS+क े खिलए इस रह का विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया गया र्थीा। +ए विवति*क व्यविX को विदए गए अति*कारों की सीमाओं को विवति*क व्यविXत्व को प्रदा+ कर+े क े कारर्णों से वि+द†णिश विकया Sा+ा चाविहए। न्यातियक +वाचार क े मा+द°ड़ उस उद्देश्य से वि+*ा:रिर विकए गए हैं सिSसक े खिलए न्याया*ीश +वाचार कर ा है। इसका एक उदाहरर्ण यह है विक Sब अदाल ें वि+गविम व्यविXत्व हर्टा दे ी हैं, Sहां एक स्व ंत्र विवति*क व्यविXत्व विदया Sा+ा अब उपरोX लक्ष्यों को पूरा +हीं कर ा है। सिसद्धां क े प्रयोज्य ा को इसक े सृS+ में अं र्मि+विह उद्देश्य को पूरा कर+े की इसकी क्षम ा द्वारा परिरभाविष विकया गया है। विवति*क +वाचार अवि+यंवित्र हो Sाएगा यविद न्यायालय विकसी वस् ु को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा चाह े हैं और बाद में वस् ु क े अति*कारों को उस हिंबदु क बढ़ा दे े हैं Sहां समझदारी और व्यावहारिरक अति*वि+र्ण:य 51 विफखिलप ब्लुमवग:, द मल्र्टी+ेश+ल चैलेंS र्टू कॉप रेश+ लॉ (ऑक्सफोर्ड: यूवि+वर्जिसर्टी प्रेस 1993) पृष्ठ 207 पर, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का मूल लक्ष्य परासिS हो Sा ा है। इस समझ क े सार्थी, अब हिंहदू मूर्ति यों क े संबं* में इ+ सिसद्धां ों की प्रयोज्य ा पर आ+ा आवश्यक है। विहन्दू मूर्ति और देवत्व

102. आरम्भ में, यह समझ+ा महत्वपूर्ण: है विक विहन्दू मूर्ति को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा स्वयं देवत्व को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा +हीं है, सिSसे विहन्दू *म: में प्रायः 'परमात्मा' समझा Sा ा है। परमात्मा रूप और आकार से परे है, विफर भी उसकी उपस्जिस्र्थीति साव:भौम है। हिंहदू *म:दाय क े का+ू+ में और व:मा+ काय:वाही में, यह अक्सर कहा गया है विक 'मूर्ति क े पीछे क े उद्देश्य' से विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। व:मा+ वि+र्ण:य इस कर्थी+ क े सर्टीक का+ू+ी महत्व का उल्लेख करेगा। व:मा+ क े खिलए, यह +ोर्ट कर+ा पया:प्त है विक विवति*क व्यविXत्व को स्वयं 'परमात्मा' को प्रदा+ +हीं विकया गया है Sैसा विक राम Sा+कीSी देवी ब+ाम विबहार राज्य52 में इस न्यायालय द्वारा अवलोक+ विकया गया है: "19. ईश्वर सव:शविXमा+ और सव:ज्ञ है और उसकी उपस्जिस्र्थीति विकसी विवशेष रूप या छविव क े कारर्ण +हीं बस्जिल्क सव:शविXमा+ की उपस्जिस्र्थीति क े कारर्ण महसूस की Sा ी है। वह वि+राकार है, वह आकारही+ है और उपासकों क े लाभ क े खिलए है विक परमात्मा की छविव में एक अणिभव्यविX है। परमात्मा क े पास कोई गुर्ण +हीं है, सिSसमें शुद्ध आत्मा हो ी है और Sो विब+ा विकसी दूसरी सत्ता क े हो ी है अर्थीा: ईश्वर वास् व में एकमात्र अस्जिस् त्व हो ा है, उसे छोड़कर वास् विवक अस्जिस् त्व में कोई अन्य +हीं है।" (प्रभाव वर्ति* )

103. 1991 में बम्पर र्डेवलपमेंर्ट कॉरपोरेश+ खिलविमर्टेर्ड ब+ाम कविमश+री ऑफ पुखिलस ऑफ द मेर्ट्रोपोखिलस 52 में अपील क े आंग्ल अदाल को यह 52 (1999) 5 एससीसी 50 52 (1999) 5 एससीसी 50 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सवाल य कर+े क े खिलए बुलाया गया र्थीा विक क्या एक हिंहदू मंविदर और एक हिंहदू मूर्ति विवति* क े न्यायालय में मुकदमा कर सक े हैं। स+् 1976 में एक भार ीय मSदूर +े विमल+ार्डु क े पर्थीूर में एक 'णिशव +र्टराS' की खोS की सिSसे बाद में मSदूर +े *ार्मिमक कलाक ृ ति यों क े एक र्डीलर को बेच विदया। बाद में एक 'णिशवलिंलगम' सविह अन्य कलाक ृ ति याँ पायी गयीं और पर्थीुर मंविदर में पु+ःस्र्थीाविप कर विदया गया। 1982 में बम्पर र्डेवलपमेंर्ट कॉरपोरेश+ +े लंद+ क े एक र्डीलर से 'णिशव +र्टराS' को सद्भाव से खरीदा, सिSस+े विबक्री क े प्रयोS+ों क े खिलए '+र्टराS की एक झूठी उत्पखित्त' प्रस् ु की। बाद में +र्टराS को मेर्ट्रोपॉखिलर्ट+ पुखिलस +े Sब् कर खिलया। विवचारर्ण में भार सरकार और विमल+ार्डु की राज्य सरकार +े पर्थीूर मंविदर और णिशवलिंलगम क े सार्थी-सार्थी "विवति*क व्यविXयों" क े रूप में हस् क्षेप विकया। अपील क े न्यायालय +े आंग्ल न्यायालयों में विवदेशी विवति* पर लंबी चचा: की। हालांविक, का+ू+ी इकाई क े रूप में पर्थीुर मंविदर द्वारा दावे की पोषर्णीय ा का मूल्यांक+ कर+े में, अांग्ल न्यायालय +े वि+म्+खिलखिख अवलोक+ विकए: "(1) + ो ईश्वर और + ही कोई अलौविकक सत्ता का+ू+ में व्यविX हो सक ा है। इस कर्थी+ की सत्य ा का एक व्यावहारिरक उदाहरर्ण यह है विक यविद *म:दाय एक अलौविकक शविX क े रूप में ईश्वर में वि+विह हो ी, ो विवणिभन्न मंविदरों क े बीच उ+क े संबंति* अति*कारों को लेकर मुकदमेबाSी असंभव होगी। ो विकसी प्रसंग में समा+ "व्यविX" वादी और प्रति वादी दो+ों होंगे, Sैसा विक र्डॉ. मुखS- ब ा े हैं, सभी हिंहदू हमेशा एक परमात्मा की पूSा कर े हैं। विब+ा संदेह क े यह स्पष्ट है विक भार में मंविदरों क े मध्य बहु मुकदमेबाSी है।... (4) कोई विवति*क व्यविX पहचा+ क े खिलए समर्थी: हो+ा चाविहए। इसक े खिलए आवश्यक है विक 'व्यविX' का +ाम या विववरर्ण हो। चूंविक प्रत्येक हिंहदू मूर्ति एक परमात्मा की अणिभव्यविX है, इसखिलए व्यविX को पहचा+ क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भगवा+ क े +ाम को छोड़कर कहीं और देख+ा चाविहए। पर्थीूर मंविदर क े संस्र्थीापक का +ाम इसक े शीष:क में है और यह विमल+ार्डु में प्रर्थीा प्र ी हो ी है। इसखिलए विकसी भी मूर्ति को उस मंविदर क े +ाम क े सार्थी संबं* द्वारा संदर्भिभ विकया Sा+ा चाविहए सिSसमें यह है।" (प्रभाव वर्ति* )

104. विहन्दू *म: परमात्मा को विवश्व क े हर पहलू में विवद्यमा+ समझ ा है। परमात्मा सव:व्यापी है। का+ू+ी प्रर्णाली क े 'विवषयों की पहचा+ कर+े' की आवश्यक ा पर एक विवति*क व्यविX का विवचार आ*ारिर है। एक सव:व्यापी विकसी भी रीक े से का+ू+ क े खिलए सार्थी:क या तिचवित्र हो+े में असमर्थी: है और कोई पहचा+ योग्य विवति*क विवषय साम+े +हीं आएगा। यह समझ इस न्यायालय क े वि+र्ण:यों में भी परिरलतिक्ष हो ी है। योगेंˆ +ार्थी +स्कर ब+ाम आयकर आयुX, कलकत्ता54 में, इस न्यायालय की ी+ SSों की पीठ को यह वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए बुलाया गया र्थीा विक क्या एक हिंहदू मूर्ति (या देव ा) आयकर अति*वि+यम 1922 की *ारा 3 क े ह "एक व्यविX" की परिरभाषा में आ ी है। न्यायमूर्ति वी रामास्वामी +े इस न्यायालय की ी+ SSों की बेंच क े खिलए बोल े हुए कहा: "महा+ दाश:वि+क शंकर +े एक ही सत्य का उल्लेख विकया है Sो बुतिद्ध (मति भेद) की विवविव* ा क े कारर्ण पारंपरिरक रूप से (परिरकल्प्य) ब्रह्म, विवष्र्णु और महेश्वर क े रूप में विवणिभन्न प्रकार से कहा Sा ा है। हालाँविक, यह संभव है विक उपासक या *म:दाय क े संस्र्थीापक इस उच्च म आध्यास्जित्मक आ*ार की कल्प+ा +हीं कर सक े हैं, लेविक+ यह मा+ े हैं विक मूर्ति एक व्यविXग भगवा+ का मू: रूप है, लेविक+ इस मामले से का+ू+ का कोई सरोकार +हीं है। + ो ईश्वर और + ही कोई अलौविकक का+ू+ में व्यविX हो सक ा है। लेविक+ Sहाँ क देव ा उस विवशेष उद्देश्य क े प्र ीक और प्रति वि+ति* क े रूप में हो ा है सिSसे दा ा द्वारा इंविग विकया Sा ा है, यह एक विवति*क व्यविX क े रूप में हो सक ा है। सही का+ू+ी 54 (1969) 1 एससीसी 555 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दृविष्टकोर्ण यह है विक उस क्षम ा में क े वल समर्मिप संपखित्त इसमें वि+विह है। कोई सिसद्धां +हीं है विक अगर इस रह क े विवति*क व्यविX को का+ू+ में संपखित्त रख+े, भले ही आदश: अर्थीÂ में और संपखित्त क े खिलए मुकदमा कर+े, विकराए की मान्य ा दे+े और ऐसी संपखित्त का बचाव कर+े क े खिलए आदश: अर्थीÂ में का+ू+ की अदाल में, अ+ुमति दी Sा ी है ो इस रह क े विवति*क व्यविX क े रूप में एक देव ा पर कर क्यों +हीं लगाया Sा+ा चाविहए। हमारा वि+ष्कष: यह है विक हिंहदू मूर्ति एक न्यातियक इकाई है Sो संपखित्त रख+े में सक्षम है और इसक े सेवादार क े माध्यम से कर लगाया Sा सक ा है सिSन्हें इसकी संपखित्त का कब्Sा और प्रबं*+ सौंपा गया है।" (प्रभाव वर्ति* ) परमात्मा को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ +हीं विकया Sा ा है। अप+े अस्जिस् त्व क े आ*ार पर ही- परमात्मा की कोई भौति क उपस्जिस्र्थीति +हीं है, क्योंविक वह सव:व्यापक मा+ा Sा ा है। अदाल देवत्व पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ +हीं कर ी है। विहन्दू दश:+ में द्वैवत्व असीम, विवरार्ट और अ+न् है। दैवत्व विवश्व क े हर पहलू में व्याप्त है। देवत्व का गुर्ण वर्ण:+ से परे है और उसे -भौति क या विवति*क सीमाओं क े संदभ: में परिरभाविष +हीं कर+े क े खिलए मूल आ*ार प्रदा+ कर ा है। इस कारर्ण से विक यह सव:व्यापी है, यह भेद कर+ा असंभव होगा विक कहाँ एक का+ू+ी इकाई समाप्त हो Sा ी है और अगली शुरू हो ी है। इस रह क े अभ्यास में का+ू+ की संकीर्ण: सीमाएँ दोषपूर्ण: हैं और यह इस कारर्ण से है, विक का+ू+ इस दृविष्टकोर्ण को अप+ा+े से दूर रहा है। विहन्दू *म: में, परमात्मा की भौति क अणिभव्यविXयाँ मूर्ति यों क े रूप में विवद्यमा+ हैं, सिSससे उपासक एक आकारही+ प्रार्णी का अ+ुभव कर सक ें । मूर्ति परमसत्ता का एक प्रति वि+ति*त्व है। एक भौति क रूप रख+े से मूर्ति पहचा+ योग्य है।

105. विहन्दू मूर्ति यों को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े खिलए अप+ाई गई पद्धति की खोS और प्रदा+ कर+े का कारर्ण आवश्यक है। मुख्य न्याया*ीश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बी. क े. मुखS- की, "*ार्मिमक और पू: न्यासों की विहन्दू विवति*" कालवि+रपेक्ष गुर्ण प्रदर्भिश कर ा है और इस विवषय पर हमारी विवति* क े विवकास को समझ+े में उसका महत्व है। न्यायमूर्ति मुखS- +े +ोर्ट विकया विक *ार्मिमक *म:दाय की हिंहदू प्रर्थीा को विववि+यविम कर+े वाले न्यायालयों से पहले भी, *ार्मिमक उद्देश्यों क े खिलए समर्मिप संपखित्तयों को विववि+यविम कर+े में स्पष्ट साव:Sवि+क विह की परिरर्णति उस समय क े शासकों द्वारा विववि+यविम कर+े में हुई। वह कह े हैं: "1.36... र्थीाविप ऐसा प्र ी हो ा है विक प्रारंणिभक समय से ही इस देश में *ार्मिमक और पू: संस्र्थीा+ सत्तारूढ़ प्राति*कारी क े विवशेष संरक्षर्ण में आ गए। प्रसिसद्ध रामेश्वर पगोर्डा मामले में, न्यातियक सविमति द्वारा यह इंविग विकया गया र्थीा विक इस देश क े पूव: शासकों +े हमेशा इस रह क े *म:दाय पर Sा+े क े अति*कार का दावा विकया र्थीा ाविक उ+क े प्रबं*+ में बुराईयों को रोका Sा सक े और उ+का वि+वारर्ण विकया Sा सक े । "इसमें कम ही संदेह हो सक ा है", इस प्रकार उ+क े आति*पत्य का अवलोक+ विकया Sा सक ा है, "विक अ*ीक्षर्ण प्राति*कारी का प्रयोग पुरा+े शासकों द्वारा विकया गया र्थीा।" श्री +ेल्स+ +े अप+े मदुरा मै+ुअल में कहा है: "... *म: क ा: एक दूसरे क े सार्थी लेविक+ र्थीोड़ा संवाद कर े र्थीे और खुद राSा को छोड़कर विकसी भी सांसारिरक श्रेष्ठ को मान्य ा +हीं दे े र्थीे। प्रत्येक व्यविX सभी वि+यंत्रर्णों से स्व ंत्र र्थीा और अप+ी प्रसन्न ा क े सार्थी पूरी रह से काय: कर ा र्थीा। इस स्व ंत्र ा +े स्वाभाविवक रूप से घोर बुराईयां को Sन्म विदया और राSा को कभी-कभी क ु छ चचÂ क े प्रबं*+ में हस् क्षेप कर+े क े खिलए मSबूर विकया गया।"55 (प्रभाववर्ति* )

106. 2010 में इको+ोविमकल ए°ड़ पॉखिलर्टीकल वीकली में प्रकाणिश एक लेख में गौ म पर्टेल +े *म:दाय क े ऐति हासिसक विवकास का प ा लगाया। उन्हों+े मूर्ति यों को का+ू+ में व्यविXत्व प्रदा+ कर+े का कारर्ण ब ाया: "राSाओं और शासकों +े हिंहदू मंविदरों की स्र्थीाप+ा, देखरेख और रखरखाव क े खिलए वि+यविम रूप से संपखित्त और +कदी दा+ की। 55 बी. क े. मुखS-, द विहन्दू लॉ ऑफ रिरखिलसिSयस ए°ड़ चैरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट, 5 वॉ संस्करर्ण ईस्र्ट+: लॉ हाउस, (1983) पेS 28 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sब भूविम पर मंविदर ब+ Sा ा र्थीा ो वह आज्ञापत्र द्वारा स+द या अ+ुदा+ या फरमा+ क े रूप में हो ी र्थीी। उदाहरर्ण क े खिलए, +ार्थीद्वार स्जिस्र्थी श्री+ार्थीSी मंविदर को बादशाह अकबर का फरमा+ प्राप्त हो+ा कहा गया। सुव्यवस्र्थीा और प्रलेख+ से औपवि+वेणिशक स+क को देख े हुए, इस स्जिस्र्थीति +े एक समस्या खड़ी कर दी- भूविम क े बड़े क्षेत्रों का स्वाविमत्व, प्रबं*+ और वि+मा:र्ण सेवाय और मंह द्वारा विकया गया Sो स्पष्ट रूप से माखिलक +हीं र्थीे। मंविदर अप+ी प्रक ृ ति से, +म्य व वृतिद्ध और बदलाव क े खिलए उपयुX र्थीे। क ु छ स्र्थीातियत्व क े सार्थी मूर्ति का अस्जिस् त्व र्थीा और यह संभव ः इस कारर्ण से है विक हिंहदू मूर्ति की का+ू+ी अव*ारर्णा सम्पखित्त रख+े वाली एक न्यातियक इकाई क े रूप में विवकसिस की गई। कारर्ण विवशुद्ध रूप से राSकोषीय रहा होगा- इ+ भूविम का सव†क्षर्ण विकया Sा+ा र्थीा, उ+क े स्वाविमत्व का प ा लगाया गया र्थीा और विफर भू-राSस्व और अन्य करों क े खिलए (या छ ू र्ट से) मूल्यांक+ विकया गया र्थीा। लेविक+ भूविम का स्वाविमत्व लगभग हमेशा फरमा+, स+द या विकसी अन्य खिलख द्वारा विदए गए सकारात्मक काय: की स्र्थीाप+ा पर वि+भ:र कर ा र्थीा Sो विक स्पष्ट ः मूर्ति को भूविम का समप:र्ण दशा: ा है।"56 (प्रभाव वर्ति* ) का+ू+ में एक इकाई क े रूप में मूर्ति की मान्य ा का कारर्ण आं रिरक रूप से उ+ ऐति हासिसक परिरस्जिस्र्थीति यों से Sुड़े हो े हैं सिS+में मान्य ा प्राप्त हुई र्थीी। व्यविXयों, व्यापारिरयों और शासकों द्वारा *ार्मिमक *म:दायों की स्र्थीाप+ा भार में एक सविदयों पुरा+ी प्रर्थीा है। र्थीाविप, भार में औपवि+वेणिशक प्रशास+ और उस समय की आंग्ल विवति* में उस विवति*क ढांचे का अभाव र्थीा सिSसक े भी र विहन्दू *ार्मिमक *म:दाय क े संबं* में दावों को अणिभखिलखिख, करा*ा+ और अं ः न्यायवि+र्ण- विकया Sाए। समर्मिप संपखित्तयों की मूल्य वृतिद्ध से विववाद उत्पन्न हुए। देश भर में अदाल ों की स्र्थीाप+ा +े *म:दाय, मूर्ति यों और 56 गौ म पर्टेल, आइर्डल्स इ+ लॉ, ख°ड़ 45 सं. 50 इको+ोविमक व पॉखिलर्टीकल वीकली (11-17 विदसम्बर 2010 ) पेS 49 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA देवोत्तर संपखित्तयों से संबंति* दावों पर वि+र्ण:य ले+े क े खिलए वि+रं र +े ृत्व विकया। Sे. 2 मूर्ति याँ और न्यातियक व्यविXत्व

107. भार में अं£ेSी और भार ीय न्याया*ीशों से हिंहदू मूर्ति यों और उ+से संबद्ध संपखित्तयों की विवति*क विवशेष ाओं का अव*ारर्ण कर+े का आह्वा+ विकया गया। म+ोहर गर्णेश ाम्बेकर ब+ाम लखविमराम गोहिंवदराम57 में वादी र्डाकोर क े मंविदर की *ार्मिमक स्र्थीाप+ में विह रख+े वाले व्यविX र्थीे और प्रति वादी मंविदर क े चढ़ावे क े प्राप्तक ा: र्थीे। वादी की प्रार्थी:+ा र्थीी विक अदाल मंविदर में विदए गए प्रसाद क े Sवाबदेह वि+राकरर्ण क े खिलए एक रिरसीवर वि+युX करे। दूसरी ओर, प्रति वाविदयों +े कहा विक मंविदर का प्रसाद उ+की अप+ी पूर्ण: और *म:वि+रपेक्ष संपखित्त र्थीी। बॉम्बे उच्च न्यायालय की एक ख°ड़ पीठ +े उ+ परिरस्जिस्र्थीति यों का विवश्लेषर्ण विकया सिSसमें मामला घविर्ट हुआ और हिंहदू मूर्ति को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े की आवश्यक ा पर विवचार विकया। न्यायालय क े न्यायमूर्ति आर बेस्र्ट +े संप्रेतिक्ष विकया: "कई श ास्जिब्दयों क मंविदर क े राSस्व में उसकी सेवाओं को ब+ाए रख+े क े खिलए अपेतिक्ष व्यय से अति*क हो गये प्र ी हो े हैं लेविक+ हाल ही में ये राSस्व काफी बढ़ गये हैं। का+ू+ Sो बाहरी हिंहसा क े खिखलाफ अति*ष्ठा+ की रक्षा कर ा है, वह भी आं रिरक रूप से क ु प्रशास+ से रक्षा कर ा है, और संस्र्थीा क े क ें ˆीय सिसद्धां क े अ+ुरूप, इसक े बढ़े हुए *+ का उपयोग कर ा है।"

108. मंविदरों और मूर्ति यों को सम्पखित्त समर्मिप कर+े की हिंहदू प्रर्थीा को अदाल ों द्वारा पहली बार उन्नीसवीं श ाब्दी क े अन् में अति*वि+र्ण- विकया 57 आईएलआर (1888) 12 बॉम्बे 247 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा+ा र्थीा। भार में अं£ेSी न्याया*ीशों द्वारा हिंहदू का+ू+ को *ार्मिमक *म:दाय पर लागू कर+े क े काय: से वि+पर्ट े हुए यह सिसद्धां विक हिंहदू मूर्ति यों का एक अलग विवति*क व्यविXत्व है, को अप+ाया गया र्थीा। संपखित्त विववाद उत्पन्न हुए और संपखित्तयों क े स्वाविमत्व क े बारे में सवाल उठाया गया। दो स्पष्ट विह ों को का+ू+ी सुरक्षा क े विवषय क े रूप में मान्य ा दी गई र्थीी। सबसे पहले, शेविबट्स (या+ी प्रबं*कों) द्वारा क ु प्रबं*+ की वास् विवक संभाव+ा मौSूद र्थीी, Sहां एक विवशेष पविवत्र उद्देश्य क े खिलए प्रदा+ की गयी भूविम, आम ौर पर एक मूर्ति की पूSा क े खिलए, खराब रूप से प्रशासिस या यहां क विक अलग-र्थीलग र्थीी। दूसरा, Sहां भूविम साव:Sवि+क पूSा क े खिलए समर्मिप र्थीी, वहाँ यह भय र्थीा विक S+ ा क पहुंच या S+ ा को अन्य *ार्मिमक लाभ से वंतिच विकया Sाएगा, विवशेष रूप से भXों क े खिलए। Sहां *म:दाय का मूल संस्र्थीापक Sीविव +हीं र्थीा और शेबै भूविम का माखिलक +हीं र्थीा, ो मूल समप:र्ण को प्रभावी कर+े क े खिलए अदाल ें (और उ+क े माध्यम से राज्य) क ै सी र्थीीं। अदाल ों को एक वैचारिरक ढांचा प्रदा+ कर+े क े खिलए सिSसक े भी र वे विवश्लेषर्ण कर सक े हैं और व्यावहारिरक रूप से *म:दाय संपखित्तयों पर प्रति स्प*- दावों से Sुड़े विववादों पर वि+र्ण:य ले सक े हैं, अदाल ों +े हिंहदू मूर्ति क े विवति*क व्यविXत्व को मान्य ा दी। यह ऐति हासिसक परिरस्जिस्र्थीति यों, मौSूदा का+ू+ में अं र और सुविव*ा क े विवचार से आवश्यक का+ू+ी +वाचार र्थीा। यह एक वस् ु को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े का अति रिरX लाभ र्थीा Sो विक हिंहदू *म: क े भी र लंबे समय से व्यविXत्व क े अ*ी+ रहा र्थीा। इस प्रकार प्रदत्त विवति*क व्यविXत्व की सर्टीक आक ृ ति व:मा+ मामले क े खिलए प्रासंविगक है, सिSस पर यह वि+र्ण:य अब ध्या+ आकर्मिष कर ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

109. हिंहदू मूर्ति को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े में अदाल ों +े रोम+ का+ू+ में थ्यात्मक समा+ ा क े रूप में देखकर प्रेरर्णा प्राप्त की। न्यायमूर्ति बी क े मुखS- +े स्जिस्र्थीति को संक्षेप में प्रस् ु विकया: "...पांचवी श ाब्दी क े बाद से- व्यविXयों द्वारा सृसिS प्रति ष्ठा+ को सही विवति*क अर्थी: में प्रति ष्ठा+ क े रूप में मान्य ा प्रदा+ की गई, हिंक ु यविद वे विपआ कॉSा का रूप ले े हैं, अर्थीा: ् यविद वे क े वल 'पू: उद्देश्य' क े खिलए समर्मिप र्थीे, संक्षेप में, यविद वे पू: संस्र्थीाएं हों। Sब कभी कोई व्यविX संपखित्त चाहे Sीव+काल में उपहार क े माध्यम से या वसीय द्वारा - गरीबों या बीमार, या क ै विदयों या अ+ार्थीों, या वृद्ध लोगों क े पक्ष में समर्मिप कर ा है ो उस+े वास् व में का+ू+ी अति*कारों का एक +या विवषय ब+ाया-गरीब घर, अस्प ाल और इसक े आगे और समर्मिप संपखित्त +ए विवषय की एकमात्र संपखित्त ब+ गई- यह +ए विवति*क व्यविX की संपखित्त ब+ गई सिSसे संस्र्थीापक अस्जिस् त्व में लाया र्थीा।..... 1...एक वि+Sी व्यविX पहले से ही अस्जिस् त्व में एक वि+गम को विवरास या उपहार क े माध्यम से संपखित्त दे सक ा है और हो सक ा है, उसी समय, उस विवशेष उद्देश्य को वि+*ा:रिर करे सिSसक े खिलए संपखित्त को वि+योसिS विकया Sा+ा र्थीा, उदाहरर्ण क े खिलए, गरीबों को भोS+ करा+ा, या बीमार या व्यणिर्थी को राह दे+ा। प्राप्तक ा: वि+गम एक र्ट्रस्र्टी की स्जिस्र्थीति में होगा और विवशेष उद्देश्य क े खिलए *+ खच: कर+े क े खिलए का+ू+ी रूप से बाध्य होगा। दूसरा विवकल्प स्वयं दा ा क े खिलए एक प्रति ष्ठा+ या संस्र्थीा+ ब+ा+ा र्थीा। यह एक +या विवति*क व्यविX होगा, Sो अप+े मूल पर वि+भ:र, विकसी और पर +हीं बस्जिल्क संस्र्थीापक की इच्छा पर वि+भ:र कर ा है, बश † विक यह एक *मा:र्थी: उद्देश्य क े खिलए वि+द†णिश र्थीा। प्रति ष्ठा+ समर्मिप संपखित्त का माखिलक होगा, और प्रशासक प्रति ष्ठा+ क े उद्देश्य को पूरा कर+े क े खिलए बाध्य न्यासी होंगे।"58 (प्रभाव वर्ति* ) 58 बी. क े मुखS-, द विहन्दू लॉ ऑफ रिरलीसिSयस ए°ड़ चैरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट, 5 वाँ संस्करर्ण, ईस्र्ट+: लॉ हाउस (1983) पृष्ठ 9 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रोम+ का+ू+ में, Sहां संपखित्त एक विवशेष *ार्मिमक या पू: उद्देश्य क े खिलए समर्मिप र्थीी और एक अणिभज्ञा आदा ा को +हीं र्थीी, ो *ार्मिमक/पू: उद्देश्य को स्वयं एक वै* प्रति ष्ठा+ की प्रास्जिस्र्थीति क बढ़ाया गया र्थीा। प्रति ष्ठा+ एक अलग का+ू+ी इकाई र्थीी और समर्मिप संपखित्त का माखिलक र्थीा। विहन्दू विवति* *ार्मिमक और *मा:र्थी: उद्देश्यों क े बीच अं र +हीं कर ी है। हालांविक, हिंहदू *म:दाय क े मामले में एक स्पष्ट सदृश मौSूद है।

110. म+ोहर गर्णेश ांबेकर में, बॉम्बे उच्च न्यायालय की ख°ड़ पीठ +े उस क: और उस प्रविक्रया क े खिलए औतिचत्य वि+*ा:रिर विकया, सिSसक े द्वारा हिंहदू मूर्ति को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। न्यायमूर्ति वेस्र्ट +े संप्रेतिक्ष विकया: "हिंहदू विवति*, रोम+ का+ू+ और उससे व्युत्पन्न की रह, + क े वल वि+गविम वि+कायों को अप+े व्यविXग सदस्यों क े अलावा वि+गम में वि+विह संपखित्त क े अति*कारों क े सार्थी, बस्जिल्क विवति*क व्यविXयों को या प्रति ष्ठा+ +ामक विवषयों को भी मान्य ा दे ा है। एक हिंहदू, Sो एक *ार्मिमक या *मा:र्थी: संस्र्थीा+ स्र्थीाविप कर+ा चाह ा है, अप+े का+ू+ क े अ+ुसार, अप+ा उद्देश्य व्यX कर सक ा है और इसे *म:स्व दे सक ा है, और शासक उपहार को प्रभाव देगा... इस उद्देश्य क े खिलए एक न्यास की आवश्यक ा +हीं है: ऐसे मामले में एक न्यास की आवश्यक ा वास् व में एक विवशेष ा और अं£ेSी का+ू+ की एक आ*ुवि+क विवशेष ा है। शुरुआ ी समय में एक उपहार, Sैसा विक यह व्यX विकया गया र्थीा, "ईश्वर की वेदी पर इस प्रकार समर्मिप भूविम की चच: को Sा+कारी दे+ा पया:प्त है।... इस रह की व्यावहारिरक वास् विवक ा का+ू+ क े क्षेत्र क ही सीविम +हीं है; यह व्यापारिरयों द्वारा अप+े खा ों में भी उपयोग की Sा ी है, और एक संस्र्थीा क े खिलए एक आदश: क ें ˆ प्रस् ु करक े विकया Sा ा है सिSसे आवश्यक मा+व विवशेष ाएँ प्रदा+ की Sा ी है।... लेविक+ यविद विवति*क व्यविX है, ो प्रति ष्ठा+ क े क े न्ˆ क े रूप में एक पविवत्र या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परोपकारी विवचार क े आदश: मूर्ति मा+ क े रूप में इ+ अति*कारों का क ृ वित्रम क ा:, गह+े और *+ क े चढ़ावे को ले+े क े खिलए वैसे ही सक्षम है Sैसे विक भूविम का। वे Sो दूसरे प्रकार की संपखित्त की रह ही विकसी का भौति क कब्Sा ले े हैं, ए द्वारा प्रति ष्ठा+ क े उद्देश्यों क े खिलए इसक े उतिच अ+ुप्रयोग की सिSम्मेदारी ले े हैं।... विवति* Sो बाहरी हिंहसा क े खिखलाफ प्रति ष्ठा+ की रक्षा कर ी है, इसे आं रिरक रूप से क ु प्रबन्*+ क े खिखलाफ भी बचा ी है, और संस्र्थीा क े क ें ˆीय सिसद्धां क े अ+ुरूप, इसक े बढ़े हुए *+ का उपयोग कर ी है। यह क े वल समुदाय क े सामान्य विह में इस वि+यंत्रर्ण क े अ*ी+ है विक का+ू+ क े अदाल ों क े माध्यम से राज्य मात्र एक क ृ वित्रम व्यविX को मान्य ा दे े हैं। यह वि+ष्ठावा+ क े रूप में संपखित्त और अति*कारों की रक्षा कर ा है, और इस प्रकार, बोल+े क े खिलए, यह क े वल अ+ुप्रयोग को अलग कर+े की श: पर एक विवशेष अ+ुमति प्राप्त उद्देश्य से संबंति* है, Sब या ो उद्देश्य अव्यावहारिरक, बेकार या ख र+ाक हो गया है, या *+ की एक असा*ारर्ण मात्रा में वृतिद्ध हुई है।" (प्रभाव वर्ति* )

111. म+ोहर गर्णेश ाम्बेकर का वि+र्ण:य ब ा ा है विक *ार्मिमक या *मा:र्थी: उद्देश्य की अणिभव्यविX और इसे काया:स्जिन्व कर+े क े खिलए एक *म:दाय का वि+मा:र्ण पया:प्त र्थीा। आंग्ल विवति* की रह एक न्यास का वि+मा:र्ण आवश्यक +हीं र्थीा। एक *म:दाय क े वि+मा:र्ण क े परिरर्णामस्वरूप एक क ृ वित्रम विवति*क व्यविX का वि+मा:र्ण हुआ। क ृ वित्रम या विवति*क व्यविX इसक े वि+मा:र्ण में अं र्मि+विह एक पविवत्र या परोपकारी उद्देश्य का प्रति वि+ति*त्व या प्र ीक है। *म:दाय ब+ा+े वाले व्यविX क े पविवत्र उद्देश्य को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। Sहां *म:दाय एक मूर्ति क े खिलए विकया Sा ा है, मूर्ति विवति*क व्यविX क े भौति क प्रति वि+ति*त्व का वि+मा:र्ण कर ी है। यह विवति*क व्यविX (या+ी मूर्ति द्वारा प्रति वि+ति*त्व विकया गया पविवत्र उद्देश्य) का+ू+ में चल और अचल संपखित्त क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA चढ़ावे को स्वीकार कर सक ा है Sो इसमें वि+विह होगा। मूर्ति का विवति*क व्यविXत्व और *म:दाय संपखित्त पर मूर्ति क े अति*कार र्थीा भXों क े चढ़ावे, मूर्ति क े विद+-प्रति विद+ क े प्रबं*+ क े खिलए सौंपे गये मा+व अणिभकरर्णों क े द्वारा क ु प्रबं*+ क े खिखलाफ *म:दाय की रक्षा क े खिलए का+ू+ द्वारा संरतिक्ष हैं।

112. म+ोहर गर्णेश ांबेकर क े फ ै सले क े ुरं बाद, मˆास उच्च न्यायालय को एक मठ क े प्रमुख की वि+युविX से संबंति* विववाद का फ ै सला कर+े क े खिलए बुलाया गया र्थीा। विवद्यापूर्णा: ीर्थी: स्वामी ब+ाम विवद्यावि+ति* ीर्थी: स्वामी59 में, एक खंर्डपीठ +े मूर्ति यों, मंविदरों और मठों क े का+ू+ी चरिरत्र की कु छ विवस् ार से Sांच की। न्यायमूर्ति बी अयंगर इस संप्रेक्षर्ण पर पहुँचे: "Sैसा विक पहले ही कहा गया है, उपासक क े वल आध्यास्जित्मक अर्थीÂ में लाभार्थी- हैं, और *म:दाय स्वयं मुख्य रूप से आध्यास्जित्मक उद्देश्यों क े खिलए अणिभप्रे है, अप्रत्यक्ष रूप से और संयोग से अति*क संख्या में लोग काया:लय-*ारकों, +ौकरों या दा+ की वस् ुओं क े रूप में वहाँ से साम£ी या आर्भिर्थीक लाभ प्राप्त कर े हैं... इस सवाल का सुझाव या विवचार +हीं विकया गया है, क्या वह समुदाय स्वयं सिSसक े आध्यास्जित्मक लाभ क े खिलए संस्र्थीा+ की स्र्थीाप+ा की गई र्थीी और *म:दाय को विवति*क व्यविX का वि+मा:र्ण कर+े वाली वि+गविम वि+काय क े रूप में उतिच रूप से +हीं मा+ा Sा सक ा है सिSसमें संस्र्थीा की संपखित्त वि+विह हैं और Sो वि+गविम वि+काय का वि+मा:र्ण कर+े वाले एक या अति*क प्राक ृ ति क व्यविXयों क े माध्यम से काय: कर ी है, ये उत्तरव - *मा:क ा: या पंचाय और सी. (C.), संस्र्थीा क े न्यासों क े वि+ष्पाद+ का प्रभार रख े हैं और *म:दायों क े अं रर्ण का सीविम अति*कार रख े हैं, Sैसा विक ऊपर उद्धृ वादों में परिरभाविष विकया गया है। हालांविक व्यविXयों का परिरव:+ीय और अवि+तिश्च वि+काय ए पै°र्ड्रे इ+ एखिलयो+ो सो+ो में लाभ का दावा +हीं कर सक े हैं, + ही विकसी भी प्रकार की वास् विवक संपखित्त का अ+ुदा+गृही ा हो सक ा है। (गुर्डमै+ ब+ाम मेयर ऑफ साल ेस, देखें)। विफर भी ऐसे समुदाय को *ार्मिमक अति*ष्ठा+ और *म:दाय क े संबं* में एक वि+गम या विवति*क व्यविX क े रूप में मा++े क े खिलए उच्च प्राति*कार हो ा है। 59 आईएलआर (1904) 27 मˆास 435 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA... सभी व्यावहारिरक उद्देश्यों क े खिलए हालांविक यह सारही+ है विक क्या पीठासी+ मूर्ति या उपासकों क े समुदाय को वि+गम या विवति*क व्यविX क े रूप में मा+ा Sा ा है सिSसमें सम्पखित्त वि+विह हो ी हैं, हालांविक एक न्यातियक दृविष्टकोर्ण से राय का अं र हो सक ा है विक कौ+ सिसद्धां अति*क वैज्ञावि+क है। विवति*शास्त्र पर हाल क े एक लेखक (सामंर्ड की 'ज्यूरिरसप्रूर्डेन्स' (1902), 346) क े शब्दों में, "काया का विवकल्प सिSसमें का+ू+ एक क ृ वित्रम व्यविXत्व को Sीव+ प्रदा+ करेगा, वह त्व क े बSाय रूप का विवषय है, का+ू+ी सिसद्धां क े बSाय स्पष्ट और सारगर्भिभ अणिभव्यविX का विवषय है,"...." (प्रभाव वर्ति* ) अदाल ों द्वारा विवति*क व्यविXत्व का विदया Sा+ा का+ू+ में मौSूदा कविमयों को दूर कर+ा और सामासिSक रूप से सं ोषS+क और विवति*सम्म परिरर्णामों को सुवि+तिश्च कर+ा है। न्यायमूर्ति अायंगर का मा++ा है विक मूर्ति को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ करक े संरतिक्ष विकए Sा+े क े खिलए एक प्रमुख सामासिSक विह, भXों क े विह ों का संरक्षर्ण र्थीा। न्यायमूर्ति अयंगर +ोर्ट कर े हैं विक सामूविहक रूप में भXों को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ करक े भी इस रह की सुरक्षा प्राप्त की Sा सक ी है। हालांविक, मूर्ति क े व्यापक व्यविXकरर्ण को देख े हुए, वह मा+ े हैं विक विवति*क व्यविXत्व को व्यावहारिरक ा और सुविव*ा क े विवचार पर मूर्ति में वि+विह हो+ा चाविहए।

113. भूपति +ार्थी स्मृति ीर्थी: ब+ाम राम लाल मैत्र 60 में, कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच न्याया*ीशों की न्यायपीठ का गठ+ इस प्रश्न का उत्तर दे+े क े खिलए विकया गया र्थीा विक क्या देवी काली की मूर्ति की स्र्थीाप+ा क े खिलए एक वसीय क ा: द्वारा न्यासिसयों को वसीय और वसीय क ा: की मृत्यु क े बाद मूर्ति की पूSा विहन्दू विवति* क े सिसद्धां क े कारर्ण अविवति*मान्य र्थीीं सिSसमें यह 60 आईएलआर (1909-1910) 37 कलकत्ता 128 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कहा गया र्थीा विक उपहार क े वल चै न्य प्रार्णी को विदए Sा सक े हैं। इस मामले में वसीय क ा: +े क ु छ संपखित्तयों को एक मूर्ति को समर्मिप विकया र्थीा। Sबविक 1890 में वसीय क ा: की मृत्यु हो गई, 1894 क मूर्ति को प्रति विष्ठ +हीं विकया गया र्थीा। यह प्रश्न उठा विक क्या वसीय क ा: की मृत्यु क े समय मूर्ति क े अस्जिस् त्व में + हो+े +े, समर्मिप सम्पखित्त की वसीय क े प्राव*ा+ों को अमान्य कर विदया र्थीा। एक विवद्व ापूर्ण: म में यह *ारिर कर े हुए विक इस रह की वसीय वै* र्थीी, मुख्य न्याया*ीश लॉरेंस Sे+हिंकस +े अव*ारिर विकया: "...लेविक+ वसीय क ा: +े अप+ी सभी संपखित्त को उसक े द्वारा +ाविम व्यविXयों क े हार्थीों में रख+े का वि+द†श विदया और कु छ भुग ा+ों क े अ*ी+ इ+ व्यविXयों को अति*शेष आय खच: कर+े क े खिलए वि+द†णिश विकया गया र्थीा Sो विक अप+ी माँ क े +ाम पर काली की छविव स्र्थीाविप कर+े क े बाद काली की पूSा और णिशबा में छोड़ दी Sा सक ी है। अब यह स्पष्ट रूप से *ार्मिमक उद्देश्यों क े खिलए एक प्रवृखित्त र्थीी और इस रह की प्रवृखित्तयों का हिंहदू विवति* द्वारा पक्ष खिलया Sा ा है।...इंग्लैंर्ड में यह मा+ा गया है विक "माखिलक और ईश्वर की सेवा में वि+योसिS विकए Sा+े वाले" या "ईश्वर की उपास+ा क े खिलए" उपहार सही हैं। विफर क्या यह उस प्रवृखित्त को अमान्य कर दे ा है विक "मेरी मां क े +ाम पर काली की छविव स्र्थीाविप कर+े क े बाद" णिशबा और काली की पूSा पर अति*शेष आय को खच: कर+े क े खिलए विववेक है। मुझे +हीं लग ा: पविवत्र उद्देश्य अभी भी विवरास है, छविव की स्र्थीाप+ा क े वल वह ढंग है सिSसमें पविवत्र उद्देश्य को प्रभाविव विकया Sा+ा है।" (प्रभाव वर्ति* ) न्यायमूर्ति स्र्टीफ+ +े अप+े अलग म में कहा: "लेविक+ यद्यविप एक देव ा क े प्रति समप:र्ण एक उपहार को गविठ +हीं कर ा है, लेविक+ इसका का+ू+ी प्रभाव है। दा ा का इरादा यह है विक उपहार की विवषय-वस् ु का उपयोग पूSा द्वारा देव ा को सम्मा+ दे+े क े खिलए और उपासकों र्थीा देव ा क े मंवित्रयों पर लाभ प्रदा+ कर+े क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sाएगा, Sो इसे संचाखिल कर े हैं। यह पूSा ठीक प्रकार से की Sा ी है और मैं समझ ा हूं विक यह विकसी छविव या बाहरी भौति क पदार्थी: का सहारा लेकर की Sा ी है, लेविक+ यह छविव ब क क ु छ +हीं है Sब क विक देव ा द्वारा प्रेरर्णा प्राप्त + हो। यह देख+ा संप्रभु का क:व्य है विक समप:र्ण क े उद्देश्य पूरे विकए Sाएं। (प्रभाव वर्ति* ) यह मा+ े हुए विक वसीय क ा: की मृत्यु क े समय मूर्ति की गैर -मौSूदगी माय+े +हीं रख ी र्थीी, मुख्य न्याया*ीश Sेस्जिन्कन्स की राय स्पष्ट रूप से प्रदर्भिश कर ी है विक *म:दाय संपखित्त स्वंय उद्देश्य में वि+विह है। Sैसा विक वह +ोर्ट कर े है, "पविवत्र उद्देश्य अभी भी वसीय प्राप्तक ा: है।" यह इस उद्देश्य पर है विक विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। एक न्यातियक व्यविX क े रूप में पविवत्र उद्देश्य को मान्य ा दे+े में राज्य इसे प्रभाव दे ा है और *म:दाय का संरक्षर्ण कर ा है। मूर्ति वसीय क ा: क े उपहार का ास्जित्वक मू: रूप है। उपहार देव ा की वि+रं र पूSा सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए है, मूर्ति वसीय क ा: क े पविवत्र उद्देश्य की एक शारीरिरक अणिभव्यविX है। Sहां अदाल ें मूर्ति क े विवति*क व्यविXत्व को मान्य ा दे ी हैं, वे वास् व में वसीय क ा: की इच्छा को मान्य ा दे े हैं और उ+का संरक्षर्ण कर े हैं विक देव ा की पूSा की Sाए।

114. ऊपर उसिल्लखिख वि+र्ण:यों द्वारा अप+ायी गयी समझ को मुख्य न्याया*ीश बी क े मुखS- +े वि+म्+खिलखिख शब्दों में संक्षेप में प्रस् ु विकया है: "1.48 क.- संस्र्थीाओं क े व्यविXत्व क े खिलए सिसद्धां -- +ैसर्मिगक व्यविXयों और वि+गमों क े अति रिरX, सिSन्हें अं£ेSी विवति* द्वारा मान्य ा प्राप्त है, विहन्दू विवति* क े अ*ी+ स्जिस्र्थीति यह है विक यविद न्यास की खिलख क े विब+ा *ार्मिमक या पू: संस्र्थीा क े खिलए कोई *म:दाय की Sा ी है और *म:दाय का उद्देश्य वह है सिSसे पविवत्र समझा Sा ा है, Sो विहन्दू विवति* की स्वीक ृ *ारर्णाओं क े अ*ी+ *ार्मिमक या पू: है, ो संस्र्थीा को संपखित्त *ारर्ण कर+े में समर्थी: विवति*क व्यविX मा+ा Sाएगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA …

1.48 ख. मूर्ति याँ- मूर्ति यों की स्जिस्र्थीति विवशेष प्रक ृ ति की है। हिंहदू देवोत्तर में, ऐसा लग ा है, स्जिस्र्थीति र्थीोड़ी अलग है, और पूरा *म:दाय +हीं बस्जिल्क मूर्ति Sो एक पविवत्र या परोपकारी विवचार क े एक मूर्ति मा+ क े रूप में है, प्रति ष्ठा+ क े क ें ˆ का गठ+ कर ा है और विवति*क व्यविX क े रूप में देखी Sा ी है सिSसमें देवोत्तर संपखित्त वि+विह है। आखिखरकार, विवति*क व्यविXत्व मात्र का+ू+ का वि+मा:र्ण है और इसकी उत्पखित्त न्यातियक संबं*ों क े क ें ˆ क े रूप में प्रदा+ करक े न्याय कर+े की इच्छा में है। Sैसा विक सामंर्ड कह े हैं: "यह उ +े प्रकार का हो सक ा है सिS +ा का+ू+ उतिच समझे," और काया का विवकल्प सिSसमें का+ू+ काल्पवि+क व्यविXत्व को Sीव+ प्रदा+ करेगा, वह सार की बSाय रूप का विवषय है।61 (प्रभाव वर्ति* )

115. विहन्दू विकसी *ार्मिमक प्रयोS+ क े खिलए *म:दाय ब+ा सक ा है। *म:दाय संपखित्तयों क े संरक्षर्ण और यह सुवि+तिश्च कर+े में एक साव:Sवि+क विह है विक समप:र्ण का मूल पविवत्र उद्देश्य पूरा हो। का+ू+ इस पविवत्र उद्देश्य पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर ा है। हालाँविक, Sैसा विक मुख्य न्याया*ीश बी क े मुखS- +ोर्ट कर े हैं, विवति*क व्यविX की ास्जित्वक अणिभव्यविX मूर्ति है सिSसे उस क ें ˆ क े रूप में देखा Sा ा है सिSसमें संपखित्त वि+विह है। एक पविवत्र या परोपकारी उद्देश्य क े मूर्ति मा+ क े रूप में मूर्ति को का+ू+ द्वारा एक न्यातियक इकाई क े रूप में मान्य ा दी Sा ी है। इसखिलए राज्य उस संपखित्त की रक्षा करेगा Sो मूर्ति में वि+विह है, चाहे एक विवणिशष्ट या व्यX न्यास की स्र्थीाप+ा + भी हो। एक पविवत्र उद्देश्य या 'परोपकारी विवचार' को एक विवति*क व्यविX की प्रास्जिस्र्थीति क बढ़ाया Sा ा है और मूर्ति पविवत्र उद्देश्य की भौति क अणिभव्यविX का वि+मा:र्ण कर ी है सिSसक े माध्यम से का+ू+ी संबं* प्रभाविव हो े हैं। समप:र्ण 61 बी. क े. मुखS-, द विहन्दू लॉ ऑफ रिरखिलसिSयस एन्र्ड चैरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट, 5 वां संस्करर्ण ईस्र्ट+: लॉ हाउस (1983) पृष्ठ 36 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का क े न्ˆ विबन्दु पविवत्र उद्देश्य है Sो मूर्ति को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े का आ*ार है और Sो अति*कारों और क:व्यों का विवषय है। विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े की आवश्यक ा का+ू+ी वि+तिश्च ा की आवश्यक ा से उत्पन्न हो ी है विक कौ+ समर्मिप संपखित्त का माखिलक है, सार्थी ही सार्थी समप:र्णक ा: क े मूल आशय और भXों क े भविवष्य क े विह ों की संरक्षर्ण क े खिलए आवश्यक है। अदाल ों क े खिलए क ु छ स्जिस्र्थीति यों में भXों क े समुदाय को व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा भी उपलब्* र्थीा, लेविक+ मूर्ति को का+ू+ी संबं*ों क े खिलए एक क ें ˆ क े रूप में चु+ा Sा ा है क्योंविक यह पविवत्र उद्देश्य की शारीरिरक अणिभव्यविX है।

116. मोह प बहादुर ब+ाम काली पाड़ा चर्टS-62 में कलकत्ता उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य में इसका कारर्ण रेखांविक है। सुदूर अ ी में, बद:वा+ क े महाराSा +े एक मूर्ति ('वित्रलोक े श्वर णिशव') की पूSा क े खिलए क ु छ भूविम समर्मिप की और प्रति वादी क े पूवा:ति*कारी को सेवाय क े रूप में पूSा क े प्रबं*+ का काय: सौंपा। समप:र्ण क े बाद पास की एक +दी की बाढ़ से मूर्ति बह गयी। बाद में महाराSा +े उसी गांव में एक +ई मूर्ति का वि+मा:र्ण विकया। हालांविक, प्रत्यर्भिर्थीओं +े इस आ*ार पर +ई मूर्ति की Sगह पर पूSा कर+े से इ+कार कर विदया विक मूल मूर्ति बह गयी र्थीी। अपीलार्थी- +े +वी+ वि+र्मिम मूर्ति स्र्थील पर आवश्यक *ार्मिमक अ+ुष्ठा+ कर+े क े खिलए प्रत्यर्भिर्थीओं को बाध्य कर+े क े खिलए एक वि+देश की मांग की। मुख्य न्याया*ीश Sेहिंकस और न्यायमूर्ति मुखS- की पीठ +े अव*ारिर विकया: "4..... यह स्पष्ट है विक संपखित्त को महाराS द्वारा प्रति वादी क े पूवा:ति*कारी क े खिलए ब+ाया गया होगा ाविक आय को वित्रलोक े श्वर णिशव [की] छविव की पूSा क े खिलए लगाया Sा सक े । सवाल यह उठ ा है विक 62 ए.आई.आर. 1914 कलकत्ता 200 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क्या यह न्यास ब समाप्त हो गया Sब मंविदर बह गया और प्रति मा र्टूर्ट गई... 5.... क्या *म:दाय को लागू कर+े क े खिलए प्रति वादी का क: समाप्त हो Sाएगा, यविद, Sैसा विक इस मामले में हुआ है, सिSस भूविम पर मंविदर र्थीा वो +दी द्वारा बहा विदया गया र्थीा। यह दृविष्टकोंर्ण विहन्दू विवति* क े विकसी सिसद्धां या विकसी उद्धरर्ण द्वारा समर्भिर्थी +हीं है सिSसे हमारे ध्या+ में लाया गया है।

6. दूसरी ओर, भूपति +ार्थी स्मृति ति र्थी ब+ाम रामलाल मैत्रा क े मामले में इस अदाल की पूर्ण: पीठ द्वारा मान्य ा प्राप्त सिसद्धां का स्पष्ट रूप से विवरो* विकया गया है। यविद ब *म:दाय +ष्ट +हीं हुई Sब सिSस भूविम पर मंविदर र्थीा, बह गया और प्रति मा र्टूर्ट गई र्थीी, ो ब से पक्षकारों की स्जिस्र्थीति को बदल+े क े खिलए क्या हुआ है? प्रति वादी उसी स्जिस्र्थीति में है Sैसे वह सेवा काय:काल में हो। भूविम उन्हें वि+तिश्च उद्देश्य क े खिलए दी गई र्थीी, अर्थीा: ्, वह महाराSा द्वारा स्र्थीाविप प्रति मा की सेवा क े उद्देश्य से आय को लगा सक ा है...।" (प्रभाव वर्ति* ) मूर्ति उस पविवत्र उद्देश्य की अणिभव्यविX या मूर्ति मा+ का गठ+ कर ी है सिSस पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है। मूर्ति क े विव+ाश क े परिरर्णामस्वरूप पविवत्र उद्देश्य और फल ः *म:दाय की समाविप्त +हीं हो ी है। यहां क विक Sहां मूर्ति +ष्ट हो Sा ी है या मूर्ति की उपस्जिस्र्थीति स्वयं अवि+यविम अं राल पर या पूरी रह से अ+ुपस्जिस्र्थी हो ी है, ो *म:दाय द्वारा वि+र्मिम विवति*क व्यविXत्व Sारी रह ा है। हमारे देश में, *ार्मिमक आचरर्ण क े रूप में मूर्ति यों को वि+यविम रूप से Sल में विवसर्जिS विकया Sा ा है। यह +हीं कहा Sा सक ा है विक इस रह विवसS:+ से पविवत्र उद्देश्य भी समाप्त हो गया है। मूर्ति की स्र्थीाप+ा वह रीका है सिSसमें पविवत्र उद्देश्य पूरा हो Sा ा है। मूर्ति को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा, वास् व में, स्वयं पविवत्र उद्देश्य की मान्य ा है + विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वह रीका सिSसक े माध्यम से उस पविवत्र उद्देश्य को आम ौर पर व्यविX ब+ाया Sा ा है। पविवत्र उद्देश्य वहाँ भी पूरा विकया Sा सक ा है Sहां मूर्ति की उपस्जिस्र्थीति अवि+यविम है या समप:र्ण क े विवलेख क े आ*ार पर विवद्यमा+ मस्जिन्दर में मूर्ति अ+ुपस्जिस्र्थी है। ऐसे सभी मामलों में विवति*क व्यविXत्व को सिSस पविवत्र उद्देश्य से प्रदा+ विकया Sा ा है, वह वि+वा:ह कर+ा Sारी रख ा है।

117. स्व ंत्र ा क े पश्चा ् *म:दायों की विहन्दू विवति* पर लागू सिसद्धां ों की देवकी +ंद+ ब+ाम मुरली*र63 में इस न्यायालय की चार न्याया*ीशों की पीठ द्वारा पुविष्ट की गई र्थीी। 1919 में एक हिंहदू वसीय क ा: +े श्री रा*ाक ृ ष्र्णSी (या 'ठाक ु र') की मूर्ति को अप+ी भूविम वसीय की। ठाकु र क े प्रबं*+ पर वसीय क ा: क े प्रत्यक्ष वंशS और उसक े दूर क े गोत्रS क े बीच विववाद उत्पन्न हुआ। यह क: विदया गया विक ठाकु र का क ु प्रबं*+ विकया Sा रहा र्थीा और S+ ा को पूSा से वंतिच विकया गया र्थीा। यह उद्घोषर्णा मांगी गयी विक ठाक ु रद्वारा एक साव:Sवि+क मंविदर र्थीा। इस न्यायालय क े समक्ष यह मुद्दा र्थीा विक वसीय क ा: की वसीय में समप:र्ण क े दायरे का वि+मा:र्ण क ै से विकया Sाए। इस न्यायालय की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति वेंकर्टरामा अय्यर +े अव*ारिर विकया: "6.... मूर्ति को सम्पखित्त क े दा+ का वास् विवक उद्देश्य ईश्वर को कोई लाभ प्रदा+ कर+ा +हीं है, बस्जिल्क उ+ लोगों को सुविव*ा और अवसर प्रदा+ करक े आध्यास्जित्मक लाभ प्राप्त कर+ा है Sो पूSा कर+ा चाह े हैं। भूपति +ार्थी स्मृति ीर्थी: ब+ाम राम लाल मैत्रा में इ+का और अन्य उद्धरर्ण को देख+े पर यह अव*ारिर विकया गया र्थीा विक 'चै न्य व्यविX' क े हस् ांरर्ण पर लागू वि+यमों द्वारा एक मूर्ति को विदया गए उपहार को न्यायवि+र्ण- +हीं विकया Sा+ा र्थीा, और यह विक एक मूर्ति को सम्पखित्त का समप:र्ण उ+ पर से अप+े प्रभुत्व क े स्वाविमत्व को छोड़+े में शाविमल र्थीा, 63 1956 एससीआर 756 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sो उ+क े उद्देश्यों क े खिलए विववि+योसिS विकए Sा+े क े उद्देश्य से र्थीे। इस प्रकार, सर लॉरेंस Sे+हिंकस सी.Sे. द्वारा पृष्ठ 138 पर यह संप्रेतिक्ष विकया गया र्थीा विक "पविवत्र उद्देश्य अभी भी वसीय दार है, छविव की स्र्थीाप+ा क े वल वह रीका है सिSसमें पविवत्र उद्देश्य को प्रभाविव विकया Sा+ा है" और यह विक "एक देव ा क े प्रति समप:र्ण उस पविवत्र उद्देश्य की एक सारगर्भिभ अणिभव्यविX हो सक ी है सिSसक े खिलए समप:र्ण विकया गया है।"

7. Sब एक बार यह समझा Sा ा है विक *ार्मिमक *म:दाय क े सच्चे लाभार्थी- मूर्ति याँ +हीं हैं, बस्जिल्क उपासक हैं, और यह विक *म:दाय का उद्देश्य उपासकों क े लाभ क े खिलए उस पूSा का रखरखाव है, ो यह प्रश्न विक क्या एक *म:दाय वि+Sी या साव:Sवि+क है, कोई समस्या प्रस् ु +हीं कर ा। यह मूल हिंबदु वि+र्ण- विकया Sा+ा है विक क्या यह संस्र्थीापक का आशय र्थीा विक वि+र्मिदष्ट व्यविXयों को मंविदर में पूSा का अति*कार है, या आम S+ ा को है या उसक े विकसी वि+र्मिदष्ट विहस्से में है। (प्रभाव वर्ति* ) *म:दाय ब+ा+े से, दा ा *म:दाय संपखित्त क े सभी दावों को छोड़ दे ा है। संपखित्त अब *म:दाय क े मूल में स्जिस्र्थी पविवत्र उद्देश्य में वि+विह है सिSसे विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा प्राप्त है। मूर्ति पविवत्र उद्देश्य की भौति क अणिभव्यविX और विवति*क संबं*ों क े परिरर्णामी क ें ˆ का वि+मा:र्ण कर ी है। *म:दाय क े लाभार्थी- उपासक हैं और मूर्ति क े खिलए पूSा का उतिच रखरखाव उपासकों को ईश्वर से संवाद कर+े क े आध्यास्जित्मक लाभ को प्राप्त कर+े में सक्षम ब+ा+ा है।

118. योगेंˆ +ार्थी +स्कर ब+ाम आयकर आयुX, कलकत्ता64 में, यह य कर+े में विक आयकर अति*वि+यम 1922 की *ारा 3 क े ह एक हिंहदू मूर्ति (या देव ा) "वैयविXक" की परिरभाषा में आ ी है, न्यायमूर्ति रामास्वामी +े 64 (1969) 1 एससीसी 555 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ी+ न्याया*ीशों की पीठ की ओर से बोल े हुए इस अदाल +े अव*ारिर विकया: 6.... हालांविक यह याद रख+ा चाविहए विक मूर्ति में न्यातियक व्यविX ास्जित्वक छविव +हीं है, और यह एक खस्जि°ड़ सिसद्धां है विक प्रार्ण प्रति ष्ठा अ+ुष्ठा+ द्वारा सSीव और अति*विष्ठ हो े ही छविव स्वयं एक का+ू+ी व्यविX क े रूप में विवकसिस हो ी है। यह भी सही +हीं है विक परमात्मा सिSसकी मूर्ति एक छविव या प्र ीक है, समर्मिप सम्पखित्त का प्राप्तक ा: या माखिलक है।... सही का+ू+ी स्जिस्र्थीति यह है विक दा ा क े आध्यास्जित्मक उद्देश्य का प्रति वि+ति*त्व कर+े और मू: कर+े क े रूप में मूर्ति, का+ू+ द्वारा मान्य ा प्राप्त विवति*क व्यविX है और इस विवति*क व्यविX में समर्मिप संपखित्त वि+विह है। Sैसा विक मा++ीय बी.क े. मुखS- द्वारा संप्रेतिक्ष विकया गया है: "देवोत्तर क े संबं* में... यह + क े वल एक सारगर्भिभ अणिभव्यविX है, बस्जिल्क पविवत्र उद्देश्य का ास्जित्वक मूर्ति मा+ है और हालांविक यह मा++ा विक संपखित्त स्वयं उद्देश्य या लक्ष्य में ही रह सक ी है, इसमें कविठ+ाई है। यह कह+ा विवति*शास्त्र क े मSबू सिसद्धां ों से काफी सुसंग होगा विक एक भौति क वस् ु Sो विकसी विवशेष उद्देश्य का प्रति वि+ति*त्व या प्र ीक है, उसे का+ू+ी व्यविX का दSा: विदया Sा सक ा है, और इसे समर्मिप संपखित्त का माखिलक मा+ा Sा सक ा है।".... का+ू+ी स्जिस्र्थीति रोम+ का+ू+ में विवकास क े कई मामलों में ुल+ा कर+े योग्य है।" (प्रभाव वर्ति* ) समप:र्ण क े पीछे उद्देश्य

119. सव:बन्*ी काय:वाही का मा+वीकरर्ण कर+े क े खिलए +ौसे+ा का+ू+ में एक Sलया+ क े मामले में न्यातियक व्यविXत्व की अव*ारर्णा क े समा+ सम:पर्ण क े पीछे उद्देश्य क े मूर्ति मा+ रूप में भौति क वस् ु (मूर्ति ) को विवति*क सम्बन्*ों क े विबन्दु क े रूप में चु+ा गया। का+ू+ में एक इकाई का न्यातियक वि+व:च+ द्वारा सृS+ एक महत्वपूर्ण: काय: है। क्योंविक इस+े उस स्जिस्र्थीति को दूर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sो पैदा होगी यविद एक पविवत्र उद्देश्य क े खिलए एक हिंहदू द्वारा समप:र्ण क े बावSूद, कोई का+ू+ी रूप से मान्य ा प्राप्त इकाई मौSूद +हीं र्थीी Sो समप:र्ण प्राप्त कर सक ी र्थीी। ऐसी स्जिस्र्थीति को न्यातियक रूप से मान्य ा प्राप्त सिसद्धां द्वारा दूर विकया गया Sहां एक *ार्मिमक या *मा:र्थी: संस्र्थीा+ क े खिलए *म:दाय विकया Sा ा है और उद्देश्य पविवत्र है, संस्र्थीा को एक न्यास की अ+ुपस्जिस्र्थीति में भी एक विवति*क व्यविX क े रूप में मा+ा Sाएगा। इसी रह, Sहां समप:र्ण एक मूर्ति की पूSा कर+े क े खिलए है, व:मा+ और भावी भXों का विह एक का+ू+ी ढांचे क े अभाव में Sोखिखम पर होगा, Sो विकए गए समप:र्ण क े विववि+यम+ को सुवि+तिश्च कर ा है। पविवत्र उद्देश्य पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा यह सुवि+तिश्च कर ा है विक समप:र्ण प्राप्त कर+े क े खिलए एक ऐसी इकाई मौSूद है सिSसमें संपखित्त एक आदश: अर्थी: में वि+विह होगी और सिSसक े माध्यम से भXों क े विह ों की रक्षा की Sा सक ी है। यह समप:र्ण क े उद्देश्य को पूरा कर+े और *ार्मिमक £ंर्थीों क े अ+ुसार पूSा संचाल+ क े उद्देश्य से यह सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए र्थीा विक भXों को प्रार्थी:+ा क े माध्यम से शांति का एहसास हो।

120. विवति*क व्यविXत्व की मान्य ा अदाल ों द्वारा एक *ार्मिमक या 'पविवत्र' उद्देश्यों क े खिलए संपखित्त समर्मिप कर+े की हिंहदू प्रर्थीा को का+ू+ी प्रभाव दे+े क े खिलए ैयार की गई र्थीी। संस्र्थीापक या वसीय क ा: एक पविवत्र उद्देश्य क े उपयोग क े खिलए संपखित्त समर्मिप कर+े का चय+ कर सक े हैं। उपरोX कई मामलों में, इस पविवत्र उद्देश्य +े एक मूर्ति की पूSा और वि+रं र रखरखाव का रूप खिलया। संस्र्थीापक या वसीय क ा: की इच्छा को प्रभावी कर+े में एक स्पष्ट राज्य विह र्थीा, सिSसक े पास ऐसी समर्मिप संपखित्त है, सार्थी ही यह सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए विक संपखित्त हर समय समप:र्ण क े उद्देश्य क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उपयोग की Sा ी है। एक का+ू+ी परिरकल्प+ा ब+ाई गई र्थीी सिSसक े द्वारा उस *ार्मिमक या *मा:र्थी: उद्देश्य को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया गया र्थीा सिSसक े खिलए *म:दाय विकया गया र्थीा। एक मूर्ति क े खिलए एक समप:र्ण क े मामले में, विवति*क व्यविXत्व मूर्ति में ही 'सारगर्भिभ अणिभव्यविX' पा ा है। विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ करक े, अदाल +े समर्मिप संपखित्तयों को प्राप्त कर+े क े खिलए एक इकाई ब+ाकर समप:र्ण को का+ू+ी प्रभाव विदया। यह ब ा े हुए विक ब+ाया गया क ृ वित्रम व्यविX वास् व में समर्मिप संपखित्तयों का माखिलक है, अदाल +े सेवाय ों द्वारा क ु प्रबं*+ क े खिखलाफ रक्षा की। भले ही क ृ वित्रम विवति*क व्यविX प्राक ृ ति क व्यविX की सहाय ा क े विब+ा मुकदमा +हीं कर सक ा है, एक का+ू+ी ढांचे को अस्जिस् त्व में लाया गया र्थीा सिSसक े द्वारा समर्मिप संपखित्त क े खिलए और उसक े खिखलाफ दावे विकए Sा सक े हैं।

121. यद्यविप वैचारिरक रूप से अदाल ों +े संस्र्थीापक क े इरादे को विवति*क व्यविXत्व की विवशेष ा दी, भौति क मूर्ति में का+ू+ी संबं*ों का एक सुविव*ाS+क भौति क स्र्थीा+ पाया गया। देवकी +ंद+ में इस न्यायालय क े अवलोक+ों द्वारा इस समझ को दोहराया गया है विक मूर्ति वसीय क ा: क े पविवत्र उद्देश्य की एक "सारगर्भिभ अणिभव्यविX" है। मूर्ति, एक प्रति वि+ति*त्व क े रूप में या पविवत्र उद्देश्य (अब क ृ वित्रम विवति*क व्यविX) की "सारगर्भिभ अणिभव्यविX" क े रूप में का+ू+ी संबं*ों का एक स्र्थीा+ है। यह इस समझ क े अ+ुरूप भी है विक Sहां एक मूर्ति +ष्ट हो Sा ी है, *म:दाय समाप्त +हीं हो ा है। पविवत्र उद्देश्य की भौति क अणिभव्यविX हो+े क े +ा े, यहां क विक Sहां मूर्ति बह Sा ी है, अस्र्थीायी रूप से अस्जिस् त्व में +हीं है, या प्रक ृ ति की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शविXयों द्वारा +ष्ट हो Sा ी है, एक विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा प्राप्त पविवत्र उद्देश्य अस्जिस् त्व में रह ा है।

122. सिSस सीमा क विवति*क आवश्यक ा और सुविव*ा से सिसद्धां उत्पन्न हो ा है, उसे विवद्यापूर्णा: ीर्थी: स्वामी ब+ाम विवद्यावि+ति* ीर्थी: स्वामी 65 में न्यायमूर्ति अायंगर द्वारा समझाया गया है। Sब विवद्वा+ न्याया*ीश +े उल्लेख विकया विक का+ू+ी परिरकल्प+ा द्वारा, एकल विवति*क व्यविX क े रूप में भXों क े समुदाय या समूह को मान्य ा दे+ा भी संभव र्थीा। Sैसा विक वह +ोर्ट कर े हैं, इस+े भXों क े विह और समर्मिप सम्पखित्त क े संरक्षर्ण क े खिलए एक पया:प्त विवति*क ढाँचा क े वि+मा:र्ण क े न्यायालय क े लक्ष्यों को भी पूरा विकया होगा। हालांविक अदाल +े +ोर्ट विकया विक Sैसा विक कोई "व्यावहारिरक" अं र +हीं र्थीा, सुविव*ा क े खिलए मूर्ति पर का+ू+ी परिरकल्प+ा लगायी गयी र्थीी और भXों पर +हीं। इ+ पूव: वि+र्ण:यों से संक े विमल ा है विक *ार्मिमक व्यवहार में क ै से मूर्ति क े वि+रं र व्यविXकरर्ण +े अदाल क े खिलए मूर्ति को का+ू+ी संबं*ों क े क े न्ˆ क े रूप में चु++े की +ींव रखी।

123. इसखिलए एक विवति*क या "न्यातियक" व्यविX क े रूप में हिंहदू मूर्ति की मान्य ा अदाल ों द्वारा वि+योसिS दो क्षेत्रों पर आ*ारिर है। पहला एक न्यास की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, एक आदश: अर्थी: में संपखित्त *ारर्ण कर+े में सक्षम विवति*क इकाई क े रूप में वसीय क ा: क े पविवत्र उद्देश्य को मान्य ा दे+ा है। दूसरा मूर्ति और स्वयं पविवत्र उद्देश्य का विवलय है Sो पविवत्र उद्देश्य की पूर्ति सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए पविवत्र उद्देश्य को मू: रूप दे ा है। यर्थीा मान्य, हिंहदू मूर्ति एक विवति*क व्यविX है। पविवत्र उद्देश्य क े खिलए *म:दाय संपखित्त आदश: अर्थीÂ में एक विवति*क व्यविX क े रूप में मूर्ति क े स्वाविमत्व में रखी Sा ी है। 65 आईएलआर (1904) मˆास 435 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अदाल +े इस रह की का+ू+ी कल्प+ा क्यों की, इसका कारर्ण बाहरी ख रों क े सार्थी-सार्थी आं रिरक क ु प्रशास+ से पविवत्र उद्देश्य क े खिलए समर्मिप संपखित्तयों की रक्षा क े खिलए एक आसा+ का+ू+ी ढांचा प्रदा+ कर+ा र्थीा। Sहां पविवत्र उद्देश्य +े सभी भXों क े लाभ क े खिलए एक साव:Sवि+क न्यास को आवश्यक ब+ा विदया और विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर े हुए अदाल ों को भXों क े लाभ क े खिलए पविवत्र उद्देश्य की रक्षा कर+े की अ+ुमति दी।

124. विहन्दू मूर्ति यों पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े पीछे विवति*क +वाचार क े इति हास और अं र्मि+विह आ*ार को उपवर्भिर्ण कर े हुए, हमारे समक्ष मूल प्रश्न का उल्लेख कर+ा आवश्यक हो Sा ा है। वाद 5 में वादी की ओर से विकए गए इस क: क े Sवाब पर व:मा+ मामला महत्वपूर्ण: हो Sा ा है विक प्रर्थीम और विद्व ीय वादी- भगवा+ श्री राम विवराSमा+ और अस्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम विवति*क व्यविX हैं। यविद इस क: को स्वीकार कर खिलया Sा ा है, ो इस न्यायालय को दूसरी वादी क े विवति*क व्यविX घोविष विकए Sा+े क े का+ू+ी परिरर्णामों को अति*वि+र्ण- कर+े की आवश्यक ा होगी। J.[3] प्रर्थीम वादी का विवति*क व्यविXत्व

125. भगवा+ राम क े भXों क े खिलए "भगवा+ श्री राम विवराSमा+", वाद 5 में प्रर्थीम वादी भगवा+ राम क े मूर्ति मा+ हैं और राम Sन्मभूविम क े वि+वासी देव ा का गठ+ कर े हैं। हिंहदू भXों की आस्र्थीा और विवश्वास उ+की अं रात्मा क े खिलए व्यविXग मामला है और इस न्यायालय का काम प्रर्थीम-दृष्ट या परीक्षर्ण से परे उ+क े दृढ़ विवश्वास की ाक या उ+क े विवश्वासों की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क: संग ा की Sांच कर+ा व यह प ा लगा+ा +हीं है विक क्या इस रह क े विवश्वासों को सद्भाव में *ारर्ण विकया गया है।

126. मौखिखक और दस् ावेSी साक्ष्य से प ा चल ा है विक भगवा+ राम क े हिंहदू भX उस स्र्थीा+ पर भगवा+ राम की प्रार्थी:+ा कर+े से विमले *ार्मिमक गुर्ण में एक वास् विवक, बहु समय से और गह+ विवश्वास रख े हैं, सिSसे वे उ+का Sन्म स्र्थीा+ मा+ े हैं। विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम की हिंहदू उपास+ा का एक लंबा अभ्यास विदखा+े क े खिलए वाद 5 में वादी द्वारा साक्ष्य विदया गया है। 18 वीं श ाब्दी क े प्रारम्भ में Sोसेफ र्टाइफ ें र्थीालर और उन्नीसवीं श ाब्दी क े प्रारंभ में रॉबर्ट: मोंर्टगोमरी मार्मिर्ट+ यात्रा वृ ां में विववाविद स्र्थील पर हिंहदू पूSा की प्रबल ा दS: कर े हैं। वे राम +वमी Sैसे विवशेष अवसरों का भी उल्लेख कर े हैं, सिSसक े दौरा+ हिंहदू भX भगवा+ राम की प्रार्थी:+ा कर+े की इच्छा से प्रेरिर होकर दूर क े क्षेत्रों से Sन्मस्र्थीा+ पर Sा े हैं। ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े +ीचे Sन्मस्र्थीा+ क े अस्जिस् त्व में हिंहदू भXों की वि+रं र आस्र्थीा और विवश्वास, कई वषÂ क े दौरा+ विववाविद स्र्थील Sा+े वाले वि+म विहयों की गति विवति*यों, वैयविXक भXों Sैसे विक वि+हंग सिंसह और हिंहदू भXों की अं ही+ *ारा से स्पष्ट है। यह हिंहदू *म: क े खिलए पूSा स्र्थील क े रूप में विववाविद स्र्थील की पविवत्र ा में लंबे समय से प्रचखिल विवश्वास का प्रमार्ण है। वाद 5 में प्रर्थीम वादी क े विवति*क व्यविXत्व क े वि+*ा:रर्ण क े खिलए यह स्र्थीाविप कर+ा आवश्यक +हीं है विक क्या भXों का मा++ा है विक क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे वही स्र्थीा+ भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ र्थीा या भXों की आस्र्थीा और विवश्वास स्वयं स्वत्व प्रदा+ कर सक ी है। ये प्रश्न इस वि+र्ण:य क े बाद क े भाग में संबोति* हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व:मा+ उद्देश्यों क े खिलए, यह +ोर्ट कर+ा पया:प्त है विक विववाविद स्र्थील की पविवत्र ा में हिंहदू आस्र्थीा का थ्य साक्ष्य द्वारा स्र्थीाविप विकया गया है।

127. विकसी विवति*क व्यविX को मान्य ा दे+े क े प्रयोS+ों क े खिलए, सुसंग Sांच का उद्देश्य ऐसी मान्य ा द्वारा प्राप्त विकया Sा+ा है। सिSस सीमा क ऐसा उद्देश्य प्राप्त विकया Sा ा है, उस वस् ु का रूप या काया सिSस पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है, सारवा+ विवषय +हीं है, बस्जिल्क क े वल रूप का प्रश्न है। Sैसा विक सामंड़ द्वारा संप्रेतिक्ष विकया गया है, Sब क विक विवति*क व्यविXत्व का प्रदा+ विकया Sा+ा प्रयोसिS उद्देश्य को प्राप्त कर ा है, ब क विवति*क व्यविXत्व को एक अमू: विवचार पर भी प्रदा+ विकया Sा सक ा है। हिंहदू मूर्ति यों क े मामले में, सा*ारर्ण या मूर्ति पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ +हीं विकया Sा ा है, बस्जिल्क मूर्ति में अव ार क े रूप में देव ा की वि+रं र पूSा क े अं र्मि+विह पविवत्र उद्देश्य पर प्रदा+ विकया Sा ा है। Sहां एक देव ा की वि+रं र पूSा क े उद्देश्य पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है, ो मूर्ति का हर्ट Sा+ा या +ष्ट हो+ा इसक े विवति*क व्यविXत्व को प्रभाविव +हीं कर ा है। विवति*क व्यविXत्व मूर्ति की वि+रं र पूSा क े उद्देश्य में वि+विह है Sैसा विक अदाल द्वारा मान्य ा प्राप्त है। यह वि+रं र पूSा क े संरक्षर्ण क े खिलए है विक का+ू+ इस उद्देश्य को मान्य ा दे ा है और इसे विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ करक े इसे संरतिक्ष कर+ा चाह ा है।

128. देव ा की वि+रं र पूSा क े अलावा, अदाल ों को एक अव*ारर्णात्मक ढांचा प्रदा+ कर+े क े खिलए विहन्दू मूर्ति पर का+ू+ी व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है, सिSसक े भी र रहकर व्यावहारिरक रूप से हिंहदू मूर्ति यों को *म:दाय या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उससे Sुड़ी विववाविद संपखित्त पर प्रति स्प*- दावों से Sुड़े विववादों को अति*वि+र्ण:य+ कर+ा हो ा है। विववादों को अति*वि+र्भिर्ण कर+े क े क्रम में, अदाल माखिलका+ा दावों क े वि+*ा:रर्ण कर+े क े खिलए, सेवाय ों द्वारा क ु प्रबं*+ और भXों क े विह ों की रक्षा क े खिलए विवति*क संबं*ों क े एक स्र्थीा+ का प ा लगा ा है। इस प्रकार का+ू+ एक विवणिशष्ट या व्यX न्यास की स्र्थीाप+ा की अ+ुपस्जिस्र्थीति में भी मूर्ति की संपखित्तयों की रक्षा कर ा है। हमारे समक्ष काय:वाही में, वाद 5 में प्रर्थीम वादी क े का+ू+ी अति*कार और सम्पखित्त विववाविद र्थीी। हालांविक, प्रर्थीम वादी क े विवति*क व्यविXत्व को चु+ौ ी दे+े क े खिलए कोई दलील +हीं दी गयी र्थीी। गौर लब है विक वाद 4 में वाविदयों की ओर से पेश हुए विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े प्रर्थीम वादी क े विवति*क व्यविXत्व को स्वीकार विकया। प्रर्थीम वादी क े विवति*क व्यविXत्व का प्रश्न उ+ संपखित्तयों से अलग है Sो प्रर्थीम वादी से संबंति* हैं। देव ा में वि+विह संपखित्तयों क े वि+*ा:रर्ण पर इस वि+र्ण:य क े आगे भाग में संपखित्त क े खिलए प्रति स्प*- दावों क े प्रकाश में चचा: की गई है।

129. व:मा+ मामले में, प्रर्थीम वादी कई सौ वषÂ से पूSा की वस् ु रही है और वि+रं र पूSा का अं र्मि+विह उद्देश्य ही स्पष्ट है चाहे विकसी भी व्यX समप:र्ण या न्यास का अभाव हो। मूर्ति का अस्जिस् त्व क े वल रूप या काया का प्रश्न है, और प्रर्थीम वादी का विवति*क व्यविXत्व मूर्ति क े वि+रं र अस्जिस् त्व पर वि+भ:र +हीं है। व:मा+ विववाद क े क ें ˆ में देव ा क े सही प्रबं*क और भगवा+ राम क े भXों की मूर्ति यों क पहुंच से संबंति* प्रश्न हैं। अं र्मि+विह उद्देश्य की का+ू+ी सुरक्षा सुवि+तिश्च कर+े और विववाद का व्यावहारिरक रूप से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*वि+र्ण:य+ कर+े क े खिलए, प्रर्थीम वादी क े विवति*क व्यविXत्व को मान्य ा दी Sा ी है। J.[4] दूसरे वादी का विवति*क व्यविX दलीलें

130. वाद 5 में वाविदयों की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े. परासर+ +े कहा विक दूसरा वादी एक विवति*क व्यविX है। उन्हों+े कहा विक हिंहदू विवति* में एक विवति*क व्यविX की अव*ारर्णा मूर्ति यों क सीविम +हीं है। श्री क े. परासर+ क े अ+ुसार, प्रासंविगक प्रश्न यह है विक क्या देव ा की प्रार्थी:+ा की Sा ी है, + विक वह रूप प्रासंविगक है सिSसमें देव ा प्रकर्ट हो े हैं। यह क: विदया गया विक "स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम" पूSा की एक वस् ु है और विदव्य की भाव+ा को मू: रूप प्रदा+ कर ा है। भXS+ इस भूविम को देव ा मा+ े हैं और इसकी प्रार्थी:+ा की Sा ी है। इसखिलए, इस आ*ार पर वाद 5 में वादी यह क: दे े हैं विक इस अदाल को राम Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में प्रस् ु भूविम को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा चाविहए। इस क: का समर्थी:+ कर+े क े खिलए, यह कहा गया विक भगवा+ आकारही+ और वि+राकार है और इस बा की कोई आवश्यक ा +हीं है विक पूSा की वस् ु एक मूर्ति हो। यह कहा गया विक इस आस्र्थीा और विवश्वास क े सार्थी विववाविद स्र्थीा+ क े चारों ओर परिरक्रमा कर+ा विक यह भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है, उस संपखित्त की सीमाओं को ब ा ा है सिSस पर एक न्यातियक इकाई की प्रास्जिस्र्थीति प्रदा+ की Sा+ी चाविहए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस क: का समर्थी:+ कर+े क े खिलए श्री परासर+ +े वि+म्+खिलखिख वि+र्ण:यों पर अवलम्ब+ खिलया, सिSन्हें वि+र्ण:य क े दौरा+ संदर्भिभ विकया Sाएगा: म+ोहर गर्णेश ाम्बेकर ब+ाम लखविमराम गोहिंवदराम66, भूपति +ार्थी स्मृति ति र्थी: ब+ाम राम लाल मैत्र67, रामप ब+ाम दुगा: भार ी68, राम ब्रह्म ब+ाम क े दार +ार्थी69, मदुरा, ति रुप्पर+क ुं ˆम ब+ाम अखिलखा+ साविहब70, द बोर्ड: ऑफ कविमश्नस: फॉर रिरलीसिSयस इ+र्डाउमेन्ट्स, मˆास ब+ाम विपर्डुगु +रसिसम्ह+71, र्टीआरक े रामास्वामी सेरवई ब+ाम द बोर्ड: ऑफ कविमश्नस: फॉर द विहन्दू रिरलीसिSयस इ+र्डाउमेन्ट्स, मˆास72, द पोहरी फकीर सदावर्थी- ऑफ बोन्दीपीपुत्रम ब+ाम द कविमश्नस:, विहन्दू रिरलीसिSयस ए°ड़ चेरिरर्टेबल इ+र्डाउमेन्ट्स73, वेन्कर्टरम+ मूर्ति ब+ाम श्री राम मस्जिन्*राम 74, शास्त्री यग्नपुरूशाद Sी ब+ाम मुल्दास भुदारदास वैश्य75, योगेन्ˆ +ार्थी +स्कर ब+ाम सीआईर्टी, कलकत्ता76, कमराSू वेंकर्टा क ृ ष्र्ण राव ब+ाम सब कलेक्र्टर, ऑ+गोले77, णिशरोमणिर्ण गुरूद्वारा प्रबं* कमेर्टी, अमृ सर ब+ाम सोम +ार्थी दास78 और र्थीयराम्मल ब+ाम क+काम्मल79 । 66 आईएलआर 1888 12 बॉम्बे 247 67 आईएलआर 1909 37 कलकत्ता 128 68 एआईआर 1920 अव* 258 69 (1922) 36 सीएलSे 478 70 (1931) 61 मˆास एलSे 285 71 1939 1 एमएलSे 134 72 आईएलआर 1950 मˆास 799 73 1962 सप्लीमेंर्ट 2 एससीआर 276 74 (1964) 2 एए+र्डब्ल्यूआर 457 75 (1996) 3 एससीआर 242 76 (1969) 1 एससीसी 555 77 (1969) 1 एससीआर 624 78 (2000) 4 एससीसी 146 79 (2005) 1 एससीसी 457 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

131. वाद 5 में वाविदयों की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री सी. एस. वैद्य+ार्थी+ +े श्री परासर+ क े कÂ को अप+ाया यह विक वाद 5 में विद्व ीय वादी एक विवति*क व्यविX है। उन्हों+े कहा विक इ+क े मध्य अन् र है: (i) भूविम क े एक देव ा हो+े में; (ii) भूविम क े एक देव ा का वि+वास हो+े में; और (iii) भूविम क े एक देव ा की संपखित्त हो+े में। यह कहा गया विक व:मा+ मामले में, विववाविद स्र्थील का गठ+ कर+े वाली भूविम, पूSा की एक वस् ु है और स्वयं देव ा है। श्री वैद्य+ार्थी+ +े कहा विक एक न्यातियक व्यविX क े रूप में विद्व ीय वादी का अव*ारर्ण कब्Sे, संयुX-कब्Sे या प्रति क ू ल कब्Sे क े अ+ावश्यक प्रश्नों का प्रति पाद+ कर ा है क्योंविक भूविम स्वयं एक विवति*क व्यविX है और कोई अन्य व्यविX विवति*क व्यविXत्व +हीं रख सक ा है। यह कहा गया विक यह मात्र थ्य विक विववाविद स्र्थील पर मस्जिस्Sद विवद्यमा+ है, यह सुन्नी वक्फ बोर्ड: की ओर से हक या संयुX कब्Sे क े दावे का सबू +हीं दे सक ा है। इसी क: क े विवस् ार से, एक बार यह मा+ खिलया Sा ा है विक विववाविद स्र्थील एक विवति*क व्यविX है, ो एक मान्य ा प्राप्त विवति*क व्यविX का एक देव ा क े रूप में भूविम का कोई भी विवभाS+ +हीं विकया Sा सक ा है, यह अविवभाज्य है और इसे विवभासिS +हीं विकया Sा सक ा है। संपखित्त का कोई भी विवभाS+ देव ा क े विव+ाश क े समा+ होगा। यह इस आ*ार पर है विक संपखित्त क े ी+ रीक े क े विवभाS+ का वि+द†श दे+े वाले उच्च न्यायालय क े आक्षेविप वि+र्ण:य को चु+ौ ी दी गई र्थीी। इस संबं* में प्रमर्थी +ार्थी मुखिलक ब+ाम प्रद्युम्+ कु मार मुखिलक80, ठाक ु रSी श्री गोहिंवद देवSी महाराS, Sयपुर ब+ाम राSस्व बोर्ड:, 80 (1924-25) 52 आईए 245 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA राSस्र्थीा+81, और प्रफ ु ल्ल कोरो+ रिरक्यूर्ट ब+ाम सत्य कोरो+ रिरक्यूर्ट82 क े फ ै सलों पर अवलम्ब+ रखा गया।

132. श्री वैद्य+ार्थी+ +े कहा विक विववाविद संपखित्त, एक विवति*क व्यविX हो+े से, स्वामीही+ सम्पखित्त है। चूंविक विववाविद संपखित्त एक विवति*क व्यविX है, इसखिलए यह हस् ां रर्णीय +हीं है। यह क: विदया गया र्थीा विक भूविम Sो स्वामीही+ सम्पखित्त है या व्यापार योग्य +हीं है, उसे प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा अति*£ही +हीं विकया Sा सक ा है। यह कहा गया विक भले ही मूर्ति र्टूर्ट Sाए, लेविक+ एक देव ा अ+श्वर है और इस प्रकार, उस भूविम पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण एक देव ा क े रूप में उसकी प्रक ृ ति से अलग +हीं हो ा। महं राम स्वरूप दासSी ब+ाम एसपी साही, हिंहदू *ार्मिमक न्यास क े विवशेष प्रभारी अति*कारी83, राम Sा+कीSी देवी ब+ाम विबहार राज्य84, अमरेन्ˆ प्र ाप सिंसह ब+ाम ेS बहादुर प्रSापति 85, र्थीयराम्मल ब+ाम क+काम्मल86 और राSस्र्थीा+ हाउसिंसग बोड़: ब+ाम न्यू हिंपक सिसर्टी वि+मा:र्ण सहकारी सविमति खिलविमर्टेर्ड87 क े वि+र्ण:यों पर अवलम्ब+ खिलया गया।

133. दूसरी ओर, वाद 4 में वादीगर्णों, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े कहा विक 'स्र्थीा+ राम Sन्मभूविम' (वाद 5 में विद्व ीय वादी) विवति*क व्यविX +हीं है। उन्हों+े कहा विक विववाविद भूविम एक विवति*क व्यविX है यह क: पहली बार मात्र 1989 में उठाया गया र्थीा। र्डॉ. *व+ +े कहा विक इस न्यायालय क े समक्ष दो णिभन्न और 81 (1965) 1 एससीआर 96 82 (1979) 3 एससीसी 409 83 1959 सप्लीमेंर्ट (2) एससीआर 583 84 (1999) 5 एससीसी 50 85 (2004) 10 एससीसी 65 86 (2005) 1 एससीसी 457 87 (2015) 7 एससीसी 601 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अलग मुद्दे हैं। पहला इस आस्र्थीा और विवश्वास से संबंति* है विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा और इस आशय का प्रमार्ण विमला है। दूसरा का+ू+ी परिरर्णामों का समूह है Sो विववाविद संपखित्त को विवति*क व्यविX की प्रास्जिस्र्थीति प्रदा+ कर+े से उत्पन्न हो ी है। र्डॉ. *व+ +े कहा विक एक संप्रदाय की इस आस्र्थीा और विवश्वास पर विक भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ को *ार्मिमक महत्व प्राप्त है, इस पर सवाल +हीं उठाया Sा सक ा है, Sन्म स्र्थीा+ की सर्टीक स्जिस्र्थीति विववाद में है। इसक े अलावा, संपखित्त को क े वल इस आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर एक विवति*क व्यविX की प्रास्जिस्र्थीति +हीं दी Sा सक ी है विक यह भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है। इस हे ू यह कहा गया र्थीा विक भXों क े एक वि+तिश्च वग: की व्यविXपरक आस्र्थीा, विवति* में माखिलका+ा दावे क े उद्देश्य को आगे +हीं बढ़ा सक ी है। यह कहा गया विक वैविदक काल में प्रक ृ ति की भौति क वस् ुओं की पूSा प्राची+ भार में की Sा ी र्थीी। वस् ु की पूSा को प्राप्त विकया Sा+ा ही उसका उद्देश्य र्थीा। र्डॉ. *व+ +े क: विदया विक *ार्मिमक महत्व की हर वस् ु से विवति*क व्यविXत्व की प्रास्जिस्र्थीति Sुड़ी +हीं हो ी है और मान्य ा या प्रार्ण प्रति विष्ठ कर+े का कोई सकारात्मक काय: अपेतिक्ष हो ा है।

134. र्डॉ. *व+ +े आगे कहा विक अचल संपखित्त पर विवति*क व्यविXत्व विदया Sा+ा, हिंहदू मूर्ति यों क े विवति*क व्यविXत्व पर मौSूदा का+ू+ द्वारा समर्भिर्थी +हीं है और यह विक भूविम पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा+ा अति*वि+र्ण:य+ क े विकसी रूप से भूविम का पृर्थीक्करर्ण कर+े वाला एक +वाचार होगा। मात्र भXों की आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर विवति*क अख°ड़+ीय ा प्रदा+ की Sाएगी। यह कहा गया र्थीा विक विद्व ीय वादी पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा+ा दो विवति*क व्यवस्र्थीा सृसिS करेगा Sो विवणिशष्ट अति*कारों, शविX, क:व्यों और विह ों क े सार्थी -पहला मूर्ति पर और दूसरा भूविम पर - लागू होगा। र्डॉ. *व+ +े मूर्ति को शासिस कर+े वाली लागू विवति* व्यवस्र्थीा और भूविम को शासिस कर+े वाली विवति* व्यवस्र्थीा (वाद 5 में वाविदयों की दलीलों से Sैसा प ा चल ा है) क े बीच अन् र को वि+म्+खिलखिख शब्दों में व्यX विकया: (i) एक मान्य ाप्राप्त विहन्दू मूर्ति क े रूप में प्रर्थीम वादी पर लागू विवति*क व्यवस्र्थीा-आदश: अर्थी: में मूर्ति में वि+विह सम्पखित्त क े हक क े खिलए कोइ: दावा क े वल सेवाय द्वारा अ+ुयोज्य है (Sब क विक सेवाय +े मूर्ति क े विह ों क े प्रति क ू ल काय: +हीं विकया है); और प्रति क ू ल कब्Sे र्थीा परिरसीमा की विवति* मूर्ति क े स्वाविमत्व वाली संपखित्त क े दावों पर लागू होगी; और (ii) विद्व ीय वादी पर लागू विवति*क व्यवस्र्थीा- न्यातियक मान्य ा भXों क े व्यविXपरक विवश्वास पर आ*ारिर होगा विक यह क्षेत्र एक देव ा है; न्यातियक व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा+ा विकसी भी प्रति स्प*- माखिलका+ा दावों को वि+ष्फल कर दे ा है; और विवचारा*ी+ संपखित्त क े खिलए परिरसीमा और प्रति क ू ल कब्Sे की विवति* अप्रयोज्य है।

135. र्डॉ. *व+ उपयु:X विवभेद क े आ*ार पर विकसी परिरर्णाम को स्वीकार कर+े क े विवरुद्ध क: कर े हैं। र्डॉ. *व+ +े क: विदया विक विद्व ीय वादी को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा+ा विवति*क अख°र्ड+ीय ा की परिरति* को वि+*ा:रिर करेगा। उन्हों+े कहा विक एक विवति*क व्यविX क े रूप में मूर्ति को मान्य ा दे े समय का+ू+ी रूप से इस न्यायालय क े न्यायशास्त्र क े अ+ुरूप और सुसंग है, भूविम को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+ा एक का+ू+ी +वाचार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है Sो पहले वादी क े खिलए उपलब्* +हीं हैं। अं में यह कहा गया विक भार ीय *मÂ और अन्य *मÂ क े बीच कोई अं र +हीं विकया Sा+ा चाविहए और संवै*ावि+क संरक्षर्ण क े खिलए कोई दलील वाद 5 में अणिभयोगी द्वारा +हीं ली Sा सक ी है Sो अवि+वाय: रूप से एक सिसविवल मामला है। इसका परिरर्णाम दो *ार्मिमक समुदायों क े बीच वि+Sी अति*कारों पर सिसविवल न्यायवि+र्ण:य+ क े परिरर्णाम को एक *म: की आस्र्थीा और विवश्वास में प्रभाविव कर+ा होगा। इ+ विवरो*ी दलीलों का अब विवश्लेषर्ण विकया Sाएगा। *ार्मिमक महत्व और विवति*क व्यविXत्व का विवभेद कर+ा

136. साव:Sवि+क उपास+ा क े स्र्थील क े रूप में विकसी स्र्थीा+ क े *ार्मिमक महत्व की मान्य ा एक विवति*क व्यविX क े रूप में स्र्थीा+ को मान्य ा दे+े से वैचारिरक रूप से अलग है। राम Sन्मभूविम वि+स्संदेह इस आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर हिंहदुओं क े खिलए *ार्मिमक महत्व का है विक यह भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है। विववाविद स्र्थील एक न्यातियक व्यविX है या +हीं, इस न्यायालय द्वारा इस बा का अव*ारर्ण विकसी भी रह से हिंहदू समुदाय की आस्र्थीा और विवश्वास क े महत्व को कम +हीं करेगा।

137. उ+क े इस कर्थी+ का समर्थी:+ कर+े क े खिलए विक दूसरा वादी एक न्यातियक व्यविX है, वाद 5 में वाविदयों की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा +े कई पूव: वि+र्ण:यों पर अवलम्ब+ खिलया। इ+ वि+र्ण:यों को ध्या+ से पढ़+े पर यह संक े विमल ा है विक अति*वXा +े इस क: का समर्थी:+ कर+े क े खिलए विक विववाविद स्र्थील एक विवति*क व्यविX है, चुहिं+दा रूप से उद्दरर्णों का अवलम्ब+ खिलया है। सिSस सीमा क वाद 5 में वादी द्वारा विदए गए कÂ का वे समर्थी:+ कर े हैं उ+का अव*ारर्ण कर+े क े खिलए, अब उ+ मामलों का विवश्लेषर्ण कर+ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और उस संदभ: की Sांच कर+ा आवश्यक होगा सिSसमें उन्हें अति*वि+र्ण- विकया गया र्थीा।

138. म+ोहर गर्णेश ाम्बेकर ब+ाम लखविमराम गोहिंवदराम88 में, वादी +े एक देव ा को समर्मिप मंविदर क े *ार्मिमक प्रति ष्ठा+ क े रखरखाव में विह बद्ध पक्षकार क े रूप में एक वाद संस्जिस्र्थी विकया। वादी +े उन्हें प्रति वादी ब+ा+े की मांग की Sो मस्जिन्दर में चढ़ावे प्राप्त कर े र्थीे व उतिच न्यासिसयों क े रूप में Sबाबदेह र्थीे। प्रति वाविदयों +े दावा विकया विक वे पूर्ण: माखिलक र्थीे और सम्पूर्ण: चढ़ावे को वि+Sी संपखित्त क े रूप में *ारर्ण कर े र्थीे। बॉम्बे उच्च न्यायालय की एक ख°ड़ पीठ +े अव*ारिर विकया विक यद्यविप वि+Sी वि+काय हो सक े हैं, अं£ेSी का+ू+ क े ह एक संघ सिSसमें व्यविXयों क े अवि+यविम या अपरिरभाविष वग: शाविमल हैं, चाहे वह *मा:र्थी: उद्देश्यों क े खिलए हों या + हों, वि+गम+ क े विब+ा संपखित्त वि+विह +हीं की Sा सक ी है। हालांविक प्रति वाविदयों +े स्वयं को मूर्ति को अर्मिप संतिच चढ़ावे से विमले राSस्व क े माखिलक क े रूप में प्रस् ु विकया। न्यायालय की ओर से न्यायमूर्ति आर वेस्र्ट +े संप्रेतिक्ष विकया: "9. इस मामले में दS: विकए गए सबू सिSसमें मूर्ति श्री रर्णछोड़ रायSी क े कई दा ा शाविमल हैं, उ+से प ा चल ा है विक देव ा को उपहार देकर *ार्मिमक पु°य प्राप्त कर+े या *ार्मिमक क:व्य का वि+व:ह+ कर+े क े पश्चा ्, उपासक को इसमें कोई विदलचस्पी +हीं है विक बाद में चढ़ावे का क्या हो ा है.... विफर भी उसे एक उतिच और व्यवस्जिस्र्थी पूSा क े रखरखाव की आवश्यक ा हो+ी चाविहए और वह उससे संबंति* है।… वह एक वि+यविम व वि+रन् र अर्थीवा कम से कम एक अावति*क समय में पविवत्र अ+ुष्ठा+ों की काम+ा कर ा है, Sो विवफल हो सक ी है यविद विपछले वषÂ क े चढ़ावों का पूरी रह से अपव्यय कर विदया गया हो, Sबविक विकसी विदए गए वष: में चढ़ावा काफी + हो। ऐसा प्र ी हो ा है विक सेवकों +े अचल 88 आईएलआर 1888 12 बॉम्बे 247 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और Sंगम दो+ों चढ़ावे इस चे +ा क े सार्थी, यद्यविप अस्पष्ट चे +ा क े सार्थी प्राप्त विकया विक वे इस प्रकार उ+क े पास आ+े वाले *+ में से मूर्ति की पूSा और मंविदर Sा+े वाले श्रद्धालुओं की सुविव*ा प्रदा+ कर+े क े खिलए बाध्य हैं।" (प्रभाव वर्ति* ) सेवकों (प्रति वाविदयों) +े मंविदर की देखभाल कर+े की अप+ी सिSम्मेदारी स्वीकार की। मूल्यवा+ वस् ुएँ भंर्डारी को दी Sा+ी र्थीी। यह इस संदभ: में है विक न्यायालय +े संप्रेतिक्ष विकया: "11..... श्री मैकफस:+ +े इस मामले में प्रति वाविदयों क े खिलए स्वीकार विकया विक वे मूर्ति श्री रर्णछोड़ रायSी को अर्मिप की गई भूविम को +हीं बेच सक े। यह प्रति बं* उसी की रह है सिSसक े द्वारा सम्रार्ट विकसी भी परिरस्जिस्र्थीति में समर्मिप भूविम क े अलगाव को म+ा कर ा है। व्याव. माय., अध्याय IV, एस. VII, पी. 23, +वम्बर 120, क ै प. 10। यह र्डकोर में मूर्ति में प्र ीक या व्यविX क े रूप में विवति*क व्यविX को विदए गए अ+ुदा+ क े अ+ुरूप है। इसे विवति*क व्यविX क े एक मात्र गुलाम या संपखित्त क े रूप में मा++ा सुसंग +हीं है, सिSसका शीष:क स्वाविमत्व +हीं है, बस्जिल्क भगवा+ की सेवा है। यह वास् व में एक अSीब बा है, अगर Sा+बूझकर +हीं, ो विवचार का भ्रम है, सिSसक े द्वारा प्रति वाविदयों +े उपहारों को आंमवित्र कर+े और आशीवा:द प्रदा+ कर+े क े उद्देश्य से एक देव ा क े रूप में श्री रर्णछोड़ रायSी की स्र्थीाप+ा की, बस्जिल्क एक मात्र णिशलाख°ड़ क े रूप में, उ+क े पैरों में रखे गये प्रत्येक उपहार को प्रयोग में ला+े क े उद्देश्य क े खिलए उ+की संपखित्त क े रूप में भी स्र्थीाविप विकया।… लेविक+ अगर एक न्यातियक व्यविX है, ो प्रति ष्ठा+ क े क ें ˆ क े रूप में एक पविवत्र या परोपकारी विवचार का आदश: मूर्ति मा+ है, यह अति*कारों का क ृ वित्रम विवषय भूविम की रह +कदी और गह+ों का चढ़ावा ले+े में सक्षम है।" (प्रभाव वर्ति* ) वि+र्ण:य स्पष्ट कर ा है विक एक न्यातियक व्यविX क े रूप में एक मूर्ति एक पविवत्र या परोपकारी विवचार का "आदश: मूर्ति मा+" है। एक न्यातियक व्यविX की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रास्जिस्र्थीति को मूर्ति पर एक इकाई क े रूप में प्रदा+ विकया गया र्थीा Sो उस उद्देश्य को शाविमल कर ा है सिSसमें चढ़ावा और सम्पखित्त वि+विह हो ी हैं। इस मामले में अवलोक+ इस स्जिस्र्थीति की पुविष्ट कर े हैं विक न्यातियक व्यविXत्व को पविवत्र उद्देश्य पर प्रदा+ विकया गया र्थीा और संतिच या भेंर्ट की गयी संपखित्त स्वयं एक न्यातियक इकाई +हीं ब+ गई र्थीी। भेंर्ट की गयी संपखित्त एक न्यातियक व्यविX +हीं है- यह मूर्ति है Sो एक पविवत्र उद्देश्य क े मूर्ति मा+ क े रूप में है सिSसे एक न्यातियक व्यविX क े रूप में मान्य ा प्राप्त है, सिSसमें संपखित्त वि+विह है।

139. रामप ब+ाम दुगा: भार ी89 में, प्रति वादी +े 'स्र्थीा+' क े महं क े रूप में, सार्थी ही सार्थी बंदोवस् विवलेख क े ह दावा विकया विक वह उ+ संपखित्तयों को वसूल+े का हकदार र्थीा Sो परेला क े 'स्र्थीा+' से संबंति* है। श्री गट्टारी +े परेला में एक मठ ('स्र्थीा+') का वि+मा:र्ण विकया और अप+े पस्वी भा ृत्व की सेवा क े खिलए अप+ी इमार को अर्मिप विकया और संस्र्थीा+ क े रखरखाव क े खिलए मुकदमें वाले गांवों को खरीदा। न्यायमूर्ति +ज़ीर हस+ +े 'स्र्थीा+' की प्रक ृ ति पर अव* न्यातियक आयुX की अदाल की ओर से बोल े हुए अव*ारिर विकया: "मेरी राय में, परेला में स्जिस्र्थी 'स्र्थीा+', पूरी रह से पुरा+े विद+ों क े मठों की प्रक ृ ति क े अ+ुरूप र्थीा। पूव:व - वर्ण:+ से उद्भू कई का+ू+ी अव*ारर्णाओं को वि+म्+ा+ुसार कहा Sा सक ा है: (1) यह संन्यासिसयों, ब्रह्मचारिरयों और पस्जिस्वयों का एक समूह है, सिSस+े पूरी रह से सांसारिरक संबं*ों से स्वंय को अलग कर खिलया है। (2) स्र्थीा+ से संबंति* सम्पखित्त स्र्थीा+ क े प्रयोS+ों क े खिलए न्यास में रखे Sा े हैं। (3) स्र्थीा+ क े प्रयोS+ों में भXों का भरर्ण-पोषर्ण और परोपकार का प्रचार- प्रसार हो ा है। (4) स्र्थीा+ का प्रमुख उस संस्र्थीा का और उससे Sुड़ी 89 एआईआर 1980 अव* 258 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संपखित्तयों का न्यासी है........... इसखिलए स्र्थीा+ अवि+वाय: रूप से संन्यासिसयों, ब्रह्मचयÂ और पस्जिस्वयों की एक संस्र्थीा है- सिSसका संपखित्त या परिरवार से कोई सांसारिरक संबं* +हीं हो ा है।" (प्रभाव वर्ति* ) इस दृविष्ट से 'स्र्थीा+' एक इमार +हीं बस्जिल्क *ार्मिमक णिशक्षा का क ें ˆ र्थीा। 'स्र्थीा+' की प्रक ृ ति प्रचुर ापूव:क स्पष्ट कर ी है विक इसे मू: संपखित्त क े रूप में +हीं मा+ा गया र्थीा, लेविक+ णिशक्षा की एक *मा:र्थी: संस्र्थीा को विवति*क व्यविX मा+ा Sा ा र्थीा। भौति क संपखित्त Sो मठ र्थीी, उसे एक विवति*क व्यविX क े रूप में +हीं मा+ा गया र्थीा। अदाल +े वि+ष्कष: वि+काला विक *मा:र्थी: संस्र्थीा एक न्यातियक व्यविX क े रूप में र्थीी सिSसमें मुकदमे वाले गांव वि+विह र्थीे।

140. रामब्रह्म चर्टS- ब+ाम क े दार +ार्थी ब+S- 90 में, प्रत्यर्भिर्थीयों +े इस उद्घोषर्णा क े खिलए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया विक वे ी+ मूर्ति यों को अर्मिप भोग में भाग ले+े क े हकदार र्थीे Sो प्रत्यर्भिर्थीयों और अपीलक ा: क े सामान्य पूव:Sों द्वारा प्रति विष्ठ विकए गए र्थीे। एक मंविदर का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, और संपखित्तयों को मूर्ति यों को समर्मिप विकया गया र्थीा। प्रत्यर्भिर्थीयों +े अप+ी बेविर्टयों क े माध्यम से संस्र्थीापकों क े वंशS क े रूप में भोग में भाग ले+े की प्रर्थीा का दावा विकया और अ*ी+स्र्थी अदाल ों +े पाया विक पुरुष शाखा में वंशS लगा ार सेवाय रहे र्थीे। इस प्रश्न का विववि+श्चय कर+ा र्थीा विक क्या संस्र्थीापक यह वि+द†श दे+े क े खिलए सक्षम र्थीा विक बेर्टे क े माध्यम से वंशSों में सेवादारी वि+विह हो+ी चाविहए और बेविर्टयों क े माध्यम से वंशSों को अर्मिप भोग में भाग ले+े का अति*कार है। कलकत्ता उच्च न्यायालय +े वि+म्+ा+ुसार अव*ारिर विकया: 90 (1922) 36 सीएलSे 478 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "एक *मा:र्थी: वि+गम, Sहां क यह *मा:र्थी: है, संस्र्थीापक की रच+ा है... इसका कोई कारर्ण +हीं है विक संस्र्थीापक, Sो न्यास की सरकार और प्रशास+ प्रदा+ कर+े क े खिलए सक्षम है, वह इसक े प्रबं*+ क े खिलए एक वि+द†श दे+े में सक्षम क्यों +हीं हो+ा चाविहए, Sो एक *ार्मिमक और *मा:र्थी: न्यास क े रूप में अप+े स्वरूप से असंग +हीं है... प्रत्येक मामले में परीक्षर्ण यह है, विक क्या संस्र्थीापक द्वारा विदया गया वि+द†श *ार्मिमक और *मा:र्थी: न्यास क े रूप में *म:दाय की प्रक ृ ति से असंग है और यह शाश्व ा की विवति* क े बचाव क े खिलए छद्म यु्विX है।" अदाल +े उल्लेख विकया विक दो श ास्जिब्दयों से अति*क समय से बेर्टों क े माध्यम से वंशSों में सेवादारी अति*कार वि+विह र्थीे और बेविर्टयों क े माध्यम से वंशSों +े भोग अर्मिप कर+े में भाग ले+े क े अति*कार का प्रयोग विकया र्थीा। इस संदभ: में, अदाल +े अव*ारिर विकया विक विब+ा विकसी सवाल क े लंबे समय क इ+ अति*कारों क े प्रयोग में हस् क्षेप कर+ा बुतिद्धमत्ता +हीं होगी और इस रह क े अति*कार क े पक्ष में एक उतिच उप*ारर्णा की Sाएगी। वाद 5 में वादी इस अवलोक+ पर वि+भ:र र्थीे विक देव ा को एक वास् विवक Sीविव प्रार्णी क े रूप में मा+ा Sा ा है। इस संबं* में, अदाल +े उल्लेख विकया: "...एक बो*गम्य व्यविX को उपहार और एक देव ा को भेंर्ट या समप:र्ण क े बीच एक मौखिलक अं र है। इसक े विवपरी विवशेष प्रर्थीा क े अ*ी+, चढ़ावा काय:वाहक पुSारी की संपखित्त +हीं ब+ े हैं, लेविक+ इसक े सभी अति*कारों, अ+ुष्ठा+ों और दा+ क े सार्थी मंविदर क े रखरखाव में योगदा+ दे े हैं... यह कह+ा ही पया:प्त है विक देव ा को, संक्षेप में, एक Sीविव प्रार्णी क े रूप में मा+ा Sा ा है और उसी रह से व्यवहार विकया Sा ा है Sैसे घर क े माखिलक से उसक े विव+म्र सेवक द्वारा व्यवहार विकया Sाएगा। Sीव+ की दैवि+क विद+चया: सूक्ष्म सर्टीक ा क े सार्थी पूरी हो Sा ी है; सSीव मूर्ति को वस्त्र बदल+े से लेकर, पक्का व कच्चा भोS+ का चढ़ावा और आराम करा+े क े सही क्रम में Sीव+ की आवश्यक ाओं और विवलासिस ा से प्रफ ु सिल्ल विकया Sा ा है। पूSा पूरी हो+े क े बाद भोग क े +ाम से ज्ञा अर्मिप भोS+ को परिरवार क े सदस्यों क े सार्थी -सार्थी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आमंवित्र और + बुलाये गये अति णिर्थीयों क े बीच दा+ में विव रिर विकया Sा ा है; प्राची+ ब्राह्मर्णवादी साविहत्य में आति थ्य को मा+व ा क े खिलए एक सामान्य ऋर्ण का वि+व:ह+ मा+ा Sा ा है और अति णिर्थी को एक देवत्व क े रूप में सम्मावि+ विकया Sा ा है। हमारी राय में, यह वि+द†श विक संस्र्थीापक की बेविर्टयों क े वंशSों को अर्मिप भोS+ क े ऐसे विव रर्ण में भाग ले+ा चाविहए, विकसी भी रह से *म:दाय क े उद्देश्य से असंग +हीं है।" (प्रभाव वर्ति* ) एक वास् विवक व्यविX क े रूप में एक स्र्थीाविप देव ा की पूSा कर+े की विवति* का+ू+ में विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े से अलग और णिभन्न है। मा+व व्यविXत्व विवति*क व्यविXत्व से अलग है। अदाल +े एक स्र्थीाविप देव ा क े खिलए पूSा कर+े क े रीकों का संदभ: विदया, Sो उपासक की आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार है। इस मामले में एक विवति*क व्यविX का कोई सवाल ही +हीं उठ ा। मदुरा ति रुप्पर+क ुं र्डम

141. वाद 5 में वादी +े ब मदुरा, ति रुप्पर+क ुं र्डम ब+ाम अल्खा+ साविहब91 में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य पर अवलम्ब+ खिलया है। यह कहा गया विक इस मामले में एक पूरी पहाड़ी को साव:Sवि+क उपास+ा स्र्थील क े रूप में इसक े चारो ओर की गई परिरक्रमा क े आ*ार पर एक विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा दी गई र्थीी। परिरर्णामस्वरूप व:मा+ मामले में विववाविद स्र्थील क े चारो ओर परिरक्रमा कर+े को विवति*क व्यविX की प्रास्जिस्र्थी क बढ़ा+े से भूविम का प्रभाव (यह आ£ह विकया गया है) विदया Sा+ा चाविहए।

142. मदुरा ति रुप्पर+क ुं र्डम में विप्रवी काउंसिसल, मˆास क े मदुरा सिSले में एक बंSर पहाड़ी क े स्वाविमत्व से संबंति* र्थीा। पहाड़ी क े उच्च म स्र्थीा+ पर एक 91 (1931) 61 मˆास एलSे 285 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मस्जिस्Sद र्थीी। ति रुप्पर+क ुं र्डम मंविदर +े अप+े प्रबं*क क े माध्यम से मंविदर की संपखित्त क े रूप में पूरी पहाड़ी का दावा कर े हुए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया (क ु छ खे ी की गई और मूल्यांविक भूविम और मस्जिस्Sद स्र्थील को छोड़कर)। मुस्जिस्लम प्रति वाविदयों +े मस्जिस्Sद और +ेसिल्लर्टोपे क े रूप में Sा+ी Sा+े वाली पहाड़ी क े एक विहस्से पर स्वाविमत्व का दावा विकया। राज्य क े सतिचव +े पहाड़ी क े सभी विब+ा कब्Sे वाले विहस्सों क े माखिलक हो+े का दावा विकया। मदुरा क े अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश +े वाविदयों क े पक्ष में फ ै सला सु+ाया (+ेसिल्लर्टोपे, मस्जिस्Sद को और यहाँ क Sा+े वाली सीढ़ीयों को छोड़कर )। मुस्जिस्लम प्रति वाविदयों +े एक अपील दायर की और राज्य क े सतिचव को अपील का पक्षकार ब+ा+े का वि+द†णिश विकया गया। इस वि+ष्कष: क े बावSूद विक हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े पास पहाड़ी पर अति*कार र्थीे, और यह वि+र्मिदष्ट विकए विब+ा विक ये अति*कार क्या र्थीे, उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक सरकार पहाड़ी की माखिलक र्थीी। पहाड़ी क े आ*ार ल क े चारों ओर पहाड़ी की परिरक्रमा करक े उपासकों +े प्रदतिक्षर्णा की। इस माग: का उपयोग रर्थीयात्रा खिलए भी विकया Sा ा र्थीा और इसे तिघरी वीति* क े रूप में Sा+ा Sा ा है। Sबविक उच्च न्यायालय +े वि+र्ण:य में अणिभलेख पर साक्ष्यों को +ोर्ट विकया विक सम्पूर्ण: पहाड़ी की पूSा हिंहदू समुदाय द्वारा एक लिंलग क े रूप में की गई, विववाद का क े न्ˆ तिघरी वीति* क े भी र पहाड़ी क े विब+ा कब्Sे वाले विहस्सों पर स्वाविमत्व क े प्रश्न से संबंति* र्थीा। वष: 1801 में अSीम-उल-दौला क े सार्थी लॉर्ड: क्लाइव की संति* से मदुरा ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी क े वि+यंत्रर्ण में आ गया। उच्च न्यायालय +े यह दृविष्टकोंर्ण खिलया विक, वष: 1801 क े बाद पूरी पहाड़ी गांव का विहस्सा हो+े क े कारर्ण सरकारी संपखित्त ब+ गई। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

143. विप्रवी काउंसिसल +े अव*ारिर विकया विक भूविम क े सभी विब+ा कब्Sे वाले विहस्सों पर सदी क े ज्यादा र भाग में मंविदर द्वारा स्वाविमत्व क े कृ त्यों का वि+रं र प्रयोग विकया गया र्थीा। तिघरी वीति* क े भी र स्जिस्र्थी छोर्टे मंविदरों क े रखरखाव क े खिलए भी व्यय विकया गया र्थीा। मंविदर को अ+ाविदकाल से पहाड़ी क े खाली विहस्से क े कब्Sे में हो+ा कहा गया र्थीा सिSसे मंविदर द्वारा मंविदर की संपखित्त क े रूप में मा+ा Sा ा र्थीा। विप्रवी काउंसिसल +े कहा विक मस्जिस्Sद को छोड़कर, पहाड़ी क े "शेष भाग से विबलगाव का कोई सबू +हीं" र्थीा। सर SाS: लोन्ड्स +े अव*ारिर विकया: "एकमात्र अति*कार Sो मंविदर प्रत्यर्थी- क े विवरूद्ध Sोर दे सक े हैं वे अति*कार हैं Sो ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी +े उन्हें विदए र्थीे या उन्हें ब+ाए रख+े की अ+ुमति दी र्थीी... और उ+क े न्याया*ीश को लग ा है विक सबू ों से प ा चल ा है विक 1801 क े बाद मस्जिन्दर को सभी क े वि+बा:* कब्Sे में छोड़ विदया गया र्थीा सिSसका अब यह दावा कर ा है... उ+क े न्याया*ीशों को संदेह +हीं है विक एक सामान्य उप*ारर्णा है विक अ+ुपयुX भूविम क्राउ+ की संपखित्त है, लेविक+ उन्हें लग ा है विक यह व:मा+ मामले क े थ्यों पर लागू +हीं है Sहां कणिर्थी अ+ुपयुX सभी प्रसंगों में भौति क रूप से संलग्न मस्जिन्दर क े अन् ग: है।… सम्पूर्ण: रूप से उ+क े न्याया*ीश इस म पर हैं विक अपीलक ा: +े विदखाया है विक पहाड़ी का विब+ा कब्Sे वाला विहस्सा अ+ाविदकाल से मंविदर क े कब्Sे में है और मंविदर प्राति*कारिरयों द्वारा अप+ी संपखित्त क े रूप में मा+ा गया है। (प्रभाव वर्ति* ) वि+र्ण:य का सूक्ष्म पाठ+ यह स्पष्ट कर ा है विक विप्रवी कौंसिसल क े वल, (i) भूविम क े विब+ा कब्Sे वाले विहस्से और पहाड़ी में अन्य माखिलका+ा अति*कारों की सुरक्षा और (ii) मंविदर द्वारा संपखित्त क े स्वाविमत्व से, संबंति* र्थीी। विप्रवी कौंसिसल पहाड़ी क े विवति*क व्यविX की प्रास्जिस्र्थीति क बढ़ा+े से संबंति* +हीं र्थीी। मंविदर द्वारा संपखित्त क े स्वाविमत्व और भूविम पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकए Sा+े क े मध्य अं र है। Sहां भूविम एक व्यविX क े स्वाविमत्व में है, यह एक विवति*क व्यविX +हीं हो सक ी है, क्योंविक कोई भी व्यविX एक विवति*क व्यविX क े रूप में एक देव ा का माखिलक +हीं हो सक ा है। यह मामला वाद 5 में वाविदयों द्वारा विदए गए इस क: को आगे +हीं बढ़ा ा है विक विववाविद संपखित्त स्वयं एक विवति*क व्यविX है। संविवति* द्वारा शासिस मंविदर

144. द बोर्ड: ऑफ कविमश्न+स: फॉर हिंहदू *ार्मिमक बंदोबस् ी, मˆास ब+ाम विपर्डुगु +रसिसम्हा92 में, बोर्ड: +े इस आ*ार पर एक योS+ा ब+ाई विक विवचारा*ी+ संस्र्थीा मˆास हिंहदू *ार्मिमक बंदोबस् ी अति*वि+यम 1863 क े अर्थी: क े अन् ग: एक मंविदर र्थीी। प्रति वादी +े अति*वि+यम क े ह एक मंविदर क े रूप में संस्र्थीा की उद्घोषर्णा को चु+ौ ी दे े हुए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया। मˆास उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ +े अवलोक+ विकया विक संस्र्थीा कई श ास्जिब्दयों से अस्जिस् त्व में र्थीी और इस समय क े दौरा+ उपास+ा स्र्थील ब+ गई र्थीी। अदाल +े कहा विक साव:Sवि+क *म:दाय को आकर्मिष कर+े क े खिलए पूSा पया:प्त महत्व की हो+ी चाविहए। संस्र्थीा क े भी र विकए गए आयोS+ों क े आकल+ पर, अदाल +े वि+ष्कष: वि+काला विक संस्र्थीा क े भी र साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा र्थीी। उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक बोर्ड: इस प्रकार अति*वि+यम क े ह एक योS+ा ैयार कर+े क े खिलए अति*कृ र्थीा। न्यायमूर्ति वरदचारिरयर +े संप्रेतिक्ष विकया: "परीक्षर्ण यह +हीं है विक क्या यह आगम शास्त्र क े विकसी विवशेष सम्प्रदाय क े अ+ुरूप है; हमें लग ा है विक यह प्रश्न उ+ लोगों क े वग: क े दृविष्टकोर्ण क े 92 1939 1 एमएलSे 134 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संदभ: में य विकया Sा+ा चाविहए Sो पूSा में भाग ले े हैं। यविद वे इस अर्थी: में इसकी *ार्मिमक प्रभावकारिर ा में विवश्वास कर े हैं, विक इस रह की पूSा से, वे स्वयं को विकसी अलौविकक शविX क े अति*दा+ की वस् ु ब+ा रहे हैं, इसे '*ार्मिमक पूSा' मा+ा Sा+ा चाविहए।"

145. वाद 5 में वाविदयों की ओर से पेश श्री परासर+ +े इस उद्धरर्ण क े आ*ार पर क: विदया विक इस आस्र्थीा और विवश्वास क े सार्थी विववाविद स्र्थील क े चारो ओर परिरक्रमा कर+ा विक विववाविद स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म- स्र्थीा+ है, भX मा+ े हैं विक *ार्मिमक पूSा का आध्यास्जित्मक लाभ प्राप्त हो ा है। उन्हो+ें कहा यह ही पया:प्त है इस न्यायालय को यह मा++े क े खिलए विक विद्व ीय वादी का गठ+ कर+े वाली भूविम एक न्यातियक व्यविX है। विपर्डुगु +रसिसम्हा में मˆास उच्च न्यायालय क े अवलोक+ यह आकल+ कर+े क े संदभ: में र्थीे विक क्या अ+ुष्ठा+ों का विकया Sा+ा "साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा" क े समा+ है ाविक यह वि+*ा:रिर विकया Sा सक े विक क्या विवचारा*ी+ संस्र्थीा अति*वि+यम क े ह एक मंविदर र्थीी। मंविदर क े विवति*क व्यविX हो+े का कोई प्रश्न ही +हीं उठ ा। अति*क से अति*क यह मामला वाद 5 में वाविदयों द्वारा विदए गए इस प्रस् ाव का समर्थी:+ कर ा है विक विववाविद स्र्थील पर की गई पूSा की प्रक ृ ति *ार्मिमक प्रक ृ ति की है।

146. श्री परासर+ +े मˆास उच्च न्यायालय क े र्टीआरक े रामस्वामी सेरवई ब+ाम द बोर्ड: ऑफ कविमश्न+स: फॉर विहन्दू रिरलीसिSयस इ+र्डाउमेन्र्ट, मˆास93 क े विववि+श्चय पर यह प्रति वाद कर+े क े खिलए अवलम्ब+ खिलया विक मूर्ति की उपस्जिस्र्थीति *ार्मिमक उपास+ा क े संबं* में एक अ+ावश्यक अपेक्षा है और यह विक उपासकों की आस्र्थीा और विवश्वास क े सार्थी-सार्थी विववाविद भूविम क े चारों ओर परिरक्रमा की प्रर्थीा न्यायालय क े खिलए विववाविद स्र्थील पर विवति*क 93 आईएलआर 1950 मˆास 799 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े खिलए पया:प्त है। र्टीआरक े रामास्वामी सेरवई में, दा+ क े एक विवलेख को यह घोषर्णा कर े हुए वि+ष्पाविद विकया गया र्थीा विक कु छ भूविम एक मंविदर देवस्र्थीा+म को *म:दाय की गई र्थीी और मंविदर वि+मा:र्णा*ी+ र्थीा। दा ा क े अलावा, दो न्यासी वि+युX विकए गए र्थीे। 1937 में हिंहदू *ार्मिमक बंदोबस् ी बोर्ड: +े न्यासिसयों से इस *ारर्णा पर अंशदा+ की मांग की विक मंविदर का वि+मा:र्ण पूरा हो गया। अपीलक ा:ओं द्वारा इस आ*ार पर विवरो* विकया गया विक मंविदर का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा और कोई भी मूर्ति स्र्थीाविप +हीं की गई र्थीी। इसक े बावSूद मंविदर को मˆास हिंहदू *ार्मिमक बंदोबस् ी अति*वि+यम, 1926 क े दायरे में एक मंविदर घोविष विकया गया। इसक े बाद, मंविदर क े खिलए प्रबं*+ की एक योS+ा ैयार कर+े की मांग की गई।

147. न्यायालय द्वारा ब ाये गये विवणिभन्न विववाद्यकों में से एक, अति*वि+यम क े उद्देश्यों क े खिलए एक वै* मंविदर क े अस्जिस् त्व से संबंति* है। ख°ड़ पीठ क े दो न्याया*ीशों में म भेद र्थीा और मामले को विफर ीसरे न्याया*ीश क े पास भेSा गया। यह मा+ े हुए विक अति*वि+यम क े प्रयोS+ों क े खिलए एक मंविदर मौSूद र्थीा, न्यायमूर्ति विवश्व+ार्थी शास्त्री +े अव*ारिर विकया: "हिंहदू विवति* देव ा की स्र्थीाप+ा और उसकी पूSा क े रखरखाव क े खिलए समप:र्ण की वै* ा को मान्य ा दे ी है। यह सारही+ है विक दा+ क े खिलए देव ा की प्रति मा स्र्थीाविप +हीं की गई है या उसक े खिलए वसीय की गई है.... यह परीक्षर्ण +हीं है विक मूर्ति की स्र्थीाप+ा और इसकी पूSा का रीका आगम शास्त्र क े विकसी विवशेष संप्रदाय क े अ+ुरूप है। यविद पूSा क े खिलए Sा+े वाली S+ ा या S+ ा का कोई भाग यह मा+ ा है विक विकसी स्र्थीा+ विवशेष में ईश्वरीय उपस्जिस्र्थीति है और उस स्र्थीा+ पर पूSा करक े उन्हें ईश्वर का आशीवा:द प्राप्त हो+ा संभाव्य है, ो आपको अति*वि+यम की *ारा 9, खंर्ड 12 में परिरभाविष एक मंविदर की आवश्यक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवशेष ाएं प्राप्त हुई हैं। एक मूर्ति की उपस्जिस्र्थीति, हालांविक हिंहदू मंविदरों की एक अपरिरव:+ीय विवशेष ा है, यह अति*वि+यम की *ारा 9, खंर्ड 12 में एक मंविदर की परिरभाषा क े अन् ग: एक का+ू+ी आवश्यक ा +हीं है।" (प्रभाव वर्ति* ) न्यायालय की विर्टप्पणिर्णयाँ यह आंकखिल कर+े क े संदभ: में की गयी र्थीीं विक क्या मˆास हिंहदू *ार्मिमक बंदोबस् ी अति*वि+यम, 1926 की *ारा 9 क े ह संस्र्थीा को एक मंविदर क े रूप में परिरभाविष कर+े क े खिलए एक मूर्ति की उपस्जिस्र्थी आवश्यक र्थीी। इस संदभ: में न्यायालय +े मा+ा विक भXों का यह विवश्वास विक उन्हें ईश्वर का आश-वाद प्राप्त होगा, अति*वि+यम क े ह एक मंविदर मा+े Sा+े क े खिलए पया:प्त है। न्यायालय की ये विर्टप्पणिर्णयां अति*क से अति*क यह स्र्थीाविप कर ी हैं विक भXों का यह विवश्वास विक एक ईश्वरीय उपस्जिस्र्थीति है, साव:Sवि+क उपास+ा स्र्थील का गठ+ है। हालांविक, यह विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े से अलग है। एक अति*वि+र्ण:य+ विक एक संस्र्थीा एक वै*ावि+क अति*वि+यम+ क े प्रयोS+ों क े खिलए एक मंविदर है, यह इस विववाद्यक से अलग है विक क्या संस्र्थीा क े पास विवति*क व्यविXत्व है। इस प्रकरर्ण में विर्टप्पणिर्णयाँ एक वै*ावि+क परिरभाषा क े विवणिशष्ट संदभ: में की गयी र्थीीं और यह उस *ार्मिमक पूSा स्र्थील क े खिलए लागू +हीं विकया Sा सक ा है सिSसक े खिलए कोई वै*ावि+क अति*वि+यम+ मौSूद +हीं है।

148. आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा वेंकर्टरम+ मूर्ति ब+ाम श्री राम मंति*राम94 में समा+ प्रश्न अति*वि+र्ण- विकया गया र्थीा सिSसका अवलम्ब+ खिलया गया र्थीा। इस प्रकरर्ण में, अदाल को यह आकल+ कर+ा र्थीा विक क्या हिंहदू *ार्मिमक और *मा:र्थी: बंदोबस् ी अति*वि+यम 1951 क े दायरे में एक मंविदर हो+े 94 (1964) 2 एए+र्डब्ल्यूआर 457 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े खिलए उपास+ा स्र्थील क े खिलए एक मूर्ति पूव:-आवश्यक ा र्थीी। अदाल +े पुविष्ट की विक समप:र्ण और साव:Sवि+क *ार्मिमक उपास+ा का अस्जिस् त्व ही अति*वि+यम क े ह संस्र्थीा को एक मंविदर क े रूप में घोविष कर+े क े खिलए पया:प्त है, भले ही मूर्ति अ+ुपस्जिस्र्थी हो। यह मामला वाद 5 में वादी क े मामले का समर्थी:+ +हीं कर ा है।

149. कामराSु वेंकर्ट क ृ ष्र्ण राव ब+ाम उप सिSलाति*कारी, ओंगोले95 में इस न्यायालय क े वि+र्ण:य में, सिSस पर महत्वपूर्ण: अवलम्ब+ खिलया गया है, ी+ न्याया*ीश पीठ क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या एक र्टैंक को आंध्र इ+ाम (रैय वाड़ी में संपरिरव:+ एवं उन्मूल+ अति*वि+यम) 1956 क े अर्थी: में एक *मा:र्थी: संस्र्थीा मा+ा Sा सक ा है। सिSस+े प्रश्नग इ+ाम विदया, ज्ञा +हीं र्थीा। अपीलक ा: +े एक उद्घोषर्णा की मांग की विक इ+ाम में शाविमल संपखित्त उसक े +ाम पंSीक ृ की Sाये। इस क: को प्राति*कारिरयों +े अति*वि+यम क े ह इस आ*ार पर खारिरS कर विदया विक अणिभलेखों क े ह, इ+ाम र्टैंक को ही विदया गया र्थीा और अपीलक ा: का पूव:S क े वल *मा:र्थी: संस्र्थीा+, र्टैंक का प्रबं*क र्थीा। अपीलक ा: द्वारा यह क: विदया गया र्थीा विक भले ही इ+ाम को एक *मा:र्थी: उद्देश्य क े खिलए विदया गया र्थीा, लेविक+ दा+ की वस् ु एक र्टैंक र्थीी सिSसे एक *मा:र्थी: संस्र्थीा+ +हीं मा+ा Sा सक ा र्थीा। इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की पीठ +े न्यायमूर्ति क े एस हेगड़े क े माध्यम से वि+म्+ अव*ारिर विकया: "9. उपरोX चचा: से, यह देखा Sा ा है विक हिंहदू विवति* क े ह एक र्टैंक दा+ की वस् ु हो सक ी है और Sब एक र्टैंक क े पक्ष में समप:र्ण विकया Sा ा है, ो इसे एक *मा:र्थी: संस्र्थीा+ मा+ा Sा ा है। हमारे व:मा+ उद्देश्य क े खिलए यह य कर+ा आवश्यक +हीं है विक क्या वह संस्र्थीा+ 95 (1969) 1 एससीआर 624 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एक विवति*क व्यविX क े रूप में मा+ा Sा सक ा है। एक बार Sब हम इस वि+ष्कष: पर पहुँच े हैं विक सिSस इ+ाम क े सार्थी हम इस मामले में संबंति* हैं, वह "उराचेरूवु" (र्टैंक) क े पक्ष में एक इ+ाम र्थीा इस र्टैंक को अति*वि+यम क े ह एक *मा:र्थी: संस्र्थीा+ मा+ा Sा+ा चाविहए।" (प्रभाव वर्ति* ) इस न्यायालय क े खिलए क े वल यह आकल+ कर+ा अपेतिक्ष र्थीा विक क्या एक र्टैंक को आंध्र इ+ाम (रैय वाड़ी में संपरिरव: + और उन्मूल+ अति*वि+यम) 1956 क े अर्थी: क े अन् ग: एक "*मा:र्थी संस्र्थीा" मा+ा Sा सक ा है। इसखिलए, यह स्पष्ट रूप से स्पष्ट विकया गया र्थीा विक र्टैंक एक विवति*क व्यविX है या +हीं, इस पर विवचार कर+े की आवश्यक ा +हीं र्थीी। यह मामला वाद 5 में वाविदयों द्वारा विदए गए कÂ को आगे +हीं बढ़ा ा है। णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क सविमति

150. इस चरर्ण पर णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क सविमति, अमृ सर ब+ाम सोम +ार्थी दास96 में इस न्यायालय क े वि+र्ण:य पर ध्या+ दे+ा आवश्यक है। इस मामले में, एक दो न्याया*ीश पीठ +े गुरु £ंर्थी साविहब को एक विवति*क व्यविX मा+ा। वाद 5 में वादी की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री परसर+ +े यह प्रति वाद कर+े क े खिलए इस वि+र्ण:य पर विवशेष अवलम्ब+ खिलया विक इस न्यायालय +े भौति क संपखित्त को सा*ारर्ण या विवति*क व्यविX मा+ा है। इसखिलए उन्हों+े कहा विक विववाविद संपखित्त पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े खिलए इस न्यायालय क े विवति*शास्त्र में एक का+ू+ी आ*ार है। इस क: का विवश्लेषर्ण कर+े क े खिलए प्रकरर्ण पर कु छ विवस् ार से विवचार कर+ा आवश्यक है। 96 (2004) 4 एससीसी 146 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

151. णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा में 56 व्यविXयों +े सिसख गुरुद्वारा अति*वि+यम 1925 की *ारा 7(1) क े ह इस उद्घोषर्णा क े खिलए एक यातिचका दायर की विक क ु छ विववाविद संपखित्त सिसख गुरुद्वारा र्थीीं। इस आशय की एक अति*सूच+ा Sारी कर+े पर यह आपखित्तयां उठाई गयीं विक विववाविद संपखित्त एक *म:शाला और र्डेरा र्थीी। अति*वि+यम क े ह न्यायाति*करर्ण +े इस आपखित्त को इस आ*ार पर खारिरS कर विदया विक यातिचकाक ा:ओं में सु+े Sा+े क े अति*कार का अभाव र्थीा। इस बीच, णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क सविमति 97 +े दावा विकया विक विववाविद संपखित्त एक सिसख गुरुद्वारा र्थीी और यह विक "गुरू £न्र्थी साविहब" "पूSा की एकमात्र वस् ु र्थीा और यह गुरुद्वारा संपखित्त का एकमात्र माखिलक र्थीा।" सिसख गुरुद्वारा न्यायाति*करर्ण +े एसSीपीसी क े पक्ष में तिर्डक्री की और मा+ा विक विववाविद संपखित्त "एसSीपीसी की र्थीी।"

152. वष: 1921 में Sारी फरमा+ -ए-शाही क े आ*ार पर राSस्व अति*कारी +े "गुरु £ंर्थी साविहब बारSमा+ *म:शाला देह " क े +ाम पर +ामान् रर्ण का आदेश विदया र्थीा। इस प्रकार, इसक े +ाम पर भूविम का स्वाविमत्व कॉलम ब क Sारी रहा Sब क विक सिसख गुरुद्वारा क े रूप में भूविम की घोषर्णा पर आपखित्तयां दS: +हीं की गई ं। न्यायाति*करर्ण क े वि+ष्कषÂ से उच्च न्यायालय क े समक्ष अपील में, यह क: उठाया गया र्थीा विक गुरु £ंर्थी साविहब क े +ाम पर राSस्व अणिभलेख में प्रविवविष्ट शून्य र्थीी क्योंविक यह एक विवति*क व्यविX +हीं है। उच्च न्यायालय +े मा+ा विक गुरु £ंर्थी साविहब एक विवति*क व्यविX +हीं हैं और परिरर्णामस्वरूप गुरु £ंर्थी साविहब क े +ाम पर +ामान् रर्ण अपास् विकए Sा+े क े योग्य र्थीा। यह इस संदभ: में र्थीा विक इस न्यायालय को यह अति*वि+र्ण- कर+े क े खिलए आहू विकया गया र्थीा विक क्या 97 "एसSीपीसी" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गुरु £ंर्थी साविहब एक विवति*क व्यविX है, Sो विववाविद संपखित्त को अप+े +ाम पर स्वाविमत्व रख+े में सक्षम है।

153. विवति*क व्यविX की संकल्प+ा क े विवकास का प ा लगा े हुए न्यायमूर्ति एपी विमश्रा +े उल्लेख विकया विक विवति*क व्यविX की का+ू+ में मान्य ा का+ू+ और समाS की Sरूर ों को पूरा कर+े क े खिलए है। न्यायालय +े अव*ारिर विकया: "19.... Sब दा+दा ा मूर्ति क े खिलए या मस्जिस्Sद क े खिलए या विकसी संस्र्थीा क े खिलए *म:दाय कर ा है ो यह विवति*क व्यविX क े सृS+ को आवश्यक ब+ा दे ा है। 21... पविवत्र या *ार्मिमक प्रयोS+ क े खिलए एक बंदोबस् ी हो सक ी है यह एक मूर्ति, मस्जिस्Sद, चच: आविद क े खिलए हो सक ा है। ऐसी *म:दाय संपखित्त का उपयोग उस उद्देश्य क े खिलए विकया Sा+ा चाविहए। विकसी देव ा को वि+रूविप कर े हुए एक हिंहदू द्वारा विकसी मूर्ति या विकसी प्रति मा की स्र्थीाप+ा और आरा*+ा क े वल एक ऐसा सा*+ है सिSसक े माध्यम से उसकी आस्र्थीा और विवश्वास सं ुष्ट हो ी है। इससे एक विवति*क व्यविX क े रूप में एक मूर्ति की मान्य ा हुई है।

27. पूव X सारांश यह कल्प+ा कर ा है विक समाS की Sरूर ों को पूरा कर+े क े खिलए "न्यातियक व्यविXयों" को क ै से गढ़ा गया र्थीा... अलग-अलग वैचारिरक मान्य ाओं और विवश्वास क े सार्थी दुवि+या क े विवणिभन्न *मÂ में विवणिभन्न क े न्ˆ और आरा*+ा क े खिलए अलग-अलग संस्र्थीाग स्र्थील हैं, लेविक+ सभी का एक ही उद्देश्य है।" (प्रभाव वर्ति* ) न्यायमूर्ति विमश्रा +े आगे उल्लेख विकया: 29...गुरु £न्र्थी साविहब को न्यातियक व्यविX क े रूप में हो+े क े खिलए यह आवश्यक +हीं है विक इसे एक मूर्ति क े समा+ हो+ा चाविहए। Sब दो अलग-अलग *मÂ का आस्र्थीा और विवश्वास अलग हो ा है, ो एक की दूसरे से बराबरी कर+े का कोई सवाल ही +हीं है। यविद "गुरु £न्र्थी साविहब" स्वयं में इसक े ऐसा घोविष विकए Sा+े क े परीक्षर्ण पर खरा उ र सक ा है, ो इसे ऐसा घोविष विकया Sा सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "31. अब इस सवाल पर लौर्ट े हैं विक क्या गुरु £ंर्थी साविहब 'न्यातियक व्यविX' हो सक ा है या +हीं या इसे समा+ स्र्थीा+ पर रखा Sा सक ा है, हम पहले सिसख *म: पर एक +Sर र्डाल लें.... सिसख *म: में, गुरु का सव च्च श्रद्धेय व्यविX क े रूप में आदर विकया Sा ा है...

33. अंति म Sीविव गुरु, गुरु गोहिंबद सिंसह +े, विब+ा विकसी अवि+तिश्च ा क े व्यX विकया विक अब कोई भी Sीविव गुरु +हीं होगा। गुरु £ंर्थी साविहब Sीवन् गुरु होगा। उन्हों+े घोषर्णा की विक "अब से यह आपका गुरु होगा सिSससे आपको अप+ा सारा माग:दश:+ और उत्तर विमलेगा।" इसी विवश्वास क े सार्थी इसे एक Sीविव गुरु की रह पूSा Sा ा है। इसी श्रद्धा और विवश्वास क े सार्थी ही Sब यह विकसी गुरुद्वारा में स्र्थीाविप विकया Sा ा है ो यह पूSा का पविवत्र स्र्थीा+ ब+ Sा ा है। गुरुद्वारा की पविवत्र ा क े वल इसीखिलए है क्योंविक गुरु £न्र्थी साविहब इसमें स्र्थीाविप है। गुरु £ंर्थी साविहब की यह श्रद्धापूर्ण: मान्य ा इसक े अ+ुयातिययों क े हृदय को भी उदार ब+ा ी है विक वे इसक े खिलए *+ और सम्पदा दे सक ें । ऐसा +हीं है विक इसे इसकी Sरूर है, लेविक+ Sब इसे स्र्थीाविप विकया Sा ा है, ो यह अप+े अ+ुयातिययों क े खिलए बढ़ ा है, Sो इसक े प्रति अप+ी श्रद्धा क े माध्यम से अप+े आप को पविवत्र कर े हैं और लंगर चला+े क े खिलए भी स्वयं को पविवत्र कर े हैं, Sो गुरुद्वारा का एक अं र्मि+विह विहस्सा है। 34..... इसे एक "मूर्ति " क े समकक्ष +हीं रखा Sा सक ा है Sैसा विक मूर्ति पूSा सिसख *म: क े विवपरी है। श्रद्धा की अव*ारर्णा अर्थीवा कल्प+ा क े रूप में दो *म: अलग-अलग हैं। हां, एक विवति*क व्यविX क े रूप में इसकी का+ू+ी मान्य ा क े खिलए, दो+ों *मÂ क े अ+ुयायी उन्हें क्रमशः एक ही श्रद्धेय मूल्य दे े हैं...। 42.... सभी कारर्णों से, हमें इस वि+ष्कष: में उच्च न्यायालय क े क: में कोई बल +हीं विमल ा है विक "गुरु £न्र्थी साविहब" एक "न्यातियक व्यविX" +हीं है। उX वि+ष्कष: थ्य और का+ू+ दो+ों विबन्दुओं पर पोषर्णीय +हीं है।" विवद्वा+ न्याया*ीश का दृविष्टकोर्ण यह र्थीा विक एक न्यातियक व्यविX का सृS+ आस्र्थीा क े *ार्मिमक विवश्वासों क े का+ू+ी संरक्षर्ण को सुवि+तिश्च कर+ा र्थीा: "28. आस्र्थीा और विवश्वास को विकसी भी न्यातियक Sांच क े माध्यम से विववि+तिश्च +हीं विकया Sा सक ा है। यह इसक े अ+ुयातिययों द्वारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संपाविद और स्वीक ृ थ्य है। इस आस्र्थीा +े एक "न्यातियक व्यविX" क े रूप में मान्य ा प्राप्त एक इकाई क े सृS+ को आवश्यक ब+ा विदया। यह सब दशा: ा है विक न्यातियक व्यविX विकसी परिरभाविष सीमा से बं*ा +हीं है। बदल े विवचार क े सार्थी, समाS की बदल ी Sरूर ों क े सार्थी, समय-समय पर +ए न्यातियक व्यविXत्व ब+ाए गए र्थीे।" (प्रभाव वर्ति* )

154. मामले क े सूक्ष्म पठ+ से यह उभर ा है: पहला, मामला अचल संपखित्त पर न्यातियक व्यविXत्व क े प्रदा+ कर+े से संबंति* +हीं र्थीा। इस वि+र्ण:य क े दौरा+ इसकी प्रासंविगक ा पर विवचार विकया Sाएगा; दूसरा, *म: क े मामले में, सिसख *म: क े सिसद्धां मूर्ति पूSा क े विवरो* में हैं। Sहां विवति*क व्यविXत्व को हिंहदू विवति* में मूर्ति पर न्यातियक संबं*ों क े भौति क स्र्थील क े रूप में प्रदा+ विकया गया र्थीा, वही सिसख *म: में भौति क काया अ+ुपस्जिस्र्थी र्थीी। इस न्यायालय को इस प्रकार एक काया का प ा लगा+े की आवश्यक ा र्थीी, सिSस पर न्यातियक व्यविXत्व को मान्य ा दी Sा सक ी है, यह क े वल इस अव*ारर्ण क े परिरर्णामस्वरूप र्थीा विक अदाल यह य कर सक ी र्थीी विक क्या विववाविद संपखित्त गुरु £ंर्थी साविहब में एक न्यातियक व्यविX क े रूप में वि+विह है। Sैसा विक ऊपर कहा गया है, आवश्यक ा प्रायः न्यातियक व्यविXत्व प्रदा+ कर+े का आ*ार हो ी है। इस मामले में, Sैसा विक यह हिंहदू विवति* में मूर्ति क े मामले में है, गुरु £ंर्थी साविहब क े विवति*क व्यविXत्व को उस काया क े रूप में मान्य ा दे+ा का+ू+ी रूप से समीची+ र्थीा, सिSस पर न्यातियक व्यविXत्व को यह वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए प्रदा+ विकया Sाएगा विक क्या संपखित्त गुरु £ंर्थी साविहब में वि+विह हो सक ी है।

155. णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा का वि+र्ण:य इस बा की पुविष्ट कर ा है विक एक अं र्मि+विह उद्देश्य है Sो वस् ुओं पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े क ें ˆ में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है। विवणिभन्न *मÂ का मूल्यांक+ उ+की स्वयं की आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार विकया Sा ा है। सिसख *म: में मूर्ति पूSा क े अभाव +े गुरु £ंर्थी साविहब पर न्यातियक व्यविXत्व प्रदा+ कर+े को आवश्यक ब+ा विदया Sो विक सिसक्ख *म: क े सिसद्धां ों क े अ+ुसार गुरु हैं। द+ुसार, ब यह अव*ारिर विकया गया विक विववाविद संपखित्त गुरु £न्र्थी साविहब में वि+विह है। र्थीयराम्मल

156. अं में र्थीयराम्मल ब+ाम क+काम्मल98 में एक पत्र्थीर क े णिशलालेख पर लेख+ क े माध्यम से वाद संपखित्तयों को *म:चत्रम (कारवां सराय) क े रूप में S+ ा क े उपयोग क े खिलए समर्मिप विकया गया र्थीा Sहां यात्री और श्रद्धालु आश्रय ले सक े र्थीे और Sलपा+ प्रदा+ विकया Sा सक ा र्थीा। संपखित्त "एक विवश्राम स्र्थील क े रूप में आम S+ ा क े खिलए समर्मिप र्थीी।" विकसी न्यासी का उल्लेख +हीं विकया गया र्थीा और समप:र्ण क े गवाह स्वयं भगवा+ त्यागराS र्थीे। वादी +े समर्मिप संपखित्त (अ+ुसूची ए) क े एक विहस्से क े कब्Sे में हो+े का दावा विकया और आरोप लगाया विक अ+ुसूची बी संपखित्त क े एक विहस्से का प्रति वाविदयों द्वारा अति क्रमर्ण विकया गया र्थीा Sो बेदखली क े खिलए दायी र्थीे। प्रति वाविदयों +े मुकदमा इस आ*ार पर प्रति वाद विकया विक उन्हों+े एक समझौ ा तिर्डक्री वि+ष्पाविद कर+े क े दौरा+ की गयी अदाल ी विबक्री में विवक्रय क े माध्यम से संपखित्त क े विहस्से का स्वत्व प्राप्त विकया र्थीा। उच्च न्यायालय +े वि+ष्कष: वि+काला विक समझौ ा तिर्डक्री दुरणिभसंति* र्थीी और वादी को भी एक प्रकस्जिल्प न्यासी क े रूप में कोई अति*कार +हीं र्थीा। द+ुसार, शासकीय न्यासी अति*वि+यम 1913 क े ह प्र*ा+ प्रशासक को न्यास क े प्रबं*+ को 98 (2005) 1 एससीसी 457 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संभाल+े क े खिलए वि+द†णिश विकया गया र्थीा। इस न्यायालय क े समक्ष मुख्य प्रश्न यह र्थीा विक क्या एक न्यास या *मा:र्थी: बंदोबस् ी ब+ाई गई र्थीी।

157. न्यायालय +े णिशलालेख का विवश्लेषर्ण विकया और अव*ारिर विकया विक वाद संपखित्त *मा:र्थी: उद्देश्यों क े खिलए समर्मिप र्थीी और इसे वादी द्वारा न्यासी क े रूप में या प्रति वादी द्वारा माखिलक क े रूप में दावा +हीं विकया Sा सक ा र्थीा। हालाँविक वि+र्ण:य क े दौरा+ न्यायालय की ओर से न्यायमूर्ति र्डीएम *मा:ति*कारी +े अव*ारिर विकया: "16. एक *ार्मिमक बंदोबस् ी विकसी क े पक्ष में समर्मिप संपखित्त क े संबं* में स्वत्व वि+र्मिम +हीं कर ी है। एक संपखित्त Sो *ार्मिमक या *मा:र्थी: उद्देश्य क े खिलए समर्मिप है, सिSसक े खिलए संपखित्त क े माखिलक या दा ा +े विकसी प्रशासक या प्रबन्*क का उल्लेख +हीं विकया है वो स्वामीही+ सम्पखित्त हो Sा ी है सिSसे विवद्वा+ लेखक +े विक ाब (उपरोX) में ऐसी सम्पखित्त को विकसी से भी संबंति* +हीं हो+ा ब ाया है। आम साव:Sवि+क उपयोग क े खिलए समर्मिप ऐसी संपखित्त स्वयं एक न्यातियक व्यविX की श्रेर्णी में आ Sा ी है। पृष्ठ 35 पर विवद्वा+ लेखक की विर्टप्पर्णी ब ा ी है विक क ै से इस रह की संपखित्त स्वयं व्यविX में एक न्यातियक व्यविX क े रूप में वि+विह हो ी है... यह विवचार वही है, अर्थीा: ् Sब संपखित्त विकसी विवशेष उद्देश्य क े खिलए समर्मिप हो ी है, ो संपखित्त स्वयं सिSस पर उद्देश्य प्रभाविव हो ा है, एक न्यातियक व्यविX की श्रेर्णी में आ Sा ी है ाविक समर्मिप संपखित्त ऐसे वि+र्मिम व्यविX में वि+विह हो सक े ।" वि+र्ण:य क े सूक्ष्म पाठ+ से प ा चल ा है विक मामले में आ£ह विकया गया प्रमुख क: यह र्थीा विक *म:चत्रम क े रूप में वर्भिर्ण संपखित्त विमल+ार्डु हिंहदू *ार्मिमक और *मा:र्थी: बंदोबस् ी अति*वि+यम 1959 की *ारा 6 (5) क े ह एक "*मा:र्थी: बंदोबस् ी" क े रूप में शाविमल है। इस न्यायालय +े मा+ा विक *म:चत्रम क े खिलए संपखित्त का समप:र्ण, कठोर विवति*क अर्थी: में, + ो एक उपहार है और + ही एक न्यास है। इस न्यायालय +े मा+ा विक संपखित्त Sो mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एक *मा:र्थी: उद्देश्य क े खिलए समर्मिप र्थीी, उसे वादी द्वारा न्यासी क े रूप में या प्रति वादी द्वारा माखिलक क े रूप में दावा +हीं विकया Sा सक ा है। इस वि+ष्कष: से न्यायालय का विवचार र्थीा विक यह विमल+ार्डु हिंहदू और *मा:र्थी: बंदोबस् ी अति*वि+यम 1959 र्थीा सिSससे मामला शासिस है और द+ुसार 1959 अति*वि+यम क े ह आयुX और राज्य सरकार द्वारा प्रशास+, प्रबं*+ और रखरखाव क े खिलए वाद संपखित्त को वि+यंत्रर्ण में खिलया Sाएगा।

158. *ार्मिमक *मा:र्थी: संस्र्थीा+ की स्जिस्र्थीति का आकल+ कर+े में इस न्यायालय +े प्रस् र 16 में क ु छ विर्टप्पर्णीयाँ की, सिSस पर अवलम्ब+ खिलया गया है। न्यायालय इस आ*ार पर आगे बढ़ा विक वाद संपखित्त एक विवणिशष्ट उद्देश्य क े खिलए समर्मिप की गई र्थीी और यह प्रति वादी क े स्वाविमत्व में +हीं हो सक ी र्थीी। यह उस उद्देश्य की सुरक्षा सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए र्थीा सिSसक े खिलए संपखित्त समर्मिप की गयी र्थीी। गौर लब है विक समप:र्ण विवलेख +े *म:दाय संपखित्त क े खिलए एक प्रबं*क की पहचा+ +हीं की और न्यायालय +े *म:दाय क े पीछे क े आशय पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ करक े संपखित्त की रक्षा कर+े का प्रयास विकया। यद्यविप न्यायालय +े ऊपर विवश्लेषर्ण विकए गए सैद्धांति क ढांचे क े आ*ार पर का+ू+ की स्जिस्र्थीति का आकल+ विकया, ऊपर दी गई विर्टप्पणिर्णयों से लग ा है विक संपखित्त को स्वयं एक न्यातियक व्यविX की स्जिस्र्थीति क बढ़ा विदया गया र्थीा। मामले को सम£ रूप से पढ़+े क े सार्थी-सार्थी सैद्धांति क व्याख्या से, सिSसका विवचार विकया गया है, की गयी विर्टप्पणिर्णयों को *म:दाय क े पीछे क े उद्देश्य की रक्षा क े प्रकाश में पढ़ा Sा+ा चाविहए और यह अ+ुमा+ +हीं कर+ा चाविहए विक संपखित्त को स्वयं विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सम्पखित्तयों का समप:र्ण

159. श्री सी एस वैद्य+ार्थी+ को संदर्भिभ मामले, विववाविद भूविम पर इस न्यायालय द्वारा विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े परिरर्णाम से संबंति* हैं। वाद 5 में वादी की ओर से विकए गए क: की सहाय ा से दूर, विक विद्व ीय वादी एक विवति*क व्यविX है, ऊपर विदए गए मामले पुविष्ट कर े हैं विक हिंहदू मूर्ति यों पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े की प्रर्थीा अदाल ों द्वारा यह सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए विवकसिस की गई र्थीी विक का+ू+ पया:प्त रूप से *ार्मिमक उद्देश्यों क े खिलए *म:दाय की गयी संपखित्तयों की सुरक्षा करे। Sैसा विक विवणिशष्ट मूर्ति यों को बड़ी संख्या में *म:दाय विकए गए र्थीे, न्यायालय +े मूर्ति को एक क े न्ˆ क े रूप में रखा सिSसमें *म:दाय क े अति*कार, शविXयां, विवशेषाति*कार और उन्मुविXयाँ वि+विह होगीं। ऐसी *म:दाय की गयी संपखित्तयों की रक्षा क े खिलए विवणिशष्ट साव:Sवि+क विह को पूरा कर+े क े खिलए और न्यातियक संबं*ों का एक क ें ˆ ब+ा+े क े खिलए विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया गया र्थीा। आवश्यक ा +े का+ू+ में एक इकाई क े वि+मा:र्ण और मान्य ा को अवि+वाय: ब+ा विदया, यह अदाल ों को प्राक ृ ति क व्यविXयों और मूर्ति क े बीच विवति*क संबं*ों और परिरर्णामस्वरूप मूर्ति में वि+विह सम्पखित्त को विववि+यविम कर+े की अ+ुमति दे ा है। इ+ मामलों को उस स्जिस्र्थीति में संदर्भिभ विकया Sाएगा Sब अदाल यह वि+*ा:रिर कर ी है विक विद्व ीय वादी एक विवति*क व्यविX है। आस्र्थीा और विवश्वास mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

160. वि+र्ण:य और उ+की विर्टप्पणिर्णयाँ सिS+को संदर्भिभ विकया गया है, वे दा+ या समर्ण:र्ण क े सकारात्मक काय: क े अस्जिस् त्व पर आ*ारिर हैं। यह +ोर्ट कर+ा प्रासंविगक है विक वाविदयों का विववाविद स्र्थील अर्थीा: ् भूविम पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकए Sा+े का दावा एक अणिभव्यX समप:र्ण पर आ*ारिर +हीं है। यह आ£ह विकया गया र्थीा विक क े न्ˆीय गुम्बS क े +ीचे सिSस स्र्थीा+ पर मूर्ति याँ रखी हुई हैं, वह भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ है। उपासकों की आस्र्थीा और विवश्वास सव परिर है। हिंहदू विववाविद स्र्थील क े चारो ओर इस आस्र्थीा और विवश्वास क े सार्थी परिरक्रमा कर े हैं विक यह भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है। इस प्रकार यह क: विदया गया है विक *ार्मिमक उपास+ा स्र्थील क े रूप में 'स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम' को उपासकों की आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर एक विवति*क व्यविX की प्रास्जिस्र्थीति क बढ़ाया Sा+ा चाविहए। यह क: विदया गया र्थीा विक हिंहदू *म: में एक मूर्ति की उपस्जिस्र्थीति गौर्ण है, यह एक स्जिस्र्थीति पर विवचार कर ा है Sैसे विक हमारे समक्ष क े मामले में, Sहां भूविम को स्वयं एक देव ा क े रूप में पूSा Sा ा है। भX भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में भूविम की प्रार्थी:+ा कर े हैं, और परिरर्णामस्वरूप, यह आ£ह विकया गया है, विद्व ीय वादी को विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा दी Sा+ी चाविहए।

161. वाद 5 में वादी की ओर से Sो क: विदया गया है, वह एक हिंहदू *म:दाय पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े मामले से ास्जित्वक रूप से अलग है। एक *म:दाय क े मामले में, न्यायालयों +े संस्र्थीा में वि+विह *मा:र्थी: या *ार्मिमक उद्देश्य को संस्र्थीा पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े आ*ार क े रूप में मान्य ा दी है। ऐसा कर+े में न्यायालय इस प्रकार *म:दाय की गयी सम्पखित्त क े संरक्षर्ण क े खिलए संस्र्थीापक या वसीय क ा: क े पविवत्र उद्देश्य को मान्य ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दे ी है। हालांविक, यह वाद 5 में वाविदयों का मामला +हीं है विक विद्व ीय वादी क े रूप में संपखित्त देवोत्तर संपखित्त है। बस्जिल्क एक "न्यातियक व्यविX" का क: देकर वादी +े इस न्यायालय से विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े खिलए एक अति रिरX आ*ार -भXों की आस्र्थीा और विवश्वास को सृसिS कर+े का आ£ह विकया है। इस न्यायालय क े समक्ष विदए विवणिभन्न कÂ क े मध्य, यह +वोन्वेषी विवति*क दावा व:मा+ विववाद क े क ें ˆ में है।

162. वाद 5 में वाविदयों द्वारा आ£ह विकए गए क: को स्वीकार कर+े में पहली कविठ+ाई इस व्यावहारिरक प्रश्न से ही उभर ी है विक इस रह की अचल संपखित्त को क ै से सीमांविक विकया Sा+ा है। *म:दाय संपखित्तयों क े मामले क े विवपरी सिSन्हें स्वयं *म:दाय विवलेख या खिलख में सीमांविक विकया Sा ा है, Sहां भXों की आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े की मांग की Sा ी है, भX स्वयं इस संपखित्त की सर्टीक रूप- रेखा पर सहम +हीं हो सक े हैं। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े मस्जिस् ष्क में सीमांक+ का प्रश्न आया सिSन्हो+ें कहा:

"1887. शब्द "स्र्थीा+" का अर्थी: क्या होगा और इसकी सीमा क्या हो+ी चाविहए? क्या यह एक छोर्टी सी Sगह होगी Sो आम ौर पर एक इंसा+ के Sन्म के खिलए आवश्यक हो ी है या क्या यह पूरे कमरे, घर, इलाके, शहर के एक क्षेत्र को कवर करेगा या कभी-कभी कोई इससे भी अति*क कह सक ा है। हम Sा+ े हैं विक हिंहद ू गंगा , यमु+ा, +म: दा, मा+सरोवर आविद +विदयों और झीलों की पूSा कर े हैं। वे बहु पाव+ व पविवत्र हैं। कई स्र्थीा+ों पर बहु से मंविदर इत्याविद उX +विदयों के आसपास या इ+के विक+ारे ब+ाए गए हैं। गंगोत्री, यमु+ोत्री (उत्तरांचल राज्य) र्थीा अमरकंर्टक (+म: दा +दी के खिलए) Sैसी पविवत्र +विदयों का उद्गम भी ु ं के खिलए उपास+ा स्र्थील है। क्या यह कहा Sा सक ा है विक इ+ हिंहदओ +विदयों द्वारा य की गयी पूरी दरू ी एक "विवति*क व्यविXत्व" का गठ+ और अपेक्षाओं को सं ुविष्ट करेगी। यह अप्रांसविगक +हीं है विक कई स्र्थीा+ों पर

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गंगा, +म:दा, यमु+ा आविद क े मंविदर का वि+मा:र्ण विकया गया है और वे अप+े स्वयं क े अति*कारों में *ार्मिमक *म:दाय हैं, ऐसे सभी विवति*क अति*कारों और दातियत्वों इत्याविद का उपभोग कर े हैं Sो इस रह क े *म:दायों क े खिलए उपलब्* हैं। इसी प्रकार क ु छ पहाड़ी या पव: या पहाड़ी भू-भाग Sैसे क ै लाश, गोब*:+, कामर्थीविगरी आविद उपास+ा स्र्थील मा+े Sा े हैं।" (प्रभाव वर्ति* ) परिरक्रमा

163. इ+ कविठ+ाइयों क े बावSूद विवद्वा+ न्याया*ीश +े वि+ष्कष: वि+काला विक 'स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम' एक विवति*क व्यविX र्थीा। हमारे समक्ष यह आ£ह विकया गया र्थीा विक संपूर्ण: अयोध्या विवति*क व्यविX +हीं है, बस्जिल्क क े वल विववाविद संपखित्त है। Sब खंर्डपीठ द्वारा कणिर्थी विवति*क व्यविX की भौति क सीमाओं का एक प्रश्न उठाया गया, ो यह कहा गया विक विववाविद संपखित्त क े चारों ओर परिरक्रमा विकए Sा+े +े उस संपखित्त को वि+रूविप विकया सिSसकी Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में उपास+ा की गई र्थीी और विदव्य हो+े क े कारर्ण इस संपखित्त पर एक न्यातियक व्यविX की प्रास्जिस्र्थीति प्रदा+ की Sा+ी चाविहए। इस दृविष्ट से, परिरक्रमा +े विवति*क व्यविX की सीमाओं को तिचवि- कर+े का काय: विकया। दूसरी ओर, र्डॉ. *व+ +े कहा विक परिरक्रमा मात्र एक पूSा का रूप है + विक विकसी संपखित्त की सीमाओं को तिचवित्र कर+े की विवति* है।

164. एक छोर्टी-सी मूर्ति, ीर्थी:स्र्थील, मंविदर या भूविम, सिSसमें मस्जिन्दर स्जिस्र्थी है, क े चारो ओर परिरक्रमा की Sा सक ी है। विफर भी इसका मूल उद्देश्य विदव्य की उपास+ा कर+ा है और यह इस विवश्वास क े सार्थी विकया Sा ा है विक परिरक्रमा से परिरक्रमाक ा: को कु छ आध्यास्जित्मक लाभ प्राप्त होगा। सिSस संपखित्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा ा है, उसकी सर्टीक सीमाओं को तिचवि- कर+े क े खिलए परिरक्रमा +हीं की Sा ी है। परिरक्रमा कर+ा, आस्र्थीा और विवश्वास क े मामले क े रूप में की गई उपास+ा का एक रूप है, इसका संपखित्त पर माखिलका+ा दावे क े खिलए का+ू+ में एक पात्र ा क े आ*ार क े रूप में दावा +हीं विकया Sा सक ा है। भगवा+ राम Sा+कीSी

165. भगवा+ राम Sा+कीSी ब+ाम विबहार राज्य99 में इस न्यायालय द्वारा की गई विर्टप्पणिर्णयों पर वाद 5 में वाविदयों क े अति*वXा +े यह क: कर+े क े खिलए अवलम्ब+ खिलया विक विकसी देव ा को प्रार्ण-प्रति विष्ठ कर+े का रीका व्यविXपरक है और भXों क े दृढ़ संकल्प पर आ*ारिर है। यह क: विदया गया विक भXों द्वारा चु+ा गया प्रार्ण-प्रति ष्ठा का कोई भी रीका देव ा पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े खिलए पया:प्त है। उस मामले में अदाल क े समक्ष यह प्रश्न र्थीा विक क्या उतिच अ+ुष्ठा+ों करक े विकसी देव ा की दृश्यमा+ छविव क े सार्थी प्रार्ण प्रति ष्ठा कर+े से एक वै* देव ा की स्र्थीाप+ा हुई सिSस पर "विबहार भूविम सु*ार (अति*कत्तम सीमा वि+*ा:रर्ण और अति*शेष भूविम अS:+ ) अति*वि+यम 1961 क े उद्देश्य क े खिलए" विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया Sा सक ा है। दो समप:र्ण विवलेख वि+ष्पाविद विकए गए र्थीे- एक भगवा+ राम Sा+कीSी को और दूसरा भगवा+ ठाक ु र राSा को। दो+ों देव ाओं को णिभन्न इकाईयों क े रूप में मान्य ा दी गई र्थीी, उन्हें अलग-अलग संपखित्तयाँ दी गई र्थीी और सेवाय क े माध्यम से कब्Sे में रखा गया र्थीा। दो+ों देव ा समर्मिप संपखित्त क े भी र अलग-अलग मंविदरों में स्जिस्र्थी र्थीे। 99 (1999) 5 एससीसी 50 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

166. तिर्डप्र्टी कलेक्र्टर +े सीलिंलग क्षेत्र क े वि+*ा:रर्ण क े प्रयोS+ों क े खिलए देव ाओं को इस आ*ार पर दो भूविम इकाइयों की अ+ुमति दी विक अलग - अलग देव ा हैं सिS+क े खिलए भूविम दा+ में दी गई र्थीी। कलेक्र्टर +े असहमति S ाई और इस आ*ार पर एकल इकाई की अ+ुमति दी विक दो+ों देव ाओं द्वारा *ारिर सम्पूर्ण: संपखित्त को *ार्मिमक न्यास बोर्ड: क े ह गविठ एक सविमति द्वारा प्रबंति* विकया Sा+ा र्थीा और देव ाओं को दा+ की गई संपखित्त को अलग-अलग मा+े Sा+े का कोई सबू +हीं र्थीा। इस अदाल +े इसका उत्तर चाहा विक क्या दो देव ा अलग-अलग और णिभन्न का+ू+ी इकाईयाँ र्थीीं। यह ध्या+ रख+ा उतिच है विक उच्च न्यायालय क े एकल न्याया*ीश +े मा+ा विक ठाक ु र राSा (या राSा रा+ी) क े रूप में देव ा की छविव की Sा+कारी हिंहदू *म:£ंर्थीों में +हीं विमल ी और इसखिलए कोई दूसरा देव ा +हीं है सिSसक े खिलए एक अलग समप:र्ण विकया Sा सक ा है। यह इस संदभ: में है विक इस न्यायालय +े न्यायमूर्ति उमेश ब+S- क े माध्यम से विर्टप्पर्णी की: "14. हिंहदू प्राति*कारिरयों क े अ+ुसार प्रति मा दो प्रकार की हो ी है: पहली स्वयंभू या स्वयं अस्जिस् त्वमा+ या स्वयं प्रकर्ट क े रूप में Sा+ा Sा ी है, Sबविक दूसरी प्रति विष्ठ या स्र्थीाविप है। पद्म पुरार्ण में कहा गया है: "पत्र्थीर, पृथ्वी, लकड़ी, *ा ु या इस प्रकार से ब+ाई गई हरिर (ईश्वर) की प्रति मा और वेदों, स्मृति यों व ंत्रों में वि+*ा:रिर अ+ुष्ठा+ों क े अ+ुसार स्र्थीाविप की गई प्रति मा को स्र्थीाविप प्रति मा कहा Sा ा है... सिSस स्र्थीा+ पर स्ववि+यंवित्र विवष्र्णु +े स्वयं को पत्र्थीर या लकड़ी में मा+व Sाति क े लाभ क े खिलए स्र्थीाविप विकया है, उसे ही स्वयं प्रकर्ट कहा Sा ा है। (बी. क े. मुखS-- विहन्दू लॉ ऑफ रिरलीसिSयस और चेरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट, 5 वां संस्करर्ण) स्वयंभु या स्वयं-प्रकर्ट प्रति मा प्रक ृ ति का एक उत्पाद है और यह अ+ाविद है या विब+ा विकसी प्रारंभ का है और उपासक क े वल अप+े अस्जिस् त्व की खोS कर े हैं और ऐसी प्रति माओं क े खिलए अणिभषेक या प्रार्ण-प्रति ष्ठा की आवश्यक ा +हीं है विकन् ु मा+ववि+र्मिम प्रति मा क े खिलए प्रार्ण-प्रति ष्ठा की आवश्यक ा हो ी है। इस मा+व-वि+र्मिम छविव को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दीवार या क ै +वास पर तिचवित्र विकया Sा सक ा है। साल£ाम णिशला +ारायर्ण को देव ाओं क े देव ा क े रूप में प्रदर्भिश कर ी है और विवष्र्णु भगवा+ को दशा: ी है। यह एक णिशला है- शाल£ाम रूप देव ाओं क े देव ा, +ारायर्ण और विवष्र्णु का रूप *ारर्ण कर ा है।" न्यायालय +े ब यह मा++े क े खिलए पूव:व - सव†क्षर्ण विकया विक Sब एक मूर्ति को आम ौर पर एक मंविदर में प्रार्ण-प्रति विष्ठ विकया Sा ा है, ो यह एक आवश्यक श: +हीं प्र ी हो ी है। न्यायालय +े मा+ा: "16... यविद लोग मंविदरों की *ार्मिमक प्रभावोत्पादक ा में विवश्वास कर े हैं ो अन्य क्षेत्रों क े संबं* में कोई अन्य आवश्यक ा +हीं है और विवद्वा+ न्याया*ीश +े विहन्दू शास्त्रों क े इस पहलू की पूरी रह अ+देखी की है- विकसी प्रसंग में हिंहदुओं क े पास शास्त्रों में अविग्न देव ा, वायु देव ा हैं- ये देव ा आकारही+ और रूपही+ हैं, लेविक+ हर अ+ुष्ठा+ क े खिलए हिंहदू देव ा क े समक्ष अप+ी आहुति दे े हैं। देव ा को दी Sा+ी आहुति उसकी पूर्ण: ा है- विवद्वा+ एकल न्याया*ीश र्थीाविप उस पर कोई अवलम्ब+ + ले+े क े खिलए सं ुष्ठ र्थीे। एक विवशेष प्रति मा न्यातियक व्यविX +हीं है, बस्जिल्क यह म+ की एक विवशेष प्रवृखित्त है Sो प्रति मा को अति*विष्ठ कर ी है।"

167. न्यायालय द्वारा अवलम्ब खिलए गए सभी मामले विवणिभन्न संविवति*यों क े अ*ी+ मंविदर की अपेक्षाओं से संबंति* हैं या Sो *ार्मिमक उपास+ा स्र्थील गविठ कर ा है, से संबंति* हैं। न्यायालय की विर्टप्पणिर्णयाँ पूSा क े क ें ˆ का प ा लगा+े का आ*ार दे ी हैं, सिSसक े अ+ुसार इसे एक वि+तिश्च छविव की आवश्यक ा +हीं है और यह उपासक की आस्र्थीा और विवश्वास पर आ*ारिर है। न्यायालय की विर्टप्पणिर्णयां यह वि+*ा:रिर कर+े क े संदभ: में र्थीीं विक क्या एक वै* देव ा मौSूद है सिSसक े खिलए समप:र्ण विकया Sा सक ा है। यह सवाल विक क्या दूसरा देव ा एक अलग विवति*क व्यविX र्थीा, यह विबहार भूविम सु*ार (अति*कत्तम सीमा वि+*ा:रर्ण और अति*शेष भूविम अS:+) अति*वि+यम 1961 क े प्रयोS+ों क े खिलए एक अलग इकाई का गठ+ कर+े वाले दूसरे देव ा क े पक्ष mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में समप:र्ण क े विवलेख की वै* ा को वि+*ा:रिर कर+े की आवश्यक ा क े कारर्ण उत्पन्न हुआ र्थीा। यह क े वल एक वै* देव ा की स्र्थीाप+ा क े परिरर्णामस्वरूप है विक समर्मिप संपखित्त आदश: अर्थीÂ में स्र्थीाविप देव ा में वि+विह होगी।

168. यह +हीं कहा Sा सक ा है विक एक वै* देव ा की स्र्थीाप+ा या प्रार्ण- प्रति ष्ठा क े संबं* में न्यायालय की विर्टप्पर्णीयाँ, भXों की आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर संपखित्त पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े संबं* में समा+ बल क े सार्थी लागू हो ी हैं। इस न्यायालय द्वारा अप+ाए गए दृविष्टकोर्ण का अं र्मि+विह औतिचत्य वि+म्+खिलखिख विर्टप्पणिर्णयों में स्पष्ट विकया गया है: "17. मूर्ति पूSा से संबंति* एक बुवि+यादी सिसद्धां को ध्या+ में रख+ा चाविहए "विक उपास+ा क े प्रयोS+ों क े खिलए भX विकसी भी भगवा+ को चु+ सक ा है और इस उद्देश्य क े सार्थी विकसी भी प्रति मा को वह स्र्थीाविप र्थीा प्रार्ण-प्रति विष्ठ कर सक ा है, प्रति मा सव च्च ईश्वर का प्रति वि+ति*त्व कर ी है और विकसी को +हीं। विवणिभन्न देव ाओं क े मध्य कोई श्रेष्ठ ा या ही+ ा +हीं है। णिशव, विवष्र्णु, गर्णपति या सूय: प्रत्येक की सृविष्ट क े वि+मा: ा, पालक और सव च्च स्वामी क े रूप में स् ुति की Sा ी है। प्रति मा क े वल वि+राकार ईश्वर को एक +ाम और रूप दे ी है और स+ा + हिंहदू विवचार यह है विक रूप की अव*ारर्णा क े वल उपासक क े लाभ क े खिलए है और क ु छ +हीं।" (बी. क े. मुखS-- विहन्दू लॉ ऑफ रिरलीसिSयस ए°ड़ चैरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट, 5 वां संस्करर्ण)" (प्रभाव वर्ति* ) भगवा+ राम Sा+कीSी में की गयी विर्टप्पणिर्णयां एक देव ा की स्र्थीाप+ा क े खिलए भXों की आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर एक प्रति मा की प्रार्ण-प्रति ष्ठा कर+े क े विवणिशष्ट संदभ: में की गई र्थीीं, सिSसक े खिलए वै* समप:र्ण विकया Sा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक ा है। इस मामले में विर्टप्पणिर्णयों से प ा चल ा है विक एक वै* देव ा क े अस्जिस् त्व का परीक्षर्ण हिंहदू शास्त्रों क े सापेक्ष +हीं बस्जिल्क भXों की आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर विकया Sा+ा र्थीा। एक बार भXों की आस्र्थीा और विवश्वास स्र्थीाविप हो Sा+े क े बाद, यह समप:र्ण का एक अणिभव्यX विवलेख र्थीा सिSसक े परिरर्णामस्वरूप मूर्ति पर विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया गया। इस मामले में विर्टप्पणिर्णयों को एक विवति*क व्यविX क े रूप में संपखित्त की प्रास्जिस्र्थीति प्रदा+ कर+े से Sोड़ा +हीं Sा सक ा है।

169. उस मामले में अदाल इस बा से संबंति* र्थीी विक क्या विकसी देव ा की एक विवणिशष्ट प्रति मा को हिंहदू *म:£ंर्थीों क े सापेक्ष परीतिक्ष विकया Sा+ा चाविहए और यह इस संदभ: में है विक अदाल +े यह मा+ा विक "देवत्व रूपही+, आकारही+ है लेविक+ यह एक विवशेष विदव्य अस्जिस् त्व की मा+व अव*ारर्णा है Sो इसे आक ृ ति, आकार और रंग दे ा है।" व:मा+ मामले में समप:र्ण का कोई अणिभव्यX विवलेख +हीं है। भगवा+ राम Sा+कीSी का मामला इस प्रस् ाव क े खिलए एक प्राति*कार +हीं है विक क े वल भXों की आस्र्थीा और विवश्वास विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ कर+े क े खिलए पया:प्त है। Sबविक यह *ार्मिमक उपास+ा स्र्थील क े अस्जिस् त्व क े खिलए पया:प्त र्थीा, यह समप:र्ण क े एक विवलेख क े आ*ार पर र्थीा विक विवति*क व्यविXत्व प्रदा+ विकया गया र्थीा। पविवत्र पहाड़ी

170. श्रीमा+ सेठ हुक ु म चंद ब+ाम महाराS बहादुर सिंसह100 में 25 वग: मील की पहाड़ी की पूSा क े अति*कारों क े संबं* में Sै+ समुदाय क े दो संप्रदायों से संबंति* विववाद र्थीा Sो *ार्मिमक महत्व Sुड़ा हुआ र्थीा। विदगंबरों क े अ+ुसार 100 (1993) 38 एलर्डब्ल्यू 306 (पीसी) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पहाड़ी की पविवत्र प्रक ृ ति की अपेक्षा हो ी है विक सिSस क्षर्ण वे पहाड़ी पर पैर रख े हैं, उन्हें प्रक ृ ति क े विवरूद्ध विकसी भी अपरा* से दूर रह+ा चाविहए, यहां क विक र्थीूक+ा से भी। यद्यविप यह श्वे ाम्बर द्वारा भी देखा Sा ा है, विदगंबर +े एक स्जिस्र्थीति को अप+ाया विक कोई विक्रयाविवति* Sो उ+की पूSा से असंग है, Sैसे विक पहाड़ी पर मा+व का वि+यविम और वि+रं र रह+ा पहाड़ी को अपविवत्र कर ा है।

171. 1918 में श्वे ांबरों +े पालगंS क े राSा से विवक्रय द्वारा पहाड़ी का माखिलका+ा हक हासिसल कर खिलया। इसक े बाद पहाड़ी पर सं री और रावित्र चौकीदार ै+ा विकए गए सिS+क े खिलए और अन्य पुSारिरयों क े खिलए आवास ब+ाए गए र्थीे। विदगंबरों +े क: विदया विक पहाड़ी की लहर्टी पर एक द्वार का प्रस् ाविव वि+मा:र्ण पहाड़ी क उ+की पहुंच को बाति* कर+े क े खिलए र्थीा। यह क: कर े हुए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया विक दो+ों पंर्थीों क े खिलए पहार्डी़ पूSा की एक वस् ु र्थीी और इसकी विवशेष स्जिस्र्थीति क े मद्दे+Sर इस पर कोई वि+मा:र्ण +हीं होगा। विवचारर्ण न्याया*ीश +े अव*ारिर विकया विक वादी विदगम्बर यह सुवि+तिश्च कर+े क े हकदार र्थीे विक देव ाओं की *म:दाय संपखित्त क े रूप में पहाड़ी को उ+की आस्र्थीा क े अ+ुसार एक विवशुद्ध स्जिस्र्थीति में रखा Sाये। उच्च न्यायालय +े इस फ ै सले को उलर्ट विदया और अव*ारिर विकया विक पहाड़ी देवोत्तर संपखित्त +हीं र्थीी, बस्जिल्क पालगंS क े राSा की संपखित्त र्थीी सिSसका स्वत्व हस् ां रिर विकया गया र्थीा। इसक े अलावा द्वार का प्रस् ाविव वि+मा:र्ण विदगंबरों की पूSा क े अति*कार को बाति* कर+ा +हीं मा+ा गया।

172. अपील में विप्रवी काउंसिसल +े अणिभलेख पर साक्ष्यों का परीक्षर्ण कर यह वि+ष्कष: वि+काला विक वै* रूप से विवति*क हक राSा में वि+विह र्थीा। राSा और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA श्वे ाम्बरों क े बीच विपछले मुकदमे का परिरर्णाम राSा क े पक्ष में हक विदया गया र्थीा। 1903 में विदगंबरों द्वारा दायर एक वाद में भी राSा क े हक को उ+क े पूSा क े अति*कार क े अ*ी+ स्वीकार विकया। विप्रवी काउंसिसल +े ब पूSा कर+े क े अति*कार क े व्यव*ा+ क े विब+ा पहाड़ी पर की गई गति विवति*यों की सीमा की Sांच की और यह मा+ा विक यह साविब +हीं हुआ विक ी+ों पविवत्र स्र्थीा+ों में चरर्ण रख+े को छोड़कर वाद पत्र में णिशकाय विकए गए विकसी काय: से पूSा क े अति*कार का अल्पीकरर्ण हुआ।

173. विवचारर्ण न्याया*ीश +े वि+ष्कष: वि+काला विक पहाड़ी पूरी रह से इसकी पविवत्र ा क े विवश्वास पर देव ाओं की देवोत्तर संपखित्त र्थीी। इ+ विर्टप्पणिर्णयों पर आपखित्त कर े हुए, विप्रवी काउंसिसल +े मा+ा: "अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश +े अप+े वि+ष्कष: का यह आ*ार ब+ाया है विक पूरी पहाड़ी इसकी पविवत्र ा में अब दो+ो संप्रदायों द्वारा स्वीकाय: विवश्वास क े आ*ार पर Sै+ देव ाओं की देवोत्तर संपखित्त है। Sैसा विक Sस्जिस्र्टस रॉस द्वारा अवलोक+ विकया गया है विक साक्ष्य वि+स्संदेह एक संदेह से परे स्र्थीाविप कर े हैं विक Sै+ समुदाय का विवश्वास है विक पहाड़ी में आध्यास्जित्मक गुर्ण Sुड़ा हुआ है, लेविक+ यह आस्र्थीा का विवषय है और अप+े आप में पहाड़ी क े भौति क स्वाविमत्व का वि+*ा:रर्ण +हीं कर सक ा है।" (प्रभाव वर्ति* ) विप्रवी कौंसिसल +े माखिलका+ा दावे क े खिलए विदगम्बरों द्वारा विदए गए क: को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर विदया Sो संप्रदाय की आस्र्थीा और विवश्वास पर आ*ारिर र्थीे। पूर्ण: स्वत्व का परिरर्णाम mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

174. व:मा+ मामले में, 'श्री राम Sन्म भूविम स्र्थीा+' की एक विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा से प्रश्नग भूविम क े खिलए सभी प्रति स्प*- माखिलका+ा दावे समाप्त हो Sाएंगे। 'पूर्ण: स्वत्व' (भूविम को विवति*क व्यविX का दSा: विदये Sा+ क े परिरर्णामस्वरूप) का दSा: विदये Sा+े से वास् व में स्वत्व की अव*ारर्णा ही वि+रर्थी:क हो Sाएगी। इसक े अलावा, प्रति स्प*- दावों का समाप+ स्र्थीाविप विवति*क सिसद्धान् ों से +ही, बस्जिल्क विवशुद्ध रूप से आस्र्थीा और श्रद्धालुओं क े विवश्वास क े आ*ार पर होगा। इसे का+ू+ में +हीं मा+ा Sा सक ा है। अदाल ों द्वारा विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया Sा+ा आवश्यक ा और सुविव*ा से उत्पन्न एक +वाचार है। हिंहदू मूर्ति यों को विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदये Sा+े की बा इस मूल प्रश्न क े कारर्ण उत्पन्न हुई विक, संपखित्त विकसे समर्मिप र्थीी और समर्मिप भूविम विकसमें वि+विह र्थीी। श्रद्धालुओं क े विह और संपखित्त का क ु प्रबं*+ से संलक्षर्ण ऐसे दो स्पष्ट विह र्थीे सिS+का विवति*क संरक्षर्ण आवश्यक र्थीा। व:मा+ मामले में, समर्मिप विकये Sा+े का कोई काय: विवद्यमा+ +हीं है इसखिलए यह प्रश्न विक संपखित्त विकसे समर्मिप की गई र्थीी, +हीं उठ ा। परिरर्णामस्वरूप विवति*क व्यविX क े रूप में समप:र्ण क े पीछे क े पविवत्र उद्देश्य को पहचा++े की आवश्यक ा भी उत्पन्न +हीं हो ी है। स्वंभू क:

175. इस बा पर ध्या+ दे+ा प्रासंविगक है विक, Sवाब में, श्री परासर+ +े र्थीोड़ा अलग क: विदया है। वाद 5 में वादीगर्ण की ओर से विदया गया प्रारंणिभक क: यह र्थीा विक विववाविद स्र्थील पर इस आस्र्थीा और विवश्वास क े सार्थी पूSा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sा+ा विक यह स्र्थीा+ भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है, इस न्यायालय क े खिलए विववाविद स्र्थील को न्यातियक व्यविXत्व का दSा: दे+े क े खिलए पया:प्त है। प्रत्युत्तर में विदया गया क: यह र्थीा विक, भूविम स्वयंभू देव ा (या+ी स्व- अव रिर देव ा) है। श्री परासर+ +े कहा विक हिंहदू *म: में पूSा क े खिलए मूर्ति आवश्यक +हीं है। यह क: विदया गया विक मूर्ति देवत्व क े प्र ीक क े रूप में पविवत्र है, हालांविक सभी पूSा एक अखंर्ड सव च्च सत्ता की हो ी है। मूर्ति और देव ाओं की बहु ाय क े वल सव च्च सत्ता क े विवणिभन्न पहलुओं का गठ+ कर ी है। इसखिलए विवति* को, सिSस रूप में भी ईश्वर प्रकर्ट हो ा है, उसे मान्य ा दे+ी चाविहए। यह क: विदया गया र्थीा विक दूसरा वादी एक देव ा है Sो खुद को 'भूविम क े रूप में प्रकर्ट कर ा है ' और इसखिलए राम Sन्मभूविम का न्यातियक व्यविXत्व विववाविद स्र्थील की अचल संपखित्त में वि+विह है। श्री परासर+ क े क: क े अ+ुसार, विववाविद स्र्थील पर पूSा क े वल भगवा+ राम की ही +हीं की Sा ी र्थीी बस्जिल्क उस भूविम की भी सिSस पर भगवा+ राम का Sन्म ले+ा कहा Sा ा है। इस संबं* में कई मंविदरों क े अस्जिस् त्व का अवलंब खिलया गया है, Sहां विकसी मूर्ति की अ+ुपस्जिस्र्थीति क े बावSूद पूSा की Sा ी र्थीी, इ+में सबसे महत्वपूर्ण: है- विमल+ार्डु का तिचदंबरम मंविदर।

176. दूसरे वादी क े विवति*क व्यविXत्व को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए, श्री परासर+ +े आ£ह विकया विक चूंविक राम Sन्मभूविम एक 'स्वयंभू देव ा' है, इसखिलए न्यायालय को इसक े न्यातियक व्यविXत्व को मान्य ा दे+े क े खिलए विकसी समप:र्ण या अणिभषेक की आवश्यक ा +हीं है। यह क: विदया गया विक इस देव ा की प्रक ृ ति से ही इसक े चारों ओर परिरक्रमा कर+ा आवश्यक हो mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा ा है, सिSस+े उस संपखित्त की सीमाओं का अंक+ हो Sा ा है सिSसे न्यातियक व्यविXत्व का दSा: विदया Sा+ा चाविहए। श्री परासर+ +े क: विदया विक न्यातियक व्यविXत्व क े दS† से भूविम की अति क्रमर्ण या विवलविग विकये Sा+े से बचा+े की आवश्यक ा की पूर्ति होगी। भूविम को Sन्म-स्र्थीा+ मा+ा Sा ा है और हिंहदु इसमें श्रद्धा रख े हैं Sो वहां पर पूSा कर+ा चाह े हैं। परिरर्णामस्वरूप, भूविम की सुरक्षा क े खिलए इसे विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया Sा+ा चाविहए। इ+ कÂ क े समर्थी:+ में श्री परासर+ +े वि+म्+खिलखिख प्रमार्णों का अवलंब खिलया: काशी विवश्व+ार्थी मंविदर क े श्री आविद विवश्वेश्वरा ब+ाम उ.प्र. राज्य101, राम Sा+की Sी विवभूति यां ब+ाम विबहार राज्य102, योगेंˆ +ार्थी +स्कर ब+ाम सीआईर्टी, कलकत्ता103, भूपति +ार्थी 104, म+ोहर गर्णेश ाम्बेकर ब+ाम लखमीराम गोहिंवदराम105, गुरुवायूर देवस्वोम प्रबं* सविमति ब+ाम सी क े राS+106, श्री सभा+ायगर मंविदर, तिचदंबरम ब+ाम विमल+ार्डु राज्य107, हिंपचाई ब+ाम आयुX, हिंहदू *ार्मिमक और *मा:र्थी: अ+ुदा+ बोर्ड: 108, सरस्व ी अम्मल ब+ाम राSगोपाल अम्मल109; कामराSु वेंकर्ट क ृ ष्र्ण राव ब+ाम उप- सिSलाति*कारी110, र्थीायरम्मल ब+ाम क+कम्मल111, णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क

109 1954 SCR 277 110 (1969) 1 SCR 624 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सविमति, अमृ सर ब+ाम सोम +ार्थी दास112 और सप+ेश्वर पूSाप°र्डा ब+ाम रत्+ाकर महापात्रा113 ।

177. र्डा. *व+ +े संक्षेप में यह प्रति वाद विकया विक यद्यविप विहन्दू *म: स्वयंभू देव ा मान्य ा दे ा है, विफर भी ऐसे सभी उदाहरर्णों में भौति क अणिभव्यविX पायी Sा ी है। श्रद्धालुओं की आस्र्थीा और विवस्वास क े अलावा विववाविद स्र्थील को ऐसी ही विकसी भूविम से अलग कर+े वाली कोई भौति क अणिभव्यविX साम+े +हीं आई है।

178. श्री परासर+ क े विवचार में, चाहे विववाविद स्र्थील ऐसी विदव्य ा की अणिभव्यविX क े प्रमार्ण स्वरूप कोई विवणिशष्ट विवशेष ा + हो, श्रद्धालुओं की आस्र्थीा और विवश्वास इस बा को मान्य ा दे+े क े खिलए पया:प्त है विक विववाविद स्र्थील एक स्वयंभू देव ा है। श्री परासर+ द्वारा विदए गए संशोति* क: क े मूल में यह बा है श्रद्धालुओं की आस्र्थीा और विवश्वास इस न्यायालय द्वारा विववाविद स्र्थील को स्वंभू देव ा क े रूप में मान्य ा दे+े और परिरर्णामस्वरूप उसे विवति*क व्यविXत्व का दSा: देे+े क े खिलए पया:प्त है। इस सीमा क, श्री परासर+ +े अप+े उत्तर में Sो क: विदया है, वह श्रद्धा और विवश्वास वाले पहले क: क े समा+ ही है, सिSस आ*ार पर न्यातियक व्यविXत्व का दSा: विदया Sा+ा चाविहए। वाद 5 में वादीगर्ण द्वारा दी गयी दो+ों दलीलों में, श्रद्धालुओं की आस्र्थीा और विवश्वास को न्यातियक व्यविXत्व का दSा: विदए Sा+े क े खिलए एकमात्र आ*ार हो+े का दावा विकया Sा ा है। आस्र्थीा और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवश्वास क े क: का ऊपर पहले ही विवश्लेषर्ण विकया Sा चुका है। हालांविक, विदया गया क: विक विववाविद भूविम एक स्वयंभू देव ा है, हिंहदू विवन्यास विवति* की परिरति* से बाहर क ु छ अति रिरX मुद्दों को उठा ी है। इ+ मुद्दों पर आ+ा अब आवश्यक है।

179. वाद 5 में वादीगर्ण द्वारा विदए गए कÂ को देख े हुए, उ+ मामलों पर ध्या+ दे+ा आवश्यक है सिS+का प्रत्युत्तर में अवलंब खिलया गया है। सिS+ विर्टप्पणिर्णयों पर अवलंब खिलया गया है, वे चुहिं+दा रूप से वि+काली गई हैं और एक बार उस संदभ: को पूरी रह से समझ ले+े पर सिS+में वे की गई हैं, उ+से श्री परासर+ द्वारा विदया गया क: +हीं वि+कल ा।

180. यह क: दे+े क े खिलए विक कोई मंविदर स्वयं एक न्यातियक इकाई है, गुरुवायूर देवस्वोम प्रबं* सविमति ब+ाम सी. क े. राS+114 क े मामले का अवलंब खिलया गया। विववाद देवस्वोम सविमति द्वारा मंविदर मामलों क े क ु प्रबं*+ से संबंति* र्थीा। इस न्यायालय की एक ी+ न्याया*ीशों की पीठ +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक ऐसे मामलों में Sहां राज्य प्राति*कारिरयों क े काय: या वि+स्जिष्क्रय ा द्वारा श्रद्धालुओं का संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 25 और 26 क े अन् ग: अति*कारों का उल्लंघ+ हो ा हो, वे लोकविह वाद क े माध्यम से उच्च न्यायालय या उच्च म न्यायालय में Sा सक े हैं। मंविदर क े न्यातियक व्यविX हो+े का एकमात्र संदभ: वि+र्ण:य क े प्रस् र 40 में दS: विकया गया है। न्यायमूर्ति एस बी सिसन्हा की विर्टप्पर्णी:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “40. श्री सुब्बा राव क े अ+ुसार, S+विह यातिचका क े रूप में शुरू की गई कोई काय:वाही उच्च न्यायालय या इस न्यायालय क े समक्ष भी आएगी, Sहां यह पाया गया हो विक वै*ावि+क प्राव*ा+ों क े अस्जिस् त्व क े बावSूद, राज्य या अन्य वै*ावि+क अति*कारी, णिशकाय ों क े उपचारार्थी: उ+ प्राव*ा+ों का सहारा +हीं ले रहे र्थीे। विकसी भी स्जिस्र्थीति में, चूंविक एक हिंहदू मंविदर एक न्यातियक व्यविX हो ा है, इस थ्य क े कारर्ण ही विक सिसविवल प्रविक्रया संविह ा की *ारा 92 में उसक े संरक्षर्ण का आशय है, इस उद्देश्य क े खिलए ही, अ+ुच्छेद 226 और 32 का भी सहारा खिलया Sा सक ा है। इस संबं* में हमारा ध्या+ योगेन्ˆ +ार्थी ब+ाम सीआईर्टी और म+ोहर गर्णेश ाम्बेकर ब+ाम लखमीराम गोहिंवदराम की ओर आकर्मिष विकया गया है " (प्रभाव वर्ति* ) यह विर्टप्पर्णी विक मंविदर एक विवति*क व्यविX हो ा है, अति*वXा द्वारा दी गई दलील का एक विहस्सा र्थीा ब+ाया और न्यायालय द्वारा अणिभलेख क े खिलए संरतिक्ष विकया गया र्थीा। इस बा का कोई साक्ष्य +हीं है विक इस न्यायालय +े इस क: को स्वीकार विकया विक मंविदर एक विवति*क व्यविX हो ा है। इस वि+र्ण:य पर या प्रस् र 40 में की गई विर्टप्पर्णी पर इस क: हे ु कोई अवलंब +हीं खिलया Sा सक ा विक मंविदर एक विवति*क व्यविX हो ा है।

181. आगे, विब+ा विकसी वि+वासी मूर्ति क े एक मंविदर क े अणिभखिलखिख अस्जिस् त्व को दशा:+े क े खिलए श्री परासर+ +े श्री सभा+ायगर मंविदर, तिचदंबरम ब+ाम विमल+ार्डु राज्य115 का अवलंब खिलया। वि+र्ण:य में विमल+ार्डु क े तिचदंबरम मंविदर का एक संतिक्षप्त इति हास अणिभखिलखिख है। मˆास उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति र्टी राSा +े *ारिर विकया: 115 (2009) 4 CTC 801 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "...तिचदंबरम मंविदर में एक वेदी है सिSसमें कोई मूर्ति +हीं है। वास् व में कोई लिंलगम् भी +हीं है, बस्जिल्क, एक दीवार से एक परदा लर्टका हुआ है, Sब लोग पूSा कर+े Sा े हैं, ब 'लिंलगम्' देख+े क े खिलए परदा हर्टाया Sा ा है। परन् ु परम भX को विदव्य आश्चय: का अ+ुभव होगा विक भगवा+ णिशव वि+राकार हैं अर्थीा: स्र्थीा+ सिSसे "आकाश लिंलगम्" कह े हैं। परदे क े साम+े आरा*+ा की Sा ी है। इस पूSा पद्धति को "तिचदम्बरा रहस्यम" अर्थीा: तिचदम्बरम का रहस्य कहा Sा ा है। " यह वि+र्ण:य श्री परासर+ क े इस क: का अ+ुसमर्थी:+ कर ा है विक मूर्ति क े विब+ा भी कोई मंविदर हो सक ा है। कोई मूर्ति परम सत्ता की एक अणिभव्यविX हो ी है और यह +हीं कहा Sा सक ा है विक विब+ा मूर्ति क े परम सत्ता का अस्जिस् त्व ही +हीं हो ा सिSसकी पूSा की Sा सक े । हालांविक, मˆास उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या अपीलार्थी- और उसक े पूव:S मंविदर क े संस्र्थीापक र्थीे और क्या यह मंविदर क े लौविकक मामलों में राज्य विववि+यम+ क े प्रयोS+ों क े खिलए एक सांप्रदातियक मंविदर र्थीा. उच्च न्यायालय +े इस बा पर विवचार +हीं विकया विक क्या एक मंविदर एक विवति*क व्यविX हो सक ा है और वि+र्ण:य श्री परासर+ क े इस क: का समर्थी:+ +हीं कर ा है विक भौति क अणिभव्यविX क े विब+ा, क े वल खाली भूविम या 'स्र्थीा+' की पूSा मात्र, विवति*क व्यविXत्व का दSा: प्रदा+ कर सक ा है। इसक े अलावा, मामले क े थ्य व:मा+ मामले से स्पष्टः णिभन्न हैं क्योंविक तिचदंबरम मंविदर पविवत्र मा+े Sा+े वाले एक विवणिशष्ट स्र्थीा+ क े आसपास वि+र्मिम एक भौति क संरच+ा है। मूर्ति की अ+ुपस्जिस्र्थीति क े बावSूद, मंविदर देव ा की भौति क अणिभव्यविX क े रूप में काय: कर ा है और पूSा की संस्र्थीाग प्रक ृ ति को प्रदर्भिश कर ा है। यह व:मा+ मामले क े विवपरी है। भगवा+ राम की मूर्ति की पूSा की Sा ी है। विववाविद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्र्थील *ार्मिमक महत्व का एक स्र्थील है, लेविक+ यही मात्र भूविम को विवति*क व्यविXत्व का दSा: दे+े क े खिलए पया:प्त +हीं है।

182. यह क: दे+े क े खिलए मूर्ति + हो+े पर भी मंविदर को साव:Sवि+क पूSा स्र्थील मा+ा Sा ा है, विपचल उफ: चोकलिंलगम विपल्लई ब+ाम विहन्दू *ार्मिमक एवं सेवार्थी: विवन्यास (प्रशासवि+क प्रभाग) मˆास116 क े मामले का अवलंब खिलया गया। मामला अववि+यापुरम क े कल्यार्णसुंदरेश्वर मंविदर से संबंति* र्थीा। बीसवीं श ाब्दी की शुरूआ में चोकलिंलगम विपल्लई +ाम क े एक व्यविX +े श्री कल्यार्णसुंदरेश्वर सविह चार मूर्ति यों क े वि+र्णा:म, स्र्थीाप+ा और स रखरखाव क े खिलए, समप:र्ण विवलेख वि+ष्पाविद विकया। चोकलिंलगम विपल्लई की 1926 में मृत्यु हो गई और 1954 में समझौ ा विवलेख क े कारर्ण मˆास उच्च न्यायालय क े समक्ष अपीलार्थी- प्रबं* न्यासी ब+ गये। अपीलार्थी-गर्ण पर मूर्ति क े रखरखाव और सेवा में असफल रह+े का आरोप लगाया गया और विहन्दू *म: एवं सेवार्थी: विवन्यास आयुX +े मंविदर का प्रबं*+ अप+े वि+यंत्रर्ण में ले+े की योS+ा ब+ाई। अपीलार्थी-गर्ण +े आयुX की सक्षम ा पर इस आ*ार पर चु+ौ ी दी विक मंविदर मˆास विहन्दू *ार्मिमक एवं सेवार्थी: वि+न्यास अति*वि+यम 1959 की *ारा 6(20) क े अन् ग: मंविदर +हीं है। अपीलार्थी-गर्ण का मूल क: यह र्थीा विक कल्यार्णसुंदरेश्वर मंविदर की मूर्ति यां विवति*व स्र्थीाविप व प्रार्णप्रति विष्ठ +हीं र्थीी। मˆास उच्च न्यायालय की खंर्ड पीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति क े रेड्डी +े *ारिर विकया विक विकसी साव:Sवि+क पूSा स्र्थील क े "मंविदर" हो+े क े खिलए उX अति*वि+यम की *ारा 6 (20) क े ह मूर्ति का अस्जिस् त्व आवश्यक +हीं है। उन्हों+े आगे कहा:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “..... ऐसा प्र ी +हीं हो ा है विक उX मंविदरों में पूव X मूर्ति याँ आगम शास्त्रों में वर्भिर्ण विवति* विव*ा+ क े अ+ुसार स्र्थीाविप और प्रार्ण प्रति विष्ठ की गई हैं। वे हिंहदू समुदाय द्वारा इस स्र्थीा+ क े लंबे समय से उपयोग क े कारर्ण साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा स्र्थील ब+ गए हैं। इसखिलए, हमारा यह म है विक हिंहदू शास्त्रों द्वारा वि+*ा:रिर प्रार्ण प्रति ष्ठा आविद Sैसे अ+ुष्ठा+ र्थीा मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा क े खिलए अवि+वाय: श: +हीं है। विकसी भी स्जिस्र्थीति में, यह अति*वि+यम क े अन् ग: मंविदर की परिरभाषा की विवति*क पूवा:पेक्षा +हीं है...” दो हिंबदुओं पर ध्या+ विदया Sा+ा चाविहए: पहला, न्यायालय की विर्टप्पर्णी 'मंविदर' की पूव:-मौSूदा वै*ावि+क परिरभाषा क े संदभ: में है। इसी संदभ: में, मˆास उच्च न्यायालय +े विर्टप्पर्णी की है विक मंविदर की वै*ावि+क परिरभाषा क े खिलए मूर्ति का अस्जिस् त्व कोई पूवा:पेक्षा +हीं है। दूसरा, मामले में इस सवाल पर कोई बहस +हीं हुई विक क्या मूर्ति क े विब+ा कोई मंविदर एक विवति*क व्यविX हो सक ा है। यह ध्या+ रख+ा प्रासंविगक है विक मूर्ति क े विब+ा मंविदर कई वषÂ से मौSूद र्थीा। इ+ विर्टप्पणिर्णयों क े आलोक में, वि+र्ण:य श्री परासर+ क े इस क: का समर्थी:+ +हीं कर ा है विक मूर्ति या प्रकर्ट अणिभव्यविX या पहचा+ क े विब+ा भूविम कोई विवति*क व्यविX हो सक ा है।

183. श्री परासर+ +े यह क: दे+े क े खिलए सरस्व ी अम्मल ब+ाम राSगोपाल अम्मल117 क े वि+र्ण:य का अवलंब खिलया है विक राम Sन्मभूविम क े रूप में मान्य भूविम की पूSा और व्यापक आस्र्थीा उसे विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा दे+े क े खिलए पया:प्त है। मामला एक समझौ ा विवलेख से संबंति* र्थीा सिSसक े द्वारा एक विव*वा +े दैवि+क पूSा और उसक े पूव: पति क े मकबरे 117 1954 SCR 277 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की 'गुरूपूSा' हे ु क ु छ अचल संपखित्त की मालगुSारी शाश्व रूप से समर्मिप कर विदया। अपीलार्थी-गर्ण द्वारा मामले में यह कहा गया विक समप:र्ण पूSा कर+े और बड़े पैमा+े पर वार्मिषक 'श्राद्ध' कर+े क े खिलए र्थीा, और इसखिलए समप:र्ण *ार्मिमक और सेवार्थी: उद्देश्य क े खिलए र्थीा। इस क: को खारिरS कर े हुए, इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीश पीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति बी Sगन्नार्थीदास +े *ारिर विकया: “6..... अ ः इस सीमा क, विक *ार्मिमक मेरिरर्ट क े आ*ार पर, भले ही साव:Sवि+क लाभ का + हो, विकसी प्रयोS+ क े शाश्व समप:र्ण क े खिलए वै* हो+े क े खिलए, Sहां क विहन्दुओं का संबं* है, इसका शास्त्रीय आ*ार हो+ा दर्भिश विकया Sा+ा चाविहए। इसमें संदेह +हीं विक ब से अन्य *ार्मिमक रिरवाS और आस्र्थीाओं का विवकास हुआ सिSन्हें क ु छ वगÂ से मान्य ा विमली, Sो *ार्मिमक मेरिरर्ट क े अ+ुक ू ल उद्देश्य का गठ+ कर े हैं। यविद संपखित्त क े शाश्व समप:र्ण क े वै* हो+े क े खिलए ऐसी आस्र्थीाओं को न्यायालय द्वारा पया:प्त मा+ा Sाए, अर्थीा: वास् विवक या कस्जिल्प लाभ क े विब+ा, कम से कम यह दर्भिश विकया Sा+ा चाविहए विक उन्हें व्यापक मान्य ा विमली है और एक बड़े वग: क े *ार्मिमक रिरवाS का विहस्सा है। वह एक ऐसा प्रश्न है Sो मामले में सी*े वि+र्ण:य क े खिलए +हीं आ ा। लेविक+ यह +हीं कहा Sा सक ा विक ऐसे एक या दो व्यविXयों की आस्र्थीा उन्हें संपखित्त क े संबं* में वै* स्र्थीायी समझौ ा कर+े में सक्षम ब+ा+े क े खिलए पया:प्त होगा। *ार्मिमक मेरिरर्ट प्राप्त कर+े में आस्र्थीा द्वारा वि+*ा:रिर *ार्मिमक प्रयोS+ों क े प्रमुखों को लोक +ीति और आ*ुवि+क समाS की आवश्यक ाओं क े अ+ुरूप विवस् ार की अ+ुमति +हीं दी Sा सक ी। (प्रभाव वर्ति* ) उपरोX वि+र्ण:य इस बा से संबंति* है विक क्या बड़ी संख्या में हिंहदुओं का कोई महत्वपूर्ण: और व्यापक रिरवाS, *ार्मिमक या *मा:र्थी: प्रर्थीा क े रूप में इसे मान्य ा विदलाएगा। इसक े अलावा, न्यायालय +े स्पष्ट रूप से कहा विक इस mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रश्न का उत्तर दे+ा आवश्यक +हीं र्थीा क्योंविक लोक+ीति का आ*ार कु छ इक्का-दुक्का व्यविXयों द्वारा मकबरे की पूSा क े रिरवाS को अप्रति विष्ठक कर+े क े खिलए पया:प्त है। यह इस प्रश्न पर विवचार +हीं कर ा विक न्यायालय को विकसी मूर्ति या भूविम को विवति*क व्यविXत्व का दSा: कब प्रदा+ कर+ा चाविहए। हालांविक विकसी विवणिशष्ट *ार्मिमक रिरवाS को उसको अप+ाए Sा+े क े पैमा+े क े आ*ार पर न्यायालय द्वारा "*ार्मिमक" या "*मा:र्थी:" क े रूप में मान्य ा दी Sा सक ी है या +हीं दी Sा सक ी है, विवति*क व्यविX की अव*ारर्णा क े संबं* में उससे समा+ ा +हीं की Sा सक ी Sो विक विवति* क े पूर्ण: ः णिभन्न क्षेत्र में काय: कर ा है। वि+र्ण:य इस क: का अ+ुसमर्थी:+ +हीं कर ा है विक विकसी स्र्थील की *ार्मिमक प्रक ृ ति में व्यापक विवश्वास उस स्र्थील को विवति*क व्यविX का दSा: प्रदा+ कर+े क े खिलए पया:प्त है। अं में श्री परासर+ +े दो वि+र्ण:यों सप्+ेश्वर पुSापांर्डा ब+ाम रत्का+र महापात्रा118 और काशी विवश्व+ार्थी मंविदर क े श्री आविद विवश्वेश्वरा ब+ाम उ.प्र. राज्य119 का अवलंब यह क: दे+े हे ु खिलया है विक, वाद 5 में दूसरा वादी एक 'स्वंभू' देव ा है, सिSसका एक मान्य विवति*क व्यविXत्व है। वि+र्ण:य में मात्र इस बा का उल्लेख है विक हिंहदू *म: स्वयंभू देव ा की अव*ारर्णा को मान्य ा दे ा है, सिSस पर व:मा+ विववाद क े विकसी पक्ष द्वारा कोई विववाद +हीं है। इ+में से विकसी वि+र्ण:य से श्री परासर+ द्वारा विदया गया क: +हीं वि+कल ा। वाद 5 में वादीगर्ण द्वारा दी गई दलीलों की मूल साम£ी पर आगे विवचार विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

184. श्री परासर+ का कर्थी+ है विक विहन्दू *म: क े विवणिभन्न देवी-देव ा और मूर्ति याँ एक ही अविवभाज्य ईश्वर क े रूप हैं। इस प्रकार यह क: विदया गया विक अविवभाज्य ईश्वर की प्रत्येक अणिभव्यविX विवति*क सुरक्षा और विवति*क व्यविXत्व का दSा: पा+े की हकदार है।

185. योगेंˆ +ार्थी +स्कर ब+ाम सीआईर्टी, कलकत्ता120 क े मामले में इस न्यायालय +े श्रद्धालु की *ारर्णा, विक मूर्ति सव च्च सत्ता की अणिभव्यविX है, और इस विवति*क स्जिस्र्थीति विक विवति*क व्यविXत्व का दSा: वसीय क ा: क े पविवत्र प्रयोS+ को विदया Sा ा है,Sो विवति*क संरक्षर्ण का हकदार है, क े बीच अं र विकया है। विहन्दू *म: एक व्यापक *म: है Sो सृS+ क े हर पहलू में परम सत्ता क े रूप में विवद्यमा+ देवत्व में विवश्वास कर ा है। विहन्दू *म: में ईश्वर की पूSा क े वल मस्जिन्दर या मूर्ति यों क ही सीविम +हीं हो ी, बस्जिल्क प्रायः प्राक ृ ति क आक ृ ति यों, पशुओं और यहां क विक उपासक क े Sीव+ में महत्व रख+े वाली दैवि+क वस् ुओं क विवस् ारिर हो सक ी है। *म: क े रूप में, परम सत्ता की प्रत्येक अणिभव्यविX विदव्य और पूSा योग्य है। हालांविक विवति*क दृविष्ट से परम सत्ता की प्रत्येक अणिभव्यविX विवति*क व्यविX +हीं है। विवति*क व्यविXत्व विवति*क आवश्यक ा और न्याय वि+र्ण:य+ की व्यवहारिरक ा से उत्पन्न एक +वाचार है। विब+ा समप:र्ण क े विदया गया विवति*क व्यविXत्व का प्रत्येक दSा: मामले क े थ्यों क े आ*ार पर Sांचा Sा+ा चाविहए और यह कोई दृढ़ विवति*क *ारर्णा +हीं विक परम सत्ता की प्रत्येक अणिभव्यविX को विवति*क व्यविXत्व का दSा: प्राप्त है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

186. व:मा+ मामले में यह क: विदया गया है विक विववाविद स्र्थील की भूविम ही भगवा+ राम की अणिभव्यविX है। दो विवति*क उप*ारर्णाएं प्रस् ु कर+े क े खिलए ऐसे मंविदरों क े अस्जिस् त्व का महत्वपूर्ण: अवलंब खिलया गया है सिS+में मूर्ति यां +हीं हैं विवशेषकर विमल+ार्डु का तिचदंबरम मंविदर: पहला यह विक विवति*क व्यविXत्व वाला कोई हिंहदू देवी-देव ा विब+ा मूर्ति क े भी अस्जिस् त्वमा+ हो सक ा है और दूसरा यह विक विकसी विवणिशष्ट विवशेष ा से रविह कोई भूविम स्वयंभू देव ा फलस्वरूप विवति*क व्यविX हो सक ी है। यर्थीा ध्या व्य, श्री परासर+ द्वारा तिचदंबरम और कल्यार्णसुंदरेश्वर मंविदर क े संदभ: में खिलया गया अवलंब विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया Sा+ा संदर्भिभ +हीं कर ा है। हालांविक यह सत्य है विक मूर्ति विवति*क व्यविX क े अस्जिस् त्व की पुवा:पेक्षा +हीं है। Sहां प्रत्यक्ष समप:र्ण विवलेख विवद्यमा+ हो, विवति*क व्यविXत्व संस्र्थीापक क े पविवत्र प्रयोS+ में वि+विह हो ा है। मूर्ति पविवत्र प्रयोS+ का भौति क मू: रूप हो ा है और विवति*क संबं*ों का स्र्थीा+ हो ा है। मूर्ति यों क े Sलमग्न हो+े या विवध्वंस हो+े क क े भी मामले हुए हैं लेविक+ इसक े बावSूद यह *ारिर विकया गया विक विवति*क व्यविXत्व विवद्यमा+ रह ा है। यविद कोई वसीय क ा: विकसी *ार्मिमक प्रयोS+ क े खिलए समप:र्ण कर+ा चाहे लेविक+ समप:र्ण क े समय मूर्ति विवद्यमा+ + हो या परम सत्ता का प्रकर्टीकरर्ण मूर्ति क े रूप में + हो कर विकसी अन्य आकार या *ार्मिमक महत्व क े रूप में हो, ो विवति*क व्यविXत्व समप:र्ण क े ही पविवत्र उद्देश्य में वि+विह रहेगा। लेविक+ व:मा+ मामले में वह स्जिस्र्थीति +हीं है। वाद 5 में दूसरे वादी क े मामले में, समप:र्ण का प्रत्यक्ष विवलेख +हीं है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

187. यह सच है विक दूसरे वादी को विवति*क व्यविXत्व का दSा: दे+े से क े वल इसखिलए अवरूद्ध +हीं विकया गया है क्योंविक दूसरा वादी मूर्ति +हीं है, और कोई समप:र्ण विवलेख मौSूद +हीं है। स्वंभू देव ा, इस थ्य से ही विक वे प्रक ृ ति से प्रकर्ट हो े हैं, पारंपरिरक अर्थीÂ में मूर्ति क े सदृश +हीं हो े हैं। न्यायालयों को परमसत्ता की ऐसी मूर्ति मा+ अणिभव्यविXयों को विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा दे+े की म+ाही +हीं है। भौति क आकार क े रूप में अणिभव्यविX ही परिरभाविषक विवशेष ा हो ी है। हालांविक व:मा+ मामले में प्रत्युत्तर में वादीगर्ण की ओर से वाद 5 में विदए गए क: दो रफा दावे पर आ*ारिर हैं। पहला यह- विक स्वयंभू देव ा क े संबं* में विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदए Sा+े क े खिलए विकसी भौति क अणिभव्यविX की आवश्यक ा +हीं है। इस आलोक में इस आस्र्थीा और विवश्वास क े सार्थी पूSा काय: संपन्न कर+ा विक कातियक या भौति क गुर्ण*म: परम सत्य का प्रति वि+ति*त्व कर े हैं- विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदए Sा+े क े खिलए पया:प्त है। दूसरा- वैकस्जिल्पक रूप से, यह मा+कर विक भौति क अणिभव्यविX स्वयंभू देव ा क े खिलए एक पूवा:पेक्षा है, विववाविद स्र्थील की भूविम भौति क अणिभव्यविX का प्रति वि+ति*त्व कर ी है और *ार्मिमक पूSा हो+े क े चल े विवति*क व्यविXत्व का दSा: दSा: विदए Sा+े क े खिलए विकसी अन्य साक्ष्य की आवश्यक ा +हीं है। इस न्यायालय क े समक्ष तिचदंबरम मंविदर सविह कई ऐसे मूर्ति रविह मंविदरों क े उदाहरर्ण यह क: दे+े क े खिलए रखे गए विक भगवा+ राम की अणिभव्यविX भूविम क े रूप में ही हुई है। वाद 5 में वादी गर्ण क े अ+ुसार, विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम का Sन्म श्रुति है और राम Sन्मभूविम स्जिस्र्थी देव ा स्वयं को भूविम क े रूप में अणिभव्यX कर े हैं, यह विक ऐसी अणिभव्यविX विववाविद भूविम ही है। तिचदंबरम मंविदर में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वहां स्जिस्र्थी देव ा भगवा+ णिशव की कोई मूर्ति +हीं है। वेदी पर एक पदा: लगा है। पूSा क े समय पद† को हर्टा विदया Sा ा है और खुले आकाश वाली वेदी को खोल विदया Sा ा है। वेदी का खुला आकाश ही पूSा पाठ की विवषय वस् ु हो ी है और श्रद्धालु वि+यविम रूप से वेदी पर +ैवेद्य चढ़ा े हैं। श्री परासर+ +े उससे सम ुल्य ा दर्भिश कर+े क े खिलए विक क ै से मूर्ति रविह या विकसी विवणिशष्ट विवशेष ा क े विब+ा मुX आकाश भी पूSा की विवषय वस् ु र्थीी और एक वै*ावि+क देव ा क े रूप में र्थीी सिSसे विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया Sा सक ा है।

188. श्री परासर+ द्वारा अप+े प्रत्युत्तर में विदए गए क: हमारे विववि+श्चय क े खिलए ी+ प्रश्न उठा े हैं: पहला, क्या भौति क अणिभव्यविX रविह स्वयंभू देव ा को मान्य ा दी Sा सक ी है; दूसरा, क्या भूविम देव ा की अणिभव्यविX हो सक ी है; और ीसरा, क्या अचल संपखित्त को स्वंयमेव विवति*क व्यविX का दSा: विदया Sा सक ा है।

189. कोई स्वयंभू देव ा ऐसे ईश्वर की अणिभव्यविX हो ा है, Sो विक 'स्वप्रकर्ट' या 'विवद्यमा+ पाया' Sा ा है, + विक कोई पारंपरिरक मूर्ति Sो विक हस् वि+र्मिम हो और अ+ुष्ठा+ द्वारा प्रार्ण प्रति विष्ठ की गई हो। 'स्वंय' शब्द का अर्थी: है 'स्वयं' या 'स्व ः' और 'भू' का अर्थी: है 'Sन्म ले+ा'। स्वंय भू देव ा वह हो ा है सिSस+े मा+वीय णिशल्पकारिर ा क े विब+ा प्रक ृ ति में स्वंय को अणिभव्यX विकया हो। इ+ देव ाओं क े सामान्य उदाहरर्ण हैं- ऐसे वृक्ष Sो हिंहदू देवी या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA देव ा क े रूप आकार हो या ऐसे प्राक ृ ति क गठ+ Sैसे विक बफ: या चट्टा+ Sो एक मान्य हिंहदू देवी- देव ा क े रूप में हो।

190. र्डॉ. *व+ +े दलील दी है विक स्वयंभू देव ा का कोई भी क: आवश्यक रूप से वि+म्+खिलखिख पर आ*ारिर हो+ा चाविहए: (i) ईश्वर की भौति क अणिभव्यविX क े क ु छ साक्ष्य और सार्थी ही; (ii) आस्र्थीा और विवश्वास विक कोई विवशेष भौति क गुर्ण*म: परमसत्ता का प्रति वि+ति*त्व कर ा है; और (iii) पारंपरिरक प्रार्ण प्रति ष्ठा क े अभाव में, ऐसी संस्र्थीाग पूSा सिSससे यह *ार्मिमक मान्य ा विमले विक अणिभव्यविX दैविवक है। इस दृविष्ट से, स्वयंभू देव ा का आ*ार भौति क अणिभव्यविX और *ार्मिमक मान्य ा क े सार्थी आस्र्थीा और विवश्वास आ*ारिर हो ा है।

191. स्वयंभू देव ा भौति क आकार में ईश्वर का प्रकर्टीकरर्ण हो ा है सिSसकी श्रद्धालुओं द्वारा पूSा की Sा ी है। स्वयंभू देव ा की मान्य ा इस *ारर्णा पर आ*ारिर है विक ईश्वर सव:व्याप्त है और वह स्वयं को विकसी भौति क आकार में अणिभव्यX कर सक ा है। ऐसी अणिभव्यविX का देवत्व क े सगुर्ण रूप में पूSा की Sा ी है। इ+ सभी मामलों में देवत्व क े गुर्ण का आ*ार देव ा का भौति क आकार में अणिभव्यविX पर आ*ारिर है। वि+संदेह विकसी देव ा का विब+ा भौति क अणिभव्यविX क े अस्जिस् त्व हो सक ा है उदाहरर्ण क े रूप में सूय: और वायु की पूSा। लेविक+ स्वयंभू सिसद्धां ईश्वर क े भौति क अस्जिस् त्व की अणिभव्यविX पर आ*ारिर है सिSससे आस्र्थीा और विवश्वास Sुड़ा हो ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

192. व:मा+ मामले में Sो कविठ+ाई आ ी है वह यह है विक इस न्यायालय से मान्य ा चाह+े वाला स्वयंभू देव ा अव रिर हिंहदू देव ाओं क े प्रचखिल रूपों से सामान्य ः संबद्ध +हीं है। वाद 5 में वादीगर्ण +े यह क: दे े हुए विक वह भूविम ही देव ा की अणिभव्यविX है और श्रद्धालु + सिसफ: भगवा+ राम की मूर्ति की पूSा कर े हैं बस्जिल्क उस भूविम की भी पूSा कर े हैं, विववाविद भूविम पर ही ध्या+ क ें विˆ कर+े की कोणिशश विकया है। उस भूविम में वहां पर स्जिस्र्थी भगवा+ राम की कोई भौति क अणिभव्यX +हीं है। श्रद्धालुओं की आस्र्थीा और विवश्वास से इ र, उस भूविम में ऐसी कोई विवणिशष्ट विवशेष ा +हीं है विक उसे न्यायालय द्वारा विववाविद स्र्थील पर देवी अणिभव्यविX क े साक्ष्य क े रूप में मान्य ा प्रदा+ की Sा सक े । यह सत्य है विक आस्र्थीा एवं विवश्वास क े विवषयों में साक्ष्य की अ+ुपस्जिस्र्थीति उसकी अ+ुपस्जिस्र्थीति का साक्ष्य +हीं हो ा। लेविक+ अणिभव्यविX से रविह भूविम को स्व -अव रिर देव ा की मान्य ा दे+े से पक्षकारों क े ऐसे कÂ की बाढ़ आ Sाएगी विक *ार्मिमक महत्व की कोई भूविम Sो देव ा क े विकसी मा+वीय अव ार से Sुड़ी कोई भूविम (Sैसे विववाह स्र्थील, या स्वगा:रोहर्ण) हो, वास् व में भूविम क े रूप में अणिभव्यX स्वयंभू देव ा है। यविद श्री परासर+ द्वारा विदए गए इस क: को स्वीकार कर खिलया Sाए विक भौति क अणिभव्यविX की कोई आवश्यक ा +हीं है ो यह दावा विकया Sा सक ा है विक *ार्मिमक महत्व का कोई भी क्षेत्र स्वयंभू देव ा है Sो विवति*क व्यविX का दSा: विदए Sा+े की योग्य है। समस्या इस थ्य से और बढ़ Sा ी है विक विकसी *ार्मिमक स्र्थील पर विकसी विवशेष देव ा और उस उस भूविम की पूSा सभी भेदरविह उद्देश्यों एवं आशयों से की Sा ी है। स्वयंभू देव ा को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मान्य ा दे+े क े खिलए विवति*शास्त्रीय आ*ार प्रदा+ कर+े हे ु अणिभव्यविX अत्यं महत्वपूर्ण: है। ऐसी अणिभव्यविX Sो उस भूविम को अन्य संपखित्तयों से अलग कर ी हो, से रविह भूविम को विवति*क व्यविXत्व का दSा: +हीं विदया Sा सक ा है।

193. यह बो*गम्य है विक क ु छ उदाहरर्णों में भूविम में क ु छ विवणिशष्ट विवशेष ाएं हो सक ी हैं। उदाहरर्ण क े खिलए, यह दावा विकया Sा सक ा है विक समुˆ र्ट क े विक+ारे क ु छ वि+तिश्च विवन्यास या फसल आकार परमसत्ता की अणिभव्यविX का प्रति वि+ति*त्व कर े हैं। इ+ मामलों में, अणिभव्यविX भूविम से अविवभाज्य है और इससे संबंति* है। एक स्व ंत्र प्रश्न यह उठ ा है विक क्या कोई भूविम देव ा की भौति क अणिभव्यविX हो सक ी है। यविद कोई न्यायालय भूविम को देव ा की अणिभव्यविX मा+ भी ले, क्योंविक ऐसी भूविम अचल संपखित्त क े सिसद्धां ों से शासिस हो ी है, न्यायालय क े खिलए इससे उत्पन्न परिरर्णामों की विववेच+ा कर+ा आवश्यक होगा। ऐसा कर+े में न्यायालय को विवति*क व्यविXत्व की विवति*क व्यवस्र्थीा की अचल संपखित्तयों की विवति*क व्यवस्र्थीा से सुसंग ा का विवश्लेषर्ण कर+ा चाविहए। अब इस विवषय पर आ+ा आवश्यक है। अति*देव में वि+विह संपखित्त और अति*देव क े रूप में संपखित्त

194. विकसी प्रति ष्ठा+ में विवविह संपखित्त (यर्थीा रोम+ विवति* में) या विवति*क व्यविXत्व क े रूप में देवी-देव ा (यर्थीा हिंहदू विवति* में ) और द्नुरूप संपखित्त क े विवति*क व्यविX हो+े में महत्वपूर्ण: अं र है। Sहां संपखित्त पविवत्र प्रयोS+ से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गविठ विकसी प्रति ष्ठा+ में वि+विह हो, यह अचल संपखित्त क े रूप में अप+ी विवशेष ाओं को बरकरार रख ा है। यह उ+ मामलों में भी सच है Sहां संपखित्त आदश: अर्थीÂ में देव ा में वि+विह हो। विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदये Sा+े का उद्देश्य विवति*क संबं*ों का क ें ˆ एवं श्रद्धालुओं क े लाभकारी विह ों की सुरक्षा सुवि+तिश्च कर+ा है। हालांविक, यह उस संपखित्त क े चरिरत्र को +हीं बदल ा है Sो विवति*क व्यविX में वि+विह है। यह उस विवति*क ढांचे क े अ*ी+ रह ा है Sो संपखित्त क े संबं* में मांगे गए अति*कारों या विह ों और संपखित्त क े विवति*क संव्यवहार से उत्पन्न हो+े वाले दातियत्वों को शासिस कर+े वाले संबं*ों को परिरभाविष कर ा है।

195. इस विवशेष ा पर, Sो अचल संपखित्त की विवशेष ाओं को रेखांविक कर ी है, विप्रवी कौंसिसल द्वारा द् मास्क, मस्जिस्Sद शहीदगंS ब+ाम णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क कमेर्टी अमृ सर121 क े मामले में विवचार विकया गया। उस मामले में फलक बेग खा+ +ाम क े विकसी व्यविX द्वारा 1972 में मस्जिस्Sद को समर्मिप विकया गया र्थीा। समप:र्ण विवलेख द्वारा शेख विद+ मोहम्मद और उसक े वंशSों को मु वखिलस वि+युX विकया गया। हालांविक 1762 से, इमार और कोर्ट:-यार्ड:,क ु आं व समीपस्र्थी भूविम सिसक्खों क े आति*पत्य और कब्Sे में र्थीी। मस्जिस्Sद क े समीप की भूविम एक सिसक्ख ीर्थी:स्र्थील ब+ गयी। वष: 1849 में विब्रविर्टश द्वारा विवलय क े समय मस्जिस्Sद और समीपस्र्थी भूविम दो+ों की का कब्Sा सिसखों क े पास र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

196. त्पश्चा सिसख संरक्षकों "द्वारा या उ+की मौ+ सहमति से" इमार को ढहा विदया गया। णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क कमेर्टी, सिS+क े पास विववाविद संपखित्त का कब्Sा र्थीा, क े विवरुद्ध, इस उद्घोषर्णा की मांग कर े हुए विक इमार मस्जिस्Sद र्थीी सिSसमें इमार क े पु+र्मि+मा:र्ण क े अवि+वाय: व्यादेश क े सार्थी वादी गर्ण और इस्लाम क े सभी अ+ुयातिययों को इबाद का अति*कार र्थीा, 1935 में एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया। 18 वादी गर्णों में से एक खुद मस्जिस्Sद र्थीी- स्र्थील और इमार । विप्रवी कौंसिसल +े इस क: का आंकल+ विकया विक मस्जिस्Sद और समीपस्र्थी संपखित्त विवति*क व्यविX हैं। इस क: को खारिरS कर े हुए न्यायमूर्ति SॉS: रै+विक+ +े *ारिर विकया: "इस क: में विक विकसी मस्जिस्Sद की भूविम और भव+ संपखित्त विबल्कु ल भी +हीं हैं क्योंविक वे एक विवति*क व्यविX हैं, कई सारी गल अव*ारर्णाओं का समावेश हो Sा ा है। यह कई ऐसे वि+र्ण:यों क े सार्थी पूरी रह से असंग है, सिSसक े ह एक पुSारी या मु वल्ली को एक अति चारक क े वि+ष्कास+ द्वारा वक्फ क े प्रयोS+ों क े खिलए भूविम और इमार ों को पु+प्रा:प्त कर+े क े खिलए विकसी वाद को बरकरार रख+े की अ+ुमति दी गई है... विक मुस्जिस्लमों क े इबाद क े खिलए समर्मिप विकसी इमार की विवति*क स्जिस्र्थीति और विहन्दू *म: क े वैविXक देव ा क े बीच कोई अ+ुमावि+ सादृश्य हो+ा...यह मा++ीय न्याया*ीशों क े खिलए आश्चय: का विवषय है... भार में प्रविक्रया आवश्यक रूप से हिंहदू *म: क े बहुलवादी और अन्य विवशेष ाओं का ध्या+ रख ी है और आवश्यक रूप से हिंहदू विवति* क े क ु छ सिसद्धां ों को मान्य ा दे ी है, Sैसे विक एक मूर्ति संपखित्त की स्वामी हो सक ी है... विकसी मस्जिस्Sद को "विवति*क व्यविX" की मान्य ा दे+े वाला वि+र्ण:य पंSाब क ही सीविम प्र ी हो ा हैं: 153 पीआर 1884; शंकर दास ब+ाम सईद अहमद (1884) 153 पीआर 1884 59 पीआर 1914; मौला बक्स ब+ाम हफीSुद्दी+ (1926) 13 एआईआर लाह 372 एआईआर 1926 लाह 372. 6. उ+ मामलों में से विकसी में भी मस्जिस्Sद वाद में एक पक्ष +हीं र्थीी, और शायद आखिखरी मामले को छोड़कर अन्य विकसी में भी वि+र्ण:य क े खिलए मस्जिस्Sद को काल्पवि+क व्यविXत्व प्रदा+ +हीं विकया गया है। लेविक+ ये मामले मस्जिस्Sद संस्र्थीा+ को एक काल्पवि+क व्यविX क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रूप में मान्य ा का समर्थी:+ कर े हैं-स्पष्ट ः अमू: ा क े मा+वीयकरर्ण का। Sैसा विक व:मा+ मामले में विवद्व मुख्य न्याया*ीश +े इंविग विकया है, यह विकसी इमार को व्यविX का दSा: देकर उसे उसक े अचल संपखित्त क े रूप में चरिरत्र से रविह कर+े से अलग है।" (प्रभाव वर्ति* )

197. विप्रवी कौंसिसल +े पाया विक यविद मस्जिस्Sद को न्यातियक व्यविX का दSा: दे विदया Sाए ो इसका अर्थी: यह होगा विक परिरसीम+ उस पर लागू +हीं होगा और यह विक यह संपखित्त +हीं है बस्जिल्क संपखित्त का स्वामी है। विप्रवी कौंर्जिसल द्वारा अप+ाई गई क प्रर्णाली को यह बा रेखांविक कर ी है विक अचल संपखित्त को विवति*क व्यविX का दSा: विदए Sा+े से संपखित्त अचल संपखित्त क े रूप में अप+े चरिरत्र को खो देगी। अचल संपखित्त अप+े प्रक ृ ति क े कारर्ण ही इस पर विवरो*ी माखिलका+ा दावे की अ+ुमति प्रदा+ कर ी है। अचल संपखित्त को विवभासिS विकया Sा सक ा है। हालांविक भूविम को ही न्यातियक व्यविX की मान्य ा दे+े से यह आवश्यक गुर्ण खो सक ा है। Sहां पर कातियक संपखित्त Sैसे की मूर्ति क े मामले में विवति*क व्यविXत्व की मान्य ा दी गई इससे वह बृहद उद्देश्य पूरा हुआ सिSसक े खिलए विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया गया र्थीा अर्थीा: दा ा द्वारा य विकए गए पविवत्र उद्देश्य की पूर्ति और सुरक्षा और श्रद्धालुओं क े लाभदाई विह ों का संरक्षर्ण। हालांविक अचल संपखित्त को विवति*क व्यविX का दSा: विदया Sा+े से ऐसे परिरर्णाम वि+कल े हैं सिS+का उस सीविम उद्देश्य से कोई संबं* +हीं है सिSसक े खिलए विवति*क व्यविX का दSा: विदया Sा ा है। यह उस अचल संपखित्त को अन्य सभी अचल संपखित्तयों क े प्रकार से अलग कर दे ा है सिSसे विवति*क व्यविX का दSा: विदया Sा ा है । इससे यह दावा वि+कल ा है विक ऐसी विवति* व्यवस्र्थीा Sो दूसरे ('सामान्य अचल संपखित्त’) पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लागू हो ी है वह उस श्रेर्णी की अचल संपखित्त पर लागू +हीं होगी सिSसे विवति*क व्यविX का दSा: प्राप्त है । यविद यह क: स्वीक ृ कर खिलया Sाए ो प्रति क ू ल कब्Sे का सिसद्धां और सीमांक+ विवति*क व्यविX क े रूप में भूविम लागू +हीं होगा Sो "कब्Sा" विकए Sा+े योग्य +हीं है। *म:दाय क े संबं* में विवति*क व्यविX का दSा: विदया Sा+ा समर्मिप संपखित्त की विवति*क सुरक्षा सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए र्थीा + विक संपखित्त को विवति* की पहुंच से बाहर कर इसे विवति*क अभेद्य ा प्रदा+ कर+े क े खिलए। विकसी भूविम को विवति*क व्यविX का दSा: दे+े से अचल संपखित्त क े रूप में इसक े विवशेष ा में मौखिलक बदलाव आ Sा ा है, इसक े गंभीर वि+विह ार्थी: हैं सिSससे न्यायालय को रक्षा कर+ी चाविहए। + ही यह *ारर्णा ब+ा+ा वै* है विक विकसी विवशेष अचल संपखित्त को विवति*क दSा: विमल+ा चाविहए या +हीं इसका वि+*ा:रर्ण न्यायालय मामला दर मामला आ*ार पर करेगा। प्रयोग क े विकसी वस् ुवि+ष्ठ मा+क क े अभाव में, ऐसे वि+*ा:रर्ण की प्रविक्रया अत्यन् व्यविXवि+ष्ठ हो Sाएगी और न्यातियक प्रविक्रया को प्रभावोत्पादक ा से ही+ कर देगी।

198. विवचारा*ी+ भूविम को 1989 क हिंहदू समुदाय क े लोगों सविह व:मा+ विववाद क े खिलए सभी पक्षों द्वारा अचल संपखित्त मा+ा गया है। विववाविद संपखित्त पर मुकदमेबाSी 1885 से शुरू हुई, और विकसी भी हिंबदु पर, 1989 में वाद 5 आ+े से पहले यह दलील +हीं दी गई र्थीी विक विवचारा*ी+ भूविम विवति*क व्यविX है। सिS+ कारर्णों को ऊपर उसिल्लखिख विकया गया है, उ+क े अलावा, अदाल क े पास अब मात्र 1989 में वाद 5 में वादीगर्ण द्वारा दी गई +ई दलील क े आ*ार पर संपखित्त को अलग मा++े का विवकल्प +हीं होगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पारंपरिरक ढांचे में स्वाविमत्व का दावा

199. व:मा+ मामले क े थ्य पूSा स्र्थील क श्रद्धालुओं की पहुंच का प्रश्न उठा े हैं और यह प्रश्न उठा े हैं विक भूविम पर स्वाविमत्व विकसका है। पहला क ृ ति म विवति*क व्यविX ब+ाए विब+ा कई रीकों से न्यायालय द्वारा संरतिक्ष हो सक ा है। क ु प्रबं*+ से संरक्षर्ण सी*े इस दायरे में पड़ ा है विक सेवादार की मान्य ा विकसे दी Sाए और इस पर व:मा+ वि+र्ण:य क े अन्य विहस्सों में विवचार विकया गया है। सामान्य ः न्यायालय सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 क े अं ग: आवेद+ विदए Sा+े पर ऐसे मामलों पर विवचार कर+े में सक्षम हो ा है। स्वाविमत्व क े प्रश्न पर न्याय वि+र्ण:य+ अचल संपखित्त क े बारे में प्रयोज्य मौSूदा विवति*क व्यवस्र्थीा का प्रयोग करक े विकया Sा सक ा है। इसमें आवश्यक ा या सुविव*ा का कोई कारर्ण +हीं है सिSसक े कारर्ण न्यायालय को वाद 5 में वादी गर्ण द्वारा विदए गए +ए क: को स्वीकार कर विववाविद भूविम को विवति*क व्यविXत्व का दSा: दे+ा चाविहए।

200. विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया Sा+ा एक विवति*क +वाचार है सिSसका प्रयोग उ+ स्जिस्र्थीति यों में हो ा है Sब ात्काखिलक मौSूदा विवति* में कु छ कविमयां हो ी हैं या ऐसे दS† से न्याय वि+र्ण:य+ की सुविव*ा बढ़ ी है। व:मा+ समय में मौSूदा विवति* श्रद्धालुओं क े विह ों क े संरक्षर्ण क े खिलए पूरी सक्षम है और भूविम को विवति*क व्यविX क े रूप में मान्य ा विदए विब+ा कु प्रशास+ से उ+क े विह ों की सुरक्षा कर+े में सक्षम है। Sहां विवति* श्रद्धालुओं क े विह ों की सुरक्षा कर+े में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पया:प्त रूप से सक्षम हो और विवति*क व्यविX का दSा: विदए विब+ा *ार्मिमक स्र्थीलों क े उत्तरदाई प्रबं*+ में सक्षम हो, विवति*क कल्प+ा की राह पर चल+ा आवश्यक +हीं है सिSसक े अवि+स्जिच्छ परिरर्णाम हो सक े हैं। अ ः आस्र्थीा और विवश्वास क े क: में कोई मेरिरर्ट +हीं है और दूसरे वादी क े खिलए आस्र्थीा और विवश्वास का संरक्षर्ण ही विवति*क दSा: आवश्यक ब+ा सक े हैं। इसक े विवपरी इस क: को + मा++े में काफी ख रा है। विकसी *ार्मिमक वग: द्वारा यह क: विदया Sा सक ा है विक श्रद्धालुओं क े आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार कोई विवशेष भूविम खंर्ड देव ा का Sन्म स्र्थीा+, विववाह स्र्थील या वह स्र्थीा+ है Sहां पर मा++ीय अव ार का स्वगा:रोहर्ण हुआ। देव ा क े मा++ीय अव ार से संबद्ध बहु सारी घर्ट+ाओं से कई अति*भौति क संपखित्त Sोड़ी Sा सक ी है सिSसका उपासकों क े आस्र्थीा और विवश्वास में महत्वपूर्ण: स्र्थीा+ हो ा है। ऐसे में संपखित्त को विवति*क व्यविX का दSा: दे+े क े आ*ार क े खिलए न्यायालय विवश्वास क े महत्व का मूल्यांक+ कर+े की रेखा कहां खींच ा है? वस् ुवि+ष्ठ मा+द°र्ड की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, ऐसा प्रयास व्यविXपरक हो Sाएगा। वाद में वादीगर्ण क े क: को मा++े का परिरर्णाम भूविम पर ऐसे सभी दावों को विवति*क व्यविX का दSा: दे+े में हो सक ा है। ऐसा दSा: उस आस्र्थीा क े बाहर क े वास् विवक वादी गर्णों क े विवरूद्ध हो सक ा है सिS+का वही विवस्वास +ही हो+े से उ+का स्वाविमत्व खत्म हो सक ा है। आगे, अचल सम्पखित्त को ऐसा विवति*क दSा: विदया Sा+ा श्रद्धालुओं की आस्र्थीा और विवस्वास क े आ*ार पर होगा Sो विक मूल रूप से व्यविXवि+ष्ठ चीS है और सिSस पर इस न्यायालय द्वारा प्रश्नतिचन्ह +हीं उठाया Sा सक ा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

201. सिSस उद्देश्य क े खिलए विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया Sा ा है, उसे एक ऐसी हावि+कर युविX में +हीं बदला Sा सक ा Sो *ार्मिमक आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर संपखित्त पर सभी प्रति स्प*- माखिलका+ा दावों को समाप्त कर+े क े सार्थी-सार्थी संपखित्त को अचल संपखित्त की आवश्यक विवशेष ाओं से रविह कर+े की अ+ुमति दे ा हो। यविद वाद 5 में वादी गर्ण की ओर से विदया गया क: स्वीकार कर खिलया Sा ा है, ो इसकी परिरर्णति विवति* की ऐसी स्जिस्र्थीति में हो ी है Sो Sहां 'पूर्ण: स्वत्व' क े दावे को क े वल श्रद्धालुओं की आस्र्थीा और विवस्वास क े आ*ार पर बरकरार रखा Sा सक ा है। कातियक संपखित्त को विवति*क दSा: दे+ा संपखित्त को + क े वल प्रति स्प*- स्वत्व क े दावों से प्रति रक्षा करेगा, बस्जिल्क ऐसी अ+ेक विवति*यों को, Sो दीवा+ी वादों, Sैसे सीमा, स्वाविमत्व, कब्Sे और विवभाS+, क े सार्थी:क न्याय वि+र्ण:य+ क े खिलए आवश्यक हैं, पूरी रह से वि+रर्थी:क ब+ा देगा। वाद 5 में वादी गर्ण की ओर से विदया गया क: अति*क से अति*क इस दावे को ब+ाए रखेगा विक विवशेष स्र्थीा+ श्रद्धालुओं क े खिलए *ार्मिमक महत्व का स्र्थीा+ है। हालांविक भूविम को ही विवति*क व्यविXत्व का दSा: देकर इसे विवति*क माखिलका+ा दावों को ब+ाए रख+े या भूविम पर दूसरों क े माखिलका+ा या स्वत्व आ*ारिर दावों से भूविम की प्रति रक्षा कर+े क े खिलए विवस् ारिर +हीं विकया Sा सक ा है। संवै*ावि+क मूल्यों क े प्रति प्रति बद्ध ा

202. मामले क े इस पहलू पर, सिSसका अणिभप्रायपूर्ण: महत्व है, अंति म अवलोक+ विकया Sा+ा चाविहए। वाद 5 में वादी गर्णों की ओर से विदये गये क: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का अस्वीकरर्ण पंर्थीवि+रपेक्ष ा क े खिलए हमारी संवै*ावि+क प्रति बद्ध ा क े मूल को छ ू ी है। पूSापद्धति सिSसक े आ*ार पर विकसी माखिलका+ा दावे को कायम रखा Sा सक ा है वह विकसी विवशेष *म: से संबं* योग्य है। *ार्मिमक विवन्यासों से वि+ःसृ मूर्ति यों को विवति*क व्यविXत्व का दSा: विदया Sा+ा एक ऐसा विवति*क विवकास है Sो क े वल हिंहदू समुदाय की प्रर्थीा पर लागू हो ा है। परिरक्रमा कर+ा एक ऐसी पूSा-पद्धति है Sो अति*क र विहन्दू *म: क सीविम है। इस थ्य को अलग कर े हुए विक वाद 5 में वादी गर्ण द्वारा विदया गया क: हिंहदू *ार्मिमक विवन्यासों पर लागू विवति* का एक +वी+ विवकास है, यह एक महत्वपूर्ण: मामला है सिSस पर हमें विवचार कर+े की आवश्यक ा है।

203. *ार्मिमक विवविव* ा क े खिलए वि+स्संदेह विवविव* पूSा पद्धति यों और *ार्मिमक समारोहों क े विवविव* रीकों क े संरक्षर्ण की आवश्यक ा हो ी है। हालाँविक, एक *म: क े विवणिशष्ट पूSा पद्धति क े कारर्ण दीवा+ी संपखित्त क े न्याय वि+र्ण:य+ में एक *म: क े पक्षकार पर दूसरे *म: क े पक्षकार को पूर्ण: स्वत्व विदया Sा+ा हमारे संविव*ा+ क े ह +हीं विर्टक सक ा। यह ऐसी विवति* प्रस् ु करेगा, Sो विकसी पक्ष को विकसी वाद विवशेष क े गुर्णावगुर्ण क े आ*ार पर +हीं बस्जिल्क उस *म: क े ढ़ांचे या गठ+ क े आ*ार पर सिSससे वे संबंति* हैं, उसक े या उसकी का+ू+ी दावे क े संबं* में लाभ प्रदा+ कर+े वाला अंति म वि+ष्पक्ष मध्यस्र्थी हो+ा चाविहए। यविद वाद 5 में वादी गर्ण की ओर से विदये गये क: को स्वीकार कर खिलया Sा ा है, ो एक *म: की पूSा पतिद्ध को ही विववाविद संपखित्त पर सभी प्रति स्प*- माखिलका+ा दावों को खत्म कर+े की शविX विमल Sाएगी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

204. यह सत्य है विक एक व्यविX और सिSसे वह दैवीय मा+ ा है क े बीच संबं* आं रिरक हो ा है। यह एक व्यविXग क्षेत्र क े दायरे में वि+विह हो ा है सिSसमें विकसी अन्य व्यविX को घुसपैठ +हीं कर+ी चाविहए। यही कारर्ण है विक संविव*ा+ सभी +ागरिरकों की *म: को मा++े, आचरर्ण कर+े और प्रचारिर कर+े की स्व ंत्र ा की समा+ रूप से रक्षा कर ा है। प्रायः मा+वीय दशाओं को पूSा में सान्त्व+ा विमल ी है। लेविक+ पूSा को एक सी*े सूत्र में सीविम +हीं विकया Sा सक ा है। भार ीय समाS क े सामासिSक ा+े-बा+े में *म: की गहरी पैठ क े कारर्ण ही *ार्मिमक स्व ंत्र ा क े अति*कार को वि+रपेक्ष +हीं ब+ाया गया र्थीा। इस न्यायालय क े न्यायशास्त्र में *ार्मिमक से पंर्थीवि+रपेक्ष का सीमांक+ कर+े का प्रयास विकया गया है। यविद संवै*ावि+क मूल्यों क े प्रति प्रति बद्ध ा को बरकरार रखा Sा+ा है, ो वि+Sी संपखित्त पर दीवा+ी दावों का न्यायवि+र्ण:य+ *म:वि+रपेक्ष क े दायरे में रह+ा चाविहए। चार दशक पूव:, संविव*ा+ में संशो*+ विकया गया और इसक े पंर्थीवि+रपेक्ष स्वरूप का एक विवणिशष्ट संदभ: उद्देणिशका में शाविमल विकया गया। इसक े मूल में, इस+े उस बा को दोहराया सिSसका संविव*ा+ +े सदैव सम्मा+ विकया और स्वीकार विकया: सभी *मÂ की समा+ ा। पंर्थीवि+रपेक्ष ा हर विकसी क े द्वारा *ार्मिमक स्व ंत्र ा क े प्रयोग से बेखबर समय की रे खोई रिरर्ट +हीं हो सक ी।

205. उपरोX सभी कारर्णों की वSह से ही विवति* +े आS क अचल संपखित्त का विवति*क व्यविXत्व का दSा: स्वीकार +हीं विकया है। *म: +े हृदय एवं मस्जिस् ष्क को प्रभाविव विकया है। न्यायालय ऐसी स्जिस्र्थीति को +हीं अप+ा सक ा Sो न्यातियक विवलगाव और सार्थी ही सम्पूर्ण: विवति*क व्यवस्र्थीा पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्र*ा+ ा प्रदा+ कर+े क े आ*ार क े रूप में एक ही *म: क े आस्र्थीा और विवश्वास को प्र*ा+ ा दे ी है। शहीद गंS से अयोध्या क, हमारे Sैसे देश में, Sहां *ार्मिमक समुदायों द्वारा संपखित्त पर विवरो*ी दावे अपरिरहाय: हैं, हमारे न्यायालय स्वत्व क े प्रश्न को, Sो *म: से बाहर सुदृढ़ रूप से पंर्थीवि+रपेक्ष दायरे में आ ा है, इस प्रश्न में +हीं बदल सक े विक विकस समुदाय की आस्र्थीा मSबू है। उपरोX उसिल्लखिख सभी कारकों पर विवचार कर, यह *ारिर विकया Sा ा है विक वाद 5 में दूसरा वादी - 'श्रीराम Sन्मभूविम स्र्थीा+' विवति*क व्यविX +हीं है।

206. गोपाल सिंसह विवशारद द्वारा दायर विकया गया वाद 1 अवि+वाय: रूप से एक उपासक द्वारा Sन्मभूविम में भगवा+ राम की पूSा कर+े क े अप+े अति*कार क े प्रव:+ क े खिलए एक वाद है। वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर वाद 3 Sन्मभूविम मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार को सौंप+े क े खिलए है। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा दायर वाद 4 कब्Sे क े खिलए तिर्डक्री और इस उद्घोषर्णा क े खिलए है विक बाबरी मस्जिस्Sद और आसपास क े कविब्रस् ा+ सविह सम्पूर्ण: विववाविद स्र्थील एक साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है। वाद 5 भगवा+ राम और Sन्मस्र्थीा+ (दो+ों क े विवति*क व्यविX हो+े का दावा विकया गया है) क े देव ा द्वारा ीसरे वादी क े रूप में एक विमत्र क े माध्यम से व:मा+ इमार क े ध्वंस क े बाद +ये मंविदर क े वि+मा:र्ण में विकसी हस् क्षेप क े विवरूद्ध व्यादेश और इस घोषर्णा क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खिलए दायर विकया गया है विक वाद क े संलग्नक 1, 2 और 3 को विमलाकर पूरा परिरसर राम Sन्मभूविम है। वि+र्ण:य अब मुकदमों में दावों का विवश्लेषर्ण और न्यायवि+र्ण:य+ की ओर अ£सर हो ा है।

207. 16 S+वरी, 1950 को, फ ै Sाबाद में दीवा+ी न्याया*ीश क े समक्ष गोपाल सिंसह विवशारद द्वारा, स्वयं को विहन्दू भX ब ा े हुए, एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया। वे अयोध्या क े वि+वासी हैं और 'स+ा + *म:' क े अ+ुयायी हैं। उ+की णिशकाय यह र्थीी विक उन्हें सरकार क े अति*कारिरयों द्वारा पूSा क े खिलए ढांचे क े अंदरू+ी आँग+ में प्रवेश कर+े से रोका Sा रहा र्थीा। वादी का दावा है विक वह भगवा+ राम की पूSा कर+े का हकदार है। वि+म्+खिलखिख अ+ु ोष मांगा गया: (i) "*म: और रीति क े अऩुसार" Sन्मभूविम मंविदर में विब+ा बा*ा क े भगवा+ राम की पूSा और दश:+ कर+े क े उसक े अति*कार की उद्घोषर्णा; और (ii) प्रति वादी गर्ण 1 से 10 को देव ा की मूर्ति यां और अन्य मूर्ति यों को उस स्र्थीा+, Sहां वे रखी गयी हैं, से हर्टा+े से रोक+े; मूर्ति की ओर Sा+े वाले mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रास् े को बंद कर+े; या दश:+ और पूS+ में व्यव*ा+ कर+े से रोक+े वाला स्र्थीायी और स व्यादेश। वाद 1 का वाद हे ुक 14 S+वरी 1950 को उत्पन्न हो+ा अणिभकणिर्थी है, सिSस विद+ ऐसा आरोप है विक सरकार क े कम:चारिरयों +े वादी को गैरका+ू+ी रूप से "स्र्थीा+ क े अन्दर Sा+े से" और पूSा क े उसक े अति*कार का प्रयोग कर+े से रोका। यह आरोप लगाया गया है विक "राज्य" +े मुस्जिस्लम वि+वासिसयों प्रति वि+ति*त्व द्वारा प्रति वादी सं. 1 से 5 क े इशारे पर यह काय: विकया, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप हिंहदुओं को उ+क े "पूSा क े वै* अति*कार" से वंतिच विकया Sा+ा अणिभकणिर्थी है। वादी को आशंका र्थीी भगवा+ राम की मूर्ति सविह मूर्ति यों को हर्टा विदया Sाएगा। इ+ काय:वाविहयों का "वादी क े अति*कार और स्वत्व पर एक सी*ा हमला " गविठ कर+ा और विवति* क े विवरुद्ध एक "दम+ात्मक काय:" हो+ा अणिभकणिर्थी है।

208. वाद में वि+विह आरोपों से इ+कार कर े हुए, मुस्जिस्लम प्रति वादी सं. 1 से 5 +े अप+े खिलखिख बया+ में कहा विक: (i) वह संपखित्त, सिSसक े संबं* में वाद संस्जिस्र्थी विकया गया है, Sन्मभूविम +हीं बस्जिल्क बाबर द्वारा ब+ाई गई मस्जिस्Sद है। मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण मुगलों द्वारा उपमहाद्वीप की विवSय क े पश्चा 1528 में बाबर क े वि+द†श मीर बाकी द्वारा कराया गया र्थीा Sो उसकी से+ा का कमांर्डर र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) मस्जिस्Sद को मुसलमा+ों क े खिलए वक्फ क े रूप में समर्मिप विकया गया र्थीा, सिSन्हें वहां +माS का अति*कार है। बाबर +े मस्जिस्Sद क े रखरखाव और खच: क े खिलए वार्मिषक अ+ुदा+ वि+*ा:रिर विकया, सिSसे अव* क े +वाब और विब्रविर्टश सरकार द्वारा Sारी रखा और बढ़ाया गया; (iii) 1885 का वाद क े वल रामचबू रा क े संबं* में महं रघुबर दास द्वारा स्वाविमत्व की घोषर्णा क े खिलए एक मुकदमा र्थीा और इसखिलए, यह दावा विक पूरी इमार Sन्मस्र्थीा+ का प्रति वि+ति*त्व कर ी है, वि+रा*ार है। 24 विदसंबर 1885 को मुकदमे को खारिरS विकये Sा+े क े परिरर्णामस्वरूप “चबू रा क े संबं* में मामले पर विवचार +हीं विकया गया”; (iv) वक्फ अति*वि+यम, 1936 क े अ*ी+ वि+युX वक्फ क े मुख्य आयुX +े मस्जिस्Sद का सुन्नी वक्फ हो+ा *ारिर विकया है; (v) मस्जिस्Sद का कब्Sा सदैव से मुसलमा+ों क े पास रहा है। यह स्जिस्र्थीति 1528 में शुरू हुई और उसक े बाद Sारी रही, और फलस्वरूप, " ….प्रति क ू ल कब्Sे क े माध्यम से उस संपखित्त का कब्Sा मुस्जिस्लमों क े पास है"; (vi) बाबरी मस्जिस्Sद में 16 विदसंबर, 1949 क +माज़ अदा की गई र्थीी, सिSस हिंबदु क क े न्ˆीय गुंबद क े +ीचे कोई मूर्ति +हीं र्थीी। यविद विकसी व्यविX +े दुभा:व+ा से मस्जिस्Sद क े अंदर कोई मूर्ति रखा विदया, ो "मस्जिस्Sद का अपकष: स्पष्ट है और आरोपी व्यविXयों पर मुकदमा चलाया Sा+ा चाविहए”; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) पूSा या दश:+ कर+े क े खिलए मस्जिस्Sद में प्रवेश कर+े का वादी या विकसी अन्य व्यविX का कोई प्रयास विवति* का उल्लंघ+ करेगा। द.प्र.सं. 1898 की *ारा 145 क े ह काय:वाही शुरू की गई र्थीी; और (viii) बाबरी मस्जिस्Sद क े Sन्मस्र्थीा+ हो+े का दावा कर+े वाला व:मा+ मुकदमा आ*ारही+ है, क्योंविक काफी लंबे समय से, भगवा+ राम और अन्य की मूर्ति यों वाला एक और मंविदर, Sो भगवा+ राम का वास् विवक Sन्मस्र्थीा+ है। प्रति वादी सं. 6 राज्य द्वारा एक खिलखिख बया+ यह कर्थी+ कर े हुए दायर विकया गया र्थीा, विक: (i) वाद की संपखित्त सिSसे बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ा Sा ा है, मुस्जिस्लमों द्वारा लंबे समय क इबाद क े प्रयोS+ क े खिलए मस्जिस्Sद क े रूप में प्रयोग की गई है और उसका उपयोग भगवा+ राम क े मंविदर क े रूप में +हीं हुआ है; (ii) साव:Sवि+क शांति व्यवस्र्थीा से छेड़छाड़ कर े हुए 22 विदसंबर, 1949 की रा को भगवा+ राम की मूर्ति यों को मस्जिस्Sद क े भी र चोरी णिछपे रख विदया गया। 23 विदसंबर 1949 को, +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट +े दंप्रसं 1898 की *ारा 144 क े ह एक आदेश पारिर विकया, सिSसक े बाद अपर +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा *ारा 145 क े ह विववाविद संपखित्त को कु क: कर+े का उसी विद+ एक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आदेश पारिर विकया गया। ये आदेश साव:Sवि+क शांति ब+ाए रख+े क े खिलए पारिर विकए गए र्थीे; और (iii) +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट +े श्री विप्रय दत्त राम, अध्यक्ष +गरपाखिलका बोर्ड:, फ ै Sाबाद सह अयोध्या को संपखित्त का प्राप्त क ा: वि+युX विकया। प्रति वादी सं. 8, अति रिरX +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट और प्रति वादी सं. 9, पुखिलस अ*ीक्षक द्वारा ऐसे ही खिलखिख बया+ दS: कराये गए। प्रति वादी सं. 10, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े यह अणिभकणिर्थी कर े हुए अप+ा खिलखिख बया+ दS: कराया: (i) विववाविद इमार भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ +हीं है और इसमें कभी कोई मूर्ति स्र्थीाविप +हीं की गई र्थीी; (ii) वाद की संपखित्त बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ी Sा+े वाली मस्जिस्Sद र्थीी Sो सम्रार्ट बाबर क े शास+ क े दौरा+ ब+वाई गई र्थीी सिSस+े उसक े रख- रखाव और व्यय क े खिलए वार्मिषक अ+ुदा+ वि+*ा:रिर विकया र्थीा और सिSसे अव* क े +वाब और विब्रविर्टश सरकार द्वारा Sारी रखा गया और बढ़ाया गया र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) 22-23 विदसंबर, 1949 की रा को मूर्ति यां चोरी-णिछपे रूप से मस्जिस्Sद में लाई गई ं; (iv) 1528 से 29 विदसंबर, 1949, Sब इसे *ारा 145 क े ह क ु क: विकया गया, क मस्जिस्Sद का कब्Sा क े वल मुसलमा+ों क े पास ही र्थीा। उन्हों+े 23 विदसंबर, 1949 क वि+यविम रूप से इबाद की र्थीी और 16 विदसंबर, 1949 क शुक्रवार की +माS अदा की। (v) मस्जिस्Sद की प्रक ृ ति वक्फ क े रूप में र्थीी और उसका स्वाविमत्व ईश्वर में वि+विह र्थीा; (vi) वादी मस्जिस्Sद को भगवा+ राम की Sन्मभूविम क े रूप में दावा कर+े से विवबंति* र्थीा क्योंविक महं रघुबर दास (सिSन्हें वादी का पूव:व - ब ाया गया है) द्वारा 1885 में संस्जिस्र्थी वाद में दावा मस्जिस्Sद क े बाहर सत्रह फीर्ट गुर्णा इक्कीस फीर्ट आकार का रामचबू रा क ही सीविम र्थीा। (vii) वहाँ पर पहले से ही एक राम Sन्मस्र्थीा+ मंविदर मौSूद र्थीा, Sो बाबरी मस्जिस्Sद से र्थीोड़ी दूरी पर है। वादी द्वारा प्रति वादी सं. 1 से 5 क े खिलखिख बया+ क े प्रत्युत्तर में यह दावा विकया गया विक 1934 से विववाविद स्र्थील का मस्जिस्Sद क े रूप में कभी उपयोग +हीं विकया गया। आगे कहा गया विक यह एक "सामान्य Sा+कारी" र्थीी विक हिंहदू क े पास स कब्Sा र्थीा सिSसक े आ*ार पर प्रति वाविदयों का दावा समाप्त हो गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA L.[2] उच्च न्यायालय क े विवषय और वि+ष्कष:

209. 1. क्या वाद की संपखित्त श्री राम चंˆ Sी का Sन्म भूविम स्र्थील है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया। बाबर क े समय में मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण हो+े क विववाविद परिरसर को भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ +हीं मा+ा Sा ा र्थीा या ऐसा विवश्वास +हीं विकया Sा ा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल – Sन्म स्र्थीा+, Sैसा विक विहन्दुओं द्वारा मा+ा और पूSा Sा ा है, आं रिरक अहा े में विववाविद ढ़ाचे क े क ें ˆीय गुंबद से आच्छाविद स्र्थीा+ है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े विवरुद्ध वि+र्ण- ।

2. क्या वाद क े स्र्थीा+ पर भगवा+ राम चंˆ Sी की कोई मूर्ति है या उ+की चरर्ण पादुका स्जिस्र्थी है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ – मस्जिस्Sद क े अंदर मंच पर पहली बार मूर्ति यां 22-23 विदसंबर, 1949 की रा में रखी गयीं र्थीी।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- आं रिरक अहा े क े अंदर विववाविद ढ़ाचे क े क े न्ˆीय गुम्बद क े +ीचे मूर्ति यां 22-23 विदसंबर, 1949 की रा को रखी गयीं र्थीीं हिंक ु इसक े पूव: वे बाहरी आंग+ में विवद्यमा+ र्थीीं।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े विवरुद्ध वि+र्ण- ।

3. क्या वादी को वाद क े स्र्थीा+ पर स्जिस्र्थी 'चरर्ण पादुका' और मूर्ति यों की पूSा कर+े का कोई अति*कार है? mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - क े वल यही कहा Sा सक ा है विक रामचबू रा मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े बाद र्टेफ े न्र्थीैलर की यात्रा से पहले अस्जिस् त्व में आया। दो+ों पक्षों का संयुX कब्Sा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - वादी को सुरक्षा और रखरखाव Sैसे युविXयुX वि+बã*+ों क े अ*ी+ पूSा कर+े का अति*कार है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- ।

4. क्या वादी को वाद क े स्र्थील का दश:+ कर+े का अति*कार है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - क े वल यही कहा Sा सक ा है विक रामचबू रा मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े बाद र्टेफ े न्र्थीैलर की यात्रा से पहले अस्जिस् त्व में आया। दो+ों पक्षों का संयुX कब्Sा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - वादी को सुरक्षा और रखरखाव Sैसे युविXयुX वि+बã*+ों क े अ*ी+ पूSा कर+े का अति*कार है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- । 5 (क). क्या वाद की संपखित्त उप-न्याया*ीश (फ ै Sाबाद रघुबर दास महं ब+ाम भार क े राज्य सतिचव और अन्य) की अदाल में मूल वाद सं. 61/280 वष: 1885 में शाविमल र्थीी?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - 1885 क े वाद में क ु छ भी य +हीं विकया गया र्थीा और पूव: न्याय का सिसद्धान् लागू +हीं हो ा है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल – +कारात्मक में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - संपखित्त +Sूल भूविम क े रूप में विवद्यमा+ र्थीी। 5 (ख). क्या यह वादी क े विवरुद्ध वि+र्ण- र्थीा? mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल -1885 का वाद महं भास्कर दास क े विवरूद्ध वि+र्ण- र्थीा और उन्हें कोई अ+ु ोष +हीं विदया गया र्थीा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - संपखित्त +Sूल भूविम क े रूप में विवद्यमा+ र्थीी। 5 (ग). क्या वह वाद आम ौर पर हिंहदुओं की Sा+कारी में र्थीा और क्या सभी विहन्दूओं की इसमें रूतिच र्थीी?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - +कारात्मक में उत्तरिर । यह साविब कर+े क े खिलए कोई भी दस् ावेSी साम£ी +हीं है विक वाद महं रघुबर दास की प्रति वि+ति*क क्षम ा में दायर विकया गया र्थीा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- । 5 (घ). क्या वह वि+र्ण:य व:मा+ वाद को पूव:न्याय क े सिसद्धान् या विकसी अन्य रीक े से बाति*क कर ा है?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल – +कारात्मक में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- ।

6. क्या वाद की संपखित्त बाबर द्वारा 1528 ईस्वी में ब+ाई गई मस्जिस्Sद है सिSसे आम ौर पर बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ा Sा ा है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ – बाबर द्वारा या उसक े आदेश क े ह एक मस्जिस्Sद ब+ाई गयी। यह प्रश्न विक क्या इसे वास् व में मीर बाकी +े ब+वाया र्थीा विकसी और +े, महत्वपूर्ण: +हीं है। मुसलमा+ों +े 1934 क वि+यविम +माS अदा की सिSसक े बाद 22 विदसंबर 1949 क क े वल शुक्रवार की +माS अदा की गई। यह स कब्Sे और उपयोग क े खिलए पया:प्त है। मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल – वादी गर्ण ढ़ाचे का वि+मा:र्ण 1528 ई. में बाबर द्वारा हुआ सिसद्ध कर+े में असफल रहे।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े विवरुद्ध वि+र्ण- ।

7. क्या वाद की संपखित्त का कब्Sा 1528 ई. से लगा ार, खुले ौर पर और प्रति वादी गर्ण और आम ौर पर विहन्दुओं की Sा+कारी में, मुसलमा+ों क े पास र्थीा? यविद हां, ो इसका प्रभाव?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ – स्वाविमत्व कब्Sे से आ ा है और दो+ों पक्षों का विववाविद परिरसरों पर संयुX कब्Sा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - वादी क े पक्ष में वि+र्ण- ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- ।

8. क्या वाद विववि+र्मिदष्ट अ+ु ोष अति*वि+यम की *ारा 42 क े परं ुक द्वारा बाति* है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - बाति* +हीं है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - बाति* +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वाविदयों क े पक्ष में वि+र्ण- ।

9. क्या वाद मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम (उ.प्र. अति*वि+यम 13,वष: 1936) की *ारा 5 (3) क े प्राव*ा+ों द्वारा बाति* है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - वादी क े पक्ष में वि+र्ण- ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- । mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 9 (क). क्या उX अति*वि+यम की आम ौर पर हिंहदुओं और विवशेषकर व:मा+ वाद क े वादी क े पूSा क े अति*कार क े संबं* में कोई प्रयोज्य ा +हीं है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल – आम ौर पर विहन्दू पक्षकारों क े पक्ष में।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- । 9 (ख). क्या उX अति*वि+यम क े अ*ी+ पैरा 15 में वि+र्मिदष्ट काय:वाही दुरणिभसंति*पूर्ण: र्थीीं? यविद हां ो इसका प्रभाव?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - वादी क े विवरुद्ध वि+र्ण- ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी क े पक्ष में वि+र्ण- । 9 (ग). क्या उ.प्र. अति*वि+यम 13, वष: 1936 क े उX प्राव*ा+ वादी क े अति*वXा क े 9. 3. 62 विद+ांविक और पेपर सं. 454-ए पर अंविक बया+ में विदये गये कारर्णों से विवति* विवरुद्ध है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - +कारात्मक में उत्तरिर ।

10. क्या व:मा+ वाद समय बाति* है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - वाद परिरसीमा द्वारा बाति* +हीं है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 11 (क). क्या सिस.प्र.सं. की *ारा 91 क े प्राव*ा+ व:मा+ वाद पर लागू हो े हैं? यविद हां, क्या वाद महाति*वXा द्वारा खिलखिख अ+ुमति + हो+े क े कारर्ण त्रुविर्टपूर्ण: है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - +कारात्मक में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - वादी क े पक्ष में वि+र्ण- । 11 (ख). क्या इस वाद में अति*कार सिस.प्र.सं. की *ारा 91 क े प्राव*ा+ों से मुX वादी द्वारा ब+ाए गये हैं? यविद +हीं, ो इसका प्रभाव।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - सकारात्मक में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - वादी क े पक्ष में वि+र्ण- ।

12. क्या वाद सिस.प्र.सं. क े आदेश 1, वि+यम 8 क े ह काय: और +ोविर्टस + हो+े क े कारर्ण त्रुविर्टपूर्ण: है? यविद हां, ो इसका प्रभाव?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - वादी क े पक्ष में उत्तरिर ।

13. क्या 50 का वाद 2 (श्री गोपाल सिंसह विवशारद ब+ाम Sहूर अहमद) सिस.प्र.सं. की *ारा 80 क े ह +ोविर्टस क े अभाव में त्रुविर्टपूर्ण: है? mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+- न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल – बाति* हो+े क े कारर्ण खारिरS +हीं विकया गया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - प्रति वादी गर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- ।

14. क्या 50 का वाद सं. 25 परम हंस राम चन्ˆ ब+ाम Sहूर अहमद सिस.प्र.सं. की *ारा 80 क े अ*ी+ विवति*मान्य +ोविर्टस क े अभाव में त्रुविर्टपूर्ण: है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - वाद वापस ले+े क े कारर्ण वि+रस् हो+े क े बाद विवषय अर्थी:ही+ हो गया।

15. क्या प्रति वादी गर्ण क े असंयोS+ क े अभाव में वाद त्रुविर्टपूर्ण: है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- +कारात्मक में और वादी क े पक्ष में उत्तरिर ।

16. क्या प्रति वादी गर्ण या उ+में से कोई सिस.प्र.सं. की *ारा 35-ए क े ह विवशेष लाग क े हकदार हैं?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - अति*वXा +े इस विवषय को +हीं उठाया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - वादी अ+ु ोष का हकदार +हीं है और आसा+ लाग क े सार्थी खारिरS विकया गया।

17. विकस अ+ु ोष, यविद कोई, क े खिलए वादी हकदार है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कष: से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - वादी क े पूSा अति*कार पर संदेह +हीं विकया Sा सक ा है क्योंविक विववाविद स्र्थील में उस भूविम का विहस्सा शाविमल है सिSसे भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ मा+ा Sा ा है। इस हद क वादी उ+ वि+बã*+ों क े अ*ी+ उद्घोषर्णा का हकदार है Sो पूSा क े स्र्थीा+ की सुरक्षा, संरक्षा और रखरखाव क े खिलए आवश्यक हो।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - वादी अ+ु ोष का हकदार +हीं है और मुकदमा आसा+ लाग क े सार्थी खारिरS कर विदया Sा ा है। L.[3] विवश्लेषर्ण

210. वाद 1 में वादी की ओर से प्रस् ु विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा श्री रंSी क ु मार +े, दं.प्र.सं. की *ारा 145 क े अ*ी+, मसिSस्र्ट्रेर्ट क े 29 विदसंबर, 1949 विद+ांविक आदेश को संदर्भिभ विकया सिSसक े द्वारा विववाविद परिरसरों को क ु क: विकया गया और एक प्राप्तक ा: वि+युX विकया गया र्थीा। विवद्वा+ अति*वXा +े कहा विक 8-16 फरवरी 1950 क े बीच सिस.प्र.सं. क े आदेश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA XIX, वि+यम 1 क े ह क ु छ मुसलमा+ों द्वारा चौदह हलफ+ामे दायर विकए गए र्थीे, सिSसमें कहा गया र्थीा: (i) वह स्र्थीा+ Sहां बाबरी मस्जिस्Sद स्जिस्र्थी र्थीी, भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है। बाबरी मस्जिस्Sद भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ को ोड़कर ब+ाई गयी र्थीी; (ii) विब्रविर्टश शास+ क े पश्चा ् मुसलमा+ उस मस्जिस्Sद में क े वल शुक्रवार की +माS पढ़ े र्थीे; (iii) मस्जिस्Sद ब+ Sा+े क े पश्चा ्, विहन्दुओं +े अप+ा कब्Sा +हीं छोड़ा और वहां पूSा कर+ा Sारी रखा। (iv) विहन्दू और मुस्जिस्लम दो+ों +े विववाविद स्र्थील पर पूSा कर+ा Sारी रखा; (v) 1934 क े दंगों क े बाद, मुसलमा+ों +े र्डर क े मारे मस्जिस्Sद Sा+ा बंद कर विदया और ब से विहन्दुओं +े मस्जिस्Sद में मुख्य स्र्थीा+ पर कब्Sा कर खिलया; और (vi) मस्जिस्Sद का कब्Sा विहन्दुओं को सौंप+े में कोई आपखित्त +हीं है क्योंविक उस स्र्थीा+ पर +माज़ पढ़+ा शरीय क े विवरुद्ध है।

211. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े शपर्थीपत्रों को पूरी रह अविवश्वस+ीय मा+ े हुए यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक: “3020. इस थ्य को साविब कर+े क े खिलए उपरोX दस् ावेSों पर कोई विववाद +हीं है विक मसिSस्र्ट्रेर्ट क े साम+े इन्हें दायर विकया गया र्थीा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े समक्ष *ारा 145 दं.प्र.सं. काय:वाही का विहस्सा र्थीे, लेविक+ हमारे विवचार में साम£ी पर विवश्वास कर+े क े खिलए, यह आवश्यक र्थीा विक दस् ावेSों क े लेखकों को प्रस् ु विकया Sाय और अन्य पक्षों को, सिS+क े विह ों क े विवरुद्ध दस् ावेSों में प्रकर्थी+ विकये गये हैं, सिSरह का अवसर विदया Sाय। उX दस् ावेSों क े विकसी भी लेखक को प्रस् ु +हीं विकया गया और वे व्यविXग रूप से काय:वाही का विहस्सा भी +हीं हैं। हमें उX दस् ावेSों की साम£ी की शुद्ध ा का परीक्षर्ण कर+े का कोई लाभ +हीं है। हमारे विवचार में, उX दस् ावेSों की साम£ी को साविब कर+े क े खिलए विकसी भी व्यविX की उपलब्* ा की अ+ुपस्जिस्र्थीति में उ+ पर पर भरोसा +हीं विकया Sा सक ा और इसखिलए, उपरोX दस् ावेSों से विकसी क े पक्ष में या विकसी भी पक्षकार क े विवरुद्ध कु छ भी +हीं वि+कल ा है।" न्यायमूर्ति एस यू खा+ न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल द्वारा की गई विर्टप्पणिर्णयों से सहम र्थीे। हालांविक, न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े हलफ+ामों को स्वीकाय: मा+ा है और *ारिर विकया विक: "...उ+ व्यविXयों क े हलफ+ामें सिS+क े ह या माध्यम से वादी दावा कर रहे हैं मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा अति*कार प्राप्त अति*कारी क े समक्ष ब+े र्थीे और स्वीकाय: साक्ष्य हैं।..."

212. श्री रंSी क ु मार +े वि+म्+खिलखिख क: विदया है: (i) 1885 क े वाद का व:मा+ वाद पर कोई प्रभाव +हीं पड़ेगा क्योंविक पहले वाले वाद में मांगा गया अ+ु ोष विकसी ऐसे स्र्थीा+ पर मंविदर ब+ा+े क े खिलए र्थीा Sो मस्जिस्Sद क े बाहर चबू रा क सीविम र्थीा। लेविक+ व:मा+ वाद "*म: और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रीति -रिरवाSों क े अ+ुसार" Sन्ममभूविम मंविदर में भगवा+ राम क े दश:+ की पूSा क े अति*कार क े संबं* में है; (ii) 3 माच:, 1951 को, विवचारर्ण न्यायालय +े वाद 1 क े 19 S+वरी, 1950 विद+ांविक अं रिरम आदेश की अणिभपुविष्ट की सिSसक े द्वारा व्यादेश को मूर्ति यों को विववाविद स्र्थील से हर्टा+े से रोक+े और पूSा में बा*ा र्डाल+े से रोक+े संबं*ी संशो*+ विकया गया र्थीा। विवचारर्ण न्याया*ीश +े अयोध्या क े क ु छ मुस्जिस्लम वि+वासिसयों क े हलफ+ामों का उल्लेख विकया और कहा विक कम से कम 1936 से "मुस्जिस्लमों +े + ो इस स्र्थीा+ का मस्जिस्Sद क े रूप में प्रयोग विकया है और + ही वहां इबाद की है" और "संदर्भिभ शपर्थीपत्र वादी का पक्ष पोषर्ण कर े हैं।" उपरोX आदेश की पुविष्ट 26 अप्रैल 1955 को अपील में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ +े की र्थीी, हालांविक उच्च न्यायालय +े यह विर्टप्पर्णी विकया विक वि+र्ण:य क े आरतिक्ष हो+े क े बाद हलफ+ामों को अणिभखिलखिख कर+ा सही +हीं है; (iii) *ारा 145 की काय:वाविहयों क े संबं* में आपखित्तयां आमंवित्र कर+े वाले साव:Sवि+क +ोविर्टस क े प्रकाश+ क े बावSूद विकसी भी मुस्जिस्लम प्रति वादी +े कोई प्रति क ू ल बया+ +ही दS: कराया; (iv) इ+ हलफ+ामों का पुविष्टकारक मूल्य है: Sब 21 फरवरी, 1950 को वाद 1 में प्रति वादी सं. 1 से 5 +े अप+े खिलखिख बया+ दS: विकए, ो *ारा 145 की काय:वाई में दाखिखल हलफ+ामों की Sा+कारी हो+े क े बावSूद उन्हों+े मुसलमा+ों द्वारा खिलए गए रुख पर आपखित्त +हीं S ाई। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) उच्च न्यायालय से पहले, शपर्थीपत्र व:मा+ वाद में अणिभलेख में शाविमल र्थीे और सम्यक ् प्रदर्भिश र्थीे। वे प्रासंविगक ऐति हासिसक थ्यों का विहस्सा हैं और उन्हें एकमुश् खारिरS +हीं विकया Sा सक ा है; (vi) प्रति वादी सं. 1 से 5 +े यह प्रार्थी:+ा कर े हुए आवेद+ दायर विकया विक वाद 1 को आदेश I वि+यम 8 क े अ*ी+ प्रति वि+ति* वाद मा+ा Sाए सिSसका वादी द्वारा विवरो* विकया गया र्थीा। 27 अX ू बर विद+ांविक एक आदेश द्वारा सिसविवल SS +े आवेद+ खारिरS कर विदया; (vii) इस न्यायालय क े समक्ष बहस क े दौरा+,1858 से कब्Sा विदखा+े क े खिलए सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा सिS+ प्रदशÂ का अवलंब खिलया गया है, उ+में विववाविद स्र्थील को "Sन्मस्र्थीा+ मस्जिस्Sद" या "मस्जिस्Sद Sन्मस्र्थीा+" क े रूप में संदर्भिभ विकया गया है, Sो यह संक े दे ा है विक इस स्र्थीा+ को हमेशा Sन्मस्र्थीा+ या भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में संदर्भिभ विकया गया; (viii) "दश:+" या पूSा क े प्रयोS+ों क े खिलए मंविदर में प्रवेश का अति*कार एक ऐसा अति*कार है Sो संस्र्थीा की प्रक ृ ति से ही प्रवाविह हो ा है (+र हरिर शास्त्री ब+ाम श्री बˆी+ार्थी मंविदर सविमति 122 )। पूSा में विकसी देव ा या देव ाओं क े दश:+ क े उद्देश्य से मंविदर में उपस्जिस्र्थीति शाविमल है (शास्त्री यज्ञपुरुषदSी ब+ाम मुल्दास भूदरदास वैश्य123 )। यविद आम S+ ा +े हमेशा साव:Sवि+क पूSा और भविX क े खिलए मंविदर का उपयोग उसी रह विकया है 122 1952 SCR 849 123 (1966) 3 SCR 242 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sैसे वे अन्य मंविदरों में कर े हैं, ो यह साव:Sवि+क मंविदर क े आत्यंति क अस्जिस् त्व क े पक्ष में (बाला शंकर महा शंकर भट्टSी ब+ाम चैरिरर्टी कविमश्नर,गुSरा राज्य124 ) एक मSबू परिरस्जिस्र्थीति है। विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा श्री रंSी कु मार, +े 30 Sुलाई 1953 विद+ांविक मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश का उल्लेख विकया, सिSसक े द्वारा *ारा 145 क े ह काय:वाही में फाइल को 3 माच: 1951 को दी गई अस्र्थीायी व्यादेश क े मद्दे+Sर रिरकॉर्ड: में भेS विदया गया र्थीा। मसिSस्र्ट्रेर्ट +े +ोर्ट विकया विक *ारा 145 क े ह मामला 'अ+ावश्यक' रूप से लंविब है और इस उम्मीद में ारीखें दी Sा रहीं हैं विक दीवा+ी वाद का वि+स् ारर्ण हो Sाएगा या अस्र्थीायी वि+षे*ाज्ञा रद्द कर दी Sाएगी। र्थीाविप, मसिSस्र्ट्रेर्ट +े यह उल्लेख विकया विक दीवा+ी न्यायालय का वि+ष्कष: आपराति*क न्यायालय क े खिलए बाध्यकारी है और *ारा 145 क े अ*ी+ पृर्थीक काय:वाही आरंभ कर+े का कोई प्रयोS+ +हीं है। श्री रंSी क ु मार +े इस न्यायालय का ध्या+ गोपाल सिंसह विवशारद द्वारा मसिSस्र्ट्रेर्ट क े समक्ष फाइल विकए गए 22 Sुलाई 1954 विद+ांविक आवेद+ पर आकर्मिष कर े हुए *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयों क े संबं* में सभी फाइलों को परिररतिक्ष कर+े और सिसविवल न्यायालय क े वि+र्ण:य की परिरर्णति क उन्हें वि+राक ृ + कर+े का अ+ुरो* विकया र्थीा।

213. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से उपस्जिस्र्थी विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े प्रत्युत्तर में वि+म्+खिलखिख क: विदये है:

Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) प्रति वादी सं. 1 से 5 क क े खिलखिख कर्थी+ में सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: सस्जिम्मखिल +हीं है; (ii) मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर +े अप+े से+ापति मीर बाकी क े माध्यम से विकया र्थीा और वह वै* वक्फ क े रूप में समर्मिप र्थीी। मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम 1936 क े ह मुख्य आयुX वक्फ +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक मस्जिस्Sद एक सुन्नी वक्फ है; (iii) मुसलमा+ों का स+् 1528 से मस्जिस्Sद पर कब्Sा रहा है और 400 वष: से अति*क समय से कब्Sे में रह+ा, विववाविद संपखित्त पर उ+क े प्रति क ू ल कब्Sे क े अति*कार की पुविष्ट र्थीी; (iv) वाद 1 मुख्य रूप से राज्य प्राति*कारिरयों क े विवरुद्ध दायर विकया गया है क्योंविक मुख्य णिशकाय वादी को विववाविद परिरसर क े भी र पूSा कर+े से वि+वारिर कर+े वाले प्राति*कारिरयों क े विवरुद्ध र्थीी; (v) वाद वादी क े व्यविXग अति*कार अर्थीा: ् विववाविद ढांचे क े भी र पूSा कर+े का अति*कार लागू कर+े क े खिलए दायर विकया गया र्थीा और इस प्रकार यह अति*कार उसकी मृत्यु पर स्व ः समाप्त हो Sा ा है; (vi) अयोध्या क े मुस्जिस्लम व्यविXयों द्वारा *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयों में विदये गए चौदह हलफ+ामे भार ीय साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 3 क े अ*ी+ साक्ष्य में £ाह्य +हीं हैं। हलफ+ामों की कोई प्रासंविगक ा +हीं है क्योंविक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हलफ+ामों क े लेखकों की प्रति परीक्षा +हीं की गई है और चूंविक वे व्यविXग रूप से विकसी भी वाद क े पक्षकार +हीं हैं, इसखिलए उ+ पर भरोसा +हीं विकया Sा सक ा है। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े इ+ हलफ+ामों को अविवश्वस+ीय पाया है; (vii) इस बा का कोई स्पष्ट उल्लेख +हीं है विक क्या वादी +े पहले विववाविद ढांचे क े भी र कोई पूSा की र्थीी और उस+े क े न्ˆीय गुंबद क े +ीचे भगवा+ राम क े Sन्म क े सही स्र्थीा+ का उल्लेख +हीं विकया है; और (viii) सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा सिS+ प्रदशÂ का अवलंब खिलया गया है उ+से स्पष्ट प ा चल ा है विक विदए गए प्रदश:+ों से स्पष्ट प ा चल ा है विक हिंहदू पक्षकारों की पहुंच रामचबू रा और सी ा रसोई क सीविम बाहरी आंग+ क र्थीी। आं रिरक आंग+ में अति चार क े सभी प्रयास विवफल कर विदये गए और अति*कारिरयों +े उ+ लोगों को बेदखल कर+े का कर विदया सिSन्हों+े आं रिरक आंग+ में प्रवेश कर+े का प्रयास विकया।

214. सिS+ व्यविXयों पर *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयों में हलफ+ामा दायर कर+े का अणिभकर्थी+ है उ+में से विकसी की भी उच्च न्यायालय क े समक्ष सिसविवल विवचारर्ण क े दौरा+ साक्ष्य में परीक्षा +हीं की गई। हलफ+ामे पर विकसी व्यविX द्वारा विदए गए बया+ की विवश्वस+ीय ा को क े वल भी स्वीकार विकया Sा सक ा है Sब गवाह साक्ष्य में उपस्जिस्र्थी विकया Sाय। लेविक+, व:मा+ मामले में, *ारा 145 क े ह काय:वाही में मसिSस्र्ट्रेर्ट क े समक्ष mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हलफ+ामों को प्रस् ु कर+े वाले मुस्जिस्लम वि+वासिसयों को गवाह क े रूप में उद्धृ या प्रस् ु +हीं विकया गया। हलफ+ामों में विदए गए बया+ों को चु+ौ ी दे+े क े खिलए विवपक्षी क े पास विकसी भी अवसर क े अभाव में, हलफ+ामों की विवषयवस् ु पर कोई अवलंब +ही खिलया Sा सक ा।

215. मुकदमे क े विवचारा*ी+ रह े मूल वादी गोपाल सिंसह विवशारद का वि+*+ हो गया और 22 फरवरी, 1986 विद+ांविक न्यायालय क े आदेश क े अ+ुसरर्ण में वाद उ+क े पुत्र राSेन्ˆ सिंसह विवशारद द्वारा स्र्थीा+ापन्न हो गया। यह क: विदया गया र्थीा विक मूल वादी +े विववाविद संपखित्त पर पूSा कर+े क े अप+े वि+Sी अति*कार क े प्रव:+ हे ु वाद संस्जिस्र्थी विकया र्थीा और उ+की मृत्यु पर, इस रह का अति*कार समाप्त हो गया और मुकदमा समाप्त हो गया। यह वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए विक मूल वादी द्वारा दावा विकया गया अति*कार एक वि+Sी अति*कार र्थीा या अन्य उपासकों क े सार्थी आम ौर पर दावा विकया गया एक वृहद साव:Sवि+क अति*कार र्थीा, वाद 1 में दी गई दलीलों का उल्लेख कर+ा आवश्यक है। वाद 1 का पैरा£ाफ 3 इस प्रकार है:... प्रति वादी सं. 6 +े वादी को उस स्र्थीा+ क े अंदर Sा+े से रोका Sहां श्री रामचंˆ Sी और अन्य की मूर्ति यां रखी गई हैं और यह प ा चला र्थीा विक प्रति वादी सं. 1 से 5 और उ+क े अन्य साणिर्थीयों की आ*ारही+ और झूठी स+क क े प्रभाव में, प्रति वादी सं 7 से 9 +े हिंहदू S+ ा को पूSा कर+े और दश:+ कर+े क े अप+े वै* अति*कार से वंतिच कर विदया और प्रति वादी सं. 1 से 5 आविद क े अ+ुतिच आ£ह क े कारर्ण, प्रति वादी सं. 6 घोविष कर ा है विक हिंहदू S+ ा को भविवष्य में भी उसी रह से उसक े उपरोX अति*कारों से वंतिच विकया Sाएगा और उपरोX अ+ुतिच काय: क े कारर्ण,मूल वादी का माखिलका+ा अति*कार, सिSसका उस+े सदैव mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उपयोग विकया र्थीा, का उल्लंघ+ विकया Sा रहा है और उपरोX परिरस्जिस्र्थीति यों में, व:मा+ वादी क े पास प्रति वादी गर्ण क े प्रति उपयु:X *ार्मिमक अति*कार क े प्रयोग में अवै* हस् क्षेप की पूरी आशंका और भय है।" (प्रभाव वर्ति* ) प्रति वादी सं. 6 उत्तर प्रदेश राज्य है प्रति वादी सं. 7 से 9 क्रमशः उपायुX, अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट और पुखिलस अ*ीक्षक, फ ै Sाबाद हैं। दलीलों से यह संक े विमल ा है दावा विकया गया अति*कार व्यविXग अति*कार +हीं र्थीा बस्जिल्क विववाविद संपखित्त पर अन्य विहन्दू श्रद्धालुओं क े विह में पूSा कर+े क े एक सामान्य अति*कार क े खिलए र्थीा। मांगा गया अति*कार विववाविद संपखित्त पर अ+ुतिच हस् क्षेप क े विब+ा पूSा कर+े का "विहन्दू S+ ा" का अति*कार र्थीा। 22 फरवरी 1986 विद+ांविक एक आदेश द्वारा न्यायालय +े मूल वादी क े बेर्टे राSेंˆ सिंसह विवशारद को वाद 1 में पहले वादी क े रूप में प्रति स्र्थीाविप कर+े की अ+ुमति दी। राSेंˆ सिंसह विवशारद भी'स+ा + *म:' क े अ+ुयायी हैं और विववाविद स्र्थील पर पूSा कर े र्थीे। वृहद 'विहन्दू S+ ा' की ओर से मांगा गया अति*कार मूल वादी की मृत्यु पर समाप्त +हीं हो ा और इसका प्रयोग उसक े बेर्टे द्वारा विकया Sा सक ा है Sो स्वंय एक उपासक है।

216. वाद 1 क े शेष विववाविद विवषय वाद 5 में अणिभकणिर्थी विवषयों से संबद्ध हैं। वाद 5 में मांगे गये अ+ु ोष का वाद 1 में यर्थीा यातिच वादी क े पूSा क े अति*कार पर सी*ा प्रभाव पड़ेगा। द+ुसार, हम वाद 1 में विदये गये कÂ पर वाद 5 पर चचा: कर े समय विवचार करेगें। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

217. वि+म ही अखाड़ा का दावा है विक Sन्मस्र्थीा+, सिSसे आम ौर पर Sन्मभूविम क े रूप में Sा+ा Sा ा है, Sो भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है, “उसकी है और सदैव उसकी रही है" और वह उसका प्रबं*+ कर ा रहा है और प्रशासी महं और सरबराहकार से चढ़ावा प्राप्त कर ा रहा है। प्राप्तक ा: क े अलावा, दूसरे से पांचवां प्रति वादी गर्ण उत्तर प्रदेश राज्य और उसक े अति*कारिरयों द्वारा प्रस् ु आति*कारिरक प्रत्यर्थी-गर्ण हैं। विकया Sा ा है। वाद में एक प्रकर्थी+ है विक मंविदर "हमेशा से वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में रहा है" और कम से कम 1934 से क े वल हिंहदुओं को इसमें प्रवेश कर+े और पूSा कर+े की अ+ुमति दी गई है। दूसरे शब्दों में, वि+म ही अखाड़ा विववाविद ढ़ाचे की मस्जिस्Sद क े रूप में स्जिस्र्थीति से इ+कार कर ा है। वाद संस्जिस्र्थी कर+े का आ*ार +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा दंप्रसं 1898 की *ारा 145 क े ह काय:वाही शुरू कर+ा है। काय:वाविहयों पर विवति*क कारर्ण से रविह हो+े और छठें और आठवें प्रति वादी गर्ण द्वारा प्रस् ु मुस्जिस्लम पक्षकारों क े "गल आ£ह" क े ह हो+े का आरोप है। परिरर्णामस्वरूप, वि+म विहयों का आरोप है विक उन्हें "उX मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार से" गल रीक े से वंतिच विकया गया है और हालांविक वे *ारा 145 क े ह काय:वाही क े समाप+ की प्र ीक्षा कर रहे र्थीे, काय:वाही प्रति वाविदयों की विमलीभग से लंबे समय से चली आ रही है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुस्जिस्लम पक्षकारों को इसखिलए आरोविप विकया गया है क्योंविक उ+ पर आरोप है विक उ+की रुतिच यह सुवि+तिश्च कर+े में है विक मंविदर का प्रभार और प्रबं*+ वि+म ही अखाड़ा को + सौंपा Sाय। वाद का वाद हे ुक 5 S+वरी 1950 को उत्पन्न हुआ कहा गया है Sब प्राप्तक ा: द्वारा वि+म ही अखाड़ा से मंविदर का प्रबं*+ और प्रभार अवै* रूप से ले खिलया Sा+ा आरोविप है। 6 विदसंबर 1992 को हुई घर्ट+ा क े बाद (सिSसे वि+म ही "क ु छ बदमाशों" द्वारा मंविदर क े संपखित्त का विवध्वंस कह े है), वाद में संशो*+ विकया गया र्थीा। संशोति* वाद 19 माच: 1949 को वि+म ही अखाड़ा द्वारा वि+ष्पाविद र्ट्रस्र्ट विवलेख को संदर्भिभ कर ा है, सिSससे इसका अस्जिस् त्व खिलखिख रूप में आ गया। अखाड़ा +े अ+ेक मंविदरों और संपखित्तयों क े स्वाविमत्व का दावा विकया है, Sो इसमें वि+विह हैं। वाद में मांगा गया अ+ु ोष प्राप्तक ा: को उX Sन्मभूविम मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार से हर्टा+े और इसे वादी को दे+े को लेकर है। वाद में वि+विह प्रकर्थी+ और सार्थी ही वि+म ही अखाड़ा द्वारा मांगा गया अ+ु ोष संक े कर े हैं विक दावा स्वाविमत्व पर आ*ारिर है, सिSसे मंविदर का प्रभार और प्रबं*+ मा+ा गया है। उस हैसिसय से,वि+म विहयों +े अणिभकर्थी+ विकया है विक Sन्मभूविम मंविदर का कब्Sा उ+क े पास रहा है और भXों द्वारा चढ़ाई गई भेंर्ट उन्हें विमली है। वाद में उ+ मंविदरों का एक संदभ: है Sो वि+म ही अखाड़ा क े स्वाविमत्व और प्रबं*+ में हैं। अं: अ+ु ोष का दावा प्राप्तक ा: को मंविदर का प्रबं*+ और प्रभार इसे सौंप+े का वि+द†श है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

218. खिलखिख बया+ में, Sो मुस्जिस्लम पक्षकारों (प्रति वादी सं. 6 से 8) द्वारा दायर विकया गया र्थीा, खिलया गया अणिभवच+ 1885 क े वाद में र्थीा सिSसे महं रघुबर दास द्वारा संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, अ+ु ोष मस्जिस्Sद क े बाहर चबू रा क सीविम र्थीा और उस मस्जिस्Sद क े संबं* में कोई आपखित्त +हीं की गयी र्थीी Sो साइर्ट प्ला+ में दशा:ई गयी र्थीी। अप+े प्रत्युत्तर में,वि+म ही अखाड़ा +े महं रघुबर दास द्वारा दायर वाद क े बारे में अ+णिभज्ञ ा प्रकर्ट की। अखाड़े का दावा है विक काय:वाही क े परिरर्णामस्वरूप इसे गल रीक े से मंविदर क े प्रबं*+ क े अति*कार और प्रभार से वंतिच कर विदया गया है। हालांविक वाद में यह प्र ी हो ा है विक मुकदमे में दावा आं रिरक आंग+ क े संबं* में र्थीा, दसवें प्रति वादी क े खिलखिख बया+ क े प्रत्यत्तर में वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर Sवाब में यह कहा गया है विक बाहरी घेरा उसक े कब्Sे और स्वाविमत्व में र्थीा और 1982 क इसक े द्वारा प्रबंति* Sब यह उस संबं* में एक वि+यविम वाद 39 वष: 1982 द्वारा प्राप्तक ा: क े कब्Sे में आ गया।

219. वाद 3 में वि+म ही अखाड़ा की दलीलों में वि+विह प्रकर्थी+ को वाद 5 क े बचाव की प्रक ृ ति क े सार्थी पढ़ा Sा+ा चाविहए। वाद 5 भगवा+ राम और Sन्मस्र्थीा+ की ओर से एक वाद विमत्र द्वारा दायर विकया गया है। वि+म ही अखाड़ा +े वाद 5 में अप+े खिलखिख बया+ में इस आ*ार पर वाद की पोषर्णीय ा का विवरो* विकया गया है विक Sन्मस्र्थीा+ एक विवति*क व्यविX +हीं है और वाद विमत्र को देव ा और Sन्मस्र्थीा+ की ओर से वाद संस्जिस्र्थी करा+े का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कोई अति*कार या प्राति*कार +हीं है। वि+म ही अखाड़ा +े स्वंय को वाद 5 से यह कह कर अलग कर खिलया विक भगवा+ राम की मूर्ति "राम लला विवराSमा+" क े रूप में +हीं Sा+ी Sा ी और Sन्मस्र्थीा+ क े वल एक स्र्थीा+ है + विक एक विवति*क व्यविX। वि+म ही अखाड़ा +े अप+े खिलखिख कर्थी+ में दावा विकया है विक यह "विववाविद मंविदर में रखे भगवा+ श्री राम क े सेवादार है" और मंविदर क े वि+यंत्रर्ण, अ*ीक्षर्ण और मरम्म और यहां क विक आवश्यक हो+े पर मंविदर क े पु+र्मि+मा:र्ण का भी अति*कार "मात्र" अखाड़ा क े पास है। इसका दावा है विक सेवादार और प्रबं*क की हैसिसय से "मंविदर वि+म ही अखाड़ा का है" और वाद 5 में वादी क े पास मुकदमा कर+े क े खिलए "कोई वास् विवक स्वत्व +हीं है"। यह आ£ह विकया गया है विक वाद 5 मंविदर क े प्रबं*+ का वि+म ही अखाड़ा क े अति*कारों पर अति क्रमर्ण कर ा है। वि+म ही अखाड़ा का आ£ह है विक पूरा परिरसर इसका है और वाद 5 क े वादी को वि+म ही अखाड़ा क े अति*कार और स्वत्व क े विवरुद्ध उद्घोषर्णा का कोई अति*कार +हीं है। अति रिरX खिलखिख बया+ में, यह दावा विकया गया है विक क ु क: विकये Sा+े क Sब वाद 239 वष: 1982 में प्राप्तक ा: वि+युX विकया गया, बाहरी विहस्सा वि+म ही अखाड़ा क े प्रबं*+ और प्रभार में र्थीा। M.[2] वाद 3 और वाद 5 में विवरो* mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

220. वाद 3 में वि+म ही अखाड़ा क े कÂ और वाद 5 में प्रति वादी क े रूप में विवश्लेषर्ण से वि+म्+खिलखिख स्जिस्र्थीति उभर ी है: (i) वि+म ही अखाड़ा का दावा राम Sन्मभूविम मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए है। (ii) मांगा गया अ+ु ोष प्राप्तक ा: द्वारा मंविदर का प्रबं*+ और प्रभार इसे सौंप+े क े खिलए है; (iii) उपरोX (i) और (ii) क े संदभ: में, वि+म ही अखाड़ा +े दावा विकया है विक मंविदर का कब्Sा इसक े पास र्थीा; (iv) दावा विकये गये अति*कार से ब वंतिच हुआ Sब प्राप्तक ा: +े 5 S+वरी, 1950 को प्रबं*+ और प्रभार ले खिलया; (v) वि+म ही अखाड़ा का दावा एक सेवादार की हैसिसय और मंविदर क े प्रबं*क क े रूप में है; (vi) वि+म ही अखाड़ा +े वाद 5 की पोषर्णीय ा का इस आ*ार पर विवरो* विकया है है विक एक सेवादार क े रूप में, क े वल वही भगवा+ राम का प्रति वि+ति*त्व कर+े का हकदार है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) मुकदमा कर+े का वि+म ही अखाड़ा का हक विकसी ीसरे पक्ष क े अपवS:+ का है और इसखिलए, वाद 5, Sो एक वाद विमत्र क े माध्यम से संस्जिस्र्थी विकया गया है, का पोषर्णीय + हो+ा ख्याविप है; और (viii) राम Sन्मस्र्थीा+ का विवति*क व्यविXत्व +कार विदया गया है और इसखिलए यह (वि+म ही अखाड़ा क े अ+ुसार) वाद 5 में दावे को आगे बढ़ा+े का हकदार +हीं होगा। सु+वाई क े दौरा+ वि+वेविद विकये गये क: और कर्थी+ दो+ों क े आ*ार पर, वाद 3 और वाद 5 में वादी क े दावों और अति*कारों क े बीच स्पष्ट विवरो* साम+े आया है।

221. वाद 5 में वादी गर्ण की ओर से प्रस् ु विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े. परासर+ +े कहा है विक वाद 3 परिरसीमा बाध्य है, यह एक ऐसा क: है Sो वाद 4 में वादी की ओर से र्डॉ *व+ द्वारा भी विदया गया है। दूसरी ओर, इस पर ध्या+ विदया Sा+ा चाविहए विक र्डॉ. *व+ का कर्थी+ है विक, थ्य और साक्ष्य क े रूप में, वि+म ही अखाड़ा Sन्मभूविम में भगवा+ राम की मूर्ति यों क े संबं* में सेवादारी अति*कारों का दावा कर+े का हकदार है। हालांविक उ+का कह+ा है विक वाद 3 सीमा बाध्य है और इसखिलए, उ+क े मुकदमे में कोई अ+ु ोष +हीं विदया Sा सक ा र्थीा या +हीं विदया Sा+ा चाविहए र्थीा। इसखिलए, इस न्यायालय क े समक्ष कÂ से यह साम+े आया है विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) वाद 4 और वाद 5 क े वादी गर्णों +े वाद 3 को सीमा बाध्य हो+े क े आ*ार पर चु+ौ ी दी है; (ii) वाद 5 क े वादी गर्ण भगवा+ राम की मूर्ति का सेवादार हो+े संबं*ी वाद 3 क े वादी क े दावे का विवरो* कर े हैं; (iii) वाद 4 का वादी इस क ै विवएर्ट क े अ*ी+ विक वाद सीमा बाध्य है, वाद 3 क े वादी का सेवादार हो+े संबं*ी स्वत्व स्वीकार कर ा है।

222. इस न्यायालय द्वारा वाद 3 में वादी की ओर से प्रस् ु वरिरष्ठ विवद्व अति*वXा श्री एस क े Sै+ को एक प्रश्न संबोति* विकया गया र्थीा, विक क्या सेवादार क े खिलए देव ा क े दावे क े विवरुद्ध स्वत्व या स्वाविमत्व क े दावे का विवकल्प है। प्रत्युत्तर में, श्री Sै+ +े कहा विक मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए वि+म ही अखाड़ा का दावा सेवादार क े रूप में है विकसी और रूप में +हीं। इसखिलए, हालांविक इसमें 'स्वाविमत्व हो+ा' और 'संबंति* हो+ा' शब्द का प्रयोग हुआ है, सेवादार से अति*क या उससे ज्यादा पूर्ण: स्वाविमत्व का दावा कर+े का उ+का इरादा +हीं है। श्री Sै+ की कर्थी+ क े इस पहलू की शीघ्र ही परिरसीमा क े विवषय क े सन्दभ: में Sांच की Sाएगी। हालाँविक, इस स् र पर यह भी ध्या+ रख+ा चाविहए विक, सु+वाई क े दौरा+, श्री Sै+ +े वि+म्+खिलखिख शब्दों में वाद 5 की पोषर्णीय ा पर वि+म ही अखाड़ा क े रुख संबं*ी एक बया+ विदया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “1. वि+म ही अखाड़ा वाद सं. OOS सं. 5 वष: 1989 की पोषर्णीय ा क े मुद्दे पर Sोर +हीं देगा Sो देव ाओं-वादी सं. 1 और 2 की ओर से उ+क े वाद विमत्र वादी सं. 3 क े माध्यम से सिस.प्र.सं. क े वि+यम 1 आदेश 32 क े अन् ग: दायर विकया गया है बश † अन्य हिंहदू पक्षकार अर्थीा: OOS सं. 1 वष: 1989 का वादी और OOS सं. 5 वष: 1989 का वादी सं. 3 प्रश्नग देव ाओं क े संबं* में वि+म ही अखाड़ा क े सेवादारी अति*कारों और वि+म ही अखाड़ा द्वारा वाद OOS सं. 3 वष: 1989 पर सवाल + उठाएं या Sोर + दें।

2. यह कहा गया है विक वादी- वि+म ही अखाड़ा वाद OOS सं. 3 वष: 1989 में देव ाओं की पक्षकारों क े रूप में अ+ुपस्जिस्र्थीति में भीस्व ंत्र रूप से वाद को चला सक ा है क्योंविक देव ाओं की पहचा+ सेवादार- वि+म ही अखाड़ा की पहचा+ में वि+विह है। "सेवादार क े रूप में" वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर वाद देव ाओं की ओर से देव ाओं द्वारा दायर वाद है।

3. यह कहा गया है विक, "प्राप्तक ा: से प्रभार और प्रबं*+ ले+े क े खिलए" वि+म ही अखाड़ा द्वारा मांगे गये अ+ु ोष को देव ाओं क े विह क े "विवरुद्ध" अ+ु ोष क े रूप में वग-क ृ +हीं विकया Sा सक ा है, सिSसक े खिलए यह कहा Sा सक ा है विक उ+का प्रति वि+ति*त्व एक वि+ष्पक्ष वाद विमत्र क े माध्यम से प्रति वादी क े रूप में हो+ा चाविहए।" दूसरे शब्दों में, वि+म ही अखाड़ा का रुख यह है विक सेवादार क े रूप में वही देव ा क े विह का प्रति वि+ति*त्व कर+े का हकदार है, Sो विक इस+े वाद 3 में विकया गया है। इसक े अलावा, सेवादार की ओर से विकसी कु प्रबं*+ क े आरोप की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, वाद विमत्र द्वारा देव ा क े +ाम पर कोई वाद संस्जिस्र्थी +हीं विकया Sा सक ा, Sैसा विक वाद 5 में विकया गया है। वाद 5 की पोषर्णीय ा का विवश्लेषर्ण कर+े पर इस पहलू पर अति*क विवस् ार से विवचार विकया Sाएगा। इस स् र पर, हमें र्डॉ. *व+ द्वारा वि+म ही अखाड़ा क े सेवादारी दावे को स्वीकार विकये Sा+े क े वि+विह ार्थीÂ पर भी ध्या+ दे+ा चाविहए। रिरयाय ऐसे ही mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं हो सक ी। दावा उसी सन्दभ: में विकया Sा सक ा है सिSसमें ऐसे देव ा क े अस्जिस् त्व को स्वीकार कर ी हो सिSसका सेवादार प्रति वि+ति*त्व कर ा है। इसखिलए, र्डॉ. *व+ से एक विवणिशष्ट प्रश्न पूछा गया र्थीा विक क्या, परिरसीमा क े विवषय से अलग, उ+की ओर से की गई रिरयाय का राम Sन्मस्र्थीा+ पर देव ा की उपस्जिस्र्थीति क े बारे में आवश्यक रूप से विवति*क वि+विह ार्थी: होंगे। यहां र्डॉ. *व+ की प्रति विक्रया ध्या व्य है सिS+क े कर्थी+ा+ुसार, रामचबू रा पर देव ा की उपस्जिस्र्थीति क े खिलए, हिंहदू भXों को क े वल पूSा का सुखाति*कार और उस उद्देश्य क े खिलए अहा े क पहुंच पा+ा प्रकस्जिल्प र्थीा। M.[3] उच्च न्यायालय क े विवषय और वि+ष्कष:

223. आगे विवश्लेषर्ण कर+े से पहले, इस स् र पर,उ+ विवषयों और उच्च न्यायालय क े वि+ष्कषÂ को सूचीबद्ध कर+ा आवश्यक है Sो वाद 3 में विवरतिच विकए गए र्थीे।

1. क्या वाद 3 क े वादपत्र क े पैरा 3 में यर्थीा आरोविप Sन्मभूविम मंविदर है सिSसमें मूर्ति यां रखी गयी हैं ?  न्यायमूर्ति एस यू खा+- मूर्ति यों को मंच पर पहली बार 22/23 विदसंबर 1949 की रा में मस्जिस्Sद क े वि+र्मिम विहस्से क े अंदर रखा Sा+ा कहा गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-विववाद क े परिरसरों को उस रीति से मंविदर +हीं मा+ा Sा सक ा Sैसा वाद 3 में वादी द्वारा दावा विकया गया है। इसखिलए, विवषय 1 का +कारात्मक उत्तर विदया गया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-यह स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कोई सबू +हीं है विक ढ़ाचे क े अंदर वि+म ही अखाड़ा से संबंति* कोई मंविदर र्थीा सिSसमें प्राची+ काल से मूर्ति यां रखी हैं।

2. क्या वाद की संपखित्त वाद 3 क े वादी की है?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-उस संपखित्त में, Sो वाद 3 में दावे की विवषयवस् ु है, आं रिरक क े परिरसर शाविमल हैं। स्वत्व स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कोई दस् ावेSी साक्ष्य +हीं है और + ही प्रति कू ल कब्Sा स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कोई सबू है।  Sस्जिस्र्टस र्डी वी शमा: +े वादी क े विवरुद्ध अव*ारिर विकया।

3. क्या वादी गर्ण +े 12 वष: से अति*क समय क प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा स्वत्व प्राप्त विकया है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+-1855 से पहले की अवति* क े खिलए, प्रति क ू ल कब्Sे का प्रश्न अणिभवि+र्ण- कर+े की आवश्यक ा +हीं है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े वादी क े विवरुद्ध अव*ारिर विकया।  Sस्जिस्र्टस र्डी वी शमा: +े वादी क े विवरुद्ध अव*ारिर विकया।

4. क्या वादी गर्ण उX मंविदर का प्रबं*+ और प्रभार पा+े क े हकदार हैं?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े वादी क े विवरुद्ध अव*ारिर विकया। मूर्ति यां क े न्ˆीय गुंबद क े +ीचे 22/23 विदसंबर, 1949 की रा में रखी गयी र्थीीं। इसे विववाविद कर+े वाले वादी को क े न्ˆीय गुम्बद क े +ीचे रखी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मूर्ति का सेवादार +हीं मा+ा Sा सक ा क्योंविक अां रिरक अहा े में क े न्ˆीय गुम्बद क े +ीचे रखी देवमूर्ति का उ+क े द्वारा देखभाल विकये Sा+े का कोई साक्ष्य +हीं है।  Sस्जिस्र्टस र्डी वी शमा: +े वादी क े विवरुद्ध अव*ारिर विकया।

5. क्या वाद की संपखित्त सम्रार्ट बाबर द्वारा ब+वाई गई मस्जिस्Sद है सिSसे बाबरी मस्जिस्Sद कहा Sा ा है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विववाविद परिरसर का वि+र्मिम विहस्सा बाबर क े द्वारा या उसक े आदेश पर मस्जिस्Sद क े रूप में ब+वाया गया र्थीा। यह महत्वपूर्ण: +हीं है विक इसे मीर बाकी या विकसी अन्य द्वारा ब+वाया गया र्थीा। लेविक+ प्रत्यक्ष साक्ष्य से यह सिसद्ध +हीं है विक वि+र्मिम भाग सविह विववाविद परिरसर बाबर का या उस व्यविX का र्थीा सिSस+े मस्जिस्Sद ब+वाया। क े वल उत्कीर्ण:+ों क े आ*ार पर यह *ारिर +हीं विकया Sा सक ा विक इमार बाबर क े द्वारा या उसक े आदेश पर ब+बायी गयी र्थीी या विक इसे 1528 में ब+वाया गया र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-प्रति वादी गर्ण यह साविब कर+े में विवफल रहे विक विववाविद संपखित्त का वि+मा:र्ण बाबर +े 1528 में कराया र्थीा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-विववाविद संपखित्त का वि+मा:र्ण बाबर द्वारा कराया गया है।

6. क्या कणिर्थी मस्जिस्Sद बादशाह बाबर द्वारा आम ौर पर मुसलमा+ों द्वारा इबाद क े खिलए समर्मिप की गयी र्थीी और साव:Sवि+क वक्फ संपखित्त ब+ाई गयी र्थीी? mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+-यह *ारिर +हीं विकया Sा सक ा विक मस्जिस्Sद विकसी और की भूविम पर ब+वाई गयी एक वै* मस्जिस्Sद +हीं र्थीी।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-प्रत्यक्ष, परिरस्जिस्र्थीति Sन्य या अन्यर्थीा साक्ष्य की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, विवषय सं. 6 साविब +हीं हुआ है और +कारात्मक में उत्तरिर है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - विवषय सं. 1 क े सार्थी वि+र्ण- ।

7. क्या मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम (1936 का अति*वि+यम सं. 13) क े अ*ी+ वाद की इस संपखित्त को सुन्नी वक्फ क े रूप में घोविष कर+े की अति*सूच+ा Sारी की गई है?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वाद 4 में वि+काले गए वि+ष्कषÂ क े अ+ुसार। 7(ख). क्या उX अति*सूच+ा अंति म और बाध्यकारी है? इसका प्रभाव।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वाद 4 में वि+काले गए वि+ष्कषÂ क े अ+ुसार।

8. क्या वाद से पूव: 12 वषÂ क कब्Sा + हो+े क े कारर्ण वादी गर्ण क े अति*कार समाप्त हो गए हैं?  न्यायमूर्ति एस यू खा+-पक्ष संयुX कब्Sे का लाभ ले रहे हैं और इसखिलए, प्रति क ू ल कब्Sे क े मुद्दे का अणिभवि+*ा:रर्ण आवश्यक +हीं र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सूर्ट 1959 में संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा और यह +हीं कहा Sा सक ा है विक पूव:व - 12 वषÂ में, वादी क े पास कभी भी आं रिरक आंग+ का कब्Sा +हीं र्थीा. वादी गर्ण में से विकसी +े भी यह स्र्थीाविप कर+े का दातियत्व +हीं वि+भाया है विक वे विववाद की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संपखित्त क े स्वामी र्थीे और + ही प्रति वादी गर्ण +े यह स्र्थीाविप विकया है विक वादी गर्ण 12 वषÂ से कब्Sाविवही+ रहे और प्रति वादी गर्ण +े प्रति क ू ल कब्Sे की श Â को पूरा विकया है। इस विवषय का द+ुसार +कारात्मक में उत्तर विदया गया है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादी क े विवरुद्ध उत्तरिर और वाद 4 में वि+काले गए वि+ष्कषÂ क े अ+ुसार।

9. क्या वाद समय क े भी र है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+-वाद परिरसीमा क े भी र है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल -वाद परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 120 क े ह परिरसीमा बाध्य है। परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 47, 142 और 144 अप्रयोज्य र्थीे।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वाद परिरसीमा बाध्य है। 10(a). क्या वाद *ारा 80 सी क े ह +ोविर्टस क े अभाव में अ+ुतिच है?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल -वादी गर्ण क े पक्ष में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादी गर्ण क े पक्ष में उत्तरिर । 10 (ख). क्या उपरोX अणिभवाक विवरो*ी प्रति वादी गर्ण को उपलब्* है?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े-वादी गर्ण क े पक्ष में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादी गर्ण क े पक्ष में उत्तरिर ।

11. क्या वाद आवश्यक प्रति वादी गर्ण क े असंयोS+ क े कारर्ण अ+ुतिच है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+-हालांविक इस विवषय पर विववि+र्मिदष्टया विवचार +हीं विकया गया है, वह न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ से सहम हैं Sो उ+क े स्वयं क े वि+ष्कषÂ से असंग +हीं हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- बल + दे+े क े कारर्ण वादी गर्ण क े पक्ष में उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वाद 4 में विवषय 21 पर वि+ष्कषÂ क े संदभ: में वि+र्ण- ।

12. क्या प्रति वादी गर्ण सिस.प्र.सं. की *ारा 35 क े ह विवशेष लाग क े हकदार हैं?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल -बल + दे+े क े कारर्ण वादी गर्ण क े पक्ष में उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - +कारात्मक में उत्तरिर ।

13. वादी कौ+ सा अ+ु ोष,यविद कोई, पा+े का हकदार है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+- ी+ों पक्षों में से प्रत्येक (मुस्जिस्लम, हिंहदू और वि+म ही अखाड़ा) संयुX स्वत्व की घोषर्णा और एक ति हाई विहस्से की सीमा क कब्Sा कर+े का हकदार है और उस हे ु एक प्रारंणिभक तिर्डक्री प्रदा+ की Sा ी है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वाद 3 का वादी विकसी भी अ+ु ोष का हकदार +हीं है। इसक े बावSूद, यह *ारिर विकया गया है विक बाहरी अहा े का रामचबू रा, सी ा रसोई और भंर्डार बेह र स्वत्व क े दावे क े अभाव में, वि+म ही अखाड़ा का विहस्सा घोविष विकया Sा ा है। इसक े अलावा, बाहरी अहा े का खुला क्षेत्र वि+म ही अखाड़ा द्वारा वाद 5 क े वादी क े सार्थी साझा विकया Sाएगा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वाद को वि+रस् विकया Sा ा है और वि+म ही अखाड़ा कोई भी अ+ु ोष पा+े का हकदार +हीं है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

14. क्या विवरतिच रूप में वाद पोषर्णीय +हीं है?  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+- विवषय विववि+र्मिदष्ट रूप से वि+र्ण- +हीं। प्रकीर्ण: वि+ष्कष:- रूप से वि+र्ण:य +हीं खिलया गया। विवविव* वि+ष्कष: -वह अप+े (न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ क े ) वि+र्ण:य में इसक े विवपरी विकसी बा क े अध्य*ी+ न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वाद अपोषर्णीय *ारिर । दं.प्र.सं. 1898 की *ारा 145 क े ह संपखित्त क े क ु क: विकये Sा+े पर,वादीगर्ण मसिSस्र्ट्रेर्ट क े साम+े आपखित्त दS: कर सक े र्थीे। वादी +े कोई आपखित्त दS: +हीं की या स्वत्व क े घोषर्णा की मांग +हीं की,सिSसक े अभाव में सिसविवल SS प्राप्तक ा: द्वारा वादी को प्रभार सौंप+े का वि+द†श + दे पा ा।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-यह विवषय वादीगर्ण क े पक्ष में वि+र्ण- विकया Sा ा है।

15. क्या वाद संपखित्त मूल्यवा+ है और न्यायालय फीस पया:प्त संदत्त है?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- बल + दे+े क े कारर्ण वादीगर्ण क े पक्ष में उत्तरिर ।

16. क्या उ.प्र. अति*वि+यम 13 वष: 1936 की *ारा 83 क े अन् ग: +ोविर्टस क े अभाव में वाद अ+ुतिच है?  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक में उत्तरिर ।

17. क्या वादी वि+म ही अखाड़ा, बैराविगयों क े रामा+ंद संप्रदाय का एक पंचाय ी मठ है और इस रह, अप+े *ार्मिमक विवश्वास और वाद क े अ+ुसार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अप+े रीति रिरवाS क े विहसाब से एक *ार्मिमक अणिभ*ा+ है?(मा++ीय उच्च न्यायालय क े 23 फरवरी, 1996 विद+ांविक आदेश द्वारा Sोड़ा गया)  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े-वादीगर्ण क े पक्ष में उत्तरिर ।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्ण क े पक्ष में उत्तरिर ।

224. वाद सं. 3, 17 विदसंबर, 1959 को संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। वष: 1908 का परिरसीमा अति*वि+यम वाद क े संस्जिस्र्थी हो+े की ति णिर्थी पर प्रव:+ में र्थीा। परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 3 उपबं* कर ी है विक *ारा 4 से 25 (समावेशी) में वि+विह प्राव*ा+ों क े अ*ी+, प्रर्थीम अ+ुसूची द्वारा वि+*ा:रिर परिरसीमा अवति* क े बाद संस्जिस्र्थी प्रत्येक वाद, की गई अपील और विदया गया आवेद+ खारिरS कर विदया Sाएगा, हालांविक परिरसीमा को बचाव क े रूप में +हीं रखा गया है। परिरसीमा अति*वि+यम 1963 की *ारा 31 (ख)125 ऐसे वाद, अपील और आवेद+ों को विव*ा+ क े प्रयोग से मुX रख ी है Sो इसक े प्रव:+ की ति णिर्थी पर लंविब र्थीे। परिरर्णामस्वरूप, वाद 3 क े उद्देश्य क े खिलए परिरसीमा का विवषय परिरसीमा अति*वि+यम 1908 द्वारा शासिस है। 2:1 क े एक विवभासिS फ ै सले से, उच्च न्यायालय +े *ारिर विकया विक वाद 3 परिरसीमा द्वारा बाध्य है, न्यायमूर्ति एस यू खा+ इस विवषय पर असहम हो+े वाले न्याया*ीश र्थीे। 125 *ारा 31. बाध्य या लंविब वाद इत्याविद क े संबं* में उपबं*… (b) ऐसे प्रारम्भ क े पूव: संस्जिस्र्थी या विकए गए और एेसे प्रारम्भ क े समय लस्जिम्ब विकसी वाद, अपील या आवेद+ पर प्रभाव + र्डालेगी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

225. सहाय ा क े खिलए परिरसीमा अति*वि+यम, 1908 की अ+ुसूची क े ी+ अ+ुच्छेदों पर बल विदया गया है और विवषय यह है विक उ+ अ+ुच्छेदों में से कौ+ सा लागू होगा। प्रासंविगक अ+ुच्छेद हैं- अ+ुच्छेद 47, 120 और 142 हैं। ये अ+ुच्छेद +ीचे दी गई ाखिलका में विदये गए है वाद का विववरर्ण परिरसीमा की अवति* समय Sहां से अवति* प्रारम्भ हो ी है

47. द°र्ड प्रविक्रया संविह ा 1998, या मामला दास: कोट्स: एक्र्ट 1906 या ऐसे आदेश में शाविमल संपखित्त को ऐसे व्यविX से ले+े का दावा कर+े वाले विकसी व्यविX क े द्वारा अचल संपखित्त क े कब्Sे क े संबं* में विकसी आदेश द्वारा बाध्य व्यविX क े द्वारा । [ ी+ वष:] वाद में अस्जिन् म आदेश की ति णिर्थी से

120. ऐसा वाद सिSसक े खिलए इस अ+ुसूची में और कहीं अवति* +हीं दी गई है। [छः वष:] Sब से मुकदमा कर+े का अति*कार विमल ा है।

142. अचल संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए Sब संपखित्त पर कब्Sा रख+े वाला वादी बेदखल कर विदया गया हो या कब्Sा बाति* हो गया हो। [ बारह वष: ] बेदखली या बाति* हो+े की ति णिर्थी से प्रासंविगक ति णिर्थीयां mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

226. इससे पहले विक हम परिरसीमा क े विवषय पर आएं, इस विवषय पर प्रभाव र्डाल+े वाली सुसंग ति णिर्थीयों को संक्षेप में दुहरा+ा आवश्यक है। वे इस प्रकार हैं: (i) 29 विदसंबर, 1949 को अपर +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा दं.प्र.सं. 1898 की *ारा 145 क े अं ग: प्रारंणिभक आदेश पारिर विकया गया और कु क— का आदेश कर े समय, एक प्राप्तक ा: वि+युX विकया गया; (ii) 5 S+वरी, 1950 को प्राप्तक ा: +े प्रभार £हर्ण विकया और कु क: संपखित्तयों की सूची ब+ाई; (iii) 16 S+वरी, 1950 को गोपाल सिंसह विवशारद द्वारा इस उद्घोषर्णा की मांग कर े हुए वाद 1 संस्जिस्र्थी विकया गया विक वह मूर्ति क े वि+कर्ट मुख्य Sन्मभूविम में पूSा और प्रार्थी:+ा कर+े का हकदार हैं। उसी ति णिर्थी को वाद में अन् रिरम व्यादेश विदया गया; (iv) 19 S+वरी, 1950 को, वाद 1 में अं रिरम व्यादेश को वि+म्+खिलखिख शब्दों में संशोति* विकया गया र्थीा: "विवरो*ी पक्षों को ए द्द्वारा अस्र्थीायी व्यादेश क े माध्यम से विववाविद स्र्थील से प्रश्नग मूर्ति यों को हर्टा+े और पूSा आविद में हस् क्षेप कर+े से वि+रुद्ध विकया Sा ा है। 16. 01. 1950 विद+ांविक आदेश द्+ुसार संशोति* विकया Sा ा है।" (v) 3 माच:, 1951 को 16 S+वरी, 1950 विद+ांविक अस्र्थीायी व्यादेश, 19 S+वरी 1950 को यर्थीा संशोति*, की अणिभपुविष्ट हुई; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vi) 30 Sुलाई, 1953 को अपर +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट +े *ारा 145 क े अं ग: काय:वाविहयों में वि+म्+खिलखिख आदेश पारिर विकया: "सिसविवल न्यायालय की प्राविप्तयां आपराति*क न्यायालय क े खिलए बाध्यकारी होंगी। इस प्रकरर्ण में दं.प्र.सं. की *ारा 145 क े ह काय:वाही शुरू कर+ा और विवशेष रूप से अस्र्थीायी व्यादेश क े रह े साक्ष्य अंविक कर+े का कोई महत्व +हीं है क्योंविक यह +हीं कहा Sा सक ा विक पक्षकारों क े साक्ष्य अंविक कर+े क े पश्चा इस न्यायालय की प्राविप्तयां क्या हो सक ी हैं। प्रशासवि+क दृविष्टकोर्ण से संपखित्त पहले से ही क ु क— प्रविक्रया में है और शांति का उल्लंघ+ +हीं हो सक ा है। इसखिलए, मैं आदेश दे ा हूं विक *ारा 145 दं.प्र.सं. क े ह फाइल को अणिभलेख विवभाग को सौंपी Sाए क्योंविक इसे व्यादेश की समाविप्त पर आगे काय:वाही क े खिलए खिलया Sा ा है/Sाएगा।" (vii) 31 Sुलाई, 1954 को अपर +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट +े वि+म्+खिलखिख वि+देश Sारी विकए: "इस फाइल को अलग +हीं विकया Sा सक ा क्योंविक इस फ़ाइल का वि+स् ारर्ण +हीं हुआ है। आप क ै से रिरपोर्ट: कर े हैं विक इसे अलग विकया Sाएगा?” (viii) 26 अप्रैल, 1955 को, सिसविवल प्रविक्रया संविह ा, 1908 क े आदेश XLIII, वि+यम 1 (r) क े ह 3 माच:, 1951 विद+ांविक आदेश क े विवरुद्ध अपील को उच्च न्यायालय द्वारा खारिरS कर विदया गया; और (ix) 17 विदसंबर, 1959 को, मंविदर का प्रभार और प्रबं* सौंप+े हे ु प्राप्तक ा: क े विवरुद्ध तिर्डक्री क े खिलए वि+म ही अखाड़ा द्वारा वाद 3 संस्जिस्र्थी विकया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उच्च न्यायालय क े कारर्ण

227. न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े यह *ारिर कर+े क े खिलए विक वाद परिरसीमा द्वारा बाध्य +हीं है,वि+म्+खिलखिख कारर्णों का उल्लेख विकया: (i) प्रर्थीम, *ारा 145 क े अं ग: काय:वाविहयों में पारिर अंति म आदेश 30 Sुलाई, 1953 को र्थीा (पद*ारी की मृत्यु पर प्राप्तक ा: को प्रति स्र्थीाविप कर+े क े खिलए 1970 में एक आदेश क े सिसवाय). इस आदेश और मसिSस्र्ट्रेर्ट क े 31 Sुलाई 1954 विद+ांविक पश्चा व - आदेश से प ा चल ा र्थीा विक *ारा 145 क े ह काय:वाही को समाप्त या अंति म रूप +हीं विदया गया र्थीा। अं रिरम व्यादेश प्रदा+ कर+े वाले आदेश क े विवरुद्ध अपील खारिरS विकये Sा+े क े बाद या विकसी और ति णिर्थी पर मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा अंति म आदेश पारिर विकये Sा+े की स्जिस्र्थीति में, वाद दायर कर+े क े खिलए परिरसीमा क े उद्देश्य से +या प्रारम्भ विबन्दु विमल Sा ा। (ii) यविद यह *ारिर भी विकया Sा ा विक वाद 3 परिरसीमा बाध्य है, ो विवरो*ी पक्षकारों क े अति*कारों और हक का विववि+श्चय वाद 1 में विकया Sा+ा चाविहए Sो परिरसीमा की अवति* क े भी र संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। वाद 1 में वि+म ही अखाड़ा क े स्वत्व पर वि+र्ण:य दं.प्र.सं. की *ारा 146 (1) क े उद्देश्य क े खिलए पया:प्त होगा। (iii) 6 विदसंबर, 1992 को परिरसर क े वि+र्मिम भाग का विवध्वंस, संघ सरकार द्वारा परिरसर और आस-पास क े क्षेत्र का अS:+ और र्डॉ एम इस्माइल mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA फारुकी ब+ाम भार संघ वाले मामले में उच्च म न्यायालय क े वि+र्ण:य +े परिरसीमा क े खिलए एक +या प्रारंभ विबन्दु प्रदा+ विकया। यद्यविप विक सभी पक्षों क े उपचार (वाद 1 में वादी को छोड़कर) परिरसीमा बाध्य र्थीा र्थीाविप उ+क े अति*कार विवद्यमा+ र्थीे। ढ़ाचे क े विवध्वंस +े विववि+र्मिदष्ट अ+ु ोष अति*वि+यम 1877 की *ारा 42 क े ह ज्ञापक वाद क े खिलए +या वाद हे ुक प्रदा+ कर विदया। (iv) मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा *ारा 145 क े अ*ी+ वि+युX प्राप्तक ा: क ु क— क े पश्चा ् संपखित्त को अवि+तिश्च काल क *ारिर +हीं कर सक ा है। इसखिलए, एक उदार दृविष्टकोर्ण रख+ा होगा, सिSसक े अभाव में अवि+तिश्च ा पैदा हो Sाएगी। Sहां क ु क— क े कारर्ण, कब्Sे क े खिलए वाद दायर +हीं विकया Sा सका, *ारा 28 पक्षकारों क े अति*कारों को समाप्त +हीं करेगी। इसक े अलावा, परिरसीमा अति*वि+यम 1908 की *ारा 23 क े ह एक स अपक ृ त्य का सिसद्धां प्रयोज्य र्थीा और वि+म ही अखाड़ा को लगा ार प्रभार और प्रबं*+ क े उसक े अति*कार से वंतिच विकया Sा रहा र्थीा; और (v) विकसी भी स्जिस्र्थीति में, यद्यविप विक वाद परिरसीमा द्वारा बाध्य र्थीा र्थीाविप न्यायालय सिसविवल प्रविक्रया संविह ा, 1908 क े वि+यम 2 (1) आदेश XIV द्वारा यर्थीा अपेतिक्ष सभी विवषय पर अति*घोषर्णा कर+े क े खिलए बाध्य र्थीा। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े यह *ारिर कर+े क े खिलए विक वाद 3 परिरसीमा बाध्य र्थीा, वि+म्+खिलखिख कारर्णों का उल्लेख विकया:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) वाद का वाद हे ु 5 S+वरी 1950 को उत्पन्न हुआ Sब प्रापक +े आं रिरक अहा े का प्रभार £हर्ण विकया; (ii) वाद 3 आं रिरक अहा े क े परिरसर क सीविम र्थीा। अप+ी दलीलों में वादी गर्णों +े +ा ो स्वत्व क े घोषर्णा की मांग की र्थीी + ही उन्हों+े अवै* रूप से कब्Sा बेदखल विकए Sा+े का दावा विकया है। दावा यह है विक +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट +े अवै* रूप से मंविदर का प्रबं*+ एवं प्रभार ले खिलया है। +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट +े *ारा 145 क े अं ग: एक वै*ावि+क आदेश पारिर विकया और क ु क— क े आदेश क े अ+ुसरर्ण में आं रिरक अहा े का कब्Sा प्रापक को दे विदया गया। *ारा 145 क े अं ग: क ु क— क े आदेश में वास् विवक स्वामी को कब्Sे क े अति*कार से वंतिच कर+ा शाविमल +हीं हो सक ा। लेविक+ प्रापक द्वारा वास् विवक स्वामी की ओर से संपखित्त *ारिर कर+ा अाक्षेविप है। यविद वि+म ही अखाड़ा की बेदखली + हो ी ो *ारा 142 की कोई प्रयोज्य ा + हो ी; और (iii) अ+ुच्छेद 47 भी लागू +हीं हो ा। अ ः परिरसीमा क े विवषय पर न्याय वि+र्ण:य+ अ+ुच्छेद 120 क े सन्दभ: में विकया Sा+ा र्थीा। वाद अ+ुच्छेद 120 में वि+र्मिदष्ट छः साल की अवति* से परे संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा और इसखिलए परिरसीमा द्वारा बाध्य र्थीा। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े कहा विक वाद 3 में परिरसीमा वि+*ा:रिर कर+े क े प्रयोS+ों क े खिलए,अ+ुच्छेद 120 प्रयोज्य र्थीा। वाद 3, 17 विदसंबर 1959 को दायर विकया गया र्थीा। वादहे ुक विमल+े क े छः वष: क े भी र वाद संस्जिस्र्थी + विकये Sा+े क े कारर्ण यह परिरसीमा बाध्य र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+म ही अखाड़ा क े क:

228. वाद 3 में वादी गर्णों की ओर से प्रस् ु विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री एस. क े. Sै+ +े परिरसीमा क े संबं* में वि+म्+खिलखिख क: विदए:

I. *ारा 145 क े ह काय:वाविहयों में कोई अंति म आदेश पारिर +हीं विकया गया है। अ ः परिरसीमा अति*वि+यम 1908 क े अ+ुच्छेद 47 क े ह परिरसीमा प्रारम्भ +हीं हुई है: (i) वाद में वाद हे ुक 5 S+वरी, 1950 को उत्पन्न हुआ Sब प्रापक +े भी री प्रांगर्ण का प्रभार संभाला; (ii) *ारा 145 क े अ*ी+ 29 विदसंबर, 1949 विद+ांविक मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश एक प्रार्थीविमक आदेश र्थीा और उस+े वादहे ुक प्रदा+ विकया। हालांविक, ऐसे वाद क े खिलए परिरसीमा *ारा 145 क े ह काय:वाही में अंति म आदेश पारिर हो+े पर ही शुरू होगी। व:मा+ वाद में, Sैसा विक मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा 31 Sुलाई 1954 विद+ांविक आदेश में उल्लेख विकया गया है, *ारा 145 क े ह काय:वाही का वि+पर्टारा +हीं विकया गया र्थीा और इसखिलए, अंति म आदेश अभी पारिर +हीं विकया गया र्थीा। *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयां लंविब ही हैं; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) यह वाद परिरसीमा अति*वि+यम, 1908 क े अ+ुच्छेद 47 द्वारा शासिस है। अ+ुच्छेद 47 क े अ*ी+ वाद क े खिलए ी+ वष: की परिरसीमा मामले में अंति म आदेश की ति णिर्थी से प्रारंभ हो ी है। अ+ुच्छेद 47 क े अ*ी+ प्रर्थीम स् ंभ में वाद का विववरर्ण अं र्मिवष्ट है और दंर्ड प्रविक्रया संविह ा क े अं ग: अचल संपखित्त क े कब्Sे क े संबं* में आदेश से आबद्ध व्यविX का उल्लेख है। अ+ुच्छेद 47 क े अ*ी+ ीसरा स् ंभ वह समय विववि+र्मिदष्ट कर ा है सिSससे परिरसीमा प्रारंभ हो ी है और अंति म आदेश क े पारिर हो+े की ारीख से परिरसीमा प्रारंभ हो+े का उल्लेख कर ा है। प्रर्थीम कॉलम में वग-क ृ विकया गया वाद, ीसरे कॉलम में शब्दों क े प्रयोग से अप्रभाविव,क े वल उसी द्वारा शासिस होगा। परिरसीमा अति*वि+यम परिरसीमा अवति* "क े बाद" दायर विकये गये वादों को बाति* कर ा है लेविक+ अवति* प्रारम्भ हो+े "से पहले" वाद संस्जिस्र्थी हो+े से +हीं रोक ा। II वि+म ही अखाड़ा क े प्रबं* और प्रभार क े 'पूर्ण:' सेवादारी अति*कार से इ+कार एक स अपक ृ त्य है। परिरसीमा अति*वि+यम 1908 की *ारा 23 क े आ*ार पर, एक +या वादहे ुक प्रत्येक विद+ उत्पन्न हुआ: (i) वाद 3 क े खिलए परिरसीमा अ+ुच्छेद 142 द्वारा शासिस हो ी है क्योंविक वादी गर्ण को उ+की संपखित्त से बेदखल कर विदया गया र्थीा। अ+ुच्छेद 142 ब लागू हो ा है Sब अचल संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए वाद दायर विकया Sा ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है Sब संपखित्त क े कब्Sेदार वादी को कब्चा बेदखल कर विदया गया है या बाति* कर विदया गया है। वाद 3 क े वादीगर्ण क े पास मूर्ति यों और मंविदर का प्रबं*+ और प्रभार र्थीा क्योंविक वे पूSा कर े र्थीे, श्रद्धालुओं की देखभाल कर े र्थीे और अन्य क:व्यों का पाल+ कर े र्थीे। पूSा इत्यादी कर+े का अति*कार अर्थीा: सेवादारी अति*कार अचल संपखित्त क े कब्Sे से Sुड़े हैं। वादी +े संपखित्त में अप+े माखिलका+ा विह को स्पष्ट कर+े क े खिलए वि+म्+खिलखिख दृष्टान् ों का अवलंब खिलया है: (क) अंगुरबाला मखिलक ब+ाम देबब्र मखिलक127 Sहां यह *ारिर विकया गया विक सेवादार का सेवार्थी: संपखित्त में कु छ रह का अति*कार या विह हो ा है Sो आंणिशक रूप से कम से कम माखिलका+ा अति*कार Sैसा हो ा है; और (ख) आयुX, विहन्दू *ार्मिमक विवन्यास ब+ाम श्री णिशरूर मठ क े श्री लक्ष्मींˆ ीर्थी: स्वामीयर 128, Sहां यह *ारिर विकया गया विक सेवादारी में पद और संपखित्त,क:व्य और व्यविXग विह दो+ों क े त्व सार्थी- सार्थी रह े हैं। महं का पद माखिलका+ा हक वाला हो ा है, Sो हालांविक क ु छ हद क असंग है, विफर भी एक वास् विवक का+ू+ी अति*कार है। (ii) सेवादारी अति*कारों की बहाली क े खिलए वाद कब्Sे की पु+प्रा:विप्त और प्रबं*+ की बहाली क े खिलए होगा। अ+ुच्छेद 142 लागू होगा Sो बेदखली की ति णिर्थी से 12 वष: की परिरसीमा अवति* प्रदा+ कर ी है। 127 1951 SCR 1125 128 1954 SCR 1005 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) वादहे ुक 5 S+वरी, 1949 को उत्पन्न हुआ सिSसक े द्वारा वि+म ही अखाड़ा को सेवादार क े रूप में उसक े पूर्ण: अति*कार से वंतिच कर विदया गया और यह उ+ अति*कारों से वंतिच ही है। वादी द्वारा भोग और और प्रार्थी:+ा का स्व ंत्र रूप से प्रबं*+ विकये Sा+े में बा*ा परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 23 क े अं ग: एक स अपक ृ त्य है और ऐसा प्रत्येक अवरो* +या वादहे ुक प्रदा+ कर ा है। सर सेठ हुक ु म चंद ब+ाम महाराS बहादुर सिंसह129 क े मामले में विप्रवी कौंसिसल क े फ ै सले पर अवलंब खिलया गया, Sहां प्रार्थी:+ा और पूSा में बा*ा स अपक ृ त्य मा+ा गया है। III परिरसीमा अति*वि+यम, 1908 का अ+ुच्छेद 120 एक अवणिशष्ट उपबं* है और ब लागू हो ा है Sब अ+ुच्छेद 47 और 142 सविह कोई अन्य उपबं* लागू +हीं हो ा है। विवलय का सिसद्धां लागू हो ा है, और 29 विदसंबर 1949 को *ारा 145 क े ह पारिर प्रारंणिभक आदेश का 26 अप्रैल 1955 विद+ांविक आदेश क े सार्थी विवलय हो गया सिSसक े द्वारा वाद 1 में अं रिरम व्यादेश को उच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखा गया र्थीा: (i) क: (विब+ा स्वीकार विकए) इस *ारर्णा पर आ*ारिर है विक अ+ुच्छेद 47 और 142 प्रयोज्य +हीं हैं और अ+ुच्छेद 120 लागू हो ा है; (ii) विवलय क े सिसद्धां क े आ*ार पर, वाद 1 में यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रख+े क े खिलए अपर +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट का दं.प्र.सं. की *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयों में 29 विदसंबर, 1949 विद+ांविक आदेश का उच्च न्यायालय द्वारा अं रिरम आदेश क े विवरुद्ध अपील में विदये गए 26 अप्रैल, 1955 विद+ांविक आदेश क े 129 (1933) 38 LW 306 (PC) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सार्थी विवलय हो गया। अ ः वादी को वाद का अति*कार 26 अप्रैल, 1955 को प्राप्त हुआ। वाद 3 Sो 17 विदसंबर 1959 को दायर विकया गया,छः वष: की परिरसीमा क े भी र र्थीा। इस न्यायालय क े वि+म्+खिलखिख वि+र्ण:यों पर अवलंब खिलया गया: (क) चंर्डी प्रसाद ब+ाम Sगदीश प्रसाद130, Sहां यह *ारिर विकया गया विक विवलय का सिसद्धां यह अणिभ*ारर्णा कर ा है विक विकसी वि+तिश्च समय पर एक ही विवषय-वस् ु को शासिस कर+े वाली एक से अति*क सविक्रय तिर्डक्री +हीं हो सक ी। Sब अपीलीय न्यायालय कोई तिर्डक्री पारिर कर ा है, ो विवचारर्ण न्यायालय की तिर्डक्री का अपीलीय न्यायालय की तिर्डक्री क े सार्थी विवलय हो Sा ा है, भले ही अपीलीय न्यायालय विवचारर्ण न्यायालय द्वारा पारिर तिर्डक्री की अणिभपुविष्ट करे, संशोति* करे या उलर्ट दे; और (ख) एस एस राठौर ब+ाम मध्य प्रदेश राज्य 131, Sहां यह *ारिर विकया गया विक प्रार्थीविमक न्यायालय की विकसी तिर्डक्री की अपील में पारिर विकसी तिर्डक्री क े सार्थी विवलय हो Sा ा है। IV प्रापक से कब्Sा पु+प्रा:विप्त हे ु दायर विकसी वाद में,परिरसीमा का प्रश्न कभी +हीं उठ सक ा और ऐसे वाद कभी भी परिरसीमा बाध्य +हीं हो सक े। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

(i) Sब क विकसी ऐसे व्यविX की संपखित्त, सिSससे कब्Sा ले खिलया गया हो, प्रापक क े अ*ी+ रह ी है, परिरसीमा का प्रश्न कभी +हीं उठ सक ा; और (ii) संपखित्त अ+ं काल क विवति*क अणिभरक्षा में +हीं रह सक ी है और स्वत्व क े प्रश्न पर न्याय वि+र्ण:य+ न्यायालय का दातियत्व है और वाद को परिरसीमा बाध्य कह कर खारिरS +हीं विकया Sा सक ा है। V मध्यव - लाभ क े खिलए पात्र ा का वि+*ा:रर्ण कर+े में, स्वत्व क े प्रश्न पर न्याय वि+र्ण:य+ कर+ा होगा और प्रापक को वास् विवक स्वामी को कब्Sा सौंप+ा होगा: चूंविक संपखित्त प्रापक क े वि+यंत्रर्ण में है, प्रापक द्वारा प्राप्त आय क े मध्यव - लाभ क े खिलए वास् विवक स्वामी द्वारा वाद दायर विकया Sा सक ा है और ऐसे वाद में, कोई भी लाभ Sो अर्जिS हुआ हो, स वाद हे ुक को Sन्म देगा। VI यह वादी का दावा है विक वि+म ही अखाड़ा भी Sन्मस्र्थीा+ और मूर्ति यों का सेवादार है। उसी कारर्ण से सिSससे वाद 5 वष: 1989 को परिरसीमा क े भी र मा+ा गया अर्थीा: यह विक देव ा एक तिचर +ाबाखिलग हैं, वादी का वाद परिरसीमा बाध्य +हीं हो सक ा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

229. वाद 5 में वादीगर्ण क े विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े. परासर+ +े श्री एस क े Sै+ क े कÂ का खंर्ड+ विकया और परिरसीमा और वाद 3 की पोषर्णीय ा क े संबं* में वि+म्+खिलखिख क: विदया: I *ारा 145 क े ह मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश शांति व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+े क े खिलए पुखिलस शविXयों का प्रयोग है और संपखित्त पर स्वत्व या कब्Sे का वि+*ा:रर्ण +हीं कर ा है। चूंविक इस रह क े आदेश का उद्देश्य विकसी भी पक्ष को कब्Sा दे+ा +हीं है, इसखिलए *ारा 145 की काय:वाही क े ह विदये गए आदेश क े कारर्ण वि+म ही अखाड़ा की बेदखली का सवाल ही +हीं उठ ा। (i) *ारा 145 क े अ*ी+ आदेश शांति व्यवस्र्थीा सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए पुखिलस शविXयों का प्रयोग है। यह क े वल शांति क े उल्लंघ+ को रोक+े क े खिलए है और संपखित्त पर स्वत्व क े संबं* में पक्षकारों क े अति*कारों का वि+*ा:रर्ण +हीं कर ा है। *ारा 145 की काय:वाही क े वल वास् विवक स्वामी क े अति*कारों को स्जिस्र्थीर या संरतिक्ष कर ी है। काय:कारी काय: क े प्रयोग में मसिSस्र्ट्रेर्ट का कोई आदेश कभी भी अ+ुतिच काय: +हीं हो सक ा या क्षति कारिर +हीं कर सक ा है। सिसविवल न्यायालय क े आदेश को 'अ+ुतिच ' +हीं मा+ा Sा सक ा Sो वादहे ुक को Sन्म दे ा हो। क े वल एक न्यातियक प्राति*कारी को ही यह य कर+े की शविX है विक क्या सिसविवल न्यायालय की कोई कार:वाई अ+ुतिच है या +हीं। स्वत्व और कब्Sे से संबंति* प्रश्न अ+न्य रूप से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिसविवल न्यायालयों क े विवषय हैं और *ारा 145 क े अ*ी+ मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश सिसविवल न्यायालय की अति*कारिर ा का उल्लंघ+ +हीं कर सक ा है; (ii) *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयां अलग हैं और मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा आदेश पारिर विकए Sा+े क े पश्चा ् स्वत्व या कब्Sे क े खिलए सिसविवल वाद दायर कर+े क े खिलए पक्षकारों क े खिलए कोई रोक +हीं है। *ारा 145 क े ह मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश से सिसविवल न्यायालय क े क्षेत्राति*कार क्षेत्र में कोई कर्टौ ी +हीं हो ी और दीवा+ी काय:वाही को स्व ंत्र रूप चलाया Sा सक ा है। इस न्यायालय क े वि+म्+खिलखिख मामलों में विदए गए वि+र्ण:यों पर अवलंब खिलया गया: (i) भिंभका ब+ाम चरर्ण सिंसह 132, Sहां यह *ारिर विकया गया विक *ारा 145 (1) क े अ*ी+ मसिSस्र्ट्रेर्ट की अति*कारिर ा क े वल यह विववि+श्चय कर+े क े खिलए सीविम है विक, कोई और यविद ऐसा है ो, विकस पक्षकार क े पास प्रारंणिभक आदेश की ति णिर्थी पर विववाद£स् भूविम का कब्Sा र्थीा। आदेश क े वल एक वि+र्मिदष्ट ति णिर्थी पर विकसी पक्ष क े वास् विवक कब्Sे की घोषर्णा कर ा है और विकसी भी पक्ष को कब्Sा +हीं दे ा या कब्Sा ले+े क े खिलए अति*क ृ +हीं कर ा है; 132 1959 Supp (2) SCR 798 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) झुम्मामल उफ: देवदास ब+ाम मध्य प्रदेश राज्य133, Sहां यह *ारिर विकया गया विक *ारा 145 क े अ*ी+ विकया गया आदेश क े वल एक वि+तिश्च विद+ पर विकसी पक्षकार क े कब्Sे क े थ्य से संबंति* हो ा है। यह विववाविद संपखित्त पर कब्Sा ब+ाए रख+े का कोई हक +हीं दे ा है। इसखिलए असफल पक्ष को क े वल सिसविवल न्यायालय में सम्यक रूप से संस्जिस्र्थी वाद में ही अ+ु ोष प्राप्त कर+ा चाविहए। कोई पक्ष उद्घोषर्णा क े खिलए वाद दायर कर सक ा है और कब्Sे का श्रेष्ठ र अति*कार साविब कर सक ा है। सिसविवल न्यायालय क े पास यह अति*कारिर ा है विक वह ऐसा वि+ष्कष: दे सक े Sो मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा *ारा 145 क े ह काय:वाही कर े समय प्राप्त वि+ष्कष: से णिभन्न हो; और (iii) देवक ुं वर ब+ाम णिशवप्रसाद सिंसह134, Sहां यह *ारिर विकया गया विक *ारा 145 क े अ*ी+ क ु क: की गई संपखित्त क े स्वत्व की घोषर्णा क े खिलए दायर विकये गये वाद में कब्Sे क े परिरदा+ क े अ+ु ोष की मांग कर+ा आवश्यक +हीं है। (iii) वाद 3 में श्री एस क े Sै+ का यह क: विक *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयां समाप्त +हीं हुई हैं और इसखिलए, अ+ुच्छेद 47 क े अ*ी+ परिरसीमा प्रारंभ +हीं हो सक ी, स्वीकार +हीं विकया Sा सक ा। *ारा

134 (1965) 3 SCR 655 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 145 क े ह काय:वाही क े बावSूद, वि+म ही अखाड़ा स्व ंत्र रूप से स्वत्व और कब्Sे क े खिलए वाद दायर कर सक ा र्थीा। II परिरसीमा अति*वि+यम 1908 की *ारा 3 में यह प्राव*ा+ है विक परिरसीमा की अवति* क े बाद संस्जिस्र्थी प्रत्येक वाद खारिरS हो Sाएगा। उच्च म न्यायालय क े वल परिरसीमा क े आ*ार पर अपीलों का वि+स् ारर्ण कर सक ा है। विवचारर्ण न्यायालय क े विवपरी सिSसे सभी मुद्दों पर वि+र्ण:य कर+ा हो ा है, इस वि+ष्कष: पर पहुँच Sा+े क े बाद विक वाद परिरसीमा बाध्य है,सव च्च न्यायालय ऐसा कर+े क े खिलए बाध्य +हीं है। (i) यशवं देवराव देशमुख ब+ाम वालचंद रामचंद कोठारी135 क े मामले में इस न्यायालय द्वारा विदए गए वि+र्ण:य का अवलंब खिलया गया, सिSसमें यह *ारिर विकया गया विक साम्या वि+यम वहां लागू +हीं होंगे Sहां उ+ आ*ारों को विववि+र्मिदष्ट कर+े वाले वि+श्चायक विवति*क प्राव*ा+ हों सिSसक े आ*ार पर काल गर्ण+ा में एकमात्र रुकावर्ट या स्र्थीग+ उत्पन्न हो। हालांविक न्यायालय *ोखा*ड़ी को "मा दे+े या उससे लड़+े में अवश्य सक्षम" हैं, यह भी ध्या+ रख+ा चाविहए विक परिरसीमा का विव*ा+ सीविम अवति* का विव*ा+ हैं। III उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य को अपास् विकया Sा+ा चाविहए। तिर्डक्री अणिभवच+ की विवति* क े विवरुद्ध है। वि+म ही अखाड़ा द्वारा भूविम क े बंर्टवारे क े 135 (1950) SCR 852 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खिलए कोई प्रार्थी:+ा +हीं की गई र्थीी। उच्च न्यायालय का आदेश न्यायविह में +हीं पारिर विकया गया है बस्जिल्क न्याय का अं है। IV परिरसीमा अति*वि+यम, 1908 की *ारा 28 विकसी व्यविX क े सारवा+ अति*कारों को वि+वा:विप कर ी है। द्+ुसार, यविद पक्षकार परिरसीमा क े विवषय पर विवफल हो Sा ा है, ो यह अन्य सभी सारवा+ विवषयों पर भी विवफल हो Sा ा है और इसखिलए, यह न्यायालय वाद 3 में वि+म ही अखाड़ा को कोई अ+ु ोष प्रदा+ +हीं कर सक ा। V वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर वाद क े वल अ+ुच्छेद 120 से शासिस है। परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 142 और 144 प्रयोज्य +हीं हैं। एक बार परिरसीमा प्रारम्भ हो Sा+े पर, इसे रोका +हीं Sा सक ा है। (i) विप्रवी कौंसिसल द्वारा राSा राSग+ महाराSा Sग Sी सिंसह ब+ाम राSा पर ाब बहादुर सिंसह136 क े मामले में विदए गए वि+र्ण:य पर अवलंब खिलया गया सिSसमें परिरसीमा की वै*ावि+क अवति* क े बारे में यह *ारिर विकया गया विक अ+ुच्छेद 47 लागू +हीं हो ा है क्योंविक *ारा 145 क े अ*ी+ मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा कब्Sे का कोई आदेश +हीं विकया गया है। स्वत्व की घोषर्णा क े वाद में अ+ुच्छेद 142 और 144 लागू +हीं हो े और वाद अ+ुच्छेद 120 द्वारा शासिस हो ा है 136 (1942) 2 Mad LJ 384 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

230. वाद 4 में वादी क े खिलए विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े वाद 3 की सीमा क े संबं* में वि+म्+खिलखिख क: विदये: I वाद 3 में वि+म ही अखाड़ा द्वारा मांगा गया अ+ु ोष प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए है। हालाँविक, अप+े वादपत्र में, इस+े यह दावा विकया गया है विक Sन्मस्र्थीा+ उससे संबंति* है और सदैव उससे संबंति* रहा है और विकसी संदभ: में उदार प्रयोग विकये Sा+े पर इ+ शब्दों का अर्थी: 'कब्Sा', 'स्वाविमत्व' और 'प्रच्छन्न स्वत्व' लगाया Sा सक ा है। (i) वि+म ही अखाड़ा द्वारा मांगा गया अ+ु ोष क े वल भगवा+ राम की मूर्ति यों क े प्रबं*+ और प्रभार क े संबं* में र्थीा। वि+म ही अखाड़ा का पक्ष दं.प्र.सं. 1898 की *ारा 145 क े ह एक आदेश द्वारा सेवादारी अति*कारों से वंतिच विकए Sा+े पर आ*ारिर है। दावा राज्य क े विवरुद्ध कब्Sे क े भोगाति*कार क े खिलए है और देव ा को सेवाएं प्रदा+ कर+े क े खिलए है। "संबं*" या "संबंति* " Sैसे शब्दों का लचीला अर्थी: है। इस न्यायालय द्वारा वि+म्+खिलखिख मामलों में विदए गए वि+र्ण:यों पर अवलंब खिलया गया: (क) स्वग-य +वाब सर मीर उस्मा+ अली खा+ ब+ाम *+ कर आयुX, हैदराबाद 137 'से संबंति* ' क े अर्थी: पर बहस क े संबं* में;

Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ख) राSा मोहम्मद अमीर अहमद खा+ ब+ाम +गर बोर्ड: सी ापुर, वाद में सुस्पष्ट अणिभकर्थी+ कर+े क े बारे में हुई बहस क े संबं* में और सही अर्थी: को समझ+े क े खिलए वाद को उसकी संपूर्ण: ा में पढ़+े क े संबं* में। (ii) वि+म ही अखाड़ा +े अप+े वाद क े प्रस् र 2 में यह दावा विकया है विक Sन्मस्र्थीा+ उससे संबंति* है और सदैव उससे संबंति* रहा है। आगे वाद क े प्रस् र 4 में यह दावा विकया गया है विक मंविदर वादी क े कब्Sे में रहा है। हालांविक, खिलखिख कर्थी+ में वादी +े स्वाविमत्व और कब्Sे का सन्दभ: विदया है। (iii) विकसी विदए गए सन्दभ: में 'संबं* रख ा है' या 'संबंति* है' शब्द का प्रयोग 'कब्Sा’, 'स्वाविमत्व' और 'प्रच्छन्न स्वत्व' लगाया Sा सक ा है। 'संबं* रख ा है' या 'संबंति* है' शब्द कला का शब्द +हीं है और इसका वि+तिश्च अर्थी: +हीं है। इसकी व्याख्या का विवकल्प हो ा है। II वि+म ही अखाड़ा 'संबं* रख ा है' शब्द का प्रयोग स्वत्व का दावा कर+े और परिरसीमा क े वS:+ का वि+वारर्ण कर+े क े खिलए कर रहा है। 'संबं* रख ा है' शब्द को इसक े सामान्य अर्थी: में पढ़ा Sा+ा चाविहए। यविद वि+म ही अखाड़ा अप+े खिलए स्वत्व का दावा कर ा है, ो भगवा+ क े वाद क े विवरुद्ध होगा। यह क े वल अ+ुषंविगक अति*कारों का दावा कर सक ा है:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) वि+म ही अखाड़ा क े वल मूर्ति की सेवा कर+े का दावा कर ा है और मूर्ति का ही दावा +हीं कर रहा है। वि+म ही अखाड़ा क:व्य पूर्ति की मांग कर रहा है स्वाविमत्व और स्वत्व क े अति*कार का +हीं। द्+ुसार, क े वल *ारा 120 लागू हो सक ी है; और (ii) यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम में न्यासों की विवति* क े विवपरी, भार में सेवादारी क े आ*ार पर कोई स्वाविमत्व या स्वत्व +हीं विमल ा। सेवादार मूर्ति की संपखित्त का स्वामी +हीं है। III वि+म ही अखाड़ा +े *ारा 145 क े ह काय:वाही का उपयोग यह वि+वेद+ कर+े क े खिलए विकया है विक उन्हें पूर्ण: सेवादारी अति*कार से वंतिच कर+े का सरकार का काय: एक स अपक ृ त्य है: (i) *ारा 145 की काय:वाविहयां स्वत्व या हक क े दावों का वि+*ा:रर्ण कर+े क े खिलए +हीं हैं। वि+म ही अखाड़ा को कब्Sे और स्वत्व क े खिलए घोषर्णात्मक वाद दायर कर+े क े खिलए क ु छ भी वि+वारिर + कर ा; और (ii) वह कही गई विवणिशष्ट ति णिर्थी,Sब वादहे ुक उत्पन्न हुआ, 5 S+वरी, 1950 र्थीी। Sहां विवति* +े मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश क े ह कब्Sा ले+े में हस् क्षेप विकया है, छः वष: की अवति* उस ति णिर्थी को प्रारम्भ हुई और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स अपक ृ त्य लागू कर+े की कोई गुंSाइश +हीं र्थीी क्योंविक कार:वाई पूरी हो गई र्थीी, और उपचार कहीं और र्थीा। इस विवषय पर विक, क्या वाद 3 परिरसीमा बाध्य है,वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा क े अणिभकर्थी+ों का उल्लेख कर+े क े पश्चा, अब हम दं.प्र.सं. 1898 क े विवणिभन्न प्राव*ा+ों और परिरसीमा अति*वि+यम 1908 क े अ+ुच्छेदों का विवश्लोषर्ण कर+े की ओर उन्मुख हो े हैं। *ारा 145 की काय:वाही की प्रक ृ ति और विवषयक्षेत्र

231. मसिSस्र्ट्रेर्ट +े दं.प्र.सं. 1898 की *ारा 145 क े ह 29 विदसंबर 1949 विद+ांविक आदेश संपखित्त को कु क: कर विदया। वाद 3 क े वादीगर्ण का कह+ा है विक वाद हे ुक 5 S+वरी 1950 को उत्पन्न हुआ Sब प्रापक +े संपखित्त का प्रभार £हर्ण विकया और उन्हें मंविदर का प्रभार और प्रबं*+ दे+े से म+ा कर विदया गया।

232. *ारा 145 को 1898 की संविह ा क े अध्याय XII में शाविमल विकया गया र्थीा, सिSसका शीष:क र्थीा "अचल संपखित्त क े संबं* में विववाद"। *ारा 145 इस प्रकार है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “*ारा 145। प्रविक्रया Sहां भूविम इत्याविद से संबंति* विववाद से शांति भंग हो+े की आशंका हो (1) Sब कभी विकसी सिSलाति*कारी, उप सिSलाति*कारी या प्रर्थीम श्रेर्णी मसिSस्र्ट्रेर्ट को पुखिलस रिरपोर्ट: से या अन्य इखित्तला पर समा*ा+ हो Sा ा है विक उसकी स्र्थीा+ीय अति*कारिर ा क े अंदर विकसी भूविम या Sल या उसकी सीमाओं से सम्बद्ध ऐसा विववाद विवद्यमा+ है, सिSससे परिरशास्जिन् भंग हो+ा संभाव्य है, ब वह ऐसा समा*ा+ हो+े क े आ*ारों का कर्थी+ कर े हुए और ऐसे विववाद से सम्बद्ध पक्षकारों से यह अपेक्षा कर े हुए खिलखिख आदेश देगा विक वे विववि+र्मिदष्ट ारीख और समय पर स्वंय या प्लीर्डर क े द्वारा उसक े न्यायालय में हासिSर हो, और विववाद की विवषय वस् ु पर वास् विवक कब्Sे क े थ्य क े बारे में अप+े -अप+े दावों का खिलखिख कर्थी+ प्रस् ु करें। (2) इस *ारा क े प्रयोS+ों क े खिलए "भूविम या Sल" पद क े अं ग: भव+, बाSार, मी+क्षेत्र, फसलें, भूविम की अन्य उपS और ऐसी विकसी सम्पखित्त क े भार्टक या लाभ भी हैं। (3) इस आदेश की एक प्रति की ामील इस संविह ा द्वारा सम+ों की ामील क े खिलए उपबंति* रीति से ऐसे व्यविX या व्यविXयों पर की Sाएगी, सिSन्हें मसिSस्र्ट्रेर्ट वि+विदष्ट करे, और कम से कम एक प्रति विववाद की विवषय वस् ु या उसक े वि+कर्ट विकसी सहSदृश्य स्र्थीा+ पर लगाकर प्रकाणिश की Sाएगी। (4) मसिSस्र्ट्रेर्ट ब विववाद की विवषय वस् ु को पक्षकारों में से विकसी क े भी कब्Sे में रख+े क े अति*कार क े गुर्णागुर्ण या दावे क े प्रति वि+द†श विकए विब+ा उ+ कर्थी+ों का, Sो ऐसे पेश विकए गए हैं,परिरशील+ करेगा, पक्षकारों को सु+ेगा और ऐसा सभी साक्ष्य लेगा Sो उ+क े द्वारा प्रस् ु विकया Sाए, ऐसा अति रिरX साक्ष्य यविद कोई हो, लेगा Sैसा विक वह आवश्यक समझे और यविद संभव हो ो यह विववि+तिश्च करेगा विक क्या उ+ पक्षकारों में से कोई उप*ारा क े अ*ी+ उसक े द्वारा विदये गए आदेश की ारीख पर विववाद की विवषयवस् ु पर कब्Sा रख ा र्थीा और यविद रख ा र्थीा ो वह कौ+ सा पक्षकार र्थीा: बश †, विक यविद मसिSस्र्ट्रेर्ट मामले को आपा काली+ में से एक मा+ ा है, ो वह विकसी भी समय, इस *ारा क े अ*ी+ अप+े वि+र्ण:य क े लंब+ क े दौरा+, विववाद की विवषय वस् ु को क ु क: कर सक ा है। (5) इस *ारा की कोई बा, हासिSर हो+े क े खिलए ऐसे अपेतिक्ष विकसी पक्षकार को या विकसी अन्य विह बद्ध व्यविX को यह दर्भिश कर+े से +हीं रोक े गी विक कोई पूव X प्रकार का विववाद व:मा+ +हीं है या +हीं रहा है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और ऐसी दशा में मसिSस्र्ट्रेर्ट अप+े उX आदेश को रद्द कर देगा और उस पर आगे की काय:वाविहयां रोक दी Sाएगी, विकन् ु उप*ारा (1) क े अ*ी+ मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश ऐसे रद्दकरर्ण क े अ*ी+ रह े हुए अंति म होगा। (6) यविद मसिSस्र्ट्रेर्ट यह विववि+श्चय कर ा है विक विकन्हीं पक्षकारों में से एक का उX विवषय वस् ु पर ऐसा कब्Sा र्थीा या उप*ारा (4) क े परन् ुक क े अ*ी+ ऐसा कब्Sा मा+ा Sा+ा चाविहए, ो वह यह घोषर्णा कर+े वाला विक ऐसा पक्षकार उस पर ब क कब्Sा रख+े का हकदार है Sब क उसे विवति* क े सम्यक अ+ुक्रम में बेदखल + कर विदया Sाए और यह वि+षे* कर+े वाला विक Sब क ऐसी बेदखली + कर दी Sाए, ब क ऐसे कब्Sे मेंं कोई विवघ्+ + र्डाला Sाए, आदेश Sारी करेगा,और Sब वह उप*ारा (4) क े परन् ुक क े अ*ी+ काय:वाही कर ा है ब उस पक्षकार को, Sो बला ् और सदोष बेकब्Sा विकया गया है, कब्Sा लौर्टा सक ा है। (7) Sब विकसी ऐसी काय:वाही क े पक्षकार की मृत्यु हो Sा ी है ब मसिSस्र्ट्रेर्ट मृ पक्षकार क े विवति*क प्रति वि+ति* को काय:वाही का पक्षकार ब+वा सक े गा और विफर Sांच Sारी रखेगा और यविद इस बारे में कोई प्रश्न उत्पन्न हो ा है विक मृ पक्षकार का ऐसी काय:वाही क े प्रयोS+ क े खिलए विवति*क प्रति वि+ति* कौ+ है ो मृ पक्षकार का प्रति वि+ति* हो+े का दावा कर+े वाले सब व्यविXयों को उस काय:वाही का पक्षकार ब+ा खिलया Sाएगा। (8) यविद मसिSस्र्ट्रेर्ट की यह राय है विक उस संपखित्त की,Sो इस *ारा क े अ*ी+ उसक े समक्ष लंविब काय:वाही में विववाद की विवषय वस् ु है, कोई फसल या अन्य उपS शीघ्र या और प्रक ृ त्या क्षयशील है ो वह ऐसी सम्पखित्त की उतिच अणिभरक्षा या विवक्रय क े खिलए आदेश दे सक ा है और Sांच क े समाप्त हो+े पर ऐसी सम्पखित्त क े या उसक े विवक्रय क े आगमों क े व्यय+ क े खिलए ऐसे आदेश दे सक ा है,Sो वह ठीक समझे। (9) यविद मसिSस्र्ट्रेर्ट ठीक समझे ो वह इस *ारा क े अ*ी+ काय:वाविहयों क े विकसी प्रक्रम में पक्षकारों में से विकसी क े आवेद+ पर विकसी साक्षी क े +ाम सम+ यह वि+द†श कर े हुए Sारी कर सक ा है विक वह हासिSर हो या कोई दस् ावेS या चीS पेश करे। (10) इस *ारा की कोई बा *ारा 107 क े अ*ी+ काय:वाही कर+े की मसिSस्र्ट्रेर्ट की शविXयों का अल्पीकरर्ण कर+े वाली +हीं समझी Sाएगी। *ारा 145 को मसिSस्र्ट्रेर्ट क े वि+वारक क्षेत्राति*कार की एक शाखा मा+ा Sा ा है।139 मसिSस्र्ट्रेर्ट को यह समा*ा+ हो Sा+े पर विक "शांति भंग हो+े की 139 Commentary on the Criminal Procedure Code by Ratanlal and Dhirajlal, 20th edition (2016) at page 426 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संभाव+ा वाले विववाद मौSूद हैं.".. *ारा 145 (1) को लागू विकया Sा सक ा है। यह प्राव*ा+ भूविम या पा+ी या इसकी सीमाओं क े कब्Sे से संबंति* विववादों से संबंति* है सिSसक े परिरर्णामस्वरूप शांति भंग हो सक ी है। मसिSस्र्ट्रेर्ट का काय: स्वत्व क े प्रश्नों में +हीं Sा+ा है, बस्जिल्क पक्ष को कब्Sे में रखकर स्जिस्र्थीति की ात्काखिलक ा से वि+पर्ट+ा है। मसिSस्र्ट्रेर्ट को वास् विवक कब्Sे क े अप+े दावे क े समर्थी:+ में खिलखिख बया+ प्रस् ु कर+े क े खिलए पक्षकारों को बुला+े का अति*कार है। ऐसा आदेश पक्षकारों को सम+ क े रूप में विदया Sा+ा चाविहए। मसिSस्र्ट्रेर्ट को, यह विववि+श्चय कर+े क े खिलए विक आदेश की ति णिर्थी पर कब्Sा विकसक े पास र्थीा, बया+ों का परिरशील+ कर+ा हो ा है, पक्षों को सु++ा हो ा है और साक्ष्यों पर विवचार कर+ा हो ा है। मसिSस्र्ट्रेर्ट, "यविद ऐसा कर+ा संभव हो" ो, वि+*ा:रर्ण कर सक ा है। इसक े अलावा वि+*ा:रर्ण "विववाद की विवषयवस् ु पर कब्Sे क े अति*कार क े विकसी पक्ष क े दावे क े गुर्णागुर्ण को संदर्भिभ विकये विब+ा" आदेश की ति णिर्थी पर कब्Sे का थ्यात्मक विववरर्ण हो ा है। इ+ शब्दों से प ा चल ा है विक मसिSस्र्ट्रेर्ट कब्Sे क े विवरो*ी अति*कारों या विवरो*ी दावों क े गुर्णागुर्ण पर विववि+श्चय या न्यायवि+र्ण:य+ +हीं कर ा। मसिSस्र्ट्रेर्ट क े वल यह वि+*ा:रर्ण कर ा है विक आदेश की ति णिर्थी पर कब्Sा विकसक े पास र्थीा। यविद कब्Sा आदेश की ति णिर्थी क े दो माह क े भी र अ+ुतिच रीक े से खिलया गया है ो ऐसे बेदखल व्यविX को कब्Sा*ारी मा+ा Sाए। आकस्जिस्मक ा की स्जिस्र्थीति में,मसिSस्र्ट्रेर्ट वि+र्ण:य क े विवलंब+ क े कारर्ण विववाद की वस् ु को कु क: कर सक ा है। अं ः *ारा 145 क े अन् ग: अणिभकस्जिल्प काय:वाही द°र्डात्मक +हीं है बस्जिल्क वि+वारक है, और उस उद्देश्य क े खिलए विवति* की सम्यक प्रविक्रया में सक्षम न्यायालय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द्वारा अति*कारों का औपचारिरक या अस्जिन् म न्यायवि+र्ण:य+ विकए Sा+े क मात्र प्राविवति*क है। अ ः, उपबं* क े अन् ग: पक्षकारों क े भू काली+, व:मा+ और भविवष्य ् अति*कारों को प्रभाविव कर+े वाला कु छ भी अणिभकस्जिल्प +हीं है।

233. उपबं* का उद्देश्य क े वल का+ू+ व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+ा और सिसविवल न्यायालय द्वारा एक पक्ष क े वास् विवक अति*कार का वि+*ा:रर्ण हो+े क एक पक्ष का कब्Sा, विववाद क े ठीक पहले सिSसका कब्Sा मसिSस्र्ट्रेर्ट को प्र ी हो,ब+ाए रख+ा है।140 इसका उद्देश्य विववाद की विवषयवस् ु को विववादकों क े हार्थी से बाहर कर+ा है सिSससे अणिभरक्षक अति*कार की रक्षा कर सक े Sब क विक एक पक्ष +े सिसविवल न्यायालय में कब्Sे क े अप+े अति*कार को (यविद कोई) स्र्थीाविप विकया है।141 यह *ारा 146 की उप-*ारा (6) क े प्राव*ा+ों से स्पष्ट है। मसिSस्र्ट्रेर्ट उस पक्ष की घोषर्णा कर ा है Sो कब्Sे का हकदार है "Sब क विक विवति* की सम्यक प्रविक्रया में उसे वहां से हर्टाया + Sाय "। हालांविक प्रर्थीम परन् ुक क े अन् ग: काय: कर े हुए मसिSस्र्ट्रेर्ट उस पक्ष का कब्Sा बहाल कर सक ा है सिSसे अ+ुतिच रीक े से और Sबर+ बेदखल कर विदया गया है। विकसी भी पक्ष को *ारा 145 क े प्राव*ा+ों का उपयोग अं रस्र्थी उद्देश्य क े खिलए या सिसविवल उपचार क े अ+ुपूरक क े रूप में कर+े की अ+ुमति +हीं होगी। सिसविवल न्यायालय की अति*कारिर ा और शविX विकसी भी प्रकार से बाति* +हीं की Sा सक ी है।142 140 Commentary on the Criminal Procedure Code by Ratanlal and Dhirajlal, 20th edition (2016) at page 427 141 Commentary on the Criminal Procedure Code by Ratanlal and Dhirajlal, 20th edition (2016) at page 427 142 Commentary on the Criminal Procedure Code by Ratanlal and Dhirajlal, 20th edition (2016) at page 451 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

234. इस न्यायालय +े वि+म्+खिलखिख मामलों में *ारा 145 क े ह काय:वाही की प्रक ृ ति और दायरे का विवश्लेषर्ण विकया है: (i) भिंभका ब+ाम चरर्ण सिंसह 143 में, प्रत्यर्थी- +े विववाविद भूविम को "महाराS की भूविम हो+े का दावा" विकया, Sबविक अपीलार्थी-गर्ण +े वंशा+ुग विकरायेदारों क े रूप में भूविम पर कब्Sा हो+े का दावा विकया। मसिSस्र्ट्रेर्ट +े *ारा 145 क े ह काय:वाही शुरू की, विववाविद भूविम को क ु क: कर विदया और उ+ काय:वाविहयों क े लंविब वि+स् ारर्ण क े चल े उन्हें सुपुद:गीदार क े कब्Sे में रख+े का वि+द†श विदया। Sांच क े बाद मसिSस्र्ट्रेर्ट +े कहा विक अपीलार्थी-गर्ण विवति* की सम्यक प्रविक्रया द्वारा वि+काले Sा+े क कब्Sेदार रह+े क े हकदार हैं। त्पश्चा ् प्रत्यर्थी- +े राSस्व न्यायालय क े समक्ष एक वाद दायर विकया। उस काय:वाही क े बाद सव च्च न्यायालय क े समक्ष अपील की गई। इस न्यायालय क े समक्ष रखे गये विवषयों में से एक यह र्थीा विक क्या अपीलार्थी-गर्ण +े *ारा 145 क े प्राव*ा+ों क े अ+ुसार कब्Sा खिलया है। ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति सुब्बा राव +े यह *ारिर विकया: “16.... संविह ा की *ारा 145 (6) क े अ*ी+, मसिSस्र्ट्रेर्ट ऐसी उद्घोषर्णा कर+े वाला आदेश Sारी कर+े क े खिलए प्राति*क ृ हो ा है विक कोई पक्षकार विवति* की सम्यक प्रविक्रया में वि+काले Sा+े क विकसी भूविम पर कब्Sे का हकदार है। मसिSस्र्ट्रेर्ट विकसी पक्ष क े स्वत्व या भूविम पर कब्Sे क े अति*कार का वि+*ा:रर्ण +हीं कर ा, लेविक+ स्पष्ट रूप से उस प्रश्न को विवति* की सम्यक प्रविक्रया में विववि+श्चय विकए Sा+े हे ु आरतिक्ष रख ा है। उसकी अति*कारिर ा का आ*ार शांति भंग की आशंका पर 143 1959 Supp (2) SCR 798 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आ*ारिर है, उस उद्देश्य से वह पक्षकारों क े अति*कारों क े बावSूद एक अस्र्थीायी आदेश दे ा है, सिSस पर बहस हो+ी चाविहए और विवति* द्वारा उपबंति* रीति से वि+स् ारर्ण हो+ा चाविहए। उX आदेश का Sीव+काल विकसी सिसविवल न्यायालय द्वारा तिर्डक्री पारिर कर+े क हो ा है और Sैसे ही सिसविवल न्यायालय वि+काले Sा+े का आदेश दे ा है, वैसे ही आपराति*क न्यायालय द्वारा विदया गया आदेश विवस्र्थीाविप हो Sा ा है। विद+ोमो+ी चौ*रीा+ी ब+ाम ब्रोSो मोविह+ी चौ*री [(1901) LR 29 IA 24, 33] क े मामले में विप्रवी काउंसिसल +े द°र्ड प्रविक्रया संविह ा की *ारा 145 क े ह आदेशों क े प्रभाव को संक्षेप में इस प्रकार ब ाया है: " ये आदेश क े वल पुखिलस आदेश हैं Sो शांति भंग रोक+े क े खिलए ब+ाए गए हैं। ये स्वत्व क े विकसी प्रश्न का वि+*ा:रर्ण +हीं कर े...."। इसखिलए, हमारा मा++ा है विक पक्षों क े अति*कार क े बावSूद कब्Sे क े संबं* में मसिSस्र्ट्रेर्ट का एक अ+ंति म आदेश विकसी व्यविX को अति*वि+यम की *ारा 180 क े ह वाद का विवरो* कर+े में सक्षम +हीं ब+ा ा। (प्रभाव वर्ति* ) (ii) आरएच भूर्टा+ी ब+ाम विमस मणिर्ण Sे देसाई 144 क े मामले में, अपीलार्थी- +े अप+े स्वाविमत्व वाले क े विब+ पर कब्Sा कर+े क े खिलए पहले प्रति वादी क े सार्थी एक अ+ुमति एवं अ+ुज्ञविप्त अ+ुबं* विकया। Sब पक्षकारों क े मध्य क्षति पूर्ति में वृतिद्ध को लेकर विववाद उत्पन्न हुआ ब प्रर्थीम प्रत्यर्थी- +े अपीलार्थी- को वि+काल+े और कब्Sा दूसरे और ीसरे प्रत्यर्थी- को हस् ग कर+े की मांग की। इसक े बाद, अपीलार्थी- +े *ारा 145 क े ह एक आवेद+ दाखिखल विकया और मसिSस्र्ट्रेर्ट +े काय:वाही शुरू की। काय:वाविहयों क े लंविब रह े, प्रत्यर्थी- +े एक सिसविवल वाद दायर विकया। मसिSस्र्ट्रेर्ट +े कहा विक अपीलार्थी- क े पास क े विब+ का वास् विवक कब्Sा र्थीा और उसे Sबर+ बेदखल विकया गया। उच्च न्यायालय क े समक्ष पु+रीक्षर्ण यातिचका में मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश को अपास् कर विदया गया और यह *ारिर विकया गया विक मसिSस्र्ट्रेर्ट 144 (1969) 1 SCR 80 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +े *ारा 145 क े अ*ी+ अप+ी शविXयों क े दायरे का अति क्रमर्ण है। उच्च न्यायालय क े आदेश को इस न्यायालय क े समक्ष चु+ौ ी दी गई सिSस+े उच्च न्यायालय क े आदेश को अपास् कर विदया और मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश को बहाल कर विदया। इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीश पीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति Sेएम शेलार्ट +े *ारा 145 क े ह काय:वाही क े विवषयक्षेत्र पर वि+म्+खिलखिख शब्दों में चचा: की: “8. इसमें कोई संदेह +हीं है विक *ारा 145 का उद्देश्य शांति भंग को रोक+ा और उस हे ु पक्षकारों को न्यायालय क े समक्ष लाकर त्वरिर उपचार प्रदा+ कर+ा है और यह अणिभवि+*ा:रति कर+ा है विक उ+में से विकसक े पास वास् विवक कब्Sा र्थीा और सक्षम न्यायालय द्वारा उ+क े अति*कारों क े वि+*ा:रर्ण हो+े क यर्थीास्जिस्र्थीति बरकरार रख+ा है…*ारा 145 क े ह Sांच इस प्रश्न क सीविम है विक पक्षकारों क े अति*कारों क े बावSूद प्रारंणिभक आदेश की ति णिर्थी पर कब्Sा विकसक े पास र्थीा।" (प्रभाव वर्ति* ) (iii) शांति क ु मार पांर्डा ब+ाम शक ुं ला देवी 145 क े मामले में, पक्षकारों क े मध्य एक दुका+ को लेकर विववाद र्थीा। अपीलार्थी- द्वारा दायर परिरवाद क े आ*ार पर *ारा 145 क े ह काय:वाही शुरू की गई और मसिSस्र्ट्रेर्ट +े संपखित्त क ु क: कर दी। प्रत्यर्थी-, सिSस+े विववाद क े विवषय-वस् ु से विह बद्ध हो+े का दावा विकया र्थीा,को काय:वाही में अणिभयोसिS विकए Sा+े की स्वीकृ ति +हीं दी गई। *ारा 145 क े ह अंति म आदेश अपीलार्थी- क े पक्ष में र्थीा। आदेश क े विवरुद्ध पु+रीक्षर्ण यातिचकाएं खारिरS कर दी गई ं । इसक े बाद, प्रत्यर्थी- +े एक दीवा+ी वाद दायर विकया और व्यादेश प्राप्त कर खिलया। र्थीाविप, सिSला न्यायालय द्वारा इस आ*ार पर व्यादेश को रद्द कर विदया गया विक चूंविक *ारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 145 की काय:वाविहयां अपीलार्थी- क े पक्ष में गई र्थीी, अ ः विवचारर्ण न्यायालय द्वारा व्यादेश Sारी कर+ा न्यायोतिच +हीं र्थीा Sब क विक मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश दीवा+ी न्यायालय की तिर्डक्री द्वारा रद्द + कर विदया गया हो हो और संपखित्त क े न्यातियक अणिभरक्षा में रह े कोई व्यादेश + विदया Sा सका हो। उच्च न्यायालय +े सिSला न्यायालय क े आदेश को उलर्ट विदया। इस न्यायालय क े समक्ष उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य को चु+ौ ी दी गयी। इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की न्यायपीठ +े अपील को खारिरS कर विदया और *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयों की प्रक ृ ति क े बारे में विवचार विकया। न्यायमूर्ति Sे. एम. शेल +े न्यायालय की ओर से अणिभवि+*ा:रिर विकया: “10. संविह ा की *ारा 145/146 क े ह काय:वाविहयों को अ*: - दीवा+ी, अ*:-आपराति*क प्रक ृ ति का या काय:कारी या पुखिलस कार:वाई मा+ा गया है। उपबं*ों का उद्देश्य त्वरिर और सारांश उपाय प्रदा+ कर+ा है ाविक संपखित्त पर कब्Sे क े सवाल को विववाविद कर+े वाले पक्षकारों क े बीच विववाद को समा*ा+ क े खिलए काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट को सौंपकर शांति क े उल्लंघ+ को रोका Sा सक े । विववाद का संज्ञा+ लेकर मसिSस्र्ट्रेर्ट प्रारंणिभक आदेश की ति णिर्थी या उX आदेश क े ठीक दो मही+े पहले क े भी र, *ारा 145 की उप-*ारा 4 क े परं ुक में यर्थीा संदर्भिभ को संदर्भिभ कर क े वल विववि+श्चय करेगा विक विववाद क े पक्षकारों में से कब्Sा विकसक े पास र्थीा और दीवा+ी अति*कारों का न्यायवि+र्ण:य+ कर+े में सक्षम न्यायालय द्वारा कब्Sे क े हक क े संबं* में वि+*ा:रर्ण विकये Sा+े क, Sो विक काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट +हीं कर सक ा, यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रखेगा। काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट उस विववाद का संज्ञा+ +हीं लेगा Sो क े वल स्वाविमत्व या कब्Sे क े अति*कार क े खिलए संदर्भिभ है और क े वल कब्Sे क े खिलए +हीं...” वि+म्+खिलखिख विर्टप्पणिर्णयों में न्यायालय +े मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश और दीवा+ी अदाल की अति*कारिर ा की अन् र्मिक्रया पर विवचार विकया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “15. यह सुस्र्थीाविप है विक आपराति*क न्यायालय का वि+र्ण:य दीवा+ी न्यायालय को बाध्य +हीं कर ा है Sबविक दीवा+ी न्यायालय का वि+र्ण:य आपराति*क न्यायालय को बाध्य कर ा है। (देखिखए, Sarkar on Evidence 15 वां संस्करर्ण, पृष्ठ 845) । संविह ा की *ारा 145 क े अ*ी+ विदया गया वि+र्ण:य प्रासंविगक हो ा है और यह दर्भिश कर+े क े खिलए साक्ष्य क े रूप में स्वीकाय: हो ा है: (i) विक विकसी संपखित्त विवशेष से संबंति* विववाद र्थीा; (ii) यह विक विववाद पक्षकार विवशेष क े बीच र्थीा; (iii) विक ऐसे विववाद क े कारर्ण विकसी दी गयी ति णिर्थी पर *ारा 145 (1) क े अ*ी+ प्रारंणिभक आदेश या *ारा 146 (1) क े अ*ी+ क ु क— का आदेश पारिर विकया गया र्थीा; और (iv) यह विक मसिSस्र्ट्रेर्ट +े प्रारंणिभक आदेश की ारीख को विववाविद संपखित्त पर विकसी एक पक्षकार का कब्Sा या काल्पवि+क कब्Sा हो+ा पाया। मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा अंविक क: या उसक े द्वारा प्राप्त वि+ष्कषÂ की कोई प्रासंविगक ा +हीं हो ी और सक्षम न्यायालय क े समक्ष साक्ष्य में स्वीकाय: +हीं हो े और सक्षम न्यायालय मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा कब्Sे क े प्रश्न पर भी प्राप्त वि+ष्कषÂ से बाध्य +हीं हो ा, यद्यविप यर्थीा पक्षकारों क े मध्य, मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश कब्Sे का साक्ष्य होगा। मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा दS: वि+ष्कष: अदाल को बाध्य +हीं कर ा। सक्षम अदाल क े पास अति*कारिर ा हो ी है और उसका कब्Sे क े प्रश्न पर भी काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा प्राप्त वि+ष्कष: से असंग वि+ष्कष: पर पहुंच+ा न्यायोतिच होगा।” (प्रभाव वर्ति* ) न्यायालय +े *ारिर विकया विक मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेश दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा क े आदेश XXXIX क े ह दीवा+ी न्यायालय की अं व: - अति*कारिर ा क े रूप में बाध्यकारी +हीं होगी: “22... दीवा+ी न्यायालय भी ऐसे आदेश का सम्मा+ करेगा और काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा विदये गए आदेश से असंग अं रिरम व्यवस्र्थीा पर पहुंच+े से बचेगा। हालांविक, यह ये *ारिर कर+े से अलग है विक दीवा+ी न्यायालय क े पास काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश से असंग व्यादेश Sारी कर+े की अति*कारिर ा +हीं हो ी। अति*कारिर ा हो ी है लेविक+ उसका प्रयोग अपवाद क े रूप में होगा + विक वि+यम क े रूप में। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ऐसे मामले हो सक े हैं Sहां काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश को अति*कारिर ा ही+, स्पष्ट रूप से गल या विवरो*ाभासी वि+ष्कषÂ वाला विदखाया Sा सक ा है। उदाहरर्ण क े खिलए, हो सक ा है विक मसिSस्र्ट्रेर्ट +े दो मही+े से अति*क समय से कब्Sाही+ पक्षकार को कब्Sावा+ मा+कर आदेश दे विदया हो। ऐसे मामले हो सक े हैं Sहां काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा इसक े समक्ष प्रस् ु साक्ष्यों क े आ*ार पर विदये गये आदेश क े बावSूद, सक्षम न्यायालय, ऐसे न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु साम£ी क े आ*ार पर, यह *ारिर कर सक ा है विक वाद संपखित्त पर प्रर्थीम दृष्टया एक पक्ष का कब्Sा बरकरार रख+े या एक पक्ष को कब्Sा दे+े का आ*ार है या काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश क े अ+ुसार संपखित्त पर एक पक्ष को कब्Sा दे+ा अन्यायोतिच एवं असंग होगा। ऐसी अपवाद स्वरूप स्जिस्र्थीति यों में, सक्षम न्यायालय (Sो अति*कांश ः एक सिसविवल न्यायालय होगा) क े पास काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े द्वारा दंर्ड प्रविक्रया संविह ा की *ारा 145 क े ह की गई उद्घोषर्णा और प्राप्त वि+ष्कषÂ से हर्टकर व्यादेश प्रदा+ कर+े की अति*कारिर ा हो सक ी है। *ारा 146 क े ह आदेश उस परिरमार्ण की समस्या +हीं होगी। Sहां क संपखित्त कु क: है और प्रापक को दी गयी है, सिसविवल न्यायालय सरल ा से Sांच कर सक ा है विक सिसविवल वाद क े विवलम्ब+ क े दौरा+ क्या क ु क— Sारी रख+ा और उसी प्रापक को रख+ा, या अन्य प्रापक वि+युX कर+ा या कोई अन्य अन् रिरम व्यवस्र्थीा कर+ा उतिच और समीची+ होगा।” (प्रभाव वर्ति* ) (iv) सुरिंरदर पाल कौर ब+ाम स पाल146 क े मामले में, शांति क ु मार पांर्डा क े मामले में विदये गये वि+र्ण:य का अवलंब खिलया गया। न्यायमूर्ति दीपक विमश्रा ( त्काली+ मुख्य न्याया*ीश) दो न्याया*ीश पीठ की ओर से वि+म्+व *ारिर विकया: “10... यह एक सुस्र्थीाविप विवति*क स्जिस्र्थीति है विक दंप्रसं की *ारा 145 क े ह की गई काय:वाही में दी गई विर्टप्पणिर्णयां सक्षम अदाल को इससे समक्ष प्रारंभ की गई का+ू+ी काय:वाही में बाध्य +हीं कर ी।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

235. *ारा 145 की काय:वाही विकसी पक्षकार क े स्वत्व या भूविम पर कब्Sे क े अति*कार को य कर+े का उद्देश्य +हीं रख ी है। *ारा 145 क े ह काय:वाही में क ु क: संपखित्त ‘न्यातियक अणिभरक्षा’ में हो ी है। इसखिलए, उस पार्ट- से कब्Sा प्राप्त कर+ा आवश्यक +हीं हो ा Sो कब्Sे में +हीं है और इसखिलए, कब्Sा दे+े की स्जिस्र्थीति में +हीं है। इस न्यायालय +े वि+म्+खिलखिख वि+र्ण:यों में क ु क: संपखित्त की प्रक ृ ति का विवश्लेषर्ण विकया है: (i) देवक ु वंर ब+ाम णिशवप्रसाद सिंसह147 क े मामले में इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की पीठ +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक *ारा 145 क े अ*ी+ क ु क: सम्पखित्त ‘न्यातियक अणिभरक्षा’ में हो ी है। अपील अपीलार्भिर्थीयों द्वारा 1947 में इस उद्घोषर्णा क े खिलए लाए गए वाद से उद्भू है विक विकन्हीं विवलेखों क े ह प्रति वाविदयों को संपखित्त का कोई अति*कार या स्वत्व प्राप्त +हीं है और यह विक विवलेख वि+स्जिष्क्रय और शून्य र्थीे। वाद को विवचारर्ण न्यायालय +े तिर्डक्री कर विदया र्थीा, लेविक+ अपील पर, उच्च न्यायालय +े तिर्डक्री अपास् कर विदया। उच्च न्यायालय +े कहा विक चूंविक अपीलक ा:ओं का वाद की ति णिर्थी पर संपखित्त पर कब्Sा +हीं र्थीा, इसखिलए उ+का वाद विववि+र्मिदष्ट अ+ु ोष अति*वि+यम की *ारा 42 क े परं ुक क े ह विवफल हो+ा चाविहए क्योंविक वे प्रत्यर्भिर्थीयों से कब्Sे की बहाली क े अ+ु ोष की मांग कर+े में विवफल रहे। वाद की ति णिर्थी पर, विववाद की संपखित्त मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा *ारा 145 क े ह अप+ी शविXयों का प्रयोग कर े हुए क ु क: कर दी गयी र्थीी और विकसी भी पक्ष का कब्Sा +हीं र्थीा। इस न्यायालय क े समक्ष Sो विवषय उठा, वह यह र्थीा विक क्या क ु क— क े मद्दे+Sर, अपीलार्थी- अप+े वाद में कब्Sा उन्हें विदये Sा+े का अ+ु ोष मांग 147 (1965) 3 SCR 655 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक े र्थीे। ी+ न्याया*ीशों की पीठ की ओर से न्यायमूर्ति एक े सरकार +े वि+म्+व *ारिर विकया: “4. हमारे विवचार में, संपखित्त क े स्वत्व की उद्घोषर्णा क े खिलए दायर वाद में Sबविक उसे संविह ा की *ारा 145 क े क ु क: कर विदया गया हो, कब्Sा विदये Sा+े क े अ+ु ोष की मांग कर+ा आवश्यक +हीं है। हमारे विवचार से, इस रह की क ु क— क े मामले में मसिSस्र्ट्रेर्ट का उस पक्षकार की ओर, सिSसे वह अन् ः कब्Sावा+ पा ा है, कब्Sा हो+े का थ्य, यविद ऐसा हो, अप्रासंविगक है। हालांविक, इस प्रश्न पर विक क्या मसिSस्र्ट्रेर्ट वास् व में ऐसा कर ा है या +हीं, व:मा+ मामले में कोई राय व्यX कर+ा अ+ावश्यक है।

5. प्राति*कारी स्पष्ट रूप से विदखा े हैं विक Sहां प्रति वादी का कब्Sा + हो और वादी को कब्Sा दे+े की स्जिस्र्थीति में + हो, वादी क े खिलए संपखित्त पर स्वत्व की उद्घोषर्णा क े वाद में कब्Sे का दावा कर+ा आवश्यक +हीं है: देखें, सुंदर सिंसह-मल्लाह सिंसह स+ा + *म: हाई स्क ू ल, र्ट्रस्र्ट ब+ाम प्रबं* सविमति, सुंदर सिंसह-मल्लाह सिंसह राSपू हाई स्क ू ल [(1957) LR 65 IA 106]। अब यह स्पष्ट है विक व:मा+ मामले में, क ु क— क े बाद प्रत्यर्थी-गर्ण का कब्Sा +हीं र्थीा और अपीलार्भिर्थीयों को कब्Sा दे+े की स्जिस्र्थीति में +हीं र्थीे। कब्Sा मसिSस्र्ट्रेर्ट का र्थीा, सिS+क े खिलए, इससे कोई फक: +हीं पड़ ा और वह वि+तिश्च रूप से वाद का एक पक्षकार +हीं र्थीा। यह देख+ा प्रासंविगक है विक +वाब हुमायूँ बेगम ब+ाम +वाब शाह मोहम्मद खा+ [AIR (1943) PC 94] में यह मा+ा गया है विक विववि+र्मिदष्ट अ+ु ोष अति*वि+यम की *ारा 42 क े परं ुक में अणिभकस्जिल्प अ+ु ोष क े वल प्रति वादी क े विवरुद्ध अ+ु ोष है। हम यह Sोड़ सक े हैं विक क े. सुंदरेश अय्यर ब+ाम सव:S+ सोविकयाविबल विव*- वि+ति* खिलविमर्टेर्ड [(1939) ILR Mad 986] में यह कहा गया विक संपखित्त क े न्यातियक अणिभरक्षा में हो+े पर कब्Sे की मांग कर+ा आवश्यक +हीं। इसमें कोई संदेह +हीं है विक संविह ा की *ारा 145 क े ह क ु क: संपखित्त न्यातियक अणिभरक्षा में है। इससे यह स्पष्ट ः स्र्थीाविप हो Sा ा है विक अपीलार्भिर्थीयों क े खिलए कब्Sे की मांग कर+ा आवश्यक +हीं र्थीा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) शांति क ु मार पांर्डा क े मामले में, इस न्यायालय +े *ारा 145/146 क े ह मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश क े प्रभाव को शासिस कर+े वाले विवति*क सिसद्धान् ैयार विकये Sब सक्षम अति*कारिर ा वाले न्यायालय क े समक्ष का+ू+ी काय:वाही शुरू की Sा ी है: “(1) संविह ा की *ारा 146 की उप*ारा (1) में यर्थीा प्रयुX सक्षम न्यायालय शब्द का अर्थी: क े वल दीवा+ी न्यायालय +हीं है। एक सक्षम न्यायालय वह है सिSसमें काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े समक्ष काय:वाही की विवषय-वस् ु संपखित्त पर कब्Sे क े संबं* में स्वत्व या पक्षकारों क े अति*कारों क े प्रश्न को वि+*ा:रिर कर+े की अति*कारिर शविX हो ी है: (2) *ारा 145 (1) क े अ*ी+ विकसी आदेश में असफल पक्षकार सफल पक्षकार क े विवरुद्ध विववाविद संपखित्त पर कब्Sा कर+े का अप+ा हक स्र्थीाविप कर+े क े खिलए सक्षम न्यायालय में काय:वाही आरंभ करेगा। सामान्य ः, कब्Sा प्राविप्त का अ+ु ोष उतिच होगा। संविह ा की *ारा 146 (1) क े ह क ु क— क े परिरर्णामस्वरूप एक सक्षम न्यायालय क े समक्ष शुरू की गई का+ू+ी काय:वाही में कब्Sे की प्राविप्त का अ+ु ोष मांग+ा आवश्यक +हीं है। चूंविक संपखित्त को मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा उस पक्षकार क े खिलए और उसकी ओर से न्यातियक अणिभरक्षा में रखा गया है, Sो अं ः न्यायालय से सफल होगा, अ ः क े वल कब्Sे क े खिलए स्वत्व क े अति*कारों का वि+*ा:रर्ण विकये Sा+े की मांग कर+ा पया:प्त होगा। ऐसा वाद कब्Sे का अ+ु ोष + मांग+े क े कारर्ण गल +हीं होगा। (3) विकसी दांतिर्डक न्यायालय द्वारा विकया गया विववि+श्चय दीवा+ी न्यायालय को आबद्ध +हीं कर ा Sबविक दीवा+ी न्यायालय द्वारा विकया गया कोई विववि+श्चय दांतिर्डक न्यायालय को आबद्ध कर ा है। संविह ा की *ारा 145/146 क े ह काय:वाही में काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेश दांतिर्डक न्यायालय का आदेश हो ा है और वह भी सारांश Sांच पर आ*ारिर । यह आदेश अं व: - मंच पर सक्षम न्यायालय क े समक्ष सम्मा+ और वS+ का हकदार हो ा है। अति*कारों क े न्याय वि+र्ण:य+ क े अंति म चरर्ण में, Sो अदाल क े समक्ष प्रस् ु साक्ष्यों पर होगा, मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश साक्ष्यों क े कई र्टुकड़ों में से क े वल एक है। (4) न्यायालय अं रिरम व्यादेश का आदेश Sारी कर+े या काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा विकए गए आदेश से असंग अं रिरम व्यवस्र्थीा का आदेश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दे+े से बचेगा। हालांविक, ऐसा कह+ा न्यायालय क े विववेकाति*कार क े प्रयोग क े संबं* में क े वल साव*ा+ी या संयम क े वि+यम की उविX,बुतिद्धमत्ता की मांग और अप+ी अति*कारिर ा में विदये गए त्काल/ आकस्जिस्मक काय:कारी आदेशों क े खिलए सम्मा+ है; और वि+तिश्च रूप से न्यायालय की शविX पर अंक ु श +हीं। न्यायालय क े पास काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश से असंग अं रिरम व्यादेश सविह अं रिरम आदेश दे+े की अति*कारिर ा हो ी है। अति*कारिर ा हो ी है लेविक+ उसका प्रयोग अपवाद क े रूप में विकया Sाएगा वि+यम क े रूप में +हीं। यहां क विक अं रिरम आदेश पारिर कर+े क े चरर्ण में भी, काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े साम+े असफल पक्षकार, न्यायालय में प्रस् ु साम£ी क े आ*ार पर काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े वि+ष्कषÂ को अति*कारिर ाही+, गल या असंग विदखाकर प्रर्थीम दृष्टया मSबू पक्ष रख सक ा है, सिSस मामले या मामलों में, अदाल अप+े कारर्णों और सं ुविष्ट को अंविक कर, काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा विकए गए आदेश से असंग या हर्टकर आदेश दे सक ी है। न्यायालय क े अंति म या अं व: - आदेश का प्रभाव, एक पक्ष क े कब्Sे क े स्वत्व की घोषर्णा और *ारा 145 की उप*ारा (6) क े अर्थीÂ में काय:कारी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े समक्ष सफल पक्षकार का वि+ष्कास+ होगा।” (प्रभाव वर्ति* ) उपरोX सूत्रीकरर्ण अवि+वाय: रूप से उ+ सिसद्धां ों की पु+रूविX है Sो न्यायालय की सुसंग परिरपाविर्टयों से उदभू हो े हैं [देखें, झूम्मामल उफ: देव+दास ब+ाम मध्य प्रदेश राज्य148 ]

236. Sहां कोइ: वाद सक्षम दीवा+ी न्यायालय क े समक्ष कब्Sे क े खिलए या हक की घोषर्णा क े खिलए संस्जिस्र्थी विकया Sा ा है, वहां *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयां Sारी +हीं रह+ी चाविहए। इस न्यायालय +े वि+म्+खिलखिख मामलों में उपरोX विवति*क उप*ारर्णाओं का विवश्लेषर्ण विकया है:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) अमरेश ति वारी ब+ाम लाल ा प्रसाद दुबे149 क े मामले में, न्यायमूर्ति एस. ए+. वरिरयावा +े इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की पीठ की ओर से वि+म्+व *ारिर विकया: “12... इस विवषय-वस् ु पर विवति* राम सुमेर पुरी महं ब+ाम उत्तर प्रदेश राज्य [(1985) 1 एससीसी 427: 1985 एससीसी (दांतिर्डक) 98] वाले मामले में इस न्यायालय क े वि+र्ण:य द्वारा सुस्र्थीाविप है। इस मामले में वि+म्+ा+ुसार *ारिर विकया गया है: (एससीसी पीपी. 428-29, पैरा 2) - Sब कोई दीवा+ी वाद उस संपखित्त क े खिलए लंविब है सिSसमें कब्Sे का प्रश्न अं व:खिल है और न्यायवि+र्ण- विकया गया है ो हम संविह ा की *ारा 145 क े अ*ी+ समा+ां र दांतिर्डक काय:वाही आरंभ कर+े क े खिलए शायद ही कोई औतिचत्य देख े हैं इस स्जिस्र्थीति पर संदेह या विववाद कर+े की कोई गुंSाइश +हीं है विक दीवा+ी न्यायालय का फ ै सला, व:मा+ Sैसे मामलों में, दांतिर्डक न्यायालय को आबद्ध कर ा है... समा+ां र काय:वाही को Sारी रख+े की अ+ुमति +हीं दी Sा+ी चाविहए और दीवा+ी की तिर्डक्री की स्जिस्र्थीति में दांतिर्डक न्यायालय को अप+ी अति*कारिर ा क े प्रयोग की अ+ुमति +हीं दी Sा+ी चाविहए, खासकर Sब कब्Sे की Sांच दीवा+ी अदाल द्वारा की Sा रही है और पक्षकार वाद क े विवलंब+ की स्जिस्र्थीति में, अं रिरम आदेशों Sैसे विक व्यादेश या संपखित्त की पया:प्त सुरक्षा क े खिलए प्रापक की वि+युविX क े खिलए दीवा+ी अदाल का दरवाSा खर्टखर्टा+े की स्जिस्र्थीति में हैं। मुकदमेबाSी की बहुल ा पक्षकारों क े विह में +हीं है और + ही साव:Sवि+क समय को वि+रर्थी:क मुकदमेबाSी पर बबा:द हो+े विदया Sा+ा चाविहए। इसखिलए, हम सं ुष्ट हैं विक समा+ां र काय:वाही Sारी +हीं रह+ी चाविहए...” न्यायालय +े इस क: को खारिरS कर विदया विक राम सुमेर पुरी महं ब+ाम यूपी राज्य150 वाला सिसद्धां दीवा+ी अदाल द्वारा इस मुद्दे पर न्यायवि+र्ण:य+ विकए Sा+े क े बाद ही लागू होगा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “13. हम यह क: स्वीकार कर+े में असमर्थी: हैं विक राम सुमेर पुरी महं ब+ाम उत्तर प्रदेश राज्य [(1985) 1 एससीसी 427: 1985 एससीसी (दांतिर्डक) 98] क े मामले में विदया गया सिसद्धान् क े वल भी लागू होगा Sब दीवा+ी न्यायालय +े पहले ही संपखित्त क े संबं* में न्यायवि+र्ण:य+ कर विदया है और वि+ष्कष: दे विदया है। हमारे विवचार में राम सुमेर पुरी महं ब+ाम उत्तर प्रदेश राज्य [(1985) 1 एससीसी 427: 1985 एससीसी (दांतिर्डक) 98] का मामला यह वि+*ा:रिर कर रहा है विक मुकदमेबाSी की बहुल ा से बचा Sा+ा चाविहए क्योंविक यह पक्षकारों क े विह में +हीं है और साव:Sवि+क समय वि+रर्थी:क मुकदमेबाSी पर बबा:द हो होगा। इस सिसद्धां पर यह कहा गया है विक Sब दीवा+ी न्यायालय द्वारा कब्Sे की Sांच की Sा रही है और पक्षकार विववाद क े विवलम्ब+ क े दौरा+ संपखित्त क े पया:प्त संरक्षर्ण क े खिलए दीवा+ी न्यायालय का दरवाSा खर्टखर्टा+े की स्जिस्र्थीति में हैं, ो समा+ां र काय:वाही अर्थीा: *ारा 145 की काय:वाही Sारी +हीं रह+ी चाविहए...” इस विवषय पर विवचार कर े हुए विक विक कब न्याय वि+र्ण:य+ क े खिलए वाद संस्जिस्र्थी हो Sा+े पर *ारा 145 क े ह काय:वाही को आगे +हीं बढ़ायी Sा+ी चाविहए, इस न्यायालय +े *ारिर विकया: “14. झुम्मामल ब+ाम मप्र राज्य [(1988) 4 SCC 452: 1988 SCC (Cri) 974] क े मामले का अवलंब खिलया गया है। यह कहा गया है विक यह प्राति*कारी क े वल यह कह ा है विक क े वल इसखिलए विक एक दीवा+ी वाद लंविब है इसका म लब यह +हीं है विक द°र्ड प्रविक्रया संविह ा की *ारा 145 क े ह काय:वाही शून्य हो Sा+ी चाविहए। हमारे विवचार में यह प्राति*कारी इस रह का कोई व्यापक प्रस् ाव +हीं रख ा है। इस मामले में द°र्ड प्रविक्रया संविह ा की *ारा 145 क े ह काय:वाही का परिरर्णाम एक वि+ष्कर्मिष आदेश हुआ र्थीा। इसक े बाद, Sो पक्ष हार गया, उस+े सिसविवल काय:वाही दायर विकया। सिसविवल काय:वाही दायर कर+े क े बाद उस+े प्रार्थी:+ा की विक *ारा 145 की काय:वाही में पारिर अंति म आदेश को रद्द कर विदया Sाए। यह उस संदभ: में है विक इस न्यायालय +े यह मा+ा विक क े वल इसखिलए विक एक दीवा+ी वाद दायर विकया गया र्थीा, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसका म लब यह +हीं र्थीा विक द°र्ड प्रविक्रया संविह ा की *ारा 145 क े ह पास आदेश को रद्द कर विदया Sा+ा चाविहए। यह पूरी रह से एक अलग स्जिस्र्थीति है। इस मामले में पहले दीवा+ी वाद दायर विकया गया र्थीा। यर्थीास्जिस्र्थीति का आदेश सक्षम दीवा+ी न्यायालय द्वारा पहले ही पारिर कर विदया गया र्थीा। इसक े बाद *ारा 145 की काय:वाही शुरू की गई। *ारा 145 क े ह काय:वाही में कोई अंति म आदेश पारिर +हीं विकया गया र्थीा। व:मा+ मामले क े थ्यों क े आलोक में, हमारे विवचार में, राम सुमेर पुरी महं ब+ाम उत्तर प्रदेश राज्य [(1985) 1 एससीसी 427: 1985 एससीसी (दांतिर्डक) 98] में वि+*ा:रिर अ+ुपा पूरी रह से लागू हो ा है। हम स्पष्ट कर े हैं विक हम यह +हीं कह रहे हैं विक हर मामले में Sहां एक दीवा+ी वाद दायर विकया Sा ा है, *ारा 145 की काय:वाही कभी +हीं चलेगी। यह क े वल उ+ मामलों में है Sहां दीवा+ी वाद कब्Sे क े खिलए है या उसी संपखित्त क े संबं* में स्वत्व की घोषर्णा क े खिलए है और Sहां संबंति* संपखित्त क े संरक्षर्ण क े बारे में अ+ु ोष क े खिलए आवेद+ विकया Sा सक ा है और दीवा+ी न्यायालय द्वारा विदया Sा सक ा है, वहां *ारा 145 क े ह काय:वाही Sारी रख+े की अ+ुमति +हीं दी Sा+ी चाविहए। ऐसा इसखिलए है क्योंविक दीवा+ी न्यायालय स्वत्व क े प्रश्न क े सार्थी-सार्थी पक्षकारों क े बीच कब्Sे का फ ै सला कर+े क े खिलए सक्षम हो े हैं और दीवा+ी न्यायालय क े आदेश मसिSस्र्ट्रेर्ट क े खिलए बाध्यकारी होंगे।“ (प्रभाव वर्ति* ) *ारा 145 की काय:वाही क े संबं* में स्र्थीाविप विवति*क स्जिस्र्थीति को रख+े क े पश्चा, अब हम व:मा+ मामले में थ्यों पर विवति* क े प्रयोज्य ा पर आ े हैं। *ारा 145 क े प्राव*ा+ों को क े वल भी लागू विकया Sा सक ा है Sब शांति भंग हो+े का ख रा हो। मसिSस्र्ट्रेर्ट की अति*कारिर ा स्वत्व क े विववाविद प्रश्नों क े न्यायवि+र्ण:य+ क विवस् ृ +हीं है। मसिSस्र्ट्रेर्ट को स्जिस्र्थीति की ात्काखिलक ा को पूरा कर+े और शांति ब+ाए रख+े का प्राति*कार विदया गया है। मसिSस्र्ट्रेर्ट का विववि+श्चय इस बा क सीविम है विक आदेश की ति णिर्थी पर विकस पक्ष का वास् विवक कब्Sा र्थीा। वास् विवक उद्देश्य यह य कर+ा है विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वास् विवक भौति क कब्Sा, + विक भूविम पर स्वत्व द्वारा समर्भिर्थी का+ू+ी कब्Sा, विकसक े पास है। *ारा 145 क े ह काय:वाही शुरू कर+े क े खिलए, मसिSस्र्ट्रेर्ट को एक विववाद क े अस्जिस् त्व से सं ुष्ट हो+ा पड़ ा है सिSससे शांति भंग हो+े की आशंका हो। मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा Sांच एक सारांश प्रक ृ ति की हो ी है, उद्देश्य इलाक े में शांति सुवि+तिश्च कर+े का हो ा है Sबविक विववाद क े परिरर्णामस्वरूप शांति भंग हो+े की आशंका हो ी है।

237. 29 विदसंबर, 1949 को अपर +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट फ ै Sाबाद-सह- अयोध्या द्वारा *ारा 145 की उप*ारा (1) क े अ*ी+ प्रारंणिभक आदेश Sारी विकया गया। इसक े सार्थी ही सार्थी स्जिस्र्थीति को आपा स्जिस्र्थीति मा+ े हुए उप- *ारा (4) क े दूसरे परं ुक क े ह क ु क— का आदेश भी पारिर विकया गया र्थीा। 5 S+वरी 1950 को, प्रापक +े प्रभार खिलया और क ु क: वस् ुओं की एक सूची ब+ाई। मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश क े अ+ुसार, क े वल दो या ी+ पुSारिरयों को उस स्र्थीा+ क े अंदर Sा+े की अ+ुमति दी गई र्थीी Sहां मूर्ति यों को भोग और पूSा Sैसे *ार्मिमक कायÂ क े खिलए रखा गया र्थीा और आम S+ ा को क े वल झरोखा दश:+ कर+े की अ+ुमति र्थीी। *ारा 145 क े ह काय:वाही न्यातियक +हीं र्थीी; प्राव*ा+ क े ह अति*कार का प्रयोग कर े समय मसिSस्र्ट्रेर्ट को पक्षकारों क े सारवा+ अति*कारों से बर +े का अति*कार +हीं र्थीा। *ारा 145 क े ह काय:वाही एक सिसविवल न्यायालय में विवचारर्ण क े समा+ +हीं है। संपखित्त पर स्वत्व और स्वाविमत्व क े ठोस दावों का वि+र्ण:य एक सक्षम सिसविवल काय:वाही में विकया Sा सक ा है। *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयां दीवा+ी न्यायालय क े समक्ष विवचारर्ण की प्रक ृ ति की +हीं हैं और क े वल पुखिलस mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA काय:वाविहयों Sैसी हैं। मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश पक्षकारों क े सारवा+ अति*कारों पर प्रति क ू ल प्रभाव +हीं र्डाल सक ा। संपखित्त की कु क— और प्रापक की वि+युविX क े पश्चा, संपखित्त न्यातियक अणिभरक्षा में आ गयी और प्रापक वास् विवक स्वामी क े विह क े खिलए संपखित्त *ारर्ण की। इस प्रकार वि+युX विकए गए प्रापक को विह बद्ध पक्षकार +हीं कहा Sा सक ा। 30 Sुलाई 1953 और 31 Sुलाई 1954 क े अप+े आदेशों द्वारा मसिSस्र्ट्रेर्ट +े काय:वाही को स्र्थीविग कर विदया और क ु क— क े आदेश को Sारी रखा।

238. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े ठीक ही यह म व्यX विकया विक वाद 1 क े अं रिरम व्यादेश, सिSसक े द्वारा यर्थीास्जिस्र्थीति और सेवापूSा Sारी रख+े का आदेश विदया गया र्थीा, को ध्या+ में रख े हुए, *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयां समाप्त +हीं की Sा सक ी र्थीीं क्योंविक इससे यर्थीास्जिस्र्थीति विबगड़ Sा ी। न्यायमूर्ति अ£वाल +े यह म व्यX विकया: “2244.... दीवा+ी न्यायालय द्वारा पारिर व्यादेश क े अवलोक+ से, हम पा े हैं विक 16 S+वरी, 1950 को अं रिरम व्यादेश आवेद+ में की गई प्रार्थी:+ा क े ह एक सरल आदेश, पक्षकारों को यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रख+े का वि+द†श दे े हुए पारिर विकया गया र्थीा। इसक े बाद 19 S+वरी, 1950 को, आदेश को संशोति* विकया गया र्थीा, लेविक+ दीवा+ी न्यायालय +े अप+ा स्वयं का प्रापक वि+युX +हीं विकया और सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट को यह वि+द†श +हीं विदया विक वह विकसी अन्य व्यविX या मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा वि+युX प्रापक क े बSाय न्यायालय क े विकसी अन्य प्रापक को कब्Sा हस् ां रिर करे। इसक े विवपरी, सूर्ट-1 में, सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट को भी प्रति वाविदयों में रखा गया र्थीा और दीवा+ी न्यायालय +े प्रति वाविदयों को यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रख+े का वि+द†श दे े हुए एक आदेश पारिर विकया। इस+े यह भी स्पष्ट विकया विक सेवा, पूSा Sैसी चल रही र्थीी, Sारी रहेगी.... मसिSस्र्ट्रेर्ट इस आदेश को काय:वाही छोर्डकर +SरअंदाS +हीं कर सक ा र्थीा क्योंविक इसका परिरर्णाम प्रापक की उन्मुविX और उसक े प्रभार में रखी कु क: संपखित्त की रिरहाई mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हो ा। दूसरे शब्दों में, इसे दीवा+ी न्याया*ीश क े यर्थीास्जिस्र्थीति क े आदेश की अवहेल+ा कर+े वाला आदेश मा+ा Sा सक ा र्थीा। यविद दीवा+ी न्याया*ीश +े अदाल ी प्रापक वि+युX विकया हो ा मसिSस्र्ट्रेर्ट को संपखित्त का कब्Sा उसे दे+े का वि+द†श विदया हो ा, ो स्जिस्र्थीति अलग हो सक ी र्थीी। इ+ परिरस्जिस्र्थीति यों में, यविद मसिSस्र्ट्रेर्ट +े काय:वाही को +हीं छोड़ा, बस्जिल्क क े वल इसे स्र्थीविग कर विदया, ो हमें उसकी ओर से कोई गल ी +हीं विमली। इसक े अलावा, Sब संपखित्त को क ु क: कर+े और इसे प्रापक क े प्रभार में रख+े का मसिSस्र्ट्रेर्ट का पूव: का आदेश, वादी को वाद दायर कर+े क े खिलए वादहे ुक +हीं दे सका, ो हम यह समझ+े में विवफल हैं विक बाद का आदेश, Sो क े वल लंविब काय:वाही को स्र्थीविग कर ा है, क ै से कोई मदद करेगा। मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा पारिर क ु क— का आदेश स्वयं वादहे ुक +हीं ब+ ा है और इसक े विवपरी यह क े वल पक्षकारों को चीSों से अवग करा ा है विक संबंति* संपखित्त क े स्वत्व और/या कब्Sे क े बारे में क ु छ विववाद है और साव:Sवि+क शांति और व्यवस्र्थीा की गड़बड़ी की भी आशंका है। वादहे ुक पक्षकार को ज्ञा है विक क ु छ विववाद मौSूद है + विक मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश सिSसक े ह उस+े संपखित्त को क ु क: कर प्रापक क े प्रभार में रखा।" (प्रभाव वर्ति* )

239. सुस्र्थीाविप विवति*क स्जिस्र्थीति क े आलोक में, Sैसा विक इस अदाल क े फ ै सलों से साम+े आ ा है, संपखित्त की क ु क— क े खिलए मसिSस्र्ट्रेर्ट क े 29 विदसंबर 1949 क े आदेश क े बाद, वि+म ही अखाड़ा को कब्Sे और स्वत्व क े खिलए उद्घोषक वाद दायर कर+े से विकसी +े +हीं रोका। मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश कब्Sे क े विवरो*ी अति*कारों या विकसी पक्ष क े दावे क े गुर्णागुर्ण का विववि+श्चय या न्याय वि+र्ण:य+ +हीं कर ा। संपखित्त क े स्वत्व और कब्Sे क े संबं* में सारवा+ अति*कारों पर क े वल दीवा+ी अदाल क े समक्ष दीवा+ी काय:वाही में विवचार विकया Sा सक ा र्थीा। मसिSस्र्ट्रेर्ट क े पास स्वाविमत्व और स्वत्व क े प्रश्नों का विववि+श्चय कर+े की अति*कारिर ा +हीं हो ी। *ारा 145 क े ह काय:वाही क े परिरर्णामस्वरूप वास् विवक स्वामी क े स्वत्व या कब्Sे पर भी कोई वि+र्ण:य +हीं हो सक ा र्थीा क्योंविक यह दीवा+ी न्यायालयों क े अ+न्य क्षेत्र क े भी र है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+म ही अखाड़ा इससे बचाव +हीं कर सक ा विक *ारा 145 की काय:वाही में कोई अंति म आदेश पारिर +हीं विकया गया और परिरर्णामस्वरूप परिरसीमा प्रारम्भ +हीं हुई। मसिSस्र्ट्रेर्ट +े सूर्ट 1 में यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रख+े क े संबं* में दीवा+ी न्यायालय द्वारा विदए गए वि+द†शों का अ+ुपाल+ विकया और द+ुसार, *ारा 145 क े ह काय:वाही को स्र्थीविग कर विदया। परिरसीमा अति*वि+यम 1898 क े अ+ुच्छेद 142 क े ह मामला

240. अ+ुच्छेद 142 अचल संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए विकसी वाद को शासिस कर ा है Sब कब्Sे वाले वादी को बेकब्Sा कर विदया गया हो या “कब्Sा अवरूद्ध हो गया हो।” अ+ुच्छेद 142 क े अ*ी+ परिरसीमा काल 12 वष: हो ा है। समय बेकब्Sा या अवरुद्ध हो+े की ारीख से प्रारम्भ हो ा है। वि+म:ल अखाड़ा का दावा है विक वादहे ुक 5 S+वरी 1950 उत्पन्न हुआ और वाद Sो 17 विदसंबर 1959 को संस्जिस्र्थी विकया गया, बारह वष: की परिरसीमा क े भी र है। बेकब्Sा हो+े या कब्Sा अवरुद्ध हो+े की अव*ारर्णाएं

241. वि+म ही क े वाद में Sन्मस्र्थीा+ मंविदर पर कब्Sा कर+े क े संबं* में,विववि+र्मिदष्ट अ+ु ोष क े अलावा कब्Sा हो+े या कब्Sा अवरुद्ध हो+े की अव*ारर्णाओं की व:मा+ मामले क े थ्यों में प्रयोज्य ा संबं*ी एक और आयाम पर विवचार विकया Sा+ा है। परिरसीमा अति*वि+यम, 1908 क े अ+ुच्छेद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 142 में अचल संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए वाद शाविमल है। इसमें अचल संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए उ+ वादों को शाविमल विकया गया है Sो दो विववरर्णों में से विकसी एक क े अन् ग: आ े हैं। पहला वह है Sब संपखित्त क े कब्Sे में रह े हुए वादी को बेकब्Sा कर विदया गया हो। दूसरा एक ऐसी स्जिस्र्थीति से संबंति* है Sब कब्Sे में रह े हुए वादी का कब्Sा अवरूद्ध हो गया हो। दूसरे शब्दों में, अ+ुच्छेद 142 Sो अचल संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए वाद से संबंति* है, इस श: क े सार्थी अह: ा लागू हो ा है विक वादी को उस समय संपखित्त क े कब्Sे में हो+ा चाविहए Sब दो+ों में से कोई भी घर्ट+ा हुई हो- अर्थीा: ् बेकब्Sा हो+े या कब्Sा अवरुद्ध हो+े घर्ट+ा, Sैसा भी मामला हो। अ+ुच्छेद 142 +े वाद क े विववरर्ण को क े वल अचल संपखित्त पर कब्Sा कर+े क े खिलए वाद क सीविम +हीं विकया है। प्राव*ा+ में वादी क े पूव: कब्Sे की श: और या ो बेकब्Sा या वादी क े कब्Sे में रह े कब्Sा अवरुद्ध हो+े की श: शाविमल है। परिरसीमा काल 12 वष: हो ा है। समय बेकब्Sा या अवरुद्ध हो+े की ारीख से प्रारम्भ हो ा है।

242. अ+ुच्छेद 144 एक अवणिशष्ट उपबं* है Sो स्र्थीावर संपखित्त पर कब्Sा या स्र्थीावर संपखित्त में विकसी विह क े खिलए वाद से संबंति* है, Sो विववि+र्मिदष्ट रूप से अन्यत्र उपबंति* +हीं है। अवणिशष्ट उपबं* क े रूप में, अ+ुच्छेद 144 अचल संपखित्त पर कब्Sा कर+े क े खिलए वादों पर लागू हो ा है Sो ऐसे विववरर्ण क े अं ग: +हीं आ े Sो अ+ुसूची क े अ+ुच्छेदों में विवशेष रूप से शाविमल हों. अ+ुच्छेद 144 क े मामले में, परिरसीमा काल 12 वष: और समय ब प्रारम्भ हो ा है Sब प्रति वादी का कब्Sा वादी क े प्रति क ू ल हो गया हो। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

243. Sैसा विक ऊपर देखा गया है, अ+ुच्छेद 142 में दो अलग-अलग अव*ारर्णाएं शाविमल हैं। पहला बेकब्Sा का है और दूसरा कब्Sे का अवरुद्ध हो+े संबं*ी है। बेकब्Sा का ात्पय: बेदखली है; इसमें एक ऐसी स्जिस्र्थीति शाविमल है Sहां विकसी व्यविX को दूसरे व्यविX क े कब्Sावा+ हो+े से उसक े कब्Sे से वंतिच कर विदया Sा ा है। बेकब्Sा का अर्थी: कब्Sा क े अति*कार से वंतिच कर+ा है Sो स्वैस्जिच्छक +हीं है और इसमें वि+ष्कास+ का काय: शाविमल है Sो उस व्यविX को विवस्र्थीाविप कर ा है सिSस का संपखित्त पर कब्Sा र्थीा। बेकब्Sा शब्द को ब्लैक लॉ तिर्डक्श+री151 में वि+म्+ा+ुसार परिरभाविष विकया गया है: “संपखित्त पर उतिच कब्Sे क े अति*कार से वंतिच कर+ा, या वि+ष्कास+; ऐसे व्यविX से Sो विवति* ः उसका हकदार हो भूविम छी++ा या कब्Sा रख+ा; वि+ष्कास+। 'अवरुद्ध हो+े' और 'बेकब्Sा' शब्द को पी रामा+ार्थी अय्यर क े एर्डवांस लॉ लेस्जिक्सकॉ+ 152 में परिरभाविष विकया गया है: "अवरुद्ध हो+े का अर्थी: है विक कब्Sे वाला व्यविX बाहर Sा ा है और उसक े पश्चा ् विकसी अन्य व्यविX द्वारा कब्Sा कर खिलया Sा ा है इसका ात्पय: यह है विक कब्Sे क े सभी संक े वापस ले खिलए गए हैं।” “बेदखली या वि+ष्कास+ का अर्थी: है विकसी सही माखिलक से भूविम का कब्Sा गल रीक े से ले ले+ा। बेदखली क े वल उ+ मामलों पर लागू 151 Black‘s Law Dictionary, Tenth Edition at p. 152 P Ramanantha Aiyar‘s Advanced Law Lexicon, Fifth Edition at pgs. 1537 and 1563 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हो ा है Sहां भूविम क े माखिलक को विकसी व्यविX क े काय: से, भूविम पर अप+े प्रभुत्व से या इसक े मु+ाफ े की प्राविप्त से पूरी रह से वंतिच विकया गया है । एक व्यविX को ब क अचल संपखित्त से वंतिच +हीं विकया Sा सक ा है सिSस समय क वह उसक े कब्Sे में हो।” बेदखली एक वि+तिश्च समय पर एक ऐसे व्यविX क े पहले से मौSूद कब्Sे की उप*ारर्णा कर ा है सिSसे बाद में बेदखल कर विदया गया हो। एक ऐसे को व्यविX सिSसक े पास कब्Sा + हो, उसे बेदखल +हीं कहा Sा सक ा है। दूसरी ओर अवरो*, कब्Sे को छोड़+े की *ारर्णा का प्र ीक है और कभी-कभी उस व्यविX क े स्वैस्जिच्छक काय: क े रूप में वर्भिर्ण विकया Sा ा है Sो अप+े स्वयं क े कब्Sे छोड़ विदया हो। Sी र्डब्ल्यू पेर्ट+153 +े "न्यायशास्त्र” पर अप+े महत्वपूर्ण: £ंर्थी में कहा है "विक अं£ेSी भाषा में अति*कांश शब्दों की रह, कब्Sा शब्द क े विवणिभन्न उपयोग और विवणिभन्न अर्थी: हो े हैं, Sो संदभ: और उपयोग क े आ*ार पर हो ा है।” लेखक हमें ब ा ा है विक “शब्द क े खिलए एक उपयुX, पूर्ण: अर्थी: की खोS का वि+ष्फल हो+ा संभाव्य है।” ब्लैक लॉ तिर्डक्श+री154 +े 'कब्Sा' शब्द को इस प्रकार परिरभाविष विकया है: "1. संपखित्त को अप+े अ*ी+ रख+े या *ारर्ण कर+े का थ्य; संपखित्त पर प्रभुत्व का प्रयोग।

2. वह अति*कार सिSसक े ह कोई अन्य सभी को छोड़कर विकसी चीS पर वि+यंत्रर्ण कर सक ा है; एक भौति क वस् ु क े अ+न्य उपयोग क े खिलए एक दावे का वि+रं र प्रयोग।” 153 G. W. Paton and David P. Derham, A Textbook of Jurisprudence, 3rd Edition, Oxford: Clarendon Press (1964) 154 Black‘s Law Dictionary, Tenth Edition at page 1351 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सुपरिंरर्टेंर्डेंर्ट एंर्ड रेमेम्बरेंस ऑफ लीगल अफ े यरप पतिश्चम बंगाल ब+ाम अवि+ल क ु मार भुंSा155 क े मामले में, इस न्यायालय +े कहा विक "कब्ज़ा एक बहुरूपी शब्द है” और इसखिलए, हर संदभ: में लागू हो+े वाले अर्थी: संभव +हीं। सालमंर्ड क े न्यायशास्त्र से सन्दभ: दे े हुए, न्यायालय +े कहा विक कब्Sे का अर्थी: एक अति*कार और एक थ्य है; संपखित्त क े अति*कार और वास् विवक इरादे क े थ्य से संलग्न आ+ंद का अति*कार। एक अव*ारर्णा क े रूप में कब्Sा का अर्थी: है- कब्Sा*ी+ वस् ु और कब्Sे का आशय। पहले में कब्Sे की वस् ु क े प्रयोग की शविX और ऐसी अपेक्षा क े आ*ार का अस्जिस् त्व है विक कब्Sे क े प्रयोग में हस् क्षेप +हीं होगा। दूसरे में कब्Sा की गयी वस् ु क े अन्य प्रयोग को सुलभ ब+ा+े की उप*ारर्णा है।

244. श्याम सुंदर प्रसाद ब+ाम राS पाल सिंसह156 क े मामले में, इस अदाल +े ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ क े माध्यम से बोल े हुए परिरसीमा अति*वि+यम 1908 क े अ+ुच्छेद 142 और 144 क े बीच विवस् ृ अं र स्पष्ट विकया। न्यायालय +े *ारिर विकया: "3... पुरा+े परिरसीमा अति*वि+यम क े अ*ी+ कब्Sे क े खिलए सभी वाद, चाहे वे हक क े आ*ार पर हों या विपछले कब्Sे क े आ*ार पर अ+ुच्छेद 142 द्वारा शासिस र्थीे, सिSसमें वादी क े कब्Sे में रह े हुए उसे बेदखल कर विदया गया र्थीा या अवरुद्ध कर विदया गया र्थीा। Sहां मामला वादी की बेदखली का या उसक े कब्Sा क े अवरुद्ध हो+े का + रह+े पर, अ+ुच्छेद 142 लागू +हीं हुआ। क े वल हक क े आ*ार पर वाद, + विक कब्Sा या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कब्Sा अवरुद्ध हो+े क े आ*ार पर, अ+ुच्छेद 144 द्वारा शासिस र्थीे Sब क विक वे विववि+र्मिदष्ट रूप से विकसी अन्य अ+ुच्छेदों द्वारा उपबंति* +हीं विकए गए हों। इसखिलए, अ+ुच्छेद 142 की प्रयोज्य ा क े खिलए, वाद क े वल स्वत्व क े आ*ार पर +हीं बस्जिल्क कब्Sे क े आ*ार पर भी हो।”

245. वाद को अ+ुच्छेद 142 की परिरति* क े भी र ला+े क े खिलए वि+म्+खिलखिख अपेक्षाएं पूरी हो+ी चाविहए: (i) वाद स्र्थीावर संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए हो+ा चाविहए; (ii) वादी को यह स्र्थीाविप कर+ा होगा विक उसका संपखित्त पर कब्Sा र्थीा; और (iii) संपखित्त क े कब्Sे में रह े हुए वादी को बेदखल कर विदया गया हो या कब्Sा अवरुद्ध हो गया हो। अ+ुच्छेद 142 को लागू हो+े क े खिलए, इ+ अपेक्षाओं को संचयी रूप से स्र्थीाविप विकया Sा+ा चाविहए।

246. वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर वाद में इस बा की उप*ारर्णा की गयी है विक Sन्मस्र्थीा+, सिSसे आम ौर पर S+मभूविम क े रूप में Sा+ा Sा ा है, Sो भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है " वि+म ही अखाड़ा का है और हमेशा वि+म ही अखाड़ा का र्थीा”, सिSस+े इसे "प्रबंति* विकया और चढ़ावा प्राप्त विकया।” वादी क े अ+ुसार, मंविदर ब से वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में है। मुकदमे में णिशकाय यह है विक *ारा 145 क े ह क ु क— क े आदेश क े परिरर्णामस्वरूप वादी गल रीक े से अप+े प्रबं*+ और मंविदर क े प्रभार से वंतिच कर विदया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गया और मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा मुस्जिस्लम पक्ष क े सार्थी विमलकर काय:वाही लंबे समय खींची गई। वि+म ही अखाड़ा प्रापक को प्रबं*+ और प्रभार से हर्टा+े और इसे वादी को दे+े क े खिलए प्रार्थी:+ा कर ा है। अवि+वाय: रूप से, दलील क े पैरा 2 में “संबंति* ” है और पैरा 4 में “कब्Sा” शब्द क े आ*ार पर ही वि+म ही अखाड़ा +े वाद को अ+ुच्छेद 142 (और इसखिलए, अवणिशष्ट अ+ुच्छेद 120 क े दायरे से बाहर) क े दायरे में ला+े की मांग की है।

247. विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+, Sो सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से प्रस् ु र्थीे, +े यह प्रदर्भिश कर+े क े खिलए एक श्रमसाध्य प्रयास विकया है विक क ै से वि+म ही अखाड़ा की ओर से दलीलों से परे Sा+े का साव*ा+ीपूव:क प्रयास विकया गया है और विवशेष रूप से अ+ु ोष Sो वाद में मांगा गया है, से खिलखिख कर्थी+ में वाद क े विवषय क्षेत्र को बढ़ाकर।

248. हमारे विवचार में, यह वाद 3 क े दायरे को वि+*ा:रिर विकया Sा+ा यह विदखा+े क े खिलए णिशक्षाप्रद होगा, विक क ै से खिलखिख कर्थी+ (काउंसिसल क े णिशल्प क े माध्यम से) वाद को परिरसीमा क े दायरे में ला+े क े खिलए इसकी प्रकृ ति को बदल+े का प्रयास कर ा है। पहले सिसद्धां क े रूप में, वाद को सम£ रूप से पढ़ा Sा+ा चाविहए। हालाँविक, यह वाद क े वादी को अपील में खिलखिख कर्थी+ क े आ*ार पर इसकी प्रक ृ ति को बदल+े क े खिलए अ+ुमति दे+े से काफी अलग है। क े वल सीपीसी क े आदेश VI वि+यम 17 क े ह एक संशो*+ द्वारा ही एक वाद की साम£ी में कोई परिरव:+ हो सक ा है। इसक े बSाय, Sैसा विक हम देखेंगे, खिलखिख कर्थी+ में वाद की साम£ी को +SरअंदाS कर+े का सरल mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रयास विकया गया है। यह अ+ुमन्य +हीं है। श्री एस क े Sै+, वाद 3 में वादी की ओर से पेश विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा +े अप+ी खिलखिख कर्थी+ क े पैरा 13 (र्डी) में वि+म्+खिलखिख क: विदया है: "(र्डी) वादी- वि+म ही अखाड़ा + क े वल संपखित्त क े स्वाविमत्व और कब्Sे का दावा कर रहा र्थीा अर्थीा: मुख्य मंविदर या आं रिरक कोर्ट:यार्ड:, बस्जिल्क "Sन्मस्र्थीा+” क े सार्थी-सार्थी भगवा+ राम चंˆ, लक्ष्मर्णSी, ह+ुमा+Sी और साखिल£ामSी की मूर्ति यों का प्रबं*क (सेवाय ) हो+े भी दावा कर रहा र्थीा।” (प्रभाव वर्ति* ) खिलखिख कर्थी+ क े पैरा 17 (Sे) में, यह कहा गया है: "(Sे) चूंविक संपखित्त को क ु क: कर विदया गया र्थीा और प्रापक क े अ*ी+ कर विदया गया र्थीा, अ ः न्यायालय क े खिलए यह आवश्यक है विक वह हक क े विवषय का विववि+तिश्च करे और न्यायवि+र्ण- करे और वाद को परिरसीमा द्वारा वर्जिS +हीं विकया Sा सक ा। संपखित्त को सही माखिलक को वापस कर+ा चाविहए और अ+न् समय क े खिलए विवति* अणिभरक्षा में +हीं रह सक ी। इसखिलए प्रापक से कब्Sे की प्राविप्त क े खिलए वाद में, परिरसीमा का सवाल कभी +हीं उठ सक ा है और इस रह क े वाद (sic) कभी भी परिरसीमा से बाध्य +हीं हो सक े हैं Sब क विक ऐसी संपखित्त कम से कम एक ऐसे व्यविX क े रूप में प्रापक क े ह + हो सिSससे कब्Sा खिलया गया र्थीा।” (प्रभाव वर्ति* ) विफर से, पैरा 18 (क े ) में, यह कहा गया है: "(क े ) चूंविक संपखित्त प्रापक क े वि+यंत्रर्ण में है, इसखिलए वास् विवक स्वामी द्वारा प्रापक द्वारा प्राप्त आय क े खिलए क े खिलए विफर भी वाद द्वारा दायर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sा सक ा है और इस रह क े वाद में, सिSसक े खिलए वादहे ुक ब ब+ ा है Sब कोई लाभ प्राप्त हो ा है,एक स वाद हे ुक ब+ ा है। प्राप्त लाभ क े हक क े विवषय का विववि+श्चय कर े समय स्वत्व क े प्रश्न का न्याय वि+र्ण:य+ कर+ा होगा और न्याय वि+र्ण:य+ पर प्रापक को वास् विवक स्वामी को कब्Sा दे+ा होगा। (i) एल्लप्पा +ाइक े + ब+ाम लक्ष्मर्ण +ाइक े + ए आई आर 1949 मˆास (ii) वेंकर्टविगरिर क े राSाब ब+ाम इस्कापल्ली सुब्बैया, आईएलआर 26 मˆास 410” (प्रभाव वर्ति* ) विफर, पैरा 18 (एम) में, यह कहा गया है: "(एम) वादी- वि+म ही अखाड़ा + क े वल संपखित्त क े स्वाविमत्व और कब्Sे का दावा कर रहा र्थीा अर्थीा: मुख्य मंविदर या आं रिरक कोर्ट:यार्ड:, बस्जिल्क "Sन्मस्र्थीा+” क े सार्थी-सार्थी भगवा+ राम चंˆ, लक्ष्मर्णSी, ह+ुमा+Sी और साखिल£ामSी की मूर्ति यों का प्रबं*क (सेवाय ) हो+े भी दावा कर रहा र्थीा। यह उ+ कारर्णों से भी कहा गया है सिSसे अदाल का समर्थी:+ विमला है विक वाद ओओएस +ंबर 5, 1989 परिरसीमा क े भी र है क्योंविक देव ा एक स्र्थीायी +ाबाखिलग है, वि+म ही अखाड़ा क े वाद को भी परिरसीमा द्वारा बाध्य +हीं मा+ा Sा सक ा।" (प्रभाव वर्ति* ) अं में, पैरा 18 में यह कहा गया है विक:

"18. वाद में वादी से "संबंति* ” संपखित्त का दावा दोहरे क: पर आ*ारिर है-(i) यह विक संपखित्त प्रबं*क/सेवाय की क्षम ा में वादी की है; और (ii) यह विक वादी के कब्Sे में हो+े के कारर्ण *ारा 110 साक्ष्य अति*वि+यम के मद्दे+Sर अति*कार प्राप्त हो ा है और कब्Sे में रह+े और

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sारी रख+े का हकदार है Sब क विक प्रति वादी वादी की ुल+ा में बेह र शीष:क +हीं विदखा सक ा है। (प्रभाव वर्ति* ) यह वाद में दी गयी दलील से पूरी रह णिभन्न है।

249. "संबंति* ” शब्द कला का शब्द +हीं है और इसकी विवषयवस् ु संदभ: क े अ+ुसार णिभन्न णिभन्न हो ी है। राSा मोहम्मद अमीर अहमद खा+ ब+ाम सी ापुर +गरपाखिलका बोर्ड: क े मामले में, इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ +े विवचार विकया विक क्या एक विकरायेदार द्वारा "उससे संबंति* ” पद का प्रयोग सरकार क े प्रत्याव:+ विह क े अस्वीकरर्ण क े खिलए विकया गया र्थीा। उस संदभ: में, न्यायमूर्ति ए+ राSगोपाल अयंगर +े ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ की ओर से *ारिर विकया: “24...यद्यविप विक “संबंति* ” पद पूर्ण: स्वाविमत्व का भाव व्यX कर+े में सक्षम है विफर भी उसी भाव क सीविम +हीं है। पूर्ण: स्वाविमत्व से कम विह *ारर्ण भी उस शब्द द्वारा व्यक हो सक ा है। वेबस्र्टर में “संबंति* ” शब्द को अन्य बा ों क े सार्थी सार्थी “स्वाविमत्व” और “कब्ज़ा” क े रूप में व्याख्यातिय विकया गया है। शब्द का सर्टीक अर्थी: क े वल दस् ावेज़ को सम£ रूप में पढ़कर और उस संदभ: में Sाकर ही पाया Sा सक ा है।” मामले क े थ्यों पर, यह कहा गया विक विकरायेदारी की परिरस्जिस्र्थीति यां दावे की प्रक ृ ति का वि+*ा:रर्ण कर+े क े खिलए सारवा+ र्थीीं। विकरायेदारी की उत्पखित्त वि+तिश्च रूप से ज्ञा +हीं र्थीी, पट्टेदार +े संरच+ाओं का वि+मा:र्ण विकया र्थीा और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलक ा: और उसक े पूव:S ी+ चौर्थीाई श ाब्दी से अति*क समय से संपखित्त का आ+ंद ले रहे र्थीे। अं रर्ण प्रभावी हुआ और संपखित्त विवरास का विवषय र्थीी। इस आशय का एक साव:Sवि+क दस् ावेS र्थीा विक यद्यविप यह सरकारी भूविम र्थीी, लेविक+ एक स्र्थीायी न्यायसंग और हस् ां रर्णीय अति*कार र्थीा। इस संदभ: में, यह कहा गया विक “संबंति* ” शब्द का उपयोग सरकार क े स्वत्व क े वि+राकरर्ण क े खिलए +हीं विकया गया र्थीा। इसी रह, न्यायालय +े कहा विक स्वामी शब्द का प्रयोग पूर्ण: अर्थीÂ में स्वाविमत्व को वि+रूविप +हीं कर ा ाविक वह विकरायेदारी क े त्याग या अस्वीकरर्ण क े बराबर हो Sाय: “25... यद्यविप अप+े संदभ: से हर्टाकर इ+ शब्दों का अर्थी: पूर्ण: स्वाविमत्व क े रूप में विकया Sा सक ा है, हमारे विवचार से उस स्जिस्र्थीति सिSसमें ये हो े हैं और अपीलार्थी- और उसक े पूव:Sों द्वारा इस संपखित्त क े उपभोग को ध्या+ में रखकर इसे पूर्ण: स्वाविमत्व क े वि+र्मिववाद दावे क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा विक वह इस रह की स्र्थीायी विकरायेदारी को Sब् कर+े क े खिलए पया:प्त हो। इस संबं* में यह देखा Sा सक ा है विक यह उपभोग सरकार की सहमति से ब ाया गया है। यविद दावे क े स्वामी क े रूप में सरकार क े अति*कारों क े विवरो* में एक पूर्ण: माखिलक क े रूप में समझा Sा ा र्थीा, ो इस रह क े उपभोग क े खिलए सरकार की सहमति का संदभ: पूरी रह से अ+ुतिच होगा। सहमति की प्रासंविगक ा क े वल भी होगी Sब सरकार का संपखित्त में विह होगा और इसखिलए, हम प्रस् र का अर्थी: स्र्थीायी, हस् ां रर्णीय और विवरास ी, विवशेष रूप से हस् ां रर्ण का अति*कार Sो +गरपाखिलका द्वारा अस्वीकार विकया Sा रहा र्थीा, को सरकार की सहमति से प्रयुX कहा गया। यह हमारे द्वारा यह कहे Sा+े का एक अति रिरX कारर्ण है विक, अति*क से अति*क, दावा विकरायेदारी Sब् कर+े क े खिलए वि+र्मिववाद +हीं र्थीा।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

250. स्वग-य +वाब सर मीर उस्मा+ अली खा+ ब+ाम वेल्र्थी र्टैक्स कविमश्नर क े मामले में, इस न्यायालय की दो न्याया*ीश पीठ +े पद का अर्थी: *+ कर अति*वि+यम 1957 की *ारा 2 (एम) में “मूल्यांक+ ति णिर्थी पर वि+*ा:रिर ी से संबंति* ” विकया। सिSस वै*ावि+क प्राव*ा+ की व्याख्या की Sा रही र्थीी, उसक े संदभ: में, इस न्यायालय +े यह मा+ा विक का+ू+ी अति*कार क े विब+ा क े वल कब्Sा संपखित्त को +ेर्ट वेल्र्थी पद क े अर्थी: क े भी र +हीं लाएगा,क्योंविक यह एक संपखित्त +हीं होगी Sो वि+*ा:रिर ी की है। न्यायालय +े राSा मोहम्मद क े वि+र्ण:य का सन्दभ: ले े हुए कहा विक यद्यविप संबंति* वाक्यांश एक पूर्ण: स्वत्व को वि+रूविप कर+े में सक्षम र्थीा, विफर भी यह उस अर्थी: को व्यX कर+े क सीविम +हीं र्थीा। मामले में,न्यायालय +े *ारिर विकया: “29... हम+े उ+ मामलों पर चचा: की है Sहां “संबंति* ” और “स्वाविमत्व” क े बीच विवभेद विकया गया है। वि+म्+खिलखिख थ्य उभर कर साम+े आ े हैं: (1) वि+*ा:रिर ी कब्Sे से अलग हो गया र्थीा Sो स्वाविमत्व का एक आवश्यक भाग है। (2) वि+*ा:रिर ी क े वल क्र े ा और वि+*ा:रिर ी से कब्Sा वापस ले+े क े खिलए अ+ति*क ृ र्थीा, Sब क विक स्वत्व क े दस् ावेS को वि+ष्पाविद +हीं विकया Sा ा है, दूसरों क े खिखलाफ कब्Sे क े खिलए मुकदमा कर+े का हकदार र्थीा अर्थीा: इस मामले में कब्Sेवा+ क्र े ा क े अलावा । वास् व में स्वत्व वि+*ा:रिर ी में वि+विह र्थीा। (3) क्र े ा विवक्र े ा क े विवरुद्ध उतिच कब्Sावा+ र्थीा (4) र्थीाविप, विवति*क हक विवक्र े ा का र्थीा (5) वि+*ा:रिर ी क े पास ऐसे अति*कारों की सम£ ा +हीं र्थीी सिSससे उसका स्वत्व ब+ ा हो बस्जिल्क इसका अंश र्थीा और एक महत्वपूर्ण: अंश।” र्डॉ. *व+ की सहाय ा से विदये गए इ+ दो+ों वि+र्ण:यों से संक े विमल ा है विक “संबंति* ” पद को संदभ: क े आ*ार पर अर्थी: विदया Sा+ा चाविहए। विकसी विदए 158 1986 Supp SCC 700 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गए संदभ: में, शब्द एक अर्थी: पूर्ण: स्वत्व कर सक े हैं लेविक+ अन्य थ्यात्मक स्जिस्र्थीति यों में शब्द क ु छ ऐसा व्यX कर सक ा है Sो पूर्ण: विह से कम हो।

251. व:मा+ मामले में, यह स्पष्ट है विक “संबंति* ” पद का प्रयोग वि+म ही अखाड़ा द्वारा क े वल प्रबं*+ और प्रभार क े संदभ: में विकया गया है। वि+म ही अखाड़ा का पूरा मामला *ारा 145 क े ह मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश द्वारा उसक े सेवाय ी अति*कारों से वंतिच कर+े का है। वि+म ही अखाड़ा का दावा राज्य क े खिखलाफ है ाविक वादी को देव ा को सेवाएं प्रदा+ कर+े क े सुखाति*कार कर+े में सक्षम ब+ाया Sा सक े । दूसरे शब्दों में वि+म ही अखाड़ा प्रबं*+ और प्रभार क े संदभ: में अ+ुषंविगक अति*कारों का दावा कर ा है। वास् व में, वाद 3 मांगी गये अ+ु ोष से सबसे महत्वपूर्ण: पहलू Sो उभर ा है वह “उX Sन्मभूविम मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार से पहले प्रति वादी को हर्टा+े और उसे वादी को दे+े क े खिलए तिर्डक्री है।” इसखिलए वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर विकया गया वाद 3 कब्Sे क े खिलए वाद +हीं है Sो अ+ुच्छेद 142 क े अर्थी: और दायरे में आ ा है।

252. वि+म ही अखाड़ा +े सेवाय हो+े का दावा कर े हुए वाद 3 संस्जिस्र्थी विकया है। स अपक ृ त्य mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

256. श्री एस क े Sै+ द्वारा वि+म ही अखाड़े की रफ से विकया गया आ£ह वैकस्जिल्पक क: Sो परिरसीमा अति*वि+यम 1908 की *ारा 23 क े प्राव*ा+ों पर आ*ारिर है। यह क: विदया गया है विक वि+म ही अखाड़े क े प्रबं*+ और प्रभार क े 'पूर्ण:' अति*कार क े वि+षे* या अवरो* स अपक ृ त्य है और *ारा 23 क े आ*ार पर प्रत्येक विद+ एक +या वाद हे ुक उत्पन्न हुआ। *ारा 23 इस प्रकार है: "23. उल्लंघ+ और अपक ृ त्यों को Sारी रख+ा - अ+ुबं* क े स उल्लंघ+ क े मामले में और अ+ुबं* से स अपक ृ त्य हो+े क े मामले में, अवति* क े समय में एक +ई परिरसीमा ऐसे प्रत्येक क्षर्ण पर प्रारम्भ हो Sा ी है सिSसक े दौरा+ उल्लंघ+ या अपक ृ त्य, Sैसा भी मामला हो, Sारी रह ा है।"

257. श्री एस. क े. Sै+ का क: है विक क ु क— क े आदेश पर Sन्मस्र्थीा+ मंविदर की संपखित्त से संबंति* अति*कारों क े सार्थी प्रभार और प्रबं*+ को हर्टा विदया गया है और ये वाद 3 क े विवषय वस् ु हैं। यह आ£ह विकया गया विक यह एक स अपक ृ त्य संस्जिस्र्थी कर ा है Sब क विक उन्हें बहाल +हीं विकया Sा ा। इस संदभ: में, सर सेठ हुक ु म चंद ब+ाम महाराS बहादुर सिंसह163 में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य पर क: क े समर्थी:+ में अवलम्ब खिलया गया है विक प्रार्थी:+ा और पूSा में अवरो* एक स अपक ृ त्य है। क: यह है विक वादीगर्णों का अवरो* भोग और प्रार्थी:+ाओं को स्व ंत्र रूप से प्रबंति* कर+े का अति*कार एक प्राप की वि+युविX क े परिरर्णामस्वरूप *ारा 23 क े अर्थी: क े ह स अपक ृ त्य है और इसखिलए अवरो* का प्रत्येक काय: एक +वी+ हे ुक और परिरसीमा क े खिलए एक +या प्रारंणिभक हिंबदु प्रदा+ कर ा है। 163 (1933) 38 LW 306 (PC) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

258. हुक ु म चंद क े वि+र्ण:य में पारस+ार्थी पहाड़ी की पूSा क े अति*कार को लेकर श्वे ाम्बरी और विदगंबरी Sै+ संप्रदायों क े बीच प्रति वाद शाविमल र्थीा। श्वे ाम्बरों +े पहाड़ी में पालगंS क े राSा का माखिलका+ा हक खरीदकर अति*गृही कर खिलया। उन्हों+े मंविदर क े अन्य कम:चारिरयों क े खिलए *म:शालाओं क े वि+मा:र्ण क े अलावा चौकीदार क े खिलए पहाड़ी क े ऊपर आवास का वि+मा:र्ण प्रारम्भ विकया। विदगंबरों +े श्वे ाम्बरों क े विवरूद्ध यह दावा कर े हुए इस पर आपखित्त S ाई सिSन्हों+े वाद संस्जिस्र्थी विकया विक संपूर्ण: पहाड़ी पविवत्र र्थीी। पुरा+े पविवत्र स्र्थीा+ों में चरर्ण र्थीे सिS+में सन् ों क े पदतिच-ों की छाप र्थीी और उ+में कमलाक ृ ति र्थीी। श्वे ाम्बरों +े चरर्ण का एक अन्य रूप विवकसिस विकया सिSसका विवरो* विदगम्बरों +े विकया सिSन्हों+े इसे मा+व शरीर क े एक अलग विहस्से क े रूप में पूSा कर+े से इ+कार कर विदया र्थीा। दो+ों अ*ी+स्र्थी न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया विक मंविदरों में चरर्णों को रख+े का काय: गल र्थीा सिSसक े संबं* में विदगम्बरी णिशकाय कर+े क े हकदार र्थीे। विप्रवी काउंसिसल क े समक्ष उठ+े वाले प्रश्नों में से एक अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश क े वि+ष्कष: क े संबं* में र्थीा विक विदगंबरों द्वारा विकया गया मुकदमा परिरसीविम र्थीा। उस संदभ: में, विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य को सु+ा े हुए सर Sॉ+ वाखिलस +े यह अव*ारिर विकया विक: "Sहां क परिरसीमा का संबं* है, अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश +े अपया:प्त आ*ारों पर मा+ा है विक छह वष: क े भी र विकए गए कायÂ की णिशकाय की गई र्थीी ाविक दावे का यह भाग अ+ुच्छेद 120 द्वारा वर्जिS + की Sा सक े, परन् ु उन्हों+े यह भी अव*ारिर विकया विक उस अ+ुच्छेद क े ह वS:+ +हीं लगाई Sा सक ी क्योंविक यह स अपक ृ त्य र्थीा, सिSसक े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कारर्ण परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 23 क े ह अवति* क े समय में एक +ई परिरसीमा ऐसे प्रत्येक क्षर्ण पर प्रारम्भ हो Sा ी है सिSसक े दौरा+ अपक ृ त्य Sारी रह ा है। दूसरी ओर उच्च न्यायालय की राय र्थीी विक यह स अपक ृ त्य +हीं र्थीा और अ+ुच्छेद 120 क े ह दावा वर्जिS र्थीा। उ+क े लॉर्ड:णिशप की राय में अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश यह अव*ारिर कर+े में सही र्थीे विक सिS+ कायÂ की णिशकाय की गई र्थीी वे स अपक ृ त्य र्थीे और परिरर्णामस्वरूप यह दावे का यह भाग वर्जिS +हीं है।क ृ वित्रम रूप से Sल *ारा को मोड़+े और वादी की वि+चली पड़ी भूविम की Sल आपूर्ति को कार्ट+े क े इस प्रश्न को राSरूप कौर ब+ाम अबुल हुसै+ [(1880) आई.एल.आर 6 कलकत्ता 394: एल.आर. 7 आई.ए. 240] मामले में इस बोर्ड: क े वि+र्ण:य द्वारा शाविमल विकया गया है।"

259. उपयु:X उद्धरर्ण क े क: क े समर्थी:+ में अवलम्ब खिलया गया है विक पूSा क े अति*कार से वंतिच कर+ा स अपक ृ त्य है। गौर लब है विक विप्रवी काउंसिसल +े महारा+ी राSरूप कौर ब+ाम सैयद अब्दुल हुसै+164 क े अप+े पूव: क े फ ै सले पर अवलम्ब खिलया सिSसमें वादीगर्णों से संबंति* भूविम की Sलापूर्ति को कार्टकर क ृ वित्रम Sल-*ारा का अति*कार शाविमल विकया गया र्थीा। विप्रवी काउंसिसल +े महारा+ी राSरूप कौर मामले में सर मोंर्टेग ई स्जिस्मर्थी क े माध्यम से कह े हुए यह अव*ारिर विकया विक वादी का Sल प्रवाह में हस् क्षेप अवरो*ों को Sारी रख+े की प्रक ृ ति में र्थीा: "यविद न्याया*ीशों का म लब वास् व में ऊपरोX अ+ुच्छेद 34 की परिरसीमा को लागू कर+े क े खिलए है ो उ+का वि+र्ण:य स्पष्ट रूप से गल है; सिS+ अवरो*ों क े खिलए वादी क े महल में Sलप्रवाह में अवरो* विकया गया र्थीा वह वि+रं र बा*ा की प्रक ृ ति में र्थीे, Sो विक वाद हे ुक विद+ प्रति विद+ +वी+ीकरर्ण विकया गया र्थीा Sब क विक इस रह क े हस् क्षेप क े कारर्ण अवरो*ों को Sारी रख+े की अ+ुमति दी गई र्थीी। वास् व में क़ा+ू+ की *ारा 24 में इस आशय का स्पष्ट प्राव*ा+ है।" 164 (1879-80) 7 IA 240 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

260. प्रत्येक मामले में शाविमल थ्यात्मक संदभ: क े आ*ार पर, इस न्यायालय क े वि+र्ण:यों क े माध्यम से स अपक ृ त्य का गठ+ कर+े की *ारर्णा विवकसिस हुई है। विबहार राज्य ब+ाम देवकर+ +ेन्शी165 में दो न्याया*ीशों का वि+र्ण:य खदा+ अति*वि+यम 1952 की *ारा 66 और 79 क े प्राव*ा+ों क े सार्थी विवचार विकया है। *ारा 66 रिरर्ट+: दाखिखल कर+े क े खिलए Sुमा:+े का उपबं* कर ी है Sो 1000/- रुपए क हो सक ी है। हालाँविक, *ारा 79 में वि+*ा:रिर है विक कोई भी न्यायालय विकसी भी अपरा* का संज्ञा+ +हीं लेगी Sब क विक कणिर्थी अपरा* हो+े की ति णिर्थी से छह माह क े भी र या सिSस विद+ कणिर्थी अपरा* वि+रीक्षक क े संज्ञा+ में आया र्थीा उस ति णिर्थी से छह माह क े भी र, Sो भी बाद में हो, णिशकाय दS: +हीं की Sा ी है। हालांविक, स्पष्टीकरर्ण यह वि+*ा:रिर कर ा है विक यविद अपरा* एक स अपरा* है ो परिरसीमा की परिरकल+ प्रत्येक समय विबन्दु क े संदभ: में की Sाएगी सिSसक े दौरा+ अपरा* हो+ा Sारी रहा। विववि+यम+ 3 क े ह, विपछले वष: में वार्मिषक रिरर्ट+: प्रत्येक वष: S+वरी क े इक्कीस विद+ पूव: या उससे पहले दायर कर+े की आवश्यक ा र्थीी। परिरसीमा क े प्रश्न से वि+पर्ट े हुए इस न्यायालय +े विवचार विकया विक क्या रिरर्ट+: दाखिखल कर+े में विवफल ा से Sुड़ा अपरा* *ारा 79 क े मूल भाग द्वारा शाविमल विकया गया है (सिSस मामले में णिशकाय का समय वर्जिS र्थीा) या स्पष्टीकरर्ण द्वारा एक स अपरा* शाविमल है। न्यायमूर्ति Sे. एम. शेल +े पीठ क े खिलए अवलोक+ कर े हुए कहा विक: “5. स अपरा* वह है Sो वि+रं र ा क े खिलए संवेद+शील और प्रभेद्य है Sो एक बार और प्रत्येक क े खिलए प्रति बद्ध है। यह उ+ अपरा*ों में से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एक है Sो विकसी वि+यम या इसकी आवश्यक ा का अ+ुपाल+ कर+े या आज्ञा का पाल+ कर+े में विवफल ा से उत्पन्न हो ा है और सिSसमें Sुमा:+ा शाविमल हो ा है, सिSसक े खिलए दातियत्व ब क Sारी रह ा है Sब क विक वि+यम या इसकी आवश्यक ा का पाल+ अर्थीवा अ+ुपाल+ +हीं विकया Sा ा है। प्रत्येक अवसर पर विक इस रह की अवज्ञा अर्थी+ा गैर-अ+ुपाल+ हो ा है और विफर से अपरा* कारिर हो ा है। दो प्रकार क े अपरा*ों क े बीच का अं र काय: अर्थीवा विवलोप+ क े बीच हो ा है Sो एक बार और प्रत्येक क े खिलए एक अपरा* ब+ ा है और काय: अर्थीवा चूक Sो स हो ा रह ा है और इसखिलए प्रत्येक अवसर पर एक +या अपरा* हो ा है सिSस पर यह Sारी रह ा है।" न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक संबंति* वष: क े 21 S+वरी या उससे पूव: वार्मिषक रिरर्ट+: दाखिखल कर+े में विवफल ा पर उल्लंघ+ हुआ और उस विद+ क स्वामी पूर्ण: वार्मिषक रिरर्ट+: प्रस् ु कर+े में विवफल हो गया र्थीा। न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक यह प्राव*ा+ वि+*ा:रिर +हीं कर ा है विक स्वामी अर्थीवा प्रबं*क दोषी होगा यविद वह रिरर्ट+: प्रस् ु विकए विब+ा खदा+ को Sारी रख ा है या यह अपरा* ब क Sारी रह ा है Sब क विक विववि+यम+ 3 की आवश्यक ा का अ+ुपाल+ +हीं विकया Sा ा है। दूसरे शब्दों में: "9....Sैसे विक विकसी स्र्थीा+ीय वि+काय क े उप-वि+यम क े उल्लंघ+ में एक दीवार क े वि+मा:र्ण क े मामले में अपरा* विकसी एक और प्रत्येक क े खिलए इस रह का वि+मा:र्ण शीघ्र ही पूर्ण: हो Sाएगा Sो विक वि+*ा:रिर ति णिर्थी क रिरर्ट+: प्रस् ु कर+े में एक तिर्डफ़ॉल्र्ट हो ा है।"

261. संपखित्त कर आयुX अमृ सर ब+ाम सुरेश सेठ166 क े मामले में इस न्यायालय क े दो न्याया*ीशों का अन्य वि+र्ण:य संपखित्त कर अति*वि+यम क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उपबं*ों पर आ*ारिर र्थीा। *ारा 18(1)(ए) में विब+ा उतिच कारर्ण क े क ु ल संपखित्त का रिरर्ट+: दाखिखल कर+े में विवफल ा क े खिलए Sुमा:+ा लगा+े का प्राव*ा+ विकया गया। इस न्यायालय क े समक्ष मुद्दा यह र्थीा विक क्या रिरर्ट+: राणिशयों को दाखिखल कर+े में तिर्डफ़ॉल्र्ट एक स अपक ृ त्य है। न्यायमूर्ति ई एस वेंकर्टरमैय्या ( ब मुख्य न्याया*ीश क े रूप में र्थीे) +े इस न्यायालय में यह कहा विक: "11 का+ू+ में एक दातियत्व आम ौर पर आयोग क े काय: या विवलोप+ क े काय: से उद्भू हो ा है। Sब कोई व्यविX एक काय: कर ा है ो Sो का+ू+ उसे ऐसा कर+े से रोक ा है और उसे यह कर+े क े खिलए Sुमा:+ा दे ा है उसे आयोग का एक काय: कर+े क े खिलए कहा Sा ा है Sो का+ू+ की +Sर में गल है। इसी प्रकार, Sब कोई व्यविX ऐसा काय: कर+े क े खिलए छोड़ दे ा है Sो का+ू+ द्वारा उसक े द्वारा विकया Sा+ा आवश्यक है और इस रह क े विवलोप+ क े खिलए Sुमा:+ा दे ा है ो उसे कहा Sा ा है विक उस+े विवलोप+ का काय: विकया है Sो का+ू+ की +Sर में भी गल है। सामान्य ः एक गल काय: या का+ू+ द्वारा अपेतिक्ष काय: को कर+े में विवफल ा, काय: कर+े या विवलोप+ एक पूर्ण: काय: ब+ Sा ा है, Sैसा मामला हो और Sैसे ही पूव: मामले में गल काय: विकया Sा ा है Sब विकसी काय: को कर+े क े खिलए का+ू+ द्वारा वि+*ा:रिर समय बाद क े मामले में समाप्त हो Sा ा है और काय: कर+े या विवलोप+ क े काय: को पूर्ण: हो+े क े बाद उत्पन्न हो+े वाला दातियत्व बढ़ Sा ा है।" इस न्यायालय +े एक स अपक ृ त्य और गल ी या तिर्डफ़ॉल्र्ट क े बीच अं र विकया Sो वि+म्+खिलखिख अवलोक+ों में प्रति बद्ध हो+े पर पूर्ण: हो Sा ा है: "11... स अपक ृ त्य की विवणिशष्ट प्रक ृ ति यह है विक सिSस का+ू+ का उल्लंघ+ विकया Sा ा है वह अपक ृ त्य कर+े वाले को स दंर्ड क े खिलए उत्तरदायी ब+ा ा है। कोई तिर्डफ़ॉल्र्ट Sो पूर्ण: हो गया है लेविक+ सिSसका mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रभाव उसक े पूर्ण: हो+े क े बाद भी महसूस विकया Sा सक ा है, हालांविक वह स अपक ृ त्य या तिर्डफ़ॉल्र्ट +हीं है।" संविवति* क े प्राव*ा+ों से वि+पर्ट े हुए इस न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक तिर्डफ़ॉल्र्ट क े वल वही है Sो रिरर्ट+: दाखिखल कर+े की अंति म ति णिर्थी की समाविप्त पर हो ा है और यह स अपक ृ त्य +हीं है। परिरर्णामस्वरूप, तिर्डफ़ॉल्र्ट प्रत्येक विद+ कार:वाई क े एक +ए कारर्ण को Sन्म +हीं दे ा है। वि+म्+खिलखिख उद्धरर्ण में स अपक ृ त्यों क े तिचत्रर्ण में संक े दे े हुए न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया: "17. वास् विवक सिसद्धां यह दर्भिश होगा विक Sहां पर गल णिशकाय सकारात्मक क:व्य कर+े क े लोप से सम्बस्जिन्* है सिSसमें विकसी व्यविX से वि+तिश्च काय: कर+े कर+े की अपेक्षा की Sा ी है ाविक यह Sांच की Sा सक े विक क्या यह गल णिशकाय लगा ार की Sा रही र्थीी, प्रश्नग क:व्य उससे यह काय: कर+े की अपेक्षा कर ा है। परिरसर को अच्छे रखरखाव क े खिलए प्रसंविवदा का उल्लंघ+, स गारंर्टी का उल्लंघ+, रास् े क े अति*कार में बा*ा, पा+ी क े अबाति* Sल प्रवाह क े खिलए विकसी व्यविX क े अति*कार में बा*ा, विकसी व्यविX द्वारा अप+ी पत्+ी और बच्चों को संभाल+े से इ+कार कर+ा सिSसे वह का+ू+ क े ह संभाल+े क े खिलए बाध्य है और ख++ कायÂ या विकसी कारखा+े को चला+े क े खिलए काय: कर+े वालों की सुरक्षा और भलाई क े खिलए विकए गए उपायों का अ+ुपाल+ विकए विब+ा +ागरिरक या आपराति*क दातियत्व को Sन्म दे+े वाले उल्लंघ+ों या गलति यों को Sारी रख+े क े उदाहरर्ण हो सक े हैं, विद+- प्रति विद+ Sैसा विक मामला हो सक ा है।" इस न्यायालय क े दृविष्टकोर्ण में, *ारा 18(1)(ए) में उसिल्लखिख विकसी भी काय: का + कर+ा एकल उल्लंघ+ और एक ही दंर्ड को को Sन्म दे ा है, सिSसका माप हालांविक वह ति णिर्थी सिSस पर रिरर्ट+: दाखिखल विकया Sा+ा है और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिSस ति णिर्थी को यह वास् व में दाखिखल विकया गया है उसक े बीच क े समय अं राल से संबंति* है।

262. एक अन्य राSस्व संविवति* का प्राव*ा+ आयकर अति*वि+यम 1961 माया रा+ी पुंS ब+ाम सीआईर्टी167 में इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की पीठ क े समक्ष विवचार क े खिलए प्रस् ु हुआ र्थीा। इस मामले में, आयकर अति*वि+यम 1961 की *ारा 271 (1)(ए) में रिरर्ट+: दाखिखल कर+े में विवलम्ब क े खिलए Sुमा:+े का प्राव*ा+ र्थीा। Sुमा:+ा + क े वल प्रर्थीम तिर्डफ़ॉल्र्ट क े खिलए अति*रोविप विकया Sा सक ा र्थीा, बस्जिल्क Sब क तिर्डफ़ॉल्र्ट Sारी रहा। कर वि+*ा:रिर ी +े वि+य ति णिर्थी क े सा माह से अति*क समय बाद अप+ा रिरर्ट+: दाखिखल विकया। ी+ न्याया*ीशों की पीठ +े सुरेश सेठ क े वि+र्ण:य को खारिरS कर विदया। न्यायमूर्ति सब्यसाची मुखS- ( ब विवद्व मुख्य न्याया*ीश क े रूप में र्थीे) +े अव*ारिर विकया विक तिर्डफ़ॉल्र्ट ब क Sारी रहा Sब क विक रिरर्ट+: दाखिखल +हीं विकया गया र्थीा और इसखिलए यह स अपक ृ त्य र्थीा: "19. Sुमा:+ा अति*रोविप कर+े का प्राव*ा+ प्रर्थीम तिर्डफ़ॉल्र्ट क सीविम +हीं है परन् ु स तिर्डफ़ॉल्र्ट का संदभ: स्पष्ट रूप से इस आ*ार पर है विक रिरर्ट+: ब+ा+े क े दातियत्व क े सार्थी गैर-अ+ुपाल+ एक उल्लंघ+ है Sब क विक तिर्डफ़ॉल्र्ट Sारी रहा। का+ू+ की मंSूरी क े विब+ा तिर्डफ़ॉल्र्ट आचरर्ण क े संदभ: में कोई Sुमा:+ा अति*रोविप कर+े योग्य +हीं है। वह स्जिस्र्थीति Sो + क े वल पहली चूक क े खिलए बस्जिल्क Sब क चूक हो ी रह ी है, ब क Sुमा:+ा लगाया Sा सक ा है और इस रह क े दंर्ड की गर्ण+ा मासिसक आ*ार पर वि+*ा:रिर दर से की Sा+ी चाविहए, यह सुस्पष्ट शब्दों में विव*ायी मंशा का संक े है विक Sब क मूल्यांक+ +हीं हो ा है ब क का+ू+ की आवश्यक ाओं का अ+ुपाल+ वह उल्लंघ+ क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sारी रह ा है और का+ू+ द्वारा प्रदा+ विकए गए दंर्ड क े खिलए खुद को उSागर कर ा है।"

263. सेवा न्यायशास्त्र क े संदभ: में स अपक ृ त्य क े सिसद्धां का प्रयोग भार संघ ब+ाम रसेम सिंसह168 में इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की पीठ क े समक्ष आया। उस मामले में, प्रत्यर्थी- को +वंबर 1983 में तिचविकत्सीय आ*ार पर भार ीय से+ा से बाहर कर विदया गया र्थीा। उन्हों+े वष: 1999 में विवकलांग ा पेंश+ की मांग कर े हुए उच्च न्यायालय का दरवाSा खर्टखर्टाया। उच्च न्यायालय +े विवकलांग ा पेंश+ क े भुग ा+ क े खिलए एक परमादेश Sारी विकया, परन् ु रिरर्ट यातिचका संस्जिस्र्थी हो+े से पूव: इसे 38 माह की अवति* क सीविम कर विदया। हालांविक प्रत्यर्थी- का दावा र्थीा विक विवकलांग ा पेंश+ +वंबर 1983 से प्रभावी हो+ी चाविहए, सिSसे लेर्टस: पेर्टेंर्ट अपील में उच्च न्यायालय की तिर्डवीS+ बेंच द्वारा अ+ुमति दी गई र्थीी। उच्च न्यायालय की तिर्डवीS+ बेंच क े उपरोX वि+र्ण:य क े खिलए इस न्यायालय क े समक्ष चु+ौ ी में दो न्याया*ीशों की पीठ क े खिलए न्यायमूर्ति आर. वी. रवीन्ˆ+ +े कहा विक इस सिसद्धां पर विकसी विवलस्जिम्ब सेवा का दावा अति विवलम्ब क े आ*ार पर खारिरS कर+े क े खिलए उत्तरदायी है और स अपक ृ त्य क े संबं* में एक अपवाद है।हालांविक, अपवाद का एक अन्य अपवाद है Sहां णिशकाय एक वि+र्ण:य क े संबं* में है Sो प्रति क ू खिल सेवा में दूसरों को प्रभाविव कर+े क े खिलए उत्तरदायी है। न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया विक:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "7. संक्षेप में, सामान्य ः एक विवलस्जिम्ब सेवा से संबंति* दावे को अति विवलम्ब (Sहां रिरर्ट यातिचका दायर करक े उपचार की मांग की Sा ी है) या सीमा (Sहां प्रशासवि+क न्यायाति*करर्ण को एक आवेद+ द्वारा उपचार की मांग की Sा ी है) क े आ*ार पर खारिरS कर विदया Sाएगा। उX वि+यम क े अपवाद स अपक ृ त्य से संबंति* मामले हैं। Sहां सेवा-संबंति* दावा स अपक ृ त्य पर आ*ारिर हो ा है ो राह दी Sा सक ी है, भले ही उपचार की माँग कर े हुए दीघ: विवलम्ब हुआ हो, उस ारीख क े संदभ: में सिSस पर स अपक ृ त्य प्रारम्भ हुआ हो, यविद इस प्रकार का स अपक ृ त्य क्षति का वि+रं र स्रो ब+ा ा है। परन् ु अपवाद क े खिलए एक अपवाद है। यविद णिशकाय विकसी आदेश या प्रशासवि+क वि+र्ण:य क े संबं* में है Sो कई अन्य लोगों से भी संबंति* या प्रभाविव हो ा है, और यविद मुद्दे को विफर से खोल+े से ीसरे पक्षकारों क े व्यवस्जिस्र्थी अति*कारों को प्रभाविव विकया Sाएगा ो दावे पर विवचार +हीं विकया Sाएगा। उदाहरर्णार्थी:, यविद मुद्दा वे + या पेंश+ क े भुग ा+ या पु+र्मि+*ा:रर्ण से संबंति* है, ो विवलम्ब क े बावSूद भी राह दी Sा सक ी है क्योंविक यह ीसरे पक्षकारों क े अति*कारों को प्रभाविव +हीं कर ा है। परन् ु यविद दावे में वरिरष्ठ ा अर्थीवा पदोन्नति इत्याविद से संबंति* मुद्दे शाविमल हैं ो अन्य को प्रभाविव कर े हुए विवलम्ब क े पुरा+े दावे को प्रस् ु करेगा और अति विवलम्ब/सीमा क े सिसद्धां को लागू विकया Sाएगा। Sहाँ क पूव: की अवति* क े खिलए बकाए की प्राविप्त क े परिरर्णामी राह का संबं* है, आव -/क्रविमक अपक ृ त्यों से संबंति* सिसद्धां लागू होंगे।" अपील में उच्च न्यायालय को रिरर्ट यातिचका संस्जिस्र्थी हो+े से ी+ साल पहले भुग ा+ क े खिलए बकाया का भुग ा+ कर+े का वि+द†श दे+े में न्यायसंग +हीं ठहराया गया र्थीा।

264. उपरोX कई वि+र्ण:यों +े बालक ृ ष्र्ण सावलराम पुSारी वाघमारे ब+ाम श्री ध्या+ेश्वर महाराS संस्र्थीा+169 में ी+ न्याया*ीशों की पीठ क े वि+र्ण:य को 169 1959 Supp (2) SCR 476 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सन्दर्भिभ विकया है। अपीलार्भिर्थीयों +े एक *ार्मिमक संस्र्थीा में पै ृक उपासकों क े अति*कारों का दावा विकया और यह विक मंविदर और मंविदर की पूSा सविह इसक े मामलों का प्रबं*+ उ+क े पूव:Sों क े कब्Sे में र्थीा। न्यासिसयों +े कदाचार क े कारर्ण क ु छ पुSारिरयों को हर्टा विदया। इस बीच वष: 1922 में, पुSारिरयों +े मंविदर पर Sबर+ कब्Sा कर खिलया। न्यासिसयों +े एक वाद दायर की सिSसका परिरर्णाम एक तिर्डक्री र्थीी। तिर्डक्री क े वि+ष्पाद+ में मंविदर का कब्ज़ा प्राप्त विकया गया। बाद में, पुSारिरयों +े *ार्मिमक संस्र्थीा+ क े ह पै ृक अति*कारों का दावा कर े हुए एक वाद स्र्थीाविप की। वाद में तिर्डक्री से उद्भू एक अपील में उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 120 को लागू विकया गया र्थीा और अ+ुच्छेद द्वारा विवविह छह वष: की अवति* क े पहले वाद को खारिरS कर विदया गया र्थीा। इस न्यायालय क े समक्ष अपील में यह आ£ह विकया गया र्थीा विक अ+ुच्छेद 120 क े ह वाद वर्जिS +हीं विकया गया र्थीा क्योंविक परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 23 लागू हो ी है, न्यासिसयों का प्रर्णाली स अपक ृ त्य है। इस क: पर विवचार कर े हुए न्यायमूर्ति पीबी गSेन्ˆगर्डकर ( ब विवद्वा+ मुख्य न्याया*ीश क े रूप में र्थीे) द्वारा अव*ारिर विकया गया: "31.... इस क: से वि+पर्ट+े क े खिलए यह ध्या+ रख+ा आवश्यक है विक *ारा 23 स अति*कार का +हीं बस्जिल्क स अपक ृ त्य का वि+द†श कर ी है। यह स अपक ृ त्य का सार है विक यह एक ऐसा काय: है Sो क्षति का वि+रं र स्रो ब+ा ा है और उX क्षति की वि+रं र ा क े खिलए सिSम्मेदार और उत्तरदायी काय: क े क ा: का प्रति पाद+ कर ा है। यविद अ+ुतिच काय: Sो पूर्ण: हो गया है वह क्षति का कारर्ण ब+ ा है ो कु छ भी अ+ुतिच +हीं है, भले ही काय: से उत्पन्न क्षति स रह सक ी है। हालांविक, यविद एक अ+ुतिच काय: इस रह की प्रक ृ ति का है विक इसक े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कारर्ण हुई क्षति स्वयं Sारी है ो वह काय: स अपक ृ त्य का गठ+ कर ी है। इस संबं* में अ+ुतिच काय: क े कारर्ण हुई क्षति क े बीच अं र कर+ा आवश्यक है और सिSसे उX क्षति क े प्रभाव क े रूप में वर्भिर्ण विकया Sा सक ा है। यह क े वल उ+ क ृ त्यों क े संबं* में है सिSन्हें उतिच रूप से स अपक ृ त्य मा+ा Sा सक ा है विक *ारा 23 को लागू विकया Sा सक ा है।"

265. इस न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक अपीलार्थी-गर्णों क े कणिर्थी अति*कारों को पै ृक पुSारिरयों क े रूप में और 1922 क े वाद में उ+से कब्Sे का दावा कर+े और प्राप्त कर+े में न्यासिसयों क े काय: को स अपकृ त्य +हीं ठहराया Sा सक ा है। न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक न्यासिसयों द्वारा प्राप्त तिर्डक्री +े अपीलार्थी-गर्णों क े अति*कारों को प्रभावी ढंग से और पूर्ण: रूप से क्षति पहुँची है, हालांविक क्षति बाद में भी Sारी रही हो। तिर्डक्री क े वि+ष्पाद+ पर, अपीलार्थी-गर्णों क े अति*कार विवफल हो गए र्थीे और हालांविक उ+की बेदखली Sारी रही, परन् ु इसे स अपक ृ त्य +हीं मा+ा गया। उस संदभ: में न्यायालय +े वि+म्+खिलखिख उल्लेख विकया: “हमारे विवचार से इसमें कोई संदेह +हीं है विक Sहां अ+ुतिच काय: की णिशकाय बेदखली क े बराबर हो ी है, वहां परिरर्णामी क्षति बेदखली की ति णिर्थी पर पूर्ण: हो Sा ी है और इसखिलए ऐसे मामले में *ारा 23 क े आवेद+ की कोई गुंSाइश +हीं होगी। यही वह दृविष्टकोर्ण है सिSसे उच्च न्यायालय +े खिलया है और हमें इससे अलग हो+े का कोई कारर्ण +हीं विदख ा है।" इस न्यायालय +े महारा+ी राSरूप कौर ब+ाम सैयद अब्दुल हुसै+170 में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य को इस आ*ार पर प्रति विष्ठ विकया विक यह एक 170 (1879-80) 7 IA 240 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ऐसा मामला र्थीा Sहां Sल-प्रवाह क े कारर्ण वि+रं र बा*ा ब+ी रह ी र्थीी। इसी प्रकार, सर सेठ हुक ु म चंद ब+ाम महाराS बहादुर सिंसह171 क े वि+र्ण:य +े महारा+ी राSरूप कौर क े मामले में पूव: क े वि+र्ण:य पर अवलम्ब खिलया। वि+र्ण:य का अं र स्पष्ट कर े हुए इस न्यायालय +े अव*ारिर विकया वह काय: Sो आक्षेविप र्थीी वह वादीगर्णों क े वि+ष्कास+ या पूर्ण: बेदखली क े बराबर +हीं र्थीी।

266. Sैसा विक इस न्यायालय द्वारा अव*ारिर बालक ृ ष्र्ण सांवलराम मामले में स अपक ृ त्य एक ऐसा काय: है Sो क्षति का वि+रं र स्रो ब+ा ा है। यह क्षति की वि+रं र ा क े खिलए काय: कर+े वाले को उत्तरदायी ब+ा ा है। हालांविक, व:मा+ मामले की रह Sहां एक अपक ृ त्य बेदखली क े खिलए हो ा है, परिरर्णामी क्षति बेदखली की ति णिर्थी पर ही पूर्ण: हो Sा ी है। एक तिर्डफ़ॉल्र्ट सिSसक े परिरर्णामस्वरूप क्षति पूर्ण: हो Sा ी है वह स अपकृ त्य या चूक +हीं है भले ही इसक े पूर्ण: हो+े क े बावSूद इसका प्रभाव महसूस विकया Sा ा है।

267. वि+म ही अखाड़ा का क: स अपक ृ त्य की परिरसीमा की दलील क े बचाव क े सिसद्धां पर आ*ारिर है। क: का मूल्यांक+ कर+े में, विवति*क क्षति क े स्रो और क्षति क े प्रभाव क े बीच एक अं र विकया Sा+ा चाविहए। एक विवति*क क्षति का स्रो विकसी दातियत्व क े उल्लंघ+ में स्र्थीाविप विकया गया है। Sहां विवति*, समझौ ा या अन्यर्थीा काय: Sारी रख+े या विकसी विवशेष रीक े से काय: कर+े से रोक+े क े खिलए अति*रोविप विकया Sा ा है वहाँ स अपकृ त्य उत्पन्न हो ा है। इस रह क े दातियत्व का उल्लंघ+ एकल पूर्ण: अति*वि+यम या लोप से परे है। उल्लंघ+ एक वि+रं र प्रक ृ ति का है, एक विवति*क क्षति का 171 (1933) 38 LW 306 (PC) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रारम्भ हो+ा Sो विकसी स अपक ृ त्य की प्रक ृ ति मा+ा Sा ा है। स अपक ृ त्य हो+े क े खिलए, प्रर्थीम स्र्थीा+ में एक अपक ृ त्य हो+ा चाविहए Sो कार:वाई क े योग्य है क्योंविक अपक ृ त्य क े + हो+े से क ु छ भी गल +हीं हो सक ा है। यह अपक ृ त्य ब हो ा है Sब कोई Sांच की एक रेखा हो ी है विक क्या स अपक ृ त्य होगा। विब+ा विकसी अपक ृ त्य क े स अपक ृ त्य +हीं हो सक ा। एक व्यविX को Sहां सकारात्मक या +कारात्मक एक विवशेष रीक े से काय: कर+े या काय: कर+े से रोक+े क े खिलए पूव:मान्य अपकृ त्य क े दातियत्व का उल्लंघ+ कर ा है। एक व्यविX पर दातियत्व विकसी अति*कार का एक संग प्रति हिंबब हो ा है Sो अन्य को विवरास में विमला है। एक स अपकृ त्य वि+रं र क:व्य या दातियत्व का उल्लंघ+ है Sो एक स प्रकृ ति का है। यह वास् व में वह आ*ार र्थीा सिSस पर माया रा+ी पुंS मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय क े एक फ ै सले में ी+ न्याया*ीशों की पीठ +े वि+म्+खिलखिख वXव्यों में इस बया+ को मंSूरी दी: "Sी.र्डी. भट्टर ब+ाम राज्य [AIR 1957 Cal 483: 61 CWN 660: 1957 विक्र एलSे 834] में यह ब ाया गया र्थीा विक एक स अपरा* या एक स अपक ृ त्य आखिखरकार क:व्य का वि+रं र उल्लंघ+ है Sो स्वयं ही स है। यविद एक क:व्य विद+-प्रति विद+ Sारी रह ी है, ो विद+- प्रति विद+ उस क:व्य का गैर-प्रदश:+ एक स अपक ृ त्य है।" इसखिलए, यह मूल्यांक+ कर+े में विक क्या *ारा 23 क े अर्थी: में स अपक ृ त्य है, क े वल इस थ्य क े कारर्ण विक क्षति का प्रभाव Sारी है यह स अपक ृ त्य क े रूप में गविठ कर+े क े खिलए पया:प्त +हीं है। उदाहरर्णार्थी:, Sब काय: या लोप क े परिरर्णामस्वरूप अपक ृ त्य पूर्ण: हो Sा ा है, सिSसकी णिशकाय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की Sा ी है ो कोई भी स अपक ृ त्य उत्पन्न +हीं हो ा है, भले ही भविवष्य में Sो प्रभाव या क्षति ब+ी हुई हो। अपक ृ त्य क्या हो ा है, अपक ृ त्य को स प्रक ृ ति का अपक ृ त्य ब+ा+े वाली चीS है क:व्य का उल्लंघ+ Sो विक खत्म +हीं हुआ है बस्जिल्क अभी विवद्यमा+ है। इस रह क े क:व्य का उल्लंघ+ एक स अपक ृ त्य का वि+मा:र्ण कर ा है और इसखिलए परिरसीमा की दलील का बचाव कर ा है।

268. व:मा+ मामले में, वि+म ही अखाड़े की क: को स्वीकार कर+े में कई कविठ+ाइयाँ हैं Sो स अपक ृ त्य र्थीी। Sैसा विक मसिSस्र्ट्रेर्ट +े आदेश की ति णिर्थी में वि+ष्कष: वि+काला विक प्रर्थीम और मुख्य ः *ारा 145 क े ह मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश का अणिभप्राय और उद्देश्य अति*कार प्राप्त करक े शांति क े उल्लंघ+ को रोक+ा है। मसिSस्र्ट्रेर्ट + ही अति*कारों पर वि+र्ण:य +हीं ले ा है और + ही प्रश्नग स्वत्व की काय:वाही पर एक वि+र्ण:य में परिरर्ण हो ी है। मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश दीवा+ी न्यायालय क े आदेश या तिर्डक्री क े अ*ी+ है। इसखिलए, यह मा++े क े खिलए विक मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश एक अपक ृ त्य को Sन्म देगा और परिरर्णामस्वरूप एक स अपक ृ त्य हो+े पर स्वाभाविवक रूप से प + हो ा है।दूसरे, विद+ांक 22 से 23 विदसंबर 1949 क े बीच रा को मूर्ति यों की गुप्त स्र्थीाप+ा वि+म ही अखाड़ा क े पक्ष में अति*कार की स्र्थीाप+ा करेगी? वि+म ही अखाड़ा इस घर्ट+ा का खंर्ड+ कर ा है। वि+म ही अखाड़ा को सिSस अति*कार का दावा कर+ा है, वह इस आ*ार पर स्र्थीाविप +हीं विकया Sा सक ा है और यविद कोई अति*कार +हीं है ो कोई भी समरूपी अपकृ त्य +हीं हो सक ा है Sो एक स अपक ृ त्य की +ींव को प्रस् ु कर सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+म ही अखाड़ा में कोई अति*कार अं र्मि+विह +हीं र्थीा Sो मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश से खलल पड़ ा। वि+म ही अखाड़े का दावा प्रबं*+ और आं रिरक अहा े क े प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए एक सेवादार की क्षम ा में र्थीा। वि+म ही अखाड़े +े स्वयं दलील दी है विक वाद क े खिलए वाद हे ुक विद+ांक 5 S+वरी 1950 को साम+े आया। इस दावे क े आ*ार पर आगे बढ़ े हुए यह स्पष्ट है विक बेदखली, Sो अखाड़ा अप+ी भूविमका से एक सेवादार क े रूप में दावा कर ा है और इसखिलए स अपक ृ त्य क े सिसद्धां का कोई प्रश्न ही +हीं र्थीा।

269. एल्लप्पा +ाइक े + ब+ाम क े लक्ष्मर्ण +ाइक े +172 में मˆास उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य से वि+म ही अखाड़े को कोई सहाय ा +हीं विमली है। यह एक ऐसा मामला र्थीा Sहां *ारा 145 क े ह काय:वाही क े लंब+ क े दौरा+, मसिSस्र्ट्रेर्ट +े एक प्राप की वि+युविX क े खिलए *ारा 146 क े ह एक आदेश पारिर विकया र्थीा क्योंविक न्यायालय स्वयं को सं ुष्ट कर+े में असमर्थी: र्थीी विक पक्षकारों में से विकसक े पास कब्Sा र्थीा। प्रत्यर्भिर्थीयों +े स्वत्व और कब्Sे की घोषर्णा क े खिलए एक वाद दायर विकया र्थीा सिSसे चूक में खारिरS कर विदया गया र्थीा और आदेश को सीपीसी क े आदेश IX का वि+यम 9 क े ह एक आवेद+ को भी खारिरS कर विदया गया र्थीा। आदेश की अपील भी खारिरS कर दी गई। इसक े बाद यातिचकाक ा: Sो प्रति वादी र्थीा, +े इस आ*ार पर वाद को खारिरS कर+े क े बाद मसिSस्र्ट्रेर्ट क े समक्ष कब्Sे क े खिलए आवेद+ विकया विक मुंसिसफ +े अप+े अति*कारों का वि+*ा:रर्ण विकया र्थीा। मसिSस्र्ट्रेर्ट +े यह *ारर्ण कर े हुए आदेश पारिर विकया विक विकसी दीवा+ी न्यायालय द्वारा कोई घोषर्णा +हीं की गई र्थीी विक वाद परिरसर का हकदार कौ+ र्थीा, अ ः भूविम प्राप क े कब्Sे में 172 AIR 1949 Madras 71 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ही रहेगी। इस संदभ: में विवद्व न्याया*ीश +े यह अव*ारिर विकया विक या ो *ारा 146 क े ह एक वि+र्ण:य क े खिलए विकसी भी पक्ष को परिरसीमा की अवति* में स्वत्व की घोषर्णा क े खिलए वाद दायर कर+ा होगा या भूविम क े मु+ाफ े की वसूली क े खिलए वाद ला+ा होगा। ऐसे वाद में प्रश्न यह है विक मु+ाफ े का हकदार कौ+ है इसक े परिरर्णामस्वरूप यह य होगा विक स्वत्व का प्रश्न को अति*वि+र्ण:य+ भी कर+ा होगा। यह *ारा 146 क े उद्देश्य क े खिलए प्रांङ्गन्याय क े रूप में काय: करेगा। इ+ अवलोक+ों को मˆास उच्च न्यायालय क े विवद्व एकल न्याया*ीश द्वारा सत्तारूढ़ क े समर्थी:+ में की गई र्थीीं विक ऐसा +हीं र्थीा विक पक्षकार विब+ा विकसी उपचार क े र्थीे, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप हमेशा क े खिलए विवति* की अणिभरक्षा की संपखित्त शेष रह ी र्थीी।या ो पक्ष परिरसीमा क े भी र मु+ाफ े की वसूली क े खिलए वाद दायर कर+े का हकदार र्थीा, Sहां प्रश्नग स्वत्व का अति*वि+र्ण:य+ विकया Sाएगा। यह वि+र्ण:य वि+म ही अखाड़े क े खिलए सहायक +हीं है। वि+म ही अखाड़े द्वारा कु छ वि+र्ण:यों पर अवलम्ब खिलया गया है परन् ु ये वि+ष्पाद+ द्वारा विकसी तिर्डक्री क े प्रव:+ क े खिलए परिरसीमा क े आरम्भ क े संबं* में हैं। चंर्डी प्रसाद ब+ाम Sगदीश प्रसाद173 में, इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की पीठ +े अव*ारिर विकया विक संविवति* क े ह अपील स रूप से सभी प्रयोS+ एवं उद्देश्यों क े खिलए है। इसखिलए, Sब एक उच्च र फोरम एक अपील की सु+वाई कर ा है और गुर्णावगुर्ण पर आदेश पारिर कर ा है, ो विवलय का सिसद्धां लागू हो ा है और अपीलीय न्यायालय क े आदेश क े सार्थी विवचारर्ण न्यायालय की तिर्डक्री का विवलय हो ा है। इसखिलए, एक बार तिर्डक्री वि+ष्पाविद कर+े क े उद्देश्य से लागू कर+े की मांग की Sा ी है, भले ही मूल या अपीलीय हो+े क े बावSूद तिर्डक्री की ति णिर्थी या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकसी वि+तिश्च ति णिर्थी पर *+ क े भुग ा+ या संपखित्त क े विव रर्ण का वि+द†श दे े हुए परिरसीमा क े आरंभ का अ+ुव - आदेश मा+ा Sाएगा। इसी सिसद्धां को यूवि+य+ ऑफ इंतिर्डया ब+ाम वेस्र्ट कोस्र्ट पेपर विमल्स खिलविमर्टेर्ड174 और शांति ब+ाम र्टी र्डी विवश्व+ार्थी+175 में ी+ न्याया*ीशों की पीठ द्वारा Sोर विदया गया है। आवश्यक मुद्दा यह है विक क्या उ+का वाद परिरसीमा में र्थीा और सिS+ कारर्णों से सूतिच विकया गया है उ+का उत्तर +कारात्मक में हो+ा चाविहए। M.[5] वि+म ही साक्षीगर्णों क े मौखिखक साक्ष्य

270. वि+म ही अखाड़ा द्वारा स्र्थीाविप वाद 3 परिरसीमा द्वारा वर्जिS विकया गया है, इस न्यायालय क े खिलए साक्ष्य, मौखिखक और वृत्ततिचत्र पर विवचार कर+े क े खिलए कठोर ा से कह+ा आवश्यक +हीं है। श्री परसर+ +े आ£ह विकया विक विवचारर्ण न्यायालय से णिभन्न इस न्यायालय को उ+ सभी प्रश्नों का उत्तर दे+े की आवश्यक ा +हीं है Sो पहली अपील में उद्भू हो े हैं यविद परिरसीमा क े वल मुद्दे का वि+ष्कष: वि+काल ी है ो विववाद में सभी मुद्दों पर विवचार कर+ा अ+ावश्यक है। यह आ£ह विकया गया र्थीा विक विवचारर्ण न्यायालय को सभी मुद्दों पर विवचार कर+ा होगा क्योंविक इसका वि+र्ण:य अपील क े अ*ी+ है। इस क: का साव*ा+ीपूव:क मूल्यांक+ कर+े क े बाद, वि+म ही अखाड़ा द्वारा उद्धृ विकये गए साक्ष्यों की Sांच कर+ा और विववाद की प्रकृ ति क े संबं* में अति*वि+र्ण:य प्रस् ु कर+ा उतिच है। अपील की सु+वाई क े दौरा+ सभी वादों में दS: साक्ष्य पर अवलम्ब खिलया गया है। इसखिलए मौखिखक साक्ष्य

175 2018 SCCOnLine SC 2196 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर विवचार कर+ा आवश्यक हो Sा ा है। सु+वाई क े दौरा+ वि+म ही अखाड़ा +े वि+म्+खिलखिख गवाहों क े मौखिखक साक्ष्य का अवलम्ब खिलया:

271. महं भास्कर दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/1): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 29 अगस्, 2003 है। बया+ की ति णिर्थी में उ+की उम्र 75 वष: र्थीी और उन्हों+े बाबा बलदेव दास का णिशष्य हो+े का दावा विकया र्थीा। वह श्री मंच रामा+ंविदया वि+म ही अखाड़ा क े सरपंच र्थीे और इससे पूव: राम Sन्मभूविम मंविदर क े पंच और पुSारी हो+े का दावा विकया र्थीा। साक्षी +े कहा विक: (i) वि+म ही अखाड़ा विववाविद मंविदर, राम Sन्मभूविम और आसपास क े अन्य मंविदरों में कई सौ वषÂ क मूर्ति यों का अति*कारी है। (ii) राम Sन्मभूविम मंविदर में विवराSमा+ भगवा+ राम और राम चबू रे की प्रार्ण प्रति ष्ठा वि+म ही अखाड़े क े महं द्वारा विकया गया र्थीा; (iii) यह Sा+कारी उ+क े प्राची+ उपदेशकों से णिशष्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही र्थीी; (iv) वह 1946 से 1949 क रामचबू रा मंविदर में पूSा और आर ी कर रहा र्थीा; (v) आन् रिरक और बाह्य दो+ों अहा े सदैव वि+म ही अखाड़े क े कब्Sे में रहे हैं सिSसक े आं रिरक भाग में एक गभ:गृह र्थीा, सिSसमें क ु क— की गई र्थीी; (vi) संपूर्ण: बाह्य भाग तिचरकाल से वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में र्थीा;

(vii) Sब वह विववाविद संरच+ा क े उत्तरी गुंबद क े +ीचे सो रहे र्थीे ो विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की रा क े दौरा+ कोई घर्ट+ा घविर्ट +हीं हुई,; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (viii) गभ:गृह में भगवा+ राम की आर ी और पूSा विद+ांक 29 विदसंबर, 1949 से पूव: भी संचाखिल की Sा रही र्थीी और आं रिरक मंविदर को विद+ांक 19 विदसंबर, 1949 को क ु क: विकया गया र्थीा; (ix) वष: 1934 क े दंगों क े पश्चा ् विववाविद स्र्थील पर विकसी मुस्जिस्लम +े +माज़ अदा +हीं विकया र्थीा; (x) विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 को रामचबू रा मंविदर से कोई मूर्ति +हीं ली गई र्थीी और विववाविद मंविदर का कब्Sा वि+म ही अखाड़े क े पास र्थीा; (xi) वि+म ही अखाड़ा क े पास विद+ांक 29 विदसंबर, 1949 क मुख्य मंविदर से संबंति* सेवा काय: का अति*कार र्थीा। वि+म ही अखाड़ा फरवरी 1982 में दूसरी क ु क— हो+े क बाह्य परिरसर में भगवा+ राम एवं अन्य मूर्ति यों की पूSा कर ा रहा र्थीा; और (xii) 1934 से पूव: भी भगवा+ राम आं रिरक भाग में विवराSमा+ र्थीे Sो ब से वि+म ही अखाड़े क े स रूप से कब्Sे में र्थीे। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की रफ से प्रस् ु वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा र्डॉ. *व+ +े साक्षी क े साक्ष्य में वि+म्+खिलखिख विवरो*ाभासों को ब ाया है:

(i) Sबविक साक्षी +े कहा विक विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 को कोई घर्ट+ा +हीं हुई र्थीी और वह विववाविद ढाँचे क े उत्तरी गुंबद क े +ीचे सो रहा र्थीा, उच्च न्यायालय +े वि+म ही अखाड़ा क े अति*वXा का कर्थी+ इस आशय क े खिलए अणिभखिलखिख विकया है विक मूर्ति यों को रामचबू रे से स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया र्थीा और विववाविद भव+ क े क ें ˆीय गुंबद में रखा गया र्थीा; और (ii) साक्षी +े प्रारंभ में यह कहा र्थीा विक विववाविद भव+ में राम लला की दो मूर्ति याँ र्थीीं; एक सिंसहास+ पर और एक सीढ़ी पर विकन् ु बाद में उस+े यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्पष्ट विकया विक दो प्रति माओं से उसका आशय एक रामलला से और दूसरे लक्ष्मर्ण से र्थीा। इसक े अलावा, साक्षी का दावा है विक स्वयं उस+े विद+ांक 29 विदसंबर 1949 को इसकी क ु क— से पूव: विववाविद स्र्थील क े अंदर भगवा+ राम की आर ी की र्थीी सिSसक े बावSूद भी वह विववाविद संरच+ा क े अंदर मूर्ति यों की संख्या क े संबं* में कोई कर्थी+ कर+े क े योग्य +हीं र्थीा। इसक े अलावा, Sबविक एक ओर साक्षी +े कहा विक परिरक्रमा विववाविद ढाँचे क े पीछे की Sा ी र्थीी, बाद में उन्हों+े कहा विक रामचबू रे क े आसपास परिरक्रमा की Sा रही र्थीी।

272. क ु छ अन्य पहलुओं पर साक्षी का बया+ भी Sांच का गुर्ण है। साक्षी +े कहा विक राम Sन्मभूविम मंविदर को ध्वस् करक े वष: 1528 में बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। उन्हों+े यह कहा विक: "चूँविक विवक्रमाविदत्य द्वारा वि+र्मिम भव+ 2500 वष: पुरा+ी र्थीीं, वे स्वयं ही ढह गई ं और वष: 1528 में Sन्मभूविम मंविदर को ध्वस् कर विदया गया। वष: 1528 में सिSस भव+ को ध्वस् विकया गया वह मूल रूप से विवक्रमाविदत्य द्वारा वि+र्मिम र्थीा।" साक्षी +े कहा विक विवक्रमाविदत्य द्वारा राम Sन्मभूविम मंविदर का वि+मा:र्ण और वष: 1528 में मंविदर क े विवध्वंस पर विववाविद ढाँचे का वि+मा:र्ण वह र्थीा Sो उस+े अप+े पूव:Sों से सु+ा र्थीा और उसे कहीं भी +हीं पढ़ा गया र्थीा। साक्षी क े अ+ुसार, वष: 1934 से पूव: हिंहदुओं द्वारा मस्जिस्Sद में पूSा हो रहा र्थीा। उ+क े अ+ुसार, मूर्ति यों को वष: 1934 से पहले स्र्थीाविप विकया गया र्थीा परन् ु वह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस बा से अ+णिभज्ञ र्थीे विक वे विकसक े द्वारा स्र्थीाविप विकए गए र्थीे। ब साक्षी +े कहा विक: "मैं+े अप+े पूव:Sों से यह सु+ा र्थीा विक वष: 1934 से पूव: ही वहां पर मूर्ति याँ मौSूद र्थीीं। मैं यह भी ब ा+े योग्य +हीं हूँ विक ी+ गुंबदाकार विववाविद ढाँचे क े वि+मा:र्ण क े विक +े वष: पश्चा या+ी वष: 1528 क े बाद विववाविद ढाँचे में मूर्ति याँ स्र्थीाविप की गई र्थीीं।" साक्षी क े अ+ुसार वष: 1946 में भXों क े खिलए वि£ल-ई ंर्ट की दीवार क े द्वार खोले गए र्थीे और मंविदर खुला रह ा र्थीा। उन्हों+े कहा विक विदसंबर 1949 क विववाविद ढाँचे में +माS अदा +हीं की गई र्थीी। विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को घर्ट+ा क े संबं* में साक्षी क े पास वि+म्+खिलखिख स्पष्टीकरर्ण है: "विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की रावित्र में विववाविद ढाँचे में कोई घर्ट+ा घविर्ट +हीं हुई। यविद कोई दावा कर ा है विक विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की रावित्र में विववाविद ढाँचे में क ु छ घर्ट+ाएं घविर्ट हुई ं ो वे गल कह रहे हैं। मैं विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की रावित्र में विववाविद परिरसर में मौSूद र्थीा। मैं रा को 11.30 बSे विबस् र पर Sा ा हूं और सुबह 4.30 बSे उठ Sा ा हूं। मैं उस रा या+ी विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की रा में सो गया र्थीा। उस समय या+ी उस रा मैं गुंबद क े +ीचे उस स्र्थीा+ पर सोया र्थीा।" साक्षी सिSस घर्ट+ा की अज्ञा+ ा को ब ा रहा है वह स्पष्ट है। साक्षी का बया+ महत्व रख ा है क्योंविक वह वष: 1950 से वि+म ही अखाड़ा का पंच र्थीा और सरपंच क े भौति क समय पर र्थीा। उ+क े साक्ष्य में कई विवरो*ाभास हैं। उन्हों+े कहा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "यह सिंसहास+ वष: 1950 से पहले क े विववाविद ढांचे में मौSूद र्थीा। यह सिंसहास+ विववाविद ढांचे में वष: 1950 से दस वष: पूव: विवद्यमा+ र्थीा। यह सिंसहास+ वष: 1950 में विववाविद ढांचे में र्थीा, परं ु यह क ु क: +हीं विकया गया र्थीा।" दूसरी ओर, साक्षी +े कहा: "1986 से पहले, इ+ स्वीरों में विदखाई दे+े वाला सिंसहास+ विववाविद स्र्थील पर मौSूद +हीं र्थीा। वष: 1986 में ाला खोल+े क े बाद यह सिंसहास+ विववाविद भव+ में स्र्थीाविप विकया Sा सक ा र्थीा।" साक्षी +े ब स्वीकार विकया विक उन्हों+े भगवा+ राम की दो मूर्ति यों का उल्लेख विकया र्थीा Sब भगवा+ राम और लक्ष्मर्ण की क े वल एक मूर्ति र्थीी। Sहां क रामचबू रे की मूर्ति यों का संबं* है, साक्षी +े कहा विक वे अकबर क े शास+काल में स्र्थीाविप की गयी र्थीीं। Sबविक एक ओर, साक्षी +े कहा विक बाबर क े समय से ही मस्जिस्Sद में कभी +माS अदा +हीं की गई र्थीी, दूसरी ओर, Sब उसे विववाविद ढाँचे में रामलला की मूर्ति क े बारे में परिरचय दे+ा हुआ ो उस+े कहा विक यह वष: 1934 क े पूव: र्थीा लेविक+ सर्टीक ति णिर्थी और अवति* उसे +हीं प ा र्थीी। साक्षी क े अ+ुसार, सिंसहास+ पर विवराSमा+ रामलला की मूर्ति चल-विव£ह या Sंगम मूर्ति र्थीी। साक्षी क े अति*कांश अ+ुश्रु साक्ष्य हैं। उ+क े बया+ अन्य क े द्वारा उन्हें ब ाई गई बा ों पर आ*ारिर हैं। साक्षी का स्पष्टीकरर्ण है विक वह विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को विववाविद परिरसर में सो रहा र्थीा और कोई घर्ट+ा घविर्ट +हीं हुई र्थीी यह उसकी म+गढं बा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रामलला की मूर्ति यों को वष: 1934 से बहु पहले विववाविद ढाँचे में स्र्थीाविप विकया गया है, यह कर्थी+ विवश्वस+ीय ा क े योग्य +हीं है।

273. राSा राम पांर्डे (र्डीर्डब्ल्यू 3/2): साक्षी क े मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 22 सिस ंबर, 2003 है। गवाह +े कहा विक बया+ क े समय वह 87 वष: का र्थीा और वह वष: 1930 में अयोध्या आया र्थीा, Sब उस+े राम Sन्मभूविम मंविदर का दौरा कर+े का दावा विकया र्थीा। साक्षी +े कहा विक: (i) उस+े आं रिरक अहा े की क ु क— से पूव: वि+म ही अखाड़ा आर ी देखी र्थीी; (ii) बाहरी अहा े क े द्वार खोल+े और बंद कर+े का काय: वि+म ही अखाड़े द्वारा विकया गया र्थीा; (iii) विकसी भी मुस्जिस्लम को 1930-1949 क े बीच बाहरी द्वार से प्रवेश कर+े की अ+ुज्ञा +हीं दी गई र्थीी और वह गभ:गृह क े भी री भाग को देख+े में सक्षम र्थीा Sहां क ु छ मूर्ति यां उत्कीर्ण: की गई र्थीीं; और (iv) उसक े पहुंच+े क े बाद से क ु क— की ति णिर्थी क परिरसर का उपयोग मस्जिस्Sद क े रूप में कभी +हीं विकया गया। र्डॉ. *व+ +े अप+े कÂ क े दौरा+ प्रति -परीक्षा क े वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर Sोर विदया है: (i) साक्षी +े स्वीकार विकया है विक चबू रे को पहले Sन्मभूविम मंविदर क े रूप में Sा+ा Sा ा र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) साक्षी इस बा से अ+णिभज्ञ र्थीा विक विववाविद ढाँचे को ी+ गुंबदों क े सार्थी कब और विकसक े द्वारा वि+र्मिम विकया गया र्थीा; उसे इस बा का कोई ज्ञा+ +हीं र्थीा विक विववाविद ढांचे क े भी र कब और विकस+े मूर्ति स्र्थीाविप की र्थीी; और (iii) साक्षी इस बा से अ+णिभज्ञ र्थीा विक कब और विकसक े द्वारा वि+म ही अखाड़े को राम Sन्मभूविम मंविदर का माखिलक ब+ाया गया र्थीा। साक्षी +े अप+ी परीक्षा क े दौरा+ कहा विक वह वष: 1949 से बाबरी मस्जिस्Sद क े बारे में सु+ रहा र्थीा, लेविक+ वह इस बा से अ+णिभज्ञ र्थीा विक अयोध्या में वह कहां पर है या कहाँ पर स्जिस्र्थी है। उन्हों+े कहा विक उन्हें बाद में प्रति - परीक्षा से प ा चला विक सिSस भव+ को उन्हों+े राम Sन्मभूविम मंविदर कहा, उसे मुस्जिस्लमों द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद कहा Sा ा है। यद्यविप, उन्हों+े कहा विक उन्हों+े वष: 1992-93 में मुस्जिस्लमों क े सार्थी बैठक की र्थीी, उन्हों+े कहा विक उन्हें उ+में से विकसी क े द्वारा सूतिच +हीं विकया गया र्थीा विक विद+ांक 6 विदसंबर 1992 को मस्जिस्Sद को ध्वस् कर विदया गया है। साक्षी +े घर्ट+ाओं को स्मरर्ण कर+े की अप+ी क्षम ा पर कहा: "मैं 87 वष: का हो गया हूं और मेरा विववेक उतिच रीक े से काय: +हीं कर ा है। इस कारर्ण मैं यह याद रख+े में विवफल हूं विक मैं+े एक विवशेष समय में विकस विवशेष बा को कहा र्थीा। उपरोX कर्थी+ों में से आS मेरे द्वारा विदया गया उपयु:X कर्थी+ सही है; मैं+े विद+ांक 30.09.2003 को अ+ुतिच बया+ विदया है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साक्षी +े दशा:या विक उन्हें इस बा का कोई ज्ञा+ +हीं र्थीा विक विकस+े ी+ गुंबददार विववाविद ढाँचे में मूर्ति यों को स्र्थीाविप विकया र्थीा, लेविक+ दावा विकया गया है विक Sब से वह वहाँ Sा रहे र्थीे ब से उसे देख रहे र्थीे। Sबविक एक ओर साक्षी +े अप+ी स्मृति की अक्षम ा को स्वीकार विकया वहीं वे उस चीS का बया+ दे रहे हैं Sो 73 वष: पूव: 1930 में हुआ र्थीा Sब वह विववाविद ढांचे पर दश:+ क े खिलए गये र्थीे। उ+क े अ+ुसार, उ+क े विप ा +े कहा र्थीा विक स् ंभों में भगवा+ ह+ुमा+ की मूर्ति यां र्थीीं।

274. सत्य +ारायर्ण वित्रपाठी (र्डीर्डब्ल्यू 3/3): साक्षी की मुख्य परीक्षा विद+ांक 30 अक्र्टूबर, 2003 को हुई र्थीी Sब वह 72 वष: का र्थीा। साक्षी +े कहा विक Sब वह दस साल का र्थीा ब वह प्रर्थीम बार वष: 1941 में राम Sन्मभूविम मंविदर गया र्थीा और ब से लगा ार Sा रहा र्थीा। साक्षी +े कहा विक विववाविद स्र्थील पर + ही कोई +माS +हीं अदा की गई र्थीी और + ही विकसी मुस्जिस्लम +े इबाद की र्थीी। यद्यविप, साक्षी +े कहा विक वह लगा ार विववाविद ढाँचे का दौरा कर रहा है, Sब भौति क विवशेष ाओं क े विवषय में पूछा गया ो उस+े कहा विक उस+े कभी भी विववाविद संरच+ा क े विकसी भी विहस्से को बहु ध्या+ से +हीं देखा र्थीा। साक्षी +े इस बारे में अ+णिभज्ञ ा व्यX की विक क्या कु छ व्यविXयों +े मस्जिस्Sद में प्रवेश विकया र्थीा और विद+ांक 23 विदसंबर 1949 की रा को मूर्ति यों को स्र्थीाविप की र्थीी। उच्च न्यायालय +े +ोर्ट विकया है विक इस साक्षी क े अति*कांश बया+ *ारर्णा और सु+े सु+ाए हैं। Sबविक एक ओर, उन्हों+े उ+ मूर्ति यों का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उल्लेख विकया सिSन्हें विववाविद ढाँचे में सिंसहास+ पर रखा गया र्थीा Sो वष: 1941-1992 क वहां ब+े रहे, बाद में स्वीरों को विदखाए Sा+े पर वह अप+े बया+ से मुकर गए और कहा विक यह उ+क े खिलए स्पष्ट +हीं र्थीा विक वे कब Sा े र्थीे और मूर्ति यों को विकस रीक े से रख े र्थीे।

275. महं णिशव शरर्ण दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/4): साक्षी की परीक्षा विद+ांक 14 +वंबर, 2003 को हुई र्थीी। वह 83 वष: क े र्थीे। उन्हों+े कहा विक वह वष: 1933 से श्री राम Sन्मभूविम क े दश:+ को Sा रहे हैं और वष: 1949 में हुई क ु क— क गभ:गृह क े अंदर भगवा+ राम का दश:+ विकया। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से प्रस् ु वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा र्डॉ. *व+ +े इस साक्षी क े कर्थी+ क े वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर Sोर विदया है: (i) साक्षी +े प्रस् ु विकया विक उस+े अप+े साक्ष्य क े शपर्थीपत्र को क े वल सहS रूप से पढ़ा र्थीा और उसे पूर्ण: रूप से +हीं पढ़ा र्थीा; (ii) यद्यविप साक्षी +े यह कर्थी+ विकया विक Sब वह वष: 1936 में विववाविद स्र्थील पर गया र्थीा ब कोई दीवार या लोहे क े छड़ +हीं र्थीे, यह +ोर्ट कर+ा सुसंग है विक भी री और बाहरी अहा ों को पृर्थीक ् कर+े क े खिलए वष: 1856-57 में वि£ल-ई ंर्ट की दीवार ब+ाई गई र्थीी; और (iii) हालांविक, अप+ी मुख्य परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े कहा विक उन्हों+े वष: 1949 में इसकी क ु क— क आं रिरक गभ:गृह का दश:+ विकया र्थीा, अप+ी प्रति -परीक्षा क े दौरा+ उन्हों+े कहा विक वे वष: 1986 से पूव: विववाविद भव+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं गए र्थीे। उपरोX आ*ार पर यह आ£ह विकया गया विक वास् व में साक्षी +े भौति क समय पर विववाविद स्र्थील का दौरा +हीं विकया है। अयोध्या में अप+े वि+वास पर साक्षी +े कहा: "मैं अयोध्या में वष: 1938 से 1950 क +हीं रहा परन् ु Sब भी मैं अयोध्या आ ा र्थीा ो विववाविद स्र्थील की ओर +हीं Sा ा र्थीा और यविद मैं वहां Sा ा र्थीा ो स्र्थील को हार्थी Sोड़कर प्रर्णाम कर+े क े बाद बाहर से ही लौर्ट आ ा र्थीा।" साक्षी +े कहा विक वह विववाविद ढाँचे में एक पुSारी र्थीा सिSसे उस+े सैकड़ों बार देखा होगा। हालांविक उसे उस वष: की स्मृति +हीं र्थीी सिSसमें वह पुSारी र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े कहा विक वह “2-4 वष” क े खिलए ी+ गुंबदाकार ढाँचे में पुSारी र्थीा परन् ु बाद में उस+े स्वीकार विकया विक उसका कर्थी+ गल र्थीा: “प्रश्न- आपक े स्वयं क े पूव X कर्थी+ा+ुसार, वष: 1931 से 1957 क े बीच आप अयोध्या में लगा ार 5-6 माह रहे हैं। क्या यह सत्य है? उत्तर: हां, श्रीमा+। यह सत्य है। प्रश्न: ब मुझे कह+ा होगा विक पृष्ठ 74 पर उसिल्लखिख विद+ांक 5 फरवरी, 2004 का आपका कर्थी+ ' ी+ गुंबदाकार विववाविद भव+ में 2-4 वष क े खिलए एक पुSारी क े रूप में विकया गया काय:'-गल हो Sा ा है। इस संबं* में आपको क्या कह+ा है? उत्तर: उपरोX साक्षी क े माध्यम से-मेरा यह कर्थी+ गल हो गया है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बाद में, उन्हों+े स्वीकार विकया विक मुख्य परीक्षा में उ+का कर्थी+ विक वह वष: 1933 से राम Sन्मभूविम में दश:+ क े खिलए Sा रहे र्थीे, इस वष: का संदभ: गल र्थीा। इसक े अलावा, साक्षी +े स्वीकार विकया विक उसे याद +हीं है विक वह फरवरी 1986 से पूव: विववाविद भव+ गया र्थीा या +हीं। साक्षी +े यह भी कहा विक उस+े गल रीक े से 1930-42 क लगा ार अयोध्या में रह+े का संदभ: विदया र्थीा।

276. रघु+ार्थी प्रसाद पांर्डे (र्डीर्डब्ल्यू 3/5): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 18 +वम्बर, 2003 की है। Sब उन्हें पदस्र्थीाविप विकया गया र्थीा ब उ+की आयु 73 वष: की र्थीी। उ+क े अ+ुसार, राम Sन्मभूविम मंविदर उ+क े गाँव से लगभग 16 या 17 विकलोमीर्टर की दूरी पर है और 7 वष: की आयु से ही उ+का आ+ा Sा+ा है।

277. र्डॉ. *व+ द्वारा प्रति परीक्षा क े वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर Sोर विदया गया है: (i) साक्षी को इस बा का कोई ज्ञा+ +हीं र्थीा विक छायातिचत्र क्या पतिश्चमी रफ की दीवार की र्थीीं अर्थीवा विववाविद भव+ क े मध्य गुंबद क े वि+चले भाग की क्योंविक वह दश:+ क े खिलए Sा ा र्थीा और उस+े दीवारों पर ध्या+ाकष:र्ण +हीं विकया र्थीा; (ii) यद्यविप उस+े वि£ल-ई ंर्ट की दीवार देखी र्थीी, र्थीाविप उसे यह याद +हीं र्थीा विक विववाविद ढाँचे में प्रवेश कर+े क े खिलए उसे बैरिरक े र्डों से गुSर+ा पड़ा र्थीा; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) यद्यविप साक्षी +े वष: 1937-1948 क अप+ी मा ा क े सार्थी अयोध्या Sा+े का दावा विकया र्थीा, और यह विक भगवा+ रामलला की मूर्ति यां क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे भव+ क े अंदर र्थीीं, विफर भी बाद में उस+े विवणिभन्न छायातिचत्रों पर विवरो*ाभास प्रकर्ट विकया। उच्च न्यायालय द्वारा +ोर्ट विकया गया है विक उ+क े अति*कांश कर्थी+ प्राची+ काल से चले गए र्थीे और अस्वीकाय: र्थीे क्योंविक उन्हें थ्यों का कोई व्यविXग ज्ञा+ +हीं र्थीा। Sब उ+क े ज्ञा+ क े स्रो क े बारे में पूछ ाछ की गई, ो उन्हों+े कहा विक उन्हों+े अप+े णिशक्षकों से कहावि+याँ सु+ी र्थीीं। प्रारंभ में, साक्षी +े कहा विक ी+ गुंबदाकार ढाँचे का वि+मा:र्ण विवक्रमाविदत्य द्वारा विकया गया र्थीा। विफर उन्हों+े कहा विक विवक्रमाविदत्य द्वारा वि+र्मिम भव+ को ध्वस् कर विदया गया र्थीा और विववाविद भव+ का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। यद्यविप, उन्हों+े इस Sा+कारी को अयोध्या महात्म्य का गुर्ण ब ाया और वि+म ही अखाड़ा क े अति*वXा +े उच्च न्यायालय क े समक्ष स्वीकार विकया विक दस् ावेज़ में यह उसिल्लखिख +हीं है विक भव+ का वि+मा:र्ण विवक्रमाविदत्य द्वारा विकया गया र्थीा और ध्वस् कर विदया गया र्थीा सिSसक े बाद विववाविद ढाँचे का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। यद्यविप, साक्षी +े वष: 1948-1988 क भार ीय रेलवे में अप+ी सेवा दी र्थीी, परन् ु उन्हों+े प्रर्थीम बार विद+ांक 18 +वंबर 2003 को बाबरी मस्जिस्Sद का +ाम सु++े का दावा विकया र्थीा।

278. श्री सी ा राम यादव (र्डीर्डब्ल्यू 3/6): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 6 S+वरी, 2004 है। साक्षी +े कहा विक उसका Sन्म वष: 1943 में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हुआ र्थीा और 1951 में Sब वह 8 वष: का र्थीा ब सही गल की समझ प्राप्त हुआ। इस साक्षी क े कर्थी+ इसखिलए विववाद क े खिलए प्रासंविगक +हीं र्थीे क्योंर्मिक उ+का थ्यात्मक ज्ञा+ वष 1951 क े बाद की अवति* से संबंति* है। इस साक्षी का Sन्म वष: 1943 में हुआ र्थीा और विदसंबर 1949 क थ्यों का कोई व्यविXग ज्ञा+ +हीं र्थीा। साक्षी क े साक्ष्य अ+ुश्रुति यों की प्रकृ ति में र्थीे।

279. महं रामSी दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/7): कर्थी+ क े वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर र्डॉ. *व+ द्वारा Sोर विदया गया है: (i) साक्षी +े यह स्वीकार विकया विक विववाविद भव+ सम्रार्ट बाबर द्वारा वि+र्मिम विकया गया र्थीा हिंक ु उस+े कहा र्थीा विक इसका वि+मा:र्ण सी ा पाक क े रूप में विकया गया र्थीा हिंक ु मस्जिस्Sद क े रूप में +हीं, Sो अप+े खिलखिख कर्थी+ में वि+म ही अखाड़े क े प्रति क ू ल है; (ii) साक्षी क े अ+ुसार, गुदार बाबा (Sो विकसी हिंहदू पक्षकारों क े अणिभवच+ का मामला +हीं है) क े माध्यम से सम्रार्ट बाबर द्वारा Sन्मस्र्थीा+ मंविदर क े विवध्वंस क े बाद विववाविद मंविदर का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा; और (iii) बाबर +े विववाविद भव+ पर खिलखिख 'सी ा पाक' प्राप्त विकया क्योंविक वह मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर+े में असमर्थी: र्थीा क्योंविक Sब भी मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण का प्रयास विकया Sा ा र्थीा ब ह+ुमा+Sी ढांचे को ध्वस् कर दे े र्थीे। अप+े स्वयं क े व्यविXग ज्ञा+ में, साक्षी +े कहा विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “मैं वि+तिश्च रूप से यह +हीं ब ा सक ा विक वष: 1934 से 1948 क े बीच मैं विक+ अवसरों पर अयोध्या गया र्थीा। मुझे यह स्मृति +हीं विक वष: 1934 से 1948 क े बीच Sब मैं अयोध्या गया ो मेरी आयु क्या र्थीी। Sब मैं अप+े विप ा क े सार्थी गया र्थीा। मुझे याद +हीं है विक वष: 1934 क े बाद मैं अयोध्या कब गया र्थीा, लेविक+ Sब मैं प्रर्थीम बार वष: 1934 क े बाद अयोध्या गया ो मैं 3-4 विद+ रहा र्थीा।” वि+म ही अखाड़ा क े रुख क े विवपरी, उन्हों+े कहा विक विववाविद ढाँचा बाबर द्वारा वि+र्मिम की गई र्थीी, यद्यविप सी ा पाक की आक ृ ति में: "विववाविद ढाँचा, सिSसे विद+ांक 6 विदसंबर, 1992 को ध्वस् कर विदया गया र्थीा, बाबर द्वारा 'सी ा पाक' क े आकार में ब+ाई गई र्थीी (एवं) + विक मस्जिस्Sद क े आकार में.... अकबर क े काल में, मुस्जिस्लमों को विववाविद ढांचे में Sुम्मे की +माS अदा कर+े की अ+ुमति र्थीी और शेष अवति* क े खिलए हिंहदुओं को प्रार्थी:+ा-पूSा कर+े की अ+ुमति दी गई र्थीी। साविहत्य अर्थीवा इति हास में यह उसिल्लखिख +हीं है विक क्या बाबर से अकबर क े कालावति* में, विववाविद ढांचे में मुस्जिस्लमों द्वारा +माS अदा की गई र्थीी अर्थीवा +हीं, या भगवा+ राम की प्रार्थी:+ा-पूSा की गई र्थीी अर्थीवा +हीं। मेरे ज्ञा+ क े अ+ुसार और Sैसा विक मुझे ब ाया गया है विक वष: 1934 क े दंगों क े बाद विववाविद ढाँचे में कभी +माS अदा +हीं की गई र्थीी और इसक े बSाय बाद क े विद+ों में वि+यविम रूप से प्रार्थी:+ा-पूSा की गई र्थीी। मेरे ज्ञा+ क े अ+ुसार Sो विक अ+ुश्रुति यों पर आ*ारिर है विक अकबर क े काल से वष: 1934 क विववाविद ढाँचे पर Sुम्मे की +माS अदा की गई र्थीी। अन्य विद+ों में +माS अदा +हीं की गयी र्थीी।” आखिखरकार, साक्षी +े कहा विक उस+े हस् ाक्षर कर+े क े समय मुख्य परीक्षा क े माध्यम से अप+े शपर्थीपत्र को +हीं पढ़ा र्थीा और इसे न्यायालय कक्ष में पढ़ा र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

280. पं. श्याम सुंदर विमश्रा (र्डीर्डब्ल्यू 3/8): इ+का Sन्म वष: 1914 में हुआ र्थीा और इ+क े द्वारा कहा गया र्थीा विक राम Sन्मभूविम उ+क े घर से 400 गS से भी कम की दूरी पर स्जिस्र्थी है। बया+ कर+े क े समय वह 90 साल क े र्थीे।

281. र्डॉ. *व+ द्वारा साक्षी क े कर्थी+ क े वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर Sोर विदया गया है: (i) साक्षी का कर्थी+ है विक क े न्ˆीय गुंबद स्वयंभू है, वि+म ही अखाड़े क े अणिभवच+ मामले क े विवरुद्ध है; (ii) साक्षी क े अ+ुसार वष: 1992 में Sन्मस्र्थीा+ मंविदर का गुंबद अप+ी प्राची+ ा और उतिच रखरखाव क े अभाव में Sीर्ण:-शीर्ण: हो गया र्थीा; और (iii) बया+ दे े समय, साक्षी रामचबू रा मंविदर और " ी+ गुंबदाकार मंविदर" क े बीच विवभेद कर ा प्र ी हो ा है और कर्थी+ विकया विक रामचबू रा मंविदर वि+म ही अखाड़े क े स्वाविमत्व में र्थीा, वहीं " ी+ गुंबदाकार मंविदर" क े प्रबं*+ और स्वाविमत्व क े विवषय में क ु छ +हीं कहा। साक्षी +े कहा विक उसे 14 वष: की आयु से पूव: विववाविद स्र्थील पर पूSा क े पाल+ अर्थीवा गैर-पाल+ क े बारे में कोई ज्ञा+ +हीं र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

282. श्री राम आसरे यादव (र्डीर्डब्ल्यू 3/9): साक्षी की मुख्य परीक्षा विद+ांक 22 माच:, 2004 को अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा Sब वह 72 वष: का र्थीा। वह राम Sन्मभूविम मंविदर क े करीब रह+े का दावा कर ा है।

283. र्डॉ. *व+ +े क: प्रस् ु विकया है विक यह साक्षी अप+ी मुख्य परीक्षा में ब ाई गई बा ों से पूर्ण: ः अ+णिभज्ञ है, सिSन्हें वि+म्+खिलखिख कारर्णों से पूर्ण: रूप से असहम हो+े की आवश्यक ा है: (i) अप+ी प्रति परीक्षा क े अ+ुक्रम में, साक्षी +े स्वीकार विकया विक Sब उसे इस बा का कोई ज्ञा+ +हीं र्थीा विक उसक े शपर्थीपत्र में क्या खिलखा गया र्थीा, वह पु+स्मृ:ति +हीं कर सक ा विक वास् व में क्या खिलखा गया र्थीा, यद्यविप उसे पढ़ाया गया र्थीा; (ii) उस+े Sो उत्तर विदए हैं वे शायद सही या गल हैं और उसकी स्मृति प्रभाविव हो चुकी है; (iii) वह इस बा से अ+णिभज्ञ र्थीा विक मुख्य शपर्थीपत्र फ ै Sाबाद में र्टाइप विकया गया र्थीा या लख+ऊ में; (iv) वह विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 क े पूव: भी दश:+ क े खिलए गभ:गृह में गया र्थीा और यह कर्थी+ असत्य र्थीा विक मूर्ति को उन्हीं ति णिर्थीयों पर स्र्थीाविप विकया गया र्थीा, और (v) साक्षी इस बा से अ+णिभज्ञ र्थीा विक विद+ांक 22/23 विदसम्बर की ति णिर्थीयाँ वष: 1949 से संबंति* र्थीीं अर्थीवा +हीं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यद्यविप, शपर्थीपत्र क े वल दस माह पूव: ैयार विकया गया र्थीा, साक्षी दस् ावेज़ से क ु छ भी पु+स्मृ:ति कर+े में असमर्थी: र्थीा। वह वि+म ही अखाड़ा क े इति हास से अ+णिभज्ञ र्थीा और उसे इस बा का कोई ज्ञा+ +हीं र्थीा विक विववाविद मंविदर क ु क: र्थीा अर्थीवा +हीं। इस साक्षी +े कहा विक वह मुख्य परीक्षा क े माध्यम से अप+े शपर्थीपत्र क े थ्यों से अ+णिभज्ञ र्थीा: "आS, मैं+े इस न्यायालय में एक शपर्थीपत्र दायर विकया है। मैं स्वयं पढ़+े में सक्षम +हीं र्थीा विक मेरे द्वारा दायर हलफ+ामे में क्या खिलखा गया र्थीा। यह शपर्थीपत्र मुझे 'मुंशी' (अति*वXा क्लक: ) द्वारा पढ़ाया गया र्थीा, लेविक+ मुझे उ+का +ाम याद +हीं है। मैं+े क े वल उसी को सु++े क े बाद शपर्थीपत्र पर अप+ा हस् ाक्षर विकया र्थीा, लेविक+ मुझे इसक े थ्य क े बारे में +हीं प ा है। यह शपर्थीपत्र ी+ या चार पृष्ठों में दायर हुआ र्थीा।" बाद में, उन्हों+े कहा विक उ+का विदमाग आठ-दस माह से ठीक से काम +हीं कर रहा र्थीा और उ+की स्मृति कमSोर हो गई र्थीी। उन्हों+े कहा: "मुझे याद +हीं है विक इस प्रस् र में उसिल्लखिख थ्य मेरे द्वारा शाविमल विकए गए र्थीे अर्थीवा +हीं।... इस प्रस् र की दूसरी और ीसरी पंविX में मैं+े उल्लेख विकया है विक 'विद+ांक 22-23 विदसंबर को 'गभ:-गृह' वाले विहस्से में मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा पूर्ण: ः गल है'। मुझे याद +हीं है विक यह थ्य वष: 1949 की घर्ट+ा से संबंति* है अर्थीवा +हीं। इस प्रस् र में मैं+े यह भी उल्लेख विकया है विक 'क ु छ स्र्थीा+ीय मुस्जिस्लमों +े... क ू र्टरतिच कार:वाई की'। मुझे याद +हीं है विक विकस ओर से यह क ू र्टरतिच कार:वाई र्थीी। अप+े दम पर यह कह े हुए विक मैं यह +हीं ब ा सक ा विक मेरे द्वारा उसिल्लखिख क ू र्टरतिच कार:वाई वष: 1934 की घर्ट+ा से संबंति* र्थीी अर्थीवा +हीं।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

284. श्री पा ेश्वरी दत्त पांर्डे (र्डीर्डब्ल्यू 3/10): साक्षी की मुख्य परीक्षा विद+ांक 23 माच:, 2004 को की गई है। 74 वष: की आयु क े साक्षी +े कहा विक वह उस समय स्र्थीा+ीय आयुX र्थीे सिSस+े एक अन्य मामले (वि+म ही अखाड़ा ब+ाम राम लख+ शरर्ण दास- वाद 9 वष: 1973) क े संबं* में स्र्थील का सव†क्षर्ण विकया र्थीा। र्डॉ. *व+ +े साक्षी क े कर्थी+ क े संबं* में वि+म्+खिलखिख हिंबदुओं को वि+र्मिदष्ट विकया है: (i) यद्यविप, उ+की आख्या विववाविद स्र्थील पर मंविदर क े अस्जिस् त्व को तिचवि- कर ी है, र्थीाविप उन्हों+े स्वीकार विकया विक 'मंविदर' शब्द उ+क े द्वारा कति पय अन्य व्यविXयों क े इशारे पर अं ःस्र्थीाविप विकया गया र्थीा। उन्हें यह +हीं प ा र्थीा विक उस स्र्थीा+ पर बाबरी मस्जिस्Sद र्थीी या कु छ और र्थीा और कहा विक वह खिलख चुका र्थीा विक उसे दूसरों क े द्वारा क्या सूतिच विकया गया र्थीा; और (ii) परिरर्णामस्वरूप, साक्षी की आख्या को सिसद्ध कर+े पर अवलस्जिम्ब +हीं विकया Sा सक ा विक विववाविद ढाँचा एक मंविदर है क्योंविक उस+े इसे क े वल दूसरों क े सुझाव पर एक मंविदर क े रूप में तिचवि- विकया र्थीा। साक्षी क े इ+ स्वीकारोविXयों पर उसकी विवश्वस+ीय ा पर गंभीर संदेह हो ा है।

285. श्री भा+ु प्र ाप सिंसह (र्डीर्डब्ल्यू 3/11): इस साक्षी की मुख्य परीक्षा विद+ांक 28 अप्रैल, 2004 को अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा Sब वे 70 वष: क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीे। उन्हों+े 10 वष: की आयु से राम Sन्मभूविम मंविदर में Sा+े का दावा विकया। साक्षी +े कहा विक उ+की स्मृति कमSोर है। वह यह ब ा+े में असमर्थी: र्थीे विक राम Sन्मभूविम मंविदर क े अलावा कोई अन्य मंविदर वि+म ही अखाड़ा से संबंति* है अर्थीवा +हीं। Sब उन्हों+े अप+ी मुख्य परीक्षा का साम+ा विकया, ो उन्हों+े कहा विक: "मेरे उपरोX कर्थी+ का भाग 'चारों ओर मंविदर' गल है क्योंविक मंविदर क े वल दो ओर र्थीे... इस संबं* में, मैं गल कर्थी+ कर+े का कोई कारर्ण +हीं दे सक ा। मैं क ु छ थ्यों को भूल Sा ा हूं सिSसक े कारर्ण ऐसा कर्थी+ कर दे ा हूँ। यह भूलकर, मेरा आशय है विक उस समय मुझे उ+ थ्यों की स्मृति +हीं है।"

286. श्री राम अक्षयबर पांर्डे (र्डीर्डब्ल्यू 3/12): मुख्य परीक्षा विद+ांक 25 मई, 2004 को अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा। 70 वष: की आयु क े साक्षी +े कहा विक वह 12 वष: से राम Sन्मभूविम मंविदर Sा रहे र्थीे। साक्षी क े कर्थी+ क े वि+म्+खिलखिख पहलू महत्वपूर्ण: हैं: (i) साक्षी +े स्वीकार विकया विक विववाविद ढाँचे क े विवषय में Sा+कारी उसक े दादा से प्राप्त की गई र्थीी; (ii) यद्यविप उस+े अप+े मुख्य परीक्षा में कहा र्थीा विक वह अप+ी प्रति परीक्षा क े दौरा+ परिरक्रमा कर ा र्थीा, उस+े कहा विक उस+े ढांचे क े पीछे से ी+ गुंबदों को कभी +हीं देखा र्थीा; (iii) साक्षी +े कहा विक उस+े राम Sन्मभूविम की परिरक्रमा +हीं विकया बस्जिल्क रामचबू रे की विकया र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) साक्षी क े अ+ुसार, उसे £ामीर्णों द्वारा यह सूतिच विकया गया र्थीा विक राम Sन्मभूविम सिSसमें रामलला विवराSमा+ र्थीे प्राची+ हो+े क े कारर्ण ढह गई र्थीी; और (vi) साक्षी +े कहा विक उस+े इस विवषय में + ो पढ़ा और + ही सु+ा विक विववाविद ढाँचे क े ी+ गुंबदों का वि+मा:र्ण विकस+े विकया र्थीा। साक्षी +े अं ः अप+ी ही स्मृति की कमSोरी स्वीकार की और उसे गल ब+ा विदया।

287. महं राम सुभाग शास्त्री (र्डीर्डब्ल्यू 3/13): मुख्य परीक्षा विद+ांक 25 मई, 2004 को अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा। साक्षी की आयु 86 वष: र्थीी, उन्हों+े कहा विक वे वष: 1933 में अयोध्या आए र्थीे और उ+क े गुरु वि+म ही अखाड़ा से Sुड़े र्थीे। साक्षी क े कर्थी+ क े वि+म्+खिलखिख पहलू प्रासंविगक हैं: (i) साक्षी +े कहा विक विववाविद ढाँचे में विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की रा में अशांति र्थीी और यद्यविप उसे उस रा विकए गए प्रबं*ों क े विवषय में Sा+कारी +हीं र्थीी, यह हुआ विक +ई मूर्ति यां स्र्थीाविप की गई र्थीीं; (ii) मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े संबं* में, साक्षी +े कहा: ''बाबर +े मंविदर क े ढांचे को ध्वस् करक े मस्जिस्Sद ब+ाई र्थीी, लेविक+ वह उसे पूर्ण: ः मस्जिस्Sद वि+र्मिम कर+े में असमर्थी: र्थीा। इस ढाँचे में 14 स् ंभ वि+*ा:रिर विकए गए र्थीे, सिS+ पर मूर्ति प्रति विष्ठ र्थीी और इस प्रकार यह मूर्ति का स्र्थीा+ ब+ गया।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) साक्षी +े कहा विक संभव ः वष: 1933-34 क े पश्चा ् की अवति* से संबंति* थ्य उसकी स्मृति से विमर्ट गए र्थीे। साक्षी का कर्थी+ विक विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की रा को विववाविद ढाँचे में मूर्ति याँ स्र्थीाविप की गई र्थीीं यह वि+म ही अखाड़े क े मामले क े विवपरी है। वि+म ही अखाड़ा क े अ+ुसार, विववाविद स्र्थील पर कभी कोई मस्जिस्Sद +हीं र्थीी और सबक े सार्थी एक मंविदर र्थीा Sो इसक े प्रबं*+ में र्थीा और विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को कोई घर्ट+ा +हीं हुई र्थीी।

288. Sगद गुरु रामा+ंदाचाय: स्वामी हया:चाय: (र्डीर्डब्ल्यू 3/14): मुख्य परीक्षा विद+ांक 23 Sुलाई, 2004 को अणिभखिलखिख की गई र्थीी Sब साक्षी 69 वष: का र्थीा। वह वष: 1985-86 से रामा+ंद संप्रदाय क े प्रमुख र्थीे। वे वष: 1949 वष: की आयु में अयोध्या आए। उ+क े अ+ुसार, उन्हों+े क ें ˆीय गुंबद क े सार्थी-सार्थी रामचबू रे क े बाहर विववाविद ढाँचे क े अंदर राम लला की मूर्ति को देखा र्थीा। साक्षी +े गवाही दी विक Sब उस+े प्रर्थीम बार 15 फीर्ट की दूरी से दश:+ विकया र्थीा ो यह गुम्बद क े +ीचे +हीं बस्जिल्क अहा े से र्थीा। अयोध्या आ+े से पूव: ही साक्षी को इस बा की कोई Sा+कारी +हीं र्थीी विक विववाविद ढाँचे में +माS अदा की गई र्थीी। साक्षी +े इस संभाव+ा को खारिरS +हीं विकया विक मूर्ति यों को वष: 1949 में विववाविद ढाँचे क े अंदर रखा गया र्थीा, Sब उन्हों+े कहा विक: "यह संभव है विक वष: 1949 में हुए विववाद और घर्ट+ा में, सिSसमें विववाविद भव+ में मूर्ति को रखा गया र्थीा, अयोध्या क े स्र्थीा+ीय हिंहदुओं mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की कोई भूविमका +हीं र्थीी, बस्जिल्क बाहरी सा*ु सं इसक े खिलए सिSम्मेदार र्थीे।"

289. +रेंˆ बहादुर सिंसह (र्डीर्डब्ल्यू 3/15): मुख्य परीक्षा विद+ांक 17 अगस्, 2004 को अणिभखिलखिख की गई र्थीी। साक्षी की आयु 72 वष: र्थीी। उ+क े अ+ुसार, Sब वे 11 वष: क े र्थीे ो वह अप+े मा ा-विप ा क े सार्थी राम Sन्मभूविम गए और उन्हों+े देखा विक राम लला की मूर्ति क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे विवराSमा+ है। उन्हों+े दावा विकया विक 15 वष: की आयु से विवध्वंस क वह अक े ले ही मंविदर Sा रहे र्थीे। र्डॉ. *व+ +े साक्षी क े बया+ क े संबं* में वि+म्+खिलखिख हिंबदुओं को सन्दर्भिभ विकया है:

(i) Sब वह विववाविद स्र्थील Sा+ा प्रारंभ कर ा है सिSसक े खिलए उस+े विवणिभन्न समयावति* प्रस् ु की है इसक े खिलए साक्षी की पूर्ण: ः अवहेल+ा आवश्यक है।यद्यविप, उन्हों+े अप+ी मुख्य परीक्षा में कहा विक वे प्रर्थीम बार 11 वष: की आयु में प्रर्थीम बार गए र्थीे, अप+ी प्रति परीक्षा में उन्हों+े कहा विक वे 5-6 वष: और 8-9 वष: की आयु से वि+म विहयों को विववाविद ढाँचे का प्रबं*+ कर े हुए देखा र्थीा।; (ii) अप+े कर्थी+ क े संबं* में उन्हों+े कहा विक विववाविद स्र्थील पर +माS अदा हो े कभी +हीं देखा र्थीा, उन्हों+े कहा हिंक वह उस स्र्थील पर वहा +हीं र्थीा और इसखिलए यह +हीं देख सका विक क्या +माज़ अदा की Sा रही र्थीी; और (iii) साक्षी +े उत्तर विदशा में Sन्मस्र्थीा+ मंविदर क े अस्जिस् त्व से इ+कार विकया सिSसे वि+म ही अखाड़ा +े इसकी प्रति क ृ ति में स्वीकार विकया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

290. णिशव भीख सिंसह (र्डीर्डब्ल्यू 3/16): साक्षी की आयु उस ति णिर्थी को 79 वष: र्थीी Sब विद+ांक 24 अगस्, 2004 को मुख्य परीक्षा क े माध्यम से उस+े अप+े शपर्थीपत्र में शपर्थी विकया र्थीा। उन्हों+े दावा विकया विक वह 12 वष: की आयु से राम Sन्मभूविम मंविदर गए र्थीे और उन्हों+े क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे भगवा+ राम की मूर्ति देखी र्थीी। साक्षी +े कहा विक राम लला की मूर्ति राम Sन्मभूविम मंविदर में स्जिस्र्थी र्थीी और ी+ गुफाएँ र्थीीं। उन्हों+े इस बा से इ+कार विकया विक मूर्ति यों को विद+ांंक 23 विदसंबर 1949 को विववाविद ढाँचे में रखा गया र्थीा। उ+क े अ+ुसार, मूर्ति याँ उ+क े पूव:Sों से पूव: भी विववाविद ढाँचे पर मौSूद र्थीीं। साक्षी +े ी+ गुंबदाकार ढाँचे में दश:+ क े विवषय में बा की Sहां मूर्ति मौSूद र्थीी, परन् ु कहा विक वि£ल-ई ंर्ट की दीवार क े अंदर परिरक्रमा विकया गया र्थीा। उ+क े अ+ुसार विववाविद परिरसर में सी ा रसोई +ाम का कोई स्र्थीा+ +हीं र्थीा। साक्षी +े यह भी कहा विक Sब वह प्रर्थीम बार ी+ गुंबदाकार ढाँचे में गया र्थीा, ो वह विबल्क ु ल क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे +हीं र्थीा और उस+े गुंबद क े वि+चले विहस्से क े साम+े वाले द्वार से दश:+ विकया र्थीा।

291. श्री मा ा बदल ति वारी (र्डीर्डब्ल्यू 3/17): मुख्य परीक्षा 31 अगस्, 2004 विद+ांविक की ति णिर्थी में साक्षी की आयु 84 वष: र्थीी। उस+े दावा विकया विक वह 15 वष: की आयु में प्रर्थीम बार वष: 1935 में राम Sन्मभूविम मंविदर गया र्थीा और ब से अयोध्या Sा ा रहा है। साक्षी को अयोध्या की बाबरी मस्जिस्Sद क े विवषय में या वह कहाँ स्जिस्र्थी है इसकी कोई Sा+कारी +हीं र्थीी। हालांविक उस+े कहा विक उस+े मस्जिस्Sद क े बारे में सु+ा र्थीा। मस्जिस्Sद क े विवषय में इस mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साक्षी की Sागरूक ा क े अभाव में वष: 1934 क े दंगों पर उसक े विववरर्ण द्वारा विवरो*ाभास है: "मैं+े अयोध्या क े दंगे का सिSक्र विकया है। यह दंगा वष: 1934 में हुआ। उस समय विववाविद ढाँचे का क ु छ विहस्सा क्षति £स् हो गया र्थीा। कई लोगों +े इ+ गुंबदों को क्षति £स् विकया। क्षति क ा: हिंहदू *म: को मा++े वाले र्थीे।" साक्षी क े अ+ुसार वष: 1934 में सिS+ व्यविXयों +े गुंबद को क्षति £स् विकया यविद वे *म: से हिंहदू र्थीे ो मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व क े विवषय में उ+की Sागरूक ा का अभाव स्वीकार कर+ा असंभव है।

292. श्री आचाय: महं बंसी*र दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/18): 1905 में Sन्मे साक्षी +े कहा विक वे अयोध्या वष: 1930 में आए र्थीे। विद+ांक 15 सिस ंबर 2004 को मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी में उ+की आयु 99 वष: र्थीी। उन्हों+े कहा विक वह लगा ार विववाविद ढांचे में Sा रहे र्थीे और आं रिरक अहा े में मूर्ति यों की पूSा कर रहे र्थीे। इस गवाह की गवाही क े वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर ध्या+ दे+े की आवश्यक ा है: (i) साक्षी +े यह अणिभसाक्ष्य विदया विक रामचबू रे को बेदी भी कहा Sा ा है और इस शब्द का उपयोग छोर्टे या बड़े चबू रे क े खिलए विकया Sा सक ा है; (ii) साक्षी +े कहा विक यविद कोई *ार्मिमक स्र्थीा+ है और कोई उसे गल सा*+ों से प्राप्त कर रहा है या उस पर बला ् कब्Sा कर रहा है ो झूठ बोल+े में कोई हावि+ +हीं है; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) साक्षी +े स्वीकार विकया विक उसकी स्मृति आयु क े कारर्ण अच्छी +हीं है (iv) साक्षी +े लगभग दो सौ वादों में बया+ विदया र्थीा। साक्षी क े पास वादकारी हिंहदू पक्षकारों क े अणिभकणिर्थी मामले क े विवपरी मंविदर क े वि+मा:र्ण क े विवषय में विवणिभन्न सिसद्धां र्थीे: (क) उ+क े अ+ुसार, राम Sन्मभूविम की मरम्म वि+म ही अखाड़े द्वारा विपछले 700 वषÂ क े दौरा+ की गई र्थीी; (ख) कसौर्टी काले पत्र्थीरों क े मंविदर का वि+मा:र्ण वि+म ही अखाड़ा द्वारा विकया गया र्थीा; (ग) विवक्रमाविदत्य की कालावति* में वि+र्मिम मंविदर का वि+मा:र्ण कन्नौS क े राSा द्वारा विकया गया र्थीा + विक अयोध्या क े राSा द्वारा; (घ) मीर बाकी +े राम मंविदर को +ष्ट कर विदया लेविक+ मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया, मंविदर का पु+र्मि+मा:र्ण गोहिंवद दास +े विकया Sो बाबर क े शास+ क े दौरा+ वि+म ही अखाड़ा क े महं र्थीे; (ङ) गोहिंवद दास Sी +े ी+ गुंबदाकार भव+ का वि+मा:र्ण विकया; (च) मंविदर का क ु छ विहस्सा बाबर क े शास+ काल में वि+र्मिम हुआ र्थीा Sो हुमायूं क े शास+ क े दौरा+ +ष्ट हो गया र्थीा हिंक ु उसका पु+र्मि+मा:र्ण गोहिंवद दास Sी द्वारा कराया गया र्थीा; और (छ) रामा+ंद क े णिशष्य अ+ं ा+ंद +े विववाविद स्र्थील पर मंविदर का पु+र्मि+मा:र्ण विकया।

293. श्री राम विमल+ सिंसह (र्डीर्डब्ल्यू 3/19): साक्षी की आयु विद+ांक 17 अगस्, 2004 को 75 वष: र्थीी Sब उसकी मुख्य परीक्षा अणिभखिलखिख की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गई र्थीी। उस+े क ें ˆीय गुंबद क े अंदर मूर्ति यों क े अस्जिस् त्व को साविब कर+ा चाहा और कहा विक वह वह 1940 से 1951 क और कभी-कभी 1952 क े बाद से आ ा रहा। Sब उसक े शपर्थीपत्र क े विवषय में प्रश्न विकया गया ो उस+े कहा विक: “इस शपर्थी-पत्र को ैयार कर+े वाला व्यविX ही क े वल इस विवषय में ब ा सक ा है। मैं+े इस पर हस् ाक्षर कर+े से पूव: मुख्य परीक्षा क े शपर्थीपत्र को पूर्ण: ः +हीं पढ़ा र्थीा... मैं+े उच्च न्यायालय लख+ऊ में इस शपर्थीपत्र पर अप+ा हस् ाक्षर विकया र्थीा। मैं यह +हीं ब ा सक ा विक यह शपर्थीपत्र लख+ऊ में र्टाइप विकया गया र्थीा अर्थीवा +हीं। Sब मेरे इस शपर्थीपत्र का मसौदा ैयार विकया गया र्थीा, मैं अयोध्या में अप+े अति*वXा क े यहाँ र्थीा। उन्हों+े कहा र्थीा विक 'मैं आपक े शपर्थीपत्र का प्रारूप ैयार कर रहा हूं'। मैं+े शपर्थीपत्र का मसौदा ैयार हो+े क े बाद इसक े थ्य +हीं देखे र्थीे।" उपरोX स्वीक ृ ति उसक े साक्ष्य को अविवश्वस+ीय और विवश्वस+ीय ा क े योग्य +हीं ब+ा ा है।

294. महं राSा रामचन्ˆ आचाय: (र्डीर्डब्ल्यू 3/20): विद+ांक 27 अX ू बर, 2004 को मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी को साक्षी की आयु 76 वष: र्थीी। वह वाद 3 में विद्व ीय वादी महं रघु+ार्थी दास क े णिशष्य र्थीे। साक्षी +े कहा विक 1943 में, Sब वह पहली बार अयोध्या आए ो बाबरी मस्जिस्Sद मौSूद +हीं र्थीी और विववाविद भव+ मस्जिस्Sद +हीं है: "वष: 1943 में Sब मैं अयोध्या आया ो वहाँ बाबरी मस्जिस्Sद +हीं र्थीी। वष: 1943 में विववाविद स्र्थील पर कोई मस्जिस्Sद +हीं र्थीी क्योंविक वहाँ पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मूर्ति यों की पूSा की Sा ी र्थीी। मैं+े बाबरी मस्जिस्Sद का +ाम सु+ा है। विववाविद भव+ बाबरी मस्जिस्Sद है। (पु+ः कहा गया) यह बाबरी मस्जिस्Sद +हीं है; यह एक मंविदर है। विववाविद भव+ में ी+ गुम्बद हैं। यह कोई मस्जिस्Sद +हीं है। यह भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ है। वष: 1943 में Sब मैं पहली बार अयोध्या आया ो मैं+े बाबरी मस्जिस्Sद +हीं देखी र्थीी। मैं+े कभी भी विववाविद भव+ में +माS अदा हो े +हीं देखा। मैं+े वहीं पूSा हो े देखी है। (स्वयं क े द्वारा कहा गया) पूSा स्र्थील पर +माज़ अदा कर+े का कोई सवाल ही +हीं उठ ा। वष: 1943 में Sब मैं पहली बार अयोध्या आया ो मैं+े एक मंविदर देखा, वहाँ कोई मस्जिस्Sद +हीं है। (स्वयं क े द्वारा कहा गया) वहाँ पर पूSा सेवा (पूSा कर+ा और सेवा प्रदा+ कर+ा) हो ा र्थीा। विववाविद भव+ में ी+ गुम्बद ब+ाये गये र्थीे।" साक्षी क े अ+ुसार वष: 1943 से 1950 क विववाविद भव+ पर +माS अदा +हीं की गई र्थीी और पूSा की Sा रही र्थीी; और मंविदर परिरसर विववाविद भव+ की ी+ गुंबदाकार ढाँचे क े +ीचे स्जिस्र्थी र्थीा।

295. वि+म ही अखाड़े क े समर्थी:+ में अपदस्र्थी सातिक्षयों क े मौखिखक साक्ष्य क े उपरोX विववरर्ण से संक े विमल ा है विक उ+क े कर्थी+ अ+ुश्रुति यों से परिरपूर्ण: हैं। कई अवसरों पर विववाविद स्र्थील का दौरा कर+े का दावा कर+े वाले साक्षी इसकी भौति क विवशेष ाओं को अणिभखिलखिख कर+े में असमर्थी: र्थीे। यद्यविप, सातिक्षयों द्वारा कणिर्थी रूप से कहा गया है विक विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को कोई घर्ट+ा +हीं हुई र्थीी और उ+में से एक +े इस आ*ार पर अ+णिभज्ञ ा व्यX की विक वह उस समय विववाविद ढाँचे क े अंदर सो रहा र्थीा, इसे एक प्रमाणिर्णक अर्थीवा विवश्वस+ीय विववरर्ण क े रूप में स्वीकार कर+ा असंभव है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सातिक्षयों क े कर्थी+ विवसंगति यों और विवरो*ाभासों से परिरपूर्ण: हैं। साक्षी परिरक्रमा माग: की प्रक ृ ति और मूर्ति यों की संख्या क े विवषय में अवि+तिश्च र्थीा। विववाविद ढाँचे क े अंदर मूर्ति यों का विववरर्ण प्रस् ु कर े समय, कई सातिक्षयों +े अणिभस्वीक ृ ति दी विक वे विववाविद ढाँचे में +हीं गए र्थीे। कई सातिक्षयों +े मुख्य परीक्षा क े खिलए अप+े शपर्थीपत्रों को पढा +हीं र्थीा और विवषय वस् ुओं को समझे विब+ा क े वल अप+े हस् ाक्षर विकए र्थीे। कई साक्षी मुख्य परीक्षा में अप+े दावे की पुविष्ट कर पा+े में सक्षम +हीं हैं और वास् व में उ+क े स्वयं क े कर्थी+ों पर विवरो*ाभासी थ्य हैं। कई सातिक्षयों +े विववाविद ढांचे क े संबं* में विववरर्णों को प्रस् ु विकया Sो वि+म ही अखाड़े क े अणिभकणिर्थी मामले से अलग हैं। वास् व में वाद 4 में क ु छ सातिक्षयों +े इस मामले का समर्थी:+ विकया विक Sहां प्रार्थी:+ा की गई र्थीी वहाँ बाबरी मस्जिस्Sद मौSूद र्थीी। परिरर्णामस्वरूप साक्षी क े विववरर्णों को वि+म ही अखाड़े क े मामले क े समर्थी:+ में विवश्वस+ीय प्रमार्ण +हीं मा+ा Sा सक ा है। M.[6] वि+म ही अखाड़ा का आं रिरक अहा े पर कब्Sे का दावा

296. वाद 3 में वि+म ही अखाड़े का दावा आं रिरक अहा े क े संबं* में है, सिSसमें मस्जिस्Sद की ी+ गुंबदाकार ढाँचा शाविमल है। वि+म ही अखाड़ा विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की घर्ट+ा को अस्वीकार कर ा है सिSसक े दौरा+ मूर्ति यों को विववाविद ढाँचे में स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। वि+म ही अखाड़े क े अ+ुसार ढाँचा एक मंविदर है + विक मस्जिस्Sद। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस कर्थी+ का समर्थी:+ कर+े क े खिलए Sो मौखिखक साक्ष्य प्रस् ु विकये गए हैं, उ+का पूव: विवश्लेषर्ण विकया गया है। वि+म ही अखाड़े क े मौखिखक साक्ष्य विकसी भी अस्पष्ट, विवश्वस+ीय या भरोसेमंद विववरर्ण को इंविग +हीं कर ा है Sो आं रिरक अहा े या ढाँचे क े कब्Sे में है। वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रस् ु सातिक्षयों क े मौखिखक साक्ष्य क े संबं* में इस स्जिस्र्थीति क े सार्थी, यह Sांच कर+ा आवश्यक हो Sा ा है विक क्या दस् ावेSी साक्ष्य वि+म ही अखाड़े क े मामले का समर्थी:+ कर ा है Sो आं रिरक अहा े और ढाँचे क े कब्Sे में है।

297. वाद 3 में वाविदयों की रफ से प्रस् ु वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा श्री एस. क े. Sै+ +े न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: क े वि+र्ण:यों में विदए गए वि+ष्कषÂ पर बल विदया विक महं गोहिंवद दास क े Sयपुर छोड़कर अयोध्या आ+े क े बाद वष: 1734 से वि+म ही अखाड़े की उपस्जिस्र्थीति र्थीी। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े वाद 3 में विववाद्यक 17 का वि+र्ण:य कर े हुए कहा विक: "799.... वि+म ही अखाड़ा वादी सं. 1 बैराविगयों क े रामा+ंदी पंर्थी का एक पंचाय ी मठ है और इस रह यह एक *ार्मिमक संप्रदाय है Sो अप+ी *ार्मिमक आस्र्थीा और प्रर्थीा क े अ+ुसार अ+ुसरर्ण कर रहा है। हालांविक, हम यह भी मा+ े हैं विक अयोध्या में इसकी वि+रं र ा 1734 ईस्वी क े बाद कभी-कभी (यर्थीाव ) विमल ी है और इससे पहले +हीं।" न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े महं भास्कर दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/1) और राSा रामचंˆाचाय: (र्डीर्डब्ल्यू 3/20) क े साक्ष्य पर अवलंब खिलया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “वि+म ही अखाड़ा बैराविगयों क े रामा+ंद पंर्थी की एक पंचाय ी है और यह *ार्मिमक संप्रदाय क े रूप में है। यह प्रर्थीा वष: 1949 में मान्य हो चुकी है।"

298. ये वि+ष्कष: आं रिरक अहा े को वि+म विहयों क े कब्Sे में हो+े की पुविष्ट +हीं कर े हैं। उ+क े द्वारा अवलस्जिम्ब दस् ावेSी साक्ष्यों की Sांच कर े हुए, अयोध्या में वि+म ही अखाड़ा की उपस्जिस्र्थीति मात्र अर्थीवा विववाविद स्र्थील क े आसपास और विववाविद संरच+ा क े वास् विवक कब्Sे क े बीच अं र स्पष्ट विकया Sा+ा चाविहए। उस संदभ: में श्री एस क े Sै+ +े वष: 1770 क े विर्टफ ें र्थीालर क े विववरर्ण को संदर्भिभ विकया, Sो भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ का प्र ीक बेदी या पाल+े की उपस्जिस्र्थीति को संदर्भिभ कर ा है। विर्टफ ें र्थीालर क े विववरर्ण में पाल+े क े संदभ: को विववाविद ढाँचे या मस्जिस्Sद क े आं रिरक अहा े क े कब्Sे क े सूचक क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है। श्री आचाय: महं बंसी*र दास उफ: उविड़या बाबा (र्डीर्डब्ल्यू 3/18), Sो वि+म ही अखाड़े क े गवाह र्थीे, +े कहा विक रामचबू रा को भी बेदी कहा Sा ा है। इस साक्षी क े कर्थी+ का आशय विक बेदी/पाल+ा रामचबू रे में र्थीा, को संदभ: से बाहर +हीं विकया Sा सक ा और इसे साक्ष्यों की संपूर्ण: ा क े प्रकाश में पढ़ा Sा+ा चाविहए, सिSसमें उन्हों+े विर्टफ ें र्थीालर क े अवलोक+ों सविह +ोविर्टस विकया र्थीा। अन्य दस् ावेSों क े बीच, सिS+ पर अवलम्ब खिलया गया है: (I) वाल्र्टर हैविमल्र्ट+ की "ईस्र्ट इंतिर्डया गSेविर्टयर ऑफ विहन्दुस् ा+"; (ii) एर्डवर्ड: र्थीॉ+:र्ट+ की ''द गSेविर्टयर ऑफ द र्टेरीर्टोरीS अ°र्डर द गव+:मेंर्ट ऑफ ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी''; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) विद+ांक 25 सिस ंबर, 1866 को मस्जिस्Sद परिरसर क े भी र क ु छ बैराविगयों द्वारा वि+र्मिम "कोठरी" क े संबं* में मीर राSब अली खा ीब द्वारा की गई णिशकाय; (iv) का+†गी की "विहस्र्टोरिरकल स्क े च ऑफ फ ै Sाबाद"; (v) उत्तरी विदशा में एक +ए द्वार क े वि+मा:र्ण हे ु विद+ांक 13 अप्रैल, 1877 को महं खेम दास को अ+ुमति प्रदा+ की गई; (vi) +ए द्वार क े खिलए अ+ुज्ञा विदए Sा+े क े विवरुद्ध विद+ांक 13 विदसंबर, 1877 को अपील दायर की गइ:; (vii) उपरोX अपील क े दृविष्टग उपायुX द्वारा ब+ाई गइ: रिरपोर्ट:; (viii) अपील को खारिरS कर+े वाला 13 विदसंबर, 1877 विद+ांविक को आयुX का आदेश; (ix) अव* प्रां (1877-78) का गSेविर्टयर; (x) सैयद मोहम्मद असगर द्वारा महं रघुबर दास क े विवरूद्ध चबू रे क े उपयोग क े खिलए विकराए की मांग कर े हुए विद+ांक 8 +वंबर, 1882 को वादपत्र में वाद संस्जिस्र्थी विकया गया; (xi) विद+ांक 18 Sू+, 1883 को फ ै Sाबाद क े उप-न्याया*ीश का वाद को खारिरS कर+े वाला आदेश; (xii) सैयद मोहम्मद असगर द्वारा मस्जिस्Sद की मरम्म कर+े की अ+ुमति क े खिलए विद+ांक 2 +वंबर, 1883 को दायर विकया गया आवेद+; (xiii) 12 S+वरी, 1884 विद+ांविक का उपायुX का आदेश; (xiv) 22 S+वरी 1884 विद+ांविक का सहायक आयुX का आदेश; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (xv) 27 Sू+, 1884 विद+ांविक को महं रघुबर दास द्वारा की गई णिशकाय में सैयद मोहम्मद असगर द्वारा मस्जिस्Sद की दीवारों को सफ े द कर+े क े खिलए विकए Sा रहे कायÂ क े मद्दे+Sर स्र्थील वि+रीक्षर्ण की मांग की गई र्थीी।

299. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े फ ै सले में इ+ दस् ावेSों का विवश्लेषर्ण विकया गया है, सिSसमें पाया गया है विक मूर्ति रामचबू रे में मौSूद र्थीी और वि+म ही अखाड़ा मूर्ति की पूSा की देखरेख कर रहे र्थीे, Sो अन्य हिंहदू पक्षकारों द्वारा गंभीर ा से विववाविद +हीं र्थीा। हालांविक, न्यायमूर्ति अ£वाल +े अवलोक+ विकया विक यह मा++े का कोई आ*ार +हीं र्थीा विक विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को ढाँचे क े अंदर मूर्ति यों क े स्र्थीा+ां रर्ण कर+े क े बाद भी वि+म ही अखाड़ा ऐसा कर ा रहा है। यह वि+ष्कष: इसखिलए र्थीा क्योंविक वि+म ही अखाड़ा +े विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को कोई भी घर्ट+ा हो+े से स्पष्ट ः इ+कार कर विदया र्थीा और उ+क े पास उस रा हुई घर्ट+ाओं को ब ा+े का कोई ठोस स्पष्टीकरर्ण +हीं र्थीा। वि+म ही अखाड़े द्वारा सिS+ दस् ावेSों पर अवलम्ब खिलया गया है, उ+की साव*ा+ीपूव:क Sांच से यह वि+ष्कष: +हीं वि+कल ा है विक वि+म ही अखाड़े का विववाविद ढांचे पर विवशेष कब्Sा र्थीा। हमें श्री एस क े Sै+ क े क: को ध्या+ में रख+ा चाविहए विक मस्जिस्Sद क े विववाविद ढाँचे को स्र्थीलबद्ध कर विदया गया र्थीा और बाह्य अहा े सिSसमें रामचबू रा, सी ा रसोई और भंर्डार शाविमल र्थीे, मस्जिस्Sद में प्रवेश क े खिलए बाति* विकए गए र्थीे। बाह्य अहा े में दो द्वार-सिंसह द्वार और ह+ुम द्वार र्थीे। हिंक ु, क्या विववाविद ढाँचे का स्र्थीलबद्ध हो+ा इस वि+ष्कष: क े थ्य की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ओर ले Sाएगा विक क्या वि+म ही अखाड़े का आं रिरक ढाँचे पर कब्Sा र्थीा? प्रातियक ाओं क े पूव:सग: पर उस वि+ष्कष: को रेखांविक कर+ा संभव +हीं है।

300. वष: 1885 में चबू रे पर मंविदर क े वि+मा:र्ण की अ+ुमति मांग े हुए महं रघुबर दास द्वारा एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। फ ै Sाबाद में उप - न्याया*ीश +े 24 विदसंबर 1985 विद+ांविक क े वि+र्ण:य में अवलोविक विकया विक यद्यविप चबू रे क े कब्Sे वाला क्षेत्र वादी क े कब्Sे और स्वाविमत्व में र्थीा, हिंक ु वि+मा:र्ण काय: कर+े की अ+ुमति इस आ*ार पर म+ा कर दी Sा+ी चाविहए विक यह लोक विह में +हीं र्थीा और यह हिंहदुओं और मुस्जिस्लम समुदायों क े बीच संघष: की +ींव र्डालेगा। अपील में, सिSला न्याया*ीश फ ै Sाबाद +े विद+ांक 18/26 माच: 1886 को महं रघुबर दास क े पक्ष में विकए गए चबू रे क े स्वाविमत्व पर अवलोक+ों को हर्टा विदया। श्री एस क े Sै+ +े अप+े खिलखिख कर्थी+ों में स्पष्ट ः स्वीकार विकया है विक वष: 1885 क े वाद से उत्पन्न हो+े वाली घर्ट+ाओं को बाह्य अहा े में रामचबू रे पर महं रघुबर दास की उपस्जिस्र्थीति दर्भिश कर+े क े खिलए अवलम्ब खिलया गया है। इसक े अलावा, वि+म ही वष: 1885 क े वाद क े विवषय में अस्पष्ट रहे हैं, एक समय इसक े बारे में अ+णिभज्ञ ा का संक े दे े हैं और विफर अन्य समय में असंग स्जिस्र्थीति को अप+ा े हैं।

301. वि+म ही अखाड़े द्वारा अवलस्जिम्ब दस् ावेSों की अगली श्रेर्णी वष: 1900 से प्रारम्भ हो ा है। ये दस् ावेS अ£खिलखिख हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) श्रद्धालुओं को पी+े का पा+ी उपलब्* करा+े क े खिलए सिंझगू को अ+ुमति दे+े वाला अ+ुबं*176; (ii) एच. आर. +ेविवल की '' द गSेविर्टयर ऑफ द यू+ाइर्टेर्ड प्राॉविवन्सेS ऑफ आगरा ए°र्ड अव* 1905'' यह कह े हुए विक वि+म ही अखाड़ा पंर्थी पूव: में रामकोर्ट में राम Sन्मभूविम मंविदर र्थीा, सिSसक े अवशेष अब भी उ+क े हैं; (iii) महं रघु+ार्थी दास क े पक्ष में दाखिखल खारिरS;177 (iv) विद+ांक 13 अक्र्टूबर, 1942 को ठेका दुका+ का अ+ुबं*;178 (v) महं रघु+ार्थी दास द्वारा एक दुका+ क े संबं* में वि+ष्पाविद 29 अX ू बर, 1945 विद+ांविक का अ+ुबं*;179 (vi) वक्फ वि+रीक्षक द्वारा यह रिरपोर्ट: विक विहन्दू और सिसखों क े भयवश मुस्जिस्लम मस्जिस्Sद में +माज़ अदा +हीं कर पा रहे र्थीे;180 (vii) 29 विदसंबर, 1949 विद+ांविक की वक्फ वि+रीक्षक की रिरपोर्ट: में विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949181 क े बीच पुखिलसकर्मिमयों की उपस्जिस्र्थीति दS: की गई र्थीी और यह विक शुक्रवार को Sब मस्जिस्Sद 3-4 घंर्टे क े खिलए खुली है, सिसवाय इसक े कोई +माS अदा +हीं की Sा रही र्थीी और कई बैरागी मस्जिस्Sद पर Sबर+ कब्Sा कर+े की कोणिशश कर रहे र्थीे; (viii) 5 S+वरी, 1950 विद+ांविक को प्राप की रिरपोर्ट: Sो वि+म ही अखाड़ा को संदर्भिभ कर ी है, Sबविक उसक े कब्Sे में ली गई संपखित्त की सीमाओं का तिचत्रर्ण कर ी है।182 विद+ांक 5 S+वरी 1950 को क ु क— क े बाद, 176 Exhibit 8 177 Exhibit 49 178 Exhibit 9 179 Exhibit 10 180 Exhibit A-63 - Suit 1 181 Exhibit A- 64 - Suit 1 182 Exhibit A– 3 – Suit 4 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह क: विदया गया है विक महं बलदेव दास द्वारा *ारा 145183 क े ह काय:वाही में आपखित्तयां दS: की गई र्थीीं; (ix) वष: 1961 में, बाह्य अहा े में वि+मा:र्ण क े खिलए अ+ुमति मांगी गई र्थीी; और (x) सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े स्पष्टीकरर्ण 9 फरवरी, 1961 विद+ांविक में यह कहा गया विक क ै +वास या कवर क े स्र्थीा+ पर कोई आपखित्त +हीं र्थीी। वि+म ही अखाड़े द्वारा सिS+ दस् ावेSों को सन्दर्भिभ कर े हुए अवलम्ब खिलया गया है, उ+क े अ+ुसार, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अव*ारिर विकया विक दस् ावेSों की अन् व:स् ु सिS+क े पक्षकार प्रति वादी +हीं र्थीे, प्रश्नग स्वत्व और आति*पत्य पर प्रासंविगक +हीं हैं। वि+म ही अखाड़ा द्वारा अवलस्जिम्ब दस् ावेSी साक्ष्य आं रिरक अहा े क े भी र क े परिरसर क े संबं* कु छ +हीं ब ा े हैं।

302. अपील की सु+वाई क े दौरा+ र्डॉ. राSीव *व+ +े उ+ प्रदशÂ पर एक विवस् ृ प्रति विक्रया दायर की सिSस पर वि+म ही अखाड़ा +े अवलम्ब खिलया र्थीा। सांप्रदातियक संघष: क े इति हास क े घर्ट+ाक्रम में वष: 1856-57 एवं 1934 में हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े बीच कई विवˆोहों का संक े दे ा है। वष: 1934 में मस्जिस्Sद आंणिशक रूप से क्षति £स् हो गई और इसक े बाद मस्जिस्Sदों में +माS अदा कर+े क े दौरा+ मुस्जिस्लमों को +माS अदा कर+े क े अति*कार से वंतिच रख+े में बा*ाएं र्डाली गई ं ।इसक े बाद 22/23 विदसंबर 1949 को हुई घर्ट+ाओं क े बाद गुप्त रूप से मूर्ति यों को क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे रखा गया। 183 Exhibit 6 -Suit 3 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसक े ुरं बाद, *ारा 145 क े ह काय:वाही प्रारम्भ की गई सिSसक े परिरर्णामस्वरूप संपखित्त की क ु क— की गयी। इस पृष्ठभूविम में, वि+म ही अखाड़ा क े मामले को स्वीकार कर+ा मुस्जिश्कल है विक विववाविद ढाँचा एक मंविदर र्थीा Sो उ+क े अ+न्य कब्Sे में र्थीा और विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को कोई घर्ट+ा +हीं हुई र्थीी। मस्जिस्Sद से संबंति* दस् ावेSी साक्ष्य (1934-1949)

303. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से प्रस् ु वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा श्री Sफरयाब सिSला+ी +े विववाविद ढाँचे क े कब्Sे संबंति* वि+म ही अखाड़े क े दावे का खंर्ड+ कर े हुए इस मामले का समर्थी:+ कर+े क े खिलए दस् ावेSी साक्ष्य पर अवलम्ब खिलया विक आं रिरक अहा े क े भी र स्जिस्र्थी ढाँचा एक मस्जिस्Sद र्थीी और यह विक वष: 1934 से 1949 क मुस्जिस्लमों द्वारा +माS अदा कर+े क े खिलए उपयोग विकया Sा ा रहा र्थीा। इस दस् ावेSी साक्ष्य का असर मस्जिस्Sद क े अ+न्य कब्Sे संबंति* वि+म ही अखाड़े क े दावे की सत्य ा पर पड़ ा है और इसखिलए इसकी Sांच कर+े की आवश्यक ा है। दस् ावेSी साक्ष्य में वि+म्+खिलखिख शाविमल हैं: (i) अपर दीवा+ी न्याया*ीश, फ ै Sाबाद185 क े समक्ष वि+यविम वाद 95/1941 (महं रामचरर्ण दास ब+ाम रघु+ार्थी दास) में 6 Sुलाई, 1942 विद+ांविक को तिर्डक्री और विद+ांक 4 Sू+, 1942184 क े आदेश की प्रमाणिर्ण 185 Exhibits A-5 - Suit 4 184 Exhibit A-4 – Suit 4 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रति । वाद में समझौ ा हुआ र्थीा। समझौ े की श Â में "बाबरी मस्जिस्Sद"186 का एक विवणिशष्ट संदभ: है:

"2. मोहल्ला रामकोर्ट, सिसर्टी अयोध्या, परग+ा हवेली अव*, हसील और S+पद फैSाबाद में स्जिस्र्थी भूविम के सार्थी एक पक्का मंविदर , सिSसकी सीमाओं को वि+म्+ा+ुसार वर्भिर्ण विकया गया है: पूव:ः पर ी और कविब्रस् ा+ पतिश्चमः बाबरी मस्जिस्Sद उत्तर: पक्की रोर्ड दतिक्षर्ण: कविब्रस् ा+।"

वाद वि+म विहयों क े मध्य र्थीा। उपरोX दस् ावेS इंविग कर े हैं विक मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व से इ+कार +हीं विकया Sा सक ा है; (ii) विद+ांक 27 माच:, 1934 को या बकरीद क े अवसर पर हुए दंगों क े पश्चा ् मस्जिस्Sद का एक भाग +ष्ट हो गया। उस संबं* में, परिरसर की मरम्म से संबंति* दस् ावेS वि+म्+खिलखिख हैं: (क) बाबरी मस्जिस्Sद की सफाई और *ार्मिमक सेवाओं क े उपयोग क े खिलए मंSूर की गइ: अ+ुज्ञा187; (ख) मस्जिस्Sद क्षति £स् हो+े क े कारर्ण बैराविगयों से Sुमा:+े की प्राविप्त क े खिलए 5 Sू+, 1934 विद+ांविक को मोहम्मद Sकी एवं अन्य का आवेद+188; (ग) मस्जिस्Sद को हुई क्षति क े मुआवSे क े भुग ा+ हे ु 6 अX ू बर, 1934 विद+ांविक को सिSलाति*कारी का आदेश189; 186 Exhibit A-6 – Suit 4 187 Exhibit A-49- Suit 1 188 Exhibit A-6- Suit 1 189 Exhibit A-43- Suit 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (घ) मस्जिस्Sद की मरम्म क े खिलए अप+े विबलों क े भुग ा+ हे ु ठेक े दार ाहावर खा+ का 25 फरवरी, 1935 विद+ांविक का आवेद+190; (ङ) मस्जिस्Sद की मरम्म क े खिलए विबलों का संदाय कर+े से पूव: उपख°र्ड मसिSस्र्ट्रेर्ट सदर द्वारा विकए गए काय: क े वि+रीक्षर्ण क े खिलए 26 फरवरी, 1935 विद+ांविक को फ ै Sाबाद उपायुX का आदेश191; (च) विद+ांक 15 अप्रैल, 1935 को ठेक े दार द्वारा प्रस् ु मरम्म का आकल+ सिSसक े अं ग: गुंबद की मरम्म भी शाविमल है192; (छ) काय: पूर्ण: हो+े में विवलंब संबंति* 16 अप्रैल, 1935 विद+ांविक को ठेक े दार का आवेद+। इस पत्र में कहा गया विक गुंबद की मरम्म उसी प्रकार की Sा रही र्थीी Sैसे विक संगमरमर की पविट्टयाँ सिSसमें अल्लाह क े उत्कीर्ण:+ र्थीा193 । (S) बाबरी मस्जिस्Sद की मरम्म में सहायक अणिभयं ा, लोक वि+मा:र्ण विवभाग, फ ै Sाबाद क े 21 +वंबर, 1935 विद+ांविक क े वि+रीक्षर्ण +ोर्ट में यह उल्लेख विकया गया है विक काय: का वि+रीक्षर्ण विकया गया र्थीा और वह सं ोषS+क विमला र्थीा194; (झ) मस्जिस्Sद की मरम्म क े संबं* में ठेक े दार क े विबल पर 27 S+वरी, 1936 विद+ांविक की विबल क्लक: की रिरपोर्ट:195; (ञ) बाबरी मस्जिस्Sद की मरम्म क े काय: क े खिलए भुग ा+ क े संबं* में 29 S+वरी, 1936 विद+ांविक को श्री ए र्डी तिर्डक्स+ का आदेश196; और 190 Exhibit –A- 51 – Suit 1 191 Exhibit A-45- Suit 1 192 Exhibit –A-44- Suit 1 193 Exhibit –A-50- Suit 1 194 Exhibit A-48- Suit 1 195 Exhibit A-46 – Suit 1 196 Exhibit A-47- Suit 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (र्ट) बाबरी मस्जिस्Sद की मरम्म क े खिलए उसक े विबल से की गई कर्टौति यों की णिशकाय 30 अप्रैल, 1936 विद+ांविक को ठेक े दार क े आवेद+ में की गई है।197 उपरोX दस् ावेS Sो विवति*व प्रदर्भिश विकए गए हैं यह दशा: ा है विक वष: 1934 क े दंगों क े बाद, एक मुस्जिस्लम ठेक े दार बाबरी मस्जिस्Sद की मरम्म क े खिलए लगा हुआ र्थीा। मस्जिस्Sद को हुए +ुकसा+ और ठेक े दार द्वारा विकए गए काय: का संदभ: विदया गया है।

304. मरम्म से संबंति* दस् ावेSी साक्ष्य क े अलावा, दस् ावेSों का एक अन्य समूह बाबरी मस्जिस्Sद में इमाम की सेवाओं से संबंति* है: (i) विद+ांक 25 Sुलाई, 1936 को बाबरी मस्जिस्Sद क े न्यासी सैयद मोहम्मद ज़की द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद क े पेश इमाम मौलवी अब्दुल गफ्फार क े पक्ष में एक करार/वच+ वि+ष्पाविद विकया गया, Sो वष: 1935 क उ+क े बकाया वे + क े भुग ा+ क े संबं* में र्थीा198; (ii) मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम, 1936 की *ारा 4 क े ह एक +ोविर्टस की प्रति विक्रया में वक्फ आयुX क े समक्ष 19/20 Sुलाई, 1938 विद+ांविक को सैयद मोहम्मद Sकी का आवेद+199; (iii) वक्फ आयुX फ ै Sाबाद क े समक्ष 20 अगस्, 1938 विद+ांविक को अब्दुल गफ्फार, बाबरी मस्जिस्Sद क े पेश इमाम का विद+ांक 31 Sुलाई, 1938 197 Exhibit A-52- Suit 1 198 Exhibit A-7- Suit 1 199 Exhibit A- 67- Suit 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क अप+े वे + क े बकाया क े भुग ा+ क े खिलए मु वल्ली को वि+देश दे+े की मांग का आवेद+200; (iv) सैयद मोहम्मद Sकी (भू पूव: मु वल्ली) क े भाई का विद+ांक 20 +वंबर, 1943 विद+ांविक को सुन्नी वक्फ बोर्ड: की 27 अX ू बर, 1943 विद+ांविक की +ोविर्टस पर उत्तर201 । पत्र की अन् व:स् ु में मस्जिस्Sद क े खिलए दैवि+क आवश्यक ाओं क े सार्थी ही सार्थी Sुमे की +माS को ब+ाए रख+े की व्यवस्र्थीा का स्पष्ट संदभ: है: “यह विक चर्टाई, काली+ और Sा+माS-इबाद कर+े की काली+ आविद क े वल दैवि+क आवश्यक ाओं क े खिलए पया:प्त हो े हैं। अन्य काली+ और इबाद कर+े की काली+ पेश इमाम मौलवी अब्दुल गफ्फार क े पास हैं। इन्हें हर शुक्रवार को मस्जिस्Sद में लाया Sा ा है और Sुमे की +माS क े बाद वापस उसी स्र्थीा+ पर रखा Sा ा है क्योंविक काली+ अक्सर मस्जिस्Sद से चोरी हो Sा ी है। यही कारर्ण है विक मस्जिस्Sद में सभी चर्टाई और काली+ों को +हीं रखा Sा ा है।" (v) उत्तर प्रदेश मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम, 1936 की *ारा 5(2) क े ह वाद संस्जिस्र्थी कर+े से पूव: सुन्नी वक्फ बोर्ड: को णिशया वक्फ बोर्ड: क े 11 अप्रैल, 1945 विद+ांविक की +ोविर्टस में सुन्नी वक्फ क े रूप में मस्जिस्Sद घोविष कर े हुए 26 फरवरी, 1944 विद+ांविक की अति*सूच+ा को चु+ौ ी दी गई202; (vi) मु ावल्ली की मृत्यु क े कारर्ण ौखिलय क े प्रभार क े बारे में सुन्नी वक्फ बोर्ड: क े सतिचव का विद+ांक 5 +वंबर, 1948 का +ोविर्टस203; 200 Exhibit A- 61- Suit 1 201 Exhibit A-66- Suit 1 202 Exhibit A-65- Suit 1 203 Exhibit A-62- Suit 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) इबाद कर े समय मुस्जिस्लमों क े उत्पीड़+ संबंति* वक्फ वि+रीक्षक की विद+ांक विद+ांक 10/12 विदसंबर, 1949 की रिरपोर्ट:204; और (viii) बाबरी मस्जिस्Sद की दशा संबंति* 23 विदसंबर, 1949 विद+ांविक की वक्फ वि+रीक्षक की रिरपोर्ट: में यह कहा Sा रहा र्थीा विक चाविबयां मुस्जिस्लमों क े पास ही रहेंगी और क े वल शुक्रवार को +माS पढ़ी Sा Sा रही र्थीीं205: "मुझे विद+ांक 22 विदसंबर 49 को बाबरी मस्जिस्Sद अयोध्या और कविब्रस् ा+ की मौSूदा हाल की Sांच कर+ी पड़ी, मैं+े सारा विद+ पूछ ाछ में विब ाया। मेरी पूछ ाछ +े मुझे वि+म्+खिलखिख परिरस्जिस्र्थीति यों और घर्ट+ाओं क े बारे में अवग कराया। बाबा रघु+ार्थी क े Sन्मस्र्थीा+ आगम+ क े खिलए ी+ माह की अवति* बी चुकी है। उन्हों+े बैराविगयों और पुSारिरयों से आ£ह विकया विक रामायर्णपाठ -रामायर्ण का पाठ- Sन्मस्र्थीा+ में हो+ा चाविहए। यह संदेश आसपास क े सभी क्षेत्रों में फ ै ल गया। बाबा रघुबरदास क े प्रस्र्थीा+ क े एक माह बाद हSारों हिंहदू पुSारी और पंतिर्ड रामायर्ण पाठ कर+े क े खिलए वहां इकट्ठा हुए। पाठ एक सप्ताह क चल ा रहा। इस बीच में बैराविगयों +े मस्जिस्Sद क े साम+े वाले विहस्से और क़विब्रस् ा+ क े विहस्से क े बाहर खुदाई की और इस Sमी+ को सम ल कर विदया। उन्हों+े एक अस्र्थीायी संरच+ा भी स्र्थीाविप विकया और क ु छ कब्रस्र्थील पर पत्र्थीर लगाए। रामायर्ण क े पाठ क े समय पुखिलस का बंदोबस् र्थीा। इसक े बावSूद कब्रों को खोदा गया। पुखिलस +े चार व्यविXयों को विगरफ् ार विकया सिSन्हें बाद में बं*पत्र पर रिरहा कर विदया गया। एक उभरे हुए र्टीले पर स्जिस्र्थी कविब्रस् ा+, सिSसमें ख्वाSा रहम ुल्लाह का मकबरा है वह भी खोदी गयी और भूविम सम ल कर दी गई। एक बैरागी +े वहां रह+ा प्रारम्भ कर विदया है। बैरागी, मस्जिस्Sद की दीवारों से सर्टे अहा े क े दरवाSे क े पास स्जिस्र्थी पक्की कब्र क े पास बैठ रहे हैं। बैराविगयों +े एक क ु विर्टया ब+ाई है। इस पाठ क े प्रारम्भ हो+े से पूव: ही बैराविगयों +े लूर्टपार्ट की र्थीी और बाड़े को ोड़ विदया र्थीा। मुअखिज्ज+ को पीर्टा गया और उसक े बाद उन्हों+े मस्जिस्Sद क े उत्कीर्ण:+ खोद+े का प्रयास विकया। दो अS+बी मुस्जिस्लमों को पीर्टा गया सिSससे उन्हें गंभीर 204 Exhibit A-63- Suit 1 205 Exhibit A-64- Suit 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA चोर्टें आई ं। अब मस्जिस्Sद क े बाहर दो क ैं प हैं। उ+में से एक में पुखिलस कांस्र्टेबल ै+ा हैं और दूसरे में बर्टाखिलय+ों क े सिसपाही हैं। (कांस्र्टेबलों और सिसपाविहयों) क ु ल सं. लगभग 7 से 8 है। अब मस्जिस्Sद बंद है। Sुमा का विद+ और समय को छोड़कर विकसी भी अज़ा+ की अ+ुमति +हीं है और + ही +माज़ अदा की Sा ी है। चाविबयां मुस्जिस्लमों क े पास रह ी हैं। लेविक+ पुखिलस उन्हें ाला खोल+े की अ+ुमति +हीं दे ी। ाला Sुमा क े विद+, या+ी शुक्रवार को दो या ी+ घंर्टे क े खिलए खोला Sा ा है। इस अवति* क े दौरा+, मस्जिस्Sद को साफ विकया Sा ा है और Sुमे की +माS अदा की Sा ी है। इसक े बाद यह हमेशा की रह बंद कर विदया Sा ा है। Sुमे क े समय बहु शोर मचाया Sा ा है। Sब +मासिSयों को सीढ़ी से +ीचे Sा+ा हो ा है ो उ+ पर Sू े और *ूल विमट्टी फ ें क विदए Sा े हैं। लेविक+ मुस्जिस्लम र्डर क े मारे इस पर कोई प्रति विक्रया +हीं दे े हैं। राघवदास क े बाद, श्री लोविहया भी अयोध्या आए र्थीे और उन्हों+े लोगों को संबोति* कर े हुए कहा र्थीा विक फ ू लों क े पौ*ों को कब्रों की Sगह पर लगाया Sा+ा चाविहए। एक मंत्री भी लख+ऊ से आए र्थीे। बैराविगयों +े उन्हें ब ाया विक मस्जिस्Sद Sन्मभूविम है। हमें इसे प्राप्त कर+े में सहाय ा करें। उस+े बलपूव:क ऐसा कर+े से इ+कार कर विदया। यह सु+कर बैराविगयों को क्रो* आ गया और उन्हें पुखिलस सुरक्षा क े बीच फ ै Sाबाद वापस Sा+ा पड़ा। इस बीच अयोध्या क े क+क भव+ मंविदर में महं बाबास्र्थीा+, महं रघुबरदास, वेदां ी Sी, +ारायर्ण दास, आचाय: Sी मुस्जिस्लमों को बुला+ा चाह े र्थीे, परन् ु ज़हूर अहमद को छोड़कर कोई भी वहाँ +हीं आया। हिंहदुओं +े ज़हूर अहमद से कहा विक वे मस्जिस्Sद पा+े में उ+की सहाय ा करें। उसे ब ाया गया विक यविद ऐसा विकया Sा ा है ो हम भाई हैं, अन्यर्थीा, हम दुश्म+ हैं। मैं रा भर अयोध्या में रहा। सुबह मुझे प ा चला विक बैराविगयों की कोणिशश मस्जिस्Sद पर Sबर+ कब्Sा कर+े की है। आS Sुमे का शुक्रवार है। Sब मैं स्र्थील पर पहुंचा, ो 10 से 15 बैरागी गदा और क ु ल्हाड़ी लेकर मस्जिस्Sद क े अहा े में मौSूद र्थीे और कई बैरागी गदा लेकर मस्जिस्Sद क े दरवाSे पर बैठे र्थीे। आसपास क े क्षेत्र क े हिंहदू भी वहां इकट्ठे हो रहे हैं। सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट, शहर क े पुखिलस अति*कारी और अन्य पुखिलस बल पया:प्त संख्या में ै+ा हैं। फ ै Sाबाद क े मुस्जिस्लम Sुमे (शुक्रवार) की +माज़ अदा कर+े ज़रूर आ े र्थीे। उ+का क्या हश्र होगा मैं +हीं Sा+ ा। अब मैं +दी पार कर लक्कड़मंर्डी गो°र्डा Sा रहा हूं। (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अव*ारिर विकया विक पेश इमाम को बकाए सविह वे + भुग ा+ का उपक्रम/अ+ुबं*206 साविब +हीं हुआ है। साक्ष्य में प्रदर्भिश हो+े क े अलावा, इस दस् ावेS को वक्फ वि+रीक्षक क े समक्ष पेश इमाम द्वारा अ+ुबं* क े संदभ: में उसक े वे + भुग ा+ क े खिलए एक आवेद+ में संदभ: विमल ा है सिSसकी एक प्रति आवेद+207 क े सार्थी दायर की गई र्थीी। Sैसा विक वक्फ वि+रीक्षक की सूच+ाओं क े संबं* में वि+म ही अखाड़ा की ओर से दायर खिलखिख कर्थी+, दो+ों सूच+ाओं पर वास् व में भरोसा कर ी हैे। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल द्वारा सूच+ाओं पर भरोसा + कर+े क े खिलए संक े विदया गया कारर्ण-यह विक वक्फ वि+रीक्षक को विकसी +े +हीं देखा है, वह सदृश है। रिरपोर्ट: 10/12 विदसंबर 1949 विद+ांविक को खास ौर पर वाद 5 में वादपत्र पर और वाद 5 में वादी 3 की मुख्य परीक्षा पर अवलम्ब खिलया गया है।

305. उपरोX दस् ावेS वि+रूविप कर े हैं विक: (I) वष: 1934 क े दंगों क े बाद मस्जिस्Sद की पु+स्र्थीा:प+ क े खिलए उठाए गए कदम; (ii) ठेक े दार द्वारा मस्जिस्Sद की मरम्म और लोक वि+मा:र्ण विवभाग द्वारा विकए गए भुग ा+; (iii) पेश इमाम की सेवाओं का Sुड़ाव और अप+े बकाया वे + का संदाय + कर+े संबंति* परिरचर विववाद; 206 Exhibit A-7- Suit 1 207 Exhibit A-61 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) विदसंबर, 1949 में वक्फ वि+रीक्षक की रिरपोर्ट: में यह कह े हुए विक मुस्जिस्लमों को मस्जिस्Sद में +माज़ अदा कर+े क े खिलए परेशा+ विकया Sा रहा र्थीा, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप क े वल शुक्रवार की +माS अदा की Sा रही र्थीी; और (v) वक्फ इंस्पेक्र्टर +े मस्जिस्Sद क े खिलए ख रे की आशंका व्यX की।

306. मौखिखक साक्ष्य और दस् ावेSी साम£ी क े उपरोX विवश्लेषर्ण क े मद्दे+Sर, वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: वि+काले Sा सक े हैं: (i) वि+म ही सातिक्षयों क े मौखिखक विववरर्णों में बहु कविमयाँ हैं विक विववाविद ढाँचा एक मस्जिस्Sद +हीं बस्जिल्क Sन्मभूविम मंविदर र्थीा; (ii) वि+म ही अखाड़े द्वारा विदए गए दस् ावेSी साक्ष्य आं रिरक अहा े और उसक े भी र मस्जिस्Sद का ढाँचा, Sो वाद 3 क े विवषय है, को अप+े कब्Sे को स्र्थीाविप +हीं कर े हैं; (iii) वि+म ही अखाड़ा क े दावों क े विवपरी, दस् ावेSी साक्ष्य वष: 1934 से 1949 क े बीच मस्जिस्Sद ढाँचे क े अस्जिस् त्व को स्र्थीाविप कर ा है; और

(iv) Sहां क मस्जिस्Sद में +माज़ का संबं* है, मुस्जिस्लमों को इबाद कर+े में बा*ा र्डाली Sा रही र्थीी सिSसक े परिरर्णामस्वरूप विदसंबर, 1949 क शुक्रवार की +माS अदा की Sा रही र्थीी। विदसंबर 1949 क मस्जिस्Sद क े हो+े और उपयोग क े संबं* में यह दस् ावेSी साक्ष्य विवशेष रूप से पुखिलस अ*ीक्षक फ ै Sाबाद क े पत्र 29 +वंबर 1949 विद+ांविक का समर्थी:+ कर े हैं, सिSसमें मस्जिस्Sद को घेर+े क े खिलए विकए Sा रहे प्रयासों का सिSक्र र्थीा विक मुस्जिस्लम इसे छोड़ दें। यह मुख्य सतिचव को मस्जिस्Sद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की सुरक्षा क े संबं* में आशंकाओं को दूर कर+े क े खिलए सिSला मसिSस्र्ट्रेर्ट क े 16 विदसंबर 1949 विद+ांविक क े पत्र क े सार्थी युखिग्म है,।

307. वाद 3 को परिरसीमा द्वारा वर्जिS अणिभवि+*ा:रिर विकया गया है। वि+म ही अखाड़े क े दावों का पूर्ण: वि+र्ण:य प्रस् ु कर+े क े खिलए ऊपर उसिल्लखिख मौखिखक और दस् ावेSी साक्ष्य का विवश्लेषर्ण विकया गया है: (i) मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व को +कार े हुए; (ii) यह दावा कर े हुए विक आं रिरक अहा े में ढाँचा एक ऐसा मंविदर है Sो इसक े अ+न्य कब्Sे में र्थीा; और (iii) विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 क े बीच रा की घर्ट+ा से इ+कार कर े हुए। वि+म ही अखाड़ा अप+े दावे को साविब कर+े में +ाकाम रहे हैं। दस् ावेSी साक्ष्य वि+म ही अखाड़े (सुन्नी क ें ˆीय वक्फ बोर्ड: द्वारा समर्भिर्थी ) द्वारा वाद 5 की पोषर्णीय ा क े खिलए उठाई गई आपखित्तयों का वि+*ा:रर्ण कर+े में प्रासंविगक होंगे। क्या वि+म ही अखाड़ा द्वारा कहा गया है है विक वे भगवा+ राम की सेवा में सेवाय क े रूप में र्थीे Sो विक वाद 5 में एक मुद्दा र्थीा और इसखिलए उस वाद से वि+पर्ट े समय इस पर विवचार विकया Sाएगा। ऊपर सिS+ साक्ष्यों पर चचा: की गई है वे भी प्रश्नग स्वत्व पर प्रासंविगक हैं और इस वि+र्ण:य क े दौरा+ उपयुX स्जिस्र्थी में पु+प्र:स् ु विकया Sाएगा।

N. वाद 5: देवी देव ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA N.[1] पक्षकारों की श्रृंखला

308. वाद 5 को वाद विमत्र क े माध्यम से पहली और दूसरे वादी की ओर से संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा सिSसे ीसरे वादी क े रूप में अणिभयोसिS विकया गया र्थीा। प्रर्थीम और विद्व ीय वादी: "भगवा+ श्री राम लला विवराSमा+" और "स्र्थीा+ श्री राम Sन्मभूविम, अयोध्या" हैं। ृ ीय वादी इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े पूव: न्याया*ीश श्री देकी +ंद+ अ£वाल र्थीे। ृ ीय वादी की मृत्यु क े परिरर्णामस्वरूप उच्च न्यायालय क े एक आदेश द्वारा उसे प्रति स्र्थीाविप विकया गया र्थीा।

309. पहले प्रति वादी क े विवति*क प्रति वि+ति* गोपाल सिंसह विवशारद (वाद 1 में वादी) हैं; दूसरा प्रति वादी वाद 2 में वादी र्थीा (सिSसे बाद में वापस ले खिलया गया र्थीा); ीसरा प्रति वादी वि+म ही अखाड़ा (वाद 3 में वादी); चौर्थीा प्रति वादी सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: (वाद 4 में वादी) हैं; पांचवें और छठे प्रति वादी अयोध्या और फ ै Sाबाद क े मुस्जिस्लम वि+वासी हैं; सा वें, आठवें, +ौवें और दसवें प्रति वादी उत्तर प्रदेश राज्य और इसक े अति*कारी हैं; ग्यारहवें प्रति वादी अखिखल भार ीय हिंहदू महासभा क े अध्यक्ष हैं; बारहवें और ेरहवें प्रति वादी क्रमशः अखिखल भार ीय आय: समाS और अखिखल भार ीय स+ा + *म: सभा का प्रति वि+ति*त्व कर े हैं; चौदहवें प्रति वादी श्री *म: दास र्थीे सिSन्हें बाबा अणिभराम दास क े चेले क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया र्थीा Sो कणिर्थी ौर पर विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को हो+े वाली घर्ट+ा में शाविमल विकया गया र्थीा; पंˆहवें और सोलहवें प्रति वादी क े रूप में अयोध्या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और फ ै Sाबाद क े हिंहदू वि+वासी हैं; प्रति वादी सं. सत्रह फ ै Sाबाद सिSले का वि+वासी र्थीा (अब हर्टा विदया गया); अठारहवें और उन्नीसवें प्रति वादी क े रूप में महं गंगा दास और स्वामी गोहिंवदाचाय: मा+स मा ãर्ड हैं; बीसवें प्रति वादी उमेश चंˆ पांर्डे र्थीे सिSन्हों+े वाद 3 में वि+म ही अखाड़े क े दावे का विवरो* विकया र्थीा (परन् ु क ु छ साक्ष्य +हीं विदए); प्रति वादी सं. इक्कीस को र्ट्रस्र्ट "श्री राम Sन्म भूविम न्यास" क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है सिSसका प्रबं* न्यासी श्री अशोक सिंसघल क े माध्यम से वि+विह विकया गया है; प्रति वादी सं. बाईस से पच्चीस णिशयाओं का व्यविXग प्रति वि+ति*त्व कर+े वाला वक़्फ़ णिशया सेंर्ट्रल बोर्ड: है; प्रति वादी सं. छब्बीस Sमै ुल उलेमा हिंहद उ.प्र. क े महासतिचव हैं और प्रति वादी सं. सत्ताईस फ ै Sाबाद का मुस्जिस्लम वि+वासी है। N.[2] उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा कोई प्रति वाद +हीं।

310. उत्तर प्रदेश राज्य +े एक कर्थी+ (वाद 4 वष: 1989 में) दायर विकया सिSसमें कहा गया र्थीा विक "विववाविद संपखित्तयों में सरकार की कोई रूतिच +हीं है" और विववाविद संपखित्तयों क े संबं* में अति*कारिरयों क े काय: उ+क े शासकीय क:व्यों क े सम्यक ् वि+व:ह+ में सद्भाविवक र्थीे। N.[3] अणिभकर्थी+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

311. वाद 5 का वादपत्र इस आ*ार पर आगे बढ़ ा है विक पहले और दूसरे वादी '"भगवा+ श्री राम क े सार्थी उस स्र्थीा+ क े प्रमुख देव ा क े रूप में न्यातियक व्यविX हैं"। ीसरे वादी को "वैष्र्णव हिंहदू" क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है। वादपत्र में राम Sन्मभूविम से सम्बस्जिन्* विववरर्ण इस प्रकार हैं, "सिSसमें भव+ परिरसर क े दो साइर्ट प्ला+, वाद 1 में दीवा+ी न्याया*ीश, फ ै Sाबाद क े न्यायालय द्वारा वि+युX आयुX णिशव शंकर लाल द्वारा" अप+े पदीय क:व्य क े वि+व:ह+ में इससे Sुड़े हुए क्षेत्र का वि+मा:र्ण कराया गया Sो श्री राम Sन्मभूविम क े +ाम से Sा+ा Sा ा है। ये +क्शा +Sरी अप+ी आख्या क े सार्थी वादपत्र क े अ+ुलग्नक I, II और III में हैं।

312. दीवा+ी न्यायालय208 क े समक्ष संस्जिस्र्थी पूव:व - वादों क े इति हास को स्र्थीाविप कर+े क े पश्चा ् और *ारा 208 क े ह की गई काय:वाविहयों में वादपत्र कह ा है विक ये वाद "उ+की त्वरिर सु+वाई की मंद संभाव+ा क े सार्थी" लंविब रह े हैं। यद्यविप, वादी देव ाओं की सेवा और पूSा को ठीक से विकया Sा+ा कहा गया है और यह कहा गया है विक क े वल हिंहदू भXों क े खिलए एक बैरिरयर क े पीछे से दश:+ की अ+ुमति दी गई है। वादी देव ाओं और भXों को मुकदमों क े वि+स् ारर्ण में विवलंब क े सार्थी, मंविदर क े मामलों क े प्रबं*+ में विगरावर्ट और पुSारिरयों और मंविदर क े अन्य कम:चारिरयों द्वारा उपासकों क े प्रसाद क े कणिर्थी दुरुपयोग क े सार्थी "बेहद +ाखुश" कहा Sा ा है। यह कहा गया है विक हिंहदू भX राम Sन्मभूविम में मौSूदा ढाँचे को हर्टा+े क े बाद एक +या मंविदर ब+ा+े क े इच्छ ु क हैं। वादपत्र क े अ+ुसार, रामा+ंद 208 Suit 2 of 1950, Suit 25 of 1950, Suit 26 of 1959 and Suit 12 of 1961 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संप्रदाय क े प्रमुख को मंविदर क े क ु प्रबं*+ को ब ा े हुए और एक +ए मंविदर क े वि+मा:र्ण की सुविव*ा सौंपी गई र्थीी। अं ः 18 विदसंबर 1985 विद+ांविक को न्यास का विवलेख हुआ Sो उप-वि+बन्*क द्वारा पंSीक ृ विकया गया र्थीा। र्ट्रस्र्ट का +ाम "श्री राम Sन्मभूविम न्यास" रखा गया है और इसमें दस न्यासी हैं। इसक े अलावा, विवश्व हिंहदू परिरषद को अप+े माग: दश:क मंर्डल क े माध्यम से चार न्यासिसयों को +ाविम कर+ा है, Sो उस+े विकया र्थीा। आगे, पांच न्यासिसयों को "भार क े श्रेष्ठ हिंहदू +ागरिरक" में +ाविम विकया गया है। उपरोX पांच व्यविXयों में से, ीसरे वादी को न्यासिसयों में से एक क े रूप में +ाविम विकया गया र्थीा। यह कहा गया है विक राम Sन्मभूविम न्यास वादी देव ाओं की सेवा-पूSा और अन्य मामलों में प्रत्यक्ष विह बद्ध है। वादी आगे संक े दे ा है विक मौSूदा वाद "अपया:प्त हैं" और विववाद का वि+पर्टारा +हीं कर सक े क्योंविक + ो पीठासी+ देव ा भगवा+ श्री राम विवराSमा+ और + ही अस्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम (सिS+में से दो+ों को न्यातियक व्यविX कहा गया है) को पूव: वाद में अणिभयोसिS विकया गया र्थीा। इसक े अलावा, यह अणिभकणिर्थी विकया गया है विक पूव: क े वादों में से कु छ पक्षकार वादी देव ाओं की पूSा पर वि+यंत्रर्ण प्राप्त करक े अप+े व्यविXग विह को प्राप्त कर+े क े खिलए शाविमल हैं। इस पृष्ठभूविम में, वादी +े अप+े स्वयं ही एक वाद की स्र्थीाप+ा की है।

313. वादपत्र कह ा है विक "असंविदग्* प्राति*कारी" द्वारा यह प्रति स्र्थीाविप विकया गया है विक विववाविद परिरसर उस स्र्थीा+ का प्रति वि+ति*त्व कर ा है Sहां भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा। दूसरे वादी को "अस्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है और पूSा की एक स्व ंत्र वस् ु क े रूप में कहा गया है, सिSसे भXों द्वारा भगवा+ राम की विदव्य आत्मा क े मू: रूप में पूSा Sा ा है। इसखिलए, यह प्रकणिर्थी है विक राम Sन्मभूविम की भूविम क े मौSूदा ढाँचे क े वि+मा:र्ण अर्थीवा क ें ˆीय गुंबद क े भी र मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा से पूव: भी न्यातियक व्यविXत्व का कब्Sा रहा है। यह कहा गया है विक हिंहदुओं द्वारा + क े वल मूर्ति क े भौति क रूप अर्थीवा आकार की पूSा की Sा ी है बस्जिल्क उस विदव्य आत्मा की सिSसे प्रार्ण प्रति ष्ठा द्वारा आह्वा+ विकया Sा ा है। यह कहा गया है विक दूसरे वादी क े स्र्थील पर एक देव ा क े रूप में विदव्य आत्मा को पूSा Sा ा है और इसखिलए यह कहा गया है विक वह स्र्थील स्वयं एक देव ा है। यह प्रस् ु विकया गया है विक ये देव ा अविव+ाशी हो+े क े +ा े ब क अस्जिस् त्व में है Sब क विक वह Sगह मौSूद है और सिSस स्र्थीा+ पर भूविम है, उस पर विकसी भी वि+मा:र्ण क े बावSूद वह मौSूद है।

314. क: क े समर्थी:+ में फ ै Sाबाद गSेविर्टयर क े वष: 1928 क े संस्करर्ण पर अवलम्ब ले+े क े खिलए वादपत्र आगे बढ़ ा है विक राम Sन्मभूविम मंविदर कहे Sा+े वाले प्राची+ मंविदर को बाबर +े वष: 1528 में +ष्ट कर विदया र्थीा और इस स्र्थील पर +ष्ट हुए मंविदर की साम£ी से एक वृहद मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कसौर्टी स् ंभ सविह विकया गया र्थीा। वादपत्र क े अ+ुसार विफर भी उपासकों +े चरर्ण और सी ा रसोई और परिरसर क े भी र रामचबू रे पर भगवा+ राम की मूर्ति Sैसे प्र ीकों क े माध्यम से भगवा+ राम की पूSा कर+ा Sारी रखा। यह कहा गया है विक कोई भी भव+ में प्रवेश +हीं कर सक ा है सिसवाय उ+ क्षेत्रों से गुSर+े क े Sहां हिंहदू पूSा कर े र्थीे। वादपत्र में यह विववाविद है विक क्या एक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हिंहदू मंविदर क े स्र्थील पर इस्लाविमक सिसद्धां ों क े अ+ुसार एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण वै* रूप से विकया Sा सक ा है Sो हिंहदू पूSा स्र्थीलों से तिघरा हुआ है। वाविदयों क े अ+ुसार, देव ाओं क े उपासक सविदयों से राम Sन्मभूविम में प्रार्थी:+ा कर े रहे हैं; यह स्र्थीा+ देव ाओं का है और कोई वै* वक्फ कभी +हीं ब+ाया गया र्थीा या ब+ाया Sा सक ा र्थीा। मुस्जिस्लम वि+वासिसयों द्वारा यदा- कदा अति चार क े बावSूद यह कहा गया है विक स्वत्व और कब्Sा वादी देव ाओं में वि+विह है। यह अणिभकणिर्थी है विक मस्जिस्Sद में कोई इबाद +हीं की गई र्थीी। स्व ंत्र ा क े बाद बैराविगयों द्वारा राम Sन्मभूविम क े आसपास की कब्रें खोदी गई ं और अं ः विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की रावित्र को भगवा+ राम की एक मूर्ति विववाविद भव+ क े क ें ˆीय गुंबद में विवति* विव*ा+ क े सार्थी स्र्थीाविप की गई र्थीी। इसक े बाद *ारा 145 क े ह काय:वाही की गई सिSसमें वादी देव ा पक्षकार +हीं र्थीे। वादी देव ाओं में वि+विह मूल हक क े क: क े विवकल्प में यह कहा गया है विक देव ाओं का कब्Sा है और देव ाओं क े प्रति क ू ल हक का कोई भी दावा प्रति क ू ल कब्Sे से समाप्त हो Sा ा है।

315. वादपत्र में यह उपवर्भिर्ण विकया गया है विक विहन्दू भX विववाविद स्र्थील पर एक मंविदर ब+ा+े क े इच्छ ु क र्थीे और "सविक्रय आंदोल+" विद+ांक 30 सिस ंबर, 1989 से 9 +वंबर, 1989 को आ*ारणिशला रखे Sा+े क े सार्थी प्रारंभ विकया गया र्थीा। यह कहा गया है विक वि+म ही अखाड़े +े वादी-देव ाओं की पूSा क े प्रबं*+ में व्यविXग विह रखा है और उ+का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए कोई अन्य उपयुX व्यविX +हीं है, ीसरे वादी +े वाद को वाद विमत्र क े रूप में संस्जिस्र्थी विकया है। यह प्रकणिर्थी है विक +ए मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आंदोल+ पूर्ण: हो+े में विकसी बा*ा को दूर कर+े क े खिलए विववाविद स्र्थील पर संपूर्ण: परिरसर "एकल पहचा+" क े सार्थी "एक अणिभन्न परिरसर" का गठ+ कर ा है। मुस्जिस्लमों क े दावे को आं रिरक चारदीवारी क े भी र बाड़े क सीविम ब ाया गया है। वष: 1992 में बाबरी मस्जिस्Sद विवध्वंस क े बाद वादपत्र में विवध्वंस क े दौरा+ और उसक े बाद की परिरस्जिस्र्थीति यों से संबंति* प्रकर्थी+ शाविमल कर+े क े खिलए संशोति* विकया गया र्थीा। वादी क े अ+ुसार, अति*£हर्ण क े अध्यादेश और संसद द्वारा अति*वि+यविम का+ू+ क े पाल+ क े बाद सेवाय ी अति*कारों को छी+ खिलया गया और वै*ावि+क प्राप को सुपुद: कर विदया गया। वाद संस्जिस्र्थी विकए Sा+े क े खिलए वाद हे ुक क े बारे में कहा गया है विक "दैवि+क" उपाS:+ विकया गया, विवशेष रूप से ब Sब +ये मंविदर क े वि+मा:र्ण की योS+ा पर क ु छ मुस्जिस्लमों की ओर से हिंहसात्मक कार:वाई से बा*ा र्डाल+े का अणिभकर्थी+ विकया गया र्थीा। उपरोX कÂ पर, वाद 5 में दो राह ें मांगी गई हैं: (क) एक घोषर्णा Sो विक अ+ुलग्नक I, II और III में वर्भिर्ण श्री राम Sन्मभूविम का पूरा परिरसर वादी-देव ाओं से संबंति* है; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ख) मौSूदा भव+ों और संरच+ाओं को हर्टा+े और विवध्वंस क े बाद श्री राम Sन्मभूविम में एक +ए मंविदर क े वि+मा:र्ण में हस् क्षेप या बा*ा र्डाल+े से प्रति वाविदयों को प्रति बंति* कर+े वाली एक स्र्थीायी वि+षे*ाज्ञा। N.[4] खिलखिख कर्थी+ वि+म ही अखाड़ा

316. वाद 5 क े प्रत्युत्तर में वि+म ही अखाड़े +े अप+ा खिलखिख कर्थी+ दS: कर े हुए कहा विक एक वाद विमत्र क े माध्यम से संस्जिस्र्थी वाद दुभा:व+ापूर्ण: है और "Sवाब दे+े वाले प्रति वाविदयों क े हक और विह को +ुकसा+ पहुंचा+े क े खिलए एक रूपरेखा" है। वि+म ही अखाड़ा वाद विमत्र क े स्र्थीा+ का खंर्ड+ कर ा है Sो ीसरे वादी क े रूप में देव ाओं का प्रति वि+ति*त्व कर ा है। यह विवशेष रूप से न्यातियक व्यविX क े रूप में दूसरे वादी की स्जिस्र्थीति से इ+कार कर ा है। वि+म ही अखाड़ा क े अ+ुसार, भगवा+ श्री राम राम Sन्मभूविम में +हीं बस्जिल्क उस मंविदर में स्र्थीाविप हैं सिSसे Sन्मभूविम मंविदर क े रूप में Sा+ा Sा ा है सिSसक े प्रभार और प्रबं*+ क े खिलए इस+े वाद 3 संस्जिस्र्थी विकया है। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार, अस्र्थीा+ का सामान्य आशय क े वल एक स्र्थीा+ है और यह एक विवति*क व्यविX +हीं है। ीसरे वादी द्वारा यह दावा विकया गया है विक वह वैष्र्णव है और देव ा का उपासक +हीं है और उसक े पास देव ा या " र्थीाकणिर्थी अस्र्थीा+" का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए कोई स्र्थीा+ +हीं है। यह कहा गया है विक +ए मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए 25 करोड़ रुपये की राणिश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sुर्टा+े का प्रयास विकया गया र्थीा। वि+म ही अखाड़ा ब ा ा है विक भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ विववाविद +हीं है और यह अयोध्या में स्जिस्र्थी है Sहाँ राम Sन्मभूविम मंविदर खड़ा है। राम Sन्मभूविम मंविदर को विववाविद भूविम में ब ाया गया है, सिSसको मुस्जिस्लम मस्जिस्Sद हो+े का दावा कर े हैं। अस्र्थीा+ Sन्मभूविम को भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में Sा+ा Sा ा है, सिSसमें संपूर्ण: अयोध्या शहर शाविमल हैं।वि+म ही अखाड़े +े दावा विकया है विक यह विववाविद मंविदर में स्र्थीाविप भगवा+ राम की मूर्ति का सेवाय है और क े वल इसको ही मंविदर पर वि+यंत्रर्ण, पय:वेक्षर्ण, मरम्म और पु+र्मि+मा:र्ण का अति*कार है। यह कहा गया है विक वि+म विहयों +े वाद को वष: 1959 में दायर विकया र्थीा Sबविक राम Sन्मभूविम न्यास वष: 1985 में "अखाड़े क े हक और विह को +ुकसा+ पहुंचा+े क े खिलए एक स्पष्ट रूपरेखा क े सार्थी" अस्जिस् त्व में आया। वि+म ही अखाड़े +े अणिभकणिर्थी विकया विक भगवा+ राम की मूर्ति राम Sन्मभूविम मंविदर में स्र्थीाविप की गई र्थीी और मंविदर इसक े अं ग: आ ा है और विकसी अन्य को +या मंविदर ब+ा+े का अति*कार +हीं है। वाद 5 का इस आ*ार पर विवरो* विकया गया है विक वादी क े पास "मुकदमा कर+े क े खिलए कोई वास् विवक हक +हीं है" और यह वाद मंविदर का प्रबं*+ कर+े क े खिलए वि+म विहयों क े अति*कारों पर अति क्रमर्ण है। इसखिलए इसक े अ+ुसार, वाद 5 में वाविदयों द्वारा उसिल्लखिख विववाविद परिरसर वि+म ही अखाड़े से संबंति* है और वादी वि+म ही अखाड़ा क े अति*कार और हक क े विवरूद्ध घोषर्णा +हीं कर सक े। द+ुसार, वि+म ही अखाड़े +े वाद 5 को खारिरS कर+े क े खिलए प्रार्थी:+ा की है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अप+े अति रिरX खिलखिख बया+ में, वि+म ही अखाड़े +े कहा है विक बाहरी सहा+ (अहा ा) में भगवा+ राम का "एक छोर्टा मंविदर" ब+ाया, सिSसकी पूSा वि+यविम रूप से रामा+ंदी बैराविगयों क े बीच प्रचखिल रीति -रिरवाSों क े अ+ुसार की गई र्थीी। इस मंविदर का बाहरी विहस्सा सामान्य वाद सं. 239 वष: 1982 में विद+ांक 16 फरवरी 1982 को क ु क: हो+े क वि+म ही अखाड़े क े प्रबं*+ और प्रभार क े रूप में र्थीा। यह कहा गया है विक बाहरी विहस्सा वि+म ही अखाड़े क े कब्Sे और प्रबं*+ में रहा है और रामचबू रे पर स्र्थीाविप भगवा+ राम की मूर्ति को वि+म ही अखाड़ा क े स्वाविमत्व वाली अलग विवति*क वि+काय कहा Sा ा है। यह कहा गया है विक *ारा 145 क े ह क ु क— क े खिलए मसिSस्र्ट्रेर्ट का आदेश क े वल उ+ ी+ गुंबदाकार ढांचे से संबंति* है Sहां भगवा+ राम की मूर्ति को वि+म ही अखाड़ा द्वारा अ+ाविदकाल से स्र्थीाविप विकया गया है और Sो हमेशा ही इसक े प्रबं*+ और कब्Sे में र्थीा। एक अन्य खिलखिख कर्थी+ में वि+म ही अखाड़े +े दावा विकया है विक राम Sन्मभूविम न्यास का गठ+ अवै* है। अखिखल भार ीय विहन्दू महासभा

317. अखिखल भार ीय हिंहदू महासभा क े अध्यक्ष +े एक खिलखिख कर्थी+ दायर विकया सिSसमें दावा विकया गया र्थीा विक श्री राम Sन्मभूविम न्यास क े खिलए एक पक्षकार क े रूप में यह प्रत्यक्ष रूप से राम Sन्मभूविम मंविदर क े सेवा-पूSा और अन्य मामलों को समर्मिप है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड:

318. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े वादी-देव ाओं क े वाद का विवरो* विकया है। अप+े खिलखिख कर्थी+ में यह पहले और दूसरे वादी की विवति*क स्जिस्र्थीति और ीसरे वादी क े स्र्थीा+ को वाद विमत्र क े रूप में काय: कर+े से इ+कार कर ा है। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े अ+ुसार, Sब क विक विद+ांक 22-23 विदसंबर 1949 क े बीच रावित्र को गुप्त रूप से मूर्ति को लाया +हीं गया ब क बाबरी मस्जिस्Sद परिरसर क े भी र विकसी भी देव ा को स्र्थीाविप +हीं विकया गया र्थीा। खिलखिख कर्थी+ विकसी पीठासी+ देव ा या "विकसी अस्र्थीा+" क े हो+े से इ+कार कर ा है। महं रघुबर दास द्वारा संस्जिस्र्थी वष: 1885 क े वाद क े खारिरS हो+े पर अवलम्ब ले े हुए यह कहा गया है विक "अस्र्थीा+ राम Sन्मभूविम" क े +ाम से एक विवति*क व्यविXत्व मा+ े हुए वादी बाबरी मस्जिस्Sद क े विकसी भी विहस्से का दावा +हीं कर सक े, विवशेष रूप से विवति* या हिंहदू *म: क े सिसद्धां ों क े अ+ुसार प्रार्ण प्रति ष्ठा या देव ा की स्र्थीाप+ा + हो+े पर। खिलखिख कर्थी+ में इस आरोप का खंर्ड+ विकया गया है विक बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर विकसी भी मंविदर का अस्जिस् त्व र्थीा या मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कणिर्थी मंविदर को +ष्ट कर+े क े बाद इसकी साम£ी से विकया गया र्थीा। यह प्रकणिर्थी है विक बाबर क े शास+ क े दौरा+ इसक े वि+मा:र्ण क े बाद से मस्जिस्Sद हमेशा एक मस्जिस्Sद क े रूप में उपयोग विकया Sा ा रहा है। यह कहा गया है विक इसका वि+मा:र्ण हो+े पर यह भूविम राज्य की र्थीी, और मस्जिस्Sद का दावा विकया गया है विक यह खाली भूविम में वि+र्मिम की गयी र्थीी। यह अणिभकणिर्थी विकया गया है विक रामचबू रे को वष: 1857 क े आसपास ब+ाया गया र्थीा। मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े बाद से विद+ांक 23 विदसंबर 1949 क मुस्जिस्लमों का कब्Sा वि+बा:* और वि+रं र रहा है और इसखिलए, इसक े विवपरी कोई भी अति*कार, हक या विह प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा समाप्त हो Sाएगी। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार, विद+ांक 22 विदसंबर 1949 क वि+यविम रूप से और विद+ांक 16 विदसंबर 1949 क शुक्रवार की +माS अदा की गई। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार, वाद हे ुक को विदसंबर 1949 में उपार्जिS मा+ा Sा+ा चाविहए Sब संपखित्त कु क: की गई र्थीी और मुस्जिस्लमों +े मस्जिस्Sद में पूSा कर+े क े खिलए हिंहदुओं क े दावे से इ+कार विकया र्थीा। इसखिलए वाद को परिरसीमा द्वारा बाति* कर विदया गया है।

319. पांचवें प्रति वादी209 +े अप+े खिलखिख कर्थी+ में न्यास क े स्र्थीा+ से इ+कार विकया है। इसक े अलावा, यह कहा गया है विक परिरसर हमेशा सोलहवीं श ाब्दी में इसक े वि+मा:र्ण क े बाद से एक मस्जिस्Sद रहा है और मुस्जिस्लमों द्वारा +माS अदा कर+े और विकसी अन्य उद्देश्य क े खिलए इस् ेमाल विकया गया र्थीा। पांचवें प्रति वादी +े पहले और दूसरे वाविदयों की न्यातियक स्जिस्र्थीति और ीसरे वादी क े स्र्थीा+ से इ+कार विकया। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और पांचवें प्रति वादी द्वारा संयुX रूप से दायर एक अति रिरX खिलखिख कर्थी+ में संशोति* वादपत्र की अन् व:स् ु से इ+कार कर विदया गया है और यह कहा गया है विक विद+ांक 6 विदसंबर 1992 को हर्टाए Sा+े क े बाद मूर्ति यों क े संबं* में दावा समाप्त हो गया र्थीा। N.[5] उच्च न्यायालय क े विवषय और वि+ष्कष: 209 Mohammad Hashim mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

320. सिS+ मुद्दों को वाद में विवरतिच विकया गया र्थीा और उच्च न्यायालय में ी+ न्याया*ीशों क े वि+ष्कषÂ को +ीचे सूचीबद्ध विकया गया है Sो वि+म्+खिलखिख हैं:

1. क्या प्रर्थीम और विद्व ीय वादी न्यातियक व्यविX हैं।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-यह मूर्ति संपखित्त *ारर्ण कर+े में सक्षम है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर-वादी 1 और 2 दो+ों विवति*क व्यविX हैं।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाविदयों क े पक्ष में फ ै सला विदया।

2. क्या पहले और दूसरे वादी क े रूप में वादपत्र में वर्भिर्ण देव ाओं क े +ाम पर वाद को वाद विमत्र क े रूप में ीसरे वादी द्वारा पोषर्णीय +हीं है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+र्ण:य का अ+ुसरर्ण विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वाद को पोषर्णीय मा+ा गया।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाद को पोषर्णीय मा+ा गया। 3(क). क्या प्रश्नग मूर्ति को विद+ांक 23 विदसंबर, 1949 क े प्रारंणिभक घंर्टों में विववाविद भव+ क े क ें ˆीय गुंबद (ध्वस् हो+े क े बाद से) में स्र्थीाविप विकया गया र्थीा, Sैसा विक वादपत्र क े प्रस् र 27 में वादी द्वारा अणिभकणिर्थी है और दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा क े आदेश X वि+यम 2 क े ह उ+क े कर्थी+ में स्पष्ट विकया गया है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-मूर्ति यों को प्रर्थीम बार विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की रावित्र को मस्जिस्Sद क े अंदर रखा गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-सकारात्मक उत्तर। 3(ख). क्या एक ही मूर्ति को चबू रा पर एक ही स्र्थीा+ पर विव ा+ में पु+स्र्थीा:विप विकया गया र्थीा।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-सकारात्मक उत्तर। 3(ग).क्या मूर्ति यों को न्यायालय क े आदेश 14 अगस् 1989 और 15 +वंबर 1991 विद+ांविक का अति क्रमर्ण कर े हुए विद+ांक 6 विदसंबर 1992 अर्थीवा उसक े पश्चा विववाविद स्र्थील पर रखा गया र्थीा।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाविदयों क े पक्ष में फ ै सला विदया। 3(घ). यविद उपरोX विववाद्यक का उत्तर सकारात्मक है, ो क्या ब भी इस प्रकार रखी गई मूर्ति याँ देव ा की प्रस्जिस्र्थीति प्राप्त करेंगी।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-सकारात्मक उत्तर। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

4. क्या प्रश्नग मूर्ति यों का अस्जिस् त्व "णिशखर" क े अन् ग: विद+ांक 6 विदसंबर 1992 से पूव: तिचरकाल से र्थीा, Sैसा विक वि+म ही अखाड़े ( ीसरे प्रति वादी) क े अति रिरX खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 44 में अणिभकणिर्थी है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-मूर्ति यों को प्रर्थीम बार विद+ांक 22-23 विदसंबर, 1949 को मस्जिस्Sद क े अंदर रखा गया र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल -+कारात्मक उत्तर; क ें ˆीय गुम्बद क े अन् ग: मूर्ति यां विद+ांक 6 विदसंबर 1992 से पूव: अस्जिस् त्व में र्थीीं, लेविक+ विद+ांक 22-23 विदसंबर 1949 की रावित्र क े दौरा+ रखी गई र्थीीं।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-ये मूर्ति यां विद+ांक 22-23 विदसंबर 1949 से पूव: क ें ˆीय गुम्बद क े अं ग: +हीं र्थीीं।

5. क्या प्रश्नग संपखित्त को वादपत्र में यर्थीोतिच रूप से अणिभतिचन्हांविक और वर्भिर्ण विकया गया है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया। बाबर क े शास+ काल क े दौरा+ Sब क मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा ब क परिरसर को भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ हो+े का + ो विवश्वास विकया Sा ा र्थीा + ही मा+ा Sा ा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-संपखित्त की पहचा+ या विववरर्ण में कोई अस्पष्ट ा +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वादी क े पक्ष में उत्तर। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

6. क्या ीसरा वादी वाद विमत्र क े रूप में वादी सं. 1 और 2 का प्रति वि+ति*त्व कर+े का हकदार +हीं है और इस सम्बन्* में यह वाद सक्षम +हीं है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+- न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वाविदयों क े पक्ष में +कारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाविदयों क े पक्ष में फ ै सला विदया।

7. क्या अक े ला वि+म ही अखाड़ा ( ीसरा प्रति वादी) पहले और दूसरे वाविदयों का प्रति वि+ति*त्व कर+े का हकदार है और उस आ*ार पर, Sैसा विक वि+म ही अखाड़ा ( ीसरा प्रति वादी) क े अति रिरX खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 49 में अणिभकणिर्थी है, यह वाद सक्षम +हीं है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वाविदयों क े पक्ष में वि+म ही अखाड़ा क े विवरूद्ध +कारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाविदयों क े पक्ष में वि+म ही अखाड़ा क े विवरूद्ध उत्तर।

8. क्या प्रति वादी वि+म ही अखाड़ा भगवा+ श्री राम का "सेवाय " विववाविद ढाँचे में स्र्थीाविप विकया गया है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+- न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वि+म ही अखाड़े क े विवरुद्ध उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वि+म ही अखाड़ा क े विवरुद्ध उत्तर दे े हुए अव*ारिर विकया विक वि+म ही अखाड़ा पहले और दूसरे वादी का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए अक्षम है।

9. क्या विववाविद ढाँचा बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ी Sा+े वाली एक मस्जिस्Sद र्थीी?  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर द्वारा या उसक े आदेश पर विकया गया र्थीा। वष: 1934 क मुस्जिस्लमों +े वि+यविम रूप से इबाद विकया और उसक े बाद विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 क क े वल शुक्रवार की +माS अदा की।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वाविदयों क े विवरूद्ध Sवाब।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े विवरूद्ध और वाविदयों क े पक्ष में Sवाब।

10. क्या विववाविद ढाँचे को वादपत्र क े प्रस् र 24 में अं र्मिवष्ट आरोपों पर मस्जिस्Sद मा+ा Sा सक ा है।  Sस्जिस्र्टस एस. यू. खा+-मस्जिस्Sद एक विवति*मान्य मस्जिस्Sद र्थीी।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण मंविदर क े विवध्वंस पर विकया गया र्थीा।

11. क्या वादी क े प्रस् र 25 में विकए गए प्रकर्थी+ पर विववाविद ढाँचे क े संबं* में कोई विवति*मान्य वक्फ इसे मस्जिस्Sद क े रूप में गविठ कर+े क े खिलए ब+ाया +हीं विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-मस्जिस्Sद एक विवति*मान्य मस्जिस्Sद है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-विववाविद संपखित्त क े संबं* में कोई विवति*मान्य वक्फ +हीं है।

12. विद+ांक 23 फरवरी,1996 क े आदेश द्वारा हर्टाई गई।

13. क्या वाद परिरसीमा द्वारा वर्जिS है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-यह वाद परिरसीमा द्वारा वर्जिS +हीं है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-यह वाद परिरसीमा द्वारा वर्जिS +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-यह वाद परिरसीमा द्वारा वर्जिS +हीं है।

14. विववाविद ढाँचे का दावा है विक क्या बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण Sन्मस्र्थीा+ मंविदर को ध्वस् कर+े क े बाद उस स्र्थील पर हुआ र्थीा।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण हे ु विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया र्थीा। Sब क बाबर क े शास+ काल में मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा ब क परिरसर को भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ पर विवश्वास +हीं विकया Sा ा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- सकारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े विवरूद्ध और वाविदयों क े पक्ष में फ ै सला विदया।

15. विववाविद ढ़ांचा सिSसे बाबरी मस्जिस्S हो+े का दावा विकया गया है क्या उसका प्रयोग इसक े कणिर्थी वि+मा:र्ण स+् 1528 से 22 विदसंबर 1949 क mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लगा ार +माS पढ़+े क े खिलए विकया Sा रहा र्थीा, Sैसा विक प्रति वादीगर्ण 4 और 5 द्वारा ब ाया गया। न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-वष: 1934 क मुस्जिस्लम मस्जिस्Sद में वि+यविम रूप से इबाद कर रहे र्थीे। इसक े बाद, विद+ांक 22 विदसंबर 1949 क क े वल शुक्रवार की +माS अदा की गई र्थीी।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-कम से कम वष: 1860 से आं रिरक अहा े में +माS अदा की गई र्थीी। विद+ांक 16 विदसंबर 1949 को अंति म बार +माज़ अदा की गई र्थीी।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-विववाद्यक सं. 1- बी(सी),2,4,12,13,14,15,19 (ए),19(बी),19(सी),27 और 28 वाद 4 संबंति* हैं Sो सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े विवरूद्ध वि+र्ण- हुए र्थीे।

16. क्या वादी 1 और 2 का हक, यविद कोई हो, ो प्रति वादी 4 क े खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 25 में कणिर्थी रूप से समाप्त कर विदया गया र्थीा। यविद हाँ, ो वादपत्र क े प्रस् र 29 में कणिर्थी रूप से प्रति क ू ल कब्Sे से वादी 1 और 2 का पु+प्रा:प्त हक है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+-दो+ों पक्षकारों का वष: 1855 से पूव: संयुX कब्Sा र्थीा और इसखिलए प्रति क ू ल कब्Sे क े मुद्दे का फ ै सला कर+े की कोई आवश्यक ा +हीं र्थीी।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-पहले और दूसरे वादी का हक कभी समाप्त +हीं विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-विववाद्यक सं. 1B- (c),2,4,12,13,14,15,19 (ए),19(बी),19(सी),27 और 28 वाद 4 से संबंति* हैं Sो सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े विवरूद्ध वि+र्ण- र्थीे।

17. विद+ांक 23 फरवरी,1996 क े आदेश द्वारा हर्टाई गई।

18. क्या प्रति वादी सं. 3 क े अति रिरX खिलखिख बया+ क े प्रस् र 42 में कणिर्थी विवणिशष्ट अ+ु ोष अति*वि+यम की *ारा 34 क े अ+ुसार वाद को वर्जिS कर विदया गया है और प्रति वादी 4 क े खिलखिख बया+ क े प्रस् र 47 और प्रति वादी 5 क े खिलखिख बया+ क े प्रस् र 62 क े रूप में भी अणिभकणिर्थी है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- ीसरे चौर्थीे और पांचवें प्रति वाविदयों क े विवरुद्ध +कारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-प्रति वाविदयों क े विवरुद्ध और वाविदयों क े पक्ष में उत्तर।

19. क्या यह वाद आवश्यक पक्षकारों का असंयोS+ क े खिलए बुरा है Sैसा विक प्रति वादी 3 क े अति रिरX खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 43 में अणिभकणिर्थी है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाद को पोषर्णीय अव*ारिर विकया।

20. क्या कणिर्थी न्यास प्रति वादी सं. 21 का खिलखिख कर्थी+ प्रति वादी सं. 3 क े खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 47 में वर्भिर्ण थ्यों और आ*ारों पर शून्य है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-उत्तर +हीं विदया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-उत्तर +हीं विदया।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाविदयों क े पक्ष में उत्तर विदया।

21. क्या प्रश्नग मूर्ति यों को प्रति वादी 4 क े खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 1,11,12,21,22,27 और 41 में और प्रति वादी 5 क े खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 1 में कणिर्थी रूप से देव ाओं क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को स्वीकार विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और पांचवें प्रति वादी क े विवरूद्ध Sवाब।

22. क्या प्रश्नग परिरसर या उसका कोई भाग परंपरा, आस्र्थीा और विवश्वास द्वारा भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ है, Sैसा विक वाद क े प्रस् र 19 और 20 में अणिभकणिर्थी है, यविद हां, ो इसका प्रभाव क्या होगा?  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-+ ो मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए कोई मंविदर ध्वस् विकया गया और + ही मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क परिरसर या भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ मा+ा गया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-Sैसा विक हिंहदुओं द्वारा विवश्वास और पूSा विकया Sा ा है, भगवा+ राम क े Sन्म का स्र्थीा+ विववाविद परिरसर क े आं रिरक अहा े में क ें ˆीय गुंबद क े अं ग: आ ा है।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाद 4 में विववाद्यक सं. 1, 1(ए), 1(बी), 1 बी-(बी), 11, 19(र्डी), 19(ई) और 19(एफ) क े सार्थी Sुड़े। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े विवरूद्ध फ ै सला सु+ाया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

23. क्या विवशेष न्याया*ीश, फ ै Sाबाद की अदाल में महं रघुबर दास द्वारा दायर 1885 क े वाद में फ ै सला वाविदयों क े खिलए बाध्यकारी है, Sैसा विक प्रति वाविदयों 4 और 5 द्वारा कणिर्थी रूप से विवबं*+ और पूव:न्याय क े सिसद्धां ों क े आवेद+ द्वारा विकया गया है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-वस् ु ः 1885 क े वाद में क ु छ भी वि+र्ण- +हीं हुआ र्थीा अ ः सीपीसी की *ारा 11 आकर्मिष +हीं कर ा है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक उत्तर।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाविदयों क े पक्ष में उत्तर।

24. क्या वाद में परिरसर में कणिर्थी वादी-देव ा की उपास+ा अ+ाविदकाल से की गई है Sैसा विक वादपत्र क े प्रस् र 25 में अणिभकणिर्थी है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-+ ो मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए कोई मंविदर ध्वस् विकया गया र्थीा और + ही परिरसर को मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण हो+े क भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ मा+ा गया र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल -पहले और दूसरे वादी की पूSा अ+ाविदकाल से हुई है: पुविष्ट में उत्तर विदया गया।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाद 4 क े विववाद्यक सं. 1-बी(सी), 2,4,12,13,14,15,19(ए),19(बी),19(सी), 27 और 28 क े सार्थी Sोड़ा गया। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े विवरूद्ध उत्तर विदया।

25. क्या वाद सं. 29 वष: 1945 में पारिर 30 माच:, 1946 विद+ांविक का वि+र्ण:य और तिर्डक्री वादी द्वारा कणिर्थी रूप से वादी क े खिलए बाध्यकारी +हीं है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को अप+ाया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादीगर्ण वाद क े पक्षकार +हीं र्थीे और इसखिलए वि+र्ण:य उ+ पर बाध्यकारी +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वादी क े पक्ष में फ ै सला विकया।

26. क्या प्रति वादी 4 और 5 द्वारा यर्थीा अणिभकणिर्थी दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा की *ारा 80 क े ह +ोविर्टस क े खिलए वाद गल है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को अप+ाया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादी क े पक्ष में उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वादी क े पक्ष में उत्तर विदया।

27. क्या दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा की *ारा 80 क े ह +ोविर्टस क े खिलए वाद की दलील प्रति वादी 4 और 5 द्वारा उठाई Sा सक ी है।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-Sस्जिस्र्टस सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को अप+ाया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादी क े पक्ष में उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वादी क े पक्ष में उत्तर विदया।

28. क्या प्रति वादी 4 और 5 द्वारा यर्थीा अणिभकणिर्थी उ.प्र. मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम, 1960 की *ारा 65 क े ह +ोविर्टस क े खिलए वाद गल है। यविद हां, ो इसका क्या प्रभाव होगा।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को अप+ाया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-यह प्राव*ा+ लागू +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वादीगर्ण क े पक्ष में फ ै सला विकया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

29. क्या वादीगर्ण मुंसिसफ सदर, फ ै Sाबाद की न्यायालय क े वाद 57 वष: 1978 (भगवा+ श्री राम लला ब+ाम राज्य) की बखा:स् गी क े कारर्ण व:मा+ वाद ला+े से पीछे हैं।  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को अप+ाया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वादीगर्ण क े पक्ष में उत्तर विदया।

30. क्या राह, यविद कोई हो, पा+े क े खिलए वादी या उ+में से कोई हकदार हैं?  न्यायमूर्ति एस. यू. खा+-न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+ष्कषÂ को अप+ाया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-यह वाद प्रस् र 4566 में वि+विह वि+द†शों क े अ+ुसार आंणिशक रूप से कम हो गया र्थीा।  न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाविदयों को अ+ु ोष पा+े का हकदार मा+ा गया और वाद की तिर्डक्री कर दी गई।

321. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े वाद में वि+म्+खिलखिख अ+ु ोष विदए: "(i) यह घोविष विकया Sा ा है विक ी+ गुंबदाकार ढाँचे क े क ें ˆीय गुंबद द्वारा ढँका हुआ क्षेत्र अर्थीा:, विववाविद ढाँचा हिंहदुओं की आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार भगवा+ राम Sन्मस्र्थीा+ क े देव ा और भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है और वादीगर्णों (वाद-5) से संबंति* हैं और प्रति वाविदयों द्वारा विकसी भी रीक े से अवरूद्ध या बाति* +हीं विकया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sाएगा। यह क्षेत्र AA BB CC DD अक्षरों द्वारा दर्भिश है Sो इस वि+र्ण:य क े खिलए परिरणिशष्ट 7 है। (ii) परिरणिशष्ट 7 में B. C. D. L. J. H. G. द्वारा दशा:ए गए आं रिरक अहा े क े भी र का क्षेत्र (उपरोX (i) को छोड़कर) दो+ों समुदायों क े सदस्यों अर्थीा: ् विहन्दू (वाद-5 क े वादीगर्ण) और मुस्जिस्लम से सम्बस्जिन्* है, चूंविक इसका प्रयोग दशकों और श ास्जिब्दयों से विकया Sा रहा र्थीा। हालाँविक, यह स्पष्ट विकया गया है विक वादीगर्णों क े विहस्से क े उद्देश्य से, इस वि+द†श क े ह वाद-5 Sो क्षेत्र उपरोX (i) से ढँका हुआ है उसे भी शाविमल विकया Sाएगा। (iii) ढाँचों द्वारा आच्छाविद क्षेत्र, अर्थीा: राम चबू रा (परिरणिशष्ट 7 में EE FF GG HH), सी ा रसोई (परिरणिशष्ट 7 में MM NN OO PP) और भंर्डार (परिरणिशष्ट 7 में II JJ KK LL) को बाह्य अहा े में वि+म ही अखाड़ा (प्रति वादी संख्या 3) क े विहस्से में घोविष विकया गया है और वे बेह र स्वत्व वाले विकसी भी व्यविX की अ+ुपस्जिस्र्थीति में उसक े कब्Sे क े हकदार होंगे। (iv) बाह्य अहा े (परिरणिशष्ट 7 में A G H J K L E F) (ऊपर (iii) क े अं ग: आ+े वाले को छोड़कर) क े भी र उन्मुX क्षेत्र को वि+म ही अखाड़ा (प्रति वादी सं. 3) और वादीगर्णों (वाद-5) द्वारा साझा विकया Sाएगा, चूँविक इसका उपयोग आम ौर पर हिंहदुओं द्वारा दो+ों स्र्थीा+ों पर पूSा क े खिलए विकया Sा ा है। (iv-क) हालांविक यह स्पष्ट विकया Sा ा है विक मुस्जिस्लम पक्षकारों का विहस्सा परिरसर क े क ु ल क्षेत्रफल क े एक ति हाई (1/3) से कम +हीं होगा और यविद आवश्यक हो ो उसे बाह्य अहा े का क ु छ क्षेत्र विदया Sा सक े गा। यह भी स्पष्ट विकया Sा ा है विक मेट्स और बाउंर्ड ? द्वारा विवभाS+ कर े समय, यविद क ु छ मामूली समायोS+ विवणिभन्न पक्षों क े विहस्से क े संबं* में विकए Sा+े हैं, ो प्रभाविव पक्ष को उस क्षेत्र से अपेतिक्ष भूविम आवंविर्ट करक े मुआवज़ा विदया Sा सक ा है Sो अति*£हर्ण भार सरकार क े अ*ी+ है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) अयोध्या अति*वि+यम 1993 क े ह भार सरकार क े पास Sो भूविम उपलब्* है, वह उ+ पक्षकारों को प्रदा+ कर+े क े खिलए है, Sो संपखित्त क े बेह र उपभोग क े खिलए वाद में सफल हैं, उन्हें उपरोX संबंति* पक्षकारों को इस रह से उपलब्* कराया Sाएगा ाविक ी+ों पक्षकार उस क्षेत्र सिSसमें एक-दूसरे क े अति*कारों क े खिलए बगैर परेशा+ी लोगों को आ+े और Sा+े क े खिलए अलग-अलग प्रवेश कर+े क े द्वारा उपयोग कर सक ें सिSसक े वे हकदार हैं। इस प्रयोS+ क े खिलए संबंति* पक्षकार भार सरकार क े पास Sा सक े हैं Sो उपरोX विदशावि+द†शों क े अ+ुसार काय: करेगा और र्डॉ. इस्माइल फारुकी (उपरोX) में सव च्च न्यायालय क े वि+र्ण:य में वि+विह है। (vi) यर्थीापूव X (i से v) आंणिशक रूप से प्रारंणिभक और आंणिशक रूप से अंति म, एक तिर्डक्री Sो पारिर विकया गया है। वाद-5 उपरोX सीमा क े भाग में कमी है। पक्षकार विववाविद संपखित्त क े वास् विवक विवभाS+ क े खिलए अप+े सुझाव दाखिखल कर+े क े खिलए स्व ंत्र हैं, Sैसा विक ऊपर विदए गए मेट्स और बाउंर्ड? क े अ+ुसार, विवशेष काया:ति*कारी, अयोध्या पीठ को लख+ऊ अर्थीवा रसिSस्र्ट्रार, लख+ऊ पीठ को, Sैसा भी मामला हो, इस आशय का एक आवेद+ सौंपकर विकया Sा ा है। (vii) ी+ माह की अवति* क े खिलए अर्थीवा Sब क विक अन्यर्थीा वि+द†श + विदया Sाए, Sो भी पहले हो, पक्षकार विववाविद संपखित्त क े बाब आS क यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रखेंगे।" न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ +े वि+म्+खिलखिख वि+द†श Sारी विकए: " द+ुसार, पक्षकारों क े सभी ी+ों समूह अर्थीा: मुस्जिस्लम, हिंहदू और वि+म ही अखाड़ा को विववाविद संपखित्त/परिरसर क े संयुX स्वत्व *ारक घोविष विकया Sा ा है, Sैसा विक प्लीर्डर/आयुX द्वारा वाद संख्या 1 में श्री णिशव शंकर लाल द्वारा ैयार विकए गए मा+तिचत्र योS+ा-I में A B D E F द्वारा वर्भिर्ण है, पूSा क े खिलए एक ति हाई विहस्से का उपयोग और प्रबं*+ कर+े क े खिलए न्यायालय द्वारा वि+युX विकया गया है। इस आशय की एक प्रारंणिभक तिर्डक्री पारिर की Sा ी है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हालांविक, यह आगे घोविष विकया गया है विक क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे का विहस्सा Sहां व:मा+ में मूर्ति को मंविदर में रखा गया है, अंति म तिर्डक्री में हिंहदुओं को आवंविर्ट विकया Sाएगा। यद्यविप आगे यह वि+द†णिश विकया गया है विक वि+म ही अखाड़े को उस विहस्से सविह वह विहस्सा आवंविर्ट विकया Sाएगा Sो उX मा+तिचत्र में राम चबू रा और सी ा रसोई शब्दों द्वारा विदखाया गया है। यह आगे स्पष्ट विकया गया है विक भले ही ी+ों पक्षकारों को एक -एक ति हाई विहस्सा घोविष विकया गया हो, हालांविक अगर समुतिच विहस्सा आवंविर्ट कर े समय विहस्से में क ु छ मामूली समायोS+ विकया Sा+ा है, ो वही विकया Sाएगा और क ें ˆ सरकार द्वारा अति*गृही की गई वि+कर्टव - भूविम क े क ु छ विहस्से को आवंविर्ट करक े प्रति क ू ल रूप से प्रभाविव पक्ष को मुआवज़ा विदया Sा सक ा है। पक्षकार ी+ माह क े भी र मेट्स और बाउंर्ड? द्वारा वास् विवक विवभाS+ क े खिलए अप+े सुझाव दाखिखल कर+े क े खिलए स्व ंत्र हैं।" न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: +े वि+म्+खिलखिख शब्दों में वादीगर्णों क े वाद की तिर्डक्री की: "वादीगर्णों का मुकदमा तिर्डक्री कर विदया गया है परन् ु आसा+ लाग क े सार्थी। यह घोविष विकया Sा ा है विक अयोध्या में श्री राम Sन्मभूविम का संपूर्ण: परिरसर, Sैसा विक वादपत्र क े अ+ुलग्नक संख्याओं 1 और 2 में वर्भिर्ण और तिचवित्र विकया गया है Sो और 2 वादी संख्या 1 और 2 देव ा से सम्बस्जिन्* हैं। वादपत्र में संदर्भिभ है विक राम Sन्म भूविम अयोध्या स्र्थील पर मंविदर क े वि+मा:र्ण में कोई बा*ा र्डाल+े, अर्थीवा विकसी भी आपखित्त को उठा+े अर्थीवा रख+े से प्रति वाविदयों को स्र्थीायी रूप से रोक विदया Sा ा है।" N.[6] सेवाय: मुकदमा कर+े का विवशेषाति*कार। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सेवाय की भूविमका और स्जिस्र्थीति

322. न्यायालयों +े विहन्दू मूर्ति को वसीय क ा: क े पविवत्र प्रयोS+ क े खिलए ास्जित्वक रूप में मान्य ा दी है। का+ू+ी व्यविXत्व को भी स्वयंभू देव ा में प्रदत्त विकया Sा सक ा है Sो प्रक ृ ति में आत्म -वि+मा:र्ण है। कोई मूर्ति एक न्यातियक व्यविX है सिSसमें संपखित्त क े वि+विह हो+े का हक है। मूर्ति प्राकृ ति क व्यविXयों क े समा+ संपखित्त पर कब्Sा +हीं कर ी है। संपखित्त आदश: अर्थीÂ में क े वल मूर्ति में ही वि+विह है। मूर्ति को विकसी मा+व सा*+ क े माध्यम से काय: कर+ा चाविहए Sो अप+ी संपखित्तयों का प्रबं*+ करेगा, पूSा से Sुड़े समारोहों क े प्रदश:+ की व्यवस्र्थीा करेगा और अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी मूर्ति की ओर से काय:वाविहयों द्वारा *म:दाय की रक्षा क े खिलए कदम उठाएगा। सेवाय वह व्यविX है Sो इस भूविमका का वि+व:ह+ कर ा है।

323. वि+म ही अखाड़ा +े इस आ*ार पर वाद 3 संस्जिस्र्थी विकया है विक यह विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम क े देव ाओं का सेवाय है। क्या वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय है अर्थीवा +हीं, वाद 3 और 5 में पक्षकारों क े बीच परस्पर अति*कारों का वि+*ा:रर्ण है। इस विववाद पर वि+र्ण:य ले+े क े खिलए, हमारे का+ू+ में एक सेवाय की स्जिस्र्थीति का विवश्लेषर्ण कर+ा आवश्यक है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

324. पोसन्नो क ु मारी देब्या ब+ाम गोलाब चंद बाबू210 में विप्रवी काउंसिसल द्वारा एक प्रारंणिभक वि+र्ण:य विदया गया र्थीा। एक वाद क े सेवाय द्वारा उ+क े त्काल पूव:व - क े विवरूद्ध एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, Sो अपास् दो तिर्डविक्रयों क े वि+ष्पाद+ क े खिलए संपखित्त की विवक्रय को वि+द†णिश कर ा है। यह विवश्लेषर्ण कर े हुए विक क्या एक सेवाय क े काय: अ+ुव - सेवाय ों को बां* ी है, विप्रवी काउंसिसल क े माध्यम से न्यायमूर्ति एम. ई. स्जिस्मर्थी +े यह अव*ारिर विकया: "यह प्र ी हो ा है विक व्यविX को उसकी आवश्यक ा+ुसार सौंपा Sा+ा चाविहए उसे मूर्ति की सेवा क े खिलए और अप+ी संपखित्त क े लाभ और संरक्षर्ण क े खिलए कम से कम एक छोर्टे उत्तराति*कारी क े प्रबं*क क े रूप में एक बड़ी तिर्ड£ी क े खिलए Sो क ु छ भी आवश्यक हो वह कर+े क े खिलए सशX हो+ा चाविहए। यविद ऐसा +हीं हो ा, ो मूर्ति की संपखित्त +ष्ट या बबा:द हो सक ी है, और उसकी पूSा उन्हें संरतिक्ष कर+े और ब+ाए रख+े क े खिलए आवश्यक *+ की इच्छा क े खिलए बंद कर दी Sा ी है।" विप्रवी काउंसिसल +े उपरोX सारांश में सही काय: और उद्देश्य एक सेवाय की अव*ारर्णा को संक्षेप में अं र्मि+विह विकया है। चूंविक, आदश: अर्थीÂ में समर्मिप संपखित्त एक मूर्ति में वि+विह है और सेवाय को इसका प्रबं*+ सौंपा गया है। एक मूर्ति व्यविXग रूप से अप+ी संपखित्त क े लाभ और संरक्षर्ण क े खिलए आवश्यक कार:वाई +हीं कर सक ी है। मूर्ति को आवश्यक रूप से म+ुष्य क े माध्यम से काय: कर+ा चाविहए और यह इस कारर्ण से है विक मूर्ति क े प्रबं*+ को का+ू+ द्वारा एक सेवाय की स्जिस्र्थीति क े सार्थी प्रदत्त विकया गया है। का+ू+ मूर्ति क े का+ू+ी व्यविXत्व को मान्य ा दे ा है विक वह मूर्ति क े अति*कारों और 210 (1875) 14 L Beng LR 450 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क:व्यों क े संरक्षर्ण की सुविव*ा प्रदा+ करे। सेवाय का प्राकृ ति क व्यविXत्व म+ुष्य का माध्यम है सिSसक े माध्यम से मूर्ति की अावश्यक ाओं और प्रयोS+ को पूर्ण: विकया Sा ा है।

325. विप्रवी काउंसिसल द्वारा 1875 में पेश विकए गए का+ू+ +े 1979 में इस न्यायालय क े एक फ ै सले में प्रति ध्ववि+ पाई है। प्रोफ ु ल्ला कोरो+ रिरस्जिक्वट्टे ब+ाम सत्या कोरो+ रिरस्जिक्वट्टे211 में, एक सवाल उत्पन्न हुआ विक क्या यह संस्र्थीापक का इरादा र्थीा विक वह अप+ी इच्छा में न्यासी क े रूप में पद*ारी व्यविX पर सेवाय की स्जिस्र्थीति प्रदा+ करे। इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की पीठ क े खिलए न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिरया +े बोल े हुए यह अव*ारिर विकया विक: "20....आदश: अर्थी: में समर्मिप संपखित्त क े वलमूर्ति में वि+विह है; पूव: अवि+वाय: ा, कब्Sे और प्रबं*+ को क ु छ म+ुष्य माध्यम को सौंपा Sा+ा है। मूर्ति क े ऐसे माध्यमों को उत्तरी भार में सेवाय क े रूप में Sा+ा Sा ा है। एक सेवाय क े का+ू+ी चरिरत्र को यर्थीार्थी: ा और परिरशुद्ध ा क े सार्थी परिरभाविष +हीं विकया Sा सक ा है। मोर्टे ौर पर वर्भिर्ण है विक वह मूर्ति क े मा+व काय: संपादक और अणिभरक्षक हैं, इसक े सांसारिरक प्रवXा, इसक े सभी अस्र्थीायी मामलों से वि+पर्ट+े और अप+ी संपखित्त का प्रबं*+ कर+े क े खिलए हकदार हैं।"

326. विकसी व्यविX या व्यविXयों क े समूह को सेवाय क े रूप में पहचा+, देव ा क े मामलों का प्रबं*+ कर+े क े अति*कार का एक मूलभू विवचार- विवमश: है। एक सेवाय की स्जिस्र्थीति का एक आवश्यक अ+ुबद्ध, एक मूर्ति की ओर से कायÂ क े हो+े और इसक े गुर्णों को परिरर्णामों क े खिलए बां*+े का अति*कार है। सिSस उद्देश्य क े खिलए विवति*क व्यविXत्व को एक मूर्ति क े रूप में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रदत्त विकया Sा ा है, वह पविवत्र उद्देश्य की साम£ी क े रूप में संरतिक्ष और म+ुष्यों क े कायÂ क े माध्यम से महसूस विकया Sा ा है, वह सेवाय है। सेवाय को मूर्ति और उसकी संपखित्तयों क े संबं* में दा ा क े उद्देश्य को पूरा कर+े की शविX और क:व्य सौंपा गया है। अति*कांश मामलों में, एक सेवाय को समप:र्ण क े एक विवलेख क े अ+ुसार वि+युX विकया Sा ा है सिSसक े द्वारा एक मूर्ति को संपखित्त दी Sा ी है। यह इस संपखित्त क े संरक्षर्ण क े खिलए है विक का+ू+ या ो दा ा या *म:दाय विवलेख में +ाविम व्यविX को सेवाय रूप में पहचा+ ा है। स्पष्ट रूप से वि+युX अर्थीवा पहचा+े गए सेवाय की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, का+ू+ +े मूर्ति क े संपखित्तयों की सुरक्षा को वस् ु ः एक सेवादार की मान्य ा द्वारा सुवि+तिश्च विकया है। Sहां एक व्यविX देव ा क े मामलों क े पूर्ण: और वि+रं र प्रबं*+ में शाविमल है, वह संबद्ध संपखित्त क े लंबे, अ+न्य और वि+बा:* कब्Sे क े सार्थी है, ऐसे व्यविX को एक सेवाय क े अति*कारों क े खिलए का+ू+ी हक की अ+ुपस्जिस्र्थीति क े बावSूद एक सेवाय क े रूप में मान्य ा दी Sा सक ी है। इसे वि+र्ण:य क े दौरा+ संदर्भिभ विकया Sाएगा।

327. हिंहदू विवति* में एक सेवाय की स्जिस्र्थीति आंग्ल विवति* में न्यासी की स्जिस्र्थीति से अलग है। विवद्या वरुणिर्थी ीर्थी: ब+ाम बालुसामी अय्यर212 में विप्रवी काउंसिसल क े समक्ष यह प्रश्न र्थीा विक क्या शब्द "न्यास में व्यX विकए गए" और "न्यासी" क े रूप में एक हिंहदू मठ क े महं को दी गई संपखित्तयों पर लागू हो े हैं वे परिरसीमा अति*वि+यम 1908 क े अ+ुच्छेद 134 में विदखाई दे े हैं। विप्रवी काउंसिसल +े इस क: को खारिरS कर विदया विक *म:दातियक संपखित्तयों का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रबं*+ कर+े वाले व्यविX आंग्ल विवति* क े ह न्यासिसयों की स्जिस्र्थीति में हैं। न्यायमूर्ति अमीर अली +े यह अव*ारिर विकया: "यह भी याद रख+ा चाविहए विक आंग्ल विवति* में सिSस अर्थी: में अणिभव्यविX का उपयोग विकया Sा ा है उसमें एक "र्ट्रस्र्ट" हिंहदू प्रर्णाली में अज्ञा, शुद्ध और सरल है। हिंहदू *म:वि+ष्ठों +े मूर्ति यों और छविव को मंविदरों में और हर रह क े *ार्मिमक संस्र्थीा+ों में स्र्थीाविप विकए… सिSन्हें अलग -अलग +ामों से Sा+ा Sा ा है, और एक ही “न्यातियक” क्षम ा रख+े वाले क े रूप में Sा+ा Sा ा है, और उपहार उन्हें ईओ ? +ाविम विकए Sा े हैं...Sब उपहार सी*े मूर्ति अर्थीवा मंविदर में हो ा है, ो उपहार को पूरा कर+े क े खिलए मा+व एSेंसी द्वारा कब्Sा ले+ा आवश्यक हो ा है। सिSस भी +ाम से पुकारा Sा ा है, वह क े वल संस्र्थीा का प्रबं*क और अणिभरक्षक हो ा है। विकसी भी मामले में संपखित्त को उसक े द्वारा अव रिर या वि+विह +हीं विकया गया र्थीा, और + ही वह इस शब्द की अं£ेSी अर्थी: में एक 'न्यासी' है, यद्यविप दातियत्वों और क:व्यों क े दृष्टकोर्ण में, वह सामान्य अर्थीÂ में एक न्यासी क े रूप में कु प्रबं*+ क े खिलए Sवाबदेह है...यह अ+ुसरर्ण करेगा विक एक प्रबं*क या श्रेष्ठ द्वारा विकसी भी +ाम से एक अलगाव को "न्यासी" क े रूप में व्यवहार +हीं विकया Sा सक ा है, सिSसे संपखित्त "न्यास में व्यX" विकया गया है और उसक े द्वारा Sो उसक े पास वि+विह क्षम ा है, Sो आंग्ल विवति* में "न्यासी" क े पास है।"... + ो हिंहदू विवति* और + ही मुस्जिस्लम प्रर्णाली क े ह विकसी संपखित्त को विकसी समप:र्ण क े मामले में सेवाय अर्थीवा मु ावल्ली को 'प्रदत्त' की Sा ी है। + ही उसक े पास कोई संपखित्त वि+विह है, Sो भी संपखित्त है वह मूर्ति या संस्र्थीा क े खिलए रख ा है वह रीति रिरवाS और उपयोग द्वारा विववि+यविम क ु छ लाभकारी विह क े सार्थी प्रबं*क क े रूप में रख ा है।" (प्रभाव वर्ति* )

328. विवद्या वरुणिर्थी क े वि+र्ण:य में हिंहदू विवति* में एक सेवाय की स्जिस्र्थीति और आंग्ल विवति* में एक न्यासी क े बीच अं र की पुविष्ट कर ा है। न्यास क े मामले mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े विवपरी, समर्मिप संपखित्त विवति*क रूप से सेवाय में वि+विह +हीं है। सिSस उद्देश्य क े खिलए संपखित्त एक मूर्ति को समर्मिप की Sा ी है, उसे सेवाय द्वारा वि+ष्पाविद और संरतिक्ष विकया Sा ा है। यद्यविप समर्मिप संपखित्त सेवाय में वि+विह +हीं है, वे संपखित्तयों क े प्रबं*+ क े खिलए सिSम्मेदार हैं और *म:दाय की गई संपखित्तयों क े विकसी भी क ु प्रबं*+ क े खिलए विवति*क रूप में Sवाबदेह हैं। सेवाय मूर्ति क े लाभ क े खिलए विकसी मूर्ति की संपखित्त रख ा है। इस प्रकार आंग्ल विवति* में एक न्यासी क े माखिलका+ा अति*कार और हिंहदू विवति* में एक सेवाय क े बीच अं र है। मुख्य न्याया*ीश बी. क े. मुखS- +े अप+े "विहन्दू लॉ ऑफ रिरलीसिSयस चैरिरविर्टबल र्ट्रस्र्ट" में कहा है: "आंग्ल विवति* में न्यास की संपखित्त में का+ू+ी संपदा न्यासी में वि+विह है Sो न्यास क े विह ाति*कारी क े लाभ क े खिलए रख ा है। एक हिंहदू *म: क े *म:दाय में समर्मिप संपखित्त का पूरा स्वाविमत्व देव ा अर्थीवा संस्र्थीा क े न्यातियक व्यविX क े रूप में हस् ां रिर विकया Sा ा है और सेवाय अर्थीवा महं क े वल एक प्रबं*क हैं।''213 इस न्यायालय द्वारा प्रोफ ु ल्ला चोरो+ में उपरोX अं र की पुविष्ट की गई र्थीी। एक सेवाय की अव*ारर्णा से वि+पर्ट+े में, न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिरया +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: "Sहां क देवोत्तर संपखित्त क े प्रबं*+ का संबं* है, उसकी स्जिस्र्थीति एक न्यासी क े अ+ुरूप है; विफर भी, वह आंग्ल अर्थी: में एक न्यासी की स्जिस्र्थीति में ठीक +हीं है, क्योंविक हिंहदू विवति* क े ह, संपखित्त संपूर्ण: रूप से एक मूर्ति को समर्मिप है, मूर्ति में वि+विह है और + विक सेवाय में। यद्यविप यह 213 B.K. Mukherjea, The Hindu Law of Religious and Charitable Trust (5th Edn. Eastern Law House, 1983) at page 204 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA देवोत्तर संपखित्त कभी भी सेवाय में वि+विह +हीं हो ा, विफर भी, लगभग हर मामले में ही, सेवाय को भोगाति*कार क े एक विहस्से पर अति*कार है, और यविद वह संस्र्थीापक द्वारा ब+ाया +हीं गया है ो उपभोग और मात्रा क े आ*ार पर भोगाति*कार की राणिश का अति*कार हो ा है।" (प्रभाव वर्ति* )

329. ये अवलोक+ पुविष्ट कर े हैं विक आंग्ल विवति* में एक न्यासी से एक सेवाय की स्जिस्र्थीति अलग है। आदश: अर्थी: में समर्मिप संपखित्त विवति*क रूप से मूर्ति में वि+विह है + विक सेवाय में। सेवाय एक व्यविXग क्षम ा में संपखित्त की प्राविप्त क े खिलए काय: +हीं कर ा परन् ु मूर्ति क े खिलए समर्मिप संपखित्त की सुरक्षा क े खिलए मूर्ति की ओर से कर ा है। आम ौर पर, समप:र्ण क े विवलेख में सेवाय क े क:व्यों का प्राव*ा+ +हीं होगा। हालांविक, एक अणिभव्यX अ+ुबं* और यहाँ क विक इसकी अ+ुपस्जिस्र्थीति से भी यह अर्थी: +हीं वि+कल ा विक देव ा की संपखित्त सेवाय में वि+विह है। यद्यविप संपखित्त विवति*क रूप से सेवाय में वि+विह +हीं है और सेवाय से उत्पन्न भोगाति*कार में कु छ विह हो सक ा है। एक सेवाय क े क:व्यों क े खिलए सम्बद्ध यह विह एक सेवाय क े काया:लय की प्रक ृ ति में परिरलतिक्ष हो ा है।

330. म+ोहर मुखS- ब+ाम भूपेंˆ+ार्थी मुखS-224 में कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक पूर्ण: पीठ क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक चाहे हिंहदू विवति* में सेवादारी की संपखित्त हो या विकसी काया:लय की, सिSसमें एक *म:दाय का संस्र्थीापक उत्तराति*कार क े विकसी भी क्रम में व्यविXयों को वि+युX कर+े अर्थीवा +ाविम कर+े क े खिलए सक्षम है। सव†क्षर्ण कर े हुए न्याया*ीश मुखS- +े अव*ारिर विकया: 224 ILR (1933) 60 Cal 452 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ".... मुझे इस प्रस् ाव क े खिलए कोई प्राति*कार +हीं विमल सक ा है विक सामान्य मामलों में सीविम स्वाविमत्व Sो एक सेवाय का देवोत्तर संपखित्त पर प्रयोग हिंहदू विवति* क े दृविष्टकोर्ण में संपखित्त +हीं है...उ+ अति*कारों क े संबं* में, Sो सामान्य ः विकसी सेवाय क े काया:लय से संबद्ध हैं, काया:लय और *म:दाय की संपखित्त एक सार्थी Sा ी है और यह विक Sब यह दावा कर+े वाले दो व्यविXयों क े बीच एक सवाल है और दूसरा विववाविद हो+े का अति*कार रख ा है, ो यह प्रश्न संपखित्त का प्रश्न है...वि+तिश्च रूप से स्वयं *ार्मिमक काया:लय विबक्री का उद्देश्य +हीं हो सक ा और गह+े और *ार्मिमक पूSा में उपयोग की Sा+े वाली अन्य साम£ी, सिSन्हें अणिभरक्षा में ले+े क े खिलए कणिर्थी विवक्र े ा हकदार है और उसकी साव*ा+ीपूव:क अणिभरक्षा क े खिलए बाध्य है और वे विवति* की समस् प्रर्णाखिलयों क े अ+ुसार और हिंहदू विवति* द्वारा अन्य की ुल+ा में सशX रूप से अति*क है और वि+Sी स्वाविमत्व की विवषय वस् ु +हीं है।" (प्रभाव वर्ति* )

331. देवोत्तर संपखित्त क े संबं* में सिS+ क:व्यों का वि+व:ह+ विकया Sा+ा चाविहए, उ+क े अलावा देवोत्तर संपखित्त क े भोगाति*कार क े खिलए विकसी सेवाय में रुतिच हो सक ी है। इस दृविष्ट से, सेवादारी एक सरल काया:लय +हीं है, बस्जिल्क न्यागम+ क े प्रयोS+ों क े खिलए भी संपखित्त है। 215 इस दृविष्टकोर्ण को अंगुरबाला मखिलक ब+ाम देवब्र मखिलक216 में इस न्यायालय द्वारा पुविष्ट की गई है। उस मामले में विववाद यह र्थीा विक क्या अपीलार्थी- सेवाय की विव*वा क े रूप में अप+े पहले विववाह से उत्पन्न हुए सेवाय क े +ाबाखिलग पुत्र Sो प्रति वादी र्थीा उसक े बSाय मूर्ति क े सेवाय क े रूप में काय: कर+े का हकदार र्थीा। यह क: विदया गया र्थीा विक सेवादारी का काया:लय हिंहदू मविहला संपखित्त 215 Approved by Privy Council in Ganesh Chunder Dhur v Lal Behary Dhur (1935-36) 63 IA 448, and Bhabatarini Debi v Ashalata Debi (1942-43) 70 IA 57 216 1951 SCR 1125 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का अति*कार अति*वि+यम 1937 क े अ+ुसार न्याग होगा। इस न्यायालय की चार न्याया*ीश पीठ क े खिलए न्यायमूर्ति बी क े मुखS- +े इस क: को स्वीकार विकया और यह अव*ारिर विकया: "12..... परन् ु हालांविक कोई सेवाय एक प्रबं*क है और क+ीकी अर्थीÂ में न्यासी +हीं है, क े वल एक काया:लय क े रूप में सेवादारी का वर्ण:+ कर+ा सही +हीं होगा। सेवाय क े पास + क े वल *म:दाय क े संबं* में वि+व:ह+ कर+े क े खिलए क:व्य हैं बस्जिल्क उ+का देवोत्तर संपखित्त में भी लाभकारी विह है। Sैसा विक उपरोX मामले में न्यातियक सविमति +े अवलोविक विकया विक लगभग ऐसे सभी *म:दायों में सेवाय में देवोत्तर संपखित्त क े भोगाति*कार में एक विहस्सा है Sो अ+ुदा+ की श Â पर अर्थीवा रीति रिरवाS या प्रर्थीा पर वि+भ:र कर ा है। यहां क विक Sहां सेवाय क े काया:लय से कोई परिरलस्जिब्* Sुड़ी +हीं है, वह *म:दाय संपखित्त में विकसी प्रकार क े अति*कार या विह का उपभोग ले ा है, Sो आंणिशक रूप से कम से कम एक माखिलका+ा अति*कार की प्रक ृ ति है। इस प्रकार, सेवादारी की अव*ारर्णा में काया:लय और संपखित्त क े त्वों, क:व्यों और व्यविXग विह दो+ों को एक सार्थी विमणिश्र विकया Sा ा है; और त्वों में से एक को दूसरे से अलग +हीं विकया Sा सक ा है। यह *म:दाय संपखित्त में इस व्यविXग या लाभकारी विह की उपस्जिस्र्थीति है Sो माखिलका+ा अति*कारों की प्रक ृ ति क े सार्थी सेवादारी का वि+वेश कर ी है और इसे संपखित्त की विवति*क घर्ट+ाओं को संलग्न कर ी है।" न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक विकसी सेवाय की देवोत्तर संपखित्त क े भोगाति*कार में एक लाभकारी विह है। यह लाभकारी विह एक माखिलका+ा अति*कार क े रूप में है। यद्यविप मूर्ति क े खिलए कु छ क:व्यों क े खिलए सेवाय की भूविमका का आ*ार है और लाभ आशंविक हैं, + ो दूसरे से अलग विकया Sा सक ा है। इस प्रकार, काया:लय और संपखित्त दो+ों को सेवादारी में विमणिश्र mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sा ा है, एक सेवाय का व्यविXग विह उ+क े क:व्यों क े खिलए अ+ुलग्न है।217 पुSारी

332. सेवाय ों क े संबं* में अंति म हिंबदु ब+ाया Sा सक ा है। एक पुSारी Sो विकसी मंविदर में पूSा कर ा है उससे वह एक सेवाय की स्जिस्र्थीति को प्राप्त +हीं कर ले ा है। पुSारी सेवाय द्वारा वि+युX व्यविX या एक सेवक है और वह एक सेवाय क े रूप में लंबे समय क अ+ुष्ठा+ों का संचाल+ कर+े क े बावSूद भी कोई स्व ंत्र अति*कार प्राप्त +हीं कर ले ा। इस प्रकार मात्र पुSारिरयों की उपस्जिस्र्थीति से उ+में सेवादारी का कोई अति*कार वि+विह +हीं हो ा है। गौरी शंकर ब+ाम अंविबका दत्त218 में वादी एक मूर्ति की पूSा क े खिलए समर्मिप संपखित्त पर एक पुSारी क े रूप में वि+युX व्यविX का वंशS र्थीा। मंविदर में पूSा क े अति*कारों का विवभाS+ और चढ़ावे क े विव रर्ण का दावा कर+े क े खिलए वाद संस्जिस्र्थी की गई र्थीी। पर्ट+ा उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ +े अव*ारिर विकया विक प्रासंविगक प्रश्न यह है विक क्या देवोत्तर +े पुSारी को सेवाय क े रूप में वि+युX विकया गया र्थीा। न्यायमूर्ति रामास्वामी +े यह अव*ारिर विकया विक: “7... यह ब ा+ा महत्वपूर्ण: है विक पुSारी या अच:क सेवाय +हीं है। पूSा कर+े क े खिलए सेवाय द्वारा पुरोविह क े रूप में पुSारी की वि+युविX की Sा ी है। परन् ु यह पुरोविह को सेवाय क े अति*कारों और दातियत्वों 217 Affirmed in Badri Nath v Punna, AIR 1979 SC 1314; Profulla Chorone Requitte v Satya Chorone Requitte, (1979) 3 SCC 409 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को हस् ां रिर +हीं कर ा है। वह पुSारी क े रूप में अप+े काया:लय में अति*कार क े सम्बन्* में स रख+े क े खिलए हकदार +हीं है। वह अ+ुष्ठा+ क े खिलए सेवाय द्वारा वि+युX क े वल एक +ौकर है। Sहां एक पुरोविह की वि+युविX संस्र्थीापक की इच्छापत्र पर हुई है, क े वल यह थ्य विक कई पीविढ़यों क े खिलए वि+युXक ा:ओं +े पूSा की है इसखिलए वि+युX विकए गए परिरवार क े सदस्यों पर स्व ंत्र अति*कार प्रदा+ +हीं करेगा और उन्हें पुSारी क े रूप में पद पर ब+े रह+े का अति*कार प्राप्त +हीं होगा..."

333. एक सेवाय का प्राति*कार है विक वह देव ा की संपखित्तयों का प्रबं* करे और उस उद्देश्य की पूर्ति सुवि+तिश्च करे सिSसक े खिलए संपखित्त समर्मिप की गई र्थीी। इस प्रबं*कीय भूविमका क े एक आवश्यक त्व क े रूप में, एक सेवाय पूSा कर+े क े खिलए पुSारिरयों को वि+युX कर सक ा है। यह वि+युX विकये गए पुSारिरयों को एक सेवाय की स्जिस्र्थीति प्रदा+ +हीं कर ा है। सेवाय की वि+युविX क े रूप में, वे काया:लय से हर्टाए Sा+े क े खिलए उत्तरदायी हैं और काया:लय में रह+े क े अति*कार का दावा +हीं कर सक े हैं। एक सेवाय और एक पुSारी क े बीच क े अं र को इस न्यायालय +े श्री श्री कालीमा ा ठाक ु रा+ी ऑफ कालीघार्ट ब+ाम सिSबां*+ मुखS-219 में मान्य ा दी र्थीी। श्री श्री काली मा ा ठक ु रा+ी और उ+क े सह देव ाओं की सेवा-पूSा क े समुतिच प्रबं*+ क े खिलए योS+ा विवरतिच कर+े क े खिलए सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 क े ह एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। न्यायमूर्ति Sे आर मु*ोल्कर क े माध्यम से बोल े हुए इस न्यायालय की एक संविव*ा+ पीठ +े यह अव*ारिर विकया विक:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "...सेवाय को मात्र पुSारी या अच:क कह+ा गल है। Sैसा विक मुखS- Sे. (Sैसे विक वे उस समय र्थीे) द्वारा *ार्मिमक और *मा:र्थी: न्यासिसयों क े हिंहदू विवति* पर अप+े र्टैगोर विवति* व्याख्या+ में ब ाया गया है विक सेवाय देव ा का मा+वीय सेवक है Sबविक एक पुSारी की वि+युविX संस्र्थीापक या सेवाय द्वारा पूSा कर+े क े खिलए की Sा ी है। इस प्रकार पुSारी सेवाय का सेवक है। सेवादारी मात्र पद ही +हीं संपखित्त भी है।''

334. पूSा कर+े क े खिलए संस्र्थीापक या विकसी सेवाय द्वारा पुSारी की वि+युविX की Sा ी है। यह वि+युविX पुSारी को एक सेवाय की स्जिस्र्थीति प्रदा+ +हीं कर ी है। वे क ु प्रबं*+ या अ+ुशास+ही+ ा क े विकसी भी काय: क े खिलए हर्टाए Sा+े क े खिलए उत्तरदायी हैं Sो उ+क े क:व्यों क े प्रदश:+ क े सार्थी असंग है। आगे, Sहां एक पुSारी की वि+युविX वसीय क ा: क े इच्छापत्र पर हुई है, यह थ्य विक कई पीविढ़यों क े खिलए वि+युXक ा:ओं +े पूSा की है इसखिलए वि+युX विकए गए परिरवार क े सदस्यों पर स्व ंत्र अति*कार प्रदा+ +हीं करेगा और उन्हें पुSारी क े रूप में पद पर ब+े रह+े का अति*कार प्राप्त +हीं होगा। और + ही एक पुSारी क े काय: मात्र से ही एक व्यविX सेवाय +हीं हो Sा ा है। मुकदमा चला+े का अ+न्य अति*कार?

335. विकसी सेवाय का स्र्थीा+ विवति* में एक सारवा+ स्र्थीा+ है Sो व्यविX को अन्य सभी क े अपवS:+ क े खिलए मूर्ति की संपखित्तयों क े प्रबं*+ का विवशेष अति*कार प्रदा+ कर ा है। मूर्ति की संपखित्तयों का प्रबं*+ कर+े क े अ+न्य अति*कार क े अति रिरX, सेवाय को मूर्ति की ओर से काय:वाविहयों का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संस्र्थीाप+ कर+े का अति*कार है। क्या मूर्ति की ओर से वाद कर+े का अति*कार का प्रयोग क े वल सेवाय द्वारा ही (उस स्जिस्र्थीति में Sहां कोई सेवाय है) विकया Sा सक ा है अर्थीवा या विकसी "वाद विमत्र" क े माध्यम से मूर्ति द्वारा भी प्रयोग विकया Sा सक ा है Sो हमारे समक्ष काय:वाविहयों में विववाद का विवषय रहा है। वाद 3 में वादी-वि+म ही अखाड़े का क: है विक वि+म ही विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम की मूर्ति यों क े सेवाय हैं। वि+म ही अखाड़े की ओर से पेश वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा श्री एस क े Sै+ +े क: विदया विक वाद 5 में वादपत्र प्रकणिर्थी क ु प्रबं*+ या दुराचरर्ण क े विकसी भी आरोप की अ+ुपस्जिस्र्थी में देवकी +ंद+ अ£वाल मूर्ति यों की ओर से एक वाद विमत्र क े रूप में वाद को पोविष +हीं कर सक े र्थीे। श्री Sै+ +े इस क: पर महत्वपूर्ण: अवलम्ब+ खिलया विक वाद 5 में वादपत्र वि+म विहयों द्वारा कोई क ु प्रबं*+ +हीं कर ा है। यद्यविप श्री एस क े Sै+ +े क: विकया विक वाद 5 क े (Sो वष: 1989 में संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा) वादीगर्णों को वाद 3 क े विवषय में प ा र्थीा सिSसे वि+म ही अखाड़ा द्वारा (वष: 1959 में) एक सेवाय क े रूप में दावा कर े हुए संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, वाद 5 में वादपत्र वि+म ही अखाड़े को एक सेवाय क े रूप में स्जिस्र्थीति को चु+ौ ी +हीं दे ा है। परिरर्णामस्वरूप वि+म ही अखाड़ा +े कहा विक मूर्ति की ओर से वाद विमत्र द्वारा वाद पोषर्णीय +हीं है। यह क: विक वि+म ही अखाड़ा मूर्ति यों का सेवाय है और परिरर्णामस्वरूप भगवा+ राम की मूर्ति यों की ओर से कार:वाई कर+े का अ+न्य अति*कार उसमें वि+विह है, इस क: को 4 में वादकारिरयों की ओर से पेश वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा र्डॉ. *व+ द्वारा भी समर्थी:+ विकया गया र्थीा। उन्हों+े कहा विक उ+क े क: क े बावSूद विक वाद 3 को परिरसीमा द्वारा बाति* कर विदया गया र्थीा, उस वाद की बखा:स् गी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +े क े वल वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे क े खिलए वाद दायर कर+े क े उपचार को समाप्त कर विदया, परन् ु वि+म विहयों क े अति*कारों को सेवाय क े रूप में समाप्त +हीं विकया। अ ः र्डा. *व+ क े कÂ में वि+म ही अखाड़ा सेवाय ब+ा रहा और वष: 1989 में भी भगवा+ राम की मूर्ति यों की ओर से मुकदमा चला+े का अ+न्य अति*कार रख ा र्थीा। यह यह कहा गया है विक वाद 5 पोषर्णीय +हीं है।

336. वाद 5 की पोषर्णीय ा की चु+ौ ी इस क: पर आ*ारिर है विक क े वल एक सेवाय मूर्ति की ओर से मुकदमा चला सक ा है। मूर्ति की विवणिशष्ट प्रक ृ ति क े कारर्ण मूर्ति की ओर से कौ+ मुकदमा कर सक ा है इस पर प्रश्न उठ ा है। मूर्ति एक न्यातियक व्यविX और देवोत्तर संपखित्त का स्वामी है, परन् ु (Sैसा विक हम+े पहले चचा: की है) क े वल एक आदश: अर्थी: में है। विवति* में मूर्ति मुकदमा कर+े और अप+े +ाम पर मुकदमा चला+े में सक्षम है। हालांविक, मूर्ति द्वारा विकसी भी वाद को सभी व्यावहारिरक उद्देश्यों क े खिलए विकसी इंसा+ द्वारा लाया Sा+ा चाविहए। महाराSा Sगदींˆ +ार्थी राय बहादुर ब+ाम रा+ी हेमं ा क ु मारी देबी220 में प्रति वादी द्वारा क ु छ भूविम पर आरोप लगा े हुए बेदखल कर विदया सिSसक े खिलए वादी +े एक मूर्ति क े सेवाय क े रूप में वाद संस्जिस्र्थी विकया। प्रति वादी +े परिरसीमा क े आ*ार पर मुकदमे का विवरो* विकया। सेवाय +े आरोप लगाया विक बेदखली क े समय वह +ाबाखिलग र्थीा और इसखिलए परिरसीमा की अवति* उसक े विवरूद्ध +हीं प्रारम्भ हुई Sब क विक उस+े वयस्क ा प्राप्त +हीं विकया। सर आर्थी:र विवल्स+ क े माध्यम से कह े हुए विप्रवी काउंसिसल +े अव*ारिर विकया: 220 (1903-04) 31 IA 203 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "लेविक+ *ार्मिमक समप:र्ण को कठोर प्रक ृ ति का मा+ े हुए भी, यह अभी भी ब+ा हुआ है विक समर्मिप संपखित्त का कब्Sा और प्रबं*+ सेवाय से संबद्ध है। और इसक े सार्थी यह अति*कार है विक संपखित्त की सुरक्षा क े खिलए Sो भी वाद आवश्यक हों, उसे ला+े का अति*कार है। वाद ला+े का ऐसा हर अति*कार सेवाय में वि+विह है मूर्ति में +हीं। और व:मा+ मामले मुकदमा चला+े का अति*कार वादी को ब प्राप्त र्थीा Sब वह अवयस्क र्थीा। इसखिलए मामला परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 7 की स्पष्ट भाषा क े अन् ग: आ ा है Sो कह ा है विक: "यविद कोई व्यविX वाद संस्जिस्र्थी कर+े का हकदार है........उस समय Sहां से परिरसीमा की अवति* की गर्ण+ा की Sा+ी है, अवयस्क है" ो वह एक समय क े भी र Sो व:मा+ मामले में ी+ वष: होगी, आयु प्राप कर+े क े पश्चा ् वाद संस्जिस्र्थी कर सक े गा।" (प्रभाव वर्ति* ) विप्रवी काउंसिसल +े बेदखली क े समय Sांच की विक क्या सेवाय क े विवरूद्ध परिरसीमा प्रारम्भ हो गई र्थीी। ऐसा कर+े में विप्रवी काउंसिसल +े वाद चला+े क े अति*कार को सेवाय में वि+विह रखा, + विक मूर्ति में। अं: विप्रवी काउंसिसल +े अव*ारिर विकया विक वाद को परिरसीमा द्वारा बाति* +हीं विकया गया क्योंविक बेदखली क े समय सेवाय अवयस्क र्थीा। इस प्रकार, यह प्रासंविगक +हीं र्थीा विक परिरसीमा देव ा क े वाद चला+े क े अति*कार क े विवरूद्ध है अर्थीवा +हीं Sो विक इस रह क े अति*कार सेवाय में वि+विह हैं।

337. सा*ारर्ण या, मूर्ति की ओर से वाद चला+े का अति*कार सेवाय में वि+विह है। हालांविक इसका आशय यह +हीं है विक मूर्ति कु छ स्जिस्र्थीति यों में अप+े +ाम पर वाद चला+े क े अप+े अं र्मि+विह और स्व ंत्र अति*कार से वंतिच है। संपखित्त मूर्ति में वि+विह है। संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए वाद चला+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का अति*कार संपखित्त क े स्वाविमत्व वाले अति*कारों का एक अं र्मि+विह घर्टक है। सेवाय मात्र मा+व अणिभक ा: है सिSसक े माध्यम से वाद चला+े क े अति*कार का प्रयोग विकया Sा ा है। मूर्ति क े त्काली+ रक्षक और उसक े संपखित्तयों क े अ+न्य प्रबं*क क े रूप में, मूर्ति की ओर से क े वल सेवाय द्वारा एक वाद चलाया Sा+ा चाविहए। Sहां विवति*पूव:क वि+य विकया गया सेवाय मौSूद है Sो देव ा क े विह ों की सुरक्षा क े खिलए आवश्यक सभी कायÂ को कर+े में सक्षम है और इसकी वि+रं र सुरक्षा और प्रबन्* को सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए, वाद चला+े क े खिलए देव ा क े अति*कार को देव ा की ओर से वाद चला+े क े सेवाय क े अति*कार से अलग +हीं विकया Sा सक ा। ऐसी स्जिस्र्थीति यों में, मूर्ति क े वाद चला+े का अति*कार मूर्ति की ओर से सेवाय क े वाद चला+े क े अति*कार क े सार्थी Sुड़ Sा ा है। इस व्यवस्र्थीा को न्यायमूर्ति बी क े मुखS- +े "द हिंहदू लॉ ऑफ *ार्मिमक और *मा:र्थी: र्ट्रस्र्ट" में वि+म्+खिलखिख रीक े से संक्षेविप विकया है: "इसखिलए यह वि+र्ण:य [Sगदीन्ˆ +ार्थी में] ी+ बा ों को स्र्थीाविप कर ा हैः - (1) यह विक मूर्ति की सम्पखित्त क े संबं* में वाद का अति*कार सेवाय में है; (2) यह अति*कार सेवाय का व्यविXग अति*कार है Sो उसे परिरसीमा अति*वि+यम द्वारा प्रदत्त विवशेषाति*कार का दावा कर+े का अति*कार दे ा है; और (3) सेवाय अप+े +ाम से वाद चला सक ा है और वाद में वादी क े रूप में देव ा की +ाम की आवश्यक ा +हीं है, यद्यविप अणिभवच+ से यह प्रदर्भिश हो+ा चाविहए विक सेवाय वाद चला रहा है।"221 221 बी क े मुखS-, "द हिंहदू लॉ ऑफ *ार्मिमक और *मा:र्थी: र्ट्रस्र्ट" (पाँचवाँ संस्करर्ण, ईस्र्ट+: लॉ हाऊस, 1983) पृष्ठ 257-258 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

338. विकसी मूर्ति की ओर से सेवाय द्वारा एक वाद मूर्ति को बां* ा है। इस कारर्ण से, एक मूर्ति की ओर से वाद कौ+ चला सक ा है, यह प्रश्न मूल विवति* का प्रश्न है। विकसी अपरिरतिच को मूर्ति की ओर से काय:वाविहयों को संस्जिस्र्थी कर+े और उसे आबद्ध कर+े क े अति*कार क े सार्थी वि+विह कर े हुए मूर्ति और उसकी संपखित्तयों को ऐसे कई व्यविXयों की अ+ुक ं पा पर छोड़ देगा Sो 'वाद विमत्र' हो+े का दावा कर े हैं। इसखिलए, मूर्ति क े विह ों को मूर्ति की ओर से लाए गए कायÂ को प्रति बंति* और Sांच कर े हुए संरतिक्ष विकया Sा ा है। सा*ारर्ण या इस वSह से क े वल एक विवति*क सेवाय मूर्ति की ओर से वाद चला सक ा है। Sब एक विवति*क सेवाय देव ा की ओर से वाद चला ा है, ो यह प्रश्न विक क्या देव ा काय:वाही क े खिलए एक पक्षकार है यह मात्र प्रविक्रया का विवषय है। Sब क विक वाद एक सेवाय की क्षम ा में दायर विकया Sा ा है ो यह विववतिक्ष है विक इस रह का वाद मूर्ति की ओर से और लाभ क े खिलए है। विकसी उपासक या विह बद्ध व्यविX द्वारा चलाया गया वाद

339. ऐसी स्जिस्र्थीति उत्पन्न हो सक ी है Sहां एक सेवाय क:व्यों क े प्रदश:+ में परिरत्यX है, चाहे कोई काय: + करक े या *म:दाय संपखित्त क े अपक ृ त्य हस् ां रर्ण में सहयोग करक े । ऐसी स्जिस्र्थीति में, Sहां देव ा की संपखित्त की प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए वाद संस्जिस्र्थी की Sा ी है, यह काय: सेवाय और उस व्यविX दो+ों क े विवरूद्ध है Sो संपखित्त को देव ा क े प्रति शत्रु ापूर्ण: रीक े से रख ा या दावा कर ा है। एक सेवाय द्वारा सामान्य कु प्रबं*+ क े विवरूद्ध mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA काय: का उपचार सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 में पाया Sा सक ा है। हालांविक, Sहां न्यास क े खिलए विकसी अपरिरतिच क े विवरूद्ध काय: पर विवचार विकया Sा ा है वहाँ उपचार सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 क े ह एक वाद +हीं है परन् ु सामान्य विवति* में एक वाद है।

340. वेमारेड्डी रामाराघव रेड्डी ब+ाम कोंर्डुरु सेशू रेड्डी222 में वादकारिरयों +े प्रति वाविदयों पर आरोप लगाया Sो मंविदर क े प्रबं*कों और इसकी संपखित्तयों का क ु प्रबं*+ र्थीा। इसक े बाद, प्रति वाविदयों और हिंहदू *ार्मिमक *म:दाय बोर्ड: क े बीच एक समझौ ा तिर्डक्री वि+ष्पाविद की गई, सिSसमें अन्य बा ों क े सार्थी- सार्थी मंविदर की संपखित्तयों को प्रति वाविदयों की व्यविXग संपखित्त क े रूप में घोविष विकया। वादकारिरयों +े विवणिशष्ट राह अति*वि+यम 1963 की *ारा 42 क े ह यह कह े हुए समझौ े क े प्राव*ा+ की एक घोषर्णा की मांग की विक मंविदर की संपखित्त प्रति वादी क े पूर्ण: व्यविXग संपखित्त मंविदर पर बाध्यकारी +हीं र्थीे। प्रति वाविदयों +े इस क: का इस आ*ार पर विवरो* विकया विक वादकारिरयों को मंविदर अर्थीवा मंविदर की संपखित्त में कोई विवति*क विह +हीं र्थीा और और मात्र उपासक ही र्थीे सिS+क े वाद मंविदर को बाध्य +हीं कर सक े र्थीे। न्यायमूर्ति वी रामास्वामी +े इस न्यायालय की दो न्याया*ीश पीठ क े खिलए बोल े हुए अव*ारिर विकया: "13....विवति*क रूप में, एकमात्र व्यविX Sो देव ा का प्रति वि+ति*त्व कर सक ा है या Sो देव ा की ओर से वाद चला सक ा है वह सेवाय है, और यद्यविप एक देव ा एक न्यातियक व्यविX है Sो संपखित्त *ारिर कर+े में सक्षम है, यह क े वल एक आदश: अर्थी: में है विक संपखित्त इस प्रकार *ारिर 222 1966 Supp SCR 270 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की गई है।सामान्य प्रविक्रया में संपखित्त क े कब्Sे और प्रबं*+ क े संबं* में वाद चला+े का अति*कार सेवाय में वि+विह है लेविक+ हालांविक Sहां सेवाय उपेतिक्ष है अर्थीवा Sहाँ सेवाय, सिSसक े विवरूद्ध देव ा को राह की आवश्यक ा है वह स्वयं दोषी पक्षकार है और यह *ार्मिमक *म:दाय में विह बद्ध उपासकों अर्थीवा अन्य व्यविXयों क े खिलए न्यास की संपखित्तयों क े संरक्षर्ण क े खिलए वाद चला सक ा है। ऐसे मामले में, यह अ+ुतिच रीक े से हस् ां रिर संपखित्त क े कब्Sे क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए अर्थीवा अन्य राह क े खिलए वाद विमत्र क े रूप में विकसी व्यविX क े माध्यम से देव ा वाद दायर कर सक े हैं। ऐसा वाद विमत्र वह व्यविX हो सक ा है Sो देव ा का उपासक हो अर्थीवा भावी सेवाय क े रूप में *म:दाय में विवति*क रूप से विह बद्ध हो। ऐसे मामले में Sहां सेवाय +े देव ा क े समर्मिप संपखित्तयों क े अति*कार से इ+कार विकया है, यह स्पष्ट रूप से वांछ+ीय है विक देव ा को न्यायालय द्वारा +ाविम विह बद्ध + रख+े वाले वाद विमत्र क े माध्यम से वाद दायर कर+ा चाविहए...." (प्रभाव वर्ति* )

341. मंविदर की संपखित्तयों क े प्रबं*+ का एक आवश्यक अ+ुबद्ध उX संपखित्तयों की प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए वाद चला+े का अति*कार है। सामान्य ः क े वल सेवाय ही मूर्ति की ओर से वाद चला+े का हकदार होगा। मूर्ति क े खिलए त्काल सहारा प्रदा+ कर+े क े अलावा, यह अपरिरतिच ों क े विवरूद्ध वाद चला+े क े खिलए महत्वपूर्ण: Sांच भी प्रदा+ कर ा है, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप मूर्ति अर्थीवा सेवाय क े ज्ञा+ क े विब+ा मूर्ति पर प्रति क ू ल प्रभाव र्डाल सक े हैं। लेविक+ ऐसे मामले भी हो सक े हैं Sहां एक सेवाय का आचरर्ण विवचारा*ी+ है। क ु छ मामलों में, Sहां सेवाय मूर्ति क े खिलए स्वयं ही उपेतिक्ष अर्थीवा पक्षˆोही दावा कर ा है, यह उपासक अर्थीवा वाद विमत्र क े खिलए है Sो परिरस्जिस्र्थी क े उपचार क े खिलए वाद दायर कर+े क े खिलए मूर्ति की संपखित्तयों को संरतिक्ष कर+े में विह बद्ध है। उपरोX मामले में, समझौ ा तिर्डक्री में प्रवेश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर े हुए मंविदर की संपखित्तयों को प्रति वादी सेवाय ों क े व्यविXग संपखित्तयों क े रूप में घोविष कर े हुए प्रति वाविदयों +े मूर्ति क े हक क े विवपरी हक स्र्थीाविप विकया। इस न्यायालय +े अव*ारिर विक यह वादकारिरयों क े खिलए स्वीकाय: र्थीाSो समझौ ा तिर्डक्री को अमान्य कर+े क े खिलए वाद पोविष कर+े क े खिलए एक उपासक र्थीे।

342. हालांविक वेमारेड्डी रेड्डी में देव ा की ओर से वाद +हीं चलाया गया र्थीा। वाद को उपासक द्वारा व्यविXग क्षम ा में एक घोषर्णा क े खिलए संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा विक प्रश्नग संपखित्त देवोत्तर संपखित्त र्थीी। इस संदभ: मेंन्यायालय +े अव*ारिर विकया: "11.... यविद एक सेवाय +े अ+ुतिच रूप से न्यास की संपखित्त को हस् ां रिर कर विदया है ो एक घोषर्णा क े खिलए विह बद्ध विकसी व्यविX द्वारा एक वाद लाया Sा सक ा है विक देव ा क े खिलए इस रह का अं रर्ण बाध्यकारी +हीं है, परन् ु कब्Sे क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए कोई तिर्डक्री ऐसे वाद में +हीं ली Sा सक ी Sब क विक वाद में वादी क े कब्Sे का व:मा+ अति*कार है। मंविदर क े उपासक आध्यास्जित्मक अर्थी: में विह ाति*कारी अर्थीवा न्यास लाभी की स्जिस्र्थीति में हैं।.... चूंविक उपासक अप+े विह ों को संरतिक्ष कर+े क े खिलए देव ा क े वाद चला+े की शविX का प्रयोग +हीं कर े हैं इसखिलए वे सेवाय द्वारा अ+ुतिच रूप से हस् ां रिर संपखित्त क े कब्Sे को पु+प्रा:प्त कर+े क े हकदार +हीं हैं, परन् ु उन्हें एक घोषर्णात्मक तिर्डक्री दी Sा सक ी है विक हस् ां रर्ण देव ा पर बाध्यकारी +हीं है...." (प्रभाव वर्ति* ) देव ा की ओर से वाद चला+े और देव ा क े लाभ क े खिलए व्यविXग क्षम ा में वाद का संस्र्थी+ क े बीच अं र का महत्व शीघ्र ही संदर्भिभ विकया Sाएगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

343. विबश्व+ार्थी ब+ाम श्री ठाक ु र रा*ा बल्लभSी223 में मूर्ति क े वाद विमत्र +े प्रति वादी सेवाय द्वारा अप+ी संपखित्तयों क े हस् ां रर्ण को चु+ौ ी दी। सेवाय द्वारा प्रति रक्षा में से एक यह र्थीा विक वाद विमत्र देव ा की ओर से वाद चला+े में सक्षम +हीं र्थीा। न्यायमूर्ति सुब्बा राव +े इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीश पीठ क े खिलए बोल े हुए इस सिसद्धां की पुविष्ट की विक सामान्य ः एक मूर्ति की ओर से वाद चला+े का विवणिशष्ट अति*कार है: “9. ी+ का+ू+ी अव*ारर्णाएं अच्छी रह से य की गई हैं: (1) हिंहदू मंविदर की एक मूर्ति न्यातियक व्यविX है; (2) Sब एक सेवाय है, ो सामान्य ः सेवाय क े अति रिरX कोई भी व्यविX मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व +हीं कर सक ा है; और (3) यद्यविप क े वल आध्यास्जित्मक अर्थीÂ में मूर्ति क े उपासक इसक े लाभार्थी- हैं। हिंहदू विवति* और *म: क े अ+ुसार यह भी अव*ारिर विकया गया है विक Sो लोग क े वल भविX क े उद्देश्य क े खिलए ही Sा े हैं उ+का मंविदरों में मात्र सेवकों, Sो वहां क ु छ *+-संबं*ी लाभ क े खिलए काय: कर े हैं, की अपेक्षा कहीं अति*क और गहरी रूतिच हो ी है..." विवद्वा+ न्याया*ीश +े ब मूल्यांक+ विकया Sब एक सेवाय क े अति रिरX अन्य व्यविX देव ा की ओर से मुकदमा पोविष कर+े क े हकदार हो सक े हैं: "10. प्रश्न यह है विक क्या ऐसा व्यविX उस मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व कर सक ा है Sब सेवाय अप+े विह क े प्रति क ू ल काय: कर ा है और अप+े विह ों की रक्षा क े खिलए काय: कर+े में विवफल रह ा है। सिसद्धां रूप में हमें उपासक क े खिलए इस रह क े अति*कार से इ+कार कर+े का कोई औतिचत्य +हीं विदख ा है। एक मूर्ति अवयस्क की स्जिस्र्थीति में है Sब इसका प्रति वि+ति*त्व कर+े वाला व्यविX इसे एक झर्टक े में छोड़ दे ा है, मूर्ति की 223 (1967) 2 SCR 618 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पूSा में विह बद्ध व्यविX वि+तिश्च रूप से अप+े विह की रक्षा क े खिलए प्रति वि+ति*त्व की दर्थी: शविX प्रदा+ की Sा सक ी है। यह थ्यात्मक है, विफर भी एक कविठ+ परिरस्जिस्र्थीति का विवति*क समा*ा+ है। यह अव*ारिर विकया Sा+ा चाविहए विक कोई सेवाय, सिSस+े संपखित्त हस् ां रिर की है क े वल प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए वाद ला सक ा है, अति*क से अति*क बार वह अप+े चूक को स्वीकार +हीं करेगा और संपखित्त की प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए कदम उठाएगा, इसक े अलावा वाद में अन्य क+ीकी दलीलें अं रिर ी क े खिलए हो सक ी हैं। क्या यह अव*ारिर विकया Sा+ा चाविहए विक एक उपासक क े वल सेवाय को हर्टा+े क े खिलए एक वाद दायर कर सक ा है और संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए कदम उठा+े की इस रह की प्रविक्रया दीघ:काली+ और Sविर्टल हो Sाएगी और मूर्ति क े विह को अपूर्ण-य क्षति हो सक ी है।इसीखिलए ऐसे वि+र्ण:य +े ऐसी परिरस्जिस्र्थीति यों में एक उपासक को मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व कर+े और मूर्ति क े खिलए संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण कर+े की अ+ुमति दी है। यह कई फ ै सलों में अव*ारिर विकया गया है विक उपासक विकसी *म:दाय की ओर से विकसी संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए प्रार्थी:+ा पत्र दायर कर सक े हैं..." (प्रभाव वर्ति* )

344. यह वि+र्ण:य वेमारेड्डी रेड्डी क े इस वि+र्ण:य को दोहरा ा है विक Sहां एक सेवाय विकसी मूर्ति क े लाभ क े खिलए काय: कर+े से इ+कार कर ा है, अर्थीवा Sहां सेवाय क े काय: मूर्ति क े विह क े खिलए पूवा:£हपूर्ण: हैं, मूर्ति क े विह ों की रक्षा क े खिलए एक वैकस्जिल्पक विवति* प्रदा+ की Sा+ी चाविहए। ऐसे मामलों में, *म:दाय संपखित्तयों क े संरक्षर्ण में विह बद्ध एक वाद विमत्र को वाद संस्जिस्र्थी कर+े क े अति*कार क े सार्थी वि+विह विकया Sा ा है। Sहां मूर्ति क े विह ों क े खिलए पूवा:£ही काय: सेवाय द्वारा की Sा ी है, यह संभाव+ा +हीं है विक सेवाय अप+े कायÂ को चु+ौ ी दे+े वाला वाद संस्जिस्र्थी करेगा। इसखिलए यह आवश्यक हो Sा ा है विक वाद विमत्र को उस सेवाय और उस अपरिरतिच क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवरुद्ध Sो मूर्ति क े विह ों को ख रा पैदा कर ा है, विवति* में कार:वाई कर+े का अति*कार प्रदा+ विकया Sाए।

345. यह उल्लेख कर+ा महत्वपूर्ण: है विक वेमारेड्डी रेड्डी की रह ही, विबश्व+ार्थी में भी इस न्यायालय +े उपासकों को मूर्ति की ओर से वाद चला+े की अ+ुमति दी। विबश्व+ार्थी मामले में वाद को एक उपासक द्वारा अप+ी व्यविXग क्षम ा में +हीं बस्जिल्क मूर्ति क े प्रति वि+ति* क े रूप में सेवाय क े अपवS:+ क े खिलए संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। वाद विमत्र मुकदमेबाSी क े सीविम उद्देश्य क े खिलए सेवाय की भूविमका का वि+व:ह+ कर ा है।

346. Sब एक उपासक काय:वाही संस्जिस्र्थी कर ा है ो इस संबं* में विवति*क स्जिस्र्थीति य की Sा ी है। एक उपासक एक अपरिरतिच क े विवरूद्ध देव ा क े विह ों की रक्षा क े खिलए एक वाद का संस्र्थी+ कर सक ा है Sहां एक सेवाय अप+े क:व्यों में उपेतिक्ष है अर्थीवा ऐसे कायÂ को कर ा है Sो देव ा क े प्रति पक्षˆोही हैं। प्रश्न यह है विक क्या उपासक क े खिलए उपलब्* उपचार व्यविXग क्षम ा में एक वाद है या मूर्ति की ओर से एक वाद (वाद विमत्र क े रूप में) वह है सिSसका उत्तर विदया Sा+ा चाविहए। वेमारेड्डी रेड्डी मामले में यह उ+की व्यविXग क्षम ा में उपासकों द्वारा दायर विकया गया वाद र्थीा और न्यायालय क े पास यह वि+*ा:रिर कर+े का कोई अवसर +हीं र्थीा विक मूर्ति की ओर से वाद विमत्र द्वारा मुकदमे को पोविष रखा Sा सक ा है अर्थीवा +हीं। हालांविक अणिभव्यX अणिभवि+*ा:रर्ण विक एक उपासक देव ा क े मुकदमा कर+े क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*कार का प्रयोग +हीं कर सक ा, इस मामले पर विवचार विकया Sा+ा चाविहए।

347. इस संबं* में, र्डॉ. *व+ +े कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ क े सदस्य क े रूप में रिर भूषर्ण राय ब+ाम श्री श्री ईश्वर श्री*र साल£ाम णिशला ठाक ु र224 में न्यायमूर्ति पाल की अलग राय को हमारे संज्ञा+ में लाए। मामला एक अविद्व ीय थ्यात्मक पृष्ठभूविम से उत्पन्न हुआ। अ+ुपमा द्वारा एक सूर्ट की स्र्थीाप+ा की गई, Sो सेवाय +हीं बस्जिल्क त्काली+ सेवाय की पुत्री र्थीी। अ+ुपमा +े इस आ*ार पर कु छ संपखित्त क े विवक्रय पर रोक लगा+े की मांग की, Sो संपखित्त पूर्ण: देवोत्तर संपखित्त र्थीी। अ+ुपमा क े वाद को बाद में खारिरS कर विदया गया र्थीा और सेवाय द्वारा +ए सिसरे से उतिच काय:वाही संस्जिस्र्थी की गई र्थीी। न्यायमूर्ति +सीम अली और न्यायमूर्ति पाल दो+ों +े अव*ारिर विकया विक अ+ुपमा एक सेवाय +हीं र्थीी और इस प्रकार +ए वाद को य कर+े क े उद्देश्यों क े खिलए उ+क े वाद को खारिरS कर+ा अप्रासंविगक र्थीा। हालांविक, न्यायमूर्ति पाल +े आगे अणिभवि+*ा:रिर विकया: ''ऐसे *म:दाय क े ह व्यविXग अति*कार रख+े वाले व्यविX मूर्ति क े +ाम पर वाद चला+े क े खिलए बाध्य विकए विब+ा अप+े +ाम में एक सा*ारर्ण वाद द्वारा ऐसे व्यविXग अति*कारों को लागू कर+े क े खिलए वाद ला सक े हैं। देवोत्तर में विह बद्ध उपासकों अर्थीवा अन्य व्यविXयों क े विह ों की सुरक्षा क े खिलए इस अति*कार को पया:प्त रूप से उपासकों को आरतिक्ष कर विदया गया है। उस समय यह मूर्ति क े विह ों को उ+ व्यविXयों की दखलंदाSी द्वारा प्रभाविव हो+े क े द्वारा Sोखिखम में र्डाल+े की अ+ुमति दे ा है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिS+की उपयुX ा पर कभी भी पूछ ाछ और न्यायवि+र्ण:य+ +हीं विकया गया है। (प्रभाव वर्ति* ) न्यायमूर्ति पाल +े कहा विक उ+ स्जिस्र्थीति यों में भी Sहां सेवाय मूर्ति क े विह ों क े विवपरी काय: कर ा है, परन् ु क े वल व्यविXग क्षम ा में एक उपासक मूर्ति की ओर से वाद +हीं चला सक ा है। यह इस विवचार से अा ा है विक सिS+ व्यविXयों की उपयुX या सद्भाव+ापूर्ण: की Sांच +हीं की गई है या अदाल ों द्वारा स्र्थीविग +हीं विकया गया है, वे मूर्ति और उसकी संपखित्तयों को प्रति क ू ल रूप से बां* सक+े में सक्षम हैं। इस दृविष्ट से, उपासक देव ा की ओर से वाद दायर +हीं कर ा है, परन् ु उच्च म स् र पर, सेवाय क े कायÂ को चु+ौ ी दे े हुए एक घोषर्णात्मक तिर्डक्री प्राप्त कर सक ा है Sो देव ा क े खिलए बाध्यकारी +हीं है।

348. Sहां कोई सेवाय देव ा क े विह ों क े प्रति क ू ल रूप से काय: कर ा है ो इस प्रकार वहां विह बद्ध उपासक को उपलब्* उपचारों पर दो दृविष्टकोर्ण विवद्यमा+ हैं। विबश्व+ार्थी मामले में इस न्यायालय द्वारा ली गई स्जिस्र्थीति यह है विक एक उपासक देव ा की ओर से वाद विमत्र क े रूप में वाद चला सक ा है। वाद विमत्र क े रूप में उपासक देव ा क े वाद चला+े क े अति*कार का प्रत्यक्ष प्रयोग कर े हैं। रिर भूषर्ण राय में न्यायमूर्ति पाल द्वारा खिलया गया वैकस्जिल्पक दृविष्टकोर्ण और Sैसा विक वेमारेड्डी रेड्डी में इस न्यायालय द्वारा अव*ारिर विकया गया है विक एक उपासक देव ा क े विह ों की रक्षा क े खिलए व्यविXग क्षम ा में वाद दायर कर सक ा है परन् ु देव ा की ओर से प्रत्यक्ष वाद +हीं कर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक ा है, यद्यविप यह वाद देव ा क े लाभ क े खिलए हो सक ा है। इस दृविष्ट से, देव ा उपासक क े वाद से बाध्य +हीं है Sब क विक प्रदा+ विकया गया उपचार सव:बन्*ी प्रक ृ ति का +हीं हो। यह मामला दो प्रश्न उठा ा है: पहला, क्या एक उपासक द्वारा व्यविXग क्षम ा में दायर एक वाद Sो देव ा क े विह ों की सुरक्षा क े खिलए पया:प्त और समीची+ विवति* है? दूसरा, एक वाद विमत्र को देव ा की ओर से वाद कर+े की अ+ुमति दे ा है, विब+ा विकसी सद्भाव+ापूर्ण: आशय और योग्य ाओं को स्र्थीाविप कर ा है और देव ा को विह ों को Sोखिखम में र्डाल ी है ?

349. विकसी उपासक द्वारा अप+ी व्यविXग क्षम ा में विकया गया वाद कु छ मामलों में समुतिच उपचार हो सक ा है। उदाहरर्ण क े खिलए, Sहां एक सेवाय मूर्ति क पूSा कर+े वालों की पहुंच से इ+कार कर ा है, मूर्ति क अणिभगम+ क े खिलए व्यविXग क्षम ा में उपासक द्वारा एक वाद सेवाय क े विवरूद्ध उपयुX उपचार हो सक ा है। व्यविXग क्षम ा में दायर हो+े वाले उपासकों क े वाद को सीविम कर+े का एक और लाभ यह है विक संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण से संबंति* मामलों में, एक व्यविXग क्षम ा में एक उपासक द्वारा विकसी वाद का यह प्रश्न +हीं उठाया Sा ा है विक भूविम का कब्Sा विकसको विदया Sाएगा। हालांविक, Sहां देव ा की ओर से एक वाद विमत्र द्वारा वाद दायर विकया Sा ा है ो एक समस्या उत्पन्न हो ी है: विकसी वाद में मूर्ति की ओर से संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए न्यायालय संपखित्त का कब्Sा वाद विमत्र को +हीं दे सक ी है। वाद विमत्र व्यविXग मुकदमे क े सीविम उद्देश्यों क े खिलए मूर्ति का मात्र एक अस्र्थीायी प्रति वि+ति* है। Sहां एक उपासक क े वल अप+ी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्यविXग क्षम ा पर वाद चला सक ा है वहाँ कब्Sे प्रदा+ कर+े का प्रश्न ही +हीं उठ ा।

350. उपासक द्वारा उ+की व्यविXग क्षम ा में विकया गया वाद, आशंका की सीमा को +हीं ब ा सक ा है Sो मूर्ति को उपेतिक्ष सेवाय से होगी और न्यायालय क े खिलए यह आवश्यक हो सक ा है विक वह मूर्ति क े विह ों की रक्षा कर+े क े खिलए मूर्ति की ओर से वाद विमत्र को पया:प्त रूप से वाद चला+े की अ+ुमति प्रदा+ करे। उदाहरर्णरर्णार्थी:, Sहां एक सेवाय देव ा की ओर से कब्Sे क े खिलए वाद दायर कर+े में विवफल रह ा है वहीं उपासक द्वारा उसक े व्यविXग क्षम ा में विकया गया वाद अपया:प्त हो ा है। बस्जिल्क, संपखित्त क े कब्Sे क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए मूर्ति की ओर से वाद विमत्र द्वारा वाद की आवश्यक ा है। यह सत्य है विक वाद विमत्र को कब्Sा +हीं विदया Sाएगा। हालांविक न्यायालय सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92225 क े ह महाति*वXा अर्थीवा दो व्यविXयों द्वारा एक आवेद+ पर योS+ा ैयार कर+े सविह कई प्रकार की राह दे सक ी है, यह सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए विक 225 92. लोक पू: काय:- (1) पू: या *ार्मिमक प्रक ृ ति क े लोक प्रयोS+ों क े खिलए सृष्ट विकसी अणिभव्यX या आन्वतियक न्यास क े विकसी अणिभकति भंग क े मामले में, या Sहां ऐसे विकसी न्यास क े प्रशास+ क े खिलए न्यायालय का वि+देश आवश्यक समझा Sा ा है वहाँ महाति*वXा या न्यास में विह रख+े वाले ऐसे दो या अति*क व्यविX, सिSन्हों+े [न्यायालय की इSाS ] अणिभप्राप्त कर ली है, ऐसा बाद, चाहे वह प्रति विवरो*ात्मक हो या +हीं, आरस्जिम्भक अति*कारिर ा वाले प्र*ा+ सिसविवल न्यायालय में या राज्य सरकार द्वारा इस वि+विमत्त सशX विकए गए विकसी अन्य न्यायालय में सिSसकी अति*कारिर ा की स्र्थीा+ीय सीमाओं क े भी र न्यास की सम्पूर्ण: विवषय-वस् ु या उसका कोई भाग स्जिस्र्थी है, वि+म्+खिलखिख तिर्डक्री अणिभप्राप्त कर+े क े खिलए संस्जिस्र्थी कर सक ें गे- (क) विकसी न्यासी को हर्टा+े की तिर्डक्री; (ख) +ए न्यासी को वि+युX कर+े की तिर्डक्री; (ग) न्यासी में विकसी सम्पखित्त को वि+विह कर+े की तिर्डक्री; [(गग) ऐसे न्यासी को Sो हर्टाया Sा चुका है या ऐसे व्यविX को Sो न्यासी +हीं रह गया है, अप+े कब्Sे में की विकसी न्यास- सम्पखित्त का कब्Sा उस व्यविX को Sो उस सम्पखित्त क े कब्Sे का हकदार है, परिरदत्त कर+े का वि+देश दे+े की तिर्डक्री;] (घ) लेखाओं और Sांचों को वि+र्मिदष्ट कर+े की तिर्डक्री; (ङ) यह घोषर्णा कर+े की तिर्डक्री विक न्यास-सम्पखित्त का या उसमें क े विह का कौ+ सा अ+ुपा न्यास क े विकसी विवणिशष्ट उद्देश्य क े खिलए आवंविर्ट होगा; (च) सम्पूर्ण: न्यास-सम्पखित्त या उसक े विकसी भाग का पट्टे पर उठाया Sा+ा, विवक्रय विकया Sा+ा, बन्*क विकया Sा+ा या विववि+मय विकया Sा+ा प्राति*क ृ कर+े की तिर्डक्री; (छ) स्कीम स्जिस्र्थीर कर+े की तिर्डक्री; अर्थीवा (S) ऐसा अति रिरX या अन्य अ+ु ोष अ+ुदत्त कर+े की तिर्डक्री Sो मामले की प्रक ृ ति से अपेतिक्ष हो। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संपखित्त मूर्ति को वापस कर दी Sाए। Sहां पहले से ही सेवाय क े काय: की वि+स्जिष्क्रय ा या दुभा:व+ापूर्ण: कार:वाई स्र्थीाविप की गई है, ऐसी योS+ा उपयुX उपचार हो सक ी है। हालांविक यह आवश्यक रूप से प्रत्येक मामले क े थ्यों और परिरस्जिस्र्थीति यों पर वि+भ:र करेगी।

351. इ+ विर्टप्पणिर्णयों क े मद्दे+Sर, Sहां मूर्ति क े विह ों को संरतिक्ष कर+े की आवश्यक ा है, विवति* में मात्र इच्छ ु क उपासकों को उ+की व्यविXग क्षम ा पर वाद चला+े की अ+ुमति दे+े से देव ा की पया:प्त सुरक्षा +हीं हो सक ी। क ु छ स्जिस्र्थीति यों में, प्रत्यक्ष रूप से देव ा को वाद चला+े क े अति*कार क े प्रयोग को मूर्ति की ओर से वाद चला+े की अ+ुमति वाद विमत्र को दी Sा+ी चाविहए। राह का प्रश्न मौखिलक रूप से प्रासंविगक है और न्यायालय द्वारा विवरतिच प्रत्येक मामले की परिरस्जिस्र्थीति यों में इसक े समक्ष पक्षकारों क े प्रकाश में लाया Sा+ा चाविहए।

352. हालांविक यह हमें दूसरे प्रश्न पर ला ा है विक क्या वाद विमत्र को मूर्ति की ओर से वाद चला+े की अ+ुमति दे+ा मूर्ति को Sोखिखम में र्डाल+ा है। मूर्ति और उसकी संपखित्तयों की रक्षा एक स्वच्छन्द वाद विमत्र की *मकी क े विवरुद्ध की Sा+ी चाविहए। Sहां सेवाय दुभा:व+ापूर्ण: रीति से काय: कर ा है वहां कोई व्यविX Sो 'वाद विमत्र' हो+े का दावा कर ा है वह वाद ला सक ा है। ऐसे व्यविX का आशय वास् व में देव ा क े प्रति शत्रु ापूर्ण: हो सक ा है और झूठे आ*ार में वाद कर सक ा है। यहां क विक एक सुविवचारिर उपासक भी वाद विमत्र क े रूप में वाद कर सक ा है और विवशुद्ध रूप से विवत्तीय बा*ाओं या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उपेक्षा क े कारर्ण वाद हार सक ा है और देव ा पर प्रति कू ल प्रभाव र्डाल सक ा है। रिर भूषर्ण राय क े मामले में न्यायमूर्ति पाल द्वारा पेश विकया गया समा*ा+, और व:मा+ काय:वाविहयों में र्डॉ. *व+ द्वारा कहा गया है विक क े वल न्यायालय द्वारा वि+युX वाद विमत्र मूर्ति की ओर से वाद चला सक े हैं। इसमें कोई संदेह +हीं है विक यह न्यायालय को सं ुष्ट करेगा विक वाद विमत्र सद्भाव+ापूर्ण: है और सं ोषS+क रूप से देव ा का प्रति वि+ति*त्व कर सक ा है।

353. यह सच है विक Sब क विक वाद विमत्र की उपयुX ा का विकसी प्रकार से Sाँच +हीं हो Sा ी, ब क एक व्यविX सिSसकी सद्भाव+ा वि+*ा:रिर +हीं की गयी है वह मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए बाध्य कर सक ा है। हालाँविक, प्रत्येक वाद विमत्र को पहले न्यायालय द्वारा वि+युX कर+ा अर्थीवा न्यायालय क े खिलए देव ा का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए एक अविह बद्ध व्यविX प्राप्त कर+ा अ+ावश्यक रूप से बोसिझल होगा। देव ा क े विह ों की पया:प्त रूप से रक्षा की Sाएगी, यविद उ+ मामलों में Sहां वाद विमत्र सद्भाव+ापूव:क विकसी अन्य पक्ष द्वारा क: विकया Sा ा है ो न्यायालय दृढ़ ा से Sांच कर ी है विक क्या वाद विमत्र मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए उपयुX है। एक उपयुX मामले में, न्यायालय अप+े स्वयं क े समझौ े क े अ+ुरूप ऐसा कर सक ा है Sहाँ वह देव ा क े विह संरतिक्ष कर+ा आवश्यक समझ ा है। विकसी भी आपखित्त क े अभाव में, और Sहां न्यायालय वाद विमत्र क े कायÂ में कोई कमी +हीं देख ी है, वहाँ कोई कारर्ण +हीं है विक एक उपासक को उस देव ा की ओर से वाद कर+े का अति*कार +हीं हो+ा चाविहए Sहां एक सेवाय अप+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पविवत्र और विवति*क क:व्यों का पाल+ कर ा है। बहु बार, उपासकों को एक सेवाय द्वारा विकसी क ु प्रबं*+ क े विवरूद्ध काय: कर+े और साक्ष्य क े खिलए सबसे अच्छा मा+ा Sा ा है। इसखिलए Sहां सेवाय देव ा क े विह ों क े प्रति क ू ल काय: कर ा है वहाँ एक उपासक देव ा क े वाद विमत्र क े रूप में देव ा की ओर से वाद चला सक ा है, बश † विक यविद वाद विमत्र की सद्भाव+ा क: कर े हैं ो न्यायालय को Sांच कर+ी चाविहए विक वाद विमत्र क े आशय और क्षम ाओं को पया:प्त रूप से देव ा का प्रति वि+ति*त्व कर+ा है। न्यायालय अप+े स्वयं क े अ+ुरूप न्यातियक दातियत्व का वि+व:ह+ कर सक ी है। ीसरे वादी की सक्षम ा

354. व:मा+ काय:वाही में श्री एस क े Sै+ और र्डॉ. *व+ दो+ों +े आ£ह विकया विक वाद 5 में ीसरा वादी पहले और दूसरे वादी का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए उपयुX +हीं र्थीा। वाद 5 वष: 1989 में वैष्र्णव देवकी +ंद+ अ£वाल द्वारा संस्जिस्र्थी विकया गया। वैष्र्णव *म: क े प्रमुख देव ा भगवा+ विवष्र्णु हैं। वैष्र्णव संप्रदाय भगवा+ राम को भगवा+ विवष्र्णु क े कई अव ार में से एक क े रूप में पूS े हैं। सिसविवल SS क े एक आदेश विद+ांविक 1 Sुलाई 1989 द्वारा देवकी +ंद+ अ£वाल को पहले और दूसरे वादी क े वाद विमत्र क े रूप में वि+युX विकया गया र्थीा।

355. मो. हाणिशम +े श्री देवकी +ंद+ अ£वाल की वि+युविX को चु+ौ ी दे े हुए एक दीवा+ी प्रकीर्ण: प्रार्थी:+ा पत्र226 दायर विकया। सुसंग Sांच यह है विक क्या 226 सामान्य वाद सं. 236 वष: 1989 में दीवा+ी प्रकीर्ण: प्रार्थी:+ा पत्र सं. 10(0) वष: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पहले और दूसरे वादी का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए ीसरे वादी की सद्भाव+ा का कोई सारवा+ प्रति वाद विकया गया र्थीा। प्रार्थी:+ा पत्र में कहा गया: "5. यह विक वादपत्र प्रकर्थी+ों क े सत्य हो+े को ध्या+ में रख े हुए कणिर्थी वादी संख्या 1 और 2 विवति*क व्यविX +हीं हैं, और इस रह, विवति*क व्यविX क े खिलए वाद + हो+े से वाद विमत्र की वि+युविX क े प्रश्न पर विवचार +हीं विकया Sा सक ा है और प्रर्थीमदृष्ट्या इस सं ुविष्ट क े विब+ा विक यह वाद विवति*क व्यविX द्वारा दायर विकया गया है, वादविमत्र की वि+युविX क े प्रश्न पर विवचार +हीं विकया Sा सक ा है।

8. यह विक वाद विमत्र की वि+युविX क े खिलए एक प्रकर्थी+ हो+ा चाविहए विक कणिर्थी वाद विमत्र का उस व्यविX क े विह क े प्रति क ू ल कोई विह +हीं है सिSसक े खिलए उसे वाद विमत्र वि+युX विकया Sा रहा है और इसक े संबं* में विकसी प्रकर्थी+ क े + अभाव में और प्रति क ू ल विह क े अभाव क े बारे में सं ुष्ठ विकए विब+ा न्यायालय द्वारा वादी सं. 3 को वाद विमत्र क े रूप में वि+युX कर+े का आदेश गल और अवै* है।" (प्रभाव वर्ति* ) प्रार्थी:+ा पत्र क े प्रस् र 5 में प्रार्थी- +े पहले और दूसरी वादी क े विवति*क व्यविXत्व पर सवाल उठाया। यह प्रकणिर्थी विकया गया विक एक स्र्थीाविप विवति*क व्यविX क े अभाव में वाद विमत्र को वि+युX कर+े का सवाल ही +हीं उठ ा। चाहे Sो हो प्रकर्थी+ को ीसरे वादी की सद्भाव+ा को चु+ौ ी दे+े क े रूप में +हीं पढ़ा Sा सक ा है। प्रस् र 8 में प्रार्थी- +े कहा विक वाद विमत्र की वि+युविX क े खिलए कोई प्रार्थी:+ा पत्र इस विवणिशष्ट प्रकर्थी+ क े सार्थी हो+ा चाविहए विक प्रति वि+ति*त्व कर+े वाले व्यविX का देव ा क े प्रति क ू ल कोई विह +हीं है। इसक े अलावा प्रार्थी- को प्रति क ू ल विह क े अभाव क े बारे में अदाल को सं ुष्ट कर+ा चाविहए। यह सच है विक Sहां वाद विमत्र की विफर्ट+ेस विववाद में है, अदाल को वाद विमत्र की सद्भाव+ा की Sांच कर+ी चाविहए। हालांविक क े वल आरोप, Sो विकसी साक्ष्य से पुष्ट +हीं है, वाद विमत्र की सद्भाव+ा क े प्रति वाद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को गविठ +हीं कर ा है। प्रस् र 8 में एक विवरल कर्थी+ को छोड़कर प्रार्थी:+ा पत्र +े ीसरे वादी की सद्भाव+ा का + ो प्रति वाद विकया या + ही सिसद्ध विकया।

356. 8 अप्रैल, 2002 को देवकी +ंद+ अ£वाल का वि+*+ हो गया और र्डा. र्टी. पी. वमा: को प्रर्थीम और विद्व ीय वादी का वाद विमत्र वि+युX कर+े की अ+ुमति दे+े क े खिलए न्यायालय में एक प्रार्थी:+ा पत्र विदया गया। 25 अप्रैल 2002 क े एक आदेश द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय +े र्डॉ. र्टी पी वमा: को वाद विमत्र क े रूप में वि+युX विकया गया। इसक े बाद र्डॉ. र्टी पी वमा: की Sगह वित्रलोकी +ार्थी पांर्डे को प्रर्थीम और विद्व ीय वादी क े वाद विमत्र क े रूप में अ+ुमति दे+े क े खिलए एक प्रार्थी:+ा पत्र दायर विकया गया। इस प्रार्थी:+ा पत्र को इलाहाबाद उच्च न्यायालय +े खारिरS कर विदया। अपील पर विद+ांक 8 फरवरी 2010 क े एक आदेश द्वारा इस न्यायालय +े अव*ारिर विकया: "3. अपीलक ा:ओं की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े.ए+. भर्ट +े Sोरदार रीक े से क: विकया विक र्डॉ. ठाक ु र प्रसाद वमा: क े बSाय श्री वित्रलोकी +ार्थी पांर्डे को दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा क े आदेश XXXII वि+यम 8 क े प्राव*ा+ों क े ह अपीलक ा:-वादी सं. 1 व 2 क े वाद विमत्र क े रूप में वि+युX विकया Sाए चूँविक र्डॉ. वमा: को गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हैं। वह आगे कह े हैं विक Sहाँ क विक पहले से की गई लाग ों का संबं* है व:मा+ वाद विमत्र र्डॉ वमा: उच्च न्यायालय को यह दर्भिश कर+े वाला एक शपर्थी पत्र देंगें विक वह पहले से विकए गए खचÂ क े खिलए सिSम्मेदार होगें।

4. दूसरे पक्ष को इस व्यवस्र्थीा से कोई आपखित्त +हीं है। इसक े दृविष्टग हमारे खिलए उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आक्षेविप आदेश की शुद्ध ा या अन्य की Sांच कर+े की आवश्यक ा +हीं है। यविद उX शपर्थी पत्र विदया Sा ा है और श्री वित्रलोकी +ार्थी पा°र्डे की इच्छा उच्च न्यायालय को दशा:यी Sा ी है ो उस स्जिस्र्थीति में र्डॉ वमा: द्वारा विदए गए शपर्थी पत्र क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अध्य*ी+ श्री वित्रलोकी +ार्थी पा°र्डे अपीलक ा:-वादी सं. 1 व 2 क े वाद विमत्र क े रूप में काय: करेंगें।" इस न्यायालय क े आदेश द्वारा वित्रलोकी +ार्थी पांर्डे को प्रर्थीम और विद्व ीय वादी क े वाद विमत्र क े रूप में काय: कर+े की अ+ुमति दी गई र्थीी। इस न्यायालय क े समक्ष काय:वाविहयों में वित्रलोकी +ार्थी पांर्डे की वि+युविX पर कोई आपखित्त +हीं S ाई गई। इस न्यायालय क े पास र्टीपी वमा: को वाद विमत्र क े रूप में काय: कर+े से सेवावि+वृत्त हो+े की अ+ुमति दे+े वाले उच्च न्यायालय क े आदेश की शुद्ध ा की Sांच कर+े का कोई कारर्ण +हीं र्थीा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय +े बाद में 18 माच: 2010 क े एक आदेश द्वारा वित्रलोकी +ार्थी पांर्डे को वाद विमत्र क े रूप में वि+युX विकया।

357. Sहां वाद विमत्र की विफर्ट+ेस विववाद में है, अदाल को वाद विमत्र की सद्भाव+ा की Sांच कर+ी चाविहए। हालांविक व:मा+ मामले में यह Sांच आवश्यक +हीं है Sैसा विक वाद 5 में ीसरे वादी को अदाल क े आदेशों क े ह पहले और दूसरे वादी क े वाद विमत्र क े रूप में वि+युX विकया गया है। वित्रलोकी +ार्थी पांर्डे की वि+युविX से इस अदाल +े इस प्रश्न पर अप+े मस्जिस् ष्क का प्रयोग विकया है और वित्रलोकी +ार्थी पांर्डे को पहले और दूसरे वादी क े वाद विमत्र क े रूप में काय: कर+े की अ+ुमति दी। इस Sाँच को देख े हुए विक वाद विमत्र की वि+युविX व:मा+ काय:वाविहयों में श Â क े अ*ी+ की गयी है, इस दलील में कोई बल +हीं है विक वाद 5 में ीसरा वादी पहले और दूसरे वादी क े वाद विमत्र क े रूप में एक वाद संस्जिस्र्थी क े खिलए उपयुX +हीं है। वि+म ही अखाड़ा और सेवाय अति*कार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

358. Sहां सेवाय की पहचा+ कर+े क े खिलए समप:र्ण का अणिभव्यX विवलेख विवद्यमा+ है वहां मूर्ति की ओर से कौ+ वाद कर सक ा है, उसकी बाब विवति* की स्जिस्र्थीति इस प्रकार है: (i) वाद कर+े का अति*कार विवति*पूव:क वि+युX सेवाय में अ+न्य ः वि+विह है; हालांविक,

(ii) Sहां सेवाय अणिभव्यX काय: या वि+स्जिष्क्रय ा से मूर्ति क े विह ों क े प्रति क ू ल या उपेतिक्ष रूप से काय: कर ा है, वहां कोई व्यविX Sो *म:दाय में विह बद्ध है, मूर्ति की ओर से वाद संस्जिस्र्थी कर सक े गा; और (iii) वाद विमत्र द्वारा *ारिर विह की सर्टीक प्रक ृ ति और क्या वाद विमत्र सद्भावी है, ये सारवा+ विवति* क े मामले हैं। यविद प्रति वाविद हो ा है, ो इसे अदाल द्वारा अति*वि+र्ण- विकया Sा+ा चाविहए। वाद 5 की पोषर्णीय ा इस प्रश्न पर वि+भ:र कर ी है विक क्या वि+म ही अखाड़ा सेवाय र्थीी और क्या उन्हों+े मूर्ति क े विह ों क े खिलए प्रति क ू ल रीक े से काम विकया है। इसी क े कारर्ण अब हमें इस मुद्दे पर आऩा चाविहए। इस अदाल क े समक्ष मौखिखक कÂ क े दौरा+ श्री Sै+ से एक प्रश्न विकया गया विक क्या मूर्ति क े वाद की पोषर्णीय ा को चु+ौ ी देकर वि+म ही अखाड़ा +े मूर्ति क े विह ों क े प्रति क ू ल एक दावा स्र्थीाविप विकया है। Sवाब में श्री एस क े Sै+ +े इस न्यायालय में एक बया+ प्रस् ु विकया, सिSसमें कहा गया र्थीा विक वाद 5 की पोषर्णीय ा क े संबं* में वि+म ही अखाड़ा की स्जिस्र्थीति को सश: रूप से संशोति* विकया गया र्थीा, सिSसमें कहा गया र्थीा विक वि+म ही अखाड़ा वाद 5 की पोषर्णीय ा क े मुद्दे पर बल +हीं देगा, बश † विक वाद में वादी 3 वि+म ही अखाड़ा क े सेवाय ी अति*कारों पर प्रश्न +हीं उठाए। यह प्रस् ु विकया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विक वि+म ही अखाड़ा स्व ंत्र रूप से अप+े वादों को सेवाय क े रूप में ब+ाए रख सक ा है।

359. वि+म ही अखाड़ा द्वारा विकया गया कर्थी+ इसक े दावे को +हीं बदल ा है विक यह भगवा+ राम की मूर्ति यों का सेवाय है। यह क े वल इस बा को वि+*ा:रिर कर ा है विक उस स्जिस्र्थीति में विक वाद 5 में वादीगर्ण वि+म ही अखाड़ा को मूर्ति यों क े सेवाय क े रूप में मान्य ा का विवकल्प चु+ े हैं, ो यह अब वाद 5 की पोषर्णीय ा को चु+ौ ी +हीं देगा। विवति* क े न्यायालय में ऐसी स्जिस्र्थीति असमर्थी:+ीय है। वि+म ही अखाड़ा +े लगा ार यह कहा है विक वि+म ही भगवा+ राम की मूर्ति यों क े सेवाय हैं। यविद यह न्यायालय पा ा है विक वे मूर्ति यों की सेवाय हैं, ो अक े ले वे ही मूर्ति यों की ओर से मुकदमा कर सक े हैं और इस न्यायालय द्वारा इस अति*वि+र्ण:य+ क े विब+ा, विक वि+म विहयों +े मूर्ति क े विह ों क े विवपरी काय: विकया है, वाद विमत्र द्वारा संस्जिस्र्थी वाद 5 पोषर्णीय +हीं होगा।

360. व:मा+ मामला एक सेवाय को मान्य ा दे+े वाले समप:र्ण क े एक अणिभव्यX विवलेख से संबंति* +हीं है। बस्जिल्क यह वि+म ही अखाड़ा का क: है विक विववाविद स्र्थील पर उ+की लम्बे समय से उपस्जिस्र्थीति क े आ*ार पर और मूर्ति क े संबं* में क ु छ कायÂ क े उ+क े अभ्यास द्वारा वे वस् ु ः सेवाय हैं। इसक े अलावा व:मा+ काय:वाही की अ+ूठी प्रकृ ति यह है विक वि+म ही अखाड़ा द्वारा वाद क े ीस साल बाद, वाद विमत्र द्वारा संस्जिस्र्थी वाद, कणिर्थी सेवाय वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर मुकदमे क े सार्थी-सार्थी अति*वि+र्ण- विकया Sा रहा है। इसका परिरर्णाम यह है विक Sब वाद विमत्र का मुकदमा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1989 में संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, ब क कोई वि+*ा:रर्ण +हीं विकया गया र्थीा विक वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय र्थीा।

361. व:मा+ काय:वाही एक सम£ प्रक ृ ति की है, इसखिलए वाद 5 की पोषर्णीय ा क े सवाल का Sवाब क्रमबद्ध रूप से विदया Sा+ा चाविहए। पहला प्रश्न यह है विक क्या वि+म ही अखाड़ा वास् व में भगवा+ राम की मूर्ति यों क े सेवाय हैं। यविद इसका उत्तर सकारात्मक रूप में विदया Sा ा है, ो दूसरा प्रश्न यह उठ ा है विक क्या वि+म ही अखाड़ा +े मूर्ति क े विह क े प्रति कू ल काय: विकया है। यविद वि+म ही अखाड़ा का वास् व में सेवाय हो+ा पाया Sा ा है और उस+े प्रति क ू ल रूप से काय: +हीं विकया है, ो वाद 5 पोषर्णीय +हीं है क्योंविक यह सेवाय है Sो देव ा की ओर से मुकदमा कर+े क े अ+न्य अति*कार का प्रयोग कर ा है। वैकस्जिल्पक रूप से, यविद वि+म ही अखाड़ा को मूर्ति यों का वस् ु ः सेवाय हो+ा +हीं पाया Sा ा है या मूर्ति यों क े सम्बन्* में प्रति क ू ल रूप से काय: विकया गया हो+ा पाया Sा ा है, ो वाद विमत्र द्वारा विकया गया वाद पोषर्णीय है। इसी क े सार्थी हम इस प्रश्न पर आ े हैं विक क्या वि+म ही अखाड़ा वास् व में सेवाय हैं। वस् ु ः सेवाय का वाद ला+े का अति*कार

362. देव ा की ओर से वस् ु ः सेवाय का वाद संस्जिस्र्थी कर+े का अति*कार विप्रवी काउंसिसल क े दो प्रारंणिभक वि+र्ण:यों: महं राम चरर्ण दास ब+ाम +ौरंगी लाल227 और महादेव प्रसाद सिंसह ब+ाम करिरया भार ी228 से प ा लगाया Sा सक ा है। महन् राम चर+ दास में पालीगंS मठ क े महन् +े मठ की 70 एकड़ भूविम क े खिलए एक पट्टा वि+ष्पाविद विकया और बाद में पट्टे क े 227 एआईआर 1933 विप्रवी कौंसिसल 75 228 एआईआर 1935 विप्रवी कौंसिसल 44 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ*ी+ विबक्री विवलेख वि+ष्पाविद विकया। उ+की मृत्यु हो+े पर एक अन्य व्यविX +े महं हो+े का दावा कर े हुए कब्Sा ले खिलया और बाद में वादी, Sो एक अन्य मठ का महं र्थीा (पालीगंS मठ सिSसक े अ*ी+स्र्थी र्थीा) को एक पंSीक ृ विबक्री विवलेख क े माध्यम से अप+े सभी अति*कारों को छोड़ विदया। वादी +े यह दावा कर े हुए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया विक पट्टा विवलेख और उसक े बाद की विबक्री विवलेख क े वि+ष्पाद+ की कोई आवश्यक ा +हीं र्थीी। वादी की ओर से मुकदमे की पोषर्णीय ा क े प्रश्न पर विप्रवी काउंसिसल की ओर से लॉर्ड: रसेल +े अव*ारिर विकया: ".... न्याया*ीशगर्ण हालांविक अब हक क े विकसी प्रश्न पर क े स्जिन्ˆ +हीं हैं क्योंविक दो+ों अ*ी+स्र्थी न्यायालयों +े पाया है विक वादी पालीगंS मठ का वास् विवक कब्Sा*ारी व्यविX है और उसी रूप में स्वयं क े लाभ क े खिलए +हीं बस्जिल्क मठ क े लाभ क े खिलए संपखित्त प्राप्त कर+े क े खिलए एक वाद Sारी रख+े का हकदार है।

363. महादेव प्रसाद सिंसह में एक गाँव Sो एक मठ में संलग्न संपखित्त का विहस्सा र्थीा, 1914 में महं द्वारा बेचा गया र्थीा। 1916 में उ+की मृत्यु क े बाद, 1926 में प्रश्नग वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, सिSसमें मठ का महं हो+े का आरोप लगा े हुए एक व्यविX द्वारा हस् ां रर्ण को चु+ौ ी दी गई र्थीी। वाद पर एक आपखित्त यह र्थीी विक प्रति वादी वाद को ब+ाए रख+े का हकदार +हीं र्थीा क्योंविक वह + ो विपछले महं का चेला र्थीा, + ही वह विकसी अन्य क्षम ा में महं हो+े का हकदार र्थीा। इस क: को खारिरS कर े हुए विप्रवी काउंसिसल की ओर से सर शादी लाल +े अव*ारिर विकया: "इसमें कोई संदेह +हीं है विक करिरया 1904 से संस्र्थीा+ों क े मामलों का प्रबं*+ कर रहे हैं और राSबंश की मृत्यु से इसमें विह बद्ध सभी व्यविXयों द्वारा इसक े महं मा+े गए है। राSब+ क े +ाम पर राSस्व अणिभलेख में दS: की गई संपखित्त, उ+की मृत्यु पर, करिरया को +ामां रिर की गई र्थीी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और यह सुझाया +हीं गया है विक कोई भी व्यविX है Sो महं क े पद पर उसक े शीष:क को विववाविद कर ा है। इ+ परिरस्जिस्र्थीति यों में न्याया*ीशगर्ण उच्च न्यायालय से सहम है विक करिरया मठ क े लाभ क े खिलए उस सम्पखित्त को प्राप्त कर+े का हकदार र्थीा Sो संपखित्त मठ से संबंति* र्थीी और अब अपीलक ा:ओं द्वारा गल रीक े से ली गयी है। वे अति चारिरयों की रह हैं। Sैसा विक 1933 पीसी 75 (1) में इस बोर्ड: द्वारा देखा गया है, मठ क े वास् विवक कब्Sा*ारी व्यविX को अप+े स्वयं क े लाभ क े खिलए +हीं, बस्जिल्क मठ क े लाभ क े खिलए इससे संबंति* संपखित्त को प्राप्त कर+े क े खिलए एक वाद ब+ाए रख+े का अति*कार है।" विप्रवी काउंसिसल +े वि+म्+खिलखिख +ोर्ट विकया: (i) करिरया को £ामीर्णों द्वारा महं क े रूप में मान्य ा दी गई र्थीी; (ii) राSस्व अणिभलेख में करिरया का +ाम र्थीा; और (iii) यह +हीं सुझाया गया र्थीा विक महं क े पद पर उसक े हक क े खिलए कोई विववाद र्थीा। यह इ+ विवचारों क े आ*ार पर है विक विप्रवी काउंसिसल +े अव*ारिर विकया विक करिरया द्वारा प्रयोग विकए गए अति*कार एक महं की प्रक ृ ति में र्थीे। ऊपर उसिल्लखिख विवचार विप्रवी काउंसिसल क े अप+े विवश्लेषर्ण में प्रभावी रहे विक क्या प्रयोग विकए गए अति*कार, एक महं द्वारा प्रयोग विकए अति*कारों की प्रक ृ ति क े र्थीे।

364. यद्यविप ऊपर संदर्भिभ विप्रवी काउंसिसल क े दो+ों वि+र्ण:य एक मठ की ओर से काय:वाही कर+े क े खिलए एक महं क े अति*कार क े संदभ: में र्थीे, यह विवति*क स्जिस्र्थीति विक एक वस् ु ः महं को मठ की ओर से इसक े लाभ क े खिलए काय:वाही संस्जिस्र्थी कर+े का हकदार है, इसको समा+ रूप से एक मूर्ति क े वस् ु ः सेवाय और इसकी सम्पखित्त पर लागू विकया गया है। पंचकारी रॉय ब+ाम अमोर्डे लाल बम:+229 में रामदास महं एक वसीय क े आ*ार पर क ु छ मूर्ति यों को संपखित्त समर्मिप की और अप+ी विव*वा को ब क संपखित्त 229 (1937) 41 सीर्डब्ल्यूए+ 1349 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े प्रबं*क क े रूप में वि+युX विकया, Sब क विक उ+की बेर्टी वयस्क ा की आयु प्राप्त +हीं कर ले ी, वयस्क ा प्राप्त कर+े पर वह एक सेवाय क े रूप में काय:भार संभाल लेगी। विव*वा +े संपखित्त को लौविकक संपखित्त क े रूप में बेच विदया और बेर्टी +े वयस्क ा प्राप्त कर+े पर अणिभकर्थी+ विकया विक यद्यविप संपखित्त लौविकक र्थीी परन् ु वसीय क े आ*ार पर यह उसको प्राप्त र्थीी। उस+े संपखित्त को दूसरे पक्षकार को बेच विदया। वादी +े देवोत्तर का *ार्मिमक गुरू हो+े का दावा कर े हुए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया सिSसमें आरोप लगाया गया विक मूर्ति यों को उसे सौंप विदया गया र्थीा। अदाल क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या वादी, Sो परिरवार का सदस्य +हीं र्थीा या वसीय में +ाविम र्थीा, वै* रूप से एक वि+Sी *म:दाय में एक वाद संस्जिस्र्थी कर सक ा है। कलकत्ता उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रासंविगक प्रश्न यह र्थीा विक क्या वादी एक वस् ु ः सेवाय र्थीा। न्यायमूर्ति बी.क े. मुखS- (Sैसा विक वह ब र्थीे) +े अव*ारिर विकया: "न्यातियक सविमति +े राम चंˆ ब+ाम +ौरंगी लाल (4) और विफर महादेव प्रसाद सिंसह ब+ाम करिरया भार ी (5) में वि+*ा:रिर विकया विक मठ का वास् विवक कब्Sा*ारी व्यविX अप+े स्वयं क े लाभ क े खिलए +हीं बस्जिल्क मठ क े लाभ क े खिलए इससे संबंति* संपखित्त को प्राप्त कर+े क े खिलए एक वाद Sारी रख+े का हकदार है।... हो सक ा है और वास् व में एक मठ और एक मूर्ति क े बीच अं र है लेविक+ मुझे कोई कारर्ण +हीं विदख ा विक क्यों एक परिरवारिरक *म:दाय या वि+Sी देवोत्तर क े मामले में वस् ु ः सेवाय को वाद चला+े की अ+ुमति +हीं दी Sा सक ी।.… हालांविक एक व्यविX को वस् ु ः सेवाय ब+ा+े क े खिलए यह आवश्यक है विक वह पद और देवोत्तर सम्पखित्त का वास् विवक कब्Sा*ारी हो+ा चाविहए।.… मेरी राय में, वस् ु ः सेवाय वह होगा Sो सेवाय क े सभी क ृ त्यों का प्रयोग कर ा हो और देवोत्तर संपखित्त का कब्Sा*ारी हो हालांविक विवति*क हक की कमी हो सक ी है।" (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

365. Sहां कोई व्यविX विवति*क हक की कमी क े बावSूद सेवाय हो+े का दावा कर ा है, ो वहां न्यायालय क े समक्ष सुसंग Sांच यह है विक क्या उस व्यविX का देवोत्तर संपखित्त पर वास् विवक कब्Sा र्थीा और वह सेवाय क े सभी अति*कारों का प्रयोग कर रहा र्थीा। देवोत्तर संपखित्त क े संरक्षर्ण में सव परिर विह वस् ु ः सेवाय की मान्य ा को रेखांविक कर ा है। Sहाँ कोई विवति* ः सेवाय +ही है, अदाल एक ऐसी स्जिस्र्थीति का अ+ुमोद+ +हीं करेगी Sहां सभी प्रबं*कीय अति*कारों का प्रयोग कर+े वाले एक सद्भावी वादकारी को संपखित्त क े संरक्षक क े रूप में का+ू+ में मान्य ा +हीं दी Sा सक ी है। यह क े वल संस्र्थीा क े सव परिर विह क े खिलए है विक वाद ला+े का अति*कार प्रबं*कों क े रूप में काय: कर+े वाले व्यविXयों को विदया Sा ा है, हालांविक एक प्रबं*क क े विवति*क हक का अभाव है।

366. इस का:*ार को मˆास उच्च न्यायालय +े सुब्रम°य गुरुक्कल ब+ाम अणिभ+व पूर्ण:विप्रया ए श्रीवि+वास राव साविहब230 में रेखांविक विकया र्थीा। प्रति पाल्य न्यायालय +े इस आ*ार पर 'अच:क' क े एक मंविदर से संबंति* भूविम क े कब्Sे को खारिरS कर विदया विक वह सेवाएं प्रदा+ कर+े और संपखित्त पर विकए गए क ु छ खचÂ क े खिलए खा ा प्रस् ु कर+े में विवफल रहा है। ब Sागीरदार +े संपखित्त का कब्Sा प्राप्त कर+े क े खिलए मंविदर क े न्यासी क े रूप में प्रति पाल्य न्यायालय क े ह अप+े वाद विमत्र संपखित्त क े प्रबन्*क द्वारा एक मुकदमा दायर विकया गया। बखा:स् गी का आदेश विपछले Sागीरदार की मृत्यु क े बाद पारिर विकया गया र्थीा। वाद को संस्जिस्र्थी कर+े क े बाद और वाद में वि+र्ण:य से पहले एक अति*सूच+ा Sारी की गयी सिSसमें अति*वि+यम क े ह एक प्रति पाल्य को +या Sागीरदार ब+ाया गया। यह सवाल उठ ा है विक क्या 230 एआईआर 1940 मˆास 617 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बखा:स् गी का आदेश वै* रूप से पारिर विकया गया र्थीा। न्यायालय +े मा+ा विक Sहां Sागीरदार क े उत्तराति*कारी +े वि+यंत्रर्ण £हर्ण कर+े क े खिलए कोई कदम +हीं उठाया, प्रति पाल्य न्यायालय +े वस् ु ः न्यासी की स्जिस्र्थीति की प्रकल्प+ा की। न्यायमूर्ति वोड्सवर्थी: +े अव*ारिर विकया: "न्यायालय का यह क:व्य है विक वह न्यास संपखित्त को दुर्मिववि+योग से और सिSस उद्देश्य क े खिलए यह समर्मिप र्थीी, उसक े परिरव:+ से संरक्षर्ण करे। Sब न्यासी की वि+युविX क े खिलए मशी+री में दोषों क े कारर्ण या विवति*क न्यासी की काय: कर+े की अवि+च्छा क े कारर्ण न्यास संपखित्त एक विवति*क संरक्षक क े विब+ा हो ी है, ो यह एक सरासर अSीब बा होगी यविद विकसी भी बेह र हक क े अभाव में उ+ कायÂ को कर+े क े खिलए Sो न्यास क े उद्देश्यों की सुरक्षा क े खिलए आवश्यक हैं, न्यास क े विह ों में सविक्रय रूप से इसक े मामलों को वि+यंवित्र कर+े वाला और संस्र्थीा क े प्रभारी क े रूप में मान्य ा प्राप्त कोई ईमा+दार व्यविX हकदार +हीं हो+ा चाविहए।"

367. मˆास उच्च न्यायालय का यह अव*ारर्ण दो कारर्णों से सूक्ष्म र दृविष्टपा क े योग्य है: पहला, न्यायालय +े मा+ा विक न्यासी क े विह का संरक्षर्ण कर+े क े खिलए काय:वाही कर+े का अति*कार उस व्यविX में वि+विह हो ा है Sो 'संस्र्थीा क े प्रभारी क े रूप में मान्य ा प्राप्त है और सविक्रय रूप से इसक े मामलों को वि+यंवित्र कर ा है।' प्रबं*+ का एकल या इक्का दुक्का काय: विकसी व्यविX को एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में वि+*ा:रिर हो+े का हकदार +हीं ब+ा ा है। इस अवलोक+ की प्रासंविगक ा पर शीघ्र ही विवचार विकया Sाएगा। दूसरा, वस् ु ः सेवाय मे काय:वाही कर+े का अति*कार क े वल भी वि+विह हो ा है Sब एक बेह र हक वाले व्यविX अर्थीा: ् विवति* ः सेवाय की अ+ुपस्जिस्र्थीति हो। उपरोX श Â क े सार्थी, न्यायालय +े अव*ारिर विकया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "... इसक े अलावा मैं इ+ वै*ावि+क प्राव*ा+ से अलग सोच+े क े खिलए प्रवृत्त हूँ, विक एक हिंहदू मंविदर का एक वस् ु ः न्यासी Sो उस मस्जिन्दर क े वास् विवक प्रबन्*+ में हो और संस्र्थीा क े विह ों क े खिलए सद्भाव+ापूव:क काय: कर रहा हो, वह एक मंविदर सेवक को या अति*कारी को बखा:स् कर+े का आदेश वै* रूप से पारिर कर सक ा है, बश † विक बखा:स् गी का उतिच आ*ार हो और यह ऐसी प्रविक्रया है सिSसमें कोई आपखित्त +हीं की Sा सक ी है.. इसक े अलावा मंविदर की भूविम को प्राप्त कर+े हे ू एक वाद ला+े क े खिलए एक मंविदर क े प्रबन्*+ और कब्Sे में एक वस् ु ः न्यासी की क्षम ा में कोई संदेह +हीं है।" इस दृविष्टकोंर्ण में, संस्र्थीा क े विह ों क े खिलए सद्भाव+ापूव:क काय: कर+े वाला और वास् विवक प्रबन्*+ वाला व्यविX एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में मंविदर की संपखित्त को प्राप्त कर+े क े खिलए दावा कर सक ा है।

368. शंकर+ारायर्ण अय्यर ब+ाम श्री पूवा+ा+ार्थीस्वामी मंविदर231 में मˆास उच्च न्यायालय क े पूर्ण: पीठ क े फ ै सले पर कु छ विवस् ार से ध्या+ दे+ा यहाँ प्रासंविगक है। इस मामले में, विवति* ः न्यासी +े एक मंविदर की संपखित्तयों को हस् ां रिर कर विदया और उसक े बारे में प ा +हीं चला। अदाल द्वारा पारिर एक समझौ ा तिर्डक्री क े ह वि+युX उत्तरव - न्यासी +े मंविदर की संपखित्त क े रूप में विववाद£स् संपखित्त क े कब्Sे को प्राप्त कर+े क े खिलए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया। यह क: विदया गया र्थीा विक समझौ ा तिर्डक्री से स्व ंत्र, वस् ु ः सेवाय क े रूप में देवोत्तर संपखित्त क े संरक्षर्ण क े खिलए एक वाद संस्जिस्र्थी कर+े का अति*कार उसमें वि+विह र्थीा। मुख्य न्याया*ीश पी वी राSामन्नार +े अव*ारिर विकया: "इ+ *म:दायों क े मामले में र्थीाकणिर्थी न्यासी क+ीकी अर्थी: में वास् व में न्यासी +हीं है, सिSसमें संपखित्त वि+विह है। वह वास् व में एक प्रबं*क है (यहां क विक उ+ मामलों में भी Sहां उसका भोगाति*कार में लाभकारी 231 एआईआर 1949 मˆास 721 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विह है) और हक हमेशा मूर्ति या संस्र्थीा में वि+विह हो ा है। विकसी भी मामले में, सादृश्य ा एक व्यविX से की गयी है सिS+क े पास अप+े मामलों और संपखित्तयों क े प्रशास+ को चला+े क े खिलए एक प्रबं*क है। इस प्रकाश में देखा गया विक स्जिस्र्थीति खुद को इस क कम कर दे ी है। क ु छ मामलों में प्रबं*क क े पास प्रबं*क क े पद क े खिलए एक वै* दावा है, अन्य मामलों में उसका एकमात्र दावा यह है विक वह काया:लय का वास् विवक कब्Sा*ारी है। "र्डी Sूरे" (विवति* ः) अर्थीा: ् "स्वत्वाति*कार द्वारा" इसक े विवपरी "र्डी फ ै क्र्टो" (वस् ु ः) का अर्थी: है, "कब्Sे क े हक द्वारा"। Sब क विक काय:वाही वास् विवक माखिलक अर्थीा: ् मूर्ति या मठ क े लाभ क े खिलए हो ी है और काय:वाही कर+े वाला व्यविX क े वल वह व्यविX हो ा है Sो त्समय मठ या मूर्ति क े मामलों का प्रबं*+ कर ा है, इसका कोई कारर्ण +हीं है विक ऐसे व्यविX को मठ या मूर्ति की ओर से काय:वाही को ब+ाए रख+े की अ+ुमति क्यों +हीं दी Sा+ी चाविहए।" (प्रभाव वर्ति* ) उपरोX अवलोक+ स्पष्ट कर े हैं विक वस् ु ः सेवाय हो+े का दावा कर+े वाले व्यविX को देवोत्तर संपखित्त क े अ+न्य कब्Sे में हो+ा चाविहए और उसे संपखित्त क े प्रबं*+ में एकमात्र व्यविX हो+ा चाविहए।

369. न्यायमूर्ति विवश्व+ार्थी शास्त्री +े अप+ी पृर्थीक राय में एक वस् ु ः सेवाय द्वारा प्रबं*+ की शविX का प्रयोग कर+े क े खिलए चु+ौ ी क े आ*ारों को वि+म्+खिलखिख शब्दों में स्पष्ट विकया: "... यविद वस् ु ः न्यासी न्यास क े विकसी उल्लंघ+ का दोषी है, ो उसे विवति* ः न्यासी की रह से हर्टाया Sा सक ा है। का+ू+ उसे न्यास क े उतिच प्रशास+ क े खिलए सिSम्मेदारी दे ा है और उसे न्यास क े विह ों में और उसकी ओर से काय: कर+े की शविX भी दे ा है, Sब क विक एक वै* न्यासी उभरकर +हीं आ ा है... एक व्यविX Sो *ार्मिमक *म:दाय की संपखित्त क े खिलए अप+े स्वयं क े हक का दावा कर ा है, Sो *म:दाय क े न्यासी या प्रबं*क क े रूप में मुकदमा +हीं कर ा है और Sो न्यास क े खिलए +हीं बस्जिल्क अप+े खिलए संपखित्त को प्राप्त कर+े का दावा कर ा है, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उसे कभी भी वस् ु ः न्यासी क े रूप में मुकदमा कर+े की अ+ुमति +हीं दी Sा सक ी है। Sहाँ क न्यास का संबं* है वह पूरी रह से एक अति चारी की स्जिस्र्थीति में है और उस+े न्यासी क े क:व्यों और दातियत्वों को अप+े ऊपर खिलया है ऐसा +हीं मा+ा Sा सक ा।"232 एक *म:दाय की संपखित्तयों क े संबं* में एक सेवाय क े अति*कारों पर विवति*शास्त्र क े अ+ुरूप, एक वस् ु ः सेवाय को मूर्ति और उसकी संपखित्तयों क े संबं* में देवोत्तर क े उद्देश्य को पूरा कर+े की शविX और क:व्य सौंपा गया है। हालांविक सेवाय का देवोत्तर संपखित्त क े भोगाति*कार में विह हो सक ा है, देवोत्तर संपखित्त पर स्व ंत्र स्वत्वाति*कार वस् ु ः सेवाय में वि+विह +हीं है। इस प्रकार Sहां एक वस् ु ः सेवाय मूर्ति की देवोत्तर संपखित्त क े खिलए एक स्व ंत्र दावा कर ा है, यह एक अति चारी की स्जिस्र्थीति को प्रकस्जिल्प कर ा है और उसकी ओर से कोई काय:वाही पोषर्णीय +ही है। मूर्ति क े प्रति कू ल एक सेवाय द्वारा विकया गया दावा उस उद्देश्य को परासिS कर ा है सिSसक े खिलए मूर्ति और उसकी संपखित्त क े प्रबं*+ का अति*कार सेवाय ों में वि+विह हो ा है।

370. कब एक व्यविX को वस् ु ः सेवाय मा+ा Sा सक ा है इसक े संबं* में विवद्वा+ न्याया*ीशों द्वारा अप+े पृर्थीक राय में वि+*ा:रिर मा+क पर विवचार कर+ा वि+र्णा:यक महत्व का है। न्यायमूर्ति विवश्व+ार्थी शास्त्री +े अव*ारिर विकया: "एक *ार्मिमक *म:दाय की संपखित्त क े संबं* में एक व्यविX का क्षणिर्णक या कभी-कभार का काय: उसे वस् ु ः न्यासी +हीं ब+ायेगा। एक फ ू ल क े खिखल+े से बहार +हीं आ ी। एक स काय: व्यवहार हो+ा चाविहए, इसकी अवति* वाद क े थ्यों और परिरस्जिस्र्थीति यों पर वि+भ:र कर ी है। पद या संस्र्थीा का कब्Sा Sो न्यास की वस् ु है और पद से संबंति* अति*कारों का प्रयोग वस् ु ः न्यासिस ा का महत्वपूर्ण: लक्षर्ण होगा।" (प्रभाव वर्ति* ) 232 सप+ा कोर्टेश्वर गोद गोवा इन्र्डॉउमेन्र्ट (र्ट्रस्र्ट) ब+ाम रामचन्ˆ वासुदेव विकत्तर एआईआर 1956 बॉम्बे 615 में अ+ुसरिर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसी प्रकार, न्यायमूर्ति राघव राव +े अव*ारिर विकया: "हालांविक मुझे स्वीकार कर+ा चाविहए, विक मुझे विववाविद हिंबदु क े वि+*ा:रर्ण में अति*क कविठ+ाई महसूस हो+ी चाविहए र्थीी... वस् ु ः प्रबन्*क का वाद ला+े का अति*कार कहाँ से आ ा है? वहाँ विफर से, विक हमें कहाँ और क ै से विकसी विवशेष अवसर पर कभी कभार काय: कर+े वाले एक वस् ु ः प्रबं*क और दर्थी: प्रबन्* क े बीच अन् र कर+ा है। मैं अप+े विवद्वा+ भाई न्यायमूर्ति विवश्व+ार्थी शास्त्री क े म+ोहारी अवलोक+ से सम्मा+पूव:क सहम है विक एक फ ू ल क े खिखल+े से बहार +हीं आ ी; लेविक+ व्यावहारिरक प्रश्न अभी भी ब+ा हुआ है ो विक +े से हो ा हैं?.... यह क ै से सुवि+तिश्च विकया Sाए विक संस्र्थीा की ओर से वादकारी व्यविX तिर्डक्री- पूव: या तिर्डक्री-पश्चा कोई अ+ुतिच समझौ ा या सुलह + करे। या संस्र्थीा की ओर से प्राप्त एक विवशेष तिर्डक्री क े फलस्वरूप प्राप्त *+ को लेकर + भाग Sाए? यविद यह संभव + हो, ो यह क ै सी सांत्व+ा है विक विवति* ः प्रबन्*क क े हार्थीों से भी संस्र्थीा को कभी कभार समा+ हावि+ हो सक ी है?

371. उपरोX सभी अवलोक+ वि+र्णा:यक महत्व क े हैं। शंकर+ारायर्ण अय्यर में और उसक े बाद हमारी अदाल ों क े लगा ार न्यायशास्त्र में 233 यह अव*ारिर विकया गया है विक प्रबन्*+ का इक्का दुक्का काय: या अवि+यविम काय: विकसी व्यविX में वस् ु ः सेवाय क े अति*कारों को वि+विह +हीं कर ा है। समप:र्ण विवलेख की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, वि+म ही अखाड़ा द्वारा विदया गया क: विक वे विववाविद संपखित्त क े प्रभार और प्रबं*+ में रहे हैं, विवति* मेंं यह वस् ु ः सेवाय क े रूप में प्रबं*+ क े अति*कारों क े खिलए दावा है। शंकर+ारायर्ण अय्यर में दो+ों न्यायमूर्ति विवश्व+ार्थी शास्त्री और राघव राव +े स्पष्ट रूप से कहा विक कभी-कभार क े क ृ त्य एक व्यविX में वस् ु ः सेवाय क े अति*कारों 233 पला+ीअप्पा गौंर्ड+ ब+ाम +ल्लप्पा गौंर्ड+ एआईआर 1951 मˆास 817; मोविहदी+ खा+ ब+ाम गर्णखा+ एआईआर 1956 आन्ध्र प्रदेश 19, वंकामाविमविद बालक ृ ष्र्णमूर्ति ब+ाम गोविग+े+ी सम्बेय्या एआईआर 1959 आन्ध्र प्रदेश 186, हिंहदू *ार्मिमक और *मा:र्थी: बंदोबस् ी आयुX, मˆास ब+ाम वी.आर. Sग+ार्थी राव (1974) 87 एलर्डब्ल्यू 675; र्डी गर्णेशमूर्ति ब+ाम श्री सप्पवि+करुप्पुस्वामी की मूर्ति एआईआर 1975 मˆास 23, लालSी *म:से ब+ाम भगवा+दास रर्णछोड़दास 1981 एमएएच एलSे 573; श्री पाश:व+ार्थी Sै+ मंविदर ब+ाम प्रेम दास क े विवति*क प्रति वि+ति* (2009) 1 आरएलर्डब्ल्यू (रेव) 523 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को वि+विह +हीं कर े हैं। प्रश्नग आचरर्ण यह विदखा+े क े खिलए एक वि+रं र प्रक ृ ति की हो+ा चाविहए विक व्यविX +े लंबे समय क लगा ार एक सेवाय क े सभी अति*कारों का प्रयोग विकया है। समय की अवति* Sो इस अपेक्षा को पूरा करेगी, वह आवश्यक ावश प्रत्येक वाद क े थ्यों और परिरस्जिस्र्थीति यों पर आ*ारिर होगी। न्यायमूर्ति राघव राव +े न्यायमूर्ति विवश्व+ार्थी शास्त्री क े दृविष्टकोर्ण का समर्थी:+ विकया हिंक ु एक ऐसा मा+क वि+*ा:रिर कर+े में व्यावहारिरक कविठ+ाइयों की रूपरेखा प्रस् ु कर+े क े खिलए एक कदम और आगे बढ़े, सिSसक े सापेक्ष वस् ु ः सेवाय हो+े का दावा कर+े वाले व्यविX क े कायÂ का परीक्षर्ण विकया Sा+ा चाविहए। एक ऐसे व्यविX को सिSसक े पास क े वल देवोत्तर संपखित्त का कब्Sा है और अवि+यविम प्रबं*कीय अति*कारों का उपयोग कर ा है, वस् ु ः न्यासी की स्जिस्र्थीति प्रदा+ कर+े क े खिलए एक वि+म्+ र का+ू+ी सीमा अप+ा+े क े विवरूद्ध साव*ा+ी सुस्र्थीाविप है।

372. देवोत्तर संपखित्त का प्रबन्* कर+े का अति*कार और मूर्ति की ओर से काय:वाही कर+े का अति*कार एक वस् ु ः सेवाय में वि+विह है। मूर्ति क े लाभ क े खिलए एक सद्भावी काय:वाही इसे और इसकी संपखित्तयों को बाध्य कर ी है। विवति* ः सेवाय सिSसक े अति*कारों को समप:र्ण विवलेख से का+ू+ी रूप से प ा लगाया Sा सक ा है उसकी ुल+ा में एक वस् ु ः सेवाय में क े वल कब्Sे द्वारा और प्रबन्*कीय अति*कारों क े प्रयोग द्वारा अति*कार वि+विह है। अति*कारों क े इस असा*ारर्ण रूप से प्रदा+ कर+े क े क ें ˆ में संपखित्त का संरक्षर्ण है। यविद अदाल ों को एक मा+क अप+ा+ा र्थीा Sो आसा+ी से सं ुष्ट कर+े वाला है, ो देवोत्तर संपखित्त क े बड़े क्षेत्र को ऐसी संपखित्तयों क े कब्Sे और प्रबं*+ में हो+े का दावा कर+े वाले व्यविXयों की दया पर छोड़ विदया Sा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक ा है। प्रत्येक मामले में अदाल का यह क:व्य है विक वह यह आकल+ करे विक क्या + क े वल अ+न्य कब्Sा रहा है, बस्जिल्क सभी प्रबं*+ अति*कारों का एक वि+रं र और वि+बा:* प्रयोग है, Sो विकसी व्यविX को अति*कार दे+े से पहले न्यास संपखित्त क े विह ाति*कारिरयों द्वारा मान्य ा प्राप्त है, सिSसक े खिलए उ+क े पास कोई विवति*क हक +हीं है।

373. क:व्य Sो एक विवति* ः सेवाय की शविXयों क े प्रयोग को आबद्ध कर ा है एक वस् ु ः सेवाय पर समा+ रूप से लागू हो ा है। इस प्रकार वस् ु ः सेवाय द्वारा कोई ऐसी काय:वाही +हीं की Sा सक ी Sो मूर्ति या उसकी संपखित्त क े लाभकारी विह में +हीं है। हालाँविक एक वस् ु ः सेवाय और एक विवति* ः सेवाय सभी मामलों में समा+ +हीं है। शंकर+ारायर्ण अय्यर में, न्यायमूर्ति विवश्व+ार्थी शास्त्री +े अव*ारिर विकया: "यह देखा Sा+ा चाविहए विक एक वस् ु ः न्यासी क े अति*कार सभी मामलों में एक विवति* ः न्यासी क े समा+ +हीं हैं। साव:Sवि+क *ार्मिमक *म:दाय क े विवति* ः न्यासी को क े वल कदाचार क े खिलए हर्टाया Sा सक ा है और वह भी क े वल मˆास अति*वि+यम II 1927 की *ारा 73 या दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा की *ारा 73 द्वारा वि+*ा:रिर मंSूरी से संस्जिस्र्थी एक वाद में ही। हालांविक Sहाँ क े वल एक वस् ु ः सेवाय है Sो इस रह से काय: कर रहा है, यह न्यास में विह बद्ध व्यविXयों क े खिलए है, विक वे उपरोX प्राव*ा+ों क े ह एक वाद लाये सिSसमें यह अणिभकणिर्थी हो विक पद पर एक रिरविX है और यह अपेतिक्ष कर े हुए हो विक इसे अदाल द्वारा एक न्यासी की वि+युविX द्वारा भरा Sा+ा चाविहए। यह वस् ु ः न्यासी को उसकी ओर से विब+ा विकसी कदाचार क े हर्टा देगी… वस् ु ः न्यासी Sब क वह इस रह से काय: कर रहा है, उसे आवश्यक परिरस्जिस्र्थीति यों में न्यास क े प्रति क ू ल दावा कर+े वाले अति चारिरयों को बाहर वि+काल+े क े खिलए न्यास की ओर से और उसक े विह में वाद ला+े का अति*कार है। इस संबं* में और इस उद्देश्य क े खिलए उसक े अति*कार और शविXयां एक विवति* ः न्यासी की रह समा+ हैं..." mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एक विवति* ः सेवाय को क े वल कु प्रबं*+ क े आ*ार पर या मूर्ति क े प्रति क ू ल विह का दावा कर+े क े आ*ार पर पद से हर्टाया Sा सक ा है। हालांविक, एक विवति* ः सेवाय को हर्टा+े क े खिलए विकसी ऐसे प्रकर्थी+ की आवश्यक ा +हीं है। Sब क विक एक वस् ु ः सेवाय का अति*कार प्रति कू ल कब्Sे द्वारा परिरष्क ृ + विकया गया हो, एक विवति* ः सेवाय, वस् ु ः सेवाय को पद से विवस्र्थीाविप कर सक ा है और विकसी भी समय मूर्ति क े प्रबं*+ को £हर्ण कर सक ा है। इसक े अलावा Sहां एक वस् ु ः सेवाय है, दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 क े ह एक वाद संस्जिस्र्थी विकया Sा सक ा है, सिSसमें अदाल से एक योS+ा य करक े रिरविX को भर+े की अपेक्षा की Sा ी है। यह मूर्ति क े संरक्षर्ण क े खिलए एक काय:वाही ला+े क े सीविम उद्देश्य क े खिलए है विक वस् ु ः सेवाय क े अति*कार और शविXयाँ उसी समा+ हैं Sैसी विक विवति* ः सेवाय की है।

374. विवति*क स्जिस्र्थीति विक देवोत्तर संपखित्त का वि+रन् र और अ+न्य कब्Sा रख+े वाला व्यविX Sो मूर्ति क े विह ों में प्रबन्*+ अति*कारों का प्रयोग कर ा है, वह इसकी ओर से वाद ला सक ा है, इसे विवक्रम दास महन् ब+ाम दौल राम अस्र्थीा+ा234 में इस न्यायालय द्वारा मान्य ा दी गई है। विप्रवी कौंसिसल क े एक वि+र्ण:य द्वारा (इस आ*ार पर विक विपछले महन् +े उसे संपखित्त अन् रिर कर दी र्थीी) अपीलक ा: को एक प्रबं*क क े रूप में पुविष्ट की गई र्थीी। विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य की ति र्थीी से पहले, त्काली+ महं द्वारा क ु छ व्यविXयों क े सार्थी एक और समझौ ा तिर्डक्री की गई, सिSन्हों+े उसे हर्टा+े क े खिलए काय:वाही संस्जिस्र्थी की। Sबविक कु छ व्यविX सिSन्हों+े काय:वाही की, समझौ े की श Â क े ह न्यासी क े रूप में पद पर काविबS हो गए, उ+में से 234 एआईआर 1956 एससी 382 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एक +े महं क े रूप में पदभार संभाला और संपखित्त पर कब्Sा कर खिलया। ी+ न्यासिसयों और विपछले मंह क े उत्तराति*कारी +े अपीलक ा: क े खिखलाफ मुकदमा दायर विकया। दो+ों वि+चली अदाल ों +े अपीलक ा: क े विवरूद्ध अव*ारिर विकया। उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक भले ही समझौ ा तिर्डक्री अपास् हो Sाए, वादीगर्ण वस् ु ः न्यासी हो+े क े आ*ार पर मुकदमा ब+ाए रख+े क े हकदार हैं सिS+का कब्Sा स्पष्ट और वि+र्मिववाद है। दो+ों अ*ी+स्र्थी न्यायालयों +े दS: विकया विक समझौ ा तिर्डक्री क े अ+ुसार वादीगर्ण और वि+युX महं कब्Sे में आ गए और संपखित्तयों को महं क े +ाम पर +ामां रिर कर विदया गया और ब से कब्Sे में र्थीे। न्यायमूर्ति बी Sगन्नार्थीदास +े इस न्यायालय की संविव*ा+ पीठ क े खिलए बोल े हुए अव*ारिर विकया: "33... हमारे साम+े प्रश्न यह है विक क्या कोई व्यविX सिSसक े पास 1934 से 1941 क (और उसक े बाद अब क) अस्र्थीा+ और इसकी संपखित्त का प्रबन्*+ और वस् ु ः कब्Sा रहा हो, Sो विकसी न्यायालय की वै* या अवै* तिर्डक्री क े अ*ी+ इसका न्यासी हो+े का दावा कर ा हो, क्या उसका अस्र्थीा+ क े विह ों क े विवरूद्ध प्रति वादी क े कायÂ से उत्पन्न संशय को दूर कर+े की काय:वाविहयों को Sारी रख+े में पया:प्त विह +हीं है..." "34.. Sहां क लोक न्यासों का संबं* है, न्यायालयों का यह क:व्य है विक वे देखें विक उ+क े विह और विह ाति*कारिरयों क े विह सुरतिक्ष हैं... हम विवचार कर े हैं विक महं क े रूप में राम सरूप दास क े दीघ: अवति* प्रबन्*+ र्थीा कब्Sे क े मद्दे+Sर और इस थ्य क े मद्दे+Sर विक वह इसक े विह क े खिलए और इसकी ओर से काय: कर+े का दावा कर रहे है, यह उतिच है विक उसे न्यास की ओर से काय: Sारी रख+े की अ+ुमति दी Sा+ी चाविहए Sब क विक उतिच काय:वाही में उसक े हक की परीक्षा +हीं की Sा ी और यह विक न्यायालय को न्यास क े लाभ क े खिलए इ+ काय:वाविहयों में उसक े पक्ष में एक तिर्डक्री प्रदा+ कर+ा चाविहए।" न्यायालय +े पुविष्ट की विक यह क े वल संस्र्थीा क े सव परिर विह क े खिलए है विक वाद का अति*कार प्रबं*कों क े रूप में काय: कर+े वाले व्यविXयों को विदया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा ा है, यद्यविप प्रबं*क क े का+ू+ी हक में कमी हो। मामले में दावेदार क े कब्Sे और लम्बे समय क प्रबन्*+ +े देव ा की ओर से इसक े विह ों क े संरक्षर्ण क े खिलए काय: कर+े का अति*कार उसमें वि+विह विकया।

375. श्री श्री काखिलमा ा ठक ु रा+ी कालीघार्ट ब+ाम सिSबं*+ मुखS-235 में, श्री काली मा ा ठक ु रा+ी और उ+क े संबंति* देवी-देव ाओं की सेवा-पूSा क े उतिच प्रबं*+ क े खिलए और वि+विह संपखित्तयों क े उतिच प्रबं*+ क े खिलए एक योS+ा ैयार कर+े क े खिलए सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 क े ह एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। एक योS+ा ैयार की गई र्थीी और बाद में इस आ*ार पर चु+ौ ी दी गई र्थीी विक योS+ा में प्रबं*+ सविमति में वस् ु ः सेवाय को शाविमल कर+ा अ+ुज्ञेय +हीं र्थीा। न्यायमूर्ति Sे आर मु*ोल्कर +े इस न्यायालय की संविव*ा+ पीठ क े खिलए बोल े हुए इस क: को खारिरS कर विदया और अव*ारिर विकया: "Sो भी हो, हम इस थ्य की अ+देखी +हीं कर सक े विक व:मा+ पूवा:ति*कारीगर्ण बहु लंबे समय से सेवाय क े रूप में काय: कर रहे हैं और इस संबं* में उ+क े अति*कारों को पहले कभी भी प्रश्नग +हीं विकया गया है। इ+ परिरस्जिस्र्थीति यों में हम विवद्वा+ अति*वXा क े इस क: को स्वीकार +हीं कर सक े विक उन्हें मंविदर क े प्रबं*+ से पूरी रह से बाहर रखा Sा+ा चाविहए।" अ+ु ोष दे+े में, न्यायालय सेवाय क े रूप में अति*कारों का लम्बे समय क प्रयोग कर+े वाले क े प्रति सचे र्थीा। उच्च न्यायालय द्वारा ब+ाई गई प्रारंणिभक योS+ा में प्रबं*कीय बोर्ड: में अठारह सदस्य शाविमल र्थीे सिS+में से बारह सेवाय र्थीे। न्यायालय +े इसे ग्यारह सदस्यों क े बोर्ड: में संशोति* विकया, सिSसमें पांच सेवाय और अति*कांश हिंहदू र्थीे Sो सेवाय +हीं र्थीे। 235 एआईआर 1962 एससी 1329 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

376. न्यास संपखित्त का संरक्षर्ण सव परिर महत्व का है। यह इस कारर्ण से है विक काय:वाही संस्जिस्र्थी कर+े का अति*कार प्रबं*कों क े रूप में काय: कर+े वाले व्यविXयों को विदया Sा ा है, हालांविक एक प्रबं*क क े का+ू+ी हक का अभाव है। वस् ु ः सेवाय हो+े का दावा कर+े वाला व्यविX मूर्ति क े प्रति कू ल दावा और देवोत्तर संपखित्त में माखिलका+ा हक का दावा +हीं कर सक ा है। Sहां एक व्यविX वस् ु ः सेवाय हो+े का दावा कर ा है, ो यह अति*कार एक बेह र हक क े विकसी व्यविX अर्थीा: ् विवति* ः प्रबन्*क की अ+ुपस्जिस्र्थीति पर आ*ारिर है। यह विदखाया Sा+ा चाविहए विक न्यास की संपखित्त पर वस् ु ः प्रबन्*क का अ+न्य कब्Sा है और विकसी भी रफ से विब+ा विकसी बा*ा क े संपखित्तयों क े प्रबं*+ क े अति*कार पर पूर्ण: वि+यंत्रर्ण रख ा है। सभी व्यावहारिरक उद्देश्यों क े खिलए वह व्यविX न्यास संपखित्त क े प्रभारी व्यविX क े रूप में मान्य ा प्राप्त है। साव:Sवि+क अणिभलेखों में प्रबन्*क क े रूप में मान्य ा, प्रबं*क क े रूप में मान्य ा प्राप्त हो+े का प्रमार्ण प्रस् ु करेगा।

377. गौर लब है विक प्रबं*+ का एकल या इकलौ ा काय: एक व्यविX में वस् ु ः सेवाय क े अति*कारों को वि+विह +हीं कर ा है। व्यविX को संपखित्त का दीघ:, वि+बा:* और अ+न्य कब्Sा और प्रबं*+ को प्रदर्भिश कर+ा चाविहए। विक +ी अवति* पया:प्त अवति* का गठ+ कर ी है यह मामले -दर-मामले क े आ*ार पर वि+*ा:रिर विकया Sा ा है। पुSारी क े रूप में *ार्मिमक पूSा कर+ा, प्रबं*+ क े अति*कारों क े अभ्यास क े समा+ +हीं है। आवश्यक अ+ुष्ठा+ों का संचाल+ कर+े क े खिलए एक प्रबं*क एक या कई पुSारिरयों को वि+युX कर सक ा है। अंति म विवश्लेषर्ण में, न्यास की संपखित्तयों क े कब्Sे क े खिलए एक विवति* ः न्यासी क े अलावा अन्य व्यविX का वाद कर+े का अति*कार अमू: में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA य +हीं विकया Sा सक ा है और प्रत्येक मामले क े थ्यों पर वि+भ:र कर ा है। क ृ त्य Sो एक सेवाय क े रूप में दावा विकए गए अति*कारों का आ*ार ब+ े हैं, उन्हें उसी रूप में हो+ा चाविहए Sैसा विक एक विवति* ः सेवाय द्वारा प्रयोग विकया Sा ा है। एक वस् ु ः सेवाय में देव ा की ओर से वाद संस्जिस्र्थी कर+े का अति*कार वि+विह है और इसकी संपखित्त पर लागू हो ा है बश † विक यह अति*कार सद्भाव+ापूव:क रीक े से प्रयोग विकया Sा ा है। इस कारर्ण से अदाल को साव*ा+ीपूव:क यह आकल+ कर+ा चाविहए विक क्या प्रबं*+ क े काय: पया:प्त अवति* क अ+न्य, वि+बा:* और वि+रं र हैं। समय अवति*

378. एक अंति म प्रश्न Sो हमारी व:मा+ Sांच क े खिलए प्रासंविगक है यह है विक क्या एक वस् ु ः सेवाय अवि+तिश्च काल क पद पर रह+े क े अति*कार का दावा कर सक ा है। Sैसा विक पहले देखा गया है, एक विवति* ः सेवाय और एक वस् ु ः सेवाय मूर्ति क े लाभ क े खिलए सीविम अर्थी: में काय: कर+ेे क े समा+ अति*कारों का प्रयोग कर े हैं। यहां क विक सेवाय द्वारा कु प्रबं*+ का कोई प्रकर्थी+ + हो+े पर भी, कोई व्यविX विकसी योS+ा को य कर+े क े खिलए सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 क े ह काय:वाही संस्जिस्र्थी कर सक ा है। इस दृविष्टकोंर्ण से, का+ू+ी वि+तिश्च ा और देव ा क े वि+रं र विह को एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में अति*कारस्वरूप Sारी रख+े क े दावे को सीविम करक े पूरा विकया Sाएगा।

379. गोपाल क ृ ष्र्णSी क े कर ब+ाम महोमेद Sाफर मोहम्मद हुसै+236 में वादी +े इस उद्घोषर्णा क े खिलए प्रार्थी:+ा कर े हुए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया विक 236 एआईआऱ 1954 एससी 5 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दूसरा वादी दरगाह का संरक्षक और 'वविहवार्टदार' है। प्रति वाद +े इसका वै* प्रबन्*क र्थीा मु वल्ली हो+े का दावा विकया। वादीगर्ण क े परिरवार 1817 से प्रबं*क र्थीे। 1902-03 से, प्रति वादी को मंविदर में हर साल एक वि+तिश्च अवति* क े दौरा+ उपास+ा का प्रबं*+ कर+े और उसक े रखरखाव क े खिलए चढ़ावे को एकत्र कर+े का अति*कार विदया गया र्थीा। वाविदयों क े प्रबं*+ और चढ़ावा सं£विह कर+े क े अति*कार पर कणिर्थी हस् क्षेप पर वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। न्यायालय +े पाया विक वादीगर्ण और उ+क े परिरवार कम से कम वष: 1886 से प्रबं*+ कर रहे र्थीे। न्यायालय +े मा+ा विक Sैसा विक प्रति वादी द्वारा दावा विकया गया अति*कार वंशा+ुग न्यासी का +हीं र्थीा, अति*कार उसक े सार्थी ही खत्म हो Sा ा है और एकमात्र प्रश्न यह र्थीा विक वादी प्रबं*+ और चढ़ावे क े हकदार र्थीे या +हीं। न्यायमूर्ति विववा+ बोस +े इस न्यायालय की ी+-न्याया*ीश पीठ क े खिलए बोल े हुए अव*ारिर विकया: "30. अब एक वस् ु ः प्रबन्*क या एक स्वयं क े अपक ृ त्य से ब+े न्यासी क े क ु छ अति*कार हैं। वह न्यास की ओर से और इसक े लाभ क े खिलए प्रबं*+ क े सामान्य अ+ुक्रम में संपखित्तयों और *+ की वसूली क े खिलए मुकदमा कर सक ा है। हालांविक यह कह+ा एक बा है विक क्योंविक एक व्यविX एक 'वस् ु ः' प्रबन्*क है, इसखिलए वह प्रबन्*+ क े सामान्य अ+ुक्रम में इसक े लाभ क े खिलए व इसकी ओर से विकसी विवशेष संपखित्त या विकसी विवशेष राणिश की वसूली कर+े का हकदार है, Sो अन्यर्थीा न्यास को हावि+ कारिर करेगा, लेविक+ यह कह+ा विबल्क ु ल अलग है विक उसे विब+ा विकसी स्वत्व क े अवि+तिश्च काल क 'वस् ु ः' प्रबं*+ को Sारी रख+े का अति*कार है, Sो इस रह की घोषर्णा को आशतिय करेगा। हम ऐसी कोई व्यापक उद्घोषर्णा कर+े में संकोच महसूस कर े हैं... ऐसा हो+े क े कारर्ण, हमें लग ा है विक यह अवांछ+ीय है विक चीSों को इस अवि+तिश्च रीक े से Sा+े विदया Sाय, कोई भी यह +हीं Sा+ ा विक प्रबं*+ क े का+ू+ी अति*कार कहाँ हैं या उ+में से क्या शाविमल हैं; कोई भी यह +हीं Sा+ ा विक अति*कार क ै से विवकसिस हो े हैं या बड़े *मा:र्थी: चढ़ावे Sो एकत्र विकए Sा े हैं, उन्हें क ै से विव रिर और उपयोग विकया Sा+ा है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (प्रभाव वर्ति* )

380. न्यायालय +े का+ू+ में देव ाओं की ओर से काय:वाही कर+े क े वि+विह अति*कार और एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में अवि+तिश्च काल क Sारी रह+े क े दावे क े मध्य अं र विकया, Sो सभी उद्देश्यों क े खिलए, विवति* ः सेवाय क े सार्थी वस् ु ः सेवाय की बराबरी करेगा और पूव:व - को एक विवति*क इकाई प्रदा+ करेगा Sहां यह हमेशा अ+ुपस्जिस्र्थी रहा है। विवति*क वि+तिश्च ा और न्यास संपखित्तयों का अंति म संरक्षर्ण, सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1908 की *ारा 92 क े ह वि+विह है। इस प्राव*ा+ क े ह, महाति*वXा या न्यास में विह रख+े वाले और न्यायालय की इSाS अणिभप्राप्त कर+े वाले, ऐसे दो या दो से अति*क व्यविXयों क े आवेद+ पर न्यासिसयों को बदल+े और न्यास संपखित्तयों क े संबं* में एक योS+ा य कर+े की व्यापक शविXयाँ न्यायालय में वि+विह है। इसे ध्या+ में रख े हुए, न्यायालय +े उपरोX विर्टप्पणिर्णयों क े अ+ुसार वि+द†श ैयार विकए: "32. हमें विवद्वा+ सॉखिलसिसर्टर S+रल द्वारा ब ाया गया है विक दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा की *ारा 92 क े ह एक मुकदमा विवचारा*ी+ है। मामले पर विकसी भी रह प्रभाव र्डाले विब+ा Sो वहां उत्पन्न होंगे, हम वि+म्+खिलखिख आदेश दे े हैं। हम वि+देश दे े हैं-

1. यह विक चढ़ावे क े सं£ह और वि+स् ारर्ण से संबंति* व:मा+ व्यवस्र्थीा इस वि+र्ण:य की ति णिर्थी से छः माह की अवति* क े खिलए Sारी रहे।

2. यह विक अन् रावति* में एकत्र विकए गए चढ़ावे, सार्थी ही पहले से Sमा चढ़ावे, सिसफ: आवश्यक खचÂ को पूरा कर+े क े खिलए आवश्यक राणिश को छोड़कर विद्व ीय वादी को + सौंपा Sाए। उ+ चढ़ावे पर प्रति वादी क े विवति*क प्रति वि+ति*यों का कोई अति*कार +हीं है।

3. यविद ऐसा वाद उX अवति* क े भी र संस्जिस्र्थी विकया Sा ा है, ो उX चढ़ावा और सं£ह को ऐसी योS+ा क े अ+ुसार वि+स् ारिर विकया Sाएं, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sैसा ब ब+ाया Sाए, और ऐसे वि+द†शों क े अ+ुसार Sैसा विक उस वाद में विदए Sाएं।

4. यविद उX छः माह क े अन्दर ऐसा कोई वाद संस्जिस्र्थी +हीं विकया Sा ा है ो विद्व ीय वादी दरगाह क े वस् ु ः प्रबन्*क व्यविX क े रूप में अणिभ£हर्ण की ति र्थीी 13-11-1938 से वाद कर+े की ति णिर्थी 7-10- 1946 क दरगाह की ओर से र्थीा इसक े लाभ क े खिलए कोष में Sमा चढ़ावे को प्राप्त कर+े का हकदार होगा और दरगाह की ओर से और इसक े लाभ क े खिलए भविवष्य में वष: पय:न् सम्पूर्ण: चढ़ावे को प्राप्त कर+े का हकदार होगा Sब क विक उसे एक बेह र हक क े व्यविX या न्यायालय से व्युत्पन्न प्राति*कारी द्वारा विवस्र्थीाविप विकया Sा ा है।

381. विवक्रम दास महं ब+ाम दौल राम अस्र्थीा+ा237 में समझौ ा तिर्डक्री सिSसक े आ*ार पर महं +े अति*कार का दावा विकया और कब्Sा खिलया, उसे प्रभावशील +हीं विकया गया। समझौ ा तिर्डक्री को प्रभावी ब+ा+े वाले विवचारर्ण न्यायालय क े वि+र्ण:य को अपास् विकया गया। हालांविक अदाल +े महं क े अति*कारों को एक वस् ु ः प्रबन्*क क े रूप में Sारी रखा, न्यायालय +े अव*ारिर विकया: "19. लेविक+ यह क े वल एक अन् ःकाली+ उपाय है। हम इस थ्य को अ+देखा +हीं कर सक े विक हमारे साम+े एक लोक न्यास है, अब हमारे साम+े थ्यों क े आ*ार पर, सिSस पर एक तिर्डक्री क े ह सिSसका शून्य हो+ा कहा गया है, दावा कर+े वाला कणिर्थी इंर्टरमेर्डलर का कब्Sा और प्रबं*+ है। यह हो सक ा है, Sब मामले को वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए उतिच काय:वाही शुरू की Sा ी है, ो यह पाया Sाएगा विक वह का+ू+ी अति*कार क े विब+ा +हीं है या उसे वह प्राति*कार दे+ा उतिच हो सक ा है यविद वह पहले से ही इसे प्राप्त +हीं है, या विफर यह बेह र हो सक ा है विक कोई अन्य व्यविX या वि+काय हो। लेविक+ वे मामले +हीं हैं सिSन्हें हमें इ+ काय:वाही में य कर+े की आवश्यक ा है। हमे थ्यों की व:मा+ स्जिस्र्थीति को उत्तर प्रदेश क े महाति*वXा क े संज्ञा+ में ला+ा है और इस पर विवचार कर+े क े खिलए 237 एआईआर 1956 एससी 382 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA छोड़+ा है विक क्या उसे अप+े स्वयं क े प्रस् ाव पर सिसविवल प्रविक्रया संविह ा की *ारा 92 क े ह काय:वाही संस्जिस्र्थी कर+ी चाविहए या अन्य कोई उतिच कदम उठा+ा चाविहए। इस वि+र्ण:य की एक प्रति उसे भेSी Sाए।"

382. गोपाल क ृ ष्र्णSी क े कर और विवक्रम दास में इस न्यायालय क े वि+र्ण:य +े पुविष्ट की विक मूर्ति की ओर से सद्भावी वादों को संस्जिस्र्थी कर+े क े सीविम अति*कार को वस् ु ः सेवाय को प्रदा+ कर+े का आ*ार न्यास की संपखित्तयों को संरतिक्ष कर+े का विह र्थीा। Sहाँ कोई विवति* ः सेवाय +हीं र्थीा वहाँ का+ू+ +े मूर्ति और उसकी संपखित्तयों क े संरक्षर्ण कर+े की सीमा क संपखित्त का प्रबं*+ कर+े वाले व्यविX को मान्य ा दी। हालाँविक, इस सीविम मान्य ा +े वस् ु ः सेवाय ों को अ+न् काल क ब+े रह+े का अति*कार +हीं विदया। वि+म ही का दावा

383. ऐसे विवति*क मा+क को संदर्भिभ कर+े क े बाद सिSसे न्यायालय को एक विवति*क सेवाय को मान्य ा दे+े क े खिलए सं ुष्ट कर+ा चाविहए, वि+म ही अखाड़ा द्वारा विदए गए इस क: को अति*वि+र्ण- कर+े की स्जिस्र्थीति आ गयी है विक यह विववाविद स्र्थील पर मूर्ति यों का सेवाय है। वि+म ही अखाड़ा बैराविगयों की रामा+ंद संप्रदाय की एक पंचाय ी मठ है Sो एक *ार्मिमक संप्रदाय है। 19 माच: 1949 को एक पंSीक ृ विवलेख द्वारा वि+म ही अखाड़ा क े रीति -रिरवाSों को खिलख+े का दावा विकया गया है। यह क: विदया गया र्थीा विक विववाविद ढाँचा एक मंविदर भव+ है Sो वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में रही है और क े वल हिंहदुओं mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को मंविदर में प्रवेश कर+े और चढ़ावा चढ़ा+े की अ+ुमति दी गई है। वि+म ही अखाड़ा का दावा है विक यह अप+े पुSारिरयों क े माध्यम से चढ़ावा प्राप्त कर रहा है। वाद पत्र में वि+विह प्रकर्थी+ों से सार्थी ही वि+म ही अखाड़ा द्वारा दावा विकए गए अ+ु ोषों से संक े विमल ा है विक दावा मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार क े अति*कार क े खिलए है। वि+म:ल अखाड़ा +े क: विदया विक यह संपखित्त क े कब्Sे में रहे हैं और प्रबं*+ अति*कारों का प्रयोग विकया है Sो विक उ+को एक वस् ु ः सेवाय की प्रास्जिस्र्थीति दे+े क े बराबर है।

384. शुरुआ में वि+म ही अखाड़ा द्वारा यह प्रति वाद विकया गया र्थीा विक भगवा+ राम की मूर्ति क े सेवाय क े रूप में इसकी प्रास्जिस्र्थीति को विववाविद कर े हुए वाद 5 में वाद पत्र में एक प्रकर्थी+ की अ+ुपस्जिस्र्थीति से सेवाय क े रूप में उ+की प्रास्जिस्र्थीति को विववाविद +हीं विकया Sा सक ा है। यह आगे कहा गया विक विकसी भी मुकदमे में सेवाय क े अति*कारों का कोई विवरो*ी दावा +हीं विकया गया है। + ीS +, यह आ£ह विकया गया र्थीा विक यह *ारिर विकया Sा+ा चाविहए विक वि+म ही भगवा+ राम की मूर्ति यों क े सेवाय हैं। इस क: को स्वीकार +हीं विकया Sा सक ा है। यविद वि+म ही अखाड़ा को एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में मान्य ा दी Sाये ो यह विवति* ः अन्य सभी व्यविXयों क े अति*कारों का अपवS:+ कर े हुए मूर्ति की ओर से काय:वाही कर+े क े खिलए इसे एक सारवा+ अति*कार प्रदा+ करेगा। सेवाय क े काय: से मूर्ति और उसकी संपखित्त बाध्य है। वि+म ही अखाड़ा को सेवाय अति*कार प्रदा+ कर+े क े अणिभव्यX समप:र्ण विवलेख क े अभाव में, यह प्रदर्भिश कर+े क े खिलए इस पर एक सकारात्मक भार है विक यह वास् व में मूर्ति यों का एक सेवाय र्थीा। इस कारर्ण से, वि+म ही अखाड़ा को मौखिखक और दस् ावेSी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साक्ष्य क े आ*ार पर यह स्र्थीाविप कर+ा चाविहए विक उन्हों+े एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में मान्य ा प्राप्त कर+े क े खिलए आवश्यक सभी अति*कारों का प्रयोग विकया है।

385. वि+म ही अखाड़ा 22/23 विदसंबर 1949 की घर्ट+ा से इ+कार कर ा है, सिSसक े दौरा+ मूर्ति यों को विववाविद ढ़ाँचे क े आं रिरक पविवत्र स्र्थीा+ में गुप्त रीक े से रखा गया र्थीा। यह दावा विक वि+म ही अखाड़ा का अणिभलेख क े साक्ष्य क े आ*ार पर आं रिरक अहा ा पर कब्Sा र्थीा, इसे पहले ही खारिरS कर विदया गया है। वि+म ही अखाड़ा यह साविब कर+े में +ाकाम रहा है विक उस समय विववाविद ढ़ाचा एक मंविदर र्थीा, Sो इसक े कब्Sे में र्थीा और यह विक 22/23 विदसंबर 1949 को कोई घर्ट+ा +हीं हुई र्थीी। यह दावा विक वि+म ही अखाड़ा सेवाय क े रूप में आं रिरक अहा े का प्रबं*+ कर रहा र्थीा, आं रिरक अहा े क े अ+न्य कब्Sे क े अभाव में यह द्वावा उत्पन्न +हीं हो ा है। यह इस संदभ: में र्थीा विक न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अव*ारिर विकया: "2994. अब विववाद्यक संख्या 3 (वाद- 3) पर आ े हैं, यह ध्या+ में रखा Sा+ा चाविहए विक यह वाद आं रिरक अहा े क े भी र क े परिरसर क ही सीविम है, + विक पूरे परिरसर, अर्थीा: ् भव+ सविह बाहरी और आं रिरक अहा े क े खिलए। यह वही है Sो वि+म ही अखाड़ा क े अति*वXा +े आदेश X वि+यम 1 सीपीसी क े ह विद+ांक 17.5.1963 को विदए गए अप+े बया+ में कहा है।

4537. इ+ विवशेष थ्यों और परिरस्जिस्र्थीति यों में और वि+म ही अखाड़ा क े रुख से, हमारे पास यह मा++े क े अलावा कोई विवकल्प +हीं है विक Sहाँ क विववाविद ढ़ाचें में अर्थीा: ् आं रिरक अहा े क े भी र स्र्थीाविप भगवा+ श्री राम की मूर्ति यों का संबं* है। प्रति वादी वि+म ही अखाड़ा को इसका सेवाय +हीं कहा Sा सक ा है।"

386. वि+म ही अखाड़ा की खिलखिख दलीलों में यह क: विदया गया है विक आं रिरक और बाहरी अहा ा एक सम£ क्षेत्र ब+ा े हैं और वाद 3 क े वल mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आं रिरक अहा े क े संबं* में दायर विकया गया र्थीा क्योंविक क े वल आं रिरक अहा ा क ु क— की काय:वाही का विवषय र्थीा। वि+म ही अखाड़ा का कह+ा है विक क ु क— आदेश +े आं रिरक और बाहरी अहा े क े बीच एक म+मा+ा विवभेद विकया और आं रिरक अहा े क े संबं* में एक वि+ष्कष: पूरे परिरसर की सेवादारी क े उ+क े दावे को कमSोर +हीं कर ी है। यहां क विक अगर इस क: को स्वीकार कर खिलया Sा ा है, ो यह वि+*ा:रिर कर+े क े अलावा विक वि+म ही अखाड़ा आ ंरिरक अहा े क े कब्Sे में +हीं र्थीा, हमारे वि+*ा:रर्ण क े खिलए Sो स्व ंत्र प्रश्न उठ ा है, वह यह है विक क्या वि+म ही अखाड़ा +े भगवा+ राम की मूर्ति यों क े वस् ु ः सेवाय क े रूप में का+ू+ में अति*कार क े दावे क े खिलए बाहरी अहा े में मूर्ति यों पर प्रबं*+ अति*कारों का वि+रन् र प्रयोग विकया है ? अप+े कÂ का समर्थी:+ कर+े क े खिलए वि+म ही अखाड़ा +े वाद 3 और 5 में गवाहों क े मौखिखक साक्ष्य पर अवलम्ब विकया है और सेवाय क े रूप में अप+ी प्रास्जिस्र्थीति स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कु छ अति रिरX दस् ावेS भी प्रस् ु विकए हैं।

387. वाद 3 में वादी की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री एस क े Sै+ +े वाद 3 में गवाह महं भास्कर दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/1) और राSा राम पांर्डे (र्डीर्डब्ल्यू 3/2) क े बया+ों पर यह प्रति वाद कर+े क े खिलए अवलम्ब खिलया विक यह स्वीकार विकया गया र्थीा विक वि+म ही अखाड़ा स्मारर्णा ी काल से एक सेवाय क े अति*कारों का प्रयोग कर रहा र्थीा। वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रस् ु मौखिखक साक्ष्य का पहले ही इस वि+र्ण:य क े दौरा+ विवश्लेषर्ण विकया Sा चुका है। विववाविद स्र्थील पर वि+म ही अखाड़ा द्वारा की गई गति विवति*यों का एक ठोस लेखा स्र्थीाविप कर+े क े खिलए उ+क े गवाहों द्वारा बया+ों पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अवलम्ब+ +हीं खिलया Sा सक ा है। कई गवाहों +े अप+ी मुख्य परीक्षा में यह स्वीकार विकया है विक उन्हो+ें अप+े स्वयं क े शपर्थीपत्र +हीं पढ़े हैं। गवाहों +े क े वल उसमें वि+विह गवाही को समझे विब+ा संबंति* दस् ावेSों पर हस् ाक्षर विकए। इसक े अलावा सिSरह में कई गवाहों +े स्पष्ट रूप से अप+े स्वयं क े बया+ों का खंर्ड+ विकया। कई गवाहों +े विववाविद ढाँचे में प्रवेश +हीं कर+ा स्वीकार विकया या विववाविद ढ़ाँचे की उ+की यात्राओं क े बारे में पहले क े बया+ों को रद्द कर विकया। इ+ विर्टप्पणिर्णयों क े प्रकाश में, सेवाय क े रूप में अप+ी स्जिस्र्थीति को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए वि+म ही अखाड़ा द्वारा अवलम्ब खिलए गए मौखिखक साक्ष्य को स्वीकार +हीं विकया Sा सक ा है। हालांविक पूर्ण: ा क े खिलए, प्रासंविगक उद्धरर्ण को +ीचे परीतिक्ष विकया गया है।

388. महं भास्कर दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/1) वष: 1950 से वि+म ही अखाड़ा क े पंच र्थीे और प्रासंविगक समय पर सरपंच र्थीे। उ+क े हलफ+ामे में, यह कहा गया र्थीा: "81. भगवा+ राम लला 1934 क े पूव: से ही आं रिरक भाग में विवराSमा+ हैं और यह 1934 से वि+म ही अखाड़ा क े वि+रन् र कब्Sे में रहा र्थीा। मुसलमा+ इसक े बारे में अ+णिभज्ञ +हीं हैं। भगवा+ वहीं विवराSमा+ हैं। उ+की पूSा, शाही चढ़ावा सब वि+म ही अखाड़े की ओर से विकया Sा ा है। आं रिरक भाग की क ु क— क े विद+ भी (अर्थीा: ् 29. 12.

1949) को यह अखाड़ा क े कब्Sे में र्थीा। इसक े *ार्मिमक न्यास हो+े क े कारर्ण वि+म ही अखाड़ा में स्वाविमत्व विवविह हो गया।" इस वि+र्ण:य क े दौरा+ अणिभलेख पर सबू ों क े विवश्लेषर्ण पर यह अव*ारिर विकया गया है विक 22/23 विदसंबर 1950 की रा में मूर्ति यों को क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया र्थीा। इस गवाह क े हलफ+ामे में 200 साल से अयोध्या में और विववाविद स्र्थील में वि+म ही अखाड़ा क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अस्जिस् त्व क े बारे में संदभ: हैं। हालांविक सेवाय ी अति*कारों क े अभ्यास क े संबं* में गवाह ब ा ा है: "35. श्री राम Sन्मभूविम क े पूव- दरवाSे क े मंविदर क े आगं ुकों को फ ू ल, फल, ब ाशा आविद प्रदा+ कर+े क े खिलए एक वार्मिषक संविवदा की गई र्थीी। यह प्राची+ समय से वि+म ही अखाड़ा क े पूव:व - महं ों द्वारा विकया Sा रहा र्थीा और इसक े खिलए एक करार विकया गया र्थीा। ब्राह्मर्णों को सी ा क ू प से आगं ुक/भXों को पविवत्र और ाSा पा+ी दे+े का अ+ुबं* विदया गया। अखाड़े क े महं को कर का भुग ा+ विकया गया र्थीा। मैं+े अप+े सभी उपलब्* करारों को प्रस् ु विकया है और कई दस् ावेS लूर्ट खिलए गए र्थीे। इसक े खिलए रिरपोर्ट: दS: करायी गई र्थीी।" सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े खिलए पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री Sफरयाब सिSला+ी द्वारा विद+ांक 11 सिस ंबर 2003 को इस साक्षी की प्रति परीक्षा में साक्षी +े Sवाब विदया: "क ु क— क े बाद Sो चढ़ावे विववाविद भव+ में रखी मूर्ति यों पर विकए गए र्थीे, वे वि+म ही अखाड़ा द्वारा की गई विकसी संविवदा का भाग +हीं र्थीे। मेरे हलफ+ामे क े प्रस् र 36 में संविवदा क े बारे में करार का उल्लेख है, लेविक+ मुझे याद +हीं है विक वि+म ही अखाड़ा की ओर से ऐसे विक +े करार इस अदाल में प्रस् ु विकए गए र्थीे। मुझे इस समय उ+ लोगों क े +ाम याद +हीं है सिS+से वि+म ही अखाड़ा द्वारा र्थीाकणिर्थी करार खिलखाया गया र्थीा। मुझे इस समय कोई +ाम याद +हीं है। मै+ें न्यायालय में अप+े हलफ+ामें क े प्रस् र 35 में ऐसा करार प्रस् ु कर+े क े बारे में खिलखा है और विबन्देश्वरी दुबे उ+ में से एक र्थीे सिSन्हो+ें करार खिलखा और यह न्यायालय में प्रस् ु विकया गया है। Sो दस् ावेS सं. 39 C-1/39 है, मैं इसे संख्या द्वारा +हीं ब ा सक ा लेविक+ कागS का शीष:क र्थीा।" (प्रभाव वर्ति* ) यद्यविप गवाह +े विववाविद स्र्थील में वि+म ही अखाड़ा की उपस्जिस्र्थीति का संदभ: विदया है, लेविक+ गवाह सबू क े रूप में उसक े द्वारा प्रस् ु विकए गए विकसी भी दस् ावेS को याद कर+े में असमर्थी: है विक वि+म ही अखाड़ा सेवाय क े रूप में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रबं*+ अति*कारों का प्रयोग कर रहे र्थीे। 17 सिस ंबर 2003 को सिSरह में श्री सिSला+ी द्वारा पूछे गए प्रश्न का इस गवाह द्वारा विदए गए उत्तर पर भी ध्या+ दे+ा महत्वपूर्ण: है: "प्रश्नः- क्या मैं मा+ लूँ विक इस हलफ+ामे का अति*कांश विहस्सा आपक े अति*वXा +े अप+े ज्ञा+ क े आ*ार पर ैयार विकया र्थीा? उत्तर:- ऐसा कह+ा गल है। इस हलफ+ामे का क ु छ विहस्सा मेरे अति*वXा क े ज्ञा+ पर आ*ारिर है लेविक+ मुझे याद +हीं है विक वह कौ+ सा विहस्सा है और मैं यह +हीं ब ा पाऊ ं गा।" (प्रभाव वर्ति* ) र्डीर्डब्ल्यू 3/1 क े बया+ संक े कर े हैं विक गवाह साक्ष्य क े रूप में उसक े द्वारा प्रस् ु विकए गए दस् ावेSों से पूरी रह से अ+णिभज्ञ र्थीा। बया+ इस आत्मविवश्वास को प्रेरिर +हीं कर े हैं विक वि+म ही अखाड़ा सेवाय क े रूप में प्रबं*+ अति*कारों का प्रयोग कर रहा र्थीा।

389. श्री एस क े Sै+ +े राSा राम पांर्डे (र्डीर्डब्ल्यू 3/2) क े शपर्थी-पत्र क े माध्यम से मुख्य परीक्षा पर अवलम्ब+ खिलया, सिSसमें यह कहा गया र्थीा: 14....गभ: £ह की क ु क— क े पहले और रिरसीवर द्वारा अप+ा काय:भार संभाल+े क, मैं+े वि+म ही अखाड़ा क े पुSारी और सहायक पुSारी को आर ी का पाठ कर े हुए, विवणिभन्न चीS कर े हुए और 'प्रसाद' र्थीा 'चरर्णामृ ' दे े हुए देखा है। और इसी रह मैं+े फरवरी 1982 क वि+म ही अखाड़ा क े पुSारी, सहायक पुSारी, पंच को 'चबू रा मंविदर और "छठी पूSा स्र्थील" में आर ी का पाठ कर े हुए और पूSा (उपास+ा) कर े हुए देखा है। Sैसा विक ऊपर उल्लेख विकया गया है, एक मंविदर में पूSा कर+े वाले पुSारी को सेवाय की प्रास्जिस्र्थीति क +हीं बढ़ाया Sा ा है। लंबी अवति* क अ+ुष्ठा+ कर+े क े बावSूद एक पुSारी को कोई स्व ंत्र अति*कार +हीं है। इस प्रकार पुSारिरयों की मात्र उपस्जिस्र्थीति उ+में सेवाय हो+े का कोई अति*कार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+विह +हीं कर ी है। एक पुSारी क े काय: कर+े मात्र से उसमें और अप+े आप में एक व्यविX सेवाय +हीं हो Sा ा है। र्डीर्डब्ल्यू 3/2 का बया+ अच्छी रह से स्र्थीाविप कर ा है विक वि+म ही अखाड़ा क े कु छ पुSारी पुSारिरयों क े रूप में काय: कर रहे र्थीे, लेविक+ एक सेवाय क े रूप में उ+की स्जिस्र्थीति की मान्य ा क े खिलए प्रबं*+ अति*कारों क े प्रयोग विकए Sा+े का सबू +हीं दे ा है।

390. श्री एस क े Sै+ +े भी वाद 3 में श्री आचाय: महं बंसी*र दास उफ: उविड़या बाबा (र्डीर्डब्ल्यू 3/18) की गवाही पर यह प्रति वाद कर+े क े खिलए अवलम्ब+ खिलया विक वि+म ही अखाड़ा पूSा कर+े सविह विववाविद स्र्थील पर प्रबं*+ अति*कारों का प्रयोग कर रहा र्थीा। 1930 से र्डीर्डब्ल्यू 3/18 अयोध्या क े रामकोर्ट का एक अवि+रन् र वि+वासी र्थीा और उस+े विववाविद स्र्थील क े करीब विवणिभन्न मंविदरों और *ार्मिमक स्र्थीलों में रह+े का दावा विकया र्थीा। अप+ी मुख्य-परीक्षा क े दौरा+ र्डीर्डब्ल्यू 3/18 +े कहा:

"1930 में मैं श्री राम Sन्म भूविम मस्जिन्दर के दश: + के खिलए गया सिSसके बारे में मुकदमा विवचारा*ी+ है। उस समय भी भगवा+ राम लला वहां विवराSमा+ र्थीे, मैं+े दश: + विकया और प्रसाद, आर ी और चरर्णामृ (पविवत्र Sल) भी खिलया। मैं बाहरी भाग अर्थीा: ् राम चबू रा के उत्तर में ह+ुमा+ द्वार +ामक मुख्य पूव- दरवाSे के उत्तर में स्जिस्र्थी सं वि+वास और भ°ड़ार गृह में रह+े वाले वि+म ही अखाड़ा के पुSारी और सा*ुओ ं से प्रसाद, आर ी और चरर्णामृ प्राप्त कर रहा र्थीा।" (प्रभाव वर्ति* )

साक्षी +े कहा विक पूSा क े प्रभारी पुSारी वि+म ही अखाड़ा क े पुSारी र्थीे। हालांविक विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री सिSला+ी द्वारा सिSरह में गवाह +े कहा: "....सबसे पहले मैं रामचबू रा का दश:+ कर ा, विफर रामलाल, सी ा विकच+ और शंकर चबू रा का और वहां से मैं वापस आ ा र्थीा। कभीmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कभी मैं दश:+ क े दौरा+ आं रिरक भी र में चढ़ा+े क े खिलए पुSारी को प्रसाद दे ा र्थीा। मुझे पुSारी का +ाम याद +हीं है। पुSारी बदल े रह े र्थीे। उस+े खुद कहा विक ह+ुमा+गढ़ी फ ै Sाबाद क े महं लंबे समय क पुSारी ब+े रहे। मुझे व:मा+ में उ+का +ाम याद +हीं है। विवद्वा+ सिSरह कर+े वाले अति*वXा द्वारा याद विदला+े पर, उस+े कहा विक पुSारी का +ाम भास्कर दास र्थीा।... भास्कर दासSी वषÂ क विववाविद स्र्थील क े पुSारी रहे लेविक+ वह कभी वि+म ही अखाड़ा क े महन् +हीं र्थीे। वह ह+ुमा+गढ़ी, फ ै Sाबाद क े एक पुSारी र्थीे। व:मा+ में वह + ो वि+म ही अखाड़ा क े महं हैं और + ही एक पुSारी हैं। वह सविमति क े एक सदस्य हैं। मुझे +हीं प ा विक सविमति में विक +े सदस्य हैं।" (प्रभाव वर्ति* ) विववाविद स्र्थील पर पूSा वि+म ही अखाड़ा द्वारा की Sा ी र्थीी इस प्रारंणिभक बया+ क े बावSूद, गवाह सिSरह में इस बया+ का खंर्ड+ कर ा है। साक्षी +े कहा विक भास्कर दास पूSा कर े र्थीे। स्वयं साक्षी क े अ+ुसार, भास्कर दास वि+म ही अखाड़ा से +हीं Sुड़े र्थीे। गवाह क े विवरो*ाभासी रुख का यह स्र्थीाविप कर+े क े खिलए अवलम्ब+ +हीं खिलया Sा सक ा है विक वि+म ही अखाड़ा प्रबं*+ अति*कारों का प्रयोग कर रहे र्थीे या यहां क विक 1949 से पहले विववाविद स्र्थील पर पूSा का काय: भी कर रहे र्थीे।

391. वाद 3 में वादी द्वारा अवलम्ब खिलए गए कई गवाहों की गवाही विवसंगति यों और विवरो*ाभासों से भरी है। र्डीर्डब्ल्यू 3/18 की गवाही अलग +हीं है। अप+ी गवाही क े दौरा+ उस+े कहा: ".... चबू रे का आकार लगभग ी+-चार फ ु र्ट र्थीा, चौड़ाई में ी+ फीर्ट और Sमी+ स् र से र्डेढ़ फीर्ट ऊ ं ची र्थीी। यह चबू रा मध्य गुम्बद क े ठीक +ीचे र्थीा।और सीमेंर्ट र्थीा ई ं र्टों से ब+ा है। यह चबू रा पतिश्चमी दीवार से दो फीर्ट की दूरी पर र्थीा और पूव: में र्थीा… mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA... यह कह+ा सही +हीं है विक 5-6 हSार हिंहदुओं +े बलपूव:क प्रवेश करक े 22/23.12.49 की रा को वहां मूर्ति यों को रखा है। यह कह+ा भी सही +हीं है विक इ+ लोगों +े मस्जिस्Sद को अपविवत्र विकया है। यह कह+ा भी गल है विक मूर्ति याँ वहाँ रा में रखी गयी र्थीी क्योंविक मूर्ति याँ वहाँ पहले से है। प्रार्थीविमकी में दS: विकया गया यह विबन्दु विक मूर्ति याँ 22.12.1949 की रा को रखी गयीं र्थीी, गल र्थीी...." (प्रभाव वर्ति* ) इस वि+र्ण:य क े दौरा+ पक्षकारों द्वारा बहु से साक्ष्य प्रस् ु विकए गए हैं। इस बा का कोई प्रमार्ण +हीं है विक रामचबू रा कभी मस्जिस्Sद क े क े न्ˆीय गुंबद क े +ीचे र्थीा या यह विक विदसम्बर 1949 से पूव: मस्जिस्Sद क े भी र मूर्ति याँ विवद्यमा+ र्थीीं। साक्षी आगे ब ा ी है: "*म:शास्त्र में झूठ बोल+े को पाप क े रूप में ब ाया गया है। लेविक+ यविद झूठ बोलकर, भला हो ा है ो झूठ बोल+े में कोई बुराई +हीं है। इसी रह भूख से मर रहे व्यविX द्वारा झूठ बोल+े में कोई बुराई +हीं है। यविद कोई *ार्मिमक स्र्थीा+ है और यविद कोई इसे गल रीक े से प्राप्त कर रहा है या Sबर+ कब्Sा कर रहा है, ो झूठ बोल+े में कोई बुराई +हीं है। यविद *ार्मिमक स्र्थील को झूठ बोलकर दूसरों द्वारा Sबर+ खिलया Sा ा है ो यह सही है।" (प्रभाव वर्ति* ) गवाह द्वारा इ+ बया+ों क े मद्दे+Sर उसकी गवाही पर कोई अवलम्ब+ +हीं खिलया Sा सक ा है।

392. श्री एस. क े. Sै+ +े दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा क े आदेश X वि+यम 2 क े अ*ी+ 22 अप्रैल, 2009 को अणिभखिलखिख श्री सिSला+ी क े कर्थी+ पर अवलम्ब+ खिलया Sहां यह कहा गया र्थीा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "...+वीं श ाब्दी क े उत्तरा*: क े बाद से वि+म ही अखाड़ा का अस्जिस् त्व भी विववाविद +हीं है। हालांविक इस बा से इ+कार विकया Sा ा है और विववाविद है विक वि+म ही अखाड़ा विवशेषकर अयोध्या में 16 वीं श ाब्दी ईस्वी या 1528 ईस्वी में अस्जिस् त्व में र्थीा और इस+े इस बा से भी इ+कार विकया विक कोई भी मूर्ति 22 विदसंबर 1949 क बाबरी मस्जिस्Sद क े भव+ में र्थीी।" अयोध्या में या विववाविद स्र्थील क े आसपास वि+म ही अखाड़ा की मात्र उपस्जिस्र्थीति और विववाविद स्र्थील क े वास् विवक कब्Sे और प्रबं*+ क े बीच अं र है। विकसी क्षेत्र का कब्Sा या विकसी क्षेत्र में मात्र उपस्जिस्र्थीति, सेवाय की शविXयों क े वि+विह हो+े क े खिलए पया:प्त +हीं है। श्री सिSला+ी क े बया+ में कु छ भी, वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रबं*+ या क े वल कब्Sा प्रदर्भिश या स्वीकार +हीं कर ा है।

393. वाद 5 में वादी सातिक्षयों क े मौखिखक साक्ष्य पर अवलम्ब खिलया गया। श्री एस क े Sै+ +े कहा विक इ+ गवाहों +े स्वीकार विकया है विक कु क— से पहले और बाद में वि+म ही अखाड़ा क े पुSारी विववाविद ढाँचे में मूर्ति यों का प्रबं*+ कर रहे र्थीे। यह प्रस् ु विकया गया र्थीा विक वाद 5 में गवाहों +े वि+म ही अखाड़े की स्जिस्र्थीति को सेवाय क े रूप में स्वीकार विकया र्थीा, इस अदाल क े समक्ष यह स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कोई और सबू रख+े की आवश्यक ा +हीं र्थीी विक वि+म ही सेवाय हैं। इ+ गवाहों क े बया+ों क े प्रासंविगक अंश इस प्रकार हैं: (i) श्री महं परमहंस राम चरर्ण दास (ओपीर्डब्ल्यू-1) "...क ु क— से पहले, विहन्दू दश:+ कर+े क े खिलए विब+ा विकसी प्रति बं* क े गभ: £ह Sा रहे र्थीे। भगवा+ साखिल£ाम, ह+ुमा+Sी और रामलला की मर्ति याँ वहां स्र्थीाविप र्थीी। वि+म ही अखाड़ा से Sुड़े व्यविXयों +े विकसी भी हिंहदू को गभ: गृह Sा+े में कभी कोई बा*ा +हीं पहुँचायी। क ु क— से पहले, वि+म ही अखाड़ा क े सदस्य गभ: £ह का प्रबं*+ विकया कर े र्थीे…" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) देवकी +ंद+ अ£वाल (ओपीर्डब्ल्यू-2) "...वि+म ही अखाड़े क े बैराविगयों +े, Sो राम चबू रा में पूSा कर े र्थीे, मुस्जिस्लमों को अंदर प्रवेश +हीं कर+े विदया। इसखिलए लगा ार विकए गए प्रयासों क े बावSूद इस Sगह पर +माS +हीं हो सकी।" "...राम चबू रा पर पूव: विवद्यमा+ मूर्ति यों और 1949 क े बाद स्र्थीाविप की गई मूर्ति की पूSा *रमदासSी क े सार्थी झगड़ा हो+े क क े वल वि+म ही अखाड़े क े दो लोगों द्वारा करायी Sा ी र्थीी।" (iii) श्री राम +ार्थी पांर्डा @ बंसरी पांर्डा (ओपीर्डब्ल्यू-5) "वर्जिS दीवार में, दो दरवाSे र्थीे Sो बंद रह े र्थीे और उ+ दरवाSों को वि+म ही अखाड़े क े पुSारिरयों द्वारा खोला और बंद विकया Sा ा र्थीा। वही पुSारी राम चन्ˆ और सी ा रसोई आविद में प्रार्थी:+ा कर े र्थीे और आर ी कर े र्थीे। हम रेलिंलग से ही श्रद्धालुओं क े खिलए गभ: गृह क े दश:+ की व्यवस्र्थीा कर े र्थीे। वहां एक दा+ पात्र भी रखा गया र्थीा। मुख्य द्वारों पर ब ाशा और फ ू ल मालाओं की दुका+ें र्थीीं। उ+में से एक सहदेव माली की है।" " ाला की चाबी वि+म ही अखाड़े क े लोगों क े कब्Sे में हो ी र्थीी और सिSसका पुSारी ाला खोल ा र्थीा, ाला बंद कर ा र्थीा और आर ी पूSा कर ा र्थीा और घंविर्टयाँ और विबगुल बSा ा र्थीा।" "…1949 से 1970 क, मैं वि+यविम रूप से राम Sन्म भूविम मंविदर Sा ा र्थीा। 1949 की क ु क— क े बाद, गभ: £ह क े रिरसीवर बाबू विप्रया दत्त राम +गर पाखिलका फ ै Sाबाद क े अध्यक्ष ब+े और राम चबु रा मंविदर, छठी पूSा स्र्थील, भंर्डार स्र्थील और णिशव दरबार Sैसी Sगहों पर पूSा उसी रह से Sारी रही Sैसी पहले की Sा ी र्थीी और उन्ही लोगों द्वारा की Sा ी र्थीी, Sो पहले इसे कर े र्थीे।" वाद 5 में वादी साक्ष्यों की गवाही को चुहिं+दा रूप से उद्धृ विकया गया है और यह इस वि+ष्कष: को दर्भिश +हीं कर ा है विक वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीा। ओपीर्डब्ल्यू-1 का यह बया+ विक वि+म ही अखाड़ा आं रिरक अहा े का प्रबन्*+ कर ा र्थीा, प्रस् ु साक्ष्य द्वारा समर्भिर्थी +हीं है, सिSसक े बारे में वि+ष्कष: इस वि+र्ण:य में अन्यत्र दS: है। इसी रह, ओपीर्डब्ल्यू-5 द्वारा इकलौ ा बया+ विक वि+म विहयों क े पास बाहरी अहा े की चाबी र्थीी, यह विकसी अन्य बया+ से संपुष्ट +हीं है। यविद वि+म विहयों क े पास बाहरी अहा े की चाबी हो ी, ो विववाविद स्र्थील पर आ+े वाले प्रत्येक व्यविX को, चाहे वह हिंहदू हो या मुस्जिस्लम, प्रवेश कर+े क े खिलए वि+म विहयों से अ+ुमति ले+े की आवश्यक ा हो ी। यविद सच है, ो ऐसी स्जिस्र्थीति वि+तिश्च रूप से अन्य गवाहों द्वारा उ+की गवाही में दS: की गई होगी। ओपीर्डब्ल्यू-2 का बया+ एक बार विफर क े वल विववाविद स्र्थील में और उसक े आसपास वि+म ही की उपस्जिस्र्थीति का संक े दे ा है। यह 1949 में अां रिरक अहा े में मूर्ति यों की आवाSाही क े बारे में वि+म ही और *रम दास क े बीच असहमति का संक े दे ा है। यह बया+ देव ा क े अ+न्य प्रबं*कों क े रूप में वि+म विहयों क े दावे को कम कर ा है क्योंविक यह मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा क े बारे में असहमति का साक्ष्य दे ा है। वि+म ही अखाड़ा द्वारा 22/23 विदसंबर की घर्ट+ाओं को लगा ार अस्वीकार कर+ा, इस अवलोक+ को विवश्वस+ीय ा प्रदा+ कर ा है।

394. वि+म ही अखाड़ा द्वारा अवलम्ब ली गयी मौखिखक गवाही अति*क से अति*क यह स्र्थीाविप कर ी है विक वे विववाविद स्र्थील में और उसक े आसपास मौSूद र्थीे। हालाँविक विववाविद स्र्थील क े आसपास वि+म विहयों की उपस्जिस्र्थीति, प्रबं*+ अति*कारों क े प्रयोग क े समा+ +हीं है Sो उन्हें विवति* में एक वस् ु ः सेवाय की प्रास्जिस्र्थीति क े खिलए हकदार ब+ा ा है। वाद 3 में मौखिखक साक्ष्य सिSस पर अवलम्ब खिलया गया र्थीा, वह विवसंगति यों से भरा हुआ है और यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+ष्कष: +हीं वि+काल ा है विक वि+म ही अखाड़ा +े भगवा+ राम की मूर्ति यों की ओर से प्रबं*+ अति*कारों का प्रयोग विकया र्थीा। वाद 5 में ी+ों गवाहों क े मौखिखक साक्ष्य को चुहिं+दा रूप से उद्धृ विकया गया है और उसमें विदए गए बया+ों की विकसी अन्य गवाह की गवाही द्वारा पुविष्ट +हीं की गई है। मौखिखक गवाही से स्व ंत्र, वि+म ही अखाड़ा +े विववाविद स्र्थील पर मूर्ति यों क े सेवाय क े रूप में अप+ी प्रास्जिस्र्थीति स्र्थीाविप कर+े क े खिलए दस् ावेSी साक्ष्य पर अवलम्ब+ खिलया है। ये दस् ावेS इस प्रकार हैं: मस्जिस्Sद क े परिरसर क े अन्दर क ु छ बैराविगयों द्वारा ब+ाई गई कोठरी क े संबं* में ुलसीदास क े विवरूद्ध मीर रSब अली खा ीब द्वारा 25 सिस ंबर 1866 का परिरवाद; प्रदश: 30 - वाद 1: उत्तरी रफ एक +ए दरवाSे क े वि+मा:र्ण की अ+ुमति दे+े क े आदेश क े संबं* में महं खेम दास क े विवरूद्ध मोहम्मद असग़र द्वारा 13 विदसंबर 1877 की अपील। प्रदश: 7 - वाद 5: अव* प्रां का गSेविर्टयर (1877-78); प्रदश: 24 - वाद 1: महन्द रघुबर दास क े विवरूद्ध चबू रे क े प्रयोग क े खिलए विकराये की मांग कर े हुए सैयद मोहम्मद असग़र द्वारा संस्जिस्र्थी वाद में विद+ांक 8 +वंबर 1882 का वाद पत्र; प्रदश: 28 - वाद 1: मस्जिस्Sद की पेन्टिंन्र्टग क े खिलए सैयद मौहम्मद असग़र द्वारा विकए Sा रहे काय: क े मद्दे+Sर स्र्थील वि+रीक्षर्ण की मांग कर े हुए महं रघुबर दास द्वारा 27 Sू+ 1884 का परिरवाद; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रदश: ए- 22- वाद 1: रामचबू रा स्र्थील पर मस्जिन्दर क े वि+मा:र्ण क े खिलए अ+ुमति मांग े हुए महन् रघुबर दास द्वारा दायर विद+ांक 19 S+वरी 1885 का वाद; प्रदश: 8 - वाद 3: विद+ांक 11 Sू+ 1900 क े करार की प्रति सिSसमें अयोध्या में राम Sन्मभूविम स्र्थील क े श्रद्धालुओं को पेयSल उपलब्* करा+े क े खिलए सिंझगू (गया क े पुत्र) को अ+ुमति दी गई र्थीी; एच आर +ेविवल का "द गSेविर्टयर ऑफ द यू+ाइर्टेर्ड प्रोविवन्सेS ऑफ आगरा ए°र्ड अव*" (1905) सिSसमें यह कहा गया है विक रामकोर्ट में स्जिस्र्थी Sन्मस्र्थीा+ मस्जिन्दर पहले वि+म ही अखाड़ा संप्रदाय क े पास र्थीा, सिSसक े अवशेष अभी भी उन्हीं क े हैं। प्रदश: 9 - वाद 3: +रोत्तम दास द्वारा गोपाल (बाबू का पुत्र) क े पक्ष में वि+ष्पाविद Sन्मभूविम राम कोर्ट अयोध्या की र्थीेका दुका+ क े संबं* में 13 अX ू बर 1942 क े करार की प्रति; प्रदश: 10 - वाद 3: महं रघु+ार्थी दास द्वारा एक दुका+ क े संबं* में 29 अक्र्टूबर 1945 को विकया गया करार; प्रदश: 49 - वाद 4: महं रघु+ार्थी दास क े पक्ष में +ामां रर्ण प्रविवविष्ट; और र्डीर्डब्ल्यू -10 का बया+ - उमेश चंˆ पांर्डे द्वारा। आगे यह क: विदया गया विक Sबविक सुपुद:विग+ामा, सिSसक े द्वारा रिरसीवर +े कब्Sा प्राप्त विकया र्थीा, अणिभखिलखिख +हीं कर ा है विक विकसक े कब्Sा खिलया गया र्थीा, दस् ावेज़ बाहरी अहा े में वि+म ही अखाड़ा की उपस्जिस्र्थीति को इंविग mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर ा है। अं में यह कहा गया र्थीा विक *ारा 145 की काय:वाही में अं रिरम आदेश पारिर हो+े क े बाद, सेवा-पूSा "पहले की रह" Sारी रही और वि+म ही अखाड़ा क े पुSारिरयों द्वारा संचाखिल की गयी।

395. वि+म ही अखाड़ा +े कहा विक विववाविद स्र्थील पर वि+म ही अखाड़ा क े कई बैरागी की उपस्जिस्र्थीति प्रबं*+ अति*कारों क े प्रयोग का सबू है। इसका समर्थी:+ कर+े क े खिलए वि+म ही अखाड़ा वि+म्+खिलखिख पर अवलम्ब+ खिलया:  एर्डवर्ड: र्थीा+:र्ट+ (1854, ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी क े अन् ग: राज्यक्षेत्रों क े गSेविर्टयर) लगभग 500 बैराविगयों की उपस्जिस्र्थीति का उल्लेख कर े हैं;  पत्रांक विद+ांविक 29 +वंबर 1949: फ ै Sाबाद क े उस समय क े पुखिलस आयुX क ृ पाल सिंसह +े उपायुX क े. क े. +ायर को यह उल्लेख कर े हुए एक पत्र खिलखा विक प्रस् ाविव की:+ में "कई हSार हिंहदूओं, बैराविगयों और सा*ुओं को भाग ले+ा है।  पत्रांक विद+ांविक 16 विदसंबर 1949: क े. क े. +ायर (उपायुX और सिSलाति*कारी, फ ै Sाबाद) +े गोविवन्द +ारायर्ण को यह कह े हुए एक पत्र भेSा विक "इस साल विकसी समय संभव ः अक्र्टूबर या +वंबर में क ु छ कब्रों को स्पष्ट रूप से बैराविगयों द्वारा आंणिशक रूप से +ष्ट विकया गया र्थीा सिSस+े इस मठ से मुस्जिस्लम संगठ+ों को बहु +ाराS कर विदया"; और  वाद 1 में प्रदश: ए-64 क े रूप में तिचवि- वक्फ वि+रीक्षक की 23 विदसंबर 1949 की आख्या में बैराविगयों की उपस्जिस्र्थीति का संदभ: भी विदया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस संबं* में वि+म ही अखाड़ा द्वारा अवलम्ब खिलया गया साक्ष्य, अति*क से अति*क विववाविद स्र्थील पर वि+म ही अखाड़ा क े बैराविगयों की उपस्जिस्र्थीति का साक्ष्य दे ा है। यह विदखा+े क े खिलए कोई अन्य विवश्वस+ीय दस् ावेS या सबू पेश +हीं विकया गया र्थीा विक इ+ बैराविगयों +े वास् व में एक सेवाय क े प्रबं*+ क े अति*कारों का प्रयोग विकया र्थीा।

396. मीर रSब अली खा ीब द्वारा दायर 25 सिस ंबर 1866 की परिरवाद में कहा गया है विक यह ' ुलसीदास' क े खिखलाफ दायर विकया गया है। वि+म ही अखाड़ा +े यह साविब कर+े क े खिलए मौखिखक साक्ष्यों पर अवलम्ब+ खिलया विक ुलसीदास वास् व में वि+म विहयों क े महं र्थीे और वि+म ही अखाड़ा +े "कोठरी" का वि+मा:र्ण विकया। यह पहले ही अव*ारिर विकया गया है विक वि+मोविहयों द्वारा उ+क े दावे को प्रमाणिर्ण कर+े क े खिलए अवलम्ब खिलया गया मौखिखक साक्ष्य विवश्वस+ीय +हीं हैं। दस् ावेज़ स्वयं + ो यह साविब कर ा है विक ुलसीदास वि+म विहयों क े महं र्थीे और + ही यह विक वि+मा:र्ण वि+म विहयों द्वारा विकया गया र्थीा। यह उस समय सामान्य ः इस रह क े वि+मा:र्ण से Sुड़े विकसी अन्य दस् ावेSी साक्ष्य द्वारा पुष्ट +हीं विकया गया है और एक सेवाय क े रूप में अति*कारों क े प्रयोग का साक्ष्य +हीं दे ा है।

397. वाद 3 में प्रदश: 8, 9 और 10 से प ा चल ा है विक वि+म ही विववाविद ढाँचे पर आ+े वाले श्रद्धालुओं को विवणिभन्न सेवाएं प्रदा+ कर रहे र्थीे। हालांविक ी+ों प्रदश: विववाविद ढ़ाँचे क े बाहर इ+ सेवाओं को प्रदा+ कर+े की अ+ुमति दे+े से संबंति* हैं। इ+ प्रदशÂ से अति*क से अति*क यह प ा चल ा है विक वि+म ही विववाविद ढाँचे में और आसपास उपस्जिस्र्थी र्थीे और श्रद्धालुओं को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सहाय ा प्रदा+ कर े र्थीे। हालांविक यह मूर्ति यों या विववाविद स्र्थील पर विकसी प्रबं*+ का साक्ष्य +हीं दे ा है।

398. वि+म ही अखाड़ा क े महं क े रूप में रघुबर दास की भूविमका पर महत्वपूर्ण: अवलम्ब+ खिलया गया। इस संबं* में उपरोX संदर्भिभ वाद 1 में प्रदश: 24 (विकराए क े सं£ह क े खिलए दायर वाद विद+ांविक 8 +वंबर 1882), प्रदश: 28 (स्र्थील वि+रीक्षर्ण की मांग कर े हुए परिरवाद विद+ांविक 27 Sू+

1884) और प्रदश: ए-22 (रामचबू रा पर मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए दायर वाद 1885) पर अवलम्ब खिलया गया। यह क: विदया गया विक महं रघुबर दास +े उपरोX वाद वि+म ही अखाड़ा क े महं क े रूप में दायर विकए। इस आ*ार पर यह क: विदया गया विक वि+म ही अखाड़ा द्वारा देव ा का प्रबं*+ और प्रभार खिलया गया र्थीा। सूक्ष्म विवश्लेषर्ण से महं रघुबर दास क े संबं* में वि+म ही अखाड़ा क े रुख में कई विवरो*ाभासों का प ा चल ा है। 1885 क े वाद में महन् रघुबर दास +े "Sन्मस्र्थीा+, अयोध्या का महन् " हो+े का दावा विकया। वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर खिलखिख कÂ में यह कहा गया विक महं रघुबर दास +े 1885 का वाद व्यविXग क्षम ा में दायर विकया: ".... उX मुकदमा [1885] महन् रघुबर दास द्वारा वि+म ही अखाड़ा क े +ाम का उल्लेख विकए विब+ा, अप+ी व्यविXग क्षम ा में दायर विकया गया र्थीा और विकसी भी मामले में उX मुकदमे में विवषय संपखित्त (बाहरी अहा े में चबू रा), वाद-संपखित्त (आं रिरक अहा ा) से अलग र्थीी Sो विक ओओएस सं. 3 की विवषयवस् ु है।" (प्रभाव वर्ति* ) हालाँविक वक्फ वि+रीक्षक की आख्या विद+ांविक 23 विदसंबर 1949 की बा कर े हुए इन्ही खिलखिख कÂ में यह कहा गया र्थीा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "उन्हों+े अन्य लोगों क े सार्थी महं रघुबर दास क े +ाम का उल्लेख विकया है सिSन्हों+े मुसलमा+ों को बा ची क े खिलए आमंवित्र विकया र्थीा। महं रघुबर दास वि+म ही अखाड़े क े महं हैं।" (प्रभाव वर्ति* ) प्रत्युत्तर में, वि+म ही अखाड़ा +े महं रघुबर दास द्वारा मुकदमें क े बारे में कोई Sा+कारी हो+े से इ+कार विकया: "... वाविदयों को उX वाद क े बारें में Sा+कारी +हीं है, यविद कोई, Sन्म स्र्थीा+ क े महन् क े रूप में महन् रघुबर दास क े रूप में ज्ञा विकसी व्यविX द्वारा दायर विकया गया हो।" वाद 4 में वि+म ही अखाड़ा की ओर से दायर खिलखिख कर्थी+ में यह कहा गया र्थीा: "... स्वंय को Sन्म स्र्थीा+ क े महन् हो+े क े रूप में प्रस् ु कर े हुए महन् रघुबर दास क े रूप में ज्ञा विकसी व्यविX द्वारा दायर विकए गए विकसी वाद की, उत्तरदा ा प्रति वाविदयों को Sा+कारी +ही है..." 1885 क े वाद में महं रघुबर दास +े अयोध्या क े Sन्मस्र्थीा+ का महं हो+े का दावा विकया। इस न्यायालय क े सार्थी-सार्थी उच्च न्यायालय क े समक्ष मौखिखक सु+वाई में वि+म ही अखाड़ा +े दावा विकया विक महं रघुबर दास वि+म ही अखाड़ा क े महं र्थीे। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल वि+म्+खिलखिख अवलोक+ कर े हैं: "964. Sैसा विक हम+े पहले से ही ध्या+ विदया हैं, वि+म ही अखाड़ा द्वारा यह विववाविद +हीं विकया गया है विक 1885 में रघुबर दास वि+म ही अखाड़ा क े महं र्थीे..." उपरोX उद्धरर्ण से यह स्पष्ट है विक वि+म ही अखाड़ा +े महं रघुबर दास का वि+म ही अखाड़ा क े महं क े रूप में यह स्र्थीाविप कर+े क े खिलए समर्थी:+ विकया विक उन्हों+े 1800 क े दशक से सेवाय क े रूप में काम विकया है। विफर भी वे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्राङ्न्याय क े प्रश्न पर विवचार कर े समय स्वयं को महं से अलग कर ले े हैं। यहाँ क विक वि+म ही अखाड़ा +े कहा विक यह 1885 क े मुकदमे से अ+णिभज्ञ र्थीा। महं रघुबर दास क े संबं* में वि+म ही अखाड़ा का असंग रवैया उ+क े विवरूद्ध प्रति क ू ल वि+ष्कष: की ओर ले Sा ा है।

399. वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रस् ु दस् ावेSी साक्ष्य यह +हीं दशा: े हैं विक यह प्रश्नग संपखित्त का प्रबं*+ कर रहा र्थीा। उपरोX विवश्लेविष दस् ावेSी साक्ष्य क े अलावा, Sो वि+म ही अखाड़ा क े मामले को आगे +हीं बढ़ा ा है, वि+म ही अखाड़ा द्वारा प्रबं*+ अति*कारों क े प्रयोग को विदखा+े क े खिलए कोई साक्ष्य प्रस् ु +हीं विकया गया है। इक्का दुक्का काय:, एक वस् ु ः सेवाय क े अति*कारों और क:व्यों क े वि+म ही अखाड़ा द्वारा वि+रं र, अ+न्य और वि+बा:* प्रयोग को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए पया:प्त साक्ष्य +हीं दे े हैं। इस न्यायालय क े समक्ष मरम्म, वि+मा:र्ण, पुSारिरयों की वि+युविX या अन्य गति विवति*यों का साक्ष्य दे+े क े खिलए कोई दस् ावेS प्रस् ु +हीं विकया गया है। गौर लब है विक यावित्रयों क े विववरर्ण में इक्का दुक्का संदभ: क े अलावा, प्रबं*+ अति*कारों क े प्रयोग को विदखा+े क े खिलए वि+म ही अखाड़ा का कोई दस् ावेS अणिभलेख पर +हीं रखा गया है। वि+म ही अखाड़ा की प्रर्थीाओं को 19 माच: 1949 को ही एक पंSीक ृ विवलेख द्वारा खिलख विदया गया र्थीा।

400. Sब श्री एस क े Sै+ से सेवाय क े रूप में वि+म ही अखाड़ा क े दावे को स्र्थीाविप कर+े वाले मूल दस् ावेSों को प्रस् ु कर+े क े खिलए प्रश्न पूछा गया, ो यह क: विदया गया विक एक कणिर्थी र्डक ै ी क े कारर्ण दावे को प्रमाणिर्ण कर+े क े खिलए आवश्यक दस् ावेS खो गए। इस दावे को प्रमाणिर्ण कर+े क े खिलए, यह क: विदया गया विक *रम दास क े खिखलाफ 18 फरवरी 1982 को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एक प्रार्थीविमकी दS: की गई र्थीी। हालाँविक वि+म विहयों द्वारा प्रस् ु खिलखिख कर्थी+ में यह कहा गया है विक यद्यविप *रम दास दो मही+े क Sेल में रहे, लेविक+ बाद में एक समझौ े क े आ*ार पर मामले को रद्द कर विदया गया। एकल गवाह- राSा रामचन्ˆचाय: (र्डीर्डब्ल्यू 3/20) क े बया+ पर अवलम्ब ले+े क े अलावा इस दावे को प्रमाणिर्ण कर+े क े खिलए कोई दस् ावेS प्रस् ु +हीं विकया गया है। यह क: वि+म विहयों द्वारा प्रबं*+ अति*कारों क े प्रयोग क े विकसी प्रामाणिर्णक सबू क े अभाव को णिछपा+े क े खिलए एक प्रयास है, Sो उन्हें एक सेवाय की प्रास्जिस्र्थीति प्रदा+ कर+े क े खिलए है। का+ू+ में एक सेवाय की स्जिस्र्थीति अत्यति*क महत्व की है। सेवाय मूर्ति क े मा+वीय सेवक और संरक्षक हैं और इसक े अति*क ृ प्रति वि+ति* क े रूप में काय: कर े हैं। सेवाय में देव ा की ओर से काय:वाही कर+े का अति*कार वि+विह हो ा है और इस पर बाध्यकारी है। इस दृविष्ट से वि+म ही अखाड़ा का यह दावा विक यह एक वस् ु ः सेवाय है, अणिभलेख पर मौखिखक और दस् ावेSी साक्ष्यों क े आ*ार पर विवश्लेषर्ण विकया गया है और यह पाया गया है विक दावा सेवाय अति*कारों में +हीं परिरर्ण हो गया।

401. एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में अति*कारों का दावा इस सबू से प्रमाणिर्ण विकया Sा+ा चाविहए विक न्यास संपखित्त व्यविX क े अ+न्य कब्Sे में है और विकसी भी रह से विब+ा विकसी बा*ा या हस् क्षेप क े संपखित्तयों क े प्रबं*+ क े अति*कार पर पूर्ण: वि+यंत्रर्ण रख ा है। सभी व्यावहारिरक उद्देश्यों क े खिलए, इस व्यविX को न्यास संपखित्तयों क े प्रभारी व्यविX क े रूप में मान्य ा दी Sा ी है। हालांविक व:मा+ काय:वाही में इससे इ+कार +हीं विकया Sा सक ा है और इस बा से इ+कार +हीं विकया गया है विक वि+म ही अखाड़ा विववाविद स्र्थील mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर मौSूद र्थीा, वि+म ही अखाड़ा का दावा अति*क से अति*क कु छ प्रबं*+ अति*कारों क े अवि+यविम प्रयोग का है। उ+क े अति*कार परिरव्यापी र्थीे, सिSसमें सामान्य ः श्रद्धालुओं की सहाय ा शाविमल र्थीी और उ+को लगा ार चु+ौ ी दी गयी र्थीी। Sैसा विक ऊपर अव*ारिर विकया गया है, प्रबं*+ अति*कारों क े इक्का दुक्का काय: या अवि+यविम प्रयोग एक दावेदार को का+ू+ में एक वस् ु ः सेवाय की स्जिस्र्थीति प्रदा+ +हीं कर े है। यह +हीं कहा Sा सक ा है विक वि+म ही अखाड़ा क े काय: प्रभार और प्रबं*+ क े का+ू+ी मा+क को सं ुष्ट कर े हैं Sो पया:प्त समयावति* में अ+न्य, वि+बा:* और वि+रं र हैं। विववाविद स्र्थील पर उ+की वि+र्मिववाद उपस्जिस्र्थीति क े बावSूद, ऊपर उसिल्लखिख कारर्णों क े खिलए, वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय +हीं है।

402. इस अव*ारर्ण क े आलोक में विक विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम की मूर्ति यों क े खिलए वि+म ही अखाड़ा सेवाय +हीं है, यह एक विह बद्ध उपासक क े खिलए देव ा की ओर से मुकदमा कर+े क े खिलए खुला र्थीा। विवति* में कोई मान्य ा प्राप्त सेवाय +हीं र्थीा। ऐसी स्जिस्र्थीति में मूर्ति का मुकदमा कर+े का स्व ंत्र अति*कार, इसक े वाद विमत्र, मूर्ति की सुरक्षा और उसक े विह ों में रुतिच रख+े वाले उपासक क े माध्यम से प्रयोग विकया गया। वाद 5 ऐसे वाद क े रूप में पोषर्णीय है Sो एक विवति*पूर्ण: मान्य ा प्राप्त सेवाय की अ+ुपस्जिस्र्थीति में प्रर्थीम र्थीा विद्व ीय वाविदयों की ओर से एक वाद विमत्र द्वारा संस्जिस्र्थी हो।

403. व:मा+ अपील में प्रत्यर्थी- 12, महन् श्री *रम दास की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री Sयदीप गुप्ता +े कहा विक वह स्वग-य बाबा अणिभराम दास क े उत्तराति*कारी (चेला) हैं, Sो 1949 से पहले राम Sन्मभूविम क े पुSारी र्थीे। व:मा+ प्रत्यर्थी- अखिखल भार ीय श्री पंच वि+वा:र्णी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ+ी अखाड़ा और ह+ुमा+ गढ़ी, अयोध्या क े महं हैं। स्वग-य बाबा अणिभराम दास वाद 4 में प्रति वादी संख्या 13/1 और वाद 5 में प्रति वादी संख्या 14 र्थीे और उ+की मृत्यु पर, व:मा+ प्रति वादी को उX मुकदमों में प्रति वादी क े रूप में प्रति स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। यह कहा गया है विक स्वग-य बाबा अणिभराम दास Sन्मस्र्थीा+ मंविदर क े पुSारी र्थीे और उन्हों+े इसक े मामलों में महत्वपूर्ण: भूविमका वि+भाई र्थीी। यह प्रस् ु विकया गया है विक 1949 से पहले, स्वग-य बाबा अणिभराम दास +े पूSा की और विववाविद ढाँचे क े अंदर मूर्ति को रख+े क े बाद भी, उन्हों+े 5 S+वरी 1950 क ब क पूSा कर+ा Sारी रखा Sब रिरसीवर +े काय:भार संभाला। यह कहा गया है विक व:मा+ प्रति वादी स्वग-य बाबा अणिभराम दास का चेला हो+े क े +ा े, सेवाय क े रूप में विववाविद ढाँचे में भोग और सेवा पूSा कर+े का हकदार है। उपरोX क े समर्थी:+ में, वि+म्+खिलखिख क: विदए गए हैं:  भगवा+ राम की मूर्ति को 22-23 विदसंबर, 1949 की मध्यरावित्र में विववाविद ढांचे में रखा गया र्थीा। ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े अंदर रखे Sा+े क े बाद देव ा (प्रति विष्ठ ) और रामSन्मभूविम (स्वयंभू) विवति*क व्यविX हैं और विववाविद ढाँचे पर अति*कार व हक रख ा है;  वि+म ही अखाड़ा अप+ी दलीलों में अप+ी मौSूदगी से इ+कार कर+े क े बाद न्यातियक इकाईयों क े संबं* में सेवाय हो+े का दावा +हीं कर सक ा है। Sब यह घर्ट+ा 22-23 विदसंबर की मध्यरावित्र में हुई, ो वि+म ही अखाड़ा का कोई व्यविX वहां मौSूद +हीं र्थीा और काय:वाही में वि+म ही अखाड़ा क े विकसी भी सदस्य को अणिभयुX क े रूप में +ाविम +हीं विकया गया र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  प्रति वादी एकमात्र व्यविX है Sो Sन्मभूविम और राम लला क े मठ का सेवाय हो+े का दावा कर सक ा है। प्रत्यर्थी- क े गुरु स्वग-य बाबा अणिभराम दास +े कई अन्य लोगों क े सार्थी 2 अक्र्टूबर 1949 को हुई एक साव:Sवि+क बैठक में विवSयादशमी क े अवसर पर सामूविहक प्रति ज्ञा लेकर पविवत्र Sन्मस्र्थीा+ को उसकी प्राची+ मविहमा को बहाल कर+े का संकल्प खिलया, सिSसक े अ+ुसरर्ण में विववाविद स्र्थील क े चारो ओर क े आसपास क्षेत्र को साफ कर विदया गया र्थीा। इसक े बाद ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े अंदर और बाहर +वह+ा पर्थी, Sाप और संकी:+ विकया गया।  Sब क कोई सेवाय है ब क देव ा का प्रबं*+ वाद 5 में वाद विमत्र या राम Sन्मभूविम न्यास को +हीं सौंपा Sा सक ा। वाद 1 और वाद 5 दो+ों व्यविXग क्षम ा में दायर विकए गए हैं और उन्हें कोई प्रबं*+ या कब्Sा +हीं सौंपा Sा सक ा है; और  यह थ्य विक स्वग-य बाबा अणिभराम दास देव ा क े पुSारी/पुरोविह / सेवाय र्थीे, इसे वि+म्+खिलखिख थ्यों और अणिभलेखों से स्र्थीाविप विकया गया हैं:  वाद 4 में श्री भास्कर दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/1), Sो वि+म ही अखाड़ा क े सरपंच र्थीे, उन्हो+ें अप+ी सिSरह में कहा और पुविष्ट की विक स्वग-य बाबा अणिभराम दास विववाविद ढाँचे क े पुSारी र्थीे, + विक वि+म ही अखाड़ा क े पुSारी र्थीे।  *ारा 145 क े अ*ी+ मसिSस्र्ट्रेर्ट क े समक्ष विदए गए 29 विदसंबर, 1950 क े अप+े बया+ में, स्वग-य बाबा अणिभराम दास +े स्पष्ट रूप से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कहा र्थीा विक वह और उ+क े अन्य सह-पुSारी 1934 से Sन्मभूविम मंविदर और आसपास की भूविम का रखरखाव और प्रबं*+ कर रहे र्थीे;  उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रत्यर्थी- +े कहा विक विववाविद परिरसर में विवणिभन्न *ार्मिमक क ृ त्य उ+क े गुरु, स्वग-य बाबा अणिभराम दास की देखरेख में आयोसिS विकए गए र्थीे और उ+क े +ाम पर विवद्यु क+ेक्श+ भी र्थीे;  मोहम्मद हाणिशम, Sो वाद 4 में वादी संख्या 7 और वाद 5 में प्रति वादी संख्या 3 है, उस+े अप+ी सिSरह में कहा विक मूर्ति यों को मस्जिस्Sद क े अंदर अणिभराम दास, *रम दास और अन्य द्वारा रखा गया र्थीा;  30 अप्रैल, 1992 को, वाद 5 में वादी संख्या 3 स्वग-य देवकी +ंद+ अ£वाल +े कहा र्थीा विक मूर्ति को क े न्ˆीय गुंबद क े अंदर 22-23 विदसंबर, 1949 को श्री परमहंस रामचंˆ और स्वग-य बाबा अणिभराम दास +े अन्य लोगों क े सार्थी रखा र्थीा;  स्वग-य बाबा अणिभराम दास को 23 विदसंबर, 1949 की दो+ों एफआईआर में और विववाविद ढाँचे क े अंदर मूर्ति रख+े क े खिलए विद+ांक 1 फरवरी, 1950 क े आरोप पत्र में अणिभयुX संख्या 1 क े रूप में +ाविम विकया गया है। स्वग-य बाबा अणिभराम दास +े कहा है विक वह 1 फरवरी 1950 क े Sमा+ पत्र में राम Sन्मभूविम क े पुSारी हैं;  सिSला अति*कारी, फ ै Sाबाद +े विद+ांक 23 विदसंबर, 1949 की अप+ी आख्या में यह म व्यX विकया विक विववाविद ढाँचे क े भी र मूर्ति को भोग दे+े क े खिलए अणिभराम दास, राम शुक्ल दास और सुदश:+ दास mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सविह दो या ी+ व्यविXयों को अ+ुमति देकर भीड़ को वि+यंवित्र विकया गया र्थीा; और  21 विदसंबर, 1962 क े एक आवेद+ द्वारा, स्वग-य बाबा अणिभराम दास +े 62 Sयं ी समरोह क े काय:क्रम क े आयोS+ क े खिलए रिरसीवर क े समक्ष अ+ुमति क े खिलए आवेद+ विकया। ऐसा कहा Sा ा है विक उX समरोह प्रत्येक वष: आयोसिS विकया गया र्थीा और स्वग-य बाबा अणिभराम दास और Sन्म भूविम सेवा सविमति द्वारा आयोसिS विकया गया।

404. वि+म ही अखाड़ा और वि+वा:र्णी अवि+ अखाड़ा क े मध्य विववाद मौSूदा विववाद की विवषय वस् ु +ही है। वि+वा:र्णी अवि+ अखाड़ा +े अप+ा दावा स्र्थीाविप कर+े क े खिलए अप+ी कोई काय:वाही +हीं की है। यह दावा विक वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय र्थीा, इसको अस्वीकार कर विदया गया है। वि+म ही अखाड़ा क े दावे पर चचा: कर े हुए, यह मा+ा गया है विक एक सेवाय क े रूप में दावा स्र्थीाविप कर+े क े खिलए या यहां क विक एक वस् ु ः सेवाय क े रूप में दावा स्र्थीाविप कर+े क े खिलए, ऐसे सबू ों पर अवलम्ब रख+े की आवश्यक ा हो ी है Sो क े वल पुSारी क े कायÂ को कर+े क े अलावा अति*क काय: कर+े को दशा: ा हो। पुSारी क े वल एक सेवाय का वि+युX विकया गया व्यविX या एक सेवक है और समयावति* क े दौरा+ अ+ुष्ठा+ों को कर+े क े बावSूद एक सेवाय क े रूप में कोई स्व ंत्र अति*कार प्राप्त +हीं कर ा है। स्वग-य बाबा अणिभराम दास क े दावे का समर्थी:+ कर+े क े खिलए अवलम्ब खिलए गए सभी साक्ष्य विववाविद परिरसर में उ+क े पूSा कर+े क ही सीविम है और उ+को कोई सेवाय अति*कार प्रदा+ +हीं कर े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ए+. 7 वाद 5 में परिरसीमा

405. वाद 5 को संस्जिस्र्थी कर+े क े खिलए वाद हे ूक, वाद पत्र क े प्रस् र 14, 18, 30 और 36 में अणिभकणिर्थी विकए गए हैं Sो इस प्रकार हैं: “14. यह विक उX मुकदमों की सु+वाई और वि+स् ारर्ण में लंबे समय क देरी और मंविदर क े मामलों क े विबगड़ े प्रबं*+ से वादी देव ा और उ+क े भX बहु दुखी हैं, विवशेष रूप से उपासकों द्वारा दी Sा+े वाली *+राणिश, Sो बड़ी संख्या में आ े हैं, इसे पुSारी और अन्य मंविदर कम:चारिरयों द्वारा गल रीक े से विकया Sा रहा है, और रिरसीवर +े इस बुराई को वि+यंवित्र +हीं विकया है। वादी देव ाओं क े भX अयोध्या में श्री राम Sन्म भूविम क े पुरा+े ढाँचें को हर्टाकर उसकी प्राची+ मविहमा को लौर्टा+े क े खिलए श्री राम Sन्म भूविम क े एक +ये मस्जिन्दर वि+मा:र्ण क े इच्छ ु क हैं।...

18. यह विक यद्यविप पूव X मुकदमे इ +े असा*ारर्ण रूप से लंबे समय से विवचारर्ण क े खिलए लंविब रहे हैं, वे अपया:प्त हैं और विववाद क े वि+पर्टारे का परिरर्णाम +हीं दे सक े हैं, सिSसक े कारर्ण उ+का संस्र्थी+ हुआ या वहां से उत्पन्न समस्याएँ, सिS +ा विक + ो भगवा+ श्री राम विवराSमा+ और + ही अस्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम क े पीठासी+ देव ा, इसमें वादी सं. 1 और 2, Sो दो+ों न्यातियक व्यविX हैं, को इसमें योसिS विकया गया र्थीा, हालांविक उ+का अप+ा स्वयं का एक अलग व्यविXत्व है, Sो उ+क े उपासकों और सेवकों से अलग है, और उसक े क ु छ वास् विवक पक्षकार, Sो उपासक हैं, क ु छ हद क वादी देव ा की उपास+ा का वि+यंत्रर्ण प्राप्त करक े उ+क े व्यविXग विह ों को पूरा कर+े की मांग कर+े में संखिलप्त हैं। इसक े अलावा, श्रीराम Sन्म भूविम, अयोध्या और इससे संलग्न भूविम व भव+ व अन्य चीSों से संबंति* विववाद क े उतिच वि+*ा:रर्ण क े खिलए, वादी देव ाओं क े दृविष्टकोंर्ण से इ+ चार दशकों क े दौरा+ हुई घर्ट+ाओं और कई भौति क थ्यों और का+ू+ क े हिंबदुओं को अणिभकणिर्थी विकए Sा+े की आवश्यक ा है। द+ुसार वादी को अप+ा +या मुकदमा दायर कर+े की सलाह दी गई है।... mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

30. यह विक हिंहदू S+ ा और वादी देव ाओं क े भXों, सिSन्हों+े स्वं त्र भार में राम-राज्य की स्र्थीाप+ा, अर्थीा: ् *म: और +ीति परायर्ण ा का शास+, का सप+ा देखा र्थीा, सिSसक े प्र ीक मया:दा पुरुषोत्तम श्री रामचंˆ Sी महाराS र्थीे, महात्मा गां*ी द्वारा हमें दी गई उस राष्ट्रीय आकांक्षा क े पहले चरर्ण क े रूप में, इसकी प्राची+ मविहमा को लौर्टा+े क े खिलए उत्सुक रहे हैं। इसे प्राप्त कर+े क े खिलए वे साव:Sवि+क रूप से +ागर शैली में एक भव्य मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए आंदोल+ कर रहे हैं। सोम+ार्थी मंविदर का वि+मा:र्ण कर+े वाले वास् ुविवदों क े परिरवार द्वारा ही प्रस् ाविव मंविदर का ढाँचा और मॉर्डल ैयार कर खिलया गया हैं। सविक्रय आंदोल+ 30 सिस ंबर, 1989 से शुरू कर+े की योS+ा है और यह घोविष विकया गया है विक +ए मंविदर भव+ की आ*ारणिशला 9 +वंबर, 1989 को रखी Sाएगी।...

36. यह विक इस मुकदमे क े खिलए वाद हे ूक विद+-प्रति विद+ बढ़ रहा है, विवशेष रूप से हाल ही में Sब क ु छ मुस्जिस्लम सम्प्रदातियकों की रफ से हिंहसक कार:वाई द्वारा मंविदर पु+र्मि+मा:र्ण की योS+ाओं को बाति* कर+े की मांग की Sा रही है।" (प्रभाव वर्ति* ) वाद हे ूक क े उपरोX प्रकर्थी+ में वि+म्+खिलखिख घर्टक शाविमल हैं: (i) वाद 1, 3 और 4 की सु+वाई और वि+स् ारर्ण में लम्बे समय क विवलम्ब; (ii) मंविदर क े विक्रयाकलापों क े प्रबं*+ में विवफल ा और उसे वि+यंवित्र कर+े में रिरसीवर की विवफल ा; (iii) उपासकों क े चढ़ावे को पुSारिरयों और मंविदर कम:चारिरयों द्वारा गल रीक े से प्रयोग विकया गया है; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) पहले और दूसरे वादी, सिS+क े बारे में विवति*क व्यविX हो+े का दावा विकया Sा ा है, उ+को आरंणिभक वादों में पक्षकार क े रूप में योसिS +हीं विकया गया र्थीा; (v) उपासक और सेवक र्थीा वाद क े कु छ पक्षकार देव ाओं की पूSा को वि+यंवित्र कर+े क े खिलए अप+े वि+Sी विह को पूरा कर+े की मांग कर रहे हैं; (vi) विहन्दू भX एक +ए मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए आंदोल+ कर रहे हैं सिSसक े खिलए योS+ाएं ब+ाई गई हैं; और (vii) "क ु छ मुसलमा+ सांप्रदातियकों की रफ से हिंहसक काय:वाही द्वारा " पु+र्मि+मा:र्ण की योS+ाओं को बाति* कर+े की माँग की गयी है।

406. अयोध्या में श्री राम Sन्मभूविम क े पूरे परिरसर, Sैसा विक वादी देव ाओं से संबंति* अ+ुलग्नक I, II और III में वर्भिर्ण और दर्भिश विकया गया है, और परिरर्णामी शाश्व व्यादेश की उद्घोषर्णा क े खिलए वाद 5 संस्जिस्र्थी विकया गया। वादी देव ाओं क े खिलए और परिरर्णामी स्र्थीायी वि+षे*ाज्ञा क े खिलए है। अ+ुलग्नक I, II और III को "णिशव शंकर प्लीर्डर द्वारा ैयार, सार्थी ही उ+की आख्या विद+ांविक 25.05.1950 में भव+ परिरसर क े दो साइर्ट योS+ाओं और श्री राम Sन्म भूविम क े रूप में ज्ञा संलग्न क्षेत्र " क े रूप में प्रस् र 2 में वर्भिर्ण विकया गया र्थीा। र्डॉ एम इस्माइल फारुकी ब+ाम भार संघ238 में इस न्यायालय की संविव*ा+ पीठ क े फ ै सले क े बाद, विववाद को आं रिरक और बाहरी अहा े में शाविमल क्षेत्र क सीविम विकया गया है। वाद 5, विद+ांक 1 Sुलाई 1989 को संस्जिस्र्थी विकया गया, इस ति र्थीी को परिरसीमा अति*वि+यम 1963 लागू र्थीा। 238 (1994) 6 एससीसी 360 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दलीलें

407. परिरसीमा का वS:+ स्र्थीाविप कर े हुए, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ राSीव *व+ +े वि+म्+खिलखिख कर्थी+ों को रेखांविक विकया: (क) परिरसीमा अति*वि+यम, 1963 की *ारा 10 व:मा+ मामले में प्रयोज्य +हीं है क्योंविक विकसी ऐसे व्यविX क े विवरुद्ध, सिSसमें संपखित्त विकसी विववि+र्मिदष्ट प्रयोS+ क े खिलए न्यास में वि+विह हो गई है, या उसक े विवति*क प्रति वि+ति* को या सम+ुदेणिशति यों क े विवरूद्ध (विवति* सम्म प्रति फल से णिभन्न) उसक े या उ+क े हस् ग ऐसी संपखित्त या उसक े आगमों क े अ+ुगामी या उस संपखित्त या उसक े आगम क े लेखा क े खिलए, वाद को यह उपबन्* लागू हो ा है; (ख) Sब देव ा को इसक े सेवाय – वि+म ही अखाड़ा- क े माध्यम से "अच्छी रह से प्रति वि+ति*त्व" विकया Sा रहा र्थीा, ब वाद संस्जिस्र्थी +हीं विकया Sा सक ा र्थीा और कदाचार पर आ*ारिर णिशकाय क े कारर्ण सेवाय को हर्टा+े की कोई मांग +हीं की गई है। (ग) यह प्रति रक्षा विक देव ा स्र्थीायी रूप से अवयस्क है, वाद 5 में वाविदयों की इस कारर्ण सहाय ा +हीं करेगा विक मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व सेवाय द्वारा विकया गया र्थीा और वाद क े वल भी उपासक द्वारा वाद विमत्र क े रूप में संस्जिस्र्थी विकया Sा सक ा है Sब सेवाय देव ा क े विह क े प्रति कू ल काय: कर ा पाया Sा ा है। हालांविक वाद विमत्र द्वारा सेवाय क े विवरूद्ध कोई आरोप +हीं लगाया गया है; (घ) यह विवति* का स्र्थीाविप सिसद्धां है विक परिरसीमा शाश्व अवयस्क क े विवरुद्ध चल ी है; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ङ) वाद 5 पोषर्णीय +हीं है क्योंविक इसको संस्जिस्र्थी कर+े क े खिलए कोई वाद हे ुक +हीं र्थीा अन्यर्थीा भी परिरसीमा अति*वि+यम क े Sो भी प्राव*ा+ लागू हो े हैं, वाद 5 को परिरसीमा द्वारा अपवर्जिS कर विदया Sाएगा। 23 सिस ंबर 2019 को र्डॉ. *व+ +े अप+े मौखिखक कÂ क े दौरा+ श्री परासर+ क े परिरसीमा क े कÂ पर प्रति विक्रया व्यX की। ऐसा कर े समय, र्डॉ. *व+ इस आ*ार पर आगे बढ़े विक श्री परासर+ +े यह कह े हुए परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 10 का लाभ मांगा र्थीा विक मुकदमा परिरसीमा क े अन् ग: र्थीा। इसक े बाद 24 सिस ंबर 2019 को, इस न्यायालय क े वS:+ (परिरसीमा) की वि+ष्पक्ष परंपरा में, र्डॉ. *व+ +े स्पष्ट विकया विक उन्हें श्री परासर+ द्वारा सूतिच विकया गया र्थीा विक वह *ारा 10 का लाभ +हीं उठा रहे र्थीे और उस प्राव*ा+ का लाभ +हीं मांग रहे र्थीे। अ ः र्डॉ. *व+ +े कहा विक *ारा 10 क े ह कÂ को उ+क े द्वारा विदए गए कÂ क े रूप में पढ़ा Sाए।

408. श्री परासर+ +े कहा विक प्रति वादी-सुन्नी वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश र्डॉ. *व+ क े क: इस आ*ार पर आगे बढ़ े है विक वादी न्यातियक व्यविX +हीं हैं और वि+म ही अखाड़ा क े महं प्रर्थीम व विद्व ीय वादी दो+ों क े खिलए एक वै* सेवाय हैं। परिरसीमा क े मुद्दे पर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों +े सव:सम्मति से वादी क े पक्ष में अव*ारिर विकया (सिसवाय इसक े विक न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े यह अणिभवि+*ा:रिर +हीं विकया विक क्या दूसरी वादी एक न्यातियक व्यविX है)। इसखिलए श्री परासर+ +े कहा विक परिरसीमा का मुद्दा वाद 5 में विववाद्यक 1, 6 और 8239 पर इस न्यायालय क े वि+ष्कषÂ पर वि+भ:र करेगा और इस प्रसंग में विक ये विववाद्यक वाद 5 में वादी क े पक्ष में 239 विववाद्यक 1: क्या प्रर्थीम और विद्व ीय वादी न्यातियक व्यविX हैं। विववाद्यक 6: क्या ृ ीय वादी को वादी 1 और 2 क े वाद विमत्र क े रूप में प्रति वि+ति*त्व कर+े का हकदार है और क्या इस कारर्ण वाद सक्षम +ही है। विववाद्यक 8: क्या प्रति वादी वि+म ही अखाड़ा विववाविद ढाँचेें में स्जिस्र्थी भगवा+ श्री राम का "सेवाय " है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अव*ारिर विकए गए हैं, परिरर्णामस्वरूप प्रति वाविदयों का हमला परिरसीमा से वर्जिS हो+े क े कारर्ण विवफल हो Sाएगा।

409. आरंभ में, यह अणिभखिलखिख कर+ा आवश्यक है विक व:मा+ वि+र्ण:य क े अ+ुक्रम में, यह अव*ारिर विकया गया है विक: (i) वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय हो+े क े अप+े मामले को स्र्थीाविप कर+े में विवफल रहा है; (ii) पहले(i) क े परिरर्णामस्वरूप, वाद 5 की पोषर्णीय ा को इस आ*ार पर चु+ौ ी विक सेवाय क े रूप में क े वल वि+म ही अखाड़ा द्वारा ही वाद संस्जिस्र्थी विकया Sा सक ा र्थीा, यह विवफल हो+ा चाविहए; और (iii) वाद 5 में प्रर्थीम वादी एक न्यातियक व्यविX है। इसखिलए परिरसीमा क े मुद्दे को उपरोX स्जिस्र्थीति क े आ*ार पर संबोति* विकया Sाएगा। अवि+वाय: रूप से, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े अप+े कÂ क े दौरा+ ी+ व्यापक आ*ारों पर परिरसीमा पर उच्च न्यायालय क े वि+ष्कषÂ को चु+ौ ी दी: (i) वाद 5 को ब संस्जिस्र्थी +हीं विकया Sा सक ा र्थीा, Sब देव ा का उसक े सेवाय क े माध्यम से 'अच्छी रह से प्रति वि+ति*त्व' विकया Sा रहा र्थीा, सिSसक े आचरर्ण क े खिखलाफ कोई णिशकाय +हीं है और चूंविक सेवाय को हर्टा+े की मांग +हीं की गई है; (ii) शाश्व अवयस्क हो+े क े कारर्ण देव ा का बचाव, वादी की सहाय ा +हीं कर सक ा है क्योंविक देव ा का प्रति वि+ति*त्व एक सेवाय द्वारा विकया Sा रहा है और एक वाद विमत्र द्वारा वाद भी विकया Sा सक ा है Sब सेवाय +े देव ा क े विह क े प्रति क ू ल काय: विकया हो; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) यह विवति* का स्र्थीाविप सिसद्धां है विक परिरसीमा क े प्रयोS+ क े खिलए देव ा अवयस्क +हीं है। ऊपर उसिल्लखिख पहला और दूसरा आ*ार अब इस वि+ष्कष: पर पहुंच गया है विक वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय +हीं र्थीा और इसखिलए वाद 5 को वाद विमत्र की ओर से पोषर्णीय हो+ा अव*ारिर विकया गया है। इस चरर्ण पर Sो मुद्दा विवचार क े खिलए आ ा है, वह यह है विक क्या वाद 5 को इस आ*ार पर परिरसीमा क े भी र हो+ा अव*ारिर विकया Sा सक ा है विक देव ा एक शाश्व अवयस्क है। इसे विफर से दोहरा+ा आवश्यक है विक वाद 5 में वादी की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री सी एस वैद्य+ार्थी+ का क: क े वल प्रर्थीम वादी को शासिस करेगा सिSसे एक न्यातियक व्यविX मा+ा गया है। विवश्राम की एक विवति*

410. परिरसीमा की विवति* एक ऐसे क़ा+ू+ में सतिन्नविह है Sो विवश्राम या शांति क े सिसद्धां आ*ारिर है, Sैसा विक इस न्यायालय द्वारा पुंर्डखिलक Sालम पाविर्टल ब+ाम अति*शाषी अणिभयं ा, Sलगांव मध्यम परिरयोS+ा240 में अव*ारिर विकया गया। "परिरसीमा का असीविम और शाश्व ख रा, असुरक्षा और अवि+तिश्च ा पैदा कर ा है; साव:Sवि+क व्यवस्र्थीा क े खिलए विकसी प्रकार की परिरसीमा आवश्यक है...” परिरसीमा अति*वि+यम क े प्राव*ा+ों की प्रयोज्य ा को सादृश्य या वि+विह ार्थी: द्वारा विवस् ारिर +हीं विकया Sा सक ा है। शाश्व दावे का अति*कार एक 240 (2008) 17 एससीसी 448 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवणिशष्ट स्जिस्र्थीति में सतिन्नविह है सिSसे *ारा 10 में संदर्भिभ विकया गया है और प्राव*ा+ क े दायरे को वि+विह ार्थी: क े मामले क े रूप में +हीं बढ़ाया Sा सक ा है। 1929 से पहले, *ारा 10 को वि+म्+खिलखिख शब्दों में रखा गया र्थीा: “10. न्यासिसयों और उ+क े प्रति वि+ति*यों क े विवरूद्ध वाद- इस अति*वि+यम क े पूव:गामी उपबन्*ों में अन् र्मिवष्ट विकसी बा क े हो े हुए भी, विकसी ऐसे व्यविX क े विवरूद्ध, सिSसमें संपखित्त विकसी विववि+र्मिदष्ट प्रयोS+ क े खिलए न्यास वि+विह हुई हो अर्थीवा उसक े विवति*क प्रति वि+ति*यों या सम+ुदेणिशति यों क े विवरूद्ध (Sो मूल्यवा+ प्रति फलार्थी: सम+ुदेणिश ी + हों) उसक े या उ+क े हस् ग ऐसी संपखित्त या उसक े आगमों क े अ+ुगामी प्रयोS+ से या उस संपखित्त या उसक े आगमों क े लेखा क े खिलए कोई वाद विक +ा भी समय बी Sा+े क े कारर्ण वर्जिS + होगा।" भार ीय परिरसीमा (संशो*+) अति*वि+यम 1929 (वष: 1929 का 1) द्वारा *ारा 10 में एक स्पष्टीकरर्ण Sोड़कर संशो*+ विकया गया। यर्थीा संशोति*, प्राव*ा+ वि+म्+ प्रकार है: “10. अणिभव्यX न्यासिसयों और उ+क े प्रति वि+ति*यों क े विवरूद्ध वाद - इसमें ए स्जिस्म+पूव: अन् र्मिवष्ट विकसी बा क े हो े हुए भी, विकसी ऐसे व्यविX क े विवरूद्ध, सिSसमें संपखित्त विकसी विववि+र्मिदष्ट प्रयोS+ क े खिलए न्यास वि+विह हो गई हो अर्थीवा उसक े विवति*क प्रति वि+ति*यों क े या सम+ुदेणिशति यों क े विवरूद्ध (Sो मूल्यवा+ प्रति फलार्थी: सम+ुदेणिश ी + हो) उसक े या उ+क े हस् ग ऐसी संपखित्त या उसक े आगमों क े अ+ुगामी प्रयोS+ से या उस संपखित्त या उसक े आगमों क े लेखा क े खिलए कोई वाद विक +ा भी समय बी Sा+े क े कारर्ण वर्जिS + होगा।"

411. संशो*+ की पृष्ठभूविम को विवद्या वरूणिर्थी ीर्थी: ब+ाम बालुसामी अय्यर241 में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य पर विवचार करक े समझा Sा ा है। संपखित्त क े अं रर्ण से वि+पर्ट े हुए, वि+र्ण:य का व्यापक वि+विह ार्थी: र्थीा, सिSसक े कारर्ण 1929 में वै*ावि+क परिरव:+ हुए। विप्रवी काउंसिसल +े अव*ारिर विकया: 241 एआईआर 1922 पीसी 123 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "विहन्दू और मुस्जिस्लम पू: संस्र्थीा+ों से संबंति* सामान्य विवति* की उपयु:X समीक्षा, प्रर्थीम दृष्ट या इसका अ+ुसरर्ण करेगी विक एक प्रबं*क या विकसी भी +ाम क े वरिरष्ठ द्वारा अन् रर्ण को न्यासी क े काय: क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है सिSसे न्यास में संपखित्त दी गई है और उसक े आ*ार पर उसमें वि+विह क्षम ा है, Sो आंग्ल विवति* में एक "न्यासी" को प्राप्त है। बेशक, एक हिंहदू या एक मुस्जिस्लम विकसी विवणिशष्ट व्यविX को एक विवणिशष्ट और वि+तिश्च उद्देश्य क े खिलए एक विवणिशष्ट संपखित्त न्यास में दे सक ा है, और स्वयं को अणिभव्यX रूप से अांग्ल विवति* क े अ*ी+ कर सक ा है, Sब वह व्यविX सिSसे विवति*क स्वाविमत्व हस् ां रिर विकया Sा ा है, ो वह विवणिशष्ट अर्थी: में एक न्यासी ब+ Sाएगा।" (प्रभाव वर्ति* ) प्रबन्*क द्वारा अन् रर्ण एक ऐसे न्यासी का क ृ त्य +हीं मा+ा गया सिSसे न्यास में संपखित्त उसी अर्थी: में दी गयी हो सिSस अर्थी: में इस पद का आंग्ल विवति* में प्रयोग विकया गया र्थीा। 1929 क े संशो*+ क े फलस्वरूप, एक अणिभगृविह कल्प+ा पेश की गयी र्थीी, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप एक हिंहदू, मुस्जिस्लम या बौद्ध *ार्मिमक या *मा:र्थी: *म:दाय में शाविमल संपखित्त को एक विवणिशष्ट उद्देश्य क े खिलए न्यास में वि+विह संपखित्त मा+ा गया। *ारा 10 वि+म्+ क े विवरूद्ध दायर मुकदमों पर लागू हो ी है: (i) कोइ: व्यविX, सिSसमें संपखित्त विकसी विवणिशष्ट प्रयोS+ क े खिलए न्यास में वि+विह हो गइ: है; और (ii) विवति*क प्रति वि+ति* और ऐसे न्यासी क े सम+ुदेणिश ी। हालांविक, यह मूल्यवा+ विवचार क े खिलए इस रह क े न्यासी क े समुदेणिश ी को कवर +हीं कर ा है। वाद वि+म्+ उद्देश्य क े खिलए दायर विकया Sा सक ा है: (i) न्यासी क े हस् ग ऐसी संपखित्त का; (ii) न्यासी क े हस् ग ऐसी संपखित्त क े आगमों का; और (iii) ऐसी संपखित्त या आगमों क े लेखे क े खिलए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA *ारा 10 क े शुरुआ ी शब्दों में "क े द्वारा या क े विवरूद्ध" Sैसे शब्दों की अ+ुपस्जिस्र्थीति महत्वपूर्ण: है। दूसरे शब्दों में, यह *ारा न्यासी द्वारा ीसरे पक्ष क े विवरूद्ध विकए गए वादों पर लागू +हीं हो ी है। (इस संदभ: में पलावि+अंदी £ाम+ी मणिर्णकम्मल वी ब+ाम मुरुगप्पा £ाम+ी242 में मˆास उच्च न्यायालय की ख°ड़पीठ का वि+र्ण:य भी देखें)। *ारा 10, वाद 5 पर प्रयोज्य +हीं है। शाश्व अवयस्क ा का क:

412. वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा श्री सी. एस वैद्य+ार्थी+ +े कहा विक मूर्ति विवति*क कल्प+ा द्वारा अवयस्क है। इसखिलए अवयस्क क े खिखलाफ कोई प्रति कू ल हक हासिसल +हीं विकया Sा सक ा है। विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा, र्डॉ. राSीव *व+ +े कहा विक हालांविक एक मा+व अणिभकरर्ण क े माध्यम से मुकदमा कर+े क े सिसवाय मुकदमा कर+े की असमर्थी: ा क े कारर्ण देव ा को अवयस्क मा+ा Sा ा है, लेविक+ परिरसीमा क े प्रयोS+ों क े खिलए देव ा अवयस्क +हीं है। उन्हों+े कहा विक विबश्व+ार्थी ब+ाम श्री ठाक ु र रा*ा बल्लभSी243 में यह सिसद्धां विक देव ा एक स्र्थीायी अवयस्क है, परिरसीमा क े संदभ: में +हीं विदया गया र्थीा।

413. विबश्व+ार्थी में, इस न्यायालय को यह वि+र्ण:य ले+ा र्थीा विक यविद सेवाय मूर्ति क े विह क े विवपरी काय: कर ा है ो क्या मूर्ति की ओर से वि+ष्कास+ क े खिलए एक उपासक वाद चला सक ा है। मुख्य न्याया*ीश सुब्बा राव +े इस न्यायालय की दो-न्याया*ीश पीठ क े खिलए बोल े हुए इस प्रकार अव*ारिर विकया: “10.सवाल यह है विक क्या ऐसा व्यविX उस मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व कर सक ा है Sब सेवाय इसक े विह क े प्रति क ू ल काय: कर ा है और इसक े 242 एआईआर 1935 मˆास 438 243 (1967) 2 एससीआर 618 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विह ों की रक्षा क े खिलए काय:वाही कर+े में विवफल रह ा है। सिसद्धां रूप में हमें उपासक क े खिलए इस रह क े अति*कार से इ+कार कर+े का कोई औतिचत्य +हीं विदख ा है। एक मूर्ति एक अवयस्क की स्जिस्र्थीति में है Sब इसका प्रति वि+ति*त्व कर+े वाला व्यविX इसे एक अ*र में छोड़ दे ा है, ो मूर्ति की उपास+ा में विह बद्ध व्यविX को वि+तिश्च रूप से इसक े विह की रक्षा क े खिलए प्रति वि+ति*त्व की दर्थी: शविX आवृत्त हो सक ी है। यह एक कविठ+ स्जिस्र्थीति क े खिलए एक व्यावहारिरक, विफर भी एक विवति*क समा*ा+ है। क्या यह मा+ा Sा+ा चाविहए विक एक सेवाय, सिSस+े संपखित्त हस् ां रिर की, क े वल प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए एक वाद ला सक ा है, अति*कांश मामलों में यह सेवाय क े क:व्य क े ति रस्कार की अप्रत्यक्ष स्वीक ृ ति होगी, अति*कत्तर, वह अप+ी चूक को स्वीकार +हीं करेगा और अन्य क+ीकी दलीलों क े अलावा Sो एक वाद में अं रिरति क े खिलए खुले हो सक े हैं, संपखित्त की वसूली क े खिलए कदम उठाएगा। क्या यह मा+ा Sा+ा चाविहए विक एक उपासक क े वल एक सेवाय को हर्टा+े क े खिलए और दूसरे की वि+युविX क े खिलए मुकदमा दायर कर सक ा है ाविक उसे संपखित्त की वसूली क े खिलए कदम उठा+े में सक्षम ब+ाया Sा सक े, इस रह की प्रविक्रया एक लंबी और Sविर्टल होगी और मूर्ति का विह अपूरर्णीय रूप से प्रभाविव हो सक ा है। इसीखिलए विववि+र्ण:यों द्वारा ऐसी परिरस्जिस्र्थीति यों में एक उपासक को मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व कर+े और मूर्ति क े खिलए संपखित्त की वसूली कर+े की अ+ुमति दी गयी है। यह कई वि+र्ण:यों द्वारा अव*ारिर विकया गया है विक उपासक एक *म:दाय की ओर से संपखित्त क े कब्Sे की प्रार्थी:+ा कर े हुए एक वाद दायर कर सक े हैं।..." (प्रभाव वर्ति* )

414. उस मामले में मुकदमा श्री ठाकु र रा*ा बल्लभSी द्वारा संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, देव ा का अचल संपखित्त क े कब्Sे और मध्यव - लाभ क े खिलए एक वाद विमत्र द्वारा प्रति वि+ति*त्व विकया गया। वादी का मामला यह र्थीा विक दूसरा प्रति वादी, Sो सरवरकर और प्रबं*क र्थीा, उस+े संपखित्त को पहले प्रति वादी को हस् ां रिर कर विदया र्थीा और विबक्री आवश्यक ा क े खिलए या मूर्ति क े लाभ क े खिलए +हीं र्थीी, यह देव ा पर बाध्यकारी +हीं र्थीी। विवचारर्ण न्यायालय और अपील दो+ों में, उच्च न्यायालय +े मा+ा विक विबक्री देव ा क े लाभ क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खिलए +हीं र्थीी और प्रति फल पया:प्त +हीं र्थीा। लेविक+ यह कहा गया विक कब्Sे क े खिलए मुकदमा क े वल सेवाय द्वारा दायर विकया Sा सक ा र्थीा र्थीा कोई और देव ा का प्रति वि+ति*त्व +हीं कर सक ा र्थीा। यह उस संदभ: में र्थीा, विक इस न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया विक सिसद्धां रूप में हस् ां रर्ण को चु+ौ ी दे े हुए एक वाद संस्जिस्र्थी कर+े क े खिलए एक उपासक को एक स्र्थीा+ रूप दे+े से इ+कार कर+े का कोई कारर्ण +हीं र्थीा, Sब सेवाय +े देव ा क े विह क े प्रति क ू ल काय: विकया र्थीा। यह अवलोक+ विक मूर्ति एक अवयस्क की स्जिस्र्थीति में है, परिरसीमा अति*वि+यम क े प्राव*ा+ों क े संदभ: में +हीं विकया गया र्थीा। अवलोक+ यह वि+र्ण- कर+े क े संदभ: में र्थीा Sब प्रबं*क +े देव ा क े विह क े प्रति क ू ल काय: विकया र्थीा ो क्या एक उपासक द्वारा वाद विकया Sा सक ा र्थीा। यह सिसद्धां विक मूर्ति अवयस्क की स्जिस्र्थीति में है, इसका अर्थी: यह +हीं लगाया Sा सक ा है विक मूर्ति को परिरसीमा अति*वि+यम 1963 की प्रयोज्य ा से छ ू र्ट दी गई है।

415. बी क े मुखिखया क े "द विहन्दू लॉ ऑफ रिरखिलसिSयस ए°ड़ चैरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट”244 में, विवति*क स्जिस्र्थीति संक्षेप में इस प्रकार प्रस् ु की गई है: "एक हिंहदू मूर्ति को कभी-कभी एक शाश्व णिशशु क े रूप में बोला Sा ा है, लेविक+ यह सादृश्य ा + क े वल गल है, बस्जिल्क सकारात्मक रूप से भ्रामक है। हिंहदू विवति* क े वि+यमों में इस रह क े सिसद्धां का कोई आह्वाह+ +हीं है और Sैसा विक सुरेंˆ ब+ाम श्री श्री भुव+ेश्वरी में रैंविक+, सीSे द्वारा अवलोक+ विकया गया र्थीा, यह दामोदर दास ब+ाम लख+ दास में ऐसे मामलों में न्यातियक सविमति क े वि+र्ण:य क े विवपरी एक असा*ारर्ण सिसद्धां है। यह सच है विक एक णिशशु की रह देव ा विवति*क अक्षम ा से £सिस है और विकसी अणिभक ा: क े माध्यम से काय: कर ा है और देव ा क े सेवाय र्थीा एक णिशशु क े संरक्षक की शविXयों क े बीच 244 बी क े मुखिखया, द विहन्दू लॉ ऑफ रिरखिलसिSयस ए°ड़ चैरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट, 5 वां संस्करर्ण, ईस्र्ट+: लॉ हाउस, (1983) पृष्ठ 256-257 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समा+ ा भी है। लेविक+ सादृश्य ा वास् व में वहाँ समाप्त हो ी है। परिरसीमा अति*वि+यम क े प्रयोS+ों क े खिलए मूर्ति विकसी भी विवशेषाति*कार का उपभोग +हीं कर ी है और संविवदात्मक अति*कारों क े बारे में भी मूर्ति की स्जिस्र्थीति विकसी अन्य क ृ वित्रम व्यविX की रह ही है। अवयस्कों या अस्वस्र्थी मस्जिस् ष्क क े व्यविXयों द्वारा वाद से संबंति* सिसविवल प्रविक्रया संविह ा क े प्राव*ा+ कम से कम एक मूर्ति पर लागू +हीं हो े हैं; और इस परिरकल्प+ा पर प्रविक्रया क े का+ू+ का वि+मा:र्ण कर+ा विक मूर्ति एक णिशशु है, यह प्रकर्ट रूप से अवांछ+ीय और विवसंगति पैदा करेगा।"245 (प्रभाव वर्ति* ) ये एक दूरदश- न्याया*ीश क े दूरदश- शब्द हैं। वषÂ से न्यायालयों +े मूर्ति क े विवति*क स्वरूप पर एक अवयस्क और इस विवति*क परिरकल्प+ा क े परिरर्णामों को स्पष्ट विकया है।

416. 1903-4 में, विप्रवी काउंसिसल महाराSा Sगदीन्ˆ +ार्थी राय बहादुर ब+ाम रा+ी हेमं क ु मारी देबी 246 में एक ऐसे मामले से संबंति* र्थीा, Sहां वादी +े एक मूर्ति क े सेवाय क े रूप में अप+ी क्षम ा में, विकसी संपखित्त में माखिलका+ा हक क े खिलए वाद संस्जिस्र्थी विकया। उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक मूर्ति संपखित्त *ारर्ण कर+े में सक्षम एक विवति*क व्यविX है, इसखिलए उसक े विवरूद्ध परिरसीमा काल अं रर्ण की ति र्थीी से प्रारम्भ हो गई र्थीी और इसखिलए सेवाय द्वारा विकया गया वाद परिरसीमा द्वारा वर्जिS र्थीा। विप्रवी काउंसिसल +े उच्च न्यायालय क े न्याया*ीशों क े सार्थी इस पर सहमति व्यX की, विक एक न्यातियक व्यविX हो+े क े +ा े, मूर्ति संपखित्त *ारर्ण कर+े में सक्षम र्थीी। हालाँविक, परिरसीमा काल अवशेष र्थीा क्योंविक Sब वाद हे ुक उत्पन्न हुआ, ो सेवाय सिSसका संपखित्त पर कब्Sा और प्रबं*+ र्थीा, वह 245 अणिशम क ु मार ब+ाम +रेन्ˆ 76 सीर्डब्ल्यूए+ 1016 246 (1903-04) 31 आईए 203 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अवयस्क र्थीा। इसखिलए विप्रवी काउंसिसल +े अव*ारिर विकया विक मूर्ति में वि+विह संपखित्त की सुरक्षा क े खिलए वाद संस्जिस्र्थी कर+े का अति*कार, सेवाय क े वयस्क ा प्राप्त कर+े क े ी+ साल क े भी र लाया Sा सक ा है। सर आर्थी:र विवल्स+ +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: "लेविक+ *ार्मिमक समप:र्ण को कठोर प्रक ृ ति का मा+ े हुए भी, यह अभी भी ब+ा हुआ है विक समर्मिप संपखित्त का कब्ज़ा और प्रबं*+ सेवाय से संबद्ध है। और इसक े सार्थी यह अति*कार है विक संपखित्त की सुरक्षा क े खिलए Sो भी वाद आवश्यक हों, उसे ला+े का अति*कार है। वाद ला+े का ऐसा हर अति*कार सेवाय में वि+विह है, मूर्ति में +हीं। और व:मा+ मामले में मुकदमा चला+े का अति*कार वादी को ब प्राप्त र्थीा Sब वह अल्पवयस्क र्थीा। इसखिलए मामला परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 7 की स्पष्ट भाषा क े अन् ग: आ ा है, Sो कह ा है विक, "यविद कोई व्यविX एक वाद संस्जिस्र्थी कर+े का हकदार है... ो, उस समय से Sहाँ से परिरसीमा की अवति* की गर्ण+ा की Sा+ी है, अवयस्क है", ो वह एक समय क े भी र Sो व:मा+ मामले में ी+ वष: होगी, आयु प्राप्त कर+े क े पश्चा ् वाद संस्जिस्र्थी कर सक े गा।" (प्रभाव वर्ति* ) वाद का परिरसीमा क े भी र हो+ा, यह मा++े का आ*ार यह +हीं र्थीा विक मूर्ति परिरसीमा विवति* क े अ*ी+ +हीं र्थीी, बस्जिल्क यह विक काय:वाही प्रोद्भू की ति र्थीी पर वह अवयस्क र्थीा। सेवाय क े वयस्क ा प्राविप्त क े ी+ साल क े भी र वाद संस्जिस्र्थी विकया Sा सक ा र्थीा।

417. 1909-10 में विप्रवी काउंसिसल द्वारा महन् दामोदर दास ब+ाम अति*कारी लख+ दास247 में एक वि+र्ण:य विदया गया र्थीा Sहां महं क े वि+*+ क े बाद उत्तराति*कार क े संबं* में एक मठ क े वरिरष्ठ चेला और कवि+ष्ठ चेला क े बीच विववाद र्थीा। यह एक इकरार+ामा विद+ांविक 3 +वंबर, 1874 से 247 (1909-10) 37 आईए 147 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सुलझाया गया र्थीा। इकरार+ामा क े अन् ग: भˆक में एक मठ को शाश्व रूप से वरिरष्ठ चेला और उसक े उत्तराति*कारिरयों को आवंविर्ट विकया गया र्थीा, Sबविक विबविवसराय में मठ को और उससे Sुड़ी संपंखित्तयों को एक 'अति*कारी' की क्षम ा में कवि+ष्ठ चेला को आवंविर्ट विकया गया र्थीा, Sो भˆक मठ क े खचÂ क े खिलए रू. 15 लाख क े वार्मिषक संदाय क े अ*ी+ र्थीा। वरिरष्ठ चेला की मृत्यु क े बाद, विबविवसराय में मठ क े कब्Sे क े खिलए उसक े उत्तराति*कारी द्वारा एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया। यह क: विदया गया र्थीा विक संपखित्त वादी की मूर्ति की उपास+ा और सेवा क े खिलए समर्मिप र्थीी और एक अति*कारी की क्षम ा में कवि+ष्ठ चेला द्वारा *ारिर की गयी र्थीी। प्रति वादी +े यह दावा कर े हुए परिरसीमा को प्रति रक्षा क े रूप में स्र्थीाविप विकया विक + ो वादी का और + ही उसक े पूव:व - का, वाद क े संस्र्थी+ से पहले बारह साल क े भी र विववाविद संपखित्त पर कब्Sा र्थीा। विवचारर्ण न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक मुकदमा परिरसीमा द्वारा बाति* +हीं र्थीा, लेविक+ उच्च न्यायालय +े इस आ*ार पर तिर्डक्री को उलर्ट विदया विक प्रति वादी +े विववाविद मठ को बारह साल से अति*क समय क प्रति क ू ल रूप से रखा र्थीा। विप्रवी काउंसिसल +े वरिरष्ठ चेला की दलील को खारिरS कर विदया विक वरिरष्ठ चेला की मृत्यु पर वाद हे ुक उत्पन्न हुआ और उच्च न्यायालय क े इस फ ै सले की पुविष्ट की विक मुकदमा वरिरष्ठ चेला की मृत्यु क े बारह साल क े भी र, लेविक+ इकरार+ामा क े सत्ताइस साल बाद संस्जिस्र्थी विकए Sा+े से परिरसीमा द्वारा बाति* र्थीा। सर आर्थी:र विवल्स+ +े इस प्रकार अणिभवि+*ा:रिर विकया: "उच्च न्यायालय क े विवद्वा+ न्याया*ीशों +े ठीक ही अव*ारिर विकया है विक का+ू+ की दृविष्ट से इकरार+ामा द्वारा विवचारिर संपखित्त इसकी ति णिर्थी से पहले इसे महं में वि+विह +हीं मा+ी गयी, बस्जिल्क विवति*क इकाई में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अर्थीा: ् मूर्ति में वि+विह मा+ी गयी क्योंविक महं क े वल उ+का प्रति वि+ति* और प्रबं*क है। और यह इस बा से वि+कल ा है विक विवद्वा+ न्याया*ीश आगे यह अणिभवि+*ा:रिर कर+े में सही र्थीे विक इकरार+ामा की ारीख से, उस इकरार+ामा की श Â क े आ*ार पर, Sूवि+यर चेला का कब्Sा मूर्ति क े अति*कार और उस मूर्ति का प्रति वि+ति*त्व कर+े वाले वरिरष्ठ चेला क े अति*कार क े प्रति क ू ल र्थीा और इसखिलए, व:मा+ वाद परिरसीमा द्वारा बाति* र्थीा।" (प्रभाव वर्ति* ) यद्यविप उपरोX विर्टप्पणिर्णयों में विवशेष रूप से इस बा पर कोई विवचार +हीं विकया गया र्थीा विक क्या एक मूर्ति को स्र्थीायी अवयस्क मा+ा Sा सक ा है, विप्रवी काउंसिसल +े स्पष्ट शब्दों में अव*ारिर विकया विक मूर्ति क े अति*कार क े विवरूद्ध प्रति क ू ल कब्Sे का अणिभवच+ उपलब्* र्थीा और इसखिलए वाद परिरसीमा द्वारा बाति* र्थीा।

418. छत्र मल ब+ाम पंचु लाल248 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ +े इस पर विवचार विकया विक क्या एक मूर्ति एक स्र्थीायी अवयस्क हो+े क े +ा े अक्षम ा से £सिस है और इसखिलए अं रर्ण की ति र्थीी क े बाद विकसी भी अवति* में एक मूर्ति द्वारा वाद परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 7 क े ह परिरसीमा की वS:+ा से सुरतिक्ष रहेगा। शास्त्री क े "विहन्दू लॉ"249 क े पांचवें संस्करर्ण में वि+म्+खिलखिख राय क े आ*ार पर क: प्रस् ु विकया गया। "परिरसीमा क े संबं* में यह विवचार विकया Sा+ा चाविहए विक क्या परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 7, विकसी हिंहदू देव ा से संबंति* संपखित्त क े सेवाय द्वारा अ+ुतिच हस् ां रर्ण को अपास् कर+े क े खिलए विकए गए वाद पर लागू +हीं है। चूंविक भगवा+ अप+ी संपखित्त का प्रबं*+ कर+े में असमर्थी: हैं, इसखिलए उन्हें परिरसीमा क े उद्देश्य क े खिलए एक स्र्थीायी अवयस्क मा+ा Sा+ा चाविहए।" हालांविक, ख°ड़ पीठ +े अव*ारिर विकया: 248 एआईआर 1926 ऑल 392 249 अध्याय 1926, 5 वाँ संस्करर्ण पृष्ठ 769 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "...सादर, यह इंविग विकया Sा सक ा है विक एक अवयस्क द्वारा हस् ां रर्ण में उतिच या अ+ुतिच हस् ां रर्ण का प्रश्न उत्पन्न +हीं हो ा। संविवदा अति*वि+यम क े ह एक अवयस्क द्वारा अं रर्ण शून्य होगा और + विक क े वल शून्यकरर्णीय होगा: मोहरी बीबी ब+ाम *म दास घोष [(1902) आई.एल.आर., 30 कलकत्ता, 539]। यविद वि+यम लागू कर विदया Sाये ो देव ा की संपखित्त को बाSार में कोई मूल्य +हीं विमलेगा, Sब मंविदर क े लाभ क े खिलए इसे अं रिर कर+े की आवश्यक ा उत्पन्न हो, Sहां मूर्ति स्र्थीाविप की Sा सक ी है... इसखिलए हमारे पास वादी क े क: को स्वीकार कर+े से म+ा कर+े का स्पष्ट प्राति*कार है।" इस दृविष्टकोर्ण को अप+ा+े में, उच्च न्यायालय की खंर्डपीठ +े महाराSा Sगदींˆ +ार्थी और दामोदर दास में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:यों पर अवलम्ब+ खिलया।

419. स्र्थीायी अवयस्क की परिरकल्प+ा को मˆास उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ द्वारा रामा रेड्डी ब+ाम रंगदस+250 में अप+ाया गया र्थीा। उस मामले में, वादी +े 1918 में मंविदर क े प्रबं*क क े रूप में वादी क े एक पूव:S को दी गई संपखित्त पर कब्Sा प्राप्त कर+े क े खिलए वाद£स् मंविदर क े पुSारी और न्यासी क े रूप में एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया। विववाविद संपखित्त को प्रति वादी सं. 1 और 2 (वादी क े विप ा और चाचा) द्वारा 1893 में प्रति वादी सं. 3 को बेच विदया गया र्थीा। यह वादी का क: र्थीा विक संपखित्त को एक पुSारी क े रूप में सेवा प्रदा+ कर+े क े खिलए उसक े परिरवार को सेवा इ+ाम क े रूप में विदया गया र्थीा और हस् ां रर्ण वै* +हीं र्थीा। सिSला मुंसिसफ +े वाद को परिरसीमा द्वारा बाति* क े रूप में खारिरS कर विदया और अपील पर, अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश +े इसको उलर्ट विदया और मुकदमे को वापस खिलया। सिSला मुंसिसफ +े विफर से मुकदमा खारिरS कर विदया और अपील पर, सिSला न्याया*ीश +े तिर्डक्री की 250 एआईआर 1926 मˆास 769 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पुविष्ट की। वि+चली अपीलीय अदाल +े पाया विक वादी वाद£स् संपखित्त का पुSारी या न्यासी र्थीा और यह अव*ारिर विकया विक वाद संपखित्त मंविदर से संलग्न र्थीी। वादी +े एक दूसरी अपील दायर की, सिSसे एक एकल न्याया*ीश +े सु+ा, सिSस+े यह अव*ारिर विकया विक वाद परिरसीमा द्वारा बाति* +हीं र्थीा। एकल न्याया*ीश क े वि+र्ण:य क े विवरुद्ध लेर्टस: पेर्टेंर्ट अपील में, खंर्डपीठ को यह अव*ारर्ण कर+ा र्थीा विक क्या वाद परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 134 या 144 द्वारा वर्जिS विकया गया र्थीा

420. उच्च न्यायालय +े विवद्या वरूणिर्थी ीर्थी: ब+ाम बालुसामी अय्यर 251 में वि+र्ण:य का उल्लेख विकया Sहां विप्रवी काउंसिसल +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक मठ संपखित्त का एक स्र्थीायी पट्टा, अ+ुदा+क ा: क े Sीव+ से परे वि+वा:ह कर+े क े खिलए संपखित्त में कोई विह वि+र्मिम +हीं कर सक ा है और फलस्वरूप, अ+ुच्छेद 134 संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए अ+ुदा+क ा: क े उत्तराति*कारी द्वारा लाए गए वाद पर लागू +हीं होगा। उच्च न्यायालय +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक न्यासी अं रिर ी को विवति*मान्य हक +हीं दे सक ा, इसखिलए अ+ुच्छेद 134 लागू +हीं होगा। उच्च न्यायालय +े यह उल्लेख विकया विक प्रति कू ल कब्Sे का सिसद्धां उ+ मामलों पर लागू होगा Sहां कोई व्यविX Sो अप+े स्वत्व का दावा कर सक ा है, परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 144 क े अ*ी+ वि+य अवति* क े भी र ऐसा +हीं कर ा है। एक मूर्ति की संपखित्त क े संबं* में, न्यायमूर्ति देवदास +े इस प्रकार अणिभवि+*ा:रिर विकया: "विवति*क परिरकल्प+ा यह है विक एक मूर्ति हर समय अवयस्क है और इसे स्र्थीायी संरक्षर्ण क े अन् ग: हो+ा चाविहए और ऐसा हो+े पर, यह +हीं कहा Sा सक ा है विक मूर्ति कभी भी वयस्क ा प्राप्त कर सक ी है, और एक व्यविX Sो मंविदर क े न्यासी से हक प्राप्त कर ा है, वह मूर्ति क े 251 एआईआर 1922 पीसी 123 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रति क ू ल कोई भी हक प्राप्त +हीं कर सक ा है, मूर्ति हर समय एक णिशशु है और उत्तरव - न्यासी विकसी भी समय मूर्ति क े खिलए संपखित्त का प्रत्युद्धरर्ण कर सक ा है।" यह उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक प्रबं*क मूर्ति की संपखित्त क े प्रति क ू ल हक स्र्थीाविप +हीं कर सक ा है। यह वि+ष्कष: वि+काला गया विक परिरर्णाम में, प्रबं*क अप+े काय: द्वारा एक ऐसे व्यविX को अ+ुमति +हीं दे सक ा है Sो एक प्रति क ू ल हक का दावा कर+े क े खिलए उससे हक प्राप्त कर ा है। सुरेंˆक ृ ष्र्ण रॉय ब+ाम श्री श्री ईश्वर भुव+ेश्वरी ठकु रा+ी252 में, कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक Sब विकसी मूर्ति को समर्मिप संपखित्त दूसरे क े प्रति क ू ल *ारिर की गई है और मूर्ति क े सार्थी कोई वैश्वासिसक संबं* +हीं है, ो परिरसीमा चलेगी और अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 144 द्वारा शासिस होगी। स्र्थीायी अवयस्क ा क े मुद्दे पर, मुख्य न्याया*ीश रैंविक+, +े इस प्रकार अणिभवि+*ा:रिर विकया: “21.मेरे वि+र्ण:य में यह सिसद्धां विक एक मूर्ति एक स्र्थीायी अवयस्क है, दामोदर दास ब+ाम लख+ दास [(1910) 37 कलकत्ता 885: 37 आईए 5147: 7 आईसी 240 (पीसी)] Sैसे मामलों में न्यातियक सविमति क े वि+र्ण:य क े विवपरी एक असा*ारर्ण सिसद्धां है। देवोत्तर प्रयोS+ों क े खिलए मूर्ति की संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए वाद ला+े का विवकल्प सेवाय या *म:दाय में विह बद्ध विकसी भी व्यविX पर है...” (प्रभाव वर्ति* ) उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य की श्री श्री ईश्वरी भुब+ेश्वरी ठक ु रा+ी ब+ाम ब्रS+ार्थी र्डे253 में विप्रवी काउंसिसल द्वारा पुविष्ट की गई र्थीी। 252 एआईआर 1933 कलकत्ता 295 253 (1936-37) 64 आईए 203 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

421. मस्जिस्Sद, शाविहद गंS मस्जिस्Sद ब+ाम णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क सविमति, अमृ सर254 में, विप्रवी काउंसिसल +े विवचार विकया विक क्या एक मस्जिस्Sद को एक न्यातियक व्यविX मा+ा Sा सक ा है और प्रति कू ल कब्Sे क े अ*ी+ हो सक ा है। सर SॉS: रेंविक+ +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: "यह विक मुसलमा+ों क े खिलए प्रार्थी:+ा स्र्थील क े रूप में और हिंहदू *म: क े व्यविXग देव ाओं को समर्मिप एक इमार की विवति*क स्जिस्र्थीति क े बीच कोई कणिर्थी सादृश्य ा हो+ी चाविहए, यह न्याया*ीशों क े खिलए क ु छ आश्चय: का विवषय है। यह प्रश्न विक क्या एक विब्रविर्टश भार ीय न्यायालय, विवति* क े न्यायालय में सु+े Sा+े क े अति*कार क े रूप में एक मस्जिस्Sद को मान्य ा देगा, यह एक प्रविक्रया का प्रश्न है। विब्रविर्टश भार में न्यायालय प्रविक्रया क े मामलों में मुस्जिस्लम का+ू+ का पाल+ +हीं कर े हैं [Sाफरी बेगम ब+ाम अमीर मोहम्मद खा+ [आई.एल.आर. 7 ऑल 822 पृष्ठ 841 पर, 842 (1885)], न्यायमूर्ति महमूद क े अ+ुसार] इससे अति*क वे साक्ष्य क े प्राची+ मुस्जिस्लम वि+यमों क े मुस्जिस्लम आपराति*क का+ू+ लागू कर े हैं। सार्थी ही हिंहदू या मुस्जिस्लम विवति* को लागू कर+े में न्यायालयों की प्रविक्रया को उ+ का+ू+ों क े खिलए उपयुX हो+ा चाविहए Sो वे लागू कर े हैं। इस प्रकार भार में प्रविक्रया, आवश्यक रूप से, हिंहदू *म: क े बहुदेववादी और अन्य विवशेष ाओं को ध्या+ में रख ी है और हिंहदू विवति* क े क ु छ सिसद्धां ों को आवश्यक ा क े रूप में मान्य ा प्रदा+ कर ी है, उदाहरर्णार्थी:, एक मूर्ति संपखित्त का माखिलक हो सक ा है। हमारे न्यायालयों की प्रविक्रया एक मूर्ति या देव ा क े +ाम पर वाद कर+े की अ+ुमति दे ी है, हालांविक वाद का अति*कार वास् व में सेवाय में है। [Sगदींˆ+ार्थी ब+ाम हेम्म क ु मारी [एल.आर. 31 आई.ए. 203: एस.सी. 8 सी.र्डब्ल्यू.ए+. 609 (1605)]] इ+ सिसद्धां ों में अत्यति*क कविठ+ाईयां आ ी हैं-विवशेष रूप से, अं र क े संबं* में, यविद कोई हो, Sो देव ा और छविव क े बीच विकया Sा+ा उतिच है। [भूपति +ार्थी ब+ाम राम लाल [आई.एल.आर. 37 कलकत्ता 128, 153: एस.सी. 14 सी.र्डब्ल्यू.ए+. 18 (1910)],गोलपचंˆ सरकार, शास्त्री का "हिंहदू लॉ”, 7 वां संस्करर्ण पृष्ठ 865 वगैरह]। हिंक ु इसमें कभी कोई संदेह +हीं रहा है विक विहन्दू *ार्मिमक *म:दाय की संपखित्त -ठाक ु रबरी सविह - 254 एआईआर 1940 पीसी 116 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरसीमा विवति* क े अध्य*ी+ है। [दामोदर दास ब+ाम लख+ दास [एलआर 37 आई.ए. 147: एससी 14 सी.र्डब्ल्यू.ए+. 889 (1810)] और श्री श्री ईश्वरी भुब+ेश्वर ठाक ु रा+ी ब+ाम ब्रS +ार्थी र्डे [एल.आर. 64 आई.ए. 203: एस. सी. 41 सी. र्डब्ल्यू. ए+. 968 (1937)]]। इ+ विवमशÂ से लेकर हिंहदू का+ू+ क कोई भी सामान्य लाइसेंस काल्पवि+क व्यविXयों क े आविवष्कार क े खिलए +हीं खिलया Sा सक ा है।...” (प्रभाव वर्ति* ) यह इस प्रकार वि+ष्कष: वि+काला गया र्थीा: "व:मा+ प्रश्नग संपखित्त पर वक्फ क े प्रति क ू ल और 12 साल से अति*क समय क इसक े अन् ग: सभी विह ों क े खिलए सिसखों का कब्Sा है, वक्फ क े प्रयोS+ों क े खिलए मु ावाली का कब्Sे का अति*कार, परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 144 क े ह समाप्त हो गया और व्यवस्र्थीापक या वाविकफ से समप:र्ण क े ह व्युत्पन्न हक *ारा 28 क े ह समाप्त हो गया। विब्रविर्टश भार ीय न्यायालयों क े विकसी भी प्रयोS+ क े खिलए संपखित्त अब "उ+की सृष्ट वस् ुओं क े परिरर्णामस्वरूप ईश्वर की संपखित्त " +हीं रही।..." रिर भूषर्ण राय ब+ाम श्री श्री ईश्वर श्री*र सालगराम णिशला ठाकु र255 में कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ क े एक फ ै सले में, न्यायमूर्ति +सीम अली +े हिंहदू विवति* में एक अवयस्क और एक मूर्ति की स्जिस्र्थीति क े बीच अं र क े विबन्दु और समा+ ाओं को +ोर्ट विकया: “ एक अवयस्क और एक विहन्दू मूर्ति क े मध्य समा+ ा क े वि+म्+ विबन्दु हैं: (1) दो+ों में संपखित्त का स्वाविमत्व रख+े की क्षम ा है। (2) दो+ों अप+ी सम्पखित्त का प्रबं*+ कर+े और अप+े विह ों का संरक्षर्ण कर+े में असमर्थी: हैं। (3) दो+ों की संपखित्त विकसी अन्य मा+व द्वारा प्रबंति* और संरतिक्ष की Sा ी है। अवयस्क का प्रबं*क उसका विवति*क संरक्षक है और मूर्ति का प्रबं*क उसका सेवाय है। (4) उ+क े प्रबं*कों की शविXयां समा+ हैं। (5) दो+ों को वाद कर+े का अति*कार प्राप्त है। (6) *ारा 11 का वS:+ और सिसविवल प्रविक्रया संविह ा का आदेश 9, वि+यम 9, दो+ों पर लागू हो ा है। 255 एआईआर 1942 कलकत्ता 99 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दो+ों क े बीच अं र क े वि+म्+ हिंबदु हैं: (1) विहन्दू मूर्ति एक न्यातियक या क ृ वित्रम व्यविX है लेविक+ अवयस्क एक प्राक ृ ति क व्यविX है। (2) विहन्दू मूर्ति अप+े स्वंय क े विह क े खिलए सार्थी ही सार्थी अप+े उपासकों क े विह क े खिलए विवद्यमा+ हो ी है लेविक+ अवयस्क विकसी अन्य व्यविX क े विह ों क े खिलए अस्जिस् त्वमा+ +हीं हो ा है। (3) संविवदा अति*वि+यम (सारवा+ विवति*) +े अवयस्क की संविवदा कर+े की विवति*क क्षम ा को छी+ खिलया है लेविक+ विहन्दू मूर्ति की संविवदा कर+े की विवति*क क्षम ा को इस अति*वि+यम द्वारा या विकसी अन्य संविवति* द्वारा प्रभाविव +हीं विकया गया है। (4) परिरसीमा अति*वि+यम (एक विवशेषर्ण विवति*) +े विकसी अवयस्क को परिरसीमा वS:+ क े प्रव:+ से छ ू र्ट दी है हिंक ु यह संरक्षर्ण विहन्दू मूर्ति को विवस् ारिर +हीं विकया गया है। उपरोX से यह स्पष्ट है विक अवयस्क और विहन्दू मूर्ति क े मध्य क ु छ सादृश्य ा है लेविक+ बाद वाला + ो अवयस्क + ही शाश्व अवयस्क है।" (प्रभाव वर्ति* ) रा*ाक ृ ष्र्ण दास ब+ाम रा*ारमर्ण स्वामी256 में उड़ीसा उच्च न्यायालय क े समक्ष, वादी देव ा को उसक े अणिभषेक क े मूल स्र्थीा+ पर पु+स्र्थीा:विप कर+े का वि+द†श दे+े क े खिलए वादी देव ा क े वाद विमत्र द्वारा एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय की ख°ड़ पीठ +े अव*ारिर विकया विक एक मूर्ति को परिरसीमा क े प्रयोS+ों क े खिलए एक अवयस्क +हीं मा+ा Sा सक ा है और वादी क े इस क: को खारिरS कर विदया है विक देव ा का अप+े मंविदर में अवस्जिस्र्थी हो+े का अति*कार, देव ा क े अप+ी ओर से काय: कर+े की अक्षम ा क े कारर्ण स अति*कार है। ख°ड़ पीठ +े अव*ारिर विकया: “... मूर्ति वि+स्संदेह एक णिशशु की स्जिस्र्थीति में है क्योंविक यह क े वल एक सेवाय द्वारा या एक प्रबन्*क द्वारा काय: कर सक ा है। लेविक+ हमे इस अव*ारर्णा क े खिलए कोई प्राति*कार +हीं विदया गया है विक उसे एक स्र्थीायी णिशशु क े रूप में मा+ा Sाए, ाविक उसक े द्वारा या उसक े विवरूद्ध संव्यवहार को परिरसीमा अति*वि+यम द्वारा शासिस + विकया Sाए। 256 एआईआर 1949 उड़ीसा 1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह सिसद्धां विक एक मूर्ति एक स्र्थीायी अवयस्क है, एक असा*ारर्ण सिसद्धां है क्योंविक देवोत्तर प्रयोS+ों क े खिलए सेवाय या *म:दाय क े विकसी व्यविX को मूर्ति की संपखित्त को पु+प्रा:प्त कर+े क े खिलए एक वाद ला+े का अति*कार है। इसखिलए मूर्ति एक प्राक ृ ति क व्यविX क े रूप में परिरसीमा विवति* क े अ*ी+ है और इस आ*ार पर छ ू र्ट का दावा +हीं कर सक ी है विक वह एक स्र्थीायी णिशशु है। + ही सभी उद्देश्यों क े खिलए एक हिंहदू देव ा को अवयस्क मा+ा Sा ा है। इसखिलए एक मूर्ति परिरसीमा विवति* से छ ू र्ट का दावा +हीं कर सक ी है।" एक अवयस्क क े रूप में एक देव ा की विवति*क परिरकल्प+ा को, देव ा द्वारा विवति*क काय:वाविहयों कर+े की अक्षम ा को दूर कर+े क े खिलए विवकसिस विकया गया है। अक्षम ा को दूर कर+े क े खिलए एक मा+व अणिभक ा: को देव ा की ओर से का+ू+ी काय:वाही कर+ी चाविहए। हालांविक देव ा को परिरसीमा विवति* की प्रयोज्य ा से छ ू र्ट दे+े क े खिलए परिरकल्प+ा को बढ़ाया +हीं गया है।

422. व:मा+ मामले में, यह स्र्थीाविप विकया गया है विक देव ा की ओर से काय: कर+े क े खिलए वस् ु ः या विवति* ः सेवाय +हीं र्थीा। इसखिलए सेवाय में वि+विह "वाद क े अति*कार" क े संदभ: में और देवोत्तर संपखित्त क े प्रति क ू ल कब्Sे क े खिलए परिरसीमा अति*वि+यम की प्रयोज्य ा पर एक सेवाय की अ+ुपस्जिस्र्थीति क े परिरर्णाम क े खिलए इस न्यायालय क े वि+र्ण:यों को संदर्भिभ कर+ा उतिच है। राय साविहब र्डॉ. गुरविदत्तमल कपूर ब+ाम महं अमर दास चेला महं राम सर+257 में इस अदाल +े एक मामले पर विवचार विकया, Sहां प्रर्थीम प्रति वादी द्वारा 1957 में एक मुकदमा दायर विकया गया र्थीा, Sो सुल् ा+हिंवद दरवाSा, अमृ सर क े +व वि+युX महं र्थीे। दूसरे प्रति वादी को सिसविवल प्रविक्रया संविह ा की *ारा 92 क े ह काय:वाही में, महं क े पद से हर्टा विदया गया र्थीा और प्रर्थीम प्रति वादी को बाद में उ+क े स्र्थीा+ पर वि+युX विकया गया र्थीा। यह 257 एआईआर 1965 एससी 1966 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आरोप लगाया गया र्थीा विक दूसरे प्रति वादी द्वारा संपखित्त का अं रर्ण अ+ति*क ृ र्थीा क्योंविक अं रर्ण विवति*क आवश्यक ा क े खिलए या संपखित्त क े लाभ क े खिलए +हीं र्थीा। इसक े अलावा यह क: विदया गया र्थीा विक इस थ्य का विक अपीलक ा: का बारह साल से अति*क समय क भूविम पर कब्Sा र्थीा, इससे कोई फक: +हीं पड़ ा और चूंविक भूविम न्यास की संपखित्त र्थीी, इसखिलए इसक े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए वाद ऐसी संपखित्त क े प्रबन्*क की मृत्यु, इस् ीफा या वि+ष्कास+ की ति र्थीी से बारह साल क े भी र लाया Sा सक ा र्थीा। इस अदाल की ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ +े अव*ारिर विकया विक प्रर्थीम प्रति वादी द्वारा दायर विकया गया मुकदमा खारिरS विकए Sा+े योग्य र्थीा क्योंविक अपीलार्थी- का बारह साल से अति*क समय से प्रति क ू ल कब्Sा र्थीा। इस न्यायालय क े खिलए बोल े हुए, न्यायमूर्ति Sे. आर. मु*ोल्कर +े अव*ारिर विकया विक अति*वि+यम की *ारा 144 क े प्रयोS+ों क े खिलए, विबक्री क े परिरर्णामस्वरूप अपीलक ा: क े "प्रभावी कब्Sे" से, प्रति क ू ल कब्Sे की गर्ण+ा की Sा+ी है: “12... इस विबषय पर विवति* को मुखS- क े विहन्दू लॉ ऑफ रिरलीसिSयस ए°ड़ चैरिरर्टेबल र्ट्रस्र्ट क े दूसरे संस्करर्ण में पृष्ठ 274 और 275 पर बहु स्पष्ट रूप से ब ाया गया है। यह दर्भिश विकया गया है विक देवोत्तर संपखित्त की वि+ष्पाद+ विबक्री क े मामले में, मठ क े पद*ारी की मृत्यु की ारीख से +हीं, बस्जिल्क विबक्री क े परिरर्णामस्वरूप प्रभावी कब्Sे की ारीख से, Sहाँ से क्र े ा क े प्रति क ू ल कब्Sे की शुरुआ हुई वहाँ से परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 144 क े प्रयोS+ों क े गर्ण+ा की Sा+ी है।... इस प्रकार यविद प्रत्यर्थी- संख्या 2 को पहले क े दो वादों में अखाड़े का प्रति वि+ति*त्व विकया गया हो+ा कहा Sा सक ा है, ो उ+में दी गयी तिर्डक्री प्रत्यर्थी- संख्या 1 पर बाध्यकारी होगी क्योंविक वह प्रत्यर्थी- संख्या 2 क े पद का उत्तराति*कारी है। दूसरी ओर यविद प्रत्यर्थी- संख्या 2 अखाड़े का प्रति वि+ति*त्व +हीं कर ा है, ो इ+ मुकदमों में पारिर तिर्डक्री क े ह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलक ा: का कब्Sा स्पष्ट रूप से, विप्रवी काउंसिसल क े संदर्भिभ दो वि+र्ण:यों में खिलए गए दृविष्टकोर्ण क े आ*ार पर, अखाड़ा क े प्रति क ू ल होगा। अपीलक ा: द्वारा प्रति क ू ल कब्Sे क े 12 साल से अति*क समय पूरा कर+े क े बाद प्रर्थीम प्रति वादी क े वाद को संस्जिस्र्थी विकया गया है, इसखिलए समय द्वारा बाति* हो+ा अव*ारिर विकया Sा+ा चाविहए। इ+ कारर्णों से अ*ी+स्र्थी न्यायालयों से असहम हो+े क े कारर्ण हम अ*ी+स्र्थी न्यायालयों की तिर्डविक्रयों को अपास् कर े हैं और सभी अदाल ों में खचÂ क े खिलए प्रत्यर्थी- संख्या 1 क े मुकदमे को खारिरS कर े हैं।" (प्रभाव वर्ति* )

423. इस न्यायालय क े एक बाद क े वि+र्ण:य सरंगदेव पेरिरया म म ब+ाम रामास्वामी गौंर्डर (मृ ) द्वारा विवति*क प्रति वि+ति*गर्ण258 में, मठाति*पति +े विववाविद संपखित्त क े एक विहस्से को वार्मिषक विकराए पर वादीगर्णों क े दादा को विदया र्थीा। 1883 से Sब पट्टा विदया गया र्थीा और S+वरी 1950 क, संपखित्त प्रत्यर्भिर्थीयों क े वि+बा:* कब्Sे में र्थीी। 1915 में, उत्तराति*कारी क े विब+ा मठाति*पति की मृत्यु हो गई और वादीगर्णों +े कोई विकराया +हीं विदया। 1915 और 1939 क े मध्य, कोई मठाति*पति +हीं र्थीा और कोई व्यविX बीस वषÂ से मठ क े प्रबं*+ में र्थीा। 1939 में एक मठाति*पति का चु+ाव हुआ। 1928 में, मदुरई क े कलेक्र्टर +े इ+ाम भूविम को विफर से शुरू कर+े क े खिलए एक आदेश पारिर विकया और भूविम क े पूर्ण: मूल्यांक+ और इसक े रखरखाव क े खिलए मठ को मूल्यांक+ क े भुग ा+ का वि+द†श विदया। पु+: शुरू कर+े क े बाद, भूविम क े कब्Sा*ी+ वादी और अन्य व्यविXयों क े +ाम पर एक संयुX पट्टा Sारी विकया गया र्थीा। प्रत्यर्भिर्थीयों +े S+वरी 1950 क ब क वाद भूविम पर कब्Sा Sारी रखा Sब मठ +े कब्Sा प्राप्त विकया। 18 फरवरी 1954 को, प्रत्यर्भिर्थीयों +े मठ क े विवरूद्ध वाद भूविमयों क े कब्Sे क े प्रत्युद्धरर्ण का दावा कर े हुए एक 258 एआईआर 1966 एससी 1603 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाद संस्जिस्र्थी विकया, मठ का प्रति वि+ति*त्व इसक े त्काली+ मठाति*पति और मठ क े एक अणिभक ा: द्वारा विकया गया र्थीा। विवचारर्ण न्यायालय +े वाद को तिर्डक्री प्रदा+ की। अपील में, सिSला न्याया*ीश +े तिर्डक्री को अपास् कर विदया और वाद को खारिरS कर विदया। दूसरी अपील में, मˆास क े उच्च न्यायालय +े विवचारर्ण न्यायालय की तिर्डक्री को बहाल कर विदया। प्रत्यर्थी- +े क: विदया विक उस+े प्रति क ू ल कब्Sे से और इ+ाम को विफर से शुरू कर+े पर उसक े पक्ष में रैय वारी पट्टा Sारी कर+े से, भूविम क े खिलए हक प्राप्त विकया र्थीा। अपीलक ा: +े क: विदया विक मठ की संपखित्तयों क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए मुकदमा कर+े का अति*कार का+ू+ी रूप से वि+युX मठति*पति में वि+विह है और उसक े विवरूद्ध प्रति क ू ल कब्Sा उसकी वि+युविX क चलायमा+ +हीं होगा। इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ +े उल्लेख विकया विक एक मूर्ति की रह ही मठ एक न्यातियक व्यविX है सिSसे एक मा+व अणिभकरर्ण क े माध्यम से काय: कर+ा चाविहए और इसक े विवरूद्ध प्रति क ू ल कब्Sे का दावा पोषर्णीय र्थीा: “6. हम प्रत्यर्भिर्थीयों क े क: को स्वीकार कर+े को इच्छ ु क हैं। भार ीय परिरसीमा अति*वि+यम 1908 क े अ+ुच्छेद 144 क े अ*ी+ मठ द्वारा या इसका प्रति वि+ति*त्व कर+े वाले विकसी व्यविX द्वारा इससे संबंति* स्र्थीावर संपखित्तयों क े कब्Sे क े वाद क े खिलए परिरसीमा उस समय से प्रारंभ हो ी है Sब प्रति वादी का कब्Sा वादी क े प्रति क ू ल हो Sा ा है। मठ *म:दाय संपखित्त का माखिलक है। एक मूर्ति की रह ही मठ एक न्यातियक व्यविX है सिSसक े पास संपखित्त प्राप्त कर+े, स्वाविमत्व रख+े और कब्Sा रख+े की शविX हो ी है और मुकदमा कर+े और उसक े विवरूद्ध मुकदमा चला+े की क्षम ा हो ी है। एक आदश: व्यविX हो+े क े +ा े, इसे मा+व अणिभकरर्ण क े माध्यम से अप+े सांसारिरक मामलों क े संबं* में आवश्यक काय: कर+ा चाविहए... यह तिचरभोग द्वारा संपखित्त प्राप्त कर सक ा है और इसी रह प्रति क ू ल कब्Sे से संपखित्त खो सक ा है। यविद मठ का अप+ी संपखित्त पर कब्Sा है और इसे बेदखल कर विदया Sा ा है या यविद विकसी अS+बी का कब्Sा प्रति क ू ल हो Sा ा है, ो इसे हावि+ हो ी है और संपखित्त क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए मुकदमा कर+े का अति*कार है। यविद का+ू+ी रूप से वि+युX मठाति*पति है, ो वह इसकी ओर से मुकदमा दायर कर सक ा है; यविद +हीं, ो वस् ु ः मठाति*पति ऐसा कर सक े हैं, महालेव प्रसाद सिंसह ब+ाम कोरिरया भार ी [(1934) एल. आर. 62 आईए 47, 50] देखें; और Sहां, आवश्यक हो, मठ का कोई णिशष्य या अन्य विह ाति*कारी इसकी ओर से मुकदमा कर+े क े प्राति*कार से एक रिरसीवर की वि+युविX द्वारा या न्यायालय द्वारा वि+युX वाद विमत्र द्वारा अप+े +ाम से वाद संस्जिस्र्थी करक े इसक े विवति*क अति*कारों की रक्षा क े खिलए कदम उठा सक े गा। सम्यक ् परिरश्रम से, मठ या इसमें विह बद्ध व्यविX समय क े चल+े से बच सक े हैं। अ+ुच्छेद 144 क े ह मठ क े विवरुद्ध परिरसीमा, विवति*क रूप से वि+युX मठाति*पति की अ+ुपस्जिस्र्थीति से वि+लंविब +हीं हो ी है; स्पष्ट ः, Sहां यह वस् ु ः मठाति*पति द्वारा प्रबंति* की Sा ी है इसक े विवरूद्ध परिरसीमा चलायमा+ होगी। विवठलबोवा ब+ाम +ारायर्ण दाSी ठाइर्ट [(1893) आईएलआर 18 बॉम्बे 507, 511] देखें, और हमें लग ा है यह समा+ रूप से चलेगा, अगर कोई + ो विवति* ः और + ही वस् ु ः मठाति*पति है।" (प्रभाव वर्ति* ) न्यायमूर्ति आरएस बचाव +े अव*ारिर विकया विक Sब संपखित्त का कब्Sा प्रति क ू ल हो Sा ा है, ो मठ क े विवरूद्ध एक विवति* ः या वस् ु ः मठाति*पति की अ+ुपस्जिस्र्थीति में भी परिरसीमा चलायमा+ रहेगी। महाराSा Sगविदन्ˆ +ार्थी में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य को ध्या+ में रख े हुए, इस न्यायालय +े इस सिसद्धां का विवस् ार कर+े से इ+कार कर विदया विक "कब्Sे क े खिलए वाद कर+े का अति*कार" संपखित्त क े खिलए "माखिलका+ा अति*कार" से पृर्थीक कर+ा है Sो मूर्ति में वि+विह है: “8... सेवाय को भार ीय परिरसीमा अति*वि+यम 1877 की *ारा 7 का लाभ दे+े में, विप्रवी काउंसिसल इस आ*ार पर आगे बढ़ी विक कब्Sे क े खिलए मुकदमा कर+े का अति*कार उस संपखित्त क े माखिलका+ा अति*कार से पृर्थीक कर+ा है Sो मूर्ति में वि+विह है। हम Sगहिंदˆ +ार्थी राय मामले [आईएलआर 32 कलकत्ता 129, 141] की शुद्ध ा पर एक या दूसरे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रीक े से कोई राय व्यX +हीं कर े हैं। इस मामले क े प्रयोS+ों क े खिलए, यह कह+ा पया:प्त है विक हम उस मामले क े सिसद्धां का विवस् ार कर+े क े खिलए इच्छ ु क +हीं हैं। उस मामले में, परिरसीमा की अवति* शुरू हो+े पर, मूर्ति की ओर से मुकदमा कर+े क े खिलए एक सेवाय अस्जिस् त्व में र्थीा, और वाद क े संस्र्थी+ पर उस+े सफल ापूव:क दावा विकया विक सिSस समय से अवति* की गर्ण+ा की Sा+ी है, उस समय वाद संस्जिस्र्थी कर+े का Sो व्यविX हकदार है, उसे भार ीय परिरसीमा अति*वि+यम 1877 की *ारा 7 का लाभ विमल+ा चाविहए। व:मा+ मामले में, 1915 में उस समय कोई मठाति*पति अस्जिस् त्व में +हीं र्थीा Sब परिरसीमा चल+ा शुरू हुई। +ा ही 1915 में मुकदमा कर+े क े हकदार मठाति*पति की अवयस्क ा पर या भार ीय परिरसीमा अति*वि+यम 1908 की *ारा 6 को लागू कर+े पर कोई प्रश्न है।" उच्च न्यायालय का वि+र्ण:य

424. इस पहलू पर विक क्या विकसी देव ा को स्र्थीायी रूप से अवयस्क मा+ा Sा सक ा है, न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक परिरसीमा क े प्रयोS+ क े खिलए विकसी देव ा की मूर्ति स्र्थीायी अवयस्क +हीं है और देवोत्तर संपखित्त प्रति क ू ल कब्Sे क े माध्यम से लुप्त हो सक ी है। विवद्वा+ न्याया*ीश का दृविष्टकोर्ण र्थीा विक विबश्व+ार्थी ब+ाम श्री ठाक ु र रा*ा बल्लभSी259 में यह अव*ारर्ण विक एक मूर्ति अवयस्क की स्जिस्र्थीति में है, परिरसीमा विवति* क े संदभ: में +हीं र्थीी। इसक े विवपरी, विवद्वा+ न्याया*ीश क े विवचार में, र्डॉ गुरदीत्तमल कपूर और सरंगादेवी पेरिरया मा म में वि+र्ण:यों को ी+ न्याया*ीशों की पीठ +े विदया र्थीा (विबश्व+ार्थी, दो न्याया*ीशों की पीठ द्वारा वि+र्ण- )। दो+ों ी+ न्याया*ीश की पीठ क े फ ै सलों +े इस विवचार का समर्थी:+ विकया विक परिरसीमा विवति* लागू होगी। इसक े अलावा विप्रवी काउंसिसल +े मस्जिस्Sद 259 (1967) 2 एससीआर 618 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शाविहदगंS ब+ाम णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क कमेर्टी, अमृ सर260 में उल्लेख विकया र्थीा विक इसमें कोई संदेह +हीं र्थीा विक हिंहदू *ार्मिमक *म:दाय की संपखित्त परिरसीमा क े अ*ी+ है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल का विवचार र्थीा विक यद्यविप पहले दायर विकया गया मुकदमा एक व्यापक क्षेत्र से संबंति* र्थीा, विववाद का क्षेत्र (इस्माइल फारुकी में इस न्यायालय क े वि+र्ण:य क े बाद) आं रिरक और बाहरी अहा े क सीविम र्थीा। न्यायमूर्ति अ£वाल क े विवचार में, यह भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है सिSसका विहन्दू अ+ाविद काल से दौरा कर े आए र्थीे और "देव ा एक स्र्थीा+ क े रूप में”, "यह कभी भी +ष्ट +हीं हो सक ी है" और "+ ही इसे +ष्ट विकया Sा सक ा है"। इसखिलए यविद देव ा न्यायालय से एक घोषर्णा कर+े का दावा कर ा है, ो परिरसीमा की दलील लागू +हीं होगी और परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 6 या *ारा 7 क े खिलए सहारा ले+े का कोई कारर्ण +हीं र्थीा। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े विबश्व+ार्थी क े वाद में विदए गए वि+र्ण:य पर अवलम्ब खिलया और इस वि+ष्कष: पर पहुंचे विक परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 6 क े प्रयोS+ों क े खिलए देव ा एक अवयस्क है और एक अवयस्क को एक देव ा क े खिलए उपलब्* लाभ का विवस् ार बड़े पैमा+े पर दुवि+या क े खिलए कोई अन्याय +हीं करेगा।

425. न्यायमूर्ति एसयू खा+ द्वारा स्र्थीायी अवयस्क पर विवति*क की प्रयोज्य ा पर विवति*क स्जिस्र्थीति का विवश्लेषर्ण अप+ी ही अ+ुशंसा कर ा है। ऊपर विवश्लेविष न्यातियक पूव:वि+र्ण:यों क े आ*ार पर, यह एक स्र्थीाविप स्जिस्र्थीति है विक एक देव ा एक स्र्थीायी अवयस्क हो+े क े आ*ार पर परिरसीमा अति*वि+यम की 260 एआईआर 1940 पीसी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रयोज्य ा से छ ू र्ट प्राप्त +हीं कर सक ा है। श्री सी एस वैद्य+ार्थी+ द्वारा प्रस् ु विकए गए क:, इस मुद्दे पर एक सदी क े करीब क े विवति*शास्त्र क े विवपरी हैं। हम विप्रवी काउंसिसल, इस न्यायालय और पहले उसिल्लखिख कई उच्च न्यायालयों से प्राप्त पूव:वि+र्ण:यों की पंविX का पाल+ कर े हैं। परिरसीमा विवति* की प्रयोज्य ा को स्र्थीायी अवयस्क क े सिसद्धां क े आ*ार पर खारिरS +हीं विकया Sा सक ा है। उ+ कारर्णों से सिSसे हम+े पहले ही ऊपर उद्*ृ कर विदया है, परिरसीमा अति*वि+यम की प्रयोज्य ा का अर्थी: लगा े हुए न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डीवी शमा: सिS+ कारर्णों पर प्रभावी र्थीे, वे गल हैं। विबश्व+ार्थी क े वाद में दो न्याया*ीशों की पीठ का फ ै सला, परिरसीमा अति*वि+यम की प्रयोज्य ा क े मुद्दे पर विवचार +हीं कर ा और यह अव*ारर्ण विक देव ा एक अवयस्क है, इसे परिरसीमा विवति* की प्रयोज्य ा से छ ू र्ट दे+े क े खिलए वि+विह ार्थी: द्वारा विवस् ारिर +हीं विकया Sा सक ा है। ऐसा विवस् ार विप्रवी काउंसिसल क े सार्थी-सार्थी इस न्यायालय और उच्च न्यायालयों क े वि+र्ण:यों से प्राप्त सुसंग पूव: वि+र्ण:यों क े विवपरी होगा। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 6 क े प्राव*ा+ों को ब ाया है विक एक अवयस्क पर लागू हो+े वाला सिसद्धां एक देव ा पर भी लागू हो ा है। इस रह क े विवस् ार पर वि+विह ार्थी: या अर्थीा:न्वय+ द्वारा +हीं पहुँचा Sा सक ा है। वाद 5 में परिरसीमा

426. वाद 5 परिरसीमा क े भी र र्थीा, इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े ी+ों न्याया*ीशों +े इस अव*ारर्ण क े अप+े-अप+े कारर्णों को ब ाया। न्यायमूर्ति mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एस. यू. खा+ +े परिरसीमा पर विवचार कर े हुए एक समेविक विवश्लेषर्ण कर पांच कारर्ण ब ाये सिSसमें से पहला और पांचवां, वाद 5 पर लागू हो ा र्थीा। विवद्वा+ न्यायमूर्ति का म इस प्रकार हैः (i) मसिSस्र्ट्रेर्ट +े *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयों को अवि+तिश्च काल क लंविब रखकर अति*कारिर ा क े आति*क्य में काय: विकया। परिरर्णामस्वरूप, *ारा 145 की काय:वाही में कोई अंति म आदेश पारिर +हीं हुआ। ऐसा + कर+े से, यह अणिभवि+*ा:रिर विकया गया विक इससे परिरसीमी अवति* की बाध्य ा उत्पन्न +हीं होगी; और (ii) विकसी भी अवसर पर न्यायालय से यह अपेक्षा र्थीी विक वे सभी विववाद्यकों पर आदेश XIV क े ह वि+ष्कष: पर वापस आये। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े यह अव*ारिर विकया विक वाद पत्र 5 में परिरसीमा संबं*ी Sो दलील दी गयी है उसको वि+म्+खिलखिख थ्यों क े संदभ: में समझा Sा+ा चाविहएः (i) विहन्दू विववाविद स्र्थीा+ को भगवा+ राम की Sन्म-स्र्थीली मा+ े हैं, और इस स्र्थीा+ की स्मरर्णा ी काल से पूSा की Sा रही है; (ii) विर्टफ े न्र्थीॉलर (1766-71) क े आगम+ से पूव: मुस्जिस्लम शासक क े आदेश पर मस्जिस्Sद की प्रक ृ ति में एक गैर विहन्दू ढ़ाँचे को खड़ा विकया गया र्थीा; (iii) उपरोX वि+मा:र्ण क े बावSूद, विहन्दू इसको भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+कर यहां Sाया कर े र्थीे और अप+े विवश्वास क े अ+ुसार पूSा कर े र्थीे; (iv) यद्यविप भव+ क े इस ढांचे को मस्जिस्Sद क े ौर पर मान्य ा प्रदा+ की गयी र्थीी विफर भी इससे हिंहदुओं की मान्य ाओं पर प्रभाव +हीं पड़ा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) अविवभासिS मस्जिस्Sद क े परिरसर क े भी र, एक बेदी की गैर इस्लामी संरच+ा र्थीी सिSसका उल्लेख विर्टफ ें न्र्थीॉलर +े अप+े विववरर्ण में विकया र्थीा; (vi) समय बी +े क े सार्थी अन्य हिंहदू संरच+ाओं Sैसे सी ा रसोंई, राम चबू रा और भ°ड़ार को Sोड़ा गया; (vii) इ+ संरच+ाओं को 1858, 1873, 1885, 1949, 1950 में और लगा ार संपूर्ण: संरच+ा क े विवध्वंस 6 विदसंबर, 1992 क देखा गया; (viii) यद्यविप संपूर्ण: विववाविद ढांचे को मस्जिस्Sद कहा Sा ा र्थीा, हिंक ु विब्रविर्टश सरकार +े विववाविद क्षेत्र को दो भागों में विवभासिS करक े दो+ों समुदायों क े विवपरी दावों को मान्य ा दी सिSसमें प्रत्येक समुदाय अलग -अलग से प्रार्थी:+ा और उपास+ा कर सक ा र्थीा। (ix) इस विवभाS+ क े बावSूद, हिंहदुओं +े + क े वल बाहरी अहा े को अप+े कब्Sे में रखा बस्जिल्क पु+रावृत्त णिशकाय ों और वि+ष्कास+ आदेश, Sो 1858 से 1885 क े बीच अणिभलेख में दS: है, क े बावSूद आं रिरक अहा े में प्रवेश Sारी रखा। (x) विब्रविर्टश सरकार +े विववाविद संरच+ा को मस्जिस्Sद मा+ े हुए दो मुसलमा+ों को ++कार प्रदा+ विकया सिS+क े अ+ुसरर्ण में उन्हों+े भव+ क े रख-रखाव पर व्यय विकए हुए खचÂ का दावा विकया र्थीा; (xi) 22/23 विदसंबर 1949 को भगवा+ राम की मूर्ति यों को हिंहदुओं द्वारा भी री अहा े में रखा गया र्थीा; (xii) 29 विदसंबर 1949 को आं रिरक अहा े को *ारा 145 क े ह संलग्न कर विदया गया सिSसक े बावSूद मसिSस्र्ट्रेर्ट +े यह सुवि+तिश्च विकया विक क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे रखी गई मूर्ति यों की पूSा Sारी रही सिSसक े पश्चा ् दीवा+ी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायालय +े 16 S+वरी 1950 को व्यादेश Sारी विकया, सिSसको 19 S+वरी 1950 को स्पष्टीक ृ विकया गया, सिSसकी पुविष्ट 3 माच: 1951 को की गई और Sो 26 अप्रैल 1955 को अंति म हो गया; (xiii) 23 विदसंबर 1949 से विहन्दुओं द्वारा पूSा Sारी रही र्थीी, Sबविक दूसरी ओर, विकसी मुस्जिस्लम +े परिरसर में प्रवेश +हीं विकया र्थीा और + ही +माज़ अदा की र्थीी; (xiv) 29 विदसंबर 1949 से हिंहदुओं द्वारा विवभाS+कारी दीवार में लगे लोहे क े वि£ल वाले दरवाSे से पूSा Sारी रही और क े वल पुSारिरयों को पूSा कर+े क े खिलए परिरसर में प्रवेश कर+े की अ+ुमति दी गई र्थीी; और (xv) सिSला न्याया*ीश +े 1 फरवरी, 1986 क े आदेश द्वारा विहन्दुओं को भी री अहा े में मूर्ति यों की पूSा कर+े की अ+ुज्ञा दे+े क े खिलए ाले और दरवाSे खोल+े का वि+देश विदया। उपरोX थ्यों क े आ*ार पर न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अव*ारिर विकया विक देव ाओं की पूSा Sारी र्थीी और कोई काय: या वि+स्जिष्क्रय ा +हीं हुई, सिSससे वादी विकसी विवशेष परिरसीमा अवति* द्वारा शासिस वाद दायर कर+े क े अति*कार का दावा कर सक ा। विवद्वा+ न्यायमूर्ति +े *ारिर विकया विक बी े सौ वषÂ में वादी क े विह को प्रति क ू ल रूप से प्रभाविव कर+े वाली एकमात्र काय: यह हो सक ा है विक विववाविद ढ़ांचे को खड़ा विकया गया र्थीा। इसक े बावSूद, हिंहदूओं द्वारा विववाविद ढ़ांचे को पूSा क े प्रयोS+ों क े खिलए प्रयोग विकया Sा रहा र्थीा। दूसरी ओर, विकसी भी मुस्जिस्लम का वि+मा:र्ण की ारीख से 1856-57 क +माS अदा कर+े का कोई उल्लेख +हीं है। उपरोX थ्यों क े दृविष्टग, विहन्दूओं क े सार्थी विवशेष ति णिर्थी पर कोई ऐसा काय: +हीं हुआ र्थीा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिSससे परिरसीमा क े प्रयोS+ों क े खिलए वाद दायर कर+े का अति*कार उत्पन्न हो ा। परिरर्णामस्वरूप न्याया*ीश +े अणिभवि+र्ण- विकया विक वाद 5 को परिरसीमा द्वारा बाति* हो+ा अव*ारिर +हीं विकया Sा सक ा। न्यायमूर्ति र्डी.वी. शमा: +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक परिरसीमा अति*वि+यम की *ारा 6 क े उद्देश्य क े खिलए देव ा अवयस्क है और इस वि+ष्कष: पर पहुंचें विक वाद 5 परिरसीमा क े अ*ी+ र्थीा।

427. अब मूल मुद्दे पर विवचार कर+ा आवश्यक हो Sा ा है विक क्या वाद 5 परिरसीमा द्वारा बाति* है। इस बा का आंकल+ कर+ा विक क्या वाद 5 परिरसीमा क े ह है या +हीं, इसमें वही स्जिस्र्थीति रही होगी विक शेष वादों (वाद 1, 3 और 4) में विकसी वादीगर्ण को पक्षकार +हीं ब+ाया गया Sो इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े समक्ष शुरू विकए गए र्थीे। वाद 5 में Sो कर्थी+ विकया गया वह इस प्रकार है विक प्रर्थीम और विद्व ीय दो+ों वाविदयों का अप+ा अलग न्यातियक व्यविXत्व है। प्रर्थीम वादी का उपासकों से स्व ंत्र अलग न्यातियक व्यविXत्व है। वादपत्र क े प्रस् र 18 में, वादी यह प्रकर्थी+ कर ा है विक पूव: वादों क े क ु छ पक्षकार Sो उपासक र्थीे वे कु छ हद क वादी देव ाओं की पूSा पर वि+यंत्रर्ण प्राप्त करक े अप+े व्यविXग विह ों की पूर्ति कर+े का प्रयास कर रहें हैं।

428. गौर लब है विक विद+ांक 29 विदसंबर 1949 को विववाविद संपखित्त की क ु क— क े बाद भी वादी देव ाओं की सेवा- पूSा Sारी रही। इसखिलए यह क: +हीं विदया Sा सक ा है विक वाद 5 में वादहे ुक 29 विदसंबर 1949 को उत्पन्न हुआ और पूSा की बा*ा या विववाविद संपखित्त की कु क— से संबंति* है। वाद 5 में दी गई दलीलें विववाविद संपखित्त क े संबं* में दायर सभी पूव: वादों को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संदर्भिभ कर ी हैं। वाद 5 में प्रति वाविदयों में मुस्जिस्लम और हिंहदू पक्षकारों और राज्य और उसक े अति*कारिरयों क े अलावा वाद 1, 3 और 4 क े वादी शाविमल हैं। वाद 5 इस दलील पर आ*ारिर है विक वास् व में, देव ाओं क े विह को उ+ व्यविXयों या संस्र्थीाओं द्वारा सुरतिक्ष +हीं विकया Sा रहा र्थीा Sो पूव: काय:वाही संचाखिल कर रहे र्थीे। Sब वाद 5 संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, ो प्रर्थीम और विद्व ीय वादी क े विवति*क व्यविXत्व को न्यायवि+र्ण- +हीं विकया गया र्थीा। वाद 5 क े संस्र्थी+ पर, वाद 3 और वाद 4 में वादीगर्णों +े साफ -साफ इ+कार विकया विक दूसरा वादी उपास+ा की एक स्व ंत्र वस् ु और विवति*क व्यविX र्थीा। आगे, देव ा भगवा+ राम क े विह को संरतिक्ष + कर+े की वाविदयों की आशंका क े संबं* में, 14 अगस् 1989 को दायर अप+े खिलखिख कर्थी+ में वि+म ही अखाड़ा द्वारा खिलए गए रुख में पया:प्त रूप से स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। वि+म ही अखाड़ा +े इ+कार कर विदया विक वादीगर्ण विकसी भी अ+ु ोष क े अति*कारी हैं, और इस दलील को स्र्थीाविप विकया विक सिSस परिरसर का वादीगर्णों +े उल्लेख विकया है वह वि+म ही अखाड़ा से संबंति* है और वादीगर्ण "वि+म ही अखाड़ा क े अति*कार और स्वत्वों क े विवरूद्ध घोषर्णा " की मांग का अति*कार +हीं रख े हैं। वास् व में, वि+म ही अखाड़ा +े वाद का अर्थीा:न्वय+ "वि+म ही अखाड़ा क े मंविदर को ध्वस् कर+े की *मकी सिSसक े खिलए अखाड़ा का वाद लस्जिम्ब है" क े रूप में विकया है। वि+म ही अखाड़ा +े यह दलील दी विक भगवा+ राम की मूर्ति को अयोध्या क े राम Sन्मभूविम में +हीं, बस्जिल्क राम Sन्मभूविम मंविदर क े रूप में ज्ञा मस्जिन्दर में स्र्थीाविप विकया गया है, सिSसक े प्रभार और प्रबं*+ क े खिलए वि+म ही अखाड़ा +े अप+ा मुकदमा दायर विकया र्थीा। वादी द्वारा मांगे गये व्यादेश अ+ु ोष क े Sवाब में, वि+म ही अखाड़ा +े यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दलील दी विक क े वल उसे ही मंविदर क े वि+यंत्रर्ण, पय:वेक्षर्ण, और मरम्म का अति*कार है और यविद आवश्यक हो ो पु+ः वि+मा:र्ण का भी अति*कार है। वि+म ही अखाड़ा +े यह दलील दी विक न्यास सिSसका गठ+ 1985 में विकया गया है उसमें वि+म ही अखाड़ा क े स्वत्व और विह को +ुकसा+ पहुंचा+े की "स्पष्ट ब+ावर्ट" मौSूद र्थीी। वाद 5 की पोषर्णीय ा पर, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और वि+म ही अखाड़ा दो+ों +े समा+ आपखित्तयां उठाई ं, Sो व:मा+ काय:वाही क े दौरा+ उठाए गए उ+क े रुख से पु+ः पुष्ट हो चुकी हैं। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की रफ से र्डॉ. राSीव *व+ +े यह क: विदया विक यद्यविप वाद 3 परिरसीमा से बाति* है, ब भी वि+म ही अखाड़ा का सेवाय क े रूप में दावा प्राप्त कर+े की अति*कार समाप्त +हीं हो ा है। यह क: विदया गया विक वि+म ही अखाड़ा एक शेवाय है इसखिलए वाद पोषर्णीय +हीं है। वाविदयों का प्रकरर्ण इस प्रकार है विक चूँविक देव ा को पूव: र वाद में पक्षकार +हीं ब+ाया गया र्थीा इसखिलए वाद 5 क े संस्र्थी+ की आवश्यक ा हुई और इस आशंका पर आ*ारिर र्थीा विक मौSूदा वादों में देव ा भगवा+ राम क े स्व ंत्र विह ों और चिंच ाओं को सुरतिक्ष विकये विब+ा प्रमुख पक्षकारों क े व्यविXग विह ों को सा*ा Sा रहा र्थीा, यह काय:वाही द्वारा ठीक और सही माय+े में उत्पन्न हुई है क्योंविक उन्हों+े इस न्यायालय क े समक्ष चल रही काय:वाही में इसका रहस्योघार्ट+ विकया है। वाद क े संस्र्थी+ क े खिलए वाद हे ुक क े आ*ार का उतिच अर्थीा:न्वय+ कर+े पर वाद 5 में वादहे ुक को परिरसीमा द्वारा बाति* +हीं मा+ा Sा सक ा है। वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर वाद (वाद 3) रामSन्म भूविम मंविदर क े रूप में वर्भिर्ण क े प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए र्थीा। उ+का सेवाय हो+े का दावा वाद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 3 क े संस्र्थी+ की ति णिर्थी क न्यायवि+र्ण- +हीं विकया गया र्थीा। यह विवति* ः सेवाय +हीं र्थीा (कोई समप:र्ण विवलेख +हीं है) और इसक े थ्य ः सेवाय क े दावे को साक्ष्य पर स्र्थीाविप कर+ा र्थीा। वाद 5 इस दलील पर आ*ारिर है विक देव ा भगवा+ राम क े विह ों और चिंच ाओं की रक्षा +हीं की Sा रही र्थीी और पूव: क े वादों क े पक्षकार अप+े विह ों को सा* रहे र्थीे। चूंविक, वि+म ही अखाड़ा +े अप+े बचाव में स्वयं क े अणिभकणिर्थी "अति*कार एवं स्वत्व" एवं "स्वत्व और विह " पर अवलम्ब ले+े की मांग कर े हुए प्रबं*+ और प्रभार क े दावे से परे चले गये, सिSसका उल्लेख ऊपर विकया गया है। वाद विमत्र क े माध्यम से इसक े विह ों की रक्षा क े खिलए देव ा की हकदारी को, अप+ी चु+ौ ी को सहारा दे+े क े खिलए सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोड़: +े सेवाय क े रूप में वि+म ही अखाड़ा क े हे ु को समर्भिर्थी कर इसक े सार्थी संयुX हे ु का वि+मा:र्ण विकया। वि+म ही अखाड़ा का अप+े देव ा क े प्रति पक्षˆोही विह हो Sा ा है Sब वह अप+े खुद क े स्वत्व और विह की बा कर ा है। इस पृष्ठभूविम में देव ा भगवा+ राम की ओर से वाद 5 में सिSस हे ु की दलील दी गयी उसे परिरसीमा काल से परे +हीं अणिभवि+*ा:रिर Sा सक ा है।

429. श्री परासर+ +े कर्थी+ विकया विक वाद 5 आवश्यक रूप से भविवष्य की ओर देख ा है और राम Sन्मभूविम पर भगवा+ राम को समर्मिप मंविदर क े वि+मा:र्ण की आवश्यक ा को ब ा ा है। र्डा. *व+ +े इसका सार्थी ही सार्थी 1985 में गविठ न्यास और व्यापक एSेंड़ा क े रूप में न्यास की आलोच+ा की सिSसक े परिरर्णामस्वरूप 1992 की घर्ट+ा घविर्ट हुई। Sब हम यह य करे रहें हो विक क्या का+ू++ वाद 5 परिरसीमा द्वारा बाति* है यह क: हमारे विवचार में कारक +हीं हो सक ा है। सी*े शब्दों में कहें, ो वाद 5 में यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दलील दी गयी है विक पूव: वाद में देव ा पक्षकार +हीं र्थीे इस आ*ार पर पूव: वादों, सिSसमें हिंहदुओं द्वारा दायर वाद सस्जिम्मखिल है, उ+में इ+क े विह ों और चिंच ाओं को अच्छे से रतिक्ष +हीं विकया Sा रहा र्थीा। न्यायमूर्ति अ£वाल +े सिS+ कÂ क े बल पर वाद 5 को उपरोX उसिल्लखिख विवस् ार क परिरसीमा क े भी र मा+ा, वह क: स्वीकार कर+े योग्य हैं। उपरोX क े आ*ार पर यह मा+ा Sा+ा चाविहए विक वाद 5 का संस्र्थी+ परिरसीमा अवति* क े भी र र्थीा। ए+. 8 1985 का वाद और पूव:न्याय विववाद्यक

430. पूव: न्याय की दलील वाद की अन् व:स् ु और परिरमार्ण पर आ*ारिर है सिSसे महं रघुबर दास द्वारा रामचबू रा पर मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए तिर्डक्री की मांग कर े हुए 1885 में दायर विकया गया र्थीा। क्या पूव:न्याय का सिसद्धान् आकर्मिष हो ा है इस पर विववि+र्मिदष्ट विववाद्यों को वाद 1, 4 और 5 में उठाया गया र्थीा। वाद 1 विववाद्य 5(ख)- क्या वाद की सम्पखित्त मूल वाद 61/280 1885 उप- न्याया*ीश, फ ै Sाबाद क े न्यायालय में रघुबर दास महं ब+ाम राज्य सतिचव, भार संघ एवं अन्य में अन् र्मि+विह है। विववाद्य 5(ख)- क्या यह वादी क े विवरुद्ध विववि+तिश्च विकया गया र्थीा। विववाद्य 5(ग)- क्या हिंहदुओं को वाद की Sा+कारी र्थीी और क्या सभी हिंहदू इसमें विह रख े र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विववाद्य 5 (घ)- क्या यह वि+र्ण:य, पूव: न्याय और अन्य विकसी द्वारा व:मा+ वाद को बाति* कर ा है। वाद 4 विववाद्य 7(क)- क्या वादी महं रघुबर दास +े, Sो वाद 61/280 वष: 1885 में वादी हैं, Sन्मस्र्थीा+ और Sन्मस्र्थीा+ में विह बद्ध सभी व्यविX वि+कायों की ओर से वाद दायर विकया र्थीा। विववाद्य 7(ख)-क्या मोहम्मद असगर कणिर्थी बाबरी मस्जिस्Sद क े मु वल्ली र्थीे और क्या उन्हों+े ऐसी विकसी भी मस्जिस्Sद क े खिलए और उसकी ओर से मुकदमा लड़ा र्थीा। विववाद्य 7(ग)- क्या उX वाद में वि+र्ण:य क े दृविष्टग, व:मा+ वाद क े वाविदयों सविह विहन्दू समुदाय क े सदस्यों को, सिS+क े अं ग: विवरो*ी प्रति वादी भी हैं, वाद£स् संपखित्त पर मुस्जिस्लम समुदाय क े हक को म+ा कर+े से विववस्जिन्* विकया गया है; यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव. विववाद्य 7(घ)- क्या पूव X वाद में, वाद£स् संपखित्त या उसक े विकसी भाग पर मुस्जिस्लमों क े हक को उस वाद क े वादी द्वारा स्वीकार विकया गया र्थीा; यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव। विववाद्य 8- क्या 1885 का वाद 6/280, महं रघुबर दास ब+ाम राज्य सतिचव और अन्य क े मामले में पारिर वि+र्ण:य, वाद में प्रति वाविदयों क े विवरूद्ध पूव:न्याय से प्रभाविव है। वाद 5 विववाद्य 23- क्या महं रघुबर दास द्वारा विवशेष न्याया*ीश फ ै Sाबाद क े न्यायालय में दायर वाद 61/280 वष: 1885 में पारिर वि+र्ण:य विवबं*+ और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पूव:न्याय क े सिसद्धान् ों क े ह बाध्यकारी है Sैसा विक प्रति वादीगर्ण 4 और 5 द्वारा अणिभकणिर्थी है। 1885 का वादपत्र

431. 1885 में दायर वाद महं रघुबर दास द्वारा संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा सिSसमें उन्हो+ें स्वयं को "महं Sन्मस्र्थीा+, अयोध्या" ब ाया। प्रारम्भ में वाद सतिचव, भार सरकार क े विवरूद्ध दायर विकया गया र्थीा। 1885 में दायर वाद का वाद-पत्र वि+म्+ा+ुसार हैः- "समक्ष मुंसिसफ न्यायालय, साविहब बहादुर महं रघुबर दास महं Sन्मस्र्थीा+, अयोध्या …………वादी ब+ाम सतिचव, भार सरकार, परिरषद सत्र ……...प्रति वादी वादी +े वि+म्+ा+ुसार कर्थी+ विकया: यह वाद मंविदर क े वि+मा:र्ण की अ+ुमति प्रदा+ कर+े क े खिलए है सिSसमें प्रति वादी क े विवरूद्ध वि+षे*ाज्ञा की मांग कर े हुए यह कहा गया विक वादी को Sन्मस्र्थीा+, अयोध्या में उत्तर 17 फीर्ट, पूव: 21 फीर्ट, दतिक्षर्ण 17 फीर्ट, पतिश्चम 21 फीर्ट में मंविदर क े वि+मा:र्ण से रोका +हीं Sा+ा चाविहए और बाSार मूल्य पर मंविदर की माखिलय +हीं य की Sा सक ी है इसखिलए मद 17, प्रस् र 6, परिरणिशष्ट-II, अति*वि+यम, 1870 क े अ+ुसार, न्यायालय शुल्क लगाया गया र्थीा। उस स्र्थीा+ की स्जिस्र्थीति को संलग्न मा+तिचत्र/स्क े च से अच्छी रह से Sा+ा Sा सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA *ारा 1: यह विक अयोध्या शहर, फ ै Sाबाद में स्जिस्र्थी Sन्मस्र्थीा+ हिंहदुओं क े खिलए पूSा का एक बहु पुरा+ा और पविवत्र स्र्थीा+ है और वादी इस पूSा स्र्थील का महं है। *ारा 2: यह विक Sन्मस्र्थीा+ का चबू रा पूव: -पतिश्चम 41 फीर्ट और उत्तर-दतिक्षर्ण 17 फीर्ट है सिSस पर चरर्ण पादुका रखी है उस पर एक छोर्टा मंविदर भी स्जिस्र्थी है सिSसकी पूSा की Sा ी है। *ारा 3: यह विक उX चबू रा वादी क े कब्Sे में है। चूंविक यहां पर कोई इमार +हीं +हीं ब+ी है इसखिलए वादी और अन्य फकीरों को गम- में *ूप से, मा+सू+ में बारिरश से और सर्मिदयों में कड़ाक े की ठंर्ड से साम+ा कर+ा पड़ ा है। चबू रा पर मंविदर क े वि+मा:र्ण से विकसी को कोई +ुकसा+ +हीं पहुंचेगा। विकन् ु, मंविदर क े वि+मा:र्ण से वादी और अन्य फकीरों और श्रद्धालुओं को राह विमलेगी। *ारा 4: यह विक माच: और अप्रैल 83 क े दौरा+ उपायुX बहादुर फ ै Sाबाद +े, क ु छ मुसलमा+ों द्वारा मंविदर ब+ाये Sा+े की आपखित्त क े कारर्ण, इस याची +े इस प्रकरर्ण से संबंति* इस यातिचका को स्र्थीा+ीय सरकार क े पास प्रेविष विकया, Sहां पर इसका कोई Sवाब +हीं विमला। ब वादी +े 18 अगस् 1883 को दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा की *ारा 444 क े ह यर्थीा अपेतिक्ष एक +ोविर्टस सतिचव, स्र्थीा+ीय सरकार क े काया:लय को भेSा, लेविक+ इसका भी कोई Sवाब +हीं विदया गया। इसखिलए वि+षे*ज्ञा की ति णिर्थी से अयोध्या में इस न्यायालय क े क्षेत्राति*कार क े ह वाद दायर कर+े का कारर्ण उत्पन्न हो Sा ा है। *ारा 5: यह विक एक सुभेच्छ ु प्रSा क े पास अप+ी इच्छा+ुसार अप+े स्वाविमत्व और कब्Sे की भूविम पर वि+मा:र्ण का अति*कार हो ा है। यह वि+ष्पक्ष और न्यायपूर्ण: सरकार का क:व्य है विक वह अप+े प्रSा की रक्षा करे और उन्हें अप+े अति*कारों को प्राप्त कर+े में सहाय ा प्रदा+ करें और का+ू+ र्थीा व्यवस्र्थीा को ब+ाये रख+े का उतिच प्रबं* करें। इसखिलए वादी अयोध्या में रामSन्मस्र्थीा+ चबू रे पर मंविदर क े वि+मा:र्ण की आज्ञविप्त पारिर विकये Sा+े की प्रार्थी:+ा कर ा है Sो उत्तर में 17 फीर्ट, पूव: में 41 फीर्ट, दतिक्षर्ण में 17 फीर्ट और पतिश्चम में 41 फीर्ट है और यह भी देख+े क े खिलए विक प्रति वादी मंविदर क े वि+मा:र्ण पर + कोई रोक लगाये और + ही दखलंदाSी करे और प्रति वादी द्वारा वाद खच: का वह+ विकए Sा+े का आदेश विदया Sाए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मैं रघुबर दास, महं Sन्मस्र्थीा+, अयोध्या प्रमाणिर्ण कर ा हूं विक वादपत्र क े कर्थी+ और सभी पाँचों विबन्दु मेरे ज्ञा+ सत्य हैं और इसमें क ु छ भी +हीं णिछपाया गया है। हस् ाक्षर महं S+मस्र्थीा+ (विहन्दी में)।" (प्रभाव वर्ति* ) वादी +े कहा विक Sन्मभूविम का स्र्थीा+ प्राची+ और पविवत्र है और हिंहदुओं क े खिलए पूSा का स्र्थीा+ है। वादी +े दावा विकया विक वह इस पूSास्र्थील का महं है। सिSस स्र्थीा+ का उल्लेख "Sन्मस्र्थीा+ चबू रा" क े रूप में विकया गया है वह पूव:-पतिश्चम में 41 फीर्ट और उत्तर-दतिक्षर्ण में 17 फीर्ट है। यह अणिभकणिर्थी विकया गया र्थीा विक वहाँ पर एक चरर्ण पादुका लगी र्थीी और छोर्टा सा मंविदर र्थीा सिSसकी पूSा की Sा ी र्थीी। वादी +े दावा विकया विक चबू रा उसक े कब्Sे में र्थीा। वादी +े कहा विक उसे और अन्य फकीरों को सख् मौसम में असुविव*ा का साम+ा कर+ा पड़ ा र्थीा और चबू रा पर मंविदर क े वि+मा:र्ण से विकसी को कोई हावि+ पहुंचेगी। हालांविक, यह कहा विक उपायुX, फ ै Sाबाद +े मंविदर क े वि+मा:र्ण का विवरो* विकया र्थीा और 18 अगस् 1883 को सिसविवल प्रविक्रया संविह ा क े ह +ोविर्टस विदये Sा+े क े बावSूद, सरकार +े कोई कार:वाई +हीं की र्थीी। उस दावे का आ*ार यह र्थीा विक विकसी "प्रSा" को उस भूविम पर भव+ ब+ा+े का अति*कार है Sो उसक े पास है और उसक े स्वाविमत्व में है। 1885 में खिलया गया बचाव mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

432. हालांविक मुसलमा+ों को मूल रूप से वाद क े पक्षकारों क े रूप में अणिभयोसिS +हीं विकया गया र्थीा, मोहम्मद असगर +े मु वल्ली की अप+ी क्षम ा में पक्षकार ब+ाये Sा+े क े खिलए आवेद+ विकया और उन्हें वाद में पक्षकार ब+ा विदया गया। मोहम्मद असगर +े अप+े खिलखिख कर्थी+ में यह दलील दी विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर +े विकया र्थीा। उन्हों+े कहा विक वह वादी स्वाविमत्व का दावा +हीं कर सक ा सिSस+े दलील क े समर्थी:+ में सम्रार्ट या उस समय क े शासक से संबंति* कोई साम£ी प्रस् ु +हीं की है। मूल ः Sो बचाव खिलया गया वह इस प्रकार है: (i) वादी का चबू रा पर कोई स्वत्व +हीं र्थीा; (ii) उपास+ा क े प्रयोS+ों क े खिलए आ+ा और Sा+ा स्वाविमत्व साविब +हीं कर ा है; (iii) चबू रा 1857 में अस्जिस् त्व में आया; और (iv) चबू रा क े वि+मा:र्ण से विकसी प्रकार का स्वाविमत्व का अति*कार प्राप्त +हीं हो ा और सरकार द्वारा इस पर +ए वि+मा:र्ण को रोका गया र्थीा सिSसक े परिरर्णामस्वरूप फकीर द्वारा इस पर ब+ायी गयी झोपड़ी को ध्वस् कर विदया गया र्थीा। यह क: विदया गया विक उस स्र्थीा+ पर हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े मध्य विववाद चल रहा है सिSसक े परिरर्णामस्वरूप साम्प्रदातियक घर्ट+ाएँ हुई ं। वि+ष्कष:

433. उप-न्याया*ीश, फ ै Sाबाद +े 24 विदसंबर 1885 क े अप+े फ ै सले में उस क्षेत्र पर हिंहदुओं क े कब्Sे और स्वाविमत्व को स्वीकार कर खिलया Sो मस्जिस्Sद की दीवार से तिघरी र्थीी। हालांविक, उप-न्याया*ीश +े कहा विक यविद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मंविदर क े वि+मा:र्ण की अ+ुमति दी Sा ी ो दो समुदायों क े बीच का+ू+ और व्यवस्र्थीा को ख रे में र्डाल+े वाली एक गंभीर स्जिस्र्थीति उत्पन्न हो Sा ी। उप- न्याया*ीश +े वि+म्+व अव*ारिर विकया: "उपरोX क े अति रिरX Sहां पर मंविदर र्थीा वहीं पर ठाकु रSी की मूर्ति रखी गयी र्थीी और उसकी पूSा हो ी र्थीी। चबू रा वादी क े कब्Sे में है और उस पर Sो क ु छ भी चढ़ाया Sा ा है वह वादी द्वारा ले खिलया Sा ा है। वादी का कब्Sा वादी क े गवाह द्वारा सिसद्ध विकया गया हैं और हिंहदुओं र्थीा मुसलमा+ों की सीमा को अलग कर+े वाली रेलिंलग दीवार लंबी अवति* से वहां पर मौSूद है... वष: 1855 में, हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच झगड़े क े बाद विववाद से बच+े क े खिलए रेलिंलग क े रूप में एक दीवार खड़ी की गई र्थीी। ाविक मुसलमा+ उसक े भी र उपास+ा कर सक ें और विहन्दू उसक े बाहर उपास+ा कर सक ें । इसखिलए चबू रा क े सार्थी बाहर की Sमी+ Sो वादी क े कब्Sे में है, हिंहदुओं की है। यद्यविप वह स्र्थीा+ Sहां विहन्दू पूSा कर े हैं वह प्राची+ काल से इस पर काविबS हैं इसखिलए उ+क े कब्Sें मस्जिस्Sद क े दीवार क े आस-पास क े क्षेत्र क े संबं* में आक्षेप +हीं हो सक ा है और बाहरी दीवार पर अल्लाह का +ाम उत्कीर्ण: र्थीा।" उपरोX वि+ष्कषÂ क े बावSूद विक वह स्र्थीा+ हिंहदुओं क े कब्Sे और स्वाविमत्व में र्थीा विफर भी मुकदमा खारिरS कर विदया गया क्योंविक इससे का+ू+ और व्यवस्र्थीा को गंभीर ख रा र्थीा। अपील में, विवचारर्ण न्यायालय क े वाद को खारिरS कर+े क े वि+र्ण:य को सिSला न्याया*ीश, फ ै Sाबाद द्वारा विद+ांक 18/26 माच: 1886 को पुष्ट कर विदया गया। सिSला न्याया*ीश +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक Sबविक यह दुभा:ग्यपूर्ण: र्थीा विक हिंहदु सिSसे पविवत्र स्र्थीा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मा+ े र्थीे उस भूविम पर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, घर्ट+ा Sो ी+ श ाब्दी पहले घविर्ट हुई र्थीी, उसका वि+दा+ +हीं विकया Sा सक ा है: "यह बहु ही दुभा:ग्यपूर्ण: है विक सिSस स्र्थीा+ को विहन्दू विवशेष या पविवत्र भूविम मा+ े र्थीे उस स्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। विकन् ु वह घर्ट+ा 356 वष: पूव: हुई, इसखिलए समस्याओं क े वि+दा+ क े खिलए काफी देर हो चुकी है, अब Sो भी विकया Sा सक ा है वह यह है विक पक्षकारों क े मध्य यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाये रखा Sाए।" सिSला न्याया*ीश +े स्र्थील वि+रीक्षर्ण क े बाद यह विर्टप्पर्णी की विक चबू रे पर विहन्दू काविबS र्थीे सिSस पर " म्बू क े रूप में, एक छोर्टा सी लकड़ी की अति*संरच+ा" ब+ायी गयी र्थीी। ऐसा कहा गया विक यहां पर भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा। वाद का वि+स् ारर्ण कर े हुए सिSला न्याया*ीश इस वि+ष्कष: पर पहुंचे विक विवचारर्ण न्यायालय +े अप+े वि+र्ण:य में कब्Sे और स्वाविमत्व क े संबं* में Sो अवलोक+ विकये र्थीे, वह अ+ावश्यक है अ ः इसको अणिभखस्जि°ड़ विकया Sाए। प्रर्थीम अपीलीय अदाल का वि+र्ण:य न्यातियक आयुX, अव* क े समक्ष लाया गया सिSस+े 2 +वंबर 1886 को मुकदमे को खारिरS कर+े की पुविष्ट की र्थीी। न्यातियक आयुX +े इस प्रकार अव*ारर्ण विकया: "सामान्य ः मामला यह है विक अयोध्या क े विहन्दू अयोध्या में उस कस्जिल्प पविवत्र स्र्थीा+ पर... संगमरमर का मंविदर ब+ा+ा चाह े र्थीे सिSसे वे श्री राम चन्ˆ का Sन्म स्र्थीा+ मा+ े र्थीे। अब यह स्र्थीा+ उस Sगह स्जिस्र्थी है सिSसक े आसपास बाबर +े अप+े बब:र ा और ा+ाशाही क े चल े 350 वष: पूव: मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कराया र्थीा। हिंहदू पौराणिर्णक कर्थीा क े अ+ुसार बाबर +े अप+े मस्जिस्Sद क े खिलए इसी स्र्थीा+ का चु+ाव विकया र्थीा। ऐसा प्र ी हो ा है विक हिंहदुओं क े पास मस्जिस्Sद से लगी क्षेत्र में क ु छ स्र्थीा+ों पर आ+े Sा+े क े सीविम अति*कार र्थीे। वे लगा ार कई वषÂ से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अप+े अति*कारों को बढ़ा+े और अहा े में दो स्र्थीा+ों पर इमार ब+ा+े का प्रयास कर रहें हैं Sो इस प्रकार हैंः (1) सी ा की रसोई (ब) रामचंˆ की Sन्म भूविम। काय:कारी प्राति*कारिरयों +े इ+ अति क्रमर्णों का लगा ार दम+ विकया है और 'यर्थीा स्जिस्र्थीति ' में विकसी भी बदलाव से इंकार कर विदया। मेरा मा++ा है विक उ+की ओर से उठाया गया यह कदम बहु ही बुतिद्धमत्तापूर्ण: और उतिच प्रविक्रया क े ह है। मेरा आगे यह मा++ा है विक दीवा+ी न्यायालयों +े वादी क े दावे को खारिरS कर विदया है, Sो उतिच है। इस अपील की दलीलें… मामले क े थ्यों एवं विकसी दस् ावेS द्वारा समर्भिर्थी +हीं हैं Sो विक मेरे समक्ष हैं… सिसविवल न्यायालय की अति*कारिर ा की परिरसीमाओं क े संबं* में वि+चली अपील अदाल क े क ु छ क: । हालांविक मैं उ+क े अंति म वि+ष्कष: से सहम हूं सिSस वि+ष्कष: पर न्यायालय पहुंचे- और मुझे प्रर्थीम बार क े न्यायालय द्वारा पारिर वि+र्ण:य क े विकसी भाग की शब्द संरच+ा में संशो*+ कर हस् क्षेप कर+े का कोई कारर्ण प्र ी +हीं हो ा है। यहां अणिभलेख पर ऐसा कु छ भी +हीं है सिSससे यह दर्भिश हो विक वादी विकसी भी अर्थी: में विववाविद भूविम का माखिलक है। सभी अदाल ीय वाद खचÂ सविह यह अपील खारिरS की Sा ी है।" दलीले

434. न्यातियक आयुX क े उपरोX अवलोक+ों का अवलम्ब लेकर, विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री शेखर +फार्डे +े वि+र्ण:य से पांच पहलूओं पर Sोर विदया Sो इस प्रकार हैः (i) मस्जिस्Sद का अस्जिस् त्व; (ii) वि+कर्ट क्षेत्र में चबू रे का वि+मा:र्ण; (iii) विहन्दुओं क े पहुंच क े सीविम अति*कार की उपलब्* ा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) विहन्दुओं द्वारा प्रयत्+ विकए गए अति क्रमर्ण पर काय:पाखिलका द्वारा अति*रोविप वि+बã*+; और (v) स्वाविमत्व और कब्Sे क े खिलए हिंहदुओं क े दावे की अस्वीक ृ ति ।

435. इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े ी+ों न्याया*ीशों +े पूव: न्याय की दलील को खारिरS कर विदया। न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ +े अणिभवि+र्ण- विकया विक 1885 में वि+र्ण- वाद एकमात्र इस हिंबदु पर र्थीा विक दो+ों समुदायों क े बीच दंगों की संभाव+ा को कम कर+े क े खिलए यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रखी Sा+ी चाविहए। उ+क े विवचार में: "उX वाद का वास् विवक वि+र्ण:य, विववाद क े वि+स् ारर्ण को म+ा कर दे+ा र्थीा।" उपरोX वि+ष्कष: पर कर्टाक्ष कर श्री +ापर्डे +े कहा विक विवद्वा+ न्याया*ीश का यह वि+ष्कष: त्रुविर्टपूर्ण: र्थीा विक 1885 क े वाद में विकसी सारवा+ थ्य को वि+र्ण- +हीं विकया गया र्थीा। उन्हों+े कहा विक न्यातियक आयुX क े फ ै सले से दर्भिश हो ा है विक उस क्षेत्र में हिंहदुओं क े पहुंच क े सीविम अति*कार र्थीे और कब्Sे और स्वाविमत्व का दावा खारिरS हो गया।

436. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अणिभवि+र्ण- विकया विक 1885 क े वाद में एकमात्र विववाद चबू रा पर वि+मा:र्ण की मांग को लेकर र्थीा। अ ः वाद विववाविद स्र्थील या भव+ से पूरी ौर पर संबंति* +हीं र्थीा और विववाविद भूविम क े विकसी भाग क े संबं* में स्वाविमत्व या कब्Sे का अति*कार अन् र्मि+विह +हीं र्थीा। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अणिभवि+र्ण- विकया विक सिS+ वादों का उच्च न्यायालय द्वारा न्यायवि+र्ण:य+ विकया Sा रहा र्थीा, उससे णिभन्न 1885 में दायर वाद में क े वल सम्पखित्त का क े वल एक भाग अन् र्मि+विह र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

437. इ+ वि+ष्कषÂ पर कर्टाक्ष कर श्री +ेफड़े +े न्यायालय से वि+म्+खिलखिख याच+ा की: (i) न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल इस भाव से पूव:व - वाद में न्यातियक आयुX क े वि+ष्कषÂ का अवलोक+ कर+े में असफल रहे विक विववाविद स्र्थीा+ पर हिंहदुओं क े आ+े Sा+े क े अति*कार सीविम र्थीे र्थीा उ+क े पास कब्Sे या स्वाविमत्व का कोई अति*कार +हीं र्थीा; (ii) पूव: न्याय क े विवषय पर वि+ष्कष:, क े. इणिर्थीराS+ v लक्ष्मी261 में पारिर इस न्यायालय क े वि+र्ण:य क े विवपरी है, Sहाँ पर यह अणिभवि+र्ण- विकया गया है विक पूव: न्याय का सिसद्धान् ऐसी परिरस्जिस्र्थीति में भी आकर्मिष होगा Sहां पूव:व - वाद में सम्पखित्त का क े वल एक भाग विववाविद र्थीा, Sबविक पश्चा व - वाद में पूरी सम्पखित्त दावे की विवषय वस् ु ब+ Sा ी है; और (iii) न्यायमूर्ति अ£वाल +े यह भी अणिभवि+र्ण- विकया विक न्यायालय क े समक्ष ऐस क ु छ थ्य प्रस् ु +हीं विकया गया सिSससे यह दर्भिश हो विक विहन्दू बड़े पैमा+े पर पूव:व - वाद से अवग र्थीे। Sब 1885 का वाद दायर विकया गया र्थीा उस समय दो समुदायों क े बीच झगड़ा उत्पन्न हो गया र्थीा सिSससे का+ू+ और व्यवस्र्थीा क े खिलए एक गंभीर चु+ौ ी पैदा हो गयी र्थीी। अ ः साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 114 क े ह यह वि+ष्कष: वि+काला Sा सक ा है विक हिंहदुओं को वाद क े विवषय में Sा+कारी र्थीी। प्रार्थीविमक थ्यों से एक युविXयुX वि+ष्कष: वि+काला 261 (2003) 10 एससीसी 578 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा सक ा है, भले ही पूव: वाद क े संस्र्थी+ क े विवषय में हिंहदुओं की Sा+कारी संबं*ी कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य + हों। न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:, Sब इस वि+ष्कष: पर र्थीे विक पूव: न्याय का सिसद्धान् को आकर्मिष +हीं हुआ, ब उन्हों+े अणिभवि+र्ण- विकया विक पूव: वाद प्रति वि+ति*त्व प्रक ृ ति का +हीं र्थीा क्योंविक सिसविवल प्रविक्रया संविह ा 1882 की *ारा 539 क े ह दी गयी लोक सूच+ा की आवश्यXाओं का अ+ुपाल+ +हीं विकया गया र्थीा। विवद्वा+ न्याया*ीश +े अवलोक+ विकया विक पूव: वाद क े कोई भी पक्षकार व:मा+ में चल रही काय:वाही क े पक्षकार +हीं र्थीे, और + ही विवषय वस् ु समा+ र्थीी क्योंविक पूव: वाद क े वल चबू रा से संबंति* र्थीा। इ+ वि+ष्कषÂ को चु+ौ ी दे े हुए, श्री +फाड़े +े कहा विक पूव: वाद में Sो वाद पत्र र्थीा वह हिंहदुओं क े लाभ क े खिलए र्थीा; सतिचव, राज्य परिरषद +े समुदाय क े सभी वगÂ का प्रति वि+ति*त्व विकया, और विकसी भी स्जिस्र्थीति में, *ारा 539 क े ह लोक सूच+ा का + विदया Sा+ा पूव: न्याय की बा*ा को दूर +हीं करेगा। उन्हों+े कहा विक सिसविवल प्रविक्रया संविह ा262 की *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण VI आदेश 1 वि+यम 8 क े विवषया*ी+ +हीं है।

438. प्रांङ्गन्याय की दलील पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों में से प्रत्येक द्वारा अणिभखिलखिख विकए गए वि+ष्कषÂ को चु+ौ ी दे+े क े अलावा, श्री +फाड़े +े कहा है विक सीपीसी 1908 की *ारा 11 में वि+विह प्राव*ा+ वि+म्+खिलखिख कारर्णों से आकर्मिष हो े हैं: 262 *ारा 11 इस प्रकार प्राव*ा+ कर ी हैःः स्पष्टीकरर्ण VI- Sहाँ कोई व्यविX विकसी लोक अति*कार क े या विकसी ऐसे प्राइवेर्ट अति*कार क े खिलए सद्भाव+ापूव:क मुकदमा कर े हैं सिSसका वे अप+े खिलए और अन्य व्यविXयों क े खिलए सामान्य ः दावा कर े हैं वहाँ ऐसे अति*कार से विह बद्ध सभी व्यविXयों क े बारे में इस *ारा क े प्रयोS+ों क े खिलए यह समझा Sाएगा विक वे ऐसे मुकदमा कर+े वाले व्यविXयों से व्युत्पन्न अति*कार क े अ*ी+ दावा कर े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) पक्षकारों क े मध्य पूव: र वाद में यह थ्य प्रत्यक्ष ः और सार ः विववाद्यक रहा है: (क) विहन्दुओं क े कब्Sे क े स्वाविमत्व क े दावे को न्यातियक आयुX +े 1885 क े वाद में +ामंSूर कर विदया र्थीा; और (ख) पूव: र वाद में मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व को कोइ: चु+ौ ी +हीं दी गयी र्थीी, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप मुस्जिस्लमों क े हक और अति*कार की अं र्मि+विह स्वीक ृ ति है, (ii) पूव:व - वाद में वादी सिSस+े स्वयं को Sन्मस्र्थीा+ क े महं क े रूप में वर्भिर्ण विकया है, अवि+वाय: रूप से हिंहदुओं क े वाद हे ुक का प्रति वि+ति*त्व कर ा है और इसखिलए पूव: न्याय का सिसद्घान् लागू होगा। पूव:व - वाद ''उन्हीं पक्षकारों क े बीच र्थीा या उ+ पक्षकारों क े बीच र्थीा सिS+क े ह वे या उ+में से कोई एक ही हक क े ह मुकदमेबाSी का दावा कर े हैं”; और (iii) पूव: वाद में वाद हे ुक वही है Sो व:मा+ मामलों क े समूह में है। हिंहदुओं द्वारा दावा की गई संपखित्त का स्वत्व दो+ों वादों में समा+ है और वाद हे ुक मंविदर क े वि+मा:र्ण क े अति*कार पर आ*ारिर है। इ+ आ*ारों पर, श्री +ेफाड़े +े क: विदया विक *ारा 11 क े सार्थी सीपीसी क े भाग 4 को पढ़+े पर पूव: न्याय का वS:+ आकर्मिष हो ा है। उन्हों+े आ£ह विकया विक 1882 की संविह ा की *ारा 30 (सीपीसी 1908 क े आदेश 1 वि+यम 8 क े समा+) क े प्राव*ा+ों का पाल+ कर+े में विवफल ा से कोई फक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं पड़+ा चाविहए क्योंविक *ारा 11 क े प्राव*ा+ आदेश 1 वि+यम 8 क े अ*ी+ +हीं हैं। श्री +ेफार्डे +े यह भी आ£ह विकया विक *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण IV क े ह प्रलतिक्ष पूव: न्याय का सिसद्धां आकर्मिष हो ा है। अं में, उन्हों+े क: विदया विक 1885 क े वाद क े पूव: र वि+ष्कष:, विववन्*+ क े मुद्दे क े रूप में काम करेंगे और चूंविक पूव: वाद का आदेश सव:बन्*ी आदेश र्थीा। सभी हिंहदू वि+ष्कष: से बं*े होंगे। उन्हों+े आ£ह विकया विक योS+ा, Sो 1885 क े वाद में संलग्न र्थीी, वह अवि+वाय: रूप से समा+ र्थीी और इसखिलए अणिभलेख क े द्वारा विवबन्*+ का सिसद्धां आकर्मिष होगा। कÂ का विवराे* कर े हुए, वाद सं.[5] में वाविदयों की ओर से उपस्जिस्र्थी विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े परासर+ द्वारा कहा गया विक पूव: न्याय का सिसद्धां वि+म्+खिलखिख कारर्णों से आकर्मिष +हीं हो ा है: क. पक्षकार अलग अलग हैं: (i) + ो देव ा (वाद 5 में वाविदगर्ण) और + ही सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: (वाद 4 में वादी) 1885 क े वाद क े पक्षकार र्थीे; और (ii) 1885 का वाद महं रघुबर दास द्वारा प्रति वि+ति* की हैसिसय से संस्जिस्र्थी +हीं विकया गया र्थीा ख. यह मुकदमा चबू रा पर एक मंविदर ब+ा+े क े खिलए एक व्यविXग अति*कार का दावा कर+े क े खिलए र्थीा:

(i) Sब पूव: र वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा ो दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा 1908 क े आदेश I वि+यम 8 से संबंति* सिसविवल प्रविक्रया संविह ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1882 की *ारा 30, Sो प्रवृत्त र्थीी, क े ह आवेद+ प्रस् ु +हीं विकया गया र्थीा; (ii) + ो देव ाओं और + ही हिंहदू S+ ा +े 1885 में महं रघुबर दास क े माध्यम से विकसी अति*कार का दावा विकया; (iii) वाद 4 में, 8 अगस्, 1962 को एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा, सिSसक े अ*ी+ वाविदयों +े मुस्जिस्लमों की ओर से अप+ी प्रति वि+ति* हैसिसय में वाद विकया और प्रति वादी सं. 1 से 4 को हिंहदुओं की ओर से वाद दायर कर+े की अ+ुज्ञा दी गई; और (iv) यह मा+ े हुए भी विक पूव:व - वाद सभी हिंहदुओं की ओर से दायर विकया गया र्थीा, वाद 5 में वादी-देव ा इस न्यायालय क े +ारायर्ण भगवं राव गोसावी बाला Sी वालें ब+ाम गोपाल विव+ायक गोसावी263 क े वि+र्ण:य को ध्या+ में रख े हुए इसक े परिरर्णाम से आबद्ध +हीं हैं ग. पूव:व - वाद क े विववाद्यक और मांगे गये अ+ु ोष अलग-अलग हैं: (i) 1885 का वाद मंविदर क े वि+मा:र्ण की अ+ुज्ञा क े खिलए भार क े राज्य सतिचव क े विवरुद्ध र्थीा; (ii) व:मा+ काय:वाविहयां संपखित्त क े स्वरूप से संबंति* हैं चाहे वह लोक मस्जिस्Sद हो या हिंहदुओं क े खिलए लोक उपास+ा स्र्थील हो; और (iii) वाद 5 में, यह मुद्दा विक क्या 'स्र्थीा+ राम Sन्मभूविम' एक न्यातियक व्यविXत्व है, यह एक ऐसा मुद्दा है Sो 1885 क े वाद में मांगे गए मंविदर क े वि+मा:र्ण क े अ+ु ोष से परे है। 263 1960 (1) एससीआर 773 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA घ. वाद की संपखित्तयाँ णिभन्न हैं: (i) 1885 क े वाद में, विवषय-वस् ु क े वल 17X21 फीर्ट क े माप का चबू रा र्थीा; और (ii) व:मा+ काय:वाविहयों में वाद सं. 4 और 5 दो+ों में वाद संपखित्त में आं रिरक और बाह्य आहा े सतिन्नविह हैं। ङ. 1885 का वाद ब संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा Sब सीपीसी 1882 लागू र्थीी। सीपीसी 1882 की *ारा 13 पूव: न्याय से सम्बस्जिन्* है। स्पष्टीकरर्ण V +े क े वल उ+ व्यविXयों को आच्छाविद विकया Sो अप+े और दूसरों क े खिलए सामान्य रूप से दावा विकए गए वि+Sी अति*कार क े संबं* में मुकदमेबाSी कर रहे र्थीे। सीपीसी 1908 में, अणिभव्यविX "साव:Sवि+क अति*कार" स्पष्टीकरर्ण VI में *ारा 91 क े प्राव*ा+ क े ह Sोड़ा गया र्थीा। सीपीसी क े प्राव*ा+ प्रविक्रयात्मक और सारवा+ हैं। 1885 क े वाद में क े वल एक वि+Sी अति*कार को लागू कर+े की मांग की गई र्थीी, Sबविक व:मा+ काय:वाही में पूSा कर+े क े साव:Sवि+क अति*कार को लागू कर+े की मांग की गई है। यद्यविप सीपीसी 1882 को लागू विकया Sा+ा र्थीा, 1885 क े वाद क े दाखिखल हो+े की ारीख में उX विवति* लागू र्थीी, उस वाद में वि+ष्कष: (Sो क े वल एक वि+Sी अति*कार को लागू कर+े की मांग कर ा है) पूव: न्याय क े रूप में संचाखिल +हीं होगा। विवश्लेषर्ण

439. *ारा 11 की प्रयोज्य ा क ु छ अति*शासिस सिसद्धां ों पर आ*ारिर है। ये हैंः mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) वाद में प्रत्यक्ष ः और सार ः विववाद्यक मामला पूव:व - वाद में सी*े और सार ः विववाद्यक हो+ा चाविहए। (ii) पूव:व - वाद या ो उन्हीं पक्षकारों क े बीच हो+ा चाविहए Sो अ+ुव - वाद में हैं या उ+ पक्षकारों क े बीच हों+ा चाविहए सिS+क े अ*ी+ वे या उ+में से कोई एक ही हक क े अ*ी+ वाद दायर कर+े का दावा कर े हैं; (iii) वह न्यायालय, सिSस+े पूव: - वाद का विववि+श्चय विकया र्थीा, पश्चा व - वाद या उस वाद का विवचारर्ण कर+े क े खिलए सक्षम हो+ा चाविहए सिSसमें विववाद्यक को त्पश्चा ् उठाया गया है; और (iv) विववाद्यक को पूव:व - वाद में न्यायालय द्वारा सु+ा और अंति म रूप से विववि+तिश्च विकया गया हो+ा चाविहए। स्पष्टीकरर्ण VI से *ारा 11 एक *ारर्णा प्राव*ा+ की प्रक ृ ति में है Sो अणिभव्यविX ''पक्षकारों क े मध्य सिSसमें वे या उ+में से कोई समा+ हक क े अ*ी+ मुकदमेबाSी कर+े वाले" क े दायरे का विवस् ार कर ी है। स्पष्टीकरर्ण VI क े ह, Sहां व्यविX साव:Sवि+क अति*कार या एक वि+Sी अति*कार क े संबं* में सद्भाव+ापूव:क मुकदमेबाSी कर े हैं, सिSसक ें द्वारा वे अप+े और दूसरों क े खिलए सामान्य रूप से दावा कर े हैं, इस रह क े अति*कार में विह बद्ध सभी व्यविXयों को इस रह मुकदमेबाSी कर+े वाले व्यविXयों क े अ*ी+ दावा कर+े क े खिलए समझा Sाएगा। दूसरे शब्दों में, स्पष्टीकरर्ण VI को आकर्मिष कर+े क े खिलए यह आवश्यक है विक वहाँ सद्भाव+ापूव:क मुकदमेबाSी हो+ा चाविहए सिSसमें एक साव:Sवि+क या वि+Sी अति*कार क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संबं* में एक दावा हो Sो दूसरों क े सार्थी सामान्य रूप से दावाक ृ हो। यह क े वल ब है Sब सभी व्यविX Sो इस रह क े अति*कार में विह बद्ध हैं, उन्हें *ारा क े उद्देश्य क े खिलए मुकदमेबाSी कर+े वाले व्यविXयों क े अ*ी+ दावा कर+े क े खिलए समझा Sाएगा। आदेश 1 वि+यम 8264 में ऐसे प्राव*ा+ हैं सिS+क े ह एक व्यविX, सभी विह बद्ध व्यविXयों क े लाभ क े खिलए या उ+की ओर से वाद या प्रति वाद कर सक ा है।

440. 1885 का वाद ब संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा Sब सीपीसी 1882 लागू र्थीा। *ारा 13 में पूव: न्याय क े संबं* में एक उपबं* है। *ारा 13 क ु छ थ्यात्मक विवभेद क े सार्थी सीपीसी 1908 की *ारा 11 से मेल खा ी है। *ारा 13 क े स्पष्टीकरर्ण V में यह कह े हुए एक *ारर्णा उपबन्* र्थीा विक कब समा+ हक क े अ*ी+ मुकदमा कर+े वाले व्यविXयों को दावा कर+े क े खिलए समझा Sाएगा। हालांविक *ारा 13 का स्पष्टीकरर्ण V क े वल उ+ व्यविXयों को आच्छाविद कर ा है Sो अप+े खिलए और दूसरों क े खिलए सामान्य रूप से

264. आदेश 1 वि+यम 8 इस प्रकार प्राव*ा+ कर ा है: समा+ विह क े खिलए एक व्यविX, सभी व्यविXयों की रफ से वाद दायर आैर बचाव कर सक ा है। Sब विकसी वाद में कइ: व्यविX विकसी समा+ विह क े खिलए हों- (क) ऐसे व्यविXयों में से एक या अति*क, ऐसे व्यविX न्यायालय की अ+ुज्ञा से, ऐसे सभी विह बद्ध व्यविXयों की ओर से या उ+क े लाभ क े खिलए वाद कर सक े हैं या उस वाद का प्रति वाद कर सक े हैं; (ख) न्यायालय यह वि+देश दे सक े गा विक ऐसे व्यविXयों में से एक या अति*क व्यविX इस प्रकार विह बद्ध सभी व्यविXयों की ओर से या उ+क े लाभ क े खिलए वाद ला सक े गा या उस वाद का प्रति वाद कर सक े गा। (2) न्यायालय, प्रत्येक मामले में Sहां उपवि+यम (1) क े अ*ी+ कोइ: अ+ुज्ञा या वि+देश वादी क े व्यय पर विदया Sा ा है, वाद की संस्र्थीा को व्यविXग सेवा द्वारा या ो विह बद्ध सभी व्यविXयों को, या Sहां व्यविXयों की सं. या विकसी अन्य कारर्ण से ऐसी सेवा युविXयुX रूप से व्यावहारिरक +हीं है, सूच+ा देगा, Sैसा विक प्रत्येक मामले में न्यायालय वि+देश दे सक ा है। (3) कोई व्यविX, सिSसकी ओर से या सिS+क े लाभ क े खिलए, उपवि+यम (1) क े अ*ी+ वाद संस्जिस्र्थी या प्रति वाद विकया Sा ा है, न्यायालय में ऐसे वाद क े खिलए पक्षकार ब+ाए Sा+े क े खिलए आवेद+ कर सक े गा। (4) ऐसे विकसी वाद में दावे का कोइ: भाग उपवि+यम (1) क े अ*ी+ +हीं छोड़ा Sाएगा और ऐसा कोई वाद, आदेश XXIII क े वि+यम 1 क े उपवि+यम (3) क े अ*ी+ वापस +हीं खिलया Sाएगा और उस आदेश क े वि+यम 2 क े अ*ी+ ऐसे विकसी वाद में ब क कोइ: समझौ ा, सुलह या ऋर्णमुX +हीं विकया Sाएगा Sब क न्यायालय +े वादी क े व्यय पर, ऐसे विह बद्ध सभी व्यविXयों को, Sो उपवि+यम (2) में विववि+र्मिदष्ट रीति में इस प्रकार विह बद्ध है, सूच+ा + दे दी हो। (5) Sहां ऐसे विकसी वाद में मुकदमा चला+े या प्रति वाद कर+े वाला कोई व्यविX वाद या प्रति रक्षा में सम्यक त्पर ा से काय:वाही +हीं कर ा है, वहां न्यायालय वाद में समा+ विह रख+े वाले विकसी अन्य व्यविX क े स्र्थीा+ पर अप+ा स्र्थीा+ रख सक े गा। (6) इस वि+यम क े अ*ी+ वाद में पारिर तिर्डक्री उ+ सभी व्यविXयों क े खिलए आबद्धकर होगी सिS+की ओर से या सिS+क े फायदे क े खिलए, यर्थीास्जिस्र्थीति, वाद संस्जिस्र्थी विकया Sा ा है या प्रति वाद विकया Sा ा है। स्पष्टीकरर्ण।-यह अव*ारिर कर+े क े प्रयोS+ क े खिलए विक मुकदमा कर+े वाले या वाद दायर कर+े वाले या प्रति वाद कर+े वाले व्यविXयों का एक ही विह है, यह स्र्थीाविप कर+ा आवश्यक +हीं है विक ऐसे व्यविXयों क े पास वाद हे ुक समा+ ही है Sैसे विक वह व्यविX, सिSस पर या सिS+क े फायदे क े खिलए, वे वाद कर े हैं या वाद दायर कर े हैं या वाद का प्रति वाद कर े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दावा विकए गए एक वि+Sी अति*कार क े संबं* में मुकदमेबाSी कर े हैं। इसक े विवपरी, *ारा 13 का स्पष्टीकरर्ण VI उ+ व्यविXयों को आच्छाविद कर ा है Sो स्वयं क े खिलए एवं अन्य लोगों क े खिलए व्यविXग अति*कार एवं वि+Sी अति*कार क े ह मुकदमेंबाSी कर े हैं। सीपीसी 1882 की *ारा 13 क े स्पष्टीकरर्ण V और सीपीसी 1908 की *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण VI क े बीच यह अं र वि+म्+खिलखिख ाखिलका में ब ाया गया है सिSसमें दो प्राव*ा+ हैं: सीपीसी 1882 की *ारा 13 सीपीसी 1908 की *ारा 11 स्पविष्टकरर्ण-V Sंहा व्यविX स्वयं क े खिलए आैर अन्य क े खिलए वि+Sी अति*कार क े ह सदभाव+ापूव:क समा+ दावा कर े है, इस अ+ुभाग क े उद्देश्य क े खिलए सभी व्यविXयों क े एेसे विह बद्घ अति*कार, मुकदमेंबाSी कर+े वाले व्यविXयों क े अन् ग: दावा कर+े वालें मा+े Sायेगें। स्पविष्टकरर्ण-VI Sहां कोइ: व्यविX विकसी लाेक अति*कार क े या विकसी एेसे वि+Sी अति*कार क े खिलए सद्भावपूव:क मुकदमा कर े हैं सिSसका वें अप+े खिलए आैर अन्य व्यविXयों क े खिलए सामान्य दावा कर े है वहां एेसे अति*कार से विह बद्घ सभी व्यविXयों क े बारे में इस *ारा क े प्रयोंS+ों क े खिलए यह समझा Sाएगा विक वे एेसे मुकदमा कर+े वाले व्यविXयों से व्युत्पन्न अति*कार क े अ*ी+ दावा कर े है। इस स् र पर यह ध्या+ विदया Sा सक ा है विक सीपीसी 1908 की *ारा 92, सीपीसी 1882 की *ारा 539 क े प्राव*ा+ क े अ+ुरूप है। हालांविक, सीपीसी 1908 की *ारा 91 में लोक न्यूसेन्स आैर लोक को प्रभाविव कर+े वालें अन्य अपक ृ त्यों क े बारें में विवचार विकया गया है। *ारा 91 में वि+गविम लोक न्यूशेन्स से संबंति* मुकदमों को उतिच प्रभाव दे+े क े खिलए सीपीसी 1908 की *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण VI में ’’साव:Sवि+क अति*कार’’ शब्द को प्रस् ु mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया गया र्थीा। इस प्रकार सीपीसी 1882 की *ारा 13 क े स्पष्टीकरर्ण V में वि+विह *ारर्णा उपबन्* का विवस् ार सीपीसी 1908 की *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण VI में वि+विह संबंति* प्राव*ा+ में उ+ मामलों को कवर क े खिलए विकया गया र्थीा, Sहां व्यविX अन्य व्यविXयों क े समा+ दावा विकए गए वि+Sी अति*कार या लोक अति*कार क े संबं* में सद्भाव+ापूव:क मुकदमेबाSी कर े हैं। Sब 1885 का पहले का वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, स्पष्टीकरर्ण V की उस स्जिस्र्थीति में कोई प्रयोज्य ा +हीं र्थीी, Sहां व्यविX एक वि+Sी अति*कार से णिभन्न साव:Sवि+क अति*कार क े संबं* में मुकदमेबाSी कर रहे र्थीे।

441. विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े. परासर+ +े यह क: विदया विक सीपीसी क े प्राव*ा+ों में क ु छ ऐसे प्राव*ा+ हैं Sो प्रविक्रयात्मक विवषयों से संबंति* हैं Sबविक अन्य सारवा+ विवषयों क े बारे में है (दुग†श शमा: ब+ाम Sयश्री को देखें265 )। उदाहरर्ण क े खिलए, यह अव*ारिर विकया गया है विक एक वि+र्ण:य से अपील दायर कर+े का अति*कार और एक मुकदमे में तिर्डक्री का अति*कार एक सारवा+ अति*कार है और यह अति*कार उस का+ू+ द्वारा शासिस है Sो वाद क े संस्जिस्र्थी हाे+े की ारीख पर अति*भावी र्थीा। इसीखिलए गरिरकापति वीरया ब+ाम ए+. शुविबआ चौ*री266 में इस न्यायालय की एक संविव*ा+ पीठ +े यह अव*ारिर विकया है: “23...(iii) वाद संस्जिस्र्थी कर+े का यह वि+विह ार्थी: है विक ब प्रवृत्त अपील क े सभी अति*कार वाद क े शेष Sीव+ क पक्षकारों क े खिलए सुरतिक्ष रखे Sा े हैं। (iv) अपील का अति*कार एक वि+विह अति*कार है और श्रेष्ठ न्यायालय में प्रवेश कर+े का ऐसा अति*कार वादकारी को प्रोद्भू हो ा है और वाद आरंभ हो+े की ारीख को और से विवद्यमा+ हो ा है और यद्यविप यह 265 (2008) 9 एससीसी 648 266 1957 एससीआर 488 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वास् व में ब प्रयोग विकया Sा सक ा है Sब प्रति क ू ल वि+र्ण:य दे विदया Sा ा है, ऐसा अति*कार वाद या काय:वाही क े संस्र्थी+ की ारीख पर विवद्यमा+ विवति* द्वारा शासिस हो+ा चाविहए और + विक उस विवति* द्वारा Sो उसक े विववि+श्चय की ारीख को र्थीी या अपील दाखिखल कर+े की ति णिर्थी को हो ी है। (V) अपील का वि+विह अति*कार उत्तरव - अति*वि+यम+ क े द्वारा ही छी+ा Sा सक ा है, यविद ऐसा है ो स्पष्ट रूप से या आवश्यक अणिभप्राय प्रदा+ कर ा है और अन्यर्थीा +हीं।" श्री क े परासर+ +े कहा विक सीपीसी 1882 की *ारा 13 का स्पष्टीकरर्ण V क े ह पूव: न्याय की प्रयोज्य ा से अपवर्जिS कर विदया गया Sहां पूव:व - वाद दूसरों क े सार्थी समा+ रूप से दावा विकए गए साव:Sवि+क अति*कार पर मुकदमा चला+े क े खिलए र्थीा। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े इस दलील को खारिरS कर विदया विक सीपीसी 1882 को पूव: न्याय क े सिसद्धां ों की प्रयोज्य ा का विवश्लेषर्ण कर े समय लागू विकया Sा+ा चाविहए। हालाँविक इस आ*ार पर भी विक यहाँ सीपीसी 1908 लागू होगा, विवद्वा+ न्याया*ीश इस वि+ष्कष: पर पहुंचे विक 1885 का वाद और न्यातियक आयुX द्वारा दS: विकए गए वि+ष्कष:, पूव: न्याय क े रूप में काय: +हीं करेंगे। श्री क े. परासर+ क े क: अवि+वाय: रूप से इस पर बल दे े हैं: उ+क े अ+ुसार, सीपीसी 1882 की *ारा 13 का स्पष्टीकरर्ण V (Sो 1885 क े वाद क े संस्र्थी+ क े समय र्थीा) को लागू विकया गया र्थीा, Sब पूव:व - वाद को अन्यों क े सार्थी समा+ रूप से दावा विकए गए एक वि+Sी अति*कार क े आ*ार पर चलाया Sा रहा र्थीा। इसखिलए अन्य लोगों क े सार्थी समा+ रूप से दावा विकए गए एक साव:Sवि+क अति*कार को प्राप्त कर+े क े खिलए एक अ+ुव - वाद, पूव: न्याय क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिसद्धां ों द्वारा वर्जिS +हीं है Sैसा विक स्पष्टीकरर्ण V में सतिन्नविह है। स्पष्टीकरर्ण क े दायरे का विवस् ार सीपीसी 1908 में विकया गया र्थीा, Sबविक *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण VI को साव:Sवि+क क े सार्थी-सार्थी दूसरों क े समा+ रूप से वि+Sी अति*कार पर आ*ारिर दावे को कवर कर+े क े खिलए प्रस् ु विकया गया र्थीा। श्री क े. परसर+ +े कहा विक यह प्राव*ा+ Sो स्पष्टीकरर्ण VI में प्रस् ु विकया गया है, उसे सीपीसी 1908 क े प्रव:+ क े बाद संस्जिस्र्थी विकए गए एक वाद को, सीपीसी 1882 क े लागू रह े हुए 1885 में संस्जिस्र्थी वाद में विदए गए वि+र्ण:य क े आ*ार पर रोक+े वाला +हीं मा+ा Sा सक ा है। उ+का क: र्थीा विक यह प्रविक्रया का माामला +हीं होगा, बस्जिल्क यविद पूव: न्याय का वS:+ लागू होगा ो पक्षकार को प्राप्त एक सारवा+ अति*कार छी+ खिलया Sायेगा। परिरर्णामस्वरूप, Sब क विक एक साव:Sवि+क अति*कार प्राप्त कर+े क े वाद पर पूव: न्याय क े सिसद्धां को लागू कर+े का सीपीसी 1908 में एक अणिभव्यX उपबन्* +हीं र्थीा, ो 1885 में संस्जिस्र्थी वाद सीपीसी 1908 क े स्पष्टीकरर्ण VI क े वS:+ क े दायरे क े अन्दर +हीं आ सक ा है। व:मा+ काय:वाविहयों क े उद्देश्य क े खिलए, इस मामले क े विकसी भी दृविष्टकोर्ण में, श्री क े परासर+ द्वारा प्रस् ु इस क: को विवस् ृ में विवश्लेविष कर+ा वास् व में आवश्यक +हीं है, यह स्पष्ट है विक 1882 की संविह ा की *ारा 13 क े प्राव*ा+ों की प्रयोज्य ा पर या 1908 की संविह ा की *ारा 11 की प्रयोज्य ा पर, 1885 का वाद पूव: न्याय क े रूप में संचाखिल +हीं होगा। 1885 क े पूव: र वाद क े अणिभवच+ और वि+ष्कष: दशा: े हैं विक महं रघुबर दास क े वल एक अति*कार का दावा कर रहे र्थीे Sो उ+क े खिलए व्यविXग र्थीा। पूव:व - वाद को प्रति वि+ति* क्षम ा में संस्जिस्र्थी +हीं विकया गया र्थीा; विवरतिच mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विववाद्यक और मांगी गई राह ें अलग-अलग र्थीीं और इसी रह वाद£स् संपखित्त अलग र्थीी।

442. आदेश 1 वि+यम 8 क े अ*ी+ विकसी वाद क े अणिभयोसिS या प्रति वाद विकए Sा+े क े पूव:, यह आवश्यक है विक वाद में समा+ विह रख+े वाले कई व्यविX हो+े चाविहए। अन्य व्यविXयों की ओर से वाद चला+े या बचाव कर+े की अ+ुमति विकसी व्यविX को विदए Sा+े से पहले न्यायालय की विवणिशष्ट अ+ुमति अवि+वाय: है। आदेश 1 वि+यम 8 क े उप-वि+यम 2 में वाद को संस्जिस्र्थी कर+े क े खिलए उसमें विह बद्ध सभी व्यविXयों को साव:Sवि+क विवज्ञाप+ द्वारा या वि+द†णिश रीक े से +ोविर्टस विदया Sा+ा आवश्यक है। एक व्यविX सिSसकी ओर से या सिSसक े लाभ क े खिलए एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया है या बचाव विकया Sा रहा है, उसे वाद में पक्षकार क े रूप में Sोड़ा Sा सक ा है। उप-वि+यम 4 क े ह, वाद में दावे का कोई भाग +हीं छोड़ा Sा सक ा है और मुकदमा वापस +हीं खिलया Sा सक ा है और + ही समझौ ा अ+ुब*ं या सं ुविष्ट दS: की Sा सक ी है Sब क विक सभी विह बद्घ व्यविXयों को +ोविर्टस +हीं विदया गया हो। आदेश 1 वि+यम 8 में वि+विह प्राव*ा+ों क े अ+ुपाल+ क े अ*ी+, इस रह क े मुकदमे में एक तिर्डक्री उ+ सभी व्यविXयों क े खिलए बाध्यकारी है सिS+की ओर से या सिS+क े लाभ क े खिलए वाद को संस्जिस्र्थी या प्रति वाद विकया Sा ा है। क ु मारवेलु चेविट्टयार ब+ाम र्टी पी रामास्वामी अय्यर 267 में, विप्रवी काउंसिसल +े यह अव*ारिर विकया: "स्पष्टीकरर्ण 6, वि+यम 8 आदेश 1 द्वारा कवर विकए गए मामलों क ही सीविम +हीं है, बस्जिल्क विकसी भी मुकदमेबाSी को शाविमल कर+े क े खिलए 267 एआईआर 1933 पीसी 183 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवस् ारिर है, सिSसमें वि+यम क े अलावा, पक्षकार स्वयं क े अलावा अन्य विह बद्ध व्यविXयों का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े हकदार हैं।" इस न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों +े +ारायर्ण प्रभु वेंकर्टेश्वर प्रभु ब+ाम +ारायर्ण प्रभु क ृ ष्र्ण प्रभु268 क े वि+र्ण:य में उपरोX सिसद्धां का पाल+ विकया गया र्थीा। इस अदाल +े कहा विक एक विवभाS+ क े मुकदमे में, संयुX संपखित्त का दावा कर+े वाला प्रत्येक पक्षकार एक अति*कार का प्राख्या+ कर े हैं और एक ही हक क े अ*ी+ मुकदमेबाSी कर े हैं Sो समा+ दावा कर+े वाले अन्य व्यविXयों क े खिलए सामान्य है। इसखिलए: “20... एक विवभाS+ क े वाद में संयुX संपखित्त का दावा कर+े वाला प्रत्येक पक्षकार एक अति*कार का प्राख्या+ कर ा हैं और एक ही हक क े अ*ी+ मुकदमेबाSी कर े हैं Sो समा+ दावा कर+े वाले अन्य व्यविXयों क े खिलए सामान्य है। यविद इस विववाद्यक क े ह दूसरा मुकदमा विकया Sा ा है और वि+र्ण:य विदया Sा ा है, ो हम यह +हीं देख े हैं विक समा+ दावा कर+े वाले अन्य लोगों को "स्वयं और अन्य लोगों क े खिलए सामान्य रूप मे" एक अति*कार का दावा कर+े क े खिलए क्यों +हीं अणिभवि+*ा:रिर विकया Sा सक ा है। उ+में से प्रत्येक को स्पष्टीकरर्ण VI क े कारर्ण सामान्य या सभी समा+ प्रक ृ ति क े दावों र्थीा विह का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए *ारिर विकया Sा सक ा है। यविद हम अन्यर्थीा *ारिर करें, ो आवश्यक रूप से इसका अर्थी: यह होगा विक दो असंग तिर्डक्री हो Sायेंगी। यह य कर+े में विक क्या पूव: न्याय का सिसद्धां विकसी विवशेष मामले पर लागू हो ा है या +हीं, इस अव*ारर्ण क े खिलए एक परीक्षर्ण यह है विक क्या दो असंग तिर्डक्री अस्जिस् त्व में आएंगी यविद इसे लागू +हीं विकया Sा ा है। हमें लग ा है विक यहाँ यही मामला होगा।" 268 (1977) 2 एससीसी 181 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

443. गुरुणिशद्दप्पा गुरुबसप्पा भूस+ूर ब+ाम गुरुसिसद्दप्पा चे+ाविवरप्पा चे +ी269 में, बॉम्बे उच्च न्यायालय क े एक विवद्वा+ एकल न्याया*ीश (न्यायमूर्ति रंग+ेकर) +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: "आदेश 1, वि+यम 8 उ+ विवषयों क े संबं* में संपूर्ण: है, सिSसक े बारे में यह बा कर ा है और यह इससे स्पष्ट है विक यह क े वल ब लागू हो ी है Sब कई पक्षकार हो े हैं ो वाद आदेश I, वि+यम 8 क े प्राव*ा+ों क े ह लाया Sा सक ा है। यह विक एक वाद का स्पष्टीकरर्ण VI क े अर्थी: क े भी र एक प्रति वि+ति* वाद हो+ा संभव है, हालांविक इसका आदेश I, वि+यम 8 क े ह आ+ा आवश्यक +हीं है और इसखिलए उस आदेश क े प्राव*ा+ों क े ह ला+े की आवश्यक ा +हीं है, यह इस देश में बहु समय से अव*ारिर विकया गया है... इसखिलए स्पष्टीकरर्ण VI, आदेश I वि+यम 8 क े अन् ग: आ+े वाले मामलों क ही सीविम +हीं है, लेविक+ सम£ वि+यम से अलग, इसमें कोई मुक़दमा भी शाविमल होगा, सिSसमें पक्षकारगर्ण स्वयं क े अलावा अन्य विह बद्ध व्यविXयों का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े हकदार हैं।" इसखिलए श्री +ैफार्डे क े क: पर विवचार कर+े क े उद्देश्य से, हम इस सिसद्धां पर आगे बढ़ े हैं विक आदेश I वि+यम 8 क े उपबं* सीपीसी 1908 की *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण VI की प्रयोज्य ा को वि+यंवित्र +हीं कर े हैं। व:मा+ मामले क े थ्यों में, प्रांङ्गन्याय क े सिसद्धां ों की प्रयोज्य ा का विवश्लेषर्ण विकए Sा+े की आवश्यक ा है। *ारा 11 में वि+विह सिसद्धां ों की कसौर्टी पर उभर+े वाली स्जिस्र्थीति इस प्रकार है: (i) विवचार विकया Sा+े वाला पहला विबन्दु यह है विक क्या पश्चा व - वाद क े पक्षकार, पूव: र क े वाद क े पक्षकारों क े समा+ हैं या क्या वे उसी हक क े अ*ी+ मुकदमेबाSी कर े हैं। पूव: र वाद को स्वंय को अयोध्या में स्जिस्र्थी Sन्मस्र्थीा+ क े महं क े रूप में वर्भिर्ण कर े हुए महं रघुबर दास द्वारा 269 एआईआर 1937 बॉम्बे 238 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। यह वाद रघुबर दास द्वारा वि+म ही अखाड़ा क े महं क े रूप में संस्जिस्र्थी +हीं विकया गया र्थीा। 1885 क े वाद में वि+म ही अखाड़ा का कोई संदभ: स्पष्ट ः अ+ुपस्जिस्र्थी है। इसखिलए *ारा 11 क े स्पष्टीकरर्ण VI की प्रयोज्य ा क े खिलए प्रार्थीविमक आवश्यक ा आक ृ ष्ट +हीं हो ी है। 1885 का वाद महं रघुबर दास द्वारा अप+ी व्यविXग क्षम ा में संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। यह या ो वि+म ही अखाड़ा क े महं क े रूप में उ+की क्षम ा में या हिंहदुओं की ओर से संयुX रूप से संस्जिस्र्थी वाद +हीं र्थीा; (ii) + ो ऐसे देव ा Sो वाद 5 क े प्रर्थीम और विद्व ीय वादी हैं और + ही सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड:, Sो वाद 4 में वादी है, 1885 क े वाद क े पक्षकार र्थीे। महं रघुबर दास +े प्रारंभ में क े वल सेक्र े र्टरी ऑफ स्र्टेर्ट फॉर कॉउस्जिन्सल इ+ इस्जि°र्डया को पक्षकार ब+ा े हुए पूव: र वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। बाद में, मोहम्मद असगर को मु ावल्ली क े रूप में उ+की क्षम ा में पक्षकार ब+ाया गया र्थीा। पूव: र काय:वाविहयों क े पक्षकार अलग र्थीे; (iii) पूव: र मुकदमे में Sो अ+ु ोष मांगा गया र्थीा, वह रामचबू रा पर मंविदर क े वि+मा:र्ण की अ+ुज्ञा क े खिलए र्थीा। व:मा+ काय:वाविहयों में, Sो अ+ु ोष मांगा गया है, वह अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी विववाविद संपखित्त की प्रक ृ ति क े संबं* में एक अति*वि+र्ण:य+ कर+ा है विक क्या यह एक मस्जिस्Sद है Sो S+ ा क े खिलए समर्मिप है या क्या यह हिंहदुओं क े खिलए उपास+ा स्र्थील है; और (iv) 1885 क े वाद में क े वल Sन्मस्र्थीा+ में 17x21 फीर्ट क े चबू रा पर विवचार विकया गया र्थीा, सिSसका वादी क े कब्Sे में हो+े का दावा विकया गया र्थीा। उस वाद की विवषय वस् ु को दशा:+े वाले मा+तिचत्र को काय:वाही में संलग्न कर विदया गया है। दूसरी ओर, वाद 4 और 5 में वाद£स् संपखित्त में आं रिरक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और बाहरी अहा ा, दो+ों शाविमल हैं। वाद 5 में, सिSस अ+ु ोष का दावा विकया गया है वह है: "एक ऐसी उद्घोषर्णा विक अयोध्या में श्री राम Sन्मभूविम का पूरा परिरसर, संलग्नक I, II और III में यर्थीा वर्भिर्ण और सीमांविक, वादी देव ाओं से संबंति* है।" वाद पत्र क े प्रस् र 2 में संलग्नक I, II और III का वर्ण:+ है: " प्लीर्डर णिशव शंकर लाल द्वारा भव+ परिरसर और राम Sन्म भूविम क े रूप में ख्या संलग्न क्षेत्र का ब+ाया गया +क्सा +Sरी…सार्थी ही उ+की

25. 05. 1950 विद+ांविक रिरपोर्ट: इस वाद पत्र क े सार्थी संलग्न की Sा रही हैं और संलग्नक क्रमशः I, II और III क े रूप में इसका विहस्सा ब+ायी Sा रही है।" र्डॉ. एम इस्माइल फारुकी ब+ाम भार संघ270 क े मामले में संविव*ा+ पीठ क े वि+र्ण:य क े पश्चा विववाद अब क े वल वाद 5 क े वाद पत्र क े संलग्नक I में वर्भिर्ण आं रिरक और बाहरी अहा े क सीविम है। उच्च न्यायालय +े इस न्यायालय क े वि+द†शों क े अ*ी+ इस विववाद पर न्याय वि+र्ण:य+ विकया। वाद 4 और 5 में वाद की संपखित्त 17 x 21 फीर्ट माप वाले चबू रे से बड़ी है Sो विक 1885 क े वाद की विवषयवस् ु र्थीी, हालांविक वि+स्संदेह चबू रा भी वाद की संपखित्त का एक विहस्सा है।

444. वी राSेश्वरी (श्रीम ी) ब+ाम र्टी सी सव:+ाभव271 क े मामले में, अपीलार्थी- +े वष: 1984 में 1817 वग: फीर्ट माप वाली संपखित्त क े स्वत्व की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA घोषर्णा और कब्Sे की बहाली की घोषर्णा की मांग कर े हुए वाद संस्जिस्र्थी विकया। इससे पहले 1965 में, उसक े एक पूव:व - स्वत्व*ारी +े संपखित्त पर ब+ी इमार क े ऊपरी ल पर स्जिस्र्थी 240 वग: फीर्ट से अति*क क्षेत्र क े कब्Sे और स्वत्व की घोषर्णा क े खिलए प्रत्यर्थी- क े विवरुद्ध वाद संस्जिस्र्थी विकया। उच्च न्यायालय +े *ारिर विकया विक स्वत्व और कब्Sे का विवषय अपीलार्थी- क े पूव:व - स्वत्व*ारी द्वारा संस्जिस्र्थी वाद में वि+र्ण- हो चुका है और पश्चा व - वाद प्राङ्गन्याय द्वारा बाति* है। उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य को पलर्ट े हुए इस न्यायालय +े *ारिर विकया: “15. व:मा+ मामले क े थ्यों पर वापस आ े हुए, वि+ःसंदेह प्राङ्गन्याय की दलील विवचारर्ण न्यायालय और प्रर्थीम अपीलीय न्यायालय द्वारा आवश्यक दलीलें देकर स्वीकार +हीं की गई। प्रर्थीम अपीलीय न्यायालय में वादी +े विपछले वाद में, सिSसमें पूव:व - स्वत्व*ारी एक पक्षकार र्थीा, वि+र्ण:य और तिर्ड£ी को एक साक्ष्य क े रूप में अणिभलेख में ला+े की मांग की। उसका वि+वेद+ र्थीा विक वह + क े वल दस् ावेSों द्वारा वाद संपखित्त पर अप+े स्वत्व को सिसद्ध कर+े में सफल रहा बस्जिल्क पूव: क े वि+र्ण:य में, Sो विक इस वाद संपखित्त क े एक विहस्से से संबंति* र्थीा, भी उसक े पूव:व - क े स्वत्व को बरकरार रखा गया र्थीा सिSससे उसका पक्ष मSबू हुआ। उसमें प्रत्यर्थी- को दस् ावेSों की Sा+कारी र्थीी विफर भी उस+े प्रांङ्गवि+र्ण:य की दलील +हीं दी। उच्च न्यायालय को यह सोच+े क े झंझर्ट में +हीं पड़+ा र्थीा विक विपछले वाद में मामला क्या र्थीा, सु+वाई क्या हुई और क्या वि+र्ण:य हुआ। थ्य यह है विक विपछला वाद व:मा+ वाद की पूरी संपखित्त की एक छोर्टे विहस्से क सीविम र्थीा और संपखित्त क े एक विववि+र्मिदष्ट विहस्से से संबंति* वि+र्ण:य से, आवश्यक रूप से, संपूर्ण: संपखित्त क े खिलए प्राङ्गवि+र्ण:य +हीं ब+ ा Sो विक अब मुकदमे की विवषय वस् ु र्थीी।" (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

445. इस उप*ारर्णा क े समर्थी:+ में विक *ारा 11 क े अन् ग: प्राङ्गवि+र्ण:य का सिसद्धान् ब लागू हो ा है Sब दो पक्षों क े मध्य विपछले और पश्चा व - वादों में प्रत्यक्ष और सारवा+ विवषय समा+ हों और यद्यविप विक विपछला वाद संपखित्त क े एक विहस्से से संबंति* रहा हो और पश्चा व - वाद में सम्पूर्ण: सम्पखित्त विववाद की विवषय वस् ु हो, श्री +ाफड़े +े क े इणिर्थीराS+ ब+ाम लक्ष्मी272 क े मामले में दो न्याया*ीशों की पीठ क े वि+र्ण:य का अवलंब खिलया है। श्री +ाफड़े द्वारा दी गई प्राङ्गवि+र्ण:य की दलील स्वीकार कर+े में मात्र यही कविठ+ाई है: (i) महं रघुबर दास द्वारा वष: 1985 का विपछला वाद प्रति वि+ति*क हैसिसय से +हीं र्थीा। महं रघुबर दास +े स्वयं को Sन्मस्र्थीा+ का महं हो+े का दावा विकया र्थीा। उन्हों+े वि+म ही अखाड़ा क े महं क े रूप में कोई दलील +हीं दी। दावा उ+का व्यविXग र्थीा; (ii) + ो वाद 4 का वादी और + ही वाद 5 क े वादी देव ा पूव:व - काय:वाविहयों क े पक्षकार र्थीे। वष: 1985 का वाद प्रति वि+ति*क हैसिसय से हिंहदुओं की ओर से और उ+क े खिलए +हीं संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा + ही उसक े खिलए कोई दलील र्थीी। महं रघुबर दास +े सेवादारी अति*कारों क े खिलए कोई दावा +हीं विकया और + ही न्याय वि+र्ण:य+ में सेवादारी विकस्म क े विकसी दावे पर विवचार हुआ। दूसरी ओर, यह वाद 3 में दावे का और वि+म ही अखाड़ा की ओर से वाद 5 की पोषर्णीय ा क े बचाव का आ*ार ही है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) वष: 1985 क े वाद को खारिरS कर े हुए विवचारर्ण न्यायालय इस वि+ष्कष: पर पहुंचा विक चबू रे पर हक और कब्Sा विहन्दुओं का र्थीा। हालांविक वाद इस आ*ार पर खारिरS कर विदया गया विक मंविदर ब+ा+े की अ+ुमति दे+ा का+ू+ व्यवस्र्थीा का गंभीर उल्लंघ+ होगा। अपील में सिSला न्याया*ीश द्वारा इस आ*ार पर वाद खारिरS विकये Sा+े की अणिभपुष्ट की गई र्थीी। हालांविक, चबू रा क े कब्Sे और स्वाविमत्व क े संबं* में वि+ष्कष: वि+रर्थी:क हो गई र्थीी और उसे द्+ुसार हर्टा विदये Sा+े का वि+द†श विदया गया। न्यातियक आयुX +े वाद क े वि+रस् ीकरर्ण की अणिभपुविष्ट की। यद्यविप विक न्यातियक आयुX +े मा+ा विक यह प्र ी हो ा है विक विहन्दुओं को संलग्न मस्जिस्Sद क े परिरसर क े भी र कु छ स्र्थीा+ों क पहुंच का सीविम अति*कार र्थीा, उन्हों+े *ारिर विकया विक यह स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कु छ भी +हीं है विक वादी (महं रघुबर दास) प्रश्नग भूविम क े स्वामी हैं। विकसी ऐसे वाद में विदया गया यह वि+ष्कष: सिSसमें + ो वादी देव ा + ही वि+म ही अखाड़ा पक्षकार हों, उ+क े विवरुद्ध प्राङ्गवि+र्ण:य की रह काय: +हीं कर सक ा। (iv) प्राङ्गवि+र्ण:य का सिसद्धां विकसी व्यविX को एक ही वादहे ुक पर आ*ारिर विववाद क े संबं* में दो बार की परेशा+ी से बचा ा है। Sैसा विक पहले देखा गया है, वष: 1885 क े वाद क े खिलए वादहे ुक पूरी रह णिभन्न र्थीा; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) वष: 1885 क े वाद में वि+र्ण:य वाद में वादी द्वारा विकए गए दावे क े आ*ार पर 1885 क े वाद में विववि+श्चय उस वाद में वादी द्वारा विकए गए दावे क े आ*ार पर व्यविXग रूप से विकया गया र्थीा न्यातियक आयुX क े फ ै सले में कोई भी अवलोक+ + ो देव ाओं (वाद 5 में वादी) को बां* देगा, Sो पहले की काय:वाही क े पक्षकार +हीं र्थीे और + ही हिंहदू। इसक े अलावा, वाद 4 में मुसलमा+ों द्वारा विकए गए शीष:क क े दावे क े संबं* में 1885 क े वाद में कोई स्र्थीग+ +हीं र्थीा।

446. इस क: में कोई मेरिरर्ट +हीं है विक रच+ात्मक प्राङ्गन्याय का सिसद्धान् पश्चा व - वादों को बाति* करेगा। पक्षकार अलग-अलग र्थीे। विपछले वाद में दाव अलग र्थीा। दावे का आ*ार वस् ु ः वह +हीं र्थीा Sो पश्चा व - वाद की विवषयवस् ु है। इसी रह, विववादक विवबं*क या अणिभलेख विवबं*क सिसद्धान् क े आ*ार पर विदए गए विव+म्र क: में भी कोई मेरिरर्ट +हीं है। परिरर्णामस्वरूप, और उपरोX कारर्णों से, प्राङ्गवि+र्ण:य क े आ*ार पर वाद 5 की पोषर्णीय ा का विवरो* कर रहे वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा श्री +ाफड़े द्वारा विदए गए कÂ में कोई मेरिरर्ट +हीं है। ए+. 9 पुरा ास्जित्वक रिरपोर्ट: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

447. सुन्नी वाˆल वक्फ बोर्ड:273 द्वारा संस्जिस्र्थी और देव ाओं274 द्वारा संस्जिस्र्थी दो+ों वादों में एक विवषय यह विवरतिच र्थीा विक क्या विववाविद ढ़ाचा विकसी मंविदर को ध्वस् करक े ब+ाया गया है Sो उस स्र्थीा+ पर पहले से र्थीा।

448. 1 अगस्, 2002 को उच्च न्यायालय +े प्रस् ाविव विकया विक भार ीय पुरा त्व सव†क्षर्ण विवभाग275 द्वारा उत्ख++ विकया Sाए। उच्च न्यायालय +े प्रस् ाविव विकया विक उत्ख++ से पहले, एएसआई £ाउंर्ड पे+ेर्ट्रेहिंर्टग रार्डार276 या सिSयो-रतिर्डयाोलॉSी सिसवादम का उपयोग करक े विववाविद स्र्थील का सव†क्षर्ण करेगी। प्रस् ाविव वि+द†शों पर आपखित्तयों की सु+वाई कर 23 अक्र्टूबर 2002 को उन्हें उच्च न्यायालय +े खारिरS कर विदया। एएसआई +े एक कॉप रेर्ट इकाई द्वारा Sीपीआर सव†क्षर्ण करवाया सिSस+े 17 फरवरी 2003 को अप+ी रिरपोर्ट: उच्च न्यायालय को सौंप दी। रिरपोर्ट: में "रामचबू रा क्षेत्र से लगे गभ:गृह क े उत्तर और दतिक्षर्ण में मुख्य स्र्थीा+ में विवसंगति संरेखर्ण की उपस्जिस्र्थीति विमली। विवसंगति यों से वि+म्+ स्जिस्र्थीति यों का प ा चला: “..... अप+ी अ+ुप्रस्र्थी ब+ावर्ट और स्र्थीा+ीय पैर्ट+: से “विवसंगति संरेखर्ण" की संगति विकसी रह की दीवार की +ींव क े अ+ुरूप हो सक ी है। राम चबू रा क्षेत्र में, उ+ संरेखर्णों क े क्रॉसिंसग पैर्ट+: और उ+ विवणिभन्न प्रस् रीय इकाइयों सिS+से वे उभर े हैं, से एक दूसरे क े समकाली+ हो+े क े बSाय उ+क े अ+ुक्रविमक वि+मा:र्ण अवति*यों से संबंति* हो+े का प ा चल ा है". 273 Issue 1(b) in OOS No. 4 of 1989 as follows: ―Whether the building had been constructed on the site of an alleged Hindu Temple after demolishing the same as alleged by defendant no. 13? If so, its effect? 274 Issue No. 14 in OOS No. 5 of 1989 reads as follows: ―Whether the disputed structure claimed to be Babri Masjid was erected after demolishing Janma Sthan Temple at its Site?‖ 275 ”ASI” 276 ”GPR” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रिरपोर्ट: में यह भी पाया गया विक रामचबू रा क्षेत्र क े दतिक्षर्णी भाग में अ+ुक्रम"विकसी प्रकार की स ह संरच+ा का सूचक हो सक ा है, संभव ः पत्र्थीर क े स्लैब यविद इसका उद्भव प्राची+ है।" इसक े अलावा रिरपोर्ट: से यह भी प ा चल ा है विक: " एक ीसरे प्रकार की दफ्+ संरच+ाएं स्र्थील की पूरी पूव- सीमा क विवस् ृ हैं।इसमें क ु छ आं रिरक ब+ावर्ट या ध्वस् साम£ी वाले क ु छ दफ्+ ढेर संरच+ाएं शाविमल हैं। इलाक े की ढला+ों से ठीक पहले दतिक्षर्ण पतिश्चम क्षेत्र में इसी रह की विवसंगति यों का प ा चला है। ” अं में, Sीपीआर सव† में 0. 5 से 5. 5 मीर्टर क की गहराई वाली विवविव* संरच+ाओं का प ा चला है Sो विकसी प्राची+ समकाखिलक संरच+ा Sैसे स् ंभों, +ींव, दीवार स्लैब, स्र्थील क े बड़े विहस्से पर फ ै ली हुई स ह से Sुड़ी हो सक ी हैं। हालांविक, सव†क्षर्ण +े संक े विदया विक इ+ विवसंगति यों की सही प्रक ृ ति का वि+*ा:रर्ण पुरा ास्जित्वक खुदाई क े आ*ार पर विकया Sा सक ा है। इस रिरपोर्ट: क े प्राप्त हो+े पर, उच्च न्यायालय +े एएसआई को विववाविद स्र्थील पर वि+म्+खिलखिख हद क खुदाई कर+े का वि+द†श विदया: " वाद सं. 2 वष: 1950 ( ओओएस सं.[1] वष: 1989) में प्रस् ु आयुX की रिरपोर्ट: में विदखाए गये लगभग 100x100 फ ै ले हुए, +क्सा +Sरी सं. 1 में दर्भिश और ए, बी, सी, र्डी, ई अक्षरों द्वारा विदखाए गए क्षेत्र क र्थीा त्पश्चा चबू रे की सीमा क उत्तरी विहस्से में और आगे उX स्र्थील क े पतिश्चम, दतिक्षर्ण और पूव: में 50 फीर्ट की सीमा क।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

449. पुरा त्वविवदों को उस क्षेत्र को Sहां भगवा+ राम की मूर्ति लगी है और मूर्ति क े चारों ओर 10 फीर्ट क क े क्षेत्र में व्यव*ा+ + उत्पन्न कर+े का वि+द†श विदया गया र्थीा एएसआई से कहा गया र्थीा विक वह स्र्थील पर पूSा + रोक े । इस आदेश क े बाद, उच्च न्यायालय +े 26 माच: 2003 को स्र्थील पर पाये गये उत्ख++ की प्रक ृ ति का अंक+ कर+े और पक्षकारों और उ+क े अति*वXा की उपस्जिस्र्थीति में पाए गए कलाक ृ ति यों को सील कर+े का वि+द†श Sारी विकया। एएसआई र्टीम को उ+ गर्ड्ढों की गहराई और प्रस् र की पर का, Sहां कलाक ृ ति यां पायी गयी र्थीी, रिरकॉर्ड: ब+ा+े का वि+द†श विदया गया। प्राविप्तयों की स्वीरें ले+े की अ+ुमति र्थीी। प्रविक्रया में वि+ष्पक्ष ा ला+े और पक्षकारों क े विवश्वास की रक्षा कर+े क े खिलए, उच्च न्यायालय +े सुवि+तिश्च विकया विक "एएसआई र्टीम क े संचाल+ और मSदूरों को रख+े क े काम में" दो+ों समुदायों का पया:प्त प्रति वि+ति*त्व रखा Sाए। प्रविक्रया क े दौरा+, उच्च न्यायालय +े खुदाई क े संबं* में पक्षकारों द्वारा दायर विवणिभन्न आपखित्तयों पर विवचार विकया। एएसआई +े 22 अगस् 2003 को अप+ी अंति म रिरपोर्ट: सौंपी, सिSस पर सुन्नी वाˆल वक्फ बोर्ड: और अन्य पक्षकारों +े आपखित्तयां दS: की। उच्च न्यायालय +े इ+ आपखित्तयों पर विवचार विकया।

450. व:मा+ विववाद में पुरा त्व संबं*ी साक्ष्य पर बहु सारे क: विदये गये हैं। इ+ कÂ में रिरपोर्ट: क े वि+ष्कष:, उ+से वि+काले गये वि+गम+ों, एक वि+गम+ात्मक विवज्ञा+ क े रूप में पुरा त्व और विववादों में पुरा ास्जित्वक साक्ष्य का महत्व Sैसे विक व:मा+ विववाद क े संबं* में, आविद विवविव* विवषयों का समावेश विकया गया है। अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी इस न्यायालय को विवचार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर+ा चाविहए: (I) रिरपोर्ट: क े वि+ष्कषÂ और अप+ाई गई काय:प्रर्णाली पर; (ii) रिरपोर्ट: क े वि+ष्कषÂ क े विवरुद्ध उठाई गई आपखित्तयाें पर; (iii) विवशेषज्ञ साक्ष्य को न्यातियक अं रर्ण की सीमा सविह व:मा+ चरर्ण में Sांच का दायरा; (iv) पुरा ास्जित्वक साक्ष्य को दी गयी चु+ौ ी का पूर्ण: ः अ+ुमा+ पर आ*ारिर और व्यविXपरक हो+ा; (v) साक्ष्य का स् र और (vi) रिरपोर्ट: का वि+ग: हो+ा और प्रश्नों का अ+ुत्तरिर हो+ा। अं में, व:मा+ विववाद क े खिलए प्रासंविगक Sांच स्वत्व क े वि+*ा:रर्ण में पुरा ास्जित्वक साक्ष्य का सारवा+ मूल्य है सिSसे वि+र्ण:य क े दौरा+ संदर्भिभ विकया Sाएगा।

451. एएसआई की रिरपोर्ट: में रिरपोर्ट: की शुरुआ में ही इसका लक्ष्य और काय:प्रर्णाली दर्भिश की गई है। सिSस रीक े से खुदाई क े खिलए गड्ढों की योS+ा ब+ाई गई र्थीी वह इस प्रकार है: "उत्ख++ की योS+ा ब+ा+े में, उ+ स्र्थीा+ों पर Sहां सीविम Sगह है,गड्ढों क े रेखांक+ की +वी+ म क+ीकी अप+ाई गई र्थीी और इसखिलए 10x10 वग:मीर्टर क े 4. 25x[4]. 25 मीर्टर क े चार च ुर्थीाãश में विवभासिS, 0. 50 मीर्टर चौ रफा पट्टी से विवभX रेखांक+ की Sगह उत्तर-दतिक्षर्ण और पूरब-पतिश्चम दो+ों विदशाओं में प्रत्येक 5 मीर्टर की दूरी पर कील लगाकर चारों रफ 0.[5] मीर्टर की पट्टी छोड़कर 4 x 4 मीर्टर का क्षेत्र वि+कालकर विकया गया सिSसमें समीपस्र्थी गड्ढों क े बीच पुरा त्वविवदों और मSदूरों क े आ+े-Sा+े क े खिलए प्रभावी ौर पर 1. 0 मीर्टर की Sगह छोड़ी गई र्थीी। एक मीर्टर चौड़ी पट्टी विवशेषकर इस थ्य को ध्या+ में रखकर प्रदा+ की गई र्थीी विक +ये Sमाव और मलबे से संवेद+शील क्षेत्र में *र ी क े दबाव क े कारर्ण गड्ढे *ंस + Sांए।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्टीम +े, उस स्र्थीा+ को छोड़कर Sहां देव ा को स्र्थीाविप विकया गया है, पूरे विववाविद क्षेत्र में गड्ढे खुदवाए और वैज्ञावि+क अध्यय+ क े खिलए +मू+े एकत्र विकए: "वैज्ञावि+क अध्यय+ और विवश्लेषर्ण क े खिलए प्लावादर, स ह, हतिड्डयां, कोयला, प्रागैति हासिसक- वा+स्पति क अवशेषों को भी एकत्र विकया गया। उस अस्र्थीायी ढांचे को छोड़कर Sहां रामलला विवराSमा+ हैं और उच्च न्यायालय द्वारा यर्थीा वि+र्मिदष्ट राम लला से 10 फीर्ट की दूरी की परिरति* को छोड़कर पूरे विववाविद स्र्थील पर सभी रफ गड्ढे खोदे गये। खुदाई क े काय: की योS+ा Sीपीआर सव†क्षर्ण द्वारा विमले विवसंगति यों क े महत्वपूर्ण: संक े ों क े अ+ुसार चरर्णबद्ध रीक े से ब+ाई गई र्थीी।" खुदाई क े काय: और इसक े वि+ष्कषÂ को वाविदल और वीतिर्डयो फु र्टेS द्वारा अणिभखिलखिख विकया गया। एएसआई +े पांच मही+े की अवति* में +ब्बे खाइयों की खुदाई की है और खुदाई क े पूरा हो+े क े पंˆह विद+ों क े भी र खुदाई की अप+ी रिरपोर्ट: प्रस् ु की है। एएसआई र्टीम +े पक्षकारों और उ+क े अति*वXा की उपस्जिस्र्थीति में अप+ा काय: विकया है। उत्खवि+ साम£ी में पुरा + वस् ुएं, रुतिचकर वस् ुएं, चकी हुई विमट्टी क े ब:+, र्टाइल और हतिड्डयों को पक्षकारों और उ+क े अति*वXाओं की उपस्जिस्र्थीति में सील विकया गया और फ ै Sाबाद तिर्डवीS+ क े आयुX द्वारा प्रदा+ विकए गए एक सुरतिक्ष कमरे में रखा गया। पूव- क्षेत्र

452. एएसआई र्टीम +े शुरू में पूव- क्षेत्र में खुदाई की, Sहां प्रवेश द्वार क े अवशेष क े सार्थी घेरे की दीवार विदखी, सिSसक े +ीचे पहले की समयावति* क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स ह और दीवारें र्थीीं। इस स्र्थीा+ का क े न्ˆीय भाग सिSसे रामचबू रा कहा Sा ा है इसी क्षेत्र में पाया गया Sो पांच चरर्णों में ब+ाया गया र्थीा। सिS+ मुख्य विवशेष ाओं को उद्घाविर्ट विकया गया है उ+का विवश्लेषर्ण वि+म्+व ् है: "इस क्षेत्र में पायी गयी प्रमुख विवशेष ाओं में घेरे की दीवार क े भी र अक्ष पड़े पु+प्र:युX ई ं र्टों व चू+ा पत्र्थीर क े चौदह वि+मा:र्ण सिSसमें दीवार क े बीच में 2. 12 मीर्टर का एक विहस्सा र्थीा Sो प्रवेश द्वार प्र ी हो ा है सिSसक े शीष: पर संगमरमर क े स्लैब और चू+े व सीमेंर्ट क े ब+े स ह प्रस् र सिSस पर बीसवीं श ाब्दी क े उत्तरा*: क े अर्मिप संगमरमर स्लैब लगे र्थीे। क ु छ लंबे चूल्हे और उत्तर मुगल काल की भट्ठी पायी गयी।(Pl. 3). ” दतिक्षर्णी क्षेत्र चबू रे क े दतिक्षर्ण की ओर ेइस गड्ढे खोदे गये र्थीे। उत्ख++ क े परिरर्णामस्वरूप पहले की अवति* क े लगभग पचास स् ंभ आ*ार दो हिंबदुओं पर विमले, इ+ स् ंभ आ*ारों क े +ीचे पहले क े स् ंभों क े आ*ारों क े वि+शा+ पाए गए। इस क्षेत्र में खुदाई क े परिरर्णामस्वरूप इसक े बाहरी विहस्से में ई ंर्ट क े एक वृत्ताकार पीठ का प ा चला Sो आं रिरक संरच+ा में वगा:कार र्थीी और पूव: में प्रवेश और उत्तर में वि+कास क े खिलए आय ाकार ब+ावर्ट र्थीी। एएसआई की रिरपोर्ट: का प्रासंविगक विहस्सा वि+म्+व है: 'उत्तरी और पतिश्चमी दीवारों क े विहस्से और उ+की +ींव और चू+ा पत्र्थीर खंर्ड क े ब+े हुए विववाविद ढ़ाचे क े दतिक्षर्णी और पूव- पाश्वÂ की +ींव विमली सिSसका आ*ार सी*े पतिश्चम की ओर पहले की अवति* क े ब+े 1.77 मी चौड़ी ई ं र्ट की दीवार पर र्थीा सिSसक े वि+चले विहस्से में सुसखिज्ज ई ं र्टे और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA चू+ा पत्र्थीर की +ींव है और वि+य अं राल पर लगे 50 से अति*क स् ंभों क े आ*ार हैं, Sो एक स ह पर चू+ा-ई ंर्ट की दीवार से Sुड़े हैं। विववाविद ढ़ाचे की दीवार की +ींव में ई ं र्टो क े र्टुकड़े भरे र्थीे। स् ंभ आ*ार वगा:कार या वृत्ताकार ब+ावर्ट में ई ंर्ट की र्टुकड़ों क े ब+े र्थीे सिSस पर दो से पांच चू+ा पत्र्थीर ब्लाक रखे हैं संभव ः +ीचे और उत्तरी क्षेत्र में पाये गये णिशलाख°र्ड की रह, यद्यविप विक इस क्षेत्र में मात्र एक णिशलाख°र्ड पाया गया र्थीा। पु+श्च, उपरोX वर्भिर्ण ई ं र्ट की दीवार क े +ीचे एक और ई ं र्ट की दीवार देखी गयी सिSसक े शीष: पर सुसखिज्ज णिशलाख°र्ड प्रयुX पाये गये। इससे +ीचे स् रों में, ई 8 और एफ 8 गड्ढों में ई ं र्ट की संरच+ाएं पायी गयी, हालांविक उ+की पूरी आयोS+ा का प ा +हीं चला। आ*ार स् ंभ क े +ीचे दो विबन्दुओं पर एफ 8 और एफ 9 गड्ढों में पहले क े स् ंभ आ*ारों क े अवशेष भी पाये गये Sो उस स ह क े +ीचे दूसरे स ह से Sुड़े र्थीे, सिSससे अति*कांश स् ंभ आ*ार Sुड़े र्थीे। ऊपर उद्*ृ ई ं र्ट की दीवार संभव ः इसकी ई ं र्टे वि+काल+े क े कारर्ण दतिक्षर्णी ओर बुरी रह क्षति £स् पायी गयी। यह दीवार चबू रे क े उत्तरी रफ विवस् ृ पायी गयी। उपरोX उद्*ृ दीवारों क े प्रस् र क े +ीचे ई ंर्ट की एक पीठ पायी गयी Sो बाहर से वृत्ताकार और आन् रिरक आयोS+ा में वगा:कार र्थीी और सिSसमें पूव: की ओर आय ाकार प्रवेश और उत्तर की ओर छोर्टा वि+कास र्थीा। गड्ढों क े और दतिक्षर्ण क्षेत्र में ीव्र ढाल क े कारर्ण वहां उत्ख++ कर+ा संभव +हीं र्थीा। G[7] में 10.84 मी. की गहराई पर प्राक ृ ति क मृदा पायी गयी सिSसकी पुविष्ट 13. 20 मी. की गहराई क खुदाई करक े की गयी। (PI. 5)।" पतिश्चमी क्षेत्र क ु छ स्र्थीा+ों पर ई ंर्ट की दीवार की पचास ब+ावर्टें देखी गयी। उत्तरी क्षेत्र एएसआई र्टीम +े पाया विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "दतिक्षर्णी क्षेत्र में स्जिस्र्थी विवशाल ई ंर्ट की दीवार इस क्षेत्र में उत्तर -दतिक्षर्ण विदशा में Sा ी पायी गयी और इसक े स् र क े +ीचे, Sैसा विक दतिक्षर्णी क्षेत्र में पहले देखा गया र्थीा, एक और दीवार पायी गयी। शीष: ी+ ल और स् ंभ आ*ार Sो शीष: ल से Sुड़े र्थीे, भी विदखे (पीआई/10)। इस क्षेत्र में स् ंभ क े आ*ारों की विदलचस्प विवशेष ाएं यह र्थीी विक चू+ा पत्र्थीर णिशलाख°र्डों क े ऊपर इ+ आ*ारों को बालू पत्र्थीर क े वगा:कार णिशलाख°र्ड लगाकर सही रह से संवारा गया र्थीा सिS+ पर स् ंभों को सहारा दे+े क े दीवारों क े चारों रफ चार खड़े णिशलाख°र्ड लगे र्थीे ाविक कोई झुकाव + हो। णिशलाख°र्ड स ह से र्थीोड़ा ऊपर र्थीे। चबू रा विववाविद ढांचे क े ध्वंस क े बाद, और 5 माच: 2003 विद+ांविक उच्च न्यायालय क े आदेश क े ह, +ब्बे गड्ढों में आंणिशक रूप से खुदाई की गई। दतिक्षर्ण क्षेत्र में चार गड्ढों क े विहस्से चबू रे क े +ीचे र्थीे। यहां एएसआई र्टीम को चबू रे पर भी विववाविद ढ़ाचे क े स ह और दीवार क े +ीचे ई ंर्ट की संरच+ाएं,स ह और स् ंभ आ*ार विमले।

453. एएसआई की रिरपोर्ट: का अध्याय III अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी स् र विवज्ञा+ और काला+ुक्रम से संबंति* है। रिरपोर्ट: से यह प ा चल ा है विक उत्ख++ से 10. 80 मीर्टर की गहराई क एक स सांस्क ृ ति क अ+ुक्रम प्राप्त हुआ है। इसे विमट्टी क े ब:+ों क े अ+ुक्रम, संरच+ात्मक अवशेष और अन्य कालक्रमर्णीय प्राविप्तयों क े सस्जिम्मखिल और अ+ुसमर्थी:+ात्मक साक्ष्य क े आ*ार पर चार सांस्क ृ ति क अवति*यों में विवभX (वि+म्+व ् व्याख्यातिय ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sा सक ा है। रिरपोर्ट: से प ा चल ा है विक उत्खवि+ क्षेत्र में संरच+ात्मक गति विवति*याँ क ु षार्ण काल से गुप्त और गुप्तोत्तर कालों क हुई। " उत्ख++ से यह विबल्क ु ल स्पष्ट हो गया है विक इस स्र्थील पर उत्तरोत्तर संरच+ात्मक गति विवति*यां हुई हैं Sो इस स्र्थील पर क ु षार्ण काल में प्रारम्भ हुई। ई ंर्ट और पत्र्थीर की संरच+ाओं से, Sो क ु षार्ण काल और पश्चा व - गुप्त और गुप्तोत्तर कालों में ब+ाई गयीं, र्टीले की ऊ ं चाई बढ़ी है। पूव:काली+ अवशेष पर और संरच+ात्मक वि+मा:र्ण क े खिलए बाद क े लोगों +े र्टीले की परिरति* से खोदी गई विमट्टी Sमा की, Sो विक काफी पहले क े सांस्क ृ ति क कालख°र्ड से संबंति* र्थीा। यह शेष संरच+ात्मक चरर्णों क े खिलए भी सत्य है।" एएसआई की रिरपोर्ट: से प ा चला विक पहले क े कालख°र्डों (अवति* I से III) क े कोयले क े +मू+ों क े C14 वि+*ा:रर्ण से दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूव: की अंति म श ास्जिब्दयों से शुरू हो+े वाली ारीखें विमल ी हैं। एएसआई की रिरपोर्ट: में, यर्थीा उपरोX वर्भिर्ण, +ौ सांस्क ृ ति क अवति*यों क े वि+क्षेपों का प ा चल ा है। (i) अवति*- I उत्तरी काले चमकीले ब:+ का प्रस् र यह अवति* छठी से ीसरी श ाब्दी ईसा पूव: की है, Sहां उस स्र्थील पर बस+े वाले प्रारस्जिम्भक लोगों +े उत्तरी काले चमकीले ब:+ों का प्रयोग विकया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और अन्य संलग्न ब:+ (भूरे ब:+, काले रंगे हुए ब:+ और लाल ब:+) Sो उस अवति* क े परिरच्छेदक पात्र हैं। Sली हुई विमट्टी पर पत्ती की छाप क े अलावा कोई सारवा+ संरच+ात्मक गति विवति* +हीं पायी गई। उत्ख++ क े वि+ष्कष: वि+म्+ा+ुसार हैं: “अवति*--I (उत्तरी काले चमकीले ब:+ प्रस् र)....मृदभांर्ड क े अति रिरX इस प्रस् र में र्टूर्टे बार्ट, कलश क े र्टुकड़े (votive tank),कर्ण:फ ू ल, श् रिरयां, तिचविबड्डी (hopscotch), श् री पर ब+ा हुआ पविहया, एक र्टूर्टी पशु मूर्ति का (सभी विमट्टी की ब+ी हुई), लोहे की चाक ू (र्टूर्टी हुई),काँच क े र्टुकड़े, हड्डी इत्याविद विमले। हालांविक इस प्रस् र से विमली सबसे महत्वपूर्ण: प्राविप्त है पीछे की रफ सादा और आगे की रफ अशोक काली+ ब्राह्मी में भारी उभार युX अ+ुश्रु 'सिस*े' वाली हरे कांच में गोल रत्+फलक (पंSी. सं. 778)” (ii) अवति* – II शुंग प्रस् र शुंग प्रस् र दूसरी श ाब्दी ईसा पूव: से संबंति* है। इस अवति* क े दौरा+, इस स्र्थील पर ई ंर्ट और पत्र्थीर की पहली संरच+ात्मक गति विवति* प्रारम्भ हुई। एएसआई की रिरपोर्ट: में कहा गया है: “...... इसी अवति* में,S J[3] में यर्थीादृष्टव्य, इस स्र्थील पर पत्र्थीर और ई ं र्ट की पहली संरच+ात्मक गति विवति* देखी। इस प्रस् र में मा+व और पशु आक ृ ति यां, चूड़ी क े र्टुकड़े, बॉल, व्हील और र्टूर्टी छ विमल ी है सिSस mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर ब्राह्मी में क े वल 'श्री' अक्षर विमल ा है (पंSी. सं. 701); प्रस् र क े अवति* की मृदभांर्ड क े अलावा, एक काठी चकरी और पत्र्थीर का एक ढक्क+ का विहस्सा, एक कांच का दा+ा, एक हेयरविप+ और हड्डी पर एक उत्कीर्ण:क और एक हार्थीीदां का पांसा। (iii) अवति* - III क ु षार्ण प्रस् र यह अवति* Sो लगभग पहली- ीसरी श ाब्दी से संबंति* है, यहां से भृदभांर्ड क े समृद्ध भ°र्डार प्राप्त हुए हैं। एक गड्ढे में वि+चले प्रस् र पर एक बड़ा चूल्हा विमला। उत्ख++ क े वि+ष्कष: वि+म्+व हैं: " हालांविक, Sी7 गड्ढे में, सीविम क्षेत्र में मा+व और पशु मूर्ति का, चूविड़यों क े र्टुकड़े, और कलश का एक विहस्सा, सभी विमट्टी क े ब+े हुए, हड्डी की ब+ा हुआ एक बालविप+, कांच की माला और ांबे क े उप*ा ु की छड़। 15 वें गड्ढ़े में, हालांविक ऑपरेश+ क्षेत्र में वि+यविम प्रस् रीय वि+क्षेप +हीं विमले, पूव- खंर्ड +े रिरकार्ड: मात्रा में वि+यविम वि+क्षेप और स्र्थील की लगभग सभी संरच+ात्मक गति विवति*यां विदखीं। उत्खवि+ स ह क े ऊपर 22 क्रमों में विवशाल ई ंर्ट वि+मा:र्ण J5-J[6] क े +ीचे देखा गया है Sो इस अवति* से संबंति* है। क ु षार्ण काल +े वि+तिश्च रूप से बड़े आयामों की संरच+ाओं क े वि+मा:र्ण की हलचल दी, Sो उ+की साव:Sवि+क हैसिसय की पुविष्ट कर ा है। इसक े अलावा इसी गड्ढ़े में एक पाषार्ण संरच+ा का साक्ष्य विमला सिSसकी प्रक ृ ति बहु स्पष्ट +हीं है। (iv) अवति* - IV mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गुप्त प्रस् र यह अवति* चौर्थीी-छठी श ाब्दी ईस्वी से संबंति* है Sो मृदभांर्ड आक ृ ति यों और एक ांबे क े सिसक्क े की उपस्जिस्र्थीति से सत्याविप है। एएसआई की रिरपोर्ट: से प ा चल ा है: “ पर 7 और 8 Sी 7 द्वारा लगभग 2 मीर्टर मोर्टा वि+क्षेप, J5-J[6] में प्रस् र 9 और 10 और E[8] और F[8] गड्ड़े में प्रस् र 7 और 8 पूव:व - अवति* क े अवशेषों क े ऊपर गुप्त काल (लगभग चौर्थीी-छठी श ाब्दी ए. र्डी.) से संबंति* है, सिSसकी उपस्जिस्र्थीति ज्यादा र मृदभांर्ड आक ृ ति यों Sो की उस अवति* की प्रति वि+ति*क हैं और पाश्व: में राSा की स्वीर और साम+े गरुड़ की आक ृ ति और 'श्री’चन्ˆ(गुप्त) अंविक एक ांबे क े सिसक्क े (3. 75 मीर्टर की पर 8, Sी 7, आरSी सं. -1030) द्वारा सत्याविप है।" (v) अवति* – V गुप्तोत्तर-राSपू प्रस् र यह अवति* सा वीं से दसवीं श ाब्दी ई. से संबंति* है। उपरोX अवति* क े उत्ख++ क े परिरर्णामस्वरूप इस अवति* क े अंति म प्रस् र से संबंति* एक वृत्ताकार सहायक मंविदर का खुलासा हुआ है: “इस अवति* में छ ु रे क े विक+ारे वाले पात्र, Sो सा वीं से दसवीं श ाब्दी ई. क की अवति* क े हैं, प्रमुख ा से विमल े हैं। इस अवति* में भी खाई E[8] और F[8] में अ+ेक चरर्णों में संरच+ात्मक गति विवति*यां देखी गई ं । इस अवति* mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े अंति म प्रस् र से संबंति* एक वृत्ताकार सहायक मंविदर खाई ई 8- एफ 8 (तिचत्र 24 और 24 ए) में विमला। विमट्टी क े ब:+ों क े बीच क ु षार्ण प्रकार इस अवति* क े प्रकारों से अति*क है।" (vi) अवति* VI मध्यकाली+-सल् + प्रस् र यह अवति* ग्यारहवीं-बारहवीं श ाब्दी ई. से संबंति* है । खुदाई क े वि+ष्कष: वि+म्+व हैं: " ई ं र्ट-चूरा से ब+ी मोर्टी स ह विमली, परिरस्जिस्र्थीति Sन्य साक्ष्यों पर, एक विवस् ृ और विवशाल उत्तर-दतिक्षर्ण उन्मुख ई ंर्ट दीवार से Sोड़ी गई (सं.

17) Sो विक स्पष्ट रूप से पूव: की ओर मुड़ी है (खड्ड D 7 और E 2-E 1, F 1 और ZF में पायी गयी) Sो अवति* की प्रमुख संरच+ात्मक गति विवति* र्थीी (लगभग ग्यारहवीं-बारहवीं श ाब्दी ई.)। इसी अणिभविवन्यास में एक और दीवार G[2] और ZG[1] में 180 सेमी की गहराई पर देखी गई है सिSसे G[2] में पर 6A द्वारा सील विकया गया है। लाल ई ंर्ट क े स ह को अलग-अलग मोर्टाई क े सार्थी ढूह क े विवस् ृ क्षेत्र में खड्ड E[8], F[8], G[7], J[5] & J[6] क पायी गयी। इसी स् र पर, खड्ड G[5] में, णिशलाख°र्ड पाये गये Sो Sो बड़े आकार क े हो सक े हैं।” (vii) अवति* – VII मध्यकाली+ स् र mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह अवति* बारहवीं श ाब्दी ई. क े आरंभ से सोलहवीं श ाब्दी ई. क े अं क चली और इसमें ी+ उप-अवति*यों -ए, बी और सी में संरच+ात्मक गति विवति*यां शाविमल हैं। “... उप-अवति*-ए में, उत्तर-दतिक्षर्ण अणिभविवन्यास में एक बड़ी दीवार (सं. 16) का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, सिSसकी +ींव खाई विपछली अवति* क े लाल ई ं र्ट- स ह को कार्ट ी है। इस काल में वि+मा:र्ण की एक +ई शैली विदखाई दे ी है, र्थीाविप एक सीविम क्षेत्र में। आसपास से खुदाई की गई साम£ी द्वारा ढूह की ऊ ं चाई काफी हद क बढ़ गई, सिSससे चू+े बालू और ई ं र्ट की स ह ब+ गयी सिSस पर एक स् ंभ आ*ारिर संरच+ा ब+ाई गई र्थीी (स् ंभ आ*ारों क े साक्ष्य F 9, F 8 और G 7 खड्ड में उपलब्* हैं)।” उप-अवति*-बी क े खिलए, एएसआई रिरपोर्ट: इंविग कर ी है: '' बड़ी ई ं र्ट क े पर्टरिरयों (PI.67) को कार्ट+े से विवशेष रूप से एक वृत्ताकार झुकाव है। सिSसका व्यास 1.05 मीर्टर है सिSसका ब+ावर्ट पतिश्चम में आय ाकार 0. 46x0. 32 मीर्टर है। यह ध्या+ रख+ा विदलचस्प है विक यविद मध्य भाग को दीवार 16 या दीवार 17 की मौSूदा लंबाई और उत्तर से दतिक्षर्ण क स् ंभ आ*ारों क े संरेखर्ण की लंबव लंबाई क े आ*ार पर परिरकखिल विकया Sा ा है, ो फ ु र्टपार्थी क े क ें ˆ में वृत्ताकार अव+म+ आ ा है। इस प्रकार, यह महत्वपूर्ण: स्र्थील प्र ी हो ा है। इसक े अलावा, वृत्ताकार अव+म+ विववाविद संरच+ा क े क ें ˆीय भाग की ओर उन्मुख है सिSस पर 'राम लल्ला' विवराSमा+ हैं। 50x50x[8] से 10 सेमी और 50x47x[8] और 40x40x[6] क की ई ं र्टें फ ु र्टपार्थी पर विवशेष रूप से वि+र्मिम स ह र्टाइलों की रह प्रयुX र्थीीं।” उप-अवति* बी क े खिलए उपरोX वि+ष्कष: एक वृत्ताकार अव+म+ क े अस्जिस् त्व का सूचक है, इसकी क ें ˆीय ा इसे महत्व का स्र्थीा+ ब ा ी है। यह भी कहा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गया है विक वृत्ताकार अव+म+ विववाविद संरच+ा क े क ें ˆीय भाग का साम+ा कर ा है, सिSस पर देव ा विवराSमा+ हैं। उप-अवति* सी में, स् ंभों या कालम को सहारा दे+े क े खिलए आ*ार विमला है: “इस वि+क्षेप ल में स् ंभों या कालमों को सहारा दे+े क े खिलए ब+े आ*ार र्डूबे हुए र्थीे सिSस पर 4-5 सेमी मोर्टी स ह र्थीी और सिS+में बाहरी स् ंभों क े खिलए वगा:कार सैंर्डवादो+ वि£र्ड र्थीी, उ+में से क ु छ ही अब बचे हैं। अति*क र स् ंभ आ*ारों क े आस-पास स ह र्टूर्टी है और स् ंभ आ*ार बहु खराब स्जिस्र्थीति में है।” (viii) अवति* – VIII मुग़ल प्रस् र रिरपोर्ट: इंविग कर ी है: " विपछली अवति* (अवति* VII-C) का स ह विववाविद संरच+ा (मस्जिस्Sद) की +ींव क े पत्र्थीर क े काले (ज्यादा र पर्थीरीले ) द्वारा कार्टा है। हालाँविक, अवति* VII-A की उत्तर-दतिक्षर्ण दीवार को विपछली दीवार क े खिलए +ींव क े रूप में बरकरार रखा गया है। +ींव क े अंदर और विबल्कु ल साम+े वाले भाग में, विमट्टी की एक पर विबछी है, Sो भूरे रंग क े क ं कड़ क े गहरे Sमाव और राख क े प ली पर सिSसमें +दी क े सफ े द पत्र्थीर हैं, क े ऊपर पड़ी है । क ु ल वि+क्षेप लगभग 20-25 सेमी की मोर्टाई का है Sो मुगल काल की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पहली मंसिSल क े अंदर और सार्थी ही संरच+ा क े बाहर कु छ दूरी क पूव: में +ींव क े रूप में काय: कर ा है। ” (ix) अवति* – IX सुदूर और उत्तर मुगल प्रस् र इस अवति* में, दो क्रविमक ल ब+े, एक और चबू रा पूव: में र्टेरेस आकार में Sुड़ा और बाद में दो क्रविमक बाड़े की दीवारें ब+ाई गई र्थीीं। इसक े अलावा: "इस अवति* में र्टेरेस वाले चबू रे को पूव: में मौSूदा वाले से Sोड़+े क े खिलए पूव: की अवति* क े वि+क्षेप की खुदाई की गई और हर्टाया गया सिSसमें VII-C की अवति* की स ह कर्टी र्थीी और पूव- क्षेत्र में +ष्ट हो गयी र्थीी। बाद में, क ें ˆ में एक छोर्टे से कदम क े सार्थी पहले र्टेरेस वाले चबू रे में एक विवभाSक दीवार Sोड़ी गई। और विफर संरच+ा क े अंदर एक और स ह Sुड़ी Sो अब संलग्न चबू रे क विवभाSक दीवार से वादी र्थीी। कु छ बाद में, पूरे परिरसर में विब+ा आ*ार वाली एक बाड़े की दीवार Sोड़ी गई, Sो मौSूदा स ह पर विर्टकी हुई र्थीी, सिSसमें दो द्वार, उत्तर में बड़ा और पूव: में एक छोर्टा लगा हुआ र्थीा। इस अवति* क े आसपास विकसी समय, शवों को विववाविद संरच+ा क े उत्तर और दतिक्षर्ण में दफ+ाया गया, सिS+से ऊपरी स ह कर्टी है और Sो प्रस् र 1 द्वारा बं*ी है।”

454. एएसआई की रिरपोर्ट: का अध्याय IV संरच+ाओं से संबंति* है। इस अध्याय का एक महत्वपूर्ण: पहलू एक खंर्ड है सिSसका शीष:क है- “विववाविद संरच+ा क े +ीचे विवशाल संरच+ा”। प्रासंविगक वि+ष्कष: +ीचे विदए गए हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “उत्ख++ से यह वि+ष्कष: वि+काला गया विक उत्तर से दतिक्षर्ण में स् ंभ आ*ारों की सत्रह क ारें र्थीी। प्रत्येक क ार में पांच स् ंभ आ*ार र्थीे। क्षेत्र प्रति बं* और प्राक ृ ति क बा*ा क े कारर्ण, चबू रे पर अस्र्थीायी संरच+ा द्वारा तिघरे क ें ˆीय भाग में स् ंभ आ*ारों का प ा +हीं चल पाया। उत्खवि+ पचास स् ंभ आ*ारों में से क े वल बारह पूरी रह से विदख रहे र्थीे, पैं ीस आंणिशक रूप से विदख रहे र्थीे और ी+ को क े वल अंश ः देखा Sा सक ा र्थीा। पहले क े उत्ख++ क े दौरा+ क ु छ स् ंभ आ*ार विमले, सिSसक े बाद विवणिभन्न पर ों क े सार्थी उ+क े संबं* और उ+की भार वह+ क्षम ा क े बारे में विववाद हुआ। व:मा+ खुदाई में ई ं र्ट की +ींव पर उतिच रीक े से व्यवस्जिस्र्थी और स्र्थीाविप विकए गए पर्थीरीले और पत्र्थीर क े ब्लॉकों क े आ*ार क े मूल रूप को वि+काल कर और विववाविद संरच+ा से पहले की संरच+ा क े शीष: से उसकी Sुड़ाव को उSागर कर विववाद को खत्म कर विदया गया है। पतिश्चम में उत्तर-दतिक्षर्ण Sा+े वाली ई ं र्ट दीवार (दीवार 16) से लगे सत्रह स् ंभों का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। दीवार से प्रत्येक पंविX में प्रर्थीम स् ंभ आ*ार की दूरी 3. 60 से 3. 86 मीर्टर क है। स् ंभों क े आ*ार की सत्रह पंविXयों को उत्तर-दतिक्षर्ण दूरी क े आ*ार पर ी+ अलग-अलग समूहों में वग-क ृ विकया Sा सक ा है, Sो विवणिभन्न समूहों में णिभन्न -णिभन्न हैं, Sबविक प्रत्येक स् ंभ आ*ार क े मध्य से क े न्ˆ क पूव: -पतिश्चम दूरी

2.90 से 3.30 मी. है। उत्तर और दतिक्षर्ण में आ*ार स् ंभों की छः क ारें समा+ दूरी पर र्थीीं Sो 3 से 3.30 मी. क है। क ें ˆीय पाँच पंविXयों में पच्चीस स् ंभ आ*ार अलग-अलग हैं - क ें ˆीय पंविX क े दो+ों ओर लगभग

5. 25 मीर्टर की दूरी पर दो क ारें र्थीीं, Sबविक इ+ ी+ पंविXयों क े दो+ों ओर अन्य दो क ारें 4. 20-4. 25 मीर्टर की दूरी पर स्जिस्र्थी र्थीीं। इससे आसा+ी से यह वि+ष्कष: वि+काला Sा सका विक स् ंभ वाली संरच+ा का क े न्ˆीय विहस्सा महत्वपूर्ण: र्थीा और वास् ु वि+योS+ में उसे महत्व विदया गया। दतिक्षर्णी क्षेत्र में एक स् ंभ क े आ*ार पर क े वल एक सुसखिज्ज णिशला पायी गयी, Sबविक उत्तरी क्षेत्र में कई स् ंभ आ*ार एक सादे रे पत्र्थीर ब्लॉक द्वारा तिघरी, Sो ई ंर्ट की +ींव पर लगे र्थीे, सिSसमें उ+ पर चू+ा पत्र्थीर ब्लॉक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीे। (Pl.36)। कई Sगह सपार्ट णिशलाख°र्डों विमले, सिS+में चारों रफ से पत्र्थीर की Sमावर्ट र्थीी, संभव ः ब्लॉक (Pls. 37-38) पर रखे गए स् ंभ को खिखसक+े से बचा+े क े खिलए। पत्र्थीर क े Sमावर्ट का शीष: भाग मध्य में उभरा र्थीा। उत्तरी क्षेत्र में क ु छ स्र्थीा+ों पर Sहां पत्र्थीर क े खंर्डों को +हीं पाया गया र्थीा, स् ंभ क े आ*ारों की ई ं र्ट की +ींव क े पर्थीरीले ब्लॉकों पर रे क े पत्र्थीर क े स्लैब पाए गए र्थीे। आ*ार 32 पर सखिज्ज अष्टभुSाकार बालुकाश्म खंर्ड, सिSसक े चारों को+ों पर फ ू लों की मॉविर्टफ है, दतिक्षर्णी क्षेत्र में F[7] खाई में स्जिस्र्थी है, इस स्र्थील का विवणिशष्ट उदाहरर्ण है। (Pl.39)। Sो वि+तिश्च रूप से बारहवीं श ाब्दी ई. से संबंति* है क्योंविक यह सार+ार्थी में क ु मारादेवी (Pl.40) क े *म:चक्र में पाए गये क े समा+ है Sो आरंणिभक बारहवीं सदी ईस्वी से संबंति* है।” (प्रभाव वर्ति* ) एएसआई की रिरपोर्ट: में 47 स् ंभों क े आ*ारों का विवस् ृ विवश्लेषर्ण है। वृत्ताकार वेविदका एएसआई की रिरपोर्ट: में पूव: की ओर मुख वाली ई ंर्ट क े पूSा स्र्थील का विवश्लेषर्ण है Sो उत्ख++ क े परिरर्णामस्वरूप विमली। रिरपोर्ट: में +ोर्ट विकया गया है: '' एक अंश ः क्षति £स् पूव: की ओर मुख वाला ई ं र्टों का ब+ा वेविदका, संरच+ा 5 (Pls. 59-60, तिचत्र 17, 24 और 24 ए) को खाई E[8] और F[8] क े बीच मेड़ हर्टा+े क े बाद देखा गया र्थीा। यह पूव: में एक आय ाकार प्रक्षेप वाली एक वृत्ताकार संरच+ा है, दूसरी मेड़ को हर्टा+े से पहले विदखाई दे रहा र्थीा। वृत्ताकार भाग क े उत्तरी भाग में ई ं र्टों की +ींव क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ऊपर इसक े वि+चले आठ क्रम मोSूद हैं, Sबविक दतिक्षर्णी आ*े को बाद क े चरर्ण की वि+मा:र्ण गति विवति* से क्षति £स् कर विदया गया है, सिSसक े ई ंर्टों +े संरच+ा को अप+े विक्रयाशील स् र क क्षति £स् कर विदया है। संरच+ा भी री रफ से वगा:कार र्थीी और 0.04 मीर्टर चौड़ी और 0. 53 मीर्टर लंबी चट्टा या आउर्टलेर्ट को उत्तरी दीवार क े माध्यम से अन् क पाया गया, Sहां वि+चले क्रम में V आकार में 5. 0 सेमी मोर्टी ई ं र्ट का कर्ट लगा र्थीा Sो र्टूर्टी हुई पाई गई र्थीी और Sो पा+ी को, स्पष्ट ः देव ा क े अणिभषेक क े बाद, बाहर वि+काल+े क े खिलए पर+ाला क े रूप में वृत्ताकार बाहर की ओर 3. 5 सेमी वि+कला हुआ र्थीा, Sो अब मंविदर में मौSूद +हीं है । संरच+ा का प्रवेश पूव: से एक आय ाकार रूप में है, सिSसमें वृत्ताकार संरच+ा क े सार्थी, सिSसमें विक+ारे पर 70x27x17 सेमी आकार की ई ं र्टों का एक क्रम है, ई ंर्टों का बारह क्रम लगा है। पूSा स्र्थील क े वि+मा:र्ण में 28x21xx[5].[5] सेमी और 22x18x[5] सेमी क े दो माप वाले ई ं र्टों का उपयोग विकया गया र्थीा। प्रवेश का आय ाकार आकार लंबाई 1. 32 मीर्टर लम्बा और पूव: की ओर 32. 5 सेमी है।” (प्रभाव वर्ति* ) रिरपोर्ट: में पा+ी को बाहर वि+काल+े क े खिलए एक पर+ाले क े अस्जिस् त्व को अ+ुमा+ लगाया गया है, “Sाविहर है विक देव ा क े अणिभषेक क े बाद, Sो अब मंविदर में मौSूद +हीं है।” खुदाई क े परिरर्णामस्वरूप Sो ई ंर्ट मंविदर पाया गया है, वह श्रावस् ी और रीवा में एएसआई द्वारा विकए गए उत्ख++ क े वि+ष्कषÂ क े समा+ है। ुल+ात्मक विवश्लेषर्ण पर, एएसआई +े अ+ुमा+ लगाया है विक वृत्ताकार मंविदर लगभग दसवीं श ाब्दी ई. क े हो+े का वि+ष्कष: वि+काला Sा सक ा है। परिरर्णामों का सारांश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

455. परिरर्णाम का संतिक्षप्त विववरर्ण एएसआई रिरपोर्ट: क े अध्याय X में विदया गया है। खुदाई क े परिरर्णाम +ीचे विदए गए हैं: “ उत्तरी काले रंगे ब:+ (ए+बीर्डब्ल्यू) का उपयोग कर+े वाले व्यविX पहली सहस्रास्जिब्द ईसा पूव: क े दौरा+ अयोध्या में विववाविद स्र्थील पर Sम+े वाले पहले लोग र्थीे। हालांविक Sांच विकए गए सीविम क्षेत्र में कोई संरच+ात्मक गति विवति* +हीं पायी गयी, लेविक+ भौति क संस्क ृ ति का प्रति वि+ति*त्व +ारी देव ाओं की मृदभांर्ड आक ृ ति यों द्वारा विकया गया है, Sो पुरा + विवशेष ाओं, र्टेराकोर्टा और ग्लास क े म+क े, पविहयों और कलश क े र्टुकड़ों आविद को दशा: े हैं। ची+ी विमट्टी उद्योग में ए+बीर्डब्ल्यू का संगह है, Sो £े, काला सपार्ट और लाल रंग की वस् ुओं क े अलावा इस अवति* का मुख्य +ैदावि+क लक्षर्ण है। अशोक की ब्राह्मी में आख्या+ सविह गोलाकार तिच- इस स् र का एक और महत्वपूर्ण: तिच- है। भौति क उपकरर्णों और 14 सी ारीखों क े आ*ार पर इस अवति* का वि+*ा:रर्ण लगभग 1000 ई.पू. से 300 ई.पू क े रूप में की Sा सक ा है। स्र्थील पर सांस्क ृ ति क कब्Sे क े क्रम में सुंग तिक्षति S (दूसरी-पहली श ाब्दी ई.पू.) अगले स्र्थीा+ पर आ ा है। प्ररूपी मृदभांर्ड मा ृ देविवयां, मा+व और पशु आक ृ ति यां, म+क े, हेयरविप+ उत्कीर्ण:क आविद स् र क े सांस्क ृ ति क अायामों का प्रति वि+ति*त्व कर े हैं। विमट्टी क े ब:+ों क े सं£ह में काले सपार्ट, लाल और भूरे रंग क े सामा+ आविद शाविमल हैं। इस स् र पर पायी Sा+े वाली पाषार्ण और ई ं र्ट संरच+ा इस स्र्थील पर संरच+ात्मक गति विवति* की शुरुआ दशा: ी है। क ु षार्ण काल (प्रर्थीम से ृ ीय श ाब्दी ईस्वी) सुंग क े बाद आया। मृदभांर्ड मा+व और Sा+वरों की आक ृ ति यां, कलश क े र्टुकड़े, माला, एस्जिन्र्टम+ी छड़, बाल विप+, चूड़ी क े र्टुकड़े और लाल ब:+ वाला ची+ी विमट्टी उद्योग, इस स्र्थील पर क ु षार्ण काल का विवणिशष्ट तिचन्ह हैं। इस अवति* की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एक अन्य महत्वपूर्ण: विवशेष ा बड़े आकार की संरच+ाओं का वि+मा:र्ण है Sैसा विक - बाईस क्रमों की विवशाल संरच+ा द्वारा देखा गया है। गुप्त काल (चौर्थीी से छठी श ाब्दी ईस्वी) क े आगम+ से भव+ वि+मा:र्ण गति विवति* में कोई गुर्णात्मक परिरव:+ +हीं आया, हालांविक यह अवति* अप+े शास्त्रीय कलात्मक त्वों क े खिलए Sा+ी Sा ी है। हालाँविक, इस पहलू का प्रति वि+ति*त्व विवणिशष्ट मृदभांर्ड तिचत्र और एक ांबे क े सिसक्क े से विकया Sा ा है, सिSसमें श्री चंˆ (गुप्ता) और दृष्टां पूर्ण: ब:+ों द्वारा हो ा है। गुप्तोत्तर-राSपु अवति* (सा वीं से दसवीं सदी ईस्वी) क े दौरा+ भी इस स्र्थील पर संरच+ात्मक गति विवति* देखी Sा सक ी है Sो मुख्य रूप से पकी हुई ई ंर्टों द्वारा वि+र्मिम है। हालांविक, विमली हुई संरच+ाओं में, एक वृत्ताकार ई ंर्ट मंविदर है Sो पहली बार इसकी काया:त्मक उपयोविग ा की बा कर ा है। संतिक्षप्त आयोS+ा- बाहरी रूप से वि+योसिS वृत्ताकार, Sबविक आं रिरक रूप वगा:कार एवं पूव: में प्रवेश द्वार। यद्यविप संरच+ा क्षति £स् हो गई है, उत्तरी दीवार में अभी भी एक पर+ाला है, अर्थीा: Sलवि+कास Sो गंगा-यमु+ा मैदा+ में पहले से ही ज्ञा समकाली+ मंविदरों की एक विवणिशष्ट विवशेष ा है। इसक े बाद, प्रारंणिभक मध्यकाल (ग्यारहवीं बारहवीं श ाब्दी ई.) क े दौरा+ लगभग 50.... उत्तर-दतिक्षर्ण अणिभविवन्यास का वि+मा:र्ण विकया गया, Sो विक अल्पकाखिलक प्र ी हो ा है, क्योंविक खुदाई क े दौरा+ पाये गये पचास स् ंभ आ*ारों में से क े वल चार इस स् र क े हैं सिSसमें ई ंर्ट की स ह है। उपरोX संरच+ा क े अवशेषों पर कम से कम ी+ संरच+ात्मक चरर्णों और इसक े सार्थी संलग्न ी+ क्रविमक मंसिSलों वाले एक विवशाल संरच+ा का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। पहले क े विवशाल अल्पकाखिलक संरच+ा क े वास् ुणिशल्प सदस्यों… और वृत्तान् ों का संरच+ा क े वि+मा:र्ण में बड़े पैमा+े पर पु+प्र:योग विकया गया, सिSसमें एक विवशाल स् ंभयुक़् हॉल (या दो mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हॉल) र्थीे, Sो आवासीय संरच+ाओं से अलग है, Sो साव:Sवि+क प्रयोग क े एक ऐसे वि+मा:र्ण क े पया:प्त प्रमार्ण प्रदा+ कर े हैं Sो अवति* VII (मध्य- सल् + स् र-बारह से सोलहवीं श ाब्दी ईस्वी) क े दौरा+ लंबे समय क अस्जिस् त्व में रहा। इसी वि+मा:र्ण क े शीष: पर सोलहवीं श ाब्दी क े प्रारंभ में विववाविद संरच+ा का वि+मा:र्ण इसी पर विकया गया र्थीा। विववाविद संरच+ा क े ठीक +ीचे उत्तर-दतिक्षर्ण और पूव:-पतिश्चम विदशाओं में क्रमशः 50x30 मीर्टर की न्यू+ म आयाम वाले विवशाल और स्मारकीय संरच+ा क े अस्जिस् त्व का पया:प्त प्रमार्ण है। व:मा+ उत्ख++ क े दौरा+, ई ंर्ट की +ींव वाले लगभग 50 स् ंभ आ*ार, बालुकाश्म खंर्डों क े ऊपर पर्थीरीले खंर्ड से +ीचे पाए गए। उत्तरी और दतिक्षर्णी क्षेत्रों में व:मा+ खुदाई क े दौरा+ विमले स् ंभ आ*ार भी पहले क े वि+मा:र्ण की विवशाल दीवार की लंबाई का संक े दे े हैं सिSसक े सार्थी वे Sुड़े हुए हैं और Sो मूल रूप से लगभग 60 मीर्टर (सिSसमें से 50 मीर्टर लंबाई व:मा+ में उपलब्* है) क े रहे होंगे। विववाविद संरच+ा क े क ें ˆीय कक्ष का क ें ˆ पूव:व - अवति* की विवशाल दीवार की लंबाई क े क ें ˆीय हिंबदु पर ही पड़ ा है, सिSसे अस्र्थीायी-संरच+ा में विवराSमा+ राम लला की उपस्जिस्र्थीति क े कारर्ण उत्खवि+ +हीं विकया Sा सका। यह क्षेत्र चबू रे पर लगभग 15x15m है। इस क ें ˆीय हिंबदु क े पूव: की ओर एक वृत्ताकार अव+म+ सिSसमें पतिश्चम की ओर प्रक्षेपर्ण Sो बड़े आकार क े गखिलयारे में विमला र्थीा, उस स्र्थीा+ का संक े कर ा है Sहां क ु छ महत्वपूर्ण: वस् ु रखी गई र्थीी। विवणिभन्न खाइयों से और र्ट्रेंच G 2 में अवति* VII क े स् र में एक समूह में पायी गयी र्टेराकोर्टा लैंप संरच+ात्मक चरर्ण से Sुड़े हुए हैं। अवति* VII क े अंति म चरर्ण में, चमक वाले ब:+ विमले और अगली अवति*यों क े उत्तरव - स् रों में विमल े रहे, Sहां वे चमक े र्टाइल क े सार्थी हैं, Sो संभव ः विववाविद संरच+ा क े मूल वि+मा:र्ण में उपयोग विकए गए र्थीे। इसी प्रकार बहु कम मात्रा में सेलार्डा+ और पोस†खिल+ चमकीले ब:+ विमले Sो विद्व ीयक संदभ: से आ े हैं। विवणिभन्न अवति*यों क े विवणिभन्न स् रों से पशु हतिड्डयां पायी गयी, लेविक+ उत्तरी और दतिक्षर्णी क्षेत्रों में खाइयों में देखे गए क ं काल क े अवशेष अवति* IX से संबंति* हैं क्योंविक कब्रों क े गड्ढे बाद की विववाविद संरच+ाओं क े समकाली+ पाये गये और ऊपरी वि+क्षेप द्वारा बंद हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस दौरा+ सुंग से गुप्त काल क विमली विवणिभन्न संरच+ाओं से उ+की प्रक ृ ति या विक्रयाशील उपयोविग ा क े बारे में क ु छ प ा +हीं चल ा क्योंविक उसकी पुविष्ट कर+े वाला कोई साक्ष्य +हीं विमला। एक और उल्लेख+ीय विवशेष ा यह है विक क े वल अवति* IV (गुप्त स् र) क े दौरा+ और उसक े बाद और अवति* IX (मुगल काल क े अस्जिन् म दौर और उत्तर मुगल स् र) क ही संबंति* स् रों में वि+यविम आवासीय वि+क्षेप +हीं विमल े और संरच+ात्मक दौर या ो संरच+ात्मक अवशेषों से संबंति* हैं या वि+मा:र्ण उद्देश्य क े खिलए Sमी+ को सम ल कर+े क े खिलए संलग्न क्षेत्र से ली गयी भराव साम£ी से।सिSसक े परिरर्णामस्वरूप पूव:व - कालखंर्ड, स्र्थीलाक ृ ति और पूव:व - अवति*यों की अन्य वस् ुओं, विवशेष रूप से अवति* 1 (ए+बीर्डब्ल्यू स् र) और अवति* III (क ु षार्ण स् र) क े रूप में पहले की अति*कांश साम£ी उ+की समकाली+ साम£ी क े सार्थी विमणिश्र बाद की अवति*यों क े वि+क्षेप में पाई Sा ी है। इस प्रकार विववाविद स्र्थील क े +ीचे का क्षेत्र अवति* VIII (मुगल स् र) में विववाविद संरच+ा का वि+मा:र्ण हो Sा+े क, लंबे समय क साव:Sवि+क उपयोग का स्र्थीा+ ब+ा रहा Sो विक एक सीविम क्षेत्र क ही सीविम र्थीा और इसक े चारों ओर S+संख्या बस गई र्थीी, Sैसा विक मृदभांर्ड सविह समकाली+ पुरा ास्जित्वक साम£ी में वृतिद्ध से स्पष्ट है। इसकी पुविष्ट अवति* IV (गुप्त स् र) से और विवशेष रूप से अवति* VI (प्रारंणिभक मध्यकाली+-राSपू स् र) और अवति* VII (मध्यकाली+-सल् + स् र) में आवासीय संरच+ाओं Sैसे घर परिरसर, +ाला, क ु एं, चूल्हें या भविट्टयां इत्याविद की स्पष्ट अ+ुपस्जिस्र्थीति द्वारा भी हो ी है।” (प्रभाव वर्ति* ) वि+ष्कषÂ क े ति णिर्थी वि+*ा:रर्ण क े संबं* में रिरपोर्ट: से संक े विमल ा है विक प्रारंणिभक मा+व गति विवति*यां ेरहवीं श ाब्दी ई. की है: ".... प्राची+ म अवशेष ेरहवीं श ाब्दी ई.पू. क े हो सक े हैं, सिSसकी पुविष्ट ए+बीर्डब्ल्यू स् र (अवति* I), अर्थीा: 910 = 100 ई.पू. और 880 = 100 ई.पू.) से दो और सुसंग C14 द्वारा हो ी है। ये ति णिर्थीयां खाई mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA G[7] से हैं। ऊपरी वि+क्षेप से, यद्यविप विक ए+बीपीर्डब्ल्यू और संबंति* मृदभा°र्ड क े सार्थी, चार और ति णिर्थीयों का रेतिर्डयो काब:+ र्डेहिंर्टग द्वारा 780 = 80 ई.पू., 710 = 90 ई.पू., 530 = ई.पू. और 320 = 80 ई.पू. क े रूप में वि+*ा:रर्ण विकया गया है। उत्तरी काले चमकीले ब:+ (ए+बीपीर्डब्ल्यू), सिSन्हें सामान्य ः लगभग 600 ई.पू. से 300 ई.पू. क े बीच का मा+ा Sा ा है, क े सार्थी उX ति णिर्थीयों क े अवलोक में, इसे लगभग 1000 ई.पू. का मा+ा Sा सक ा है और दूरस्र्थी ति णिर्थी क े रूप में भी ी+ श ास्जिब्दयां पहले ए+बीपीर्डब्ल्यू क े सार्थी संबद्ध +हीं है, इस स्र्थील पर ऐसी दखल की प्रारंणिभक ति णिर्थी का पुरा ास्जित्वक साक्ष्य दे+े वाली वैज्ञावि+क ति णिर्थी वि+*ा:रर्ण प्रर्णाली क े आ*ार इस स्र्थील पर मा+व गति विवति*यां लगभग ेरहवीं श ाब्दी ई.पू. की हैं। अन् ः एएसआई यह कह े हुए अप+ी बा समाप्त कर ा है: "अब, सम£ ा में देख+े पर और विववाविद ढ़ाचे क े ठीक +ीचे एक विवशाल संरच+ा क े पुरा ास्जित्वक साक्ष्य को ध्या+ में रख े हुए और पत्र्थीर और सुसखिज्ज ई ं र्टें र्थीा दैवीय युगल की क्षति £स् मूर्ति, पर्ण: पत्रक प्रति क ृ ति, अमालक, कपो पाली वाला +क्काशीदार वास् ु, अ*:-वृत्ताकार णिभखित्तस् ंभ युX कपार्टभाग, काले चट्टा+ी स् ंभ का भग्न अष्टकोर्णीय शाफ्र्ट,कमल तिचत्रर्ण, उत्तर में प्र+ाला (Sलवि+कास) वाली वृत्ताकार वेविदका, विवशाल संरच+ा से संलग्न पचास आ*ार स् ंभ र्थीा दसवीं श ाब्दी से लेकर विववाविद ढ़ाचे क े वि+मा:र्ण क संरच+ात्मक चरर्णों में वि+रन् र ा ऐसे अवशेष क े सूचक हैं Sो उत्तर भार क े मंविदर से Sुड़ी विवणिशष्ट विवशेष ाएं हैं।" (प्रभाव वर्ति* )

456. एएसआई की रिरपोर्ट: पर कई आपखित्तयां की गयी हैं और इस पर विवचार विकया Sाएगा। रिरपोर्ट: से प ा चल ा है विक सा वीं से दसवीं श ाब्दी ई. क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गुप्तोत्तर काल में इस स्र्थील पर महत्वपूर्ण: संरच+ात्मक गति विवति*यां हुई। रिरपोर्ट: में कहा गया है विक इससे ई ंर्ट की एक वृत्ताकार वेविदका क े अस्जिस् त्व का प ा चल ा है सिSसमें पूव: में प्रवेश द्वार र्थीा और वाह्य वृत्ताकार र्थीा। एएसआई +े यह वि+ष्कष: वि+काला है विक मंविदर की उत्तरी दीवार में एक प्र+ाला अर्थीा: Sलवि+कास र्थीा, सिSसे उस+े गंगा-यमु+ा क े मैदा+ी इलाकों क े मंविदरों की एक विवणिशष्ट विवशेष ा मा+ा है। रिरपोर्ट: में उल्लेख विकया गया है विक ग्यारहवीं - बारहवीं श ाब्दी ई. से संबंति* खुदाई से 50 मीर्टर गुर्णा 30 मीर्टर क े आयाम वाले " एक विवशाल संरच+ा" क े अस्जिस् त्व का प ा चला है। ग्यारहवीं और बारहवीं श ाब्दी ई. क े प्रारंणिभक मध्यकाल क े दौरा+ गति विवति* से लगभग पचास स् ंभ आ*ारों क े अस्जिस् त्व का प ा चल ा है। रिरपोर्ट: में कहा गया है विक उपरोX संरच+ा क े अवशेषों पर, कम से कम ी+ संरच+ात्मक चरर्णों और इसक े सार्थी संलग्न ी+ क्रविमक मंसिSलों क े सार्थी एक विवशाल संरच+ा का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। एक बड़े स् ंभयुX दीवार वाली विवशाल संरच+ा, Sो इसक े साव:Sवि+क प्रयोग का साक्ष्य है, क े वि+मा:र्ण क े खिलए साS विवन्यास सविह प्रारंणिभक संरच+ा की वास् ु विवशेष ाओं को संशोति* विकया गया र्थीा। रिरपोर्ट: में कहा गया है विक सोलहवीं श ाब्दी की शुरुआ में विववाविद संरच+ा का वि+मा:र्ण पहले की संरच+ा से ठीक ऊपर विकया हुआ पाया गया है और विववाविद संरच+ा क े क ें ˆीय कक्ष का क ें ˆ पूव:व - अवति* की विवशाल दीवार की लंबाई क े क े न्ˆ हिंबदु पर पड़ ा है। एएसआई की रिरपोर्ट: पर उच्च न्यायालय का वि+ष्कष: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

457. अप+े वि+र्ण:य में न्यायमूर्ति एस. यू. खा+ +े एएसआई की रिरपोर्ट: का कोई अवलंब +हीं खिलया। विवद्वा+ न्याया*ीश +े वि+म्+खिलखिख स्पष्टीकरर्ण विदया है: " पूव: उद्धृ एएसआई रिरपोर्ट: 2003 क े वि+ष्कष:, इस संबं* में दो कारर्णों से अति*क मददगार +हीं हैं। प्रर्थीम ः, यह वि+ष्कष: विक 'दसवीं सदी से विववाविद संरच+ा क े वि+मा:र्ण क संरच+ात्मक चरर्णों में वि+रं र ा का साक्ष्य है' दलीलों, गSेविर्टयर और इति हास पुस् कों क े ठीक विवपरी है। + ो विकसी भी पक्ष द्वारा यह दलील दी गयी है और + ही विकसी गSेविर्टयर या अति*कांश इति हास पुस् कों में ऐसा उल्लेख है विक पहली श ाब्दी ई.पू. (या क ु छ क े अ+ुसार ीसरी या चौर्थीी श ाब्दी ई.) में विवक्रमाविदत्य द्वारा मंविदरों क े वि+मा:र्ण क े बाद से 1528 ई. क े आसपास प्रश्नग मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क विववाविद परिरसर में या उसक े आसपास कोई वि+मा:र्ण काय: विकया गया। दूसरे, यविद मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी मंविदर को ध्वस् विकया गया हो ा ो मंविदर की संरच+ा साम£ी Sमी+ क े अंदर + Sा ी। या ो इसे विफर से इस् ेमाल विकया Sा ा या हर्टा विदया गया हो ा। विकसी भी विहन्दू पक्षकार की ओर से प्रस् ु कोई भी विवद्व अति*वXा इस स्जिस्र्थीति को स्पष्ट +हीं कर सका।" न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े सिSस प्रर्थीम कारर्ण का आंकल+ विकया वह यह र्थीा विक विकसी भी पक्ष द्वारा यह दलील +हीं दी गयी है विक पहली श ाब्दी ई.पू. (या क ु छ क े अ+ुसार ीसरी या चौर्थीी श ाब्दी ई.) में विवक्रमाविदत्य द्वारा मंविदरों क े वि+मा:र्ण क े बाद से सोलहवीं श ाब्दी में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण उस स्र्थील पर कोई वि+मा:र्ण काय: विकया गया। वाद 5 में वादी का क: यह है विक मस्जिस्Sद का विववाविद ढ़ाचा मंविदर को ोड़कर ब+ाया गया र्थीा। उच्च न्यायालय द्वारा आदेणिश उत्ख++ का उद्देश्य यह र्थीा विक न्यायालय को एएसआई द्वारा वैज्ञावि+क Sांच का लाभ विमल सक े । उत्ख++ क े आ*ार पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ही न्यायालय एएसआई द्वारा प्राप्त वि+ष्कषÂ से अवग होगा। पक्षकारों की दलील में चूक को दोष दे+ा इस कारर्ण से अ+ुतिच है विक न्यायालय क े साम+े आए पुरा ास्जित्वक साक्ष्य एएसआई द्वारा विकए गए उत्ख++ क े परिरर्णामस्वरूप र्थीे। उत्ख++ का आदेश दे+े क े बाद, विवचारर्ण क े दौरा+ उ+ वि+ष्कषÂ का मूल्यांक+ कर+ा उच्च न्यायालय क े खिलए यह आवश्यक र्थीा। Sवाविदस एस यू खा+ +े ऐसा +हीं विकया। विवद्व न्याया*ीश द्वारा आंका गया दूसरा कारर्ण अ+ुमा+ क े आ*ार पर आगे बढ़ ा है। न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े कहा विक यह बो*गम्य +हीं है विक बाबर या औरंगSेब +े भगवा+ राम क े सही Sन्म-स्र्थीा+ का प ा लगा+े क े खिलए पूव: अ+ुसं*ा+ करवाया होगा और हिंफर उस स्र्थील पर एक मविदर का वि+मा:र्ण कराया होगा। उत्ख++ का उद्देश्य न्यायालय को यह वि+*ा:रिर कर+े में सक्षम ब+ा+ा र्थीा विक क्या विववाविद स्र्थील पर उत्ख++ से सविदयों क े पूव: संरच+ात्मक गति विवति* क े अस्जिस् त्व का प ा चला और यविद ऐसा है, ो क्या इसका कोई विहस्सा *ार्मिमक प्रक ृ ति का र्थीा। न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े एएसआई की दो+ों खोSों वृत्ताकार वेविदका और साव:Sवि+क रूप से प्रयुX संरच+ा का वि+मा:र्ण सिSसकी +ींव पर विववाविद ढ़ाचा स्जिस्र्थी र्थीा, का मूल्यांक+ +हीं विकया है और व:मा+ विववाद में उसक े संभाविव मूल्य पर विवचार +हीं विकया है।

458. अप+े वि+र्ण:य में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े कहा विक उत्ख++ से कु छ वि+र्मिववाद थ्य उभर े हैं। इन्हें वि+म्+ा+ुसार सूचीबद्ध विकया गया: “(i) शुंग और क ु षार्ण काल क े प्रस् र में विववाविद स्र्थील पर बहु सारी संरच+ात्मक और वि+मा:र्ण काय: विवद्यमा+ र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) हालांविक एएसआई द्वारा उद्धृ मंसिSलों, स् ंभ आ*ारों और दीवारों की वादीक संख्या पर आपखित्त की गयी र्थीी लेविक+ विववाविद इमार क े +ीचे कई मंसिSलों, दीवारों और स् ंभ आ*ारों क े अस्जिस् त्व पर कोई विववाद +हीं है। (ii) विववाविद ढ़ाचे क े +ीचे की संरच+ा को क+र्टी मस्जिस्Sद या ईदगाह क े रूप में व्याख्यातिय कर+े का प्रयास विकया गया। ऐसा कोई संक े +हीं है विक विववाविद ढ़ाचे क े +ीचे की संरच+ा गैर-*ार्मिमक प्रक ृ ति की र्थीी। (iii) क ु छ वि+मा:र्णों या कलाक ृ ति यों को Sै+ों या बौद्धों से संबंति* कर+े का प्रयास विकया गया है लेविक+ वहां पर भी ऐसा +हीं है विक यह इस्लाविमक प्रक ृ ति का रहा हो या गैर-*ार्मिमक रहा हो। (iv) यद्यविप व्यावसातियक शैली में स्व ंत्र ा की कमी क े आरोप का समर्थी:+ रिरपोर्ट: क े क ु छ भाग में अणिभकणिर्थी गल वि+व:च+ या त्रुविर्टपूर्ण: वि+व:च+ या लोप या विवरो*ाभास और विवसंगति पूर्ण: हो+े से विकया गया है हिंक ु एएसआई र्टीम क े विकसी भी, व्यविष्ट या समूह को वि+ष्ठा या स्व ंत्र ा रविह होकर काम कर े +हीं विदखाया गया है ( सिसवाय उस बा को छोड़कर Sहां मुस्जिस्लम पक्ष क े दो +ाम वि+र्मिदष्ट लोगों अर्थीा: ् र्डा. Sया मे++ (PW 29) और र्डा. सुविप्रया वमा: (PW 32) +े 21. 5. 2003 और 7. 6. 2003 विद+ांविक णिशकाय द्वारा र्ट्रेंच Sी 2 में आ*ारों क े सृS+ की सूच+ा दी है) ।" प्रारंभ में, सुन्नी वाˆल वक्फ बोर्ड: का पक्ष यह र्थीा विक विववाविद इमार का वि+मा:र्ण उस स्र्थीा+ पर विकया गया र्थीा सिSस पर हिंहदू *ार्मिमक संरच+ा का कोई अस्जिस् त्व +हीं र्थीा और यह इस बा को कोई साक्ष्य +हीं विक संरच+ा उसी स्र्थीा+ पर ब+ी र्थीी सिSसे हिंहदू भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+ े हैं। न्यायमूर्ति अ£वाल +े उल्लेख विकया है विक Sब उत्ख++ आगे बढ़ा ो वाद 4 क े वादी क े दृविष्टकोर्ण में एक उल्लेख+ीय बदलाव आया और एक +या मामला स्र्थीाविप कर+े की कोणिशश की गई विक विववाविद संरच+ा क े +ीचे की संरच+ा, Sैसा विक खुदाई में विदखाया गया है, इस्लाविमक मूल की है, या ो ईदगाह या एक क+ा ी मस्जिस्Sद। न्यायमूर्ति अ£वाल +े कहा विक मुस्जिस्लम mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पक्षकारों क े रुख में इस बदलाव +े स्पष्ट रूप से इस संभाव+ा को अपवर्जिS कर विदया विक विववाविद संरच+ा क े +ीचे Sो संरच+ा पाई गई र्थीी वह एक ऐसे मूल की र्थीी Sो *ार्मिमक +हीं है। Sांच ब इस बा क सीविम हो गयी विक संरच+ा प्रक ृ ति में इस्लाविमक र्थीी या गैर -इस्लाविमक। विवद्वा+ न्याया*ीश +े यह वि+ष्कष: वि+काला विक: “3905 रिरपोर्ट: से यह स्पष्ट है विक स् ंभ क े ल 4 Sो स् ंभ आ*ारों की +ींव को सहारा दे ा है वह मंविदर का ल र्थीा। यह ईदगाह या क+ा ी मस्जिस्Sद का ल +हीं हो सक ा क्योंविक ईदगाह में खंभे कभी +हीं रह े ाविक प्रार्थी:+ा कर+े क े खिलए न्यू+ म स्र्थीा+ में अति*क म व्यविXयों को समायोसिS विकया Sा सक े ।"

459. न्यायमूर्ति अ£वाल +े यह उल्लेख विकया विक अप+ी संलग्न वास् ु विवशेष ाओं युX एक वृत्ताकार वेविदका क े अस्जिस् त्व से संभव ः शैव मंविदर की उपस्जिस्र्थीति का संक े विमल ा है और यह विक यह एक मुस्जिस्लम मकबरा +हीं र्थीा। उन्हों+े कहा विक एक ओर संरच+ा की विवमा मकबरे क े खिलए बहु छोर्टी र्थीी र्थीे, वहीं एक व्यालमुख पर+ाला विकसी मकबरे में कभी +हीं ब+ाया Sाएगा बस्जिल्क यह णिशवलिंलगम् पर र्डाले गए Sल को बाहर वि+काल+े क े खिलए एक णिशव मंविदर क े गभ:गृह का अणिभन्न अंग हो ा है। उस संदभ: में, सबू ों का विवश्लेषर्ण कर+े क े बाद, न्यायमूर्ति अ£वाल +े पाया विक PW 29, 31 और 32 Sो वाद 4 में वादी क े गवाह र्थीे, +े स्वीकार विकया विक उत्खवि+ वेविदका में Sो विवशेष ाएं पाई गई र्थीीं, वे गैर-इस्लामी मूल की र्थीीं । PW 29, 31 और 32 क े प्रासंविगक साक्ष्य +ीचे विदए गए हैं:1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (a) र्डॉ. Sया मे++ (PW-29) “इस स् ंभ पर घर्ट (पात्र) का तिचत्रर्ण विदखाई पड़ ा है। यह सच है विक घर्ट को कलश क े रूप में भी Sा+ा Sा ा है। सामान्य ः स् ंभ पर इस प्रकार क े घर्ट मस्जिस्Sद में +हीं पाए Sा े। यह कह+ा सही है विक उत्ख++ क े दौरा+ हार्थीी, कछ ु ए और घविड़याल की आक ृ ति यां, Sो सभी र्टेराकोर्टा से ब+े र्थीे, पाये गए। ऐसी आक ृ ति यां एक से अति*क खाई में पाई गयीं र्थीी। मैं Sा+ ा हूं विक मगर विहन्दूओं की पविवत्र +दी गंगा का वाह+ है। मैं इस बा से सहम हूं विक कछ ु आ पविवत्र +दी यमु+ा का वाह+ है।” (b) र्डा. अशोक दत्ता (PW 31) “Sैसा विक मैं+े उल्लेख विकया है विक मुसलमा+ लोग मूर्ति पूSा में विवश्वास +हीं कर े, इसखिलए मुस्जिस्लम संस्क ृ ति क े सार्थी मृदभांर्डों को Sोड़+े का कोई प्रश्न ही +हीं है। Sहां क मैं Sा+ ा हूं और मेरी Sा+कारी है, मृदभांर्डों को मुस्जिस्लम संस्क ृ ति से Sोड़+े का प्रश्न ही +हीं उठ ा। ” “यह सच है विक ऐसी पशु आक ृ ति यों को मस्जिस्Sद में रख+े की अ+ुमति +हीं है। ” “मकर पर+ाल विहन्दू मंविदर वास् ुणिशल्प का एक भाग है। मुझे पक्क े ौर पर यह +हीं कह सक ा विक मकर पर+ाल का मस्जिस्Sद से कोई संबं* है या +हीं। मैं+े ऐसी कोई मस्जिस्Sद +हीं देखी है सिSसमें मकर पर+ाल हो.” (c) र्डा. सुविप्रया वमा: (PW-32) “ मैं+े कलश शब्द सु+ा है। कलश मस्जिस्Sद में +हीं पाया Sा ा…।” “मेरे अ+ुसार, 'वॉल +ंबर 16, का प्रयोग विववाविद संरच+ा क े वि+मा:र्ण क े पहले दीवार क े रूप में विकया Sा ा र्थीा। इस रह, वाल 16 विकसी अन्य वि+मा:र्ण की दीवार र्थीी Sो विववाविद संरच+ा क े वि+मा:र्ण से पहले मौSूद र्थीी. '' “हालांविक, यह सच है विक वॉल +ंबर 17 का वि+मा:र्ण वाल +ंबर 16 से पहले हुआ र्थीा.” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “ मुझे मगरमच्छ प ा है। मंविदरों क े खिलए भी यह बहु महत्वपूर्ण: हो ा है। इसे मकर मुख कह े हैं। मैं+े विकसी मस्जिस्Sद में मकर मुख +हीं देखा है......।” न्यायमूर्ति अ£वाल +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: “3979. भार ीय पुरा त्व सव†क्षर्ण की रिरपोर्ट:, Sो उत्ख++ क े विवशेषज्ञ की एक रिरपोर्ट: है, में सभी विववरर्ण शाविमल हैं, सिSसमें वाˆैविर्ट£ाफी, कलाक ृ ति यां, अवति* वि+*ा:रर्ण और संरच+ाओं और दीवारों क े विववरर्ण शाविमल हैं। रिरपोर्ट: में उसिल्लखिख स् ंभ आ*ार सभी संदेह से परे एक विवशाल संरच+ा क े अस्जिस् त्व को स्र्थीाविप कर े हैं। उपरोX क े अलावा, वृत्ताकार वेविदका का अस्जिस् त्व, दीवारों में पत्र्थीर क े स्लैब, हिंहदू मॉविर्टफ क े सार्थी और विवशेष रूप से दीवार +ंबर 5 (विववाविद संरच+ा की दीवार) में मकर पर+ाल तिचन्ह, विदव्य युगल और अन्य मंविदर साम£ी, आविद, वि+र्णा:यक रूप से विववाविद संरच+ा क े +ीचे एक हिंहदू *ार्मिमक संरच+ा क े अस्जिस् त्व को साविब कर ा है। यह आम ौर पर गवाहों द्वारा स्वीकार विकया Sा ा है विक उत्ख++ पक्षकारों, विवशेषज्ञों और पय:वेक्षकों की उपस्जिस्र्थीति में पुरा त्व क े य मा+दंर्डों क े अ+ुसार की गई र्थीी और सभी संबंति* पक्षों की उपस्जिस्र्थीति में ी+ आयामी रिरकॉर्डिंर्डग, फोर्टो£ाफी, प्रत्येक खाई, संरच+ा, कलाक ृ ति की वीतिर्डयो£ाफी, एएसआई द्वारा उत्ख++ क े दौरा+ की गई र्थीी। विद+-प्रति विद+ क े रसिSवादर, पय:वेक्षक की र्डायरी और विवणिशष्ट रसिSवादर को वि+यविम रूप से खिलखा Sा रहा र्थीा।

3980. क ु छ और आपखित्तयां हैं, सिSन्हें हम इस कारर्ण से मूल्यवा+ +हीं समझ े विक मुस्जिस्लम पक्षकारों क े विवशेषज्ञों +े यह समझकर विक विववाविद ढ़ाचे क े +ीचे एक अन्य संरच+ा का अस्जिस् त्व र्थीा, अप+े बया+ में एक +ई बा कही। हालांविक, एक +या रुख Sो वादी का मामला +हीं है, वि+वेविद +हीं विकया गया है अ ः स्वीकाय: +हीं है। ” उच्च न्यायालय क े समक्ष एक अन्य आपखित्त यह र्थीी विक एएसआई की रिरपोर्ट: में विवशेष रूप से इस बा का Sवाब +हीं विदया विक क्या कोई पूव: -मौSूदा संरच+ा र्थीी सिSसे मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए ध्वस् कर विदया गया र्थीा और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क्या पूव:-मौSूदा संरच+ा एक मंविदर र्थीी। इस आपखित्त का Sवाब दे े हुए, उच्च न्यायालय +े *ारिर विकया: “3990. हमारे विवचार में, एएसआई +े यह स्पष्ट वि+ष्कष: दS: + करक े ठीक विकया है विक क्या कोई विवध्वंस हुआ र्थीा या +हीं Sबविक विकसी इमार का वि+मा:र्ण विकया गया और वह भी सैकड़ों साल पहले। यह प ा लगा+ा कभी-कभी मुस्जिश्कल हो सक ा है विक विक+ परिरस्जिस्र्थीति यों में भव+ का वि+मा:र्ण विकया गया और क्या पहले की इमार अप+े दम पर या प्राक ृ ति क शविXयों क े कारर्ण ढह गई र्थीी या इसक े +ुकसा+ क े खिलए इच्छ ु क कु छ व्यविXयों क े कारर्ण । एएसआई द्वारा इस बा का पया:प्त संक े विदया गया है विक विववाविद इमार की अप+ी आ*ारणिशला +हीं र्थीी, बस्जिल्क यह मौSूद दीवारों पर ब+ायी गयी र्थीी। यविद बाद की इमार क े वि+मा:र्ण से पहले कोई इमार मौSूद +हीं हो ी, ो ब+ा+े वाली इसकी ाक और +ई संरच+ा क े लोर्ड को वह+ कर+े की इसकी क्षम ा को Sा+े विब+ा पूव:व - इमार की +ींव का उपयोग + कर पा ा । विववाविद इमार की स ह पहले की इमार की स ह पर र्थीी। कई स् ंभ आ*ारों का अस्जिस् त्व सभी एक पया:प्त बड़ी संरच+ा क े पूव: अस्जिस् त्व को दशा: ा है, अगर विववाविद संरच+ा से बड़ी +हीं ो उससे कम भी +हीं। ” साक्ष्यों का विवश्लेषर्ण कर+े क े बाद, न्यायमूर्ति अ£वाल +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: “4055. उपरोX परिरचचा: और साम£ी से इस न्यायालय द्वारा अंति म अ+ुमा+ Sो यर्थीोतिच रूप से लगाया Sा सक ा है, यह है: (i) विववाविद ढ़ाचा विकसी खाली, वि+व:सिस, खुली भूविम पर +हीं ब+ाया गया र्थीा। (ii) विववाविद स्र्थील पर एक संरच+ा विवद्यमा+ र्थीी यविद विववाविद संरच+ा से बड़ी +हीं ो उससे ुल+ीय या बड़ी । (iii) विववाविद संरच+ा को ब+ा+े वाला पूव: ढांचे, उसकी शविX, क्षम ा, दीवारों क े आकार आविद का विववरर्ण Sा+ ा र्थीा और इसखिलए विब+ा विकसी सु*ार क े दीवारों आविद का उपयोग कर+े में संकोच +हीं विकया। (iv) पूव:व - ढांचा *ार्मिमक प्रक ृ ति mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का र्थीा और वह भी गैर-इस्लामी र्थीा (v) पूव:व - ढांचे क े पत्र्थीर, स् ंभ, ईर्टों आविद Sैसी साम£ी का उपयोग विववाविद ढांचे को ब+ा+े में विकया गया र्थीा। (vi) उत्ख++ क े दौरा+ विमली कलाक ृ ति यां अति*क र ऐसी हैं Sो गैर-इस्लामी अर्थीा: ् विहन्दू *ार्मिमक स्र्थीा+ों से संबंति* हैं, भले ही हम यह स्वीकार कर लें विक उ+में से क ु छ वस् ुएं ऐसी हैं सिS+का अन्य *मÂ में भी प्रयोग विकया Sा सक ा है। इसक े सार्थी ही कोई भी ऐसी कलाक ृ ति +हीं विमली, सिSसका प्रयोग क े वल इस्लामी *ार्मिमक स्र्थील पर ही विकया Sा सक ा हो।” कसौर्टी पाषार्ण स् ंभों पर अंक+

460. विववाविद संरच+ा क े स् ंभों पर अंक+ का साक्ष्य उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु विकया गया र्थीा। 10 S+वरी 1990 क े एक आदेश क े अ+ुसार राज्य पुरा त्व विवभाग द्वारा ली गई स्वीरों वाले एल्बम क े ी+ वाद प्रस् ु विकये गये। र्डॉ. राक े श ति वारी (ओपीर्डब्ल्यू-14) Sो राज्य पुरा त्व विवभाग क े वि+देशक र्थीे, +े स्वीरों का सत्याप+ विकया। पहले एल्बम में 204 रंगी+ स्वीरें र्थीीं और उन्हें पेपर सं. 200 C1/1-204 क े रूप में अंविक विकया गया। दूसरे एल्बम में 111 काली और सफ े द स्वीरें र्थीीं और उन्हें पेपर सं. 201C/1-111 क े रूप में अंविक विकया गया । उच्च न्यायालय +े अप+े फ ै सले क े परिरणिशष्ट 5 (ए) से 5 (र्डीर्डी) क े रूप में स्वीरों को संलग्न विकया। स्वीरों में काले कवादी पत्र्थीर स् ंभों की Sा+कारी है। वाद 4 में वादी की ओर से कई गवाहों को इ+ स्वीरों क े संबं* में उ+क े साक्ष्य क े दौरा+ दशा:या गया है। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े फ ै सले में फारूक अहमद (PW-3) क े बया+ से प्रासंविगक अंश को पु+: प्रस् ु विकया गया है। गवाही से उद्धरर्ण +ीचे विदए गए हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA फारूक अहमद (PW-3): '' फोर्टो£ाफ सं. 57 में मूर्ति यां विदखाई दे रही हैं, Sो उस समय मौSूद +हीं र्थीे। यह स्वीर विववाविद संपखित्त की भी है, लेविक+ यह संभव है विक इसे बदल विदया गया हो क्योंविक उस समय स् ंभों पर कोई मूर्ति +हीं र्थीी। एक मूर्ति स्वीर सं. 58 क े ऊपरी विहस्से में विदखाई दे रही है। गेर्ट पर एक काला स् ंभ र्थीा, सिSसमें कोई मूर्ति +हीं र्थीी और यह संभव है विक इसे बाद में बदल विदया गया हो... यह क े वल स्वीर को देख+े क े बाद है विक मैं यह कह रहा हूं विक स् ंभों को बदल विदया गया हो सक ा है। इ+ स् ंभों क े शीष: पर मूर्ति यां हैं और इन्हें देखकर ही मैं कह रहा हूं विक ये स् ंभ बदले गए हैं।” " स्वीर सं. 62 में वि£ल क े पास एक स् ंभ की रह संरच+ा है, सिSसमें मूर्ति यां हैं। यह स् ंभ विववाविद संपखित्त क े उत्तरी द्वार पर है... यह स्वीर सं. 64 क े सार्थी-सार्थी सफ े द रंग में विदखाई दे ा है, और मूर्ति यां भी विदखाई दे रही हैं... स्वीर सं. 65 मुख्य द्वार का है। हालांविक, इसक े स् ंभ में मूर्ति यां र्थीीं, Sो परिरव:+ क े परिरर्णामस्वरूप हैं। स्वीर सं. 66 भी पूव- विदशा का है, लेविक+ इसमें मूर्ति यां हैं, Sो परिरव:+ का परिरर्णाम हैं.” “ स्वीर सं. 72 में काले स् ंभ ो हैं हिंक ु उ+क े ऊपरी और वि+चले भाग में मूर्ति यां हैं......। वही स्जिस्र्थीति स्वीर सं. 71 में विदखाए गए दो स् ंभों की है। वही हाल स्वीर सं. 73 क े स् ंभ की भी है। इसमें भी मूर्ति यां हैं। स्वीर सं. 74 भी उसी समा+ है, सिSसमें स् ंभों पर प्रति माएं हैं। यह स् ंभ सभी रफ से पूरी रह विदखाया गया है, Sो वहां पर लगे र्थीे। '' " स्वीर सं. 101 भी उस Sगह का है, लेविक+ उसमें कई बदलाव विकए गए हैं। मूर्ति भी मौSूद हैं और कलश भी मौSूद हैं। ” “यह सच है विक इस एल्बम में शाविमल सभी स्वीरें मेरे अति*वXा की उपस्जिस्र्थीति में ली गई र्थीीं. ये सभी स्वीरें विववाविद भूविम और संपखित्त की हैं।” ऐसे गवाह र्थीे सिSन्हों+े लड़+े वाले हिंहदू पक्षकारों की ओर से बया+ विदया। उन्हों+े स् ंभों की स्वीरों में तिचवित्र मूर्ति यों क े बारे में भी ब ाया। इ+ मूर्ति यों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में विहन्दूओं द्वारा पूज्य देवी देव ाओं यर्थीा ह+ुमा+, +रसिंसह, गर्णेश और दुगा: क े तिचत्र हैं। गवाहों +े मोर, गरुर्ण और कमल की आक ृ ति यों क े बारे में भी बया+ विदया। हिंहदू पक्षकारों की ओर से इस संबं* में सिS+ गवाहों +े बया+ विदया वे र्थीे र्डीर्डब्ल्यू-3/5-1-2, 17/1, बी/1-1, 17/1, 20/1 और 12/1 । स्वीरों क े सार्थी युखिग्म थ्य यह है विक उत्ख++ क े दौरा+, एएसआई द्वारा 62 मा+व और 131 पशु आक ृ ति यां पायी गयी। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े उल्लेख विकया विक इसमें कोई विववाद +हीं र्थीा विक उत्ख++ क े दौरा+ कोई इस्लामी प्रक ृ ति की कलाक ृ ति +हीं पायी गयी Sबविक हिंहदू *ार्मिमक मूल से संबंति* कलाक ृ ति याँ बहु ाय में पाई गई ं। उ+में से, Sैसा विक विवद्व न्याया*ीश +े उल्लेख विकया है, फ ू लों क े अंक+ र्थीे (प्लेट्स सं. 51 और 62); एक +ाग का फ+ (प्लेर्ट सं. 129) और मा+व आकार में अन्य देवी- देव ाओं से संबंति* (प्लेर्ट सं. 104-112, 114-116, 118-123 और 125-126) । सिS+ गवाहों +े एएसआई क े वि+ष्कषÂ और रिरपोर्ट: का समर्थी:+ विकया, वे र्थीे र्डॉ. आर +ागस्वामी (OPW-17), अरुर्ण क ु मार (OPW-18) और राक े श दत्त वित्रवेदी (OPW-19) । एएसआई की रिरपोर्ट: पर आपखित्तयां

461. वरिरष्ठ विवद्व अति*वXा सुश्री मी+ाक्षी अरोड़ा +े एएसआई की रिरपोर्ट: पर वि+म्+खिलखिख आपखित्तयां द्वारा अप+ा क: रखा है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) एएसआई रिरपोर्ट: प्रत्यक्ष त्रुविर्टयों और आं रिरक विवसंगति यों से £स् है; (ii) एएसआई रिरपोर्ट: साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 की *ारा 45 क े मद्दे+Sर पुरा त्वविवदों की क े वल एक राय है; और (iii) पुरा त्व एक वि+गम+ात्मक विवज्ञा+ है सिSससे रिरपोर्ट: का साक्ष्य का कमSोर हो गया है। ीसरे कर्थी+ को स्पष्ट कर े हुए, सुश्री अरोड़ा +े कहा विक पुरा त्व प्राक ृ ति क विवज्ञा+ से अलग एक सामासिSक विवज्ञा+ है। उ+क े कर्थी+ा+ुसार, पुरा त्वविवज्ञा+ प्राक ृ ति क विवज्ञा+ क े विवपरी वादीक +हीं हो ा Sो सत्याप+ योग्य परिरकल्प+ाओं पर आ*ारिर हो े हैं। विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा +े कहा विक पुरा त्वविवज्ञा+ उत्ख++ से प्राप्त साम£ी से वि+ष्कष: वि+काल+े पर आ*ारिर हो ा है और इससे सत्याप+ योग्य वि+ष्कष: +हीं वि+काल ा है। सुश्री अरोड़ा +े एएसआई रिरपोर्ट: क े संबं* में वि+म्+खिलखिख अति रिरX आपखित्तयों वि+वेविद विकया: (i) एएसआई रिरपोर्ट: को साविब कर+े क े खिलए विकसी गवाह को +हीं बुलाया गया; (ii) एएसआई द्वारा इस बारे में कोई वि+ष्कष: अंविक +हीं है विक क्या कोई ऐसा मंविदर है सिSसे मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए ध्वस् कर विदया गया र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) व्यविXग अध्यायों क े विवपरी, रिरपोर्ट: क े वि+ष्कष: में अणिभखिलखिख परिरर्णामों का सारांश विकसी लेखक विवशेष का +हीं है; और (iv) रिरपोर्ट: में यह दर्भिश +हीं है विक उत्ख++ काय: कर+े क े खिलए उत्तरदायी र्टीम क े सदस्यों क े बीच कोई बैठक हुई र्थीी या +हीं। यविद बैठक हुई ो बैठक क े +ोर्टों को विदया Sा+ा चाविहए र्थीा। इसक े बाद, रिरपोर्ट: को चु+ौ ी दे+े क े बारे में अप+े कर्थी+ क े दौरा+, वाद 4 में वादी की ओर से प्रस् ु विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े कहा विक परिरर्णाम का सारांश हस् ाक्षरिर विकया गया है या +हीं, यह Sांच की एक वि+रर्थी:क लाइ+ है क्योंविक यह क े वल रिरपोर्ट: की प्रामाणिर्णक ा और लेखक पद पर Sा ा है। र्डॉ. *व+ +े ठीक ही कहा विक एएसआई रिरपोर्ट: क े लेखक पर सवाल +हीं उठाया Sा सक ा है क्योंविक इसमें कोई विववाद +हीं है विक यह एएसआई की है और उच्च न्यायालय क े वि+द†शों क े अ+ुपाल+ में प्रस् ु की गयी है। इस क: क े आलोक में, परिरर्णाम क े सारांश क े लेखक क े बारे में सुश्री अरोड़ा द्वारा पहले उठाए गए संदेह खत्म विकया Sा ा है। रिरपोर्ट: बी आर मणिर्ण और हरिर मांझी द्वारा सह -खिलखिख है। रिरपोर्ट: एएसआई से वि+कल ी है सिSसे उच्च न्यायालय द्वारा काय: सौंपा गया र्थीा। रिरपोर्ट: क े लेखक, उत्पखित्त या प्रामाणिर्णक ा क े बारे में कोई विववाद +हीं है, हम उस आ*ार पर सुश्री अरोड़ा द्वारा उठायी गयी आपखित्त में कोई सार +हीं पा े । आपखित्तयों का गुर्णावगुर्ण mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

462. विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री अरोड़ा द्वारा एएसआई की रिरपोर्ट: क े खिखलाफ सिS+ आपखित्तयों को उठाया गया है, उन्हें खिलखिख कर्थी+ क े खंर्ड ए-91 में विवस् ार से ब ाया गया है, सिSसका शीष:क है “ स्र्ट्रैर्टी£ाफी/अवति*कीकरर्ण, स् ंभ आ*ार, दीवार,वृत्ताकार वेविदका, दैवीय युगल एवं अन्य कलाक ृ ति यां, चमकीले ब:+ एवं चमकीले र्टाइल्स,पशु हतिड्डयां” । प्रारंणिभक क: हैं: (i) एएसआई +े उत्ख++ पर विमट्टी की पर ों को ठीक से तिचवि- +हीं कर ा; (ii) एएसआई विवणिशष्ट पर ों से कलाक ृ ति यों क े विमल+े का सही अणिभलेख +हीं रखा और संदभ: खो विदया. (iii) यद्यविप उत्ख++ में पाई Sा+े वाली हतिड्डयों क े काला+ुक्रम क े बेह र अ+ुमा+ों हे ु काब:+ र्डेहिंर्टग और पेखिलयो-बौर्टावि+कल अध्यय+ कराया Sा सक ा र्थीा, हिंक ु क े वल चारकोल +मू+े काब:+ र्डेहिंर्टग क े खिलए भेSे गए र्थीे; (iv) यद्यविप एएसआई +े अप+ी अं रिरम रिरपोर्ट: में उच्च न्यायालय को यह आश्वास+ विदया र्थीा विक वह विमट्टी और गारे (काब:+ र्डेहिंर्टग क े खिलए), विमट्टी क े ब:+ (र्थीम ल्युविम+ेसेंस क े खिलए), अ+ाS और पराग (पेखिलयो बोर्टेवि+कल अध्यय+ों क े खिलए) और हतिड्डयों (Sन् ु अवशेषों क े अध्यय+ क े खिलए) क े +मू+े एकत्र करेगा, लेविक+ यह +हीं विकया गया। (v) उच्च न्यायालय +े एएसआई को वि+द†श Sारी विकए र्थीे विक प्रत्येक स ह से कलाक ृ ति यों क े सही अणिभलेखीकरर्ण क े खिलए रसिSवादर रखा Sाए; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vi) एएसआई +े 15 विद+ों में त्वरिर रीति से अप+ी रिरपोर्ट: ैयार की और प्रस् ु की।

463. एएसआई को एक Sविर्टल काय: कर+ा पड़ा। इसका उत्ख++ समयबद्ध र्थीा। उत्ख++ कर+े वाली र्टीम को देव ा की पूSा को प्रभाविव विकए विब+ा एक अस्र्थीायी मंविदर क े चारों ओर अप+ा काम कर+ा र्थीा। खाइयों को साव*ा+ी से व्यवस्जिस्र्थी कर+ा र्थीा। एएसआई क े साम+े कई कविठ+ाइयां र्थीीं। इसकी र्टीम +े लोगों की Sा+कारी में, पक्षकारों या उ+क े प्रति वि+ति*यों की उपस्जिस्र्थीति में उत्ख++ विकया । रिरपोर्ट: में उ+ असामान्य परिरस्जिस्र्थीति यों को +ोर्ट विकया गया है सिSसका इस+े उत्ख++ क े दौरा+ साम+ा विकया: “a. उत्ख++ की योS+ा में, खाइयों क े लेआउर्ट की +वी+ म क+ीक को अप+ा+े का वि+र्ण:य खिलया गया, Sहां सीविम स्र्थीा+ उपलब्* र्थीे और इसखिलए 10 x 10 मीर्टर क े लेआउर्ट क े सामान्य अभ्यास क े स्र्थीा+ पर

4. 25x[4]. 25m क े चार च ुर्थीाãश को विवभासिS विकया गया। b. मा++ीय उच्च न्यायालय क े वि+द†श पर, भार ीय पुरा त्व सव†क्षर्ण +े पांच माह क े सीविम समय में ही +ब्बे खाइयों की खुदाई की है, सिSसक े बाद पंˆह विद+ों क े भी र उत्ख++ रिरपोर्ट: प्रस् ु की Sा+ी आवश्यक है। सव†क्षर्ण क े अस्जिस् त्व क े एक सौ चालीस साल क े इति हास में यह एक अभू पूव: घर्ट+ा है। c..... इस प्रकार उ+क े प्रलेख+, अध्यय+, फोर्टो£ाफी, र्ड्राइंग और रासायवि+क संरक्षर्ण क े खिलए उपलब्* समय क े वल क ु छ घंर्टे क ही सीविम र्थीा और वह भी उस विद+ का काम बंद कर+े की ओर खाई से प्राप्त साम£ी क े मामले में +हीं... सुरक्षा Sांच और ऐसी अन्य प्रशासवि+क आवश्यक ाओं में शाविमल औपचारिरक ाओं क े कारर्ण अक्सर काय: प्रभाविव और विवलंविब हो ा र्थीा... d. मा+सू+ क े आ Sा+े पर Sू+ से काय: की स्जिस्र्थीति और विबगड़ गई Sब पूरी साइर्ट अ+ेक बहुरंगी Sलरो*ी चादर से ढंक दी गयी सिSससे गड्ढों में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अं*ेरे क े अलावा ाप और आˆ: ा पैदा हो ी र्थीी। बंदरों +े उ+ चादरों को +ुकसा+ पहुंचाया सिSससे उन्हें बांस और लकड़ी क े खंभों पर फ ै लाया गया। उससे और अति*क अं*ेरा हो गया। स् र वि+रीक्षर्ण विवशेषकर स ह वि+*ा:रर्ण में बहु समस्या आयी। इ+ कारकों से Sारी काय: की प्रविक्रया को *ीमा कर विदया।'' सुश्री अरोड़ा का कह+ा है विक इ+ कविठ+ाइयों क े कारर्ण त्रुविर्टयां हुई ं । सिSस रह से एएसआई +े वाˆेविर्ट£ेविफकल अवति*करर्ण विकया र्थीा, उसे उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रश्नांविक विकया गया। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े आपखित्तयों को खारिरS कर े हुए कहा: “3846. वादी (वाद-4) की ओर से पेश विकए गए छह विवशेषज्ञ गवाहों क े बया+ से, हम पा े हैं विक वे सभी यह कह+े में एकम +हीं हैं विक एएसआई द्वारा की गयी पूरी वाˆैर्टी£ाफी या अवति*करर्ण खराब या गल है या ऐसी साम£ी या अवै* ा या अवि+यविम ा से £स् है विक उसे खारिरS कर विदया Sाय सिSससे विक अन् ः पूरी रिरपोर्ट: ही खारिरS हो Sाय। उ+क े बया+ भी विवरो*ाभासी, अस्पष्ट, भ्रविम और... अ+ुमा+ों पर आ*ारिर हैं। 3863.... इसक े विवपरी उ+में से अति*कांश इस बा को स्वीकार कर े हैं विक एक या अति*क पद्धति से वाˆैविर्ट£ाफी/कालक्रम का वि+*ा:रर्ण विकया Sा सक ा है Sो अच्छी रह से पहचा+ी Sा ी हैं और वे हैं... (1) वंश वार, (2) श ाब्दी वार और (3) स ह वार और एएसआई +े ी+ों प्रर्णाखिलयों का पाल+ विकया है।” उच्च न्यायालय +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: “3979. भार ीय पुरा ास्जित्वक सव†क्षर्ण की रिरपोर्ट:, Sो उत्ख++ क े विवशेषज्ञ की एक रिरपोर्ट: है, में सभी विववरर्ण शाविमल हैं, सिSसमें वाˆैविर्ट£ाफी, कलाक ृ ति, अवति*करर्ण क े सार्थी-सार्थी संरच+ाओं और दीवारों का विववरर्ण भी शाविमल है।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

464. एएसआई की रिरपोर्ट: का विवश्लेषर्ण कर+े क े क्रम में, एएसआई द्वारा अप+ायी गयी काय:प्रर्णाली और दS: वि+ष्कषÂ पर की गई आलोच+ा को ध्या+ में रख+ा महत्वपूर्ण: है। उन्हें ध्या+ में रख+ा इस न्यायालय क े खिलए एक महत्वपूर्ण: मूल्यांक+ क+ीक होगी Sो वै* पाये Sा+े पर ऐसी प्रकृ ति की होंगी विक रिरपोर्ट: की उपयोविग ा को रद्द कर देंगी। वैकस्जिल्पक रूप से, इस न्यायालय को एक अति*क बारीक दृविष्टकोर्ण से विवचार कर+ा पड़ सक ा है सिSसक े ह रिरपोर्ट: में मौSूद कविमयों से संभाव+ा, प्रासंविगक ा और असंगति क े आ*ार पर वि+ष्कष: का यर्थीार्थी:वादी मूल्यांक+ हो सक ा है। वि+र्ण:य को मूल प्रश्न पर विवचार कर+ा चाविहए विक क्या एएसआई क े वि+ष्कषÂ का स्वत्व क े वि+*ा:रर्ण में प्रासंविगक ा है।

465. सुश्री अरोड़ा +े आर सी र्थीकरा+ (PW-30) की मौखिखक गवाही पर प्रकाश र्डाला है, सिSन्हों+े एएसआई रिरपोर्ट: का ख°र्ड+ विकया है। PW-30 +े उल्लेख विकया है विक ‘वाˆेविर्ट£ाफी और रेतिर्डयोलॉSी’ शीष:क से अध्याय III क े VI से VII अवति* को बाद में ‘परिरर्णामों क े सारांश’ में बदल विदया गया र्थीा। प्रारंभ में रिरपोर्ट: क े 38 से 41 पृष्ठों पर, अवति* V, VI और VII का +ामकरर्ण इस प्रकार है: "अवति* V: गुप्तोत्तर राSपू, 7 वीं से 10 वीं सदी। अवति* VI: मध्यकाली+-सल् +, 11 वीं-12 वीं सदी. अवति* VII: मध्यकाली+, 12 वीं से 16 वीं सदी ।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA PW-30, हालांविक इस थ्य पर ध्या+ आकर्मिष कर ा है विक परिरर्णामों क े सारांश में उपरोX +ामकरर्ण को वि+म्+ा+ुसार संशोति* विकया गया है: "अवति* V: गुप्तोत्तर राSपू, 7 वीं से 10 वीं सदी। अवति* VI: प्रारंणिभक मध्यकाल, 11 वीं-12 वीं सदी. अवति* VII: मध्यकाली+-सल् +, 12 वीं से 16 वीं सदी ।” सुश्री अरोड़ा द्वारा ध्या+ से उSागर की गई उपरोX विवसंगति यों को ध्या+ में रख+ा चाविहए। PW-30 क े अ+ुसार, मध्ययुगी+-सल् + को अवति* VI से VII में अं रिर कर+े से इस्लाविमक अवति* की साम£ी Sैसे विक ग्लेज़्र्ड वेयर या चू+ा-पंSर को अवति* VI क े स् रों से म+मा+े ढंग से अवति* VII में हर्टाकर उ+की अ+देखी कर+े का ‘लाभ’ है, ाविक उ+ स् रों में उ+की वास् विवक उपस्जिस्र्थीति एएसआई को अवति* VI में एक कणिर्थी “विवशाल” या “भव्य” मंविदर का वि+मा:र्ण रख+े में कोई चु+ौ ी + हो। अवति*करर्ण-स् रीकरर्ण क े पहलू पर Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू- 20/5) Sो पूव: में एएसआई में पुरा त्व अ*ीक्षक र्थीे, +े कहा: ".... यद्यविप विक मैं एएसआई की राय से सहम हूं, सिSसका उल्लेख पृष्ठ 37-ए पर उ+क े द्वारा ैयार विकए गए चार्ट: में विकया गया है, Sहां उन्हों+े स ह 4 और 5 को प्रारंणिभक मध्यकाली+ सल् + अवति* का ब ाया है। चार्ट: में पृष्ट 37-ए पर एएसआई +े प्रारंणिभक मध्यकाली+ सल् + अवति* का उल्लेख विकया है Sबविक पृष्ठ 40 पर उन्हों+े मध्यकाली+ अवति* का उल्लेख विकया है। मेरे विदमाग में ऐसा प्र ी हो ा है विक दो+ों क े बीच अं र है, लेविक+ मैं इसे स्पष्ट +हीं कर सक ा। प्र. क्या यह कह+ा सही है विक चार्ट: में पृष्ट 37-A पर हल्क े हरे रंग से इंविग शब्द “प्रारंणिभक मध्यकाली+ सल् + अवति*” वही अवति* है Sो mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एएसआई की रिरपोर्ट: वॉल्यूम I क े पृष्ट 40 पर 11 वीं-12 वीं श ाब्दी की अवति* VI (मध्यकाली+ सल् + स् र )क े रूप में वर्भिर्ण है। उ. चूंविक “प्रारंणिभक मध्यकाली+” शब्द का काला+ुक्रविमक अर्थीÂ में एक वि+तिश्च अर्थी: है, इसखिलए मैं इसकी मध्यकाली+-सल् + स् र से बराबरी +हीं कर सक ा । इसखिलए उत्ख++क ा:, सिSन्हों+े यह चार्ट: ैयार विकया गया है, उन्हें हमारे द्वारा विकसी वि+ष्कष: पर पहुंच+े से पहले स्जिस्र्थीति को स्पष्ट कर+े की आवश्यक ा है।” (प्रभाव वर्ति* ) गवाह क े Sवाब से रेखांविक विकए गए अंश एएसआई से उस वग-करर्ण पर स्पष्टीकरर्ण क े महत्व पर Sोर दे े हैं सिSसे उस+े अप+ाया र्थीा। यह ठीक उ+ कविठ+ाइयों में से एक है सिS+का आपखित्तक ा:ओं को साम+ा कर+ा होगा। यविद स्पष्टीकरर्ण आवश्यक र्थीा (Sैसा विक गवाह स्वीकार कर ा है), लेविक+ यह उतिच र्थीा विक ऑर्ड:र XXVI वि+यम 10 (2) क े ह, एएसआई से एक उपयुX गवाह क े परीक्षर्ण क े खिलए अदाल में एक अ+ुरो* विकया Sा ा। ऐसा +हीं विकया गया। स् ंभ आ*ारों क े संबं* में आपखित्त

466. एएसआई की रिरपोर्ट: में कहा गया है विक: "उत्ख++ से यह अ+ुमा+ लगाया Sा सका विक उत्तर से दतिक्षर्ण स् ंभों की सत्रह क ारें र्थीी प्रत्येक क ार में पांच स् ंभ आ*ार र्थीे। '' दूसरी ओर यह स्वीकार कर ा है विक: “ उत्ख++ विकए गए पचास स् ंभ आ*ारों में से क े वल बारह ही पूरी रह विदख रहे र्थीे, पैं ीस आंणिशक रूप mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA से विदख रहे र्थीे और ी+ अंश ःही देखे Sा सक े र्थीे। पहले क े उत्ख++ क े दौरा+ क ु छ स् ंभ आ*ार पाये गये र्थीे सिSसक े बाद विवणिभन्न प्रस् रों क े सार्थी उ+क े संबं* और उ+की भार वह+ क्षम ा क े बारे में विववाद हुआ।” सुश्री अरोड़ा का कर्थी+ है विक र्थीाकणिर्थी स् ंभ आ*ार वि+म्+खिलखिख कारर्णों से या ो कणिर्थी रूप से विवशाल संरच+ा/मंविदर का एक विहस्सा +हीं हो सक े या उसको आ*ार प्रदा+ +हीं कर सक े र्थीे Sैसा विक एएसआई द्वारा दावा विकया गया है: (i) उत्ख++ क े दौरा+, एएसआई +े विवणिभन्न अवति*यों से संबंति* विवणिभन्न पर ों की पहचा+ की। विवणिभन्न पर ों क े भी र, इस+े चार अलग-अलग हों की उपस्जिस्र्थीति की पहचा+ की सिS+का अस्जिस् त्व +ींबू-सूख- या सुख- क े स्पष्ट रूप से सीमांविक हों से तिचस्जिन्ह है, ये ह विवणिभन्न प्रस् रों पर हैं, स ह 1 ध्वस् मस्जिस्Sद का स् र है और स ह 2, 3 और 4 इसक े +ीचे विवणिभन्न स् रों पर है Sैसा विक रिरपोर्ट: में तिचवित्र विकया गया है। यह देख े हुए विक कणिर्थी स् ंभ आ*ार विवणिभन्न हों में पाए गए हैं या विवणिभन्न हों को कार्ट े हुए, यह स्पष्ट है विक इ+ स् ंभ आ*ारों का वि+मा:र्ण अलग-अलग समय पर विकया गया है। इसखिलए, र्थीाकणिर्थी स् ंभ आ*ार समकाली+ रूप से एक विवशाल संरच+ा ो छोविड़ए एक एकल संरच+ा का विहस्सा भी +हीं हो सक े; (ii) एएसआई रिरपोर्ट: क े विवणिभन्न विहस्सों में विवणिभन्न हों पर पाए गए कणिर्थी स् ंभ आ*ारों की संख्या में विवसंगति यां और णिभन्न ाएं हैं। तिचत्र 23 ए में समविम ीय दृश्य में कई कस्जिल्प या अ+ुमावि+ स् ंभ आ*ार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हैं Sो +हीं पायी गयी हैं। इसखिलए विवशाल ढांचे का दावा एक वि+रा*ार परिरकल्प+ा है क्योंविक स् ंभ आ*ारों की वादीक संख्या ज्ञा +हीं है; (iii) विकसी भी दशा में, र्थीाकणिर्थी स् ंभ आ*ार वास् विवक माप और दूरी में साम्य में +हीं हैं (Sैसा विक विवशेषज्ञ सातिक्षयों र्डीर्डब्ल्यू- 20/5 और ओपीर्डब्ल्यू-17 द्वारा स्वीकार विकया गया है सिSन्हों+े एएसआई रिरपोर्ट: क े समर्थी:+ में बया+ विदया )। स् ंभ आ*ार मोर्टी पतिश्चमी दीवार से अलग दूरी पर हैं। इसक े अलावा, इ+ कणिर्थी स् ंभ आ*ारों क े आकार और माप दीघ:वृत्ताकार से गोलाकार से वगा:कार से आय ाकार क विवणिभन्न विवमाओं वाले हैं। इससे + क े वल यह प ा चल ा है विक वे अलग-अलग समय अवति* में ब+ाए गए र्थीे, बस्जिल्क यह भी प ा चल ा है विक वे विकसी भी बड़े ढांचे या मंविदर का सहारा +हीं हो सक े र्थीे। इसक े अलावा, इ+ स् ंभ आ*ारों में से कोई भी विकसी भी स् ंभ क े सार्थी Sुड़ा +हीं पाया गया; और (iv) एएसआई द्वारा दशा:ए गए र्थीाकणिर्थी स् ंभ आ*ारों की प्रक ृ ति को ध्या+ में रख े हुए, Sो ज्यादा र ईर्टों से ब+े र्थीे, वे अति*क से अति*क अप+े ऊपर क े वल लकड़ी क े स् ंभों को आ*ार प्रदा+ कर सक े र्थीे (Sैसा विक र्डीर्डब्ल्यू-20/5 द्वारा स्वीकार विकया गया है, Sो विक एक विवशेषज्ञ गवाह हैं सिSस+े एएसआई रिरपोर्ट: क े समर्थी:+ में गवाही दी र्थीी)। ऐसे लकड़ी क े खंभे विवशाल ढांचे क े भारी बोझ को वह+ +हीं कर सक े र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उपरोX आपखित्तयों को अति*वXा क े कर्थी+ क े वि+म्+खिलखिख विबन्दुओं क े ह साक्ष्य क े आ*ार पर स्र्थीाविप कर+े का प्रयास विकया गया है: (i) स् ंभ आ*ार एक ही ह से संबंति* +हीं हैं Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू 20/5); अरु+ क ु मार शमा: (ओपीर्डब्ल्यू 18) अशोक दत्ता (पी र्डब्ल्यू 31); और र्डा णिशरी+ रत्+ागर (पीर्डब्लयू 27) +े कहा विक सभी स् ंभ आ*ार एक ही ह से संबंति* +हीं हैं। ओपीर्डब्ल्यू 18 +े कहा विक 46 स् ंभ सा वीं (बारहवीं श ाब्दी ई.) की अवति* क े स ह 3 से संबंति* हैं और 4 स् ंभ स ह 4 (ग्यारहवीं श ाब्दी ई.) से संबंति* हैं। पी र्डब्ल्यू 31 +े कहा विक ढूह क े उत्तरी भाग में पाए गए क ु छ स् ंभ आ*ार एक अलग ऊ ं चाई और संरच+ात्मक गति विवति* से संबंति* र्थीे। पीर्डब्लयू 27 +े कहा विक स् ंभ आ*ार प्रस् र से संबंति* +हीं हैं। (ii) स् ंभ और स् ंभ आ*ार काल्पवि+क हैं आर +ागस्वामी (ओपीर्डब्ल्यू 17), Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू 20/5) और अशोक दत्ता (पीर्डब्ल्यू 31) +े अप+ी परीक्षा क े दौरा+ दावा विकया विक प्रत्येक यह कह+ा एक अ+ुमा+ है विक स् ंभ आ*ारों की 17 पंविXयां र्थीीं सिSसमें प्रत्येक में पांच स् ंभ आ*ार र्थीे क्योंविक सभी 85 स् ंभ आ*ारों का उत्ख++ +हीं विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) स् ंभ आ*ार संरेखर्ण में +हीं हैं आर सी ठकरा+ (पीर्डब्लयू 30), अशोक दत्त (पी र्डब्ल्यू 31) और सुविप्रया वमा: (पी र्डब्ल्यू 32) +े कहा विक स् ंभ आ*ार वादीक संरेखर्ण में +हीं र्थीे Sैसा विक एक स् ंभ वाले हॉल में अपेतिक्ष होगा। (iv) स् ंभ आ*ार विवणिभन्न आक ृ ति आकार क े हैं Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू 20/5) +े कहा विक स् ंभ आ*ार सं. 42 (43X120X28 सेमी) आकार में सबसे छोर्टा र्थीा Sबविक सबसे बड़ा स् ंभ आ*ार +ंबर 35 (170X160X38 सेमी) है। (v) स् ंभ/स् ंभ आ*ार भार को वह+ कर+े लायक +हीं र्थीे आर +ागस्वामी (ओ. पी. र्डब्ल्यू. 17) +े बया+ विदया विक स् ंभ आ*ारों में Sो स् ंभ प्रयुX विकए गए र्थीे वे शायद लकड़ी क े र्थीे और पत्र्थीर +हीं र्थीे-ऐसे स् ंभ पर र्टाइल की छ का भार हो सक ा है, हिंक ु भारी अति*रच+ा का +हीं। अशोक दत्ता (पीर्डब्ल्यू 31) +े कहा विक र्थीाकणिर्थी आ*ार स् ंभ आ*ार +हीं हैं, बस्जिल्क वास् व में ई ंर्ट -पट्टी क े Sमाव हैं। पीर्डब्ल्यू 27, पीर्डब्ल्यू 30 और पीर्डब्ल्यू 32 +े भी यह बया+ विदया है विक स् ंभ आ*ार और स् ंभ भार वह+ कर+े लायक +हीं र्थीे। दीवार क े संबं* में आपखित्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

467. उत्खवि+ दीवारों की उपस्जिस्र्थीति क े संबं* में उच्च न्यायालय क े समक्ष एएसआई की रिरपोर्ट: पर वि+म्+खिलखिख आपखित्तयां की गयी: “शास्त्रीय शैली का एक मध्यकाली+ मंविदर का एक क ें ˆीय भाग हो ा सिSसमें मोर्टी आं रिरक दीवारें हो ी हैं Sो एक उच्च अति*रच+ा को सहारा दे ी. र्टेंच एच 1 में स्जिस्र्थी संरच+ाओं की मुख्य योS+ा में दो दीवारें या दो छोर्टी दीवारें हैं, सिS+में से प्रत्येक एक मीर्टर से कम लंबी है, सिSसमें लगभग 70 सेमी का अं र है। योS+ा में यह तिचत्रर्ण और एक पंविX इस 'प्रवेश' क े बारे में दी गई सारी Sा+कारी है।” आपखित्तयों पर विवचार कर े हुए, उच्च न्यायालय +े वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: विदया: “3926. उत्ख++ क े दौरा+, क ु ल 28 दीवारें देखी गयी Sैसा विक तिचत्र 3A में विदखाया गया है। सिSसमें से दीवार सं. 1 से 15 या ो विववाविद संरच+ा क े समकाली+ हैं या विववाविद संरच+ा की हैं। दीवार सं. 16 से 28 विववाविद संरच+ा से पहले की हैं और विववाविद संरच+ा क े +ीचे पाए गए…

3928. दीवार और स हों क े संबं* में वादी (वाद-4) क े विवशेषज्ञों (पुरा त्वविवदों) क े बया+ों को पहले ही संक्षेप में कहा Sा चुका है विक इस बा को छोड़कर कोई पया:प्त आपखित्त +हीं है विक राय यह या वह हो+ी चाविहए। लेविक+ वह भी इस साव*ा+ी क े सार्थी उससे इस या उस दो+ों रह से वि+पर्टा Sा सक ा है लेविक+ एक वि+तिश्च रीक े से +हीं। दूसरे शब्दों में इस पहलू पर गवाह अस्जिस्र्थीर और अवि+तिश्च हैं। इसखिलए हमें इस संबं* में एएसआई की रिरपोर्ट: पर संदेह कर+े का कोई पया:प्त कारर्ण +हीं विमल ा। ” सुश्री अरोड़ा +े दीवारों क े संबं* में वि+म्+खिलखिख आपखित्तयां उठाई हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) भी री दीवारें (दीवारें 18A, 18B, 18C और 18D) भार वाहक +हीं हो सक ी र्थीीं क्योंविक वे बहु संकीर्ण: हैं, क े वल दो से ी+ क्रम ऊ ं चे हैं और ई ंर्ट से वि+र्मिम हैं। दीवार 16 ो 1. 77 मीर्टर चौड़ा है Sबविक दीवारें 18A, B, C और D अपेक्षाक ृ प ली हैं। (ii) मोर्टी पतिश्चमी दीवारें मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण की एक विवशेष ा हो ी हैं; (iii) दीवार 16 क े वल बाबरी मस्जिस्Sद की +ींव हो सक ी र्थीी; और

(iv) Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू 20/5) क े अ+ुसार, दीवार 16 लगभग 1130 ईस्वी क े आसपास वि+र्मिम की गयी र्थीी Sब वेविदका क े साम+े एक स् ंभ युX हाल ब+ाया गया र्थीा। दीवार 17 क े वि+मा:र्ण क े बाद, दीवार 17 क े पूव: की ओर स ह 3 क े +ीचे खड़ी संरच+ाओं को बाढ़ से बचाया गया और इसे और मSबू कर+े क े खिलए, दीवार 16 का वि+मा:र्ण विकया गया। वृत्ताकार वेविदका क े संबं* में आपखित्तयां

468. उच्च न्यायालय +े वृत्ताकार वेविदका क े अस्जिस् त्व पर एएसआई क े वि+ष्कषÂ क े संबं* में वि+म्+खिलखिख आपखित्तयों का उल्लेख विकया: "1. संरच+ा की मंविदर संरच+ाओं क े सार्थी + विक वृत्ताकार दीवारों और इमार ों क े सार्थी ुल+ा त्रुविर्टपूर्ण: है।

2. इस स् र में विहन्दू पूSा की कोई वस् ु +हीं विमली।

3. एएसआई क े अ+ुसार बची दीवार गोले का क े वल एक चौर्थीाई र्थीी। ऐसे आकार मुस्जिस्लम वि+मा:र्ण की दीवारों में काफी लोकविप्रय हैं।

4. तिचत्र या पविवत्र खंर्ड क े रूप में संरच+ा में क ु छ भी +हीं विमला सिSसे 'वेविदका' कहा Sा सक ा हो.

5. श्राइ+ 6 वीं या 7 वीं सदी ई. का ब+ा स् ूप हो सक ा र्थीा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इ+ आपखित्तयों को खारिरS कर े हुए, उच्च न्यायालय +े वि+म्+खिलखिख वि+ष्कषÂ को अंविक विकया: “3931. 'वृखित्तका वेविदका', खासकर सिSसका अस्जिस् त्व एएसआई द्वारा पाया गया है, मुस्जिस्लम पक्षकारों क े अति*कांश विवशेषज्ञों (पुरा त्वविवदों) द्वारा स्वीकार विकया गया है, हालांविक यह कहकर इसकी पहचा+ को बदल+े क े खिलए एक अवि+च्छ ु क प्रयास विकया गया है विक यह एक 'बौद्ध स् ूप' हो सक ा है या पूव:व - इस्लामी *ार्मिमक संरच+ा का एक मकबरा। PW-30 +े स्पष्ट रूप से इसे पृष्ठ 15 पर स्वीकार विकया है और कहा है विक हलफ+ामे क े पैरा 14 में उ+का बया+ घर्ट+ास्र्थील पर मंविदर देख+े क े बाद +हीं बस्जिल्क इसकी स्वीर क े आ*ार पर र्थीा।

3935. खाइयों क े बीच विववाविद स्र्थील पर उत्ख++ क े दौरा+ ई-8 और एफ-8 में पूव न्मुख Sली हुई ई ंर्टों की एक वृत्ताकार संरच+ा विमली, सिSसे आम ौर पर "वृत्ताकार वेविदका" कहा Sा ा है, Sो रिरपोर्ट: क े पृष्ठ 70 से 72 वाल्यूम 1 पर विवस् ृ है, और आक ृ ति 17, 24, 24 ए, और रिरपोर्ट: की प्लेर्टों 59, 60 और 62 (खंर्ड 2) में विदखाया गया है। यहां प्रयुX ई ंर्टों क े दो आकार है: 28x21x[5]. 5 सेमी और 22x18x[5] सेमी। गारे की साम£ी कीचड़ वाली र्थीी। इसक े पूव- विहस्से में, एक आय ाकार उद्घार्ट+ है, सिSसकी लंबाई 1.32 मीर्टर और चौड़ाई 32. 5 सेमी है, Sो संरच+ा का प्रवेश द्वार र्थीा। एक पर्थीरीला ब्लॉक, 70x27x17 सेमी माप का, यहां भी पाया गया है, Sाविहर है, दरवाSे क े रूप में। यह एक स्व ंत्र लघु मंविदर र्थीा। वास् ुकला की विवशेष ाओं से प ा चल ा है विक यह एक णिशव मंविदर र्थीा।

3939. यह अकल्प+ीय है विक णिशव मंविदर की इ+ स्पष्ट विवशेष ाओं क े बावSूद, आपखित्तक ा: इसे मुस्जिस्लम कब्र क े समा+ ही पहचा+ रहे हैं।

3940. दूसरे, यह मकबरे क े खिलए बहु छोर्टी संरच+ा है, यह अंदर से क े वल 4. 4 वग: फीर्ट है। + ो यह अप+े आं रिरक भाग में एक कब्र को समायोसिS कर सक ा र्थीा, + ही इसकी पतिश्चमी दीवार पर एक विक़ब्ल्लाह- विमहराब; विक़ब्ल्लाह विमहराब सल् + काल (1192-1526 ई.) क े दौरा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मकबरे-संरच+ा का एक अणिभन्न और आवश्यक विहस्सा र्थीा, Sैसा विक पूरे उत्तरी भार में कई उदाहरर्णों द्वारा तिचवित्र विकया गया है।

3941. ीसरा, मकबरे पर गुंबद ब+ा+े क े खिलए आवश्यक मेहराब का कोई वि+शा+ +हीं है। इसमें कोई हुक -शाफ्र्ट +हीं है और मेहराब क े रैखिखक दबाव का कोई संरच+ात्मक वि+शा+ +हीं है। यह ध्या+ विदया Sा सक ा है विक मेहराब की उप-संरच+ा को चार को+ों क े विक+ारों पर बड़े पैमा+े पर ब+ाया गया है, रैखिखक दबाव को रोक+े क े खिलए। आश्चय: है विक यविद यह विब+ा विकसी गुम्बद क े, और विब+ा विकसी कब्र क े भी हो?

3942. इस प्रकार एक ओर इस संरच+ा का आयाम मकबरे क े खिलए बहु छोर्टा है और दूसरी ओर व्यालमुख कभी कब्रों में +हीं हो ा, Sबविक णिशवलिंलग पर र्डाले गए पा+ी को बाहर वि+काल+े क े खिलए यह णिशव मंविदर का एक अणिभन्न अंग हो ा र्थीा।

3943. वेविदका एक पविवत्र स्र्थीा+ है Sहां पूSा की Sा ी है। यह एक ऐसी संरच+ा है सिSसमें पविवत्र ा हो ी है। इ+कार क े खिलए म+ा कर+े की अ+ुमति +हीं दी Sा+ी चाविहए। "इस संरच+ा को एक वेविदका मा++े का कोई साक्ष्य +हीं" और " एक कोरी कल्प+ा,विब+ा विकसी स्पष्ट आ*ार क े अ+ुमा+", इस रह की विर्टप्पणिर्णयों में क+ीकी कौशल की कमी है और स्पष्ट रूप से ार्मिकक सोच की कमी है। ये स्वयं क े वल "स्पष्ट आ*ार" की कमी क े क: हैं। ये और कई रह क े क: वादी क े 'शु ुरमुग- रवैये' को दशा: े हैं।

3952. सम£ दृविष्टकोर्ण में हमें इस पहलू पर एएसआई क े वि+ष्कषÂ पर संदेह कर+े का कोई कारर्ण +हीं विमल ा है और आपखित्तयों को अन्यर्थीा द+ुसार खारिरS कर विदया Sा ा है। ” विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री अरोड़ा +े वृत्ताकार वेविदका पर रिरपोर्ट: में वि+ष्कषÂ पर वि+म्+खिलखिख आपखित्तयां उठाई हैं: (i) संरच+ा सा वीं से दसवीं श ाब्दी ई.(गुप्तोत्तर राSपू काल) से संबंति* है और इसखिलए इसका 12 वीं श ाब्दी ई. क े कणिर्थी राम Sन्मस्र्थीा+ मंविदर से कोई संबं* +हीं होगा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) उत्ख++ रिरपोर्ट: में यह दर्भिश विकया गया है विक मंविदर क े ठीक ऊपर स्जिस्र्थी स् ंभ आ*ार हैं Sो इस दावे का खंर्ड+ कर ा है विक वृत्ताकार मंविदर बारहवीं श ाब्दी क े हिंहदू ढांचे की उसी समय अवति* का र्थीा; और (iii) विकसी Sल अवशेष का कोई साक्ष्य +हीं है दैवीय युगल एवं अन्य कलाक ृ ति यां

469. वि+म्+खिलखिख आपखित्तयों को उच्च न्यायालय क े समक्ष रखा गया र्थीा: " दैवीय युगल:

1. र्टुकड़े इ +े क्षति £स् हैं विक अपठ+ीय है।

2. उसे दैवीय कह+े का कोई कारर्ण +हीं। र्ट्रेंच K3-K[4] में र्टुकड़े पाये गये अंविक प्रस् र मलबा है। इस प्रकार यह र्टुकड़ा एक क्रमबद्ध संदभ: से +हीं आ ा है।

3. अष्टकोर्णीय शाफ्र्ट: सव च्च ह ( ल 1) क े ऊपर र्ट्रेंच एफ 3 (Pl 140) में ऊपरी स ह से आ ा है। इसकी कोई प्रासंविगक ा +हीं है। 4. अन्यः 383 वास् ु र्टुकड़ों में से क े वल 40 ही परिरमार्जिS संदभÂ से आ े हैं। इ+ 40 में से कोई भी एक मंविदर क े खिलए विववि+र्मिदष्ट +हीं र्थीा, अलग से उसिल्लखिख 8 र्टुकड़े (दरवाSा, आमलक, दैवीय युगल, श्रीवास अंक+, कमल क े पदक आविद) का कोई महत्व +हीं है। उदाहरर्णार्थी:, श्रीवत्स की रच+ा Sै+ *म: से संबंति* है, कमल की तिर्डSाइ+ बौद्ध या मुसलमा+ हो सक ी है।" उच्च न्यायालय +े उपरोX आपखित्तयों को खारिरS कर विदया। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े आयोसिS विकया: “3958. मा+व या पशु आक ृ ति आविद Sैसे उत्ख++ साम£ी की पहचा+ विवशेषज्ञों का काम है। इ+ आठ विवशेषज्ञ में से विकसी भी (मुस्जिस्लम पार्मिर्टयों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े पुरा त्वविवदों) +े पुरा त्व की इस शाखा का विवशेषज्ञ हो+े का दावा +हीं विकया..। अन्यर्थीा इ+ खोSों क े संबं* में उ+का रुख णिभन्न हो ा है। एक गवाह का कह+ा है विक ये वि+ष्कष: उ+ पर ों से बरामद +हीं हुए र्थीे, सिS+का दावा विकया Sा ा है Sबविक अन्य अन्यर्थीा कह े हैं। हम+े इस रह क े कई कलाक ृ ति यों की स्वीरें देखी हैं और पा े हैं और व्यापक ा में, विक एएसआई या अन्य पहचा+ की प्राविप्तयों में ऐसी कोई अं र्मि+विह कमी या विवक ृ ति +हीं है Sो इस अदाल की विर्टप्पर्णी आवश्यक ब+ाए... या उ+की रिरपोर्ट: को रद्द करे। इसमें विववाद +हीं है विक उत्ख++ क े दौरा+ कोई भी इस्लाविमक *ार्मिमक कलाक ृ ति +हीं पायी गयी, Sबविक हिंहदू *ार्मिमक प्रक ृ ति से संबंति* कलाक ृ ति यां बहु ाय में र्थीी। क ु छ वस् ुओं क े खिलए, यह दावा विकया Sा ा है विक इसका उपयोग गैर-हिंहदू लोगों द्वारा भी विकया Sा सक ा है, लेविक+ यह एएसआई की राय पर संदेह कर+े क े खिलए पया:प्त +हीं होगा। प्लेर्ट +ंबर 50 (कपोर्टपल्ली), दीवार 16 और 17 में विदखाए गए +ंबर 51 और 62 (फ ू लों की मोविर्टफ) प्लेर्ट +ंबर 88, कोबरा हुर्ड (+ाग देव ा) प्लेर्ट +ंबर 129 और मा+व आकार में विवणिभन्न अन्य देवी देव ा ाओं (प्लेर्ट सं. 104, 105, 106,107,108, 109, 110, 111, 112, 114, 115, 116, 118, 119, 120, 121, 122, 123, 125,

126) हमारी राय में काफी स्पष्ट हैं और कोई संदेह +हीं है। श्री अरुर्ण क ु मार (OPW-18), र्डॉ. आर. +ागस्वामी (OPW-17) और श्री राक े श दत्त वित्रवेदी (OPW-19) ी+ गवाहों को प्रस् ु विकया गया है सिSन्हों+े एएसआई क े वि+ष्कषÂ और रिरपोर्ट: का समर्थी:+ विकया। वे एएसआई में वरिरष्ठ पद *ारर्ण कर+े वाले सेवावि+वृत्त अति*कारी हैं। उ+क े बया+ पया:प्त लंबे और बेहद विवस् ृ हैं। चूंविक उन्हों+े एएसआई की रिरपोर्ट: का समर्थी:+ विकया है, इसखिलए हम+े इस कारर्ण से अप+े बया+ों का विवस् ार से उल्लेख +हीं विकया है विक हम+े एएसआई रिरपोर्ट: क े खिखलाफ उठायी गयी आपखित्तयों का परीक्षर्ण कर+े का इरादा विकया है विक वादी (वाद 4) क े गवाहों को क्या दशा:या गया है और क े वल भी हमें कु छ संदेह होगा, हम ओपीर्डब्ल्यू 17 से 19 क े बया+ का उल्लेख करेंगे और ुल+ा करेंगे। सम£ रूप से हमें तिचत्र आविद क े संबं* में आपखित्त में कोई साम£ी +हीं विमल ी और द्नुसार खारिरS विकया Sा ा है।" उपरोX आपखित्तयों क े अलावा, विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री अरोड़ा +े वि+म्+खिलखिख आपखित्तयां उठाई हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) एएसआई की ऐसी पृर्थीक र्टीमें, सिSन्हों+े रिरपोर्ट: क े विवणिभन्न अध्याय खिलखे, उ+ अवति*यों पर असंग वि+ष्कषÂ पर पहुंचे सिS+से कलाक ृ ति यां संबंति* र्थीी।; (ii) दैवीय युगल की र्थीाकणिर्थी मूर्ति पूर्ण: ः णिछन्न-णिभन्न है; (iii) दैवीय पद क े प्रयोग क े खिलए कोई आ*ार +हीं है क्योंविक आलिंलग+ मुˆा भी स्पष्ट विदखाई +हीं दे ी है; और (iv) कमल की आक ृ ति Sैसी अन्य कलाक ृ ति यां आवश्यक रूप से विहन्दू *ार्मिमक संरच+ाओं से संबंति* +हीं हैं। चमकीले ब:+ और चमकीले र्टाइल्स क े संबं* में आपखित्तयां

470. विमट्टी क े ब:+ों क े क ु ल 647 र्टुकड़े विमले, उन्हें +ीचे दशा:ई गई +ौ अवति*यों में व्यवस्जिस्र्थी विकया गया: "अवति* I: 99 अवति* II: 73 अवति* III: 105 अवति* IV: 74 अवति* V: 85 अवति* VI: 63 अवति* VII, VIII और IX: 148 क ु ल: 647. ” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 647 र्टुकड़ों में से 148 र्टुकड़े VI, VIII और IX की अवति* में रखे गये। सुश्री अरोड़ा की प्रमुख आपखित्तयां र्थीीं: (i) चमकीले ब:+ सा वीं अवति* क े अंति म चरर्ण में रखे गये, अन्यर्थीा यह उस अवति* में ब+ाए Sा रहे विकसी मंविदर क े विवरुद्ध हो ा; (ii) चमकीले ब:+ मुस्जिस्लम अति*वास का सूचक है और मध्यकाली+ हिंहदू मंविदरों में +हीं विमल ा है; और (iii) चमक ी वस् ुओं क े दो र्टुकड़े VI में पाये गये Sो यह दशा: े हैं विक पर ों को गल रीक े से सम+ुदेणिश विकया गया र्थीा। Sा+वरों की हतिड्डयों क े बारे में आपखित्त

471. विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री मी+ाक्षी अरोड़ा +े पशु हतिड्डयों क े संबं* में वि+म्+खिलखिख आपखित्तयां उठाई हैं: (i) साइर्ट क े प्रत्येक स् र पर उत्ख++ क े दौरा+ पाई गई हतिड्डयों का कोई अध्यय+ +हीं विकया गया र्थीा; (ii) एएसआई की रिरपोर्ट: में अस्जिस्र्थीयों क े अध्यय+ क े संबं* में एक पृर्थीक अध्याय +हीं है और संरच+ात्मक अवशेषों क े सार्थी बरामद अस्जिस्र्थीयों क े प्रासंविगक संबं* की विकसी भी समझ क े विब+ा परिरर्णाम क े संक्षेप में क े वल आकस्जिस्मक संदभ: है; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) कर्टे वि+शा+ों वाले अस्जिस्र्थी-खंर्डों का विमल+ा ऐसे पशुओं का खा+े क े खिलए उपयोग विकए Sा+े का लक्षर्ण है Sो विकसी मंविदर की संभाव+ा को समाप्त कर दे। सुश्री अरोड़ा द्वारा ध्या+ से उSागर की गई उपरोX विवसंगति को ध्या+ में रखा Sा+ा चाविहए। सिसविवल प्रविक्रया संविह ा: *ारा 75 और आदेश XXVI

472. सुश्री अरोड़ा द्वारा ऊपर वर्भिर्ण प्रारंणिभक पहलुओं और रिरपोर्ट: (Sो बाद में उपवर्भिर्ण की Sाएगी) पर गुर्णागुर्ण क े आ*ार पर उठाए गए आक्षेपों पर विवचार कर+े क े पूव:, न्यायालय को उच्च न्यायालय द्वारा एएसआई को अन्वेषर्ण की प्रक ृ ति और परिरति* पर विवचार कर+ा चाविहए।

473. सिसविवल प्रविक्रया संविह ा की *ारा 75277 न्यायालय को “ऐसी श Â और परिरसीमाओं क े अ*ी+ रह े हुए, Sो विवविह की Sाएं, कमीश+ Sारी कर+े की शविX प्रदा+ कर ी है। अदाल अन्य बा ों क े अलावा वैज्ञावि+क, क+ीकी या विवशेषज्ञ Sांच करा+े क े खिलए एक कमीश+ Sारी कर सक ी है। 277 *ारा 75। आयोग Sारी कर+े की न्यायालय की शविX।-ऐसी श Â और सीमाओं क े अ*ी+ Sो वि+*ा:रिर की Sा सक ी हैं, न्यायालय एक आयोग Sारी कर सक ा है - (a) विकसी व्यविX की Sांच क े खिलए (b) स्र्थीा+ीय Sांच क े खिलए (c) लेखा परीक्षा या समायोS+ क े खिलए (d) बंर्टवारे क े खिलए (e) वैज्ञावि+क, क+ीकी या विवशेषज्ञ Sांच क े खिलए (f) प्राक ृ ति क रूप से या Sल्द खराब हो+े वाली वस् ु की त्वरिर विवक्री क े खिलए Sो वाद क े वि+*ा:रर्ण क े लस्जिम्ब रह े न्यायालय की अणिभरक्षा में है। (g) विकसी मंवित्रस् रीय काय: को कर+े क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस विवणिशष्ट प्राव*ा+ को 1 फरवरी 1977 से प्रभावी कर 1976 क े संशो*+ अति*वि+यम 104 द्वारा शाविमल विकया गया र्थीा। आदेश XXVI आयोगों से संबंति* है। वि+यम 1 से 8 गवाहों की परीक्षा क े खिलए कमीश+ को आवृ कर ा है। वि+यम 9 और 10 स्र्थीा+ीय Sांच क े खिलए आयोगों से संबंति* हैं, Sबविक वैज्ञावि+क Sांच क े खिलए और मंत्रालतियक क ृ त्यों क े उद्देश्य से और संपखित्त की विबक्री वि+यम 10 ए, 10 बी और 10 सी क े अन् ग: आ े हैं। शेष प्राव*ा+ों में खा ों की Sांच और विवभाS+ है और विवदेशी न्यायाति*करर्णों क े खिलए कमीश+ सविह सामान्य प्राव*ा+ शाविमल हैं।

474. व:मा+ प्रयोS+ क े खिलए, न्यायालय को वि+यम 9, 10, 10 क और 10 ख क े बारे में काय: कर+ा है। वि+यम 9 न्यायालय को विकसी स्र्थीा+ीय अन्वेषर्ण क े प्रयोS+ क े खिलए, सिSसे वह विववाद में विकसी मामले को स्पष्ट कर+े क े प्रयोS+ क े खिलए अपेतिक्ष या उतिच समझ ा है, कमीश+ Sारी कर+े की शविX प्रदा+ कर ा है स्र्थीा+ीय वि+रीक्षर्ण क े बाद, वि+यम 10 आयुX को सबू क े सार्थी एक हस् ाक्षरिर रिरपोर्ट: अदाल में प्रस् ु कर+े का अति*कार दे ा है। वि+यम 10 इस प्रकार है: "10 आयुX की प्रविक्रया-(1) आयुX, ऐसे स्र्थीा+ीय वि+रीक्षर्ण क े पश्चा ्, Sो वह आवश्यक समझे और उसक े द्वारा खिलए गए साक्ष्य को लेखबद्ध mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर+े क े पश्चा ्, ऐसे साक्ष्य को, उसक े द्वारा हस् ाक्षरिर खिलखिख रिरपोर्ट: सविह, न्यायालय को लौर्टा देगा। (2) रिरपोर्ट: और बया+ का वाद में साक्ष्य हो+ा. आयुX की रिरपोर्ट: और उसक े द्वारा खिलए गए सबू (लेविक+ रिरपोर्ट: क े विब+ा सबू +हीं) वाद में सबू होंगे और रिरकॉर्ड: का विहस्सा ब+ेगा; लेविक+ कोर्ट: या, कोर्ट: की अ+ुमति क े सार्थी, वादकारी कोई भी पक्ष व्यविXग रूप से खुले न्यायालय में आयुX की Sांच कर सक ा है Sो उसे संदर्भिभ मामलों क े विकसी विहस्से से संबंति* हो या सिSसका उसकी रिरपोर्ट: में उल्लेख विकया गया है, या सिSस रीक े से उस+े Sांच की है। (3) Sहां न्यायालय विकसी कारर्णवश आयुX की काय:वाविहयों से असं ुष्ट है, वहां वह ऐसी अति रिरX Sांच कर+े का वि+देश दे सक े गा Sो वह ठीक समझे।" वि+यम 10 ए वैज्ञावि+क Sांच क े प्रयोS+ों क े खिलए एक आयोग की वि+युविX क े संबं* में वि+म्+खिलखिख प्राव*ा+ कर ा है: "10 क. वैज्ञावि+क Sांच क े खिलए कमीश+ (1) Sहां विकसी वाद में उद्भू हो+े वाले विकसी प्रश्न में कोई वैज्ञावि+क अन्वेषर्ण अं व:खिल है Sो न्यायालय की राय में, न्यायालय क े समक्ष आसा+ी से संचाखिल +हीं विकया Sा सक ा है, वहां न्यायालय, यविद वह ऐसा कर+ा न्याय क े विह में आवश्यक या समीची+ समझ ा है, ो ऐसे व्यविX को, सिSसे वह ठीक समझ ा है, कमीश+ Sारी कर सक े गा और उसे ऐसे प्रश्न की Sांच कर+े और उस पर न्यायालय को रिरपोर्ट: कर+े का वि+देश दे सक े गा।" (2) इस आदेश क े वि+यम 10 क े उपबं*, Sहां क हो सक े, इस वि+यम क े अ*ी+ वि+युX आयुX क े संबं* में वैसे ही लागू होंगे Sैसे वे वि+यम 9 क े अ*ी+ वि+युX आयुX क े संबं* में लागू हो े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+यम 10 बी एक मंवित्रस् रीय काय: को कर+े क े खिलए कमीश+ की वि+युविX पर लागू हो ा है सिSसे अदाल क े समक्ष आसा+ी से +हीं विकया Sा सक ा है।

475. एएसआई को एक वैज्ञावि+क Sांच कर+े का वि+द†श दे े हुए, उच्च न्यायालय आदेश XXVI की *ारा 75 और वि+यम 10 ए क े ह अप+ी शविXयों का प्रयोग कर रहा र्थीा। इस रह की Sांच क े खिलए, वि+यम 10 ए क े उप-वि+यम 2 में कहा गया है विक वि+यम 10 क े प्राव*ा+ लागू होंगे, Sहां क हो सक ा है, Sैसा विक वे वि+यम 9 क े ह वि+युX आयुX क े संबं* में लागू हो े हैं। वि+यम 10 (2) में कहा गया है विक रिरपोर्ट: और आयुX द्वारा खिलए गए सबू "वाद में सबू होंगे"। क़ा+ू+ का एक S+ादेश है विक रिरपोर्ट: और साक्ष्य को वाद में सबू क े रूप में मा+ा Sा ा है और यह 'रिरकॉर्ड: का विहस्सा ब+ेगा'। हालांविक, या ो अदाल अप+े स्वयं क े आ*ार पर या कोई पक्षकार (अदाल की अ+ुमति क े सार्थी) व्यविXग रूप से आयुX की Sांच कर सक ी है। यह एक सक्षम प्राव*ा+ है सिSसक े ह आयुX की Sांच या ो अदाल द्वारा अप+े स्वयं क े आ*ार पर या विकसी पक्षकार की ओर से की Sा सक ी है। सिSस विवषय पर आयुX की Sांच की Sा सक ी है, वह वि+यम 10 क े उप-वि+यम 2 में भी वर्भिर्ण है। आयुX की Sांच की Sा सक ी है: (i) वि+र्मिदष्ट विवषयों में से कोइ:; (ii) रिरपोर्ट: में उसिल्लखिख विवषयों में से कोइ: भी; (iii) रिरपोर्ट: क े बारे में; या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) उस रीति क े बारे में, सिSससे अन्वेषर्ण विकया गया है। यह Sांच कर+े में अप+ाई Sा+े वाली प्रविक्रया और रिरपोर्ट: क े मूल पहलुओं दो+ों मामलों को शाविमल कर ा है।

476. र्डॉ. भुव+ विवक्रम सिंसह उच्च न्यायालय क े समक्ष काय:वाविहयों क े अ+ुक्रम में, वाद 5 में वाविदयों +े एक आवेद+ फाइल विकया सिSसमें र्डा. भुव+ विवक्रम सिंसह, Sो उत्ख++ दल का विहस्सा र्थीे, की परीक्षा का अ+ुरो* विकया गया र्थीा उच्च न्यायालय +े गवाह को लब विकया। र्डा. भुव+ विवक्रम सिंसह +े एक अS-278 दाखिखल की सिSसमें यह अ+ुरो* विकया गया र्थीा विक उन्हें न्यायालय क े साक्षी क े रूप में बुलाया Sाए क्योंविक वह न्यायालय द्वारा वि+युX उत्ख++ दल का भाग र्थीे और वह वाद क े विकसी पक्षकार का साक्षी हो+े क े खिलए ैयार +हीं र्थीे. वाद 5 में वादी क े अति*वXा +े आवेद+ का विवरो* +हीं विकया और बया+ विदया विक वह वाद 5 में गवाह क े रूप में र्डॉ. भुव+ विवक्रम सिंसह की Sांच +हीं कर+ा चाह ा। र्थीाविप, अति*वXा +े अ+ुरो* विकया विक र्डा. भुव+ विवक्रम सिंसह को न्यायालय क े साक्षी क े रूप में मा+कर परीक्षा की Sा+ी चाविहए। 4 विदसंबर 2006 क े एक आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय +े बया+ को दS: विकए विब+ा गवाह को छ ु ट्टी दे दी, यह देख े हुए विक अदाल क े पास खुद विकसी भी गवाह को बुला+े का शविX र्थीी और विकसी पक्ष द्वारा अदाल क े गवाह क े रूप में परीतिक्ष विकये Sा+े क े खिलए आवेद+ द्वारा न्यायालय को +हीं सुझाया Sा सक ा। 278 Application no 25(o) of 2006 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

477. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अप+े वि+र्ण:य क े दौरा+ यह उल्लेख विकया विक पक्षकारों +े रिरपोर्ट: पर आक्षेप लगाए र्थीे, सिS+का विववि+श्चय न्यायालय द्वारा विकया Sा+ा र्थीा लेविक+ ब, यह पाया गया विक आपखित्तयों की प्रक ृ ति ऐसी र्थीी विक Sब क पक्षकारो को सबू दे+े की अ+ुमति + दी Sाय ब क आपखित्तयों पर वि+र्ण:य +हीं खिलया Sा सक ा। इसखिलए, 3 फरवरी 2005 को, उच्च न्यायालय +े वि+द†श विदया विक एएसआई रिरपोर्ट: को साक्ष्य क े रूप में स्वीकार विकया Sाएगा, लेविक+ पक्षकारों द्वारा उठाए गए आपखित्तयों का फ ै सला मुकदमों की अंति म सु+वाई में विकया Sाएगा, सिSस समय क साक्ष्य का अणिभलेखीकरर्ण पूरा हो Sाएगा। उच्च न्यायालय +े उल्लेख विकया विक का+ू+ या वि+यम 10 या 10A या आदेश XXVI में कोई आवश्यक ा +हीं है विक रिरपोर्ट: को ब क ठोस सबू क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है Sब क विक आयुX की गवाह क े रूप में Sांच +हीं की Sा ी है। उच्च न्यायालय +े कहा विक विकसी भी पक्ष +े रिरपोर्ट: से संबंति* मामले या आयुX की Sांच कर+े का विवकल्प +हीं चु+ा। इसक े अलावा, उ+क े द्वारा दायर आपखित्तयों +े रिरपोर्ट: की संपूर्ण: ा को चु+ौ ी +हीं दी, बस्जिल्क क े वल परिरर्णामों क े सारांश में वि+काले गए वि+ष्कषÂ को। ऐसा प्र ी हो ा है विक उच्च न्यायालय क े समक्ष पूवा:£ह और दुराशय क े आरोप भी वि+वेविद विकये गये हालांविक, इस अदाल क े समक्ष, सुश्री अरोड़ा द्वारा सु+वाई क े दौरा+ उ+ पर बल +हीं विदया गया।

478. थ्यात्मक स्जिस्र्थीति क े बारे में कोई विववाद +हीं है विक कोई भी पक्ष आदेश XXVI क े वि+यम 10 (2) में वि+विह प्राव*ा+ों क े संदभ: में आयुX की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sांच कर+े का प्रयास +हीं विकया, Sो, Sैसा विक ऊपर देखा गया है, वि+यम 10A (2) क े आ*ार पर वैज्ञावि+क Sांच क े खिलए गविठ कमीश+ पर लागू हो े हैं । आदेश XXVI का वि+यम 9 एक महत्वपूर्ण: शविX है Sो अदाल को स्र्थीा+ीय Sांच कर+े क े खिलए आयोग Sारी कर+े की शविX दे ा है। वि+यम 10 प्रक ृ ति में प्रविक्रयात्मक है। वि+यम 10 सारवा+ है Sो वैज्ञावि+क Sांच कर+े क े खिलए आयोग Sारी कर+े में न्यायालय को सक्षम ब+ा ा है। वि+यम 10A (2) Sो वि+यम 9 क े अ*ी+ वैज्ञावि+क अन्वेषर्ण क े खिलए विकसी आयोग में वि+युX विकए गए आयुX पर वि+यम 10 क े प्राव*ा+ों को लागू कर ा, में 'Sहां क हो सक े ' पद अन् र्मिवष्ट है। ये शब्द उस *ारर्णा को और आयोग को Sारी कर+े या वि+युX कर+े क े खिलए अदाल की शविX क े वि+व:ह+ की व्यवहार साध्य ा को समझ े हैं। वि+यम 10 (2) का दूसरा भाग सक्षमकारी है क्योंविक यह न्यायालय को रिरपोर्ट: या Sांच से संबंति* मामलों पर आयुX का स्वयं परीक्षर्ण कर+े का विववेकाति*कार और परीक्षर्ण क े खिलए आयुX को बुला+े का न्यायालय से अ+ुरो* कर+े क े खिलए पक्षकारों को सक्षम ब+ा ा है। वि+यम 10 आयुX की रिरपोर्ट: पर सवाल उठा+े क े अति*कार को वि+रस् +हीं कर ा है यविद आयुX को प्रति परीक्षा क े खिलए बुला+े की सक्षमकारी शविX का प्रयोग +हीं विकया Sा ा है। रिरपोर्ट: पर असर र्डाल+े वाले मामलों पर आयुX की परीक्षा की मांग करक े एक पक्षकार उस अवसर का लाभ उठा सक ा है। एक पक्षकार अप+े स्वयं क े गवाहों क े साक्ष्य भी ले सक ा है Sो वैज्ञावि+क Sांच क े संचाल+ क े खिलए वि+युX आयुX की काय:प्रर्णाली या वि+ष्कषÂ को चु+ौ ी दे+ा चाह े हैं। आयुX की रिरपोर्ट: पर आपखित्त कर+े का एक पक्ष का अति*कार क े वल इसखिलए वि+रस् +हीं विकया Sा ा है क्योंविक आयुX को सिSरह क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं बुलाया Sा ा है। बहु क ु छ उ+ आपखित्तयों की प्रक ृ ति पर वि+भ:र करेगा Sो न्यायालय क े समक्ष एक पक्ष द्वारा वि+वेविद विकये गये हों, हालांविक आयुX को परीक्षा क े खिलए +हीं बुलाया गया र्थीा।

479. व:मा+ मामले में, उच्च न्यायालय का विवचार र्थीा विक वाद में रिरपोर्ट: को साक्ष्य क े रूप में मा++े क े खिलए आयुX को साक्ष्य देे+े क े खिलए आहू कर+े की कोई पूव:श: +हीं है। उच्च न्यायालय का यह दृविष्टकोर्ण न्यायोतिच है क्योंविक आदेश XXVI क े वि+यम 10 (2) में कहा गया है विक आयुX द्वारा ली गई रिरपोर्ट: और साक्ष्य 'वाद में सबू होंगे और रिरकॉर्ड: का विहस्सा ब+ेंगे '। इसखिलए, रिरपोर्ट: को वाद में सबू क े रूप में और रिरकॉर्ड: क े विहस्से क े रूप में ठीक ही मा+ा गया र्थीा। हालांविक, इस+े काय:वाही क े विकसी भी पक्ष को उस रिरपोर्ट: पर सवाल उठा+े से पूव:वि+वारिर +हीं विकया, सिSसक े खिलए वि+म्+खिलखिख कार:वाविहयों में से विकसी एक या अति*क का विवकल्प हो ा है: (i) आयुX की खुले न्यायालय में परीक्षा की मांग कर+ा; (ii) आयुX की रिरपोर्ट: को विवस्र्थीाविप कर+े क े खिलए अप+े स्वयं क े सातिक्षयों क े साक्ष्य विदलवा+ा; और (iii) आयुX की रिरपोर्ट: पर अप+े आक्षेप को न्यायालय क े विवचारार्थी: रख+ा । न्यायमूर्ति अ£वाल का वि+र्ण:य वास् व में +ोर्ट कर ा है विक रिरपोर्ट: पर पक्षकारों की आपखित्तयों को मुकदमों की अंति म सु+वाई क े बाद अणिभवि+र्ण- विकया Sाएगा, सिSस समय क साक्ष्य पूर्ण: होंगे। ऊपर (ii) और (iii) में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+र्मिदष्ट कार:वाई का हक वि+यम 10 ए (2) क े उत्तराद्ध: द्वारा प्रदत्त पक्षकार की सक्षमकारी शविX से अलग र्थीा।

480. यह कह+े क े पश्चा ् साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 की *ारा 45279 को ध्या+ में रख+ा आवश्यक है। अन्य बा ों क े अलावा Sब अदाल को एक राय ब+ा+ी हो ी है, विवज्ञा+ क े एक हिंबदु पर, उस विवषय क े विवज्ञा+ पर उस विवज्ञा+ में विवशेष रूप से क ु शल व्यविXयों की राय महत्तवपूर्ण: थ्य हो े हैं। ऐसे व्यविX, Sैसा विक का+ू+ उपबं* कर ा है, “ विवशेषज्ञ” कहला े हैं। चंद+ मल इंˆ क ु मार ब+ाम तिचम+ लाल विगर*र दास पारेख280 क े मामले में विप्रवी काउंसिसल क े एक फ ै सले में उस रीति का अणिभवि+*ा:रर्ण है सिSस रह से एक विवशेषज्ञ की रिरपोर्ट: का मूल्यांक+ विकया Sा+ा चाविहए। लॉर्ड: रोमर +े अंविक विकया है Sो विक उस मामले में अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश +े वह *ारिर विकया है विक विकस रीक े से स्र्थीा+ीय आयोग की रिरपोर्ट: को देखा Sा+ा चाविहए: "यह वि+*ा:रिर विकया गया है विक एक लंबी और साव*ा+ स्र्थीा+ीय Sांच क े परिरर्णाम क े वि+ष्कष: को स्पष्ट रूप से परिरभाविष और पया:प्त आ*ार पर ही अवमूस्जिल्य विकया Sा+ा चाविहए। एक अदाल क े खिलए एक विवशेषज्ञ क े रूप में काय: कर+ा और एक ऐसे आयुX की विवस् ृ रिरपोर्ट: को रद्द कर+ा सुरतिक्ष +हीं है, सिSसकी ईमा+दारी और साव*ा+ी वि+र्मिववाद है, सिSसका 279 *ारा 45 उपबं* कर ी है: विवशेषज्ञों की रायें - Sब विक न्यायालय को विवदेशी विवति* की या विवज्ञा+ की या कला की विकसी बा पर या हस् लेख या अंगुली - तिचन्हों की अ+न्य ा क े बारे में राय ब+ा+ी हो ब उस बा पर ऐसी विवदेशी विवति*, विवज्ञा+ या कला में या हस् लेख या अंगुली-तिचन्हों की अ+न्य ा विवषयक प्रश्नों में, विवशेष क ु शल व्यविXयों की रायें सुसंग थ्य है।ऐसे व्यविX विवशेषज्ञ कहला े है।दृष्टान् - (क) प्रश्न यह है विक क्या क की मृत्यु विवष द्वारा कारिर हुई। सिSस विवष क े बारे में अ+ुमा+ है विक उससे क की मृत्यु हुई है, उस विवष से पैदा हुए लक्षर्णों क े बारे में विवशेषज्ञों की रायें सुसंग है। (ख) प्रश्न यह है विक क्या क अमुक काय: करे क े समय तिचत्ताविवक ृ ति क े कारर्ण उस काय: की प्रक ृ ति, या यह विक Sो क ु छ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण: या विवति* क े प्रति क ू ल है, Sा++े में असमर्थी: र्थीा। इस प्रश्न पर विवशेषज्ञों की रायें सुसंग हैं विक क्या क द्वारा प्रदर्भिश लक्षर्णों से तिचत्ताविवकृ ति सामान्य ः दर्भिश हो ी है र्थीा क्या ऐसी तिचत्ताविवक ृ ति लोगों को उ+ कायÂ की प्रक ृ ति, सिSन्हें वे कर े हैं या वह विक Sो क ु छ वे कर रहे हैं, वह या ो दोषपूर्ण: या विवति* क े प्रति क ू ल है, Sा++े में प्रायः असमर्थी: ब+ा दे ी है।(ग) प्रश्न यह है विक क्या अमुक दस् ावेS क द्वारा खिलखी गयी र्थीी। एक अन्य दस् ावेS पेश की Sा ी है सिSसका क द्वारा खिलखा Sा+ा साविब या स्वीक ृ है। इस प्रश्न पर विवशेषज्ञों की रायें सुसंग है विक क्या दो+ों दस् ावेS एक ही व्यविX द्वारा या विवणिभन्न व्यविXयों द्वारा खिलखी गयी र्थीी। इलैक्र्ट्राॅवि+क साक्ष्य क े खिलए परीक्षक एक विवशेषज्ञ होगा।) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साव*ा+ीपूर्ण: और श्रमसाध्य काय: वि+ष्पाद+ उसकी रिरपोर्ट: से साविब हुआ र्थीा, और सिSस+े पक्षकारों क े दावों को आँख बंद करक े +हीं मा+ा।” विवचारर्ण न्याया*ीश की उX विर्टप्पर्णी को अंविक कर, विप्रवी काउंसिसल +े उ+क े द्वारा का+ू+ क े सही स्जिस्र्थीति क े वि+रूपर्ण की अणिभपुविष्ट की है: "यह मा++ीय न्याया*ीश क े वि+र्ण:य में आयुX की रिरपोर्ट: क े संबं* में अप+ाए Sा+े वाले सिसद्धां का एक सही कर्थी+ है। यह सारवा+ रूप से इस बोर्ड: द्वारा र+ी सुरु सोंदरी देविबया ब+ाम बाबू प्रोसो+ो कोमार र्टैगोर [(1870) 13 Moo I.A. 607 at p. 617] क े मामले में पहले से ही वि+*ा:रिर सिसद्धां है।” [इस संदभ: में न्यू मुल् ा+ विर्टम्बर स्र्टोर ब+ाम र + चंद सूद281 क े मामले में विदल्ली उच्च न्यायालय क े एक विवद्वा+ एकल न्याया*ीश का वि+र्ण:य भी देखें]

481. र्डॉ. राSीव *व+ +े अप+े खिलखिख कर्थी+ क े दौरा+ इस बा को ठीक ही स्वीकार विकया है विक “न्यायालय क े पास विवशेषज्ञों पर वि+र्ण:य की दक्ष ा +हीं हो सक ी है।” विफर भी, कर्थी+ क े अ+ुसार, कविमश्नर की विवशेषज्ञ ा पर वि+र्ण:य विकए विब+ा न्यायालय द्वारा वि+तिश्च रूप से कु छ पहलुओं की Sांच की Sा सक ी है। वे पहलू इस प्रकार हैं: (i) क्या आयोग +े उत्तर दे+े क े खिलए न्यायालय क े वि+वेद+ को पूरा विकया है (ii) क्या दशाओं और सीमाओं का पाल+ विकया गया है; (iii) क्या वि+ष्कष: प्राविप्तयों क े अ+ुरूप हैं; (iv) क्या रिरपोर्ट: में स्पष्ट विवसंगति यां हैं; और 281 (1997) 43 DRJ 270 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) क्या वि+ष्कष: युविXयुX संभाव्य ा से परे वि+काले गए हैं। इसखिलए, र्डॉ. *व+ +े कहा है विक प्रर्थीम अपील में, अपीलीय न्यायालय क े पास विवचारर्ण न्यायालय द्वारा वि+काले गए वि+ष्कषÂ की Sांच कर+े का विवकल्प हो ा है यविद वे रिरपोर्ट: से असंबंति* हैं और उससे बाहर हैं। इसक े अलावा, Sहां सभी पक्षों +े आयुX की प्रति परीक्षा +हीं की है, विवचारर्ण न्यायालय और अपीलीय न्यायालय द्वारा संगति, प्रासंविगक ा और संभाव+ा क े आ*ार पर आपखित्तयों की Sांच कर+ा उ+की अति*कारिर ा में होगा।

482. सिसद्धां ः, हमारा विवचार है विक एक पक्ष को आयुX की रिरपोर्ट: पर आपखित्तयां उठा+े से या रिरपोर्ट: क े वि+ष्कषÂ को चु+ौ ी दे+े क े खिलए स्वयं क े गवाहों क े साक्ष्य दे+े से क े वल इसखिलए पूव: वि+वारिर +हीं विकया Sाएगा विक उस+े अदाल से परीक्षर्ण क े उद्देश्य से आयुX को सम+ कर+े का अ+ुरो* +हीं विकया है । लेविक+, वह पक्ष Sो अदाल में आयुX की परीक्षा की अ+ुमति दे+े क े खिलए अदाल से अ+ुरो* कर+े क े खिलए वि+यम 10 (2) द्वारा प्रदत्त सक्षमकारी शविX का सहारा ले+े में विवफल रह ा है,, आयुX की विवशेषज्ञ ा वाले विवषय क े संबं* में मुस्जिश्कल का साम+ा कर सक ा है। व:मा+ मामले में, एएसआई एक विवशेषज्ञ प्राति*करर्ण है। इसकी विवश्वस+ीय ा और विवशेषज्ञ ा संदेह से परे है। आपखित्तयों की प्रक ृ ति सिSसे अदाल द्वारा वै* रूप से मा+ा Sा सक ा है, आयुX द्वारा की Sा+े वाली Sांच की प्रक ृ ति और ज्ञा+ की विवशेष शाखा में ज्ञा+ और अ+ुभव दो+ों को शाविमल कर+े वाले र्डोमे+ विवशेषज्ञ ा पर वि+भ:र करेगा। वैज्ञावि+क Sांच से संबंति* एक मामले पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आयुX की रिरपोर्ट: क े क ु छ पहलू हो सक े हैं सिSन्हें सबसे अच्छा आयुX द्वारा ही समझाया Sा सक ा है। वि+यम 10 (2) आयुX को रिरपोर्ट: में उसिल्लखिख विकसी भी मामले पर या रिरपोर्ट: क े संबं* में या सिSस रीक े से Sांच की गई है, उस पर परीतिक्ष कर+े की अ+ुमति दे ा है। वि+यम 10 (2) में प्रदा+ की गई सक्षमकारी शविX को लागू कर+े में विवफल ा का परिरर्णाम परीक्षर्ण क े दौरा+ आयुX क े स्पष्टीकरर्ण को समझ+े में विवफल ा हो सक ी है। वैज्ञावि+क Sांच से संबंति* एक मामले में, अदाल को र्डोमे+ ज्ञा+ की आवश्यक ा वाले मुद्दों पर विवशेषज्ञ ा का अभाव हो ा है, यही कारर्ण है विक आयुX को वि+युX विकया गया। एएसआई को वि+युX कर+े का उद्देश्य विववाविद स्र्थील पर खुदाई का वि+द†श दे+ा र्थीा ाविक अदाल को विमली साम£ी और एएसआई द्वारा ैयार विकए गए वि+ष्कषÂ क े आ*ार पर विववाद क े विवषय पर एक वस् ुवि+ष्ठ दृविष्टकोर्ण ब+ा सक े । आयुX की रिरपोर्ट: पर सवाल उठा+े की वाले पक्ष की आयुX को प्रति परीक्षा क े खिलए बुला+े में विवफल ा न्यायालय क े समक्ष उठाई Sा+े वाली आपखित्तयों की प्रक ृ ति को इस कारर्ण सीविम कर सक ी क्योंविक आयुX Sो रिरपोर्ट: को समझा+े क े खिलए सबसे अच्छी स्जिस्र्थीति में र्थीा,को परीक्षा क े खिलए +हीं बुलाया गया।

483. हम विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. *व+ द्वारा दी गयी इस *ारर्णा को स्वीकार कर े हैं विक सिसद्धां ः Sांच क े खिलए आयुX को +हीं बुला+े क े बावSूद, एक पक्ष वि+म्+खिलखिख मामलों पर इस न्यायालय क े समक्ष आपखित्तयां कर सक ा है: (i) क्या आयुX द्वारा वि+म्+ सविह न्यायालय का वि+देश पूरा विकया गया है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA a. क्या आयुX +े वह अणिभवि+*ा:रिर विकया है Sो संदर्भिभ +हीं विकया गया र्थीा; या b. क्या आयुX +े ऐसा क ु छ अणिभवि+*ा:रिर +हीं विकया है सिSसे संदर्भिभ विकया गया र्थीा; (ii) क्या आयुX की रिरपोर्ट: में विवरो*ाभास या विवसंगति यां हैं; और (iii) क्या आयुX की प्राविप्तयां या वि+ष्कष: रिरपोर्ट: से उद्भू हो े हैं। अं ः, यह वि+र्ण:य ले+ा न्यायालय की अति*कारिर ा में है विक क्या एएसआई की रिरपोर्ट: में वि+विह वि+ष्कष: सत्य और न्याय विह की प्रासंविगक ा और संभाव+ाओं क े आ*ार पर रक्षा कर े हैं। विवति* की अन्य शाखाओं की रह यहां भी न्यातियक विववेकाति*कार का सामान्य विववेक द्वारा माग:दश:+ हो+ा चाविहए। विवश्लेषर्ण दलीलें

484. वाद 5 में वादीगर्ण +े यह उद्घोषर्णा मांगी विक, “ अयोध्या में श्री राम Sन्मभूविम का संपूर्ण: परिरसर.... वादी देव ाओं का है।” वाद क े पैरा£ाफ 23 में यह दलील दी गयी है विक श्री राम Sन्मभूविम पर विवक्रमाविदत्य क े शास+ में एक प्राची+ मंविदर र्थीा सिSसे आंणिशक रूप से +ष्ट कर विदया गया र्थीा और इस स्र्थील पर मस्जिस्Sद को ब+ा+े का प्रयास विकया गया र्थीा: “23. यह विक, इति हास की पुस् क ें र्थीा असंविदग्* प्रमाणिर्णक ा वाले साव:Sवि+क अणिभलेख वि+र्मिववाद रूप से यह स्र्थीाविप कर े हैं विक महाराSा विवक्रमाविदत्य क े समय का एक प्राची+ मंविदर श्री राम Sन्मभूविम, अयोध्या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में र्थीा। उस मंविदर को आंणिशक रूप से +ष्ट कर विदया गया और हणिर्थीयारों क े बल पर मस्जिस्Sद ब+ा+े का प्रयत्+ विकया गया. 1528 ई. में बाबर अयोध्या आया और वहाँ एक सप्ताह क े खिलए रुका. उस+े प्राची+ मंविदर को +ष्ट कर विदया और उसक े स्र्थीा+ पर एक मस्जिस्Sद ब+वा दी सिSसे अभी क बाबर की मस्जिस्Sद कहा Sा ा है. ” (प्रभाव वर्ति* ) वाद 5 में दावा है विक (i) राम Sन्मभूविम क े स्र्थीा+ पर एक प्राची+ मंविदर मौSूद र्थीा; (ii) मंविदर विवक्रमाविदत्य क े समय का र्थीा; और (iii) बाबर +े 1528 में मंविदर को +ष्ट करक े और उसी स्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया। विवषय

485. पक्षकारों की दलीलों क े मद्दे+Sर, वाद 4 और वाद 5 में वि+म्+खिलखिख विवषय विवरतिच विकये गये: “(a) वाद सं. 4 में विवषय सं. 1 (ख) “क्या इमार का वि+मा:र्ण एक कणिर्थी हिंहदू मंविदर क े स्र्थीा+ पर उसे ध्वस् कर+े क े बाद विकया गया र्थीा, Sैसा विक प्रति वादी सं. 13 द्वारा आरोविप है? यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव?” (ख) वाद सं. 5 में विवषय 14 “क्या बाबरी मस्जिस्Sद कही Sा+े वाली विववाविद संरच+ा राम Sन्मस्र्थीा+ मंविदर को ध्वस् करक े उसक े स्र्थीा+ पर ब+ायी गयी र्थीी?” अप+े पक्ष को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए, वाद 5 में वादीगर्ण को यह सिसद्ध कर+े की आवश्यक ा है विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) विववाविद स्र्थील पर एक प्राची+ विहन्दू मंविदर विवद्यमा+ र्थीा; (ii) विवद्यमा+ प्राची+ विहन्दू मंविदर को बाबरी मस्जिस्Sद ब+ा+े क े खिलए ध्वस् कर विदया गया र्थीा; और (iii) मस्जिस्Sद को वि+मा:र्ण क े स्र्थीा+ पर ही ब+ाया गया र्थीा। साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 101 से 103 क े संदभ: में एक सकारात्मक पक्ष स्र्थीाविप कर+े क े खिलए साक्ष्य का भार वाद 5 में वादीगर्ण पर वि+विह है। उच्च न्यायालय द्वारा आदेणिश उत्ख++ का उद्देश्य

486. Sीपीआर सव†क्षर्ण का आदेश दे े हुए, उच्च न्यायालय +े 23 अक्र्टूबर 2002 क े अप+े आदेश में वि+म्+खिलखिख शब्दों में इसका उद्देश्य स्पष्ट विकया: '' ऊपरी संरच+ा की प्रक ृ ति काफी हद क +ींव से संबंति* हो ी है।........ यविद विकसी भी वि+मा:र्ण की कोई +ींव मौSूद है, ो वह इस पर प्रकाश र्डाल सक ी है विक क्या कोई संरच+ा मौSूद र्थीी और यविद ऐसा है ो उस समय संभाविव संरच+ा क्या हो सक ी र्थीी.....।” 17 फरवरी 2003 की Sीपीआर सव†क्षर्ण रिरपोर्ट: में 0. 5 से 5. 5 मीर्टर क की गहराई की विवसंगति यों पायी गयी, Sो विक प्राची+ और समकाली+ संरच+ाओं Sैसे खंभे, +ींव की दीवारों और स्लैब स ह से Sोड़ कर देखा Sा सक ा र्थीा Sो विक उस स्र्थीा+ क े विवस् ृ विहस्से पर र्थीा। र्थीाविप, सव†क्षर्ण mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रिरपोर्ट: में यह उपदर्भिश विकया गया विक इ+ विवसंगति यों की पुविष्ट औपचारिरक आ*ार पर सिसस्र्टमेविर्टक £ाउंर्ड र्ट्रोभिंर्थीग Sैसे पुरा त्वीय खुदाई द्वारा विकया Sा+ा चाविहए। Sीपीआर सव†क्षर्ण द्वारा ज्ञा 184 विवसंगति यों में से, 39 की खुदाई क े दौरा+ पुविष्ट की गई। 5 माच: 2003 को, Sब उच्च न्यायालय +े एएसआई को साइर्ट पर उत्ख++ कर+े का वि+द†श विदया, ो यह वि+म्+ वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए र्थीा: "क्या कोई मंविदर/संरच+ा ऐसी र्थीी सिSसे विगराया गया हो और विववाविद स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा।" एएसआई +े 22 अगस् 2003 को अप+ी अंति म रिरपोर्ट: प्रस् ु की, सिSसमें यह ब ाया गया र्थीा: "अब, सम£ ा में देख े हुए और विववाविद संरच+ा क े ठीक +ीचे एक विवशाल संरच+ा क े पुरा ास्जित्वक साक्ष्य को ध्या+ में रख े हुए और दसवीं श ाब्दी क े बाद से संरच+ात्मक चरर्णों में वि+रं र ा क े साक्ष्य क े सार्थी- सार्थी पत्र्थीर और अलंक ृ ई ं र्टों से विववाविद संरच+ा क े वि+मा:र्ण क सार्थी ही दैवीय युगल की क्षति £स् मूर्ति, आमलक, कपो पाली द्वारSंब सविह अ*:-वृत्ताकार णिभखित्तस् ंभ, काले णिशष्ट स् ंभ क े र्टूर्टे अष्टकोर्णीय शाफ्र्ट, उत्तर में पर+ाला (Sलवि+कास) वाली वृत्ताकार वेविदका, विवशाल संरच+ा से संबंति* पचास स् ंभ, ऐसे अवशेषों क े संक े हैं Sो उत्तर भार क े मंविदरों से Sुड़ी विवणिशष्ट विवशेष ाएं हैं।" (प्रभाव वर्ति* ) एएसआई की रिरपोर्ट: पर मूल आपखित्त यह है विक इस बा पर कोई वि+ष्कष: +हीं विदया गया है विक विकसी अं र्मि+विह मंविदर या संरच+ा को ध्वस् कर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विदया गया र्थीा और इसक े स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। इस संदभ: में, यह कहा गया है विक अप+ी प्रक ृ ति से ही, Sो रिरपोर्ट: एक राय है (हालांविक एक विवशेषज्ञ वि+काय की) एक थ्य का प्रत्यक्ष प्रमार्ण +हीं है और स्वाभाविवक रूप से अ+ुमा+परक और अवि+र्णा:यक है।

487. साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 3 " थ्य" पद को इस प्रकार परिरभाविष कर ी है: " थ्य का अर्थी: है और इसमें शाविमल है - (1) कोई भी वस् ु, चीSों की स्जिस्र्थीति, या चीSों क े संबं*, इंविˆयों द्वारा महसूस विकए Sा+े योग्य; (2) कोइ: मा+सिसक दशा, सिSसक े प्रति कोइ: व्यविX सचे है।" हालांविक, *ारा 45 विवशेषज्ञ की राय को एक प्रासंविगक थ्य क े रूप में अ+ुमति दे ी है Sब अदाल को विवदेशी का+ू+, विवज्ञा+ या कला क े हिंबदु पर या खिलखावर्ट या उंगली क े छापों की पहचा+ पर एक राय ब+ा+ी हो ी है। थ्य क े एक गवाह और एक विवशेषज्ञ गवाह क े बीच अं र को प्रेम सागर म+ोचा ब+ाम राज्य (विदल्ली क े ए+वादी)282 क े मामले में इस न्यायालय क े एक वि+र्ण:य में स्पष्ट विकया गया है: “20.... विकसी विवशेषज्ञ का क:व्य न्यायालय को उसकी राय और सभी सामवि£यों क े सार्थी उसकी राय क े कारर्णों को प्रस् ु कर+ा हो ा है। इसक े बाद अदाल को यह देख+ा हो ा है विक क्या राय का आ*ार सही और उतिच है और विफर अप+ा वि+ष्कष: ब+ा+ा हो ा है। लेविक+, थ्यों क े गवाह क े संबं* में ऐसा +हीं हो ा है। थ्य थ्य हो े हैं और वे वैसे ही रह े हैं और हमेशा उसी रह ब+े रह+ा हो ा है। थ्यों का गवाह थ्यों पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अप+ी राय +हीं दे ा है, लेविक+ इस रह क े थ्यों को प्रस् ु कर ा है। हालांविक, विवशेषज्ञ राय दे ा है विक उस+े परीक्षर्ण विकया है या विकसी चीS की Sांच की है। उसक े बाद Sो वि+ष्कष: वि+काला गया वह विफर भी उसक े ज्ञा+ पर आ*ारिर एक राय हो ी है...?” एएसआई द्वारा प्रस् ु की गई रिरपोर्ट: एक राय है; विफर भी पुरा त्व क े क्षेत्र में विवशेषज्ञ एक सरकारी एSेंसी की राय। रिरपोर्ट: एक विवशेषज्ञ की राय का गठ+ कर ी है। विवशेषज्ञ की राय को अदाल द्वारा प्राप्त और मूल्यांक+ विकया Sा+ा चाविहए और अप+े आप में वि+र्णा:यक +हीं हो सक ी है। एक विवषय क े रूप में पुरा त्व

488. एएसआई द्वारा प्रस् ु रिरपोर्ट: की इस आ*ार पर अलोच+ा की गयी है विक प्राक ृ ति क विवज्ञा+ से अलग, पुरा त्व विवज्ञा+ सामासिSक विवज्ञा+ की एक शाखा है और स्वाभाविवक रूप से व्यविXपरक है। क: यह है विक पुरा त्वविवज्ञा+ी, वि+ष्कष: पर पहुंच+े क े खिलए, इति हास, समाSशास्त्र और मा+व विवज्ञा+ सविह कई अन्य विवषयों से वि+ष्कष: वि+काल ा है। यह कहा गया है विक आगम+ात्मक क: की प्रविक्रया अंति म वि+ष्कष: को प्रभाविव कर+े वाली व्यविXवि+ष्ठ ा की कई पर ों को Sन्म दे सक ा है। इसखिलए, यह कहा गया है विक एक पुरा ास्जित्वक रिरपोर्ट: सत्याप+ योग्य वि+ष्कष: प्रस् ु +हीं कर ी है, लेविक+ खुदाई क े दौरा+ पाए गए र्डेर्टा या वस् ुओं से वि+काले गए अ+ुमा+ प्रदा+ कर ी है। यह कहा गया है विक व्याख्याएं णिभन्न-णिभन्न हो ी हैं और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पुरा त्वविवदों का एक ही र्डेर्टा पर वि+काला गया वि+ष्कष: णिभन्न णिभन्न हो सक े हैं। इसखिलए, कोई पूर्ण: या साव:भौविमक सत्य +हीं है। न्यायमूर्ति अ£वाल +े अप+े फ ै सले में अणिभम व्यX विकया: “3896. पुरा त्वविवज्ञा+ प्राची+ ऐति हासिसक साम£ी, संस्क ृ ति, समझ क े पु+र्मि+मा:र्ण क े खिलए वैज्ञावि+क थ्यात्मक आंकड़े प्रदा+ कर ा है। पुरा त्वविवज्ञा+... एक बहुविव*ात्मक वैज्ञावि+क विवषय है और प्रभावी परिरर्णाम क े खिलए श्रविमकों की एक र्टीम की आवश्यक ा हो ी है। प्राची+ स्र्थीलों का उत्ख++ पुरा त्वविवदों की एक प्रमुख काय: हो ा है। वैज्ञावि+क विवषय हो+े क े +ा े यह अप+े काम में वैज्ञावि+क रीकों का इस् ेमाल कर ा है. '' विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री मी+ाक्षी अरोड़ा का कर्थी+ है विक उपरोX वि+ष्कष: क े विवपरी, विवशेषज्ञ गवाहों +े पुरा त्व क े अ+ुमा+ और व्याख्या का विवषय हो+े की गवाही दी है:

(i) Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू 20/5), Sो एएसआई में अ*ीक्षर्ण पुरा त्व विवशेषज्ञ क े रूप में सेवावि+वृत्त हुए, +े रिरपोर्ट: क े समर्थी:+ में बया+ विदया। उन्हों+े कहा: "...व्याख्या उत्ख++ का एक महत्वपूर्ण: पहलू है...” "...अ+ुमा+ शब्द से मेरा ात्पय: अ+ुमावि+ तिचत्र से है Sो उपलब्* साक्ष्य पर आ*ारिर हो सक ा है और यह पुरा ास्जित्वक खुदाई में बहु चल+ में है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) आर +ागस्वामी (PW 17), Sो विमल+ार्डु सरकार में पुरा त्व वि+देशक क े रूप में सेवावि+वृत्त हुए र्थीे और वे वाद 5 में वाविदयों क े विवशेषज्ञ साक्षी र्थीे, +े कहा: “...पुरा त्व में उत्ख++ में प्राप्त र्डेर्टा का प्रामाणिर्णक स्रो ो और साम£ी क े संदभ: में व्याख्या कर+ी हो ी है यविद हमें उत्ख++ रिरपोर्ट: में Sो उल्लेख विकया गया है, उसे दोहरा+ा हो, ो उत्ख++ का उद्देश्य Sो इति हास का पु+र्मि+मा:र्ण है, संभव +हीं है..... (प्रभाव वर्ति* )

(iii) Sवाहरलाल +ेहरू विवश्वविवद्यालय में पुरा त्व विवज्ञा+ क े भू पूव: प्रोफ े सर, र्डॉ. शीरी+ एफ र +गर (PW 27), Sो वाद 4 में वाविदयों क े विवशेषज्ञ साक्षी र्थीे, +े कहा: "एक थ्य का गठ+ ही विववाविद हो सक ा है। लेविक+ यविद थ्य सिसद्ध हो Sा ा है ो दो पुरा त्ववेत्ताओं द्वारा इस थ्य पर दो राय हो सक ी हैं....” (iv) र्डॉ. सुविप्रया वमा: (PW 32), Sो हैदराबाद विवश्वविवद्यालय में सामासिSक विवज्ञा+ स्क ू ल में पुरा त्व क े एसोसिसएर्ट प्रोफ े सर र्थीे, +े कहा: “.... Sब पुरा त्ववेत्ताओं +े पुरा त्वीय साम£ी की खुदाई और खोS की, सिSसमें विमट्टी क े ब:+ और हतिड्डयां हो सक ी हैं, और व्याख्या पुरा त्ववेत्ताओं द्वारा उस संदभ: क े आ*ार पर विकए गए हैं सिSसमें ये पाए Sा े हैं. आंकड़ा अप+े खिलए +हीं बोल ा है। अ+ुमा+ पुरा त्व क े कु छ सिसद्धां ों और पद्धति यों क े आ*ार पर विकए Sा े हैं.....”

489. उत्तर से दतिक्षर्ण क 17 पंस्जिक़् यों में प्रत्येक पंविX में 5 स् ंभ आ*ार क े अस्जिस् त्व क े बारे में, आर. +ागस्वामी (ओ. पी. र्डब्ल्यू. 17) +े कहा विक यह क े वल एक अ+ुमा+ र्थीा क्योंविक सभी 85 स् ंभ आ*ार +हीं विमले र्थीे। इसी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रह का बया+ कलकत्ता विवश्वविवद्यालय क े पुरा त्व विवभाग में एक वरिरष्ठ व्याख्या ा र्डॉ. अशोक दत्ता (PW 31) +े विदया र्थीा। एएसआई की रिरपोर्ट: क े आंकड़ा 23 (समविम ीय आंकड़े) पर विवचार कर े हुए, उन्हों+े उल्लेख विकया विक यह विवणिभन्न स ह स् रों पर +हीं र्थीा और इसे विवशुद्ध रूप से अ+ुमा+ कहा Sा सक ा है। आर +ागस्वामी (ओपीर्डब्ल्यू 17) और Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू 20/5) +े विववाविद स्र्थील पर एक बड़े हिंहदू मंविदर क े अस्जिस् त्व क े बारे में एएसआई रिरपोर्ट: क े दृविष्टकोर्ण का समर्थी:+ विकया। दूसरी ओर, र्डॉ. सुविप्रया वमा: (PW 32) +े विववाविद संरच+ा क े +ीचे संरच+ा क े अस्जिस् त्व क े बारे में एएसआई की खोS से सहमति व्यX की, लेविक+ व्याख्या से असहम र्थीे। इ+ बया+ों पर यह कह+े क े खिलए अवलंब खिलया गया है विक पुरा त्वविवद र्डेर्टा की व्याख्या पर असहम हो सक े हैं और असहम हो े हैं क्योंविक क्षेत्र अवि+वाय: रूप से अ+ुमा+ात्मक है।

490. विवज्ञा+ क े रूप में पुरा त्व बहुविव*ात्मक या अं रविव*ात्मक दृविष्टकोर्ण पर आ*ारिर है। पुरा ास्जित्वक साक्ष्यों की प्रक ृ ति पर विवचार कर े हुए, यह याद रख+ा महत्वपूर्ण: है विक ज्ञा+ की एक शाखा क े रूप में पुरा त्व विवज्ञा+ सीख+े क े विवज्ञा+, अ+ुभव क े ज्ञा+ और व्याख्या की प्रविक्रया को रेखांविक कर+े वाले दृविष्ट से चल ा है। एक अ+ुशास+ क े रूप में, यह एक प्रणिशतिक्ष विदमाग को पोविष कर ा है। यह इति हास, समाSशास्त्र और मा+व विवज्ञा+ Sैसे अन्य विवषयों क े सार्थी संविक्रया पर वि+भ:र कर ा है। यह एक कमSोरी +हीं बस्जिल्क एक ाक है। पुरा त्वविवज्ञा+ में विवज्ञा+ और कला दो+ों शाविमल हैं। एक विवज्ञा+ क े रूप में, यह वस् ुवि+ष्ठ मूल्यांक+ क े सिसद्धां पर आ*ारिर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है। एक कला क े रूप में, यह एक ऐसे दृविष्टकोर्ण पर वि+भ:र कर ा है Sो वषÂ क े दौरा+ ज्ञा+ क े इति हास पर आ*ारिर हो+े की प्रति बद्ध ा क े माध्यम से प्राप्त हो ा है। एक अ+ुशास+ क े रूप में पुरा त्व को अविवश्वस+ीय +हीं मा+ा Sा सक ा है। पुरा त्वविवज्ञा+ क े मूल्य को उस रीक े से कम +हीं विकया Sा सक ा है सिSसे इसको कमSोर सबू ब ाकर सुझाया गया है।

491. साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 45 क े ढांचे क े भी र पुरा ास्जित्वक साक्ष्य और सीपीसी क े आदेश XXVI क े वि+यम 10 ए क े प्राव*ा+ों क े संदभ: में अदाल -अति*क ृ खुदाई पर विवचार कर े समय, विफर भी अदाल क े खिलए यह आवश्यक है विक वह इस विवषय की शविX और सीमा दो+ों को समझे। पुरा त्वविवज्ञा+ कोई अपवाद +हीं है। एक विवणिशष्ट पुरा त्वविवद् सर मोर्मिर्टमर व्हीलर +े उस अ+ुभव को संक्षेप में प्रस् ु विकया, सिSसे उन्हों+े प्राप्त विकया र्थीा, सिSसका शीष:क र्थीा '' *र ी से पुरा त्व '' 283 । स्र्ट्रेविर्ट£ाफी पर विवचार कर े हुए, सर मोर्मिर्टमर +े उल्लेख विकया है: "पूव: का एक प्राची+ शहर कभी सम ल +हीं हो ा। बहु कम ही कोई शहर पूरी रह से +ष्ट हो Sा ा है और एक ही समय में और एक तिक्षति S पर पूरी रह से पु+र्मि+र्मिम हो ा है। आम ौर पर, एक घर को विफर से ब+ाया Sा ा है या प्रति स्र्थीाविप विकया Sा ा है Sैसा विक यह ब ा ा है, या इसक े माखिलक की स+क पर। क ु ल विमलाकर यह +गर विवणिभन्न प्रकार क े विव+ाश और वि+मा:र्ण की स्जिस्र्थीति में वि+रं र ब+ा रह ा है। व्यविXग भव+ स्र्थील अप+े पड़ोसिसयों से ऊपर उठ े हैं; शहर का आकार स्वयं ऊ ं चा हो ा है और एक पहाड़ी +ुमा ब+ Sा ा है; इसकी ढला+ों पर इमार ें अप+े णिशखर पर इमार ों क े सार्थी समकाली+ हो ी हैं। दरवाSे क े +ीचे 10 फीर्ट की दूरी पर या दूसरे स्र्थीा+ पर ठीक उसी ारीख का एक र्टूर्टा र्टुकड़ा हो सक ा है?” 283 Mortimer Wheeler, Archaeology from the earth, Oxford: Clarendon Press (1954) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स हों का उत्ख++ अप+े आप में एक Sविर्टल काय: है। बदले में वि+ष्कषÂ की व्याख्या कर+े में कई स् रों की Sविर्टल ाएं शाविमल हैं। सर मोर्मिर्टमर +े +ोर्ट विकया है: "ठीक है, विवणिभन्न प्रकार क े स्र्ट्रेविर्ट£ाविफकल साक्ष्य क े उदाहरर्ण हैं: उ+ पर ों की Sो एक दूसरे क े सार्थी समकाली+ हैं, वे पर ें Sो अति*क या कम समय क े अं राल से अलग हो ी हैं, Sो अर्टूर्ट उत्तराति*कार में Sमा हो गई हैं एक खंर्ड का पढ़+ा एक भाषा का पठ+ है सिSसे क े वल प्रदश:+ और अ+ुभव द्वारा सीखा Sा सक ा है। विवद्यार्थी- को परामश: दे+े का शब्द। हालाँविक अभ्यास विकया Sा ा है, बहु Sल्दबाSी में + पढ़ो। वि+र्ण:य कर+े से पहले अप+े सबसे बड़े आलोचक ब+ो। और Sहां भी संभव हो, अप+े Sांच को विवद्यार्भिर्थीयों,सहकर्मिमयों और पूव:वर्ति यों क े सार्थी विवचार-विवमश: करें। (एक व्यविX की गवाही कोई गवाही +हीं है; ऐसा बुतिद्धमा+ वेल्श विवति*-दा ा हाइवेल र्डा का कह+ा है) विव+म्र ब+ें. अवि+र्मिदष्ट की राय को अ+देखा + करें। सब लोग सिS +ा Sा+ े हैं उ +ा ही ज्ञा+ी Sा+ े हैं।अहंकारी विदमाग की दीवारें पूरी रह से थ्यों,विवचारों क े सार्थी क े सार्थी खुरच Sा ी हैं। इमस:+ +े ऐसा कहा, और वह सही र्थीा। यविद आप प्रश्न कर+े वाले लोगों क े विवचारों को स्वीकार +हीं कर े हैं, ो भी प्रश्न पूछ+े का एक मात्र काय: ही संयम और प्रेरर्णा है। ” सर मोर्ट†मर की साव*ा+ी विवति* क े खिलए उ +ा ही लागू होगी सिS +ा पुरा त्व क े खिलए: यह ऐसी बा है सिSसे हम न्याया*ीशों क े रूप में इ+ अपीलों वि+ष्कष: पर पहुंच+े क े खिलए अच्छी रह से ध्या+ में रख े हैं।

492. अप+ी पुस् क “द लॉसिSक ऑफ साइंविर्टविफक तिर्डस्कवरी”284 में काल: पोपर एक दाश:वि+क और वैज्ञावि+क क े काय: को अलग कर ा है। पोपर +े लॉर्ड: एक्र्ट+ को उद्धृ विकया Sब वह कह ा है: 284 Karl R. Popper,The Logic of Scientific Discovery, Hutchinson & Co (1959) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "विवज्ञा+ क े व्यविX क े खिलए इसक े इति हास और खोS क े क: से अति*क क ु छ आवश्यक +हीं है.... सिSस रह से त्रुविर्ट का प ा लगाया Sा ा है, परिरकल्प+ा, कल्प+ा का उपयोग, परीक्षर्ण का रीक े का प्रयोग।" विवज्ञा+ क े पूर्ण: सत्य हो+े और पुरा त्व क े बीच में सिSस विवभेद का वि+रूपर्ण विकया गया है, वह एक हद क साव:भौविमक ा का +हीं है। विफर भी, अप+ी शैली क े अन्य विवषयों क े रूप में, पुरा त्व की प्रविक्रया उ +ा ही है सिS +ा विक यह वि+गम+ का है। पुरा त्वविवद को प्राविप्तयों से संबद्ध हो+ा चाविहए सिS +ा उसे विमलें। व्याख्या इसका हृदय है, हालांविक इसकी आत्मा +हीं। व्याख्याएँ णिभन्न हो ी हैं और विवशेषज्ञ असहम हो े हैं। Sब का+ू+ व्याख्या क े एक काय: को देख ा है ो उसे त्रुविर्ट और राय क े भेदों को पहचा++ा चाविहए। पुरा त्व संबं*ी वि+ष्कष: अ+ेक व्याख्याओं क े प्रति संवेद+शील हो े हैं। यह क ु छ अंशों में पुरा त्ववेत्ता क े अ ी क े बो* का काय: हो सक ा है और अ ी क े बारे में पुरा त्ववेत्ता क्या समझ+े का प्रयास कर ा है। परंपरा आ*ारिर पुरा त्व से अ ी क े बारे में थ्य प्राप्त हो सक े हैं। दूसरी ओर एक पुरा त्ववेत्ता अ ी क े बारे में विवश्वास को मान्य कर+े क े खिलए स्र्थीाविप हो सक ा है। पुरा त्वविवद अज्ञा लक्षर्णों को उSागर कर+े क े खिलए खुले विदमाग क े सार्थी काय: कर सक े हैं। अ+ुशास+ क े खिलए अं र्मि+विह दृविष्टकोर्ण से वि+द†णिश, पुरा त्वविवज्ञा+ी अप+े स्वयं क े मूल क े उद्देश्य को ध्या+ में रख े हुए इस काय: को वह+ करेगा। Sब क हम अ+ुशास+ की सीमाओं को समझ े हैं, हम चरम स्जिस्र्थीति यों से बच सक े हैं और अक्सर आभासी माध्य की खोS कर सक े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

493. सुश्री मी+ाक्षी अरोड़ा +े इस न्यायालय क े वि+र्ण:यों पर अवलंब खिलया, Sो हस् लेख विवशेषज्ञों की रिरपोर्टÂ को 'आम ौर पर एक कमSोर चरिरत्र' का मा+ े हैं, सिSससे उन्हें बहु अति*क वS+ दे+े क े खिलए साव*ा+ रह+ा पड़ ा है। इस प्रकार क े साक्ष्य को “अवि+र्णा:यक” अणिभवि+*ा:रिर विकया गया है और इसखिलए ऐसी कोई बा सिSससे सकारात्मक साक्ष्य प्राप्त हो+ा चाविहए । इसका कारर्ण श्री श्री श्री विकशोर चंˆ सिंसह देव ब+ाम बाबू गर्णेश प्रसाद भग 285 क े मामले में ब ाया गया र्थीा विक हस् खिलविप विवशेषज्ञों क े वि+ष्कष: क े वल खिलखावर्ट की ुल+ा में वि+काले Sा े हैं। सिसद्धां को श्रीम ी भगवा+ कौर ब+ाम श्री महाराS क ृ ष्र्ण शमा:286 में दोहराया गया र्थीा। मुरारी लाल ब+ाम मध्य प्रदेश राज्य287 में, इस न्यायालय +े यह मा+ा विक क े वल खिलखावर्ट विवशेषज्ञ की राय पर दोष सिसद्ध कर+ा असुरतिक्ष होगा। सिसद्धां ैयार कर े समय, इस न्यायालय +े हालांविक उल्लेख विकया विक विवशेषज्ञ साक्ष्य क े खिलए वि+*ा:रिर विकया Sा+े वाला वS+ विवज्ञा+ की प्रकृ ति पर आ*ारिर है सिSस पर यह आ*ारिर हो ा है। Sहां प्रश्न में विवज्ञा+ में सत्य ा और उद्देश्यपूर्ण: विवश्लेषर्ण क े आवश्यक त्व हैं, विवशेषज्ञ साक्ष्य को उस सीमा क क ु छ सम्मा+ की आवश्यक ा होगी। न्यायालय +े *ारिर विकया: “4... विवज्ञा+ सिS +ा अति*क विवकसिस और अति*क पूर्ण: हो ा है, गल राय की संभाव+ा कम हो ी है और यविद विवज्ञा+ कम विवकसिस और अपूर्ण: है ो उसका विवलोम हो ा है। उंगली क े वि+शा+ की पहचा+ का विवज्ञा+ पूर्ण: ा क े पास पहुंच गया है और एक गल राय का Sोखिखम व्यावहारिरक रूप से अस्जिस् त्वही+ है। दूसरी ओर, हस् लेख+ की पहचा+ का विवज्ञा+ लगभग इ +ा सही +हीं है और इसखिलए Sोखिखम अति*क है....” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस प्रकार, उपरोX उद्धरर्ण में, अदाल +े उंगखिलयों क े वि+शा+ और खिलखावर्ट विवशेषज्ञों की राय की पहचा+ क े बीच अं र विकया। इसखिलए, विवशेषज्ञ साक्ष्य को Sो वS+ विदया Sा+ा चाविहए, वह अं र्मि+विह विवज्ञा+ की प्रक ृ ति पर आ*ारिर है सिSसक े आ*ार पर विवशेषज्ञ अप+ी राय ब+ा ा कर ा है। महाराष्ट्र राज्य ब+ाम सुखदेव सिंसह288 में खिलखावर्ट की पहचा+ क े विवज्ञा+ की अपूर्ण: प्रक ृ ति पर इस न्यायालय की विर्टप्पर्णी: “29...... लेविक+ चूंविक ुल+ा द्वारा खिलखावर्ट की पहचा+ का विवज्ञा+ अचूक +हीं है, इसखिलए विववेक की मांग है विक इस रह की राय पर कार:वाई कर+े से पहले अदाल को विदये गये लेख+ क े लेखक क े बारे में पूरी रह से सं ुष्ट हो+ा चाविहए सिSसे ुल+ा क े खिलए एकमात्र आ*ार ब+ाया गया है और अदाल को खिलखावर्ट विवशेषज्ञ की क्षम ा और विवश्वस+ीय ा क े बारे में भी पूरी रह से सं ुष्ट हो+ा चाविहए... यह सच है विक, का+ू+ का कोई वि+यम +हीं है विक हस् लेख विवशेषज्ञ क े साक्ष्य पर ब क कार:वाई +हीं की Sा सक ी है Sब क विक पया:प्त रूप से पुविष्ट +हीं की Sा ी है, लेविक+ अदाल ें इस रह क े राय सबू ों पर वि+विह वि+भ:र ा रख+े में *ीमी रही हैं, विवज्ञा+ की अपूर्ण: प्रक ृ ति क े कारर्ण खिलखावर्ट की पहचा+ और इसकी स्वीक ृ आशंकाओं क े कारर्ण...।” [इस संदभ: में देखें: शणिश क ु मार ब+S- ब+ाम सुबो* क ु मार ब+S-289, एस. पी.एस. राठौर ब+ाम सीबीआई290 और चेन्नार्डी Sलपति रेड्डी ब+ाम बादाम प्र ाप रेड्डी291 ]

291 (2019) SCC Online SC 1098 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री अरोड़ा द्वारा पुरा ास्जित्वक साक्ष्यों का खिलखावर्ट विवश्लेषर्ण क े सार्थी ुल+ा कर+े का प्रयास अप+े क: में त्रुविर्टपूर्ण: है। इस क: को रेखांविक कर+ा एक पुरा त्वविवज्ञा+ी क े खिलए आवश्यक ज्ञा+, कौशल और विवशेषज्ञ ा की एक गल समझ है। खुदाई क े संचाल+ में एएसआई द्वारा अप+ाई गई प्रविक्रया पर ध्या+ दे+ा आवश्यक हो Sा ा है। प्रविक्रया

494. उच्च न्यायालय +े खुदाई क े रिरकॉर्ड: क े संरक्षर्ण क े खिलए विवस् ृ वि+द†श Sारी विकए। 5 माच:, 2003 को उच्च न्यायालय क े आदेश क े बाद महावि+देशक द्वारा चौदह सदस्यीय एएसआई र्टीम का गठ+ विकया गया। 11 माच: 2003 को, उच्च न्यायालय +े वि+द†श विदया विक विवरो*ी पक्षकारों या उ+क े अति*वXा की उपस्जिस्र्थीति में साइर्ट और खाइयों क े लेआउर्ट का एक सामान्य सव†क्षर्ण विकया Sाएगा। वीतिर्डयोो£ाफी का आदेश विदया गया र्थीा और परिरर्णाम एक सीलबंद कवर में रखा Sा+ा र्थीा। बरामद की गई सामवि£यों को साइर्ट क े समीप स्जिस्र्थी एक इमार में 'लॉक और सील' क े ह संरतिक्ष कर+े क े खिलए भी वि+द†णिश विकया गया र्थीा। खुदाई क े काय: की आवति*क प्रगति रिरपोर्ट: उच्च न्यायालय को प्रस् ु की गई र्थीी। उच्च न्यायालय को समय-समय पर उ+ खाई,Sो खोदी गई र्थीीं, खुदाई की प्रक ृ ति और विमली साम£ी क े बारे में सूतिच विकया गया र्थीा। 26 माच: 2003 को, उच्च न्यायालय +े प्राप्त वस् ुओं को दS: कर+े वाले एक रसिSस्र्टर को ब+ाए रख+े क े खिलए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एएसआई र्टीम को विवणिशष्ट वि+द†श Sारी विकए, सिSसे पक्षकारों की उपस्जिस्र्थीति में सील विकया Sा+ा र्थीा। वि+म्+खिलखिख वि+द†श Sारी विकए गए र्थीे: "(i) एएसआई र्टीम अप+े स्वयं क े रसिSस्र्टर में (प्राविप्तयों क े संबं* में) खाई क े मीर्टर/फीर्ट में गहराई, Sहां यह पाया Sा ा है, +ोर्ट करेगा। यह अप+ी व्याख्या क े अ+ुसार स् र की पर को भी +ोर्ट कर सक ा है। (ii) विवरो*ी पक्षकारों या उ+क े अति*वXा क े हस् ाक्षर अणिभप्राप्त विकए Sा सक े हैं। (iii) रसिSस्र्टर में आगे प्राविप्तयों की प्रक ृ ति अर्थीा: ् अस्जिस्र्थीयां और चमकीला ब:+ आविद विववि+र्मिदष्ट हो+ा चाविहए (iv) यह प्राविप्त पक्षकारों/अति*वXा की उपस्जिस्र्थीति में सील विकया Sाएगा और विवरो*ी पक्षकार या उसक े अति*वXा क े हस् ाक्षर भी अणिभप्राप्त विकए Sाएंगे Sो उस स्र्थीा+ पर उपस्जिस्र्थी हों। (v) यविद प्राविप्तयों की प्रक ृ ति वि+तिश्च +हीं है ो द+ुसार एक +ोर्ट ब+ाया Sा सक ा है और Sब इसे खोला Sाएगा,यविद न्यायालय चाहे ो इसकी प्रक ृ ति सत्याविप की Sा सक ी है। रंगी+ और काला सफ े द दो+ो तिचत्र ले+े का वि+द†श र्थीा। एएसआई की र्टीम द्वारा विद+-प्रति विद+ विकए गए काम का एक रसिSस्र्टर ैयार कर+े का वि+द†श विदया गया र्थीा। पार्मिर्टयों को उत्ख++ खाइयों क े काम का वि+रीक्षर्ण कर+े की भी अ+ुमति र्थीी। उच्च न्यायालय +े *ारिर विकया: “228. यह श्री सिSला+ी द्वारा सुझाया गया है, Sो सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: ऑफ वक़्फ़्स क े विवद्व अति*वXा हैं, विक एक समय में दो से अति*क खाइयों का उत्ख++ +हीं विकया Sा+ा चाविहए क्योंविक खाई में काम पूरा हो+े क े बाद पहले से ही इस कारर्ण से खुदाई की Sा रही है विक पक्ष या उ+क े अति*वXा एक समय में खाइयों की खुदाई का वि+रीक्षर्ण कर+े में सक्षम +हीं हो सक े । श्री बीआर मणिर्ण, अ*ीक्षर्ण पुरा त्व विवशेषज्ञ और र्टीम लीर्डर +े विद+ांक 22. 3. 2003 को एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की है सिSसमें कहा गया है विक इस+े क्षेत्र 4 x 4 मीर्टर क े विवणिभन्न खाइयों को राश कर 0. 5 मीर्टर बल्क छोड़ विदया है। यविद खाई एक दूसरे से संलग्न हैं, ो यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवरो*ी पक्षकारों या उ+क े अति*वXा और उ+क े +ाविम ों द्वारा देखा Sा सक ा है। हम+े प्रत्येक विवरो*ी पक्षकार को अप+े अति*वXा क े सार्थी- सार्थी अप+े +ाम वि+द†णिशति यों (एक बार एक +ाम वि+द†णिश ी) क े सार्थी देख+े की अ+ुज्ञा दी है परिरर्णाम यह है विक प्रत्येक विवरो*ी पक्षकार क े खिलए ी+ पय:वेक्षक हो े हैं। यविद दूरी बहु अति*क है और उ+में से विकसी क े द्वारा एक और खाई का वि+रीक्षर्ण कर+ा मुस्जिश्कल है, ो वे वै* रूप से इस संबं* में णिशकाय उठा सक े हैं। यह ध्या+ विदया Sा सक ा है विक एएसआई र्टीम को खुदाई क े मामले में पक्षकारो और उ+क े अति*वXा का विवश्वास सुवि+तिश्च कर+ा चाविहए। हालांविक, यह ध्या+ में रखा Sा+ा चाविहए विक हम+े ेSी से खुदाई क े खिलए वि+द†णिश विकया है और इस उद्देश्य क े खिलए यविद आवश्यक हो और विब+ा पक्षकारों क े विवश्वास को खोए हुए एएसआई र्टीम द्वारा दो से अति*क खाइयों को भी रखा Sा सक ा है।" एक अन्य सुझाव यह र्थीा विक एएसआई की र्टीम में और श्रविमकों को रख+े में मुस्जिस्लम समुदाय का पया:प्त प्रति वि+ति*त्व हो+ा चाविहए। उच्च न्यायालय द्वारा यह भी वि+द†श विदया गया र्थीा विक दो+ों समुदायों क े खिलए पया:प्त प्रति वि+ति*त्व एएसआई र्टीम क े गठ+ और साइर्ट पर प्रति वि+युX श्रम में विदया Sा+ा चाविहए। पारदर्भिश ा सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए, काय: की देखरेख क े खिलए अति रिरX सिSला न्याया*ीश क े पद क े उत्तर प्रदेश उच्च न्यातियक सेवा क े दो न्यातियक अति*कारिरयों की प्रति वि+युविX की गई र्थीी। खुदाई की प्रविक्रया पक्षकारों की उपस्जिस्र्थीति में की गई र्थीी और वि+ष्पक्ष ा और पारदर्भिश ा सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए उच्च न्यायालय द्वारा Sारी वि+द†शों द्वारा शासिस र्थीी। इसे अणिभलेखों क े संरक्षर्ण, उत्ख++ प्रविक्रया की वीतिर्डयो£ाफी, स्वीरों क े संरक्षर्ण और काय: की देखरेख क े उद्देश्य से दो न्यातियक अति*कारिरयों की उपस्जिस्र्थीति क े वि+द†श+ में विकया गया र्थीा। खुदाई क े काम क े पूरा हो+े क े बाद लेविक+ अंति म रिरपोर्ट: ैयार कर+े से पहले, उच्च न्यायालय द्वारा 8 अगस् 2003 को आगे क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+द†श Sारी विकए गए र्थीे ाविक सभी खाइयों को बरकरार रखा Sा सक े ाविक अध्यय+ को पूरा कर+े और अप+ी रिरपोर्ट: प्रस् ु कर+े में एएसआई र्टीम को सुविव*ा हो।

495. एएसआई की रिरपोर्ट: में दस अध्याय हैं सिS+में शाविमल हैं: अध्याय I परिरचय अध्याय II कहिंर्टग अध्याय III स्र्ट्रेविर्ट£ाफी और काला+ुक्रम अध्याय IV संरच+ा अध्याय V विमट्टी क े ब:+ अध्याय VI वास् ुशास्त्रीय विहस्से अध्याय मृदभांर्ड आक ृ ति यां अध्याय VIII उत्कीर्ण:+, सील, सीलिंलग्स और सिसक्क े । अध्याय IX विवविव* वस् ुएं अध्याय X परिरर्णामों का सारांश रिरपोर्ट: क े परिरणिशष्ट I से IV में वि+म्+खिलखिख Sा+कारी शाविमल है: परिरणिशष्ट I अयोध्या उत्ख++ से प्राप्त चारकोल क े +मू+े की काब:+ 14 ति णिर्थी वि+*ा:रर्ण परिरणिशष्ट IIA अयोध्या में विवणिभन्न खाइयों से एकत्र की गई प्लास्र्टर +मू+ों का रासायवि+क विवश्लेषर्ण परिरणिशष्ट IIB अयोध्या में विवणिभन्न खाइयों से एकत्र की गई स ह का रासायवि+क विवश्लेषर्ण mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरणिशष्ट III उत्खवि+ कलाक ृ ति यों का स्व-स्र्थीावि+क रासायवि+क उपचार एवं संरक्षर्ण परिरणिशष्ट IV मा++ीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद क े विवशेष पूर्ण: पीठ, लख+ऊ क े वि+द†शा+ुसार र्डेर्टा-फॉम: पर सूच+ा।

496. एएसआई +े 22 अगस् 2003 को अप+ी अंति म रिरपोर्ट: फील्र्ड +ोर्टबुक, श्रृंखला, रसिSस्र्टर, साइर्ट +ोर्टबुक और एक लैपर्टॉप हार्ड: तिर्डस्क क े सार्थी और कॉम्पैक्र्ट तिर्डस्क क े सार्थी प्रस् ु की। एएसआई द्वारा अप+ी रिरपोर्ट: क े सार्थी Sो रिरकॉर्ड: प्रस् ु विकया गया र्थीा, उसे न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े फ ै सले क े पैरा 241 में सारर्णीबद्ध विकया गया है। एएसआई की रिरपोर्ट: का आकल+ कर+े में, इसखिलए यह ध्या+ में रख+ा चाविहए विक खुदाई क े दौरा+ एक संरतिच प्रविक्रया का पाल+ विकया गया र्थीा ाविक यह सुवि+तिश्च विकया Sा सक े विक उत्ख++ की प्रविक्रया को इलेक्र्ट्रॉवि+क और पारंपरिरक दो+ों रूपों में प्रलेखिख विकया गया र्थीा। खुदाई और Sो प्राप्त हुआ है वह थ्य की बा है। वि+स्संदेह, पुरा त्ववेत्ता को उ+ आंकड़ों से संबंति* हो+ा चाविहए Sो उत्ख++ से एक संदभ: में उभर े हैं। र्डेर्टा से वि+ष्कष: वि+काल+े की प्रविक्रया एक अ+ुशास+ क े रूप में पुरा त्व का एक अवि+वाय: त्व है, लेविक+ इस काय: को अ+ुमा+ात्मक और काल्पवि+क क े रूप में अस्वीकार कर+ा विवषय और अं र्मि+विह प्रविक्रया दो+ों क े प्रति क ृ घ्+ ा होगी। सुश्री अरोड़ा द्वारा एएसआई र्टीम की स्व ंत्र ा पर सवाल उठा+े का कोई वि+वेद+ +हीं विकया गया है। इस पृष्ठभूविम में, ऑर्ड:र XXVI वि+यम 10 (2) क े प्राव*ा+ों क े ह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एएसआई र्टीम से विकसी को भी पक्षकारों द्वारा + बुला+े का थ्य +SरअंदाS +हीं विकया Sा सक ा है। इ:दगाह का प्रति वाद

497. वाद 5 में वाविदयों का मामला यह है विक विववाविद स्र्थील क े +ीचे विवक्रमाविदत्य क े युग में एक प्राची+ मंविदर र्थीा, सिSसे बाबर की से+ा क े कमांर्डर मीर बाकी क े द्वारा +ष्ट कर विदया गया र्थीा और सिSस पर बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। आरोप है विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर+े क े खिलए इस् ेमाल की Sा+े वाली साम£ी को +ष्ट विकए गए मंविदर से खिलया गया र्थीा, सिSसमें काले कासोर्टी पत्र्थीर क े स् ंभ भी शाविमल र्थीे। अप+े खिलखिख बया+ में, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े इस बा से इ+कार विकया विक बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर विवक्रमाविदत्य क े युग से संबंति* कोई भी मंविदर अस्जिस् त्व में र्थीा। इस+े इस बा से भी इ+कार विकया विक अं र्मि+विह मंविदर में उपयोग की Sा+े वाली साम£ी का उपयोग करक े एक मंविदर क े स्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। खिलखिख बया+ में, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े पैरा 24 (बी) में भी कहा है विक: "बादशाह बाबर एक सुन्नी मुसलमा+ र्थीा और खाली Sमी+, सिSस पर बाबरी मस्जिस्Sद ब+ी र्थीी, उसक े राज्य क्षेत्र में र्थीी और विकसी आैर से सम्बस्जिन्* र्थीी. ” इसखिलए इस+े इस बा से इ+कार विकया विक विववाविद स्र्थील क े +ीचे कोई भी अं र्मि+विह मंविदर मौSूद र्थीा या मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए अं र्मि+विह मंविदर को +ष्ट कर विदया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

498. प्रारंभ में, सूर्ट 5 में वादी क े Sवाब में आ£ह विकया गया र्थीा विक कोई अं र्मि+विह संरच+ा +हीं र्थीी सिSसे मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए ध्वस् कर विदया गया र्थीा। एएसआई की रिरपोर्ट: में वि+ष्कषÂ को देखकर, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े रुख बदल विदया और यह दावा कर+े की मांग की विक खुदाई क े दौरा+ Sो संरच+ा साम+े आई र्थीी, वह एक ईदगाह या कान् ी मस्जिस्Sद र्थीी। यह वास् व में, ऐसा मामला +हीं र्थीा Sो दलीलों में ब+ाया गया र्थीा और सी*े सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े मामले क े विवपरी र्थीा विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण एक मौSूदा मंविदर की साइर्ट पर +हीं विकया गया र्थीा, लेविक+ खाली Sमी+ पर ब+ाया गया र्थीा। अं र्मि+विह उत्ख++ में एक ईदगाह क े अस्जिस् त्व का संदभ: पुरा त्वविवदों क े गवाहों-र्डॉ. Sया मे++ (PW 29), र्डॉ. सुविप्रया वमा: (PW 32) और आर सी ठक+ (PW 30) क े माध्यम से स्र्थीाविप कर+े की मांग की गई र्थीी। वाद 5 में वादी की ओर से पेश विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा श्री सी एस वैद्य+ार्थी+, +े आ£ह विकया विक सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा वि+र्मिम गवाहों में से कोई भी एक ईदगाह क े अस्जिस् त्व में +हीं र्थीा। उच्च न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया: ‘’3809. प्रारंभ में वादी (वाद-4) द्वारा स्र्थीाविप मामला यह र्थीा विक विववाद में भव+ का वि+मा:र्ण उस स्र्थीा+ पर विकया गया र्थीा Sहाँ (वहाँ) + ो कोई हिंहदू *ार्मिमक संरच+ा मौSूद र्थीी और + ही (क) विववाद की Sगह (क) आैर पूSा की Sगह मौSूद र्थीी... हालांविक, Sब उत्ख++ की काय:वाही आगे बढ़ी, ो वादी (वाद-4) क े दृविष्टकोर्ण में एक तिचवि- परिरव:+ स्पष्ट हो गया। क ु छ पुरा त्वविवदों, सिSन्हों+े बाद में वादी (सूर्टmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

4) क े पक्ष में भी बया+ विकया... क े द्वारा एक +या मामला स्र्थीाविप कर+े की कोणिशश की गइ: र्थीी विक विववाविद इमार क े +ीचे एक इस्लामी *ार्मिमक संरच+ा मौSूद है या एक इस्लामी *ार्मिमक संरच+ा मौSूद है Sब विववाविद इमार का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। सुझाव यह र्थीा विक यह या ो एक ईदगाह या कान् ी मस्जिस्Sद हो सक ी है, सिSसमें पतिश्चमी रफ क े वल एक लंबी दीवार का वि+मा:र्ण एक वि+क े क े सार्थी विकया गया र्थीा। यह सव:सम्मति मुस्जिस्लम पक्षकारों क े आठ विवशेषज्ञों क े बीच प्र ी हो ी है, विववाविद स्र्थील क े +ीचे एक संरच+ा क े अस्जिस् त्व को स्वीकार कर े हुए। उपरोX दृविष्टकोर्ण विक पहले की संरच+ा एक इस्लाविमक *ार्मिमक संरच+ा र्थीी, विववाविद संरच+ा क े +ीचे विववाविद स्र्थील पर एक गैर- *ार्मिमक संरच+ा की संभाव+ा को बाहर कर ा है। यह हमारी Sांच को इस प्रश्न क सीविम कर दे ा है विक क्या ऐसी संरच+ा इस्लामी *ार्मिमक संरच+ा हो सक ी है या गैर-इस्लामी संरच+ा अर्थीा: विहन्दू *ार्मिमक संरच+ा हो सक ी है ” बचाव सिSसे खिलया गया र्थीा वह यह र्थीी विक पूव: -विवद्यमा+ संरच+ा का इस्लामी उद्भव र्थीा। एक बार Sब इस बचाव को इस मुद्दे को संकु तिच कर विदया गया र्थीा विक क्या पूव: स्र्थीाविप संरच+ा एक इस्लामी या गैर-इस्लामी मूल की संरच+ा र्थीा। एएसआई की रिरपोर्ट: में वि+ष्कष: शाविमल विकया गया र्थीा विक विववाविद संरच+ा क े +ीचें एक हिंहदू मंविदर र्थीा और इस म की शुद्ध ा का परीक्षर्ण विकया Sा रहा र्थीा।

499. उत्ख++ क े दौरा+, 28 दीवारों का प ा लगाया गया Sैसा विक रिरपोर्ट: क े आक ृ ति 3 क में दशा:या गया है इसमें से, 1 से 15 क की दीवारें विववाविद संरच+ा र्थीीं या समकाली+ र्थीीं। विदवाल सं. 16 से 28 विववाविद संरच+ा से पहले की है और +ीचे पाइ: गइ: र्थीी। एएसआई की रिरपोर्ट: में पाया गया विक 50 मीर्टर की लंबाई क े सार्थी दीवार 16 की चौड़ाई 1. 77 मीर्टर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीी। इसक े वि+चले ई ंर्ट क े क्रम में से दस मूल स्वरूप में र्थीे, Sबविक ऊपरी छह क्रम बाद में वि+मा:र्ण क े अ+ुव - चरर्ण में Sोड़े गए र्थीे: "दीवार 16 की मौSूदा लंबाई लगभग 50 मीर्टर है, सिSसमें इसका अस्पष्ट मध्य भाग 1. 77 मीर्टर चौड़ा है। इसक े दस वि+चले ई ं र्ट क्रम मौखिलक हैं और इसक े वि+मा:र्ण क े प्रर्थीम चरर्ण से संबंति* हैं, लेविक+ ऊपरी छह क्रम Sैसा विक गढ्ढो E[6] में विदखाइ: दे ा है, E[7] और E[8] बाद की ारीख में Sोड़े Sा े हैं-वि+मा:र्ण क े दूसरे चरर्ण क े दौरा+ चार पाठ्यक्रम और शीष: दो क्रम Sब विववाविद संरच+ा क े बाहर इसकी दतिक्षर्णी लंबाई का उपयोग बाद क े वि+मा:र्णों में संरच+ा क े सार्थी +ई संरच+ा क े खिलए दीवार की चौड़ाई को कम करक े वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। यह भी देखा गया है विक दीवार 16 क े प्रर्थीम चरर्ण को भी री ओर चू+ा प्लास्र्टर से प्लास्र्टर विकया गया है, Sबविक बाहरी ओर क े प्लास्र्टर को उसक े उत्र्थीा+ क े दूसरे चरर्ण में प्रदा+ विकया गया र्थीा। दूसरे चरर्ण में दीवार क े दो+ों मुखों पर अं रालों पर क ु छ वगा:कार गुहाएं हैं, सिS+का उपयोग दीवार पर सुदृढीकरर्ण प्रदा+ कर+े क े खिलए विकया Sा सक ा है. … वाल 16 और 17 एक समा+ उत्तर-दतिक्षर्ण संरेखर्ण में पाए गए: “..... 16 और 17 की दीवारें ZE[1] और ZF[1] क े गढ्ढो क े उत्तर-दतिक्षर्ण अणिभविवन्यास में लगभग समा+ संरेखर्ण पर पाई गई ं । दीवार 17 एक ई ंर्ट की दीवार है Sो उत्तरी क्षेत्र में चार क्रमों और दतिक्षर्णी क्षेत्र में छह क्रमों क े सार्थी 1. 86 मीर्टर चौड़ी र्थीी। दीवार 17 की लंबाई दीवार 16 क े समा+ र्थीी। दीवाल 17 वि+चले स् र क Sा ी हैः ‘’दीवार 17 एक ई ंर्ट की दीवार है Sो उत्तरी क्षेत्र (पी एल 50) में चार क्रमों और दतिक्षर्णी क्षेत्र में छह क्रमों क े सार्थी 1. 86 मीर्टर चौड़ी र्थीी। यह दीवार 16 क े समा+ लंबाई का पाया गया र्थीा, हालांविक प्रमुख विदशा में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसक े अणिभविवन्यास में र्थीोड़ा विवचल+ र्थीा। इस प्रकार, यह उत्तरी क्षेत्र में लगभग समा+ां र दीवार 16 की ुल+ा में वि+चले स् र पर Sा ी है और दतिक्षर्णी क्षेत्र में दीवार 16 से +ीचे आ ा है Sैसा विक गढ्ढे र्डी 7 में देखा गया है Sहां उत्तरी भाग में 16 से +ीचे 0.74 मीर्टर का अ+ुमा+ लगाया गया है, और दतिक्षर्णी भाग में यह 16 से +ीचे 1.07 मीर्टर की अ+ुमावि+ है, सिSसक े शीष: पर पत्र्थीर क े ब्लॉक प्रदा+ विकए गए हैं और इसक े प ली पर (पीएल 51) में भी पु+: वि+योसिS है।, संभव ः दीवार 16 क े वि+मा:र्ण क े समय इसकी +ींव क े रूप काय: कर+े क े खिलए। ई ं र्ट क े चूरे की एक मोर्टी मंसिSल (सम ल) 52) उत्तरी और दतिक्षर्णी क्षेत्रों क े एक बड़े क्षेत्र में अलग -अलग मोर्टाई क े सार्थी विवस् ार दीवार 17 से संबंति* पाया गया।" एएसआई की रिरपोर्ट: में भी री दीवारों क े अस्जिस् त्व को अंविक विकया गया है Sो उत्तरी और दतिक्षर्णी दो+ों क्षेत्रों में दीवार 16 से Sुड़ी हुइ: हैं। उत्तरी क्षेत्र में भी री दीवार (18 ए) पूव:-पतिश्चम विदशा में 15 मीर्टर की लंबाई क फ ै ली हुई है। इसी प्रकार उत्ख++ में दो समा+ां र दीवारें (दीवारें 18 सी और र्डी) पाइ: गइ: र्थीीं। द+ुसार, इ+ वि+ष्कषÂ से संक े विमल ा है विक यह मामला विक दीवार 16 एक एकल ईदगाह की दीवार र्थीी, पर विवश्वास विकया गया है और सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: का दावा है विक विववाविद स्र्थील क े +ीचे एक इस्लाविमक संरच+ा मौSूद र्थीी, इसे स्वीकार +हीं विकया Sा सक ा है। इसक े अलावा, मस्जिस्Sद क े +ीचे एक ईदगाह क े अस्जिस् त्व क े संबं* में उप*ारिर करेगा विक मस्जिस्Sद को एक ध्वस् ईदगाह की +ींव पर ब+ाया गया र्थीा। एक पूव: की परिरकल्प+ा क े अलावा, प्राप्त हुइ: वस् ुआें की प्रक ृ ति +े दावे को खारिरS कर विदया। इदगाह रक्षा इसखिलए सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की दलीलों क े विवपरी र्थीी। बचाव पक्ष का प्रारंणिभक मामले में मस्जिस्Sद खाली Sमी+ पर ब+ाई गई र्थीी, को +SरअदांS कर+े का प्रयास विकया गया र्थीा। अं र्मि+विह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संरच+ा एक इस्लामी मूल की +हीं र्थीी। संविव रिर संरच+ा र्थीा विपल्लार बस्जिस् यां

500. एएसआई की रिरपोर्ट: से प ा चल ा है विक विववाविद संरच+ा या संरच+ा 3, संरच+ा 4 पर सी*े विर्टकी हुइ: र्थीी Sो पहले का वि+मा:र्ण है। संरच+ा 4 में पतिश्चम में 50 मीर्टर लंबी दीवार(दीवार 16) और पूव: में पचास स् ंभ विमले हैं, Sो स ह 2 या संरच+ा क े अंति म चरर्ण क े स ह से Sुड़ा हुआ है। रिरपोर्ट: में उल्लेख हैः "शीष: पर रखा गया एक वगा:कार बालुकाश्म खंर्ड और उसक े चारों विदशाओं में ऑर्थी स्र्टॉर्ट प्रदा+ की गई, समकाली+ स ह 2, स् ंभ आ*ार की प्रर्थीमदृष्टया प्रक ृ ति र्थीी, Sो मुख्य रूप से उस पर खड़े स् ंभ क े खिलए आ*ार क े रूप में काय: कर ी र्थीी। उ+की +ींव गोलाकार या वगा:कार र्थीी या विमट्टी क े मोर्टा:र में रखे गए ई ं र्ट-पत्र्थीर क े क्रमों क े आकार में अवि+यविम र्थीी, उ+में से अति*कांश स ह 4 पर विर्टक े हुए र्थीे, सिSसक े शीष: पर चू+े क े मोर्टा:र में सैंर्डस्र्टो+ या क ं करीर्ट ब्लॉक प्रदा+ विकए गए र्थीे, इ+ ब्लॉकों को भी ई ंर्ट से घेर खिलया गया र्थीा, और कहीं सैंर्डस्र्टो+ तिचप्स का उपयोग वांणिछ ऊ ं चाई और स् र प्राप्त कर+े क े खिलए विकया गया र्थीा।" स् ंभ आ*ारों की सत्रह पंविXयों का उत्तर से दतिक्षर्ण क विवस् ार प ा चला, प्रत्येक पंविX में पांच स् ंभ आ*ारों है। उठाए गए मंच पर अस्र्थीायी संरच+ा क े +ीचे क ें ˆीय भाग में स् ंभ क े आ*ार उच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए क्षेत्र प्रति बं*ों क े कारर्ण स्जिस्र्थी +हीं हो सक े र्थीे। पचास उत्ख++ स् ंभ आ*ारों में से बारह पूरी रह से उSागर हुए र्थीे, पैं ीस आंणिशक रूप से उSागर हुए र्थीे, Sबविक ी+ का खंर्डों में प ा लगाया Sा सक ा र्थीा। रिरपोर्ट: में अंविक है विक विवणिभन्न पर ों क े सार्थी स् ंभ क े विठका+ों क े संघ क े बारे में विववाद और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उ+क े लोर्ड सह+ क्षम ा क े संबं* क े आ*ार क े मूल रूप क े उSागर हो+े क े बाद आराम से विर्टकाया गया र्थीा: "...... व:मा+ खुदाई +े विववाविद संरच+ा से पूव: विवद्यमा+ संरच+ा क े शीष: फश: क े सार्थी उ+क े संबं* सविह ई ं र्टों क े आ*ार पर व्यवस्जिस्र्थी और उतिच रीति से स्र्थीाविप विकए गए क ं करीर्ट और पत्र्थीर क े खंर्डों क े मूल रूप को उSागर करक े विववाद को अपास् विकया गया है।" णिछयाखिलस स् ंभ आ*ार स ह की सं. ी+ से संबंति* हैं और बारहवीं श ाब्दी ए. र्डी. से पीछे की अवति* से संबंति* हैं, Sबविक चार स् ंभ आ*ार स ह +ंबर चार से संबंति* हैं Sो ग्यारहवीं श ाब्दी ए. र्डी. में युग क े स् ंभ आ*ारों की सत्रह पंविXयों का वि+मा:र्ण उत्तर-दतिक्षर्ण ई ं र्ट दीवार (दीवार 16) क े सार्थी विकया गया र्थीा। एएसआई की रिरपोर्ट: में स् ंभ क े आ*ारों की व्यवस्र्थीा से यह वि+ष्कष: वि+काला गया विक स् ंणिभ संरच+ा का क ें ˆीय भाग महत्वपूर्ण: र्थीा और वास् ुकला योS+ा में इसका विवशेष उपचार विकया गया र्थीा। दतिक्षर्ण क्षेत्र में गढ्ढे एफ 7 में चार को+ों पर फ ू लों क े अक ं + वाले स् ंभ आ*ार सं.32 पर सुशोणिभ अष्टभुSाकार पाषार्ण खंर्ड को 20 वीं श ाब्दी ए. र्डी. से संबंति* साइर्ट पर एक अ+ूठा उदाहरर्ण ब ाया गया है क्योंविक यह सार+ार्थी में पाए गए लोगों क े ुल+ीय है। एएसआई की रिरपोर्ट: में इ+ विर्टप्पणिर्णयों की पृष्ठभूविम में, उच्च न्यायालय द्वारा पाये गये वि+ष्कष: इस प्रकार र्थीे: "3904. विवशेष रूप से पृष्ठ 54 पर रिरपोर्ट: क े परिरशील+ से प ा चल ा है विक सभी 50 दर्भिश स् ंभ आ*ार, स ह 2 से 1200 ए.र्डी. क Sुड़े हुए हैं और उ+में से अति*कांश स ह सं. 4 में विर्टक ें है Sो सबसे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शुरुआ ी मंसिSल है। रिरपोर्ट: क े पृष्ठ 69 पर संदर्भिभ काब:+ र्डेहिंर्टग रिरपोर्ट: यह भी साविब कर ी है विक एक गढ्ढे Sेर्डएच-1 में स ह 2 और 3 क े बीच अंविक की गई ारीख 900-1300 AD क े बीच है, Sो प्रर्थीम दृष्टया यह स्पष्ट कर ा है विक, 1300 AD क े बाद स ह 2 +हीं ब+ाई गई र्थीी और 900 AD से पहले +हीं ब+ाइ: गइ: र्थीी, Sबविक स ह 3 को 900 AD से पहले ब+ाया गया र्थीा। रिरपोर्ट: से यह भी स्पष्ट है विक खाेSे गए सभी स् ंभ आ*ार विववाविद संरच+ा क े स ह से पहले मौSूदा स ह क े सार्थी Sुड़े हुए हैं। स् म्भ आ*ार को उसी खाइ: से सम्बस्जिन्* ब ाया Sा ा है, अर्थीा: ज़ेर्डएच-1 स ह क े सार्थी-सार्थी Sो स ह 2/3 क े संगठ+ और सी 14 क े सार्थी स् ंभ आ*ार क े सार्थी ारीख क े सार्थी स ह 2 और 3 (पृष्ठ सं. 47 क े स् ंभ आ*ार क े पृष्ठ सं.28) क े बीच की पुविष्ट कर ा है। Sीआरपी सव†क्षर्ण में विवसंगति क े रूप में Sेर्डएच -1 क े समा+ स् ंभ आ*ार की भविवष्यवार्णी की गई र्थीी। इसखिलए, यह स्पष्ट है विक स् ंभ विठका+ों की +ींव का समर्थी:+ कर+े वाली मंसिSल 4 सा वीं ए (रिरपोर्ट: क े पृष्ठ 42 और प्रक ृ ति 23 और प्लेर्ट 35 ) की अवति* से संबंति* सबसे व्यापक मंसिSल र्थीी। VIIA का समय 12 वीं श ाब्दी की शुरुआ है।'' एएसआई की रिरपोर्ट: में वि+ष्कष: वि+काला गया है विक विववाविद संरच+ा क े +ीचे एक विवशाल अं र्मि+विह संरच+ा है। वृत्ताकार वेविदका

501. एएसआई की रिरपोर्ट: में संरच+ा 5 क े रूप में वि+र्मिम ई ंर्ट की वेविदका क े साम+े एक पूव: की उपस्जिस्र्थीति का उल्लेख है ( स्वीरों क े प्लेर्ट 59 और 60 क े अ+ुरूप)। पूव: में परिरपत्र संरच+ा का एक आय ाकार प्रक्षेपर्ण हो ा है और इसमें एक कर्टाक्ष या णिछˆ हो ा है Sो एएसआई क े अ+ुसार पा+ी वि+काल+े क े खिलए एक प्रर्णाल है। यह ई ंर्ट क े मंविदर मध्य प्रदेश में रीवा क े वि+कर्ट चन्ˆहे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आैर मैसो+ क े णिशव मंविदरों क े समा+ है, Sो 950 ए. र्डी. से संबंति* है और एक विवष्र्णु मंविदर और एक अन्य विब+ा मू - का मंविदर कु रारी में है और सूय: मंविदर में Sो फ ेहपुर सिSले क े ुरौली स्जिस्र्थी है। एएसआई +े एक वि+ष्कष: वि+काला है विक शैली क े आ*ार पर, वृत्ताकार वेविदका की पूव: युगी+ दसवीं श ाब्दी ए.र्डी. की है। उपरोX वि+ष्कषÂ क े संदभ: में, श्री सी वैद्य+ार्थी+ +े सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की अ*ी+ ा को विवस्र्थीाविप कर+े क े खिलए विवशेषज्ञ गवाहों की गवाही पर अवलंम्ब खिलया है विक उ+क े द्वारा उत्पाविद ये गवाह एएसआई रिरपोर्ट: का समर्थी:+ +हीं कर े हैं। विवशेषज्ञ गवाहों क े बया+ से वि+म्+खिलखिख उद्घरर्ण को ध्या+ में रख+ा होगा: (i) सूरSभा+ (PW 16) - मंविदर क े अवशेषों क े बारे में मैं एएसआई की रिरपोर्ट: से सहम हूं विक ये अवशेष शायद विकसी मंविदर क े हों। (ii) र्डी मंर्डल (PW 24) - “.... दीवार सं. 17 में एक सSावर्टी पत्र्थीर Sमा विदया गया है। यह सSावर्टी पत्र्थीर फ ू लों की मॉविर्टफ है सिSसका उपयोग हिंहदू मंविदरों में विकया Sा ा है। यह कह+ा सही है विक वि+मा:र्ण काय: मुगलकाल से पहले ही विववाविद स्र्थील पर विकए गए र्थीे. पुरा त्त्वविवद् क े रूप में मैं उत्ख++ क े दौरा+ विववाविद संरच+ा क े +ीचे की संरच+ाओं की खोS को स्वीकार कर ा हूं। ” (iii) सुविप्रया वमा: (PW 32) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “.... मैं संरच+ा क े अस्जिस् त्व क े बारे में एएसआई की खोS से सहम हूं, लेविक+ मैं एएसआई द्वारा प्राप्त व्याख्या से असहम हूं। इसक े अलावा, यह कह+ा सही है विक विववाविद संरच+ा का वि+मा:र्ण खाली भूविम पर +हीं विकया गया र्थीा। ” (iv) र्डॉ अशोक दत्ता (PW 31) - "... मैं एएसआई की राय से सहम हूं विक विववाविद संरच+ा क े +ीचे दीवारों और स ह क े रूप में कई संरच+ाएं हैं। वॉल सं. 1 से 15 विववाविद संरच+ा से संबंति* हो सक ा है। वॉल सं. 16 क े बाद विववाविद संरच+ा क े वि+मा:र्ण से पहले एक अवति* से संबंति* दीवारें हैं. ” वृत्ताकार वेविदका से संबंति*, उच्च न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया: "3937. तिचत्र में विदखाया गया उत्र्थीा+ (एएसआइ: रिरपोर्ट: क े तिचत्र 17) यह सुझाव दे े हैं विक यह ढांचा एक उठे हुए मंच अर्थीा: ् अति*ष्ठा+ पर ब+ाया गया र्थीा. ब्यालमुख या +ाली, उत्तरी विदशा की रफ प्रदा+ की गई र्थीी। संरच+ा 9 वीं-10 वीं ईस्वी क े श ाब्दी क का हो सक ा है (एएसआई +े इस स् र से सी-14 वि+*ा:रर्ण विकया और अक ं + ति णिर्थी 900 ए.र्डी. और 1030 ए.र्डी. क े बीच है)।

3938. यह एक स्व ंत्र लघु वेविदका र्थीा। वास् ुकला की विवशेष ाओं से प ा चल ा है विक यह एक णिशव वेविदका है।

3939. यह अकल्प+ीय है विक णिशव मंविदर की इ+ स्पष्ट विवशेष ाओं क े बावSूद, आपखित्तक ा: इसे मुस्जिस्लम कब्र क े समा+ ही पहचा+ रहे हैं।

3940. दूसरे, यह मकबरे क े खिलए बहु छोर्टी संरच+ा है, यह अंदर से क े वल 4. 4 वग: फीर्ट है। + ो यह अप+े आं रिरक भाग में एक कब्र को समायोसिS कर सक ा र्थीा, + ही इसकी पतिश्चमी दीवार पर एक विक़ब्ल्लाह-विमहराब; विक़ब्ल्लाह विमहराब सल् + काल (1192-1526 ई.) क े दौरा+ मकबरे-संरच+ा का एक अणिभन्न और आवश्यक विहस्सा र्थीा, Sैसा विक पूरे उत्तरी भार में कई उदाहरर्णों द्वारा तिचवित्र विकया गया है।

3941. ीसरा, मकबरे पर गुंबद ब+ा+े क े खिलए आवश्यक मेहराब का कोई वि+शा+ +हीं है। इसमें कोई हुक -शाफ्र्ट +हीं है और मेहराब क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रैखिखक दबाव का कोई संरच+ात्मक वि+शा+ +हीं है। यह ध्या+ विदया Sा सक ा है विक मेहराब की उप-संरच+ा को चार को+ों क े विक+ारों पर बड़े पैमा+े पर ब+ाया गया है, रैखिखक दबाव को रोक+े क े खिलए। आश्चय: है विक यविद यह विब+ा विकसी गुम्बद क े, और विब+ा विकसी कब्र क े भी हो?

3942. इस प्रकार एक ओर इस संरच+ा का आयाम मकबरे क े खिलए बहु छोर्टा है और दूसरी ओर व्यालमुख कभी कब्रों में +हीं हो ा, Sबविक णिशवलिंलग पर र्डाले गए पा+ी को बाहर वि+काल+े क े खिलए यह णिशव मंविदर का एक अणिभन्न अंग हो ा र्थीा।

3943. वेविदका एक पविवत्र स्र्थीा+ है Sहां पूSा की Sा ी है। यह एक ऐसी संरच+ा है सिSसमें पविवत्र ा हो ी है। इ+कार क े खिलए म+ा कर+े की अ+ुमति +हीं दी Sा+ी चाविहए। "इस संरच+ा को एक वेविदका मा++े का कोई साक्ष्य +हीं" और " एक कोरी कल्प+ा,विब+ा विकसी स्पष्ट आ*ार क े अ+ुमा+", इस रह की विर्टप्पणिर्णयों में क+ीकी कौशल की कमी है और स्पष्ट रूप से ार्मिकक सोच की कमी है। ये स्वयं क े वल "स्पष्ट आ*ार" की कमी क े क: हैं। ये और कई रह क े क: वादी क े 'शु ुरमुग- रवैये' को दशा: े हैं।

3944. एक संरच+ा को उसक े आकार और/या उसक े उपयोग द्वारा पहचा+ा Sा ा है सिSसक े इसे प्रस् ु विकया Sा ा या सिSस काय: क े खिलए इसे प्रदश:+ कर+े क े खिलए कहा Sा ा र्थीा। यह वृत्ताकार संरच+ा एक अच्छी रह से परिरभाविष 'पर+ाला' (अपक्षारर्ण रल पदार्थी: को बाहर वि+काल+े क े खिलए पा+ी का वि+कास) क े सार्थी पाया गया र्थीा. पर+ाला को अच्छी रह से +ाली क े रूप में वि+रूविप विकया Sा सक ा र्थीा, लेविक+ वह क्षेत्र Sहां से यह Sारी कर रहा र्थीा वह क े वल 40 x 60 मीर्टर र्थीा (सिSसमें पूSा की Sा+े वाली मू - को स्र्थीाइ:त्व प्रदा+ कर+े क े खिलए एक च ुभु:Sाकार खोखला चैम्बर आैर पूव: मे एक ् छोर्टा सो प्रवेश द्वार सविह ) र्थीा, सिSसका उपयोग स्+ा+ कक्ष क े खिलए या रसोई क े खिलए +हीं विकया Sा सक ा र्थीा, क ु छ विवकल्प Sहां पा+ी को बाहर वि+काल+े की आवश्यक ा हो ी है, इस प्रकार, एकमात्र वै* स्पष्टीकरर्ण यह र्थीा विक यह एक मंविदर का 'पर+ाला' है, क े वल एक सहायक है और एक मुख्य वेविदका क े क ें ˆीय/मुख्य देव ा काे पकड़+े वाला +हीं है।

3945. वृत्ताकार वेविदका को दीवार 19 ए और अन्य पर विर्टका हुआ पाया गया है, यह एकल थ्य 'वृत्ताकार वेविदका' को उX दीवारों क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समकाली+ +हीं ब+ा ा है, क्योंविक ' मौSूदा दीवारें' क े खिलए काय: स् र बहु उच्च है, और क े वल +ींव में है आैर बाकी मौSूदा दीवारें क े विहस्सों में है, सिSन्हें वृत्ताकार वेविदका की +ींव क े रूप में शाविमल विकया गया है, ये दीवारें वि+तिश्च रूप से वृत्ताकार वेविदका को +ींव प्रदा+ कर+े क े खिलए +हीं ब+ाई गई हैं। Sाविहर है, Sब परिरपत्र श्राइ+ का वि+मा:र्ण विकया गया, ो 19 ए और अन्य सभी को Sमी+ क े +ीचे दफ+ाया गया और उसी स् र क वृत्ताकार वेविदका की +ींव पड़ी।" वृत्ताकार वेविदका क े संबं* में एक महत्वपूर्ण: पहलू है सिSसे ध्या+ में रख+ा चाविहए। यह वृत्ताकार वेविदका क े ऊपर स् ंभ आ*ार की उपस्जिस्र्थीति है। एएसआई की रिरपोर्ट: क े खिलए महत्व को अणिभवि+*ा:रिर कर े समय इस पहलू को ध्या+ में रखा Sा+ा चाविहए। Sैसा विक चू+े सुरखी क े उपयोग क े संबं* में, विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री मी+ाक्षी अरोड़ा द्वारा आ£ह विकया Sा ा है विक यह इस्लाविमक संरच+ाओं में प्रयुX एक विवणिशष्ट साम£ी है। इस बा को स्वीकार कर े हुए, श्री सी वैद्य+ार्थी+ +े सूरSभा+ (PW 16) क े बया+ पर अवलंम्ब खिलया, सिSन्हों+े कहा: यह कह+ा सही है विक ईसा की ीसरी श ाब्दी में क्षणिशला और पाविकस् ा+ में क ु षार्ण काल में चू+े क े पा+ी का उपयोग विकया गया र्थीा… इसी रह, र्डॉ. Sया मे++ (PW 29) +े भी कहा विक: “..…चू+े क े मोर्टा:र का उपयोग वि+तिश्च रूप से +वपाषार्ण काल क े समय से उपयोग में है।" इसखिलए चू+े सुरखी क े उपयोग पर और विवस् ार की आवश्यक ा +हीं है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वास् ुकला का भाग

502. अयोध्या में विववाविद स्र्थील की पुरा ास्जित्वक खुदाई क े फलस्वरूप स् ंभ, णिभखित्तस् ंभ292, र्टूर्टे हुए दरवाSे, चौखर्ट, लिंलर्टल, कोष्ठक आविद वास् ुणिशल्पी अंशों की बरामदगी हुई। ये स् ंभ की स ह से लेकर गढ्ढो में काफी गहराई क क े क्षेत्रों से र्टूर्टे हुए र्टुकड़ों क े रूप में पु+ः प्राप्त विकए गए र्थीे। एएसआई की रिरपोर्ट: का अध्याय VI Sो वास् ुणिशल्प अंशों से संबंति* है, ब ा ा है विक प्राविप्तयों में, उल्लेख+ीय हैं: '' क ु छ अक्षु°र्ण वास् ुकला विहस्से Sैसे अमलका (प्लेर्ट 81, तिचत्र 59) स् ंभ, सिSसमें घट्टा-पल्लव आ*ार है, सिSसमें भार वाहक क े रूप में बौ+े और कीर्ति मुख (प्लेर्ट 82-83, तिचत्र 59) हैं, भी प्राप्त हुए हैं। इसक े अलावा बहु से वास् ुकला विहस्से भी हैं सिSन्हें गहरी +क्काशीदार पर्ण:-अंक+ों से सSाया गया है। यह पैर्ट+: अलग है और स्र्टेंसिसल क े काम (प्लेर्ट 86-87) Sैसा विदख ा है। यह कहा Sा सक ा है विक समा+ सSावर्टी तिर्डSाइ+ों वाले विवणिभन्न वास् ुणिशल्प विहस्से प्रमुख ई ंर्ट संरच+ाओं (दीवार 16) (अध्याय IV-संरच+ा) में +ींव क े रूप में प्रयुX पाये गये हैं । इस स्र्थील क े पूव X स् ंभ और अन्य सSावर्टी वास् ु अंश Sैसे विक र्टूर्टी हुई चौखर्ट का र्टुकड़ा, अ*: णिभखित्तस् ंभ (प्लेर्ट 85) क े सार्थी एक अष्टभुSाकार शाफ्र्ट का र्टुकड़ा (प्लेर्ट 84), श्रीवत्स अंक+ (प्लेर्ट 88) क े सार्थी एक वगा:कार स्लैब, कमल क े मध्यमूर्ति अंक+ का र्टुकड़ा (प्लेर्ट 89-90) सशX रूप से मंविदर वास् ुणिशल्प क े सार्थी अप+े संबं* को ब ा े हैं। शैली क े अ+ुसार, सामान्य रूप से इ+ वास् ुकला अंशों को सामान्य ः और स् ंभों को विवशेष रूप से दसवीं -बारहवीं श ाब्दी ई. क े समय में रखा Sा सक ा है। यह भी ध्या+ रख+ा आवश्यक है विक क ु छ वास् ुकला अंश (प्लेर्ट 92-94) हैं, Sो शैली क े आ*ार 292 णिभखित्तस् म्भ शास्त्रीय वास् ुकला में दीवार की आैर दर्भिश एक उर्थीले घार्ट या आय ाकार रूप का है,Sो एक क्रम मे हो ा है और सिSस पर छज्जा हो ा है। - माइकल क्लाक:, द क ं सीज़ ऑक्सफोर्ड: तिर्डक्श+री ऑफ़ आर्ट: र्टम्स:, आक्सफोर्ड: पेपरबुक रिरफरेंस, आेयूपी आक्सफोर्ड:,210, पृष्ठ 191, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर स्पष्ट रूप से इस्लाविमक वास् ुकला से Sोड़ा Sा सक ा है Sो सोलहवीं श ाब्दी ईस्वी क े बाद से संबंति* हो सक ा है। वास् ुकला अंशों क े अति रिरX आलिंलग+ मुˆा में बैठे दैवीय युगल की एक अत्यति*क क्षति £स्क मूर्ति भी विमली है। व:मा+ अवशेष में कमर, Sांघ और पैर (प्लेर्ट 235) है।”

503. सु+वाई क े दौरा+, हमें उ+ प्लेर्टों को देख+े का भी लाभ विमला सिSसमें वास् ुकला क े तिचत्र वर्भिर्ण हैं। सुश्री मी+ाक्षी अरोड़ा, विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा +े प्लेर्ट 235 में दर्भिश प्राविप का वर्ण:+ कर+े वाली 'दैवीय युगल' क े प्रयोग विकये Sा+े की आलोच+ा की है। अति*वXा की आलोच+ा वि+रा*ार +हीं है। प्लेर्ट में दर्भिश मूर्ति (ए.एस.आई. की रिरपोर्ट: क े अ+ुसार) बहु ही विवक ृ हैं। ए.एस.आई. की र्टीम क े अ+ुसार, मूर्ति कला क े Sो अवशेष विमलें हैं उसमें कपल क े कमर, Sांघ और पैर दर्भिश हैं। यह पुरा ास्जित्वक अ+ुभव की कल्प+ाशील अणिभव्यविX हो सक ी है। लेविक+ इसे "दैवीय Sोड़ा" कह+ा कल्प+ा की सीमा से परे है। इसे विवचारिर + कर, ए.एस.आई. र्टीम +े अन्य सभी वि+ष्कषÂ क े संचयी विवश्लेषर्ण कर यह अ+ुमा+ लगाया विक शैलीग रूप से ये वास् ुकला संबं*ी वि+ष्कष: और स् ंभ विवशेष रूप से दसवीं से बारहवीं श ाब्दी क े समय क े हैं और मंविदर वास् ुकला क े समा+ हैं। यह अ+ुमा+, Sैसा विक उपरोX वि+ष्कषÂ से प्रकर्ट हो ा है, आलिंलग+ मुˆा में प्राप्त युगल की मूर्ति से अलग है। अ ः उपरोX मूर्ति कला को छोड़ विदया Sाए ब भी विकसी विवशेषज्ञ क े खिलए उपरोX वि+ष्कष: वि+काल+े का उतिच आ*ार मौSूद है। खुदाई क े दौरा+ ए.एस.आई. को एक अमलका विमला, Sो आम ौर पर एक खंतिर्ड या गोलाकार पत्र्थीर की तिर्डस्क है, सिSसमें विक+ारे पर दरारें हैं और हिंहदू मंविदरों क े 'णिशखर' या मुख्य स् म्भ 293 पर है। आमलक कमल भी हो सक ा है और +ीचे बैठे देव ा का प्र ीक है। ए.एस.आई. को एक घार्टपल्व मोति फ भी विमला सिSसका संबं* देव ा को समारोहों पर विदये Sा+े वाले भेंर्ट से है और इसका प्रयोग गभ:गृह को सSा+े क े प्र ीक क े रूप में विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

504. सुश्री अरोड़ा +े अप+े कर्थी+ों कर+े क े समर्थी:+ में Sयं ी प्रसाद (र्डी.र्डब्ल्यू. 20/5) और र्डॉ. सुविप्रया वमा: (पी.र्डब्ल्यू 32) की गवाही का अवलम्ब खिलये Sा+े की मांग कर कर्थी+ विकया विक वास् ुणिशल्प क े यह र्टुकड़े हिंहदू *ार्मिमक संरच+ाओं क े अलावा बौद्ध या Sै+ संरच+ाओं से भी संबंति* हो सक ी हैं। र्डॉ. सुविप्रया वमा: कर्थी+ कर ी हैं विक हो सक ा है यह महलों का विहस्सा या इस्लामी ढांचे हो। दो गवाहों की गवाही क े वि+ष्कष: +ीचे विदए गए हैं: '(अ) श्री Sयं ी प्रसाद श्रीवास् व (र्डी.र्डब्ल्यू. 20/5), एक विवशेषज्ञ साक्षी सिSन्हों+े ए.एस.आई. रिरपोर्ट: का समर्थी:+ विकया है: "....Sै+ *म: में बड़े मंविदर पाए Sा े हैं, लेविक+ वास् ुकला संबं*ी प्रर्णाली वही है....।" (ख) र्डॉ. सुविप्रया वमा: (PW 32) +े Sो गवाही दी वह इस प्रकार है: "मुझे लग ा है, स्पष्ट रूप से यह कह+ा बहु मुस्जिश्कल है विक ए.एस.आई. क े कति पय वि+ष्कष: का संबं* हिंहदू *ार्मिमक संरच+ाओं से संबंति* हैं क्योंविक हो सक ा है यह अवशेष महलों, बौद्ध संरच+ाओं, Sै+ संरच+ाओं या इस्लामी ढांचे का विहस्सा हो....। बौद्ध या Sै+ परंपराओं क े सार्थी इसका संभाविव संबं* +कारा +हीं Sा सक ा है। वास् व में, पुरा त्वीय या ऐति हासिसक साम£ी का आँकल+ कर+े क े खिलए विकसी व्यविX को अ+ैति क दृविष्टकोर्ण से बच+ा चाविहए। व:मा+ मामले में खुदाई वास् व में सभ्य ा, संस्क ृ ति यों और परंपराओं क े संगम को सुझा ी हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इ+ गवाविहयों का साव*ा+ीपूव:क विवश्लेषर्ण कर+े पर, यह मुद्दा इसी संबं* में है विक क्या यह ए.एस.आई. रिरपोर्ट: में वि+विह सम£ वि+ष्कष: श्रेय +हीं प्रदा+ करेगा। यह कर्थी+ विक क ु छ र्टुकड़े इस्लामी संरच+ा क े हैं, वास् व में ए.एस.आई. की रिरपोर्ट: में दर्भिश विकया गया है। यह रिरपोर्ट: मुख्य ः उ+ र्टुकड़ों की बा कर ी हैं, सिSन्हें प्लेर्ट 92-94 द्वारा दशा:या गया है, Sो स्पष्ट रूप से शैलीग आ*ार पर इस्लाविमक वास् ुकला से Sुड़े हो सक े हैं। अ ः ए.एस.आई. की रिरपोर्ट: +े खुदाई से प्राप्त उ+ वास् ुणिशल्प को तिचवित्र विकया Sो सोलहवीं श ाब्दी क े इस्लाविमक वास् ुकला से संबंति* हैं। र्डी.र्डब्ल्यू. 20/5 और पी.र्डब्ल्यू 32 की राय से यह विवविद हो ा है विक खुदायी से प्राप्त सामा£ी विकसी महल, बौद्ध अर्थीवा Sै+ संरच+ाओं क े अ+ुरूप भी हो सक ी है, महत्वपूर्ण: विबन्दु यह है विक वह र्टुकड़े गैर -इस्लामी मूल क े हैं। (उ+ विवणिशष्ट कलाक ृ ति यों को छोड़कर सिS+की पहचा+ उपरोX उसिल्लखिख ए.एस.आई. द्वारा इस्लामी मूल क े रूप में की गयी है।) Sब यह स्जिस्र्थीति उत्पन्न हो ी है ब ए.एस.आई. रिरपोर्ट: को उसकी संपूर्ण: ा में पढ़कर उसका वि+व:च+ कर+ा हो ा है। विवशेषज्ञ र्टीम द्वारा वि+काले गये वि+ष्कषÂ को अस्वीकार कर+ा अ+ुतिच होगा, सिSस+े उच्च न्यायालय क े आदेशों क े ह उत्ख++ विकया है और खुदाई से प्राप्त सामावि£यों अलग - अलग दृविष्टकोर्णों से साव*ा+ीपूव:क विवश्लेषर्ण विकया है। विफर भी रिरपोर्ट: को संदभ: से विब+ा भर्टक े वि+व:च+ क े मामलों पर उत्पन्न हो+े वाले वास् विवक विवसंगति यों को अस्वीकार कर पढ़ा Sा+ा चाविहए। ए.एस.आई. +े वि+ष्कषÂ क े वि+यम+ से पूव: खुदाई की गई सामवि£यों का साव*ा+ीपूव:क विवश्लेषर्ण विकया गया र्थीा। खुदाई से प्राप्त अलग अलग mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सामावि£यों क े संबं* में वैयविXक दृविष्टकोर्ण अलग हो सक ा है। हालांविक, न्यायालय को सिSस परीक्षर्ण का प्रयोग विकया वह यह है विक क्या संभाव+ाओं की प्रबल ा पर, ए.एस.आई. द्वारा वि+काले गए वि+ष्कष: उतिच हैं।

505. हालांविक उच्च न्यायालय क े समक्ष काय:वाही क े दौरा+ ए.एस.आई. पर पूवा:£ह और दुराशय का आरोप लगाकर विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा सुश्री अरोड़ा +े विवशेष रूप से कर्थी+ विकया है विक व:मा+ अपीलों में इस आशय का कोई मामला +हीं उठाया Sा रहा है। वास् व में, Sब श्री वैद्य+ार्थी+ +े ए.एस.आई. द्वारा विकए गए काय: क े संबं* में सुश्री अरोड़ा पर पूवा:£ह से £सिस या दुभा:व+ापूर्ण: कर्थी+ कर+े का आरोप लगाया ो सुश्री अरोड़ा +े हस् क्षेप कर यह कहा विक उन्हों+े उस आशय से कोई कर्थी+ +हीं विकया है। ए.एस.आई. की रिरपोर्ट: की एक आलोच+ा यह की Sा सक ी है विक + ो हतिड्डयों की बरामदगी का कोई विवश्लेषर्ण और + ही विमट्टी क े ब:+ों का र्थीम ल्यूविमवि+सी+ कराया गया र्थीा। न्यायमूर्ति अ£वाल +े यह कहा विक यविद उसको वि+यविम पर से प्राप्त विकया गया हो ा ो हतिड्डयों क े विवश्लेषर्ण से क ु छ Sा+कारी प्राप्त हो ी। हालांविक, इस मामले में, उसे गढ्ढे से प्राप्त विकया गया है और इसखिलए इसे "अर्थी:ही+ और महत्वही+" ठहरा विदया गया र्थीा। यह भी प्र ी हो ा है विक लख+ऊ स्जिस्र्थी संस्र्थीा+ में विमट्टी क े ब:+ों क े र्थीम ल्यूविमसी+ र्डेहिंर्टग की सुविव*ा उपलब्* +हीं र्थीी और चूंविक काब:+ 14 र्डेहिंर्टग क े खिलए चारकोल +मू+े उपलब्* र्थीे, इसखिलए विमट्टी क े ब:+ का आगे विवश्लेषर्ण +हीं विकया गया र्थीा। इ+ कारर्णों से परे, Sो कमी है वह इ+ ी पया:प्त +हीं सिSससे पूर्ण:रूपेर्ण रिरपोर्ट: को खारिरS विकया Sा सक े । mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साक्ष्य क े मा+क

506. न्यायालय Sब दीवा+ी मामलों का विवचारर्ण कर ा है ो वह सम्भाव+ाओं की प्रबल ा से शासिस साक्ष्यों क े मा+क को लागू कर ा है। इस मा+क को कभी-कभी सम्भाव+ाओं का सं ुल+ या साक्ष्यों की प्रबल ा भी कहा Sा ा है। विपपस+ ऑ+ इविवर्डेंस संक्षेप में मा+क सूवित्र कर ा हैं: यविद, साक्ष्य ऐसा है विक न्यायालय यह कह सक ी है विक हमें यह +हीं लग ा है विक यह अति*क संभाविव है, ो साक्ष्य विदया Sा+ा चाविहए, लेविक+ यविद संभाव+ाएं समा+ हैं, ो ब साक्ष्य दे+े की कोई आवश्यक ा +हीं है। विमलर ब+ाम पेंश+ मामलों क े मंत्री295 क े मामले में न्यायमूर्ति लॉर्ड: र्डेहिं+ग (मास्र्टर ऑफ रोल्स क े रूप में) +े सं ुल+ या संभाव+ाओं क े प्रबल ाओं क े सिसद्धां ों की वि+म्+व व्याख्या की है: "(1).... इसमें वि+तिश्च ा क पहुंच+े की आवश्यक ा +हीं है, लेविक+ इसे एक उच्च स् र की संभाव+ा ले Sा+ा चाविहए। संदेह से परे साक्ष्य का म लब संदेह की छाया से परे साक्ष्य +हीं है। यविद न्यायालय न्याय क े पर्थी से हर्टकर काल्पवि+क संभाव+ाओं को स्वीकार कर ा ो यह समुदाय की रक्षा कर+े में असफल हो Sा ा। यविद विकसी व्यविX क े विवरूद्ध साक्ष्य इ +ा मSबू है सिSसका संबं* उसक े पक्ष में क े वल एक दूरस्र्थी संभाव+ा को छोड़+ा हो सिSसे इस वाक्य क े सार्थी खारिरS विकया Sा सक ा है, "वि+ःसंदेह यह हो सक ा है लेविक+ इसकी संभाव+ा बहु कम +हीं ।" यह मामला युविXयुX संदेह से परे साविब हो Sा ा है, लेविक+ उस रीक े का क ु छ भी पया:प्त +हीं होगा। (प्रभाव वर्ति* ) विवति* मा+ ी है विक प्रबल संभाव+ाओं क े मा+क क े भी र, अलग रह की संभाव+ा हो सक ी है। इसको र्डेहिं+ग महोद+ बेर्टर ब+ाम बेर्टर 296 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एल. Sे. क े मामले में संक्षेप में इस सिसद्धान् का प्रति पाद+ विकया है Sो इस प्रकार र्थीा Sो इस प्रकार हैः "इसखिलए दीवा+ी मामलों में भी, मामले को प्रबल संभाव+ाओं क े सार्थी साविब विकया Sा+ा चाविहए, लेविक+ वहां भी उ+ मा+कों क े ह उसकी उच्च श्रेर्णी हो+ी चाविहए। वह उच्च श्रेर्णी उस विवषय वस् ु पर वि+भ:र कर ी है। '' (प्रभाव वर्ति* ) साक्ष्य अति*वि+यम की की *ारा 3 में पद 'साविब हुआ' की परिरभाषा इस प्रकार दी Sा सक ी है: 'साविब '-कोई थ्य साविब हुआ कहा Sा सक ा Sब न्यायालय अप+े समक्ष मामलों पर विवचार कर+े क े बाद उसक े अस्जिस् त्व को मा+े या उसका विवचार हो विक उसका अस्जिस् त्व इ +ा अति संभाव्य हो सामान्य प्रज्ञा वाला व्यविX मामले की थ्यों और परिरस्जिस्र्थीति यों में उसका अस्जिस् त्व में हो+ा स्वीकार करे।' विकसी थ्य का प्रमार्ण इसक े अस्जिस् त्व की संभाव+ा पर वि+भ:र कर ा है। न्यायालय का वि+ष्कष: वि+म्+खिलखिख पर आ*ारिर हो+ा चाविहए: क. एक प्रज्ञावा+ व्यविX Sो इसे थ्य क े अस्जिस् त्व पर विवश्वास कर काय: कर ा है; और ख. विकसी विवशेष मामले क े संदभ: और परिरस्जिस्र्थीति यों में। इसका विवश्लेषर्ण कर न्यायमूर्ति वाई. वी. चंˆचूड़ ( ब क े विवद्वा+ मुख्य न्यायमूर्ति ) र्डॉ. ए+. Sी. दास् ा+े ब+ाम एस. दास् ा+े297 क े मामले में *ारिर विकया: "विकसी थ्य क े अस्जिस् त्व क े बारे में विवश्वास इस प्रकार संभाव+ाओं क े सं ुल+ पर स्र्थीाविप विकया Sा सक ा है। थ्य अर्थीवा परिरस्जिस्र्थीति से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संबंति* परस्पर विवरो*ी संभाव+ाओं का साम+ा कर रहा प्रज्ञावा+ व्यविX इस अ+ुमा+ पर काय: करेगा विक उसका अस्जिस् त्व है, एक विववेकपूर्ण: व्यविX क े रूप में, इसखिलए अदाल इस परीक्षर्ण को यह प ा लगा+े क े खिलए कर ा है विक क्या विववाद्य थ्य साविब हुआ कहा Sा सक ा है। इस प्रविक्रया में पहला चरर्ण में संभाव+ाओं को य कर+ा हो ा है, दूसरा चरर्ण में उसे ौल+ा हो ा है, भले ही दो+ों परस्पर Sुड़े हों। पहले चरर्ण में असंभव ा का र्थीा दूसरे चरर्ण में अ+ुतिच ा वि+राकरर्ण विकया Sा ा है। संभाव+ाओं की विवस् ृ श्रृंखला क े भी र न्यायालय क े पास अक्सर एक कविठ+ विवकल्प हो ा है, लेविक+ यह वह विवकल्प है Sो अं ः वि+*ा:रिर कर ा है विक संभाव+ाओं का पूव:सग: कहाँ वि+विह है। पक्षकारों की स्जिस्र्थीति को प्रभाविव कर+े वाले महत्वपूर्ण: विवषयों की उ +ी बारीकी से Sांच की Sा+ी चाविहए सिS +ी बारीकी से Sांच कर वच+ पर कोई विकसी को ऋर्ण दे ा है।: "विकसी विवषय की प्रक ृ ति और गंभीर ा आवश्यक रूप से विवषय की सत्य ा की उतिच सं ुविष्ट प्राप्त कर+े क े रीक े का वि+*ा:रिरर्ण कर ी है (राइर्ट ब+ाम राइर्ट, (1948) 77 सी.एल.आर. 191, 210 न्यायमूर्ति तिर्डक्स+ क े अ+ुसार); अर्थीवा Sैसा विक लॉर्ड: र्डेहिं+ग द्वारा कहा गया है, 'संभाव+ा का स् र विवषय-वस् ु पर वि+भ:र कर ा है।' अपरा* गंभीर हो ा है, सबू उ +ा स्पष्ट हो+ा चाविहए (स्जिब्लर्थी ब+ाम स्जिब्लर्थी (1966) 1 ए.ई.आर. 524, 536) विकन् ु चाहे यह विवषय क्र ू र ा या प्रो+ोर्ट पर ऋर्ण दे+े से संबंति* हो, परीक्षर्ण यह लागू कर ा है विक क्या संभाव+ाओं क े पूव:सग: पर प्रासंविगक थ्य साविब हुआ है। आम ौर पर दीवा+ी मामलों में यह मा+क साक्ष्य हो ा है सिSससे यह प ा लगाया Sा ा है विक क्या सबू का भार उन्मोतिच हो गया है।' (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायालय +े मा+ा विक संभाव+ाओं की प्रबल मा+क क े ह, संभाव+ा का स् र अन् र्मि+विह विवषय वस् ु पर आ*ारिर हो ा है। उत्तर प्रदेश राज्य ब+ाम क ृ ष्र्ण गोपाल 298 क े मामले में न्यायालय +े इस प्रकार अवलोक+ विकया: "26. संभाव्य ा की अव*ारर्णा और इसक े स् र को, स्पष्ट रूप से गणिर्ण ीय इकाइयों क े रूप से व्यX +हीं विकया Sा सक ा है Sैसे विक इस रह की विक +ी इकाइयाँ मामले को युविXयुX संदेह से परे साविब कर ी हैं। संभाव्य ा का स् र और साक्ष्य क े वS+ क े मूल्यांक+ में एक अचूक विवषयपरक त्व शाविमल हो ा है। मामले क े अस्जिन् म विवश्लेषर्ण क े समय फोरेंसिसक प्रातियक ा सामान्य प्रज्ञा पर वि+भ:र हो+ा चाविहए, और अं ः न्याया*ीश क े सहS बो* पर वि+भ:र हो+ा चाविहए। ' (प्रभाव वर्ति* )

507. ए.एस.आई. की रिरपोर्ट: क े आ*ार पर मा. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े थ्य क े वि+म्+खिलखिख वि+ष्कषÂ का विवचार विकया: "4055. अंति म वि+ष्कष:, सिSसे इस न्यायालय द्वारा उपरोX पूरी चचा: और साम£ी से यर्थीोतिच रूप से वि+काला Sा सक ा है, यह है: (i) विववाविद संरच+ा एक अक्ष, खाली, वि+वा:सिस, खुली भूविम पर +हीं उठाई गई र्थीी; (ii) वहां पर ऐसी संरच+ा विवद्यमा+ र्थीी Sो विववाविद स्र्थील पर ब+ी संरच+ा से बहु बड़ी +हीं र्थीी ब भी उसक े समा+ या बड़ी रही होगी; (iii) विववाविद संरच+ा क े वि+मा: ा को पूव:व - संरच+ा, उसकी शविX, क्षम ा, दीवारों क े आकार आविद का विववरर्ण प ा र्थीा और इसखिलए विब+ा विकसी सु*ार या संशो*+ क े दीवारों आविद का उपयोग कर+े में संकोच +हीं विकया. (iv) पूव:व - ढांचा की प्रक ृ ति *ार्मिमक और गैर-इस्लामी भी र्थीी.... mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) पूव:व - ढा़चें में विववाविद संरच+ा को खड़ा कर+े क े खिलए पत्र्थीर, स् ंभ, ई ं र्टें, Sैसी सामा£ी का प्रयोग विकया गया र्थीा; और (vi) उत्ख++ क े दौरा+ वि+कली चीSें काफी हद क गैर-इस्लाविमक प्रक ृ ति की हैं, Sैसे विक वह हिंहदू *ार्मिमक स्र्थीलों से संबंति* है, भले ही हम उ+ चीSों को अन्य *म: से Sुड़ी हुई ं वस् ु मा+ें। इसक े सार्थी कोई ऐसी भी कलाक ृ ति इत्याविद वहां +हीं सिSसका प्रयोग इस्लाविमक *ार्मिमक स्र्थीलों पर हो ा है।" मा. न्यायमूर्ति +े एस. यू. खा+ +े ए.एस.आई. की रिरपोर्ट: पर कोई भरोसा +हीं S ाया। सिS+ आ*ारों पर न्याया*ीश उस वि+ष्कष: पर पहुंचें वह विवणिशष्ट हैं। प्रर्थीम, विवद्वा+ न्याया*ीश +े पाया विक दसवीं श ाब्दी से विववाविद संरच+ा क े वि+मा:र्ण क संरच+ात्मक चरर्णों में वि+रं र ा क े साक्ष्य मौSूद र्थीे Sो सी*े ौर पर दलीलों, गSर्टों, और इति हास की पुस् कों क े विवरो* में है। इस सव:व्यापी वि+ष्कष: का कोई थ्यात्मक आ*ार +हीं है। खुदाई का उद्देश्य यह वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए न्यायालय को यह मूल्यांक+ कर+े क े खिलए सक्षम ब+ा+ा र्थीा विक क्या पूव: -मौSूदा मंविदर स्र्थील पर विववाविद संरच+ा का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। क्या वह ऐसा मामला र्थीा विक विवक्रमाविदत्य द्वारा मंविदर क े वि+मा:र्ण क े उपरान् और मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क विकसी भी प्रकार का वि+मा:र्ण काय: विववाविद स्र्थील क े भी र विकया गया र्थीा सिSसक े संबं* में कोई वि+ष्कर्ण: उस स्र्थील में खुदाई क े उपरान् ही लगाया Sा सक ा है। दूसरा कारर्ण यह र्थीा विक यविद मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए मंविदर को ध्वस् कर विदया Sा ा ो मंविदर का मूल ढांचा '' *र ी क े भी र + Sा ा।'' पु+ः यह अ+ुमा+ शुद्ध है। ब विवद्वा+ न्याया*ीश +े इस आ*ार पर वास् ुणिशल्प र्टुकड़ों को +कार विदया विक और कहा ऐसा क े वल प्राक ृ ति क आपदा में हो ा है Sहां ऐसी साम£ी 'Sमी+ क े अंदर +ीचे चली Sा ी है' या विकसी ऐसी स्जिस्र्थीति में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हो ा है Sहां +ष्ट इमार सविदयों क े बाद Sमी+ क े +ीचे दफ+ हो Sा ी है। न्याया*ीश +े यह अवलोक+ विकया विक यह Sरूरी +हीं है विक मंविदर क े +ींव में कोई अपेतिक्ष चीS विमले या ऐसी चीS विमले सिSससे विकसी प्रर्थीा का हो+ा दर्भिश हो, अविप ु वहां पर क ु छ ऐसी चीSें विमल+ी चाविहए सिS+से मंविदर की मूल प्रक ृ ति का प ा चले। ृ ीय विवद्वा+ न्याया*ीश, न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा: +े ए.एस.आई. रिरपोर्ट: क े वि+ष्कषÂ पर भरोसा विकया है।

508. एएसआई की रिरपोर्ट: पर न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े Sो वि+ष्कष: वि+काले हैं, वे उपरोX स्वीक ृ ति योग्य हैं। एएसआई रिरपोर्ट: में वि+विह साम£ी में पया:प्त आ*ार वि+म्+खिलखिख वि+ष्कषÂ क े खिलए है: (i) खाली Sमी+ पर बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा; (ii) उत्ख++ विववाविद ढाँचे क े +ीचे अं र्मि+विह ढाँचे की उपस्जिस्र्थीति का संक े कर ा है; (iii) अं र्मि+विह ढाँचा कम से कम बराबर र्थीा, यविद विववाविद ढाँचे की ुल+ा में बड़े आयाम +हीं र्थीे; (iv) स् ंभ क े आ*ारों की उपस्जिस्र्थीति क े सार्थी Sुड़े अं र्मि+विह ढाँचे की दीवारों की खुदाई, विववाविद ढाँचे क े अं र्मि+विह ढाँचे की उपस्जिस्र्थीति का एएसआई क े वि+ष्कषÂ का समर्थी:+ कर ी है; (v) अं र्मि+विह ढाँचा इस्लाविमक मूल की +हीं र्थीी; (vi) विववाविद ढाँचे की +ींव अं र्मि+विह ढाँचे की दीवारों पर विर्टकी हुई है; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) वास् ुकला क े र्टुकड़े सविह कलाक ृ ति याँ, Sो खुदाई क े दौरा+ प्राप्त हुए हैं वह अलग गैर-इस्लाविमक मूल का है। यद्यविप व्यविXग रूप से, क ु छ कलाक ृ ति यों का प्रयोग बौद्ध या Sै+ मूल की संरच+ा में भी विकया Sा सक ा र्थीा, लेविक+ अं र्मि+विह ढाँचे क े इस्लाविमक *ार्मिमक प्रक ृ ति हो+े का कोई प्रमार्ण +हीं है। एएसआई +े Sो वि+ष्कष: वि+काला है, वह यह है विक अं र्मि+विह ढाँचे की प्रक ृ ति और प्राविप्तयाँ Sो शैलीग आ*ार पर की गई हैं वह मंविदर संरच+ा क े अस्जिस् त्व को बारहवीं श ाब्दी में वापस ला+े का सुझाव दे ी है। यह वि+ष्कष: साक्ष्य द्वारा अ+ुसमर्भिर्थी + कहकर और संभाव+ाओं क े मा+क से परे कहकर रद्द +हीं विकया Sा सक ा Sो विक सिसविवल विवचारर्ण को शासिस कर ा है।

509. यह कह े हुए हमें वि+म्+खिलखिख क ै विवएर्ट क े सार्थी एएसआई की रिरपोर्ट: भी पढ़+ी चाविहए: (i) यद्यविप उत्ख++ से एक वृत्ताकार मंविदर क े अस्जिस् त्व का प ा चला है, हिंक ु कस्जिल्प रूप से सा वीं से +वीं श ाब्दी ए. र्डी. क एक णिशव मंविदर कक्ष है, हिंक ु अं र्मि+विह संरच+ा बारहवीं श ाब्दी ए. र्डी. से संबंति* है स् ंभों वाले वृत्ताकार मंविदर और स् ंभ क े आ*ार वाली आ*ारभू संरच+ा ी+ से पांच श ास्जिब्दयों क े बीच की दो णिभन्न समयावति* क े हैं. (ii) कोई विवणिशष्ट वि+ष्कष: +हीं है विक अं र्मि+विह संरच+ा भगवा+ राम को समर्मिप एक मंविदर र्थीा; और (iii) यह महत्वपूर्ण: है विक एएसाऐ +े इस बा पर विवशेष रूप से विवचार +हीं विकया है विक विववाविद संरच+ा क े वि+मा:र्ण क े खिलए एक मंविदर को ध्वस् विकया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गया र्थीा, हालांविक यह रिरपोर्ट: से उभरा है विक विववाविद संरच+ा का वि+मा:र्ण अं र्मि+विह संरच+ा की +ींव और साम£ी क े साइर्ट पर और उपयोग विकया गया र्थीा. विवध्वंस का अ+ुत्तरिर प्रश्न

510. एएसआई की रिरपोर्ट: की इस आ*ार पर आलोच+ा की गई है विक यह इस प्रश्न का उत्तर दे+े में विवफल रह ा है विक क्या विकसी मस्जिस्Sद क े विववाविद ढांचे का वि+मा:र्ण स्र्थील पर पूव: से मौSूद मंविदर क े विवध्वंस पर विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय +े न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल की वि+म्+खिलखिख विर्टप्पणिर्णयों में इ+ आपखित्त पर विवचार विकया: “3990. हमारे विवचार में, एएसआई +े यह स्पष्ट वि+ष्कष: दS: + करक े ठीक विकया है विक क्या कोई विवध्वंस हुआ र्थीा या +हीं Sबविक विकसी इमार का वि+मा:र्ण विकया गया और वह भी सैकड़ों साल पहले। यह प ा लगा+ा कभी-कभी मुस्जिश्कल हो सक ा है विक विक+ परिरस्जिस्र्थीति यों में भव+ का वि+मा:र्ण विकया गया और क्या पहले की इमार अप+े दम पर या प्राक ृ ति क शविXयों क े कारर्ण ढह गई र्थीी या इसक े +ुकसा+ क े खिलए इच्छ ु क कु छ व्यविXयों क े कारर्ण । एएसआई द्वारा इस बा का पया:प्त संक े विदया गया है विक विववाविद इमार की अप+ी आ*ारणिशला +हीं र्थीी, बस्जिल्क यह मौSूद दीवारों पर ब+ायी गयी र्थीी। यविद बाद की इमार क े वि+मा:र्ण से पहले कोई इमार मौSूद +हीं हो ी, ो ब+ा+े वाली इसकी ाक और +ई संरच+ा क े लोर्ड को वह+ कर+े की इसकी क्षम ा को Sा+े विब+ा पूव:व - इमार की +ींव का उपयोग + कर पा ा । विववाविद इमार की स ह पहले की इमार की स ह पर र्थीी। कई स् ंभ आ*ारों का अस्जिस् त्व सभी एक पया:प्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बड़ी संरच+ा क े पूव: अस्जिस् त्व को दशा: ा है, अगर विववाविद संरच+ा से बड़ी +हीं ो उससे कम भी +हीं। ” उच्च न्यायालय +े उल्लेख विकया विक विववाविद ढाँचे की स ह पूव: क े भव+ की स ह से ठीक ऊपर स्जिस्र्थी र्थीा। एएसआई की रिरपोर्ट: +े कहा है विक विववाविद ढाँचे की स्वयं की कोई +ींव +हीं र्थीी और इसे मौSूदा दीवारों पर उठाया गया र्थीा। इसक े अलावा, स् ंभ आ*ारों क े अस्जिस् त्व का उपयोग एक बड़े विववाविद ढाँचे को ब+ाए रख+े क े खिलए विकया गया है, सिSस पर विववाविद ढाँचे का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय +े एएसआई की अक्षम ा को एक विवणिशष्ट वि+ष्कष: में आ+े क े खिलए उतिच ठहराया विक क्या मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण क े खिलए हिंहदू *ार्मिमक मूल की एक पूव:व - ढाँचे को ध्वस् कर विदया गया र्थीा। उच्च न्यायालय +े उल्लेख विकया विक Sब कई सौ साल पहले एक संरच+ा का वि+मा:र्ण विकया गया हो ो यह विकसी भी वि+तिश्च ा क े सार्थी वि+ष्कष: वि+काल+ा मुस्जिश्कल है विक यह अं र्मि+विह ढाँचा सिSसकी +ींव पर विर्टकी हुई है वह प्राक ृ ति क कारर्णों से ध्वस् हो गई है अर्थीवा क्या मस्जिस्Sद क े ढाँचे को रास् ा दे+े क े खिलए ढाँचे को ध्वस् विकया गया र्थीा। यह संक े करेगा विक एक अं र्मि+विह ढाँचे क े खंर्डहरों का अस्जिस् त्व अप+े आप में यह अ+ुमा+ लगा+े का कारर्ण +हीं है विक एक +वी+ ढाँचे क े वि+मा:र्ण क े खिलए ढाँचे को ध्वस् कर विदया गया र्थीा Sो इसकी +ींव पर विर्टकी हुई है। एक विवशेषज्ञ वि+काय क े रूप में एएसआई एक विवणिशष्ट वि+ष्कष: को अणिभखिलखिख कर+े से परहेS कर ा है विक क्या मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े उद्देश्य से अं र्मि+विह ढाँचे को ध्वस् कर विदया गया र्थीा। यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मा+ े हुए विक कई सौ वष: बाद विवध्वंस क े संबं* में एक अ+ुमा+ लगाया Sा सक ा र्थीा विक एएसआई को स्पष्ट रूप से यह ब ा+े क े खिलए कोई साक्ष्य +हीं विमला विक मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण क े उद्देश्य से ढांचा विगराया गया र्थीा। एएसआई द्वारा प्रस् ु रिरपोर्ट: इस पहलू पर चुप है। इसखिलए, उच्च न्यायालय +े संक े विदया विक दो परिरकल्प+ाओं में से एक हो सक ा है: या ो यह विक प्राक ृ ति क शविXयों क े कारर्ण अं र्मि+विह ढाँचे का विवध्वंस हो गया र्थीा या इसक े विवध्वंस का कारर्ण इसकी +ींव पर एक मस्जिस्Sद ब+ा+े की प्रविक्रया क े विहस्से क े रूप में म+ुष्यों का हस् क्षेप र्थीा। यद्यविप, एएसआई +े विवणिशष्ट वि+ष्कष: दे+े का उपक्रम +हीं विकया और उच्च न्यायालय को यह लग ा है विक चूंविक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए त्काली+ ढांचे की +ींव का उपयोग विकया गया र्थीा इसखिलए मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर+े वाले को मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर े समय त्काली+ ढाँचे की प्रक ृ ति और उसकी +ींव क े विवषय में प ा हो ा। यद्यविप यह एक अ+ुमा+ है सिSसे उच्च न्यायालय द्वारा यह विवचार प्राप्त है विक यह एक विवणिशष्ट वि+ष्कष: +हीं है सिSसे एएसआई अप+ी रिरपोर्ट: क े दौरा+ वापस कर चुका है।

511. परिरर्णामस्वरूप, Sब एएसआई रिरपोर्ट: को इस वि+र्ण:य में इसक े स्पष्ट मूल्य क े संदभ: क े सं ुल+ में रखा Sाएगा ो न्यायालय क े खिलए यह महत्वपूर्ण: है विक वह रिरपोर्ट: में यह छा+बी+ करे विक क्या पाया गया है और क्या अ+ुत्तरिर छोड़ा गया है। एएसआई की रिरपोर्ट: में पूव: से मौSूद ढाँचे का अस्जिस् त्व पाया गया है। रिरपोर्ट: में स् ंभों की 17 पंविXयों (क ु ल 85 में से 50 पंविXयों को भागों या पूरे विहस्सों में ब ाया गया र्थीा) का अ+ुमा+ विकया गया है। यह रिरपोर्ट: स्र्थील पर पाए गए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वास् ुकला क े र्टुकड़े और ढाँचे की प्रक ृ ति क े आ*ार पर वि+ष्कष: वि+काल ी है विक यह एक हिंहदू *ार्मिमक मूल का र्थीा। रिरपोर्ट: में इस्लाविमक मूल क े अं र्मि+विह ढांचे की संभाव+ा (सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े कÂ द्वारा) को खारिरS विकया गया है। लेविक+ एएसआई की रिरपोर्ट: +े वि+द†श क े एक महत्वपूर्ण: विहस्से को अ+ुत्तरिर कर विदया है सिSससे इसे ब+ाया गया र्थीा, अर्थीा: ् इस बा का वि+*ा:रर्ण कर े हुए विक क्या मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी हिंहदू मंविदर को ध्वस् विकया गया र्थीा। एएसआई क े इस विबन्दु पर विवणिशष्ट वि+ष्कष: को प्रस् ु कर+े में असमर्थी: ा हो+ा वि+तिश्च रूप से एक महत्वपूर्ण: स्पष्ट परिरस्जिस्र्थीति है सिSसे अंति म विवश्लेषर्ण में संपूर्ण: साक्ष्यों क े संचयी प्रभाव को ध्या+ में रखा Sा+ा चाविहए।

512. एक अन्य पहलू है सिSसे इस स् र पर तिचवि- कर+े की आवश्यक ा है और सिSस पर विवचार विकया Sाएगा Sब प्रश्नग हक का मूल्यांक+ विकया Sा ा है। यह मुद्दा है विक क्या हक का वि+*ा:रर्ण एएसआई क े वि+ष्कषÂ क े आ*ार पर विर्टका हो सक ा है क्योंविक ये उसी पर आ*ारिर हैं। चाहे 1528 ईसवी (450 वष: पूव:) में एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण एक पूव:व - *ार्मिमक संरच+ा की +ींव पर (बारहवीं श ाब्दी क े ) हक क े प्रश्न पर एक वि+ष्कष: में परिरर्णाम हो सक ा है यह अलग बा है। इस स् र पर, यह ध्या+ रख+ा पया:प्त होगा विक एएसआई क े वि+द†श क े भी र हक का वि+*ा:रर्ण स्पष्ट रूप से +हीं र्थीा। यह एक ऐसा मामला है सिSस पर न्यायालय को इस वि+र्ण:य में बाद में हक क े मुद्दे क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सार्थी इससे संबंति* विवचार उद्देश्य औक वि+ष्कष: वि+काल+ की आवश्यक ा होगी।

513. वाद 5 में वादकारिरयों +े उन्नीस सातिक्षयों को प्रस् ु विकया। इ+ सातिक्षयों का एक व्यापक वग-करर्ण वि+म्+खिलखिख है:

I. थ्यों पर साक्षी: i. ओपीर्डब्ल्यू 1 महं परमहंस राम चंˆ दास ii ओपीर्डब्ल्यू 2 श्री देवकी +ंद+ अ£वाल iii ओपीर्डब्ल्यू 4 हरिरहर प्रसाद ति वारी iv ओपीर्डब्ल्यू 5 श्री राम +ार्थी विमश्रा उफ: ब+ारसी पंर्डा v ओपीर्डब्ल्यू 6 श्री हौसिसला प्रसाद वित्रपाठी vi. ओपीर्डब्ल्यू 7 राम सूर ति वारी vii ओपीर्डब्ल्यू 12 श्री कौशल विकशोर विमश्रा ix ओपीर्डब्ल्यू 13 +ारद सर+

II. विवष्र्णु हरिर उत्कीर्ण:+ों क े संबं* में साक्षी: i. ओपीर्डब्ल्यू 8 अशोक चंˆ चर्टSii ओपीर्डब्ल्यू 10 र्डॉ. क े. वी. रमेश iii ओपीर्डब्ल्यू 15 र्डॉ. एम. ए+. कट्टी

III. विवशेषज्ञ साक्षी-इति हासकार। i. ओपीर्डब्ल्यू 9 र्डॉ. र्टी. पी. वमा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ii ओपीर्डब्ल्यू 11 र्डॉ. स ीश चंˆ विमत्तल

V. विवशेषज्ञ साक्षी-पुरा त्ववेत्ता i. ओपीर्डब्ल्यू 3 र्डॉ. एस. पी. गुप्ता ii ओपीर्डब्ल्यू 14 र्डॉ. राक े श ति वारी iii ओपीर्डब्ल्यू 17 र्डॉ. आर. +ागास्वामी iv ओपीर्डब्ल्यू 18 श्री अरुर्ण क ु मार शमा: v ओपीर्डब्ल्यू 19 श्री राक े श दत्ता वित्रवेदी। विववाविद भव+ की प्रक ृ ति और उपयोग को वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए थ्य पर सातिक्षयों क े कर्थी+ों का विवश्लेषर्ण कर+े की आवश्यक ा है। सातिक्षयों +े भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े विवषय में अप+ी आस्र्थीा क े आ*ार पर भी बा कही है। विहन्दू साक्षी

514. महं परमहंस राम चंˆ दास (ओपीर्डब्ल्यू-1): महं परमहंस राम चंˆ दास +ब्बे वष: क े र्थीे और अखिखल भार ीय श्री पंच रामा+ंदी विदगंबर अ+ी अखाड़ा और विदगंबर अयोध्या अखाड़ा, बैठक क े महं र्थीे। साक्षी +े बया+ विदया विक वाल्मीविक रामायर्ण क े अ+ुसार, भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा। उ+क े अ+ुसार: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "वाल्मीविक रामायर्ण में वर्भिर्ण है विक राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा। अयोध्या का वर्ण:+ वेदों, उपवि+षदों, संविह ाओं और अठारह पुरार्णों, स्मृति यों में; और भर क े संस्क ृ साविहत्य की मान्य ा प्राप्त क ृ ति यों में विकया गया है। इ+ सब में अयोध्या को Sो आS भी विवद्यमा+ है, भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ मा+ा गया है। भगवा+ राम का Sन्म यहीं हुआ र्थीा। '' साक्षी +े कहा विक स्क ं द पुरार्ण में, अयोध्या क े महत्व से संबंति* एक अध्याय में भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ का संदभ: वि+विह है। उन्हों+े कहा विक ‘गभ: गृह’ विववाविद स्र्थील पर है Sहां उ+क े कर्थी+ क े समय राम लला की मूर्ति अस्जिस् त्व में र्थीी। साक्षी क े अ+ुसार चौदह से पंˆह वष: की आयु में घर छोड़+े क े बाद वे अयोध्या आए और ब से उन्हों+े राम Sन्मभूविम सविह कई स्र्थीा+ों पर दश:+ कर+े वाले लोगों को देखा। साक्षी क े अ+ुसार वष: 1934-1947 क े बीच, राम Sन्मभूविम में भगवा+ राम की पूSा क े रास् े में कोई बा*ा +हीं उत्पन्न की गई र्थीी और Sब से वह अयोध्या आए ब से उन्हों+े विववाविद परिरसर में +माS अदा हो े +हीं देखा र्थीा। उन्हों+े राम Sन्मभूविम क े अहा े में लोहे की छड़ से ब+े दरवाSे और वष: 1934 क े दंगों की बा कही। साक्षी +े कहा विक गुंबद क े +ीचे स् ंभों पर देवी-देव ाओं क े तिचत्र र्थीे, सिS+की पूSा की गई र्थीी। उस+े कहा विक 'मध्य गुंबद' क े +ीचे का स्र्थीा+ वह स्र्थीा+ है Sहां भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा और यह 'गभ:गृह' का प्रति वि+ति*त्व कर ा र्थीा। साक्षी +े *ार्मिमक £ंर्थीों में अयोध्या का महत्व दर्भिश विकया। उ+की ओर से बया+ दे े हुए, साक्षी +े कहा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “इस संबं* में, रामचरिर मा+स में यह वि+द†श है विक "उत्तर विदसिस बविह सरयू पाविव+ी (अर्थीा: उत्तर विदशा में सरयू +दी बह ी है)"। सरयू +दी क े स्र्थीा+ का यह प्रामाणिर्णक विववरर्ण है। रामायर्ण अर्थीा: रामचरिर मा+स में अयोध्या क े महत्व क े विवषय में कर्थी+ है विक "अव* पुरी मम पुरी सुहाववि+ (अव* का शहर मेरा विप्रय शहर है)" Sो स्पष्ट कर ा है विक अयोध्या राम का Sन्मस्र्थीा+ है। यहां यह भी उल्लेख विकया गया है विक यहां रह+े वाले लोग मुझे बहु विप्रय हैं। सिSस स्र्थीा+ पर कोई व्यविX Sन्म ले ा है उसे उसका Sन्मस्र्थीा+ कह े हैं। वाल्मीविक रामायर्ण में यह भी उल्लेख विकया गया है विक मेरा Sन्मभूविम लंका से भी अति*क विप्रय है Sो विक स्वर्ण: से ब+ा है, क्योंविक Sन्म का स्र्थीा+ स्वग: से भी श्रेष्ठ हो ा है।" पु+ः साक्षी क े अ+ुसार: "राम Sन्मभूविम स्र्थील क े प्रति संपूर्ण: विवश्व क े हिंहदुओं का विवश्वास काबा क े प्रति मुस्जिस्लमों क े विवश्वास क े समा+ है। संपूर्ण: विवश्व में क े वल एक राम Sन्मभूविम मंविदर है Sबविक भगवा+ राम क े हSारों मंविदर हैं।" अप+े परीक्षा क े अ+ुक्रम क े दौरा+ साक्षी को विववाविद स्र्थील से संबंति* काले और सफ े द और रंगी+ स्वीरों वाला एक एल्बम विदखाया गया र्थीा। उन्हों+े सिंसह और मोर और भगवा+ गर्णेश, भगवा+ शंकर और +ंदी क े तिचत्रों की पहचा+ की। "विववाविद स्र्थील क े बारे में ओओएस 4/1989 में दS: और उत्तर प्रदेश क े पुरा त्व विवभाग द्वारा ैयार विकए गए काले और सफ े द तिचत्रों क े एलबम का तिचत्र संख्या 20 साक्षी को विदखाया गया। साक्षी +े तिचत्र देख+े क े बाद कहा विक द्वार क े ऊपरी विहस्से क े दो+ों रफ एक शेर का तिच र है। ब रंगी+ एल्बम संख्या 37 से 42 क े तिचत्र को पु+ः साक्षी को विदखाया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसे देख+े क े बाद, साक्षी +े कहा विक उत्तरी द्वार पर मोर का तिचत्र ब+ाया गया है। साक्षी को रंगी+ एल्बम का तिचत्र संख्या 58 विदखाया गया र्थीा। इसे देख+े क े बाद, साक्षी +े कहा विक यह गुफा मंविदर क े विवषय में है। इ+ तिचत्रों में दर्भिश है विक गर्णेश और शंकर की मूर्ति यों को चबू रे क े पूव- - दतिक्षर्णी को+े में स्र्थीाविप की गई हैं। उपरोX तिचत्रों में +ंदी और भगवा+ शंकर की स्वीर भी शाविमल है। तिचत्र सं. 61 रंगी+ एल्बम को देख+े क े बाद साक्षी +े कहा विक यह ऊपर उसिल्लखिख देव ाओं क े तिचत्र है।" साक्षी +े *ारा 145 क े ह क ु क— क े बाद आयुX द्वारा की गई सूची और रामचबू रा (बाह्य अहा े में) सविह पदतिच-ों और पूSा क े अन्य स्रो ों की मौSूदगी को दशा:या। साक्षी क े अ+ुसार वष: 1934 क े बाद विकसी भी मुस्जिस्लम +े मस्जिस्Sद में +माS अदा +हीं की र्थीी। उ+क े आस्र्थीा और विवश्वास क े विवषय में बोल े हुए साक्षी +े कहा: "भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ हो+े क े +ा े इसमें मेरी आस्र्थीा और विवश्वास है।" एक मूर्ति की प्रार्णप्रति ष्ठा से Sुड़े समारोह क े विवषय में बोल े हुए साक्षी +े कहा विक कम से कम 24 घंर्टे और अति*क म 3 विद+ समारोह क े खिलए समर्मिप हैं। श्री साक्षी +े विद+ांक 17 S+वरी 2000 को अप+ी सिSरह क े दौरा+ सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े खिलए प्रस् ु विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा श्री Sफरयाब सिSला+ी द्वारा कहा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "मैं पहली बार वष: 1934 में अयोध्या आया र्थीा, मैं हर विद+ राम Sन्मभूविम (विववाविद स्र्थील) Sा ा रहा र्थीा। उस समय मैं विववाविद स्र्थीा+ (भव+) क े उस विहस्से में Sा ा र्थीा Sहाँ स् ंभ स्र्थीाविप विकए गए र्थीे। पूव- द्वार पर दो स् ंभ स्र्थीाविप विकये गए र्थीे। मैं उ+का 'दश:+' भी कर ा र्थीा। देव ाओं की मूर्ति यों को उ+ स् ंभों पर प्रति स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। मुख्य भव+ में काले पत्र्थीर क े दो स् ंभ स्र्थीाविप विकये गए र्थीे। स्वयंसेवक: देव ाओं की स्वीरें उस पर उत्कीर्ण: र्थीीं। पूव- द्वार क े दो स् ंभों में से एक में ह+ुमा+Sी की मूर्ति र्थीी और दूसरी मूर्ति खंतिर्ड र्थीी Sो विकसी देव ा या देवी की भी र्थीी। मुख्य द्वार क े बाद लोहे की छड़ की एक दीवार र्थीी और उसक े बाद मुख्य भव+ में ी+ द्वार र्थीे और ी+ों द्वारों में काले पत्र्थीरों क े स् म्भ स्र्थीाविप विकये गए र्थीे।" साक्षी +े काले कसौर्टी पत्र्थीरों क े स् ंभों क े स्र्थीा+ और उ+ पर हिंहदू देवी- देव ाओं क े तिचत्र की ओर इशारा विकया: "प्रश्नः-अंदर स्र्थीाविप काले पत्र्थीरों क े स् ंभ का स्र्थीा+ क्या र्थीा? उत्तर:-प्रत्येक द्वार में चार स् ंभ र्थीे। दतिक्षर्णी द्वार में चार स् ंभों पर देवी-देव ाओं की मूर्ति यां स्र्थीाविप र्थीीं। उ+में से क ु छ स्पष्ट र्थीे और क ु छ +हीं र्थीे। मैं यह +हीं कह सक ा विक दतिक्षर्णी द्वार या विकसी अन्य द्वार पर देवी या देव ा की मूर्ति उत्कीर्भिर्ण की गई र्थीी। वष: 1934 से पूव: मैं रामचबू रा क े बाद मध्य 'णिशखर' क े अं ग: गभ: गृह का 'दश:+' कर ा र्थीा। इसक े अलावा, मैं स् ंभों पर उत्कीर्ण: की गई मूर्ति यों क े दश:+ कर ा र्थीा और ' ुलसी' क े पत्ते चढ़ा ा र्थीा।" साक्षी +े 'गभ: गृह' और बाह्य मंच क े बीच अं र विकया: "प्रश्न:-विववाविद भव+ और उसक े बाह्य मंच क े अति रिरX क्या आप इससे सर्टी हुई भूविम को 'गभ: गृह' मा+ े हैं। अन्य मंच से मेरा म लब विववाविद भव+ क े बाह्य मंच से है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उत्तर:-'गभ: गृह' वह स्र्थीा+ है Sहां व:मा+ में राम लला विवराSमा+ है। बाह्य मंच विववाविद स्र्थील क े बाहर है।” साक्षी क े अ+ुसार, 'गभ: गृह' भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ का प्रति वि+ति*त्व कर ा र्थीा और यह वह स्र्थीा+ र्थीा Sहाँ विद+ांक 23 विदसंबर 1949 को मूर्ति को चबू रे से हर्टा+े क े बाद स्र्थीाविप विकया गया र्थीा: "मेरे विवश्वास और सभी हिंहदुओं क े विवश्वास क े अ+ुसार, रामचन्ˆ Sी क े Sन्म स्र्थीा+ का वह स्र्थीा+ सिSसे मैं 'गभ: गृह' कह ा हूं। मैं उस स्र्थीा+ को Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में विवचार कर ा हूं Sहां विद+ांक 23 विदसंबर 1949 को मूर्ति को चबू रे से हर्टा+े क े बाद स्र्थीाविप विकया गया र्थीा और मैं उस स्र्थीा+ पर मूर्ति की स्र्थीाप+ा से पूव: Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में विवचार कर ा र्थीा। प्रश्न:-क्या वह स्र्थीा+, सिSसे आप अप+े विवश्वास क े अ+ुसार Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में वर्भिर्ण कर े हैं, मध्य गुंबद क े स्र्थीा+ क े दो+ों ओर 10-15 हार्थी दूर हो सक े हैं? उत्तर:-+हीं। सिSस स्र्थीा+ पर मूर्ति स्र्थीाविप है वह प्रामाणिर्णक स्र्थीा+ है और संपूर्ण: हिंहदू समुदाय उसी स्र्थीा+ पर विवश्वास कर ा है। इसमें कोई संदेह +हीं है। इस स्र्थीा+ में दो-चार फीर्ट की दूरी भी +हीं हो सक ी है। इस विवश्वास का आ*ार यह है विक सविदयों से हिंहदुओं को इस स्र्थीा+ का 'दश:+' हो ा रहा है।" यद्यविप साक्षी से यह उत्तर प्राप्त कर+े का प्रयास विकया गया विक क्या Sन्म - स्र्थीा+ मध्य गुंबद से र्थीोड़ी दूरी पर स्जिस्र्थी हो सक ा है, उन्हों+े विवशेष रूप mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA से +कारात्मक में उस प्रश्न का उत्तर विदया। ओपीर्डब्ल्यू-1 क े साक्ष्य से Sो विवशेष ाएं साम+े आ ी हैं, वे इस प्रकार हैं: (i) साक्षी अयोध्या में 14 या 15 वष: की आयु से एक श ाब्दी क े ी+ चौर्थीाई से अति*क रहा र्थीा। (ii) साक्षी +े अप+ी आस्र्थीा और विवश्वास क े विवषय में कहा है विक मध्य गुंबद क े अ*ी+ "गभ: गृह" उस स्र्थीा+ का प्रति वि+ति*त्व कर ा है Sहां भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा (iii) साक्षी +े भXों द्वारा पूSा की बा कही; (iv) लोहे की रेलिंलग की मौSूदगी को स्वीकार विकया गया; और (v) साक्षी +े विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 को मूर्ति यों क े स्र्थीा+ां रर्ण की ओर संक े विकया र्थीा।

515. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े इस न्यायालय का ध्या+ क ु छ विवरो*ाभासों की ओर आकर्मिष कर+े की मांग की है सिSन्हें प्रति परीक्षा क े दौरा+ स्पष्ट विकया गया र्थीा और सिSन्हें +ीचे सूचीबद्ध विकया गया है: "क) विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 को भगवा+ राम की एक मूर्ति सुबह क े प्रारस्जिम्भक घंर्टों में विदखाई दी। इस आश्चय:S+क विवकास क े बाद, रामचबू रे पर स्र्थीाविप मूर्ति को हर्टा विदया गया और 'गभ: गृह' में स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ख) रामSन्मभूविम में क े वल रामलला की मूर्ति स्र्थीाविप की गई र्थीी...यह कर्थी+ कई अन्य सातिक्षयों द्वारा विदए गए बया+ में विवरो*ाभासी है सिSन्हों+े कहा है विक कोई अन्य मूर्ति भी स्र्थीाविप की गई र्थीी। (ग) Sब वह विगरा र्थीा, ो शीष: क े +ीचे रामलला की मूर्ति +हीं र्थीी। इससे प ा चल ा है विक विववाविद ढाँचे का विवध्वंस Sो मा++ीय न्यायालय द्वारा पारिर आदेश का पूर्ण: उल्लंघ+ र्थीा, वह विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को अपविवत्र काय: की रह पूव: वि+योसिS भी र्थीा। (घ) प्रर्थीम कर्थी+ क े अ+ुसार सम्पूर्ण: परिरक्रमा 'गभ: गृह' क े अ*ी+ र्थीी और बाद क े कर्थी+ में परिरक्रमा बाहरी रफ र्थीी।" ये विवरो*ाभास उ+ पहलुओं पर साक्ष्य क े मूल को प्रस् ु +हीं कर े हैं सिSन्हें अविवश्वस+ीय ा पर तिचन्हांविक विकया गया है। साक्षी +ब्बे वष: की आयु का र्थीा Sब वह पदच्यु हो गया र्थीा और सा दशकों से विववाविद स्र्थील क े सार्थी Sुड़ा हुआ र्थीा। उ+क े साक्ष्य, भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े संबं* में हिंहदुओं की आस्र्थीा और विवश्वास क े संबं* में, मध्य गुंबद क े +ीचे उस स्र्थीा+ से Sुड़ी पविवत्र ा और भXों द्वारा पूSा क े चढ़ावे, उसकी गवाही क े महत्वपूर्ण: पहलू हैं।

516. श्री देवकी +ंद+ अ£वाल (ओपीर्डब्ल्यू-2): श्री देवकी +ंद+ अ£वाल की आयु अस्सी वष: र्थीी Sब उ+की मुख्य परीक्षा विद+ांक 16 से 18 Sू+ 2001 क े बीच अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा। साक्षी वाद 5 में ीसरी वादी र्थीी सिSस+े देव ाओं क े वाद विमत्र क े रूप में वाद विकया र्थीा। साक्षी की मृत्यु पर साक्ष की सिSरह पूर्ण: +हीं हो सकी, परन् ु विफर भी र्डॉ. *व+ +े कहा विक वह साक्षी क े साक्ष्य पर अवलम्ब रख+े का हकदार है। र्डॉ. *व+ +े विवशेष रूप से विवश्व हिंहदू परिरषद और राम Sन्मभूविम न्यास क े बीच क े संबं* में ओपीर्डब्ल्यू mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2 क े कर्थी+ का उल्लेख विकया है। इसक े अलावा, मूर्ति यों क े स्र्थीा+ां रर्ण क े संबं* में, र्डॉ. *व+ +े अप+े कÂ में साक्षी क े साक्ष्य से संबंति* वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर प्रकाश र्डाला: “i. रामलला का विव£ह एक झूले में बैठा हुआ र्थीा और रामचबू रे पर स्र्थीाविप र्थीा। यह विव£ह चलायमा+ र्थीा और इसखिलए भXों की इच्छाओं क े अ+ुसार यह राम चबू रे से स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया और क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे स्र्थीाविप विकया गया। ii. विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 क मूर्ति याँ विववाविद भव+ क े अंदर +हीं र्थीीं। ii. चबू रे पर रामलला की एक मूर्ति र्थीी सिSसे बाद में विववाविद स्र्थील पर गुंबद क े +ीचे रखा गया र्थीा।" उपरोX पहलुओं क े अलावा, र्डॉ. *व+ +े वि+म्+ पर अवलम्ब+ खिलया: (i) साक्षी की यह स्वीक ृ ति विक उस+े मूर्ति यों की पूSा +हीं की और उसक े भव+ में पूSा का स्र्थीा+ +हीं र्थीा। (ii) साक्षी की मूर्ति का +ाम ब ा+े में असमर्थी: ा अर्थीवा वष: 1984-85 में उस+े विक +ी बार दश:+ प्राप्त विकया र्थीा; (iii) साक्षी क े कर्थी+ क े संबं* में उसका विवश्वास है विक 'गभ: गृह' उस स्र्थीा+ पर स्जिस्र्थी र्थीा Sहां मंविदर को ध्वस् कर विदया गया र्थीा, अ+ुश्रुति र्थीी; और (iv) उत्तरी विदशा में Sन्मभूविम मंविदर अर्थीवा उस विववाविद स्र्थील क े साक्षी का संदभ: Sो विब्रविर्टश प्रशास+ द्वारा एक सड़क क े वि+मा:र्ण पर बँर्टवारा विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साक्षी क े प्रत्यय पत्र को चु+ौ ी

517. ओपीर्डब्ल्यू 2 Sो वाद 5 में ीसरा वादी है +े वादपत्र में कहा है विक वह एक वैष्र्णव है। अप+े मुख्य परीक्षा क े क्रम में उन्हों+े दोहराया विक वह एक वैष्र्णव और एक हिंहदू है और वह वाद 5 में पहले और दूसरे वादी क े वाद विमत्र क े रूप में मुकदमा कर रहे र्थीे, सिSसमें कोई व्यविXग या वि+विह स्वार्थी: +हीं र्थीा, लेविक+ देव ा की सेवा का अाशय र्थीा। उस+े कहा विक वष: 1932- 1934 क े दौरा+ Sब भी वह अप+ी मा ा क े सार्थी विववाविद स्र्थीा+ पर गया उन्हों+े रामचबू रे में भगवा+ राम क े मूर्ति की पूSा देखी र्थीी। उसक े अ+ुसार, विववाविद ढाँचे क े अंदर भगवा+ राम की एक स्वीर र्थीी और पुSारी +े उपासकों से फ ू ल और मालाएं लीं और उन्हें दूर से चढ़ाया। उस+े द्वार पर और विववाविद ढाँचे क े अंदर पत्र्थीर क े स् म्भ का उल्लेख विकया। हालाँविक, उ+क े अ+ुसार विववाविद ढाँचे क े आं रिरक परिरसर में द्वार पर लगाये गए ाले क े परिरर्णामस्वरूप, पुखिलस +े उपासक को प्रवेश कर+े की अ+ुमति +हीं दी और पूSा द्वार क े बाहर से की गई: ''विववाविद ढाँचे क े द्वार पर कसौर्टी क े दो स् ंभ र्थीे सिS+का उपयोग मंविदर को ध्वस् कर+े क े बाद इसक े वि+मा:र्ण क े खिलए विकया गया र्थीा Sो पहले वहां मौSूद र्थीी। ढाँचे क े अन्दर भी दो समा+ स् ंभ र्थीे सिSन्हें दूर से देखा Sा सक ा र्थीा। लेविक+ विववाविद ढाँचे क े आं रिरक परिरसर क े द्वार पर दो ाले लगाये गए र्थीे सिSसकी वSह से पुखिलस विकसी को अंदर Sा+े की अ+ुमति +हीं दे े र्थीे और अंदर विवराSमा+ भगवा+ श्री रामलला की पूSा इत्याविद +हीं कर+े देे े र्थीे यह दरवाSे क े बाहर से की Sा ी र्थीी और लगा ार सस्वर पाठ और भगवा+ क े +ाम का Sाप बाहरी परिरसर में विकया Sा रहा र्थीा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साक्षी +े स्पष्ट रूप से यह स्वीकार विकया है विक आं रिरक परिरसर क े द्वार पर ाले लगाए Sा+े क े बाद, हिंहदू भXों +े बाहर से पूSा की क्योंविक पुखिलस +े आं रिरक अहा े में Sा+े की अ+ुमति +हीं दी र्थीी।

518. र्डा. *व+ साक्षी को ऐसे व्यविX क े रूप में महत्व + दे+े का प्रयास कर रहे हैं Sो उपासक +हीं र्थीा और ओपीर्डब्ल्यू 2 की प्रति -परीक्षा से उत्पन्न +हीं हुआ है। उसकी प्रति -परीक्षा क े दौरा+ उन्हों+े कहा विक वष: 1940 से 1952 क े बीच उस+े ई ंर्ट भट्ठे का व्यवसाय विकया और अप+ी पढ़ाई कर े हुए एक ठेक े दार क े रूप में काम विकया र्थीा। साक्षी पया:प्त रूप से यह ब ा+े क े खिलए स्पष्ट र्थीा विक सिSस समय वह व्यवसाय कर रहा र्थीा उसक े पास *म: में रुतिच ले+े का समय +हीं र्थीा और उस+े विकसी मूर्ति की पूSा +हीं की। हालांविक, उस+े *ार्मिमक त्योहारों क े अवसर पर हिंहदू *ार्मिमक देव ाओं की पूSा की बा कही। प्रति -परीक्षा क े इस भाग को विवति*क व्यवसाय में प्रवेश कर+े से पूव: साक्षी क े Sीव+ क े एक विवशेष चरर्ण क े संदभ: में पढ़ा Sा+ा चाविहए। प्रति -परीक्षा क े दौरा+ स्पष्ट विकये गए उत्तरों से यह अ+ुमा+ लगा+ा अ+ुतिच होगा विक साक्षी भगवा+ राम का भX अर्थीवा उपासक +हीं र्थीा। वाद में अणिभकर्थी+ और उसक े साक्ष्य, देव ा भगवा+ राम में वास् विवक विह बद्ध व्यविX क े रूप में साक्षी की व्यविXग विवश्वस+ीय ा को स्र्थीाविप कर े हैं।

519. हरिरहर प्रसाद ति वारी (ओपीर्डब्ल्यू-4): हरिरहर प्रसाद ति वारी विद+ांक 1 अगस्, 2002 को अप+ी मुख्य-परीक्षा की ति णिर्थी पर पचासी वष: क े र्थीे। उ+का Sन्म वष: 1917 में हुआ र्थीा और वे वष: 1938 में अयोध्या आए Sहां mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उन्हों+े चार वष: क आयुव†द का अध्यय+ विकया। साक्षी +े कहा विक वह राम Sन्मभूविम मंविदर Sाया कर ा र्थीा। साक्षी को वादकारिरयों द्वारा मुख्य रूप से वाद 5 में इस विवश्वास क े समर्थी:+ पर अवलम्ब खिलया गया है विक विववाविद स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ र्थीा। अप+ी मुख्य परीक्षा क े दौरा+ उन्हों+े कहा: "अयोध्या हिंहदुओं की एक प्राची+ और पविवत्र ीर्थी:स्र्थील है Sहां परब्रह्म परमेश्वर भगवा+ विवष्र्णु +े राSा दशरर्थी क े पुत्र श्री राम क े रूप में अव ार खिलया र्थीा। विहन्दू *म: क े अ+ुयातिययों की आस्र्थीा अ+ाविद काल से है विक भगवा+ विवष्र्णु +े अयोध्या में भगवा+ श्री राम क े रूप में अव ार खिलया र्थीा। यह स्र्थीा+ पूSा योग्य है। इसी आस्र्थीा और विवश्वास क े कारर्ण लोग श्री राम Sन्मभूविम क े दश:+ और परिरक्रमा क े खिलए आ े र्थीे। मेरे अध्यय+ क े दौरा+ वष: 1934 से 1938 क मेरे परिरवार क े सदस्यों, मेरे दादा और बुSुग: लोग, अयोध्या क े सं और संन्यासी यह कह े र्थीे विक भगवा+ विवष्र्णु +े इस स्र्थीा+ पर भगवा+ श्री राम का अव ार खिलया र्थीा और यही श्री राम Sन्मभूविम है। इसी आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर मैं दश:+ क े खिलए श्री रामSन्म भूविम Sा रहा हूं। अप+ा अध्यय+ पूर्ण: कर+े क े बाद Sब भी मैं अयोध्या आ ा र्थीा ो वहाँ दश:+ क े खिलए अवश्य Sा ा। मैं ज्यादा र विपछले 8-9 वषÂ से सु£ीव विकला, राम कोर्ट, अयोध्या में रह ा र्थीा और आम ौर पर दश:+ क े खिलए राम Sन्मभूविम Sा ा र्थीा।" साक्षी +े दो द्वारों-ह+ुम द्वार और सिंसह द्वार क े माध्यम से बाह्य अहा े में प्रवेश कर+े की बा कही है सिSसक े अंदर सी ा रसोई, रामचबू रा और भंर्डार उपस्जिस्र्थी र्थीे। उन्हों+े विवशेष रूप से चैत्र राम+वमी और अन्य *ार्मिमक त्योहारों क े अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं क े आ+े और सैकड़ों भXों द्वारा रोSा+ा परिरक्रमा विकए Sा+े का उल्लेख विकया है। साक्षी +े कहा विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उस+े विववाविद स्र्थील क े अंदर विकसी भी मुस्जिस्लम द्वारा +माS अदा कर े कभी +हीं देखा र्थीा। साक्षी +े कहा: "वष: 1934-38 क े दौरा+ मैं अक्सर भगवा+ राम क े दश:+ क े खिलए विववाविद स्र्थील गया। विववाविद स्र्थील पर भव+ क े अंदर भगवा+ राम की कोई मूर्ति +हीं र्थीी परन् ु उ+का तिचत्र एक दीवार पर र्टाँग दी गई र्थीी Sो द्वार क े बाहर से विदखाई दे रही र्थीी। द्वार पर ाला लगा र्थीा इसखिलए मैं+े उस तिचत्र को बाहर से देखा र्थीा।" इस प्रकार साक्षी +े स्वीकार विकया है विक हिंहदू भXों क े द्वारा आं रिरक अहा े क े बंद द्वार क े बाहर से पूSा की गई र्थीी। साक्षी +े वष: 1934 से 1938 क े बीच बाह्य अहा े में पूSा की बा कही: ''परिरसर क े उत्तरी विदशा की ओर एक दरवाSा र्थीा। इस दरवाSे को सिंसह द्वार कहा Sा ा र्थीा। सिंसह द्वार क े अंदर Sा े हुए बाई ं ओर एक मंच पर चौका, बेल+, चूल्हा और पदतिचन्ह (पैर क े वि+शा+) आविद र्थीे और पदतिचन्ह चार Sोड़े में र्थीे। विवश्वास क े अ+ुसार ये पदतिचन्ह राम, लक्ष्मर्ण, भर और शत्रुघ्+ क े र्थीे। उपरोX सभी चीSें वष: 1934 से 38 क े दौरा+ चबू रे पर मौSूद र्थीीं। चबू रे में भी पुSारी पूSा विकया कर े र्थीे। पहले ो पुSारिरयों +े राम मंविदर चबू रे पर पूSा की और विफर पूSा क े खिलए उपरोX चबू रे पर गए।" गभ:गृह क े रूप में वर्भिर्ण दरवाSों को वष: 1934-1938 में बंद हो+ा ब ाया गया र्थीा। साक्षी क े अ+ुसार गभ:गृह क े बाहर पूSा की गई र्थीी। अप+ी *ार्मिमक आस्र्थीा क े आ*ार पर साक्षी +े कहा विक यह विकसी *ार्मिमक £ंर्थी पर आ*ारिर +हीं है अविप ु उस+े भगवा+ राम क े Sन्मभूविम क े विवषय में “विकसी वृद्ध व्यविX से” सु+ा है। यह ओपीर्डब्ल्यू 4 की आस्र्थीा और विवश्वास की वास् विवक ा को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA महत्व + दे+े का कोई कारर्ण +हीं है। उन्हों+े विवशेष रूप Sन्मभूविम Sाकर पूSा कर+े की वि+यविम ा क े विवषय में ब ाया और उ+क े साक्ष्य क े इस पहलू को छ ु आ +हीं गया है। साक्षी +े स्पष्ट रूप से कहा विक वह विववाविद भव+ क े अंदर +हीं गया र्थीा क्योंविक यह बंद र्थीा और वष: 1938 क े बाद प्रवेश वि+विषद्ध र्थीा इसखिलए दश:+ की व्यवस्र्थीा चबू रे में की गई र्थीी।

520. श्री राम +ार्थी विमश्र उफ: ब+ारसी पंर्डा (ओपीर्डब्ल्यू-5): विद+ां 6 अगस् 2002 को, Sब साक्षी की मुख्य परीक्षा अणिभखिलखिख की गई र्थीी ब वह +ब्बे वष: का र्थीा। उस+े कहा विक उसकी शादी पंतिर्ड रामकृ ष्र्ण उपाध्याय की पुत्री से हुई र्थीी Sो एक प्रति विष्ठ " ीर्थी:-पुरोविह " र्थीे। उन्हों+े अप+े विववाह क े बाद से परिरक्रमा कर+े और राम Sन्मभूविम पर पूSा कर+े क े विवषय में ब ाया। वष: 1932 से वह अप+ी पत्+ी क े सार्थी अयोध्या आए और अप+े ससुर द्वारा विकए गए काय: का प्रबं*+ और देखभाल कर+ा प्रारम्भ कर विदया, सिSसमें लगभग सौ घार्ट उ+क े स्वाविमत्व में शाविमल र्थीे। साक्षी +े कहा विक चैत्र राम +वमी पर भगवा+ राम क े लगभग 10 से 15 लाख भX अयोध्या आए और सरयू +दी में स्+ा+ कर+े क े बाद राम Sन्मभूविम, क+क भव+ और ह+ुमा+ गढ़ी का दश:+ कर+े क े खिलए रवा+ा हुए। उन्हों+े कहा विक हSारों भX Sन्मभूविम में दश:+ पा+े क े खिलए गांवों से आए र्थीे। साक्षी +े कहा विक ब्रह्मपुरार्ण, स्क ं द पुरार्ण और वराहपुरार्ण में अयोध्या का महत्व ब ाया गया है। ओपीर्डब्ल्यू-5 की परीक्षा क े क ु छ मुख्य पहलू इस प्रकार हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) साक्षी +े सिSसे राम Sन्मभूविम परिरसर का वर्ण:+ विकया है उसमें प्रवेश कर+े क े खिलए दो द्वारों को संदर्भिभ विकया। पहला पूव- विदशा में ह+ुम द्वार र्थीा और दूसरा उत्तरी विदशा में सिंसह द्वार। (ii) ह+ुम द्वार क े द्वार क े दो+ों विक+ारों पर फ ू लों, पत्तों और देव ाओं क े तिचत्र सविह काले पत्र्थीर क े स् ंभ र्थीे। इसी प्रकार, सिंसह द्वार क े ऊपर दो+ों ओर सिंसहों क े बगल में एक 'गरूर्ण' का तिचत्र र्थीा। (iii) ह+ुम द्वार +ामक मुख्य द्वार से प्रवेश कर+े पर दतिक्षर्णी विदशा में एक चबू रा र्थीा, सिSसे रामचबू रा कहा Sा ा र्थीा सिSस पर भगवा+ राम और उ+से संबंति* मूर्ति याँ र्थीीं। रामचबू रे क े दतिक्षर्ण-पूव- को+े पर भगवा+ गर्णेश, भगवा+ शंकर और अन्य देव ाओं सविह एक पीपल क े पेड़ क े +ीचे मूर्ति याँ र्थीीं। उत्तरी विदशा में मुख्य द्वार क े अंदर एक फ ू स का बाड़ा र्थीा सिSसे भंर्डार या स्र्टोर क े रूप में Sा+ा Sा ा र्थीा सिSसमें सं£ह कर+े की व्यवस्र्थीा र्थीी। (iv) रामचबू रे क े पतिश्चम की ओर वि£ल-ई ंर्ट की दीवार क े अंदर सिSसे उन्हों+े "गभ: गृह" मंविदर क े रूप में वर्भिर्ण विकया र्थीा सिSसमें ी+ गुंबद र्थीे और यह विवश्वास का विवषय है विक क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे का स्र्थीा+ भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ र्थीा। साक्षी और अन्य हिंहदू भXों +े उस स्र्थील पर राम Sन्मभूविम क े दश:+ की माँग की सिSसे अति पविवत्र मा+ा Sा ा र्थीा। (v) उसी परिरसर क े भी र सी ा रासोई स्जिस्र्थी र्थीी सिSसमें चौका-बेल+, चूल्हा और पदतिचन्ह र्थीे; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vi) गुम्बदाकार ढाँचे क े अन्दर काले पत्र्थीर क े स् ंभ र्थीे सिS+में फ ू लों, पत्तों और देव ाओं क े तिचत्र र्थीे। वष: 1928-1949 क े बीच, उस+े 'गभ: गृह' क े अंदर भगवा+ राम का तिचत्र लगी हुई देखी और दावा विकया विक उस+े वष: 1949 क भगवा+ राम की मूर्ति को देखा र्थीा; (vii) वि£ल-ई ंर्ट की दीवार में दो दरवाSे र्थीे Sो बंद विकए गये र्थीे और सिSसे वि+म ही अखाड़े क े पुSारिरयों द्वारा खोले गए र्थीे। श्रद्धालुओं क े खिलए 'गभ: गृह' क े दश:+ की व्यवस्र्थीा रेलिंलग से की गई र्थीी Sहां दा+ पेर्टी रखी गई र्थीी; (viii) साक्षी की प्रति परीक्षा क े दौरा+ 'गभ: गृह' में पूSा क े खिलए बोल े हुए वि+म्+खिलखिख उत्तर विदए गए र्थीे: " 'गभ: गृह' में प्रवेश क े खिलए दीवार में दो दरवाSे र्थीे। ी+ णिशखरों क े +ीचे कसौर्टी क े स् म्भ र्थीे। ये स् ंभ ह+ुम द्वार क े पाश्व: वाले स् ंभों क े समा+ र्थीे। 'गभ: गृह' में अ+ुमावि+ 7"-8" ऊ ं चाई पर काले पत्र्थीर से ब+ी मूर्ति र्थीी। मूर्ति काले पत्र्थीर से वि+र्मिम र्थीी। यह कह+ा मुस्जिश्कल है विक क्या यह कसौर्टी से ब+ाया गया र्थीा अर्थीवा +हीं, क्योंविक हम इसे बाहर से देख े र्थीे। यह एक पत्र्थीर में भगवा+ राम और सी ा की मूर्ति र्थीी। इसक े अलावा मुझे स्मरर्ण +हीं है विक क्या वहाँ भगवा+ साखिल£ाम र्थीे अर्थीवा +हीं क्योंविक मैं इसे बाहर से देख ा र्थीा और यह बंद रह ा र्थीा। मैं+े रामभX ह+ुमा+ Sी को या मूर्ति को अंदर +हीं देखा र्थीा। ाले की चाबी वि+म ही अखाड़े क े व्यविXयों क े कब्Sे में हो ी र्थीी और सिSसे पुSारिरयों द्वारा खोला और बंद विकया Sा ा र्थीा और आर ी पूSा कर+े क े खिलए विबगुल और घंर्टी की ध्ववि+ की Sा ी र्थीी। Sब भी मैं वहां Sा ा र्थीा ो भX क े वल बाहर से ही चढ़ावा चढ़ा े र्थीे और 'प्रसाद' स्वीकार कर े र्थीे। वे अंदर +हीं Sा े र्थीे। वष: 1932 से 1949 क मैं+े चीSों को इसी रह देखा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sैसा विक पहले +ोविर्टस विकया गया र्थीा, ओपीर्डब्ल्यू-5 +े आं रिरक परिरसर क े द्वार पर ाले का उल्लेख विकया। ओपीर्डब्ल्यू-5 +े बाहर से की Sा रही पूSा का भी उल्लेख विकया, लेविक+ उसक े अ+ुसार चाविबयां वि+म ही अखाड़ा क े पास र्थीी। (ix) श्री Sफरयाब सिSला+ी द्वारा उसकी प्रति परीक्षा क े दौरा+, साक्षी +े ी+ प्रकार क े परिरक्रमा क े विवषय में ब ाया: (क) चौदह कोसी; (ख) पांच कोसी; और (ग) अन् £ा:ही (x) पु+ः श्री सिSला+ी द्वारा प्रति -परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े कहा: ''विववाविद परिरसर में मैं ी+ स्र्थीा+ों पर दश:+ विकया कर ा र्थीा -पहले बाई ं ओर चबू रे में, विफर बाहर की रेलिंलग से गुंबदाकार (णिशखर वाले) 'गभ: गृह' में और विफर उत्तरी विदशा में सी ा रसोई का दश:+।" (xi) साक्षी +े कहा विक वष: 1928 और 1949 क े बीच रेलिंलग की दीवार में दो द्वार बंद र्थीे, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप दश:+ क े वल उस रेलिंलग से प्राप्त विकया गया र्थीा Sहां से फ ू लों को चढ़ाया Sा ा र्थीा।

521. र्डॉ. राSीव *व+ +े इस बा की पहचा+ कर+े में असमर्थी: ा क े आ*ार पर साक्षी क े साक्ष्य को महत्व + दे+े की पुरSोर कोणिशश की है विक Sो स्वीरें उन्हें विदखाई गई ं हैं वे विववाविद स्र्थील से संबंति* हैं। साक्षी +े कहा विक 1990 में, एक बंदर विववाविद इमार क े प + का कारर्ण ब+ा। यह उत्तर स्पष्ट रूप से उ+की कल्प+ा का सूचक है और उन्हों+े विवध्वंस का सही mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विववरर्ण प्रस् ु +हीं विकया। प्रति परीक्षक द्वारा दशा:ए गए तिचत्रों का उत्तर दे+े में साक्षी की अक्षम ा वि+तिश्च रूप से एक पहलू है सिSसे ध्या+ में रख+ा होगा परन् ु यह साक्षी को महत्व + दे+े का आ*ार +हीं हो सक ा। उसकी प्रति परीक्षा की ति णिर्थी में साक्षी की आयु 90 वष: से अति*क र्थीी और विवरो*ाभासों को साक्ष्यों की संपूर्ण: ा को ध्या+ में रख े हुए देखा Sा+ा चाविहए। ढाँचे क े विगर+े क े संबं* में साक्षी का कर्थी+ वास् व में अति रंसिS है। हालांविक, साक्ष्यों क े सम£ अध्यय+ से यह संक े प्राप्त होगा विक श्री सिSला+ी द्वारा साक्षी की प्रति परीक्षा क े दौरा+ Sो उत्तर विदये गए र्थीे उससे यह वि+ष्कष: वि+काला गया र्थीा विक वे उस स्र्थील पर हिंहदू भXों द्वारा पूSा की प्रक ृ ति पर साक्षी की मुख्य परीक्षा क े आ*ार पर छोड़ दे े हैं। साक्षी पूSा की प्रकृ ति और रीक े का Sा+कार र्थीा और विववाविद स्र्थील पर पूSा कर+े क े खिलए श्रद्धालुओं द्वारा स्वयं को शाविमल कर+े क े बाद पूSा क े ौर- रीकों या Sागरूक ा क े बारे में उ+की उपस्जिस्र्थीति क े बारे में संदेह का कोई रीका +हीं हो सक ा है।

522. हौसिसला प्रसाद वित्रपाठी (ओपीर्डब्ल्यू-6): साक्षी अप+ी मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी अर्थीा: विद+ांक 13 अगस्, 2002 को अस्सी वष: की आयु का र्थीा। उसका गाँव अयोध्या से 30 से 35 विकलोमीर्टर की दूरी पर र्थीा और प्रर्थीम बार वह विदसंबर 1935 में गया र्थीा Sब उसकी आयु बारह- ेरह वष: क े बीच र्थीी। साक्षी +े कहा विक वष: 1932 से 1945 क े बीच उसक े चाचा अयोध्या में संस्क ृ विवद्यालय में णिशक्षा प्राप्त कर रहे र्थीे। इस अवति* क े दौरा+ साक्षी वष: में ी+ से चार बार अयोध्या आया र्थीा। इसक े बाद साक्षी +े कहा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विक वह राम Sन्मभूविम का दश:+ कर+े क े खिलए अयोध्या आया र्थीा। अप+े मुख्य परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े राम Sन्मभूविम में दश:+ क े विवषय में ब ाया: “राम+वमी क े समय देश क े हर को+े से लाखों लोग अयोध्या आए र्थीे। अयोध्या क े अति*कांश श्रद्धालु और आगं ुक राम Sन्म भूविम क े दश:+ क े खिलए आ े हैं और वहां प्रार्थी:+ा कर े हैं। श्री राम Sन्म भूविम का दश:+ कर+े क े बाद मैं+े हSारों लोगों को बाहर से संपूर्ण: श्री राम Sन्मभूविम परिरसर की परिरक्रमा कर े देखा है। मैं+े स्वयं अप+े विप ाSी और दादीSी क े सार्थी भी दश:+ क े पश्चा संपूर्ण: श्री राम Sन्मभूविम परिरसर की परिरक्रमा की र्थीी। वृद्धावस्र्थीा क े कारर्ण मेरी दादीSी क े वल एक बार परिरक्रमा कर सक ी र्थीीं Sबविक मैं+े और मेरे विप ाSी +े श्री राम Sन्म भूविम की परिरक्रमा पाँच बार पूर्ण: की।“ उसक े साक्ष्य क े मुख्य पहलू इस प्रकार हैं: (i) साक्षी +े रामचबू रे की रेलिंलग की वि+कर्ट ा को ब ाया सिSसक े पीछे ी+ गुंबदाकार ढांचा र्थीा Sो उसक े अ+ुसार राम Sन्मभूविम क े गभ:गृह का प्रति वि+ति*त्व कर ा र्थीा: “राम चबू रा और भंर्डार क े ठीक साम+े पतिश्चमी विदशा में एक दीवार र्थीी सिSसमें दो दरवाSे और कई बंद खिखड़विकयां र्थीीं। दरवाSे बंद रह े र्थीे। विहन्दू परंपरा, आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार, लोहे क े खंभों क े सार्थी दीवार क े पतिश्चम में ी+ णिशखरों का एक भव+ र्थीा सिSसमें क ें ˆीय णिशखर भाग का स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम है सिSसे गभ:गृह कहा Sा ा है। इस आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर मैं श्री राम Sन्मभूविम क े दश:+ और परिरक्रमा क े खिलए भी Sा ा र्थीा।“ वि£ल-ई ंर्ट की दीवार क े सार्थी रामचबू रे की वि+कर्ट ा ऐसा मामला है Sो महत्व देगा। साक्षी +े कहा विक दीवार "रामचबू रे क े ठीक साम+े" र्थीी। (ii) साक्षी +े उस रीक े की बा कही सिSसमें से भX अहा े में प्रवेश कर े हैं और दश:+ क े खिलए आगे बढ़ े हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “सभी श्रद्धालु - दश:+ार्थी- प्रवेश द्वार से पूव: की ओर श्री राम Sन्म भूविम परिरसर में प्रवेश कर े र्थीे और उ+क े दतिक्षर्ण-पूव: को+े में स्जिस्र्थी +ीम और पीपल क े पेड़ क े +ीचे रखी मूर्ति यों में से राम चबू रा में रखी मूर्ति यों और सी ा रसोई और पदतिचन्ह इत्याविद क े दश:+ कर े र्थीे और वर्जिS दीवार क े अंदर स्जिस्र्थी परमपाव+ श्री राम Sन्म भूविम सिSसे गभ:गृह कहा Sा ा है, का दश:+ कर े र्थीे। “ (iii) साक्षी +े ी+ गुंबददार ढांचे क े अंदर काले पत्र्थीर क े स् म्भों की उपस्जिस्र्थीति और उ+ पर देव ाओं की उत्कीर्ण:+ क े विवषय में ब ाया है। साक्षी क े अ+ुसार गभ:गृह का स्र्थीा+ भगवा+ राम क े Sन्म क े स्र्थीा+ का प्रति वि+ति*त्व कर ा है: “श्री राम Sन्म भूविम में स्जिस्र्थी गभ:गृह में कसौर्टी क े स् म्भ र्थीे सिS+ पर फ ू ल-पखित्तयों और देवी-देव ाओं क े तिचत्र ब+े र्थीे। णिशखरों का मंविदर पविवत्र गभ:गृह है Sबविक प्राची+ मान्य ा क े अ+ुसार भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा... कसौर्टी (काले पत्र्थीर) स् म्भों को गभ:गृह क े दरवाSों पर लगाया गया र्थीा। हिंहदू श्रद्धालु उ+ स् ंभों पर ब+ाई गई मूर्ति यों का दश:+ भी विकया कर े र्थीे।” (iv) उसकी प्रति परीक्षा क े दौरा+ साक्षी से कु छ ास्जित्वक कर्थी+ वि+काले गए सिS+में से क ु छ इस प्रकार हैं: (i) वष: 1935 से 1949 क े मध्य Sब वह राम Sन्मभूविम गया ब उस+े रामचबू रा, सी ा रासोई और मुख्य गभ: गृह Sैसे समस् *ार्मिमक स्र्थीलों पर भगवा+ राम का दश:+ प्राप्त हुआ। (ii) गभ:गृह में लोहे की छड़ क े बाहर दश:+ प्राप्त हुआ और प्रसाद को लोहे की छड़ों क े वि+कर्ट रखा गया र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) पूव- द्वार क े साम+े एक दीवार र्थीी सिSसमें लोहे की छड़ों क े दो दरवाSे र्थीे।दरवाSे क े अंदर और गुंबद क े +ीचे गभ:गृह र्थीा। गभ:गृह क े अंदर भगवा+ राम का तिचत्र र्थीा। हालांविक, साक्षी +े गभ:गृह क े अंदर की Sा+े वाली कोई भी आर ी स्वयं +हीं देखी र्थीी; और (iv) कोई भी मुस्जिस्लम सा*ुओं और बैराविगयों क े भय से परिरसर +हीं अा ा र्थीा। साक्षी द्वारा क ु छ तिचत्रों की पहचा+ में विवरो*ाभास हो+े क े आ*ार पर र्डॉ. राSीव *व+ द्वारा अप+े खिलखिख कर्थी+ में साक्षी क े बया+ की आलोच+ा की गई। उन्हों+े साक्षी क े कर्थी+ का भी उल्लेख विकया है विक वष: 1949 में राम लला मध्य गुंबद क े अंदर र्थीे। साक्षी +े वष: 1934 में भव+ को हुई क्षति की स्पष्टीकरर्ण प्रस् ु विकया। ये विवरो*ाभास स्र्थील पर हिंहदू भXों द्वारा पूSा की प्रक ृ ति पर साक्षी अर्थीवा उसक े संपूर्ण: कर्थी+ को महत्व + दे+े का कारर्ण +हीं ब+ सक ा। साक्षी क े कर्थी+ पर संदेह कर+े की कोई वSह +हीं है विक वह स्र्थील पर एक वि+यविम आगं ुक और उपासक र्थीा। मुख्य परीक्षा में उसकी गवाही को पूSा क े स्र्थील और प्रक ृ ति पर प्रति परीक्षा क े दौरा+ छ ु आ +हीं गया है। र्डॉ. राSीव *व+ द्वारा सिS+ विवसंगति यों पर ध्या+ विदया गया है वे वि+तिश्च रूप से ऐसी प्रक ृ ति की +हीं हैं Sो उपरोX पहलुओं पर कर्थी+ क े आ*ार पर संदेह को Sन्म दे ी हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

523. राम सूर ति वारी (ओपीर्डब्ल्यू-7): साक्षी अप+ी मुख्य परीक्षा की ति र्थीी अर्थीा: ् 19 सिस ंबर, 2002 को पचहत्तर वष: का र्थीा। उ+का गांव अयोध्या से 8 विकलोमीर्टर दूर स्जिस्र्थी र्थीा। साक्षी +े कहा विक वह 1942 में गम- क े दौरा+ पहली बार अयोध्या आए र्थीे Sब वह अप+े भाई क े सार्थी रह े र्थीे Sो वहां सेवा में र्थीा। इसक े बाद वे प्रति वष: चार से पांच बार अयोध्या आए। साक्षी +े विवशेष रूप से ह+ुम द्वार क े दो+ों ओर काले पत्र्थीर क े स् ंभों और पत्र्थीर की +क्काशी को संदर्भिभ विकया है: "ह+ुमं द्वार क े दो+ों ओर काले कसौर्टी पत्र्थीर से स् ंभ ब+ाए गए, सिS+ पर फ ू ल, पंखुविड़याँ और मा+व मूर्ति यां उक े री गई र्थीीं। मा+व छविवयाँ द्वारपाल की रह लग रही र्थीीं और उ+क े चेहरे खुरचे हुए प्र ी हो रहे र्थीे। मेरे भाई +े ब ाया र्थीा विक मूर्ति याँ Sय और विवSय की र्थीीं।" उपरोX उद्धरर्ण में, गवाह +े छविवयों को संदर्भिभ विकया है Sो द्वारपाल (द्वाररक्षक) क े समा+ र्थीी और Sय और विवSय की र्थीी। अन्य गवाहों की रह, ओपीर्डब्ल्यू-7 +े इस थ्य क े बारे में ब ाया विक भX रामचबू रा का दश:+ कर े र्थीे और विफर 'गभ: £ह' का दश:+ प्राप्त कर+े क े खिलए Sाली+ुमा दीवार से गुSर+ा हो ा र्थीा। साक्षी +े ब ाया विक सिंसह द्वार क े ऊपर, सिंसह की दो प्रति माएँ र्थीीं, और उ+क े बीच गरुड़ की र्थीी। उन्हों+े यह भी कहा विक मुख्य प्रवेश द्वार की दतिक्षर्णी दीवार पर वराह की एक प्रति मा स्र्थीाविप की गई र्थीी। साक्षी +े मध्य गुंबद क े मुख्य द्वार क े अंदर और बाहर कसौर्टी पत्र्थीर क े बारह स् ंभों क े बारे में ब ाया: "कसौर्टी क े बारह स् ंभ, Sाली+ुमा दीवार क े अंदर ी+ गुम्बदाकार भव+ क े मुख्य गुम्बद क े अंदर और बाहर लगाए गए र्थीे और उ+ स् ंभों पर एक घार्टपल्लव, फ ू ल और पंखुरिरयां और हिंहदू देवी-देव ाओं की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मूर्ति यों को उत्कीर्ण: विकया गया र्थीा और उ+में से मूर्ति यों क े चेहरे, हार्थीों और उ+क े पैरों को खरोंच विदया गया र्थीा।"

524. कौशल विकशोर विमश्रा (ओपीर्डब्ल्यू-12): साक्षी की आयु मुख्य परीक्षा की ति र्थीी पर अर्थीा: ् 19 सिस ंबर, 2002 को पचहत्तर वष: र्थीी। अयोध्या का वि+वासी, साक्षी आचाय: है और पुSारी क े परिरवार का है। साक्षी +े कहा विक चौदह या पंˆह वष: की आयु से, वह राम Sन्मभूविम में पूSा कर रहा र्थीा। मुख्य-परीक्षा क े दौरा+, गवाह +े कहा विक लाखों लोग त्योहारों क े अवसर पर पूSा क े खिलए वहां इकट्ठा हो े र्थीे, Sब वे रामचबू रा, सी ा रसोई और उस पविवत्र म स्र्थीा+ पर Sा े र्थीे, Sहां भगवा+ राम का Sन्म ी+ प्रमुख ढांचे क े मध्य गुंबद क े +ीचे हुआ र्थीा।। भX लोग परिरक्रमा भी कर े र्थीे। साक्षी +े यह भी कहा विक अयोध्या का कोई भी मुस्जिस्लम प्रार्थी:+ा क े उद्देश्य से राम Sन्मभूविम क े पास +हीं आया और +माज़ अदा +हीं हुई। साक्षी क े अ+ुसार, चबू रा पर राम लला और शाखिल£ाम की मूर्ति याँ र्थीीं Sहाँ प्रसाद चढ़ाया Sा ा र्थीा। बैरागी और सा*ु भी वहां रह े र्थीे और वे वि+म ही अखाड़ा से संबंति* र्थीे। देव ाओं क े खिलए प्रसाद वि+म ही अखाड़े क े भ°ड़ार में ैयार विकया Sा ा र्थीा और राम मंविदर र्थीा सी ा रसोई की देखभाल क े खिलए एक पुSारी भी वि+युX विकया गया र्थीा। गवाह +े बाहरी अहा े में दो दरवाSों और विववाविद इमार र्थीा बाहरी अहा े को अलग कर+े वाली वि£ल-ई ंर्ट की दीवार क े बारे में ब ाया। छड़ की दीवार क े दो+ों दरवाSे खुले हो े र्थीे और गवाह +े कहा विक वह भगवा+ राम की मूर्ति की पूSा कर+े क े खिलए दरवाSे से Sा ा र्थीा। हालांविक, गवाह +े अप+ी मुख्य परीक्षा क े दौरा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कहा विक वह अप+े विप ा और दादा-दादी क े सार्थी राम Sन्मभूविम गया र्थीा और श्रद्धालुओं को गभ:गृह में विववाविद संरच+ा क े मध्य गुंबद क े +ीचे प्रार्थी:+ा कर े हुए देखा र्थीा। अप+ी प्रति परीक्षा क े दौरा+ उन्हों+े कहा विक 1934 में वह विववाविद भव+ क े अंदर +हीं गए र्थीे, लेविक+ क े वल रामचबू रे क गए र्थीे। हालांविक उन्हों+े 1934 से ी+ गुम्बदाकार इमार क े अंदर Sा े रह+े का दावा विकया। उन्हों+े दावा विकया विक इमार में प्रवेश कर+े क े खिलए दो लोहे क े दरवाSे र्थीे; सिS+में से एक उत्तर में हमेशा खुला रखा गया र्थीा। उ+क े अ+ुसार, 1949 में गुम्बदाकार इमार क े अंदर कोई मूर्ति +हीं र्थीी, लेविक+ क े वल एक क ै लेंर्डर, मध्य गुंबद क े +ीचे वि+र्मिम मंच पर रखा गया र्थीा। साक्षी क े अ+ुसार, उन्हों+े इमार क े अंदर पूSा की, Sब कोई भीड़ +हीं र्थीी, लेविक+ Sब लोगों की भीड़ हो ी र्थीी, ो रामचबू रा क े पास बाहर पूSा की Sा ी र्थीी। हालांविक वह 1949 क े बाद विववाविद इमार क े अंदर भXों को पूSा कर+े क े खिलए ले गए और इससे पहले +हीं ले गए। 1949 और 1986 क े बीच, उन्हों+े रिरसीवर से इमार क े अंदर Sा+े क े खिलए मौखिखक अ+ुमति ली। 1934-1949 क े दौरा+, क ु छ लोग बाहर रामचबू रा पर अप+ा चढ़ावा चढ़ा े र्थीे; अन्य लोग इसे लोगों की भीड़ क े कारर्ण लोहे की दीवार क े दरवाSे क े पास एक पुSारी को दे े र्थीे, Sबविक क ु छ लोग अप+ा चढ़ावा चढ़ा+े मस्जिन्दर क े अन्दर Sा े र्थीे। मध्य गुम्बद क े +ीचे मंच पर बैठे पुSारी +े चढ़ावा स्वीकार विकया। इस सवाल क े Sबाव में विक 1934 से 1949 क े बीच Sब कोई मूर्ति +हीं र्थीी, ो आर ी और भोग क ै से विकया गया, साक्षी +े कहा: "प्रश्न:-1934 से 1949 क गुंबद क े +ीचे कोई मूर्ति +हीं र्थीी, ो विकसे आर ी, भोग आविद विकया गया? mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उत्तर:-विववाविद भव+ की महत्ता, क ै लेंर्डर पर स्वीरें, मा+सिसक पूSा और ध्या+ ऐसी चीSें र्थीीं सिS+क े खिलए पूSा, भोग, पाठ, आर ी की Sा ी र्थीी।" हालांविक गवाह +े स्वीकार विकया विक गभ: £ह विब+ा मूर्ति वाला कोई अन्य साव:Sवि+क मंविदर +हीं है। उ+क े अ+ुसार, राम लला की मूर्ति को 22/23 विदसंबर 1949 की रा क े दौरा+ विववाविद इमार क े मध्य गुंबद क े समक्ष रखा गया र्थीा। गवाह क े अ+ुसार, 1949 से पहले, विववाविद ढाँचे क े उत्तर की ओर का दरवाSा खोला गया र्थीा, Sबविक दतिक्षर्णी दरवाSा बंद रहा, चाबी पुखिलस की अणिभरक्षा में र्थीी। इसखिलए 1934 से 1949 क े बीच, उन्हो+ें क े वल उत्तर दरवाSे क े माध्यम से गुंबद क े +ीचे विववाविद ढ़ाँचे में प्रवेश विकया। 1934 और 1949 क े बीच, पुखिलस को वहां ै+ा विकया गया र्थीा क्योंविक भीड़ बढ़+े लगी र्थीी और दतिक्षर्णी दरवाSे को बंद रखा गया। उ+क े अ+ुसार, 1934-49 क े दौरा+, वह मध्य गुंबद क े +ीचे विववाविद ढ़ाँचे पर गए और क ै लेंर्डर में एक मूर्ति की स्वीर पर चढ़ावा चढ़ाया।

525. +ारद सर+ (ओपीर्डब्ल्यू-13): साक्षी अप+ी मुख्य परीक्षा की ति र्थीी को, Sो 27 S+वरी 2003 को र्थीी, पचहत्तर वष: का र्थीा वह 1946 में अयोध्या आए और अप+े गुरु की मृत्यु क े बाद, 1979 में वह सरSू क ुं र्ड में महं क े रूप में उ+क े उत्तराति*कारी ब+े। साक्षी +े स्वीकार विकया है विक मूर्ति यों को 22/23 विदसंबर 1949 क े बीच की रा को रामचबू रा से क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया र्थीा। उन्हें 'अल्लाह' शब्द वाले उत्कीर्ण:+ की स्वीरें विमलीं। साक्षी क े अ+ुसार, क े वल पखित्तयों और फ ू लों का उत्कीर्ण:+ र्थीा। उस+े स्वीकार विकया विक Sहाँ अल्लाह खिलखा है, वह दीवार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मंविदर की दीवार +हीं हो सक ी। गवाह इस बा की पुविष्ट +हीं कर सका विक क्या मुसलमा+ों +े उ+ ारीखों पर विववाविद इमार में +माS अदा की र्थीी, सिS+ पर वह +हीं गया र्थीा। साक्षी +े गभ: £ह क े मध्य गुम्बद क े +ीचे हो+े क े विवश्वास क े बारे में ब ाया। साक्षी +े ब ाया विक ह+ुम द्वार क े दरवाSे क े दो+ों ओर कसौर्टी स् ंभ र्थीे सिS+ पर Sय और विवSय की मूर्ति याँ उक े री गयी र्थीी। सुन्नी साक्षीगर्ण

526. वाद 5 में वादीगर्णों +े अप+े मामले को मSबू कर+े क े खिलए सुन्नी गवाहों क े ब्यौरों पर अवलम्ब+ खिलया है। वि+म्+खिलखिख सुन्नी गवाहों पर अवलम्ब+ खिलया गया र्थीा: मोहम्मद हाणिशम (PW-1): साक्षी पचहत्तर साल का र्थीा Sब उसका बया+ Sुलाई 1996 में दS: विकया गया र्थीा। उन्हों+े पेशे से एक दS- का काम विकया और अयोध्या में मोहल्ला कोविठया क े वि+वासी र्थीे। साक्षी +े कहा विक उसका वि+वास विववाविद स्र्थील से ी+ फलाãग दूर र्थीा और वह 1938 में पहली बार बाबरी मस्जिस्Sद में +माS अदा कर+े गया र्थीा। गवाह +ेे कहा विक उस समय, दो मस्जिस्Sदों में शुक्रवार की +माS अदा की Sा ी र्थीी, लेविक+ रवी +माज़ (रमSा+ क े पविवत्र मही+े क े दौरा+ ईशा +माज़ क े बाद की गई विवशेष +माS) क े वल बाबरी मस्जिस्Sद में की Sा ी र्थीी। गवाह +े 22 विदसंबर 1949 को विववाविद स्र्थील पर अंति म +माS पढ़+े का दावा विकया है और उसक े बाद सरकारी अति*कारिरयों द्वारा स्र्थील पर Sा+े और प्रार्थी:+ा अदा कर+े से रोका गया र्थीा। गवाह +े कहा विक क ु क— क े आदेश क े अ+ुसरर्ण में, उस+े और बहु mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA से अन्य लोगों +े +माS अदा कर+े का प्रयास विकया, हिंक ु उ+ पर दंर्ड प्रविक्रया संविह ा की *ारा 144 का उल्लंघ+ कर+े क े खिलए अणिभयोग चलाया गया और उ+को 50/- रुपए Sुमा:+े क े सार्थी दो मास क े कारावास का दंर्ड विदया गया। अप+े बया+ क े दौरा+, गवाह +े ब ाया विक गंS-ए-शाविहद+ विववाविद स्र्थील क े पूव: में र्थीा। उत्तरी विदशा में एक सड़क र्थीी और उसक े आगे Sन्मस्र्थीा+ को अंविक कर े हुए एक साइ+बोर्ड: क े सार्थी एक S+मस्र्थीा+ मंविदर र्थीा। विववाविद स्र्थील क े दतिक्षर्णी रफ एक कविब्रस् ा+ र्थीा। विववाविद स्र्थील क े उत्तरी और पूव- रफ एक दरवाSा र्थीा और प्रवेश ज्यादा र पूव- द्वार से र्थीा। पूव- द्वार से प्रवेश कर+े पर एक चबू रा हो ा र्थीा, Sहां कभी- कभी पुSारी बैठ े र्थीे। मस्जिस्Sद क े उत्तरी द्वार क े पास एक 'चूल्हा' र्थीा सिSसे सी ा रसोई कह े र्थीे। साक्षी क े अ+ुसार, सी ा रसोई क े साम+े एक दीवार र्थीी और Sब भीड़ बढ़ ी Sा ी र्थीी, ो उत्तरी द्वार माग: क े खिलए खोला Sा ा र्थीा। उत्तरी और पूव- द्वार एक चारदीवारी से तिघरे र्थीे। मस्जिस्Sद की एक और दीवार र्थीी Sहाँ एक मुख्य द्वार र्थीा सिSस पर ाला लगा हुआ र्थीा। यह ाला उस ारीख को लगाया गया र्थीा Sब मस्जिस्Sद क ु क: की गयी र्थीी। साक्षी +े कहा विक 22 विदसंबर 1949 क विववाविद स्र्थील क े अंदर कोई मूर्ति +हीं रखी गई र्थीी और ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े अंदर कभी कोई पूSा +हीं की गई र्थीी। प्रारंभ में 24 Sू+ 1996 को साक्षी की प्रति -परीक्षा की गई। अप+ी प्रति - परीक्षा क े दौरा+, गवाह +े कहा विक सिSस विववाविद स्र्थील को 22/23 विदसंबर 1949 को क ु क: विकया गया र्थीा, उसे हिंहदूओं द्वारा राम Sन्मभूविम और मुस्जिस्लमों द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद कहा गया र्थीा। उन्हों+े कहा विक Sन्मस्र्थीा+ मंविदर, राम Sन्मभूविम मंविदर र्थीा और यहां क विक 1885 क े वाद में, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विववाविद स्र्थील को राम Sन्मभूविम क े रूप में संदर्भिभ विकया गया र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े आगे कहा विक चूंविक अयोध्या को भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+ा Sा ा है, इसखिलए हिंहदुओं क े खिलए यह उ +ा ही महत्वपूर्ण: है सिS +ा विक मुसलमा+ों क े खिलए मक्का है। उन्हों+े आगे कहा विक भार क े बाहर क े श्रद्धालु त्योहारों क े अवसर पर दश:+ क े खिलए Sन्मस्र्थीा+ मंविदर आ े र्थीे और श्रद्धालुओं क े खिलए फ ू ल, मालाएं और ब ाशा आविद अर्मिप कर+े क े खिलए अस्र्थीायी दुका+ें स्र्थीाविप की गई ं। साक्षी +े कहा विक उन्हों+े हिंहदुओं को अप+े बचप+ से विववाविद संपखित्त क े चारो ओर पंचकोसी और चौदहकोसी परिरक्रमा कर े देखा र्थीा और सैकड़ों वषÂ से इस प्रर्थीा का पाल+ विकया Sा रहा र्थीा। कसौर्टी स् ंभ की स्वीर सं. 45, 46 और 54 और A 2/41 को देख+े क े बाद साक्षी +े कहा विक स् ंभों पर तिचत्रांक+ या उत्कीर्ण:+ हिंहदू देव ाओं क े र्थीे और पूव- मुख्य द्वार पर विदखाई दे+े वाले स् ंभ गुम्बद में प्रयुX स् ंभ क े समा+ र्थीे। गवाह +े पुविष्ट की विक 1992 में विववाविद परिरसर क े विवध्वंस क पत्र्थीर क े स् ंभ यर्थीाव ब+े रहे। एक सवाल क े Sवाब में विक क्या कोई मुसलमा+ उस स्र्थीा+ पर +माS अदा कर+े Sायेगा Sहां देव ाओं, देविवयों या फ ू लों क े तिचत्र हैं, गवाह +े Sवाब विदया विक भगवा+ की स्वीर क े साम+े +माS अदा कर+ा वि+विषद्ध र्थीा।

527. हाSी महबूब अहमद (पीर्डब्ल्यू-2): अट्ठाव+ वष: क े र्थीे, Sब उ+का बया+ सिस ंबर, 1996 में दS: विकया गया र्थीा। वह र्टेढ़ी बाSार, अयोध्या क े वि+वासी र्थीे और उ+का घर विववाविद स्र्थील से लगभग ी+ फलाãग दूर स्जिस्र्थी र्थीा। उन्हों+े कहा विक उन्हों+े विववाविद स्र्थील पर सैकड़ों बार +माज़ अदा की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीी और शुक्रवार की +माS क े अलावा वह 22 विदसंबर 1949 क पांच बार +माS अदा कर े र्थीे। गवाह +े कहा विक उस+े कभी भी विववाविद स्र्थील क े अंदर हिंहदुओं द्वारा कोई उपास+ा या पूSा हो े हुए +हीं देखी। प्रारम्भ में 17 सिस ंबर 1996 को गवाह की सिSरह की गई। अप+ी सिSरह क े दौरा+, गवाह +े वि£ल की दीवार का उल्लेख विकया Sो ी+ गुम्बदाकार संरच+ा की चारदीवारी से Sुड़ ी है और कहा विक ढाँचे को मुसलमा+ों द्वारा मस्जिस्Sद और हिंहदुओं द्वारा मंविदर मा+ा Sा ा र्थीा। साक्षी +े कहा विक सिSस प्रकार अयोध्या विहन्दूओं क े खिलए ीर्थी:-स्र्थील है उसी प्रकार मुसलमा+ों क े खिलए र्थीा और वे इसे 'खुद: मक्का' क े रूप में संदर्भिभ कर े र्थीे। उन्हों+े कहा विक परिरक्रमा सर्मिदयों में हो ी र्थीी और वे लोग Sो परिरक्रमा कर े र्थीे वे दश:+ क े खिलए मंविदर भी आ े र्थीे। साक्षी यह वि+*ा:रिर कर+े में असमर्थी: र्थीा विक क्या स् ंभ पत्र्थीर या कसौर्टी पत्र्थीर से ब+े र्थीे। गवाह +े फोर्टो सं. 29 और 30 में विदखाए गए मंविदर की मूर्ति यों और अन्य प्र ीकों क े अस्जिस् त्व से इ+कार विकया और कहा विक वे उस समय वहाँ +हीं र्थीे Sब वह विववाविद स्र्थील पर +माS अदा कर+े गया र्थीा।

528. मो. यासी+ (पीर्डब्ल्यू-4): वह णिछयासठ वष: क े र्थीे Sब उ+का बया+ +वम्बर, 1996 में अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा। वह मोहल्ला रा+ीगंS, अयोध्या क े वि+वासी र्थीे और एक मोची र्थीा। गवाह +े कहा विक विववाविद ढाँचे का उपयोग +माज़ अदा कर+े क े खिलए विकया गया र्थीा और वह विववाविद स्र्थील पर शुक्रवार की +माS लगा ार पढ़ रहा र्थीा। उस+े कहा विक विववाविद ढाँचे में काले पत्र्थीर क े खंभे मौSूद र्थीे, लेविक+ उ+ पर देवी-देव ाओं का कोई तिचत्र उत्कीर्ण- +हीं र्थीी। साक्षी क े अ+ुसार, गमले क े आकार में फ ू लों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और पखित्तयों की मूर्ति यां उ+ पर उक े री गयी र्थीीं। 29 +वंबर 1996 को गवाह की पहली सिSरह की गई। अप+ी सिSरह क े दौरा+, गवाह +े कहा विक हिंहदुओं का मा++ा र्थीा विक विववाविद संरच+ा भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ र्थीा और उन्हों+े इसे पूSा का पविवत्र स्र्थीा+ मा+ा। गवाह +े आगे कहा विक यह मा+ ले+ा गल र्थीा विक विकसी मंविदर या मूर्ति को ध्वस् कर+ा कु रा+ क े अ+ुसार अपरा* +हीं र्थीा। साक्षी +े ब ाया विक विकसी भी मुस्जिस्लम को विकसी विवशेष स्र्थीा+ पर वि+र्मिम मंविदर को ध्वस् कर+े और उस पर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर+े की अ+ुमति +हीं र्थीी और यविद कोई व्यविX मंविदर क े विवध्वंस पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण सिसद्ध कर दे, ो यह एक वै* मस्जिस्Sद +हीं होगी।

529. हसम -उल्ला-अंसारी (पीर्डब्ल्यू-7): Sब उ+का बया+ विदसंबर 1996 में अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा ो वह पैंसठ वष: क े र्थीे। वे मोहल्ला काविज़या+ा, अयोध्या क े वि+वासी र्थीे और एक र्टाइविपस्र्ट र्थीे। गवाह +े कहा विक विववाविद ढाँचा एक मस्जिस्Sद र्थीी और उस+े 1943 में वहां पहली +माS अदा की र्थीी और उसक े बाद 1949 क की र्थीी। उन्हों+े यह भी दावा विकया विक विववाविद ढाँचा कभी भी मंविदर +हीं र्थीा और 22 विदसंबर 1949 क विकसी भी हिंहदू +े वहां पूSा +हीं की। 5 विदसंबर 1996 को गवाह की पहली प्रति - परीक्षा की गई। अप+ी प्रति -परीक्षा क े दौरा+, उन्हों+े इस प्रकार कहा: "यहां साव+ में एक मेला लग ा है। मणिर्ण पब: में मेला और वणिशष्ठ क ुं र्ड में एक अन्य मेला भी आयोसिS विकया Sा ा है। चैत्र मास में राम +वमी मेला हो ा है। कहा Sा ा है विक राम +वमी मेला भगवा+ राम क े Sन्मविद+ क े अवसर पर आयोसिS विकया Sा ा है। इस अवसर पर बाहर क े लोग भी अयोध्या आ े हैं। हमारे बचप+ क े विद+ों में बाहर क े हSारों लोग आया कर े र्थीे। आSकल लाखों लोग आ े हैं। वहां परिरक्रमा का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भी आयोS+ विकया Sा ा है। इ+ दो परिरक्रमाओं में से एक पंचकोशी है और दूसरी चौदहकोसी है। विहन्दू णिभन्न-णिभन्न स्र्थीा+ों से आ े हैं और इस अवसर पर वे परिरक्रमा भी कर े हैं।"

530. मोहम्मद कासिसम अंसारी (पीर्डब्ल्यू-23): Sब उन्हो+ें S+वरी 2002 में एक हलफ+ामा दायर विकया र्थीा ब वह चौहत्तर वष: क े र्थीे। वह मोहल्ला क ु विर्टया, अयोध्या क े वि+वासी र्थीे और पेशे से मोर्टर मैक े वि+क र्थीे। साक्षी +े कहा विक उ+का वि+वास विववाविद स्र्थील से लगभग ी+ फलाãग दूर स्जिस्र्थी र्थीा। साक्षी +े कहा विक उस+े विववाविद स्र्थील पर फज्र, ज़ोहर, अस्र, मग़रिरब, एशां, रावी और यहां क विक Sुमा +माज़ भी कई बार पढ़े र्थीे। साक्षी क े अ+ुसार, उन्हों+े 22 विदसंबर 1949 को अंति म +माज़ पढ़ी और Sब क उन्हों+े +माS पढ़ी, ब क ी+ गुम्बदाकार ढाँचे क े अंदर कोई मूर्ति +हीं रखी गई और विकसी भी हिंहदू +े कभी भी विववाविद स्र्थील पर प्रार्थी:+ा +हीं की। 16 S+वरी 2002 को गवाह की पहली सिSरह की गई। सिSरह क े दौरा+, गवाह +े कहा विक हिंहदुओं +े भगवा+ राम को अप+ा भगवा+ मा+ा और उ+का विवश्वास र्थीा विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा। गवाह +े कहा विक बाबरी मस्जिस्Sद को हिंहदुओं द्वारा Sन्मभूविम क े रूप में संदर्भिभ विकया गया र्थीा और उन्हें पंचकोसी माग: और पंचकोसी परिरक्रमा क े बारे में प ा र्थीा। उन्हों+े कहा विक विववाविद स्र्थील पंचकोसी माग: से 300 मीर्टर की दूरी पर र्थीा और विववाविद स्र्थील सविह अयोध्या क े सभी प्रसिसद्ध मंविदर पंचकोसी माग: क े भी र स्जिस्र्थी र्थीे। साक्षी क े अ+ुसार कार्ति क मास क े दौरा+ अयोध्या में एक भव्य उत्सव आयोसिS विकया गया र्थीा, दुका+ें स्र्थीाविप की गई ं और लाखों श्रद्धालु राम Sन्मभूविम, क+क भव+ और ह+ुमा+ गढ़ी में दश:+ कर+े आये mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीे। साक्षी +े यह भी कहा विक प्रत्येक वष: कार्ति क क े मही+े में चौदहकोसी परिरक्रमा भी की Sा ी र्थीी और लाखों श्रद्धालु इसमें भाग ले े र्थीे। साक्षी +े चैत्र मास में आयोसिS राम +वमी उत्सव और साव+ उत्सव का भी उल्लेख विकया, सिSस+े लाखों लोगों को अयोध्या शहर की ओर आकर्मिष विकया। श्रद्धालु सरयू +दी में +हाया कर े र्थीे और क+क भव+, Sन्मस्र्थीा+ मंविदर और Sन्मभूविम में दश:+ कर े र्थीे। साक्षी क े अ+ुसार, त्योहार क े विद+ों में हिंहदू और मुस्जिस्लम प्रेम और शांति से सार्थी-सार्थी रह े र्थीे।

531. उपरोX सातिक्षयों क े बया+ों का विवश्लेषर्ण कर े हुए वि+म्+खिलखिख पहलुओं को प्राप्त विकया Sा सक ा है: (i) विहन्दू अयोध्या को भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ मा+ े हैं। विहन्दू शास्त्रों और *ार्मिमक £न्र्थीों में इसे *ार्मिमक महत्व का स्र्थीा+ ब ाया गया है; (ii) विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास यह है विक भगवा+ राम का Sन्म ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े क ें ˆीय गुंबद क े ठीक +ीचे 'गभ:गृह' क े भी र हुआ र्थीा; (iii) सिSसे मुस्जिस्लम बाबरी मस्जिस्Sद कह े हैं, उसे विहन्दू राम Sन्मभूविम या भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ मा+ े हैं; (iv) विहन्दुओं की यह आस्र्थीा और विवश्वास वि+र्मिववाद है, विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा। मुस्जिस्लम गवाहों +े यह भी कहा विक Sन्मस्र्थीा+ क े अस्जिस् त्व में हिंहदुओं की आस्र्थीा और विवश्वास है; (v) विहन्दू और सुन्नी साक्षी दो+ों की गवाही यह संक े दे ी है विक विववाविद स्र्थील का उपयोग दो+ों *मÂ क े भXों द्वारा पूSा कर+े क े खिलए विकया Sा रहा र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vi) दो+ों विहन्दू और सुन्नी सातिक्षयों +े विववाविद ढांचे क े भौति क अणिभविवन्यास का वि+म्+खिलखिख रीति से वर्ण:+ विकया है: (क) विववाविद परिरसर में दो प्रवेश द्वार र्थीे-एक पूव: की ओर ह+ुम द्वार से और दूसरा उत्तर की ओर सिंसह द्वार से। ह+ुम द्वार क े दो+ों रफ काले कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभ र्थीे सिS+ पर फ ू ल, पखित्तयों और विहन्दू देवी-देव ा उत्कीर्भिर्ण र्थीे। हिंहदू प्रार्थी:+ा कर े र्थीे और स् म्भों पर उत्कीर्ण:+ों की पूSा कर े र्थीे। दो हिंहदू गवाहों +े 'Sय और विवSय' उत्कीर्ण:+ क े बारे में ब ाया; (ख) मुख्य द्वार क े बाहर एक स्र्थीाविप विकया हुआ पत्र्थीर र्थीा, सिSस पर 'Sन्म भूविम वि+त्य यात्रा' खिलखा र्थीा। इस द्वार से प्रवेश कर+े पर रामचबू रा बाई ं ओर र्थीा सिSस पर भगवा+ राम की मूर्ति यों को रखा गया र्थीा। भX और सं रामचबू रा क े वि+कर्ट की:+ कर े र्थीे। (ग) बाहरी अहा े क े एक को+े में गर्णेश, +ंदी, णिशवलिंलग, पाव: ी और अन्य की मूर्ति याँ एक अंSीर और +ीम क े पेड़ क े +ीचे रखी गयीं र्थीी। (घ) फ ू स की छ (छप्पर) की एक संरच+ा र्थीी, सिSसमें भोS+ क े भंर्डारर्ण और भोS+ ैयार कर+े की व्यवस्र्थीा र्थीी; (ड़) विववाविद परिरसर क े बाहर, दतिक्षर्ण-पूव- को+े में, 200-250 कदम की दूरी पर सी ा क ू प स्जिस्र्थी र्थीा; (च) विववाविद स्र्थील का उत्तरी प्रवेश द्वार सिंसह द्वार र्थीा, सिSसक े ऊपर दो+ों ओर दो सिंसहों क े सार्थी क ें ˆ में गरुड़ का तिचत्रांक+ विकया गया र्थीा। सिंसह द्वार से प्रवेश कर+े पर सी ा रसोई क पहुंच े र्थीे, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिSसमें चौका-बेल+-चूल्हा, चरर्ण तिचन्ह और *ार्मिमक महत्व क े अन्य प्र ीक शाविमल र्थीे; और (छ) रामचबू रा क े पतिश्चम मे लोहे की छड़ की एक दीवार र्थीी। रेलिंलग क े अंदर ी+ गुम्बदाकार संरच+ा र्थीी सिSसे हिंहदू भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+ े र्थीे। विहन्दू इसे 'गभ: £ह' मा+ े र्थीे सिSसे पविवत्र और श्रद्धेय स्र्थील मा+ा Sा ा र्थीा। ी+ गुम्बद वाली संरच+ा में काले कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभ मौSूद र्थीे। गवाहों +े कहा विक स् ंभों पर फ ू लों, पखित्तयों, देवी- देव ाओं क े उत्कीर्ण:+ र्थीे; (vii) सातिक्षयों की गवाही से पूSा और प्रार्थी:+ा का पैर्ट+: प ा चल ा है। ह+ुम द्वार से प्रवेश कर+े पर, विहन्दू बाहरी अहा े में चबू रे पर रखी हुई भगवा+ राम की मूर्ति यों की पूSा कर े र्थीे और उसक े बाद अंSीर और +ीम क े +ीचे रखी प्रति माओं को पूS े र्थीे। सी ा-रसोई में प्रार्थी:+ाएँ की Sा ी र्थीीं और ब आं रिरक र्थीा बाहरी अहा े को विवभासिS कर+े वाली लोहे की रेलिंलग पर अप+ा चढ़ावा चढ़ा े हुए ी+ गुम्बद वाली संरच+ा क े अंदर स्जिस्र्थी 'गभ: £ह' को श्रद्धापूव:क प्रर्णाम कर े र्थीे। विहन्दू राम Sन्मभूविम की परिरक्रमा कर े र्थीे; (viii) विहन्दू और मुस्जिस्लम दो+ों सातिक्षयों +े कहा विक *ार्मिमक अवसर पर र्थीा राम +वमी, साव+ झूला, कार्ति क पूर्भिर्णमा, परिरक्रमा मेला और राम विववाह Sैसे पवÂ पर देश भर क े बहु से विहन्दू श्रद्धालु दश:+ क े विववाविद परिरसर आ े र्थीे। उपासक सरयू +दी में स्+ा+ कर े र्थीे और राम Sन्मभूविम, क+क भव+ और ह+ुमा+गढ़ी में दश:+ कर े र्थीे। श्रद्धालु विववाविद परिरसर क े चारों ओर एक प्रर्थीाग परिरक्रमा कर े र्थीे; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ix) विहन्दू और मुस्जिस्लम दो+ो सातिक्षयों +े कार्ति क मास में प्रति वष: की गयी पंचकोसी और चौदहकोसी परिरक्रमा का संदभ: विदया है, सिSस+े लाखों श्रद्धालुओं को अयोध्या क े खिलए आकर्मिष विकया है। विववाद क े क्षेत्र

532. विहन्दू और सुन्नी मुसलमा+ों की गवाही से विववाद क े ी+ महत्वपूर्ण: क्षेत्र साम+े आए हैं: (i) पहला ी+ गुम्बद वाली संरच+ा क े क े न्ˆीय गुंबद क े +ीचे मूर्ति यों की उपस्जिस्र्थीति क े संबं* में है, Sो मुस्जिस्लमों क े खिलए बाबरी मस्जिस्Sद का एक भाग र्थीा और विहन्दूओं क े खिलए 'गभ: £ह' है। मौखिखक विववरर्ण में मूर्ति की स्वीर वाले एक क ै लेंर्डर हो+े का और इस तिचत्रांक+ वि+रूपर्ण की पूSा कर+े का इक्का-दुक्का संदभ: है। हालांविक विहन्दू गवाहों +े स्वीकार विकया है विक भगवा+ राम की मूर्ति को 22-23 विदसंबर 1949 की रा को क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे आं रिरक अहा े में स्र्थीा+ां रिर विकया गया र्थीा। 22-23 विदसंबर 1949 से पूव: क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे विकसी मूर्ति की संभाव+ा को संभाव्य ा की प्रबल ा पर छोड़ विदया गया है; (ii) दूसरा, विहन्दू सातिक्षयों क े बया+ों में इस विबन्दु पर णिभन्न ा है विक क्या प्रार्थी:+ाएँ की गई ंर्थीी और यविद ऐसा है ो उ+ प्रार्थी:+ाओं की प्रक ृ ति Sो 22- 23 विदसंबर 1949 से पूव: आं रिरक गभ:गृह क े भी र की गई ंर्थीी। क ु छ गवाहों +े कहा है विक उन्हों+े क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे प्रार्थी:+ा कर+े क े खिलए विववाविद ढाँचे में प्रवेश विकया र्थीा, Sबविक अन्य गवाहों +े कहा है विक प्रार्थी:+ा क े वल अां रिरक और बाहरी अहा े को अलग कर+े वाली रेलिंलग पर की Sा रही र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह मामला विक रेलिंलग पर प्रार्थी:+ा की गयी, इस दावे से असंग है विक 1934 से 1949 क े बीच हिंहदुओं द्वारा ी+ गुम्बद वाली संरच+ा क े अंदर प्रार्थी:+ा की Sा रही र्थीी। मुस्जिस्लम गवाहों क े अ+ुसार, हिंहदुओं द्वारा ी+ गुम्बद वाली संरच+ा क े अंदर कोई प्रार्थी:+ा +हीं की Sा रही र्थीी; और (iii) ीसरा, विहन्दू और मुस्जिस्लम सातिक्षयों क े कर्थी+ों क े बीच इस बारे में णिभन्न ा है विक क्या 1934 और 1949 क े बीच मस्जिस्Sद की ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े भी र +माज़ अदा की गई र्थीी। मुस्जिस्लम गवाहों +े लगा ार यह बया+ विदया विक +माS अदा की Sा रही र्थीी और यह विक अंति म शुक्रवार की +माS 22 विदसंबर 1949 को अदा की गई र्थीी। दूसरी ओर, हिंहदू गवाहों क े अ+ुसार, विकसी भी मुसलमा+ +े ी+ गुम्बद वाली संरच+ा पर +माS अदा +हीं की और अगर कोई परिरसर क े पास घूम ा र्थीा, ो उन्हें पड़ोस क े सा*ुओं और बैराविगयों क े र्डर से उसे छोड़+ा पड़ ा र्थीा। ए+.11 विववाविद ढाँचे की स्वीरें आयुX की विद+ांक 3 अगस् 1950 की रिरपोर्ट:

533. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े फ ै सले में कहा गया है विक 10 S+वरी 1990 क े एक आदेश क े अ+ुसार राज्य पुरा त्व विवभाग द्वारा ली गई स्वीरों वाले एल्बम क े ी+ सेर्ट हैं। र्डॉ. राक े श ति वारी (ओपीर्डब्ल्यू-14) Sो राज्य पुरा त्व विवभाग क े वि+देशक र्थीे, उन्हो+ें स्वीरों को सत्याविप विकया। उ+में से एक, 204 स्वीरों वाले रंगी+ स्वीरों क े एक एल्बम को कागS संख्या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 200 सी1/1-204 क े रूप में अंविक विकया गया र्थीा। काले और सफ े द स्वीरों क े दूसरे एल्बम में 111 स्वीरें हैं और उन्हें कागS संख्या 201 सी(1)/1-111 क े रूप में अंविक विकया गया र्थीा। एल्बम में कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभ और विववाविद ढाँचे की अन्य विवशेष ाओं की स्वीरें र्थीीं। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा, र्डॉ राSीव *व+ +े वाद 1 में प्लीर्डर आयुX श्री बशीर अहमद खा+ द्वारा प्रस् ु 3 अगस् 1950 की रिरपोर्ट: पर अवलम्ब खिलया है। रिरपोर्ट: में ेरह स्वीरें हैं। रिरपोर्ट: क े प्रस् र 1 और 8 से 10 में स्वीर 1, 8, 9 और 10 क े बारे में एक स्पष्टीकरर्ण है। स्वीर 1 में विववाविद ढाँचे क े बाहर मुख्य द्वार क े मेहराब क े ऊपर अरबी में खिलखे गए 'अल्लाह' शब्द को दशा:या गया है। आयुX की रिरपोर्ट: में कहा गया है: “1. स्वीर संख्या 1 मुख्य प्रवेश द्वार क े बाहर से विववाविद भव+ की स्वीर है। मुख्य द्वार क े मेहराब क े क ु छ ऊपर दाविह+े और बाएँ छोर्टे- छोर्टे वृत्त हैं सिS+में "अल्लाह" शब्द अरबी में खिलखा (खुदा हुआ) है। इससे क ु छ ऊपर अब ह+ुमा+Sी की स्वीर लगी है। (तिचत्र क े फ्र े म क े +ीचे 'अल्लाहू अकबर' अरबी अक्षर में दीवार में उत्कीर्भिर्ण है)। यह उत्कीर्ण:+ उX तिचत्र द्वारा कवर विकया गया है और इसखिलए यह फोर्टो में विदखाई +हीं दे ा है और चूंविक ह+ुमा+Sी क े तिचत्र को हर्टाये विब+ा इस विहस्से की स्वीर +हीं ली Sा सक ी है, इसखिलए मैं इसे अप+ी रिरपोर्ट: में स्पष्ट कर रहा हूं। मैं+े तिचत्र को हर्टा+े पर Sोर +हीं विदया, ाविक विकसी भी मुसीब या बुरी स्जिस्र्थीति से बचा Sा सक े Sो उत्पन्न हो सक ी र्थीी।" (प्रभाव वर्ति* )

534. स्वीर 8 में अरबी अक्षरों में "अल्लाह" क े ी+ उत्कीर्ण:+ हैं। इसे पूव- दीवार में मध्य मेहराब क े भव+ क े अहा े से खिलया गया है। आयुX की रिरपोर्ट: में कहा गया है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “8. स्वीर संख्या 8 पूव- दीवार में मध्य मेहराब क े वाद£स् भव+ क े अहा े से ली गयी स्वीर है। मेहराब क े शीष: से र्थीोड़ा +ीचे ी+ स्र्थीा+ पर अरबी अक्षरों में 'अल्लाह' खुदा हुआ है। अल्लाह क े +ीचे मध्य में ोगरा उत्कीर्ण:+ (...) स्वीर में *ुँ*ली है (लेविक+ स्र्थील से इसे पढ़ा Sा सक ा है)।" (प्रभाव वर्ति* ) स्वीर संख्या 9, पतिश्चमी दीवार में आं रिरक मध्य विमहराब की र्थीी। इसक े बारे में आयुX +े कहा:

“9. स्वीर संख्या 9 वाद£स् भव+ के पूव- दीवार में आं रिरक म* मेहराब की स्वीर है। मेहराब के शीष: पर सुखिलखिख अल्लाह दीवार में खुदा हुआ है और इसके +ीचे "विबस्जिस्मल्लाह-विहर:हमा+-वि+र:विहम" और उसके भी +ीचे "लाइलाहा-इल्लल्लाह मुहम्मदरु रसूलल्लाह" खुदा हुआ है।" (प्रभाव वर्ति* )
स्वीर संख्या 10, विमम्बर या मंच का र्थीा सिSसक े संबं* में आयुX की रिरपोर्ट: में कहा गया है: “10. स्वीर संख्या 10 में वह मंच (विमम्बर) का है सिSस पर मूर्ति यों को रखा Sा ा है। विमम्बर क े बाई ंओर एक फ़ारसी उत्कीर्ण:+ है Sो फोर्टो में *ुं*ला है।" (प्रभाव वर्ति* ) अं में, स्वीर संख्या 11 और 12 क े संबं* में, आयुX की रिरपोर्ट: में वि+म्+खिलखिख संप्रेक्षर्ण हैं: “11. स्वीर संख्या 11, स्वीर संख्या 10 क े उत्तर की ओर पतिश्चम की दीवार में आं रिरक उत्तरी मेहराब की स्वीर है। अरबी अक्षरों में सुखिलखिख अल्लाह दीवार में खुदा हुआ है।
12. स्वीर संख्या 12, भव+ क े अन्दर से पतिश्चमी दीवार में दतिक्षर्णी मेहराब की स्वीर है, सिSसमें स्वीर संख्या 11 की रह ही अल्लाह का अरबी में उत्कीर्ण:+ है।" (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्वीर संख्या 13 में वSू का तिचत्र र्थीा। आयुX की विद+ांक 3 अगस् 1950 की रिरपोर्ट: में संलग्न की गयी स्वीरों में अल्लाह का उत्कीर्ण:+ कई Sगहों विदखाई दे ा है Sैसा विक ऊपर कहा गया है। उ+में से स्वीर संख्या 10 में उत्कीर्ण:+ मंच पर रखे हो+े से मूर्ति यों पर विदखाई +हीं दे ा है। आयुX +े यह भी उल्लेख विकया है विक एक फारसी उत्कीर्ण:+ है Sो स्वीर में *ुँ*ला है। इसी रह आयुX +े यह भी उल्लेख विकया है विक स्वीर संख्या 1 में उत्कीर्ण:+ विदखाई +हीं दे ा क्योंविक यह विहन्दू मूर्ति क े स्वीर द्वारा ढँका हुआ र्थीा। आयुX +े पाया विक स्वीर संख्या 8 में उत्कीर्ण:+ *ुँ*ला र्थीा लेविक+ स्र्थील पर पढ़ा Sा सक ा र्थीा। Sो भी हो, सु+वाई क े दौरा+ हम+े विवद्वा+ अति*वXा की सहाय ा से 'अल्लाह' क े उत्कीर्ण:+ को स्वीर संख्या 9 में और स्वीर संख्या 11 और 12 में +ोविर्टस विकया है।
535. रंगी+ र्थीा काले और सफ े द स्वीरों क े एल्बम की बा करें ो, रंगी+ एल्बम की स्वीर 40 में, प्रवेश द्वार क े ऊपर गरूड़ क े दो+ों रफ दो शेरों का एक स् ंभ है। रंगी+ स्वीरों क े एल्बम में अन्य बा ों क े सार्थी काले कसौर्टी पत्र्थीर क े पाषार्ण स् ंभों का तिचत्रर्ण है। वि+म्+खिलखिख उद्धरर्ण में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े उ+का और काले सफ े द स्वीरों क े एल्बम का संदभ: अणिभखिलखिख विकया है: “3435. इस न्यायालय क े 10.01.1990 विद+ांविक आदेश क े अ+ुसरर्ण में राज्य पुरा त्व विवभाग द्वारा ली गई स्वीरों क े एल्बम क े ी+ सेर्ट हैं। र्डॉ. राक े श ति वारी, ओपीर्डब्ल्यू-14 राज्य पुरा त्व विवभाग क े वि+देशक र्थीे सिSन्हों+े ओपीर्डब्ल्यू 14 क े रूप में बया+ विदया और इ+ सभी स्वीरों को सत्याविप विकया। एक एल्बम सिSसे पक्षकारों क े विवद्व mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*वXा +े "रंगी+ स्वीरों का एल्बम" कहा है, में 204 स्वीरें हैं और इसे पेपर सं. 200 C1/1-204 क े रूप में अंविक विकया गया है. दूसरे में 111 स्वीरें हैं Sो काली और सफ े द हैं और पक्षकारों क े अति*वXाओं +े आम ौर पर इसे "काले सफ े द स्वीरों का एल्बम" कहा है और यह पेपर सं. 201 C1/1-111 है। रंगी+ एल्बम में इ+ स् ंभों की प्रासंविगक स्वीरें हैं पेपर सं. 200 C1/48, 200 C1/50, 200 C1/51, 200 C1/52, 200 C1/54, 200 C1/87, 200 C1/104, 200 C1/105, 200 C1/109, 200 C1/114, 200 C1/115, 200 C1/141, 200 C1/146, 200 C1/147, 200 C1/166, 200 C1/167, 200 C1/181, 200 C1/186, 200 C1/187, 200 C1/195, 200 C1/199 और 200 C1/200. इसी रह, काले और सफ े द स्वीरों क े एल्बम में, संबंति* स् ंभों क े प्रासंविगक स्वीरें हैं 201 C1/55, 201 C1/57, 201 C1/76, 201 C1/88, 201 C1/91, 201 C1/103, 201 C1/104 और 201 C1/106। इ+ सभी स्वीरों को इस वि+र्ण:य क े परिरणिशष्ट 5 (ए) से 5 (र्डीर्डी) में सामूविहक रूप से संलग्न विकया Sा रहा है। ”

536. सु+वाई क े दौरा+, इस न्यायालय +े उ+ एल्बमों की स्वीरों का परिरशील+ विकया Sो विवद्व न्याया*ीश की उपरोX म ाणिभव्यविXयों से मेल खा ा है। काले कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभों पर उत्कीर्ण:+ हैं, सिS+में से अ+ेक गेरुआ रंग से से सखिज्ज हैं। काले कसौर्टी पाषार्ण स् ंभों पर ब+े कु छ आक ृ ति यों को क्षति £स् कर विदया गया है। स्वीरों क े संबं* में सिS+ गवाहों +े बया+ विदया, उ+में र्थीे र्डॉ. र्टी पी वमा: (ओपीर्डब्ल्यू 3/5) र्थीे, Sो श्री देवकी +ंद+ अ£वाल की मृत्यु क े बाद वाद 5 में पहले और दूसरी वादी क े वाद विमत्र ब+ गये र्थीे। र्डॉ. र्टी. पी. वमा: +े बया+ विदया है विक वे स्र्थीा+ Sहां सिंसदूर लगा हुआ है, मूर्ति यों की आक ृ ति यां हो सक ी हैं, हिंक ु वे विववि+र्मिदष्ट रूप से यह +हीं ब ा सक े विक यह यक्ष-यतिक्ष+ी या Sय-विवSय की स्वीर है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA या +हीं। चूंविक र्डॉ. र्टी पी वमा: की गवाही पर र्डॉ. *व+ +े अप+े कÂ क े दौरा+ Sोर विदया है, इसखिलए हम प्रासंविगक विहस्से को उद्धृ कर े हैं: "उ+ स्र्थीा+ों पर मूर्ति यां हो सक ी हैं Sहां स्वीर सं. 104, 105, 109, 110, 114 और 115 में सिंसदूरी या लाल रंग लगा है लेविक+ स्वीरों में यह स्पष्ट रूप से विदखाई +हीं दे रहा है विक उसमें कौ+ से देवी-देव ा या यक्ष-यतिक्षर्णी या Sय-विवSय हैं। पूव X स्वीरों में से बाकी स्वीरों में विदख रहे स् ंभों में उ+ स्र्थीा+ों पर यक्ष - यतिक्षर्णी या Sय-विवSय की दृष्यमा+ +हीं है Sहां रंग लगा है। (पृष्ठ 130-131), इ+ स् ंभों की काली-सफ े द स्वीरों में मैं देवी-देव ा, यक्ष-यतिक्षर्णी या Sय-विवSय को पहचा++े में असमर्थी: हूं। तिचत्र सं. 55 में 'घर्ट कलश' क े ऊपर एक *ुं*ली आक ृ ति है, Sो विकसी देवी-देव ा या यक्ष-यतिक्षर्णी की हो सक ी है।” आगे बढ़ े हुए, र्डॉ. वमा: +े कहा: “फोर्टो सं. 141, 146 और 147 क े रंगी+ भाग में क ु छ मूर्ति याँ हैं, Sो देवी-देव ाओं की हो सक ी हैं लेविक+ मैं उन्हें पहचा+ +हीं सक ा। शेष स्वीरों में मुझे कोई मूर्ति विदखाई +हीं दे ी। इ+ सभी स्वीरों में Sहां लाल रंग मौSूद +हीं है, मैं विकसी भी देवी-देव ा, यक्ष-यतिक्षर्णी या Sय-विवSय की स्वीरें +हीं देख पा रहा हूं। मैं इ+ स्वीरों में विदखाई दे+े वाले स् ंभों पर विकसी भी देवी -देव ा, यक्ष-यतिक्षर्णी या Sय-विवSय की मूर्ति को +हीं पहचा+ पा रहा हूं।” दूसरी ओर, अन्य गवाहों +े स्वीरों में विववि+र्मिदष्ट रूप से हिंहदू मूर्ति यों की मौSूदगी की बा की है। उ+में रघु+ार्थी प्रसाद पांर्डे (र्डीर्डब्ल्यू 3/5), महं *रम दास (र्डीर्डब्ल्यू 13/1-1), रमेश चंˆ वित्रपाठी (र्डीर्डब्ल्यू 17/1) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और शणिश कां रू ं गर्टा (र्डीर्डब्ल्यू 20/1) हैं। उच्च न्यायालय +े साक्ष्यों क े बया+ों में, विवशेष रूप से स्वीरों की स्पष्ट ा और तिचत्रों की पहचा+ क े संबं* में, क ु छ विवरो*ाभासों को +ोर्ट विकया। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े *ारिर विकया विक ये विवणिभन्न ाएं सामान्य हैं क्योंविक गवाह मूर्ति विवज्ञा+ क े क्षेत्र में विवशेषज्ञ +हीं र्थीे। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े र्डॉ. र्टीपी वमा: की गवाही पर भी ध्या+ विदया, सिSसमें स्वीर 188, 193-195, 189 और 200 क े रंगी+ विहस्सों में देवी-देव ाओं क े तिचत्रों की Sा+कारी र्थीी। हालांविक, उन्हों+े यह भी कहा विक आक ृ ति यों क े *ुं*ला हो+े क े कारर्ण वह साफ-साफ यह पहचा++े में अक्षम र्थीे विक विक+ देवी -देव ाओं का तिचत्रर्ण विकया गया है। साक्ष्यों की समीक्षा क े बाद न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: पर पहुंचे: “3443. उपरोX क े मद्दे+Sर, हमें यह *ारिर कर+े में कोई संकोच +हीं है विक विववाविद इमार क े अंदर और बाहर लगे स् ंभों में कु छ मा+व तिचत्र हैं और क ु छ स्र्थीा+ों पर हिंहदू देवी-देव ाओं की क ु छ छविवयां प्र ी हो ी हैं।” अणिभलेख में विमली स्वीरों में इस्लामी मूल क े और ऐसे तिचत्रों क े उत्कीर्ण:+ हैं Sो विहन्दू पूSा विवति* से संबंति* हैं। विववाविद ढ़ाचे में दो+ों का अस्जिस् त्व सार्थी-सार्थी र्थीा।

537. न्यायमूर्ति शमा: +े यह मा+ े हुए विक मस्जिस्Sद क े भी र स् ंभों पर विहन्दू देवी-देव ाओं क े तिचत्र र्थीे, यह *ारिर विकया विक विववाविद ढांचे का चरिरत्र, इस्लाम क े सिसद्धां ों क े ह, मस्जिस्Sद का +हीं र्थीा। इसक े विवपरी न्यायमूर्ति एस यू खा+ न्यायमूर्ति अ£वाल क े विवचार से सहमति र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाद 4 में विवषय सं. 19 (एफ) र्थीा: “क्या प्रश्नग इमार क े भी र और बाहर क े स् ंभों में विहन्दू देवी - देव ाओं क े तिचत्र हैं? यविद वि+ष्कष: सकारात्मक है, ो क्या उस विहसाब से प्रश्नग इमार का चरिरत्र,इस्लाम क े सिसद्धां ों क े ह, मस्जिस्Sद का +हीं हो सक ा?” न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल इस वि+ष्कष: पर पहुंचे विक प्रश्नग इमार क े अंदर और बाहर क ु छ स् ंभों पर हिंहदू देवी-देव ाओं क े क ु छ तिचत्रों क े अस्जिस् त्व क े बावSूद, संरच+ा का मस्जिस्Sद क े रूप में चरिरत्र अप्रभाविव है। उ+का विवचार यह र्थीा विक यद्यविप इस्लामी सिसद्धां ों क े ह विकसी ऐसे स्र्थीा+ पर Sहां +माS अदा की Sा+ी है, मा+व या पशु आक ृ ति यों की अ+ुमति +हीं है, उ+ आक ृ ति यों वाले स् ंभों क े अस्जिस् त्व क े बावSूद, मुसलमा+ों +े विववाविद इमार को मस्जिस्Sद मा+ा और कम से कम अस्सी साल क, +माS अदा की Sब क विक 29 विदसंबर 1949 को क ु क— का आदेश Sारी +हीं विकया गया। उ+क े विवचार में, Sहां एक विवशेष पूSा पद्धति में विवश्वास कर+े वाले लोग इमार को इस्लामी इबाद की Sगह मा+ े र्थीे, विकसी ीसरे पक्ष क े खिलए, विवशेष रूप से लंबे समय क े बाद, यह कह+े की गुंSाइश +हीं र्थीी विक इमार उस मSहब क े सिसद्धां ों क े अ+ुसार ब+ी मस्जिस्Sद +हीं र्थीी। मामले क े इस पहलू को श्री पी ए+ विमश्रा द्वारा इस्लाम क े सिसद्धां ों पर वि+वेविद कर्थी+ पर विवचार कर े समय पहले ही Sाँचा Sा चुका है। इस पर ध्या+ दे+ा पया:प्त होगा विक 3 अगस् 1950 विद+ांविक आयुX की रिरपोर्ट: क े सार्थी-सार्थी रंगी+ और काले और सफ े द स्वीरों क े एल्बम वाले अणिभलेख में विमले साक्ष्य, प्रर्थीम ः विववाविद संरच+ा पर अल्लाह उत्कीर्भिर्ण हो+ा दर्भिश कर े हैं, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विद्व ीय ः विहन्दू देवी-देव ाओं की आक ृ ति यों वाले काले कसौर्टी पत्र्थीर स् ंभों की उपस्जिस्र्थीति और ृ ीय ः दो+ों ओर शेरों वाले गरुर्ण का तिचत्रर्ण Sो गैर इस्लाविमक मूल का प्र ी होगा। इस्लामी मSहबी मूल क े उत्कीर्ण:+ और विहन्दू *ार्मिमक प्रक ृ ति क े उत्कीर्ण:+ विववाविद संरच+ा पर सार्थी-सार्थी मौSूद रहे हैं। वे इस बा का संक े दे े हैं विक इस उपमहाद्वीप में बहुल संस्क ृ ति यों की विवविव* ा में मा+व Sाति की मूलभू एक ा पर आ*ारिर साव:भौविमक सत्य अं र्मि+विह है।

538. र्डॉ. *व+ +े क: विदया विक कसौर्टी स् ंभों पर विहन्दू देवी -देव ाओं की कोई आक ृ ति +हीं है। उन्हों+े कहा विक फ ू लदार तिर्डSाइ+ Sो उ+ पर पायी गयी र्थीी इस्लामी वास् ुकला में विमल ी है। क: यह है विक सSावर्टी उत्कीर्ण:+ और ऩक्काशी मस्जिस्Sद क े चरिरत्र को कम र +हीं कर े और इसखिलए विहन्दुओं द्वारा इस प्रभाव का एक *ार्मिमक प्रश्न का क: विदया गया र्थीा विक उत्कीर्ण:+ अप+े आप में गैर-इस्लामी र्थीा। र्डॉ. *व+ का यह कह+ा सही +हीं है विक कसौर्टी पत्र्थीर स् ंभों पर विहन्दू देवी -देव ाओं का तिचत्रर्ण +हीं है। साक्ष्य इसक े विवपरी स्जिस्र्थीति का संक े दे े हैं। र्डॉ. *व+ +े रंगी+ स्वीरों वाले एल्बम की दो विवणिशष्ट स्वीरों, स्वीर सं. 128 और 129 का अवलंब खिलया है। इ+ स्वीरों को भी री गुंबद क े +ीचे रखा गया है। र्डॉ. *व+ +े कहा विक स्वीरों में से एक गुरु दत्त सिंसह की है, Sो सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट र्थीे, Sबविक एक और स्वीर क े क े +ैय्यर की है, Sो त्समय सिSला मसिSस्र्ट्रेर्ट र्थीे Sब विदसंबर 1949 में यह घर्ट+ा हुई र्थीी। र्डॉ. *व+ क े अ+ुसार, ये 1990 में संरच+ा क े भी र रखी गई स्वीरें हैं, Sो विक यर्थीास्जिस्र्थीति क े आदेश क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उल्लंघ+ में रखी गयी र्थीीं। र्डॉ. *व+ +े महं भास्कर दास (र्डीर्डब्ल्यू 13/1) क े साक्ष्य की ओर इस न्यायालय का ध्या+ आकर्मिष विकया है, सिSन्हें प्रति परीक्षर्ण क े दौरा+ फोर्टो सं. 128 और 129 विदखाए गए र्थीे। क े क े +ैय्यर क े क ै रिरयर का अवलोक+ कर+े वाले व्यविX की गवाही क े अंशों का अवलंब खिलया गया है। इ+ स्वीरों क े आ*ार पर, यह कहा गया विक क े क े +ैय्यर और गुरु दत्त सिंसह +े उस समय पक्षपा पूर्ण: रवैया अप+ाया Sब विदसंबर 1949 में मस्जिस्Sद को अपविवत्र विकया गया। हम+े अणिभलेखों की पूर्ण: ा क े खिलए र्डॉ. *व+ क े कर्थी+ को उद्धृ विकया है और Sहाँ क इसका उस कारर्ण से संबं* र्थीा सिSसक े कारर्ण विववाविद संरच+ा क े दतिक्षर्णी गुंबद में राज्य सरकार क े दो साव:Sवि+क अति*कारिरयों की स्वीरों को लगाया गया। ए+. 12 विवष्र्णु हरिर उत्कीर्ण:+

539. 7 फरवरी, 2002 को वाद 5 क े वाविदयों क े अति*वXा +े “अयोध्या विवष्र्णु हरिर मंविदर उत्कीर्ण:+” से संबंति* 3 फरवरी, 2002 विद+ांविक र्डॉ. क े. वी. रमेश की रिरपोर्ट: को उच्च न्यायालय क े समक्ष रखा। दस् ावेSों को साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 क े उपबं*ों द्वारा यर्थीा अपेतिक्ष “ आपखित्त और साक्ष्य क े अध्य*ी+” अणिभलेख पर खिलया गया। विवचारर्ण क े दौरा+, वाद 5 की वादीगर्ण +े दावा विकया विक उपरोX उत्कीर्ण:+ 6/7 विदसंबर 1992 को विववाविद संरच+ा क े मलबे से विमला र्थीा, सिSसे ध्वस् कर विदया गया र्थीा। उत्कीर्ण:+ पत्र्थीर पर है सिSसकी विवमा 115 सेमी X 55 सेमी है। न्यायालय क े आदेश क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ह, एक ई-स्र्टॉप (पेपर सं. 203 C-1/1) ैयार विकया गया और र्डॉ. क े. वी रमेश (ओपीर्डब्ल्यू-10) द्वारा क ू र्टवाच+ विकया गया Sो एक पुरालेखशास्त्री हैं। पाठ क े अ+ुवाद को वाद 5 में प्रदश: 2 क े रूप में तिचवि- विकया गया। वादीगर्ण का कर्थी+ यह है विक विववाविद स्र्थील पर विवष्र्णु हरिर मंविदर र्थीा और मंविदर का विवध्वंस कर क े ही इसक े स्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद ब+ाई गयी र्थीी। इस खंर्ड में, उत्कीर्ण:+ ही कर्थी+ का आ*ार हैं।

540. काय:वाविहयों क े दौरा+ अ+ुवाद क े सारवा+ अंशों को संदर्भिभ विकया गया है Sो वि+म्+व उद्धृ है: "पंविX 13-14, श्लोक 19-उ+क े भ ीSे (वस् ु ः भाई क े बेर्टे), बहुचर्तिच मेघदू, Sो विक प्रख्या है, सिSस+े अ+यचंˆ को पराभू विकया गया र्थीा, +े अप+े पूव:S पृथ्वी क े देव ा गोहिंवदचंˆ की क ृ पा से साक े मंर्डल का आति*पत्य अर्जिS विकया। पंविX 14, श्लोक 20- + क े वल उस+े, Sो विक शविXशाली र्थीा, +े उ+ अणिभमा+ी योद्धाओं को समाप्त कर विदया, Sो उसक े द्वारा लगा ार लड़ी गई लड़ाइयों में असीम मद में झूम रहे र्थीे, बस्जिल्क उन्हों+े (अप+े लोगों को) एक उत्क ृ ष्ट से+ा भी दी Sो (ऐसे सैवि+कों से भरी र्थीी Sो) कल्प रु क े समा+ र्थीे। पंविX 14-15, श्लोक 21-उ+क े द्वारा, Sो सांसारिरक बं*+ों क े महासागर शीघ्र पार Sा+े क े आसा+ सा*+ों पर विवचार कर रहे र्थीे, (भगवा+) विवष्र्णु-हरिर क े इस सुंदर मंविदर को एक ऐसे पैमा+े पर ब+वाया गया र्थीा Sो विक पूव:व - राSाओं द्वारा पहले कभी +हीं विकया गया र्थीा, Sो विक कार्टे गये विवशाल और उदात्त पत्र्थीरों की पंविXयों से सुगविठ रूप से ब+ाया गया र्थीा। पंविX 15-16, श्लोक 22-अल्ह+ का स्र्थीा+, सिSसक े अर्थीक क ं *े राSा गोहिंवदचंˆ क े साम्राज्य की स्जिस्र्थीर ा क े खिलए सुरक्षा क ुं र्डी की रह र्थीे, बाद में उ+क े छोर्टे (पुत्र?) अयुषचन्ˆ द्वारा ले खिलया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पंविX 16, श्लोक 23-महा+् कविवयों +े उ+की ुल+ा सहसंक और सुˆक से कर+े का साहस +हीं विकया, भय क े कारर्ण प्रेम क े देव ा को छोड़कर विकसी +े भी, उ+की उपस्जिस्र्थीति में प्रत्यंचा चढ़ा+े का साहस +हीं विकया। पंविX 17,श्लोक 24-उ+क े द्वारा Sो अच्छे आचरर्ण क े र्थीे और कलह से घृर्णा कर े र्थीे, अयोध्या में वि+वास कर े, सिSसमें अट्टाखिलकाएं,बौतिद्धक और मंविदर र्थीे, साक े मंर्डल में हSारों क ु एं, ालाब, Sलाशय, *म:शाला आविद ब+वाए गये।” र्डॉ. रमेश +े उत्कीर्ण:+ क े बारे में एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की। रिरपोर्ट: में कहा गया है विक: ''संलग्न पाषार्ण उत्कीर्ण:+ एक आय ाकार पाषार्ण स्लैब पर उक े रा गया है सिSसका खिलखिख क्षेत्र मोर्टे ौर पर 115 से. मी. X 55 से. मी. का र्थीा। व:मा+ समय में यह स्लैब दो खंर्ड में र्टूर्टा हुआ है सिSससे लगभग प्रत्येक पंविX में दो अक्षरों का +ुकसा+ हो गया है। इसक े अलावा, पहली और अंति म दो पंविX को भारी +ुकसा+ हुआ है सिSसक े परिरर्णामस्वरूप कई अक्षर विमर्ट गये हैं। क ु ल विमलाकर, अक्षरों को +ुकसा+ से पाठ्य साम£ी की पूर्ण: व्याख्या कर+े में लेख+विवदों और संस्क ृ विवदों को बा*ा आई है। विफर भी, सम£ उद्देश्य और इसक े भाव का सार संदेह से परे स्पष्ट है। पहली बार में एक Sल्दबाSी में ैयार की गई स्र्टांपेS और हाल क े विद+ों में, एक उच्च गुर्णवत्ता की स्र्टांपेS क े सार्थी-सार्थी क ु छ स्वीरें र्डॉ. एसपी गुप्ता अध्यक्ष, भार ीय पुरा त्व सविमति, +ई विदल्ली द्वारा प्रदा+ की गई र्थीीं, सिSसक े खिलए मैं उ+का बहु आभारी हूं। णिशलालेख का पाठ काफी शुद्ध संस्क ृ में खिलखा गया है, Sो विक उस अवति* की सामान्य विवशेष ा है सिSससे णिशलालेख संबंति* हैं, अर्थीा: ् 12 वीं श ाब्दी ई. क े मध्य की। यह णिशलालेख विकसी भी रह से काला+ुक्रविम +हीं है, लेविक+ इसे पुरालेखीय आ*ार पर और प्रश्नग णिशलालेखीय पाठ क े आ*ार पर विवश्वास क े सार्थी, 12 वीं श ाब्दी क े मध्य का कहा Sा सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हिंक ु आरंभ में ही भगवा+ णिशव को प्रर्णाम कर+ेपुरालेखीय एवं लेख+ विव*ीय विवशेष ाएं क े खिलए णिशलालेख का पूरा पाठ काफी उच्च साविहस्जित्यक उत्क ृ ष्ट ा वाले संस्क ृ पद्य में है। Sैसा विक ऊपर कहा Sा चुका है, पुरालेखीय एवं लेख+ विव*ीय विवशेष ाएं उस अवति* क े सामान्य लक्षर्ण है सिSससे णिशलालेख संबंति* हैं, अर्थीा: 12 वीं श ाब्दी ई. क े मध्य का। यह शास्त्रीय संस्क ृ से उत्तर भार ीय स्र्थीा+ीय भाषाओं में संक्रमर्ण का यह एक महत्वपूर्ण: काल र्थीा। इसे व:मा+ सविह समकाली+ णिशलालेखों में अ+ु+ासिसक और अ+ुस्वार क े प्रयोग और दन् ी एवं ालव्य क े उपयोग में भ्रम से आसा+ी से पहचा+ा Sा सक ा है। Sहां क मूल पाठ की विवषय-वस् ु का संबं* है, यह मध्ययुगी+ अणिभमा+ का पूर्ण: रूप से प्रति हिंबब है Sहां क विक णिशलालेख में वर्भिर्ण +ायकों क े गी ों का संबं* है। इस पुरालेख से हमें Sो सवा:ति*क महत्वपूर्ण: ऐति हासिसक Sा+कारी विमल ी है, वह है गहड़वाल वंश क े गोहिंवदचंˆ का उल्लेख, सिSस+े 1114 से 1155 ई. क एक विवशाल साम्राज्य पर शास+ विकया र्थीा। श्लोक 1 पूर्ण: ः खो चुका है। श्लोक 2, Sो बुरी रह से कर्टे हुए हैं, वित्रविवक्रम को संदर्भिभ कर ा है और इसखिलए, भगवा+ विवष्र्णु की प्रशंसा में खिलखा हुआ हो सक ा है। श्लोक 3, भी Sो बुरी रह से क्षति £स् है, भाग:व-परसुराम द्वारा क्षवित्रय वंश क े लगभग संम्पूर्ण: संहार से संबंति* प्र ी हो ा है। श्लोक 4 क्षवित्रय वंश क े उदय का, सिSसमें Sन्में वीरों +े ह्रासमा+ योद्धा क ु ल को पु+S-विव कर विदया। श्लोक 5 क े अ+ुसार उस महा+ परिरवार में S+ ा क े विप्रय का Sन्म हुआ। श्लोक 7 सांसारिरक चीSों से विवरविX की बा कर ा है, Sबविक श्लोक 8 हमें ब ा ा है विक उन्हों+े अप+ा राज्य और संपदा अप+े पुत्र सलक्स+ा (Sallaksana) को विदया। श्लोक 9 से 14 में इस सलक्स+ा (Sallaksana) की प्रशंसा की गयी है सिSसमें कविव +े उच्च स् र की काव्य कल्प+ा प्रदर्भिश की है। श्लोक 15 उ+क े पुत्र क े Sन्म को संदर्भिभ कर ा है, सिSसका अप+े विप ा क े Sैसा विदख+ा लोगों की चचा: का विवषय र्थीा। श्लोक 16 इस पुत्र को अल्ह+ क े रूप में संदर्भिभ कर ा है और उसे अप+े परिरवार की विपछली शविX और मविहमा को पु+ः प्राप्त कर+े का श्रेय दे ा है। Sहां अगले दो श्लोक (17 और 18) में उ+की पारम्परिरक प्रशंसा है, वहीं श्लोक 19 में यह ब ाया गया है विक उ+क े मेघसु +ाम क े भ ीSे +े विकसी अ+यचन्ˆ को परासिS कर पृथ्वी क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वरिरष्ठ प्रभु, गोहिंवदचंˆ की क ृ पा से साक े -मंर्डल का आति*पत्य प्राप्त विकया। Sबविक श्लोक 20 में इस +ायक की सैन्य शविX की सराह+ा की गयी है। श्लोक 21 में यह महत्वपूर्ण: Sा+कारी विमल ी है विक स्वग: में स्र्थीा+ सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए, मेघसु +े भगवा+ विवष्र्णु-हरिर क े लिंलए एक भव्य पत्र्थीर का मविदर ब+ाया। श्लोक 22 से हमें प ा चल ा है विक Sो गोविवन्दचन्ˆ क े साम्राज्य की स्जिस्र्थीर ा क े खिलए Sो उत्तरदायी र्थीा, उसका स्र्थीा+ अयुषचन्ˆ द्वारा साक े -मंर्डल क े महाराS क े रूप में खिलया गया। श्लोक 23 में उ+की पारंपरिरक प्रशंसा है।श्लोक 24 क े अ+ुसार उन्हों+े अयोध्या +गर में अप+ा वि+वास ब+ाया Sो विक विवशाल भव+ों बौतिद्धकों और मंविदरों से सुसखिज्ज र्थीा और पूरे साक े मंर्डल में हSारों छोर्टे बड़े Sलाशय र्थीे।श्लोक 25 और 26 में आयुषचन्ˆ की और पारंपरिरक प्रशंसा है। श्लोक 27 Sो विक अंश ः क्षति £स् है भगवा+ विवष्र्णु क े +रसिंसह क ृ ष्र्ण वाम+ और राम अव ार का वि+रूपर्ण है। अत्यति*क क्षति £स् श्लोक 28 राSा को संदर्भिभ कर ा है संभव ः अयुषचंˆ को पतिश्चम से (मुस्जिस्लम आक्रां ाओं से) ख रे को हर्टा े हुए। श्लोक 29 Sो अपूर्ण: है राSा अयुषचंˆ को उद्धृ कर ा है। साक े -मंदला का संदभ: विदलचस्प है। यह सव:विवविद है विक उत्तर भार दतिक्षर्ण की भांति, प्रशासक खंर्डो में विवभासिS विकया गया र्थीा, सिSन्हें मंर्डल कहा Sा ा र्थीा (एच.सी. रे की क ृ ति में मंर्डला शब्द देखें 'उत्तर भार का वंशीय इति हास', II संस्करर्ण,1973, विदल्ली)।

541. गवाह क े साक्ष्य पर चचा: कर े हुए, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े उल्लेख विकया है विक एक एपी£ाविफस्र्ट क े रूप में ओपीर्डब्ल्यू -10 की विवशेषज्ञ ा विकसी भी पक्ष द्वारा विववाविद +हीं हो सक ी है। ओपीर्डब्ल्यू-10 एक गवाह क े रूप में प्रस् ु हुए और अप+े द्वारा पत्र्थीर क े णिशलालेख की साम£ी का अ+ुवाद सत्याविप विकया। साक्षी क े अ+ुसार, णिशलालेख बारहवीं श ाब्दी ई. क े हैं और उससे बारहवीं श ाब्दी ई. में अयोध्या में वि+र्मिम विवष्र्णु हरिर मंविदर क े अस्जिस् त्व को +ोर्ट विकया गया है। ओपीर्डब्ल्यू-10 +े कहा विक अणिभव्यविX इंविग कर ी है विक अयोध्या साक े मंर्डल का मुख्यालय है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसक े अलावा, हालांविक मंविदर का वि+मा:र्ण मेघसु द्वारा विकया गया र्थीा, णिशलालेख उ+क े उत्तराति*कारिरयों द्वारा खिलखवाया गया र्थीा। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अप+े फ ै सले क े दौरा+ *ारिर विकया है विक णिशलालेख की वास् विवक ा और प्रामाणिर्णक ा पर संदेह +हीं विकया Sा सक ा, हालांविक यह मुस्जिस्लम पक्षों की ओर से क: विदया गया र्थीा विक सिSस रह से यह दावा विकया गया र्थीा विक यह विमला है वह भरोसेमंद +हीं र्थीा। यह दशा:+े क े खिलए विक इसे विवध्वंस से पहले विववाविद स्र्थील पर इमार में लगा विदया गया र्थीा। इसखिलए, उ+क े द्वारा यह कहा गया विक णिशलालेख अप+े आप में इस बा का साक्ष्य +हीं विक एक विवष्र्णु हरिर मंविदर मौSूद र्थीा या विववाविद स्र्थील पर ब+ाया गया र्थीा।

542. र्डॉ. क े. वी. रमेश (ओ. पी.र्डब्ल्यू.-10) +े अप+े मुख्य परीक्षर्ण क े स्र्थीा+ पर शपर्थी-पत्र में कहा है विक वह मˆास विवश्वविवद्यालय से संस्क ृ भाषा और साविहत्य में एम. ए. हैं और क+ा:र्टक विवश्वविवद्यालय से 1965 में इति हास में पीएचर्डी हैं। वह सरकारी णिशलालेख विवद क े रूप में एएसआई में भ - हुए और 1966 में संस्क ृ णिशलालेखों क े खिलए यूपीएससी द्वारा उप -अ*ीक्षर्ण णिशलालेख क े रूप में चयवि+ हुए। उन्हें पदोन्न विकया गया और अं ः 30 Sू+ 1993 को सेवावि+वृखित्त से पहले 1992 में एएसआई क े संयुX वि+देशक ब+े। र्डॉ. रमेश +े कहा विक उ+से र्डीए+ अ£वाल और उ+क े अति*वXा द्वारा, उपलब्* कराए गए ई-स्र्टैंपेS क े आ*ार पर बीस-पंविX क े णिशलालेख पढ़+े क े खिलए, संपक: विकया गया, Sो वाद 5 में अणिभलेख पर पेपर सं. 203 सी- 1/1 र्थीा। उन्हों+े द+ुसार ई-स्र्टांपेS का का अ+ुवाद विकया और र्डीए+ अ£वाल को रिरपोर्ट: सौंप दी। अप+ी सिSरह क े दौरा+, र्डॉ. रमेश +े कहा विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उन्हों+े विदसंबर 1992 में णिशलालेख की एक अति रिरX सुपाठ्य स्वीर भेSी गयी, Sब इसे विदल्ली में र्डॉ. एसपी गुप्ता द्वारा विदया गया। उन्हों+े यह भी कहा विक उन्हों+े विदल्ली में एएसआई में अप+े काया:लय में स्वंय णिशलालेख को आंणिशक रूप से पढ़ा र्थीा। उन्हों+े कहा विक वह एक बार भार ीय पुरा त्व सविमति क े काया:लय में कई अन्य व्यविXयों क े सार्थी इकट्ठे हुए र्थीे, सिSसका +े ृत्व र्डॉ. एसपी गुप्ता कर रहे र्थीे। गवाह +े कहा विक वह गहर्डवाली +ागरी खिलविप क े णिशलालेखों से अवग र्थीा और उस+े एविप£ाविफया इंतिर्डका में प्रकाणिश राSवंश क े लगभग दस से बीस णिशलालेख देखे र्थीे। साक्षी +े उत्तर और दतिक्षर्ण भार में पाए गए संस्क ृ णिशलालेखों पर पचास से अति*क लेख खिलखे र्थीे। उ+में से, दस णिशलालेख उत्तर भार क े र्थीे, Sो सभी बारहवीं श ाब्दी ईस्वी क े अं क या उससे पहले की अवति* से संबंति* र्थीे। अप+ी सिSरह क े दौरा+, गवाह +े उस आ*ार को समझाया, सिSस पर यह कहा गया र्थीा विक णिशलालेख बारहवीं श ाब्दी क े र्थीे: "मेरे अ+ुसार, विवचारा*ी+ णिशलालेख की अवति* 12 वीं श ाब्दी कही Sा सक ी है, और Sहां भी मैं+े विवशेष रूप से 12 वीं श ाब्दी क े मध्य की अवति* का उपयोग विकया है, मेरा म लब है विक यह लगभग 1130 से 1170 ईस्वी क र्थीा। यविद एक बार मैं+े 12 वीं श ाब्दी क े मध्य क े आसपास की अवति* का उपयोग विकया है, ो यह वही रहेगा, भले ही मैं बाद में इसे 12 वीं श ाब्दी क े रूप में संदर्भिभ कर ा हूं। मेरी रिरपोर्ट: क े पृष्ठ 1 पर पैरा 2 में मेरे द्वारा ब ाए गए पुरालेखीय और आं रिरक साक्ष्य क े आ*ार पर ही (प्रदश: ओओएस 5-2) मैं विवचारा*ी+ णिशलालेख पाठ की अ+ुमावि+ अवति* पर पहुँचा।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

543. एएसआई में उ+की योग्य ा और अ+ुभव क े आ*ार पर र्डॉ. क े वी रमेश की विवशेषज्ञ ा रिरकॉर्ड: की बा है। सुन्नी वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े हालांविक र्डॉ. रमेश की गवाही क े संबं* में वि+म्+खिलखिख पहलुओं पर Sोर दे+े का प्रयास विकया: (i) श्लोक 27 क े अ+ुवाद में, भगवा+ विवष्र्णु क े अव ारों में -+रसिंसह, क ृ ष्र्ण, वाम+ और राम वर्भिर्ण है। इसखिलए, कर्थी+ क े अ+ुसार, णिशलालेख में भगवा+ राम पर कोई विवशेष महत्व या ध्या+ +हीं विदया गया है। (ii) र्डॉ. रमेश उत्तर भार क े इति हासकार +हीं हैं और उ+क े अ+ुसार णिशलालेखों की ब क व्याख्या कर+ा संभव +हीं है Sब क विक पुरालेखशास्त्री समकाली+ इति हास को + Sा+ ले। (iii) र्डॉ. रमेश को भार ीय पुरा त्व सोसाइर्टी (Sो एएसआई, Sो सरकारी वि+काय है, से णिभन्न है) क े काया:लय में र्डॉ. एस. पी. गुप्ता क े सार्थी बैठ+े का अवसर विमला; (iv) र्डॉ. एस. पी. गुप्ता, Sो ओ. पी. र्डब्ल्यू.-3 हैं, +े 1975 से पूव: आर.एस.एस. का सदस्य हो+ा स्वीकार विकया है और इसखिलए, पूवा:£ह से इंकार +हीं विकया Sा सक ा है; (v) र्डॉ. रमेश +े अप+ी रिरपोर्ट: क े पृष्ठ 9 पर स्पष्ट विकया विक श्लोक 5-पंविX 4 और 5 में, क ु ली+ परिरवार का संदभ: दे े हुए, उन्हों+े राम Sन्मभूविम को वीर ा क े Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में अ+ुवाद विकया है, सिSसका अर्थी: है विक राSवंश क े क्षवित्रय परिरवार का Sन्म-स्र्थीा+। वह स्पष्ट कर े हैं विक इस परिरवार क े सदस्य बाद में मेघसु क े समय साक े मंर्डल क े प्र*ा+ ब+ गए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह, कर्थी+ में दर्भिश कर ा है विक राम Sन्मभूविम का संदभ: भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े खिलए +हीं र्थीा, बस्जिल्क उस समय क े राSवंश क े Sन्म-स्र्थीा+ क े खिलए र्थीा; और (vi) रिरपोर्ट: क े पैरा 13 में श्लोक 27 में भगवा+ विवष्र्णु की प्रशंसा की गई है और भगवा+ राम का कोई विवशेष उल्लेख +हीं है।

544. इस कर्थी+ का मूल्यांक+ कर े समय, हमें इस बा पर ध्या+ दे+ा चाविहए विक र्डॉ. क े. वी. रमेश की योग्य ा और अ+ुभव पर संदेह कर+े क े खिलए कोई ठोस आ*ार प्रस् ु +हीं विकया गया है। र्डॉ. रमेश कई वषÂ से एएसआई में वि+युX र्थीे और अं ः संयुX महावि+देशक ब+े। उन्हों+े मूल णिशलालेख का अ+ुवाद प्रस् ु विकया है और उस आ*ार का भी उल्लेख विकया है सिSस पर उन्हों+े यह कहा है विक यह बारहवीं श ाब्दी से संबंति* है। उ+का कह+ा है विक पुरालेखशाखिस्त्रयों +े गोहिंवदचंˆ का उल्लेख विकया है Sो गहड़वाल राSवंश से संबंति* र्थीे और 1114 से 1155 ई. क े बीच शास+ विकया। इसक े अति रिरX, शुद्ध संस्क ृ, लेख+विवति* और पुरालेखीय विवशेष ाएं (र्डॉ. रमेश क े अ+ुसार) अणिभपुविष्ट कर ी हैं विक णिशलालेख बारहवीं श ाब्दी ई. से संबंति* हैं। र्डॉ. रमेश +े भगवा+ विवष्र्णु हरिर को समर्मिप मेघसु द्वारा एक श्रेष्ठ पत्र्थीर मंविदर क े वि+मा:र्ण का उल्लेख कर+े वाले श्लोक 21 से 24 क े बारे में भी ब ाया। उ+क े बाद अयुषचन्ˆ आये सिSन्हों+े अयोध्या पर शास+ कर े हुए साक े मंर्डल में Sलाशय ब+वाए। श्लोक 27 Sो अंश ः क्षति £स् हो गया है, उसकी व्याख्या र्डॉ रमेश +े अप+े मुख्य परीक्षर्ण में वि+म्+व की है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “13. श्लोक 27 (आंणिशक रूप से क्षति £स् ) विवष्र्णु क े अव ारों +रसिंसह (सिSन्हों+े विहर°यकश्यप को मारा र्थीा) क ृ ष्र्ण (सिSन्हों+े बार्णासुर को मारा र्थीा) वाम+ (सिSन्हों+े बाली को मारा र्थीा) और राम (सिSन्हों+े दस शीश वाले रावर्ण को मारा र्थीा) का वर्ण:+ है।” इसखिलए उन्हों+े कहा विक मेघसु द्वारा वि+र्मिम विवष्र्णु मंविदर अयोध्या की मंविदर +गरी में बारहवीं श ाब्दी ईस्वी से अस्जिस् त्व में रहा होगा। हमें इस स् र पर ध्या+ दे+ा चाविहए विक णिशलालेख की प्रामाणिर्णक ा को चु+ौ ी +हीं दी गई है। पाषार्ण स्लैब की भाषा बारहवीं श ाब्दी ई. की संस्क ृ है। चु+ौ ी उस स्र्थीा+ और रीक े से संबंति* है सिSसमें णिशलालेख विमला, सिSस पर अब विवचार विकया Sाएगा।

545. णिशलालेख विमल+े क े संबं* में, वाद 5 क े वादी गर्ण +े अशोक चंˆ चर्टS- (ओपीर्डब्ल्यू-8) क े साक्ष्य का अवलंब खिलया। गवाह Sो विक फ ै Sाबाद का वि+वासी है, +े कहा विक वह मैSेस्जिस्र्टक ऑर्टोमोबाइल क े +ाम से एक फम: में एक भागीदार है और सार्थी ही मैSेस्जिस्र्टक र्टॉकीS का माखिलक है। उस+े “पंचSन्य” +ामक साप्ताविहक पत्र का फ ै Sाबाद क्षेत्र का रिरपोर्ट:र हो+े का दावा विकया। णिशलालेख विमल+े क े संबं* में ओपीर्डब्ल्यू-8 +े कहा विक 6 विदसंबर 1992 को Sब विववाविद संरच+ा को ध्वस् कर विदया गया र्थीा, ो वह ी+ गुंबद वाली संरच+ा क े पतिश्चमी रफ समाचार सं£ह क े खिलए स्र्थील पर मौSूद र्थीा। Sब उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राम Sन्मभूविम परिरसर क े पूव- विहस्से में सम ल कर+े का काम विकया Sा रहा र्थीा, ो क ु छ पत्र्थीर पाए गए Sो मंविदर क े खंर्डहर प्र ी हुए। यह Sा+कारी विमल+े पर वे उस स्र्थील पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पहुंचे और सम ल कर+े की प्रविक्रया क े दौरा+ विमले मंविदर क े खंर्डहरों सविह सभी मूर्ति यों को उत्तर प्रदेश क े पुरा त्व विवभाग क े राम कर्थीा सं£हालय, राS सद+ अयोध्या की अणिभरक्षा में दे विदया गया।

546. ओपीर्डब्ल्यू-8 +े कहा विक 6 विदसंबर 1992 को Sब वह विववाविद संरच+ा क े पीछे खड़ा र्थीा, उस+े पतिश्चमी दीवार क े एक विहस्से का प्लास्र्टर र्टूर्टा हुआ देखा और असमा+ आकार क े ई ंर्ट पत्र्थीर दीवार में लगा देखा। संरच+ा क े विवध्वंस क े दौरा+ एक स्लैब (साढ़े ी+ फीर्ट लंबा, दो फीर्ट चौड़ा और छह इंच मोर्टा) +ीचे विगरा। वह कह े हैं विक विगरे हुए कई स्लैब विकसी मंविदर क े खंर्डहर प्र ी हुए और स्र्थील पर मौSूद एक सं +े उन्हें सूतिच विकया विक स्लैब एक पुरा+े मंविदर का णिशलालेख प्र ी हो ा है। णिशलालेख कार सेवकों द्वारा उठा खिलया गया Sो इस णिशलालेख को उठाकर राम कर्थीा क ुं S क े भव+ क े पास ले आए। गवाह +े कहा विक बाद में पुखिलस +े स्लैब को विहरास में ले खिलया। गवाह +े कहा विक 6 विदसंबर 1992 को मस्जिस्Sद क े विवध्वंस क े विद+ उ+का परिरचय र्डॉ. सु*ा मलय्या से हुआ। 13 विदसंबर 1992 को, र्डॉ. सु*ा मलय्या +े विवध्वंस क े दौरा+ विमले स्लैब का वि+रीक्षर्ण कर+े में उ+की मदद क े खिलए उ+से संपक: विकया। र्डा. एस. पी. गुप्ता और र्डा. सु*ा मलय्या द+ुसार राम कर्थीा कुं S क े भव+ में आए। गवाह +े कहा विक 15 विदसंबर, 1992 को णिशलालेख की एक फोर्टो दैवि+क ‘ आS’ क े लख+ऊ संस्करर्ण में प्रकाणिश हुई र्थीी। अप+ी सिSरह क े दौरा+, गवाह +े कहा विक उसे वह Sगह +हीं प ा र्थीी Sहां विगर+े से पहले स्लैब दीवार में लगा र्थीा। उन्हों+े दावा विकया विक णिशलालेख/स्लैब की स्वीर उन्हें रा में विकसी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ऐसे व्यविX द्वारा सौंपी गई र्थीी सिSसे वह पहचा+ +हीं सक े । उन्हों+े यह भी कहा विक स्लैब की स्वीर 13/20 विदसंबर 1992 क े पंचSन्य में प्रकाणिश हुई र्थीी।

547. ओपीर्डब्ल्यू-8 की गवाही को र्डॉ. *व+ +े वि+म्+खिलखिख आ*ारों पर चु+ौ ी दी है: (i) साक्षी +े अप+े मुख्य परीक्षर्ण में कहा विक वह विवध्वंस क े समय विववाविद भव+ क े पतिश्चमी रफ खड़ा र्थीा; (ii) अप+ी प्रति परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े कहा विक वह विवध्वंस क े समय विववाविद भव+ क े दतिक्षर्णी रफ खड़ा र्थीा और *ूल क े कारर्ण कु छ भी स्पष्ट रूप से विदखाई +हीं दे रहा र्थीा; (iii) इसक े बावSूद उस+े उत्कीर्ण:+ वाले स्लैब को देख+े का दावा विकया है (iv) विफर वह कह ा है विक विवध्वंस क े अगले विद+ वह र्डॉ. सु*ा मलय्या और र्डॉ. एस. पी. गुप्ता क े सार्थी इस णिशलालेख की स्वीर ले+े गया; (v) र्डा. एस. पी. गुप्ता 1975 क े पूव: आर.एस.एस. क े सदस्य र्थीे और र्डॉ. रमेश +े भी र्डा. एस. पी. गुप्ता परिरतिच हो+े का उल्लेख विकया है; (vi) साक्षी विववाविद स्र्थील की स्वीर यह कह े हुए पहचा+ +हीं पाया विक उ+ स्वीरों से यह स्पष्ट +हीं है विक क्या यह पतिश्चमी सीमा र्थीी क्योंविक वह अप+े Sीव+काल में क े वल एक बार उस स्र्थीा+ पर गया र्थीा; और (vii) प्रारंभ में साक्षी +े कहा विक दर्भिश णिशलालेख दतिक्षर्णी गुंबद की पतिश्चमी दीवार से विगरा र्थीा हिंक ु तिचत्र देख+े क े पश्चा ् उस+े कहा विक वह णिशलालेख mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sो संरच+ा क े विवध्वंस क े पश्चा ् उपलब्* र्थीा, वह दीवार पर लगा प्र ी +हीं हुआ। साक्ष्य की गवाही में विवसंगति यां, सिSसका र्डॉ. *व+ द्वारा प्रचुर विवश्लेषर्ण विकया गया है, से गवाह की विवश्वस+ीय ा, स्र्थील पर उसकी उपस्जिस्र्थीति और 6 विदसंबर 1992 को विववाविद संरच+ा क े विवध्वंस क े दौरा+ स्लैब क े विमल+े पर गंभीर संदेह उत्पन्न हो Sा ा है। 6 विदसंबर 1992 को हुए विवध्वंस क े बाद विववाविद स्र्थील से पत्र्थीर क े णिशलालेख की प्राविप्त को स्र्थीाविप +हीं विकया गया है। अणिभरक्षा की कड़ी को स्र्थीाविप +हीं विकया गया है। पत्र्थीर क े णिशलालेख की बरामदगी क े बारे में ओपीर्डब्ल्यू-8 क े साक्ष्य पर विवश्वास +हीं हो ा। एक ओर, उसकी गवाही को पढ़ े हुए, यह स्पष्ट है विक उठ+े वाली *ूल क े ढेर क े कारर्ण साक्षी को क ु छ भी स्पष्ट रूप से विदखाई +हीं दे रहा र्थीा। उन्हों+े विकस प्रकार एक णिशलालेख को देखा या सिSस स्लैब पर वह लगा र्थीा उसे देखा, यह क: संग स्पष्टीकरर्ण से परे है। वास् व में, अप+ी सिSरह क े दौरा+, गवाह +े कहा विक: "चट्टा+ का णिशलालेख/स्लैब Sो संरच+ा क े विवध्वंस क े बाद उपलब्* र्थीा, दीवार में लगा प्र ी +हीं हो ा।” इस प्रकार ओपीर्डब्ल्यू-8 क े साक्ष्य से यह +हीं कहा Sा सक ा विक णिशलालेख/स्लैब विववाविद स्र्थील से प्राप्त हुआ र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

548. चूंविक णिशलालेख का विववाविद संरच+ा से विमल+ा साक्ष्य द्वारा सिसद्ध +हीं है, वाद 5 क े वादी द्वारा मामले में णिशलालेख क े आ*ार पर Sोड़ी गयी कड़ी अ+ुपस्जिस्र्थी पायी गयी। णिशलालेख से अयोध्या में बारहवीं श ाब्दी ई. क े विवष्र्णु हरिर मंविदर क े अस्जिस् त्व का प ा चलेगा लेविक+ एक बार णिशलालेख का प्रश्नग स्र्थील से विमल+ा अविवश्वस+ीय हो Sाए ो णिशलालेख इस वि+ष्कष: का आ*ार +हीं हो सक ा विक णिशलालेख में सन्दर्भिभ विवष्र्णु हरिर मंविदर वही मंविदर र्थीा Sो ध्वस् संरच+ा क े स्र्थीा+ पर अस्जिस् त्वमा+ र्थीा। ए+.13 आस्र्थीा और विवश्वास का ध्रुव ारा

549. इति हास क े कालक्रम में, विवष्र्णु क े अव ार क े रूप में भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ में विहन्दुओं का विवश्वास उ+की आस्र्थीा एवं विवश्वास है। उ+की आस्र्थीा मुख्य ः वि+म्+ क े मामले में अयोध्या को विदये गये महत्व पर आ*ारिर है: (i) *म: शास्त्र, वास्जिल्मकी रामायर्ण, स्कन्द पुरार्ण आैर रामचरिर मा+स में पीठासी+ भगवा+ राम, मुख्य रूप अयोध्या से Sुर्डे हुए है। श्री पी.ए+. विमश्रा (वाद सं. 5 में प्रति वादी सं.20 अखिखल भार ीय श्री राम Sन्म भूमी पु+रूद्घार सविमति की आेर से उपस्जिस्र्थी विवद्व अति*वXा) द्वारा इस न्यायलय में उ+की प्रस् ुति यों को बढ़ा चढ़ा कर प्रस् ु विकया है, सिSन्हो+े *म: आैर पौराणिर्णक कर्थीा को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इति हास क े ा+े बा+े क े रूप में अलंक ृ करक े प्रस् ु विकया है, आैर (ii) यात्रा-वृत्तां, राSपत्र और पुस् क ें । इस न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु सम्पखित्त क े दस् ोवेSों से उत्पन्न, विवश्वास एवं आस्र्थीा और यात्रा, गSर्ट एवं पुस् कों पर अवलंम्ब क े सास्जिक्ष्यक मूल्य, दो+ों की न्यातियक समीक्षा की सीमा का उत्तर दे+ा आवश्यक है।

550. स्कन्द पुरार्ण क े प्रर्थीम विवस् ार सिSस पर अवलंम्ब प्रस् ु विकया हैः वह इस प्रकार हैः- " मैं वि+र्मिवकार भगवा+ राम क े साम+े शीश +वा ा हूं, Sो परम ब्रह्म है सिS+क े +ेत्र कमल क े समा+ हैं और वे इ +ा गाढ़ा +ीला है सिS +ा अलसी (रंग क े रूप) का पुष्प हैं और सिSन्हों+े रावर्ण का व* विकया है। महा+ और पविवत्र अयोध्या शहर है Sो बुराई कर+े वालों क े खिलए दुग:म है। अयोध्या में कौ+ +हीं आ+ा चाहेगा, Sहां भगवा+ हरिर वि+वास कर े है? यह विदव्य और भव्य +गर सारायु +दी क े र्ट पर है। यह अमराव ी (इंˆ की राS*ा+ी) क े बराबर है और कई पस्जिस्वयों द्वारा इस +गर में शरर्ण खिलया Sा ा रहा है। (श्रीमद स्क ं दपुरम.

II. VIII... 29-31)” स्क ं द पुरार्ण में, भXों क े खिलए भगवा+ राम की पूSा को मुविX क े सा*+ क े रूप में पूSा कर+े का एक विव*ा+ है,एक अन्य वि+ष्कष: में भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ का उल्लेख हैः mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भX सरयू +दी क े Sल में स्+ा+ कर े है आैर ब हिंपर्डारका की पूSा कर े हैं।Sो पाविपयों का उद्घार कर े हैं और हमेशा अच्छे कमÂ क े पुरुषों को सदबुतिद्घ प्रदा+ कर े हैं। वार्मिषक उत्सव +वरात्रोत्सव क े दौरा+ भव्य सौन्दय: क े सार्थी म+ाया Sा+ा चाविहए। भXों को इसक े पतिश्चम में स्जिस्र्थी विवघ्+ेश्वर की पूSा कर+ी चाविहए। सिSसक े द्वारा म+ुष्य अप+े Sीव+ में कम से कम बा*ाआें की माँग कर े है। इसखिलए विवघ्+ेश्वर, सभी वांणिछ लाभों की पूर्ति कर े है... (श्रीमद स्क ं दापुरम II. VIII. 10.15-17) "उस स्र्थीा+ क े उत्तर-पूव: में भगवा+ श्री राम का Sन्म का स्र्थीा+ है। Sन्म का यह पविवत्र स्र्थीा+ मोक्ष प्राविप्त का सा*+ है। यह कहा Sा ा है विक Sन्म का स्र्थीा+, विवध्+ेश्वर क े पूव: में, वसिसष्ठ क े उत्तर में और लौमासा क े पतिश्चम में स्जिस्र्थी है क े वल यहां Sाकर एक आदमी गभ: में आ+े से (या+ी पु+S:न्म) से छ ु र्टकारा पा सक ा है। दा+ कर+े, पस्या कर+े या बखिलदा+ कर+े या पविवत्र स्र्थीलों की ीर्थी: यात्रा कर+े की कोई आवश्यक ा +हीं है। +वमी विक ति र्थीी क े विद+ म+ुष्य को पविवत्र शपर्थी ले+ी चाविहए। पविवत्र स्+ा+ और दा+ की शविX से वह Sन्मों क े बं*+ों से मुX हो Sा ा है। Sन्म स्र्थीा+ पर Sाकर कोई व्यविX उस लाभ को प्राप्त कर ा है Sो प्रत्येक विद+ हSारों कविपला गाय दा+ करक े प्राप्त कर ा है। Sन्म स्र्थीा+ देखकर पस्जिस्वयों द्वारा प्रति वष: राSसूय बखिलदा+ आैर अविग्नहोत्र बखिलदा+ की पस्या कर+े क े हSार गु+ा ज्यादा क े गुर्ण प्राप्त हो े है। पविवत्र रर्थी को विवशेष रूप से Sन्म क े स्र्थीा+ पर देखकर, वह मा ा और विप ा क े सार्थी-सार्थी उपदेशकों क े प्रति वि+ष्ठा से संपन्न पविवत्र पुरुषों की योग्य ा प्राप्त कर ा है। (श्रीमद् स्क ं दापुरम II. VIII. 10. 18-25)

551. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा श्री Sफरयाब सिSला+ी द्वारा श्री पी ए+ विमश्रा द्वारा भरोसा विकए गए *ार्मिमक शास्त्रों में स्र्थीाविप प्रस् ुति याँ पर बारीक प्रति विक्रया दी है। विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा +े क: विदया विकmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) राम Sन्मभूविम स्र्थील का वाल्मीविक रामायर्ण में या रामचरिर मा+स में कोई उल्लेख +हीं है, Sो 1574 ए.र्डी. में है; और (ii) *ार्मिमक £ंर्थीों में राम Sन्मभूविम मंविदर या Sन्मस्र्थीा+ मंविदर का कोई उल्लेख +हीं है। प्रस् ुति सिSस क े द्वारा आ£ह विकया गया है विक विहन्दुआें विक आस्र्थीा में एैसा कोइ: विववाद +हीं है विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा, लेविक+ Sन्मस्र्थीा+ मंविदर, सिSसकी पूSा की Sा ी है, विववाविद स्र्थील क े उत्तर में है। इसक े अलावा, यह विक 1855 क े बाद कहा गया है, बाहरी अहा े में चबू रा को Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में पूSा गया र्थीा। इसखिलए, श्री सिSला+ी क े अ+ुसार, 1949 में उत्पन्न हुए स्र्थील पर विववाद से पहले भगवा+ राम क े Sन्म क े स्र्थीा+ क े रूप में क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे क े क्षेत्र का कोई सबू +हीं है।

552. ऊपर उसिल्लखिख *ार्मिमक £ंर्थीों में हिंहदुओं क े दावे का आ*ार वि+*ा:रिर कर+े क े बाद, Sगद्गुरु रामा+ंदाचाय: की गवाही पर ध्या+ आक: विष कर+ा आवश्यक हो Sा ा है, एक गवाह सिSसे श्री सिSला+ी +े खुद बड़े पैमा+े पर अवलंम्ब खिलया र्थीा। उ+क े मौखिखक कÂ क े दौरा+,श्री सिSला+ी +े गवाह को सबसे अति*क विवद्वा+ व्यविX क े रूप में वर्भिर्ण विकया Sो *म: Sा+ ा है। उन्हें रामा+ंद की उपाति* से विवभूविष विकया गया है। गवाह शैशव काल से ही एक दृश्य विवकलांग ा से पीविड़ र्थीे। इ+ चु+ौति यों का साम+ा कर े हुए, उन्हों+े वारार्णसी क े सम्पूर्णा:+ंद संस्क ृ विवश्व विवद्यालय में प्रर्थीम विवद्यार्भिर्थी आैर वाचस्पति का अ+ुशरर्ण कर े हुए आचाय: की तिर्ड£ी प्राप्त की। गवाह क े पास एक पीएच. र्डी. और एक र्डी. खिलर्ट की उपाति* है और मुख्य परीक्षा क े एवS mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में उ+क े साक्ष्य की ारीख पर णिछयत्तर प्रकाश+ र्थीे। उदू: को छोड़कर, साक्षी +े कहा विक उन्हे लगभग सभी भार ीय भाषाओं का ज्ञा+ र्थीा। अप+ी मुख्य परीक्षा में, गवाह +े कहा: "मेरे अध्यय+ आैर Sा+कारी क े अ+ुसार, अयोध्या में विववाविद स्र्थील श्री राम का Sन्मस्र्थीा+ है, अ+ं काल से, परंपराओं और आस्र्थीा क े अ+ुसार विववाविद स्र्थील को भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ मा+ा Sा ा है और उस स्र्थीा+ की वि+रं र पूSा की Sा ी है।" गवाह +े गोस्वामी ुलसी दास द्वारा श्री ुलसी दोहाश क और वाल्मीविक रामायर्ण क े खंर्ड 18 (बाल खंर्ड) और स्क ं न्द पुरार्ण क े वैष्र्णव खंर्ड पर भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ पर विवश्वास और आस्र्थीा को ब+ाए रख+े क े खिलए अवलम्ब खिलया। अप+ी सिSरह क े दौरा+, गवाह की श्री रामचरिर मा+स क े ज्ञा+ पर परीक्षा की गइ:, Sब उन्हो+े कहा: "...पुस् क क े समाप+ भाग का शीष:क 'उत्तरका°र्ड' है। उत्तरका°र्ड में चाैर्थीे दोहे की पांचवी पंविX, Sो इस राम Sन्म भूविम से सम्बस्जिन्* है इस प्रकार है- Sन्म भूविम मम पुरी सुहाव+ उत्तर विदसिस बह सरSू पाववि+ (मा+स 7/4/5)। उपरोX दोहा का अर्थी: है -मेरे विप्रय +गर में उत्तर की ओर Sन्म भूविम स्र्थील है Sहां से सरयू +दी बह ी है। यह सुझाव दे+ा गल है विक इस Sोड़े में Sन्मभूविम का कोई उल्लेख +हीं है। वास् व में यह कहा गया है विक यह सुखद शहर मेरा Sन्म स्र्थीा+ है सिSसका अर्थी: है विक मेरे सुखद शहर में Sन्मभूविम स्र्थील है।" साक्षी +े अप+ी सिSरह क े दौरा+ पांचवें और सा वें दोहे क े महत्व को समझाया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "पांचवें दोहे में, Sो 'Sन्मभूविम' शब्द से शुरू हो ा है, शहर शब्द पूरे शहर क े खिलए है + विक विकसी भी विवशेष स्र्थील क े खिलए और एक ही बा का उल्लेख 7 वें दोहें में 'इहा+' शब्द द्वारा विकया गया है, आैर वही चीS दोहे सं. 4 में उसी बा को 'अव*पुरी' क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है। यह सुझाव दे+ा गल है विक इ+ सभी ी+ दाेहों में, शब्द 'पुरिर' का उपयोग Sन्म भूविम क े अर्थी: में विकया Sा ा र्थीा। यह सही है विक रामचरिर मा+स में, इस दोहें को छोड़कर, कहीं और राम Sन्मभूविम का कोई उल्लेख +हीं है। यह सच है विक रामचरिर मा+स में विवणिभन्न स्र्थीा+ों पर अयोध्या और अव*पुरी का उल्लेख है। श्री रामचरिर मा+स में अयोध्या क े वि+वास का कोई उल्लेख +हीं है। र्थीाविप, वाल्मीविक रामायर्ण- "बालका°र्ड" क े पाँचवें भाग में इस आशय का उल्लेख विमल ा है.

553. स्वामी अविवमुX े श्वरा+ंद सरस्व ी (र्डीर्डब्ल्यू 20/2) +े कहा विक उ+क े 'अध्यय+ और ज्ञा+' क े अ+ुसार अयोध्या में विववाविद स्र्थील भगवा+ श्री राम का Sन्म-स्र्थीा+ है और भXों द्वारा वि+यविम रूप से उ+की पूSा की Sा ी है। उन्हों+े *म:£न्र्थीों पर अप+ा विवश्वास स्र्थीाविप विकया, विवशेष रूप से वाल्मीविक रामायर्ण में, सिSसक े संदभ: में वे एक संदभ: प्रस् ु कर े हैं: "श्रीमद् बाल्मीविक रामायर्ण क े बालका°र्ड क े पन्ˆहवें सग: क े ीसरे श्लोक (दोहे) में भगवा+ +ारायर्ण में स्वयं, Sन्म ले+े से पूव: उ+क े Sन्म स्र्थीा+ क े बारे में विवचार कर+ा, उ+क े Sन्म स्र्थीा+ क े महत्व को सिसद्घ कर े र्थीे।" अयोध्या महात्म्य क े दशम अध्याय का उल्लेख कर े हुए, साक्षी Sन्मस्र्थीा+ क े महत्व पर अवलम्ब खिलया: "यह विक अयोध्या की यात्रा विवति* का वर्ण:+ स्कन्द पुरार्ण क े वैष्र्णव ख°र्ड क े अयोध्या महात्म्य में श्री राम का Sन्मस्र्थीा+ स्पष्ट रूप से संदर्भिभ है और इसका महत्व विदया गया है। पुरार्णों में उपयु:X संदभ: में वर्भिर्ण वर्ण:+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अभी भी अयोध्या में स्जिस्र्थी हैं। इसीखिलए स+ा + *म: क े सभी अ+ुयायी इ+ स्र्थीा+ों पर Sा े हैं, विवशेष रूप से अयोध्या क े श्री राम Sन्मभूविम में दश:+ कर े हैं और परिरक्रमा कर े है आैर वहां की *ूल अप+े सिसर पर लगा े हैं और *न्य की अ+ुभूति प्राप्त कर े हैं।" उन्हों+े पूव- मुख्य द्वार की दतिक्षर्णी दीवार पर वराह (ईश्वर) की प्रति मा का उल्लेख विकया। साक्षी +े राम Sन्मभूविम क े अलावा अयोध्या में सिS+ अन्य मंविदरों की पूSा की र्थीी, उ+क े बारें में ब ाया। उन्हों+े कहा विक वष: 1990 में एक पूर्ण: संरच+ा र्थीी। उन्हों+े पूव- द्वार से प्रवेश विकया र्थीा और मुख्य द्वार पर वि£ल क े सार्थी एक दीवार र्थीी। उन्हों+े रामचबू रे का दश:+ विकया। अप+ी प्रति परीक्षा क े दौरा+, साक्षी +े कहा विक रामचरिर मा+स में राम Sन्मभूविम मंविदर का संदभ: +हीं है और + ही इसमें मंविदर क े विवध्वंस पर विकसी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण का विवणिशष्ट संदभ: है। अप+े साक्ष्य क े दौरा+, साक्षी +े विववाविद भव+ पर उत्कीर्ण:+ क े विवषय में ब ाया, सिSसमें वष: 1960 में सिSला गSेविर्टयर, फ ै Sाबाद उत्तर प्रदेश का संदभ: र्थीा और यह संदभ: विक एेसे विकसी स्र्थीा+ पर एक भव+ का वि+मा:र्ण होगा Sहां देव ा उ रेंगे। साक्षी +े कहा विक वह स्र्थील भगवा+ राम क े अव ार क े स्र्थील का प्रति वि+ति*त्व कर ा है। अप+े प्रति परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े इस बा पर विवचार विकया विक क्या शास्त्रों में भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ का संदभ: है। साक्षी +े कहा विक पुरार्णों में भगवा+ राम क े विकसी विवशेष Sन्म-स्र्थीा+ का कोई संदभ: +हीं है सिसवाय अयोध्या महात्म्य और स्कन्द पुरार्ण क े वैभव खंर्ड क े । हालांविक, उन्हों+े कहा विक उन्हें विववाविद स्र्थील से विकसी भी स्र्थीा+ की दूरी का स्मरर्ण +हीं है। अप+ी प्रति परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े रामचबू रे में की गइ: पूSा क े खिलए एक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्पष्टीकरर्ण प्रस् ु विकया, सिSसमें कहा गया र्थीा विक वष: 1858 में मस्जिस्Sद क े पास एक बाहरी बाड़े का वि+मा:र्ण हो+े क े बाद हिंहदुओं को अंदर प्रवेश कर+े की अ+ुमति +हीं र्थीी, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप उन्हों+े बाहरी चबू रे पर पूSा विकया। साक्षी क े अ+ुसार इस स्जिस्र्थीति को मस्जिस्Sद क े अंदर मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर+े क े पश्चा वष: 1949 में परिरवर्ति कर विदया गया र्थीा।

554. सत्य +ारायर्ण वित्रपाठी (र्डीर्डब्ल्यू 3/3) +े कहा विक रामचरिर मा+स में रामचंˆSी क े Sन्म क े संबं* में विकसी विवशेष स्र्थीा+ का कोइ: उल्लेख +हीं है, लेविक+ क े वल अयोध्या क े बारे में उल्लेख है। महं रामSी दास (र्डीर्डब्ल्यू 3/7) से प्रति परीक्षा क े दौरा+ पूछा गया र्थीा विक क्या श्री रामचरिर मा+स में भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ का संदभ: है। साक्षी क े प्रश्न और उत्तर +ीचे वर्भिर्ण हैं: प्रश्न:- क्या श्री 'रामचरिर मा+स' क े उत्तरका°र्ड क े उपरोX दोहे सं. 71 (बी) क े बाद ीसरे, चाैर्थीे, पाँचवें, छठवें, सा वें, आठवें चौपाइ: में रामचन्ˆ Sी की प्रशंसा क े बारे में उल्लेख है आैर उसमें रामचन्ˆ Sी क े Sन्म स्र्थीा+ क े बारे में कोई उल्लेख +हीं विकया गया है। उत्तरः- उपरोX चौपाइयों में रामचन्ˆ Sी क े Sन्म-स्र्थीा+ क े विवषय में कोइ: उल्लेख +ही है, यह क े वल रामचंˆSी क े Sन्म ले+े क े बारे में है। अयोध्या महात्म्य पर अवलंम्ब ले े हुए, साक्षी +े सी ाक ू प में Sन्म-स्र्थीा+ क े संदभ: में – विववाविद स्र्थील क े पास की दीवार का उल्लेख विकया। साक्षी क े अ+ुसार: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "सी ाक ू प अविग्नकोर्ण में स्जिस्र्थी है आैर Sन्मस्र्थीा+ सी ाक ू प क े पतिश्चम में है।" उन्हों+े वर्ण:+ विकया विक सी ाक ू प से Sन्म स्र्थीा+ क की दूरी लगभग दो सौ कदम होगी। र्डॉ. राSीव *व+ और श्री Sफरयाब सिSला+ी +े हिंहदुओं क े दावे को चु+ौ ी दे े हुए कहा विक विववाविद ढाँचे क े क ें ˆीय गुंबद क े अंदर का स्र्थील भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ का प्रदर्भिश कर ा है। उपरोX सातिक्षयों क े साक्ष्यों पर श्री सिSला+ी द्वारा अवलम्ब खिलया आैर उन्हों+े यह क: विदया विक: (i) शास्त्रों में राम Sन्मभूविम +ामक स्र्थील का कोइ: संदभ: +हीं है; (ii) *म:£ंर्थीों में राम Sन्मभूविम मंविदर या Sन्मस्र्थीा+ मंविदर का कोई संदभ: +हीं है; और (iii) इस बा का कोई साक्ष्य +हीं है विक क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे क े स्र्थीा+ की पूSा भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में वष: 1950 से पूव: की गई र्थीी। श्री सिSला+ी +े प्रस् ु विकया विक वष: 1855 क े बाद भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में चबू रे की पूSा की Sा रही र्थीी, Sो इस *ारर्णा को पुष्ट कर ा है विक क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे का स्र्थीा+ भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में मा+ा गया र्थीा।

555. विहन्दू साक्षी सिSन्हें पूव: में भी संदर्भिभ विकया गया है, उसक े द्वारा क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ हो+े पर अप+ी आस्र्थीा और विवश्वास क े अा*ार पर कर्थी+ विकए हैं। सातिक्षयों +े *म:£ंर्थीों 'अयोध्या महात्म्य, वाल्मीविक रामायर्ण और रामचरिर मा+स ' की अन्:वस् ु की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्याख्या करक े उ+क े विवश्वास क े आ*ार को समझाया। सातिक्षयों की प्रति परीक्षा +े न्यायालय क े इस वि+ष्कष: पर पहुंच+े क े खिलए विकसी भी आ*ार को स्र्थीाविप +हीं विकया है विक इ+ सातिक्षयों क े माध्यम से हिंहदुओं क े विवश्वास वास् विवक +हीं है अर्थीवा यह क े वल विदखावा है। आस्र्थीा आैर विवश्वास क े मामले विवश्वास कर+े वालो लोगों क े व्यविXग क्षेत्र में हैं। Sो आत्मसं ुविष्ट प्रदा+ कर ा है वह रहस्यपूर्ण: है। क्या विवश्वास न्यातियक Sांच क े दायरे से परे है। यह ऐसा मामला +हीं है Sहां साक्षी क े कर्थी+ से संक े विमल ा है विक आस्र्थीा या विवश्वास एक आवरर्ण है या यह क े वल मुकदमेबाSी में एक रर्ण+ीति क े रूप में रखा Sा रहा है। एक बार Sब सातिक्षयों +े विवश्वास क े आ*ार पर बया+ विदया और इसकी वास् विवक ा पर संदेह कर+े क े खिलए कु छ भी +हीं है, ो यह विवश्वास क े आ*ार पर प्रश्न कर+े क े खिलए न्यायालय क े खिलए उपलब्* +हीं है। *ार्मिमक विववेच+ा विवणिभन्न अ+ुमा+ों क े प्रति संवेद+शील हो ी है। न्यायालय क े द्वारा यह अणिभवि+र्ण- + विकया Sा+ा उतिच होगा विक यविद कोई व्याख्या हो ो स्वीक ृ की Sा+ी चाविहए। विवश्वास विकसी व्यविXग विवश्वास कर+े वाले का अन् व:स् ु है। प्रर्थीम ः Sब न्यायालय क े पास यह स्वीकार कर+े क े खिलए कोई अं व:स् ु हो ी है विक आस्र्थीा अर्थीवा विवश्वास दो+ों वास् विवक हैं और ढोंग +हीं हैं, ो उसे उपासक क े विवश्वास को स्वीकार कर+ा चाविहए। हमें यह भली-भांति पहचा++ा चाविहए विक सभी *म: र्थीा उ+क े £ंर्थीों का हिंहदू *म: र्थीा इस्लाम में उ+का समावेश हो। एक *म:वि+रपेक्ष संविव*ा+ का मूल्य समा+ सम्मा+ की परंपरा में वि+विह है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

556. थ्य यह है विक विवश्वास आैर आस्र्थीा को मा+ा Sा ा है, हालांविक मामला Sो वास् विवक स्र्थीा+ से णिभन्न है Sहाँ पूSा की Sा ी र्थीी। उत्तराद्ध: को य कर+े में, सास्जिक्ष्यक अणिभलेखों का साव*ा+ीपूव:क मूल्यांक+ कर+ा होगा। व:मा+ मामले की साक्ष्य साम£ी में अन्य बा ों क े अलावा शाविमल है (i) यात्रा-वृत्तां (ii) राSपत्र; (iii) प्रश्न में स्र्थील पर विववादों का एेसा क्रम Sो संबंति* दस् ावेSी अणिभलेख की उत्पखित्त से; और (iv) ी+ गुम्बदाकार ढाँचे क े उपयोग से संबंति* दस् ावेSी साम£ी।

557. मामले क े इस पहलू से वि+पर्ट+े क े खिलए, हमें एक दोहरी कविठ+ाई का साम+ा कर+ा होगा सिSसे उच्च न्यायालय +े मा+ा र्थीा। उस कविठ+ाई का पहला पहलू इति हास क े पांच सौ वषÂ से संबंति* दस् ावेSी साक्ष्य की Sांच कर+े से संबंति* है। उच्च न्यायालय +े इति हास को सुलझा+े में अप+ी कविठ+ाई को व्यX विकया: “3672. +ीचे क्या है? यह प्रश्न इति हास क े 500 वष: से अति*क की अवति* में अति Sविर्टल ा का ब+ा हुआ है, इति हास की विवणिभन्न पुस् कों से कोई स्पष्ट Sा+कारी +हीं प्राप्त हुइ:..... वास् व में, समकाली+ अणिभलेखों में विववाद्यकों का उत्तर, एक या दूसरे रीक े से, वि+तिश्च ा क े सार्थी +हीं विदया गया, हिंक ु क ु छ अणिभलेख क े सार्थी, Sो लगभग 200 वषÂ क े पश्चा ् खिलखा गया र्थीा अर्थीा: ् 18 वीं श ाब्दी में, यह कर्थी+ है विक मंविदर क े अस्जिस् त्व, उसका विवध्वंस और विववाविद भव+ क े वि+मा:र्ण क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बारे में है, Sबविक क ु छ प्रसिसद्ध इति हासकारों में इसका म भेद हैं और क ु छ इति हास की पुस् क ें मौ+ हैं।" अप+े वि+र्ण:य क े एक अन्य खंर्ड में, उच्च न्यायालय +े रेखांविक विकया: (i) अयोध्या का *ार्मिमक महत्व; और (ii) वैष्र्णवों क े खिलए इसका महत्व। इस वि+र्मिववाद विवश्वास क े सार्थी विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा, उच्च न्यायालय को एक और कविठ+ाई का साम+ा कर+ा पड़ा। यह भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ को Sोड़+े क े प्रयास से संबंति* है, Sैसा विक शास्त्रों में सास्जिक्ष्यक अणिभलेखों में से उत्पन्न पहचा+ से परिरलतिक्ष हो ा है। उच्च न्यायालय +े इस थ्य की ओर संक े विकया विक शास्त्र अयोध्या में Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में विकसी विवशेष स्र्थीा+ की पहचा+ +हीं कर े। हिंहदू गवाहों द्वारा विवशेष रूप से वाल्मीविक रामायर्ण और अयोध्या महात्मा पर रखी गई व्याख्या का पहले ही उल्लेख विकया Sा चुका है। उच्च न्यायालय का विवचार यह र्थीा विक अयोध्या में भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में विवणिशष्ट +ाम से अणिभविह की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, इति हास की खोS करक े र्थीा *ार्मिमक आस्र्थीा को *रा ल पर रखकर वि+तिश्च वि+ष्कष: वि+काल+ा कविठ+ र्थीा। यह न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+र्ण:य से वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: प्रकर्ट हो े है: "हमारे म+ को इ +े साविहत्य आविद में उलझा दे+े क े बSाय, क ु छ पहलुओं को, Sो हम+े ऊपर ब ाए हैं सिS+का हम+े ऊपर उल्लेख विकया है, संक्षेप में उल्लेख विकया Sा सक ा है सिSससे संभव ः यह विवचार विकया Sा सक े गा विक प्रश्नों का उत्तर क ै से विदया Sाए। अयोध्या की प्राची+ ा विववाविद +हीं है. यह भी विववाविद +हीं है विक अयोध्या को *म: और मुख्य रूप से भगवा+ राम क े अ+ुयायी वैष्र्णव का प्रमुख mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्र्थीा+ मा+ा Sा ा है। भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ और उन्हो+ें वहाँ राS विकया।वाल्मीविक रामायर्ण और गोस्वामी ुलसीदास क े रामचरिर मा+स आैर अन्य Sैसे स्कन्द पुरार्ण आविद *ार्मिमक £ंर्थीों में यह उल्लेख है विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा और यह उ+का Sन्मस्र्थीा+ है लेविक+ अयोध्या में कोई विवशेष स्र्थीा+ +हीं है सिSसे उ+का Sन्म का स्र्थीा+ कहा Sा सक े । एक ओर हमें सर्टीक स्र्थीा+ या स्र्थील क े बारे में कोई Sा+कारी +हीं विमल ी है, लेविक+ सार्थी ही सार्थी हम यह भी मा+ सक े हैं विक एक बार Sब यह विववाविद +हीं हो Sा ा है विक अयोध्या में भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा, ो एक ऐसा स्र्थीा+ हो+ा चाविहए Sो उ+क े Sन्म स्र्थीा+ पर संक ु तिच हो सक ा है। यह सच है विक आS भी लंबे समय क े बाद Sन्म स्र्थीा+ की खोS बहु आसा+ +हीं हो सक ी है यविद कोई इस संबं* में क े वल ी+ या चार पीविढ़यों पहले से प ा लगा+े का प्रयास करे। इसखिलए,...इस रह की प्राची+ ा क े मामले में Sांच की रह लगभग असंभव है। हिंक ु Sब इस प्रकार से विववाद उठाया Sा ा है ब हम साक्ष्य क े विवति* में, विवशेष रूप से दीवा+ी मामलों में यर्थीा लागू, अर्थीा: ् प्रातियक ा की प्रबल ा से, अच्छी रह से स्वीक ृ सिसद्धां पर Sा े हैं। (प्रभाव वर्ति* )

558. व:मा+ Sैसी स्जिस्र्थीति यों में संभाव+ाओं क े प्रातियक ा या सं ुल+ क े परीक्षर्ण को लागू कर+े में गंभीर सीमाएं हैं, Sहां खिलखिख पाठ में सिS +ा भी *ार्मिमक परंपराओं में विवश्वास की स्र्थीाप+ा की Sा ी है, Sहां *म: द्वारा विवश्वास को बढ़ावा विदया Sा ा है, Sैसा विक महाकाव्यों में पैदा हुई पौराणिर्णक और सांस्क ृ ति क परंपराओं द्वारा विकया Sा ा है।, संगी और त्योहारों का त्योहार भXों की आत्मा को सुख प्रदा+ कर ा है। उच्च न्यायालय +े सिS+ कविठ+ाइयों पर ध्या+ विदया है, उन्हें देख े हुए, अब दस् ावेSी साम£ी क े विवणिभन्न पहलुओं का और विवस् ार से विवश्लेषर्ण कर+ा आवश्यक है।

559. एक ओर अबुल फSल क े 'आइ+-ए-अकबरी' है। क+:ल एच एस. Sेरेर्ट का अं£ेSी अ+ुवाद पहली बार 1893-96 में प्रकाणिश हुआ र्थीा। सर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sदु+ार्थी सरकार +े विद्व ीय संस्करर्ण को संशोति* कर उसकी व्याख्या की सिSसमें आइ+ा-ए-अकबरी को इस प्रकार संदर्भिभ विकया गया है: ".....मुसलमा+ों क े काला+ुक्रम और भूविववरर्ण क े पहले हिंहदुओं क े *म:, दश:+ और विवज्ञा+ का विवश्वकोश Sैसा विक उन्हीं विवषयों पर हिंहदुओं क े विवचारों क े सार्थी ुल+ा कर+े क े खिलए साविहस्जित्यक अणिभसमय द्वारा अपेतिक्ष है।" 17 मई, 1894 को खिलखे गये अप+े संपादकीय लेख में Sेरेर्ट +े इस विवषय में शाविमल विवषयों की विवविव* ा और श्रेर्णी का उल्लेख विकया र्थीा: "इसक े विवषयों की श्रेर्णी और विवविव* ा (अर्थीा: आइ+े-ए-अकबरी) और अर्थीक परिरश्रम सिSसे सSाया और संवारा गया एक अपरिरतिच भाषा क े माध्यम से एकत्र और प्रचारिर अर्थीक मेह+, सूक्ष्म विववरर्णों सविह सूच+ाओं क े कई विवषय, गूढ़ विवज्ञा+ क े विवषयों, सूक्ष्म दाश:वि+क समस्याओं और विवणिभन्न Sाति और पंर्थी क े रीति -रिरवाSों, सामासिSक, राS+ीति क और *ार्मिमक, उ+क े विववेकपूर्ण: और *ैय:पूर्ण: परिरश्रम एक स्र्थीायी स्मारक मदद करेगें.... हालांविक यहां बहु क ु छ वांणिछ हो+ा है, उ+का व्यापक और प्रशंस+ीय सव†क्षर्ण अभी क सव च्च प्रशंसा का गुर्ण है.…" यहां पर रामाव ार या राम का अव ार का एक भाग है सिSसमें सिSसमें आइ+-ए-अकबरी ब ा ी है: " द+ुसार उ+का Sन्म अयोध्या शहर में त्रे ायुग में चैत्र माह (माच:- अप्रैल) की +वमी को राSा दशरर्थी की पत्+ी कौशल्या क े गभ: से हुआ र्थीा।" "अव* की सुबह" ख°ड़ में अव* का संदभ: विदया गया है Sो इस प्रकार है: "अव* भार क े सबसे बड़े शहरों में से एक है। यह 118o, 6 अक्षांश और 27o, 22 देशान् र में अवस्जिस्र्थी है। प्राची+ काल में यह घ+ी आबादी वाला क्षेत्र र्थीा Sो 148 कोस लम्बा और 36 कोस चौड़ा र्थीा, और इसको पुरा+ शहरों में सबसे पाव+ स्र्थीलों क े रूप में मान्य ा प्राप्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीी। शहर क े आस-पास वे Sमी+ को खोदकर सो+ा वि+काल े र्थीे। यह रामचन्ˆ का वि+वास र्थीा, Sो त्रे ा युग में स्वयं में आध्यास्जित्मक राS+ैति क रूप से सव च्च र्थीे।" पाद लेख भगवा+ राम को संदर्भिभ कर ा है: "यह 7 वां अव ार ब्रह्मा क े रर्थी पर स्र्थीाविप सूय:वंश की इस राS*ा+ी में सूय:वंश की साठ पीविढयों क े गौरव का गुर्णगा+ विकया और रामाव ार क े रूप में प्रसिसद्ध महाकाव्य का +ायक हैं सिSसमें उ+का +ाम खिलखा है।" श्री सिSला+ी +े Sोर देकर कहा है विक उपरोX वि+ष्कष: में मंविदर क े अस्जिस् त्व का कोई विवशेष संदभ: +हीं है Sो राम Sन्मभूविम का प्रति वि+ति*त्व कर ी है। हालांविक, अयोध्या भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ वि+र्मिदष्ट है। Sो विकसी पुस् क में +हीं है उस पर आ*ारिर बहु अति*क +कारात्मक अ+ुमा+ +हीं लगाया Sा सक ा है। मंविदर क े संदभ: का + हो+ा विकसी मंविदर क े + हो+े का सबू +हीं हो सक ा है। इसी प्रकार उपरोX वि+ष्कष: में मस्जिस्Sद का संदभ: +हीं है। यात्रावृत्तां, गSर्ट और पुस् क ें

560. वादी क े ओर से उपस्जिस्र्थी विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा +े वाद 5 में अयोध्या से Sुड़े *ार्मिमक महत्व और उस स्र्थील, सिSसे हिंहदू सिSसे विववाविद मा+ े हैं, पर प्रकाश र्डाल+े क े खिलए कई यावित्रयों और गSर्टों का अवलम्ब खिलया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रदश: 19-वाद 5: विवखिलयम फोस्र्टर299 +े "अल- र्ट्रेवल्स इ+ इस्जि°ड़या (1583-1619)" +ामक पुस् क का संपाद+ विकया सिSसमें अकबर और Sहांगीर क े शास+काल में उत्तर और पतिश्चम भार में यात्रा कर+े वाले सा अं£ेS यावित्रयों क े कर्थी+ हैं। ये यात्री वि+म्+खिलखिख हैंः "राल्फ विफ्रच (1583-91); Sॉ+ विमल्र्डे+हॉल (1599-1606); विवखिलयम हॉविकन्स (1608-13); विवखिलयम हिंफच (1608-11); वि+कोलस विवभिंशगर्ट+ (1612-16); र्थीॉमस कोविकयॉर्ट (1612-17) और एर्डवर्ड: र्टेरी (1616-19)।" उ+में से विवखिलयम हिंफच क ै प्र्ट+ हॉविकन्स क े सार्थी अगस्, 1608 में सूर,भार आये। हिंहदू पक्षकारों क े अ+ुसार, विवखिलयम हिंफच, Sो 1608- 1611 क े मध्य अयोध्या की यात्रा पर आया, का महत्व यह है विक उन्हें इस्लाविमक मूल क े महत्व का कोई भव+ +हीं विमला। उसमें विवखिलयम हिंफच की अयोध्या की यात्राओं का संदभ: विदया गया है Sो इस प्रकार हैः " ब से अव* (अयोध्या) क 50 सी है, प्राची+ काली+ एक शहर, और पोर्टा+ राSा का एक आस+, व:मा+ में ख°ड़हर, इस दुग: का वि+मा:र्ण चार सौ वष: पूव: विकया गया। यहां रा+ीचंद क े महल और मका+ों क े भी अवशेष हैं, सिSन्हें भार ीयों +े महा+ ईश्वर स्वीकार कर े हैं और कह े हैं विक दुवि+या का माशा देख+े क े खिलए उ+से मांस कार्ट खिलया। इ+ खंर्डहरों में रामायर्णकाली+ कु छ ब्राहमर्ण रह े हैं उन्हों+े ऐसे सभी भार ीयों क े +ाम दS: विकये Sो पास में बह रही +दी में +हाया कर े र्थीे। वे ब ा े हैं विक यह प्रर्थीा चार लाख वषÂ (सृविष्ट क े सृS+ से ी+ सौ चौरा+बे लाख और पांच सौ वषÂ पूव:) से चल रही र्थीी। इस +दी क े विक+ारे से दो मील दूर एक गुफा है सिSसमें एक छोर्टा सा रास् ा है, लेविक+ इस गुफा में काफी Sगह और कई मोड़ है सिSसमें छोर्टे सिसर वाला कोई व्यविX आसा+ी से प्रवेश कर सक ा है। ऐसा मा+ा Sा ा है विक वहां पर उ+की अस्जिस्र्थीयां दफ+ाई ं गयीं हैं। वहां पर एक विहर्थीर रिरसोर्ट: है Sहां पर पूरे भार से 299 विफ़खिलयम फोस्र्टर, भार में प्रारंणिभक यात्राएँ (1583-1619), लंद+ (1921) पृष्ठ 299 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लोग उस समय बारूद क े समा+ काले रंग क े चावल ला े र्थीे। सिSसक े बारे में ऐसा कहा Sा ा है विक उ+को ब से संरतिक्ष विकया गया है। इस महल क े अवशेष क े अलावा यहां बहु क ु छ Sा++ा शेष है। महल क े अवशेषों से काफी सो+ा विमला है यहां पर अच्छा व्यवसाय है और भार ीय पशुसीगों का इ +ी प्रचुर ा है विक वे गो ाखोरों Sैसा पेय पात्र ब+ा े हैं। इ+ सींगों क े बारे में सभी भार ीय मा+ े हैं विक वे बहु मूल्यवा+ हैं और विकसी भी रत्+ से ुल+ीय +ही है क ु छ उन्हें एकसिंसगी घोड़े की सींग Sैसा मूल्यवा+ मा+ े हैं। भार क े सभी भागों से अब क कई लोग ऐसे हैं Sो चावल क े कु छ विवशेष अ+ाS को गोलाबारी क े रूप में याद कर े हैं, Sैसा विक वे कह े हैं विक वे अब क आरतिक्ष हैं। इस महल क े ध्वंसों में से अभी बहु सो+ा आSमाया गया है। यहां बहु व्यापार है, और इ +ी बहु ाय में भार ीय खिखलड़ी है विक वे यहां बास्जिल्फली और कई रह क े पी+े क े कप ब+ा े हैं। इस प्रकार क े सींग हैं, सारे भार ीय विवSयी हो े हैं, बहु कम कीम पर, Sौहरी की ुल+ा +हीं की Sा सक ी, उन्हें अति*कार से सम्मा+ विमल ा है। सींग वाला "रूइन्स ऑफ रा+ीचंद (एस) कास्र्टल ए°ड़ हाउसेS" पद से एक पाद लेख Sुड़ा हुआ है सिSसमें "रामचंˆ रामायर्ण क े +ायक" क े रूप में वर्भिर्ण हैं। यह संदभ: र्टीले क े विवषय में है सिSसे रामकोर्ट या राम का विकला क े +ाम से Sा+ा Sा ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

561. प्रदश: 133-वाद 5: Sोसेफ ति फ ें र्थीालर +े लैविर्ट+ यात्रावृत्तां को लैविर्ट+ भाषा में खिलखा सिSसका शीष:क है -र्डेसविक्रप्स+ विहस्र्टोरीक्वीर्ट सिSयो£ाविफक र्डेलइंर्डी। र्टाइफ ें र्टर एक Sेसुइर्ट विमश+री र्थीा, कहा Sा ा है विक वह अरबी, परणिशय+ और संस्क ृ भाषा में प्रवीर्ण र्थीा और 1740 में भार की यात्रा पर आया र्थीा। वह 1743-1785300 क े मध्य भार की यात्रा पर रहा। उसकी अयोध्या यात्रा का वर्ण:+ लेख क े रूप में विकया गया है सिSसको विवचारर्ण क े दौरा+ फ्र ें च भाषा में उपलब्* कराया गया र्थीा। उच्च न्यायालय क े एक आदेश क े अ+ुसरर्ण में भार सरकार द्वारा एक अं£ेSी अ+ुवाद प्रस् ु विकया गया र्थीा। ति फ ें र्थीालर का विववरर्ण इस प्रकार है: "अव* Sो विक एक पुरा + शहर है णिशतिक्ष विहन्दुओं द्वारा इस शहर को अयोध्या कहा Sा ा है। इस शहर क े ज्यादा र घर क े वल विमट्टी से ब+े हैं; Sो फ ूं स या खपरैल से ढक े हुए हो े हैं। हालांविक कई घर ई ं र्टों से ब+े हैं। मुख्य सड़क दतिक्षर्ण से उत्तर की ओर Sा ी है और इसकी लंबाई लगभग एक मील हो ी है। शहर की चौड़ाई बहु कम है। इसका पतिश्चमी विहस्सा और उत्तर क े सार्थी-सार्थी, एक विमट्टी की पहाड़ी पर अवस्जिस्र्थी है। इसका उत्तर-पूव- का विहस्सा र्टीले पर अवस्जिस्र्थी है। बांग्ला की रफ यह Sुड़ Sा ा है। आS, यह शहर बहु घ+ी आबादी वाला ब+ चुका है, बंगला या फ़ े साबाद क े गठ+ से (1)-एक +या शहर Sहां पर गव+:र +े अप+ा आवास ब+ाया - Sहां अव*़ क े वि+वासी बड़ी संख्या में आकर बस गये। देव क े दतिक्षर्ण र्ट पर राम की स्मृति में संभ्रान् लोगों द्वारा वि+र्मिम अ+ेक भव+ पाये Sा े हैं Sो पूव: से पतिश्चम की ओर फ ै लें हैं। सबसे उल्लेख+ीय स्र्थीा+ वह है सिSसे (2) सोरगादौरी कह े हैं सिSसका अर्थी: है: विदव्य मंविदर। क्योंविक वे ब ा े हैं विक राम +गर क े सभी वि+वासिसयों को 300 Sेस क े. Sॉ+, विद मैहिंपग ऑफ विहन्दुस् ा+: भार का एक फोर्ट र्टी+ सिSओSर, Sोसेफ र्टेअफ ें र्थीालर (1710-1785), भार ीय इति हास कां£ेस की काय:वाही, खंर्ड 58 (1997) पृष्ठ 400-410 पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्वग: ले गये र्थीे। इसमें भगवा+ क े आरोहर्ण से कु छ सादृश्य ा है। इस प्रकार परिरत्यX +गर को अव*़ (अव*़) (अव*़Sे+) (3) क े प्रसिसद्ध राSा विवक्रमाविदत्य +े पु+ः बसाकर इसकी पूव: प्रास्जिस्र्थीति को वापस विदलाया। इस स्र्थीा+ पर +दी क े उच्च र्ट पर एक मंविदर ब+ी र्थीी। लेविक+ औरंगSेब Sो हमेशा इस्लाम प्रचार-प्रसार क े खिलए उत्सुक रह े र्थीे और S+ ा की भाव+ाओं को विक+ारे कर मंविदर को ुड़वा विदया और उसक े Sगह एक मस्जिस्Sद और दो मी+ारें ब+वा विदया ाविक हिंहदू अं*विवश्वास की स्मृति यां समाप्त कर दी Sाएं। मोरों द्वारा वि+र्मिम अन्य मस्जिस्Sद इसक े वि+कर्ट पूव: की ओर है। सोरगदौरी क े समीप, +बीराय _ Sो विक एक हिंहदू है, इस क्षेत्र क े पूव: लेस्जिफ्र्ट+ेंर्ट गव+:र (ए) द्वारा लंबाई में एक भव+ का वि+मा:र्ण कराया गया है। लेविक+ वह Sगह Sो विवशेष रूप से सी ा रसोंई क े +ाम से प्रसिसद्ध है, अर्थीा: सी ा चौखर्ट, Sो राम की पत्+ी हैं, दतिक्षर्ण में +गर से Sुड़ा हुआ विमट्टी की पहाड़ी पर अवस्जिस्र्थी है। सम्रार्ट औरंगSेब +े रामकोर्ट +ामक विकले को ध्वस् करवाकर उसी Sगह पर ी+ गुंबदों का एक मस्जिस्Sद ब+वा विदया। अन्य लोगों का कह+ा है विक इसका वि+मा:र्ण 'बाबर' द्वारा विकया गया र्थीा। चौदह काले पत्र्थीर क े स् ंभ 5 (/) स्पै+ (4) ऊ ँ चाई, Sो विकले क े स्र्थील पर मौSूद र्थीे, वहां विदख ा हैं। इ+में से बारह स् ंभ मस्जिस्Sद क े आं रिरक मेहराब को सहारा दे े हैं। इ+ 12 में से दो को विवहार क े प्रवेश द्वार पर रखा गया है। अन्य दो 'मूर' गुम्बद का विहस्सा है। यह ब ाया Sा ा है विक इस स् ंभ को वा+रराS ह+ुमा+ द्वारा लंका द्वीप अर्थीवा सेले+ द्वीप से लाया गया र्थीा। इस द्वीप को यूरोपीय लोग सिसया+ द्वीप कह े हैं। इसक े बाई ं ओर Sमी+ क े ऊपर 5 इंच ऊपर उठाया गया एक वगा:कार बॉक्स, सिSसक े विक+ारे चू+ा से ब+े हैं, सिSसकी लंबाई 5 एल (5) से अति*क है और सिSसकी अति*क म चौड़ाई 4 एल है। हिंहदू इसे बेदी अर्थीा: क्र ै ड्ल कह े हैं। इसका कारर्ण यह है विक कभी यहां पर राम क े रूप बेस्चा+ पैदा हुए र्थीे। कहा Sा ा है विक उ+क े ी+ भाई भी यहां पैदा हुए र्थीे। इसक े बाद, Sैसा विक दूसरे लोगों द्वारा ब ाया Sा ा है, औरंगSेब और बाबर +े यहां पर लोगों की भाव+ा को ठेंस पहुँचा+े की उद्देश्य से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मंविदर ुड़वाकर मस्जिस्Sद ब+वा विदया। हालांविक ब भी क ु छ एक Sगह पर अं*विवश्वासी संप्रदाय विवद्यमा+ हैं। उदाहरर्ण क े रूप में स्र्थीा+ राम Sी मूल घर है। वे लोग उसकी ी+ 3 बार परिरक्रमा कर े हैं और द°ड़व प्रर्णाम कर े हैं। यहां पर दो स्र्थीा+ है Sो छोर्टी युद्ध दीवारों से तिघरी हुई है। एक अ*:चंˆाकार दरवाSे से होकर बड़े कमरे को Sा ी है। यहां से र्थीोड़ी दूर पर एक Sगह है विकसी +े काले चावल खोदकर वि+काला और इसको Sलाकर छोर्टे पत्र्थीर ब+ा खिलया सिSसे राम क े समय से Sमी+ क े अन्दर णिछपा विदया गया है। चैत्र माह की 24 वीं ारीख को यहां क े बड़ी संख्या में लोग राम का Sन्म विदवस म+ा+े क े खिलए यहां एकवित्र हो े हैं Sो पूरे भार में प्रसिसद्ध हैं। यह विवशाल शहर पूव: में बंगाल से ई. ए+. ई की ओर एक मील की दूरी पर है, सिSससे इसकी अक्षांश भी बंगाल की अपेक्षा लगभग एक विम+र्ट अति*क होगा। +दी क े उच्च र्ट पर स्जिस्र्थी वगा:कार आ*ार पर वि+र्मिम विकला गोल और वि+म्+ बुर्जिSयों से सुसखिज्ज है। दीवार की मरम्म की Sरूर है। यह वि+S:+ है और संरतिक्ष +हीं विकया गया है। पूव: में इस प्रान् क े गव+:रों का यहां वि+वास र्थीा। सद खाँ को एक बुरा सप+ा आया उस+े इसे बंगाल स्र्थीा+ान् रिर करवा विदया। आS यह ऊपर से +ीचे क +ष्ट हो चुका है। 2 मील की दूरी पर, क ै ++ से लेकर अव*़ क गंगा दो *ारा ब+ाकर पूव: विदशा में बह ी है। सिSसमें से एक शहर से दतिक्षर्णी भाग की ओर और दूसरी यहां से क ु छ दूरी पर दतिक्षर्ण विदशा की ओर बह ी है। और यहां से मुड़कर उत्तर पूव- विदशा और 1/4 पूव: की ओर चली Sा ी है Sहां पर शहर क े पश्चमी भाग को *ो ी है। इसक े बाद पूव: की ओर लौर्ट आ ी है Sो उत्तरी भाग क े समीप है। लेविक+ प्रत्येक वष: यह यह अप+ी विदशा बदल ी रही है। इस +दी की चौड़ाई र्डेन्यूब +दी क े समा+ है Sो बावरिरया में स्जिस्र्थी इंगोलस्र्टड़ दुग: क े समीप है, लेविक+ इसमें Sल की मात्रा कम है। वषा: काल में यह अप+ी चौड़ाई इस रह से बढ़ा ले ी है विक क ु छ Sगहों पर इसकी चौड़ाई एक मील से अति*क हो Sा ी है। (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्टाइफ ें थ्लर क े विववरर्ण का विवणिभन्न हिंहदू पक्षकारों द्वारा अवलम्ब खिलया गया है क्योंविक विक यह वि+म्+खिलखिख विवशेष ाओं पर Sोर दे ा है: (i) इसमें विहन्दुओं क े इस विवश्वास का उल्लेख है विक भगवा+ राम विवष्र्णु (इस विववरर्ण में बेस्चा+ क े रूप में उसिल्लखिख ) क े मा+व अव ार हैं । यह विववरर्ण हिंहदुओं क े विवश्वास को विदखा ा कर ा है विक भगवा+ राम इस Sगह पर पैदा हुए र्थीे सिSसका प्र ीक "बेदी" अर्थीवा "क्र ै र्डल" है। (ii) यह विववरर्ण Sब भगवा+ राम में विहन्दुओं की आस्र्थीा को ब ा रहा हो ा है ो यह पूSा से Sुड़े अन्य स्र्थीलों -सोरगदोरी (स्वर्ण: द्वार) और-सिसर्थीा रसोई (सी ा रसोई) का भी संदभ: दे ा है; (iii) यह विववरर्ण औरंगSेब द्वारा "राम कोर्ट दुग:" क े कणिर्थी विवध्वंस और उसकी स्र्थीा+ पर ी+ गुम्बदों वाले मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण का संदभ: दे ा है। हालांविक, र्टाइफ ें न्र्थीलर यह भी अंविक कर ा है विक कु छ लोगों क े अ+ुसार मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर द्वारा विकया गया र्थीा; (iv) र्टाइफ ें न्र्थीर क े विववरर्ण में चौदह काले पाषार्ण स् ंभों क े प्रयोग का संदभ: विदया गयै है Sो पूव:व - विकले क े पर विवद्यमा+ र्थीे। ऐसा कहा Sा ा है विक उ+में से बारह मस्जिस्Sद क े अंदरू+ी को सहारा दे रहे है। दो बैठक स्र्थील क े प्रवेश द्वार पर स्जिस्र्थी ब ाये Sा े हैं; (v) वह एक वगा:कार बॉक्स का वर्ण:+ कर ा है Sो Sमी+ से 5 इंच ऊपर उठा है। हिंहदुओं क े अ+ुसार यह एक पाल+ा है। (भगवा+ राम क े Sन्म को दर्भिश कर ा है)। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vi) इस विववरर्ण में यह भी उल्लेख है विक औरंगSेब या बाबर द्वारा कणिर्थी विवध्वंस क े बावSूद, अभी भी वहां क ु छ एक स्र्थीा+ पर अं*विवश्वासी पंर्थी मौSूद है Sो उस स्र्थील पर पूSा कर े हैं। उसका एक उदाहरर्ण यह है विक वो Sगह भगवा+ रा+ का घर है ऐसा मा+ा Sा ा है विक भगवा+ वहां विवराSमा+ हैं सिSसकी हिंहदू ी+ बार परिरक्रमा कर े हैैं और द°ड़व प्रर्णाम कर े हैं; और (vii) यह विववरर्ण यह ब ा ा है विक यहां पर बड़ी संख्या में लोग यहाँ इकठ्ठा होकर भगवा+ राम का Sन्म विदवस म+ा े हैं। विर्टफ ें र्थीलर 1740 क े बाद अयोध्या की यात्रा पर आया र्थीा, Sो औरंगSेब की मृत्यु क े ी+ दशक बाद का समय है। उसका विववरर्ण हिंहदू भXों की आस्र्थीा क े बारे में ब ा ा है, इस विववरर्ण में कणिर्थी विवध्वंश क े बारें में उल्लेख विकया गया है। उसकी राय में इस बा की संभाव+ा अति*क है विक औरंगज़ेब +े भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ पर मंविदर को ोड़कर मस्जिस्Sद ब+ायी र्थीी। इस विववरर्ण में यह भी ब ाया गया है विक मस्जिस्Sद में में अ+ेक काले पत्र्थीर क े स् ंभों क े प्रयोग विकया गया र्थीा। यह पुस् क का उल्लेख कर ी है।

562. प्रदश: 20 - वाद 5: रॉबर्ट: मॉन्र्टगोमरी मार्मिर्ट+ +े "विहस्र्ट्री, एंविर्टक्यूविर्टS, र्टोपो£ाफी ए°ड़ स्र्टेविर्टस्जिस्र्टक्स ऑफ ईस्र्ट+: इवि़°र्डया" ी+ खंर्डों में खिलखी। 1801 में र्डबखिल+ में पैदा हुए मार्मिर्ट+ एक एंग्लो-आइरिरस लेखक और सिसविवल सेवक र्थीे।301 उन्हों+े कलकत्ता में एक पत्रकार क े रूप में काम कर+े क े अलावा, Sहाँ उन्हो+ें बंगाल हेराल्र्ड की स्र्थीाप+ा की, णिशलॉन्ग, 301 रॉबर्ट: मॉन्र्टगोमरी मार्मिर्ट+ (Sीव+ी संबं*ी विववरर्ण)- विब्रविर्टश सं£हालय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पूव- अफ्रीका और न्यू साउर्थी वेल्स में दस वष: तिचविकत्सकीय व्यवसाय में दस साल विब ाए।302 अयोध्या पर मार्मिर्ट+ क े विववरर्ण इस प्रकार है: "अयोध्या क े लोग कल्प+ा कर े हैं, विक वृहदबाला की मृत्यु क े बाद उ+का शहर सु+सा+ हो गया र्थीा और उज्जै+ क े विवक्रम क े समय क ऐसा ही रहा, Sो पविवत्र शहर की खोS में आए र्थीे, उन्हो+ें रामगढ़ का एक विकला ब+ाया, उ+ Sंगलों को कार्ट विदया गया सिSससे खंर्डहरों ढँक े र्थीे और राम, उ+की पत्+ी सी ा, उ+क े भाई लक्ष्मर्ण और उ+क े से+ापति महावीर क े असा*ारर्ण कायÂ से पविवत्र हुए स्र्थीलों पर 360 मंविदरों को ब+ाया। इस रह की परंपरा क े खिलए एकमात्र आ*ार शायद यह है विक विवक्रम +े क ु छ मंविदरों को ब+वाया हो और महाभार में परिरवार की वंशा+ुक्रम वृहदबला क े समय क ही है, Sो विक पुस् क क े विवषय से अलग है; लेविक+ श्री भागव में वृहदवाला क े बाद 29 राSक ु मार हुए और बंगसला ा में इ+क े बाद 24 हुए। इसे यविद वाल्मीविक और श्री भागव में वर्भिर्ण राम क े पूव:Sों से विमलाय Sाय ो 18 उत्तराति*कारी होगें और हमें 279 या 558 वष: विमलेगें, इ+ उत्तराति*कारों, राज्यों या समयों, Sैसा हम कहें, क े अ+ुसार से इस परिरवार का अस्जिस् त्व सिसक ं दर क े समय क े आसपास आ Sा ा है लेविक+ इ+में से कोई भी उत्तरव - राSक ु मार बहु शविXशाली +हीं हुआ और वे मग* क े राSाओं क े Sागीरदार ही र्थीे। हालाँविक, उ+का अस्जिस् त्व विवक्रम से संबंति* पूरी कहा+ी पर एक बड़ा संदेह पैदा कर ा है। इस विवक्रम को आम ौर पर वह व्यविX मा+ा Sा ा है, सिS+से संव +ामक युग की उत्पखित्त हुई र्थीी और कोसल में इस् ेमाल की गई गर्ण+ा क े अ+ुसार, यह युग ईसा मसीह क े Sन्म से 57 साल पहले शुरू हो ा है, ाविक यह शहर लगभग 280 वषÂ क सु+सा+ रहा हो। इ +े लंबे अं राल क े बाद भगवा+ क े कायÂ क े खिलए उल्लेख+ीय स्र्थीा+ का प ा क ै से लगाया Sा सक ा है और Sंगल क े बीच ो संविदग्*ात्मक ही लग ा है और संदेह ब और बढ़ Sाएगा, अगर हम यह मा+ लें विक बाद वाले विवक्रम Sो सम्रार्ट भोS क े दामाद र्थीे, वह व्यविX र्थीे, सिSन्हों+े अयोध्या में मंविदरों का वि+मा:र्ण विकया र्थीा। मुझे लग ा है विक शायद यही 302 एफ.एच.एच. हिंकग, सव† अवर एम्पायर! रॉबर्ट: मॉन्र्टगोमरी मार्मिर्ट+ (1801-1868), संदभ:£न्र्थीसूची (1979) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मामला र्थीा, हालांविक राम की पूSा शायद बड़े विवक्रम क े समय से पहले की Sा ी र्थीी, विफर भी उ+की पूSा Sो भXों क े एक संप्रदाय को अलग कर ी है पहली बार दूसरे विवक्रम क े समय स्र्थीाविप की गयी र्थीी सिSन्हे ब से अप+े संप्रदाय क े देव ा क े तिचन्हों को खोS+े का उत्सुक मा+ा Sा सक ा है। दुभा:ग्य से यविद ये मस्जिन्दर कभी अस्जिस् त्वमा+ र्थीे ो उ+क े अवशेषों का सूक्ष्म म तिचन्ह भी हमें उस अवति* का वि+र्ण:य कर+े में सक्षम +हीं ब+ा ा Sब वे ब+ाए गए र्थीे और विहन्दूओं द्वारा उ+का विवध्वंश कारक औरंगSेब क े भयावह उत्साह को मा+ा Sा ा है सिSसे विक ब+ारस और मर्थीुरा क े मस्जिन्दरो का विवध्वंश का भी कारर्ण मा+ा Sा ा है।" मार्मिर्ट+ क े विववरर्ण में सही शासक क े संबं* में कु छ असंग ा है सिSसक े द्वारा अयोध्या की दुबारा खोS विकया गया हो+ा कहा गया है और सिSस+े कई मस्जिन्दरों का वि+मा:र्ण विकया। उसक े विवचार में क्षेत्र में भगवा+ राम की पूSा संभव ः विवक्रम क े समय से पूव: भी की Sा ी र्थीी। मार्मिर्ट+ बाद में मस्जिन्दरों क े विवध्वंश और "अति*कांश उल्लेख+ीय मस्जिन्दरों की स्जिस्र्थीति पर " मस्जिस्Sदों क े वि+मा:र्ण को उसिल्लखिख कर े हैं सिSसक े बारे में वह कह े हैं विक अयोध्या में मस्जिस्Sद "सवा:ति*क आ*ुवि+क लक्षर्णों से युX है"। उ+का विववरर्ण (पृष्ठ 335 और 336 पर) इस प्रकार है: “*माã* सिSसक े द्वारा मंविदरों को +ष्ट विकया गया, उसक े द्वारा ही अति*कांश उसिल्लखिख मस्जिन्दरों की स्जिस्र्थीति यों पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया हो+ा कहा गया है, लेविक+ अयोध्या की मस्जिस्Sद Sो अब क की सबसे व्यापक और सिSसमें अत्या*ुवि+क हो+े की सारी प्र ीति याँ विवद्यमा+ हैं, का वि+*ा:रर्ण इसकी विदवार पर लगे णिशलालेख द्वारा बाबर क े द्वारा औरंगSेब से पांच पीविढयाँ पूव: हो+ा विकया गया है (सिSसकी एक +कल दी गयी है)। इससे विवक्रम वाला पूरा कर्थीा+क अत्यति*क संदेहास्पद हो Sा ा है विवशेषकर सिSसे विक उसक े विकले का अवशेष कहा गया है, विकसी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भी आवश्यक मात्रा में उससे णिभन्न +हीं है सिSसे विक प्राची+ +गर से संबंति* कहा गया है अर्थीा: ् पूरा का पूरा र्टूर्टे ईर्टों क े अवि+यविम ढूहों से ब+ा कीचर्ड से ढका और ंबाक ू का उत्क ृ ष्ट उत्पादक और इसक े +ाम से रामगर, मैं यह मा++े को आवृ हूँ विक यह वास् व में राम क े द्वारा ब+वायी गयी इमार का विहस्सा र्थीा। हालांविक मैं उस स्र्थीा+ पर Sा+े से +हीं चूक ा और उ+ चीSों को सिSसे विहन्दू विवणिशष्ट मा+ े हैं, मैं वहाँ पर कोई मापक +हीं ले गया ाविक अवशेषों द्वारा ढ़क े स्र्थीा+ की माप ले सक ूँ क्योंविक इससे +बाव वSीर की सरकार रूष्ट हो सक ी र्थीी सिS+क े क्षेत्र में सरयू +दी क े द्वारा सिSले से विवभX वे स्जिस्र्थी हैं। मैं सामान्य ः यह कह सक ा हूँ विक ई ं र्टों क े ढ़ूह हालांविक काफी सारे +दी द्वारा बहा खिलए गए र्थीे, काफी दूर क फ ै ले र्थीे अर्थीा: ् लम्बाई में एक मील से ज्यादा और चौर्डाई में आ*ा मील से ज्यादा और हालांविक विवशाल मात्रा में साम£ी को मोहम्मर्ड+ अयोध्या या फ ै Sाबाद ब+ा+े क े खिलए हर्टा विदया गया है, विफर भी अवशेषों का कई विहस्सों में काफी उन्नय+ बरकरार है, + ही यह संदेह कर+े का कोई कारर्ण है विक वे संरच+ाएँ सिSससे वे संबंति* र्थीे, बहु ही विवशाल रही होंगी Sब हम यह विवचार कर े हैं विक इसे लगभग 2000 वष: पूव: +ष्ट कर विदया गया है। व:मा+ में विवद्यमा+ कोई भी विहन्दू इमार आकार और वास् ुकला की दृविष्ट से उ +ी उत्क ृ ष्ट है और वे + क े वल प्रत्यक्ष ः बस्जिल्क घोविष रूप से काफी आ*ुवि+क है अर्थीा: ् उन्हे ओरंगSेब क े शास+ क े समय से ब+ाया गया उ+में से कई को उस व्यविX की स्मृति क े सार्थी हालांविक उन्हे उ+ स्र्थीा+ों पर ब+ाया गया है सिSन्हें सूय:वंश क े राSक ु मारों क े महलों का अवशेष मा++े में मुझे कोई संदेह +हीं है, उ+का उन्हीं स्र्थीा+ों पर ब+ा हो+ा Sहाँ पर उ+से संबंति* घर्ट+ाएँ वास् व में घविर्ट हुई, अत्यति*क संदेहास्पद होगा, यविद वरिरष्ठ विवक्रम +े उ+ स्र्थीा+ों पर मंविदर ब+वाया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हो ा सिSन्हे ओरंगSेब द्वारा +ष्ट कर विदया गया ो विवक्रम क े द्वारा चयवि+ स्र्थीा+ परंपराग रूप से Sा+े Sा े, लेविक+ वह पूरा कर्थीा+क अत्यति*क संदेहास्पद हो+े क े कारर्ण हम विवणिभन्न स्र्थीा+ों क े +ाम क े व:मा+ विववि+योग को चमत्कार से कम +हीं मा+ े सिS+ पर इ+में से कई विवश्वास कर े हैं। यह कहा गया है विक ईर्टों की खुदाई क े क्रम में बहु सारी आक ृ ति यां पाई गयी लेविक+ क ु छेक Sो मुझे विमली वे इ +ी खस्जि°ड़ र्थीी विक गुप्तार अखाड़ा, Sहाँ लक्ष्मर्ण का अन् ध्या:+ हो+ा कहा Sा ा है, वाली को छोड़कर उ+से यह विववि+तिश्च +हीं विकया Sा सक ा विक वे क्या हैं। यह पत्र्थीर पर उक े रे गए एक स्त्री और पुरूष को तिचवित्र कर ा है। दूसरी क े सिसर पर क ु छ है और उ+ दो+ों Sैसा मैं+े पहले क ु छ +हीं देखा है। इ+ दो आक ृ ति यों और ई ंर्टों क े अलावा एकमात्र चीS सिSसे प्राची+ +गर कहा Sा सक ा र्थीा, वे बाबर द्वारा वि+र्मिम मस्जिस्Sद क े क ु छ स् म्भ हैं ये काले पत्र्थीरों क े हैं और ऐसे क्रम में हैं सिSसे मै+े और कही +हीं देखा है और सिSसे उससे Sुर्डी कलाक ृ ति यों से समझा Sा सक ा है। यह विक उन्हें एक विहन्दू भव+ से खिलया गया है, उ+क े आ*ार पर देखी Sा सक+े वाली आक ृ ति यों से प्रत्यक्ष है, हालांविक आक ृ ति याँ *माã* क े म+ को ुष्ट कर+े क े खिलए कार्ट दी गयी हैं। यह संभव है विक ये स् ंभ विवक्रम द्वारा वि+र्मिम मंविदर से संबंति* रहे हैं लेविक+ मैं ऐसे मंविदर क े अस्जिस् त्व को संदेहपूर्ण: मा+ ा हूँ और यविद वे +हीं हुए ो यह संभव है विक स् ंभ महल क े अवशेषों से खिलए गए हों। वे मात्र 6 फीर्ट ऊ ँ चे हैं।" (प्रभाव वर्ति* ) मार्मिर्ट+ का विववरर्ण मस्जिस्Sद क े दीवार पर उत्कीर्ण:+ को उन्ही दी गयी एक प्रति क े आ*ार पर संदर्भिभ कर ा है और यह वि+ष्कष: वि+काल ा है विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मस्जिस्Sद को बाबर क े द्वारा ब+वाया गया र्थीा। वह अयोध्या क े मस्जिस्Sद का "सवा:ति*क आ*ुवि+क लक्षर्णों से युX हो+ा वर्भिर्ण कर ा है"। इसमें ओरंगSेब द्वारा विहन्दुओं क े पूSा स्र्थीलों का कणिर्थी विवध्वंश का भी संदभ: है। मार्मिर्ट+ मस्जिस्Sद में काले पत्र्थीरों क े ब+े स् ंभ हो+े को भी उल्लेख कर ा है। विववरर्ण में कहा गया है विक इन्हें एक विहन्दू इमार से खिलया गया है सिS+का वह कु छ स् ंभों पर विदख+े वाली आक ृ ति यों से अ+ुमा+ कर ा है हालांविक "आक ृ ति यों को *माã* क े म+ को ुष्ट कर+े क े खिलए कार्ट विदया गया है"। मार्मिर्ट+ क े अ+ुसार अवशेषों का उन्हीं स्र्थीा+ों पर हो+े की संभाव+ा Sहाँ उ+से संंबंति* घर्ट+ाएँ घविर्ट हुई ं, कम है। उसक े विवचार से पूरा कर्थीा+क ऐति हासिसक से ज्यादा *ार्मिमक और पौराणिर्णक महत्व का है। इ+ स्र्थीा+ों पर पूSा उ+ घर्ट+ाओं का उत्सव हो ा है सिSन्हें यहाँ पर घविर्ट हो+े का विवश्वास विहन्दुओं द्वारा विकया Sा ा है।

563. प्रदश: 5- वाद 5: एर्डवर्ड: र्थीॉ+:र्ट+स् का गSेविर्टयर सिSसका शीष:क है- ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी की सरकार क े अ*ी+ राज्यक्षेत्रों का गSेविर्टयर और भार क े महाद्वीप पर देशी राज्य (गSेविर्टयर आफ दा र्टेरिरविर्टरीS अन्र्डर दा गव+:मेन्र्ट आफ इस्र्ट इंस्जि°र्डया कम्प+ी ए°र्ड दा +ेविर्टव स्र्टेट्स आ+ दा कास्जिन्र्ट+ेन्र्ट आफ इस्जि°र्डया),303 सिSसका पहला प्रकाश+ 1858 में हुआ। र्थीोरर्ट+ क े गSेविर्टयर में "सूSा-उद-दौलाह "भू पू्व: +वाब क े वSीर" क े द्वारा स्र्थीाविप 50,000 क े वार्मिषक राSस्व क े सार्थी '’ह+ुमा+गढ’ या ’ह+ुमा+ का 303 ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी की सरकार क े अ*ी+ राज्यक्षेत्रों का राSपत्र और भार क े महाद्वीप पर देशी राज्य (गSेविर्टयर आफ दा र्टेरिरविर्टरीS अन्र्डर दा गव+:मेन्र्ट आफ इस्र्ट इंस्जि°र्डया कम्प+ी ए°र्ड दा +ेविर्टव स्र्टेट्स आ+ दा कास्जिन्र्ट+ेन्र्ट आफ इस्जि°र्डया), लंद+ः र्डब्लू. एच. एले+ (1854) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकला’ +ामक एक व्यापक प्रति ष्ठा+" का सन्दभ: है। राSस्व को लगभग 500 बैराविगयों या *ार्मिमक पस्जिस्वयों और विवणिभन्न प्रकार क े अन्य हिंहदू णिभक्षुको को विव रिर कर विदया Sा ा र्थीा, मुशलमा+ों को दीवारों को छ ू +े की अ+ुमति +हीं र्थीी।र्थीोरेंर्ट+ क े गSेविर्टयर का अर्थी: भी है- "विवस् ृ खंर्डहर” सिSसे राम क े विकले क े +ाम से Sा+ा Sा ा है:” पूव: में शहर क े समीप और घा*रा क े दाविह+े र्ट पर विवस् ृ खंर्डहर हैं, Sो अव* क े राSा, रामायर्ण क े +ायक राम क े विकले हैं और अन्य भार की पौराणिर्णक और रोमा+ी कर्थीाओं में विवख्या हैं। बुच+ै+ +े पाया विक "यह विक +विद क े विक+ारे इ:र्टों का ढेर पड़ा हुआ र्थीा Sो एक बड़े रास् े की आेर Sा ा है।” यह लंबाई में एक मील से भी अति*क है, और चौड़ाई में आ*े मील से भी अति*क मील है; और, यद्यविप मुतिश्लम अयोध्या या फ ै Sाबाद क े वि+मा:र्ण की भारी मात्रा में साम£ी हर्टा दी गई है, विफर भी खंर्डहर क े कई विहस्से काफी ऊ ं चाई क ब+े हुए हैं और + ही इस बा पर संदेह कर+े का कोई कारर्ण है विक सिSस संरच+ा से वे संबंति* र्थीे, वह बहु महा+ है, Sब हम विवचार कर े हैं विक यह 2,000 वषÂ से अति*क समय क े पहले से खंर्डहर हो गयी है। " खंर्डहर अभी भी रामगढ़ या राम क े विकले का +ाम से Sा+ा Sा ा है; "उ+में से सबसे उल्लेख+ीय स्र्थील यह है विक इस कर्थीा क े अ+ुसार, राम +े अप+े +गर क े लोगों को अप+े सार्थी लेकर स्वग: की आेर उड़ा+ ली, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप वह आ*ी श ाब्दी क ईसाई युग से पहले से वीरा+ रहा और इसक े द्वारा 360 मंविदरों से शुसोणिभ रहा। इ+ मंविदरों क े सबसे छोर्टे अवशेष ही +हीं हैं, बस्जिल्क वे भी उपस्जिस्र्थीति क है और स्र्थीा+ीय अ+ुश्रुति यों क े अ+ुसार, उन्हें आैरंगSेब क े द्वारा ध्वस् कर विदया गया र्थीा, सिSस+े इस स्र्थील क े एक भाग पर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया। विफर भी, इस अ+ुश्रुति क े विमथ्या को मस्जिस्Sद की दीवार पर एक णिशलालेख द्वारा सिसद्ध विकया गया है, बादशाह बाबर इ+ कायÂ का श्रेय Sा ा है, सिSससे औरंगSेब वंश में पांचवें स्र्थीा+ पर र्थीा। मस्जिस्Sद क े वल पाँच से छः फीर्ट की ऊ ँ चाई क े चौदह स् ंभों क े सार्थी सुसखिज्ज है, लेविक+ बहु विवस् ृ और अच्छी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कारीगरी क े बारे में कहा Sा ा है विक वह हिंहदूँ देवालयों क े खंर्डहरों से ली गयी है... पाषार्ण का एक च ुभु:Sाकार पाल+ा, सफ े द पो ाइ:, पाँच इंच लम्बी आैर चार इंच चौड़ी और Sमी+ से पांच या छह इंच ऊपर की आेर उभरी हुइ: आक ृ ति को, पाल+ा क े रूप में ब ाया गया है सिSसमें राम र्थीे... विवष्र्णु क े सा वें अव ार क े अ+ुसार; और द+ुसार विहन्दू श्रद्धालु और भXों से बहु ाय से सम्मावि+ विकया गया है। अयोध्या या अव* को विहन्दुस् ा+ का सबसे पुरा+ा शहर मा+ा Sा ा है. (प्रभाव वर्ति* ) इस विववरर्ण से प ा चल ा है विक प्राची+ मंविदरों का कोई अवशेष +हीं उपलब्* है। राSपत्र क े "मस्जिस्Sद की दीवार पर एक णिशलालेख" पर अवलम्ब खिलया गया र्थीा, सिSसक े वि+मा:र्ण में बाबर का योगदा+ मा+ा Sा ा र्थीा, Sबविक यह भी ध्या+ विदया गया र्थीा विक "स्र्थीा+ीय अ+ुश्रुति यों" क े द्वारा मंविदरों क े विव+ाश और औरंगSेब क े वि+मा:र्ण को अंविक विकया र्थीा। गSेविर्टयर में बुच+ै+ की राय पर अवलम्ब खिलया गया है।

564. प्रदश: 123-वाद 5: सS:+ S+रल एर्डवर्ड: बालफोर +े "साइक्लोपीतिर्डया आफ इंतिर्डया एंर्ड आफ इ:स्र्ट+: आैर साउर्थी+: एणिशया,कामर्जिसयल, इ°र्डस्जिस्र्ट्रयल आैर साइ:न्र्टविफकः प्रोर्डक्र्ट आफ दा विम+रल, वेसिSर्टेबल, आैर एवि+मल हिंकगर्डम, यूSफ ु ल आर्ट:स आैर मैन्यूफ ै क्चस:"304 की रच+ा की है बालफोर की पुस् क में अयोध्या को सन्दर्भिभ विकया गया है: अयोध्या, अव* में फ ै Sाबाद क े समीप, गंगा +दी क े दाविह+ें विक+ारे पर, उत्तरिर अक्षांश 260 48' 20" आैर 800 24' 40" पूव- देशान् र पर है। 304 सS:+ S+रल इर्डवार्ड: बालफोर, साइ:क्लोपीतिर्डया आफ इ:चिंर्डया ए°र्ड आफ इ:स्र्ट+्: ए°र्ड साउर्थी+: एणिशया, कामर्भिशयल, इ°र्डस्जिस्र्ट्रयल ए°र्ड साइ:स्जिन्र्टविफकः प्रोर्डक्र्ट आफ दा विम+रल, वेसिSर्टेबल, ए°र्ड एेवि+मल हिंकगर्डम, यूSफ ु ल आर्ट:स आैर मैन्यूफ ै क्चस:, र्थीर्ड: एतिर्डश+, लन्द+ः बीमर्ड: क्यूरविर्टक, 15 विपक्कतिर्डली 1885. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अब यहाँ पर विहन्दुआें आैर मुतिश्लमों की S+संख्या 7518 है लेविक+ प्राची+ समय में, यह कौसल राज्य की राS*ा+ी र्थीी, व:मा+ अव* में सू्य: वंश क े महा+ दशरर्थी क े द्वारा शास+ विकया गया र्थीा आैर वे भगवा+ राम क े विप ा र्थीे। उस समय उ+का क्षेत्र 12 योS+ का क्षेत्र र्थीा Sो 96 मील क े बराबर र्थीा। बौद्घ क े प्रभुत्व क े दौरा+ अयोध्या +े इसे अस्वीकार कर विदया, लेविक+ ब्राह्मर्णवाद क े विवˆोह पर यह सम्रार्ट विवक्रमाविदत्य द्वारा बहाल कर विदया गया र्थीा (ए-र्डी 57)। ी+ विहन्दू पूSा स्र्थीलों पर बहु से Sै+ मंविदर र्थीे आैर ी+ मस्जिस्Sदे र्थीी- Sन्म स्र्थीा+ का वह स्र्थीा+ Sहाँ पर भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा, स्वग: द्वार(मंविदर) Sहाॅं उ+क े अवशेषों को Sलाया गया, आैर त्रे ा क े ठाक ु र, उ+क े महा+ बखिलदा+ों में से एक क े दृश्य क े रूप में ब+ाया गया। अव* में यहाँ बाबू बेगम का एक उत्क ृ ष्ट मकबरा है।" (प्रभाव वर्ति* )

565. प्रद:श 6-सूर्ट 5:- एलेक्Sेंर्डर कहिं+घम, Sो भार ीय पुरा त्व सव†क्षर्ण विवभाग क े महावि+देशक र्थीे, +े 1862-63-64-65 305 क े दौरा+ भार क े पुरा त्व सव†क्षर्ण विवभाग-चार रिरपोर्टÂ क े शीष:क से काय: संकखिल विकया। कहिं+घम का ात्पय: अयोध्या से है। "अयोध्या में अ+ेक अत्यं पविवत्र ब्राह्मर्णवाविद मंविदर हैं, लेविक+ वे सभी प्राची+ हैं, और विब+ा विकसी वास् ुकलात्मक क े विदखावे क े है। लेविक+ इसमें कोई संदेह +हीं विक उ+में से अति*कांश उ+ प्राची+ मंविदरों क े स्र्थीलों पर कब्Sा कर ले े हैं Sो मुसलमा+ों द्वारा +ष्ट कर विदए गए र्थीे। इस प्रकार शहर क े पूव- छोर पर रामकोर्ट या ह+ुमा+ गढ़ी एक छोर्टा- सा दीवारवाला विकला है Sो एक प्राची+ मूर्ति क े ऊपर एक आ*ुवि+क मंविदर क े चारों ओर है। रामकोर्ट +ाम वि+तिश्च रूप से पुरा+ा है, क्योंविक यह मणिर्ण पव: की परंपराओं से Sुड़ा हुआ है, सिSसका बाद में उल्लेख विकया Sाएगा; लेविक+ भगवा+ ह+ुमा+ का मंविदर औरंगज़ेब क े समय से प्राची+ +हीं है। +गर क े उत्तर-पूव- को+े में स्जिस्र्थी राम घार्ट को वह 305 1862-63-64-65 क े दौरा+ भार क े पुरा त्व सव†क्षर्ण विवभाग-चार रिरपोर्टÂ क े भाग 1 णिशमलाः क े स्जिन्ˆय शासकीय प्रेस,1871 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्र्थीा+ ब ाया गया है Sहाँ राम +े स्+ा+ विकया र्थीा, को सरगद्वारी या स्वग:द्वारी, अर्थीा: "स्वग: का द्वारा" क े +ाम से Sा+ा Sा ा र्थीा। उत्तर- पतिश्चम में ऐसा स्र्थीा+ मा+ा Sा ा है Sहाँ उ+का पार्भिर्थीव शरीर Sलाया गया र्थीा। क ु छ ही वष: पहले अशोक बर्ट, या ‘Sर्टारविह बरगद’ " एैसा +ाम Sो सम्भव ः स्वग:द्वारी से सम्बस्जिन्* है” +ामक एक बहु ही पविवत्र बरगद का पेड़ खड़ा र्थीा, इस विवश्वास में विक Sो लोग इस स्र्थीा+ पर मर गए या Sलाए गए, वे ुरं पु्+:Sन्म से मुX हो Sाएगें। लक्ष्मर्ण घार्ट क े पास है, Sहां उ+क े भाई लक्ष्मर्ण स्+ा+ कर े र्थीे आैर एक मील क े एक चौर्थीाइ: दूरी पर शहर क े मध्य में भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ "Sन्म स्र्थीा+ मंविदर" स्जिस्र्थी है। लगभग पतिश्चम में, और उपर की आेर पांच मील दूर, गुप्त घार्ट है, सिSसमें आ*ुवि+क श्वे मंविदरों का समूह है। यह वही स्र्थीा+ है Sहाँ लक्ष्मर्ण क े अदृश्य हो+े क े बारे में कहा Sा ा है, इसखिलए इसका +ाम गुप्तर से गुप्त है, सिSसका अर्थी: है-णिछपा+ा या छ ु पाया गया। क ु छ लोग कह े हैं विक यह भगवा+ राम र्थीे Sो इस स्र्थीा+ पर अदृश्य हुए र्थीे, लेविक+ स्वग:द्वारी में उ+क े दाह संस्कार की कहा+ी में म भेद है।

566. प्रदश: 49-वाद 5: पी का+†Sी, सिSन्हें स्र्थीा+ापन्न आयुX और बन्दोबस् अति*कारी, फ ै Sाबाद क े पद पर वि+युX विकया गया र्थीा, +े " (विहस्र्टोरिरकल स्क े च आफ फ ै Sाबाद विवर्थी आेल्र्ड क ै विपर्टल अयोध्या ए°र्ड फ ै Sाबाद)”306 (1870) क े द्वारा खिलखा गया। का+†Sी +े हिंहदुओं की आस्र्थीा क े खिलए अयोध्या क े महत्व को रेखांविक विकया है: “अयोध्या-अयोध्या, विहन्दुआें क े खिलए वही है Sो मुतिश्लमों क े खिलए मक्का है, यहूविदयों क े खिलए Sेरूशलम है, यह उ+की उच्च पौराणिर्णक मूल की रूविढ़वादी परम्परा है, क्योंविक यह क्षणिर्णक है इसखिलये पृथ्वी विक अति रिरX सुरक्षा क े खिलए स्र्थीाविप विकया गया है, लेविक+ स्वयं विव*ा ा क े रर्थी क े पविहयों पर है Sो हमेशा कायम रहेगा। 306 पी का+†Sी,स्र्थीा+ापन्न आयुX और बन्दोबस् ा अति*कारी, फ ै Sाबाद द्वारा "विहस्र्टोरिरकल स्क े च आफ फ ै Sाबाद विवर्थी आेल्र्ड क ै विपर्टल अयोध्या ए°र्ड फ ै Sाबाद” (1870) अव* शासकीय प्रेस, 1870। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का+†Sी क े द्वारा Sन्मस्र्थीा+ का सन्दभ:, स्वग: द्वार मंविदर आैर त्रे ा क े ठाकु र क े बारे में दे ें है । वे बाबर द्वारा मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण 1528 में मा+ े है, उ+क े +ाम क े अलावा आैर कोइ: +ाम +हीं हुआ। का+†Sी की राय में, एक पूव: मंविदर क े कई स् ंभों का उपयोग बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में विकया गया है। वे कह े हैं विक ये स् ंभ कसौर्टी पत्र्थीर से ब+े हैं और उत्कीर्भिर्ण हैं। का+†Sी Sो एक बन्दोबस् अति*कारी र्थीे, +े 1855 में हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच हुए विवˆोह का उल्लेख विकया है। उ+क े अ+ुसार, संघष: क े दौरा+, हिंहदुओं +े ह+ुमा+ गढ़ी पर कब्Sा कर खिलया, Sबविक मुसलमा+ों +े Sन्मस्र्थीा+ पर कब्Sा कर खिलया। पु+ः हु+ुम+ गढ़ी पर कब्Sा कर+े क े मुसलमा+ों क े प्रयत्+ पर विहन्दुओं +े प्रत्यूत्तर विदया, सिSसक े फलस्वरूप 75 मुसलमा+ मारे गये, सिSन्हें कविब्रस् ा+ में दफ+ाया गया है। कहा Sा ा है विक हिंहदुओं +े ब से Sन्मस्र्थीा+ पर कब्Sा कर खिलया गया र्थीा। का+†Sी क े अ+ुसार ब क हिंहदू और मुस्जिस्लम दो+ों एक ही रह की पूSा कर े हैं, सिSसे उन्हों+े "मस्जिस्Sद-मस्जिन्दर” क े रूप में वर्भिर्ण विकया है। हालाहिंक, औपवि+वेणिशक शास+ क े बाद से एक रेलिंलग स्र्थीाविप की गई सिSसक े अं ग: यह कहा गया है विक उसमें मुसलमा+ प्रार्थी:+ा कर े हैं Sबविक बाड़ा क े बाहर हिंहदुओं +े एक चबू रा स्र्थीाविप विकया है सिSस पर वे पूSा कर े हैं। का+†Sी क े विववरर्ण +ीचे उद्धृ हैं: ''Sन्मस्र्थीा+ और अन्य मंविदर - यह स्र्थीा+ीय रूप से मा+ा Sा ा है विक मुस्जिस्लम विवSय क े समय अयोध्या में ी+ महत्वपूर्ण: हिंहदू पूSास्र्थील र्थीे Sो विक लगभग वि+S:+ र्थीा, और बहु कम भX Sुड़े र्थीे। ये स्र्थीा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीे “Sन्मस्र्थीा+”, “सग:द्वार मंविदर”, सिSसे “राम दरबार” क े +ाम से भी Sा+ा Sा ा है और “ रे ा-क े -ठाक ु र”। इ+में से पहले पर, बादशाह बाबर +े 1528 ईस्वी में मस्जिस्Sद ब+वाया, Sो आS भी उसक े +ाम पर है; दूसरे पर भी, औरंगSेब +े 1658-1707 ईस्वी में वैसा ही विकया; और ीसरे पर, उसी शासक या उसक े पूव:व - +े विवसिS लोगों पर अप+ा मSहब र्थीोप+े क े विवख्या मोहम्मर्ड+ सिसद्धां क े अ+ुसार एक मस्जिस्Sद ब+वाया। Sन्मस्र्थीा+ वह स्र्थीा+ है Sहाँ रामचंˆ का Sन्म हुआ र्थीा। स्वग:द्वार वह द्वार है सिSसक े माध्यम से वह स्वग: गये, संभव ः वह स्र्थीा+ Sहां उ+का पार्भिर्थीव शरीर Sलाया गया। त्रे ा क े ठाक ु र उस स्र्थीा+ क े रूप में प्रसिसद्ध र्थीा Sहां राम +े एक महा+ बखिलदा+ विदया और सिSसकी स्मृति में उन्हों+े अप+ी और सी ा की प्रति मा लगवाई। “667। बाबर की मस्जिस्Sद- लेर्डे+ द्वारा खिलखिख बाबर क े संस्मरर्ण क े अ+ुसार उस शासक +े 28 माच:, 1528 को सरयू और घाघरा +विदयों क े संगम पर,अयोध्या से दो या ी+ कोस पूव: में घेरा र्डाला और वहां वह सा या आठ विद+ रहकर आसपास क े स्र्थीा+ों को सुव्यवस्जिस्र्थी विकया। उस रच+ा में सरSू क े विक+ारे अव* से सा या आठ कोस आगे एक प्रसिसद्ध आखेर्ट स्र्थील की चचा: है। यह उल्लेख+ीय है विक व:मा+ में बाबर क े Sीव+ से Sुड़ी सभी पुस् कों में वे पृष्ठ +हीं हैं Sो अयोध्या में उसक े कायÂ से संबंति* हैं। बाबरी मस्जिस्Sद में दो स्र्थीा+ों पर उस वष:, 935 विह. Sो 1528 ई. क े सम ुल्य है, का उल्लेख है, सिSस वष: इसे ब+ाया गया र्थीा Sो विक बादशाह की प्रशस्जिस् में समर्मिप उत्कीर्ण:+ क े सार्थी पत्र्थीर में उक े रा गया है। यविद अयोध्या उस समय वि+S:+ +हीं र्थीा, ो इसमें कम से Sन्मस्र्थीा+ पर एक उत्क ृ ष्ट मंविदर हो ा क्योंविक इसक े कई कालम अभी भी अस्जिस् त्वमा+ हैं और मुसलमा+ों द्वारा मस्जिस्Sद ब+ा+े में प्रयोग कर खिलये Sा+े क े कारर्ण अच्छे संरतिक्ष हैं। ये ठोस, गहरे स्लेर्टी या काले रंग मSबू क े हैं, सिSन्हें स्र्थीा+ीय लोगों द्वारा कसौर्टी (शब्दशः र्टच स्र्टो+) कहा Sा ा है और विवणिभन्न उपकरर्णों द्वारा उत्कीर्भिर्ण है। मेरे विवचार से यह बौद्ध मी+ारें हैं Sो मैं+े ब+ारस और अन्यत्र देखे हैं। वे सा से आठ फीर्ट लंबे, आ*ार, क े न्ˆ और शीष: पर वगा:कार और बीच में गोल या अष्टभुSाकार हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हिंहदू और मुसलमा+ म भेद - Sन्मस्र्थीा+ ह+ुमा+ गढ़ी क े क ु छ सौ कदम की दूरी क े भी र है। 1855 में Sब हिंहदुओं और मोहम्मर्ड+ क े बीच अ+ब+ हुई ो पहले +े बल पूव:क ह+ुमा+ गढ़ी पर कब्Sा कर खिलया, Sबविक मुसलमा+ों +े Sन्मस्र्थीा+ पर कब्Sा कर खिलया। उस अवसर पर मोहम्मर्ड+ों +े वास् व में ह+ुमा+ गढ़ी की सीविढ़यों क कोणिशश की लेविक+ उन्हें काफी +ुकसा+ क े सार्थी खदेड़ विदया गया। इसक े बाद हिंहदुओं +े इस सफल ा का अ+ुसरर्ण विकया और ीसरे प्रयास में, Sन्मस्र्थीा+ ले खिलया, सिSसक े द्वार पर 75 मोहम्मर्ड+ “ शहीद कब्र” (गंS-शहीद) में दफ+ हैं। राSा क े कई रेSीमेंर्ट हर समय देख े र्थीे, लेविक+ उ+को हस् क्षेप का आदेश +हीं र्थीा। ऐसा कहा Sा ा है विक उस समय क हिंहदू और मोहम्मर्ड+ दो+ों उस मस्जिस्Sद-मंविदर में पूSा कर े र्थीे। विब्रविर्टश शास+ से विववादों को रोक+े क े खिलए एक रेलिंलग लगाई गयी है, सिSसक े भी र मस्जिस्Sद में मोहम्मर्ड+ प्रार्थी:+ा कर े हैं, Sबविक दीवार क े बाहर हिंहदुओं +े एक मंच ब+ा खिलया है सिSस पर वे अप+ा चढ़ावा चढ़ा े हैं।" (प्रभाव वर्ति* ) विवणिभन्न हिंहदू पक्षकारों +े हिंहदुओं क े इस विवश्वास को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए का+†Sी क े विववरर्ण का अवलंब खिलया है विक Sन्मस्र्थीा+ भगवा+ राम क े Sन्म का स्र्थीा+ र्थीा, और मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में कसौर्टी कॉलम का उपयोग विकया गया र्थीा। कसौसी स् ंभों पर उत्कीर्ण:+ का संदभ: है। 1870 में प्रकाणिश का+†Sी क े विववरर्ण में उस घर्ट+ा का उल्लेख विकया गया है Sो 1855 में हुई र्थीी सिSसमें हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच संघष: हुआ र्थीा। वह इस घर्ट+ा क े पूव: विहन्दू और मुस्जिस्लम दो+ों द्वारा “ मस्जिस्Sद-मंविदर में” पूSा कर+े का संदभ: दे े हैं और उस रेलिंलग का भी Sो उसक े बाद विववादों को रोक+े क े खिलए ब+ाई गयी र्थीी। का+†Sी +े खिलखा है विक रेलिंलग को इसखिलए ब+ाया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीा ाविक दो समुदायों को अलग विकया Sा सक े सिSससे मुस्जिस्लम को मस्जिस्Sद क े अहा े में पूSा कर+े की अ+ुमति विमल गयी, Sबविक हिंहदुओं +े इसक े बाहर अप+ा चढ़ा+ा चढ़ा+े क े खिलए मंच ब+ा खिलया र्थीा।

567. प्रदश: 7- वाद 5: अव* क े गSेविर्टयर (1877): गSेविर्टयर में उसी शब्दों में वर्ण:+ है Sैसा का+†Sी क े विववरर्ण में है और इसखिलए आगे विवस् ार की आवश्यक ा +हीं है।

568. प्रदश: 8 वाद – 5: ए. एफ. विमलेर्ट का '' द् रिरपोर्ट: आफ सेर्टलमेंर्ट आफ लैंर्ड रेवेन्यू, फ ै Sाबाद तिर्डस्जिस्र्ट्रक्र्ट -(1880) '' में मोर्टे ौर पर का+†Sी क े विववरर्ण का सार है।

569. प्रदश: 52-वाद 5: एच. आर. +ेविवल, आई. सी. एस. +े “बाराबंकी: ए गSेविर्टयर, Sो तिर्डस्जिस्र्ट्रक्र्ट गSेविर्टयर आफ द् यू+ाइर्टेर्ड प्रोहिंवस आफ आगरा एंर्ड अव*” (1902) का XLVIII वां ख°र्ड है को संकखिल और सम्पाविद विकया। इसमें 1850 क े दशक में हुए हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े संघष: का विववरर्ण है।

570. प्रदश: 10-वाद 5: “ द् इंपीरिरयल गSेविर्टयर आफ इंतिर्डया, प्रोहिंवसिसयल सीरीS, यू+ाइर्टेर्ड प्रोहिंवस आफ आगरा एंर्ड अव* – खं. II (इलाहाबाद, ब+ारस, गोरखपुर, क ु माऊ ं, लख+ऊ एंर्ड फ ै Sाबाद तिर्डवीSंस एंर्ड द् +ेविर्टव स्र्टेट्स)”। इम्पीरिरयल गSेविर्टयर में अयोध्या का विववरर्ण वि+म्+व है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “अयोध्या कोशल राज्य की राS*ा+ी र्थीी और उसमें सूय: वंश क े राSा म+ु क े बाद छप्प+वें राSा दशरर्थी का दरबार र्थीा। रामायर्ण क े आरंणिभक अध्याय में +गर की भव्य ा, राSा की मविहमा, और उसकी प्रSा क े गुर्ण, संपदा और वि+ष्ठा का वर्ण:+ है। दशरर्थी महाकाव्य क े +ायक रामचन्ˆ क े विप ा र्थीे सिS+क े प्रति आकष:र्ण आ*ुवि+क युग में बहु अति*क बढ़ा है। सूय: वंश क े अंति म राSा सुविमन्त्र, एक सौ ेरहवें शासक, क े प + क े बाद अयोध्या वीरा+ हो गयी और राS परिरवार विबखर गया। उदयपुर, Sयपुर और अन्य क े राSा इस विबखरे वंश क े सदस्यों क े वंशS हो+े का दावा कर े हैं। कह े हैं विक अयोध्या की पु+स्र्थीा:प+ा उज्जै+ क े राSा विवक्रमाविदत्य +े की र्थीी, सिS+की पहचा+ विववाद का विवषय है। बौद्ध काल में अयोध्या का महत्व कम र्थीा Sब साक े कोशल का प्रमुख +गर ब+ गया। यह अभी भी अवि+तिश्च है विक साक े कहाँ पर स्जिस्र्थी र्थीा और यह कहा गया है विक यह प्राची+ अयोध्या +गर पर विवस् ृ र्थीा। सिसक्काशास्त्रीय साक्ष्य ईसाई युग क े प्रारंभ क े समय अयोध्या में या उसक े आसपास स्व ंत्र राSाओं की श्रृंखला क े शास+ की ओर संक े कर े हैं।” "व:मा+ +गर" को संदर्भिभ कर े हुए, गSेविर्टयर +े उल्लेख विकया है: ''व:मा+ +गर घाघरा क े विक+ारे उठे चट्टा+ से आन् रिरक भूविम क विवस् ृ है। रामकोर्ट या राम क े विकले क े रूप में ख्या एक विवशाल ढूह क े एक को+े में वह स्र्थीा+ है Sहाँ +ायक का Sन्म हुआ र्थीा। अति*कांश बाड़े को एक पुरा+े मंविदर क े अवशेषों से बाबर द्वारा ब+ाई गई मस्जिस्Sद +े घेरा है और बाहरी विहस्से में Sन्मस्र्थीा+ का एक छोर्टा सा मंच और पूSास्र्थीा+ है। पास में एक बड़ा मंविदर है, सिSसे सी ा, राम की वि+ष्ठावा+ पत्+ी, की रसोई क े रूप में दशा:या गया है। घाघरा क े र्ट पर सिSस स्र्थीा+ पर लक्ष्मर्ण स्+ा+ कर े हैं उस स्र्थीा+ पर एक भव्य मंविदर स्जिस्र्थी है और वा+रों क े राSा ह+ुमा+ की उपास+ा +गर क े एक बड़े मंविदर में की Sा ी है और सिSसमें अ+ेक सीविढ़यां हैं सिS+का +ाम ह+ुमा+ गढ़ी है। अठारहवीं और उन्नीसवीं श ाब्दी क े दौरा+ ब+े अन्य उल्लेख+ीय मंविदर हैं क+कभव+, विर्टकमगढ़ की रा+ी द्वारा ब+वाई गयी एक बविढ़या इमार, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +ागेश्वर+ार्थी मंविदर, दश:+ सिंसह का मंविदर और व:मा+ महाराSा द्वारा वि+र्मिम संगमरमर का एक छोर्टा मंविदर। अयोध्या में कई Sै+ मंविदर भी हैं सिS+में से पांच का वि+मा:र्ण अठारहवीं श ाब्दी में अयोध्या में पैदा हुए पाँच ीर्थी:करों क े Sन्मस्र्थीा+ पर कराया गया है। बाबर की मस्जिस्Sद क े अलावा प्रख्या हिंहदू मंविदर-स्वग:द्वार क े स्र्थीा+ पर, Sहाँ राम की देह का अंति म संस्कार विकया गया र्थीा और त्रे ा क े ठाक ु र Sहाँ उन्हों+े बखिलदा+ विदया र्थीा, औरंगSेब द्वारा वि+र्मिम दो भग्न मस्जिस्Sद हैं। दूसरे वाले में कन्नौS क े अंति म राSा Sयचंद का णिशलालेख विमला है। मुसलमा+ों द्वारा ी+ कब्रों का +ोआ, सेठ और Sॉब क े मकबरों क े रूप में सम्मा+ विकया Sा ा है, और अस्जिन् म दो का उन्हीं +ामों क े ह आइ+-ए-अकबरी में उल्लेख विकया गया है। मणिर्णपव: क े रूप में विवख्या पास क े एक विवशाल ढूह को ह+ुमा+ द्वारा विहमालय क े एक विहस्से को ले Sा े समय विगरा हुआ मा+ा Sा ा है Sबविक दूसरी परम्परा क े अ+ुसार यह रामकोर्ट ब+ा+े वाले कामगारों द्वारा अप+ी र्टोकरी खाली कर+े क े परिरर्णामस्वरूप ब+ा Sब उन्हों+े अप+ा काम छोड़ा; यह संभव ः एक भग्न स् ूप को ढक े हुए है।" (प्रभाव वर्ति* )

571. प्रदश: 23- वाद 5: हैंस बेकर +े अप+ी पुस् क "अयोध्या”307 की रच+ा ी+ भागों में की है। भूविमका में कहा गया है विक पहला भाग अयोध्या क े इति हास, इसक े विवकास का शासिस कर+े वाले *ार्मिमक आंदोल+ों, स्र्थीा+ीय सन्दभ: सिSसमें इस+े ठोस आकार £हड़ विकया और सिSस रह से यह *ार्मिमक रच+ा अयोध्या महात्म्य में विदखाया गया है, से संबंति* है। अप+ी पुस् क की भूविमका में लेखक +े खिलखा है: “..... गहरे प्रभाव वाले दो मामले प्रत्यक्ष हुए। पहला यह विक अयोध्या का ीर्थी:स्र्थीा+ क े रूप में *ार्मिमक विवकास दूसरी सहस्रास्जिब्द ई. में हुआ और फलस्वरूप अयोध्यामहात्म्य क े सभी संस्करर्ण इसी अवति* क े हैं; दूसरी 307 Hans Bakker, Ayodhya, Egbert Forsten Publishers (1986) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह विक +गर क े *ार्मिमक महत्व का विवकास विवष्र्णु क े प्रमुख प्राकट्य क े रूप में राम की पूSा क े उदय से Sुड़ा हुआ र्थीा।” लेखक +े 600 ईसा पूव: से 1000 ई. क क े साक े /अयोध्या का इति हास अध्याय I में विदया है, यह उल्लेख कर े हुए विक यह स्र्थीा+ सरयू (घाघरा) +दी क े वक्र पर स्जिस्र्थी है Sो आ*ुवि+क +गर को ी+ रफ से घेरे हुए है। वह कह े हैं: “इस स्र्थीा+ क े मध्य में रामकोर्ट या कोर्ट रामचंदर +ामक र्टूर्टी हुई भूविम का एक क्षेत्र है, सिSसक े अति*कांश भाग पर आS मंविदर और मठ हैं। विवशेष रूप से इसक े दतिक्षर्णी ओर, हालांविक, कई क ृ वित्रम र्टीले पाए गये हैं सिS+ पर शायद ही क ु छ वि+र्मिम है और Sो र्टूर्टी ई ं र्टों और णिशलाख°र्डों से पर्टे पड़े हैं, विवशेष रूप से दतिक्षर्ण-पतिश्चमी को+े पर र्थीाकणिर्थी क ु बेर र्टीला। ऊपर वर्भिर्ण स्र्थीा+, सिSसक े ी+ ओर +दी है और मध्य में उन्नतिय भूविम है Sो +दी पार कर+े पर दूर +हीं है,में एक प्राची+ बस् ी की सभी आवश्यक भौति क विवशेष ाएं प्र ी हो ी हैं। अयोध्या में अभी क दो उत्ख++ हुए हैं।” बेकर का कह+ा है विक पहली श ाब्दी ई. क े मध्य से, कोशल क े दत्तों का पतिश्चम में क ु षार्ण शविX से अत्यति*क साम+ा हुआ,सिSसक े परिरर्णामस्वरूप कवि+ष्क +े राS*ा+ी पर कब्Sा कर खिलया। बेकर क े अ+ुसार, 320 ई. में चंˆगुप्त-I क े शास+ और उसक े उत्तराति*कारी समुˆगुप्त क े शास+ क े बाद, साक े सी*े पार्टखिलपुत्र क े शास+ क े ह आ गया। चौर्थीी श ाब्दी ई. क े उत्तरा*: में ब्राह्मर्णवादी संस्र्थीा+ों और ज्ञा+ का पु+रोद्भव हुआ, सिSसक े संदभ: में यह कहा गया है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "आरंणिभक गुप्तकाल क े दौरा+, ब्राह्मर्णवादी *म: का हिंहदू *म: क े रूप में विवकास हो गया। राSा क े दैवीकरर्ण क े सार्थी, ईश्वर का पृथ्वी पर अव ारों का सिसद्धान् - चाहे वह विकसी मूर्ति क े रूप में हो या 'ऐति हासिसक' मा+व क े रूप में-, को ठोस आ*ार विमला। इस विवकास से, Sैसा विक हम देख चुक े हैं, अयोध्या क े भव्य +गर की साक े +गर क े रूप में मान्य ा का माग: प्रशस् हुआ। यह पु+रोद्भव इ +ा शविXशाली र्थीा विक बौद्ध ीर्थी:यात्री फह्या+, Sो समुˆगुप्त क े उत्तराति*कारी चंˆगुप्त विद्व ीय क े समय में आया, को 'शाची क े महा+ देश' और इसकी राS*ा+ी में अप+ी रूतिच की कोई चीS मुस्जिश्कल से विमली। उ+क े विववरर्ण से अ+ैस्जिच्छक रूप से Sो हमें Sा+ पड़ ा है वह यह है विक साक े एक दीवार वाला +गर र्थीा।” पांचवीं श ाब्दी में +गर क े इति हास का उल्लेख बेकर +े वि+म्+व विकया है: “+गर क े इति हास में पांचवी श ाब्दी एक वि+र्णा:यक चरर्ण प्र ी हो ी है। इसमें साक े /अयोध्या अप+ी समृतिद्ध क े णिशखर पर विदखा और प्रति विष्ठ इक्ष्वाक ु राSाओं की राS*ा+ी क े रूप में 'पूव:' गौरव को 'पु+ः स्र्थीाविप ' विकया। यह सत्य है विक गुप्त साम्राज्य क े प + और उसक े परिरर्णामस्वरूप सामान्य मंदी क े कारर्ण इस प्रति ष्ठा को आगामी श ास्जिब्दयों में गंभीर क्षति पहुंची, विफर भी इस+े उस वि+यति से +गर की रक्षा की Sो गुप्त साम्राज्य क े अति*कांश +गरों की हुई अर्थीा: ् गुप्त युग क े बाद एक क्षीर्ण अस्जिस् त्व क े परिरर्णामस्वरूप इति हास क े मंच से अं ः गायब हो Sा+ा। इक्ष्वाकु ओं क े प्रसिसद्ध +गर क े रूप में इसकी मान्य ा और सबसे अति*क स्वंय भगवा+ विवष्र्णु की रामाव ार में राS*ा+ी क े रूप में मान्य ा क े कारर्ण, +गर कभी भी हिंहदुओं की दृविष्ट से ओझल +हीं हुआ, और परिरर्णामस्वरूप, Sब परिरस्जिस्र्थीति यां ऐसे विवकास क े खिलए ैयार हुई ो यह उत्तर भार क े सबसे पविवत्र स्र्थीा+ों में से एक क े रूप पु+स्र्थीा:विप हो सका। अन्य ीर्थी: स्र्थीा+ों की रह Sैसे मर्थीुरा और वारार्णसी, “सिSन्हें गुप्त काल क े बाद प्रायः छोड़ विदया गया ”, यह +गर दूसरी सहस्त्रास्जिब्द क े आरंभ में पु+S-विव हो गया।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बेकर +े +ोर्ट विकया है विक अयोध्या की उत्तरSीविव ा उत्तर भार में इसकी क े न्ˆीय स्जिस्र्थीति हो+े और गंगा क े मैदा+ में इसक े सामरिरक महत्व को भी मा+ा Sा सक ा है। ेरहवीं श ाब्दी क े विदल्ली सल् + क े अ*ी+ अयोध्या को एक बार विफर प्रां ीय राS*ा+ी ब++ा र्थीा। बाद क े वषÂ में इसका वाणिर्णस्जिज्यक और सामरिरक महत्व प्रति स्प*- +गरों द्वारा ले खिलया गया - Sौ+पुर द्वारा पन्ˆहवीं श ाब्दी में, फ ै Sाबाद द्वारा अठारहवीं श ाब्दी में और लख+ऊ द्वारा अठारहवीं श ाब्दी क े अं और उन्नीसवीं श ाब्दी क े आरंभ में। अयोध्या का प + +हीं हुआ और +गर +े *ार्मिमक Sीव+ का उत्कष: देखा। ची+ी स्रो ों का उल्लेख कर े हुए बेकर +े कहा है: ''ची+ी स्रो ों से, Sैसा विक हम Sा+ े हैं विक, राSा विवक्रमाविदत्य अर्थीा: स्कन्दगुप्त +े अयोध्या में (परमार्थी: क े अ+ुसार ) या 'श्रावस् ी' में (ह्ववे+सांग क े अ+ुसार) अप+ा दरबार स्र्थीाविप विकया र्थीा। यह संदेह से परे है विक 'श्रावस् ी' से 'कोसल' को संदर्भिभ विकया गया है सिSसकी राS*ा+ी उस समय साक े /अयोध्या र्थीी, + विक श्रावस् ी। इसकी संभाव+ा है विक राS दरबार क ु मारगुप्त क े शास+काल में पहले ही पार्टखिलपुत्र से साक े /अयोध्या में स्र्थीा+ान् रिर हो गया हो। हम+े देखा है विक अयोध्या क े +ाम का उत्कीर्ण:+ वाला पहला णिशलालेख इसी राSा क े शास+काल का है। संरतिक्ष अणिभलेखों में पार्टखिलपुत्र का उल्लेख कर+े वाला अस्जिन् म शासक क ु मारगुप्त क े विप ा चंˆगुप्त विद्व ीय है।” बेकर +े अयोध्या में स्र्थीा+ीय S+श्रुति प्रचखिल हो+े का उल्लेख विकया है Sो +गर की पु+:खोS का श्रेय विवक्रमाविदत्य को दे ी है इस मौखिखक S+श्रुति का उल्लेख मार्मिर्ट+ द्वारा 1838 में विकया गया और उसक े बाद कहिं+घम और का+†Sी (1870) द्वारा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यावित्रयों और गSेविर्टयरों क े वृत्तां ों का विवश्लेषर्ण

572. विवखिलयम हिंफच (1608-11) +े अव* (अयोध्या) का उल्लेख 'एक प्राची+ +गर और पोर्टा+ राSा की पीठ Sो विक ध्वस् हो गया है”, क े रूप में विकया है। हिंफच +े 400 वष: पूव: वि+र्मिम महल का उल्लेख विकया है और "रामचन्ˆ का महल और घरों क े अवशेषों” का भी उल्लेख विकया है। हिंफच +े भगवा+ राम से Sुड़े *ार्मिमक विवश्वासों का, उ+क े अव ार क े हे ु ब ा े हुए वर्ण:+ विकया है। विर्टफ े न्र्थीेलर +े भगवा+ राम का अयोध्या से Sुड़ाव का उल्लेख विकया है और “इस स्र्थीा+ पर +दी क े उन्नतिय र्ट पर वि+र्मिम एक मस्जिन्दर का उल्लेख है”। विर्टफ े न्र्थीेलर का कह+ा है विक मस्जिन्दर को औरंगSेब द्वारा ध्वस् कर विदया गया र्थीा और इसक े स्र्थीा+ पर एक मस्जिस्Sद ब+ा दी गयी र्थीी। विर्टफ े न्र्थीेलर +े एक औरंगSेब द्वारा रामकोर्ट कहे Sा+े वाले महल क े विवध्वंश का और उसी स्र्थीा+ पर “ ी+ गुम्बद वाले एक मुस्जिस्लम मंविदर क े वि+मा:र्ण” का विवशेष उल्लेख विकया है। विर्टफ े न्र्थीेलर क े विववरर्ण में उल्लेख है विक क ु छ लोगों क े अ+ुसार मस्जिस्Sद बाबर द्वारा ब+वायी गयी र्थीी। उस विववरर्ण में चौदह काले पाषार्ण स् ंभों का संदभ: है सिSसमें से बारह मस्जिस्Sद क े आं रिरक विहस्से को सहारा दे े हैं और दो प्रवेश द्वारा पर लगे हुए हैं। उसक े विववरर्ण में एक वगा:कार बॉक्स का उल्लेख विमल ा है Sो विक Sमी+ से पाँच इंच उठा हुआ है और “सिSसकी लंबाई 5 एल्स और अति*क म चौड़ाई 4 एल्स है”। विर्टफ े न्र्थीेलर क े अ+ुसार विहन्दू इसे पाल+ा या बेदी कह े र्थीे Sो इस विवश्वास पर आ*ारिर र्थीा एक समय यहाँ पर एक भव+ र्थीा सिSसमें विवष्र्णु का भगवा+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA राम क े रूप में Sन्म हुआ र्थीा। हालांविक बाद में, औरंगSेब या बावर +े “इसका विवध्वंश करा विदया”, पुस् क में कहा गया है विक उस स्र्थीा+ पर Sहाँ भगवा+ राम का गृह र्थीा, विहन्दू “ ी+ बार परिरक्रमा कर े है और ल पर शीश +वा े हैं”। चैत्र माह में भXों का Sमावड़े का भी संदभ: है।

573. विर्टफ े न्र्थीेलर क े विववरर्ण का (और सार्थी ही अन्य का भी) मूल्यांक+ कर+े क े खिलए 'Sो उस+े दूसरों से सु+ा र्थीा' उसे 'Sो उस+े वास् व में देखा और पाया र्थीा’, से अलग कर+ा आवश्यक है। पहली एक अ+ुश्रुति है। विर्टफ े न्र्थीेलर का मस्जिस्Sद, एक ी+ गुम्बद वाले काले पाषार्ण स् ंभ युX संरच+ा, क े अस्जिस् त्व का वर्ण:+ उसक े व्यविXग अवलोक+ पर आ*ारिर है। उसकी यह राय विक मस्जिस्Sद को संभव ः औरंगSेब +े ब+वाया र्थीा, प्रत्यक्ष ः उस पर आ*ारिर है Sो उस+े सु+ा र्थीा और यह उसकी व्यविXग Sा+कारी की बा +हीं है। इसी रह, इस थ्य क े वि+ष्कष: को, विक मस्जिस्Sद मंविदर को ोड़कर ब+ायी गयी र्थीी, स्व ंत्र रूप से सत्याविप विकए Sा+े की आवश्यक ा है और पूर्ण: ः विर्टफ े न्र्थीेलर क े वृत्तां पर आ*ारिर +हीं हो सक ा। विववरर्ण वि+तिश्च ही विवशेष महत्व का है Sब यह भगवा+ राम में विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास क े अस्जिस् त्व का और Sन्मस्र्थीा+ का पास की ी+ गुम्बद वाली संरच+ा से Sुड़े हो+े का, Sहाँ एक "वगा:कार बॉक्स" को Sन्म वेदी मा+कर पूSा Sा ा र्थीा, का उल्लेख विकया है। विववरर्ण में परिरक्रमा द्वारा और उस स्र्थीा+ पर भXों क े Sमा हो+े की प्रविक्रया से पूSा पद्धति का उल्लेख है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

574. "ईस्र्ट इंतिर्डय+ गSेविर्टयर ऑफ विहन्दुस् ा+" (1828) में हैविमल्र्ट+ क े विववरर्ण में "घाघरा +दी क े दाविह+े विक+ारे पर स्जिस्र्थी, अव* को संदर्भिभ विकया है। +गर को संदर्भिभ कर े हुए हैविमल्र्ट+ उल्लेख कर े हैं विक "यह शहर प्राची+ ा क े सबसे पविवत्र स्र्थीा+ों में से एक है। " वे उ+ ीर्थी: स्र्थीा+ों का उल्लेख कर े हैं, "Sहाँ महा+ राम की राS*ा+ी, अव* क े प्राची+ शहर क े अवशेष अभी भी देखे Sा सक े है; लेविक+ Sो क ु छ भी इसकी पूव: भव्य ा रही होगी, वह अब भग्नावशेषों क े आकारही+ पुंS क े अलावा कु छ भी प्रदर्भिश +हीं कर ी।" उन्हें "एक मलबे का ढेर और Sंगल विमला, सिSसमें से क ु छ राम, उ+की पत्+ी सी ा, उ+क े से+ापति लक्ष्मर्ण और उ+क े प्र*ा+मंत्री ह+ुमा+ को समर्मिप मंविदरों क े प्रति विष्ठ स्र्थील हैं। " हैविमल्र्ट+ +े "राम ा संप्रदाय से वि+कले हुए *ार्मिमक णिभक्षुओं को ीर्थी:यात्रा कर े हुए देखा, Sो मंविदर और मूर्ति यों क े चारो ओर पद-यात्रा कर े र्थीे, पविवत्र क ु °ड़ में स्+ा+ कर े र्थीे और *ार्मिमक अ+ुष्ठा+ कर े र्थीे।" Sबविक हैविमल्र्ट+ स्पष्ट रूप से अयोध्या में मंविदरों को और पूSा क े प्रर्थीाग रूपों को भगवा+ राम में आस्र्थीा और विवश्वास क े प्रति संदर्भिभ कर े हैं, राम Sन्मभूविम मंविदर या मस्जिस्Sद क े बारे में कोई विवशेष अवलोक+ +हीं है।

575. मार्मिर्ट+ क े विववरर्ण (1838) में यह संदभ: है विक अयोध्या में मस्जिन्दरों क े विव+ाश को "सामान्य ः विहन्दुओं द्वारा औरंगSेब क े उ£ ा को सिSम्मेदार ठहराया Sा ा है, और यह उसिल्लखिख विकया गया है विक उसक े छोर्टे से अवशेष भी +ही बचे हैं। अयोध्या में मस्जिस्Sद क े बारें में मार्मिर्ट+ कह े हैं विक "इसमें अत्या*ुवि+क हो+े क े प्रत्येक लक्षर्ण हैं”, यह इसकी दीवारों पर लगे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA णिशलालेख से प ा चल ा है विक औरंगSेब से पांच पीढ़ी पहले बाबर +े ब+वाया र्थीा। मार्मिर्ट+ अयोध्यावासिसयों की इस आस्र्थीा को संदर्भिभ कर े हैं विक वृहदबाला की मृत्यु क े बाद उ+का +गर ब क वीरा+ र्थीा, Sब क विक "उज्जै+ क े विवक्रम" आये Sो पविवत्र +गर की खोS में आये र्थीे और उन्हो+ें भगवा+ राम की आस्र्थीा वाले पविवत्र स्र्थीलों पर 360 मस्जिन्दर ब+वाये। मार्मिर्ट+ +े विवक्रम का उल्लेख कर े हुए, दो+ों को संव युग क े प्रव:क और बाद क े विद+ विवक्रम को संदर्भिभ विकया। मार्मिर्ट+ +े विवक्रम का उल्लेख कर े हुए, दो+ों को संव युग का प्रव:क और बाद वाला विवक्रम संदर्भिभ विकया। मार्मिर्ट+ क े अ+ुसार यह संभाव+ा र्थीी विक भगवा+ राम की पूSा बड़े विवक्रम क े समय से हो ी हो, एक संप्रदाय क े भाग क े रूप में उ+की पूSा सबसे पहले रामा+ुS द्वारा स्र्थीाविप की गई होगी। शहर और उसक े मंविदरों क े उद्गम पर ये मार्मिर्ट+ की परिरकल्प+ा क े एक भाग हैं। यह साक्ष्य का गठ+ +हीं कर ा है। मार्मिर्ट+, बाबर द्वारा ब+ाई गई मस्जिस्Sद क े स् म्भों का सिSक्र कर े हुए उसिल्लखिख कर े हैं विक ये काले पत्र्थीर क े हैं और इन्हें विहन्दू इमार से खिलया गया है, सिSसका प्रमार्ण उ+क े क ु छ आ*ारों पर आक ृ ति यों का हो+ा है सिSन्हे खस्जि°ड़ कर विदया गया है। मार्मिर्ट+ क े अ+ुसार, ये स् ंभ महल क े खंर्डहरों से खिलए गए होंगे। Sैसा विक उपयु:X विवश्लेषर्ण से संक े विमल ा है, मार्मिर्ट+ क े विववरर्ण अ+ुमा+ पर हैं। Sबविक उन्हों+े मस्जिस्Sद क े संबं* में, भगवा+ राम से Sुड़ी आस्र्थीा और विवश्वास क े संबं* में अप+े स्वयं क े विवचारों का उल्लेख विकया है और काले पत्र्थीर क े स् ंभों की उपस्जिस्र्थीति क े बारे में विववरर्ण, व्यापक रूप से अ ी क े इति हास क े उ+क े स्वयं क े आकल+ पर है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

576. "गSेविर्टयर ऑफ द र्टेरिरर्ट्रीS अ°ड़र द गव:मेन्र्ट ऑफ ईस्र्ट इस्जि°ड़या क ं प+ी" (1858) में एर्डवर्ड: र्थीॉन्र्ट:+ का विववरर्ण "विवशाल खंर्डहर" को संदर्भिभ कर ा है, "सिSसे राम क े विकले का हो+ा कहा Sा ा है।" र्थीॉन्र्ट:+ एक £न्र्थी से उद्धरर्ण को संदर्भिभ कर े हैं सिSसे बुच+े+ का मा+ा Sा ा है। वह 360 मंविदरों क े वि+मा:र्ण और औरंगSेब द्वारा उ+क े विवध्वंस क े विवश्वास की S+श्रुति का संदभ: दे े हैं। उ+का मंविदर क े स्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण को मा++ा ऐति हासिसक थ्य का प्रमार्ण +हीं है। र्थीॉन्र्ट:+ +े Sो सु+ा उसे अणिभखिलखिख विकया: + ो वो सिSन्हों+े उसे उ+की आस्र्थीा क े बारे में ब ाया और + ही दस् ावेज़ क े लेखक, प्रति -परीक्षा क े दौरा+ मूल्यांविक विकया Sा+े क े खिलए उपलब्* हैं। ऐसा विववरर्ण उ+ स्वीकाय: साक्ष्य क े कठोर मा+कों क े सार्थी-सार्थी संभाव+ाओं की प्रबल ा क े अति*क णिशणिर्थील मा+क को पूरा +हीं कर सक ा है Sो दीवा+ी परीक्षर्णों को वि+यंवित्र कर े हैं।

577. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री Sफरयाब सिSला+ी +े Sोर विदया है विक उपरोX उद्धरर्ण में गSेविर्टयर +े इस सिसद्धां का समर्थी:+ कर+े क े खिलए "मस्जिस्Sद की दीवार पर एक णिशलालेख" पर अवलम्ब+ खिलया है विक स्र्थीा+ीय परंपराएँ Sो मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण औरंगSेब द्वारा ब ा ी हैं, इसक े विवपरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर द्वारा विकया गया र्थीा। उ+क े अ+ुसार हिंहदुओं द्वारा मस्जिस्Sद क े मध्य गुंबद क े +ीचे पूSा का कोई विवशेष संदभ: +हीं है। हालांविक, यह +ोर्ट कर+ा प्रासंविगक है विक र्थीॉन्र्ट:+ की विर्टप्पर्णीयाँ व्यविXग +हीं हैं और उन्हों+े बुच+े+ क े £न्र्थी से एक वि+ष्कष: वि+काला है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA औपवि+वेणिशक सरकार का उद्देश्य एक गSेविर्टयर क े रूप में भार क े बारे में प्रामाणिर्णक Sा+कारी को "एक सस् े और सुविव*ाS+क रूप में" विब्रविर्टश S+ ा को दे+ा र्थीा। इस चे ाव+ी को ध्या+ में रख े हुए यह +ोर्ट कर+ा प्रासंविगक है विक उपरोX उद्धरर्ण वि+म्+खिलखिख को संदर्भिभ कर ा हैं: (i) "रामगढ़ या राम क े विकले" क े खंर्डहर; (ii) मस्जिस्Sद में 14 कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभों की उपस्जिस्र्थीति सिSसमें परिरष्क ृ और रोचक कारीगरी है और; (iii) पत्र्थीर का एक च ुष्कोर्णीय पाल+ा सिSसे वह पाल+ा मा+ा Sा ा है सिSसमें भगवा+ राम का Sन्म भगवा+ विवष्र्णु क े अव ार क े रूप में हुआ र्थीा।

578. कहिं+घम का "आर्मिकयोलोसिSकल सव† ऑफ इस्जि°ड़या" (1862-5), "अयोध्या क े बारे में अ+ेक पविवत्र ब्राह्मर्णवादी मंविदरों" क े अस्जिस् त्व का उल्लेख कर ा है और यह विक "प्राची+ मंविदरों को मुसलमा+ों द्वारा +ष्ट कर विदया गया र्थीा।" रिरपोर्ट: में कहा गया है विक शहर क े क ें ˆ में, "Sन्म स्र्थीा+" या "राम का Sन्म-स्र्थीा+ मंविदर" है। पुस् क में रामकोर्ट को स्वग:दारी संदर्भिभ विकया गया है और उल्लेख विकया है विक "शहर क े क े न्ˆ में ही एक मील दूरी का चौर्थीाई विहस्सा Sन्म स्र्थीा+ या राम का 'Sन्म-स्र्थीा+ मस्जिन्दर' है।" श्री सिSला+ी +े क: विदया विक राम क े Sन्म-स्र्थीा+ मंविदर का संदभ: विववाविद ढाँचे क े समा+ +हीं है और यह कहीं और स्जिस्र्थी है। कहिं+घम क े विववरर्ण में ह+ुमा+ गढ़ी, स्वर्ण: द्वार, लक्ष्मर्ण घार्ट और Sन्मस्र्थीा+ सविह *ार्मिमक स्र्थीलों क े समूह की Sा+कारी है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

579. स्र्थीा+ापन्न आयुX और बन्दोबस् अति*कारी क े रूप में पी का+†गी +े "विहस्र्टोरिरकल स्क े च ऑफ फ ै Sाबाद" (1870) में Sन्मस्र्थीा+, स्वग: द्वार मंविदर और त्रे ा-क े -ठाक ु र क े संदभ: में हिंहदुओं की आस्र्थीा क े खिलए अयोध्या क े महत्व को रेखांविक विकया। उन्हों+े 1528 ई. में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण का श्रेय बाबर को विदया है और खिलखा है विक एक पूव:व - मंविदर क े कई कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभों का इस् ेमाल मस्जिस्Sद में विकया गया है। उ+क े विववरर्ण में "रामकोर्ट को रामचन्ˆ का गढ़" संदर्भिभ विकया गया है और यह विक यह विकला “20 दुगÂ से तिघरा हुआ र्थीा”, सिS+में से प्रत्येक को भगवा+ राम क े एक प्रसिसद्ध से+ापति द्वारा शासिस हो+ा मा+ा Sा ा र्थीा। का+†गी +े 1855 में हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच हुए विवˆोह को संदर्भिभ विकया है और सिSसक े परिरर्णामस्वरूप 75 मुसलमा+ों की मृत्यु हो गयी सिSन्हें विववाविद ढाँचे क े बगल में कविब्रस् ा+ में दफ+ विकया गया र्थीा। का+†गी क े अ+ुसार इसक े पहले क हिंहदू और मुसलमा+ "मस्जिस्Sद- मंविदर" क े रूप में वर्भिर्ण इस स्र्थीा+ में समा+ रूप से उपास+ा विकया कर े र्थीे। हालांविक विब्रविर्टश शास+ क े बाद से भावी संघषÂ से बच+े क े खिलए एक रेलिंलग ैयार की गयी र्थीी। यह कहा गया है विक इसक े भी र मुस्जिस्लम प्रार्थी:+ा कर े र्थीे, Sबविक बाड़े क े बाहर विहन्दुओं +े एक चबू रा ब+ाया सिSस पर वे चढ़ावा चढ़ा े र्थीे। का+†गी क े विववरर्ण में Sन्मस्र्थीा+ सविह ी+ *ार्मिमक स्र्थील उसिल्लखिख हैं। उ+क े विववरर्ण में उस Sन्मस्र्थीा+ स्र्थील पर बाबर द्वारा मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर+ा मा+ा गया है सिSसे वह उस "स्र्थीा+ क े रूप में तिचस्जिन्ह कर े हैं Sहाँ राम चंˆ का Sन्म हुआ र्थीा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

580. का+†गी +े इस थ्य क े मद्दे+Sर विक "यह उल्लेख+ीय है बाबर क े Sीव+ से संबंति* सभी ज्ञा पुस् कों में अयोध्या में उसक े कायÂ से संबंति* पृष्ठ +ामौSूद हैं”, सरयू और घाघरा +दी क े र्ट पर घेरा र्डाल+े वाला बाबर क े अणिभया+ों पर लेर्ड+ क े संस्मरर्ण का सहारा खिलया है। उस+े 1528 ईस्वी में इसका वि+मा:र्ण मा+ े हुए मस्जिस्Sद पर दो णिशलालेखों का उल्लेख विकया है। मस्जिस्Sद में इस् ेमाल हुए कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभों का एक संदभ: है Sो उन्हे बौद्ध स् ंभों से विमल ा Sुल ा है। उ+क े आ*ार पर, वह परिरकल्प+ा कर े हैं विक "यविद अयोध्या वीरा+ +हीं र्थीा, ो इसमें कम से कम Sन्मस्र्थीा+ में एक अच्छा मंविदर हो+ा चाविहए; इसक े कई स् ंभ अभी भी अस्जिस् त्व में हैं और अत्यं सुरतिक्ष हैं, सिS+का उपयोग मुसलामा+ों द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में विकया गया र्थीा।" का+†गी 1855 क े संघष: का विववरर्ण दे ा हैः "हिंहदू और मुसलमा+ म भेद - Sन्मस्र्थीा+ ह+ुमा+ गढ़ी क े क ु छ सौ कदम की दूरी क े भी र है। 1855 में Sब हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े बीच झड़प हुई ो पहले +े बल पूव:क ह+ुमा+ गढ़ी पर कब्Sा कर खिलया, Sबविक मुसलमा+ों +े Sन्मस्र्थीा+ पर कब्Sा कर खिलया। उस अवसर पर मुस्जिस्लमों +े वास् व में ह+ुमा+ गढ़ी की सीविढ़यों क कोणिशश की लेविक+ उन्हें काफी +ुकसा+ क े सार्थी खदेड़ विदया गया। इसक े बाद हिंहदुओं +े इस सफल ा का अ+ुसरर्ण विकया और ीसरे प्रयास में, Sन्मस्र्थीा+ ले खिलया, सिSसक े द्वार पर 75 मुस्जिस्लम “शहीद कब्र” (गंS-ए-शहीद) में दफ+ हैं। राSा क े कई रेSीमेंर्ट हर समय देख े र्थीे, लेविक+ उ+को हस् क्षेप का आदेश +हीं र्थीा। ऐसा कहा Sा ा है विक उस समय क हिंहदू और मुस्जिस्लम दो+ों उस मस्जिस्Sद-मंविदर में समा+ रूप से पूSा कर े र्थीे। विब्रविर्टश शास+ से विववादों को रोक+े क े खिलए एक रेलिंलग लगाई गयी है, सिSसक े भी र मस्जिस्Sद में मुस्जिस्लम प्रार्थी:+ा कर े हैं, Sबविक दीवार क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बाहर हिंहदुओं +े एक चबू रा ब+ा खिलया है सिSस पर वे अप+ा चढ़ावा चढ़ा े हैं।" का+†Sी का विववरर्ण हिंहसा की घर्ट+ा क े लगभग पंˆह साल बाद का है, इस घर्ट+ा क े परिरर्णामस्वरूप विब्रविर्टश द्वारा पूSा क े उ+क े क्षेत्रों में दो समुदायों को अलग कर+े क े खिलए रेलिंलग लगाई गई र्थीी। श्री सिSला+ी +े का+†गी क े विववरर्ण में इस संदभ: को चु+ौ ी दी विक घर्ट+ा से पहले "मस्जिस्Sद- मंविदर" क े भी र विहन्दुओं और मुसलमा+ों दो+ों द्वारा पूSा की Sा ी र्थीी। का+†गी Sब अवलोक+ कर े हैं विक "यह कहा Sा ा है" विक उस समय क मुसलमा+ों और हिंहदुओं द्वारा मस्जिस्Sद क े अंदर समा+ रूप से प्रार्थी:+ा की Sा ी र्थीी, उपरोX उद्धरर्ण में वास् व में सचे हैं। लेविक+ विववरर्ण कु छ ऐसी चीSों को ब ा ा है सिSस पर विववाद +ही है अर्थीा: ् यह विक घर्ट+ा क े बाद रेलिंलग एक अवरो* क े रूप में लगायी गयी Sो मुस्जिस्लमों को आं रिरक अहा े और हिंहदुओं को बाहरी अहा े में- *ार्मिमक पूSा कर+े में दो समुदायों को अलग कर ी र्थीी। गौर लब है विक का+†गी का विववरर्ण विहन्दुओं द्वारा चबू रे क े वि+मा:र्ण को मस्जिस्Sद क े बाहर रेलिंलग क े वि+मा:र्ण से Sोड़ ा है। उ+क े विववरर्ण क े अ+ुसार, रेलिंलग क े वि+मा:र्ण क े परिरर्णामस्वरूप पूSा क े पूव:व - रीक े से उत्पन्न अपवS:+ का साम+ा कर+े से हिंहदुओं +े रेलिंलग क े बाहर चबू रे की स्र्थीाप+ा की होगी। सिSसका बाद में प ा लगाया Sाएगा, चबू रे का वि+मा:र्ण रेलिंलग क े समीप विकया गया र्थीा, Sहां से पूSा की Sा ी र्थीी और उस पर चढ़ावा चढ़ाया Sा ा र्थीा, सिSसे हिंहदु भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+ े र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

581. द इंपीरिरयल गSेविर्टयर ऑफ इंतिर्डया (1908) एक विवशाल र्टीले को संदर्भिभ कर ा है सिSसे "रामकोर्ट या राम क े विकले" क े रूप में Sा+ा Sा ा है और इसक े एक को+े में वह पविवत्र स्र्थीा+ मौSूद है Sहाँ भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा। गSेविर्टयर में अणिभखिलखिख है विक अति*कांश बाड़े पर एक पुरा+े मंविदर क े अवशेषों से बाबर द्वारा वि+र्मिम एक मस्जिस्Sद का कब्Sा है। यह बाहरी विहस्से में राम चबू रा क े अस्जिस् त्व को संदर्भिभ कर ा है Sो भगवा+ राम क े "Sन्मस्र्थीा+ को तिचवि- कर ा" है। गSेविर्टयर +े सी ा रसोई की मौSूदगी को करीब से देखा।

582. द तिर्डस्जिस्र्ट्रक्र्ट गSेविर्टयर ऑफ फ ै Sाबाद, (1960)309 चंˆगुप्त प्रर्थीम को राज्य का वास् विवक संस्र्थीापक मा+ ा है "सिSसका विवस् ार साक े (अव*) और प्रयाग (इलाहाबाद) क र्थीा।" अयोध्या की पु+स्र्थीा:प+ा का श्रेय उज्जै+ क े विवक्रमाविदत्य को है सिSसकी चंˆगुप्त विद्व ीय क े +ाम से पहचा+ की गयी है। गSेविर्टयर में उल्लेख विकया गया है विक ची+ी यात्री ह्वे+त्सांग (630-644 ईस्वी) अव* से गुSरा और “100 बौद्ध मठों, 3000 से अति*क महाया+ र्थीा ही+या+ क े सा*ु और क े वल दस देव (गैर-बौद्ध देव ा) मस्जिन्दर, गैर बौद्ध हैं लेविक+ कम संख्या में हैं”, की मौSूदगी का उल्लेख विकया है। गSेविर्टयर क े अ+ुसार, भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ हो+े क े विहन्दुओं क े विवश्वास को दशा:+े वाले ज्यादात्तर क्षेत्रों पर मस्जिस्Sद का कब्Sा है। गSेविर्टयर का दावा यह है विक पुरा+े मस्जिन्दर क े अवशेषों पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया। यह उसिल्लखिख कर ा है विक बाहरी भाग में एक छोर्टा चबू रा और वेविदका ही Sन्मस्र्थीा+ है। 309 श्रीम ी इशा बसं Sोशी द्वारा यू.पी. गSेविर्टयर फ ै Sाबाद (1960 संस्करर्ण) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

583. कÂ क े दौरा+ गSेविर्टयस: और यात्रा वृत्तां ों क े अप+े विवश्लेषर्ण पर श्री सिSला+ी +े वि+म्+खिलखिख प्रस् ाव वि+रूविप विकया: (i) वष: 1528 में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण से लेकर वष: 1949 क की अवति* क हिंहदुओं की यह मान्य ा सिसद्ध कर+े का कोई प्रमार्ण +हीं है विक भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ मस्जिस्Sद क े मध्य गुंबद क े +ीचे र्थीा; (ii) वष: 1828 से मस्जिस्Sद क े अंदर हिंहदू पूSा की वि+रं र ा को दर्भिश कर+े क े खिलए कोई साक्ष्य +हीं हैं; (iii) रामचबू रा भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है;

(iv) Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में रामचबू रा को इस थ्य क े द्वारा संपुष्ट विकया गया है विक 1885 क े वाद में वादी +े आं रिरक अहा े क े संबं* में विकसी प्रार्थी:+ा की माँग +हीं की र्थीी; (v) यह क े वल वाद 5 वष: 1989 में र्थीा विक पूव: में एक Sन्मस्र्थीा+ की अव*ारर्णा को प्रस् ु विकया गया र्थीा सिSसक े बारे में यह *ारर्णा र्थीी विक क ें ˆीय गुंबद भगवा+ राम की Sन्मभूविम +हीं र्थीी; र्थीा (vi) भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ को तिचवि- कर+े वाले मध्य गुंबद की परिरकल्प+ा क े वल वाद 5 में सातिक्षयों क े कर्थी+ से आ ा है। श्री सिSला+ी का वि+रूपर्ण है विक रामचबू रा Sन्म स्र्थीा+ क े दो दृविष्टकोर्णों से महत्व को अप+ाएगा: पहला यह है विक आं रिरक और बाह्य अहा ों से युX संपूर्ण: स्र्थील एक संयुX संपखित्त है और रेलिंलग को औपवि+वेणिशक सरकार द्वारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े वल शांति, का+ू+ और व्यवस्र्थीा की रक्षा क े खिलए एक उपचार क े रूप में रखा Sा रहा है। दूसरा दृविष्टकोर्ण यह है विक श्री सिSला+ी क े क: यह मान्य ा दे े हैं: (i) उस स्जिस्र्थीति की स्वीक ृ ति Sो Sन्म -स्र्थीा+ विववाविद स्र्थील (उसक े अ+ुसार रामचबू रा) क े भी र एक क्षेत्र में है; और (ii) रामचबू रा की भौति क वि+कर्ट ा से इ+कार +हीं विकया गया है, सिSसे रेलिंलग क े ठीक बाहर ब+ाया गया र्थीा। यात्रा विवववरर्ण, गSेविर्टयर एवं पुस् क ें

584. वाद 4 में वादी की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े क: विदया विक ऐति हासिसक साम£ी का कोई भी उपयोग यात्रा-वृत्तां ों और गSेविर्टयर से विमलकर साव*ा+ी क े सार्थी विकया Sा+ा चाविहए। र्डॉ. *व+ +े क: विदया: (i) स्वत्व क े मुद्दे को ऐति हासिसक काय:, £ंर्थी और यात्रा वृत्तां क े आ*ार पर य +हीं विकए Sा सक े हैं; (ii) न्यायालय को वाद 5 में वादी क े अति*वXा द्वारा अप+ाए गए दृविष्टकोर्ण को +हीं मा++ा चाविहए, सिSस+े अप्रमाणिर्ण ऐति हासिसक थ्यों क े आ*ार पर वि+ष्कष: वि+काल+े का प्रयास विकया है; र्थीा (iii) इति हासलेख+ की पु+रावृखित्त क े विब+ा इति हास को पढ़ा या व्याख्या +हीं विकया Sा सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्डॉ. *व+ +े न्यायमूर्ति एस यू खा+ और न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल की काय:प्रर्णाली को इस आ*ार पर गल ठहराया विक उ+का विवश्लेषर्ण अ+ुमा+ काय: क े आ*ार पर आगे बढ़ ा है। इस मुद्दे को उठा े हुए विक क ै से संभाव+ाओं की अति*क ा गSेविर्टयर में भरा Sा सक ा है, उन्हों+े कहा विक ऐति हासिसक थ्य पर अवलम्ब ले े हुए उच्च न्यायालय से मूल रूप से यह पूछा Sा रहा र्थीा (Sैसा विक उन्हों+े इसे वर्भिर्ण विकया है) "अ+ुमावि+ काय: क े शीष: में खड़ा हो+ा"।

585. Sो क: विदए गए हैं उ+का विवश्लेषर्ण कर े हुए हमें फ़रSंद अली ब+ाम ज़फ़र अली310 में पंSाब मुख्य न्यायालय क े वि+र्ण:य क े खिलए प्रारम्भ से ही संदर्भिभ हो+ा चाविहए। उस मामले में, एक मस्जिस्Sद क े मु वल्ली और प्रति वाविदयों क े बीच एक विववाद र्थीा, Sो क ु छ संपखित्तयो से अति*क विदवंग इमाम क े वंशS र्थीे। मु वल्ली +े इसे एक *ार्मिमक बंदोबस् ी का भाग कहा। न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया: "हमें लग ा है विक संपखित्त क े खिलए स्वत्व स्र्थीाविप कर+े क े खिलए ऐति हासिसक कायÂ का उपयोग भार ीय साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 57 क े बल पर उतिच +हीं ठहराया Sा सक ा है। यद्यविप हमारी राय में पुरा+ी और ऐति हासिसक संस्र्थीा मस्जिस्Sद क े न्यासी और एक वि+Sी व्यविX क े बीच प्रश्नग स्वत्व उX *ारा क े अर्थी: क े अंदर "साव:Sवि+क इति हास का मामला" +हीं मा+ा Sा सक ा है। इसखिलए, हमें साक्ष्य क े इस भाग को विवचार से बाहर कर+ा चाविहए और हमें +हीं लग ा विक इसक े अपवS:+ से परिरर्णाम में कोई फक: पड़ेगा। दो पुस् कों में शाविमल विववरर्ण वादी क े खिलए विकसी भी उच्च परिरमार्ण क 310 (1918) 46 IC 119 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मामले को आगे +हीं बढ़ा ा है, और वास् व में इस विववरर्ण को अणिभलेख पर अन्य स्वीकाय: साक्ष्य से सं£ह विकया Sा सक ा है।" (प्रभाव वर्ति* ) इसी प्रकार का दृविष्टकोर्ण क+ा:र्टक बोर्ड: ऑफ वक्फ ब+ाम गव+:मेन्र्ट ऑफ इंतिर्डया311 में इस न्यायालय की दो न्याया*ीश पीठ +े अप+ाया, Sहाँ न्यायमूर्ति राSेन्ˆ बाबू +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: "8…Sहां क दीवा+ी प्रक ृ ति क े स्वत्व वाद का संबं* है, ऐति हासिसक थ्यों और दावों क े खिलए कोई स्र्थीा+ +हीं है। सीमाव - ऐति हासिसक थ्यों पर अवलंब ले+ा गल वि+ष्कषÂ को प्राप्त करेगी। इस प्रस् ाव क े खिलए यह प्रश्न स्वाविमत्व, कब्Sे और वाद की संपखित्त पर स्वत्व का थ्य है। इसे साविब कर+े क े खिलए क े वल स्वीकाय: साक्ष्य और अणिभलेख ही सहायक हो सक े हैं।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

586. साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 57312 उ+ थ्यों को स्पष्ट कर ी है, सिSन्हें न्यायालय द्वारा न्यातियक अवेक्षा खिलया Sा+ा चाविहए। थ्य की 13 श्रेणिर्णयों, सिS+में से न्यातियक अवेक्षा खिलया Sा सक ा है, को वि+रूविप कर+े क े बाद यह वि+*ा:रिर कर ा है विक "इ+ सभी मामलों में और लोक इति हास, साविहत्य, विवज्ञा+ और कला क े सभी मामलों पर भी न्यायालय संदभ: क े खिलए उपयुX पुस् कों या दस् ावेSों का सहारा ले सक ी है"। उपरोX प्राव*ा+ न्यायालय को लोक इति हास क े मामलों पर पुस् कों और संदभ: दस् ावेSों क े सार्थी- सार्थी "इसक े सा*+ क े खिलए" सहारा ले+े में सक्षम ब+ा ा है।

587. Sबविक वाद 5 में वादकारिरयों का प्रति वि+ति*त्व कर+े वाले अति*वXा और हिंहदू पक्षकारों क े खिलए पेश हो+े वाले अन्य अति*वXा द्वारा गSेविर्टयर पर 312 57. वे थ्य, सिS+की न्यातियक अवेक्षा न्यायालय को कर+ी होगी-- न्यायालय वि+म्+खिलखिख थ्यों की न्यातियक अवेक्षा करेगा-- [(i) भार क े राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त समस् विवति*याँ;] (ii) यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम की पार्लिलयामे°र्ट द्वारा पारिर विकए Sा+े वाले समस् पस्जिब्लक ऐक्र्ट र्थीा वे समस् स्र्थीा+ीय और पस:+ल ऐक्र्ट सिS+क े बारे में यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम की पार्लिलयामे°र्ट +े वि+र्मिदष्ट विकया है विक उ+की न्यातियक अवेक्षा की Sाए; (iii) भार ीय से+ा, +ौसे+ा या वायुसे+ा क े खिलए युद्ध की वि+यमावली; [(iv) यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम की पार्लिलयामे°र्ट की, भार की संविव*ा+ सभा की,संसद की, संसद की र्थीा विकसी प्रान् या राज्यों में त्समय प्रवृत्त विवति*यों क े अ*ी+ स्र्थीाविप विव*ा+ म°र्डलों की काय:वाही का अ++ुक्रम;] (v) £ेर्ट विब्रर्टे+ और आयरलै°र्ड की यू+ाुइर्टेर्ड हिंकगर्डम क े त्समय प्रभुका राज्यारोहर्ण और राSहस् ाक्षर; (vi) वे सब मुˆाएं, सिS+की अं£ेSी न्यायलय न्यातियक अवेक्षा कर े हैं, भार क े सब न्यायालयों की और क े न्ˆीय सरकार या क्राउ+ रिरप्रेSे°र्टेविर्टव क े प्राति*कार द्वारा भार क े बाहर स्र्थीाविप सब न्यायालयों की मुˆाएं, +ावति*करर्ण और समुˆीय अति*कारिर ा वाले न्यायालयों की और +ोर्टरीज़ पस्जिब्लक की मुˆाएंँ और वे सब मुˆाएँ, सिS+का कोई व्यविX संविव*ा+ या यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम की पार्लिलयामे°र्ट क े विकसी ऐक्र्ट या भार में विवति* का बल रख+े वाले अति*वि+यम या विववि+मय द्वारा उपयोग कर+े क े खिलए प्राति*कृ है; (vii) विकसी राज्य में विकसी लोकपद पर त्समय आरूढ़ व्यविXयों क े कोई पदारोहर्ण, +ाम, उपाति*यां, क ृ त्य और हस् ाक्षर, यविद ऐसे पद पर उ+की वि+युविX का थ्य विकसी शासकीय राSपत्र में अति*सूतिच विकया गया हो; (viii) भार सरकार द्वारा मान्य ा प्राप्त हर राज्य या प्रभु का अस्जिस् त्व, उपाति* और राष्ट्रीय ध्वS; (ix) समय क े प्रभाग, पृथ्वी क े भौगोखिलक प्रभाग र्थीा शासकीय राSपत्र में अति*सूतिच लोक उत्सव, उपवास और अवकाश-विद+; (x) भार सरकार क े आति*पत्य क े अ*ी+ राज्य-क्षेत्र; (xi) भार सरकार और अन्य विकसी राज्य या व्यविXयों क े वि+काय क े बीच संघष: का प्रारंभ, चालू रह+ा और पया:वसा+; (xii) न्यायालय क े सदस्यों और ऑविफसरों क े र्थीा उ+क े उप-पविदयों और अ*ी+स्र्थी ऑविफसरों और सहायकों क े और उसकी आदेणिशकाओं क े वि+ष्पाद+ में काय: कर+े वाले सब ऑविफसरों क े भी, र्थीा सब अति*वXाओं, अर्टर्मि+यों, प्रोक्र्टरों, वकीलों, प्लीर्डरों और उसक े समक्ष उपसंSा हो+े या काय: कर+े क े खिलए विकसी विवति* द्वारा प्राति*क ृ अन्य व्यविXयों क े +ाम; (xiii) भूविम या समुˆ पर माग: का वि+यम। इ+ सभी मामलों में, र्थीा लोक-इति हास, साविहत्य, विवज्ञा+ या कला क े सब विवषयों में भी +यायालय समुपयुX वि+द†श पुस् कों या दस् ावेSों की सहाय ा ले सक े गा। यविद न्यायालय से विकसी थ्य की न्यातियक अवेक्षा कर+े की विकसी व्यविX द्वारा प्रार्थी:+ा की Sा ी है, ो यविद और Sब क वह व्यविX कोई ऐसी पुस् क या दस् ावेS पेश + कर दे, सिSसे ऐसा न्यायालय अप+े को ऐसा कर+े को समर्थी: ब+ा+े क े खिलए आवश्यक समझ ा है, न्यायालय ऐसा कर+े से इंकार कर सक े गा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्यापक अवलंब खिलया गया है, उन्हें विवति* क े सिसद्धां ों क े संदभ: में पढ़+ा आवश्यक है Sो गSेविर्टयर पर अवलंब को शासिस कर े हैं।

588. साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 81 में न्यायालय को "विब्रविर्टश क्राउ+ क े विकसी भी उपवि+वेश क े आति*पत्य या कब्Sे" क े खिलए "विकसी भी आति*कारिरक राSपत्र या सरकारी राSपत्र क े रूप में हो+े वाले प्रत्येक दस् ावेS की वास् विवक ा" को मा++े की आवश्यक ा है।313 *ारा 81 दस् ावेS की वास् विवक ा का अ+ुमा+ लगा ी है और इसक े अन् व:स् ु की +हीं। Sब न्यायालय को एक साव:Sवि+क प्रक ृ ति क े थ्य क े अस्जिस् त्व पर एक राय ब+ा+ी हो ी है, ो साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 37314 संक े कर ी है विक सरकारी गSर्ट में इसका कोई भी कर्थी+ एक प्रासंविगक थ्य है। Sबविक इस न्यायालय क े कई वि+र्ण:यों में गSेविर्टयर पर ध्या+ विदया गया है और यह ध्या+ रख+ा भी उ +ा ही महत्वपूर्ण: है विक इ+ पर खिलया गया अवलंब संपोषी थ्य की प्रक ृ ति में अति*क है। 313 साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 81 यह उपबं* कर ी है: राSपत्रों, समाचारपत्रों, पार्लिलयामेन्र्ट क े प्राइवेर्ट एक्र्टों और अन्य द्स् ावेSों क े बारे में उप*ारर्णाएं--न्यायालय हर ऐसी दस् ावेS का असली हो+ा उप*ारिर करेगा सिSसका लंद+ गSर्ट, या कोई शासकीय राSपत्र या विब्रविर्टश क्राउ+ क े विकसी उपवि+वेश, आणिश्र देश या कब्Sा*ी+ क्षेत्र का सरकारी राSपत्र हो+ा या कोई समाचार पत्र या S+:ल हो+ा, या यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम की पार्लिलयामेन्र्ट क े प्राइवेर्ट ऐक्र्ट की क्वीन्स विप्रन्र्टर द्वारा मुविˆ प्रति हो+ा, ात्पर्तिय है र्थीा हर ऐसी दस् ावेS का, सिSसका ऐसी दस् ावेS हो+ा, ात्पर्तिय है सिSसका विकसी व्यविX द्वारा रखा Sा+ा विकसी विवति* द्वारा वि+र्मिदष्ट है, यविद ऐसी दस् ावेS सार ः उस प्ररूप में रखी गई हो, Sो विवति* द्वारा अपेतिक्ष है, और उतिच अणिभरक्षा में से पेश विकया गया हो, असली हो+ा उप*ारिर करेगा। 314 साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 37 यह उपबं* कर ी है: विकन्हीं अति*वि+यमों या अति*सूच+ाओं में अं र्मिवष्ट लोक प्रक ृ ति क े थ्य क े बारे में कर्थी+ की सुसंगति --Sबविक न्यायालय को विकसी लोक प्रक ृ ति क े त्य क े अस्जिस् त्व क े बारे में राय ब+ा+ी है ब यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम की पार्लिलयामेंर्ट क े ऐक्र्ट में या विकसी क े न्ˆीय अति*वि+यम, प्रां ीय अति*वि+यम या राज्य अति*वि+यम में या शासकीय राSपत्र में प्रकाणिश विकसी सरकारी अति*सूच+ा या क्राउ+ रिरप्रेSेंर्टेविर्टव द्वारा की गई अति*सूच+ा में या लंद+ गSर्ट या विहS मSेस्र्टी क े विकसी र्डोविमवि+य+, उपवि+वेश या कब्Sा*ी+ क्षेत्र का सरकारी राSपत्र ात्पर्तिय हो+े वाले विकसी मुविˆ पत्र में अं र्मिवष्ट परिरवर्ण:+ में विकया गया उसका कोई कर्थी+ सुसंग थ्य है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

589. राSा मुत्तू रामालिंलगा से ुपति ब+ाम पेरिरया+ायागम विपल्लई315 में विप्रवी काउंसिसल +े इस आ*ार पर उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य पर आपखित्त S ाई विक कलेक्र्टरों की रिरपोर्ट: में अत्यति*क Sोर विदया गया र्थीा। उस संदभ: में विप्रवी काउंसिसल +े अव*ारिर विकया: "लॉर्ड:णिशप का मा++ा है विक इसे स्वीकार विकया Sा+ा चाविहए विक Sब ये रिरपोर्ट: पक्षकारों क े वि+Sी अति*कारों पर राय व्यX कर े हैं, ो ऐसी राय को विवति*क अति*कार या बल क े रूप में +हीं मा+ा Sा+ा चाविहए। लेविक+ ड्यूर्टी क े दौरा+, लोक अति*कारिरयों और वै*ावि+क प्राति*करर्ण की रिरपोर्ट: क े हो े हुए वे उच्च विवचार क े हकदार हैं क्योंविक वे आति*कारिरक काय:वाही और ऐति हासिसक थ्यों की Sा+कारी प्रदा+ कर े हैं और यह भी विक Sहाँ क वे पक्षकारों क े आचरर्ण और क ृ त्यों की व्याख्या कर+े क े खिलए प्रासंविगक हैं उस संबं* में सरकार की काय:वाविहयों को उ+ पर संस्र्थीाविप की गई।" (प्रभाव वर्ति* ) विप्रवी काउंसिसल +े वि+Sी अति*कारों से संबंति* मामलों पर कलेक्र्टर की रिरपोर्ट: का उपयोग कर+े क े विवरूद्ध चे ाव+ी दी र्थीी। परन् ु शासकीय काय:वाही या ऐति हासिसक थ्यों क े अणिभलेख क े रूप में, और उ+क े संबं* में पक्षकारों क े आचरर्ण की व्याख्या कर+े क े खिलए, वे उपयोगी साम£ी प्रदा+ कर े हैं। गुलाम रसूल खा+ ब+ाम सेक्र े र्ट्री ऑफ स्र्टेर्ट फॉर इस्जि°ड़या इ+ कॉउस्जिन्सल316 क े मामले में विप्रवी काउंसिसल +े *ारिर विकया: 315 (1873-74) 1 IA 209 316 1925 एस.सी.सी. ऑ+लाइ+ पी.सी. 12 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ".... साव:Sवि+क दस् ावेSों में विदए गए कर्थी+ सामान्य आ*ारों पर कणिर्थी थ्यों को साविब कर+े क े खिलए प्राप्य हैं विक वे S+ ा क े प्राति*क ृ अणिभक ा:ओं द्वारा शासकीय क:व्य क े अ+ुक्रम में विकए गए र्थीे और संबंति* थ्य लोकविह में र्थीे और समुदाय क े लाभ क े खिलए उ+का अणिभखिलखिख विकया Sा+ा अपेतिक्ष र्थीा: र्टेलस: लॉ ऑफ इविवर्डेंस, 10 वां संस्करर्ण, एस. 1591) वास् व में लगभग सभी मामलों, इस बा का साक्ष्य दे+ा असम्भव हो Sा ा है विक कई वष: बी Sा+े क े बाद ऐसे प्रपत्र में विकये गये कर्थी+ वास् व में सच ही हों और इसका कारर्ण यह विक ऐसा अपवाद अ+ुश्रु साक्ष्य क े खिलए ब+ाया गया है। (प्रभाव वर्ति* ) सुखदेव सिंसह ब+ाम महाराSा बहादुर317 क े मामले में, इस न्यायालय Sमींदारी की प्रक ृ ति का प ा लगाया और उस संदभ: में सिSला गSर्ट की Sांच की। अदाल +े अवलोक+ विकया: "यह आवश्यक +हीं है विक गSर्ट क े कर्थी+ वि+श्चायक हों, हिंक ु गSर्ट एक मूल्यवा+ सरकारी दस् ावेS हो ा है, क्योंविक यह अ+ुभवी अति*कारिरयों द्वारा शासकीय अणिभलेखों से थ्यों को लेकर बड़ी ही साव*ा+ी से संकखिल विकया गया है। Sैसा विक मुख्य न्यायमूर्ति र्डाउस+ विमलर +े फ ु लब ी क े मामले( ए.आई.आर. 1923 पर्ट+ा 453) में उल्लेख विकया है Sहां पर ऊपर उद्धृ विववरर्ण क े बाद वाले भाग में क ु छ असंग ा है, लेविक+ Sहां क इसक े पहले भाग का प्रश्न है, ऐसा प्र ी हो ा है विक यह उ+ दस् ावेSों से काफी संपुष्ट हो ा है सिS+का संदभ: विदया गया है।" उपरोX वि+ष्कष: में, न्यायालय +े गSेविर्टयर पर स्वयं द्वारा विकये गये भरोसे की Sांच कर उल्लेख विकया विक यह "अवि+वाय: ः वि+श्चायक" +हीं र्थीा विफर भी 317 (1951)एस.सी.आर. 534 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसका "क ु छ मूल्य" र्थीा। वह सिSस भाग पर न्यायालय +े भरोसा S ाया और Sैसा विक उल्लेख विकया है वह भाग उ+ दस् ावेSों से समर्भिर्थी हैं और इसखिलए उसमें स्र्थीाविप विकये गये हैं। शेष भाग पर न्यायालय +े भरोसा +हीं S ाया। अदाल +े अप+े पुविष्टकारक गुर्णों का स्व ंत्र रूप से मूल्यांक+ विकया। इस+े एक भाग को अस्वीकार कर विदया और Sो विहस्सा इसे स्वीकार विकया वह अन्य दस् ावेSी सामावि£यों से खिलया गया र्थीा। दूसरे शब्दों में, गSविर्टयर द्वारा प्रस् ु सामा£ी Sहां क स्वीकाय: र्थीी वहां क सम्पोषक र्थीी।

590. महं श्री श्रीवि+वास रामा+ुS दास ब+ाम सूरS+ारायर्ण दास 318 318, न्यायमूर्ति रघुबर दयाल +े ओ. मैले की पुरी गSेविर्टयर ऑफ 1908 सिSसमें मठ क े इति हास का उल्लेख विकया र्थीा पर विवचार कर अवलोक+ विकया: "यह अपीलक ा: क े खिलए आ£ह विकया Sा ा है विक गSेर्टर में Sो कहा गया है उसे साक्ष्य +हीं मा+ा Sा सक ा है। गSेविर्टयर क े ये कर्थी+ स्वत्व क े साक्ष्य क े रूप में अवलस्जिम्ब +हीं हैं बस्जिल्क ऐति हासिसक साम£ी उपल्ब* करा े हैं और मठ और उसक े प्रमुख कायÂ को ब ा े हैं। लोक इति हास क े मामलों पर गSेविर्टयर से परामश: विकया Sा सक ा है।" उपरोX अवलोक+ इंविग कर ा है विक गSेविर्टयर में मौSूद कर्थी+ स्वत्व को +हीं साविब कर े हैं लेविक+ ऐति हासिसक पृष्ठभूविम क े विवषय में Sा+कारी प्रदा+ कर े है सिSसमें मठ द्वारा विकये Sा+े काय: संबं*ी मामले सस्जिम्मखिल हैं। हक क े दावे (Sो अ+ुज्ञेय + हो) को कर+े क े खिलए गSविर्टयर पर अवलम्ब ले+ा और लोक इति हास (सिSसकी अदाल उतिच सीमा क साव*ा+ीपूव:क परामश: 318 1966 सप्लीमेंर्ट्री 436 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर सक ी है) क े थ्य पर संदभ: सामा£ी क े बीच एक स्पष्ट अन् र विकया Sा+ा चाविहए। विवमला बाई ब+ाम हीरालाल गुप्ता 319 मामले में, मुद्दा यह र्थीा विक क्या एक मविहला बं*ु पुरुष *ारक की संपखित्त क े खिलए अप+ी मा ा की रफ से पुरुष *ारक की पांच पीढ़ी क े भी र संपखित्त में उत्तराति*कार पा+े का हक रख ी है। इ+ाम रसिSस्र्टर क े मुद्दे पर, इस न्यायालय +े अवलोक+ विकया विक इसका महा+ सास्जिक्ष्यक मूल्य र्थीा और इसकी प्रविवविष्टयां को अणिभलेख पर मौSूद अन्य साक्ष्य क े संदभ: में विवचारिर विकया गया। आति*कारिरक गSर्ट क े सास्जिक्ष्यक मूल्य पर, इस न्यायालय की दो न्यायमूर्ति यों वाली पीठ +े प्रव्रS+ क े संदभ: में साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 37 और *ारा 57 (13) पर विवचार कर अवलोक+ विकया: "4.... इस प्रकार, यह स्पष्ट है विक प्रव्रS+ की उप*ारर्णा +हीं की Sा सक ी है, लेविक+ इसे साक्ष्य का हवाला देकर (अपठ+ीय) स्र्थीाविप विकया Sा+ा चाविहए। ब यह सवाल उठ ा है विक क्या अपील स् र पर अवलस्जिम्ब इंदौर राज्य गSर्ट में ब ाया गया इसको स्र्थीाविप कर+े क े खिलए एकमात्र आ*ार ब+ा सक ा है विक वादी का परिरवार उत्तर प्रदेश क े मर्थीुरा से प्रवासी र्थीे। साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 की *ारा 37 में कहा गया है विक साव:Sवि+क प्रक ृ ति क े राSकीय गSर्ट में विकया गया कोई भी कर्थी+ एक प्रासंविगक थ्य है। *ारा 57 (13) में घोषर्णा की गई है विक लोक इति हास क े सभी मामलों में, अदाल संबंति* पुस् कों अर्थीवा 319 (1990) 2 एस.सी.सी. 22 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संदभ: दस् ावेSों का सहाय ा ले सक े गी, और *ारा 81 उतिच विहरास से आ+े वाले गSर्ट की वास् विवक ा क े बारे में उप*ारर्णा कर ी है। साक्ष्य पर विपSस+ ऑ+ कॉम+ लॉ, कॉम+ लॉ लाइब्रेरी ( ेरहवां संस्करर्ण) +े पृष्ठ 510 पैरा 25. 07 में कहा विक सरकारी गSर्ट...स्वीकाय: हैं (और कभी-कभी वि+श्चायक) सबू हैं, लेविक+ इसमें वि+विह वि+Sी मामले +हीं...

5. वि+Sी मामलों पर या क ु छ मामलों में ऐति हासिसक थ्यों पर आति*कारिरक क:व्यों क े वि+व:ह+ क े दौरा+ विकए गए कर्थी+ Sो आति*कारिरक गSर्ट में अन् र्मि+विह हैं, उ+ वर्भिर्ण थ्यों का सबसे अच्छा साक्ष्य है और सम्यक रूप से विवचारिर विकये Sा+े योग्य है, लेविक+ इसे उ+ मामलों में वि+श्चायक +हीं मा+ा Sा+ा चाविहए सिSसमें न्याय वि+र्ण:य+ की अपेक्षा की Sा ी है। विकसी उपयुX मामले में Sहां विववाद्य थ्य को साविब कर+े क े खिलए अणिभलेख पर क ु छ साक्ष्य मौSूद हैं, लेविक+ उसक े वि+ष्कष: को अणिभखिलखिख कर+े क े खिलए पया:प्त +हीं है, अाति*कारिरक गSर्ट में मौSूद वि+Sी मंविदरों क े प्रबं*+ से संबंति* थ्यों क े कर्थी+ अर्थीवा वि+Sी व्यविXयों इत्याविद की प्रास्जिस्र्थीति से संबंति* ऐति हासिसक थ्यों को विब+ा आगे साक्ष्य क े मांग कर सम्पोषक साक्ष्य क े रूप में अवलस्जिम्ब विकया Sा सक ा है।" (प्रभाव वर्ति* ) वि+Sी मामलों पर या "क ु छ मामलों" में ऐति हासिसक थ्यों पर आति*कारिरक क:व्यों क े वि+व:ह+ क े दौरा+ विकए गए कर्थी+ Sो आति*कारिरक गSर्ट में अन् र्मि+विह हैं, उ+ वर्भिर्ण थ्यों का सबसे अच्छा साक्ष्य है और "सम्यक रूप से विवचारिर " विकये Sा+े योग्य है। हालांविक, इसे उ+ मामलों में वि+श्चायक +हीं मा+ा Sा+ा चाविहये सिS+ मामलों में न्यातियक न्यायवि+र्ण:य+ की अपेक्षा हो ी है। स्वत्व से संबंति* प्रश्न न्यायवि+र्ण:य+ क े खिलए विववाद्यों को उठा े हैं। स्वत्व से Sुड़े हुए विवरो*ी दावों में न्यातियक न्यायवि+र्ण:य+ की आवश्यक ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हो ी है। इति हास अर्थीवा गSर्ट में अन् र्मि+विह कर्थी+ स्वत्व को +हीं ब ला ा है।

591. बाला शंकर महा शंकर भट्टSी ब+ाम चैरिरर्टी कविमश्नर, गुSरा राज्य क े मामले में, यह मुद्दा र्थीा विक क्या पवागढ़ स्जिस्र्थी काखिलका मंविदर बंबई लोक न्यास अति*वि+यम, 1950 क े अर्थी: में एक साव:Sवि+क र्ट्रस्र्ट र्थीा। इस संदभ: में, इस न्यायालय की दो न्याया*ीश पीठ +े अव*ारिर विकया: "22.... यह प्र ी हो ा है विक गSर्ट, बम्बई प्रेसीर्डेंसी, ृ ीय संस्करर्ण 1879 में प्रकाणिश खंर्ड साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 की *ारा 81 सपविठ *ारा 35 क े अ*ी+ अ+ुज्ञेय है। गSर्ट अ+ुज्ञेय है चूंविक यह आति*कारिरक अणिभलेख है और लोक घर्ट+ाओं से संबंति* साक्ष्य दे ा है और इसकी अन् व:स् ु को न्यायालय सत्य मा+ सक ी है। उसमें वि+विह कर्थी+ को उसमें वि+विह ऐति हासिसक साम£ी को प ा लगा+े क े खिलए विवचारिर विकये Sा सक े हैं और उसमें Sो कर्थी+ विकये गये हैं वह *ारा 45 क े ह साक्ष्य हैं और न्यायालय अन्य साक्ष्य और परिरस्जिस्र्थीति यों में विववाविद प्रश्न क े न्यायवि+र्ण:य+ में विवचारिर कर सक ा है भले ही वे इसे वि+श्चायक साक्ष्य + मा+ें। " (प्रभाव वर्ति* ) दूसरे शब्दों में, गSर्ट को वि+श्चायक प्रक ृ ति का स्व ंत्र साक्ष्य +हीं मा+ा गया। उपरोX वि+ष्कष: में न्यायालय साव*ा+ है। गSेविर्टयर की अन् व:स् ु को अन्य साक्ष्य और परिरस्जिस्र्थीति यों क े सार्थी पढ़ा Sा+ा चाविहए। उ+को विवचारिर विकया Sा सक ा है विकन् ु वह वि+श्चायक साक्ष्य +हीं होगा। 320 1995 सप्ली+मेंर्ट्री (1) एस.सी.सी. 485 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA [देखेंः अलीयार्थीम्मुर्डा बेर्थीैति यापुरा पुकोया ब+ाम पट्टाकल चेरिरयकोया 321 में पारिर वि+र्ण:य]

592. उच्च न्यायालय क े समक्ष काय:वाही क े दौरा+ सिSस ऐति हासिसक साम£ी का अवलम्ब खिलया गया है उन्हें शुभकर सिसद्धां ों क े संदभ: में महत्व विदया Sा+ा चाविहए Sो उपरोX वि+र्ण:यों प्रकर्ट हो े हैं। न्यायालय +े उस मामले में लोक इति हास की संबंति* पुस् कों और संदभ: सामावि£यों का संज्ञा+ विकया होगा। विफर भी, Sब ऐसा हो ा है, ो न्यायालय को इस थ्य क े बारे में सचे हो+ा चाविहए विक यात्रावृत्तां में विकये गये कर्थी+ वास् व में गSर्टस: क े विववरर्ण उ+ मामलों पर राय दशा: े हैं Sो इ +ा समय बी Sा+े पर पर इस स् र पर प्रति परीक्षा द्वारा संशोति* +हीं विकये Sा सक े हैं। परिरर्णामस्वरूप, विववाद क े दौरा+ Sहां पक्षकारों क े मध्य कब्Sे और स्वत्व से संबंति* विववाद है ो वहां पर ऐति हासिसक विववरर्ण को वि+श्चायक +हीं मा+ा Sा सक ा है। ब न्यायलय को विववाद का वि+पर्टारा विवश्वस+ीय सास्जिक्ष्यक सामा£ी क े आ*ार पर कर+ा चाविहए।

593. इति हास की व्याख्या +ुकसा+ी भरा काय: है। Sैसा विक हम+े बाबर+ामा से देखा है ऐति हासिसक अणिभलेख में स्पष्ट अं राल हैं। अ+ुवाद णिभन्न हो े हैं और उ+की सीमाएं हो ी हैं। न्यायालय को उ+ चीSों से Sो इति हास में दS: +हीं है +कारात्मक वि+ष्कष: वि+काल+े में परिरवृत्त हो+ा चाविहए। हम विकसी संविवति* अर्थीवा अणिभवच+ का अर्थीा:न्वय+ +हीं कर रहे हैं। हम स्वयं विकवदंति यों, कहावि+यों, प्रर्थीाओं और सामासिSक और सांस्क ृ ति क संदभ: में 321 2019 एस.सी.सी. ऑ+लाइ+ 953 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खिलखे गये विववरर्णों की Sांच कर रहें हैं। इति हास विवद्या की मदद खिलये विब+ा इति हास की व्याख्या कर+ा Sोखिखमों से भरा है। ऐति हासिसक संदभ: से परे Sाकर वि+ष्कष: वि+काल+े और अ+ुमा+ लगा+े क े खिलए विवति*क सिसद्धां ों का अ+ुप्रयोग कर+ा Sोखिखम भरा काय: हो ा है। इति हास सिS+ मामलों पर मौ+ है उ+ विवषयों पर विवति*वेत्ता को +कारात्मक अ+ुमा+ लगा+े में साव*ा+ी बर +ी चाविहए। मौ+ को, कभी-कभी वहां छोड़ दे+ा बेह र हो ा है, Sहां से मूल ः उसका संबंं* हो ा है, अर्थीा: मौ+ का ब्रह्मा°र्ड।

594. र्टाइम्स खिलर्टरेरी सप्लीमेंर्ट में “विवक्र्टोरिरय+ विहस्र्ट्री” शीष:क से 19 Sू+ 1953 को खिलखे अप+े लेख में ई.एच. कार +े वि+म्+खिलखिख चे ाव+ी दी: " व:मा+ और अ ी क े बीच दो रफा संबं* हो ा है,व:मा+ अ ी से प्रभाविव हो ा है विफर भी वह स रूप से अ ी का वि+मा:र्ण कर ा रह ा है। यविद इति हासकार इति हास ब+ा े हैं ो यह भी उ +ा ही सत्य है विक इति हास +े इति हासकारों को ब+ाया है…आS का इति हास दाश:वि+क, वस् ुवि+ष्ठ वि+यति वाद क े ख रों और व्यविXवि+ष्ठ सापेतिक्षक ा क े अं ही+ खड्ढ क े बीच प ली *ार पर असहS रूप से सं ुल+ ब+ा े हुए इस बा से सSग विक काय: और विवचार अविवच्छेद्य रूप से अं स:म्बस्जिन्* हैं और काय:कारर्ण की प्रक ृ ति विवज्ञा+ की रह इति हास में भी उ +ी ही ेSी से छ ू र्ट ा है सिS +ी ेSी से वह पकड़+े की कोणिशश कर ा है, उत्तर दे+े क े बSाय प्रश्न पूछ+े में व्यस् हो ा है।"322 व:मा+ Sैसे मामलों में, इति हास एक और कविठ+ाई उत्पन्न कर ा है: प्राच्य दश:+ में,*ार्मिमक परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे रीकों से परिरवर्ति हो Sा ी है 322 Introduction by Richard J Evans in E.H. Carr, What is History?, Penguin (2018 reprint) at page 12 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sो क े वल खिलखिख अणिभलेखों क सीविम +हीं हैं। माक: ब्लूच +े अप+ी पुस् क " द् विहस्र्टोरिरय+ क्राफ्र्ट"323 में इस बारे में ऐसे ब ाया है: “ क्योंविक दूसरों की ुल+ा में हमारी सभ्य ा अप+े अ ी क े प्रति सSग रही है। प्रत्येक वस् ु +े इसे इस विदशा में प्रवृत्त विकया है: इसाई और क्लासिसकल विवरास दो+ों +े। हमारे पहले स्वामी, £ीक और रोम+ इति हास खिलख+े वाले लोग र्थीे। इसाईय इति हासकारों का मSहब है। अन्य मSहबी व्यवस्र्थीाओं +े अप+े विवश्वास और कम:कांर्ड ऐसे पौराणिर्णकी क े आ*ार पर प्राप्त विकया है Sो मा+वीय समय से लगभग बाहर है। (प्रभाव वर्ति* ) हालांविक हम+े यावित्रयों और गSेविर्टयरों क े विववरर्णों को संदर्भिभ विकया है, लेविक+ हम+े उ+का वाच+ साव*ा+ी से विकया है। इ+ विववरर्णों की अन् व:स् ु स्वत्व क े विवषय में वि+श्चायक +हीं मा+ी Sा सक ी सिSसकी वSह से व:मा+ काय:वाविहयों में न्यायवि+र्ण:य+ की आवश्यक ा उत्पन्न हुई है। भले ही गSेविर्टयर न्यायालय को साव:Sवि+क इति हास क े विवषय पर झलक दे दें, इति हास अप+े आप में विवभाSक दावों का विवषय है। हालांविक न्यायालय को उ+ विवषयवस् ुओं पर प्रासंविगक साम£ी की भांति अवलंब ले+े की छ ू र्ट है लेविक+ व:मा+ न्यायवि+र्ण:य+ क े क्रम में न्यायालय को अप+े वि+ष्कषÂ क पहुंच+े में सक्षम ब+ा+े में उन्हें अणिभलेख क े साक्ष्यों क े सार्थी पढ़ा Sा+ा चाविहए। विवशेषकर,न्यायालय को विवरो*ी दावों की भूल भुलैया में णिछपे सत्य क े अंक ु र को वि+काल+े क े प्रयास में ऐसे मामलों को अलग कर ले+ा चाविहए Sो अ+ुश्रुति मूल क े हैं। यात्रा वृत्तां और गSेविर्टयरों में विवस्मृ इति हास क े 323 Marc Bloch, The Historian‘s Craft, Penguin (2019 reprint), at page 4 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विबखरे विहस्से हो े हैं। इ+को विदया Sा+े वाला साक्ष्यात्मक महत्व वि+तिश्च रूप से संदभ: पर वि+भ:र हो ा है और उ+की विवषयवस् ु क े सचे मूल्यांक+ का विवषय हो ा है। हमारे विवश्लेषर्ण में,यावित्रयों और गSेविर्टयरों क े विववरर्णों में विववाविद स्र्थील पर दावों क े बारे में औपवि+वेणिशक दृविष्टकोर्ण का अध्यय+ कर े समय सभी पहलुओं पर ध्या+ दे+े की आवश्यक ा को सं ुखिल रूप से समाविह विकया गया है। N.14 इति हासकारों की रिरपोर्ट:

595. 13 मई 1991 को चार इति हासकारों +े एक दस् ावेS ैयार विकया सिSसका शीष:क र्थीा: “बाबरी मस्जिस्Sद या राम Sन्मस्र्थीा+?भार ीय राष्ट्र क े खिलए इति हासकारों की रिरपोर्ट:” । रिरपोर्ट: (i) विदल्ली विवश्वविवद्यालय क े पूव: प्रोफ े सर एवं भार ीय इति हास अ+ुसं*ा+ परिरषद क े अध्यक्ष प्रोफ े सर आरएस शमा: (ii) अलीगढ़ मुस्जिस्लम विवश्वविवद्यालय में इति हास क े पूव: प्रोफ े सर और भार ीय इति हास कां£ेस क े पूव: अध्यक्ष प्रोफ े सर एम अ हर अली (iii) विदल्ली विवश्वविवद्यालय में इति हास क े प्रोफ े सर र्डीए+ झा; और (iv) पुरा त्व क े प्रोफ े सर एवं क ु रुक्षेत्र विवश्वविवद्यालय, हरिरया+ा में सामासिSक विवज्ञा+ संकाय क े र्डी+ प्रोफ े सर सूरS भा+ द्वारा ैयार की गयी। रिरपोर्ट: 13 मई 1991 विद+ांविक एक आवरर्ण पत्र क े भी र प्रोफ े सर आर एस शमा:, प्रोफ े सर एम अ हर अली, प्रोफ े सर र्डी ए+ झा और प्रोफ े सर सूरS भा+ द्वारा प्रस् ु की गयी र्थीी। रिरपोर्ट: की महत्वपूर्ण: विर्टप्पणिर्णयां हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) स्क ं दपुरार्ण (अयोध्या महात्म्य) में बाबरी मस्जिस्Sद वाले स्र्थीा+ को भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में विदखा+े का कोई आ*ार +हीं है। (ii) मस्जिस्Sद क े स् ंभों पर उत्कीर्ण:+ उसका वैष्र्णव म से Sुड़ा हो+ा दर्भिश +हीं कर े। (iii) प्रोफ े सर बी बी लाल द्वारा 1979 में विकये गये उत्ख++ में Sो ई ं र्टों क े आ*ार पाये गये र्थीे, उ+का उल्लेख उ+क े द्वारा 1990 में विकया गया Sबविक उ+क े द्वारा कई पत्र प्रकाणिश विकये Sा चुक े र्थीे। (iv) प्रोफ े सर बी बी लाल +े एएसआई को 1979-80 में प्रस् ु रिरपोर्ट: में स् ंभ आ*ारों का उल्लेख +हीं विकया। (v) स् ंभ आ*ार वाले गड्ढों क े मलबों में कोई पाषार्ण स् ंभ या मंविदर की छ की साम£ी का वास् ु +हीं पाया गया र्थीा;और (vi) 1675-76 में रतिच रामचरिर मा+स में बाबरी मस्जिस्Sद का कोई उल्लेख +ही है। अध्यय+ क े वि+ष्कष: र्थीे: (i) पुस् कों में यह दर्भिश कर+े वाला कोई साक्ष्य +हीं है विक अठारहवीं श ाब्दी क े पहले अयोध्या में उस स्र्थीा+ को भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ मा++े का कोई भाव Sुड़ा र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) यह मा++े का कोई आ*ार +हीं है विक भगवा+ राम का मंविदर या कोई मंविदर उस स्र्थीा+ पर अस्जिस् त्वमा+ र्थीी Sहां 1528-29 में बाबरी मस्जिस्Sद ब+ायी गयी र्थीी। (iii) यह हिंकवदन् ी विक बाबरी मस्जिस्Sद भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर ब+ायी गयी र्थीी, अठारहवीं श ाब्दी क े उत्तरा*: क पैदा +हीं हुई; और यह विक मस्जिस्Sद ब+ा+े क े खिलए मंविदर को ध्वस् विकया गया र्थीा, Sैसा दावा उन्नीसवीं श ाब्दी क े प्रारम्भ क +हीं विकया गया र्थीा; और (iv) भगवा+ राम क े Sन्मस्र्थीा+ और सी ा की रसोई मंविदर क े विवध्वंस की "चली चलाई" हिंकवदन् ी 1850 की है सिSसक े बाद "आस्र्थीा पर आ*ारिर काल्पवि+क इति हास का क्रविमक पु+र्मि+मार्ण हुआ है"।

596. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े उल्लेख विकया है विक रिरपोर्ट: प्रोफ े सर र्डी ए+ झा द्वारा हस् ाक्षरिर +हीं है,यह एक ऐसा थ्य है Sो प्रोफ े सर सूरS भा+ (पी र्डब्ल्यू 16) द्वारा स्वीकार विकया गया है सिSन्हों+े साक्ष्य में बया+ विदया। रिरपोर्ट: में संक े विकया गया है विक प्रोफ े सर बी बी लाल द्वारा उत्ख++ से प्राप्त साम£ी चारों इति हासकारों क े वि+रीक्षर्ण क े खिलए उपलब्* +हीं है। पी र्डब्ल्यू 16 क े बया+ से उद्धृ कर े हुए, न्यायमूर्ति अ£वाल +े उ+की विवशेषज्ञ ा को इस आ*ार पर खारिरS कर विदया विक वह एक पुरा त्ववेत्ता र्थीे और मध्यकाली+ इति हास पर उ+की विवशेषज्ञ ा +हीं र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

597. आगे न्यायमूर्ति अ£वाल +े सुवीरा Sयसवाल (पी र्डब्ल्यू 18) क े साक्ष्य का विवश्लेषर्ण विकया है Sो विक Sवाहर लाल +ेहरू विवश्वविवद्यालय में भू पूव: प्रोफ े सर र्थीे। पी र्डब्ल्यू 18 +े बया+ विदया है विक ध्वस् स्र्थील क े बारे में उ+की Sा+कारी समाचार पत्रों या अन्य इति हासकारों क े पुस् कों क े आ*ार पर र्थीी। न्यायमूर्ति अ£वाल +े पी र्डब्ल्यू 18 क े अ+ुभव को यह उल्लेख कर े हुए प्रश्नांविक विकया है विक वह प्रोफ े सर आर एस शमा: क े माग:दश:+ में एक शो* छात्रा र्थीी Sो रिरपोर्ट: की सह लेखिखका र्थीी। अन् ः उन्हों+े कहा विक रिरपोर्ट: को चारों इति हासकारों ( प्रोफ े सर र्डी ए+ झा +े हस् ाक्षर +हीं विकया र्थीा) द्वारा हस् ाक्षरिर +हीं विकया गया है और कणिर्थी विवशेषज्ञ ( पी र्डब्ल्यू 18) का म उसक े अ+ुभव और अ+ुसं*ा+ पर +हीं बस्जिल्क दूसरों क े लेख+ से ब+ी राय पर आ*ारिर र्थीा। द्+ुसार,विवद्वा+ न्याय*ीश +े *ारिर विकया विक यह साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 45 क े अन् ग: विवश्वस+ीय साक्ष्य +हीं है। र्डॉ *व+ का कर्थी+ है विक क े वल रिरपोर्ट: क े प्रोफ े सर र्डी ए+ झा द्वारा हस् ाक्षरिर +हीं हो+े क े आ*ार पर, न्यायमूर्ति अ£वाल +े त्रुविर्टपूव:क चारों इति हासकारों क े प्रति संक ु तिच हो गये। उन्हों+े कहा विक इति हासकारों की विवश्वस+ीय ा का मूल्यांक+ कर े समय विवद्वा+ न्याया*ीश +े पी र्डब्ल्यू 18 क े मूल्यांक+ को रिरपोर्ट: क े लेखकों क े मूल्यांक+ क े सार्थी विमला विदया। यह कहा गया है विक ये mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विर्टप्पणिर्णयां इति हासकारों से संबंति* +हीं र्थीीं बस्जिल्क पी र्डब्ल्यू 18 से संबंति* र्थीीं।

598. हमारा यह म है विक न्यायमूर्ति अ£वाल चारों इति हासकारों क े प्रति अ+ुतिच रूप से कठोर हैं। ऐसा प्र ी हो ा है विक विवद्वा+ न्याया*ीश +े पी र्डब्ल्यू 18 (सिSस+े विब+ा स्व ंत्र मूल्यांक+ क े अन्य लोगों की रच+ाओं का अवलंब खिलया र्थीा) की आलोच+ा को इति हासकारों की रिरपोर्ट: क े सार्थी विमला विदया है। पी र्डब्ल्यू 18 इति हासकारों क े दल का विहस्सा +हीं र्थीी। यह थ्य विक चार इति हासकारों में से एक +े आवरर्ण दस् ावेS पर हस् ाक्षर +हीं विकया र्थीा,पूरे काय: को खारिरS कर+े का पया:प्त कारर्ण +हीं र्थीा। इति हासकारों की रिरपोर्ट: को विदया Sा सक+े वाला महत्व एक अलग विवषय है लेविक+ इस पहलू का विवश्लेषर्ण कर े समय उच्च न्यायालय क े खिलए इति हासकारों की व्यविXग वि+ष्ठा और योग्य ा क े विवषय में विर्टप्पर्णी कर+ा आवश्यक +हीं र्थीा। इसखिलए यह स्पष्ट कर+ा आवश्यक है विक वे विर्टप्पणिर्णयां उस काय: क े खिलए अ+ावश्यक र्थीीं Sो उच्च न्यायालय कर रहा र्थीा। इसक े बावSूद,चारों इति हासकारों की रिरपोर्ट: से यह स्पष्ट है विक उन्हें उस साम£ी का वि+रीक्षर्ण कर+े का लाभ +हीं विमला सिSसक े आ*ार पर र्डॉ बी बी लाल +े 1979 में अप+ा रिरसच: विकया र्थीा। लेविक+ वह भाग और विवशेषकर इति हासकारों की रिरपोर्ट: उस साम£ी से पहले का है Sो एएसआई की रिरपोर्ट: क े रूप में साम+े आयी है और सिSसे वाद क े विवलंब+ की स्जिस्र्थीति में उच्च न्यायालय क े वि+द†श क े अ+ुसरर्ण में ैयार विकया गया र्थीा। चूंविक, चारों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इति हासकारों को उस साम£ी क े मूल्यांक+ का लाभ +हीं विमला सिSसका इस न्यायालय +े अप+े वि+र्ण:य क े पूव:व - विहस्से में मूल्यांक+ विकया है, विवषय को और खींच+े की कोई आवश्यक ा +हीं है सिसवाय और मात्र यह स्पष्ट कर+े क े खिलए विक इति हासकारों की रिरपोर्ट: Sो एएसआई की रिरपोर्ट: से पहले आयी है, का कोई विवशेष महत्व +हीं हो सक ा क्योंविक उन्हें उस साम£ी क े विवश्लेषर्ण का लाभ +हीं विमल पाया Sो एएसआई की रिरपोर्ट: से साम+े आयी र्थीी। इति हासकारों द्वारा भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ में विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास क े संबं* में वि+काला गया वि+ष्कष: उ+का अणिभम है। वादों में प्रस् ु साक्ष्य क े बाद,यह न्यायालय थ्यग वि+ष्कष: इति हासकारों की रिरपोर्ट: क े आ*ार पर +हीं वि+काल सक ा और साक्ष्यों का सम£ ा में मूल्यांक+ कर+ा चाविहए। Sहां क वाद 5 का संबं* है, स्वत्व क े विवषय का वि+र्ण:य साक्ष्य क े सम£ मूल्यांक+ क े आ*ार पर वाद 4 क े सार्थी विकया Sा+ा चाविहए। इसखिलए व:मा+ स्जिस्र्थीति में,वि+र्ण:य का अगला विहस्से में वाद 4 का विवश्लेषर्ण विकया Sाएगा। साक्ष्यों क े सम£ मूल्यांक+ क े बाद, स्वत्व का प्रश्न अन् ः अणिभ+र्ण- विकया Sाएगा

599. वाद 4 सुन्नी सेन्र्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा 18 विदसम्बर 1961 को संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। वाद में यर्थीा संशोति* वि+म्+खिलखिख अ+ु ोष मागी गयी है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “(a) इस आशय की एक उद्घोषर्णा विक स्क े च मा+तिचत्र में A B C D अक्षरों से दर्भिश वाद से Sुड़ी संपखित्त एक साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है सिSससे आम ौर पर 'बाबरी मस्जिस्Sद' क े +ाम से Sा+ा Sा ा है। और मस्जिस्Sद से संलग्न भूविम सिSसे स्क े च मा+तिचत्र में E F G H अक्षरों से दशा:या गया है एक साव:Sवि+क कब्रगाह है और वाद क े पैरा 2 में यर्थीा विववि+र्मिदष्ट सिSसकी आज्ञविप्त की Sा सक ी है। (b) यह विक यविद न्यायालय क े विवचार से कब्Sा विदया Sा+ा उतिच उपचार लगे ो,मूर्ति यों और उ+ वस् ुओं को हर्टाकर Sो विहन्दुओं +े पूSा क े खिलए मस्जिस्Sद क े अंदर रख दी हों, वाद की मस्जिस्Sद और कब्रगाह का कब्Sा दे+े क े खिलए प्रति वादी गर्ण क े विवरुद्ध वादीगर्ण क े पक्ष में तिर्डक्री पारिर की Sाय। (bb) यह विक विवति*क प्रापक को वाद की अ+ुसूची ‘ A’में वर्भिर्ण विववाविद संपखित्त को उस पर ब+े अ+ति*क ृ संरच+ाएं हर्टाकर दे+े का आदेश विदया Sाय। [+ोर्ट: प्रेयर (bb) को उच्च न्यायालय क े 25 मई 1995 विद+ांविक आदेश क े अ+ुसरर्ण में वाद में संशो*+ करक े Sोड़ा गया र्थीा।] वाद इस प्रकर्थी+ पर आ*ारिर है विक अयोध्या में एक प्राची+ ऐति हासिसक मस्जिस्Sद है सिSसे आम ौर पर बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ा Sा ा है Sो बाबर द्वारा 433 वष: से अति*क समय पहले विहन्दुस् ा+ पर विवSय और इसक े क्षेत्र पर कब्Sा कर+े क े बाद ब+वाई गयी र्थीी। यह कहा गया है विक मस्जिस्Sद आम मुस्जिस्लम क े खिलए इबाद गाह और मSहबी रस्मों को संपन्न कर+े क े खिलए ब+वाई गयी र्थीी। वाद में संलग्न आयोS+ा में मस्जिस्Sद का मुख्य वि+मा:र्ण A B C D अक्षरों से दशा:या गया है। भूविम से लगी हुई कब्रगाह है। वादीगर्ण क े अ+ुसार,मस्जिस्Sद और कब्रगाह दो+ों खुदा की है, और मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समय से ही मुस्जिस्लमों द्वारा इसका प्रयोग इबाद क े खिलए और कब्रगाह का प्रयोग दफ+ा+े क े खिलए विकया Sा ा रहा है। यह कहा गया है विक मस्जिस्Sद क े रखरखाव क े खिलए राSकोष से +गद अ+ुदा+ विदया Sा ा र्थीा Sो अव* क े +वाब वSीर क Sारी रहा। अव* क े अति*£हर्ण क े बाद विब्रविर्टश सरकार +े अयोध्या क्षेत्र क े शोलापुर और बहोरापुर गांव में राSस्व मुX अ+ुदा+ क े द्वारा स+ 1864 क '+गद ++कार' Sारी रखा।

600. वाद में आरोपति है विक मस्जिस्Sद की मुख्य इमार क े बाहर 17x21 फीर्ट क े आकार क े चबू रे पर विहन्दू पूSा की Sा ी र्थीी सिSस पर र्टेन्र्ट क े आकार की एक लकड़ी की संरच+ा र्थीी। वाद में महन् रघुबर दास द्वारा चबू रे पर मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए अ+ुज्ञा र्थीा सार्थी ही वाद को खारिरS कर+े क े सन्दभ: हे ु वष: 1985 क े वाद का पु+व:च+ है। वादीगर्ण क े अ+ुसार महन् रघुबर दास +े स्वंय की ओर से,Sन्मस्र्थीा+ की ओर से और सभी विह बद्ध लोगों की ओर से मुकदमा विकया र्थीा। बाबरी मस्जिस्Sद क े मु वल्ली को प्रति वादी ब+ाया गया। वादीगर्ण क े अ+ुसार,उस वाद का वि+र्ण:य इस आ*ार पर प्राङ्गन्याय की भाँति काय: कर ा है विक विवषयग प्रश्न प्रत्यक्ष ः और सारवा+ रूप से र्थीा: (i) बाबरी मस्जिस्Sद का अस्जिस् त्व; और (ii) मस्जिस्Sद से संलग्न भूविम पर वि+मा:र्ण कर+े का विहन्दुओं का अति*कार। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाद में स+ 1934 क े दंगों का सन्दभ: है और मस्जिस्Sद क े उस भाग को सरकारी खच: से विफर से बहाल कर+े का सन्दभ: र्थीा सिSसे क्षति £स् कर विदया गया र्थीा। वादीगर्ण क े अ+ुसार, उ.प्र. मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम 1936 क े अति*वि+यम+ क े बाद वक्फ आयुX द्वारा एक Sांच की गयी और आयुX की रिरपोर्ट: आति*कारिरक राSपत्र में प्रकाणिश विकया गई। वादीगर्ण +े दावा विकया विक मुस्जिस्लमों का मस्जिस्Sद पर शास्जिन् पूर्ण: कब्Sा है सिSसका 23 विदसम्बर 1994 क इबाद क े खिलए प्रयोग विकया Sा ा रहा Sब विहन्दुओं की भीड़ कणिर्थी रूप से मस्जिस्Sद क े भी र घुस गई और इसक े भी र मूर्ति यां रखकर इसे अपविवत्र कर विदया। वादीगर्ण क े अ+ुसार, यह स्वीकार विकये विब+ा विक प्रति वादीगर्ण द्वारा यर्थीा अणिभकणिर्थी वहां पर विहन्दू मंविदर विवद्यमा+ र्थीा सिSसक े स्र्थीा+ पर शासक बाबर द्वारा 433 वष: पहले मस्जिस्Sद ब+ायी गयी, यह मा+ ले+ा विक मस्जिस्Sद क े ब++े से लेकर इसक े अपविवत्रीकरर्ण क अप+े लंबे, एकांति क और स कब्Sे द्वारा मुस्जिस्लमों +े अप+े स्वत्व को प्रति कू ल कब्Sे द्वारा पुख् ा विकया है । वाद में त्पश्चा *ारा 145 क े ह काय:वाही और सिसविवल SS फ ै Sाबाद क े समक्ष वाद को संस्जिस्र्थी विकया Sा+ा सन्दर्भिभ विकया गया है। वष: 1950 क े वाद 2 में व्यादेश क े परिरर्णामस्वरूप, विहन्दुओं को मस्जिस्Sद में रखी मूर्ति यों की पूSा कर+े की अ+ुमति दी गयी है लेविक+ मुस्जिस्लमों को प्रवेश कर+े से रोक विदया गया है। यह कहा गया है विक वाद आदेश I वि+यम 8 सिस.प्र.सं. क े सार्थी- सार्थी पूरे मुस्जिस्लम समुदाय की ओर से संस्जिस्र्थी विकया गया है।

601. यह अणिभकणिर्थी है विक प्रापक,सिSसक े पास कब्Sा है,उसी क े पास संपखित्त है क्योंविक वास् विवक स्वामी और वादीगर्ण को भी कब्Sे का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*कार विमलेगा Sब वाद सफल होगा। वैकस्जिल्पक रूप से, कब्Sे क े खिलए भी आवेद+ विकया गया है। बाबरी मस्जिस्Sद क े विवध्वंश क े बाद की घर्ट+ाओं और थ्यों को अणिभलेख पर रखवा+ो क े खिलए वाद को संशोति* विकया गया। वादीगर्ण क े अ+ुसार,मस्जिस्Sद को विकसी विवणिशष्ट ढ़ाचे की आवश्यक ा +हीं हो ी और मस्जिस्Sद क े विवध्वंश क े बाद भी सिSस Sमी+ पर यह ब+ी र्थीी मस्जिस्Sद ही रह ी है सिSसमें मुस्जिस्लमों को इबाद कर+े का अति*कार हो ा है। वाद में भूविम क े अयोध्या क े कति पय क्षेत्रों का अति*£हर्ण अति*वि+यम 1993 क े ह अति*£हर्ण का भी उल्लेख है। वादीगर्ण क े अ+ुसार, वाद क े खिलए वादहे ुक 23 विदसंबर 1949 को उत्पन्न हुआ Sब विहन्दुओं +े कणिर्थी रूप से मस्जिस्Sद में सदोष प्रवेश विकया और मस्जिस्Sद क े अंदर मूर्ति यां रखकर इसे अपविवत्र कर विदया। अपकृ त्य का स प्रक ृ ति का हो+ा कहा गया है। राज्य क े विवपरी, वाद हे ुक कणिर्थी रूप से 29 विदसंबर 1949 को उ पन्न हुआ Sब संपखित्त को +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा क ु क: विकया गया सिSस+े कब्Sा प्रापक को सौंप विदया। प्रति वादी +े 5 S+वरी 1950 को प्रभार £हर्ण विकया। वाद में मांगे गये अ+ु ोष उपरोX प्रकर्थी+ों पर आ*ारिर हैं। वि+तिश्च ही, वादीगर्ण का मामला इस दलील पर आ*ारिर है विक: (I) मस्जिस्Sद बाबर द्वारा वाद से 433 वष: पूव: इबाद क े खिलए ब+ायी गयी र्थीी और मुस्जिस्लमों द्वारा वि+रन् र इसे इबाद कर+े क े खिलए प्रयोग विकया Sा ा रहा है;और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) यह मा+ ले+े पर भी विक उसक े +ीचे मूल रूप से एक मंविदर र्थीा सिSसे मस्जिस्Sद ब+ा+े क े खिलए ध्वस् कर विदया गया र्थीा, मुस्जिस्लमों +े प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा अप+े स्वत्व को पुख् ा कर खिलया है। इस आ*ार पर, वादीगर्णों +े स्वत्व क े उद्घोषर्णा का दावा विकया है और ऐसी प्रार्थी:+ा की आवश्यक ा की स्जिस्र्थीति में कब्Sे क े खिलए तिर्डक्री।

602. वाद 4 सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और अयोध्या क े +ौ मुस्जिस्लम वि+वासिसयों द्वारा 18 विदसंबर 1961 को संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। वाद 4 में प्रति वादी सं. 1 गोपाल सिंसह विवशारद हैं; प्रति वादी सं. 2 रामचंˆ दास परम हंस हैं। प्रति वादी सं. 3 वि+म ही अखाड़ा है;प्रति वादी सं. 4 महं रघु+ार्थी दास हैं; प्रति वादी सं. 5 उ.प्र. राज्य है; प्रति वादी सं. 6 कलेक्र्टर, फ ै Sाबाद हैं;प्रति वादी सं. 7 +गर मसिSस्र्ट्रेर्ट, फ ै Sाबाद हैं;प्रति वादी सं. 8 फ ै Sाबाद पुखिलस अ*ीक्षक हैं; प्रति वादी सं. 9 विप्रयदत्त राम हैं; प्रति वादी सं. 10 अखिखल भार विहन्दू महासभा क े अध्यक्ष हैं; प्रति वादी सं. 13 *रम दास हैं; प्रति वादी सं. 17 रमेश चन्ˆ वित्रपाठी हैं; और प्रति वादी सं.20 मद+ मोह+ गुप्ता हैं।

603. अब इ+ सिसद्धां ों को ध्या+ में रख े हुए कब्Sे क े दावे क े संबं* में वाद 4 में आ+े वाली दलीलों को साव*ा+ीपूव:क Sांच+ा आवश्यक है। वादपत्र क े प्रस् र 2 में यह क: विदया गया है विक Sब से इसका वि+मा:र्ण बाबर द्वारा विकया गया है ब से इसका मुस्जिस्लमों द्वारा +माS अदा कर+े क े खिलए इस् ेमाल विकया गया है और यह विक मस्जिस्Sद का कब्Sा क े शांति पूर्ण: रूप से मुस्जिस्लमों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कब्Sे में रहा है सिSसमें विद+ांक 23 विदसंबर 1949 क +माS अदा की गई र्थीी। अति रिरX क: यह है विक यह मा+ े हुए (विब+ा स्वीकार विकए) विक सिSस स्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, उस स्र्थीा+ पर हिंहदुओं द्वारा कणिर्थी रूप से एक हिंहदू मंविदर मौSूद र्थीा और मुस्जिस्लमों +े अप+ा दीघ:, विवणिशष्ट और वि+रं र कब्Sा उस समय से प्रारम्भ विकया Sबसे मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा और ब क रखा गया Sब क विक इसे अपविवत्र (मूर्ति यों को रख+े से) उ+क े कब्Sे को प्रति क ू ल कब्Sा और "सही स्वत्व या मंविदर और हिंहदू लोगों क े विह में, यविद कोई हो ो समाप्त कर विदया गया हो"। इसखिलए कब्Sे का दावा इस दलील पर आ*ारिर है विक मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण क े आरंभ से ही +माS अदा कर+े क े खिलए इसका वि+रं र उपयोग विकया गया है और यह उपयोग काफी समय क वि+रं र और अ+न्य रहा है। O.[2] खिलखिख कर्थी+ गोपाल सिंसह विवशारद

604. गोपाल सिंसह विवशारद द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ में पहले प्रति वादी (Sो वाद 1 में वादी भी हैं) द्वारा यह कहा गया है विक यविद मस्जिस्Sद मुस्जिस्लमों क े कब्Sे में र्थीा ो यह वष: 1934 में समाप्त हो गया। हिंहदुओं +े वष: 1934 क े बाद कब्Sे में हो+े का दावा विकया है और उ+क े कब्Sे को प्रति कू ल कब्Sे में ले खिलया गया है। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार वष: 1934 से मस्जिस्Sद में कोई इबाद +हीं की गई र्थीी। इसक े अति रिरX विकसी भी व्यविX को संपूर्ण: हिंहदू mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समुदाय का प्रति वि+ति*त्व कर+े क े खिलए +हीं कहा Sा सक ा है। हिंहदू पूSा को ढाँचे क े अंदर हो+ा कहा गया है सिSसे वष: 1934 से मंविदर क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है और सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े आदेश क े अ+ुसार S+वरी 1950 से मा+ा Sा ा है। एक अति रिरX खिलखिख कर्थी+ में दलील दी गई है विक उ.प्र. मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम 1936 अति*कारा ी है। यह प्रकणिर्थी है विक अति*वि+यम क े ह कोई भी वि+*ा:रर्ण गैर-मुस्जिस्लमों क े विवरूद्ध प्रश्नग स्वत्व य कर+े क े खिलए काम +हीं कर सक ा है। पश्चा व - खिलखिख कर्थी+ में यह कहा गया है विक हिंहदुओं +े प्राची+ काल से ही Sन्मभूविम स्र्थील की पूSा की है और Sन्मभूविम मंविदर कभी भी मुस्जिस्लमों क े कब्Sे में +हीं र्थीा और यविद वह उ+क े कब्Sे में र्थीा ो वष: 1934 में समाप्त हो गया। वाद को परिरसीम+ द्वारा बाति* कर विदया गया है। 1885 क े वाद क े संबं* में यह क: विदया गया है विक वादी प्रति वि+ति* क्षम ा में वाद +हीं कर रहा र्थीा और क े वल अप+े व्यविXग विह क े खिलए कर रहा र्थीा। वि+म ही अखाड़ा

605. वि+म ही अखाड़ा का खिलखिख कर्थी+ विकसी मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व से इ+कार कर ा है। वि+म ही अखाड़ा यह कह ा है विक महं रघुबर दास द्वारा दायर विकसी भी वाद से अ+णिभज्ञ र्थीा। इसक े अ+ुसार, इस स्र्थील पर कभी मस्जिस्Sद +हीं र्थीी और इसखिलए विद+ांक 23 विदसंबर 1949 क मुस्जिस्लम समुदाय क े पास +माज़ अदा कर+े का कोई अवसर +हीं र्थीा। यह क: विदया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गया है विक बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में वर्भिर्ण संपखित्त क े अंदर स्र्थीाविप हिंहदू देव ाओं की मूर्ति यों क े सार्थी हमेशा ही Sन्मभूविम मंविदर रहा है। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार, रामचबू रा पर मंविदर को वष: 1885 क े वाद में विवति*क रूप से मान्य ा दी गई र्थीी। यह क: विदया गया र्थीा विक Sन्मभूविम मंविदर हमेशा वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में र्थीा और हिंहदुओं क े अति रिरX विकसी और को प्रवेश कर+े और पूSा कर+े कर+े की अ+ुमति +हीं दी गई र्थीी। कहा Sा ा है विक चढ़ावे को वि+म ही अखाड़ा क े प्रति वि+ति* द्वारा प्राप्त विकया गया र्थीा। कु क— क े बाद क े वल वि+म ही अखाड़े क े पुSारिरयों को मंविदर में मूर्ति यों को पूSा कर+े का दावा विकया Sा ा है। खिलखिख कर्थी+ में कहा गया है विक कम से कम वष: 1934 से ढाँचे में मुस्जिस्लमों द्वारा इबाद कर+े से इ+कार विकया गया है और यह क: विदया गया है विक वाद 4 को परिरसीम+ द्वारा बाति* कर विदया गया है। अति रिरX खिलखिख कर्थी+ में वि+म ही अखाड़ा +े इस बा से इ+कार विकया है विक 1885 क े वाद में वि+ष्कष: प्राङ्न्याय क े रूप में काय: कर े हैं। इस आरोप से इ+कार विकया Sा ा है विक मुस्जिस्लमों +े प्रति कू ल कब्Sे से अप+ा स्वत्व पूर्ण: विकया है। उत्तर प्रदेश राज्य

606. उत्तर प्रदेश राज्य +े अप+ा खिलखिख कर्थी+ इस आशय क े खिलए दायर विकया विक सरकार विववाविद संपखित्त में विह बद्ध +हीं है और वाद चला+े का प्रस् ाव +हीं कर ी है। अखिखल भार ीय विहन्दू महासभा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

607. दसवें प्रति वादी अखिखल भार ीय हिंहदू महासभा की ओर से दायर खिलखिख कर्थी+ में यह प्रकणिर्थी है विक भार +े स्व ंत्र ा प्राप्त कर+े पर मूल हिंहदू विवति* का पु+रुद्धार विकया है सिSसक े परिरर्णामस्वरूप वादी विकसी भी विवति*क या संवै*ावि+क अति*कार का दावा +हीं कर सक े हैं। एक अति रिरX खिलखिख कर्थी+ में दसवें प्रति वादी +े विद+ांक 22 विदसंबर 1949 की घर्ट+ा से इ+कार विकया और दावा विकया विक मूर्ति यों को अ+ाविदकाल से प्रश्नग स्र्थील पर अस्जिस् त्व में र्थीा। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है और Sन्म-स्र्थीा+ पर कोई मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया Sा सक ा र्थीा। अणिभराम दास और *रम दास

608. अणिभराम दास और *रम दास द्वारा खिलखिख कर्थी+ Sो उ+क े चेला हो+े का दावा कर े हैं, राम Sन्मभूविम स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की वै* ा पर सवाल उठा े हैं। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार स्र्थील को हिंहदू उपास+ा स्र्थीलों से भूविमबद्ध है और इसखिलए इस रह का भव+ मुस्जिस्लम विवति* में एक वै* मस्जिस्Sद +हीं हो सक ी है। खिलखिख कर्थी+ में शाविमल एक वै* वक्फ का खंर्ड+ इस आ*ार पर है विक वक्फ प्रति क ू ल कब्Sे पर आ*ारिर +हीं हो सक ा है। खिलखिख कर्थी+ क े अ+ुसार राम Sन्मभूविम में विवक्रमाविदत्य क े शास+ क े समय का एक प्राची+ मंविदर र्थीा सिSसे मीर बाकी +े ध्वस् कर विदया र्थीा। यह प्रकणिर्थी है विक राम Sन्मभूविम अविव+ाशी है क्योंविक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA देव ा अSर-अमर हैं। यह प्रस् ु विकया गया है विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े बावSूद यह क्षेत्र देव ाओं क े कब्Sे में है और हिंहदू पूSा क े स्र्थीा+ों से गुSर+े क े अलावा कोई भी व्यविX ी+ गुंबदाकार ढाँचे में प्रवेश +हीं कर सक ा है। अन्य हिंहदू प्रति वाविदयों द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ में अति*क र समा+ ा है। हिंहदू पक्षकारों क े खिलखिख कर्थी+ों क े प्रत्युत्तर दायर विकया गया। O.[3] उच्च न्यायालय क े विवषय और वि+ष्कष:

609. (1) क्या वादपत्र से संलग्न रेखा मा+तिचत्र में मस्जिस्Sद क े रूप में वर्भिर्ण प्रश्नग भव+ मस्जिस्Sद र्थीी। यविद उत्तर सकारात्मक है- (क) यह कब और विकसक े द्वारा वि+र्मिम विकया गया र्थीा, Sैसा विक प्रति वादी सं. 13 द्वारा कणिर्थी रूप से मीर बाकी द्वारा अर्थीवा वादकारिरयों द्वारा कणिर्थी रूप से बाबर द्वारा; (ख) क्या प्रति वादी संख्या 13 द्वारा कणिर्थी रूप से ध्वस् ीकरर्ण क े बाद एक कणिर्थी हिंहदू मंविदर स्र्थील पर भव+ का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा; यविद ऐसा है ो उसका प्रभाव- न्यायमूर्ति एस यू खा+ - मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बाबर क े आदेश से या उसक े अ*ी+ हुआ। क्या इसे वास् व में मीर बाकी अर्थीवा विकसी अन्य द्वारा वि+र्मिम विकया गया र्थीा यह ास्जित्वक +हीं है। मुस्जिस्लमों +े वष: 1934 क वि+यविम रूप से +माS अदा की, सिSसक े बाद विद+ांक 22 विदसंबर 1949 क शुक्रवार की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +माS अदा की गई। यह वि+रं र कब्Sे और उपयोग क े खिलए पया:प्त है। मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया र्थीा। बाबर क े शास+काल की अवति* क े दौरा+ Sब क मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया ब क परिरसर को भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ +हीं मा+ा Sा ा र्थीा। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादकारिरयों क े पक्ष में उत्तर विदया। 1 (क): +कारात्मक उत्तर - वादीगर्ण बाबर द्वारा ढाँचे क े वि+मा:र्ण को साविब कर+े में असफल रहे हैं। कÂ और साक्ष्यों क े अभाव में ढाँचे का वि+मा:र्ण कर+े वाले पर कोई वि+तिश्च वि+ष्कष: प्राप्त +हीं विकया Sा सक ा, परन् ु एक समझदारी भरा अ+ुमा+ है विक इसका वि+मा:र्ण औरंगSेब (1659-1707 ईस्वी) क े शास+ क े दौरा+ विकया गया र्थीा। 1 (ख)-सकारात्मक उत्तर विदया  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-विववाद्यक संख्या 1 और 1(क) +े वादकारिरयों क े विवरूद्ध उत्तर विदया। विववाद्यक 1(ख) +े एएसआई रिरपोर्ट: क े आ*ार पर प्रति वाविदयों क े पक्ष में उत्तर विदया। 1(ख)(क) क्या भव+ वष: 1931 क े खसरा क े +Sूल प्लॉर्ट संख्या 583 क े मोहल्ला कोर्ट राम चंˆ, सिSसे राम कोर्ट सिसर्टी अयोध्या (+Sूल संपखित्त?) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अयोध्या क े रूप में Sा+ा Sा ा है, में मौSूद र्थीा। यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव-  न्यायमूर्ति एस यू खा+ – विद+ांक 6 विदसंबर, 1992 को ढाँचा विवध्वंस क े बाद संपखित्त की पहचा+ का प्रश्न य कर+ा अब आवश्यक +हीं है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - यद्यविप भव+ को मोहल्ला कोर्ट राम चंˆ क े 1931 क े खसरा क े +Sूल प्लॉर्ट संख्या 583 पर स्जिस्र्थी दशा:या गया है, यह दो समुदायों क े दावे पर प्रभाव +हीं र्डालेगा क्योंविक उत्तर प्रदेश राज्य +े कोई दावा +हीं विकया है, विब+ा विकसी प्रति वाद क े खिलखिख कर्थी+ दायर विकया गया है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: - संपखित्त सरकार से संबंति* 1931 क े खसरा क े +ाज़ुल प्लॉर्ट +ंबर 583 पर मौSूद र्थीी। 1-ख(ख) क्या भव+ वादी द्वारा यर्थीा अणिभकणिर्थी सव:शविXमा+ ईश्वर को समर्मिप र्थीा.  न्यायमूर्ति एस यू खा+- मस्जिस्Sद एक वै* मस्जिस्Sद र्थीी।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- उत्तर +हीं विदया क्योंविक असुसंग है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध उत्तर विदया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1-ख(ग) क्या भव+ का उपयोग मुस्जिस्लम समुदाय क े सदस्यों द्वारा अ+ाविदकाल से इबाद कर+े क े खिलए विकया गया र्थीा। यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव-  न्यायमूर्ति एस यू खा+- वष: 1934 क बाबर द्वारा अर्थीवा उसक े आदेश क े ह वि+र्मिम मस्जिस्Sद का उपयोग मुस्जिस्लमों द्वारा वि+यविम इबाद क े खिलए विकया Sा रहा र्थीा। वष: 1934 से विद+ांक 22 विदसंबर 1949 क क े वल शुक्रवार की +माS अदा की गई र्थीी, परन् ु यह कब्Sे और उपयोग की वि+रं र ा का संक े दे+े क े खिलए पया:प्त है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- चूंविक दो+ों पक्षकार पहले वाद क े संस्र्थी+ से पूव: 80 वष: क अप+े संबंति* स्वरूपों क े अ+ुसार पूSा, आस्र्थीा और विवश्वास से ढाँचे का उपयोग कर रहे र्थीे वहाँ आं रिरक अहा े और भव+ को विकसी एक समुदाय द्वारा उपयोग क े खिलए प्रति बंति* +हीं विकया गया र्थीा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरुद्ध उत्तर विदया। 2 Sैसा विक वादपत्र में अणिभकणिर्थी विकया गया र्थीा विक क्या वष: 1949 क वाद में संपखित्त वादीगर्णों क े कब्Sे में र्थीी और वष: 1949 में ही उसी से बेदखल विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+ - स्वत्व कब्Sे का अ+ुसरर्ण कर ा है। इसखिलए, दो+ों पक्षकारों +े विववाविद परिरसर क े कब्Sे में संयुX स्वत्व *ारक हो+े क े खिलए अव*ारिर विकया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध उत्तर विदया। 3 क्या वाद समय क े भी र है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+-वाद परिरसीमा द्वारा बाति* +हीं है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:-वाद परिरसीमा द्वारा बाति* है। 4 क्या सामान्य रूप से हिंहदुओं और विवशेष रूप से भगवा+ श्री राम क े भXों +े प्रति वाविदयों द्वारा कणिर्थी रूप से वि+द†श क े माध्यम से वै*ावि+क अवति* से अति*क समय क े खिलए प्रति क ू ल और वि+रं र कब्Sे से स्र्थील पर प्रार्थी:+ाओं का अति*कार विदया है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- दो+ों पक्षकारों +े वष: 1885 से पूव: संयुX स्वत्व *ारक हो+ा अणिभवि+*ा:रिर विकया और इसखिलए प्रति कू ल कब्Sे क े प्रश्न का फ ै सला कर+ा आवश्यक +हीं है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- 1856-57 क बाह्य अहा े का उपयोग या कब्Sा मुस्जिस्लमों द्वारा +हीं विकया गया परन् ु दो+ों पक्षकारों द्वारा आं रिरक अहा े का उपयोग विकया गया है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 5(क)क्या प्रति वादी 1936 क े यू.पी. क े अति*वि+यम 13 की *ारा 5(3) क े प्राव*ा+ क े ह वादी संख्या 1 क े प्रशास+ क े ह एक वक्फ क े रूप में संपखित्त क े प्रक ृ ति को चु+ौ ी दे+े से रोक विदए गए हैं। (यह विववाद्यक विवद्व दीवा+ी न्याया*ीश द्वारा आदेश 21.4.1966 विद+ांविक क े माध्यम से पहले ही +कारात्मक य विकया गया है)  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी. वी. शमा:- दीवा+ी न्याया*ीश क े 21 अप्रैल, 1966 विद+ांविक क े आदेश द्वारा वादीगर्णों क े विवरूद्ध इस विववाद्यक का उत्तर विदया गया है। 5(ख) क्या उX अति*वि+यम की सामान्य ौर पर हिंहदुओं क े अति*कार और विवशेष ः प्रति वाविदयों क े पूSा क े अति*कार पर कोई प्रयोज्य ा +हीं है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध प्रति वाविदयों और हिंहदू पक्षकारों क े पक्ष में फ ै सला विकया। 5(ग) क्या उX अति*वि+यम क े अ*ी+ काय:वाविहयां वि+र्णा:यक हैं (यह विववाद्यक विवद्व दीवा+ी न्याया*ीश द्वारा आदेश 21 अप्रैल, 1996 विद+ांविक क े माध्यम से पहले ही +कारात्मक य विकया गया है)।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- दीवा+ी न्याया*ीश क े आदेश 21 अप्रैल 1966 विद+ांविक द्वारा यह वि+र्ण:य खिलया गया विक 1936 क े यू.पी. अति*वि+यम XIII की *ारा 5(3) की बा*ा क े ह प्रमुख मामले क े प्रति वाविदयों की संरक्षा को प्रभाविव +हीं कर ी है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- 21 अप्रैल 1966 विद+ांविक क े आदेश द्वारा +कारात्मक फ ै सला विकया गया। 5(घ) क्या खिलखिख कर्थी+ में कणिर्थी रूप से 1936 क े अति*वि+यम XIII क े उX उपबं* अति*कारा ी हैं। (इस विववाद्यक को प्रति वाविदयों क े अति*वXा द्वारा उठाया +हीं गया र्थीा, इसखिलए विवद्व दीवा+ी न्याया*ीश द्वारा उ+क े आदेश 21 अप्रैल, 1966 विद+ांविक क े माध्यम से उत्तर +हीं विदया गया र्थीा)। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- विववाद्यक 5(घ) को उठाया +हीं गया है। 5(ङ) क्या विववाद्यक सं. 17 पर विवद्वा+ सिसविवल न्याया*ीश द्वारा विद+ांक 21 अप्रैल, 1996 को दS: विकए गये इस आशय क े वि+ष्कष: क े मद्दे+Sर विक "विववाविद संपखित्त क े सम्बन्* में मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम (सं. XIII वष: 1936) की *ारा 5(1) क े ह कोई वै* अति*सूच+ा कभी +हीं दी गई, वादी वक्फ सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: को व:मा+ मुकदमे को Sारी रख+े का कोई अति*कार +हीं है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- वादीगर्णों क े पक्ष में वि+र्ण- विकया गया वाद 3 में विववाद्यक 6 क े अ*ी+ है Sो प्रति वाविदयों क े पक्ष में भी वि+र्ण- विकया गया है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 5(च) क्या पूव X वि+ष्कष: क े दृविष्टग, वाद अति*कारक्षेत्र और परिरसीमा क े अभाव क े कारर्ण वर्जिS है Sैसा विक यह उत्तर प्रदेश मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम, 1960 क े प्रारंभ क े पश्चा ् दायर विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादीगर्णों क े पक्ष में और प्रति वाविदयों क े विवरूद्ध +कारात्मक उत्तर विदया। 6 क्या व:मा+ वाद एक प्रति वि+ति* वाद है, वादीगर्ण मुस्जिस्लमों क े विह का और प्रति वादीगर्ण हिंहदुओं क े विह का प्रति वि+ति*त्व कर े हैं।  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े पक्ष में फ ै सला विकया। 7 (क) क्या वाद संख्या 61/280 वष: 1885 क े वादी महं रघुबर दास +े Sन्मस्र्थीा+ और उसमें विह बद्ध सभी व्यविXयों की ओर से वाद दायर विकया र्थीा।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- 1885 क े वाद में वि+र्ण:य सीपीसी की *ारा 11 क े सिसद्धां ों को आकर्मिष +हीं कर ा है, क्योंविक वास् व में वाद में क ु छ भी वि+र्ण- +हीं हुआ र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- +कारात्मक उत्तर विदया। 1885 का वाद महं रघुबर दास द्वारा Sन्मस्र्थीा+ और इसमें विह बद्ध सभी व्यविXयों की ओर से दायर +हीं विकया गया र्थीा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 7(ख) क्या मोहम्मद असगर कणिर्थी बाबरी मस्जिस्Sद का मु वल्ली र्थीा और उस+े ऐसी विकसी मस्जिस्Sद क े खिलए और उसकी ओर से वाद चलाया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादीगर्णों क े पक्ष में फ ै सला विकया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 7(ग) क्या उX वाद में वि+र्ण:य क े दृविष्टग, प्रति वाविदयों सविह विहन्दू समुदाय क े सदस्यों को व:मा+ वाद क े वादीगर्णों सविह, विववाविद संपखित्त को मुस्जिस्लम समुदाय क े स्वत्व से वंतिच कर+े से रोका Sा ा है। यविद हां, ो इसका प्रभाव-  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक फ ै सला विकया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 7(घ) क्या पूव X वाद में विववाविद संपखित्त क े खिलए मुस्जिस्लमों का स्वत्व या उसक े विकसी भाग को उस वाद क े वादी द्वारा स्वीकार विकया गया र्थीा। यविद हां, ो इसका प्रभावmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- +कारात्मक उत्तर विदया। विववाविद संपखित्त क े खिलए मुस्जिस्लमों क े स्वत्व क े बारे में 1885 क े वाद में वादी द्वारा कोई स्वीकारोविX +हीं की गई र्थीी।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 8 क्या वाद संख्या 61/280 वष: 1885 में वि+र्ण:य महं रघुबर दास ब+ाम राज्य सतिचव एवं अन्य क े वाद में प्रति वादीगर्णों क े विवरूद्ध पूव:न्याय क े रूप में काय: कर े हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-+कारात्मक उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला; वि+र्ण:य पूव:न्याय क े रूप में काय: +हीं करेगा। 10 क्या वादी +े वादपत्र में कणिर्थी रूप से प्रति क ू ल कब्Sे से अप+े अति*कारों को पूरा विकया है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- दो+ों पक्षकार वष: 1885 क े पूव: से संयुX कब्Sे में हैं। इसखिलए प्रति क ू ल कब्Sे क े विववाद्यक को वि+*ा:रिर कर+े की कोई आवश्यक ा +हीं है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादकारिरयों और मुस्जिस्लमों क े विवरूद्ध +कारात्मक उत्तर विदया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 11 क्या वाद में संपखित्त श्री राम चंˆSी की Sन्मभूविम स्र्थील है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया। Sब क बाबर क े शास+काल क े दौरा+ मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा, ब क विववाविद परिरसर को भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ +हीं मा+ा Sा ा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- हिंहदुओं द्वारा Sन्म स्र्थीा+ को मा+ा Sा ा है और उ+की पूSा की Sा ी है Sो आं रिरक अहा े में विववाविद ढांचे क े क ें ˆीय गुंबद क े अं ग: आ ा है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 12 क्या मूर्ति यों और पूSा की वस् ुओं को भव+ क े अंदर विद+ांक 22 और 23 विदसंबर, 1949 क े बीच रखा गया र्थीा या वे पहले से वहां अस्जिस् त्व में हैं, Sैसा विक वादपत्र क े प्रस् र 11 में अणिभकणिर्थी है। दो+ों मामलों में प्रभाव-  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की रावित्र क े बीच पहली बार मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण वाले विहस्से क े अंदर चबू रे पर मूर्ति यों को रखा गया र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादीगर्ण यह साविब कर+े में विवफल रहे हैं विक मूर्ति यों और वस् ुओं को विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की रावित्र क े दौरा+ भव+ क े अंदर रखी गई र्थीी। बाह्य अहा े में 22 विदसंबर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1949 से पूव: भी मूर्ति याँ और वस् ुएं मौSूद र्थीीं। विववाद्यक का उत्तर +कारात्मक विदया गया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्ण यह साविब कर+े में विवफल रहे हैं विक भव+ में मूर्ति यों और वस् ुओं को विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की रावित्र में स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। 13 क्या सामान्य रूप से हिंहदुओं और विवणिशष्ट ः प्रति वाविदयों को 'चरर्णों' और 'सी ा रसोई' की पूSा कर+े और मूर्ति यों और पूSा की वस् ुओं का अति*कार र्थीा, यविद कोई हो ो संपखित्त में या वाद में मौSूद हैं।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- हक कब्Sे का अ+ुसरर्ण कर ा है और दो+ों पक्षकार विववाविद परिरसर क े कब्Sे में संयुX हक*ारी र्थीे।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सामान्य रूप से हिंहदू कई श ास्जिब्दयों से अति*कार स्वरूप आं रिरक अहा े क े अंदर परिरसर में प्रवेश कर रहे र्थीे, इसखिलए इस विववाद्यक का उत्तर सकारात्मक विदया गया है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 14 क्या विहन्दू विववाविद स्र्थील श्री राम Sन्म भूविम या Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में पूSा कर रहे हैं और अ+ं काल से इसे पविवत्र ीर्थी: स्र्थील क े रूप में देख े हैं। यविद ऐसा है ो इसका प्रभावmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+-मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया। बाबर क े शास+काल क े दौरा+ मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क परिरसर का + ो विवश्वास विकया गया और + ही यह मा+ा गया विक वह भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सकारात्मक उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 15 क्या मुस्जिस्लमों का 1528 ईस्वी से स, स्पष्ट रूप से और सामान्य ः प्रति वाविदयों और विहन्दुओं की Sा+कारी में संपखित्त का कब्Sा है। यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव-  न्यायमूर्ति एस यू खा+- यहां प्रति क ू ल कब्Sे क े प्रश्न को वि+र्ण- कर+े की आवश्यक ा +हीं है क्योंविक दो+ों पक्ष संयुX हक*ारी हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों और मुस्जिस्लमों क े विवरुद्ध उत्तर विदया। 16 अन्य कोई अ+ु ोष सिSसक े वादी या उ+में से कोई हकदार हों।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- वाद परिरसीमा द्वारा बाति* हो+े क े कारर्ण खारिरS हो+े क े खिलए उत्तरदायी है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादी विकसी भी राह क े हकदार +हीं हैं और वाद खारिरS विकया Sा ा है। 17 क्या वाद में संपखित्त से संबंति* 1936 क े यू. पी. मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम संख्या XII की *ारा 5(1) क े ह विवति*मान्य अति*सूच+ा कभी की गई र्थीी। यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव। (यह विववाद्यक विवद्व सिसविवल न्याया*ीश क े आदेश 21.04.1966 विद+ांविक द्वारा पहले ही वि+र्ण- विकया Sा चुका है)।  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: -सिसविवल न्याया*ीश क े आदेश 21 अप्रैल 1966 विद+ांविक द्वारा वि+र्ण:य विकया गया। 18 विववाद्यक संख्या 17 पर विद+ांक 21 अप्रैल, 1966 को अणिभखिलखिख सिसविवल न्याया*ीश क े वि+ष्कष: पर गुलाम अब्बास एवं अन्य ब+ाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (ए.आई.आर. 1981 सव च्च न्यायालय 2198) में सव च्च न्यायालय क े वि+र्ण:य का क्या प्रभाव है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-सव च्च न्यायालय का वि+र्ण:य विववाद्यक 17 क े वि+ष्कषÂ को प्रभाविव +हीं कर ा है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 19(क) Sैसा विक प्रति वादी सं. 13 की ओर से कणिर्थी है विक क्या वाद में भव+ क े वि+मा:र्ण क े बाद भी भगवा+ श्री राम विवराSमा+ और स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम क े देव ा वाद में संपखित्त पर मौSूद र्थीे और उX स्र्थीा+ों की पूSा क े उद्देश्य से भX वहाँ गए। यविद ऐसा है ो क्या विववाविद संपखित्त उX देव ाओं में वि+विह है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया। Sब क बाबर क े शास+काल क े दौरा+ मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा, ब क परिरसर का + ो विवश्वास विकया Sा ा र्थीा और + ही भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+ा Sा ा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर Sो परिरसर मा+ा Sा ा है वे देव ा में वि+विह र्थीे। बाह्य अहा े में हिंहदू *ार्मिमक ढाँचे को वादी की संपखित्त +हीं मा+ा Sा सक ा है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 19(ख) क्या भव+ भूबद्ध र्थीा और विहन्दू उपास+ा क े स्र्थीा+ों से गुSर+े क े सिसवाय +हीं पहुंचा Sा सक ा र्थीा। यविद ऐसा है ो इसका प्रभाव-  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- इस सीमा क इसका उत्तर सकारात्मक विदया विक भव+ भूबद्ध र्थीा और हिंहदू पूSा क े स्र्थीा+ों से गुSर+े क े अलावा +हीं पहुंचा Sा सक ा र्थीा। हालाँविक यह अप+े आप में कोई परिरर्णाम +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 19(ग) क्या वाद में संपखित्त क े विकसी भी भाग को प्रश्नग भव+ क े वि+मा:र्ण से ुरं पहले हिंहदुओं द्वारा एक स्र्थील या पूSा क े रूप में उपयोग विकया गया र्थीा। यविद वि+ष्कष: सकारात्मक है ो क्या विववाविद स्र्थील पर इस्लामी सिसद्धां ों क े मद्दे+Sर कोई मस्जिस्Sद अस्जिस् त्व में +हीं आ सक ी है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया। Sब क बाबर क े शास+काल क े दौरा+ मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा, ब क परिरसर का + ो विवश्वास विकया Sा ा र्थीा और + ही भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+ा Sा ा र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- विहन्दू विववाविद ढांचे क े वि+मा:र्ण से पूव: विववाविद स्र्थील पर पूSा कर रहे र्थीे। हालांविक, Sहाँ क दूसरे भाग का संबं* है काल्पवि+क हो+े क े +ा े इसकी कोई प्रासंविगक ा +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वाद में संपखित्त भगवा+ राम की Sन्मभूविम स्र्थील है और प्रति वाविदयों को पूSा कर+े का अति*कार र्थीा। विहन्दू अ+ाविद काल से ही ऐसा कर रहे हैं। 19(घ) क्या प्रश्नग भव+ इस्लामी का+ू+ क े ह एक मस्जिस्Sद +हीं हो सक ी है। सिSसमें यह स्वीकार +हीं विकया गया है विक इसमें मी+ारें +हीं र्थीीं।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- यह +हीं कहा Sा सक ा विक मस्जिस्Sद एक वै* मस्जिस्Sद +हीं र्थीी।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादीगर्णों क े पक्ष में उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 19(ङ) क्या प्रश्नग भव+ विवति*क रूप से मस्जिस्Sद +हीं हो सक ी है क्योंविक स्वयं वाविदयों द्वारा यह दर्भिश कर े हुए विक यह ी+ों ओर से कविब्रस् ा+ से तिघरा हुआ है?  न्यायमूर्ति एस यू खा+- यह +हीं कहा Sा सक ा विक मस्जिस्Sद एक वै* मस्जिस्Sद +हीं र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- वादीगर्णों क े पक्ष में उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। (च) क्या प्रश्नग भव+ क े अंदर और बाहर क े स् ंभों में विहन्दू देवी - देव ाओं की मूर्ति यां हैं। यविद वि+ष्कष: सकारात्मक है ो क्या उस विववरर्ण पर प्रश्नग भव+ में इस्लाम क े सिसद्धां ों क े ह मस्जिस्Sद की प्रक ृ ति +हीं हो सक ी।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए विकसी भी मंविदर को ध्वस् +हीं विकया गया। Sब क मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण +हीं विकया गया र्थीा, ब क परिरसर का + ो विवश्वास विकया Sा ा र्थीा और + ही भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+ा Sा ा र्थीा।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- पहले भाग का उत्तर सकारात्मक विदया गया है। दूसरा भाग वि+रर्थी:क है और अ+ुत्तरिर रह गया है। अंति म परिरर्णाम में इस विववाद्यक को वादीगर्णों क े पक्ष में उत्तर विदया गया है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 20(ए) क्या प्रश्नग वक्फ सुन्नी वक्फ +हीं हो सक ा है क्योंविक भव+ का वि+मा:र्ण कणिर्थी रूप से सुन्नी मुस्जिस्लमों द्वारा +हीं विकया गया र्थीा लेविक+ कणिर्थी रूप से मीर बाकी द्वारा विकया गया र्थीा Sो कणिर्थी रूप से णिशया मुस्जिस्लम र्थीा और कणिर्थी मु वल्ली कणिर्थी रूप से णिशया मुस्जिस्लम र्थीे। यविद ऐसा हो ो इसका प्रभावmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+- यह +हीं कहा Sा सक ा विक मस्जिस्Sद एक वै* मस्जिस्Sद +हीं र्थीी।  Sस्जिस्र्टस सु*ीर अ£वाल- अप्रासंविगक और उत्तर +हीं विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 20(ख) क्या कणिर्थी वक्फ का मु वल्ली र्थीा और क्या कणिर्थी मु वल्ली क े वाद में शाविमल +हीं हो+े क े कारर्ण अभी क पोषर्णीय +हीं है क्योंविक यह कब्Sे क े खिलए राह से संबंति* है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- भव+ की क ु क— क े समय एक मु वल्ली र्थीा और उसकी अ+ुपस्जिस्र्थीति में उपासकों क े रूप में वादी को कब्Sे क े अ+ु ोष की अ+ुज्ञा +हीं दी Sा सक ी।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वाद की पोषर्णीय ा अव*ारिर +हीं विकया गया है। 21 क्या वाद कणिर्थी देव ाओं क े असंयोS+ क े कारर्ण गल है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+-हालांविक, देव ा प्रति वादी +हीं है, इस आ*ार पर मुकदमा खारिरS +हीं विकया Sा सक ा है क्योंविक देव ा पया:प्त रूप से प्रति वि+ति*त्व कर े हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादी क े पक्ष में Sवाब विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादी क े खिखलाफ फ ै सला विकया। 22 क्या वाद विवशेष खच† क े सार्थी खारिरS विकए Sा+े क े खिलए दायी है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- कोई विवशेष खच: अति*वि+र्ण- विकए Sा+े की आवश्यक ा +हीं है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्ण विकसी भी अ+ु ोष क े हकदार +हीं हैं: वाद को आसा+ खच† क े सार्थी खारिरS विकया Sा ा है। 23 क्या वक्फ बोर्ड: राज्य का अणिभकरर्ण (अंग) है। यविद ऐसा है, ो क्या बोर्ड: राज्य क े विवरूद्ध ही वाद दायर कर सक ा है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- + ो वक्फ बोर्ड: राज्य का एक अणिभकरर्ण है और + ही राज्य क े विवरूद्ध वक्फ बोर्ड: को वाद दायर कर+े पर कोई वS:+ है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- मुकदमा पोषर्णीय +हीं है। 24 क्या वक्फ बोर्ड: संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 24 क े अ*ी+ “राज्य” है? यविद ऐसा है ो क्या उX वक्फ बोर्ड: विकसी विवशेष समुदाय क े मामले को प्रायोसिS कर+े और विकसी अन्य समुदाय क े विह क े विवरूद्ध प्रति वि+ति* क्षम ा में कोई वाद दायर कर सक ा है।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल- + ो वक्फ बोर्ड: राज्य का एक अणिभकरर्ण है और + ही राज्य क े विवरूद्ध वक्फ बोर्ड: को वाद दायर कर+े पर कोई वS:+ है।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- मुकदमा पोषर्णीय +हीं है। 25 क्या वादी द्वारा विकए दावे क े अ+ुसार विववाविद ढांचे क े विवध्वंस पर इसे अभी भी एक मस्जिस्Sद कहा Sा सक ा है और यविद +हीं ो क्या वादी क े दावे को अति*क समय क पोषर्णीय + हो+े क े रूप में खारिरS कर+े क े खिलए दायी है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+-विकसी विवणिशष्ट वि+ष्कष: क े अभाव में उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल -विववाविद ढाँचे क े विवध्वंस क े परिरर्णामस्वरूप वाद 4 को पोषर्णीय +हीं मा+ा Sा सक ा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 26 क्या मुस्जिस्लमों द्वारा खुले स्र्थील को मस्जिस्Sद क े रूप में उपयोग करक े इबाद विकया Sा सक ा है Sब वहाँ पर ब+े हुए ढांचे को ध्वस् कर विदया गया हो।  न्यायमूर्ति एस यू खा+- विकसी विवणिशष्ट खोS क े अभाव में, उन्हों+े कहा विक वह न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल से सहम हैं।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - विववाविद ढाँचे क े विवध्वंस क े परिरर्णामस्वरूप वाद 4 को पोषर्णीय +हीं मा+ा Sा सक ा।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। 27 क्या बाह्य अहा े में रामचबू रा, भंर्डार और सी ा रसोई शाविमल हैं। यविद ऐसा है ो क्या उन्हें विद+ांक 6 विदसंबर, 1992 को मुख्य मंविदर क े सार्थी ध्वस् कर विदया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA  न्यायमूर्ति एस यू खा+ -वरामचबू रा र्टाइफ ें र्थीलर (1766-1771 ईस्वी) की यात्रा से पूव: परन् ु मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण (1528 ईस्वी) क े पश्चा अस्जिस् त्व में आया।  न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल - सभी पक्षकारों +े स्वीकार विकया विक विववाविद ढाँचे को ध्वस् कर+े पर विद+ांक 6 विदसंबर, 1992 को ी+ों ढाँचे को ध्वस् कर विदया गया र्थीा। इसखिलए सकारात्मक उत्तर विदया।  न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:-सकारात्मक फ ै सला विकया। 28 क्या प्रति वादी सं. 3 का कभी विववाविद स्र्थील पर कब्Sा रहा है और वादीगर्णों का इस पर कभी कब्Sा +हीं र्थीा।

III. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल-वादीगर्ण विववाविद भव+ सविह बाह्य और आं रिरक परिरसरों क े कब्Sे को साविब कर+े में विवफल रहे हैं।

IV. न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:- वादीगर्णों क े विवरूद्ध फ ै सला विकया। उच्च न्यायालय का दृविष्टकोर्ण mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उच्च न्यायालय क े ी+ न्याया*ीशों में से दो (न्यायमूर्ति एस यू खा+ र्थीा न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल) +े विववाविद परिरसर का ी+- रीका से विवभाS+ का वि+द†श विदया: "मुस्जिस्लम पक्षकारों, वाद 5 क े वाविदयों और वि+म ही अखाड़ा प्रत्येक को 1/3 वाँ भाग।" उच्च न्यायालय +े सिSस आ*ार पर यह ी+- रीक े क े विवभाS+ का वि+द†श विदया वह संयुX कब्Sे क े अप+े वि+ष्कष: क े आ*ार पर र्थीा। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े वाद 5 में वाविदयों को पूरी संपखित्त की आज्ञविप्त दे दी। न्यायमूर्ति एस यू खा+ क े फ ै सले से प ा चल+े वाला सामान्य सूत्र यह है विक मुस्जिस्लमों और हिंहदूओं का संयुX कब्Sा र्थीा और चूंविक साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 110 क े ह स्वत्व, कब्Sे का अ+ुसरर्ण कर ा है, दो+ों विववाविद परिरसर क े संयुX स्वत्व*ारी र्थीे।

610. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े वि+र्ण:य का आ*ार इस प्रकार विदया Sा सक ा हैः (i) मुसलमा+ों का 1856-57 से बाहरी अहा े पर कब्Sा +हीं र्थीा Sब विब्रविर्टश सरकार +े विवभाS+ रेलिंलग को लगाया। मुसलमा+ों क े पास अति*क से अति*क क े वल बाहरी अहा े से गुSर+े का ही अति*कार र्थीा। (ii) बाहरी अहा े पर हिंहदुओं का कब्Sा स्पष्ट र्थीा और मुसलमा+ों क े ज्ञा+ में र्थीा। यह 1858 क े दस् ावेSों द्वारा स्पष्ट है Sो यह दर्भिश कर ा है विक मस्जिस्Sद क े मु वल्ली +े कई णिशकाय ें की र्थीीं, इसक े बावSूद परिरसर में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संरच+ाएं रहीं, Sैसे विक बाहरी अहा े में हिंहदुओं का प्रवेश कर+ा और पूSा कर+ा Sारी रहा। (iii) विववाविद सम्पखित्त पर मुसलमा+ों का कब्Sा हो+े का कोई साक्ष्य +हीं है। हालांविक यह +हीं मा+ा Sा सक ा है विक मुस्जिस्लम आं रिरक अहा े में +हीं गए र्थीे या 1949 क कोई +माS अदा +हीं की गई र्थीी, यह स्वंय से विवति* में कब्Sा क े समा+ +हीं होगा। मुस्जिस्लम हिंहदूओं क े सार्थी विह प्रद प्रयोग कर े र्थीे और इस प्रकार मुस्जिस्लम अप+े ढंग से पूSा कर+े क े खिलए भी री आंग+ में आ े र्थीे। (iv) यद्यविप वाविदयों का यह दावा है विक चूंविक भी री अहा े में वि+यविम +माS अदा की गई र्थीी, अ ः रिरसीवर +े इसक े उपयोग से संबंति* अपेतिक्ष साम£ी प्राप्त की होगी, ऐसी कोई साम£ी +हीं विमली, यह इस अ+ुमा+ की ओर ले Sा ा है विक कोई अस्जिस् त्व में +हीं र्थीा। इससे मुसलमा+ों का यह दावा कमSोर हो Sा ा है विक वे वि+रं र पूSा क े रूप में अ+न्य अति*कार प्राप्त कर लें। (v) मुस्जिस्लमों +े विववाविद संपखित्त को +हीं छोड़ा र्थीा। उन्हो+ें इसक े रखरखाव क े खिलए अ+ुदा+ क े रूप में विब्रविर्टश सरकार द्वारा इसकी मान्य ा प्राप्त करक े, इस पर अप+ा दावा Sारी रखा। विववाविद संरच+ा क े रूप में इमार का ब+े रह+ा और विवभाSक दीवार उसी प्रकार प्रत्यक्ष है Sैसे विक +माज़ क े खिलए आं रिरक अहा े में मुसलमा+ों का प्रवेश है। Sबविक हिंहदू और मुसलमा+ दो+ों विववाविद संपखित्त में उपासक क े रूप में Sा े र्थीे, एकमात्र अन् र यह र्थीा विक हिंहदू पूरी संपखित्त पर Sा े र्थीे, Sबविक मुसलमा+ +माS अदा कर+े क े खिलए भी री प्रांगर्ण क ही सीविम र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

(vi) Sबविक मुसलमा+ यह साविब कर+े में असफल रहे हैं विक वाद 4 की संपखित्त उ+क े अ+न्य कब्Sे में 1949 क र्थीी, हिंक ु दो+ों समुदायों का आं रिरक आंग+ में कब्Sा र्थीा; (vii) बाहरी अहा ा 1949 क मुस्जिस्लमों क े कब्Sे में +हीं र्थीा और यहाँ क विक इससे पूव: भी +हीं र्थीा। Sहाँ क आं रिरक अहा े का संबं* है, मुसलमा+ों +े 23 विदसंबर 1949 से अप+ा कब्Sा छोड़ विदया है। इससे पहले हिंहदूओं और मुस्जिस्लमों दो+ों का भी री अहा े पर कब्Sा र्थीा; और (viii) विहन्दू *ार्मिमक संरच+ाएं बाहरी अहा े में 1856 क े बाद से मौSूद र्थीीं और वि+म ही अखाड़े क े पुSारिरयों द्वारा प्रबंति* और प्रशासिस विकया Sा रहा र्थीा। इसखिलए बाहरी अहा े की सीमा क, विववाविद स्र्थील को वि+म ही अखाड़ा क े कब्Sे में हो+ा कहा Sा सक ा है, Sबविक मुसलमा+ों का उस पर कब्Sा अवरूद्ध र्थीा। आं रिरक अहा े पर दो+ों पक्षों का अ+न्य कब्Sा +हीं र्थीा और विब+ा बा*ा क े दो+ों समुदायों क े सदस्य आ े र्थीे। वाद 5 में वादी क े दावे की संपूर्ण: ा की अ+ुमति दे+े में, न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े अणिभवि+*ा:रिर विकया: (i) गैर मुस्जिस्लम द्वारा प्रति क ू ल कब्Sा रख+े से मस्जिस्Sद अप+े पविवत्र प्रक ृ ति को खो दे ी है। मुस्जिस्लमों का वाद संपखित्त पर कब्Sा +हीं र्थीा और यह ब ा+े क े खिलए कोई विवश्वस+ीय प्रमार्ण +हीं है विक अ+ाविद काल से उ+क े द्वारा +माS अदा की Sा ी र्थीी; और (ii) मुस्जिस्लमों +े 1528 ई. से वाद संपखित्त पर अ+न्य और वि+रं र कब्Sा स्र्थीाविप +हीं विकया है या यह विक उन्हों+े अ+ाविदकाल से विववाविद ढांचे में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +माS अदा की है। दूसरी ओर, हिंहदुओं +े आं रिरक अहा े पर अ+न्य कब्Sा स्र्थीाविप कर खिलया है और यह विक वे प्रार्थी:+ा कर+े क े खिलए वहाँ Sा रहे र्थीे। वाद 4 की पोषर्णीय ा

611. सु+वाई क े दौरा+, विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री परासर+ +े इस आ*ार पर वाद 4 की पोषर्णीय ा पर आपखित्त S ाई विक यह मुकदमा क े वल मु वल्ली की ओर से संस्जिस्र्थी विकया Sा सक ा र्थीा। यह आ£ह विकया गया र्थीा विक सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े पास काय:वाही कर+े क े खिलए कोई आ*ार +हीं र्थीा। इस दलील में कोई मेरिरर्ट +हीं है। यूपी मुस्जिस्लम वक्फ अति*वि+यम 1960 की *ारा 19(2) विवशेष रूप से बोर्ड: को संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए उपाय अप+ा+े और वक्फ से संबंति* मुकदमों को संस्जिस्र्थी कर+े और बचाव कर+े का अति*कार दे ी है। *ारा 3(2) क े ह, बोर्ड: का अर्थी: सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: या अति*वि+यम क े ह गविठ णिशया सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: है। इसखिलए वै*ावि+क शविX क े संदभ: में, स्पष्ट रूप से सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े पास का+ू+ी काय:वाही संस्जिस्र्थी कर+े का अति*कार है। O.[4] वाद 4 में परिरसीमा अणिभवच+

612. वाद 4 में वाद पत्र में, काय:वाही क े संस्र्थी+ क े खिलए वाद हे ुक 23 विदसंबर 1949 को हुई घर्ट+ाओं पर आ*ारिर है, सिSसक े दौरा+ हिंहदुओं की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भीड़ द्वारा मस्जिस्Sद क े अंदर मूर्ति यों को रखा गया र्थीा। ऐसा कर+े का आशय मस्जिस्Sद को +ष्ट कर+ा, क्षति पहुंचा+ा और अपविवत्र कर+ा र्थीा। इसक े अलावा, वादी क े अ+ुसार मस्जिस्Sद में प्रवेश कर+े का यह काय: और मूर्ति यों को रख+ा मस्जिस्Sद का अपविवत्रीकरर्ण है। यह स्पष्ट रूप से वाद पत्र क े प्रस् र 11 में प्रकर्थी+ से वि+कल ा है: “11. यह विक मुस्जिस्लमों का पूव X मस्जिस्Sद में शांति पूर्ण: कब्Sा रहा है और 23.12.1949 क इसमें +माS पढ़ा कर े र्थीे, Sब हिंहदुओं की एक बड़ी भीड़ +े उX मस्जिस्Sद को +ष्ट कर+े, क्षति £स् कर+े या अपविवत्र कर+े क े शरार ी इरादे से और सिSससे मुस्जिस्लम *म: और मुसलमा+ों की *ार्मिमक भाव+ाओं का अपमा+ हो ा र्थीा, मस्जिस्Sद में प्रवेश विकया और मस्जिस्Sद क े अंदर मूर्ति रखकर मस्जिस्Sद को अपविवत्र विकया। विहन्दूओं का आचरर्ण भार ीय दंर्ड संविह ा की *ारा 147, 295 और 448 क े ह दंर्ड+ीय अपरा* र्थीा।" उपरोX प्रकर्थी+ से Sुड़ा प्रस् र 23 में कर्थी+ है Sो इस प्रकार है: “23. यह विक विहन्दुओं क े विवरूद्ध मुकदमे क े खिलए वाद हे ुक इस मा++ीय न्यायालय क े अति*कार क्षेत्र क े भी र अयोध्या सिSला फ ै Sाबाद में 23.12.1949 को ब उत्पन्न हुआ Sब विहन्दूओं +े अवै* रूप से मस्जिस्Sद में प्रवेश विकया और मस्जिस्Sद में मूर्ति रखकर मस्जिस्Sद को अपविवत्र विकया सिSससे आम ौर पर मस्जिस्Sद में +माS अदा कर+े और अन्य *ार्मिमक अ+ुष्ठा+ कर+े क े मुस्जिस्लमों क े अति*कारों में बा*ा और हस् क्षेप कारिर हुआ। हिंहदू (गंS-शाविहद+) कविब्रस् ा+ में मुस्जिस्लमों क े खिलए अवरो* भी पैदा कर रहे हैं और इसमें दफ+ मृ व्यविXयों क े खिलए फति हा पढ़+े में अवरो* र्डाल रहे हैं। इस प्रकार कारिर क्षति स क्षति हैं, इससे उत्पन्न हो+े वाला वाद हे ुक वि+रं र +वीक ृ हो ा है और प्रति वादी 5 से 9 क े विवरूद्ध वाद हे ुक, विद+ांक 29. 12. 1949 को वादी क े खिलए उत्पन्न हुआ, सिSस ारीख को प्रति वादी संख्या 7 सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट फ ै Sाबाद-सह-अयोध्या +े मुकदमे में मस्जिस्Sद को क ु क: विकया और श्री विप्रया दत्त राम प्रति वादी संख्या 9 को रिरसीवर क े रूप में इसका mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कब्Sा सौंप विदया, सिSन्हों+े 5 S+वरी, 1950 को इसका पदभार £हर्ण विकया। प्रति वादी 6 से 8, राज्य सरकार और इसक े अति*कारी आरोविपयों को अणिभयोसिS कर+े और मुस्जिस्लमों क े विह ों की सुरक्षा कर+े क े अप+े क:व्य में असफल रहे।” मूल रूप से दायर विकए गए मुकदमे में इस आशय की घोषर्णा माँगी गयी र्थीी विक वाद पत्र में संलग्न +क्शे में अक्षर ए बी सी र्डी से दशा:यी गयी संपखित्त एक साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है सिSसे बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में Sा+ा Sा ा है और अक्षर ई एफ Sी एच द्वारा तिचवित्र इससे संलग्न भूविम एक साव:Sवि+क मुस्जिस्लम कविब्रस् ा+ है। प्रार्थी:+ा (ख) में विहन्दूओं द्वारा रखी गयी मूर्ति यों और पूSा की अन्य चीSों को हर्टाकर मस्जिस्Sद और कविब्रस् ा+ क े कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए एक तिर्डक्री की माँग की गयी है, "यविद न्यायालय कब्Sे क े परिरदा+ को उतिच अ+ु ोष समझ ी है"। प्रार्थी:+ा (खख) अ+ति*क ृ संरच+ाओं को हर्टाकर अ+ुसूची ए में वर्भिर्ण संपखित्त को वै*ावि+क रिरसीवर को सौंप+े क े आदेश क े खिलए है। प्रार्थी:+ा (खख) को 25 मई 1995 क े संशो*+ द्वारा लाया गया र्थीा। खिलखिख कर्थी+

613. परिरसीमा की दलील विवशेष रूप से कई खिलखिख कर्थी+ों में उठाई गई र्थीी, ये पहले और दूसरे प्रति वाविदयों क े खिलखिख कर्थी+ों क े प्रस् र 27 और 28 में और अति रिरX खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 23 में र्थीे। प्रति वादी सं. 3 और 4, वि+म ही अखाड़ा और महं रघु+ार्थी दास द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 35 में; प्रति वादी सं.10, अखिखल भार हिंहदू महासभा क े खिलखिख mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर्थी+ क े प्रस् र 29 में और कई अन्य हिंहदू पक्षकारों क े खिलखिख कर्थी+ों में भी परिरसीमा की दलील उठाई गयी र्थीी। दसवें प्रति वादी +े 15 फरवरी 1990 को एक खिलखिख कर्थी+ दाखिखल विकया और वाद पत्र क े प्रस् र 23 का खंर्ड+ विकया। प्रस् र 29 और 79 में दी गयी अति रिरX दलीलों में, एक विवणिशष्ट दलील उठायी गयी र्थीी विक वाद परिरसीमा द्वारा बाति* है। खिलखिख कर्थी+ का प्रस् र 79 इस प्रकार है: “...79. यह विक विवरतिच वाद क े वल उद्घोषर्णा क े खिलए एक वाद है और कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए अ+ु ोष इ+ शब्दों में है विक "यविद न्यायालय की राय में...” सिSसका अर्थी: है विक पक्षकार कब्Sे का अ+ु ोष +हीं मांग रहे हैं और इसे न्यायालय पर छोड़ विदया है विक वह स्व ः कब्Sे की अ+ुमति दे। कारर्ण स्पष्ट है विक मुकदमा परिरसीमा द्वारा बाति* र्थीा और इसखिलए विवणिशष्ट प्रार्थी:+ा +हीं की गई है।" खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 39 को 23 +वंबर 1992 क े न्यायालय क े आदेश क े अ+ुसरर्ण में Sोड़ा गया र्थीा। दसवें प्रति वादी क े संशोति* खिलखिख कर्थी+ क े खिलए एक प्रत्युत्तर दाखिखल विकया गया र्थीा, लेविक+ खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 79 का कोई विवणिशष्ट ख°ड़+ +हीं विकया गया र्थीा।

614. मुकदमा 18 विदसंबर 1961 को प्रस् ु और दायर विकया गया।

615. वाद 4 क े पहले वादी को 23 अगस् 1989 क े न्यायालय क े आदेश क े अ+ुसरर्ण में वि+म ही अखाड़ा द्वारा संस्जिस्र्थी वाद 3 क े +ौवें प्रति वादी क े रूप में पक्षकार ब+ाया गया र्थीा। अति*वXा क े माध्यम से पहले वादी की ओर से एक कर्थी+ विकया गया र्थीा विक वाद 5 में प्रति वादी सं. 1 से 5 और वाद 3 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में प्रति वादी सं. 6 से 8 की ओर से पहले ही दायर विकए गए खिलखिख कर्थी+ों को स्वीकार कर खिलया गया र्थीा। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: को भी विद+ांक 7 S+वरी 1987 क े अदाल क े आदेश क े अ+ुसरर्ण में वाद 1 में प्रति वादी संख्या 10 क े रूप में पक्षकार ब+ाया गया र्थीा। वाद 1 में प्रति वादी सं. 1 से 5 द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 22 में, यह विवशेष रूप से कहा गया र्थीा विक 16 विदसंबर 1949 क +माS अदा की गई र्थीी। इसी रह, वाद 3 में प्रति वादी सं. 6 से 8 की ओर से दायर खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 26 में यह भी कहा गया र्थीा विक 16 विदसंबर 1949 क +माS लगा ार अदा की गई र्थीी। इस प्रकार, परिरसीमा क े मुद्दे क े उद्देश्य से इस आ*ार पर आगे बढ़+ा आवश्यक है विक अंति म +माS 16 विदसंबर 1949 को अदा की गई र्थीी। उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रति वादी सं. 20 की ओर से पेश विवद्वा+ अति*वXा द्वारा यह कहा गया र्थीा विक: (i) उद्घोषर्णा क े वाद में, परिरसीमा अति*वि+यम 1908 का अ+ुच्छेद 120 लागू है और यविद अ+ुच्छेद 23 में यर्थीा वर्भिर्ण वाद हे ुक को सही मा+ा Sा ा है ो भी वह वाद, Sो छः वष: की समाविप्त क े पश्चा ् संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, परिरसीमा द्वारा वर्जिS है; और (ii) भले ही अ+ुच्छेद 120 को अ+ुप्रयोज्य मा+ा Sा ा है और अ+ुच्छेद 142 और अ+ुच्छेद 144 को लागू हो+ा मा+ा Sा ा है ो भी वाद हे ुक विद+ांक 16 विदसंबर, 1949 को उत्पन्न हुआ और यह स अपक ृ त्य +हीं र्थीा। इसखिलए बारह साल की समाविप्त क े बाद 18 विदसंबर 1961 को दायर विकया गया मुकदमा परिरसीमा द्वारा वर्जिS है, हालांविक क े वल 2 विद+ों से। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उच्च न्यायालय का वि+ष्कष:

616. *ारा 145 क े प्राव*ा+ों पर विवचार कर े हुए न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक काय:वाही न्यातियक प्रक ृ ति की +हीं है और + ही मसिSस्र्ट्रेर्ट इस पर ऐसे विवचार कर ा है Sैसे विक यह अचल संपखित्त क े खिलए एक मुकदमा हो। *ारा 145 क े ह काय:वाही + ो परिरसीमा क े विवस् ार का परिरर्णाम होगा और + ही परिरसीमा की गर्ण+ा कर+े क े उद्देश्य से प्राव*ावि+ कोई अपवS:+ है। मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा रिरसीवर की वि+युविX से संपखित्त मात्र विवति* की अणिभरक्षा में हुई और यह परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 142 क े अर्थी: क े अन् ग: बेदखल कर+ा +हीं है। संपखित्त की कु क— + ो माखिलक को बेदखल कर ी है + ही कब्Sे को अवरूद्ध कर ी है। देवक ु अर ब+ाम णिशवप्रसाद सिंसह324 में इस न्यायालय क े वि+र्ण:य को संदर्भिभ कर े हुए उच्च न्यायालय +े इस सिसद्धान् का उल्लेख विकया विक *ारा 145 क े अ*ी+ क ु क— क े आदेश क े अ+ुसरर्ण में सम्पखित्त विवति* की अणिभरक्षा में है; चूंविक यह विकसी वि+Sी व्यविX क े कब्Sे में +हीं है, इसखिलए कब्Sे की बहाली क े खिलए अ+ु ोष माँग+े की कोई आवश्यक ा +हीं है और हक की उद्घोषर्णा पया:प्त होगी। कब्Sे क े अ+ु ोष की आवश्यक ा +हीं है क्योंविक कोई भी वि+Sी प्रति वादी वादी को कब्Sा दे+े की स्जिस्र्थीति में +हीं होगा और मसिSस्र्ट्रेर्ट उस पक्षकार क े खिलए क ु क— की अवति* क े दौरा+ कब्Sा *ारर्ण कर ा है Sो न्यायवि+र्ण:य+ पर अं ः इसका हकदार पाया Sा ा है।

617. विवति* में स्जिस्र्थीति को उपवर्भिर्ण कर+े क े पश्चा ् न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक वाद 4 क े वादपत्र में कोई प्रकर्थी+ 324 एआईआर 1966 एससी 359 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं है विक वाविदयों को संपखित्त से वंतिच विकया गया, Sो उ+क े पास पहले से र्थीी। इसक े विवपरी, दलील यह र्थीी विक मस्जिस्Sद क े अंदर मूर्ति यों रख+ा, अपविवत्र कर+े का एक काय: र्थीा सिSस+े वाविदयों क े पूSा कर+े क े अति*कार में हस् क्षेप विकया। इसक े अलावा वाविदयों द्वारा माँगा गया अ+ु ोष पूSा क े अति*कार को Sारी रख+े क े खिलए +हीं र्थीी, बस्जिल्क संरच+ा क े मस्जिस्Sद हो+े की उद्घोषर्णा क े खिलए र्थीा। विवद्वा+ न्याया*ीश +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक अणिभवच+ वाद को अ+ुच्छेद 142 क े अ*ी+ +हीं ला े क्योंविक वादपत्र क े प्रस् र 23 में अणिभवच+, विववाविद संपखित्त पर वादी क े कब्Sे को हर्टा+े या अवरूद्ध कर+े क े मामले को गविठ कर+े क े खिलए पया:प्त +हीं र्थीा। यह अणिभवि+*ा:रिर विकया गया र्थीा विक मस्जिस्Sद क े अंदर की मूर्ति यों को रख+े से कब्Sा हर्ट+ा या अवरूद्ध हो+ा गविठ +हीं हो ा क्योंविक ये अव*ारर्णा पहले से कब्Sे में रहे व्यविX क े पूरी रह से वंतिच कर+े पर विवचार कर ी है। यह अणिभवि+*ा:रिर विकया गया विक बा*ा या हस् क्षेप, कब्Sे से हर्टा+े या अवरूद्ध कर+े को गविठ +हीं कर ी है। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े उल्लेख विकया विक यविद वादी +े यह दलील +हीं दी र्थीी विक उन्हें हर्टा विदया गया र्थीा या यह विक उ+क े कब्Sे को स्पष्ट रूप से और स्पष्ट शब्दों में अवरूद्ध कर विदया गया र्थीा, ो न्यायालय क ु छ ऐसा पढ़कर वंतिच हो+े को प्रदा+ +हीं कर सक ी र्थीी Sो अणिभवच+ों में मौSूद +हीं र्थीा।

618. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक उपरोX कारर्णों से + ो अ+ुच्छेद 47 और + अ+ुच्छेद 142 की कोई प्रयोज्य ा है। अ+ुच्छेद 120 क े अन् ग: मामले पर विवचार कर े हुए विवद्वा+ न्याया*ीश +े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह उल्लेख विकया विक वाद हे ुक 23 विदसंबर 1949 और 29 विदसंबर 1949 को उत्पन्न हुआ र्थीा। यह वाद छः साल की परिरसीमा की अवति* से परे संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। इसखिलए अस्जिन् म +माS 16 या 23 विदसंबर 1949 को अदा की गई र्थीी या +हीं, इसका कोई परिरर्णाम +हीं होगा। सिSस ारीख को अंति म +माS अदा की गई र्थीी, वह क ु छ महत्व का हो ा, यविद अ+ुच्छेद 120 लागू +हीं हो ा। अ+ुच्छेद 142 और अ+ुच्छेद 144 क े लागू + हो+े की स्जिस्र्थीति में, अ+ुच्छेद 120 ही लागू होगा और वाद को परिरसीमा द्वारा बाति* हो+ा मा+ा गया र्थीा। इस विबन्दु पर विक क्या स अपक ृ त्य र्थीा, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक यविद पूSा क े अति*कार में बा*ा क े विवरूद्ध अ+ु ोष पा+े क े खिलए मुकदमा संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, ो यह संभव: परिरसीमा अति*वि+यम 1908 की *ारा 23 में स अपक ृ त्य क े सिसद्धां को आकर्मिष हो ी, विवशेष रूप से सर सेठ हुक ु म चंद ब+ाम महाराS बहादुर सिंसह325 में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य क े मद्दे+Sर। हालांविक वाद को पूSा क े अति*कार क े प्रव:+ क े खिलए +हीं बस्जिल्क मस्जिस्Sद क े रूप में विववाविद भव+ की प्रकृ ति क े बारे में स्जिस्र्थीति की उद्घोषर्णा प्राप्त कर+े और कब्Sा हक*ारी की क्षम ा में कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक स अपक ृ त्य और अपक ृ त्य क े स प्रभाव क े बीच अं र कर+ा होगा। वाविदयों द्वारा विदए गए थ्यों +े संक े विदया विक उन्हें 22/23 विदसंबर 1949 को विववाविद परिरसर से बाहर कर विदया गया र्थीा और संपखित्त से बेदखल हो े ही अपक ृ त्य पूरा हो गया र्थीा। इस आ*ार पर, विवद्वा+ न्याया*ीश +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक स अपकृ त्य का सिसद्धां 325 (1933) 38 एलर्डब्ल्यू 306 (पीसी) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आकर्मिष +हीं हुआ र्थीा। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक वादी का वि+ष्कास+ 23 विदसंबर, 1949 को मस्जिस्Sद क े अपविवत्रीकरर्ण से पूरा हो गया र्थीा और इसखिलए परिरसीमा क े प्रयोS+ क े खिलए वाद अ+ुच्छेद 120 द्वारा शासिस र्थीा। मुकदमे को परिरसीमा द्वारा बाति* मा+ा गया र्थीा। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े अणिभवि+*ा:रिर विकया विक वाद को *ारा 145 क े ह मसिSस्र्ट्रेर्ट द्वारा क ु क— क े बाद उद्घोषर्णा कर+े क े खिलए संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। उद्घोषर्णा की मांग कर+े वाला वाद स अपक ृ त्य क े सिसद्धां द्वारा शासिस +हीं र्थीा और राSा राSग+ महाराSा Sग Sी सिंसह ब+ाम राSा पर ब बहादुर सिंसह326 में विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:य क े मद्दे+Sर अ+ुच्छेद 120 लागू होगा। इसखिलए विवद्वा+ न्याया*ीश +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक + ो अ+ुच्छेद 142 और + ही अ+ुच्छेद 144 की कोई प्रयोज्य ा है। विवद्वा+ न्याया*ीश +े यह भी अणिभवि+*ा:रिर विकया विक यद्यविप यह वाद 1961 में संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, इसे 33 साल बाद (1995 में) कब्Sे की माँग क े खिलए और इसे अ+ुच्छेद 142 र्थीा 144 क े दायरे में ला+े क े खिलए संशोति* विकया गया र्थीा। इ+ आ*ारों पर वाद परिरसीमा द्वारा बाति* मा+ा गया र्थीा। न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े इसक े विवपरी अव*ारिर विकया और इस विवचार पर र्थीे विक वाद 4 परिरसीमा क े अ*ी+ र्थीा। विवद्वा+ न्याया*ीश +े यह अणिभवि+*ा:रिर कर+े क े पांच कारर्ण दर्भिश विकए विक वाद 3, 4, और 5 परिरसीमा द्वारा बाति* +हीं र्थीे सिSन्हें पहले ही संदर्भिभ विकया Sा चुका है। 326 एआईआर 1942 पीसी 47 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस प्रकार, बहुम से (न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल और न्यायमूर्ति र्डी वी शमा:) द्वारा वाद को परिरसीमा द्वारा बाति* मा+ा गया र्थीा; न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े इस मुद्दे पर विवपरी विवचार अव*ारिर विकया। अति*वXा क े क:

619. इस न्यायालय क े समक्ष बहस क े दौरा+, वाद 5 में वाविदयों की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े. परासर+ +े कहा विक वाद 4 क े वल परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 120 द्वारा शासिस होगा और यह विक + ो अ+ुच्छेद 142 और + ही अ+ुच्छेद 144 लागू होंगे। इस क: को वि+म्+खिलखिख प्रस्र्थीाप+ाओं क े आ*ार पर समर्भिर्थी कर+े की मांग की गई है: (i) वाद 4 में मांगा गया प्रार्थीविमक अ+ु ोष (प्रार्थी:+ा (क)) इस उद्घोषर्णा क े खिलए है विक विववाविद संपखित्त एक साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है और अ ः वाद में पूSा क े अति*कार क े प्रव:+ क े खिलए उद्घोषर्णा +हीं माँगी गयी है;

(ii) Sब *ारा 145 क े अ*ी+ क ु क: की गइ: संपखित्त क े हक की उद्घोषर्णा क े खिलए वाद दायर विकया Sा ा है ो कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए आगे अ+ु ोष की मांग कर+ा आवश्यक +हीं है चूंविक प्रति वादी का कब्Sा +हीं है और वह कब्Sा दे+े की स्जिस्र्थीति में +हीं है। विवति* की अणिभरक्षा में हो+े से क ु क: की गयी संपखित्त का कब्Sा रिरसीवर उस व्यविX को दे+े क े खिलए बाध्य है सिSसका दीवा+ी न्यायवि+र्ण:य+ क े परिरर्णामस्वरूप हकदार हो+ा अणिभवि+*ा:रिर विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) कब्Sे की मांग कर+े की प्रार्थी:+ा आवश्यक +हीं र्थीी चूंविक संपखित्त विदसंबर 1949 से विवति* की अणिभरक्षा में र्थीी और प्रार्थी:+ा क े वल अ+ुच्छेद 120 द्वारा लगाए गए छह वषÂ की परिरसीमा की अवति* को रोक+े क े खिलए की गई र्थीी; (iv) परिरसीमा का का+ू+ विवश्राम(रोक+े) का का+ू+ हैं; (v) अ+ुच्छेद 120 क े अन् ग: छह वष: की अवति* की संगर्ण+ा उस ारीख से की Sा+ी चाविहए Sब वाद संस्जिस्र्थी कर+े का अति*कार प्रोद्भू हो ा है और वाद में प्राख्याविप विकए गए अति*कार क े प्रोद्भू हो+े और अति*कार का उल्लंघ+ कर+े का स्पष्ट व असंविदग्* आशय हो+े पर, वाद संस्जिस्र्थी कर+े का कोई अति*कार +हीं है; (vi) वादपत्र क े प्रस् र 23 में यर्थीा अणिभवतिच विकए गए वाद हे ुक 23 विदसंबर 1949 को ब उत्पन्न हुए कहे गए हैं Sब विहन्दूओं +े अविवति*पूर्ण: रूप से मस्जिस्Sद में प्रवेश विकया और मूर्ति यों को अंदर रखकर उसे अपविवत्र विकया और इस प्रकार मुस्जिस्लमों को +माS कर+े में बा*ा र्डाली; (vii) वाविदयों का मामला यह है विक पहुँचायी गयी क्षति स प्रक ृ ति की र्थीी + विक अपक ृ त्य र्थीी, Sो अपविवत्रीकरर्ण की ारीख को पूर्ण: हुई र्थीी। परिरसीमा क े वS:+ को यह अणिभकणिर्थी करक े दूर कर+े की मांग की गयी है विक वाद हे ुक स अपक ृ त्य हो+े क े कारर्ण +वीक ृ हो Sा ा है। (viii) व:मा+ मामले में, स अपक ृ त्य का कोई प्रश्न ही +हीं हो सक ा चूंविक संपखित्त विवति* की अणिभरक्षा में र्थीी। इसखिलए यहां क विक यह मा++ा (विब+ा स्वीकार विकए) विक क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे मूर्ति यों को रख+ा एक स अपक ृ त्य र्थीा, यह संपखित्त की क ु क— पर ही खत्म हो गया; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ix) मूर्ति यों को आं रिरक अहा े में रखे Sा+े पर वाद हे ुक उत्पन्न हुआ। यह *ारा 145 क े ह काय:वाविहयों क े पूव: भी उद्भू हुआ र्थीा और इसखिलए यह थ्य विक मसिSस्र्ट्रेर्ट +े कोई अंति म आदेश पारिर +हीं विकया है, परिरसीमा क े चल+े को +हीं रोक े गा। विवश्लेषर्ण

620. परिरसीमा अति*वि+यम 1908 और इसक े बाद का परिरसीमा अति*वि+यम 1963, दो+ों विवश्राम(रोक) क े क़ा+ू+ हैं। परिरसीमा क े विवस् ार या अपवाद विवति* में वि+*ा:रिर हैं। इ+ प्राव*ा+ों क े अन् ग: वि+म्+ हैं: (i) *ारा 4-11 (भाग II) (ii) *ारा 12-25 (भाग III) परिरसीमा अवति* की संगर्ण+ा से संबंति* हैं; (iii) *ारा 26 (20 वष: में सुखाचार क े अति*कार का अS:+); और (iv) *ारा 27 (अ+ुसेवी संपखित्त क े उत्तरभोगी क े खिलए 20 वष: का उपां रर्ण)। अ+ुच्छेद 47

621. परिरसीमा अति*वि+यम 1908 का अ+ुच्छेद 47, दंर्ड प्रविक्रया संविह ा 1898 या मामल दार न्यायालय अति*वि+यम 1906 क े ह "अचल संपखित्त क े कब्Sे का सम्मा+ कर े हुए" विदए गए आदेश से बाध्य विकसी व्यविX द्वारा या ऐसे व्यविX क े अ*ी+ आदेश में संपखित्त क े प्रत्युद्धरर्ण क े खिलए दावा कर+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाले विकसी व्यविX द्वारा दायर विकए गए वाद पर लागू हो ा है। परिरसीमा की अवति* ी+ साल है और वाद में अंति म आदेश की ारीख से समय चल+ा शुरू हो ा है। अ+ुच्छेद 47 को लागू कर+े क े खिलए, वाद को पहले कॉलम में वि+र्मिदष्ट विववरर्ण को पूरा कर+ा होगा। दूसरे शब्दों में, अ+ुच्छेद 47 क े वल उस स्जिस्र्थीति में लागू हो ा है Sहां मसिSस्र्ट्रेर्ट +े अचल संपखित्त क े कब्Sे का सम्मा+ कर े हुए एक आदेश पारिर विकया है। Sब अचल संपखित्त क े कब्Sे क े संबं* में कोई आदेश पारिर +हीं विकया गया है, Sो *ारा 145 क े ह काय:वाही का विवषय है, ो वाद पहले कॉलम में वि+र्मिदष्ट विववरर्ण का +हीं होगा। यह क े वल भी होगा यविद मसिSस्र्ट्रेर्ट +े ऐसा आदेश पारिर कर विदया है विक वाद वि+र्मिदष्ट विववरर्ण को पूरा करेगा और ऐसी स्जिस्र्थीति में अ+ुच्छेद 47 शासिस होगा। हालांविक क ु क— क े आदेश से व्यणिर्थी व्यविX अप+े अति*कार की उद्घोषर्णा क े खिलए वाद दायर कर सक ा है, यद्यविप अ+ुच्छेद 47 आकर्मिष +हीं हो ा है। दीवा+ी न्यायालय द्वारा अति*कार क े वि+*ा:रर्ण पर, वह कब्Sे का हकदार ब+ Sाएगा और मसिSस्र्ट्रेर्ट बाध्य है विक वह दीवा+ी न्यायालय क े आदेश क े अ+ुसार कब्Sा सौंप दे। व:मा+ मामले में *ारा 145 क े ह कब्Sे का सम्मा+ कर+े वाले विकसी भी आदेश की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, अ+ुच्छेद 47 की इसक े सरल शब्दों में कोई प्रयोज्य ा +हीं है। अ+ुच्छेद 120, 142, 144

622. क: का अगला भाग सिSसक े आ*ार पर परिरसीमा वS:+ का आ£ह विकया गया है, वह यह है विक वाद 4, अ+ुच्छेद 120 द्वारा शासिस है। अब mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ+ुच्छेद 120 उ+ वादों पर विवचार कर ा है सिS+क े खिलए अ+ुसूची में अन्यत्र परिरसीमा की कोई अवति* +हीं दी गई है। अ+ुच्छेद 120 अवणिशष्ट उपबं* की प्रक ृ ति का है। इसखिलए Sहां अ+ुसूची में एक विवणिशष्ट अ+ुच्छेद लागू हो ा है, ो अवणिशष्ट अ+ुच्छेद की संभव ः कोई प्रयोज्य ा +हीं हो सक ी है और यह क े वल ब हो ा है Sब वाद विकसी अन्य अ+ुच्छेद में वि+र्मिदष्ट विववरर्ण क े भी र +हीं आ ा है ो अवणिशष्ट प्राव*ा+ लागू होगा।

623. वाविदयों की ओर से सिS+ दो विवरो*ी अ+ुच्छेदो पर बल विदया गया है, वे अ+ुच्छेद 142 और वैकस्जिल्पक रूप से अ+ुच्छेद 144 हैं। अ+ुच्छेद 142 अचल संपखित्त क े कब्Sे क े खिलए वाद को कवर कर ा है Sब वादी को संपखित्त क े कब्Sे से बेदखल कर विदया गया हो या कब्Sे को अवरूद्ध कर विदया गया हो। बेदखली अस्वैस्जिच्छक प्रक ृ ति क े एक काय: को उप*ारिर कर ा है Sबविक अवरूतिद्ध अति*कांश ः कब्Sे की स्वैस्जिच्छक अणिभत्यS+ की प्रक ृ ति है। व:मा+ मामले में, वाद 4 में वादी +े एक उद्घोषर्णा की माँग की है विक अक्षर ए बी सी र्डी द्वारा इंविग संपखित्त एक साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है और ई एफ Sी एच द्वारा दशा:यी गयी भूविम एक मुस्जिस्लम कविब्रस् ा+ है। इसक े अलावा वाविदयों +े कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए प्रार्थी:+ा की है, यविद अदाल इस रह क े अ+ु ोष को उतिच समझ ा हो।

624. सिSस आ*ार पर यह कहा गया है विक वाद 4 कब्Sे का वाद +हीं है, वह यह है विक इस अदाल +े देवक ु अर ब+ाम णिशवप्रसाद सिंसह327 में अणिभवि+*ा:रिर विकया गया है विक Sहाँ संपखित्त विवति* की अणिभरक्षा में है, ो कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए एक स्व ंत्र प्रार्थी:+ा कर+ा आवश्यक +हीं है। 327 एआईआर 1966 एससी 359 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसखिलए यह आ£ह विकया गया है विक चूंविक कब्Sे की मांग क े खिलए एक विवणिशष्ट प्रार्थी:+ा आवश्यक +हीं र्थीी, प्रार्थी:+ा (ख) वि+रर्थी:क है और वाद की प्रक ृ ति को क े वल प्रार्थी:+ा (क) क े संदभ: में न्यायवि+र्ण- विकया Sा+ा चाविहए। कÂ को स्वीकार +हीं विकया Sा सक ा है। देवक ु अर क े वाद में इस न्यायालय का वि+र्ण:य यह प्रति पाविद कर ा है विक Sहाँ संपखित्त विवति* की अणिभरक्षा में है, हक की उद्घोषर्णा की माँग कर+ा पया:प्त है। ऐसा इसखिलए है क्योंविक रिरसीवर Sो न्यायालय का एक अति*कारी है, उस पक्षकार क े खिलए संपखित्त *ारिर करेगा, Sो न्यायवि+र्ण:य+ क े बाद कब्Sे का हकदार पाया Sा ा है। चूंविक रिरसीवर उस व्यविX को कब्Sा सौप+ें क े खिलए क:व्यबद्ध होगा सिSसे न्यायालय द्वारा संपखित्त का हकदार हो+ा अणिभवि+*ा:रिर विकया गया है, कब्Sे की मांग क े खिलए एक औपचारिरक प्रार्थी:+ा आवश्यक +हीं है। लेविक+ यह दलील इसकी चूक कर ा है विक कब्Sा का अ+ु ोष माँग े हुए विकया गया वाद में पोषर्णीय ा का अभाव हो+ा अणिभवि+*ा:रिर +हीं विकया गया है। हक की उद्घोषर्णा ही पया:प्त है क्योंविक एक बार संपखित्त विवति* की अणिभरक्षा में हो Sा ी है ो कब्Sा आवश्यक रूप से न्यायालय द्वारा विदए गए न्यायवि+र्ण:य+ पर उद्घोषर्णा की मंSूरी का अ+ुसरर्ण करेगा। इसखिलए कब्Sे का अ+ु ोष विववतिक्ष है। यह *ारिर कर+ा विक Sहाँ संपखित्त विवति* की अणिभरक्षा में है, इस प्रक ृ ति का वाद संभव ः कब्Sे क े खिलए वाद हो+ा अणिभवि+*ा:रिर +हीं विकया Sा सक ा, इसखिलए यह ऐसा क: है सिSसका कोई वै* आ*ार +हीं है।

625. यह क: विक वाद 4 परिरसीमा द्वारा वर्जिS है, वि+म्+खिलखिख परिरकल्प+ाओं पर आ*ारिर है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) संपूर्ण: संपखित्त Sो वाद की विवषय -वस् ु है, वह *ारा 145 क े ह काय:वाही क े परिरर्णामस्वरूप विवति* की अणिभरक्षा में र्थीी; (ii) एक बार संपखित्त विवति* की अणिभरक्षा में हो Sा ी है, ो उद्घोषर्णा क े खिलए वाद पया:प्त होगा और कब्Sे क े अ+ु ोष की माँग कर+े की कोई आवश्यक ा +हीं है; (iii) कब्Sे क े परिरदा+ क े खिलए एक तिर्डक्री की मांग कर े हुए यह प्रार्थी:+ा (ख) विक "यविद इसे आवश्यक मा+ ी हो," यह वि+रर्थी:क है; और (iv) परिरर्णाम ः कब्Sे क े खिलए प्रार्थी:+ा क े अभाव में, वाद क े वल मस्जिस्Sद की प्रक ृ ति की घोषर्णा कर+े क े खिलए है और इसखिलए परिरसीमा अति*वि+यम 1908 क े अ+ुच्छेद 120 द्वारा शासिस है। उपरोX क: का मूल आ*ार यह है विक आं रिरक और बाहरी अहा े सविह संपखित्त संपूर्ण: ः विवति* की अणिभरक्षा में र्थीी और रिरसीवर क े सुरक्षात्मक कु क— क े अ*ी+ र्थीी। हालाँविक थ्य क े मामले क े रूप में, 18 विदसंबर 1961 को Sब मुकदमा संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा, ो *ारा 145 क े ह पारिर आदेशों क े अ+ुसरर्ण में क े वल आं रिरक अहा े को कु क: विकया गया र्थीा। बाहरी अहा े को क े वल 1982 में रिरसीवर क े अ*ी+ रखा गया र्थीा। वाद 4 में विववाद की विबषयवस् ुवाद वि+म्+ र्थीी: (क) आं रिरक अहा ा, Sो *ारा 145 क े अ*ी+ क ु क: विकया गया र्थीा; (ख) बाहरी अहा ा, Sो क ु क: +हीं विकया गया र्थीा; और (ग) आसन्न कविब्रस् ा+ Sो क ु क: +हीं विकया गया र्थीा।

626. वाद 4 दो+ों ही क्षेत्रों से संबंति* र्थीा, वे Sो *ारा 145 क े ह क ु क: विकए गए र्थीे और वे क्षेत्र Sो स्पष्ट रूप से कु क— की विवषय -वस् ु +हीं र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरर्णामस्वरूप वाद में माँगी गयी घोषर्णा क े वल उस भूविम क े संबं* में +हीं र्थीी Sो क ु क— क े आदेश क े दायरे में आ ी र्थीी। अ+ु ोष वि+म्+ क े संबं* में माँगा गया र्थीा: (क) साव:Sवि+क मस्जिस्Sद क े रूप में अक्षर ए बी सी र्डी द्वारा वर्भिर्ण संपखित्त (आं रिरक और बाहरी अहा े सविह ) और अक्षर ई एफ Sी एच द्वारा तिचवि- कविब्रस् ा+ की उद्घोषर्णा; और (ख) ए बी सी र्डी क े रूप में तिचवित्र मस्जिस्Sद क े क्षेत्र का कब्Sा। इसक े अलावा, यह ध्या+ विदया Sा+ा चाविहए विक प्रार्थी:+ा (खख) को पूरी मस्जिस्Sद क े विवध्वंस क े परिरर्णामस्वरूप एक संशो*+ क े माध्यम से लाया गया र्थीा और दावा विकया गया अ+ु ोष वै*ावि+क रिरसीवर क े विवरूद्ध र्थीा सिSसे इस्माइल फारूखी में वि+र्ण:य क े परिरर्णामस्वरूप वि+युX विकया गया र्थीा। उपरोX स्जिस्र्थीति क े मद्दे+Sर, यह स्पष्ट हो Sा ा है विक प्रार्थी:+ा (ख) में माँगा गया कब्Sे का अ+ु ोष क े वल कु क— क े अ*ी+ आ+े वाली संपखित्त क े क्षेत्र क े खिलए ही +ही र्थीा, बस्जिल्क उस क्षेत्र क े खिलए भी है Sो कु क— की विवषय -वस् ु +हीं र्थीी। इस स्जिस्र्थीति क े कारर्ण परिरसीमा क े वS:+ का आह्वाह+ कर+े वाले क: का संपूर्ण: आ*ार त्रुविर्ट से £स् है और इसे स्वीकार +हीं विकया Sा सक ा है।

627. वादपत्र में वादी की णिशकाय यह र्थीी विक उ+का विववाविद भूविम पर कब्Sा र्थीा और उ+क े द्वारा 23 विदसंबर 1949 क वहां पर प्रार्थी:+ा विकया गया। 23 विदसंबर 1949 को यह आरोप लगाया गया विक हिंहदुओं +े मस्जिस्Sद क े अंदर ही प्रति माएं स्र्थीाविप की, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप मस्जिस्Sद को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपविवत्र हो गया। विवशेष रूप से यह दलील देकर विक वादी कब्Sे में र्थीे और एक विवशेष ारीख क प्रार्थी:+ाओं विकये र्थीे, अ+ुक्रमक ा: यह है विक उस ारीख क े बाद, वादी कब्Sे में +हीं रहे। यह स्जिस्र्थीति हो+े क े +ा े, यह स्पष्ट हो Sा ा है विक *ारा 145 क े ह क ु क— क े बाद संपखित्त विवति* क े अ*ी+ Sा+े से पहले ही वादी को कब्Sे से बाहर कर विदया गया र्थीा। इसक े पीछे की यह इस पृष्ठभूविम में र्थीी, विक प्रार्थी:+ा (अ) में, वादी +े मस्जिस्Sद की प्रक ृ ति क े संबं* में एक साव:Sवि+क मस्जिस्Sद क े रूप में घोविष विकये Sा+े की मांग की और प्रार्थी:+ा (ब) आवश्यक ा पर कब्Sे की मांग की गयी। इस रह की श Â में अ+ु ोष क े खिलए प्रार्थी:+ा कर+ा अणिभवच+ों की विवति* क े खिलए अज्ञा +हीं है। उदाहरर्ण क े ौर पर सी. +र्टराS+ ब+ाम आणिशम बाई328 328 ऐसा मामला र्थीा, Sहां वि+म्+खिलखिख श Â में अ+ु ोष को सूत्रबद्ध विकया गया र्थीा: "2. अपीलक ा: +े वि+म्+खिलखिख अ+ु ोष प्रदा+ विकये Sा+े क े खिलए अन्य बा ों क े सार्थी प्रत्यर्भिर्थीयों क े विवरूद्ध मुकदमा दायर विकया है: "(क) वाद संपखित्त में वादी क े स्वत्व को घोविष कर+े क े खिलए; (ख)परिरर्णामी वि+षे*ाज्ञा क े खिलए, प्रति वाविदयों पर रोक लगाकर, उ+क े लोगों, एSेंर्टों, +ौकरों आविद को विकसी भी रह से वादी क े शांति पूर्ण: कब्Sे और वाद की संपखित्त की सम्पखित्त क े भोग कर+े से रोक+ा हस् क्षेप कर+े से रोक+ा।

328. (2007) 14 एस.सी.सी. 183 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ग) वैकस्जिल्पक रूप से, यविद विकसी कारर्ण से यह मा++ीय न्यायालय इस वि+ष्कष: पर पहुंच ा है विक वादी क े कब्Sे से बाहर है, ो सूर्ट की संपखित्त क े खाली कब्Sे की वसूली क े खिलए। (घ) इस वाद व्यय क े भुग ा+ क े खिलए प्रति वादी को वि+द†णिश कर+ा. सिस.प्र.सं. क े आदेश VII वि+यम 11 क े ह वादपत्र को अस्वीक ृ ति विकये Sा+े क े आवेद+ से उत्पन्न काय:वाही में न्यायालय +े *ारिर विकया विक इस रूप में दायर कोई यातिचका अति रिरX अ+ु ोष को अमान्य +हीं ब+ा देगी। न्यायालय +े अवलोक+ विकया: "14. यविद वादी को कब्Sा वापस विदलाया Sा+ा हो ो मुकदमा 12 साल की अवति* क े भी र दायर विकया Sा सक ा है। पक्षकारों द्वारा प्रस् ु साक्ष्य क े देख+ा क े बाद यह कह+ा एक बा है विक इस रह की राह दी Sा सक ी है या +हीं, लेविक+ यह कह+ा दूसरी बा है विक वादपत्र इस आ*ार पर खारिरS कर विदया Sाएगा विक यह विकसी भी का+ू+ द्वारा बाति* है। वादी क े शीष:क की घोषर्णा क े परिरर्णामस्वरूप Sो मुकदमा दायर विकया गया है, उसमें अ+ुच्छेद 58 विकसी भी प्रकार से लागू +हीं होगा।" इस परिरस्जिस्र्थीति यों में वाद अचल संपखित्त क े कब्Sे का वाद है Sो अ+ुच्छेद 142 क े पहले स् ंभ में विदए गए विववरर्ण क े ह आ ा है। यह मुकदमा 23 विदसंबर 1949 को कणिर्थी बेदखली की ारीख क े बारह साल की अवति* क े भी र संस्जिस्र्थी विकया गया है और इसखिलए परिरसीमा क े भी र है। उX क े दृविष्टग यह मुद्दा विक क्या वि+रं र का मामला स्र्थीाविप विकया गया उसका कोई महत्व +हीं है। इस आ*ार पर विक वादहे ुक 23 विदसंबर 1949 को पूरा विकया गया र्थीा, यह स्पष्ट है विक वादपत्र को बेदखली की ारीख से बारह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साल की अवति* क े भी र संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। क्या वि+रं र अपकृ त्य क े विवपरी वि+रं र क्षति र्थीी इसखिलए मामले क े उपरोX दृविष्टकोर्ण में उत्पन्न +हीं हो ा है।

628. श्री परासर+ +े कर्थी+ विकया है विक यह वाद विवणिशष्ट अ+ु ोष अति*वि+यम 1877 की *ारा 42 क े ह संपखित्त क े प्रक ृ ति की घोषर्णा विकये Sा+े क े खिलए र्थीा + विक सम्पखित्त क े स्वत्व क े खिलए। विवद्वा+ अति*वXा +े कर्थी+ विकया विक प्रार्थी:+ा (अ) इस घोषर्णा से संबंति* है विक वादपत्र से संलग्न +क्शा सिSसमें सम्पखित्त ए, बी, सी, र्डी, क े रूप में वर्भिर्ण है वह साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है। इस आ*ार पर, यह आ£ह विकया गया है विक प्रार्थी:+ा (अ) स्वत्व की घोषर्णा +हीं है। कर्थी+ में गुर्णागुर्ण का आभाव है। प्रार्थी:+ा (अ) + क े वल मस्जिस्Sद की विववाविद संरच+ा की घोषर्णा क े मांग क े संबं* में है, बस्जिल्क उस भूविम क े संबं* में भी है Sो इसक े खिलए उपयुX र्थीी। यह यर्थीा संशोति* वादपत्र क े पैरा 21 बी से भी स्पष्ट है Sो 6 विदसंबर 1992 को मस्जिस्Sद क े विवध्वंस क े परिरर्णाम से संबंति* है। वादपत्र क े अ+ुच्छेद 21 बी में Sो दलील दी गयी वह यह है विक ढ़ांचे को विगराये Sा+े क े बावSूद, उस भूविम की प्रक ृ ति मस्जिस्Sद क े रूप में ब+ी रही।

629. वादी द्वारा स्र्थीाविप वादहे ुक यह र्थीा विक मुसलमा+ों का मस्जिस्Sद में शांति पूर्ण: कब्Sा र्थीा और 23 विदसंबर 1949 क इसमें +माS पढ़ े र्थीे, Sब हिंहदुओं की भीड़ +े मस्जिस्Sद को +ष्ट कर+े, क्षति पहुंचा+े अर्थीवा इसे दूविष कर+े क े इरादे से इसमें प्रवेश विकया और इसक े अंदर मूर्ति स्र्थीाविप कर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मस्जिस्Sद को अपविवत्र कर विदया। इस प्रकार वादपत्र का प्रस् र 11 में यह दर्भिश है विक वादी का मामला यह है विक 23 विदसंबर 1949 मस्जिस्Sद में प्रवेश कर उसमें मूर्ति स्र्थीाविप कर+े का आशय मस्जिस्Sद को दूविष कर+ा, ोड़+ा, और उसकी प्रक ृ ति को +ष्ट कर+ा र्थीा और इस काय: से मस्जिस्Sद अपविवत्र हो गयी। इसक े अलावा, यह उस संदभ: में है विक प्रस् र 23 में दलील यह है विक वाद हे ुक 23 विदसंबर 1949 को उत्पन्न हुआ Sब मस्जिस्Sद को दूविष विकया गया र्थीा और मुसलमा+ों द्वारा पूSा में व्यव*ा+ पहुंचाया गया र्थीा। अणिभलेख पर मौSूद साक्ष्य ब ा े हैं विक 23 विदसंबर 1949 को मूर्ति यों को मस्जिस्Sद में रख+े क े बाद, मस्जिस्Sद क े परिरसर क े भी र पुSारी द्वारा मूर्ति यों की पूSा की गई र्थीी। इसखिलए, अ+ुच्छेद 11 में यातिचका क े वल 23 विदसंबर 1949 क े बाद मस्जिस्Sद में +माS अदा कर+े में मुसलमा+ों की बा*ा में से एक +हीं है, बस्जिल्क उस ारीख से प्रभावी एक फ ै लाव है।

630. 29 विदसंबर 1949 को *ारा 145 क े ह Sारी प्रारंणिभक आदेश द्वारा आं रिरक संरच+ा को क ु क: कर 5 S+वरी 1950 को रिरसीवर को सौंप विदया गया। वादी क े वादपत्र से यह स्पष्ट है विक प्रस् र 11 और 23 में Sो क ु छ भी कहा गया है, वह मस्जिस्Sद परिरसर में मूर्ति यां रख मुस्जिस्लमों द्वारा की Sा रही इबाद में बा*ा मात्र है। मुसलमा+ों का मामला यह र्थीा विक मूर्ति यों की रखे Sा+े से मस्जिस्Sद दूविष और अपविवत्र हो गयी। इसक े अलावा, यह थ्य विक मूर्ति यों क े रखे Sा+े क े बाद मस्जिस्Sद क े परिरसर क े भी र क े वल हिंहदुओं द्वारा की Sा रही पूSा मुस्जिस्लम क े बेकब्Sा को दर्भिश कर ी है। इस मामले का एक महत्वपूर्ण: पहलू यह है विक यह घर्ट+ा 22 या23 विदसंबर 1949 को घविर्ट हुई mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिSससे वादीगर्ण मस्जिस्Sद से बेदखल हो गये। इसखिलए, वादपत्र को वादपत्र क े रूप में पढ़+े से क े वल इबाद में बा*ा का प ा चल ा है और मुसलमा+ों क े वि+ष्कास+ क े विवरूद्ध परिरवाद कह+ा गल होगा। वास् व में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े विवचारर्ण क े दौरा+ उसिल्लखिख विकया विक 23 विदसंबर 1949 को मुसलमा+ों को वि+ष्कासिस कर विदया र्थीा। प्रस् र 2439 में, न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े इस प्रकार अवलोक+ विकया: "...मामले में, वादी +े सिS+ थ्यों का अणिभवच+ विकया उ+से यह दर्भिश हो ा है विक वे 23 विदसंबर, 1949 को विववाविद परिरसर से बेदखल हो गये र्थीे और उस पर अपक ृ त्य हुआ इसक े बाद से उन्हें विववाविद संपखित्त से पूरी रह से इस आ*ार पर बेदखल कर विदया गया विक उ+क े पास स्वत्व का आभाव है।" इसी रह का अवलोक+ प्रस् र 2443 में वि+विह है Sहां यह उसिल्लखिख विकया गया है: "... र्डी.22/23 विदसंबर, 1949 की रा को Sब मूर्ति यां क ें ˆीय गुंबद क े अन्दर रखी गई र्थीीं और मुसलमा+ों को विववाविद संपखित्त से बाहर कर हिंहदुओं द्वारा वि+यविम रूप से शास्त्रीय विवति*यों से पूSा प्रारम्भ हो गयी।" विवद्वा+ न्याया*ीश क े यह वि+ष्कष: उ+क े पूव: अवलोक+ क े सार्थी असंग हैं विक कब्Sे से बेदखल +हीं विकया गया र्थीा, बस्जिल्क पूSा में बा*ा अर्थीवा हस् क्षेप मात्र र्थीा। 22/23 विदसंबर, 1949 को मध्य गुंबद क े +ीचे प्रति माओं को रख+े क े क ृ त्य से मस्जिस्Sद दूविष हो गयी। सबू ब ा े हैं विक मूर्ति यों की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्र्थीाप+ा क े बाद मस्जिस्Sद क े भी र हिंहदू प्रार्थी:+ा और पूSा शुरू हो गयी। यह कब्Sे से बेदखली र्थीी।

631. इस स्जिस्र्थीति में उच्च न्यायालय अ+ुच्छेद 120 क े उपबं*ों को लागू कर+े में गल ी पारिर विकया। वाद सम£ रूप से और सार ः अ+ुच्छेद 142 द्वारा शासिस र्थीा। यद्यविप अंति म +माS 16 विदसंबर 1949 को अदा की गई र्थीी विफर भी उस विद+ बेदखली की काय:वाही +हीं की गयी र्थीी। अगले शुक्रवार 23 विदसंबर 1949 को +माS अदा की गयी होगी और उस ारीख को बेदखली की कार:वाही की की गयी और ब मस्जिस्Sद अपविवत्र हो गयी। 18 विदसंबर 1961 को Sो मुकदमा दायर विकया गया र्थीा, वह 23 विदसंबर 1949 से 12 साल की अवति* क े भी र र्थीा और इसखिलए परिरसीमा अवति* क े भी र र्थीा। अ+ेक उच्च न्यायालय का यह दृविष्टकोर्ण विक वाद 4 परिरसीमा अवति* द्वारा बाति* है वह गल है। वाद 4 परिरसीमा अवति* क े भी र र्थीा। वैकस्जिल्पक रूप से, भले ही यह मा+ा Sा ा है विक वादी का आं रिरक आंग+ में पूर्ण: रूप से कब्Sा +हीं र्थीा विफर भी वाद अवणिशष्ट अ+ुच्छेद 144 क े ह आएगा और वाद परिरसीमा काल क े भी र है। O.[5] अ+ुप्रयोज्य विवति*क व्यवस्र्थीा और न्याय, साम्या एवं सद्विववेक

632. व:मा+ मामले क े थ्य ी+ श ास्जिब्दयों से चले आ रहें हैं। मौखिखक कÂ क े दौरा+, इस न्यायालय का ध्या+ सोलहवीं और सत्रहवीं श ाब्दी में सम्रार्ट बाबर क े Sीव+ को अणिभखिलखिख कर+े वाले खिलखिख विववरर्णों में समय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर वापस लाया गया र्थीा। इति हास क े पन्नों से परे ले Sाकर न्यायालय क े समक्ष पुरा ास्जित्वक साक्ष्य का अवलम्ब खिलया गया है। विववाविद भूविम पर अप+े अति*कारों को स्र्थीाविप कर+े की मांग कर पक्षकारों +े उत्पखित्त क े विबन्दु को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए मा+व इति हास की की ओर रुख विकये Sहां पर विववाविद संपखित्त पर एक पक्ष का दावा वि+र्मिवरो* र्थीाः प्रर्थीम अति*कार और प्रर्थीम अपक ृ त्य को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए। विववाविद स्र्थील पर एक हSार वषÂ से चल रहे प्रार्थी:+ा, प्रति वाद, वि+मा:र्ण और विवध्वंश से उत्पन्न का+ू+ी परिरर्णामों को वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए इस अदाल से मांग की गयी।

633. इस अवति* क े दौरा+, विववाविद संपखित्त विवणिभन्न शासकों और विवति* व्यवस्र्थीा क े अ*ी+ रही है। यह प्रश्न ऐति सिसक महत्व का है विक सिSस पक्षकार, राSा अर्थीवा *म: का उस विववाविद स्र्थील पर प्रर्थीम दावा र्थीा। लेविक+ इस न्यायालय को यह वि+*ा:रिर कर+ा चाविहए विक इस रह की Sांच से उत्पन्न विवति*क परिरर्णाम क्या हैं?मा+व इति हास शासकों और शास+ ंत्रों क े उत्र्थीा+ और प + का प्रमार्ण है। विवति* का उपयोग पीछे Sाकर उ+ व्यविXयों को उपचार प्रदा+ कर+े की युविX क े ौर पर +हीं हो+ा चाविहए Sो इति हास की घर्ट+ा से असहम हैं। व:मा+ में अदाल ें ऐति हासिसक अति*कारों और अपक ृ त्यों का संज्ञा+ ब +हीं ले सक ी हैं Sब क विक यह +हीं विदखाया Sा ा है विक व:मा+ में उ+क े विवति*क परिरर्णाम प्रव:+ीय हैं। इस प्रकार, इससे पहले विक यह न्यायालय एक लंबी ऐति हासिसक Sांच शुरू करे, यह विवचार कर+ा महत्वपूर्ण: है विक विवति*क व्यवस्र्थीा क े ह विकस सीमा क mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA काय: विकया गये हैं और अति*कारों को प्राप्त विकया गया है सिS+का व:मा+ विवति* क े ह विवति*क परिरर्णाम वि+कल ा है।

634. व:मा+ मामले से संबंति* थ्य चार अलग-अलग विवति*क व्यवस्र्थीा क े ह आ े हैं: (i) 1525 से पूव: क े राS ंत्र द्वारा बारहवीं श ाब्दी क े पहले प्राची+ आ*ारभू ढ़ांचा का वि+मा:र्ण विकया विकया Sा+ा अणिभकणिर्थी है। (ii)1525 से 1856 क े मुगल शास+ बीच, सिSसक े दौरा+ विववाविद स्र्थील पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा; (iii) 1856 से 1947 क े मध्य विववाविद संपखित्त औपवि+वेणिशक शास+ क े अ*ी+ आयी; और (iv)1947 की अवति* क े बाद स्व ंत्र भार में व:मा+ ति णिर्थी क।

635. वाद 5 में Sो वादीगर्ण है उ+की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री वैद्य+ार्थी+ +े विववाविद संपखित्त क े +ीचे एक प्राची+ हिंहदू संरच+ा की मौSूदगी पर बल विदया। अति*वXा +े क: विदया विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में इस ढांचे क े ध्वंशावशेष का उपयोग विकया गया र्थीा। विहन्दू महाभा की ओर से उपस्जिस्र्थी विवद्वा+ अति*वXा श्री एच. एस. Sै+ +े कहा विकया विक Sब बाबर +े भार पर आक्रमर्ण विकया ो अयोध्या में अयोध्या में विवक्रमाविदत्य द्वारा वि+र्मिम मंविदर सविह कई मंविदर +ष्ट कर विदये गये। उन्हों+े कर्थी+ विकया विक मुगल काल क े दौरा+, Sो अब 'भार 'क े रूप में Sा+ा Sा+ा Sा ा है 'विवदेशी'अति*भोग क े अ*ी+ र्थीा-हिंहदुओं को अप+े *ार्मिमक अति*कारों का प्रयोग कर+े की अ+ुमति +हीं र्थीी और अब चूंविक भार का संविव*ा+ अंगीकृ हो चुका है इसखिलए मुगलों द्वारा Sो गल काय: विकये गये हैं उसको सु*ारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा सक ा है। इ+ कÂ को महत्व दे+े क े खिलए यह समझ+ा आवश्यक है विक हमारी विवति* विकस हद क पूव: विवति*क व्यवस्र्थीा ह प्राप्त अति*कारों और विकये गये कायÂ से उपSे विवति*क परिरर्णामों को मान्य ा प्रदा+ कर ा है। राज्य क े अति*वि+यमों और संप्रभु ा में परिरव:+

636. पूव: विवति*क व्यवस्र्थीा से अति*कारों और कायÂ क े विवति*क परिरर्णामों को लागू कर+े की सीमा को वि+*ा:रिर कर+े वाले सिसद्धां विप्रवी काउंसिसल द्वारा वि+*ा:रिर विकए गए हैं और स्व ंत्र ा क े बाद इस न्यायालय द्वारा अप+ाया गया है। सेक्र े र्टरी ऑफ स्र्टेर्ट काउंसिसल ऑफ इस्जि°ड़या ब+ाम कमाची बोये सभा,329 ंSौर क े राSा विब+ा अप+ा उत्तराति*कारी छोड़े 29 अX ू बर, 1855 को मर गये परिरर्णामस्वरूप ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी +े इस राज्य को औपवि+वेणिशक सरकार क े अ*ी+ घोविष कर खिलया। औपवि+वेणिशक सरकार +े ' ंSौर की +ई सरकार'को एक पत्र प्रेविष कर पूव: शासक क े अ*ी+ वि+Sी और साव:Sवि+क सम्पखित्तयों की सूची मांगी ाविक इस संपखित्त क े विवरुद्ध विकए गए दावों का विववि+श्चय विकया Sा सक े । Sब इस पत्र का कोई Sवाब +हीं विमला ो क ं प+ी क े अति*कारी +े पैदल से+ा की 25 वीं रेसिSमेंर्ट की की मौSूदगी का लाभ उठाकर राSा की संपखित्त पर कब्Sा कर उसे सील कर विदया र्थीा संपखित्त की सुरक्षा क े खिलए सं री ै+ा कर विदया। त्काली+ राSा की सबसे बड़ी विव*वा द्वारा पूव: शासक की वि+Sी संपखित्त क े संबं* में मˆास क े सव च्च न्यायालय क े समक्ष एक मुकदमा लाया गया र्थीा। यह क: विदया गया र्थीा विक राSअन् राल क े बाद +ये शासक द्वारा अति*£विह सम्पखित्त एक साव:Sवि+क 329 (1857-60) 7 एम.ओ.ओ. आई.ए. (476) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संपखित्त र्थीी Sबविक राSा की वि+Sी संपखित्त को हिंहदू उत्तराति*कार विवति* क े अ+ुरूप विव रिर की Sा+ी र्थीी। प्रत्यर्ति यों +े क: विदया विक राSा की संपखित्त को Sब् कर+ा औपवि+वेणिशक सरकार की ओर से +ए संप्रभु क े रूप में राज्य का क ृ् त्य र्थीा। राS अन् राल और उसक े बाद की Sब् ी में क े वल राSा और औपवि+वेणिशक सरकार शाविमल र्थीी- दो संप्रभु शविXयां, और परिरर्णामस्वरूप, इस मामले पर सु+वाई कर+े का न्यायालय क े पास कोई क्षेत्राति*कार +हीं है। इस क: को स्वीकार कर विप्रवी काउंसिसल की ओर से बोल े हुए लॉर्ड: हिंकग्सर्डाउ+ *ारिर विकया: “विकन् ु, इस पत्र का अर्थी: क ु छ भी हो.... इससे यह दर्भिश हो ा हैै विक औपवि+वेणिशक सरकार का आशय उस सभी संपखित्त को, Sो वस् ु ः अणिभगृही की गई र्थीी, अणिभगृही कर+ा र्थीा, चाहे वह सम्पखित्त साव:Sवि+क हो या वि+Sी, र्थीा यह आश्वास+ विदया गया विक अन्वेषर्ण क े उपरान् अ+ुतिच रूप से अणिभगृही सारी सम्पखित्त को प्रत्यावर्ति कर विदया Sाएगा। लेविक+, राSा से संबंति* संपखित्त क े संबं* में भी, यह मा++ा मुस्जिश्कल है विक सरकार का उद्देश्य उ+ लोगों को वि+वारर्ण का का+ू+ी अति*कार दे+ा है Sो विकसी विवति*क न्यायाति*करर्ण क े फ ै सले क े खिलए राS+ैति क उपाय क े वि+ष्पाद+ में अप+े अति*कारिरयों क े आचरर्ण को ब ा+े में खुद को गल गल मा+ े हों।... न्यायमूर्ति का मा++ा है विक परिरर्णास्वरूप प्रत्यर्थी-, सबसे बड़ी विव*वा, +े सिSस सम्पखित्त पर दावा विकया है उसको विब्रविर्टस सरकार +े अप+े संप्रभु शविX का प्रयोग कर ईस्र्ट इवि़°र्डया कम्प+ी क े माध्यम से Sब् कर विदया इस प्रकार अप+े परिरर्णामों सविह क ृ काय: एक प्रकार से राज्य का काय: है सिSस पर मˆास उच्च म न्यायालय की अति*कारिर ा +हीं है। अगर उन्हों+े कोई राय ब+ाई र्थीी ो भी उस काय: की औतिचत्य या न्याय से संबंति* + ो वि+चली अदाल और + ही न्यातियक सविमति क े पास mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कोई राय ब+ा+े या व्यX कर+े का अति*कार है। यह उ+ लोगों क े खिलए न्यायपूर्ण: या अन्यायपूर्ण:, राS+ीति क या अपविवत्र, लाभकारी या हावि+कारक हो सक ा है, सिS+क े विह प्रभाविव हो े हैं। इ+को न्यायलय विवचारिर +हीं कर सक ा है। यह कह+ा पया:प्त है विक यविद कोई अपकृ त्य विकया गया है, ो भी यह अपक ृ त्य है, सिSसमें +गरपाखिलका न्यायालय कोई उपचार +हीं प्रदा+ कर सक ा है। (प्रभाव वर्ति* )

637. राSा की संपखित्त को Sब् कर+े में औपवि+वेणिशक सरकार का काय: दो संम्प्रभु क ा:ओं क े मध्य का काय: र्थीा -औपवि+वेणिशक सरकार और ंSौर राज्य क े राSा। यह वाद मˆास क े सव च्च न्यायालय क े समक्ष स्र्थीाविप विकया गया र्थीा Sो सरकार द्वारा गविठ एक न्यायालय र्थीा और उसकी संप्रभु ा में काय: कर रहा र्थीा। विप्रवी काउंसिसल +े *ारिर विकया विक उपवि+वेश सरकार क े काय: विकसी अन्य संप्रभु इकाई ( ंSौर क े राSा) क े मुकाबले राज्य क े काय: र्थीे और +गरपाखिलका की अदाल ें उ+ मामलों की सु+वाई +हीं कर सक ी हैं Sो उ+ कायÂ की वै* ा पर आक्षेप कर ी हैं Sब क विक औपवि+वेणिशक सरकार +े खुद यह +हीं मा+ा विक मामला न्यायसंग र्थीा। विप्रवी काउस्जिन्सल +े यह *ारिर विकया विक ऐसा कोई साक्ष्य +हीं है Sो इस दावे का समर्थी:+ करे विक औपवि+वेणिशक सरकार +े यह मान्य ा प्रदा+ की विक राSा की संपखित्त क े दावेदारों को विवति*क क्षति पूर्ति विदया Sा+ा है। यह विक राज्य क े द्वारा क ृ काय: क े परिरर्णाम विवति*क रूप से +गरपाखिलका विवति* में प्रव:+ीय र्थीे औपवि+वेणिशक सरकार +े इसको मान्य ा प्रदा+ +हीं की, +गरपाखिलका की अदाल ें राज्य क े काय: से संबंति* वादों पर सु+वाई +हीं कर सक ी र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

638. 1899 में विप्रवी काउंसिसल +े र्थीॉमस और Sेम्स क ु क ब+ाम सर Sेम्स न्टिंस्प्रग330 क े स्वयं द्वारा पारिर वि+र्ण:य में इस सिसद्धां का पाल+ विकया। अपील में प्रत्यर्भिर्थीयों +े पोन्र्डोलै°ड़ क े मुख्य वि+वासी द्वारा विकए गए कु छ करारों को चु+ौ ी दी र्थीी सिSसमें अपीलक ा:ओं को विब्रविर्टश संप्रभु क े प्रति वि+ति* क े रूप में भूविम और Sंगलों पर रिरयाय ी अति*कार प्रदा+ विकया र्थीा। प्रत्यर्ति यों +े क: विदया विक करार त्काली+ पोन्र्डोलै°ड़ की विवति*यों क े विवपरी र्थीा। विप्रवी काउंसिसल +े *ारिर विकया विक विब्रविर्टश सरकार को भूविम और अति*कारों का अ+ुदा+ राज्य का काय: होगा और और Sो पोंर्डोस प्रमुख और विब्रविर्टस सरकार क े मध्य है और इसको +गरपाखिलका की अदाल में इस आ*ार पर चु+ै ी +हीं दी Sा सक ी र्थीी विक यह पोंर्डोंस विवति* का उल्लंघ+ कर ी है। विप्रवी काउंसिसल की ओर से क े खिलए बोल े हुए लॉर्ड: हल्सबरी +े *ारिर विकया: "महारा+ी क े द्वारा अभ्यप:र्ण या विकसी अन्य माध्यम से कब्Sा खिलया Sा+ा सिSससे सम्प्रभु ा प्राप्त की Sा सक े, राज्य का एक काय: र्थीा और सिंसकाऊ (पोंड़ो प्रमुख) को एक स्व ंत्र संप्रभु मा++ा -Sो अपीलार्थी- उ+से स्वत्व प्राप्त कर+े क े खिलए बाध्य हैं - यह का+ू+ का एक सुस्र्थीाविप सिसद्धां है विक स्व ंत्र राज्यों क े पारस्परिरक संव्यवहार उ+ का+ू+ों से इ र का+ू+ों द्वारा संचाखिल हो े हैं Sो +गरपाखिलका अदाल ें स्र्थीाविप कर ी हैं। यह कह+ा कोई उत्तर +हीं है विक अन् रा:ष्टीय विवति* क े सामान्य सिसद्धान् ों क े ह उस संप्रभु द्वारा वि+Sी सम्पखित्त का सम्मा+ विकया Sा ा है Sो अभ्यप:र्ण स्वीकार कर ा है और अभ्यर्मिप क्षेेत्र क े भी र ऐसे वि+Sी सम्पखित्त क े संबं* में पूव: संप्रभु क े क:व्यों और विवति*क दातियत्वों को को £हर्ण कर ा है।...यविद अभ्यप:र्ण कर+े वाले शासक और उस सरकार क े बीच, सिSसे अभ्यप:र्ण विकया Sा+ा है, प्रकर्ट या सुस्पष्ट मोल ोल हुई हो, विक वि+Sी सम्पखित्त का सम्मा+ विकया Sाएगा अर्थीा: 330 (1899) ए.सी. 572 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े वल मोल ोल ही सिSसे विक एक संप्रभु द्वारा दूसरे संप्रभु पर सामान्य क ू र्ट+ीति क दबाव से लागू विकया Sा सक े ।" (प्रभाव वर्ति* )

639. विप्रवी काउंसिसल +े सिSस सामान्य विवति* क े सिसद्धान् को अप+ाया वह यह र्थीा विक विक +गरपालकीय अदाल ें दो संप्रभु राज्यों क े बीच प्रयोज्य विवति* को प्रवर्ति +हीं कर सक ी हैं। विप्रवी काउंसिसल +े स्पष्ट विकया विक इस बा से कोई फक: +हीं पड़ ा है विक अं रा:ष्ट्रीय विवति* को इस पर यह कह+ा पड़ा विक क्या बाद क े विवति*क दातियत्वों क े संबं* में +ए संप्रभु को पुरा+े संप्रभु क े अ*ी+ कर विदया गया, कोई +गरपालकीय अदाल ऐसे विवति*क दातियत्वों को लागू +हीं कर सक ी है Sब क +व संप्रभु ऐसे विवति*क दातियत्वों की स्पष्ट से मान्य ा प्रदा+ + कर दे। Sहां कोई पूव: संप्रभु +ए संप्रभु में परिरवर्ति हो Sा ी है वहां पर +ए संप्रभु की +गरपाखिलकीय अदाल ें पूव: संप्रभु क े अ*ी+ रह+े वाले पक्षकारों क े विवति*क अति*कारों को +ए संप्रभु द्वारा ऐसे का+ू+ी अति*कारों क े व्यX मान्य ा अ+ुपस्जिस्र्थी में लागू +हीं करेंगी।

640. माखिलका+ा अति*कारों क े प्रश्न से संबं*ी उपरोX सिसद्धान् ों की प्रायोज्य ा Sो पूव: सरकार में विवद्यमा+ र्थीे उ+की चचा: विप्रवी कौंसिसल द्वारा स+् 1915 में वि+र्ण- सेक्र े र्टरी ऑफ स्र्टेर्ट ऑफ इस्जि°ड़या ब+ाम बाई राSबाई331 क े मामले में की गयी। कस्बाति स वग: क े सदस्य Sो विक अपील में 331 आई.एल.आर. (1915) 39 बाम्बे 625 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रत्य - हैं उसे गायकवाड़ शासकों द्वारा कु छ गांवों से विकराया वसूल+े क े खिलए भूविम अ+ुदा+ में विदया गया र्थीा। स+् 1817 में अहमदाबाद S+पद को गायकवाड़ों द्वारा विब्रविर्टश सरकार को सौंप विदया गया। हालांविक, सिS+ क्षेत्रों को सौंपा गया र्थीा, उ+का बंदोबस् 1822-23 क व्यावहारिरक रूप से लागू +हीं विकया गया र्थीा। Sब इस क्षेत्र को सौंपा गया, ो उस समय प्रत्यर्भिर्थीयों क े कब्Sे में सत्रह गांव र्थीे, लेविक+ उन्हों+े इस आ*ार पर औपवि+वेणिशक बॉम्बे सरकार को अपेतिक्ष कर दे+े से इ+कार कर विदया विक वह भूविम पूव: शासक द्वारा उन्हें अ+ुदा+ पर प्रदा+ की गयी र्थीी। श्री विवखिलयमस+ द्वारा प्रस् ाविव समझौ े को भी प्रत्यर्थी- द्वारा खारिरS कर विदया गया और बॉम्बे सरकार +े अं ः अ+ेक पट्टे विकये सिSसमें सरकार क े प्रसाद पयãन् कसाबा ी को कई गांव प्रदा+ विकये गये। प्रत्यर्थी- +े एक वाद दायर विकया सिSसमें उस+े दावा विकया विक पट्टे क े अवसा+ पर +या पट्टा प्राप्त कर+े का अति*कारी है। लॉर्ड: एर्टविकन्स+ +े विप्रवी काउंसिसल की ओर से बोल े हुए वि+म्+खिलखिख अवलोक+ विकया: "ऐसी कार:वाई क े संबं* में कार:वाई कर+े से पूव:, सिSसक े संबं* में बम्बई सरकार +े इ+ रिरपोर्टÂ की प्राविप्त पर चारोर्डी क े इस गांव क े प्रति वि+द†श विकया र्थीा, यह विवचार कर+ा आवश्यक है विक वे कौ+ से संबं* र्थीे सिSसमें कबाति स बाम्बे सरकार क े सार्थी खड़े र्थीे Sब उ+क े राज्यक्षेत्र में कर्टौ ी की Sा रही र्थीी, और उ+क े +ए संप्रभु क े अति*करर्णों में प्रव:+ीय विवति*क अति*कार क्या र्थीे, सिSसको वह इसक े उपरान् *ारर्ण कर रहे र्थीे। इस कर्टौ ी से पूव: वे संबं* सिSसमें वह और उ+क े अ*ी+ सिS+ का+ू+ी अति*कारों का वे उपभोग कर रहे र्थीे, वे एक दृविष्ट से विबल्क ु ल अप्रासंविगक हैं। वे +ए शास+ क े ह का+ू+ी अति*कारों, यविद कोई हो,को +हीं ले सक े र्थीे सिS+का लाभ उन्हों+े पुरा+ी विवति* क े ह उठाया र्थीा। +ई सरकार क े प्रति क े वल वही का+ू+ी अति*कार उ+को प्राप्त हो सक े र्थीे सिSन्हें +ई सरकार अणिभव्यX या विववतिक्ष करार अर्थीवा विव*ाय+ क े द्वारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उ+को प्रदा+ कर+ा चाह ी र्थीी। बेशक, इस विववतिक्ष करार को परिरस्जिस्र्थीति Sन्य साक्ष्य द्वारा साविब विकया Sा सक ा है, Sैसे विक +ई सरकार का उ+क े सार्थी व्यवहार कर+े का रीका, सिSसे +ए संप्रभु +े अप+ाया, उ+क े पुरा+े अति*कारों की मान्य ा, और उ+का सम्मा+ कर+े क े खिलए अणिभव्यX और विववतिक्ष चु+ाव और उसक े द्वारा बाध्य हो+ा, और यह है क े वल यह वि+*ा:रिर कर+े क े उद्देश्य से विक क्या और +ए संप्रभु +े कबाति स क े इ+ छ ू र्ट विवरो*ी अति*कारों को मान्य ा प्रदा+ विकया है, और उ+क े द्वारा बाध्य हो+े का चु+ाव विकया अर्थीवा सहम हुए, यह विक इ+ अति*कारों क े अस्जिस् त्व, प्रक ृ ति, और सीमा का विवचार इस मामले में Sांच क े खिलए प्रासंविगक विवषय ब+ Sा े हैं। यह सिसद्धां सुस्र्थीाविप है...." न्यायमूर्ति क े विवचार में, यविद एक पल क े खिलए विव*ाय+ को भूल Sाएं ो यह साविब कर+े का भार विक बॉम्बे सरकार +े विकसी को इ +ी सहमति ऐसी सहमति प्रदा+ की, और यविद ऐसा है, ो इस मामले में प्रत्यर्थी- पर विकस सीमा क वि+भ:र कर ा है। 1822 में कबाति स श्री विवखिलयम्स+ क े इस प्रस् ाव को अस्वीकार कर+े की स्जिस्र्थीति में +हीं र्थीे, भले ही उन्हों+े इसका चु+ाव + विकया हो। वे अति*कार मुकदमेबाSी क े सभी उद्देश्यों क े खिलए समाप्त हो गये र्थीे, और विवति* क े हिंबदु पर उ+क े पास एकमात्र विवकल्प यह र्थीा विक उ+की श Â को स्वीकार करें अर्थीवा वहां से हर्ट Sाएं। (प्रभाव वर्ति* )

641. गायकवाड़ो द्वारा अहमदाबाद राज्यक्षेत्र का औपवि+वेणिशक सरकार को अभ्यपर्ण: दो संप्रभुओं क े बीच राज्य का एक काय: र्थीा। राज्यक्षेत्र क े अभ्यप:र्ण हो Sा+े पर, उ+क े +ए संप्रभु क े राज्यक्षेत्र क े भी र +ागरिरकों क े अति*कार, और परिरर्णामस्वरूप +ए संप्रभु क े +गरपालकीय न्यायालयों में, क े वल वही अति*कार र्थीे सिSन्हें +ए संप्रभु द्वारा स्पष्ट रूप से मान्य ा प्रदा+ की गयी र्थीी। Sब क +व सम्प्रभु +ागरिरकों क े उ+ अति*कारों को मान्य ा + प्रदा+ करे Sो पुरा+ी शास+ प्रर्णाली में मौSद र्थीे ब क +गरपालकीय न्यायालय उ+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्राची+ अति*कारों का प्रव:+ +हीं कर सक ी र्थीी। इ+ अति*कारों राज्यक्षेत्र क े ह +ागरिरकों क े संपखित्त संबं*ी अति*कार शाविमल हैं। +ए संप्रभु को +ागरिरकों क े संपखित्त अति*कारों को मान्य ा दे+ी चाविहए या +हीं, यह एक ऐसा विववाद है Sो दो संप्रभु क े बीच एक राज्य स् र पर सुलझाया Sाए और +गरपालकीय अदाल ऐसे कÂ पर सु+वाई +हीं कर सक ी है। +ए संप्रभु द्वारा पुरा+े शास+ में पहले से मान्य ा प्राप्त संपखित्त अति*कारों की मान्य ा स्पष्ट कर+े की आवश्यक ा +हीं है और +ए संप्रभु क े आचरर्ण से इंविग विकया Sा सक ा है और परिरस्जिस्र्थीति Sन्य साक्ष्य से स्र्थीाविप हो सक ा है। हालांविक, पूव: शास+ में अति*कार क े अस्जिस् त्व को साविब कर+े का भार और +ए संप्रभु द्वारा उसकी मान्य ा उ+ पक्षकार पर वि+भ:र है Sो ऐसे अति*कार की मांग कर े हैं।

642. लॉर्ड: एर्टविकन्स+ सिS+ सिसद्धां ों का प्रति पाद+ विकया है उसे इस न्यायालय +े स्व ंत्र ा प्राविप्त क े उपरान् अप+ा खिलया गया है। पूव: राSशाही शासकों द्वारा उ+क े राज्यक्षेत्रों का भार गर्णराज्य में अभ्यप:र्ण से पूव: व्यविXयों को विदये गये अति*कारों से अ+ेक विववादों का Sन्म हुआ। इस न्यायालय से मांग की गयी विक वह यह वि+*ा:रिर करे विक क्या संप्रभु ा का राS ंत्र से भार ीय गर्ण ंत्र में परिरव:+ क े पश्चा ऐसे अति*कार प्रव:+ीय र्थीे।

643. प्रमोद चंˆ देब ब+ाम उड़ीसा राज्य 332 में इस न्यायालय की संवै*ावि+क पीठ +े बंच रिरर्ट यातिचकाओं क े की सु+वाई की। उ+ रिरर्ट यातिचकाओं क े थ्य काफी हद क एक दूसरे से सादृश्य र्थीे: यातिचकाक ा:ओं 332 1962 अ+ुपूरक (1) एस.सी.आर. 405 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +े इ+ शासकों से पूव: क े शाही शासकों सिSन्हों+े अप+े राज्यक्षेत्र को भार गर्णराज्य को सौंप विदया र्थीा उ+से क ु छ +कद अ+ुदा+ अर्थीवा खोरपोश अ+ुदा+ प्राप्त विकया र्थीा। यह प्रश्न उठा विक क्या उड़ीसा राज्य को, क ें ˆ सरकार क े प्रति वि+ति* क े रूप में, खोर कोष अ+ुदा+ प्रदा+ कर+े सविह शाही राज्यों क े पुरा+े का+ू+ों को लागू कर+े की आवश्यक ा र्थीी। मुख्य न्याया*ीश बी पी सिसन्हा +े उपरोX उसिल्लखिख विप्रवी काउंसिसल क े वि+र्ण:यों का हवाला देकर संविव*ा+ पीठ की ओर से बोल े हुए क ु छ सिसद्धां ों को प्रति पाविद विकया, यह सिसद्धान् ब लागू हो े होंगे Sब +ए संप्रभु की +गरपाखिलका अदाल ें पूव: संप्रभु क े विवति*क शास+ वयवस्र्थीा से पक्षकारों को प्रोद्भभू अति*कारों का प्रव:+ करेंगी: "17. सिS+ प्राति*कारिरयों +े उपरोX की चचा: की या संदभ: विदया उ+का परीक्षर्ण कर+े पर वि+म्+खिलखिख प्रति पदाएं प्रकर्ट हो ी हैं।(1) "राज्य का अति*वि+यम"विकसी राज्य द्वारा उस राज्यक्षेत्र क े संबं* में विवSय, संति*, अभ्यप:र्ण या अन्यर्थीा द्वारा सम्प्रभु शविX का अति*£हर्ण कर+ा है, Sो ब क इस राज्यक्षेत्र क े भाग +हीं र्थीे, और यह कहा Sा सक ा है विक वह विकसी विवणिशष्ट ारीख को घविर्ट हुई है, यविद उस पर ऐसे अति*£हर्ण की उद्घोषर्णा या अन्य लोक घोषर्णा की गयी हो ी। (2) हिंक ु एक ऐति हासिसक प्रविक्रया क े परिरर्णामस्वरूप, पूर्ण: प्रभुसत्ता प्राप्त कर+े में कई वष: लग सक ें हैं।... (5) चूंविक राज्य का काय: अप+े प्राति*कार को +गरपाखिलका की विवति* से +हीं प्राप्त कर ी है बस्जिल्क विवति* से इ र या सुप्रा-का+ू+ी सा*+ों से प्राप्त कर ी है, +गरपाखिलका क े न्यायालयों क े पास विकसी अति*वि+यम की औतिचत्य या वै* ा की Sांच कर+े की कोई शविX +हीं है Sो राज्य क े काय:क े दायरे में आ े हैं।"(6) क्या राज्य क े काय: में साव:Sवि+क या वि+Sी अति*कारों का संदभ: विदया गया है, परिरर्णाम समा+ है, अर्थीा: ्, वह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह है विक यह संव्यवहार क े सही और गल की Sांच कर+े की अति*कारिर ा रख+े और उस पर वि+र्ण:य दे+े, यविद कोई हो, से परे है।यह अव*ारर्णा विकया Sा सक है विक +व अति*£विह क्षेत्र क े पूव:विवति*यां प्रवर्ति रहें, और यह विक अं रा:ष्ट्रीय का+ू+ क े अ+ुसार +ागरिरकों क े वि+Sी संपखित्त का +व संप्रभु द्वारा सम्मा+ विकया Sा+ा चाविहए,लेविक+ +गरपालकीय न्यायालयों क े पास इस रह क े अं रराष्ट्रीय बाध्य ाओं को प्रवर्ति कर+े की अति*कारिर ा +हीं है। (8). +ए संप्रभु द्वारा मान्य ा प्राप्त +गरपाखिलका न्यायालयों क े पास क े वल ऐसे अति*कारों की Sांच कर+े और अणिभवि+तिश्च कर+े की शविX और अति*कारिर ा है, Sैसा विक +व संप्रभु +े विव*ाय+, करार या अन्यर्थीा द्वारा अणिभस्वीक ृ अर्थीवा मान्य ा प्रदा+ विकया है। (9) ऐसा करार या मान्य ा या ो अणिभव्यX हो सक ी है या उ+ परिरस्जिस्र्थीति यों और साक्ष्य से, Sो +ए प्रभुत्व संपन्न द्वारा उ+ अति*कारों क े बारे में काय:वाही कर+े क े ढंग से प्रकर्ट हो े हैं, विववतिक्ष हो सक ी है। इसखिलए, +गर न्यायालयों क े पास यह प ा लगा+े का अति*कारिर ा है विक क्या +व संप्रभु +े प्रश+ग अति*कारों को यर्थीापूव X अणिभवयX या विववतिक्ष रूप में मान्य ा प्रदा+ विकया है अर्थीवा +हीं विदया है अर्थीवा अणिभस्वीक ृ विकया है। (1) +ए संप्रभु क े विवरुद्ध दावा विकए गए अति*कारों क े अस्जिस् त्व क े बारे में विववाद की स्जिस्र्थीति में, सबू का भार दावेदार पर हो ा है विक वह यह स्र्थीाविप करे विक +व संप्रभु +े प्रश्नग अति*कार को मान्य ा प्रदा+ विकया है अर्थीवा अणिभस्वीक ृ विकया है। (प्रभाव वर्ति* )

644. संविव*ा+ पीठ +े विप्रवी काउंसिसल द्वारा प्रति पाविद पूव: का+ू+ी सिसद्धां ों को स्वीकार विकया सिSसमें राज्य क े काय: क े विवति*क परिरर्णाम को पूव: शास+ व्यवस्र्थीा +े मान्य ा प्रदा+ की है। यह माय+े +हीं रख ा है विक काय: साव:Sवि+क या वि+Sी अति*कारों से संबंति* हैं। +गरपाखिलका अदाल ें क े वल उ+ अति*कारों और दातियत्वों को मान्य ा प्रदा+ करेंगी सिSन्हें +ए संप्रभु द्वारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अणिभव्यX या विववतिक्ष रूप से साक्ष्य द्वारा स्र्थीाविप विकया गया है। +ए संप्रभु की +गरपाखिलका अदाल ें इस बा की Sांच कर सक ी हैं विक क्या +ए संप्रभु +े पूव: शास+ क े ह मौSूद अति*कारों और दातियत्वों को अणिभव्यX या विववतिक्ष रूप रूप में मान्य ा प्रदा+ की है। हालांविक, ऐसे अति*कारों और दातियत्वों क े अस्जिस् त्व और मान्य ा को स्र्थीाविप कर+े का भार उ+ पर है Sो इसका दावा कर े हैं।

645. यह सिसद्धान् प्रोमोद चंˆ देब क े मामले में प्रति पाविद विकया गया है और सा न्याया*ीशों की पीठ +े गुSरा राज्य ब+ाम वोरा विफर्डाली बदरुद्दी+ विमट्ठरवाला333 क े मामले इसकी पुष्ट की। सा -न्याया*ीश पीठ +े इस क: को भी स्पष्ट रूप से खारिरS कर विदया विक एक पूव: संप्रभु द्वारा विदया गया अ+ुदा+ क े वल शून्यकरर्णीय है Sब क विक +ए संप्रभु द्वारा स्पष्ट रूप से वि+रस् +हीं विकया Sा ा है। अदाल +े कहा विक इस रह क े अ+ुदा+ +ए संप्रभु की +गरपाखिलका अदाल द्वारा लागू +हीं विकए Sा े हैं Sब क विक +ए संप्रभु द्वारा अणिभव्यX या विववतिक्ष रूप से मान्य ा +हीं प्रदा+ की Sा ी है। पीमा तिचबर ब+ाम यूवि+य+ ऑफ इंतिर्डया334 यूवि+य+ ऑफ इंतिर्डया ब+ाम सु*ांशु मSूमदार 335 +े भी इ+ सिसद्धान् ों की पुविष्ट की है।

646. इस न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु साक्ष्य और कÂ +े चार अलग - अलग विवति*क व्यवस्र्थीा को रद्द कर विदया है। कार:वाई क े का+ू+ी परिरर्णाम, माखिलका+ा अति*कार, या पूव: विवति*क व्यस्र्थीा में Sो क्षति हुई Sो विवति*क 333 (1964) 6 एस.सी.आर. 461 334 (1966) 1 एस.सी.आर. 357 335 (1971) 3 एस.सी.आर. 265 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरर्णाम वि+कलें हैं उ+को यह न्यायालय प्रवर्ति कर सक ी है यविद उन्हें बाद क े संप्रभुों द्वारा अणिभवयX या विववतिक्ष रूप से मान्य ा प्रदा+ की Sा ी है। इस रह की मान्य ा क े अभाव में, संप्रभु ा का परिरव:+ कर+ा राज्य का एक काय: है और यह न्यायालय उत्तरव - संप्रभु को ऐति हासिसक गलति यों को पहचा+कर और उपचारिर कर+े क े खिलए मSबूर +हीं कर सक ा है। पक्षकारों क े दावाक ृ प्राची+ अति*कार

647. 12 वीं श ाब्दी क े पूव: विववाविद संपखित्त क े +ीचे प्राची+ अं र्मि+विह संरच+ा की प्रक ृ ति पर व:मा+ काय:वाही में बहु विववाद रहा है। श्री वैद्य+ार्थी+ +े कहा विक संरच+ा एक हिंहदू मंविदर का प्रति वि+ति*त्व कर ी है। यह आ£ह विकया गया र्थीा विक विववाविद संपखित्त क े +ीचे एक प्राची+ हिंहदू मंविदर का अस्जिस् त्व इस बा का सबू है विक भूविम क े का स्वत्व वाद 5 में वादी देव ाओं में वि+विह है, 12 वीं श ाब्दी से Sो स्वत्व है वह विवति*क रूप से प्रव:+ीय है। इस कर्थी+ को स्वीकार कर+े क े खिलए, यह प्रदर्भिश कर+े की आवश्यक ा होगी विक उस क्षेत्र क े खिलए प्रत्येक उत्तरव - संप्रभु, सिSसक े भी र विववाविद भूविम आ ी है उसको उन्हों+े वाद 5 में वादी देव ाओं क े स्वत्व को अणिभवयX या विववतिक्ष रूप से मान्य ा प्रदा+ की गई है। इसे स्र्थीाविप कर+े का भार वाद 5 में वादी पर ही होगा।

648. ए.एस.आई. की रिरपोर्ट: क े अवलम्ब+ क े अलावा विकसी भी क: को +हीं प्रस् ु विकया गया। वाद 5 क े वादी द्वारा इस क: का समर्थी:+ में कोई साक्ष्य प्रस् ु +हीं विकया गया र्थीा भले ही अं र्मि+विह संरच+ा को मंविदर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मा+ा गया, विफर भी इससे उत्पन्न अति*कारों को उत्तरव - संप्रभु द्वारा मान्य ा प्रदा+ की गई र्थीी। विववाविद संपखित्त क े +ीचे संरच+ा का मात्र अस्जिस् त्व आS स्वत्व का विवति*क रूप से प्रव:+ीय दावे को Sन्म +हीं दे सक ा है। बारहवीं श ाब्दी में प्राची+ संरच+ा क े वि+मा:र्ण क े बाद, मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण से चार सौ साल पहले हस् क्षेप की अवति* मौSूद है। विवति*क वयवस्र्थीा की स अस्जिस् त्व या विवति*क वयवस्र्थीा में परिरव:+ संबं*ी विकसी भी प्रकार का साक्ष्य +हीं विदया गया है। सभी पक्षकारों +े यह स्वीकार विकया है विक विकसी समय मुग़ल साम्राज्य क े शास+ काल में विववाविद स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। यहां क विक इस न्यायालय +े भी यह मा+ा विक अं र्मि+विह संरच+ा वास् व में एक हिंहदू मंविदर र्थीी, सिSसका स्वत्व विववाविद स्र्थील क े वादी देव ाओं में र्थीा। वाद 5 में वादी द्वारा प्रस् ु साक्ष्य से यह स्र्थीाविप +हीं हो ा है विक Sब विवति*क व्यवस्र्थीा मुगल सम्प्रभु में परिरवर्ति हुयी ो ऐसे अति*कारों को मान्य ा प्रदा+ की गयी र्थीी।

649. उ+ राज्यक्षेत्रों पर मुगल विवSय दो संप्रभुओं क े बीच एक बहुदेशीय काय: र्थीा सिSसक े बाद, चूंविक पूव: अति*कारों को +ए संप्रभु द्वारा मान्य ा प्रदा+ +हीं की गयी इसखिलए विववाविद संपखित्त का कोई भी दावा संप्रभु में परिरव:+ क े आ*ार पर प्रवर्ति +हीं विकया Sा सक ा है। यह न्यायालय क े वल बारहवीं श ाब्दी में एक अं र्मि+विह मंविदर क े अस्जिस् त्व क े आ*ार पर विववाविद संपखित्त क े अति*कारों का लागू या प्रव:+ +हीं कर सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

650. विवति*क व्यवस्र्थीा में अगला परिरव:+ 13 फरवरी, 1856 को ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी द्वारा अव* क े विवलय क े सार्थी हुआ Sो बाद में विब्रविर्टश प्रभुत्व की औपवि+वेणिशक सरकार ब+ गई। 1856 और भार ीय स्व ंत्र ा क े बीच और उससे बाद की घर्ट+ाओं को इस वि+र्ण:य क े विवणिभन्न विहस्सों में सविवस् ार विवचारिर विकया Sाएगा और हमें इस समय इसको ब ा+े की आवश्यक ा +हीं है। हालांविक, विब्रविर्टश संप्रभु द्वारा अति*कारों की मान्य ा क े संबं* में कु छ थ्यात्मक पहलुओं को उसिल्लखिख विकया Sा सक ा है। विब्रविर्टश संप्रभु द्वारा अव* क े विवलय पर, संप्रभु द्वारा + ो हिंहदू रामभXों को पूSा कर+े से रोक+े की और + ही मुस्जिस्लम अति*वासिसयों को विववाविद संपखित्त पर +माS अदा कर+े से रोक+े की काय:वाही की गयी। 15 माच: 1858 को, लॉर्ड: क ै हिं+ग की उद्घोषर्णा द्वारा, क ु छ संपखित्त को छोड़कर, सभी संपखित्त को विब्रविर्टश संप्रभु द्वारा Sब् कर खिलया गया र्थीा और विववाविद संपखित्त को +Sूल भूविम (अर्थीा: भूविम Sो Sब् कर सरकार में वि+विह कर ली गयी)। हालांविक, विब्रविर्टश सरकार का काय: विववाविद स्र्थील पर दो+ों *ार्मिमक समुदायों की प्रर्थीाओं और प्रार्थी:+ा का सम्मा+ कर+ा र्थीा। 1858 में रेलिंलग का वि+मा:र्ण इसखिलए विकया विक दो+ों समुदायों को विवभासिS कर का+ू+ और व्यवस्र्थीा ब+ाया Sा सक े Sो दो+ों समुदायों की पूSा पर आ*ारिर है। यविद विववाविद स्र्थील पर कोई समुदाय मौSूद +हीं र्थीा, ो दो+ों समुदायों को अलग कर+े की आवश्यक ा का कोई प्रश्न कभी उत्पन्न +हीं हो सक ा र्थीा। हालांविक विहन्दुओं +े आं रिरक आंग+ से हर्टा+े Sा+े क े विवरूद्ध वि+रं र संघष: विकया। स+् 1877 में विब्रविर्टश सरकार +े बाहरी आंग+ क े उत्तरी भाग में एक और द्वार खोला सिSसे हिंहदुओं को वि+यंत्रर्ण और प्रबं* क े खिलए विदया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

651. विब्रविर्टश संप्रभु और भार गर्णराज्य क े बीच विवति*क वयवस्र्थीा क े परिरव:+ क े संबं* में एक स रेखा विवद्यमा+ है। संविव*ा+ का अ+ुच्छेद 372 विब्रविर्टश संप्रभु और स्व ंत्र भार क े बीच विवति*क वि+रं र ा को वयX कर ा है। अ+ुच्छेद 372 (1) में कहा गया है: (1) अ+ुच्छेद 395 में वि+र्मिदष्ट अति*वि+यविमति यों क े इस संविव*ा+ द्वारा वि+रस+ पर भी, हिंक ु इस संविव*ा+ क े अन्य उपबं*ों क े अ*ी+ रह े हुए, इस संविव*ा+ क े प्रारंभ से ठीक पूव: भार क े राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सभी विवति* वहां क प्रवृत्त ब+ी रहेंगी Sब क सक्षम विव*ा+-मंर्डल या अन्य सक्षम प्राति*कारी द्वारा परिरवर्ति या वि+रसिस या संशोति* +हीं कर दी Sा ी हैं। (प्रभाव वर्ति* ) संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 296 में कहा गया है: "इसक े पश्चा ् यर्थीा उपबंति* क े अ*ी+ रह े हुए, भार क े राज्यक्षेत्र में ऐसी कोइ: संपखित्त Sो यविद यह संविव*ा+ संविव*ा+ में +हीं आया हो ा ो राSगामी या व्यपग हो+े से या अति*कारवा+ स्वामी क े आभाव में स्वामीविवही+ हो+े से, यर्थीास्जिस्र्थीति, उसकी उ+की को या विकसी विदशी राSा क े शासक को प्रोद्भभू हुई हो ी,यविद वह सम्पखित्त विकसी राज्य में स्जिस्र्थी है ो ऐसे राज्य में और विकसी अन्य दशा में संघ में वि+विह होगी।" संविव*ा+ में यह अ+ुच्छेद विब्रविर्टश संप्रभु और भार गर्णराज्य क े बीच एक विवति*क वि+रं र ा का साक्ष्य दे े हैं। इसक े अति रिरX स्व ंत्र ा प्राविप्त क े बाद भार गर्णराज्य का काय: साव:Sवि+क सम्पखित्त क े उ+ दावों को ब+ाये रख+ा र्थीा Sो विब्रविर्टशा संप्रभु क े दौरा+ मौSूद र्थीे। यह +हीं कहा Sा सक ा र्थीा विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्व ंत्र ा प्राविप्त पर +ागरिरकों क े बीच पूव: विवद्यमा+ सभी वि+Sी परस्पर समाप्त हो गये र्थीे। उ+को मान्य ा ब क +हीं प्रदा+ +हीं विकया गया Sब राज्य क े क ृ त्यों द्वारा संशोति*, खस्जि°ड़ +हीं कर विदया Sा ा है। इसखिलए व:मा+ उद्देश्यों क ेे खिलए अणिभव्यX और विववतिक्ष मान्य ा प्रदा+ विकया Sा+ा चाविहए सिSसको स्व ंत्र भार संप्रभु +े वि+Sी संपखित्त पर उ+ अति*कारों को मान्य ा प्रदा+ विकया क्योंविक वे विब्रविर्टश संप्रभु में विवद्यमा+ र्थीे। इसखिलए व:मा+ विववाद में औपवि+वेणिशक शास+ क े दौरा+ पक्षकारों क े अति*कार को आS इस न्यायालय द्वारा प्रवर्ति विकया Sा सक ा है।

652. आS न्यायालय उ+ दावों को £हर्ण +हीं कर सक ी है Sो विहन्दू पूSा स्र्थीलों क े विवरूद्ध मुगल शासकों क े कायÂ से उत्पन्न हुए र्थीे। प्राची+ शासकों क े कायÂ क े विवरूद्ध कोई भी व्यविX विवति* का आश्रय +हीं ले सक ा है। ऐति हास में Sो क ु छ हुआ उसको य कर+ा +ैति क रूप से गल है और आS भी इस पर Sोरदार बहस हो सक ी है। हालांविक संविव*ा+ का अँगीकरर्ण एक ऐसा ऐति हासिसक क्षर्ण है Sहां पर हम भार क े लोग विवचार, *म:, रंग अर्थीवा हमारे पूव:S कब इस Sमी+ पर आये उ+ सब क े आ*ार पर अति*कारों और दातियत्वों ं क े वि+*ा:रर्ण से परे चले गये और विवति* क े शास+ को अप+ा खिलया। विवति* क े शास+ क े ह उ+ वि+Sी दावों को न्यायवि+र्ण- कर सक ी है सिS+कों विब्रविर्टश संप्रभु +े अणिभव्यX या विववतिक्ष रूप से मान्य ा प्रदा+ विकया र्थीा और स्व ंत्र ा प्राविप्त क े बाद छेड़ा +हीं गया। विववाविद संपखित्त क े संबं* में यह स्पष्ट है विक 1856 में Sब अव* का विवलय हुआ ब विब्रविर्टश संप्रभु +े विववाविद संपखित्त पर हिंहदू और मुस्जिस्लम दो+ों समुदायों को मान्य ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एवं अ+ुज्ञा प्रदा+ की। सिSसकी परिरर्णति यह हुई विक दो+ों समुदायों क े बीच का+ू+ व्यवस्र्थीा ब+ाये रख+े क े खिलए रेलिंलग का वि+मा:र्ण विकया गया। अव* क े विवलय क े बाद पक्षकारों क े काय: व:मा+ वाद में पक्षकारों क े स ् विवति*क अति*कारों का गठ+ कर े हैं और यह वह काय: है सिSन्हें इस न्यायालय को प्रस् ु विववाद क े वि+पर्टारे क े खिलए मूल्यांक+ कर+ा चाविहए। न्याय, साम्या अौर सविद्ववेक

653. वाद 4 में वाविदयों की ओर से उपस्जिस्र्थी विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े यह क: विदया विक व:मा+ मामले में लागू विवति* की मूल विवषयवस् ु न्याय, साम्य और सविद्ववेक पर आ*ारिर है र्डॉ. *व+ +े क: विदया विक व:मा+ विववाद क े कु छ थ्य एक वै*ावि+क ढांचे क े अं ग: आ े हैं, सकारात्मक का+ू+ में क ु छ महत्वपूर्ण: रिरविXयाँ हैं सिSन्हें न्याय, साम्य और सविद्ववेक क े सिसद्धां ों को लागू करक े भरा Sा+ा चाविहए।

654. इस प्राक्कर्थी+ का अर्थी: यह है विक न्यायालय को व:मा+ विववाद की उत्पखित्त पर ध्या+ दे+ा चाविहए Sो चार अलग -अलग विवति*क शासकों- विवक्रमाविदत्य, मुगल, विब्रविर्टश और अब, स्व ंत्र भार क विवस् ृ है। पक्षों क े प्रस् ुति करर्ण का आकल+ कर+े और अंति म वि+ष्कष: पर पहुंच+े क े खिलए आैर न्याय की आवश्यक ाआें क े खिलए मामले की विवशेष ाओं पर विवणिशष्ट ध्या+ दे+े की आवश्यक ा है। यह वाद विवणिभन्न विवरो*ी विह ों क े अलावा विवति*, *म: और विवति* और विवSय क े वि+यमों पर आ*ारिर है। इन्हें हमेशा व:मा+ थ्यों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर लागू उपलब्* वै*ावि+क ढांचे क े अन् ग: +हीं समझा Sा सक ा है। इससे न्यायालय की भूविमका और भी अति*क संवेद+शील हो Sा ी है क्योंविक उसे न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े अ+ु ोष प्रदा+ कर+ा हो ा है।

655. न्याय, साम्य और सविद्ववेक की अव*ारर्णा पर चचा: से 'क ु छ प्रश्न उत्पन्न हो े है: Sैसे (i) क ै से इस अव*ारर्णा का उद्भव हुआ? (ii) इसक े खिलए क्या अपरिरहाय: है? और (iii) इस अव*ारर्णा पर भार ीयों का अ+ुभव क्या र्थीा? 'न्याय, साम्य और सविद्ववेक' शीष:क वाले एक वि+बं* में, र्डंक+ र्डेरेर्ट क े द्वारा उ+ कविठ+ाइयों क े बारें में उल्लेख विकया गया है Sो एक अव*ारर्णा पर चचा: कर ी हैं सिSसकी आक ृ ति अस्पष्ट हैं: “ इसक े प्रारंभ में ही क: विदया Sा सक ा है विक “न्याय, साम्या और सविद्ववेक” एक अच्छा, सहS सूत्र है सिSसका अर्थी: उ +ा ही अति*क या उ +ा ही कम है सिS +ा विक उस समय क े न्याया*ीशों द्वारा साव*ा+ी बर +े से इसका ात्पय: है। एक व्यविX विकसी क े विवचार कर+े की गति विवति* को सीविम कर सक ा है विक क ै से न्याया*ीशों +े वास् व में इस पर विवचार कर+े की विदशावि+द†श वि+*ा:रिर विकए। परिरर्णाम स्र्थीायी मूल्य का +हीं होगा, क्योंविक साव:Sवि+क +ीति की अव*ारर्णा समय और स्र्थीा+ों क े सार्थी परिरवर्ति हो ी रह ी है, इसखिलए पूव:व - अव*ारर्णायें बहु कम उपयोगी हो ी है Sब इ+ वाक्यांशों का उपयोग विकया Sा ा है। आइए हम एक बार इस बा पर सहम हो Sाएं विक 'अवणिशष्ट ा' या 'असंग ा' क े संदभÂ क े न्यातियक अ+ुप्रयोगों की परिरसीम+ है। बहु कम मामले एक वास् विवक सिSज्ञासा विदखा े हैं विक वाक्यांश का क्या अर्थी: है, कई अणिभव्यविXयाँ अस क: ा क े कारर्ण उत्पन्न हैं, और परिरर्णामस्वरूप कोई प्राति*करर्ण +हीं हैं। लेविक+ सूत्र क े क ु छ प्रति वि+ति*क अ+ुप्रयोगों क े सव†क्षर्ण, और इसक े असा*ारर्ण इति हास की समीक्षा पर, मामले पर विवचार कर े हुए उस परिरप्रेक्ष्य में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रख+े में मदद कर सक ी है, विक विवकासशील देशों की विवति*क प्रर्णाखिलयों क े विवकास में अभी भी इसकी Sीवं भूविमका है।336 रोम+ विवति* की उत्पखित्त आैर साम्या

656. यह एक गल अव*ारर्णा है विक 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक' शब्द की उत्पखित्त आग्ल विवति* से हुइ: है। सर SॉS: रेंविक+ +े स्पष्ट रूप से कहा है विक न्याय, साम्या और सविद्ववेक आग्ल विवति* में कहीं +हीं खिलखा गया है। 337 रोम+ विवति* शास्त्र क े अध्यय+ क े अलावा, ''Sो यूरोपीय महाद्वीप क े खिलए सामान्य र्थीा'’’ और सोलहवीं श ाब्दी क े बाद में अं£ेSों क े विदमाग में इस अव*ारर्णा की उत्पखित्त हुइ:। अरस् ु +े अप+ी सेविम+ल वक: ’’इणिर्थीक्स’’338 में साम्या आैर न्याय क े मध्य क े सम्बन्* क े बारें में विवचार कर ा है। यद्यविप साम्या सख् न्याय क े समा+ +हीं है, विफर भी यह एक प्रकार का न्याय है। उसक े खिलए, Sहां खिलखिख विवति* में मामले की विवशेष परिरस्जिस्र्थीति यों को संबोति* कर+े क े खिलए क ु छ भी +हीं है और वास् व में उतिच परिरर्णाम, एक असमा+ ा क े (अर्थीा: साम्य या वि+ष्पक्ष ा) चरर्णों को इंविग कर ा है। खिलखिख का+ू+ का पाल+ कर+े से अन्यायपूर्ण: परिरर्णाम हो सक े है। इस दृविष्टकोर्ण में, Sहां क ु छ कारक एक मामले क े थ्यों को साव:Sवि+क +ीति Sैसे विवशेष मंच पर रख े हैं, विक आम ौर पर व्यX का+ू+ों क े सख् का+ू+ी परिरर्णाम को लागू कर+ा अन्यायपूर्ण: होगा। परिरर्णाम ः, खिलखिख विवति* से प्रस्र्थीा+ (अरस् ु क े अ+ुसार) अ+ुज्ञेय है इस प्रस्र्थीा+ +े क ु छ विवचारों को 336 Dr J Duncan M Derrett, Justice Equity and Good Conscience in Changing Law in Developing Countries (JND Anderson ed.) at page 120 337 Sir George Rankin, The Personal Law in British India, Sir George Birdwood Memorial Lecture on 21 February, 1941. 338 Aristotle, Ethics, JAK Thomson (trans) (London, Penguin, 1976) at pages 198–200. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उठा+े क े विवणिशष्ट उद्देश्य की पूर्ति की, Sो एक न्यायसंग और न्यायसंग वि+ष्कष: पर पहुंच+े क े खिलए एक थ्यात्मक ढ़ाचें को सूतिच कर े हैं। यह *ारर्णा साम्या की पतिश्चमी विवति*क परंपरा क े खिलए प्रेरर्णा और आ*ार र्थीी।339

657. र्डेरेर्ट क े दस् ावेS यह है विक उपरोX *ारर्णा रोम+ क े दो प्रकार क े प्रस् ावों से प्रभाविव हैः (I) साम्या विवति* की व्याख्या में एक सहयोगी क े रूप पस् ु विकया गया Sो उसे सही, संशोति* कर+े और यविद आवश्यक हो, ो इसे संशोति* कर+ा चाविहए आैर (II) खिलखिख या अन्यर्थीा अणिभवि+श्चायक विवति* की कमी को सही कर+े क े खिलए। अन् में, साम्या की भूविमका वि+म्+खिलखिख अव*ारिर की गइ: है। ''यविद हम न्याय को साम्या क े सहसंबं*ी क े रूप में देख े हैं, ो न्याय में सकारात्मक का+ू+ हो े हैं, Sो खिलखिख और अखिलखिख स्रो ों, विवति*यों और रीति -रिरवाSों से ब+े हो े हैं, इ+की प्रयोज्य ा या ो स्वयं सकारात्मक का+ू+ या प्राक ृ ति क साम्या द्वारा वि+*ा:रिर की Sा ी है, यह कह+ा है, मामले का प्राक ृ ति क कारर्ण है। लेविक+ दूसरे अर्थी: में साम्या न्याय की स्वीर क े रूप में साम+े आ ी है। इसक े Sोड़े क े विब+ा इसका उपयोग +ही विकया Sा सक ा है, साम्या का ात्पय: (I) Sो वाद की परिरस्जिस्र्थी ी को संसोति* कर ा है। कठोर का+ू+ या यर्थीार्थी: विवति*, विवति* क े शब्द, यह सब अचा+क हो सक ा है, यविद कभी, साम्या की सहाय ा क े विब+ा आगे Sा+े पर। इस प्रकार, इसक े अर्थी: में (I) साम्या न्याय से ब*ां हुआ है, आैर बाह्य स्रो ो क े द्वारा इसकी परीभाषा का प ा चल ा है। इसक े दूशरे अर्थी: में, स्पष्ट विवति* क े द्वारा छोर्डे़ अन् रालों को साम्या क े द्वारा भरा Sा ा है। विवति* द्वारा आच्छाविद वादों क े खिलए यह खिलखिख विवति* या अखिलखिख विवति* क े परिरपूरक है, उदाहरर्ण क े खिलए, इसे विवति* क े द्वारा कइ: शब्दों व्याख्या की गइ: है। अर्थीा: (ii) साम्या विवति* का एक 339 Max Hamburger, Morals and Law: The Growth of Aristotle‘s Legal Theory (1965). mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA महत्वपूर्ण: स्रो है, विवशेष रूप से विवकसिस दशों में है। साम्या खिलखिख या अखिलखिख दाे+ों क े अर्थी: में है।''340

658. का+ू+ और न्याय क े बीच सहसंबं* परिरभाविष कारक र्थीा-एक अर्थी: में, साम्या लागू विवति* को संशोति* कर ी है या अदाल क े समक्ष न्याय को प्रदा+ कर+े क े खिलए विवशेष परिरस्जिस्र्थीति यों को संबोति* कर+े क े खिलए इसकी उपयुX ा सुवि+तिश्च कर ी है। मामले की परिरस्जिस्र्थीति यों क े खिलए सामान्य वि+यमों का संशो*+ साम्या द्वारा वि+द†णिश है Sबविक इसक े अलावा सकारात्मक का+ू+ क े अपमा+ या वि+षे* में +हीं है। यह सकारात्मक का+ू+ का समर्थी:+ कर ा है लेविक+ इसे दबा ा +हीं है। एक दूसरे अर्थी: में, Sहां लागू विवति*क सिसद्धां ों क े रूप में सकारात्मक का+ू+ मौ+ है, साम्या का+ू+ क े स्रो क े रूप में एक प्रार्थीविमक भूविमका वि+भा ी है। साम्या सकारात्मक का+ू+ में मौSूद अं रालों को भर+े क े खिलए एक कदम है। इस प्रकार, Sहां कोई सकारात्मक का+ू+ समझ में +हीं आ ा है वहां अदाल ें साम्या को एक स्रो क े रूप में देख ी हैं। इसक े अति रिरX, र्डेरेर्ट +े यह भी उल्लेख विकया है विक यहां एक ीसरा अर्थी: है सिSसमें साम्या को महत्व विदया Sा ा है -Sहां स्र्थीाविप राS+ीति क प्राति*करर्ण को हर्टा विदया Sा ा है या संदेह में है और विवति* क े औपचारिरक स्रो संदेह में हैं, न्यातियक पद की प्रक ृ ति क े अ+ुसार साम्या क े अ+ुसरर्ण में वि+र्ण:य की आवश्यक ा हो ी है. यह विव*वाओं और अ+ार्थीों से संबंति* वि+र्ण:यों और व्यापारिरक का+ू+ का दायरे में स्पष्ट विकया गया र्थीा। 340 Dr J Duncan M Derrett, Justice Equity and Good Conscience in Changing Law in Developing Countries (JND Anderson ed.) at page 120 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

659. उपरोX उल्लेखिख ी+ों अर्थीÂ में, साम्या +े न्याया*ीशों को का+ू+ क े सामान्य सिसद्धां ों और उ+क े समक्ष विवशेष परिरस्जिस्र्थीति यों को Sोड़+े का विववेक प्रदा+ विकया। हालांविक,उ+क े विववेक की सीमा कोइ: सीमा +ही र्थीी। र्डे़रेर्ट +े उसका उतिच उल्लेख विकया: "इस क्षेत्राति*कार क े खिलए सीमा क्या र्थीी? क्या इसका म लब यह र्थीा विक न्याया*ीश +े उ+का अ+ुसरर्ण विकया और उसकी कल्प+ा क े अ+ुसार वि+र्ण:य विदया? +हीं.... यह बार-बार Sोर विदया Sा ा है विक न्याया*ीश का+ू+ क े अ+ुरूप प्राव*ा+ों से परामश: कर ा है; न्यातियक सूविX, विवशेष रूप से विवति* क े ढ़ाचे में वि+विह है, यद्यविप ये वास् व में का+ू+ या साम्या क े खिलखिख स्रो ों में इस रह क े मामले में लागू +हीं विकए गए हैं; और न्यायविवदों का लेख+ विवति*क सोच क े अन् ग: है। पहला कदम यह देख+े क े खिलए होगा विक क्या संविह ा क े अन्य प्राव*ा+ समस्या पर कोई सामान्य प्रकाश र्डाल े हैं। इसका ात्पय: खिलखिख विवति* की व्याख्या से है... इस प्रकार बहु सारे मामलों में साम्या क े का+ू+ का परामश: शाविमल है... 341 ।" इस अर्थी: में, सकारात्मक विवति* और समान्य सिसद्घां, सकारात्मक विवति* क े खिलए उपयोगी माग:दश:क क े रूप में यह सुवि+तिश्च कर+े का काय: कर े हैं विक साम्या न्याया*ीशों क े व्यविXग दृविष्टकोर्ण को प्रभावी ब+ा+े की पद्धति +हीं है। Sहां का+ू+ क े एक स्रो को प्रस् ु कर+े क े खिलए सकारात्मक का+ू+ मौ+ है और साम्या विवति* क े स्रोत्र क े रूप में प्रस् ु कर ा है, इसकी विवषयवस् ु विवति* क े विवणिभन्न प्राव*ा+ों क े अ+ुरूप है सिSसे एक उपयोगी माग:दर्भिशका क े रूप प्रस् ु विकया Sा ा हैं आैर यह सुवि+तिश्च कर ा है विक 341 Dr J Duncan M Derrett, Justice Equity and Good Conscience in Changing Law in Developing Countries (JND Anderson ed.) at page 123 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साम्या उ+ मूल्यों द्वारा रतिच एक विवस् ृ का+ू+ी ढांचे क े ह काम कर ी है Sो सम£ रूप से विवति*क प्रर्णाली की वै* ा को रेखांविक कर ा हैं।

660. भार में 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक का प्रयोग बॉम्बे में औपवि+वेणिशक शास+ क े सार्थी प्रारम्भ हुआ। चूंविक बंबई +े एक वाणिर्णस्जिज्यक क ें ˆ क े रूप में प्रसिसतिद्घ प्राप्त की र्थीी, इसखिलए भार में और अं£ेSी एर्डविमरखिलर्टी न्यायालयों में सामान्य विवति* की अपया:प्त ा से बच+े क े खिलए व्यापारिरक का+ू+ की एक प्रर्णाली की आवश्यक ा पैदा हुई। अ ः, 1669 में वि+युX क ं प+ी क े न्याया*ीशों को सविद्ववेक क े अ+ुसार न्यायवि+र्ण:य कर+ा अपेतिक्ष र्थीा। 342 अं ः (i) 9 अगस्, 1683 क े रॉयल चार्ट:रों +े बम्बई में वाणिर्णस्जिज्यक और एर्डविमरखिलर्टी न्यायालयों की स्र्थीाप+ा की; और (ii)1683 क े रॉयल चार्ट:रों क े द्वारा 30 विदसंबर, 1687 में मˆास +गर पाखिलका और मेयर न्यायालय स्र्थीाविप विकया। बंबई न्यायालय क्षेत्र को साम्य ा और सविद्ववेक क े वि+यमों क े अ+ुसार, और व्यापारिरयों की विवति*यों और रीति -रिरवाSों क े अ+ुसार, न्याय वि+र्ण:य कर+े की अपेक्षा र्थीी! मˆास क े मेयर का न्यायालय साम्या और सविद्ववेक क े अ+ुसार वि+देणिश विकया Sा+ा र्थीा

661. 5 Sुलाई, 1781 को गव+:र S+रल वारे+ हेन्टिंस्र्टग्स +े बंगाल, विबहार और उड़ीसा प्रां ों क े दीवा+ी न्यायालय में न्याय प्रशास+ क े खिलए विववि+यम+ पारिर विकए। उX विववि+यमों क े विववि+यम+ 60 में अव*ारिर विकया गया है: 342 B Lindsay, British Justice in India, the University of Toronto Law Journal, Vol. 1, No. 2 (1936), at page 344 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "सभी मामलों में, मोफस्जिस्सल दीवा+ी न्यायालय की अति*कारिर ा क े भी र, सिSसक े खिलए कोई विववि+र्मिदष्ट वि+देश +हीं विदए गए हैं और उसक े संबद्ध न्याया*ीश न्याय, ईस्जिक्वर्टी और अच्छे विववेक क े अ+ुसार काय: कर े हैं।" सदर न्यायालय क े न्याया*ीशों क े खिलए इसी प्रकार का उपबं* विववि+यम 93 में विकया गया र्थीा। हालांविक ये प्राव*ा+ प्रक ृ ति में प्रविक्रयात्मक र्थीे, लेविक+ उन्हें भार ीय प्रशासवि+क और विवति*क ढांचे की अव*ारर्णा क े परिरपेक्ष्य में अहिंक विकया गया र्थीा। 1832 क े विववि+यम+ VII क े विववि+यम+ 9 वि+म्+ा+ुसार हैः ''Sहां पक्षकारों की विवणिभन्न अव*ारर्णायें हो ी हैं वहाॅं *मÂ की विवति*यां उस संपखित्त क े विकसी पक्षकार को वंतिच +हीं करेगी Sो ऐसी विवति*यों क े प्रव:+ क े खिलए वह हकदार होगा। ऐसे सभी मामलों में वि+र्ण:य न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े सिसद्धां ों द्वारा शासिस होंगे, यह स्पष्ट रूप से समझा Sा सक ा है, हालांविक, ये प्राव*ा+ Sैसे विवदेशी विवति* या अ£ेSी विवति* क े परिरचय को न्यायसंग +ही मा+े Sोयेगें या इ+ सिसद्घान् ों क े एेसे वादो क े आवेद+ो को स्वीक ृ +हीं विकया Sा सक ा।'' इसक े सार्थी-सार्थी यह वह विवति* र्थीी Sो पक्षकारों क े व्यविXग विवति* क े प्रयोग क े खिलए ब+ाइ: गयी र्थीी। उदाहरर्ण क े खिलए, 1781 में ही, संसद में अति*वि+यम, 1781 पारिर विकया आैर *ारा 17 सिSसमें यह वि+*ा:रिर विकया गया र्थीा विक उच्च म न्यायालय को कलकत्ता क े वि+वासिसयों क े विवरूद्घ सभी मुकदमों को सु++े की शविX हो+ी चाविहए: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “बश यह विक भूविम, विकराया आैर वस् ुआें का उत्तराति*कार आैर इस रह क े सभी मामलों का पक्षकारों क े मध्य संविवदा आैर वि+पर्टारा की विवति* आैर मुतिश्लमों क े द्वारा उसका प्रयोग मुतिश्लमों क े मामलें में वि+*ा:रिर विकया Sायेगा आैर गैन्र्टूस क े मामलें में, गैन्र्टूस की विवति* का प्रयोग विकया Sायेगा और Sहां क े वल एक पक्षकार विवति* और प्रति वादी क े उपयोग क े मामलें मुतिश्लम या गेंर्टू विवति* का प्रयाेग होगा'’’343 वारे+ हेन्टिंस्र्टग्स द्वारा ैयार विकए गए न्याय क े प्रशास+ की योS+ा में दो मुख्य लक्षर्ण र्थीे: सिSसमें दीवा+ी और अपरा*ी दो+ों प्रकार क े अ*ी+स्र्थी न्यायालयों क े पुरःस्र्थीाप+ द्वारा विवक े न्ˆीकरर्ण कर+े क े खिलए र्थीा। दूसरा यह र्थीा विक अप+े वि+Sी का+ू+ों और अप+े घरेलू संबं*ों क े क्षेत्र में हिंहदुओं और मुसलमा+ों दो+ों क े खिलए आरक्षर्ण र्थीा।

662. 1850 क े दशक क न्याया*ीशों +े विहन्दू व्यविXग विवति* और मुस्जिस्लम व्यविXग विवति* का सहारा लेकर आस्र्थीा और *म: क े मामलों का विववि+श्चय विकया, Sहां यर्थीार्थी: उपबं* वि+तिश्च +हीं र्थीे वहाँ न्याया*ीशों से यह आश्वास+ अपेतिक्ष र्थीा विक उ+क े विववि+श्चय प्रत्येक मामले में न्याय की आवश्यक ाओं क े अ+ुरूप हों आैर इसक े खिलए, वे 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक' क े रीक े को अप+ा े र्थीे। अव*ारर्णा और अं£ेSी का+ू+ क े बीच संयोS+ 343 See also Article 27 of the Plan of 1772 which reads: ―That in all suits regarding inheritance, marriage and caste and other religious usages and institutions, the laws of the Koran with respect to Mahomedans and those of the Shaster with respect to Gentoos shall be invariably adhered to. On all such occasions the Molavies shall respectively attend to expound the law and they shall sign the report and assist in passing the decree.‖ See also Section 15 of Regulation IV of the Cornwalliis Code of 1793. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

663. भार ीय विवति*क प्रर्णाली में न्याय, साम्या और सविद्ववेक की शुरुआ क े सार्थी ही *ीरे-*ीरे एक अन्य समा+ान् र विवकास हुआ-उस शब्द क े व्यापक आ*ाराें क े बावSूद, सिSस+े समय-समय पर विवणिभन्न विवति* प्रर्णाखिलयों क े सादृश्य वि+द†श अ+ुज्ञा विकया सिSससे यह उप*ारर्णा उत्पन्न हुई विक “न्याय, साम्या और सविद्ववेक” पद अं£ेSी विवति* का पया:य र्थीा। ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी की शविXयों का विवस् ार क े सार्थी न्याय प्रशास+ की शविX की क ं प+ी में वि+विह र्थीी। एमसी स्र्टेलवार्ड खिलख े है: "चूंविक प्रीवी काउंसिसल क े राज्य परिरवि+*ा:रर्ण आैर विवSय क े द्वारा क ं प+ी का राज्यक्षेत्र *ीरे-*ीरे बड़ा हो ा चला गया। भार ीय न्यायालयों क े वि+र्ण:यों से उच्च म अपीलीय न्यायालय क े अ+ुसार, सभी देशों में वि+र्ण:य क े वि+यमों क े रूप में अ£ेंSी न्यायशास्त्र क े अा*ारभू सिसद्घां का प्रभुत्व बढ़ ा चला गया। यह स्वाभाविवक र्थीा, शायद अपरिरहाय: र्थीा, विक इस न्यायाति*करर्ण की अध्यक्ष ा कर+े वाले प्रख्या अं£ेS न्याया*ीशों को उ+ समस्याओं को हल कर+े का प्रयास कर+ा चाविहए Sो उ+क े साम+े आए Sहां भार ीय वि+यमों या विवति*यों में उ+क े स्वविववेक या रच+ा क े द्वारा उ+ पर कोई प्राव*ा+ लागू +हीं र्थीा Sो वि+यम उ+ पर लागू विकए गये आैर वि+यम आैर उविX सिSसे Sीव+ पय: ं क े खिलए अभ्यस् करा विदया गया र्थीा। इससे यह स्पष्ट हो ा है विक भार से अपीलों में इस अति*करर्ण क े वि+र्ण:यों क े परिरर्णामस्वरूप भार ीय विवति*शास्त्र क े वि+काय में सामान्य विवति* और साम्या क े सिसद्धां ों का वि+रन् र और वि+रं र प्रति पाद+ विकया गया है।"344

664. ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी क े गति विवति*यों में वृतिद्ध क े सार्थी, अं£ेSी विवति* में प्रणिशतिक्ष न्याया*ीशों और बैरिरस्र्टरों +े भार ीय न्यातियक प्रर्णाली को ढाला है। इससे न्यायालयों क े समक्ष र्थीा विब्रविर्टश भार में न्यायालयों क े वि+र्ण:यों में क: -विव क: दो+ों में अं£ेSी विवति* का अति*काति*क संदभ: प्राप्त हुआ। प्रख्या 344 MC Setalvad, The Common Law in India (1960) at pages 31-32. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अमेरिरकी विवद्वा+ माक: गैलेन्र्टर +े अं£ेSी का+ू+ क े सार्थी इस शब्द क े संप्रेषर्ण का दस् ावेS विदया है: "विवति* क े प्राति*क ृ वि+कायों की खोS में, अं£ेSों +े प्राची+ £ंर्थीों और हाल ही की र्टीकाओं क े सं£ह और अ+ुवाद विकए. र्थीाविप, भार ीय विवति* आश्चय:S+क रूप से समावेशी साविब हुई... यह शीघ्र ही मा+ा गया विक शास्त्र विवति* का क े वल एक भाग है और बहु से मामलों में भार ीयों को रूविढ़ग विवति* से कम औपचारिरक वि+कायों द्वारा विववि+यविम विकया Sा ा है लेविक+ यहां क विक प्रर्थीाग का+ू+ भी पया:प्त +हीं र्थीे... महसूस विकए गए अं राल को भर+े की आवश्यक ा अं ः अं£ेSी का+ू+ क े आ*ार पर वै*ावि+क संविह ाकरर्ण की ओर ले Sा+े क े खिलए र्थीी। लेविक+ इस बीच, अदाल ों को, 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक' क े अ+ुसार मामलों को य कर+े का अति*कार प्राप्त हुआ।, ' विवदेशी का+ू+ विवलग समूहों' क े द्वारा शास्त्र और रीति क े अं र को भर विदया गया। हालांविक अन्य स्रो ों से उपयुX वि+यम ब+ा+े का प्रयास विकया गया र्थीा, ज्यादा र मामलों में [अं£ेSी] न्याया*ीश यह मा++े क े खिलए इच्छ ु क र्थीे विक अं£ेSी का+ू+ सबसे उपयुX र्थीा।" 345 (प्रभाव वर्ति* )

665. पक्षकारों क े व्यविXग का+ू+ों क े खिलए प्रवृत्त विवति* और औपवि+वेणिशक सरकार क े द्वारा प्रारम्भ में *ार्मिमक £ंर्थीों का अ+ुवाद कर+े क े खिलए पंतिर्ड ों और मौलविवयों की गवाहीआें पर अवलम्बं खिलया गया र्थीा, सिSन्हें न्याय वि+र्ण:य+ क े खिलए इस् ेमाल विकया Sाएगा। अं ः इस प्रर्णाली को समाप्त कर विदया गया और संबंति* *ार्मिमक £ंर्थीों क े अं£ेSी अ+ुवाद पर अति*क अवलंम्ब खिलया गया। अं ः, औपवि+वेणिशक सरकार +े अं£ेSी विवति* क े सार्थी विकसी 345 Marc Galanter, Law and Society in Modern India (1997), at pages 221,222 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शेष कमी को पूरा कर+े का प्रयास विकया।346 भार में अपील की अंति म अदाल क े रूप में विप्रवी काउंसिसल की स्र्थीाप+ा 1833 में एक आैर प्रेरर्णा र्थीी। इ+ दो+ों क े परिरर्णामस्वरूप 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक' अं£ेSी विवति* में सस्जिम्मखिल हुआ। हाँलाविक, वास् व में, 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक' शब्द को का+ू+ी सिसद्धां ों क े स्रो क े रूप में विवति*क प्रर्णाखिलयों क े खिलए एक व्यापक परिरव:+ क े संदभ: को अति*क ृ कर ा है सिSसे अदाल क े समक्ष विवणिशष्ट मामले पर लागू विकया Sा सक ा है और यह एक उतिच परिरर्णाम सुवि+तिश्च कर ा है।

666. मुख्य न्याया*ीश बा+†स पीकाक क े द्वारा उपयुX का+ू+ी स्जिस्र्थी ी को र्डे़ेगूबरी र्डब्बी ब+ाम इश+ चुन्दर से+347 में अंविक विकया गया। सिSसमें वि+म्+ अव*ारिर कया गयाः "अब, साम्य, न्याय और सविद्ववेक को प्रभाव में ला+े क े खिलए, Sहाँ हम उ+ सिसद्धां ों की लाश में हैं Sो हमें माग:दश:+ कर+े क े खिलए हैं ? हमें अन्य देशों की विवति*यों को देख+ा चाविहए Sहां साम्या और न्याय उ+ सिसद्धां ों पर प्रशासिस हो ा है Sो सविदयों से विवकसिस हो रहा है, और यह देख+ा है विक अदाल ें समा+ परिरस्जिस्र्थीति यों में क ै से काय: कर ी हैं; और यविद हम पा े हैं विक सिS+ वि+यमों को उन्हों+े वि+*ा:रिर विकया है, वे साम्या क े सही सिसद्धां ों क े अ+ुसार हैं, ो हम उ+का पाल+ कर+े में ऋ ु विर्ट +हीं कर सक े।" 346 Sir George Rankin, the Personal Law in British India, Sir George Birdwood Memorial Lecture on 21 February, 1941– ―Under the scheme of 1772 the English judges in the civil courts were to get their law form the pandits and moulavies. These ―law officers‖ lasted as an institution from 1772 till 1864, then they were abolished, not before their usefulness had come to an end. There was no system of training them, as Sir Thomas Strange was to point out (1825); their qualifications were not always great, nor temptation always absent. It was imperative that the texts should be made available to the judges themselves, and the labours of Jones, Henry Colebrooke, theMacnaghtens, and Strange were directed to the translation of the original authorities and the exposition of their contents 347 (1868) 9 W.R. 230, 232. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भार में न्यातियक वि+र्ण:यों में अव*ारर्णा क े विवकास की एक वास् विवक समझ पाई गई। गार्थीा राम विमस्री ब+ाम मोविह ा कोसिS+ एर्टाह र्डोमू+ई,348 348 में वादी +े संवै*ावि+क अति*कारों की बहाली क े खिलए मुकदमा दायर विकया। उपायुX +े अव*ारिर विकया विक यद्यविप एक समारोह हुआ र्थीा, लेविक+ इस+े औपचारिरक विववाह +हीं विकया गया आैर +ा ही कोई कारर्ण ब ाया गया र्थीा और इसखिलए, मामले को रिरमांर्ड पर खिलया गया र्थीा। इस वि+द†श क े अति रिरX ्, न्यायमूर्ति र्डब्ल्यू माब-बी +े संवै*ावि+क संबं*ों की बहाली क े एक तिर्डक्री की प्रव:+ीय ा क े संबं* में एक अति रिरX अवलोक+ विकया: ''परं ु वि+तिश्च रूप से, Sब हम इंग्लैंर्ड की विवति* को एक माग:दश:क क े रूप में देख े हैं, ो यह वह विवति* है Sहां यह विवति* सम ा और न्यायशास्त्र क े सामान्य सिसद्धां ों क े सार्थी सामंSस्य रख ी है विक Sँहा वह असा*रर्ण + हो वहाॅं हमें उसे अंगीकार कर+ा चाविहए। यह विक अं£ेSी का+ू+, दाम्पत्य अति*कारों को लागू कर+े क े विवषय पर, अपवाद है, मेरे पास संदेह का कोई कारर्ण +हीं है... इसखिलए, यह मुझे प्र ी हो ा है, विक यविद हम इसे रोक सक े है विक एक अदाल असीविम Sुमा:+ा और कारावास द्वारा दाम्प य क:व्यों क े वि+रं र प्रदश:+ को लागू कर सक ी है, ो हमें इंग्लैंर्ड क े चच: क े का+ू+ को छोड़कर, इस देश विक विवति* को पूरे सभ्य दुवि+या विक विवति* क े विवरो* में रख+ा चाविहए। (प्रभाव वर्ति* ) न्यायालय +े यह स्पविष्टकरर्ण विदया विक यद्यविप Sहाँ अ£ेंSी विवति* क े माग:दश:क क े रूप में प्रस् ु विकया Sा ा है पहला स् र यह है विक क्या इसे सामान्य 348 (1875) 23 W.R. 179 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साम्या आैर न्याय क े सिसद्घान् ों क े द्वारा पुविष्ट विकया Sाये। न्यायालय +े यह मा+ा है विक दाम्पत्य अति*कारों की माँग अर्थीवा Sुमा:+ों का दद: आैर कारावास इंग्लै°र्ड की विवति* क े अ+ुरूप है, न्यायालय इसे स्वीकाय: कर+े क े खिलए बाघ्य +हीं है Sहाँ सभ्य विवति*क व्यवस्र्थीा क े शाविष सिसद्घान् ों क े रूप इंविग कर े है विक इसे लागू कर+ा न्याय, साम्या आैर सविद्ववेक क े सिसद्घान् ों क े विवरो* में होगा।

667. रा*ा विकश+ ब+ाम राS कौर349 में एक पुरुष Sो अन्:Sा ीय विववाह से एक बच्चें को Sन्म विदया ो उसे अछ ू मा+ा Sा ा र्थीा। उ+की मृत्यु पर, मविहला +े उसकी संपखित्त प्राप्त की, सिSसका कब्Sा उस+े अप+ी मृत्यु पर अप+े बच्चों को सौंप विदया। पुरूष क े भाइयों +े अप+ी संपखित्त की वसूली क े खिलए मुकदमा दायर विकया, सिSसमें कहा गया विक मविहला और उ+क े +ाSायS बच्चों को संपखित्त का कोई अति*कार +हीं र्थीा। अदाल +े अं£ेSी का+ू+ क े विकसी भी संदभ: क े विब+ा, यह अव*ारिर विकया विक संपखित्त स्वअर्जिS र्थीी और न्याय, साम्या और सविद्ववेक की आवश्यक ा र्थीी विक मुकदमा खारिरS कर विदया Sाए। मुख्य न्याया*ीश एर्डगर और न्यायमूर्ति +क्स +े इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े खिलए सम£ रूप से अव*ारिर विकया: ’’हम इस मामले में हमारा माग:दश:+ कर+े क े खिलए विकसी वि+तिश्च सिसद्धां का हवाला दे े हुए अति*कारिरयों और £ंर्थीों क े बीच +हीं प्राप्त कर सक े हैं इ+ परिरस्जिस्र्थीति यों में हमें साम्या और सविद्ववेक क े सिसद्धां ों पर कार:वाई कर+ी चाविहए, और खुमा+ +े अप+े बेर्टों और उ+की मां और मृ क बेर्टे की विव*वा क े भाइयों क े लाभ क े खिलए अर्जिS संपखित्त क े कब्Sे से बाहर कर+े क े खिलए अस्वीकार कर विदया।’’ 349 (1891) 13 All 573 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अं£ेSी विवति* में कोई स्पष्ट संदभ: +हीं विदया गया र्थीा, लेविक+ सामान्य सिसद्धां ों क े खिलए Sो 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक की अव*ारर्णा की विवषयवस् ु प्रदा+ करेगा।

668. राSाह विकश+दत्त राम ब+ाम राSाह मुम ाज़ अली खा+350 में, विप्रवी काउंसिसल +े एक बं*क को छ ु ड़ा+े क े खिलए अति*कारों में कु छ परिरव:+ विकया, सिSसकी संपखित्त को बं*क द्वारा कु छ विवलय क े माध्यम से कब्Sे में ले खिलया र्थीा।न्यायमूर्ति Sेर्डब्ल्यू कोलविवले +े इस प्रकार अव*ारिर विकया र्थीा। 27.... यविद लागू विकया गया सिसद्धां अं£ेSी विवति* क े विकसी क+ीकी वि+यम पर वि+भ:र कर ा है, ो यह वि+तिश्च रूप से साम्या और सविद्ववेक क े व्यापक सिसद्धां ों पर, इस रह वि+*ा:रिर मामले क े खिलए अ+ुपयुX होगा। यह क े वल इसखिलए लागू हो ा है क्योंविक यह सामान्य साम्या और सविद्ववेक क े खिलए सहम है। अैार पु+ः यविद यह उस व्यविX क े पास है, ो इसकी प्रयोज्य ा की सीमा को अ£ेSी वि+र्ण:यों क े क्रम में कड़ाई से परिरीभाविष +हीं विकया Sा+ा चाविहए, यद्यविप वे वि+र्ण:य वि+स्संन्देह मूल्यवा+ है, अब वे सामान्य साम्या क े सिसद्घान् ों क े रूप पहचा+े Sा े है, अैार यह ब ा े है विक इस देश क े न्यायालयों क े द्वारा क ै से इसे प्रयोज्य विकया Sा ा है।

669. स्जिस्र्थी ी यह विक शब्द न्याय, साम्या अैार सविद्ववेक अ£ेSी विवति* को इंविग कर े है अैार इस प्रकार असमर्भिर्थी है। यह सिसद्घान् अ£ेSी विवति* से बच+े का एक रीका र्थीा351, यह सत्य है विक भार में इसक े आवेद+ अ£ेSी विवति* क े प्रसार की शुरूआ इसक े भूमंर्डलीकरर्ण, अणिभवृतिद्घ अैार महामारी 350 (1878-79) 6 IA 145 351 Dr J Duncan M Derrett, Justice Equity and Good Conscience In Changing Law in Developing Countries (JND Anderson ed.) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भार ीय विवति*क प्रर्णाली में अ£Sी विवति* क े प्रसार की शुरूआ सामुदातियक महामारी क े द्वारा लागू विकया गया। राष्ट्रीय सीमाओं का विवति* प्रर्णाखिलयों क े अ+ुरुप वि+द†श दे+े वाला सिसद्घान् है। यद्यविप यह शब्द रोम+ क े मूल शब्द क े व्यापक अ+ुप्रयोग क े खिलए उपलब्* है, यहां क विक Sहां एक व्यX प्राव*ा+ है विक Sो मामले मे लागू हो ा है अैार भार में विवकसिस शब्दों क े विवकास को इंविग कर ा है विक यह क े वल वही है Sहां सकारात्मक का+ू+ और प्रर्थीाग का+ू+ मौ+ या विवक ृ या बे ुक े परिरर्णामों का +े ृत्व कर े र्थीे अैार न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े सिसद्धां ों को लागू विकया गया र्थीा। व:मा+ में न्याय, साम्या अैार सद्वविवेक का स्वरूप

670. वै*ावि+क का+ू+ और पूव: वि+र्ण:य क े विवकास क े सार्थी, हिंहदू संविह ा और शरीअ़ अति*वि+यम 1937 में रीति -रिरवाSों क े प्रगति शील संविह ाकरर्ण सविह, न्याय, साम्या और सविद्ववेक पर वि+भ:र ा को *ीरे-*ीरे कम कर+े की आवश्यक ा है। न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े प्रयोग क े खिलए एक वि+म्+ र क्षेत्र है Sब एक क़ा+ू+ क े ह स्र्थीाविप सिसद्धां थ्यात्मक स्जिस्र्थीति यों को कवर कर े हैं या Sहां प्रश्न में व्यविXग का+ू+ की प्रर्णाली को अं र्मि+विह सिसद्धां ों को वि+तिश्च रूप से वि+*ा:रिर विकया Sा सक ा है। लेविक+ विफर भी, इस सिसद्धां को अप+ा+े से न्यातियक णिशल्प में क्षति होगी, Sो विवति* द्वारा शासिस का+ू+ क े क्षेत्रों क े खिलए न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े प्रयोग से बाहर कर ा है। क्योंविक विवति* का विवकास *ीरे -*ीरे हो ा है, क्योंविक न्याया*ीश उतिच परिरर्णाम प्राप्त कर+े क े खिलए विवति* क े सार्थी स्वयं काय: कर े हैं। Sहां पक्षकारों क े अति*कारों को विकसी विवशेष व्यविXग का+ू+ द्वारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शासिस +हीं विकया Sा ा हैं, या Sहां व्यविXग का+ू+ एक अदाल द्वारा प ा लगा+े क े खिलए मौ+ या अक्षम हो ा है, Sहां विकसी संविह में अं र हो ा है, या Sहां का+ू+ का स्रो विवफल रह ा है या परिरपूरिर विकये Sा+े की आवश्यक ा हो ी है, न्याय, साम्या और सविद्ववेक को ठीक से संदर्भिभ विकया Sा सक ा है।

671. स्व ंत्र ा क े पश्चा ्, भार ीय न्यायालयों +े अव*ारर्णा का कम ही उपयोग विकया है हिंक ु न्याय, साम्या और सविद्ववेक शब्द का व्यापक दृविष्टकोर्ण अप+ाया है। इस न्यायालय क े दो मामले णिशक्षाप्रद हैं। +ामदेव लोकम+ लो*ी ब+ाम +म:दबाई352 352 में, यह क: विदया गया र्थीा विक संपखित्त हस् ां रर्ण अति*वि+यम की *ारा 111 (Sी) में 1929 में विकए गए संशो*+ में पट्टेदार द्वारा पट्टे क े वि+*ा:रर्ण क े खिलए खिलखिख +ोविर्टस की आवश्यक ा हो ी है, Sो न्याय, साम्या और सविद्ववेक का एक सिसद्धां क े अ+ुसार है। न्यायमूर्ति मेहर चंद महाS+ (Sैसा विक वह ब र्थीे), इस न्यायालय की दो न्याया*ीश पीठ क े द्वारा वि+म्+ अव*ारिर विकया: ‘’7. इस प्रकार विवचार क े खिलए मुख्य हिंबदु यह है विक क्या संपखित्त हस् ां रर्ण अति*वि+यम 1929 की *ारा 111 की उप-*ारा (Sी) में प्रारम्भ विकया गया विवशेष प्राव*ा+ है, लेविक+ न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े सिसद्धां की एक वै*ावि+क मान्य ा है, या यह है विव*ातियका द्वारा अ+ुभाग में पेश विकया गया एक प्रविक्रयात्मक और क+ीकी वि+यम और साम्या क े विकसी भी अच्छी रह से स्र्थीाविप सिसद्धां ों पर आ*ारिर +हीं है। उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया, और हम सोच े हैं, विक 352 1953 SCR 1009 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +ोविर्टस क े संबं* में *ारा 111 की उप*ारा (Sी) क े प्राव*ा+ न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े विकसी भी सिसद्धां पर आ*ारिर +हीं र्थीा।’’ 18..... इंग्लैंर्ड में मका+ माखिलक क े खिलए विकराए का भुग ा+ + कर+े क े मामले में यह आवश्यक +हीं है विक वह एक ज़ब् ी परिरर्णाम से पहले +ोविर्टस दे। इसखिलए, यह +हीं कहा Sा सक ा है विक *ारा 111 की उप*ारा (छ) में Sो अति*वि+यविम विकया गया है वह एक ऐसा मामला है सिSसे आS भी अं£ेSी का+ू+ में न्याय, साम्या और सविद्ववेक का मामला मा+ा Sा ा है। इस न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया विक बकाया राणिश का भुग ा+ + कर+े पर पट्टेदार द्वारा Sारी विकए Sा रहे +ोविर्टस की आवश्यक ा प्रविक्रया का एक विहस्सा र्थीी, और एक वै*ावि+क S+ादेश अ+ुपस्जिस्र्थी में, इसे 'न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े रूप में प्रस् ु विकया +हीं विकया Sा सक ा र्थीा।' यह पहली +ज़र में विदखाई विदया विक पीठ क े द्वारा अं£ेSी का+ू+ में स्जिस्र्थीति को न्याय, साम्या और सविद्ववेक को सस्जिम्मणिश्र विकया। यह सही स्जिस्र्थीति +हीं है। इस मामले में व्यX विकए गए विवचार को मुरलीलाल ब+ाम देव करर्ण353 में इस न्यायालय द्वारा पु+व्या:ख्या विकया गया र्थीा, Sो अपीलक ा: क े खिखलाफ प्रति वादी द्वारा दायर एक मोच+ मुकदमे से उत्पन्न हुआ र्थीा। प्रति वादी +े क: विदया र्थीा विक हालांविक क ु छ संपखित्तयों क े बं*क क े खिखलाफ उसक े द्वारा खिलए गए ऋर्ण को चुका+े की अवति* समाप्त हो गई र्थीी, विफर भी उसे पु+ः *+ देकर मोच+ करे+ का अति*कार उसक े बचा रहेगा। यह अपीलक ा: द्वारा विवरो* विकया गया र्थीा सिSस+े दावा विकया र्थीा विक वि+*ा:रिर अवति* की समाविप्त पर, अपीलक ा: विगरवी रखी गई संपखित्त का पूर्ण: माखिलक ब+ गया। हालांविक संपखित्त हस् ां रर्ण अति*वि+यम की *ारा 60 +े मोच+ क े इस्जिक्वर्टी सिसद्धां को 353 (1964) 8 SCR 239 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मू: रूप प्रदा+ विकया, यह अलवर में लागू +हीं र्थीा Sहां विववाद उत्पन्न हुआ र्थीा। इस न्यायालय की एक संविव*ा+ पीठ +े अव*ारिर विकया विक बं*क विवलेख में एक प्राव*ा+ र्थीा Sो मोच+ की साम्या पर रोक लगा+े क े खिलए र्थीा। मुख्य न्याया*ीश पीबी गSेन्ˆगढ़कर, पीठ क े खिलए अप+ा पक्ष रख े हुए अव*ारिर विकया । ‘’5. इसखिलए, व:मा+ अपील में Sो मुख्य प्रश्न उठ ा है वह है: क्या बं*क विवलेख में मोच+ द्वारा इस रह की साम्या पर ब+ाए गए एक रोक क े बावSूद बं*क मोच+ की साम्या का पाल+ कर+े वाला न्यायसंग सिसद्धां व:मा+ मामले पर लागू हो ा है। यह प्रश्न इस रूप में उठ ा है, क्योंविक संपखित्त हस् ां रर्ण अति*वि+यम उस समय अलवर पर लागू +हीं हुआ र्थीा Sब बं*क को वि+ष्पाविद विकया गया र्थीा और + ही उस समय Sब 15 वष: की वि+*ा:रिर अवति* समाप्त हो गई र्थीी। ’’ 16….इस क: देख े हुए, यह देख+ा प्रासंविगक होगा विक पारंपरिरक रूप से, भार में अदाल ें लगा ार इस्जिक्वर्टी क े सिसद्धां ों को लागू कर ी रही हैं Sो बं*क कायÂ में वSीफा क े प्रव:+ को रोक े हैं Sो अ+ुतिच रूप से बं*क क े अति*कार को प्रति बंति* कर े हैं या प्रति बंति* कर े हैं... वास् व में, +ामदेव लोकम+ लो*ी ब+ाम +म:दबाई (1953) एससीआर 1009 में इस न्यायालय +े सशX रूप से देखा है विक यह स्वयंसिसद्ध है विक अदाल ों को न्याय, इस्जिक्वर्टी और अच्छी विववेक क े सिसद्धां ों को लागू कर+ा चाविहए Sो उ+क े समक्ष वि+*ा:रर्ण क े खिलए आ े हैं, भले ही संपखित्त हस् ां रर्ण अति*वि+यम क े वै*ावि+क प्राव*ा+ इ+ ले+दे+ पर लागू +हीं विकए Sा े हैं। ये अवलोक+, विवषयवस् ु में, उसी पारंपरिरक न्यातियक दृविष्टकोर्ण का प्रति वि+ति*त्व कर े हैं Sो बन्*कक ा: द्वारा लगाये गये दम+कारी अन्यायपूर्ण: और अ+ुतिच प्रति बं*ों क े सार्थी हो ा है, Sब बं*क दस् ावेSों को वि+ष्पाविद विकया Sा ा है। 16...... इसखिलए, हमें लग ा है विक यह मा+ ले+ा उतिच होगा विक अलवर राज्य में स्र्थीाविप दीवा+ी अदाल ें पूरे देश में दीवा+ी अदाल ों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की रह र्थीीं, न्याय और साम्या का प्रशास+ कर+े क े खिलए आवश्यक र्थीीं, Sहां उ+क े साम+े उठाए गए प्रश्न से वि+पर्ट+े क े खिलए कोई विवणिशष्ट वै*ावि+क प्राव*ा+ +हीं र्थीा।.... इस विबन्दू पर अणिभलेख में रखी विवषयवस् ु की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, हम श्री सरSू प्रसाद क े क: से सहम +हीं हैं विक साम्या और न्याय क े सिसद्धां को व:मा+ विववाद से वि+पर्ट+े में अप्रासंविगक मा+ा Sा+ा चाविहए।

20. इस प्रकार यह स्पष्ट है विक न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े न्यायसंग सिसद्धां को लगा ार राSस्र्थीा+ क े एक बड़े विहस्से में बं*को क े सार्थी चचा: कर े हुए दीवा+ी अदाल ों द्वारा लागू विकया गया है और यह प्रति वादी क े क ्: को समर्थी:+ दे ा है विक इसे अलवर में भी मान्य ा दी गई र्थीी। यविद एक बं*क विवलेख में एक श: शाविमल है Sो अ+ुतिच रूप से संयम रख ा है या बं*क की मोच+ अदाल ों की इस्जिक्वर्टी को प्रति बंति* कर ा है, ो उस वSीफा को अ+देखा कर+े और बं*क क े अति*कार को लागू कर+े का अति*कार विदया गया र्थीा, वि+तिश्च रूप से, उस सीमा में वि+*ा:रिर सीमा क े सामान्य का+ू+ क े खिलए। इसखिलए, हम सं ुष्ट हैं विक अपीलक ा: द्वारा राSस्र्थीा+ उच्च न्यायालय क े वि+ष्कष: क े सार्थी हमारे हस् क्षेप को सही ठहरा+े क े खिलए कोई वाद +हीं दायर विकया गया है विक अपीलक ा: सिSस प्रासंविगक स्जिस्र्थीति पर अवलंम्ब खिलया है, उसे लागू विकया Sा+ा चाविहए, भले ही यह साम्या क े मोच+ पर रोक लगा ा।

672. न्यायालय +े उच्च न्यायालयों क े फ ै सलों क े उदाहरर्णों का भी हवाला विदया, सिSसे अव*ारिर विकया Sा चुका र्थीा विक संपखित्त हस् ां रर्ण अति*वि+यम की *ारा 60 +े न्यायसंग और न्यायसंग सिसद्धां को मू: रूप विदया। इस दृविष्टकोर्ण में, बेंच +े न्याय, साम्या और सविद्ववेक द्वारा सतिन्नविह सिसद्धां ों का एक व्यापक दृविष्टकोर्ण खिलया। न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया विक +ामदेव क े वाद में इस न्यायालय का दृविष्टकोर्ण अ+ुतिच और दम+कारी संविवदात्मक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA श Â की अ+ुरूप स्जिस्र्थीति क े अ+ुरूप और समा+ है और इस अर्थी: में, न्याय, साम्या और सविद्ववेक क े वल अं£ेSी का+ू+ क े अ+ुरूप र्थीी, Sहां अं£ेSी का+ू+ स्वयं न्याय, साम्या अैार सविद्ववेक द्वारा समर्भिर्थी सिसद्धां अ+ुरूप र्थीा।

673. सामान्य अं र्मि+विह सूत्र यह है विक न्याय, साम्या अैार सविद्ववेक न्यायालय क े समक्ष व:मा+ परिरस्जिस्र्थीति यों में वाद को राह प्रदा+ कर+े क े खिलए न्यायालय को सक्षम ब+ा+े क े खिलए एक पूरक भूविमका वि+भा ा है Sहाँ न्यायालय क े समक्ष आये विववादों पर वि+र्ण:य दे+े क े खिलए न्यायालयों क े पास मौSूदा वै*ावि+क ढाँचा अपया:प्त है अर्थीवा विकसी पूव: वि+*ा:रिर न्यातियक सिसद्घान् या प्रर्थीायों से सहारा +ही खिलया Sा सक ा है, न्यायालय विकसी मामलें को वि+ष्पक्ष रूप से वि+स् ारर्ण कर+े क े खिलए न्याय, साम्या, सविद्ववेक क े सिसद्घान् ों से विवति*क रूप सहारा ले े है न्यायालय विवति*क अति*कारों से उत्पन्न विववाद को वि+र्ण- कर+े क े दातियत्व को त्याग +हीं सक ा, क्योंविक विकसी वाद क े थ्य मौSूदा विवति* क े शब्दों क े प्रयोग क े खिलए स्व ः सहS रूप से +हीं मा+ा Sा सक ा है। भार ीय न्यायालयों +े पक्षकारों क े मध्य न्याय कर+े क े खिलए विवति*क विववादों क े वास् विवक आ*ारों क े सार्थी विवति* क े शब्दों की अपूर्ण: ा या अ+ुपयुX ा की कविम को पूरा कर+े क े खिलये न्याय, सविद्ववेक अैार साम्या क े सिसद्घान् ों का लम्बे समय से लाभ उठाया है साम्या, न्याय क े एक अवि+वाय: घर्टक क े रूप में, विववादों क े न्यायवि+र्ण:य+ में अंति म कदम र्थीा। विवणिभन्न विवति*क प्रर्णाखिलयों से का+ू+ी सिसद्धां ों का सहारा ले+े क े बाद, इस विवषय पर विवद्वा+ों +ें कार् विकया, और बार और पी ै ठ का अ+ुभव से यविद कोई वि+र्णा:यक या न्यायसंग परिरर्णाम +हीं प्राप्त विकया Sा सक ा है, ो mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्याया*ीश पक्षकारों क े मध्य साम्या क े सिसद्धां ों को यह सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए लागू विकया Sा सक ा है न्याय विकया Sा चुका है। यह अक्सर न्यायालय की शविXयों में पाया गया है विक वह विवति*क रूप से दो+ों सवहं+ीय अैार न्यायपूर्ण: राह ों काे प्रदा+ कर+े में प्रयोग विकया गया है। इस्जिक्वर्टी और अ+ुच्छेद 142

674. न्याय, साम्या और सविद्ववेक की अव*ारर्णा का न्यायोतिच परिरर्णाम सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए एक उपकरर्ण क े रूप में भी संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 142 में अणिभव्यविX विमल ी है Sो इस प्रकार है: - - 142 (1) सव च्च न्यायालय अप+े अति*कार क्षेत्र में इस रह की तिर्डक्री पारिर कर सक ा है या ऐसा आदेश दे सक ा है Sो विकसी भी वाद या मामले में पूर्ण: न्याय कर+े क े खिलए आवश्यक हो, और इस रह से पारिर विकया गया कोई भी तिर्डक्री या आदेश भार क े पूरे क्षेत्र में इस रह से लागू विकया Sाएगा Sैसे संसद द्वारा ब+ाई गई विकसी भी का+ू+ द्वारा या और Sब क विक उस संबं* में प्राव*ा+ +हीं ब+ाया Sा ा है, या इस रीक े से विक Sब कराष्ट्रति एैसा कोइ आदेश + Sारी करे। ( प्रभाव वर्ति* ) 'पूर्ण: न्याय कर+े क े खिलए आवश्यक है' वाक्याशं का एक व्यापक आयाम है और इसमें साम्या की एक शविX शाविमल है Sो भी काय:र हो ा है Sब विवति* क े कड़ाइ से पाल+ क े द्वारा भी उतिच परिरर्णाम प्राप्त कर+े क े खिलए अपया:प्त है। न्याय की माँगों को + क े वल सकारात्मक का+ू+ क े न्यायवि+र्ण:य+ पर करीबी से ध्या+ दे+े की आवश्यक ा है बस्जिल्क सकारात्मक विवति* क े मौ+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को इसक े अन् राल क े अन्दर खोS+ा एक समा+ ा अैार साम्या का परिरर्णाम है। न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु वाद की बारीविकयों क े खिलए विवति*क उपक्रम सामान्य ः शब्दबद्ध विवति* क े प्रयोग पर आ*ारिर है मा+विवक इति हास की Sविर्टल ाअेां अैार गति विवति*याॅं अवि+वाय: रूप से एक अविद्व ीय संघष: की अेार ले Sा े है Sैसा इस वाद में *म:, इति हास अैार विवति* क े सस्जिम्मल+ है सिSससे विक विवति* अप+े सामान्य प्रक ृ ति से वि+पर्ट+े में अक्षम है Sहाँ सकारात्मक विवति* स्पष्ट है ो वहां भी अ+ुच्छेद 142 क े ह शविX का व्यापक विवस् ार न्यायालय को न्याय क े अ+ुरूप आदेश पारिर कर+े की शविX प्रदा+ कर ा है न्याय क े खिलए वह आ*ार Sो उसक े विवति*क उपक्रम क े उददेश्य को मूल रूप में ला ा है अैार सिSसपर विवति* की वै* ा क े वि+यम वि+भ:र है विवति* क े अ+ुच्छेद 142 क े ह न्यायसंग शविX सामान्य अैार विवणिशष्ट क े बीच क े अन् र को साम+े ला ी है। न्यायालय स्वयं को उ+ परिरस्जिस्र्थीति यों में पा सक ी हैं Sहां वाँछ+ीय विवति* क े मौ+ को उसक े अर्थीÂ क े सार्थी प्रभाविव विकया Sा+ा है या या इसकी छोर्टी-छोर्टी ऋ ु विर्टयों की कठोर ा को अप+े मा+वीय और दयालू स्वरूप को ब+ाए रख+े क े खिलए का+ू+ क े खिलए +रम कर+े की आवश्यक ा है। इसक े अति रिरX इस वाद में यह सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए विक का+ू+ का वि+*ा:रर्ण, व्याख्या अैार उपयोग विकया Sा+ा चाविहए विक भार में इसक े शब्दों काे मूल रूप में ब+ाये रख ा है अैार विवणिभन्न *मÂ अैार बहुल्य मूल्यों को इंकार कर ा है आैर यह अप+ी बहुभाषी और बहु-सांस्क ृ ति क रूपों में है, Sो एक मेर्डली या क्षेत्रों और *मÂ पर आ*ारिर है, विक एक व्यविX क े रूप में भार ीय +ागरिरक और एक राष्ट्र क े रूप में भार को शां ी की भाव+ा का एहसास हो+ा चाविहए। यह एक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायपूर्ण: समाS क े खिलए इस अंति म सं ुल+ की मांग है सिSसे हमें न्याय, साम्या और सविद्ववेक को लागू कर+ा चाविहए। यह इ+ स्जिस्र्थीति यों में है, विक न्यायालय पक्षकारो क े मध्य पूर्ण: न्याय सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए आवश्यक आदेश पारिर करक े उतिच परिरर्णाम सुवि+तिश्च कर+े का अति*कार है।

675. यूवि+य+ काबा:इर्ड कॉप रेश+ ब+ाम यूवि+य+ ऑफ इंतिर्डया354, 354 में इस न्यायालय +े मुख्य न्याया*ीश रंग+ार्थी विमश्रा क े माध्यम से बोल े हुए अ+ुच्छेद 142 क े ह शविX को वि+म्+खिलखिख रीक े से परिरचाखिल कर े हुए कहा: “83. सा*ारर्ण विवति*यों में प्रति षे* या परिरसीमाएं या उपबं* स्वयं में वि+विह +हीं हो सक े है वास् व में अ+ुच्छेद 142 क े अ*ी+ संवै*ावि+क शविXयों पर प्रति षे* या परिरसीमा क े रूप में काय: कर सक े है लेविक+ हम समझ े है एसे प्रति षे* लोक +ीति क े कु छ अं र्मि+विह मूल और सा*ारर्ण विवषयों पर और विकसी विवणिशष्ट विवति*क योS+ा या प्रति रूप क े आ+ुषंविगक विवषय पर आ*ारिर हो+े क े खिलए भी इस प्रकार क े प्रति षे* या सीमाएं दर्भिश की Sा+ी चाविहए। यह कह+ा भी पूर्ण: ः गल होगा विक अ+ुच्छेद 142 क े अ*ी+ शविXयां ऐसे का+ू+ीप्रति षे* को अणिभव्यX कर े हैं। यह इस विवचार को व्यX करेगा विक वै*ावि+क प्राव*ा+ एक संवै*ावि+क प्राव*ा+ की अवहेल+ा कर े हैं। शायद, इस विवचार को व्यX कर+े का उतिच रीका यह है विक अ+ुच्छेद 142 क े ह शविXयों का प्रयोग कर+े और विकसी कारर्ण या मामले क े पूर्ण: न्याय की Sरूर ों का आकल+ कर+े में, शीष: अदाल विकसी भी महत्वपूर्ण: वै*ावि+क प्राव*ा+ क े आ*ार पर साव:Sवि+क +ीति क े क ु छ मौखिलक सिसद्धां ों और द+ुसार अप+ी शविX और विववेक क े अभ्यास को विववि+यविम कर+ा व्यX वि+षे* पर ध्या+ देगा। यह प्रस् ाव अ+ुच्छेद 142 क े अ*ी+ न्यायालय की शविXयों से संबंति* +हीं है, बस्जिल्क क े वल वही है Sो विकसी कारर्ण या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवषय का पूर्ण: न्याय है या +हीं प्रयोग की औतिचत्य का अंति म विवश्लेषर्ण है। न्याय-क्षेत्र या शून्य ा की कमी का कोई सवाल ही +हीं उठ ा। Sहां विकसी स्जिस्र्थीति को संबोति* कर+े क े खिलए कठोर ा को अपया:प्त मा+ा Sा ा है, पूर्ण: न्याय कर+े क े खिलए इस न्यायालय की पूर्ण: शविX साम्या की अं र्मि+विह गुर्णवत्ता क े अंति म उपाय की अपील है सिSसे विवति* की रक्षा क े खिलए ब+ाया गया है, यह सुवि+तिश्च कर+े क े खिलए विक न्यायालय को राह दे+े का अति*कार है Sो कारर्ण और न्याय दो+ों क े सार्थी उपयोगी है। इसी रह, सव च्च न्यायालय बार एसोसिसएश+ ब+ाम यूवि+य+ ऑफ इंतिर्डया355 355 में, न्यायमूर्ति ए एस आ+ंद +े न्यायालय की रफ से यह अव*ारिर विकया है विक: 47.... हालांविक, यह याद रख+े की आवश्यक ा है विक अ+ुच्छेद 142 द्वारा न्यायालय को प्रदत्त शविXयों का प्रक ृ ति में उपचारात्मक हो+े क े कारर्ण यह अर्थी: +हीं लगाया Sा सक ा विक वे ऐसी शविXयां हैं Sो न्यायालय को उसक े समक्ष लंविब विकसी मामले क े संबं* में काय:वाही कर े समय उसक े मूल अति*कारों की उपेक्षा कर+े क े खिलए प्राति*क ृ कर ी है अ+ुच्छेद 142 क े ह, यहां क विक इसक े आयाम की विवस् ार क े सार्थी, एक +ए स्वरूप का वि+मा:र्ण कर+े क े खिलए उपयोग +हीं विकया Sा सक ा है, Sहां पहले कोई भी मौSूद +हीं र्थीा, एक विवषय से संबंति* वै*ावि+क प्राव*ा+ों को व्यX करक े और इस रह अप्रत्यक्ष रूप से क ु छ हासिसल कर+े क े खिलए सिSसे प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त +हीं विकया Sा सक ा है।

676. सम्पूर्ण: न्याय कर+े क े खिलए न्यायालय की राय में आवश्यक तिर्डक्री या आदेश पारिर कर+े की संवै*ावि+क शविX में ही यह विवचार वि+विह है विक न्यायालय को आवश्यक ा+ुसार न्यायपूर्ण: परिरर्णाम सुवि+तिश्च कर+े हे ु इसे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द्नुरूप ब+ा+े की शविX हो+ी चाविहए। Sब विकसी न्यायालय क े समक्ष कठोर मामले356 हो े हैं उसमें विवति* का ऐसा वि+व:च+ विकया Sा ा है Sो सबसे उपयुX हो और Sो विवद्यमा+ न्यातियक फलक को - संविव*ा+, का+ू+, वि+यम, विववि+यम, रीति -रिरवाSों और सामान्य विवति* को न्यायोतिच ठहरा ा हो। Sहां विवति* और न्यायवि+र्ण:य क े अ+न्य वि+यम आ*ारिर सिसद्धां या ो व्यवस्र्थीा क े विक्रयाकलाप की व्याख्या कर+े या ऐसा अ+ु ोष सृसिS कर+े क े खिलए अपया:प्त हों Sो पूर्ण: न्याय सुवि+तिश्च कर ा हो, ऐसे मार्डल को साम्यापूर्ण: मा+कों पर आ*ारिर सिसद्धां ों से संपूरिर कर+ा आवश्यक हो ा है। हालांविक अ+ुच्छेद 142 क े अन् ग: शविX असीम +हीं है। यह न्यायालय को इसक े समक्ष आये मामले में पूर्ण: न्याय दे+े क े खिलए आदेश दे+े क े खिलए प्राति*कृ कर ा है। अ+ुच्छेद 142 में न्याय, साम्या और सविद्ववेक र्थीा पूर्ण: न्याय दे+े क े खिलए न्यायालय की अ+ुपूरक शविX दो+ों वि+विह है। O.[6] अ+ुदा+ और मान्य ा

677. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े यह कहा है विक 1528 में बाबरी मस्जिस्Sद बाबर द्वारा या बाबर क े इशारे पर ब+ाई गई र्थीी Sो विक मुसलमा+ों क े खिलए प्रार्थी:+ा स्र्थील र्थीी। दावा यह है विक वि+मा:र्ण की ति णिर्थी से विदसंबर 1949 में मस्जिस्Sद क े क ु क: विकये Sा+े क मुस्जिस्लम लगा ार इसमें +माS पढ़ े आये र्थीे। Sब क मस्जिस्Sद संलग्न +हीं की Sा ी, ब क इसक े वि+मा:र्ण की ारीख क े बाद से, मुसलमा+ों +े मस्जिस्Sद में लगा ार +माS अदा की। कहा 356 Ronald Dworkin, Hard Cases, Harvard Law Review, Vol. 88., No. 6 (Apr. 1975), pp. 1057-1109. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा ा है विक मस्जिस्Sद क े रख-रखाव और मरम्म का खच: +कद अ+ुदा+ क े रूप में प्राप्त हो ा र्थीा Sो बाबर क े शास+ में शाही खSा+े से विदया Sा ा र्थीा सिSसे औपवि+वेणिशक शास+ क े दौरा+ अं£ेSों द्वारा Sारी रखा गया।

678. इस वाद का महत्वपूर्ण: पहलू सिSसकी वाद 4 में दलील दी गयी है, वह 1528 ई. में मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण और उसक े बाद इबाद क े खिलए मुसलमा+ों द्वारा इसका उपयोग है। लेविक+, सातिक्षक अणिभलेख का एक महत्वपूर्ण: पहलू ऐसे विकसी अणिभलेख का + हो+ा है Sो यह दर्भिश करे विक वि+मा:र्ण क े बाद मस्जिस्Sद को 1856-7 क +माS पढ़+े क े खिलए प्रयोग की Sा ा रहा। वाद में न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े 1856-7 क े दंगों क +माS क े उद्देश्य से मस्जिस्Sद का प्रयोग विकये Sा+े संबं*ी साक्ष्य की कमी वाली विवशेष ा पर ध्या+ विदया। विवद्वा+ न्याया*ीश +े वि+म्+खिलखिख उद्धरर्ण में सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से प्रस् ु श्री सिSला+ी क े क: का उल्लेख विकया है: “2314... भले ही प्रश्नग विवषयों क े उद्देश्य से हम यह मा+ लें विक विववाविद इमार 1528 ई. में ब+वायी गयी र्थीी, विकन् ु ऐसा कोई प्रमार्ण +हीं है विक ब+वा+े क े बाद से मुस्जिस्लमों द्वारा इसका कम से कम 1856-57 क मस्जिस्Sद क े रूप में प्रयोग विकया गया। श्री सिSला+ी +े बहस क े दौरा+ ठीक ही स्वीकार विकया है विक कम से कम 1855 क...कब्Sे या +माS पढ़े Sा+े की स्जिस्र्थीति दशा:+े वाला कोई ऐति हासिसक या अन्य साक्ष्य उपलब्* +हीं है।" इस न्यायालय क े समक्ष सु+वाई क े दौरा+, 1856-7 से पहले मुसलमा+ों द्वारा यहां इबाद विकये Sा+े संबं*ी साक्ष्य की +ामौSूदगी वाली विर्टप्पर्णी को सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से प्रस् ु विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ राSीव mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA *व+ क े समक्ष विवशेष रूप से रखा गया। विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा +े इससे इ+कार +हीं विकया विक वे सातिक्षक अणिभलेख सिS+का सुन्नी वक्फ बोर्ड: द्वारा अवलंब खिलया गया है वि+तिश्च रूप से उ+ अ+ुदा+ों से प्रारम्भ हो े हैं सिS+का विब्रविर्टश सरकार द्वारा मस्जिस्Sद क े रखरखाव क े खिलए Sारी रखा Sा+ा अणिभकणिर्थी है। इसे ध्या+ में रख े हुए, अब साक्ष्यों की Sांच कर+ा आवश्यक हो Sा ा है।

679. सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े अ+ुसार, औपवि+वेणिशक सरकार +े मूल रूप से बाबर क े समय दी Sा+े वाले अ+ुदा+ को Sारी रखा। इस संबं* में, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े अप+े खिलखिख कर्थी+ में दस् ावेSी रिरकॉर्ड: पर अवलंब खिलया है विक: “(ए) 13 माच:, 1860 और 29 Sू+, 1860 क े सरकारी आदेशों को वाले रसिSस्र्टर माविफय में बाबर का +ाम दा ा/अ+ुदा+क ा: क े रूप में दर्भिश विकया गया है।  आगे कॉलम 13, Sो मुख्य आयुX क े आदेश को संदर्भिभ कर ा है, में कहा गया है विक Sब क मस्जिस्Sद को ठीक ठाक रखा Sा ा है और मोहम्मर्ड+ ठीक से आचरर्ण कर े हैं, मैं अ+ुदा+ Sारी रख+े का अ+ुमोद+ कर ा हूं"  इसक े अलावा, कॉलम 14 में, सरकार का 'अंति म आदेश' शीष:क से 29 S+वरी, 1860 क े सरकारी आदेश सं. 2321 में यह उल्लेख विकया गया है विक Sब क वह उद्देश्य पूरा हो ा है सिSसक े खिलए अ+ुदा+ विदया गया है, ब क क े खिलए विदया Sा ा है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अप+े फ ै सले में कहा विक यह विकसी रसिSस्र्टर की एक प्रति प्र ी हो ी है-लेविक+ यह एक अत्यं फर्टा हुआ दस् ावेS है और पृष्ठ 163 की साम£ी लगभग अपठ+ीय है। उन्हों+े वि+म्+व *ारिर विकया: “(बी) विकराए से मुX भूविम अणिभलेख का विववेच+ रसिSस्र्टर (14.3.1860) यह विक सम्रार्ट +े £ाम शह+ावा में बाबरी मस्जिस्Sद +ाम की मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण और रखरखाव क े प्रयोS+ों क े खिलए 302/3/6 रुपये का राSस्व अ+ुदा+ विदया र्थीा। रसिSस्र्टर में वि+म्+खिलखिख हिंबदु दS: विकए गए र्थीे:  सम्रार्ट बाबर का +ाम 'अ+ुदेयी' क े रूप में +ोर्ट विकया गया र्थीा।  विकराया-मुX भूविम गांव शह+ावा में स्जिस्र्थी है और इससे 302 रू. 3 आ+ा और 6 पाई का वार्मिषक राSस्व आ ा है।  यह विकराया-मुX भूविम अ+ुदा+ मुएखिज्ज+ और खाति ब क े वे + खचÂ को पूरा कर+े क े खिलए बाबर द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े समय एक वक्फ क े रूप में विदया गया र्थीा।  यह विकराया मुX अ+ुदा+ सैय्यद बकी को उ+क े Sीव+काल क और उसक े बाद उ+क े बेर्टे को Sीव+ भर और उसक े बाद सैय्यद हुसै+ अली को विदया गया।  बोर्ड: का वि+र्ण:य (विद+ांक 29 Sू+, 1880) यह र्थीा विक अ+ुदा+ उस समय क Sारी रहेगा Sब क वह उद्देश्य पूरा हो ा रहेगा सिSसक े खिलए इसे भूविम राSस्व से छ ू र्ट दी गई र्थीी। दस् ावेज़ में कहा गया है विक अ+ुदा+ की ारीख की कोई Sा+कारी +हीं है और दा ा/अ+ुदा+क ा: का +ाम गवाही क े आ*ार पर है।" इसी रह, गवाही क े आ*ार पर यह कहा गया है विक, यह भूविम मुX अ+ुदा+, सम्रार्ट बाबर द्वारा अयोध्या में बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की ैयारी क े समय वक्फ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े रूप में विदया गया र्थीा, Sो मुएखिज्ज+ और ख ीब क े वे + खचÂ को पूरा कर+े क े खिलए र्थीा।" आदेश और ति णिर्थी ज्ञा +हीं हैं: “(सी) रसिSस्र्टर सं. 6 (ई) क े अंशों की प्रति, 29 Sू+, 1860 विद+ांविक हसील फ ै Sाबाद की सश: भू-राSस्व छ ू र्ट। इस रसिSस्र्टर में मो. असगर और मो रज्जाब अली को उस व्यविX क े +ाम क े रूप में अणिभखिलखिख विकया गया है Sो विकराया मुX भूविम *ारर्ण कर रहा है (कॉलम 6 और 7 में परिरलतिक्ष )।" II +कद ++कार अ+ुदा+ का राSस्व मुX भूविम क े अ+ुदा+ में परिरव:+

680. वष: 1864 में विब्रविर्टश सरकार +े +कद ++कार को अयोध्या क े आसपास शोलापुर और बहोरपुर क े गांवों में स्जिस्र्थी राSस्व मुX भूविम क े अ+ुदा+ में बदल विदया। मुख्य आयुX की मुहर लगा अ+ुदा+ का एक प्रमार्ण पत्र रज्जाब अली और मोहम्मद असगर क े पक्ष में विवलेखिख विकया गया र्थीा। यह इस प्रकार है: "सम्यक Sांच से यह सुस्र्थीाविप है विक रज्जाब अली और मोहम्मद असगर को पूव: सरकार क े अ*ी+ विकराया मुX काय:काल में मौSा शाह+वां सिSला फ ै Sाबाद से ( रू. 302-3-6) ी+ सौ दो रुपये ी+ आ+ा छः पाई का +कद +ा+कर प्राप्त हुआ। गव+:र S+रल इ+ कौंसिसल क े प्राति*कार से मुख्य आयुX वि+म्+ श Â पर ब क अ+ुदा+ Sारी रखेंगे Sब क वह उद्देश्य सिSसक े खिलए अ+ुदा+ विदया गया है,पूरा हो ा रहेगा। यह विक वे प्रश्नग अ+ुदा+ से संबंति* सभी सुन्र्ड, स्वत्व विवलेख और अन्य दस् ावेSों को सरेंर्डर कर देंगें। यह विक वे और उ+क े उत्तराति*कारी पुखिलस, सैन्य या राS+ीति क मामलों में उ+से अपेतिक्ष भू *ारक क े दातियत्वों का कड़ाई से पाल+ करेंगे, और वे विब्रविर्टश सरकार क े शत्रु क े षर्डयंत्र का पक्ष ले+े क े संदेह में +हीं आयेगें। यविद रज्जाब अली और मोहम्मद असगर या उ+क े उत्तराति*कारी द्वारा कोई भी श: ोड़ी Sा ी है ो अ+ुदा+ ुरं बंद हो Sाएगा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उपरोX दस् ावेSों पर विवचार कर े हुए, न्यायमूर्ति अ£वाल +े *ारिर विकया: “2336. हालांविक उपरोX दस् ावेSों से प ा चल ा है विक मीर रज्जाब अली और मोहम्मद असगर को क ु छ अ+ुदा+ विदया गया र्थीा, लेविक+ ऐसा प्र ी +हीं हो ा है विक संबंति* अति*कारिरयों द्वारा विकसी भी प्रकार की Sाँच की गई र्थीी और यविद ऐसा है ो इसका आ*ार क्या र्थीा. मुसलमा+ों क े दावे क े अ+ुसार, बाबर का से+ापति, Sो विववाविद इमार क े वि+मा:र्ण क े खिलए सिSम्मेदार र्थीा, मीर बकी र्थीा। Sबविक मीर रज्जाब अली +े खुद को सैयद बकी क े पौत्र की बेर्टी का दामाद हो+े का दावा विकया। मोहम्मद असगर मीर रज्जाब अली का पुत्र र्थीा, इसखिलए, पुत्र और विप ा +े कणिर्थी मूल मु वल्ली की चौर्थीी पीढ़ी से संबं* का दावा विकया और अ+ुदा+ क े खिलए अप+ा दावा विकया। इसे दर्भिश कर+े क े खिलए कोई साम£ी +हीं है विक ऐसा कोई अ+ुदा+, यद्यविप उपरोX दो+ों व्यविXयों द्वारा अणिभकणिर्थी, विकसी क े द्वारा विदया गया र्थीा। यविद हम इस वाद क े प्रकर्थी+ों क े विहसाब से चले ो विक वक्फ को 1528 में ब+ाया गया र्थीा, ो यह मा++ा पूर्ण: ः अविवश्वस+ीय होगा विक विपछले 325 वष: से अति*क समय में क े वल चार पीविढ़यां हीं हुई और इसक े संबं*ी अति*क से अति*क पांचवी पीढ़ी क े हैं। 1860-61 में प्राति*कारी विकसी न्यातियक दातियत्व से बं*े +हीं र्थीे और हो सक ा है विक इसखिलए कोई विववरर्ण + विदया हो विक Sांच विकस आ*ार पर की गयी र्थीी। हमारे खिलए प्रत्यक्ष ः सैयद बकी, Sो 1528 में हुआ रहा होगा, से प्रारम्भ हो+े वाली मीर रज्जाब अली की वंशावली अविवश्वस+ीय है। यह संदभ: रविह +हीं विक अ+ुदा+ की कहा+ी विप ा पुत्र द्वारा अं£ेSों से अप+े खिलए मूल्यवा+ उपहार ले+े क े खिलए गढ़ी गयी हो। विकसी भी स्जिस्र्थीति में, इ+ दस् ावेSों से क े वल यह प ा चल ा है विक अं£ेSों द्वारा प्रश्नग मस्जिस्Sद क े खिलए विवत्तीय सहाय ा दी Sा ी र्थीी लेविक+ यह अप+े आप में इस बा का साक्ष्य +ही है विक मुस्जिस्लमों द्वारा विहन्दुओं या अन्यर्थीा को छोड़कर, विववाविद इमार का प्रयोग इबाद या इस्लाविमक मSहबी उद्देश्यों क े खिलए विकया Sा ा र्थीा।" (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उपरोX उद्धरर्ण से, ऐसा प्र ी हो ा है विक रज्जाब अली और मोहम्मद असगर को अ+ुदा+ प्रदा+ विकया Sा ा र्थीा। हालांविक, अणिभलेख से क ु छ महत्वपूर्ण: पहलू साम+े आ े हैं: (i) अ+ुदा+ क े आ*ार को उपदर्भिश कर+े वाली सम्यक Sांच का अभाव; (ii) मीर रज्जाब अली द्वारा यह दावा विक वह मीर बकी क े पौत्र की बेर्टी क े दामाद हैं Sबविक मोहम्मद असगर मीर रज्जाब अली क े पुत्र र्थीे; और (iii) 325 वष: क े विपछले इति हास में ऐसे अ+ुदा+ क े आ*ार को दर्भिश कर+े वाली साम£ी का अभाव; और (iv) मीर बकी की चौर्थीी पीढ़ी क े व्यविX द्वारा दावा विकया Sा+ा और अणिभलेख पर अन् व: - ी+ श ास्जिब्दयों का अणिभलेख + हो+ा। चाहे Sो भी हो, उच्च न्यायालय +े +ोर्ट विकया है विक दस् ावेSों से प ा चल ा है विक मस्जिस्Sद क े रखरखाव क े प्रयोS+ों क े खिलए विब्रविर्टश द्वारा विवत्तीय सहाय ा प्रदा+ की गई र्थीी, लेविक+ इससे यह साविब +हीं होगा विक इमार का उपयोग +माS क े खिलए विकया गया। राSस्व मुX भूविम क े उपरोX अ+ुदा+ क े संबं* में, वि+म्+खिलखिख दस् ावेSों का अवलंब खिलया गया है: “(i) 25 अगस्, 1863 को अव* क े मुख्य आयुX क े सतिचव +े फ ै Sाबाद संभाग क े आयुX यह उल्लेख कर े हुए पत्र खिलखा विक गव:+र S+रल +े अयोध्या क े वि+कर्ट Sन्मस्र्थीा+ मस्जिस्Sद क े खिलए स रूप से विदये Sा रहे 302-3-6 रुपये क े +कद अ+ुदा+ को विकराया मुX भूविम क े अ+ुदा+ में बदल+े क े मुख्य आयुX क े प्रस् ाव को मंSूर कर खिलया है। यह भी अ+ुरो* विकया गया विक अयोध्या क े वि+कर्ट कु छ +Sूल भूविम क े अ+ुदा+ द्वारा प्राव*ा+ में परिरव:+ विकया Sाए (प्रदश: ए 14 वाद 1) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) 31 अगस्, 1863 को उपायुX द्वारा विकराया मुX भूविम (302/3/6 रुपए का वार्मिषक विकराया) क े संबं* में एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा सिSसे सरकार द्वारा मस्जिस्Sद Sन्मस्र्थीा+ क े खिलए स्वीक ृ विकया गया र्थीा। यह आदेश विदया गया र्थीा विक इस उद्देश्य क े खिलए तिचवि- प्रस् ाविव भूविम का +क्शा स्पष्ट रूप से सीमाओं को इंविग कर+ा चाविहए और उपायुX द्वारा आयुX को भेSा Sा+ा चाविहए। (iii) 13 सिस ंबर, 1860 को, उपायुX, फ ै Sाबाद द्वारा आदेश पारिर विकया गया र्थीा सिSसमें यह कहा गया र्थीा विक उ+ Sमी+ों का +क्शा, सिSन्हें मस्जिस्Sद की भूविम क े बदले में विदये Sा+े क े अ+ुमोद+ क े खिलए चु+ा गया है, भेSा गया र्थीा। अ ः यह आदेश विदया गया विक त्काल काय:वाही कर+े क े खिलए अपर सहायक आयुX क े समक्ष रखा Sाय। (iv) त्पश्चा ् इस पर विवचार कर+े क े खिलए कई आदेश पारिर विकए गए विक मस्जिस्Sद क े प्रयोS+ क े खिलए कौ+ सी भूविम आबंविर्ट की Sा+ी र्थीी। (v) 10 अX ू बर, 1865 को यह आदेश विदया गया विक भूविम पर कब्Sा त्काल विदया Sाए और अणिभस्वीक ृ ति ली की Sाए। (vi) 19 अX ू बर, 1865 को यह रिरपोर्ट: दी गई विक भूविम को सौंप+े क े संबं* में काय:वाविहयां पूरी हो चुकी हैं और अणिभस्वीक ृ ति की भी पुविष्ट की गई है। (vii) बाद में, 30 अक्र्टूबर, 1865 को, फ़ाइल को रिरकॉर्ड: में भेS विदया गया।

681. विब्रविर्टश सरकार +े मोहम्मद असगर और रज्जाब अली क े प्रति वेद+ पर वार्मिषक +कद अ+ुदा+ बंद कर दे+े क े पश्चा, मुआफी में वष: 1870 में भुरईपुर और शोलापुर क े गांवों में +ई Sमी+ दी। बाद में, मुख्य आयुX द्वारा एक स+द Sारी विकया गया र्थीा विक पुरा+ी सरकार (+वाब क े शास+) मेंं गाँव शह+ावां में विकराया मुX खा ेदारी क े रूप में रज्जाब अली और मोहम्मद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA असगर द्वारा प्राप्त 302 रू./3 आ+ा/6 पाई का +कद ++कार को गव+:र S+रल क े प्राति*कार से (भुरईपुर और शोलापुर गांव में मुआफी क े रूप में) ब+ाए रखा, Sब क विक वह उद्देश्य पूरा हो सिSसक े खिलए अ+ुदा+ दी गयी है। 3 S+वरी/फरवरी 1870 को, मोहम्मद अफSल अली और मोहम्मद असगर ब+ाम सरकार357 क े मामले में बंदोबस् अति*कारी द्वारा एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा, सिSसमें वि+म्+ा+ुसार व्यादेश विकया गया र्थीा: "बहरा+पुर मौSा में श्रेष्ठ र माखिलका+ा हक मोहम्मद असगर और मोहम्मद अफSल अली को राSस्व मुX तिर्डक्री विकया Sा ा है।"

682. वष: 1931 में, +ाSुल रसिSस्र्टर में उसिल्लखिख +कल खसरा आबादी में दS: प्रविवविष्ट में प्लॉर्ट +ंबर 583 में बाबरी मस्जिस्Sद की उपस्जिस्र्थीति दS: की गयी है और कहा गया है विक वह एक मस्जिस्Sद वक्फ अहदे शाविहल र्थीी। यह दस् ावेS यह भी +ोर्ट कर ा है विक रामचबू रा Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में प्रसिसद्ध र्थीा। यह दस् ावेS अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी वि+म्+खिलखिख प्रविवविष्टयाँ उद्धृ कर ा है: “दस् न्दाSी (11) इंˆाS रघु+ार्थी दास क े बSाय महं राम शरर्ण दास Sन्मभूविम क े महं मुकर:र 357 Case No.5 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकए गए। क ै विफय (विववरर्ण) (16) मस्जिस्Sद पोख़् ा वक्फ अहदे शाही अन्दर साहा+ मस्जिस्Sद एक चबू रा Sो Sन्मभूविम क े +ाम से मशहूर है, दरख़् ाँ एक गूलर, एक इमली, एक मुलसिसरी, एक पीपल, एक बेल....मस्जिस्Sद मौसमा शाह बाबर शर मरहूम।" O.[7] विववाद और कब्Sे को पुष्ट कर+े वाले वाद

683. 1856-7 क े दंगों क े बाद अं£ेSों +े ी+ गुंबदाकार ढाँचे क े बाहर एक रेलिंलग लगाई। यह वि+ःसंदेह शांति और व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+े क े खिलए विकया गया प्र ी हो ा है। मुस्जिस्लम रेलिंलग क े अंदर इबाद करेंगे Sबविक हिंहदू बाहर पूSा करेंगे। सिSस मंच को रामचबू रा क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है उसका वि+मा:र्ण हिंहदुओं +े रेलिंलग क े बाहर और उसक े पास में विकया र्थीा। 1885 क े वाद में मोहम्मद असगर क े खिलखिख कर्थी+ में रामचबू रा क े वि+मा:र्ण को संदर्भिभ विकया गया र्थीा। यद्यविप मुस्जिस्लमों क े अ+ुसार, उ+क े द्वारा विदये गए एक आवेद+ पर रामचबू रा को खोद+े क े खिलए एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा सिSसका कोई भी आदेश अणिभलेख पर +हीं रखा गया है। 1856-7 की घर्ट+ा क े बाद कई मामले संस्जिस्र्थी विकये गए र्थीे। इ+में वि+म्+खिलखिख शाविमल हैं वाद संख्या 884- मस्जिस्Sद परिरसर से हिं+हग सिंसह फकीर का वि+ष्कास+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) विद+ांक 28 +वंबर 1858 को र्थीा+ेदार शी ल दुबे +े एक आवेद+ दाखिखल विकया सिSसमें यह कहा गया र्थीा विक पंSाब क े वि+वासी हिं+हग सिंसह फकीर +े गुरू गोविबन्द सिंसह की पूSा और हव+ को आयोसिS विकया और मस्जिस्Sद परिरसर क े भी र 'श्री भगवा+' का प्र ीक लगा विदया। र्थीा+ेदार +े उतिच काय:वाही कर+े की प्रार्थी:+ा की; (ii) 30 +वंबर 1858 को सैय्यद मोहम्मद खाति ब (बाबरी मस्जिस्Sद क े मुअखिज्ज+) +े र्थीा+ाध्यक्ष क े समक्ष वि+हंग द्वारा एक वि+शा+ लगा+े क े बारे में एक परिरवाद दS: कराया, Sो प्रकरर्ण संख्या 884 र्थीी और इसको हर्टा+े की प्रार्थी:+ा की। आवेद+ में उन्हो+ें कहा विकः क) वि+हंग सिंसह मस्जिस्Sद में उपˆव कर रहे हैं; ख) उस+े मस्जिस्Sद क े अन्दर बलपूव:क एक चबू रा ब+ा खिलया र्थीा, मस्जिस्Sद क े अन्दर मूर्ति का एक तिचत्र रख विदया, आग लगायी और पूSा कर रहा र्थीा। उस+े मस्जिस्Sद की दीवार पर कोयले से "राम राम" शब्द खिलख विदए र्थीे; ग) मस्जिस्Sद मुस्जिस्लमों का एक इबाद खा+ा है और यविद कोई इसक े अन्दर क ु छ ब+ा ा है, ो उसे दस्जि°ड़ विकया Sा+ा चाविहए; घ) पहले भी बैराविगयों +े रा भर में 1 बाखिलश् ऊ ँ चाई (लगभग 22.83 सेमी.) का एक चबू रा ब+ा खिलया र्थीा, Sब क व्यादेश Sारी विकए गए; ङ) आवेद+ में कहा गया र्थीा: "पहले वहाँ Sन्म स्र्थीा+ का प्र ीक रहा र्थीा र्थीा विहन्दूओं +े पूSा की" च) इसखिलए यह प्रार्थी:+ा की गयी विक: i. स्र्थील का वि+रीक्षर्ण विकया Sाए और +ये वि+मा:र्ण को ध्वस् कर विदया Sाए; र्थीा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ii. विहन्दूओं को मस्जिस्Sद से बाहर वि+काला Sाए और प्र ीक र्थीा मूर्ति यों को हर्टाया Sाए र्थीा दीवारों पर खिलख गए लेख+ को साफ विकया Sाए। (iii) वाद 4 में वाविदयों की ओर से पेश विवद्वा+ अति*वXा, श्री पाशा द्वारा उपरोX दस् ावेS क े अ+ुवाद क े बारे में एक विववाद उठाया गया है। दस् ावेS का अ+ुवाद इस प्रकार विकया गयाः "आप शाही समय (sic) से दो+ों पक्षकारों क े माखिलक हैं यविद कोई व्यविX बलपूव:क वि+मा:र्ण कर ा है ो उसे आपक े द्वारा दस्जि°ड़ विकया Sायेगा। क ृ पया इस थ्य पर विवचार करें विक मस्जिस्Sद मुस्जिस्लमों का एक इबाद खा+ा है और विहन्दूओं का +हीं है। पहले वहाँ कई सविदयों से Sन्मस्र्थीा+ का प्र ीक रहा र्थीा और विहन्दूओं की पूSा की।" (प्रभाव वर्ति* ) श्री पाशा क े अ+ुसार सही अ+ुवाद इस प्रकार पढ़ा Sा+ा चाविहए: "यह स्पष्ट शाह शब्द से स्पष्ट है विक यविद कोई व्यविX बलपूव:क वि+मा:र्ण कर ा है वह शास+ द्वारा दस्जि°ड़ विकया Sायेगा और मा++ीय आप इस थ्य पर विवचार करें विक मस्जिस्Sद मुस्जिस्लमों का एक इबाद खा+ा है और + विक विवरो*ी स्जिस्र्थीति विक पहले Sन्मस्र्थीा+ सविदयों से वहाँ रहा र्थीा और विहन्दू पूSा विकया कर े र्थीे।" श्री पाशा की दलीलों में शब्द "और + विक विवरो*ी स्जिस्र्थीति " ईSाद विकए गए हैं। वे मुअखिज्ज+ क े पत्र की प्रति खिलपी क े विवरूद्ध पढ़ े हैं। परिरवाद मस्जिस्Sद क े भी र रामचबू रा क े वि+मा:र्ण क े विवरूद्ध र्थीा और इस संबं* में यह कहा गया र्थीा विक यद्यविप पहले Sन्मस्र्थीा+ का प्र ीक सविदयों से वहाँ रहा र्थीा और विहन्दू पूSा कर े र्थीे, पहली बार मस्जिस्Sद क े भी र एक वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) 30 +वंबर 1858 को एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा सिSसक े अ+ुसरर्ण में र्थीा+ेदार शी ल दुबे विववाविद परिरसर गए और वि+हंग सिंसह को आदेश क े बारे में सूतिच विकया, लेविक+ उन्हों+े Sवाब विदया विक पूरा स्र्थीा+ वि+रंकार का है और देश की सरकार को न्याय प्रदा+ कर+ा चाविहए। (v) 1 विदसंबर 1958 को र्थीा+ेदार शी ल दुबे +े प्रकरर्ण संख्या 884 में एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की, सिSसमें यह वर्ण:+ विकया गया विक Sब उन्हों+े 30 +वंबर 1858 को वि+हंग सिंसह फकीर को संबोति* स्र्थीा+ छोड़+े क े खिलए सम+ आदेश को विदया, ो उन्हें कोई उत्तर +हीं विमला। उन्हों+े Sो वास् व में घविर्ट हुआ र्थीा, उसे ब ाया और उच्च अति*कारिरयों से वि+द†श मांगे र्थीे। (vi) प्रकरर्ण संख्या 884 में 5 विदसंबर 1858 को एक आदेश Sारी विकया गया र्थीा सिSसमें 30 +वंबर, 1858 क े आदेश क े अ£सरर्ण में पुखिलस उप- वि+रीक्षक अव* को वि+द†श दे े हुए न्यायालय द्वारा एक वि+द†श Sारी विकया गया र्थीा (सिSसमें यह वि+द†श विदया गया र्थीा विक बाबरी मस्जिस्Sद में बैठे फकीर को वि+काल विदया Sाए) विक यविद फकीर को मौक े से +हीं हर्टाया Sा ा है ो उसे विगरफ् ार कर अदाल में पेश विकया Sा+ा चाविहए; (vii) 6 विदसंबर 1858 को शी ल दुबे, र्थीा+ेदार अव* द्वारा न्यायालय में फकीर की उपस्जिस्र्थीति दS: कर े हुए एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की गई र्थीी; और (viii) 10 विदसंबर, 1858 को यह अणिभखिलखिख कर े हुए एक आदेश पारिर विकया गया विक झंर्डा मस्जिस्Sद से उखाड़ विदया गया र्थीा और उसमें रह+े वाले फकीर को वि+काल विदया गया र्थीा।

684. मीर रज्जब अली द्वारा 5 +वंबर 1860 को वाद संख्या 223 दायर की गयीः 5 +वंबर 1860 को मीर रज्जब अली +े वाद सं. 223 में असकली सिंसह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े खिखलाफ एक अS- दाखिखल की, सिSसमें कविब्रस् ा+ में एक +या "चबू रा" वि+र्मिम विकए Sा+े क े बारे में णिशकाय की गई र्थीी। इस आवेद+ में यह कहा गया र्थीा विक: ए) एक वि+हंग द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद से सर्टे कविब्रस् ा+ में एक छोर्टा "चबू रा" ब+ाया गया र्थीा। उन्हें ऐसा + कर+े क े खिलए कहा गया र्थीा, लेविक+ वह +हीं रूक े और हिंहसक हो गए। ख) पहले, लगभग र्डेढ़ साल पहले, हरिर दास (ह+ुमा+ गढ़ी क े महं ) +े Sबर+ एक घर ब+ा+े की कोणिशश की और हस् क्षेप +हीं कर+े क े खिलए एक बन्*पत्र/हलफ+ामा वि+ष्पाविद करवाया गया। उX हलफ+ामा अभी भी फाइलों में उपलब्* है; ग) आयुX को एक ऐसा झंर्डा भी विमला Sो बाबरी मस्जिस्Sद की Sगह पर लगाया गया र्थीा और इसे देख े ही, झंर्डे को हर्टवा विदया गया। घ) आSकल, Sब मुअस्जिज्ज़+ अSा+ पढ़ ा है, ो विवरो*ी पक्षकार शंख बSा+े लग े हैं; और ई) +ववि+र्मिम "चबू रा" को ध्वस् कर+े क े खिलए वि+द†णिश विकया Sा+ा चाविहए और विवरो*ी पक्षकार से एक हलफ+ामा/बं*पत्र खिलया Sा+ा चाविहए विक वे मस्जिस्Sद की संपखित्त में गैरका+ू+ी और अवै* रूप से हस् क्षेप +हीं करेंगे और अज़ा+ क े समय शंख +हीं बSायेंगे।

685. 12 माच: 1861 को मोहम्मद असगर, रज्जब अली और मोहम्मद अफSल द्वारा विपछले आवेद+ क े अ£सरर्ण में एक आवेद+ दाखिखल विकया गया सिSसमें कहा गया र्थीा विक इमका+ी सिसख +े वादी की भूविम पर अवै* रूप से कब्Sा कर खिलया र्थीा और बाबरी मस्जिस्Sद क े पास अ+ुमति क े विब+ा एक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "चबू रा" ब+ा खिलया र्थीा। यद्यविप विपछले आवेद+ पर, इमका+ी सिसख को "चबू रा" से वि+काल+े का आदेश Sारी विकया गया र्थीा, लेविक+ वह झोपड़ी Sहां वह रह रहा र्थीा, अभी भी है। यह प्रस् ु विकया गया र्थीा विक Sब भी कोई महं वहां Sाएगा या झोपड़ी में रहेगा, ो वाद हे ुक उत्पन्न होगा। इसखिलए यह प्रार्थी:+ा की गई विक उप-वि+रीक्षक को एक आदेश Sारी विकया Sाए विक इमा+ी सिसख क े वि+ष्कास+ क े बाद, झोपड़ी/क ु र्टीर को भी ध्वस् कर विदया Sाए और साव*ा+ी बर ी Sाए ाविक एक +ए घर की +ींव + रखी Sाए। (i) 18 माच: 1861 को सूबेदार +े 16 माच: 1861 क े आदेश क े वि+ष्पाद+ क े संबं* में एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की। यह कहा गया र्थीा विक + क े वल इमा+ी सिसख को क ु र्टीर (झोपड़ी) से वि+काल विदया गया है, बस्जिल्क झोपड़ी को भी ध्वस् कर विदया गया है; और (ii) इसक े पश्चा ् 18 माच: 1862 को मो असगर, मीर रज्जब अली और मो. अफSल द्वारा विकए गए 12 माच: 1861 विद+ांविक आवेद+ को अणिभलेख क े सुपुद: विकया Sा+ा वि+द†णिश विकया गया।

686. ुलसीदास और अन्य बैराविगयों क े खिखलाफ आवेद+ (18 अप्रैल 1861 को पूव: ः वि+र्ण- वाद संख्या 223 में शाविमल): 25 सिस ंबर 1866 को मोहम्मद अफSल (मु वल्ली मस्जिस्Sद बाबरी) द्वारा ुलसीदास और अन्य बैराविगयों क े विवरूद्ध एक आवेद+ दाखिखल विकया गया, सिSसमें एक कोठरी को ध्वस् कर+े की प्रार्थी:+ा की गयी र्थीी Sो मस्जिस्Sद क े दरवाSे क े अंदर "मूर्ति आविद रख+े क े खिलए" +ववि+र्मिम विकया गया र्थीा Sहाँ बैराविगयों +े "चबू रा" का वि+मा:र्ण विकया र्थीा। इस आवेद+ में यह कहा गया र्थीा विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क) अव* खास में Sन्मस्र्थीा+ क े पास स्जिस्र्थी बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण शाह बाबर +े विकया र्थीा; ख) विपछले क ु छ विद+ों से बैरागी मस्जिस्Sद क े पास णिशवालय ब+ा+े का प्रयास कर रहे र्थीे, लेविक+ मुसलमा+ों की स क: ा और मामले की समय पर रिरपोर्टिंर्टग क े कारर्ण अति*कारिरयों +े प्रति बं* लगा विदया और विववाद को रोका। ग) अब लगभग एक मही+े पहले मूर्ति यों को रख+े क े इरादे से प्रति वादीगर्ण ुलसीदास/बैराविगयों +े मस्जिस्Sद क े परिरसर में एक कोठी का वि+मा:र्ण विकया र्थीा। वि+मा:र्ण क ु छ घंर्टों क े भी र अवै* रूप से विकया गया र्थीा; घ) पुखिलस को पहले ही सूतिच कर विदया गया र्थीा, लेविक+ सरकार द्वारा कोठरी क े विवध्वंस क े संबं* में कोई आदेश Sारी +हीं विकए गए हैं। इस कोठरी क े कारर्ण प्रति विद+ संघष: की आशंका रह ी है। ड़) पहले उन्हों+े रा भर में रामचबू रे का वि+मा:र्ण विकया र्थीा और इस वि+मा:र्ण क े कारर्ण दंगे हुए र्थीे। अब र्थीोड़े समय क े भी र एक छोर्टी कोठरी का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। यह संभाव+ा र्थीी विक वे इस रह क े वि+मा:र्णों को *ीरे-*ीरे बढ़ा सक े हैं; और च) द+ुसार यह प्रार्थी:+ा की गई र्थीी विक मस्जिस्Sद को बैराविगयों से बचाया Sाए और कोठरी को विगरा+े क े आदेश पारिर विकए Sाएँ। छ) 12 अक्र्टूबर 1866 को उपायुX, फ ै Sाबाद +े ुलसीदास क े खिखलाफ मोहम्मद अफSल (क े स +ंबर 223 में शाविमल) क े आवेद+ पर अणिभलेख क े सुपुद: विकया Sा+ा वि+द†णिश कर े हुए एक आदेश पारिर विकया,

687. वि+याम अली और मोहम्मद शाह ब+ाम गंगा*र शास्त्री: वि+याम अली और मोहम्मद शाह ब+ाम गंगा*र शास्त्री क े वाद में स्र्थीा+ापन्न उपायुX mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA फ ै Sाबाद द्वरा 25 Sू+ 1868 को पारिर एक आदेश क े विवरूद्ध अपील में 26 अगस्, 1868 को मेSर Sे रीर्ड आयुX फ ै Sाबाद द्वारा एक आदेश पारिर कर विदया। यह वाद मुस्जिस्लमों द्वारा गंगा *र क े विवरूद्ध दायर विकया गया र्थीा सिSसमें आरोप लगाया गया र्थीा विक वह मस्जिस्Sद क े उत्तर -पतिश्चमी को+े पर अति क्रमर्ण कर रहा र्थीा। आदेश से अपील खारिरS हो गई क्योंविक कोई अति क्रमर्ण साविब +हीं हुआ र्थीा। हालाँविक वि+म्+खिलखिख अवलोक+ विकए गए र्थीे: (i) +क्शे से प ा चल ा है विक गंगा *र का घर मस्जिस्Sद की दीवार को छ ू ा र्थीा और कोई अति क्रमर्ण +हीं हुआ र्थीा। (ii) उस समय क कोई अति क्रमर्ण +हीं हो सक ा Sब क विक उस मस्जिस्Sद की दीवार ही खोद + दी गयी हो ी, हालांविक इस प्रकार अणिभकणिर्थी +हीं विकया गया र्थीा; और (iii) 27 फरवरी 1864 क े आयुX क े पूव: आदेश में यह वि+देश विदया गया र्थीा विक हिंहदुओं को मस्जिस्Sद और रामचबू रा की सीमाओं का अति क्रमर्ण +हीं कर+ा चाविहए। हालांविक चूंविक अति क्रमर्ण साविब हुआ र्थीा, इसखिलए हस् क्षेप कर+े का कोई कारर्ण +हीं र्थीा।

688. मोहम्मद असगर ब+ाम सरकार: 22 फरवरी 1870 को मोहम्मद असगर (बाबरी मस्जिस्Sद क े मु वल्ली) द्वारा प्रति वादी को बेदखल कर+े की मांग कर े हुए एक मुकदमा दायर विकया गया र्थीा, Sो एक फकीर र्थीा और उस+े इमली (इमली क े बाग), खंर्डहल और कविब्रस् ा+ क े पेड़ों पर कब्Sा कर खिलया र्थीा। यह कहा गया र्थीा विक: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (21) प्राची+ काल से ही आवेदकों और उ+क े पूव:Sों का 21 इमली क े पेड़ों पर कब्Sा रहा र्थीा; (ii) फकीर, Sो उ+का +ौकर र्थीा, वाविदयों क े पूव:Sों की अ+ुमति से वहां पहले वि+वास कर रहा र्थीा; (iii) 'शाही' अवति* क े दौरा+ फकीर वाविदयों क े पूव:Sों क े विवरुद्ध हो गया और इसखिलए उसे परिरसर से वि+काल विदया गया; और (iv) इसखिलए पेड़ों और कविब्रस् ा+ से फकीर क े विवरूद्ध वि+ष्कास+ की एक तिर्डक्री पारिर की Sा+ी चाविहए। (v) 22 अगस्, 1871 को एक आदेश पारिर विकया गया सिSसमें मस्जिस्Sद बाबर शाह मौSा कोर्ट राम चंदर क े आसपास क े क्षेत्र में काविबस् ा+ क े स्वाविमत्व क े संबं* में मोहम्मद असगर क े दावे को खारिरS कर विदया गया र्थीा Sबविक पेड़ों क े दावे पर तिर्डक्री दी गयी र्थीी। आदेश में वि+म्+खिलखिख विर्टप्पर्णीयाँ र्थीीं: "इमली क े पेड़ों पर वादी का कब्ज़ा स्र्थीाविप विकया गया, लेविक+ स्वाविमत्व का अति*कार वादी का +हीं हो सक ा क्योंविक यह मस्जिस्Sद S+स्र्थीा+ क े दरवाSे क े साम+े सामान्य कविब्रस् ा+ और अहा ा है। इसखिलए ऐसा अराज़ी (Sमी+ का र्टुकड़ा) वि+Sी संपखित्त +हीं हो सक ा है।"

689. 1873 में मूर्ति को रख+ा: +वम्बर 1873 में 'Sन्मस्र्थीा+ क े चबू रे' पर एक मूर्ति रखी गई र्थीी (सिSसे उपायुX की 14 अगस् 1877 की रिरपोर्ट: और आयुX क े 18 विदसम्बर, 1877 क े आदेश में वि+र्मिदष्ट विकया गया र्थीा) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) 7 +वंबर 1873 को चरर्ण पादुका को हर्टा+े का वि+द†श दे े हुए मोहम्मद असगर ब+ाम महं बलदेव दास क े वाद में एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा सिSसका अ+ुपाल+ +हीं विकया गया; और (iii) 10 +वंबर 1873 को बालदेव दास को उपायुX द्वारा Sन्मस्र्थीा+ चबू रा पर रखी गई प्रति मा को हर्टा+े का वि+द†श विदया गया। यह कह े हुए एक आख्या प्रस् ु की गई विक एक अति*कारी बालदेव दास क े घर गया र्थीा Sो +हीं विमला र्थीा। आदेश को अन्य पुSारिरयों को समझाया गया, सिSन्हों+े कहा विक वे आदेश को पूरा +हीं कर सक े। इ+ आदेशों का अ+ुपाल+ +हीं विकया गया और प्रति मा को हर्टाया +हीं गया।

690. उत्तरी द्वार (1877 में सिंसह द्वार) का खुल+ा- मोहम्मद असगर ब+ाम खेम दास: 3 अप्रैल 1877 को उपायुX, फ ै Sाबाद +े हिंहदुओं को विववाविद भव+ की उत्तरी बाह्य दीवार में +या दरवाSा (सिंसह द्वार) खोल+े की अ+ुमति दी। इस अ+ुमति को मोहम्मद असगर +े अपील 358 दायर करक े चु+ौ ी दी, सिSसमें उन्हों+े दावा विकया विक: क) मस्जिस्Sद की चारदीवारी क े अन्दर प्रत्येक Sगह मस्जिस्Sद है; ख) सामान्य सिसद्धां यह है विक मस्जिस्Sद से संबंति* मामलों को मुसलमा+ों को 'सौंप विदया' Sा+ा चाविहए Sबविक मंविदर से संबंति* मामले हिंहदुओं को सौंप विदए Sा+े चाविहए। इस प्रकार गेर्ट खोल+े क े खिलए प्रति वाविदयों को दी गई अ+ुमति इस मूल सिसद्धां क े उल्लंघ+ में र्थीी; ग) पहले 7 +वंबर 1873 को हिंहदुओं को मूर्ति यों को हर्टा+े का वि+द†श दे े हुए एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा। इसखिलए Sब मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर+े 358 प्रकीर्ण: अपील संख्या 58 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की कोई अ+ुमति +हीं है, ो मस्जिस्Sद की दीवार पर एक अति*कार प्रति वाविदयों को +हीं विदया Sा सक ा है। घ) मस्जिस्Sद की बाहरी दीवार क े दरवाSे पर अल्लाह शब्द खुदा हुआ है; ई) Sब अपीलक ा: +े स्वयं अ+ुरो* विकया र्थीा विक उसे अप+े खच: पर उX दरवाSा खोल+े की अ+ुमति दी Sाए और वह इसे खोल+े क े खिलए ैयार और इच्छ ु क र्थीा, ो प्रति वादी Sो दूसरे *म: से संबंति* र्थीे, उन्हें अति रिरX दरवाSा खोल+े की अ+ुमति +हीं दी Sा सक ी र्थीी; और च) क्षेत्र पर कब्Sा कर+े क े इरादे से प्रति वादी कई गति विवति*यों में खिलप्त रहा और विकसी क े द्वारा रोक े Sा+े पर, आक्रामक हो Sा ा और उसक े सार्थी लड़+े क े खिलए आमादा रह ा। 14 मई 1877 को उपायुX द्वारा एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की गई, सिSसमें कहा गया विक यविद दूसरा दरवाSा +हीं खोला गया, ो मा+व Sीव+ ख रे में पड़ Sाएगा क्योंविक वहां बहु भीड़ हो ी र्थीी। अं: 13 विदसंबर 1877 को अपील को इस आ*ार पर खारिरS कर विदया गया विक बाहरी दरवाSा साव:Sवि+क सुरक्षा क े विह ों में र्थीा। आदेश में कहा गया है विक यातिचका मात्र दूसरे दरवाSे को खोल+े या बंद कर+े क े खिलए 'मस्जिस्Sद क े लोगों' की मS- पर वि+भ:र ब+ाकर हिंहदुओं को क्र ू द्ध कर+े का एक प्रयास र्थीा।

691. 1873 में एक मूर्ति की स्र्थीाप+ा से उत्पन्न हो+े वाली घर्ट+ाओं का क्रम, हिंहदुओं को उत्तरी रफ एक अति रिरX रास् ा खोल+े की विवणिशष्ट अ+ुमति और अपील में यह विर्टप्पर्णी विक खोल+े क े खिलए आपखित्तयां वि+रा*ार र्थीीं, महत्वपूर्ण: हैं। इस स्र्थील पर हिंहदुओं की उपस्जिस्र्थीति और पूSा को मान्य ा दी गई और अपीलीय आदेश में मुसलमा+ों क े प्रवेश द्वार पर वि+यंत्रर्ण प्राप्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर+े क े प्रयास को खारिरS कर विदया गया क्योंविक इससे हिंहदू समुदाय उ+ पर वि+भ:र हो Sाएगा। दूसरे शब्दों में, प्रशास+ +े मूर्ति यों क े उ+क े उपास+ा कर+े क े एक भाग क े रूप में क्षेत्र पर हिंहदू उपासकों क े स्व ंत्र अति*कार को मान्य ा दी और स्वीकार विकया।

692. मोहम्मद असगर ब+ाम मुसम्मा हुमैरा बीबी और सुंदर ति वारी (1878): 3 Sू+ 1878 को मोहम्मद असगर ब+ाम मुसम्मा हुमैरा बीबी र्थीा सुन्दर ति वारी और भोला ति वारी और कांशी राम क े मामले में दावा यातिचका सं. 2775 वष: 1877 में मोहम्मद असगर क े पक्ष में एक तिर्डक्री पारिर की गई सिSसमें मौSा बहोरपुर परग+ा हवेली अव* क े Sमींदारी अति*कारों क े 3/8 वें विहस्से का दावा विकया गया र्थीा। यातिचकाक ा: मोहम्मद असगर क े पक्ष में अ+ुमति दी गई, सिSस+े मौSा Sमींदारी बहोरपुर क े भाग को खाली करा+े क े खिलए और 10 अगस् 1876 क े एक विबक्री विवलेख को रद्द कर+े क े खिलए प्रार्थी:+ा की र्थीी।

693. मोहम्मद असगर ब+ाम रघुबीर दास महं और वि+म ही अखाड़ा: 8 +वंबर 1882 को मोहम्मद असगर (Sो बाबरी मस्जिस्Sद क े मु वल्ली र्थीे) द्वारा चबू रा और ख् क े उपयोग क े खिलए विकराए का दावा कर े हुए रघुबर दास क े खिखलाफ वाद संख्या 374/943 वष: 1882 दायर की गयी। इस वादपत्र में चबू रा को बाबरी मस्जिस्Sद क े दरवाSे क े पास या मस्जिस्Sद से पहले स्जिस्र्थी ब ाया गया है। 18 Sू+ 1883 क े एक आदेश द्वारा, उप-न्याया*ीश फ ै Sाबाद +े इस मुकदमे को खारिरS कर विदया। इसका आवश्यक परिरर्णाम यह हुआ विक रघुबर दास को कब्Sे क े खिलए मु वल्ली को मुआवज़ा दे+े की आवश्यक ा +हीं र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

694. मोहम्मद असगर ब+ाम महं रघुबर दास359: 2 +वंबर 1883 को सैय्यद मोहम्मद असगर +े सहायक आयुX क े समक्ष वाद संख्या 1943[5] दायर की, सिSसमें कहा गया विक वह मस्जिस्Sद की दीवार की पु ाई करा+े का हकदार है, लेविक+ रघुबर दास द्वारा बाति* विकया Sा रहा है। आवेद+ में वि+म्+खिलखिख हिंबदु महत्वपूर्ण: हैं: क) वादी प्रति वादी की इ+ णिशकाय ों की व्याख्या कर+े में असमर्थी: है विक मस्जिस्Sद क े अहा े क े भी र Sन्म स्र्थीा+ चबू रा प्रति वादी का है। इस प्रकार प्रति वादी का अहा े की बाहरी दीवार, कर्थीेरा और फार्टक से कोई संबं* +हीं है और ये सभी मस्जिस्Sद से संबंति* हैं; ख) बाहरी दीवार पर अल्लाह खिलखा है; ग) Sब भी मस्जिस्Sद की मरम्म /+वीकरर्ण/पु ाई की कोई आवश्यक ा उत्पन्न हुई, ो क े वल आवेदक +े इसे पूरा कराया है; घ) आवेदक/वादी +े साम£ी खरीदी है, लेविक+ प्रति वादी वहां काम कर+े क े खिलए आया है और इसखिलए विववाद उत्पन्न हुआ है; और ड़) चबू रा और सी ा रसोई को छोड़कर प्रति वादी को कोई अति*कार +हीं है। च) 12 S+वरी 1884 को यर्थीास्जिस्र्थीति ब+ाए रख+े और बाहरी दरवाSे को खुले रख+े क े खिलए एक आदेश पारिर विकया गया. छ) 22 S+वरी 1884 को सहायक आयुX, फ ै Sाबाद +े एक आदेश पारिर विकया। क) रघुबर दास को परिरसर क े भी री और बाहरी भाग में मरम्म कर+े से प्रति बंति* कर+ा; और 359 वाद संख्या 1943[5] mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ख) मोहम्मद असगर को मस्जिस्Sद क े बाह्य दरवाSे को बंद +हीं कर+े की सलाह दी गई र्थीी क्योंविक यह आवश्यक र्थीा विक पुरा+े मौSूदा आदेशों को देखा Sाए और उ+का अ+ुपाल+ विकया Sाए और उसमें कोई हस् क्षेप + हो। S) बाद में 27 Sू+ 1884 को रघुबर दास +े सहायक आयुX, फ ै Sाबाद से स्र्थील वि+रीक्षर्ण कर+े का अ+ुरो* कर े हुए एक आवेद+ दाखिखल विकया सिSसमें णिशकाय की गयी र्थीी विक मुस्जिस्लम रोक क े आदेश का उल्लंघ+ कर रहे हैं। 1885 क े वाद का प्रभाव

695. महं रघुबर दास +े 17 x 21 फीर्ट माप क े चबू रे पर Sहाँ चरर्ण पादुका र्थीी और पूSा की Sा ी र्थीी, पर एक मस्जिन्दर क े वि+मा:र्ण की अ+ुमति माँग े हुए भार क े राज्य सतिचव क े विवरूद्ध 1885 का वाद संस्जिस्र्थी विकया। पूव: न्याय की *ारा पर, वाद की प्रक ृ ति का विवश्लेषर्ण विकया गया है और यह पाया गया है विक वि+र्ण:य सीपीसी 1908 की *ारा 11 क े प्राव*ा+ों को आकर्मिष +हीं कर ा है।

696. हालाँविक काय:वाविहयों क े क ु छ मुख्य पहलुओं पर ध्या+ विदया Sा सक ा है: (i) वाद शीष:क में महं रघुबर दास क े +ाम को "महं Sन्मस्र्थीा+ अयोध्या" क े रूप में उल्लेख विकया गया है। वादपत्र में वि+म ही अखाड़ा क े संदभ: का + हो+ा स्पष्ट र्थीा। (ii) वाद स्वत्व क े दावे पर आ*ारिर +हीं र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) क े वल चबू रे पर मंविदर क े वि+मा:र्ण क े खिलए सा*ारर्ण या स्वीकृ ति प्रदा+ कर+े का अ+ु ोष माँगा गया र्थीा। (iv) स्वत्व की विकसी दलील क े अभाव में, वाद में न्यायवि+र्ण:य+ का यह अर्थी: लगाया Sा+ा चाविहए विक वह उस बा क सीविम है Sो प्रार्थी:+ा की गई र्थीी, अर्थीा: ् चबू रे पर मंविदर ब+ा+े की अ+ुज्ञा क; (v) वाद में संलग्न +क्शा मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व को उपदर्भिश कर ा है लेविक+ यह हिंहदुओं द्वारा बाह्य अहा े में पूSा को भी उपदर्भिश कर ा है। वाद में वि+युX न्यायालय आयुX, गोपाल सहाय द्वारा प्रस् ु विकया गया +क्शा सार्थी ही 6 विदसंबर 1885 की उ+की रिरपोर्ट:, चबू रे क े पतिश्चमी रफ मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व को दशा: ी है। (vi) यह मुकदमा बाबरी मस्जिस्Sद क े मु वल्ली क े रूप में मोहम्मद असगर +े लड़ा र्थीा, सिSस+े अन्य बा ों क े सार्थी दावा विकया र्थीा विक: (क) बाबर +े मस्जिस्Sद ब+वायी र्थीी सिSस पर 'अल्लाह' शब्द खुदा र्थीा; (ख) चबू रा 1857 में ब+ाया गया र्थीा और इसका मुस्जिस्लमों द्वारा विवरो* विकया गया र्थीा; और (ग) पहले, वि+मा:र्ण कायÂ पर रोक लगायी गयी र्थीी। (vii) वाद को खारिरS कर े हुए उप-न्याया*ीश +े यह उल्लेख विकया विक: (क) रेलिंलग की दीवार क े वि+मा:र्ण क े बाद, मुस्जिस्लम मस्जिस्Sद क े अंदर और हिंहदु बाहर चबू रे पर प्रार्थी:+ा कर रहे र्थीे। (ख) इससे पहले, विहन्दू और मुसलमा+ दो+ों उस स्र्थीा+ पर पूSा कर रहे र्थीे हिंक ु विकसी विववाद से बच+े क े खिलए दीवार खड़ी कर दी गइ: र्थीी; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ग) चबू रा विहन्दुओं क े कब्Sे में र्थीा और उ+से संबंति* र्थीा।

697. अ+ुज्ञा को अस्वीकार कर े हुए उप-न्याया*ीश +े उपदर्भिश विकया विक मंविदर क े वि+मा:र्ण की अ+ुमति दे+े से अवि+वाय: रूप से यर्थीा स्जिस्र्थीति बदल Sाएगी सिSससे शांति भंग होगी। मुकदमे को खारिरS कर+े वाले उप - न्याया*ीश क े आदेश की पहली अपील में मुख्य रूप से इस आ*ार पर पुविष्ट की गई र्थीी विक यर्थीा स्जिस्र्थीति क े विकसी भी उल्लंघ+ से शांति ब+ाए रख+े में गंभीर रूप से बा*ा पड़ेगी। इसखिलए चबू रा क े कब्Sे और स्वाविमत्व क े संबं* में वि+ष्कष: वि+रर्थी:क र्थीे और हर्टा विदए गए र्थीे। दूसरी अपील में, प्रर्थीम अपीलीय न्यायालय क े आदेश की पुविष्ट की गई र्थीी। Sबविक न्यातियक आयुX +े इसे दुभा:ग्यपूर्ण: मा+ा विक एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण एक ऐसे स्र्थील पर विकया गया र्थीा सिSसे हिंहदू भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ मा+ े र्थीा, उ+का विवचार र्थीा विक उस स् र पर यर्थीा स्जिस्र्थीति का उल्लंघ+ अवांछ+ीय र्थीा।

698. 1885 क े वाद क े सभी वि+ष्कषÂ को काय:वाही की प्रक ृ ति, पक्षकार सिSस+े अ+ु ोष क े खिलए न्यायालय का रूख विकया र्थीा और इसक े परिरर्णाम क े संदभ: में पढ़ा Sा+ा चाविहए। वाद प्रति वि+ति*त्व की प्रकृ ति का +हीं र्थीा। प्रति वि+ति*त्व क्षम ा में मुकदमा कर+े की कोई अ+ुमति +हीं मांगी गई या प्राप्त की गई। Sन्मस्र्थीा+ क े महं +े अप+े व्यविXग अ+ु ोष का दावा विकया। + ो स्वत्व की उद्घोषर्णा की माँग की गयी र्थीी और + ही फकीरों र्थीा उपासकों की असुविव*ा को दूर कर+े क े खिलए चबू रा पर मंविदर ब+ा+े की अ+ुमति क े सिसवाय वाद का कोई उद्देश्य र्थीा। इसखिलए वाद क े परिरर्णाम का व:मा+ काय:वाही या स्वत्व क े मुद्दे पर पक्षकारों पर कोई प्रभाव या असर +हीं पड़ेगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1934 और 1950 क े मध्य घर्ट+ाएँ 1934 क े सांप्रदातियक दंगे

699. 1934 में सांप्रदातियक दंगों क े परिरर्णामस्वरूप, विववाविद इमार क े गुम्बदों को काफी +ुकसा+ हुआ। मुस्जिस्लम ठेक े दार द्वारा विब्रविर्टश खच† पर इस इमार का पु+रुद्धार कराया गया। इस संदभ: में, वि+म्+खिलखिख दस् ावेSों पर अवलम्ब खिलया गया है: (क) 27 माच: 1934 को दंगों में हुए +ुकसा+ की क्षति पूर्ति क े खिलए मो. Sकी और अन्य द्वारा एक आवेद+ विदया गया। इस आवेद+ में यह उल्लेख विकया गया र्थीा विक: -  अयोध्या क े बैराविगयों और हिंहदुओं +े बाबरी मस्जिस्Sद पर Sा+-बूझकर आक्रमर्ण विकया और बहु +ुकसा+ पहुंचाया।  मस्जिस्Sद की मरम्म क े खिलए एक बड़ी राणिश की आवश्यक ा होगी।  इसखिलए यह प्रार्थी:+ा की गई विक मरम्म की अ+ुमावि+ लाग, अर्थीा: ् 15000 रुपये, पुखिलस अति*वि+यम 1861 की *ारा 15 क े अ+ुसार बैराविगयों और अयोध्या क े अन्य हिंहदुओं से वसूल विकए Sाएं। (ख) विद+ांक 6.10.1934 को कविमश्नर फ ै Sाबाद +े विकन्ही अन्य आपखित्तयों क े अ*ी+ बाबरी मस्जिस्Sद क े +ुकसा+ क े खिलए मुआवSे की पूव X राणिश का भुग ा+ कर+े की अ+ुमति दी। (ग) त्पश्चा ् विद+ांक 22.12.1934 को सिSला मसिSस्र्ट्रेर्ट, फ ै Sाबाद द्वारा पुखिलस अति*वि+यम की *ारा 15 क(2) क े अ*ी+ अति*रोविप Sुमा:+े और अयोध्या क े विहन्दू वि+वासिसयों से उसकी वसूली क े संबं* में सूच+ा प्रकाणिश की गई। (घ) इस दौरा+ 12 मई 1934 क े एक आदेश द्वारा मुसलमा+ों को 14 मई 1934 से बाबरी मस्जिस्Sद की सफाई का काय: आरंभ कर+े की अ+ुमति दी गई ाविक इसका *ार्मिमक प्रयोS+ों क े खिलए उपयोग विकया Sा सक े ।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

700. 1934 में हुए सांप्रदातियक दंगों क े दौरा+ विववाविद ढांचे क े गुम्बद क्षति £स् हो गए। एक मुसलमा+ ठेक े दार द्वारा विब्रविर्टश सरकार क े खच† पर पु+रूद्धार कराया गया और मरम्म की लाग वसूल+े क े खिलए अयोध्या क े बैराविगयों और हिंहदुओं पर Sुमा:+ा लगाया गया। 12 मई 1934 को मुसलमा+ों को मस्जिस्Sद की सफाई शुरू कर+े की अ+ुमति दी गई ाविक इसका उपयोग *ार्मिमक उद्देश्यों क े खिलए विकया Sा सक े । मस्जिस्Sद की मरम्म

701. मरम्म करा+े की अ+ुमति दे+े क े वि+र्ण:य क े चल े, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा प्रस् ु दस् ावेSी साक्ष्य में वि+म्+ शाविमल हैं: (i) अप+े बकाया विबलों क े भुग ा+ क े खिलए उस ठेक े दार द्वारा विकया गया दावा सिSस+े बाबरी मस्जिस्Sद की मरम्म की र्थीी और 1935 र्थीा अप्रैल 1936 क े बीच भुग ा+ को प्रभावी कर+े वाले कायÂ को सत्याविप कर+े क े आदेश; और

(ii) Sुलाई 1936 और अगस् 1938 क े बीच बाबरी मस्जिस्Sद क े पेश इमाम क े वे + क े बकाया क े खिलए दावे का वि+स् ारर्ण। वि+म विहयों क े बीच मुकदमा

702. 1934 क े दंगों क े बाद हुए घर्ट+ाक्रम क े अगले चरर्ण में वाद 95/1941 शाविमल है, सिSसे महं रामचरर्ण दास +े रघु+ार्थी दास और अन्य क े विवरूद्ध संस्जिस्र्थी विकया र्थीा। यह मुकदमा वि+म ही अखाड़ा द्वारा दावा की गई संपखित्तयों से संबंति* है, सिSसमें रामचबू रा को "Sन्मभूविम मंविदर" क े रूप mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में वर्भिर्ण विकया गया है। मुकदमे में दी गई संपखित्तयों की सूची में बाबरी मस्जिस्Sद को संदर्भिभ विकया गया है। आयुX द्वारा 18 अप्रैल 1942 को एक रिरपोर्ट: प्रस् ु की गई र्थीी। यह मुकदमा 4 Sू+ 1942 को एक समझौ ा द्वारा वि+पर्टाया गया र्थीा, सिSसक े संदभ: में एक तिर्डक्री ैयार की गई र्थीी। मुकदमा वि+म विहयों क े मध्य परस्पर विववाद से संबंति* है। मुस्जिस्लम पक्षकारों +े समझौ े पर अवलम्ब+ खिलया है Sो बाबरी मस्जिस्Sद और कविब्रस् ा+ क े अस्जिस् त्व को दशा: ा है। णिशया और सुन्नी क े बीच विववाद

703. 1945 में वाद 29/1945 में णिशया और सुन्नी क े बीच एक मुकदमेबाSी हुई Sो 30 माच: 1946 को वि+र्ण- हुई। णिशयाओं की णिशकाय, Sैसा विक 11 अप्रैल 1945 को उ+क े +ोविर्टस में कहा गया र्थीा विक वक्फ क े आयुX +े सुन्नी मस्जिस्Sदों की सूची में बाबरी मस्जिस्Sद को शाविमल विकया र्थीा। वाद पत्र में उसिल्लखिख है विक मस्जिस्Sद, Sन्मस्र्थीा+ अयोध्या में स्जिस्र्थी र्थीी। मुकदमा यह अणिभवि+*ा:रिर कर े हुए खारिरS कर विदया गया विक मस्जिस्Sद एक सुन्नी मस्जिस्Sद र्थीी। सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े 25 +वंबर 1948 क े एक पत्र द्वारा यह स्पष्टीकरर्ण मांगा विक विपछले मु वल्ली की मृत्यु पर अन्य व्यविX मस्जिस्Sद में क ै से काम कर रहा र्थीा। ओ.[8] +माज़ का प्रमार्ण

704. वाद 4 में वाविदयों की ओर से कई गवाहों +े कहा विक वे +माS अदा कर+े क े खिलए बाबरी मस्जिस्Sद गए र्थीे। उ+क े साक्ष्य यह वि+*ा:रिर कर+े क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खिलए सुसंग हैं विक क्या विववाविद संपखित्त में +माS अदा की Sा रही र्थीी और सार्थी ही +माS विक +ी बार अदा की Sा रही र्थीी।

705. मोहम्मद हाणिशम (पीर्डब्ल्यू-1): गवाह की उम्र लगभग 75 वष: ब ाई गई र्थीी। मुख्य-परीक्षा की Sगह दाखिखल हलफ+ामे में, गवाह +े कहा विक बरी को क े वल बाबरी मस्जिस्Sद में अदा विकया गया र्थीा। उस+े कभी-कभी पांच बार +माS और Sुम्मे र्थीा बरी की +माS अदा की र्थीी। वह 22 विदसंबर 1949 को अंति म +माज़ अदा कर+े का दावा कर ा है। अप+ी प्रति -परीक्षा में गवाह +े कहा विक 1938 में वह पहली बार +माS अदा कर+े गया र्थीा। उस+े अप+ी प्रति -परीक्षा में आगे कहा विक विववाविद स्र्थील पर प्रति विद+ पांच बार +माS अदा की Sा ी र्थीी। अप+ी प्रति -परीक्षा क े दौरा+, गवाह +े मस्जिस्Sद की संरच+ा का विववरर्ण विदया। साक्षी ब ा ा है विक पूव: विदशा में कोई दरवाSा +हीं र्थीा, लेविक+ उस+े बाद में कहा विक पूव- दरवाSा उससे ी+ फीर्ट अति*क ऊ ँ चा र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में गवाह +े कहा विक उस+े 22 विदसंबर 1949 को बाबरी मस्जिस्Sद में शाम 8 बSे इशा की +माज़ अदा की र्थीी। उस+े कहा विक उसे याद है विक Sब गोपाल सिंसह विवशारद +े 15 S+वरी 1950 को मुकदमा दायर विकया र्थीा ो पूव- दरवाSा बंद र्थीा, लेविक+ दूसरे गेर्ट क े बारे में Sा+कारी +हीं र्थीी। अप+ी प्रति -परीक्षा में पीर्डब्ल्यू-1 +े कहा विक विववाविद भव+ को 2 फरवरी 1986 को खोला गया र्थीा और फरवरी 1986 में ाला खोल+े क े अ+ुसरर्ण में एक रिरर्ट यातिचका दायर की गई र्थीी। पीर्डब्ल्यू-1 सही Sा+कारी को याद कर+े में असमर्थी: र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में, उस+े कहा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "मुझे याद +हीं है विक मैं+े 1986 में रिरर्ट यातिचका (रिरर्ट यातिचका क े शपर्थी पत्र को गवाह को विदखाया गया र्थीा) क े सार्थी प्रस् ु हलफ+ामे में अप+ी आयु 55 वष: उसिल्लखिख की र्थीी।" Sब ाला खोल+े क े अ+ुसरर्ण में दायर रिरर्ट यातिचका क े बारे में पूछा गया, ो गवाह +े प्रति -परीक्षा में वि+म्+खिलखिख कहा: "यह सही है विक मेरी स्मृति वृद्धावस्र्थीा क े कारर्ण कमSोर है, लेविक+ हमारे अति*वXा को इसकी Sा+कारी हो सक ी है।" साक्षी यह याद कर पा+े में असमर्थी: र्थीा विक उसकी दो शाविदयाँ कब हुई ं र्थीी। वह अप+ी बेर्टी की उम्र याद कर पा+े में असमर्थी: र्थीा। प्रति -परीक्षा में गवाह की स्मृति में चूक से मुख्य-परीक्षा की Sगह हलफ+ामे में वि+विह बया+ों पर संदेह उत्पन्न हो ा है।

706. हाSी महमूद अहमद (पीर्डब्ल्यू-2): गवाह की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 17 सिस ंबर 1976 है। साक्षी लगभग 58 साल का र्थीा। गवाह +े कहा विक उस+े विववाविद संपखित्त में सौ से अति*क बार +माS अदा की र्थीी। गवाह +े कहा विक वह बाबरी मस्जिस्Sद में शुक्रवार की +माS को छोड़कर पांच बार की +माS अदा कर रहा र्थीा। उसक े द्वारा अंति म +माS 22 विदसंबर 1949 को अदा की गई र्थीी। उसक े विववरर्ण क े आ*ार पर, Sब क वह +माS अदा कर ा र्थीा ब क +माS अदा कर+े पर कोई प्रति बं* +हीं र्थीा, उस+े कभी मस्जिस्Sद क े अंदर पूSा हो े हुए +हीं देखा र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में गवाह +े कहा विक Sब वह समझदार हुआ (10-11 वष: की आयु में) उस+े देखा विक लोग अक्सर विववाविद संपखित्त आ े र्थीे। हालांविक उस+े कहा विक उस+े इस रास् े का प्रयोग +हीं विकया र्थीा, इसखिलए वह यह +हीं कह सक ा विक लोगों क े आ+े-Sा+े पर वहाँ कोई प्रति बं* र्थीा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA या +हीं। अप+ी प्रति -परीक्षा में गवाह +े कहा विक उस+े 1961 में हाई स्क ू ल परीक्षा उत्तीर्ण: की Sब वह 21 वष: का र्थीा, और प्रमार्ण पत्र उसकी Sन्म ति णिर्थी 1944 दशा: ी है। अप+ी प्रति -परीक्षा में उस+े स्वीकार विकया विक हाई स्क ू ल पूरा हो+े पर उसकी आयु 21 साल हो+े का उसका बया+ कु छ गल फहमी क े कारर्ण र्थीा। पीर्डब्ल्यू-2 क े बया+ में उसकी उम्र क े संबं* में एक स्पष्ट विवसंगति है, Sो उसकी गवाही पर संदेह पैदा कर ी है। यविद उसका Sन्म का वष: 1944 है Sैसा विक उसक े हाई स्क ू ल प्रमार्ण पत्र में कहा गया है, ो यह विवश्वास कर+ा मुस्जिश्कल है विक 1949 में Sब मस्जिस्Sद क ु क: हुई र्थीी, एक व्यविX Sो पांच वष: की बाल्य आयु में मस्जिस्Sद गया र्थीा, उसक े पास 47 साल पहले देखे गए मस्जिस्Sद की सर्टीक यादें होंगी।

707. फारूक अहमद (पीर्डब्ल्यू-3): साक्षी की आयु लगभग +ब्बे वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक वह बाबरी मस्जिस्Sद में +माS अदा विकया कर ा र्थीा। साक्षी +े कहा विक Sब भी उस+े अSा+ सु+ी, फ ै Sाबाद Sा े समय या वापस आ े हुए, वह +माS क े खिलए गया, चाहे Sो भी समय हो। उन्हों+े विदसंबर 1949 में अंति म बार +माज़ अदा की र्थीी। सूतिच विकए Sा+े क े बाद विक क ु छ विदक्क हो सक ी है, दरवाSा बंद कर+े क े खिलए कहा गया। उस+े दरवाSा बंद कर विदया और चाबी अप+े पास रखी। साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक उस+े अप+े विप ा क े सार्थी 28 साल की उम्र में +माज़ अदा कर+ा शुरू विकया। साक्षी +े आगे कहा विक वह 22 विदसंबर 1949 की घर्ट+ा से 10 साल पहले से विववाविद संपखित्त में +माS mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अदा कर+े क े खिलए आ+े वाले लोगों को देख रहा है। साक्षी +े अप+ी प्रति - परीक्षा में कहा विक उसक े विप ा मस्जिस्Sद का प्रबं*+ कर े र्थीे। अप+ी प्रति -परीक्षा में, गवाह +े कहा विक 22 विदसंबर 1949 को Sुमे-रा र्थीी, Sब वह +माS अदा कर+े गया र्थीा क्योंविक यह एक 'मगरिरब +माS' र्थीी Sो इसे अदा कर+े पर 27 गु+ा शवाब (आशीवा:द) दे ी है। साक्षी +े कहा विक वह प्रा ः काल, समूह में +माS अदा कर+े भी गया र्थीा। उस+े प्रति विद+ मगरिरब और ईसा +माज़ में भाग खिलया। वह प्रा ःकाल बाबरी मस्जिस्Sद में सामूविहक +माज़ अदा कर+े Sा ा र्थीा। प्रति -परीक्षा में, उस+े कहा विक उस+े अंति म +माज़ ईशा +माS अदा की र्थीी, Sो लगभग 20/22 विदसंबर 1949 को हुई र्थीी। उस+े आगे कहा विक Sब वह दरवाSे पर ाला लगा+े गया ो मोअस्जिज्ज़+ फश: पर सो रहे र्थीे। साक्षी +े स्पष्ट विकया विक अप+े पहले क े बया+ में, उस+े गल ी से कहा र्थीा विक उस+े मध्य दरवाSे को बंद कर विदया र्थीा। उस+े कहा विक उस+े दो+ों दरवाSों पर अलग-अलग ाले लगाये र्थीे। साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक उस+े 1990 में वाद में एक पक्षकार ब++े क े खिलए यातिचका दायर की र्थीी। उस+े आगे कहा विक उस+े हलफ+ामे को देखा र्थीा सिSसमें उसक े अंगूठे का वि+शा+ है, लेविक+ हस् ाक्षर उ+से संबंति* +हीं है। महत्वपूर्ण: रूप से, साक्षी +े कहा विक उम्र 65 वष: खिलखी गई र्थीी, लेविक+ उस+े अ+ुमावि+ उम्र का उल्लेख विकया र्थीा। प्रति -परीक्षा में गवाह +े स्वीकार विकया विक 18 माच: 1986 क े एक आवेद+ में, उसकी उम्र 60 साल, हलफ+ामे में अणिभखिलखिख हो सक ी है: "अप+े हलफ+ामे में मैं+े अप+ी उम्र लगभग 60 वष: दS: करायी। व:मा+ में मेरी उम्र लगभग 90 वष: है। मेरी उम्र क े बारे में बया+ सही है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*वXा +े मेरी उम्र हलफ+ामे में लगभग दS: की होगी। 1896 में प्रस् ु मेरे आवेद+, क े वल वहां खारिरS कर विदए गए र्थीे।" गवाह का बया+ यह र्थीा विक वह बीस साल की उम्र में मस्जिस्Sद Sा+े लगा र्थीा। यविद दूसरे हलफ+ामे में यर्थीा वि+र्मिदष्ट गवाह की अ+ुमावि+ आयु (अर्थीा: ् 1986 में साठ वष:) को स्वीकार कर खिलया Sाए, ो गवाह 1954 में 28 वष: का होगा। उस+े स्पष्ट रूप से कहा विक उस+े अट्ठाइस वष: की आयु में +माS अदा कर+े क े खिलए मस्जिस्Sद Sा+ा शुरु विकया र्थीा। उस स्जिस्र्थीति में, Sब 1949 में मस्जिस्Sद को स्वीकाय: ः कु क: कर खिलया गया ो गवाह 1954 में मस्जिस्Sद में +माS अदा कर+े में असमर्थी: होगा।

708. मोहम्मद यासी+ (पीर्डब्ल्यू-4): गवाह की मुख्य-परीक्षा की ति णिर्थी 17 अक्र्टूबर 1996 र्थीी। गवाह की उम्र 66 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े ब ाया विक उस+े बाबरी मस्जिस्Sद में Sुमे की +माS अदा की। महत्वपूर्ण: रूप से, गवाह +े कहा विक वह स्र्थील पर वि+रं र शुक्रवार की +माS अदा कर रहा है और विववाविद संपखित्त पर Sुमे की +माज़ को छोड़कर कोई अन्य +माS +हीं अदा कर रहा है। अप+ी प्रति -परीक्षा में, गवाह +े कहा विक उस+े स्व ंत्र ा से पांच साल पहले मस्जिस्Sद Sा+ा शुरू कर विदया र्थीा। साक्षी की गवाही क े अ+ुसार, उसक े विप ा शुक्रवार की +माS अदा कर+े क े खिलए बाबरी मस्जिस्Sद Sा े र्थीे। गवाह क े अ+ुसार, शहर क े बड़े मस्जिस्Sदों में शुक्रवार की +माS अदा की Sा ी है। स+् 1949 से पहले शुक्रवार की +माS या ो बाबरी मस्जिस्Sद में या क े वारे वाली मस्जिस्Sद में अदा की गयी। उन्हो+ें कहा विक 400-500 लोग बाबरी मस्जिस्Sद में Sुमे की +माS अदा विकया कर े र्थीे। यविद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संख्या अति*क हो गई है, ो लगभग 1000 लोग एक सार्थी +माS अदा कर सक े हैं। गवाह +े विववाविद संपखित्त क े सार्थी-सार्थी वहां विकए गए *ार्मिमक क ृ त्यों का विववरर्ण विदया है। प्रति -परीक्षा क े दौरा+, Sब गवाह का ध्या+ 1989 क े वाद में +क्शे की ओर आकर्मिष विकया गया र्थीा, ो उन्हों+े कहा विक उन्हों+े मा+तिचत्र को देखा र्थीा, लेविक+ मा+तिचत्र क े बारे में क ु छ भी +हीं प ा र्थीा और इसक े बारे में क ु छ +हीं कह सक ा र्थीा। गवाह +े कहा विक Sब भार को स्व ंत्र ा विमली, ो वह 11-12 साल का र्थीा (विफर कहा विक वह उस समय 17 साल का र्थीा)। उन्हों+े कहा विक हालांविक उ+की स्मृति कमSोर हो गई है, इसका म लब यह +हीं है विक वह पुरा+ी घर्ट+ाओं को याद कर+े में असमर्थी: हैं।

709. न्यायमूर्ति अ£वाल +े पीर्डब्ल्यू-4 क े कर्थी+ों और अन्य सातिक्षयों क े कर्थी+ों में कई विवरो*ाभास इंविग विकए हैंः

“2484. Sब उ+का बया+ पीर्डब्ल्यू 1, Sो वाद 4 में वादी संख्या 7 है, के बया+ के विवरो*ाभासी पाया गया ो उन्हो+ें यह कह े हुए स्वयं को उतिच ठहराया विक पीर्डब्ल्यू 1 +े गल बया+ विदया होगा Sैसा विक वि+म्+खिलखिख से स्पष्ट है: “यविद श्री हासिसम +े ऐसा कोई बया+ विदया है विक पुSारीगर्ण उX छप्पर के +ीचे बैठा कर े र्थीे, ो उ+का बया+ गल है।" यविद हाSी महबूब +े कहा है विक वैराविगयों +े विपछले 15-20 विद+ से इस स्र्थील को एक रफ से घेर खिलया र्थीा, ो यह बया+ गल है।" “श्री ज़की 1949 की घर्ट+ा क मु वल्ली र्थीे। उ+के बाद श्री Sव्वाद मु वल्ली ब+े… यविद श्री फारूख +े ऐसा कोई बया+ विदया है विक श्री Sहूर घर्ट+ा के समय मस्जिस्Sद का प्रबन्* कर े र्थीे , ो इसके सही या गल हो+े का दातियत्व उ+ पर है। मैं केवल इ +ा Sा+ ा हूँ विक मस्जिस्Sद का प्रबन्* श्री Sक़ी द्वारा विकया Sा ा र्थीा।"
mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “यविद श्री हासिसम +े बया+ विदया है विक उन्हो+ें क े वल 1966 से 1976 क े बीच सिसलाई का काम विकया र्थीा, ो यह गल बया+ है।" उ+की कमSोर याददाश् क े बारे में उ+की स्वयं स्वीकृ ति और सार्थी ही सार्थी अन्य विवरो*ाभासों क े आलोक में, मुख्य-परीक्षा द्वारा दाखिखल हलफ+ामें की अन् व:स् ु को साव*ा+ी क े सार्थी पढ़ा Sा+ा चाविहए।
710. अब्दुल रहमा+ (PW 5): साक्षी की आयु 71 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक उस+े वष: 1945 और 1946 में बाबरी मस्जिस्Sद में पविवत्र क ु रा+ पढ़ी र्थीी। PW-5 अयोध्या का वि+वासी +हीं है और उसका गांव 18-19 विकलोमीर्टर दूर है। साक्षी +े कहा विक उस+े दो वष: क अयोध्या में पविवत्र क ु रा+ पढ़ा है। Sब वह पविवत्र कु रा+ पढ़+े Sा ा र्थीा ो बाबरी मस्जिस्Sद में शुक्रवार की +माS पढ़ ा र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक उसे पहली बार अयोध्या Sा+ा याद +हीं है। बाद में प्रति -परीक्षा क े दौरा+ साक्षी +े कहा: "Sब मैं पहली बार क ु रा+ शरीफ पढ़+े गया ो वह रमSा+ क े मही+े का पहला विद+ र्थीा (विफर कहा विक वह 29 शाबा+ को वहाँ पहुँचा र्थीा और यविद उस रा चाँद विदखाई दे ा ो मैं क ु रा+ शरीफ पढ़ ा।) मुझे ठीक से याद +हीं विक विकस विद+ वह विवशेष विद+ कौ+ सा र्थीा (विफर कहा विक वह 29 शाबा+ को अयोध्या पहुंचा र्थीा)।" साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक Sब वह क ु रा+ शरीफ पढ़+े क े खिलए अयोध्या गया ो वह अप+े संबं*ी हाSी फ े क ू (पीर्डब्ल्यू-2 क े विप ा) क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सार्थी बारह विद+ों क रूका र्थीा। साक्षी +े कहा विक दो+ों ही मौकों पर Sब वह अयोध्या आ ा र्थीा ो गम- हो ी र्थीी और वह ेS गम- क े कारर्ण पविवत्र क ु रा+ पढ़+े क े खिलए भव+ में प्रवेश +हीं कर सक ा र्थीा। बाह्य अहा े का उपयोग पविवत्र क ु रा+ पढ़+े क े खिलए विकया Sा ा र्थीा। साक्षी +े यह भी कहा विक मस्जिस्Sद क े अंदर उस+े दूसरे आं रिरक अहा े में क ु रा+ शरीफ पढ़ी र्थीी। साक्षी +े कहा विक उस+े एक बार बाबरी मस्जिस्Sद में +माS अदा की र्थीी। साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक विब्रविर्टश शास+ क े दौरा+ वह पहली बार पविवत्र क ु रा+ पढ़+े क े खिलए अयोध्या गया। उस+े अप+ी प्रति -परीक्षा में आगे कहा विक Sब बारह विद+ों क े खिलए उस+े पविवत्र कु रा+ पढ़ी और इ+ दो अवसरों क े अलावा वह कभी बाबरी मस्जिस्Sद +हीं गया। वष: 1946 में Sब वह क ु रा+ शरीफ पढ़+े गया ो उस+े रा 9 बSे प्रारम्भ विकया और उसे सु++े लगभग 80-100 लोग आ े र्थीे। साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक वह मस्जिस्Sद Sा+े का वष: +हीं ब ा सक ा Sहां उस+े पविवत्र कु रा+ पढ़ी है और यह क े वल अ+ुमा+ ही होगा। साक्षी का कर्थी+ +माS पढ़+े क े समय को +हीं ब ा ा है Sब +माS पढ़ी Sा रही र्थीी। Sब वह मस्जिस्Sद में इबाद कर रहा र्थीा उस वष: या वषÂ क े सन्दभ: में इस साक्ष्य को इस क ै विवएर्ट क े सार्थी पढ़ा Sा+ा चाविहए।
711. मो. यूवि+स सिसद्दीकी (पीर्डब्ल्यू-6): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 28 +वंबर 1996 है। साक्षी की आयु 63 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी विद+ांक 9 Sुलाई 1955 को एक अति*वXा क े रूप में लख+ऊ में +ामांविक र्थीा। साक्षी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +े कहा विक Sब वह 12-13 साल का र्थीा ब वह अप+े बड़े भाई क े सार्थी पहली बार शब-ए-रा की रा में बाबरी मस्जिस्Sद क े अंदर गया र्थीा। वह कह ा है: "इसक े बाद मैं प्रत्येक शब-ए-रा की रा में मस्जिस्Sद Sा ा र्थीा। मैं विद+ में भी मस्जिस्Sद Sा ा र्थीा। मैं+े विद+ क े समय में क े वल एक बार +माS पढ़ी है परन् ु शब-ए-रा क े अवसर पर +फले पढ़ी है। मैं+े उसी विद+, विद+ में +माज़ अदा की र्थीी Sब मूर्ति याँ वहां रखी गई र्थीीं। इससे पहले विक Sुम्मा (शुक्रवार) +माज़ अदा की Sा ी र्थीी।" प्रति -परीक्षा में उस+े स्वीकार विकया विक वह व:मा+ वाद में शाविमल र्थीा परन् ु यह कहा विक वह वाद में वादीगर्णों द्वारा क े वल मूकदश:क क े रूप में र्थीा। उसे वष: 1961 से पूव: मामले से संबंति* कागSा देख+े का अवसर +हीं विमला। साक्षी +े कहा विक उस+े वष: 1949 से पूव: कभी हिंहदू पूSा +हीं देखी र्थीी। उसकी स्मृति क े संबं* में साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में वि+म्+खिलखिख स्वीकारोविX की: “... मेरी स्मृति कमSोर है। यह कमSोरी वष: 1986 से प्रारम्भ हुई र्थीी। यह सत्य है विक अब मैं कभी-कभी अप+े बेर्टों क े +ाम भी भूल Sा ा हूं। मेरे 5 बेर्टे हैं, मैं उन्हें पहचा+ ा हूँ। उस समय या+ी 1987 से मेरी दृविष्ट कमSोर हो गई है। उस समय मेरे सिसर में चोर्ट लगी र्थीी।” (प्रभाव वर्ति* )

712. हसम उल्लाह अंसारी (पीर्डब्ल्यू-7): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी विद+ांक 5 विदसंबर, 1996 र्थीी। साक्षी की आयु लगभग 65 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक उसका Sन्म वष: 1932 में अयोध्या में हुआ र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उस+े कहा विक उसकी Sन्म ति णिर्थी 8 S+वरी 1934 ब ाई गई है लेविक+ यह गल है। अप+ी Sन्मति णिर्थी क े संबं* में साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में वि+म्+खिलखिख कर्थी+ विकया: "Sब मेरी णिशक्षा पूर्ण: हो+े पर फोफस कॉलेS से प्रमार्ण पत्र विमला ो मुझे प ा चला विक मेरी Sन्म ति णिर्थी गल उसिल्लखिख हुई है। मैं+े इस गल ी को सु*ार+े क े खिलए कोई कदम +हीं उठाया।" साक्षी +े वष: 1996 में अप+ी आयु 65 ब ाई है और उसक े अ+ुसार उसक े Sन्म का वष: 1931 हो+ा चाविहए। उस+े कहा विक वह सैकड़ों बार बाबरी मस्जिस्Sद में +माS अदा की है और सबसे पहले वष: 1943 में +माS पढ़ी र्थीी। साक्षी +े कहा विक मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा से एक सप्ताह पहले क वह वि+यविम रूप से वहां +माS पढ़ रहा र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में उस+े कहा: "मैं+े 22 विदसंबर 1949 को इस मस्जिस्Sद में +माS +हीं पढ़ी र्थीी। मैं+े 21 विदसंबर, 1949 को भी वहां +माS +हीं पढ़ी र्थीी। मैं+े अप+े कर्थी+ को सही विकया है विक मैं मूर्ति क े रख+े से एक सप्ताह पहले क शायद ही कभी वहां +माS पढ़ी र्थीी। वहां मैं+े पांचों वX की +माS +हीं पढ़ी लेविक+ वि+तिश्च रूप से अस्र की +माS पढ़ी।" साक्षी +े कहा विक 22 विदसंबर, 1949 से पहले विववाविद संपखित्त पर +माS अदा की गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक इस मस्जिस्Sद में पांच बार Sुमे की +माज़ क े सार्थी-सार्थी +माS भी अदा की गई र्थीी। रमSा+ क े दौरा+, बाबरी मस्जिस्Sद में राबी +माज़ अदा की गई। साक्षी +े कहा विक विद+ांक 22 विदसंबर क उस+े मस्जिस्Sद में कोई मूर्ति +हीं देखी र्थीी और + ही विकसी को वहां पूSा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर े देखा र्थीा। उस+े कहा विक उस+े पूSा कर+े क े खिलए विकसी हिंहदू को Sा े हुए +हीं देखा र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक वह मस्जिस्Sद में वि+यविम रूप से +माS अदा कर रहा र्थीा। Sब उस+े वष: 1943 में पहली बार +माज़ अदा की ो वह 11-12 वष: का र्थीा। साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक मूर्ति यों को रख+े से दो विद+ पूव: उस+े अस्र की +माS पढ़ी र्थीी और वहाँ पर 8-10 लोग मौSूद र्थीे। अस्र की +माS पढ़+े से पूव: Sुमे की +माS पढ़ी र्थीी सिSसमें 400-500 लोग मौSूद र्थीे। साक्षी +े अप+ी प्रति -परीक्षा में विववाविद संपखित्त का विवस् ृ विववरर्ण विदया।

713. श्री अब्दुल अSीS (पीर्डब्ल्यू-8): मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 20 S+वरी, 1997 र्थीी। साक्षी की आयु 70 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा है विक उसका Sन्म वष: 1926 में हुआ र्थीा और वह लगभग 10 वष: का र्थीा Sब उस+े पहली बार मस्जिस्Sद में +माS पढ़ी र्थीी। उस+े कहा विक उस+े सैकड़ों बार +माज़ पढ़ी है। साक्षी +े कहा है विक उस+े मस्जिस्Sद में 'शुक्रवार +माS', 'Sोहर +माS', ' अस्र +माS' और 'शबे-ए-रा की +माS' पढ़ी है। साक्षी +े कहा विक वष: 1949 में एक मूर्ति रख+े क े बाद +माS पढ़+ा बंद हो गया र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक उस+े विद+ांक 22 विदसंबर से ठीक पहले शुक्रवार को अंति म +माS पढ़ी र्थीी। मस्जिस्Sद में पहली +माS पढ़+े क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दो- ी+ वष: बाद इस मस्जिस्Sद में शबे-रा की +माS भी पढ़ी गई र्थीी। साक्षी क े अ+ुसार स्व ंत्र ा क वह विपछले 13-14 वषÂ से +माS पढ़ रहा र्थीा।

714. श्री सैय्यद अखलाक अहमद (पीर्डब्ल्यू-9): साक्षी की आयु लगभग 60 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक उस+े मस्जिस्Sद में Sुमे की +माS और पांचवXी +माS पढ़ी र्थीी। मौला+ा अब्दुल गफ्फार बाबरी मस्जिस्Sद क े इमाम र्थीे और विमयां इस्माइल मोअखिज्ज+ र्थीे। उन्हों+े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक Sहां क उसे याद है मस्जिस्Sद में पढ़ी गई पहली +माS स्व ंत्र ा क े बाद र्थीी और यह +माज़-ए-मगरीब र्थीी। उन्हों+े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक वह विद+ांक 22-23 विदसंबर, 1949 से पांच या छह विद+ पहले मस्जिस्Sद में +माS पढ़+े गए र्थीे। उपस्जिस्र्थी व्यविXयों की सं. 200 से 400 या यहां क विक 500 भी हो सक ी है। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी क े कर्थी+ क े अ+ुसार वह 13-14 वष: का रहा होगा Sब उस+े पहली बार +माS-ए- मगरीब पढ़+े गया र्थीा। उस+े आगे कहा विक Sब उस+े मस्जिस्Sद में अप+े अंति म +माज़-ए-Sुम्मा पढ़ी ो वह 14 वष: का र्थीा। हालांविक साक्षी +े कहा विक उस+े वष: 1947 क े बाद +माS पढ़ी र्थीी, वह अ+ुमावि+ अवति* भी +हीं ब ा सक ा र्थीा Sब उस+े +माS पढ़ी र्थीी। न्यायमूर्ति अ£वाल +े +ोर्ट विकया विक साक्षी अप+ी स्मृति से उ+ घर्ट+ाओं को स्मरर्ण कर+े में असमर्थी: र्थीा।

715. Sलील अहमद (पीर्डब्ल्यू-14): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 16 फरवरी, 1999 र्थीी। साक्षी की आयु 78 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक उस+े बाबरी मस्जिस्Sद में +माS पढ़ी है। उसकी प्रति -परीक्षा में यह साम+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आया विक अयोध्या उसक े घर से 2 विकलोमीर्टर की दूरी पर है। साक्षी +े कहा विक उस+े मस्जिस्Sद में इशा और Sुम्मा दो+ों +माज़ पढ़ी है। उसक े कर्थी+ क े अ+ुसार साक्षी फ ै Sाबाद में मोहल्ला वि+वावा में स्जिस्र्थी सिSन्ना ी मस्जिस्Sद की देखभाल कर ा है। साक्षी +े अप+े प्रति -परीक्षा में कहा विक उस+े आखिखरी बार 24-25 वष: की आयु में बाबरी मस्जिस्Sद में +माS पढ़ी र्थीी। उस+े कहा विक उस+े कई अवसरों पर विववाविद स्र्थील में Sुमे की +माज़ पढ़ी र्थीी। उस+े कहा विक उस+े विववाविद स्र्थील पर राबी की +माS +हीं पढ़ी र्थीी। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े विववाविद संपखित्त का विववरर्ण विदया। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक वह लगभग 78 वष: का है और यह +हीं ब ा सक ा है विक मूर्ति रखे Sा+े और Sुमे की +माज़ पढ़+े से पहले उस+े विक +ी लम्बी अवति* क +माS पढ़ी है। उस+े कहा विक वह यह +हीं ब ा सक ा है विक वह दो माह से या विपछले पांच से छह वष: से विववाविद संपखित्त में +माS पढ़ रहा र्थीा।उस+े आगे कहा विक उस+े एक बार विववाविद स्र्थील पर इशा +माज़ पढ़ी र्थीी।

716. र्डा. हाणिशम विक़दवई (पीर्डब्ल्यू-21): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 22.11.01 ब ाई गई र्थीी। साक्षी की आयु लगभग 80 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक वह विदसंबर 1939 में पहली बार फ ै Sाबाद गया Sब उसक े विप ा फ ै Sाबाद में ै+ा र्थीे। उस माह वह अप+े परिरवार क े सदस्यों क े सार्थी बाबरी मस्जिस्Sद को देख+े गया और स्र्थील पर मगरीब +माS पढ़ी। साक्षी +े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कहा विक वष: 1941 क वह हर छ ु ट्टी पर फ ै Sाबाद Sा ा र्थीा। अक्र्टूबर 1941 में साक्षी क े विप ा को अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट क े रूप में लख+ऊ स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया र्थीा। साक्षी +े कहा विक इस अवति* क े दौरा+ उस+े मस्जिस्Sद में 15-20 बार अासिसर की +माज़ 4 से 5 बार और शुक्रवार की +माS 2-3 बार पढ़ी र्थीी। मगरीब-की-+माज़ में लगभग 100 व्यविXयों +े, आसिसर +माS में 40-50 व्यविXयों +े भाग खिलया और लगभग 250- 300 व्यविXयों +े Sुम्मा +माज़ पढ़ी र्थीी। साक्षी +े कहा विक वष: 1984 में उसे राज्य सभा का सदस्य चु+ा गया और वह छह वष: क संसद सदस्य ब+ा रहा। उस+े अप+ी प्रति -परीक्षा में कहा विक Sब वह 1939 में पहली बार +माS अदा कर+े गया र्थीा ो उस+े मस्जिस्Sद क े क्षति £स् विहस्सों क े संबं* में कोई विवशेष Sांच +हीं की। उस+े कहा विक 27 विदसंबर, 1939 में वह पहली बार विववाविद ढाँचे में गया र्थीा। साक्षी +े बाद में कहा विक Sब वह पहली और दूसरी बार विववाविद संपखित्त में गया ो उस+े भव+ क े हर विहस्से को अंदर और बाहर से देखा र्थीा। उस+े व:मा+ गुम्बद एवं स् ंभों का विवस् ृ वर्ण:+ विकया है। उस+े कहा विक +माSी गुंबदाकार ढाँचे क े सार्थी-सार्थी अहा े में भी मौSूद र्थीे। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक वह मई 1941 से फ ै Sाबाद या अयोध्या +हीं Sा सका है। विदसंबर 1939 और मई 1941 क े बीच वह स्र्थीायी रूप से फ ै Sाबाद में +हीं रह रहा र्थीा और छ ु विट्टयों क े दौरा+ कभी कभी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वहां Sा ा र्थीा। प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक उस+े विववाविद संपखित्त को बाहर और अंदर से देखा है लेविक+ चारदीवारी क े बारे में विवस् ार से +हीं ब ा सक ा है, क्योंविक 60-62 साल की लंबी अवति* बी चुकी र्थीी।

717. मो. कासिसम अंसारी (पीर्डब्ल्यू-23) (पीर्डब्ल्यू-1 का भाई): मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 16 S+वरी 2002 र्थीी। साक्षी की आयु 74 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े कहा विक उसे विववाविद संपखित्त क े बारे में प ा र्थीा Sो उसक े घर से 3 फलाãग की दूरी पर स्जिस्र्थी र्थीा। साक्षी +े कहा विक उस+े लगभग 8-9 वषÂ से मस्जिस्Sद में +माS पढ़ी र्थीी। उस+े फ़ाविज़र ज़ोहर, अस्र, मगरीब, इशा और राबी की +माS पढ़ी र्थीी। उस+े कहा विक उस+े आखिखरी बार विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 को +माS पढ़ी र्थीी Sब उस+े इशा की +माज़ पढ़ी र्थीी। उस+े कहा विक मूर्ति यों को रख+े क े चार वष: बाद, मुस्जिस्लमों +े सरकार को +ोविर्टस दी विक वे वहां अलविवदा +माS पढ़ेंगे। Sब वे अलविवदा +माS पढ़+े गए ो पुखिलस +े उन्हें रोका और विगरफ् ार कर खिलया। प्रति -परीक्षा में कहा विक Sब वह पहली बार +माS पढ़+े गया र्थीा ब वह पहली कक्षा में र्थीा। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक विववाविद स्र्थील एक वक्फ है, परन् ु उसे इस विवषय में कोई ज्ञा+ +हीं है विक मस्जिस्Sद का वक्फ कौ+ है। अप+ी प्रति -परीक्षा में साक्षी +े कहा विक उस+े विववाविद मस्जिस्Sद में विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 को शाम क े लगभग 7:30 बSे इशा की +माज़ पढ़ी र्थीी। बाद में उस+े कहा विक विववाविद ढाँचे में अंति म बार +माS पढ़+े क े विवषय में वह +हीं ब ा सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पीर्डब्ल्यू-23 क े कर्थी+ों क े संबं* में न्यायमूर्ति अ£वाल की अवलोक+ों का उल्लेख कर+ा प्रासंविगक है। उन्हों+े पीर्डब्ल्यू-23 द्वारा विदए गए वि+म्+खिलखिख कर्थी+ को +ोर्ट विकया: ''Sब मैं विपछली बार विववाविद ढाँचे पर इशा की +माS पढ़+े गया र्थीा ो फारूक मेरे सार्थी र्थीा.........विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 को 'इशा' की +माज़ पढ़+े में हशम उल्लाह क े सार्थी भी मैं र्थीा।" न्यायमूर्ति अ£वाल +े +ोर्ट विकया विक फारूक (पीर्डब्ल्यू-3) और हशम उल्लाह (पीर्डब्ल्यू-7) द्वारा कर्थी+ की संपुविष्ट +हीं की गई र्थीी। पीर्डब्ल्यू-3 +े कहा र्थीा: “विद+ांक 22 विदसंबर 1949 को इशा +माज़ में रहमा+ साहब और यू+ुस साहब मेरे सार्थी र्थीे।" इसखिलए, पीर्डब्ल्यू-3 पीर्डब्ल्यू-23 क े कर्थी+ की पुविष्ट +हीं कर ा है। इस प्रकार PW-7 +े कहा र्थीा: "मैं+े आखिखरी बार मस्जिस्Sद में उस घर्ट+ा से दो विद+ पहले ही +माS पढ़ी र्थीी Sब मूर्ति वहां रखी गई र्थीी।" "मैं+े विद+ांक 22 विदसंबर 1949 को इस मस्जिस्Sद में +माS +हीं पढ़ी।" "मैं+े विद+ांक 22 विदसंबर, 1949 को वहां भी +माS +हीं पढ़ी।"

718. सिसब् े मोहम्मद +कवी (पीर्डब्ल्यू-25): साक्षी की मुख्य परीक्षा की ति णिर्थी 5 माच:, 2002 र्थीी। साक्षी की आयु 76 वष: ब ाई गई र्थीी। साक्षी +े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ढाँचे को दूर से देखा र्थीा। उस+े कहा विक वह वष: 1948 में अयोध्या आया र्थीा और उस+े बाबरी मस्जिस्Sद में Sा+े वाले +मासिSयों को देखा र्थीा। साक्षी +े कहा विक उस+े विकसी को भी विववाविद संपखित्त पर +माS पढ़ े +हीं देखा र्थीा। चूंविक साक्षी स्वयं विववाविद संपखित्त में +हीं गया है या वास् व में विकसी को स्र्थील पर +माS पढ़ े देखा है, पीर्डब्ल्यू-25 द्वारा प्रस् ु साक्ष्य अ+ुश्रु हैं। Sैसा विक पहले उल्लेख विकया गया है विक वाद 4 में वादीगर्णों क े खिलए विदये Sा+े वाले बया+ क ु छ सातिक्षयों क े साक्ष्य में विवरो*ाभास और विवसंगति यां हैं। हालांविक, सामान्य स्मृति विवफल ा को छोड़कर न्यायालय को सशX रीक े से कर्थी+ों का आकल+ कर+ा चाविहए। सातिक्षयों द्वारा अप+ी मुख्य परीक्षा में दायर शपर्थीपत्रों में से कई कर्थी+ों में व्यापक दावे और सामान्यीकरर्ण हैं Sो प्रति -परीक्षा क े दौरा+ मान्य +हीं हैं। कर्थी+ों का आकल+ कर े हुए यह वि+ष्कष: +हीं वि+काला Sा सक ा है विक विववाविद संपखित्त पर +माS +हीं पढ़ी Sा रही र्थीी। साक्ष्य में मौखिखक कर्थी+ों का दस् ावेSी साक्ष्य क े सार्थी मूल्यांक+ विकया Sा+ा है। वक्फ वि+रीक्षक मोहम्मद इब्राविहम की 10 विदसंबर 1949 विद+ांविक की रिरपोर्ट: यह +ोर्ट कर ी है विक: "मुझे ज्ञा हुआ विक हिंहदुओं और सिसखों क े भय से कोई भी व्यविX मस्जिस्Sद में +माज़ +हीं पढ़ ा। यविद कोई व्यविX रा क े समय मस्जिस्Sद में रह ा है ो उसे विहन्दुओं द्वारा बहु स ाया Sा ा है। अहा े क े बाहर हिंहदुओं का एक मंविदर है Sहां कई हिंहदू रह े हैं। वे विकसी भी मुस्जिस्लम को अपशब्द कह े हैं Sो मस्जिस्Sद Sा े हैं। मैं स्र्थील गया और Sाँच में पाया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विक Sो क ु छ भी ऊपर कहा गया है वह सही है। लोगों +े यह भी कहा विक इसकी दीवारों को कमSोर कर+े क े रूप में हिंहदुओं से मस्जिस्Sद को ख रा है। फ ै Sाबाद क े उपायुX को खिलखिख रूप में प्रस् ु कर+ा उतिच प्र ी हो ा है विक मस्जिस्Sद में +माज़ पढ़+े वाले मुस्जिस्लमों को परेशा+ +हीं विकया Sा+ा चाविहए....” (प्रभाव वर्ति* ) रिरपोर्ट: से संक े विमल ा है विक मस्जिस्Sद में मुस्जिस्लमों द्वारा इबाद कर+े को हिंहदुओं और सिसखों द्वारा बाति* की Sा रही र्थीी और कोई भी +माS +हीं पढ़ी Sा रही र्थीी। वक्फ वि+रीक्षक की 23 विदसंबर 1949 विद+ांविक की एक और रिरपोर्ट: है सिSसमें कहा गया विक वह विद+ांक 22 विदसंबर 1949 को बाबरी मस्जिस्Sद और कविब्रस् ा+ की स्जिस्र्थीति की Sांच कर+े गया र्थीा। उन्हों+े +ोर्ट विकया विक बाबा रघु+ार्थी क े Sन्मस्र्थीा+ Sा+े क े ी+ माह और उ+क े वि+कल+े क े एक माह बाद से ही हSारों हिंहदुओं, पुSारिरयों और पंतिर्ड ों को रामायर्ण पाठ कर+े क े खिलए वहां इकट्ठा विकया गया। रिरपोर्ट: में कहा गया र्थीा: "... अब मस्जिस्Sद बन्द है। Sुमे क े विद+ और वX को छोड़कर कोई भी अSा+ को कर+े की और + ही +माज़ पढ़+े की अ+ुमति है। ाले और चाविबयां मुस्जिस्लमों क े पास रह ी हैं। लेविक+ पुखिलस उन्हें ाला खोल+े की अ+ुमति +हीं दे ी है। यह ाला Sुमा क े विद+ या+ी शुक्रवार को दो या ी+ घंर्टे क े खिलए खोला Sा ा है। इस दौरा+ मस्जिस्Sद को साफ विकया Sा ा है और Sुमे की +माS पढ़ी Sा ी है। इसक े बाद हमेशा की रह इसे बंद कर विदया Sा ा है... अाS यही Sुमे का शुक्रवार है...।" (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वक्फ इंस्पेक्र्टर की रिरपोर्ट: कई गवाहों क े दावे पर विवश्वास कर ी है विक उन्हों+े विद+ांक 22 विदसंबर 1949 को +माS पढ़ी र्थीी। उपरोX रिरपोर्ट: में कहा गया है विक विद+ांक 23 विदसंबर 1949 Sुमे का विद+ र्थीा। यह यर्थीोतिच रूप से वि+ष्कष: वि+काला Sा सक ा है विक अंति म Sुमे की +माS शुक्रवार 16 विदसंबर 1949 को पढ़ी Sा+ी चाविहए र्थीी। यह मा++े क े खिलए अणिभलेख पर साक्ष्य हैं विक मुस्जिस्लमों +े मस्जिस्Sद में शुक्रवार की +माS अदा की र्थीी और विववाविद संपखित्त को पूरी रह से खोया अर्थीवा छोड़ा +हीं र्थीा। O.[9] 1949 में मूर्ति यों को रख+ा

719. विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की मध्यरावित्र क े दौरा+ विहन्दू समुदाय क े लगभग पचास से साठ व्यविXयों +े बाबरी मस्जिस्Sद क े क े न्ˆीय गुंबद क े +ीचे मूर्ति याँ रखीं। इस घर्ट+ा क े पहले और बाद की घर्ट+ाएँ +ीचे दी गई हैं: (i) 12 +वंबर, 1949 को पुखिलस दल की ै+ा ी; (ii) फ ै Sाबाद क े पुखिलस अ*ीक्षक +े उपायुX क े क े +ायर और सिSलाति*कारी को 29 +वंबर, 1949 विद+ांविक को यह आशंका व्यX कर े हुए पत्र Sारी विकया र्थीा विक विहन्दुओं द्वारा मस्जिस्Sद में मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर+े क े उद्देश्य से प्रवेश विकए Sा+े की संभाव+ा है; (iii) वक्फ वि+रीक्षक की 12 विदसंबर, 1949 विद+ांविक की एक रिरपोर्ट: में कहा गया है विक Sब वे मस्जिस्Sद में इबाद कर+ा चाह े र्थीे ब हिंहदुओं द्वारा मुस्जिस्लमों को परेशा+ विकया Sा रहा र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) उत्तर प्रदेश सरकार क े गृह सतिचव को उपायुX और सिSलाति*कारी क े 6 विदसंबर, 1949 विद+ांविक क े एक पत्र में राज्य सरकार से अ+ुरो* विकया गया है विक वह मस्जिस्Sद की सुरक्षा क े संबं* में मुस्जिस्लमों की आशंकाओं को विवश्वस+ीय ा + दें; (v) विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की घर्ट+ा क े पश्चा ् प्रार्थीविमकी दS: की गई; (vi) मुख्य सतिचव को क े क े +ायर का 26 विदसंबर, 1949 विद+ांविक का एक पत्र सिSसमें उस घर्ट+ा पर आश्चय: व्यX विकया गया र्थीा Sो घविर्ट हुई र्थीी। सिSलाति*कारी +े मस्जिस्Sद से मूर्ति हर्टा+े क े राज्य सरकार क े आदेशों का पाल+ कर+े से इ+कार कर विदया। (vii) क े क े +ायर क े पत्र 27 विदसंबर, 1949 विद+ांविक में कहा गया है विक वे ऐसा कोई विहन्दू +हीं पाएंगे Sो मूर्ति यों को हर्टा+े का काय: करेगा और यह प्रस् ाव करेगा विक मस्जिस्Sद को पुSारिरयों की न्यू+ म संख्या क े अपवाद स्वरूप विहन्दू और मुस्जिस्लम दो+ों को संलग्न कर+ा चाविहए और पक्षकारों को सिसविवल न्याया*ीश क े पास अति*कारों क े न्यायवि+र्ण:य+ क े विवचारार्थी: भेSा Sा+ा चाविहए; और (viii) विद+ांक 29 विदसंबर, 1949 को *ारा 145 क े ह प्रारंणिभक आदेश पारिर कर+ा सिSसक े अ+ुसरर्ण में प्रापक +े विद+ांक 5 S+वरी, 1950 को काय:भार £हर्ण विकया और क ु क: संपखित्त की सूची ैयार की। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े वाद 4 में अप+े वादपत्र क े प्रस् र 11 में क: विदया विक विद+ांक 23 विदसंबर, 1949 को मस्जिस्Sद क े क ें ˆीय गुंबद क े अंदर भगवा+ राम की मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा द्वारा मस्जिस्Sद को अपविवत्र विकया गया र्थीा। वाद 4 और 5 में वादीगर्णों +े यह विववाद +हीं विकया विक विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की मध्यरावित्र क े दौरा+ देव ा की मूर्ति यों को क ें ˆीय गुम्बद क े अंदर रखा गया र्थीा। हालांविक वि+म ही अखाड़े +े इस घर्ट+ा क े हो+े से इ+कार कर विदया विक मूर्ति याँ हमेशा मस्जिस्Sद क े क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे हो ी र्थीी। वाद 1, 4 और 5 में उच्च न्यायालय द्वारा वि+म्+खिलखिख मुद्दों को विवरतिच विकया गया र्थीा: वाद 1 में विववाद्यक 2 वि+म्+ है: "क्या भगवा+ राम चंˆ Sी की कोई मूर्ति उ+क े चरर्ण पादुका वाद£स् स्र्थील पर स्जिस्र्थी है?” वाद 4 में विववाद्यक 12 वि+म्+ है: "Sैसा विक वादपत्र क े प्रस् र 11 में अणिभकणिर्थी है विक क्या पूSा की मूर्ति यों और वस् ुओं को विद+ांक 22/23 विदसंबर, 1949 की मध्यरावित्र को भव+ क े अंदर रखा गया र्थीा या वे पहले से ही वहां अस्जिस् त्व में हैं? दो+ों ही स्जिस्र्थीति यों में इसका प्रभाव? वाद 5 में विववाद्यक 3 ए वि+म्+ है: “3(ए) Sैसा विक वादपत्र क े प्रस् र 27 में वादी द्वारा अणिभकणिर्थी सीपीसी वि+यम 2 क े आदेश 10 क े ह उ+क े कर्थी+ में स्पष्ट विकया गया र्थीा विक क्या प्रश्नग मूर्ति को विद+ांक 23 विदसंबर, 1949 क े प्रारस्जिम्भक घंर्टों में विववाविद भव+ क े क ें ˆीय गुंबद क े अंदर स्र्थीाविप विकया गया र्थीा।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायमूर्ति एस यू खा+ और न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अव*ारिर विकया विक मूर्ति यों को 22/23 विदसंबर, 1949 क े मध्यरावित्र में आं रिरक अहा े क े अंदर विववाविद ढाँचे क े क ें ˆीय गुंबद क े अंदर रखा गया र्थीा। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े भी यह अव*ारिर विकया विक वि+म ही अखाड़ा यह स्र्थीाविप कर+े में विवफल रहा है विक मूर्ति यों को 22/23 विदसंबर 1949 क े मध्यरावित्र में गुंबद क े अंदर स्र्थीाविप कर+े क े पूव: से ही अस्जिस् त्व में र्थीीं। वाद 1 में प्रति वादी संख्या 1 से 5 क एक खिलखिख कर्थी+ दायर विकया गया र्थीा, Sहां प्रस् र 22 में यह दलील दी गई र्थीी विक विद+ांक 16 विदसंबर, 1949 को Sब +माS पढ़ी गई र्थीी ो क ें ˆीय गुंबद क े अन्दर कोई भी मूर्ति मौSूद +हीं र्थीी। प्रति वादी संख्या 6 द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ में यह कहा गया र्थीा विक भगवा+ राम की मूर्ति यों को विद+ांक 22 विदसंबर 1949 की रा को गुप्त और गल रूप से मस्जिस्Sद में स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। वाद 4 में प्रति वादी संख्या 1 और 2 +े अप+े खिलखिख कर्थी+ दायर विकए सिSसमें कहा विक विववाविद स्र्थील, वाद 4 में वादीगर्णों क े कब्Sे में र्थीा। यह कहा गया र्थीा विक यह मा+ े हुए विक वादीगर्णों क े पास कब्Sा र्थीा और यह वष: 1934 में बंद हो गया र्थीा सिSसक े बाद से प्रति वाविदयों का स्र्थीाविप कब्Sा हो गया है। प्रति वादी सं. 3 और 4 (क्रमशः वि+म ही अखाड़ा और महं रघु+ार्थी दास) द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ में वाद 4 में वादपत्र क े प्रस् र 11 क े प्रकर्थी+ से इ+कार विकया गया र्थीा। यह क: विदया गया र्थीा विक वाद 4 में वादीगर्णों +े भव+ को बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में गल रीक े से संदर्भिभ विकया है Sबविक यह हमेशा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA से Sन्मभूविम का मंविदर रहा है Sहां हिंहदू देव ाओं की मूर्ति यों को स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। प्रासंविगक सन्दभ: वि+म्+खिलखिख है: “11. यह विक वादपत्र क े प्रस् र 11 की अन् व:स् ु पूर्ण: ः असत्य और म+गढ़ं है। कणिर्थी मस्जिस्Sद कभी अस्जिस् त्व में ही +हीं र्थीी और + ही अब भी मौSूद है और विकसी भी मुस्जिस्लम या मुस्जिस्लम समुदाय का उस पर शांति पूर्ण: कब्Sे का और विद+ांक 23.12.1949 क +माS पढ़+े का प्रश्न ही +हीं उठ ा। सिSस भव+ को वादीगर्णों +े गल रीक े से बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में संदर्भिभ विकया है वह हमेशा से ही हिंहदू देव ाओं की स्र्थीाविप मूर्ति यों क े सार्थी Sन्म भूविम का मंविदर रहा है। विकसी भी मस्जिस्Sद क े अंदर मूर्ति यों को रख+े क े संबंति* वादपत्र का आरोप पूर्ण: ः असत्य है।” वाद 5 में वादपत्र का प्रस् र 27 कह ा है: “अं ः विद+ांक 22 23 विदसंबर, 1949 की रा को भगवा+ श्री राम की मूर्ति को उतिच समारोह क े सार्थी भव+ क े क ें ˆीय गुंबद क े अंदर भी स्र्थीाविप विकया गया।" वादी संख्या 3 +े वाद 5 में विद+ांक 30 अप्रैल, 1992 को अणिभखिलखिख सीपीसी क े आदेश 10 वि+यम 2 क े ह अप+े कर्थी+ में कहा: "विद+ांक 23 विदसंबर, 1949 क े प्रारस्जिम्भक घंर्टों में भगवा+ श्री राम लला की मूर्ति Sो पहले से ही राम चबू रे पर र्थीी, को उस स्र्थीा+ पर या+ी विववाविद भव+ क े क ें ˆीय गुंबद क े अन्दर स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया र्थीा Sहां वे व:मा+ में स्र्थीाविप हैं। मैं उस समय व्यविXग रूप से मौSूद +हीं र्थीा। यह Sा+कारी मुझे विदगंबर अखाड़े क े परमहंस राम चंˆ दास +े दी र्थीी। मूर्ति का यह स्र्थीा+ां रर्ण परमहंस चन्ˆ दास और बाबा अणिभराम mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दास और क ु छ अन्य व्यविXयों द्वारा विकया गया सिS+क े +ाम मुझे इस क्षर्ण स्मरर्ण +हीं है...” वाद 4 क े वादीगर्णों की ओर से परीतिक्ष विकए गए सातिक्षयों क े संबं* में उच्च न्यायालय +े अणिभखिलखिख विकया विक प्रासंविगक समय में कोई भी साक्षी मौक े पर मौSूद +हीं र्थीा। इसखिलए, इस विववाद्यक पर वि+*ा:रर्ण क े खिलए उ+क े कर्थी+ों पर अवलम्ब +हीं खिलया Sाएगा। ओपीर्डब्ल्यू-1 और ओपीर्डब्ल्यू-2 Sो वाद 5 में वादीगर्णों की ओर से पेश हुए र्थीे, +े अप+े कर्थी+ में कहा विक मूर्ति यों को 22/23 विदसंबर 1949 को रामचबू रा से स्र्थीा+ां रिर कर विदया गया र्थीा। ओपीर्डब्ल्यू-1 (महं परमहंस रामचंˆ दास) +े अप+े कर्थी+ में कहा विक मूर्ति यों को 23 विदसंबर 1949 को मंच से हर्टा+े क े बाद रखा गया र्थीा: "मेरे द्वारा ‘गभ:-गृह’ कहा Sा+े वाला स्र्थीा+ मेरे और सभी हिंहदुओं क े विवश्वास क े अ+ुसार रामचंˆ का Sन्मस्र्थीा+ है। सिSस स्र्थीा+ पर प्रति माओं को 23 विदसंबर, 1949 को मंच से हर्टा+े क े बाद रखा गया र्थीा, उसे मैं Sन्मस्र्थीा+ मा+ ा र्थीा और मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा से पहले भी उस स्र्थीा+ को मैं Sन्मभूविम मा+ ा र्थीा।" ओपीर्डब्ल्यू-2 का कर्थी+ इसी रह का प्रभाव र्थीा। Sो साक्षी वि+म ही अखाड़े की ओर से परीतिक्ष विकये गए हैं उन्हों+े इस मामले का समर्थी:+ विकया विक मूर्ति याँ क ें ˆीय गुम्बद क े अन्दर 22/23 विदसंबर, 1949 की मध्यरावित्र से पूव: मौSूद र्थीीं। वाद 3 में वादीगर्णों +े 20 सातिक्षयों (र्डीर्डब्ल्यू-3/1-र्डीर्डब्ल्यू 3/20) को परीतिक्ष विकया। र्डीर्डब्ल्यू-3/1 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (महं भास्कर दास) +े कहा विक 22/23 विदसंबर 1949 की मध्यरावित्र में कोई घर्ट+ा +हीं घर्टी। उन्हों+े आगे कहा विक वह उस ति णिर्थी को परिरसर में सो रहे र्थीे। र्डीर्डब्ल्यू 3/1 द्वारा विकये गए कर्थी+ों की Sांच की गई है और इस वि+र्ण:य क े एक अन्य भाग में खारिरS कर विदया गया है। साक्षी का स्पष्टीकरर्ण विक वह विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 को विववाविद परिरसर में सो रहा र्थीा और कोई घर्ट+ा +हीं घर्टी र्थीी यह उसकी म+गढं कल्प+ा है। विद+ांक 22 विदसंबर 1949 की रा को भगवा+ राम की मूर्ति यों को मस्जिस्Sद क े भी र रख विदया गया। प्रार्थीविमकी पर कार:वाई कर े हुए फ ै Sाबाद-सह- अयोध्या क े अपर सिसर्टी मसिSस्र्ट्रेर्ट +े स्जिस्र्थीति को एक आपाति प्रक ृ ति मा+ े हुए विद+ांक 29 विदसंबर 1949 को *ारा 145 क े ह एक प्रारंणिभक आदेश Sारी विकया। इसक े सार्थी ही एक कु क— आदेश Sारी विकया गया र्थीा और फ ै Sाबाद +गर वि+गम बोर्ड: क े अध्यक्ष विप्रया दत्त राम को आं रिरक अहा े क े प्रापक क े रूप में वि+युX विकया गया र्थीा। विद+ांक 5 S+वरी 1950 को प्रापक +े आं रिरक अहा े का काय:भार संभाला और कु क: संपखित्तयों की एक सूची ैयार की। वाद 4 और 5 में वादीगर्णों की अवस्जिस्र्थीति और अणिभलेख पर सातिक्षयों क े कर्थी+, वि+म ही अखाड़े क े दावे को झूठा साविब कर े हैं विक विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की घर्ट+ा से पूव: क ें ˆीय गुंबद क े अंदर मूर्ति याँ मौSूद र्थीीं। यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस घर्ट+ा क े अ+ुसरम में र्थीी विक संपखित्त कु क: की गई। सिसविवल विवचारर्ण को संचाखिल कर+े वाली प्रातियक ाओं की एक अति*क ा पर उच्च न्यायालय का वि+ष्कष: यह है विक देव ाओं की मूर्ति याँ विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 की मध्यरावित्र में स्र्थीाविप की गई र्थीीं अप+ी स्वीक ृ ति क े खिलए स्वयं की सराह+ा कर े हैं।

720. विववाविद स्र्थील पर र्डा. *व+ का सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: क े दावे का अणिभकर्थी+ हिंहदुओं क े अहा े क े बाहर हो+े और मस्जिस्Sद में मुसलमा+ों द्वारा +माS अदा कर+े पर आ*ारिर है। हिंहदुओं का मंविदर "अहा े क े बाहर र्थीा", यह क: अस्पष्ट और साक्ष्य क े विवपरी है। यविद "आँग+" उविX का प्रयोग आं रिरक और बाह्य दो+ों प्रकार क े णिशष्टमंर्डलों को वि+रूविप कर+े क े खिलए विकया Sा ा है, ो यह क: इस थ्य द्वारा झूठा साविब हो ा है विक वष: 1856-7 में रेलिंलग लगा+े क े बाद बाह्य अहा े में हिंहदुओं द्वारा कब्Sे और पूSा कर+े का संक े दे+े वाला एक सुसंग रीका र्थीा। 1856-7 क े सांप्रदातियक दंगों क े बाद रेलिंलग से सर्टे हुए रामचबू रे में पूSा कर+े क े खिलए औपवि+वेणिशक प्रशास+ द्वारा शांति और व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+े क े खिलए रेलिंलग की व्यवस्र्थीा एक उपाय र्थीी। हिंहदुओं द्वारा पूSा की व्यापक प्रक ृ ति को पूSा कर+े क े विवणिशष्ट स्र्थीा+ों की मौSूदगी और वष: 1877 में भXों की अत्यति*क भीड़ क े कारर्ण प्रवेश कर+े क े एक अन्य स्र्थीा+ क े खुल+े क े खिलए प्रशास+ द्वारा अ+ुमति का संक े विमल ा है। 1856-7 क े बाद बाह्य अहा े में हिंहदुओं द्वारा पूSा क े एक सुसंग रीक े क े समक्ष दस् ावेSी साम£ी मुस्जिस्लमों द्वारा या ो बाह्य अहा े क े स्र्थीाई कब्Sे का या उपयोग (मस्जिस्Sद क पहुंच पा+े क े उद्देश्य को छोड़कर) का संक े +हीं दे ी है। बाह्य अहा े में हिंहदुओं का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हो+ा और उ+का कब्Sा क े वल पूSा क े खिलए प्रवेश कर+े का एक वि+यामक अति*कार की प्रक ृ ति में +हीं र्थीा। इसक े विवपरी, हिंहदुओं क े अति*कार और कब्Sे से स्पष्ट है: (i) विववाविद संपखित्त में पूSा क े स्र्थीा+ों पर हिंहदुओं की अ+न्य उपस्जिस्र्थीति Sो रेलिंलग से परे है; (ii) पूSा क े इ+ स्र्थीा+ों पर हिंहदुओं द्वारा पूSा क े साक्ष्य; (iii) भXों की बड़ी संख्या में आ+े से उत्तरी रफ एक अति रिरX प्रवेश द्वार खोल+े की आवश्यक ा प्रशास+ द्वारा महसूस की गई; (iv) यह संक े कर+े क े खिलए विकसी भी साक्ष्य का अभाव है विक मुस्जिस्लमों +े रेलिंलग से परे विववाविद संपखित्त क े क्षेत्र पर अति*कार या कब्Sे का कोई दावा विकया र्थीा; (v) उ+ घर्ट+ाओं सिSसक े दौरा+ रेलिंलग क े अंदर मस्जिस्Sद का उपयोग विववादास्पद हो गया र्थीा; (vi) मस्जिस्Sद में मुस्जिस्लमों क े +माS पढ़+े में बा*ा आ+े की णिशकाय कर+े की वक्फ इंस्पेक्र्टर की रिरपोर्ट:; (vii) हिंहदुओं का अ+न्य रूप से रेलिंलग से परे विववाविद संपखित्त क े बाहरी क्षेत्र क पहुंच; और (viii) रेलिंलग क े अां रिरक क्षेत्र की भूविमबद्ध प्रक ृ ति ।

721. Sहां क आं रिरक अहा े का संबं* है, ऐसा प्र ी हो ा है विक रेलिंलग का लगाया Sा+ा यह सुवि+तिश्च कर+े का एक उपाय र्थीा विक मस्जिस्Sद में मुस्जिस्लमों को इबाद और हिंहदुओं क े रेलिंलग क े बाहर पूSा कर+े अ+ुमति दे+ा ाविक शांति ब+ी रहे। Sहां क मुस्जिस्लमों का आं रिरक अहा े में इबाद कर+े का संबं* है, दस् ावेSी साम£ी यह दशा: ी है विक यद्यविप समय-समय पर अवरो* पैदा हो े र्थीे, परन् ु मस्जिस्Sद की ढाँचे का कोई परिरत्याग या उसक े अन्दर +माS पढ़+ा बंद +हीं विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

722. स्वत्व क े प्रश्न को वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए मुस्जिस्लम और हिंहदू दो+ों क े द्वारा विववाविद परिरसर क े उपयोग की प्रक ृ ति का विवश्लेषर्ण कर+े की आवश्यक ा है। O.10 +ज़ुल भूविम

723. उच्च न्यायालय क े समक्ष वादकारी पक्षकारों द्वारा यह विववाविद +हीं र्थीा विक विववाविद ढाँचा सिSस भूविम पर र्थीा वह +Sुल भूविम क े रूप में अणिभखिलखिख की गई र्थीी (अर्थीा: ् वह भूविम Sो सरकार क े स्वाविमत्व में है) Sो प्लॉर्ट सं. 583, मोहल्ला कोर्ट रामचन्ˆ, सिSसे राम कोर्ट, सिसर्टी अयोध्या, +Sुल एस्र्टेर्ट अयोध्या क े +ाम से Sा+ा Sा ा र्थीा, क े 1931 क े खसरा क े रूप में र्थीा। सिSस भूखंर्ड में विववाविद ढाँचा स्जिस्र्थी र्थीा, उसकी संख्या विववाविद +हीं र्थीी और यह स्वीकार विकया गया र्थीा विक भूखंर्ड को 1861 क े प्रर्थीम बन्दोबस् ी में +Sुल भूविम क े रूप में अणिभखिलखिख विकया गया र्थीा और वाद क े संस्र्थी+ की णिर्थी पर इस रह Sारी रहा।

724. वास् व में, वाद 5 में यू पी सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: ऑफ वक्फ क े खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 24(बी) में यह कहा गया है: "प्रश्नग भूविम वि+ःसंदेह राज्य की र्थीी Sब राज्य की ओर से प्रश्नग मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा और इस रह यह +हीं कहा Sा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक ा है विक यह मस्जिस्Sद क े उद्देश्यों क े खिलए समर्मिप +हीं हो सक ी है।" न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अक्र्टूबर 1846 और अक्र्टूबर 1848 में उत्तर- पतिश्चमी प्रां ों क े उप-राज्यपाल क े अति*कार क े ह Sारी दो आदेशों का हवाला दे े हुए ऐति हासिसक संदभ: का प ा लगाया, सिSसमें '+Sुल संपखित्त' क े शब्दों क े बाद इसक े अं£ेSी अर्थी: को "सरकार क े संपहरर्ण" क े रूप में ब ाया गया र्थीा। विद+ांक 20 मई 1845 को सदर बोर्ड: ऑफ रेवेन्यू +े +Sुल भूविम क े संदभ: में एक परिरपत्र आदेश Sारी विकया: “सरकार उ+ भूविम का माखिलक है और उ+क े खिलए कोई वै* हक सरकार से प्राप्त +हीं विकया Sा सक ा।”

725. उत्तर-पतिश्चमी प्रां ों की सरकार द्वारा Sारी विकए गए 13 Sुलाई 1859 विद+ांविक क े परिरपत्र क े ह, प्रत्येक आयुX को सभी S+पदों क े अंति म Sब् ी कर्थी+ को ब+ाए रख+े और आदेश क े खिलए सरकार क े समक्ष पेश कर+े की आवश्यक ा र्थीी। अव* राज्य को वष: 1856 में ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी +े संलग्न विकया र्थीा। मई 1857 में विवˆोह हो Sा+े क े बाद उत्तर पतिश्चमी प्रां ों का काफी बड़ा क्षेत्र सरकार में वि+विह हो गया। विवˆोह की विवफल ा क े परिरर्णामस्वरूप, गव+:र S+रल लॉर्ड: क ै हिं+ग +े औपवि+वेणिशक सरकार का समर्थी:+ कर+े वाले 5 या 6 व्यविXयों क े अपवाद क े सार्थी भूविम में माखिलका+ा हक को Sब् कर े हुए विद+ांक 15 मई 1858 को एक उद्घोषर्णा Sारी की। प्रारंभ में इस भूविम को ी+ वष: क े खिलए विफर से बसाया गया र्थीा और विफर क्राउ+ £ांर्ट एक्र्ट क े ह स+द द्वारा अ+ुदा+ द्वारा ालुकदारों और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sमींदारों को स्र्थीायी माखिलका+ा हक विदया गया। 1 +वंबर, 1858 से ईस्र्ट इंतिर्डया क ं प+ी क े वि+यंत्रर्ण में सारा क्षेत्र विब्रविर्टश साम्राज्य क े अ*ी+ कर विदया गया।1861 क े प्रर्थीम बन्दोबस् ी में विववाविद भूविम को +Sुल क े रूप में ब ाया गया र्थीा और एक स्जिस्र्थीति सिSसे लगा ार ब+ाए रखा गया र्थीा।

726. श्री राम शरर्ण श्रीवास् व (र्डीर्डब्ल्यू 2/1-2), Sुलाई 1987 और 1990 क े बीच फ ै Sाबाद में कलेक्र्टर र्थीे, इन्हों+े वि+म्+खिलखिख शब्दों में कर्थी+ विकया है: “वष: 1861, 1893-94 और 1936-37 की ी+ राSस्व बन्दोबस्जिस् यों क े अणिभलेख मेरे अ*ी+ राSस्व अणिभलेखागार में उपलब्* र्थीे। इ+ अणिभलेखों में खसरा, ख ौ+ी, खेवर्ट और ी+ बन्दोबस्जिस् यों की रिरपोर्ट: अलग से उपलब्* र्थीीं। +Sुल भूविम क े संबं* में वष: 1931 की सव†क्षर्ण रिरपोर्ट: को ी+ बन्दोबस्जिस् यों और रिरपोर्टÂ क े अलावा शाविमल विकया गया र्थीा। वष: 1931 क े सव†क्षर्ण क े आ*ार पर ैयार खसरा, ख ौ+ी और खेवर्ट भी उपलब्* र्थीे। ी+ों बन्दोबस्जिस् यों और +Sुल सव†क्षर्ण क े अणिभलेख में, विववाविद स्र्थील को Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में वर्भिर्ण विकया गया है और स्र्थीा+ों पर रामSन्मभूविम का भी उल्लेख विकया गया है।" साक्षी +े आगे कहा: "मुझे याद +हीं है विक अंति म बन्दोबस् ी की संख्याएं 159, 160 और 160 ए र्थीी। इ+ सभी संख्याओं क े सापेक्ष Sन्मस्र्थीा+ खिलखा गया र्थीा। प्रत्येक बन्दोबस् ी में प्लॉर्ट संख्या में परिरव:+ र्थीा। मेरे द्वारा ब ाये गए प्लॉर्ट +ंबर 159 और 160 अंति म बन्दोबस् ी क े संख्या र्थीे। +Sुल सव†क्षर्ण में इससे संबंति* संख्याएँ 583, 586 र्थीी Sो मेरी स्मृति में है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसक े बाद उन्हों+े अणिभलेख में क ु छ अं व†श+ों का संदभ: विदया Sो इस प्रकार है: "प्रर्थीम और विद्व ीय बन्दोबस् ी क े विकसी भी अणिभलेख में मस्जिस्Sद, शाही मस्जिस्Sद या Sन्मस्र्थीा+ मस्जिस्Sद का कोई उल्लेख +हीं र्थीा। ीसरे बन्दोबस् ी क े खसरा, ख ौ+ी और खेवर्ट क े क ु छ अणिभलेखों में अं व†श+ र्थीे और विववाविद स्र्थील की क ु छ संख्याओं में Sन्मस्र्थीा+ मस्जिस्Sद या Sामा मस्जिस्Sद को अं व†णिश विकया गया र्थीा।मैं+े अप+ी रिरपोर्ट: भेSी र्थीी। मैं+े यह रिरपोर्ट: वष: 1989 में राSस्व बोर्ड: की ओर से भेSी र्थीी। मेरी रिरपोर्ट: पर Sांच गविठ की गई र्थीी। राSस्व बोर्ड: क े कु छ अति*कारी आए र्थीे। Sांचक ा: राSस्व बोर्ड: क े सतिचव क े अ*ी+स्र्थी एक अति*कारी र्थीा और सदस्य +हीं र्थीा। सिS+ अणिभलेखों में अं व†श+ विकया गया र्थीा और सिS+की रिरपोर्ट: मैं+े प्रस् ु की र्थीी, उन्हें कभी भी सही +हीं विकया गया क्योंविक मामला न्यायालय में लंविब र्थीा।"

727. +Sुल भूविम क े रूप में भूविम की स्जिस्र्थीति क े बारे में कोई विववाद +हीं हो सक ा है। हालाँविक, इसे अणिभखिलखिख कर े समय यह ध्या+ रख+ा आवश्यक है विक राज्य सरकार +े उच्च न्यायालय क े समक्ष मुकदमे क े दौरा+ संक े विदया विक यह विववाद क े विवषय में विकसी भी विह का दावा +हीं कर रही र्थीी और वाद +हीं चला रही र्थीी। यह इ+ परिरस्जिस्र्थीति यों में र्थीा विक उच्च न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक यद्यविप भूविम को मोहल्ला कोर्ट रामचंˆ क े वष: 1931 क े खसरा क े +Sुल भूखंर्ड संख्या 583 क े रूप में रखा Sा+ा है, यह प्रभावी रूप से दो समुदायों क े दावों पर प्रभाव +हीं र्डालेगा विक विकस+े भूविम का स्वत्व विदया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA O.11 उपयोगक ा: द्वारा वक्फ

728. वाद 4 में वादीगर्ण द्वारा,यह दर्भिश कर+े क े खिलए विक मस्जिस्Sद अर्मिप भूविम पर ब+ी र्थीी, सिS+ दस् ावेSी साक्ष्यों पर अवलंब खिलया गया है, उ+का उद्गम अव* क े औपवि+वेणिशक अति*हरर्ण और वष: 1856 क े बाद हो ा है। इसे ठीक ही वाद 4 में वादीगर्ण की ओर से प्रस् ु विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ *व+ द्वारा स्वीकार विकया गया है। वाद 4 क े वादीगर्ण विकसी विवशेष भू अ+ुदा+ को अव* क े अति*हरर्ण से पूव: या वष: 1857 क े पश्चा औपवि+वेणिशक प्रशास+ को सत्ता हस् ां रर्ण क े समय विवति*क स्वत्व क े आ*ार क े रूप में स्र्थीाविप कर+े में विवफल रहे।

729. सु+वाई क े उन्न चरर्ण में यह क: दे+े का प्रयास विकया गया विक A B C D अक्षरों से तिचस्जिन्ह विववाविद स्र्थील वक्फ सम्पखित्त है, विकसी विवणिशष्ट समप:र्ण क े कारर्ण +हीं बस्जिल्क मुस्जिस्लम समुदाय द्वारा सम्पखित्त का *ार्मिमक पूSास्र्थील क े रूप में प्रयोग क े कारर्ण। वाद 4 में वादीगर्ण की ओर से प्रस् ु वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा र्डॉ *व+ +े क: विदया विक इस्लाविमक विवति* में वक्फ की संकल्प+ा का एक व्यापक अर्थी: हो ा है। अ ः यह क: विदया गया विक विकसी प्रगर्ट समप:र्ण क े अभाव में भी विववाविद स्र्थील का मस्जिस्Sद क े रूप में साव:Sवि+क इबाद क े खिलए प्रयोग प्रश्नग सम्पखित्त का दSा: ‘उपयोगक ा: द्वारा वक्फ ‘ क े रूप में ब+ा दे ा है। इस सुझाव क े समर्थी:+ में, र्डॉ *व+ +े क: विदया है विक 1528 में बाबर द्वारा मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण से 22/23 विदसंबर 1949 को इसक े अपविवत्रीकरर्ण क, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मस्जिस्Sद में +माS अदा की गयी। इसखिलए विववाविद सम्पखित्त *ार्मिमक पूSास्र्थील रहा है। आगे, उन्हों+े कहा है विक मुस्जिस्लमों क े पास विववाविद सम्पखित्त का स्र्थीायी कब्Sा रहा है और उन्हों+े मस्जिस्Sद का साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा क े खिलए उपयोग विकया है। इस प्रकार, समप:र्ण विवलेख की अ+ुपस्जिस्र्थीति क े बावSूद, विववाविद स्र्थील का साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा क े खिलए चार श ास्जिब्दयों से ज्यादा समय क प्रयोग विकया गया सिSसक े परिरर्णामस्वरुप लंबे प्रयोग द्वारा इसका चरिरत्र वक्फ सम्पखित्त का ब+ ा है।

730. इस क: से विववि+श्चय क े खिलए दो विबन्दु उठ े हैं: पहला, क्या उपयोगक ा: द्वारा वक्फ की *ारर्णा हमारे न्यायालय द्वारा एक विवति*क सिसद्धान् क े रूप में स्वीक ृ की Sा ी है; और दूसरा, एक थ्य क े रूप में, क्या व:मा+ मामले में यह प्रयोज्य होगा। वाद 4 की दलील

731. वाद क े पहले पैरा£ाफ में,वादीगर्ण +े यह बा कही है विक बाबर द्वारा या उसक े कह+े पर 1528 ई. में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण हो Sा+े पर, इसे मSहबी इबाद गाह क े रूप में मुस्जिस्लमों को +माS अदा कर+े क े खिलए समर्मिप कर विदया गया: “1. अSोध्या +गर,परग+ा हवेली अव* में,एक प्राची+ ऐति हासिसक मस्जिस्Sद है, सिSसे आम ौर पर बाबरी मस्जिस्Sद क े +ाम से Sा+ा Sा ा है,सिSसे बाबर द्वारा 443 वष: पूव: भार पर Sी हासिसल कर+े और अयोध्या +गर सविह पूरे क्षेत्र पर कब्Sा कर+े क े बाद आम ौर पर मुस्जिस्लमों क े खिलए इबाद गाह और मSहबी कायÂ को कर+े क े स्र्थीा+ क े रूप में ब+वाया गया र्थीा।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समर्मिप विकये Sा+े की बा को स्र्थीाविप कर+े वाले विकसी विवशेष दस् ावेS क े + हो+े क े कारर्ण वादीगर्ण अप+े कर्थी+ क े दौरा+ मस्जिस्Sद को *ार्मिमक स्र्थील क े रूप में लंबे समय क प्रयोग विकये Sा+े की दलील पर आ गये। वाद क े पैरा£ाफ 2 में वि+म्+व दलील है: “2. यह विक संलग्न रेखा मा+तिचत्र में,कणिर्थी मस्जिस्Sद का मुख्य वि+मा:र्ण A B C D अक्षरों द्वारा दशा:या गया और पूव:, पतिश्चम, उत्तर और दतिक्षर्ण में मस्जिस्Sद से लगी भूविम संलग्न रेखा मा+तिचत्र में दशा:यी गयी है। बाबर और अयोध्या क े पुरा+े शासक क े बीच हुई लड़ाई में मारे गये मुस्जिस्लमों की कब्रों से ढ़क े प्राची+ कब्रगाह Sो संलग्न रेखा मा+तिचत्र में दशा:या गया है। मस्जिस्Sद और कब्रगाह खुदा की है। उX मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण क े समय से ही मुस्जिस्लमों द्वारा +माS अदा कर+े क े खिलए प्रयोग की Sा ी रही है और कब्रगाह मोहल्ला राम कोर्ट चन्दर में है सिSसे राम कोर्ट +गर, अयोध्या क े +ाम से भी Sा+ा Sा ा है। वाद क े मस्जिस्Sद और कब्रगाह का खसरा +ंबर संलग्न सूची में है Sो विक वाद का विहस्सा है।” (प्रभाव वर्ति* )

732. वक्फ चल या अचल सम्पखित्त का मुस्जिस्लम विवति* द्वारा मान्य *ार्मिमक या *मा:र्थी: उद्देश्य क े खिलए समप:र्ण हो ा है। सामान्य ः वक्फ उद्घोषर्णा क े रूप में समप:र्ण क े प्रकर्ट क ृ त्य द्वारा अस्जिस् त्व में आ ा है। उद्घोषर्णा हो+े पर समर्मिप की Sा+े वाली सम्पखित्त समप:र्ण कर+े वाले वाविकफ से वि+कलकर सव:शविXमा+ अल्लाह की हो Sा ी है। वक्फ सम्पखित्त का एक स्र्थीायी और अविवच्छेद्य समप:र्ण हो ा है और एक बार वक्फ ब+ Sा+े पर समप:र्ण को बाद में वापस +हीं खिलया Sा सक ा। विवति*क रूप से सृसिS वक्फ की सम्पखित्त अहस् ान् रर्णीय हो ी है और वि+Sी लाभ क े खिलए विबक्री या पट्टे पर +हीं दी Sा सक ी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

733. मुस्जिस्लम विवति* में प्रत्येक मामले में विकसी वक्फ की प्रकर्ट उद्घोषर्णा की आवश्यक ा +हीं हो ी। विकसी मामले क े थ्य एवं परिरस्जिस्र्थीति यों या वाविकफ क े आचरर्ण से भी वक्फ में परिरर्ण हो+े वाले समप:र्ण का युविXयुX अ+ुमा+ विकया Sा सक ा है। विकसी प्रकर्ट समप:र्ण क े अभाव में, वक्फ का अस्जिस् त्व ऐसी परिरस्जिस्र्थीति यों में विवति*क रूप से मान्य हो ा है Sहां सम्पखित्त अति प्राची+ काल से साव:Sवि+क *ार्मिमक प्रयोग की विवषयवस् ु रही हो। उपयोगक ा: द्वारा वक्फ की अव*ारर्णा को वक्फ अति*वि+यम360 1995 की *ारा 3(r) में विवति*क मान्य ा प्राप्त है सिSसमें वक्फ को वि+म्+ क े रूप में परिरभाविष विकया गया है: “(r) “वक्फ” का ात्पय: विकसी व्यविX द्वारा विकसी चल या अचल सम्पखित्त का मुस्जिस्लम विवति* द्वारा पविवत्र, *ार्मिमक या *मा:र्थी: मा+े गये विकसी उद्देश्य क े खिलए स्र्थीायी समप:र्ण हो ा है, इसमें शाविमल है- (i) उपयोगक ा: द्वारा कोई वक्फ विकन् ु ऐसे वक्फ का क े वल इस कारर्ण वक्फ हो+ा समाप्त +हीं हो Sाएगा विक उसका उपयोग कर+े वाला समाप्त हो गया है चाहे ऐसी समाविप्त की अवति* क ु छ भी हो; (ii) कोई शामला पट्टी, शामला देह, Sुमला मलक्क+ या राSस्व अणिभलेख में दS: कोई अन्य +ाम; (iii) अ+ुदा+" सिSसक े अं ग: विकसी प्रयोS+ क े खिलए मशर -उल- खिखदम भी है, सिSन्हें मुस्जिस्लम विवति* द्वारा पविवत्र, *ार्मिमक या पू: मा+ा गया है; और (iv) वक्फ-अलल-औलाद वहां क Sहां क विक संपखित्त का समप:र्ण विकसी ऐसे प्रयोS+ क े खिलए विकया गया है Sो मुस्जिस्लम विवति* द्वारा पविवत्र, *ार्मिमक या पू: मा+ा गया है, परं ु Sब कोई उत्तराति*कारी +हीं रह Sा ा है ो वक्फ की आय णिशक्षा, विवकास, कल्यार्ण और मुस्जिस्लम विवति* द्वारा यर्थीा मान्य ाप्राप्त ऐसे अन्य प्रयोS+ों क े खिलए खच: की Sाएगी, 360 Title changed from ‗Waqf Act‘ to the ‗Auqaf Act‘ by virtue of the Waqf (Amendment) Act 2013 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और वाविक़फ़" से ऐसा समप:र्ण कर+े वाला कोई व्यविX अणिभप्रे है।" (प्रभाव वर्ति* ) वक्फ की वै*ावि+क परिरभाषा में उपयोग द्वारा स्र्थीाविप वक्फ को मान्य ा दी गयी है + विक समप:र्ण द्वारा वक्फ को। इसी प्रकार,"मोहम्र्ड+ विवति*" पर अप+ी पुस् क में मुल्ला +े कहा है विक: “...यविद भूविम का प्रयोग विकसी *ार्मिमक उद्देश्य Sैसे मस्जिस्Sद या कब्रगाह या मस्जिस्Sद क े मरम्म क े खिलए अति प्राची+ काल से विकया Sा रहा है ो भूविम उपयोगक ा: द्वारा वक्फ हो ी है यद्यविप विक प्रकर्ट समप:र्ण का कोई साक्ष्य +हीं है।”361 उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े बारे में अप+े कर्थी+ में र्डॉ *व+ +े ऐसे कई प्राति*कारिरयों का उल्लेख विकया है Sो उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े सिसद्धान् को रेखांविक कर े हैं।

734. उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े सिसद्धान् को न्यातियक मान्य ा द् कोर्ट: ऑफ वॉड्स: फॉर द् प्रापर्ट- ऑफ मकदूम हस+ बक्श ब+ाम इलाही बक्श363 क े मामले में विप्रवी कौंसिसल क े वि+र्ण:य में दी गयी। मामला मुुल् ा+ क े एक साव:Sवि+क कब्रगाह से संबंति* र्थीा Sहां एक प्रसिसद्ध मुस्जिस्लम सं दफ्+ र्थीे। मकदूम बक्श की सम्पखित्त क े खिलए काय: कर े हुए कोर्ट: ऑफ वॉड्स: +े कब्रगाह क े क्षेत्र क े भी र उ+ कति पय सम्पखित्त को बेच+े का प्रस् ाव विकया सिS+ पर कोई कब्र +हीं र्थीी। मुल् ा+ क े मुस्जिस्लम वि+वासिसयों +े प्रस् ाविव विबक्री को रोक+े क े खिलए एक व्यादेश की इस आ*ार पर याच+ा विकया विक

361. Mulla‘s Mahomedan Law, 14th Edition at page 173 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सम्पूर्ण: वक्फ मुस्जिस्लम समुदाय क े साव:Sवि+क कब्रगाह क े रूप में लंबे प्रयोग क े कारर्ण एक असंक्रमर्णीय वक्फ सम्पखित्त है। लार्ड: मैक+ार्थी+ +े *ारिर विकया: “ न्याया*ीश महोदय चीफ कोर्ट: से इस बा में सहम र्थीे विक वाद की भूविम मुस्जिस्लम समुदाय क े खिलए ब+े कब्रगाह का एक विहस्सा है और यह विक समप:र्ण क े द्वारा + सही लेविक+ उपयोगक ा: द्वारा भूविम वक्फ है।” विप्रवी कौंसिसल +े इस बा को मान्य ा प्रदा+ विकया विक विकसी प्रकर्ट विवलेख या समप:र्ण क े क ृ त्य क े विब+ा विकसी वक्फ को लंबे प्रयोग क े द्वारा मान्य ा प्रदा+ की Sा सक ी है।

735. उपयु:X आदेश का अव* चीफ कोर्ट: द्वारा अब्दुल गफ ू र ब+ाम रहम अली363 क े मामले में अ+ुसरर्ण विकया गया। वादीगर्णों +े इस उद्घोषर्णा की मांग विकया विक वाद की सम्पखित्त एक साव:Sवि+क कब्रगाह र्थीी और प्रति वादी को इस पर विकसी संरच+ा क े वि+मा:र्ण का हक +हीं र्थीा। इस प्रश्नग कब्रगाह को सव:सा*ारर्ण क े खिलए +गरपाखिलका बोर्ड: द्वारा चालीस वषÂ से बंद कर विदया गया र्थीा। प्रति वादी +े क: विदया विक वादीगर्ण +े प्रश्नग वाद क कब्रगाह क े उपयोग को स्र्थीाविप +हीं विकया है और यह विक चालीस वषÂ से प्रयोग में + हो+े क े कारर्ण, इस+े वक्फ क े रूप में अप+े चरिरत्र को खो विदया है। यह *ारिर कर े हुए विक कब्रगाह एक साव:Sवि+क वक्फ ब+ा रहा, न्यायमूर्ति श्रीवास् व +े अव* चीफ कोर्ट: की ओर से यह *ारिर विकया:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “4....यह सुस्र्थीाविप है विक कोई वक्फ, उद्घोषर्णा क े प्रकर्ट साक्ष्य क े अभाव में,उपयोगक ा: क े साक्ष्य द्वारा स्र्थीाविप विकया Sा सक ा है। वाद की सम्पखित्त कविब्रस् ा+ क े रूप में पहले वि+यविम बंदोबस् क े समय अंविक की गयी र्थीी लेविक+ समप:र्ण को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य +हीं है.… वादीगर्ण की ओर से परीतिक्ष विकये गये बहु से सातिक्षयों क े साक्ष्य क े आलोक में, सिS+क े साक्ष्य पर उन्हों+े [ अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश] +े इस वि+ष्कष: पर पहुंच+े क े खिलए विवश्वास विकया है विक मोहम्र्ड+ लोगों +े भूविम का ब क दफ+ा+े की Sगह क े रूप में उपयोग विकया Sब क +गरपाखिलका बोर्ड: +े चालीस वष: पहले उस भूविम पर अवि£म प्रवेश प्रति बंति* +हीं कर विदया। इस प्रकार, व:मा+ मामले में, वाद की भूविम क े साव:Sवि+क कब्रगाह हो+े संबं*ी वि+ष्कष: लंबे समय क े उपयोगक ा: क े साक्ष्य पर आ*ारिर है… ऐसा वि+यम, Sो उपयोगक ा: क े साक्ष्य को समप:र्ण का स्र्थीा+ ले+े की अ+ुमति प्रदा+ कर ा है, वह आवश्यक ा का वि+यम है। पुरा+े वक्फ क े मामले में,समप:र्ण क े प्रत्यक्ष साक्ष्य विमल+ा संभव +हीं है और यह भी कहा गया है विक ऐसे प्रत्यक्ष साक्ष्य क े अभाव में, कोई न्यायालय विकसी वक्फ को लंबे उपयोगक ा: क े साक्ष्य पर स्र्थीाविप मा+ सक ा है...। ” (प्रभाव वर्ति* )

736. क ु छ मामलों में, न्यायालयों क े साम+े ऐसी स्जिस्र्थीति र्थीी Sहां सम्पखित्त का अति प्राची+ काल से वक्फ क े रूप में प्रयोग विकया गया और उद्घोषर्णा विवलेख क े रूप में औपचारिरक साक्ष्य मांग+ा व्यावहारिरक +हीं र्थीा। लंबा समय बी Sा+े क े बाद समप:र्ण का कोई विवशेष दस् ावेS अ+ुपलब्* हो सक ा है लेविक+ सम्पखित्त का साव:Sवि+क *ार्मिमक या *मा:र्थी: उद्देश्य से प्रयोग अति प्राची+ काल से Sारी रह सक ा है। अ ः विकसी प्रकर्ट समप:र्ण विवलेख क े विब+ा भी, न्यायालय उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े अस्जिस् त्व को मान्य ा दे सक ा है Sहां सम्पखित्त का साव:Sवि+क *मा:र्थी: उद्देश्य से लंबे समय से प्रयोग mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्र्थीाविप हो। लंबे समय से उपयोग का साक्ष्य पया:प्त मा+ा Sा ा है यद्यविप विक प्रकर्ट समप:र्ण विवलेख का कोई साक्ष्य + हो।

737. विमरू ब+ाम राम गोपाल364 क े मामले में वादी सम्पखित्त का Sमी+दार र्थीा। विकसी रहीम बक्श +े सम्पखित्त पर कब्Sा कर रखा र्थीा और पूSा क े खिलए एक अस्र्थीायी 'कच्चा' चबू रा ब+ा खिलया र्थीा। 1904 क स्र्थीा+ीय मुस्जिस्लमों द्वारा इस 'कच्ची' मस्जिस्Sद में इबाद की Sा ी र्थीी। स्र्थीा+ीय प्रति वादी मुस्जिस्लमों +े उस स्र्थीा+ पर एक स्र्थीायी ढ़ांचा ब+ा+ा चाहा। वादी द्वारा इसका विवरो* विकया गया सिSस+े +यी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण को रोक+े क े खिलए व्यादेश की मांग की। न्यायालय का कह+ा र्थीा विक उस प्लार्ट क े खसरा में उसे "मस्जिस्Sद" कहा गया र्थीा। कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक खंर्डपीठ की ओर से न्यायमूर्ति बे+ेर्ट +े कहा:  “...व:मा+ मामले में, यह वि+ष्कष: है विक प्लार्ट को लंबे समय से मस्जिस्Sद क े खिलए उपयोग विकया गया है और उपयोग स्र्थीा+ीय मोहम्र्ड+ वि+वासिसयों द्वारा विकया गया है + विक विकसी विकरायेदार विवशेष द्वारा सिSस+े अन्य लोगों को वहां इबाद क े उद्देश्य से आ+े की अ+ुमति दी… कोर्ट: ऑफ वाड्स: ब+ाम इलाही बक्श(2) क े मामले में विप्रवी कौंसिसल क े मा++ीय न्याया*ीश द्वारा यह भी कहा गया है विक उपयोगक ा: द्वारा कब्र वक्फ ब+ी। हमें +हीं लग ा विक लाइसेंस क े संबं* में सुखाति*कार अति*वि+यम क े प्राव*ा+ या अध्याय IV का कोई भाग उस Sगह लागू हो ा है Sहां Sमी+दार +े मोहम्मर्ड+ S+ ा को विकसी भव+ को मस्जिस्Sद क े रूप में प्रयोग कर+े की अ+ुमति विदया।.… ऐसे मामले में हमारा मा++ा है विक Sहां ऐसा वि+ष्कष: हो विक मस्जिस्Sद विवद्यमा+ र्थीी, वहां आवश्यक रूप से यह यह लागू हो ा है विक सुखाति*कार या लाइसेंस क े प्रयोग का कोई प्रश्न +हीं रह Sा ा। मोहम्र्ड+ विवति* क े अ+ुसार, मस्जिस्Sद अल्लाह की सम्पखित्त है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA + विक Sमी+दार की। वादी क े विवद्वा+ अति*वXा +े आपखित्त की है विक अन् रर्ण का कोई मामला +हीं र्थीा Sैसा विक सम्पखित्त क े अन् रर्ण क े मामले में आवश्यक हो ा है, बस्जिल्क हमारा मा++ा है विक भव+ क े मस्जिस्Sद क े रूप में प्रयोग कर+े की Sमी+दार की अ+ुमति पया:प्त है।" (प्रभाव वर्ति* ) 'कच्ची' मस्जिस्Sद क े लंबे समय से प्रयोग क े चल े न्यायालय +े साव:Sवि+क वक्फ क े अस्जिस् त्व को मान्य ा दी। यह कभी कभार पूSा का मामला +हीं र्थीा, बस्जिल्क 1904 से पूव: स्र्थीा+ीय मुस्जिस्लम समुदाय द्वारा मस्जिस्Sद क े वि+रं र प्रयोग का र्थीा।यह दस् ावेSी साक्ष्यों से दर्भिश हो ा र्थीा सिSससे प्लार्ट पर मस्जिस्Sद का अस्जिस् त्व विदख ा र्थीा। महत्वपूर्ण: रूप से, स्वंय Sमी+दार क े द्वारा मस्जिस्Sद पर साव:Sवि+क इबाद की अ+ुमति र्थीी। इ+ परिरस्जिस्र्थीति यों में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय +े *ारिर विकया विक भूविम Sमी+दार की वि+Sी सम्पखित्त +हीं र्थीी बस्जिल्क उपयोगक ा: द्वारा एक साव:Sवि+क वक्फ र्थीी। न्यायमूर्ति सुलेमा+ क े सहमति सूचक सर्टीक शब्दों में: “ लेविक+ Sहां भव+ विकसी भूख°र्ड पर लंबे समय से स्जिस्र्थी हो और उस भव+ में इबाद की Sा ी रही हो, ो यह न्यायालय क े खिलए,Sो विक थ्यों का वि+र्णा:यक है, अ+ुमा+ का विवषय होगा विक क्या उस भव+ में अति*कार का इ +े पया:प्त समय क े खिलए प्रयोग विकया गया है विक इस उप*ारर्णा को न्यायोतिच ठहरा सक े विक ऐसे अति*कार क े संपाद+ क े उद्देश्य से भव+ को ही प्रार्ण प्रति विष्ठ कर+े की अ+ुमति दे दी गयी है।...” यह प्रश्न विक- क्या भव+ या सम्पखित्त क े साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा क े खिलए प्रयोग से उ+ विवति*क श Â की पूर्ति हो ी है विक इसे एक साव:Sवि+क वक्फ मा+ा Sाय- साक्ष्य का विवषय है। अणिभलेख पर उपलब्* साक्ष्यों का परीक्षर्ण कर इस बा का वि+*ा:रर्ण कर+ा विक क्या सम्पखित्त का प्रयोग इ +े पया:प्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लंबे समय और लतिक्ष उद्देश्य क े खिलए हुआ है विक प्रकर्ट समप:र्ण क े विब+ा साव:Sवि+क वक्फ की मान्य ा दे+ा न्यायोतिच हो, न्यायालय क े खिलए "अ+ुमा+ का विवषय" है। वक्फ क े अर्टल, स्र्थीायी और अहस् ान् रर्णीय स्वरूप क े चल े उपयोगक ा: द्वारा वक्फ को स्र्थीाविप कर+े की सातिक्षक सीमा उच्च है, क्योंविक इससे सम्पखित्त पर स्वाविमत्व क े चरिरत्र में आमूल परिरव:+ हो Sा ा है।

738. उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े सिसद्धान् को न्यायालय क े न्यायशास्त्र में मान्य ा विमली है। फकीर मोहम्मद शाह ब+ाम काSी फासिसहुद्दी+ अंसारी365 क े मामले में विदया गया वि+र्ण:य दो अलग अलग समयावति*यों से संबंति* र्थीा: लगभग 1681 से 1880 क की अवति* और 1880 से 1956 क की अवति* से। वष: 1880 में, एक 'पुरा+ी मस्जिस्Sद' विवद्यमा+ र्थीी सिSसे विववाद क े पक्षकारों +े वक्फ सम्पखित्त मा+ा। 1880 क े बाद, प्रति वादी 'पुरा+ी मस्जिस्Sद' का मु वल्ली हो+े क े कारर्ण इसक े आकार को बढ़ा विदया और संबद्ध सम्पखित्तयों पर विवणिभन्न संरच+ाएं ब+वा विदया। कु छ का उपयोग वह स्वंय कर ा र्थीा और क ु छ का प्रयोग आमS+ इबाद क े खिलए कर े र्थीे। एक सार्थी इन्हें '+ई मस्जिस्Sद' कहा Sा ा र्थीा। वि+वासी सुन्नी समुदाय +े वादीगर्ण क े रूप में ऐसी उद्घोषर्णा की मांग की विक 'पुरा+ी मस्जिस्Sद' और '+ई मस्जिस्Sद' दो+ों वक्फ सम्पखित्त हैं। प्रति वादी +े इ+ दावों का विवरो* विकया और क: विदया विक '+ई मस्जिस्Sद' उसकी स्वंय की वि+Sी सम्पखित्त र्थीी। इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीश खंर्डपीठ की ओर से न्यायमूर्ति विवविवय+ बोस +े *ारिर विकया:

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “20. …यह प्रत्यक्ष है विक वष: 1880 क प्रकर्ट समप:र्ण का कोई साक्ष्य +हीं र्थीा + ही ब से कोई साक्ष्य प्रस् ु विकया गया है, इसखिलए एकमात्र प्रश्न यह है विक क्या उपयोगक ा: का कोई प्रमार्ण है यविद ऐसा है ो विकस चीS का उपयोगक ा:।

70. साक्ष्यों का साव*ा+ी से सव†क्षर्ण कर+े पर हम वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: पर पहुंचे है: (1) यह विक पुरा+ी मस्जिस्Sद Sैसी यह 1880 में र्थीी, का वक्फ सम्पखित्त हो+ा सिसद्ध है लेविक+ उस स्र्थीा+ और भव+ Sहां पर यह र्थीी से इ र विकसी भी चीS का उस ति णिर्थी पर वक्फ हो+ा दर्भिश +हीं विकया गया है। (2) यह विक इस सम्पखित्त में समय समय पर परिरव*:+ हो ा रहा और पूरा भव+ अब अलग से रेखांविक है और यह विक परिरव*:+ और संव*:+ से एक अलग संतिश्लष्ट और अलग इकाई ब+ गयी है Sैसा विक वादी गर्ण क े मा+तिचत्र में दशा:या गया है। यह मा+तिचत्र में ABCD से अंविक क्षेत्र है। (3) यह विक पुरा+ी मस्जिस्Sद क े सार्थी सार्थी इस क्षेत्र को आम S+ द्वारा *ार्मिमक उद्देश्यों क े खिलए उपयोग विकया Sा ा है और चूंविक इस क्षेत्र को मस्जिस्Sद में सामूविहक एवं वैविXक इबाद क े एकमात्र उद्देश्य क े खिलए अलग से अंविक व्यवस्जिस्र्थी इकाई ब+ा विदया गया है इसे एक इकाई मा+ा Sा+ा चाविहए और उसी भांति व्यवहृ हो+ा चाविहए।..… (7) यह विक वाद की शेष सम्पखित्त को वक्फ हो+ा या वक्फ सम्पखित्त का परिरव*:+ हो+ा +हीं दशा:या गया र्थीा। यह अलग से रेखांविक है और वक्फ विहस्सा ABCD से और मस्जिस्Sद क े पतिश्चम में दुका+ से पृर्थीक्करर्णीय है।.…

73. यह अब स्वीक ृ है और ऐसा वष: 1880 क े वाद में पाया गया विक पुरा+ी मस्जिस्Sद वक्फ सम्पखित्त र्थीी। यह मा+ा Sा सक ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है विक उस ति णिर्थी पर शेष वक्फ +हीं र्थीा और साक्ष्यों का मूल्यांक+ कर+े पर यही भी वि+ष्कष: है। लेविक+ वष: 1880 क े वाद क े पश्चा काफी क ु छ हो चुका है और बाद में मूल सम्पखित्त में परिरव*:+ और संव*:+ हो चुका है विक अब वे परिरव*:+ और संव*:+ मूल वक्फ क े अणिभन्न विहस्से हैं। (प्रभाव वर्ति* )

739. हमारे न्यायशास्त्र में, प्रकर्ट समप:र्ण या उद्घोषर्णा विवलेख की अ+ुपस्जिस्र्थीति में भी उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े सिसद्धान् को मान्य ा दी गयी है। कोई सम्पखित्त वक्फ सम्पखित्त है या +हीं यह साक्ष्य का विवषय है। मा+क यह है विक क्या सम्पखित्त को इस्लाम मSहब मा++े वालों द्वारा साव:Sवि+क *ार्मिमक उद्देश्य क े खिलए उपयोग विकया गया है या +हीं। प्रत्यक्ष कसौर्टी ऊ ं ची है, अति*कांश मामलों में अति प्राची+ काल से प्रश्नग सम्पखित्त पर साव:Sवि+क इबाद का साक्ष्य। फकीर मोहम्मद शाह क े मामले में, यह स्वीकार विकया गया विक पुरा+ी मस्जिस्Sद वक्फ सम्पखित्त र्थीी। बाद में न्यायालय +े अणिभलेख में उपस्जिस्र्थी साक्ष्यों का यह वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए परीक्षर्ण विकया विक क्या 'पुरा+ी मस्जिस्Sद' से संलग्न सम्पखित्त पर ब+े '+ई मस्जिस्Sद' वाली संरच+ा का भी साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा क े खिलए प्रयोग विकया गया। इसी आ*ार पर इस न्यायालय +े 'पुरा+ी मस्जिस्Sद' से संलग्न ब+े '+ई मस्जिस्Sद' क े विहस्से को भी सम£ वक्फ सम्पखित्त मा+ा। व:मा+ मामले में प्रयोज्य ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

740. हमारे न्यायालयों द्वारा मान्य उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े सिसद्धान् ों को य कर दे+े क े पश्चा, अगला प्रश्न यह है विक क्या व:मा+ मामले में सिसद्धान् लागू हो ा है। वाद 4 में वादी की ओर से विदये गये क: को वाद 4 में मांगे गये अ+ु ोष क े सार्थी विमलाकर पढ़ा Sा+ा चाविहए। मांगा गया अ+ु ोष है: “(a) इस प्रभाव की उद्घोषर्णा विक वाद में संलग्न रेखातिचत्र में ABCD अक्षरों से दर्भिश की गयी सम्पखित्त साव:Sवि+क मस्जिस्Sद है सिSसे आम ौर पर 'बाबरी मस्जिस्Sद' क े +ाम से Sा+ा Sा ा है और वाद क े पैरा 2 में यर्थीा विववि+र्मिदष्ट EFGH अक्षरों से दशा:यी गयी मस्जिस्Sद से संलग्न भूविम एक साव:Sवि+क मुस्जिस्लम कब्रगाह है सिS+की तिर्डक्री की Sा सक ी है। (b) यह विक यविद न्यायालय की राय में कब्Sा विदया Sा+ा उतिच उपचार मा+ा Sा ा है ो मूर्ति यों और अन्य वस् ुओं, सिSन्हें अप+े पूSा पाठ क े खिलए विहन्दुओं +े मस्जिस्Sद क े अन्दर रखा है, को हर्टाकर मस्जिस्Sद और कब्रगाह का कब्Sा दे+े क े खिलए प्रति वादीगर्ण क े विवरुद्ध वादी क े पक्ष में तिर्डक्री पारिर की Sाय। संशो*+/ 25.5.95 विद+ांविक न्यायालय आदेश द्वारा परिरवर्ति* हस् ाक्षरिर /- (bb) यह विक विवति*क प्रापक को वाद की अ+ुसूची ‘A’ में वर्भिर्ण वाद की सम्पखित्त को उस पर ब+े अ+ति*क ृ संरच+ाएं हर्टाकर सौंप+े का आदेश विदया Sाय।" वाद 4 में विकये गये उपयोगक ा: द्वारा वक्फ का दावा बाहरी और भी री दो+ों अहा ों से संबंति* है। वादीगर्ण क े अ+ुसार मस्जिस्Sद अल्लाह की है। यह क: विदया गया है विक ABCD अक्षरों से अंविक विववाविद सम्पखित्त क े वि+वासी मुस्जिस्लम समुदाय द्वारा लंबे और अ+वर प्रयोग क े कारर्ण विववाविद स्र्थील को उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े रूप में मान्य ा दी Sाय। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

741. वाद 4 में वादीगर्ण की ओर से प्रस् ु विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ *व+ +े स्वीकार विकया विक 1856-7 क े पहले कब्Sा, उपयोग या मस्जिस्Sद में इबाद का कोई साक्ष्य +हीं है। ABCD अक्षरों से अंविक विववाविद सम्पखित्त पर वष: 1528 में उसक े वि+मा:र्ण की ति णिर्थी से वष: 1857 में औपवि+वेणिशक सरकार द्वारा रेलिंलग ब+वाये Sा+े क की 325 वषÂ की अवति* में इबाद या कब्Sा वि+यंत्रर्ण का कोई साक्ष्य प्रस् ु +हीं विकया गया है। इसखिलए अणिभलेख पर साक्ष्यों की अ+ुपस्जिस्र्थीति में,ऐसा कोई वि+ष्कष: +हीं वि+काला Sा सक ा विक 1857 से पहले विववाविद स्र्थील का वि+वासी मुस्जिस्लम समुदाय द्वारा इबाद क े खिलए उपयोग विकया Sा ा र्थीा। वष: 1856-57 की घर्ट+ा क े बाद, पूSा क्षेत्र को आं रिरक और बाहरी अहा े में बांर्ट+े क े खिलए औपवि+वेणिशक सरकार +े रेलिंलग ब+वाई। सिSसक े कु छ समय बाद, बाहरी अहा े में रामचबू रा ब+वाया गया। रामचबू रा और पहले से विवद्यमा+ सी ा रसोई पर पर पूSा की वSह से ABCD अक्षरों से अंविक सम्पखित्त क े भी र विहन्दुओं की पूSा संस्र्थीाग हो गयी।

742. रेलिंलग का वि+मा:र्ण स्वाविमत्व अति*कारों को सुलझा+े का प्रयास +हीं र्थीा। यह का+ू+ व्यवस्र्थीा सुवि+तिश्च कर+े का एक सुविव*ाS+क उपाय र्थीा। वष: 1858 से 1883 क े बीच विववाद से यह विदख ा है विक रेलिंलग ब+ाकर विहन्दुओं को आन् रिरक अहा े से बाहर कर+े का प्रयास स्र्थीायी विववाद का विवषय र्थीा। विवणिशष्ट रूप से, बाहरी अहा े में विहन्दु भXों की गति विवति*यां Sारी रही। इस संबं* में एक महत्वपूर्ण: संसूचक औपवि+वेणिशक सरकार का 1877 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में विहन्दू भXों की सुविव*ा क े खिलए बाहरी अहा े में एक अति रिरX द्वार खोल+े दे+े का वि+र्ण:य र्थीा सिSसक े विवरुद्ध आपखित्तयां की गयीं और उन्हें वि+रस् कर विदया गया। विहन्दू भXों क े खिलए एक अति रिरX प्रवेश द्वार की आवश्यक ा पूSा कर+े क े खिलए इसक े प्रयोग क े व्यापक प्रक ृ ति का संक े क है। प्रवेश विमल+े पर, विहन्दू भX राम चबू रा और सी ारसोई Sैसी कई संरच+ाओं पर पूSा कर े र्थीे। बाहरी अहा े में भ°र्डार भी उ+क े वि+यंत्रर्ण में र्थीा। इससे प ा चल ा र्थीा विक Sहां क बाहरी अहा े का संबं* र्थीा, विहन्दू भXों का सुस्र्थीाविप कब्Sा र्थीा और सविक्रय रूप से अप+ी आस्र्थीा का पाल+ कर रहे र्थीे। विहन्दू भXों का बाहरी अहा े पर यह कब्Sा खुले ौर पर र्थीा और मुस्जिस्लमों की Sा+कारी में र्थीा। वष: 1857 और 1949 क े बीच की कई घर्ट+ाओं को वि+र्ण:य क े अन्य भाग में सन्दर्भिभ विकया गया है सिSससे प ा चल ा है विक आन् रिरक अहा े पर कब्Sा गंभीर विववाद का विवषय र्थीा। बाहरी अहा े पर मुस्जिस्लमों का कब्Sा +हीं र्थीा। यह स्र्थीाविप कर+े क े खिलए पया:प्त साक्ष्य का अभाव है विक 1858 क े बाद आन् रिरक अहा े का अ+न्य या वि+र्मिवघ्+ प्रयोग हो ा र्थीा।

743. वाद 4 में वादीगर्ण का क: यह है विक आन् रिरक और बाहरी दो+ों अहा े सविह मस्जिस्Sद की पूरी सम्पखित्त वक्फ सम्पखित्त है। एक बार वक्फ क े रूप में मान्य हो Sा+े पर सम्पखित्त उस विद+ से स्र्थीायी और अहस् ान् रर्णीय रूप से अल्लाह की हो Sा ी है सिSस विद+ से वक्फ को अस्जिस् त्व में मा+ा Sा ा है। भूविम अविवच्छेद्य हो Sा ी है और वक्फ विव*ा+ और इस्लाविमक विवति* क े वि+यामक दायरे में आ Sा ी है। उपयोगक ा: द्वारा वक्फ का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिसद्धान् हमारे विवति* में सुस्र्थीाविप है। हालांविक यर्थीा उपरोX वर्भिर्ण पूव: वि+र्ण:यों द्वारा उल्लेख विकया गया है विक ऐसे मामलों पर विवचार कर+ा Sहां कोई सम्पखित्त इस्लाम *म: क े मा++े वालों द्वारा लंबे और अ+वर *ार्मिमक प्रयोग का स्र्थील रहा हो लेविक+ मूल समप:र्ण समय की ग: में खो गया हो, आवश्यक ा का सिसद्धान् है। उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े रूप में मान्य हो+े क े पश्चा संपखित्त क े चरिरत्र में हो+े वाले बुवि+यादी बदलाव क े कारर्ण, उपयोगक ा: द्वारा वक्फ को सिसद्ध कर+े का सातिक्षक भार अति*क हो ा है। वाद 4 क े वादपत्र में दलीलें अदक्ष हैं। प्रयोग की प्रक ृ ति या दायरे का विववरर्ण +हीं विदया गया है। वादपत्र क े पैरा 2 में एक वाक्य उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े दावे को संवहवि+ +हीं कर सक ा। इसक े अलावा इस क: का, विक पूरी संपखित्त एक समेविक वक्फ र्थीा, संदभ:ही+ मूल्यांक+ +हीं विकया Sा सक ा। न्यायालय विववाविद स्र्थील क े परिरसर में विहन्दू भXों की स्र्थीाविप *ार्मिमक पूSा क े साक्ष्य को +SरअंदाS +हीं कर सक ा। यविद वादीगर्ण द्वारा वाद 4 में विदये गये क:, विक पूरी विववाविद संपखित्त उपयोगक ा: द्वारा वक्फ है, को स्वीकार विकया Sा ा है ो यह विहन्दुओं द्वारा *ार्मिमक पूSा स्र्थील क े रूप में विववाविद संपखित्त पर विकये गये सभी दावों को खत्म कर+े क े बराबर होगा।

744. उपरोX संदर्भिभ वि+र्ण:य में, सिSसमें उपयोगक ा: द्वारा वक्फ क े दावों को मान्य ा दी गयी है, दूसरे *ार्मिमक समुदाय द्वारा संपखित्त को *ार्मिमक पूSा कर+े क े खिलए प्रयोग कर+े क े संदभ: में दावे +हीं विकये गये हैं। यह प्र ी हो ा है विक इ+ मामलों क े थ्यों में उपयोगक ा: द्वारा वक्फ की मान्य ा से दूसरे *ार्मिमक समुदाय क े विवरो*ी और विवति*क रूप से मान्य अति*कार खत्म mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं हो गये। मीरू ब+ाम राम गोपाल366 क े मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय +े *ारिर विकया विक Sमींदार की संपखित्त क े साव:Sवि+क *ार्मिमक प्रयोग से संपखित्त पर Sमींदार का पंर्थीवि+रपेक्ष स्वत्व खत्म हो गया। हालांविक यह वि+र्ण:य ऐसे संदभ: में र्थीा Sहाँ पर भूविम पर एक कच्ची मस्जिस्Sद र्थीी और Sमींदार +े अप+ी भूविम को मुस्जिस्लम प्रार्थी:+ा क े खिलए प्रयोग विकए Sा+े की अ+ुमति दी र्थीी। उच्च न्यायालय +े वि+म्+व *ारिर विकयाः “दस् ावेSी साक्ष्य में ी+ दस् ावेS हैं, पहला, वष: 1311 फसली (1903-04)एक खसरा प्रदश:. ए र्थीा। इस खसरा में कहा गया है विक प्लार्ट सं. 119 "मस्जिस्Sद" क े रूप में दS: है… यविद Sमी+दार को उस प्रविवविष्ट से आपखित्त र्थीी ो वह भू राSस्व अति*वि+यम की *ारा 111 क े अन् ग: न्यायालय में आवेद+ कर सक ा र्थीा। यह थ्य विक उस+े प्रविवष्ट पर आपखित्त +हीं की, दशा: ा है विक वह प्रविवष्ट से सहम र्थीा।"...… यह +हीं कहा गया है विक Sमी+दार +े मस्जिस्Sद को अप+ी सम्पखित्त समर्मिप कर दी र्थीी। यह कहा गया है विक Sमी+दार +े प्रति वादीगर्ण को मस्जिस्Sद क े उद्देश्य क े खिलए भव+ क े प्रयोग द्वारा Sमी+दार की मौ+ या मुखर सहमति से भव+ को मस्जिस्Sद क े रूप में समर्मिप कर+े की स्वीक ृ ति दी। (प्रभाव वर्ति* ) उस मामले में Sमींदार +े इस संपखित्त पर मुस्जिस्लमों द्वारा स पूSा की स्वीक ृ ति दी र्थीी और अ+वर और लम्बे समय से *ार्मिमक पूSा का उच्च सास्जिक्ष्यक मा+क पूरा हो रहा र्थीा। Sमींदार की स्वीकृ ति चाहे प्रत्यक्ष या परोक्ष एक विवणिशष्ट कारक र्थीा। व:मा+ मामला भौति क रूप से णिभन्न है इसमें विकसी भी संबंति* पक्ष की स्वीक ृ ति +हीं है इसक े विवपरी विहन्दुओं क े देव ा भगवा+ राम +े विववाविद संपखित्त पर अप+े अति*कारों का प्रयोग विकया है। 366 1935 AIR All 891 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

745. प्रस् ु विकए गए साक्ष्यों से यह दर्भिश +हीं हो ा है विक पूरी विववाविद संपखित्त का प्रयोग वि+वासी मुस्जिस्लम समुदाय द्वारा साव:Sवि+क *ार्मिमक पूSा क े खिलए विकया Sा ा र्थीा। यह स्पष्ट है विक बाहरी अहा ा वास् व में भगवा+ राम क े भXों द्वारा उपयोग विकया Sा ा र्थीा और उ+क े कब्Sे में र्थीा। संपखित्त क े यह विहस्से स्पष्ट ः वि+वासी मुस्जिस्लम समुदाय क े सदस्यों द्वारा *ार्मिमक उद्देश्य क े खिलए प्रयोग +हीं विकए Sा े र्थीे और लम्बे प्रयोग क े आ*ार पर वक्फ संपखित्त +हीं हो सक े। आगे व:मा+ मामले में ABCD अक्षरों से अंविक पूरी विववाविद सम्पखित्त को वक्फ संपखित्त मा++े का Sो परिरर्णाम होगा वह वाद 5 में भूविम को ही न्यातियक व्यविXत्व की मान्य ा दे+े का वादीगर्ण क े दावे का यह दप:र्ण प्रति विबम्ब होगा। इसका परिरर्णाम विकसी विवशेष *म: क े आं रिरक त्वों क े कारर्ण सिSन्हें विवशेष उद्देश्य क े खिलए मान्य ा दी गई हो, दूसरे समुदाय क े पूSा कर+े क े अति*कार का विव+ाश होगा। विवति* यह मान्य ा दे ी है विक Sहाँ अति प्राची+ समय से विकसी मस्जिस्Sद वाली भूविम पर इबाद की Sा ी रही हो, ो भूविम को *ार्मिमक उद्देश्य क े खिलए समर्मिप मा+ा Sा ा है, और समप:र्ण क े अभाव में भी उपयोगक ा: द्वारा वक्फ मा+ा Sा ा है। हालांविक इससे उस संपखित्त में दूसरे समुदाय क े विवरो*ी और स्र्थीाविप *ार्मिमक अति*कार, विवशेषकर उपरोX उसिल्लखिख साक्ष्यों क े आलोक में, खत्म +हीं हो सक े। वाद 4 में वादीगर्ण द्वारा विदए गए क: को मा++े का यही परिरर्णाम होगा और Sो विवति* द्वारा समर्भिर्थी +हीं हो सक ा। O.12 कब्Sा और प्रति क ू ल कब्Sा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

746. वाद 4 में वादीगर्ण +े विवकल्प में प्रति क ू ल कब्Sे का क: विदया है। प्रति क ू ल कब्Sे का दावा कर+े का अति*कार वाद पत्र (यर्थीा संशोति* ) क े प्रस् र 11(a) में विदया गया है Sो वि+म्+व ् हैः “11(a). वैसा मा+ ले+े पर, यद्यविप स्वीकार +हीं विकया गया है,Sैसा विहन्दू प्रति वादी प्रति वि+ति*यों द्वारा यर्थीा कणिर्थी,विक एक समय विहन्दू मंविदर विवद्यमा+ र्थीा सिSसक े स्र्थीा+ पर बादशाह बाबर +े लगभग 433 वष: पहले मस्जिस्Sद ब+वाई, ो भी मुस्जिस्लमों का, मस्जिस्Sद क े ब++े से लेकर मस्जिस्Sद में क ु छ शरार ी त्वों क े घुस+े और इसे अपविवत्र कर+े क, Sैसा वादपत्र क े पूव:व - प्रस् र में कणिर्थी है, लंबे, अ+न्य और अ+वर कब्Sे द्वारा मुस्जिस्लमों +े प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा अप+ा स्वत्व पूर्ण: कर खिलया और मंविदर और विहन्दू S+ ा का, यविद कोई, अति*कार, स्वत्व या विह खत्म हो गया।" प्रस् र 11(a) की दलीलें उप*ारर्णा पर आ*ारिर हैं विकः विहन्दू मस्जिन्दर क े अस्जिस् त्वमा+ हो+े की स्जिस्र्थीति में, Sैसा विक प्रति वादीगर्ण द्वारा कणिर्थी है सिSसक े स्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद ब+ायी गयी र्थीी; लम्बे, अ+न्य और स कब्Sे द्वारा मुस्जिस्लम अप+े स्वत्व को पूर्ण: कर+े का दावा कर े हैं और यह विक मस्जिन्दर और विहन्दू समुदाय का अति*कार, स्वत्व और विह, यविद कोई हो, खत्म हो Sा ा है। प्रति क ू ल कब्Sे की दलील मस्जिस्Sद की वि+र्मिम हो+े पर बाबर द्वारा मुस्जिस्लमों क े साव:Sवि+क पूSा क े खिलए समर्मिप हो+े क े मुख्य दलील की सहायक है।

747. प्रति क ू ल कब्Sे की दलील इस स्वीक ृ ति पर आ*ारिर हो ी है विक संपखित्त का स्वाविमत्व अन्य में वि+विह है सिSसक े विवरूद्ध दावा कर+े वाला अन्य क े स्वत्व क े प्रति क ू ल कब्Sे का दावा कर ा है। कब्Sा इस अर्थी: में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रति क ू ल है विक यह अन्य व्यविX क े स्वीक ृ ति स्वत्व क े विवपरी है सिSसक े विवरूद्ध इसका दावा विकया गया है। प्रत्यक्ष ः इसखिलए वाद 4 क े वादीगर्ण को इस थ्य से अवग हो+ा चाविहए विक विहन्दूओं या मस्जिन्दर क े विवरूद्ध प्रति क ू ल कब्Sे का दावा दूसरे में स्वत्व की स्वीक ृ ति क े समा+ होगा। र्डॉ *व+ +े मा+ा है विक यह दलील एक सहायक या वैकस्जिल्पक दलील है सिSस पर मुख्य दलील क े साक्ष्यों क े आ*ार पर स्र्थीाविप हो+े की स्जिस्र्थीति में आरूढ़ रह+ा वादीगर्ण क े खिलए आवश्यक +हीं है। ब इस बा का मूल्यांक+ कर+ा आवश्यक हो Sा ा है विक क्या प्रति क ू ल कब्Sे का दावा स्र्थीाविप विकया गया है।

748. ऐसा व्यविX Sो प्रति क ू ल कब्Sे की दलील दे ा है, को ऐसा कब्Sा Sो शास्जिन् पूर्ण:, खुला और अ+वर हो - और ऐसा कब्Sा Sो nec ve nec claim and nec precario हो+े की श: पूरा कर ा हो, दो+ों स्र्थीाविप कर+ा होगा। प्रति क ू ल कब्Sे की दलील को सारवा+ ब+ा+े क े खिलए कब्Sे का चरिरत्र अ+वर ा और साव:Sवि+क हो+े क े मामले में पया:प्त हो+ा चाविहए क्योंविक प्रति क ू ल हो+े क े खिलए कब्Sे को वास् विवक स्वामी की Sा+कारी में हो+ा चाविहए। इ+ श Â को पहले पया:प्त दलील और दूसरे पया:प्त साक्ष्य क े द्वारा भलीभाँति स्र्थीाविप हो+ा चाविहए। यह सुस्र्थीाविप है विक साक्ष्य क े वल उन्हीं मामले क े संदभ: में प्रस् ु विकए Sा सक े हैं सिS+की विकसी सिसविवल वाद में दलील दी गयी हो और उपयुX दलील क े + हो+े पर विकसी मामले में साक्ष्य इसकी कमी को पूरा +हीं कर सक े। प्रस् र 11(a) को पढ़+े पर यह स्पष्ट हो Sा ा है विक यह कह+े क े अलावा- विक मस्जिस्Sद क े ब++े क े समय से इसक े अपविवत्र हो+े क मुस्जिस्लमों का लम्बा, अ+न्य और अ+वर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कब्Sा रहा- कोई थ्यात्मक आ*ार प्रस् ु +हीं विकया गया है। यह मात्र विववरर्ण या साक्ष्य का मामला +हीं है। प्रति क ू ल कब्Sे की दलील से वास् विवक स्वामी क े अति*कार को वि+रस् कर+े का प्रयास हो ा है और विवति* इसे आसा+ी से स्वीकार +हीं कर ा Sब क विक दलील में स्पष्ट और संज्ञेय आ*ार + विदया गया हो और साक्ष्यों द्वारा स्र्थीाविप + हो।

749. हालांविक प्रस् र 11(a) में कब्Sे की शुरूआ मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े समय की ब ायी गयी है यह बा साम+े आई है विक 1528 से 1860 की अवति* में कब्Sे क े संदभ: में कोई भी अणिभलेख उपलब्* +हीं है। इसक े अलावा विवकल्प में प्रति क ू ल कब्Sे की दलील दे+ा या एक सहायक दलील क े रूप में रख+ा प्रति क ू ल कब्Sे की दलील क े विवकास में एक विवणिशष्ट सु*ार है। वाद 2 में (सिSसे बाद में वापस ले खिलया गया पहले प्रति वादी द्वारा Sो विक वाद 4 में वादी संख्या 10 है, एक खिलखिख कर्थी+ दायर विकया गया र्थीा। खिलखिख कर्थी+ में पहले प्रति वादी +े दावा विकया विक यविद विकसी भी समय वाद का कोई वादी या कोई अन्य विहन्दू यह सिसद्ध कर दे विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण से पूव: उस स्र्थीा+ पर एक मस्जिन्दर र्थीा, उस स्जिस्र्थीति में भी मुस्जिस्लमों क े पास 400 वषÂ क कब्Sा रहा और उ+का कब्Sा विहन्दुओं की Sा+कारी में र्थीा। परिरर्णामस्वरूप विहन्दुओं क े पास कोई स्वाविमत्व +हीं है।

750. बाद में वाद 4 क े संस्जिस्र्थी हो+े क े समय क प्रति क ू ल कब्Sे की दलील को एक सहायक क: रह+े विदया गया है मुख्य क: यह र्थीा विक बाबर द्वारा मस्जिस्Sद क े ब+वा+े पर इसे साव:Sवि+क इबाद क े खिलए समर्मिप विकया गया र्थीा। वास् व में इ+ काय:वाविहयों क े क्रम में भी उस रीक े क े संबं* में अस्पष्ट ा विवद्यमा+ है सिSससे प्रति क ू ल कब्Sे क े दावे पर विवचार विकया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है। प्रति क ू ल कब्Sे क े संबं* में अप+े खिलखिख क: में र्डॉ राSीव *व+ +े वि+म्+खिलखिख कर्थी+ प्रस् ु विकया हैः “7.[1] वाद 4 में, प्रति क ू ल कब्Sे का मुख्य दावा विहन्दू पक्षकारों विवशेषकर वि+म ही अखाड़ा (वाद 3 में वादी और वाद 4 और 5 में प्रति वादीगर्ण) और वाद 5 में वादीगर्ण द्वारा यह Sोर दे+े क े खिलए विकया गया है विक Sन्म भूविम(वादी सं.2) क े विवरुद्ध कोई प्रति क ू ल कब्Sे का दावा +हीं विकया Sा सक ा। 7.[2] यर्थीा उपरोX वर्भिर्ण,वरिरष्ठ अति*वXा श्री सिSला+ी +े दस् ावेSों क े संबं* में साक्षी बया+ क े समर्थी:+ क े विब+ा भी यह स्र्थीाविप विकया है विक वष: 1939 - 49 से प्रति क ू ल कब्Sे का दावा आ*ारही+ है। कर्थी+ से उपरोX उद्धरर्ण वास् व में इस पर बल दे ा है विक वाद 4 में प्रति क ू ल कब्Sे का मुख्य दावा विहन्दू पक्षकारों द्वारा विकया गया है, वि+म ही अखाड़ा और वाद 5 क े देव ाओं क े विवशेष बल दे+े पर। Sो बा उपरोX कर्थी+ में छ ू र्ट गयी है वह यह है विक वाद 4 में प्रति क ू ल कब्Sे का क: स्वयं सुन्नी सेन्र्ट्रल वक्फ बोर्ड: +ी वादीगर्ण द्वारा विदया गया है। बस्जिल्क वाद 4 क े कÂ का प्रत्युत्तर दे े समय कर्थी+ से यह प्र ी हो ा है विक यह एक ऐसा कर्थी+ है Sो क े वल वि+म ही अखाड़ा और देव ाओं द्वारा प्रस् ु विकया Sा रहा है। प्रस् र 11(a) सिSसे ऊपर उद्धृ विकया गया है, सुन्नी सैन्र्ट्रल वक्फ बोर्ड: और अन्य समर्थी:+कारी वादीगर्ण की दलील है। सिSसमें प्रति क ू ल कब्Sे की दलील दे+े का प्रयास है।

751. कब्Sे का परिरभाविष कर+े का कोई भी प्रयास संदभ: आ*ारिर हो+ा चाविहए। साव:वित्रक प्रयोज्य ा वाले सिसद्धां को समझ+ा दुब * हो ा है। कविठ+ाई उलझ+ों से भरी हुई थ्यात्मक स्जिस्र्थीति यों को विवति*क मा+विबन्दुओं में परिरवर्ति कर+े की हो ी है। सिसद्धान् में यह थ्य वि+विह हो ा है- कब्Sे में हो+े का - और आशय, कब्Sे में हो+े की इच्छा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

752. सुपरिरन्र्टेंर्डेंर्ट ए°र्ड रेमेमब्रेंस ऑफ लीगल अफ े यर वेस्र्ट बंगाल ब+ाम अवि+ल क ु मार भुंSा367 क े मामले में इस न्यायालय क े ी+ न्याया*ीश न्यायपीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति आर एस सरकारिरया +े उल्लेख विकया विक कब्Sे की अव*ारर्णा बहुपक्षीय हो ी है सिSसमें अति*कार (सुखाति*कार) और एक थ्य (वास् विवक आशय) दो+ो वि+विह हो ा है। विवद्वा+ न्याया*ीश +े *ारिर विकया विकः “13. "कब्Sे" की पूर्ण: ार्मिकक और सर्टीक व्याख्या कर+ा Sो सभी विव*ाय+ों क े संदभ: में एक समा+ रूप से लागू हो, असंभव है। अप+ी पुस् क Sुरिरस्प्रूर्डेंस में तिर्डयाS और ह्यूSेस कह े हैं विक यविद विकसी विवषय का बहु अति*क सैद्धान् ीकरर्ण हुआ है ो वह "कब्Sा" का विवषय ही है। ऐसी बहु सी कविठ+ाई और विवभ्रम (Sैसा सालमा°र्ड क े Sुरिरस्प्रूर्डेंस क े 12 वें संस्करर्ण 1966 में उल्लेख है) इस थ्य से उत्पन्न हो ा है विक कब्Sा पूर्ण: ः विवति*क अव*ारर्णा +हीं है। "कब्Sा" में एक अति*कार और एक थ्य वि+विह हो ा है, संपखित्त क े अति*कार से संलग्न सुखाति*कार और वास् विवक आशय का थ्य। इसमें वि+यंत्रर्ण की शविX और वि+यंत्रर्ण का आशय वि+विह हो ा है। ( देखें तिर्डयाS और ह्यूSेस उपरोX) यह अवलोक+ शस्त्र अति*वि+यम 1959 की *ारा 29 (बी) क े ह कब्Sे क े संदभ: में विकया गया र्थीा। पी. लक्ष्मी रेड्डी ब+ाम एल लक्ष्मी रेड्डी368 क े मामले में न्यायमूर्ति Sगन्नार्थीदास इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की पीठ की ओर से बोल े हुए प्रति क ू ल कब्Sे की मान्य आवश्यक ा पर विवचार विकया गया:

368 1957 एस.सी.आर. 195 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "4. अब, प्रति क ू ल कब्Sे की सा*ारर्ण मान्य आवश्यक ा यह है विक इसको विब+ा बल, विब+ा गोप+ीय ा, विब+ा अ+ुज्ञा क े हो+ी चाविहए। (देखेंः सेक्र े र्ट्री ऑफ स्र्टेर्ट ब+ाम देवेंˆ लाल खा+ (1933) एल.आर. 61 ए 78,82 )। आवश्यक कब्Sा पया:प्त रूप से स, साव:Sवि+क, और उसे इस सीमा क हो सिSससे यह प ा चले विक वह विवपक्षी क े प्रति क ू ल कब्Sे में है।" न्यायालय +े यू. ए+. द्वारा विवरतिच पुस् र्टैगोर लॉ लेक्र्टर ऑ+ खिलविमर्टेश+ ऑफ प्रेसविक्रप्स+ संस्करर्ण 2 क े वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: का प्रोद्धरर्ण विदया। "7.... एक प्रति क ू ल कब्Sा भूविम का एक वास् विवक और अ+न्य विववि+योS+ है Sो उ+क े विवरूद्ध (sic) भूविम को *ारर्ण कर+े क े खिलए सिS+का उस भूविम पर कब्Sा है अति*कार क े दावे क े ह शुरू हो ा और ब+ा रह ा है, वह दावा या ो स्पष्ट हो या प्रलतिक्ष हो (विववि+योग क े कायÂ एवं परिरस्जिस्र्थीति यों से उत्पन्न )। (एंSेल, *ारा 390 और 398)। यह विवपरी पक्ष क े अति*कारों क े इस रह क े आक्रमर्ण क े सार्थी प्रति क ू ल रूप से दावा कर+े का इरादा है क्योंविक उसे कार:वाई का कारर्ण ब+ ा है Sो प्रति क ू ल कब्Sे का गठ+ कर ा है।369 " यह न्यायालय आयोसिS: "7.... इस सिसद्धां क े सार्थी सहमति, प्रति क ू ल कब्Sे की शुरुआ, विकसी व्यविX क े पक्ष में ात्पय: है विक व्यविX उस समय वास् विवक कब्Sे में है, उस समय, अ+न्य शीष:क क े क ु ख्या शत्रु ापूर्ण: दावे क े सार्थी, सिSसे वि+रस् कर+े क े खिलए, असली माखिलक ब एक कार:वाई ब+ाए रख+े की स्जिस्र्थीति में होगा। यह पाल+ करेगा विक Sो भी व्यविX प्रति क ू ल कब्Sे से शीष:क हासिसल कर+े क े इच्छ ु क व्यविX क े इरादे या इरादे हो सक े हैं, उसका प्रति क ू ल कब्Sा ब क शुरू +हीं हो सक ा Sब क विक वह पु+: कणिर्थी दुश्म+ी क े सार्थी वास् विवक कब्Sा प्राप्त +हीं कर ले ा।" 369 6 वां संस्करर्ण, भाग 1, लेक्चर 6, पृष्ठ संख्या 159 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क+ा:र्टक बोर्ड: ऑफ वक्फ ब+ाम भार सरकार370, न्यायमूर्ति एस राSेंˆ दो न्याय*ीशों की पीठ की ओर से बोल े हुए *ारिर विकया विक: "11... अ+न्य कब्Sे क े भौति क थ्य और वास् विवक माखिलक को बविहष्क ृ कर माखिलक क े रूप में कब्Sे में रह+े का आशय सबसे महत्वपूर्ण: कारक हैं सिSन्हें इस प्रक ृ ति क े मामलों में विवचारिर विकया Sा+ा चाविहए। प्रति क ू ल कब्Sा विवशुद्ध विवति* का प्रश्न +हीं है, बस्जिल्क एक थ्य और विवति* से संबंति* है। थ्य एवं विवति*। इसखिलए, प्रति क ू ल कब्Sे का दावा कर+े वाले व्यविX को विदखा+ा चाविहए: (क) वह विकस ारीख को कब्Sे में आया, (ख) उसक े कब्Sे की प्रक ृ ति क्या र्थीी, (ग) क्या कब्Sे का थ्य दूसरे पक्षकार को ज्ञा र्थीा, (घ) उसका कब्Sा कब क Sारी रहा, और (ड़) उसका कब्Sा खुला और बाति* +हीं र्थीा।" (प्रभाव वर्ति* ) मामले की साम£ी को अणिभवच+ों में स्र्थीाविप कर साक्ष्य में साविब विकया Sा+ा चाविहए। आ*ारही+ साक्ष्य +हीं विदया Sा सक ा है और विवति* में साक्ष्य रविह अणिभवच+ मामले को गठ+ +हीं करेगा। अकाली ब+ाम ए. वेद+ायगम371 क े मामले में इस न्यायालय +े इस बा पर Sोर विदया विक भूविम पर कब्Sा मात्र स्वत्व में परिरणिर्ण +हीं हो Sाएगा। स्वामी क े पास कब्Sा हो+ा चाविहए और उसे वास् विवक स्वामी क े प्रति कू ल भूविम *ारर्ण कर+ा चाविहए। इसक े अलावा, उसे परिरसीमा अति*वि+यम क े ह वि+*ा:रिर अवति* क े खिलए उस क्षम ा में ब+े रह+ा चाविहए। 370 (2004) 10 एस.सी.सी. 779 371 (2007) 14 एस.सी.सी. 308 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

753. विप्रवी काउंसिसल द्वारा वि+र्ण- मस्जिस्Sद शाविहदगंS ब+ाम णिशरोमणिर्ण गुरूद्वारा प्रबं*क सविमति, अमृ सर372 क े मामले में लाहौर में एक मस्जिस्Sद र्थीी सिSसे स+ 1722 में ब+ाया गया र्थीा। 1762 या उसक े बाद से वह भव+ और उसक े आस-पास की Sमी+ सिसक्खों क े अति*भोग और कब्Sे में र्थीी। स+् 1849 में अं£ेSों द्वारा विवलय क े समय मस्जिस्Sद और संपखित्त मस्जिस्Sद और इसकी सम्पखित्त सिसख गुरुद्वारा क े महं क े कब्Sे में र्थीी और मस्जिस्Sद का Sो भव+ र्थीा उसका प्रयोग सिसख समुदाय कर रहा र्थीा। सिसख गुरूद्वारा अति*वि+यम 1925 क े ह पुरा+ी मस्जिस्Sद की इमार और उससे संलग्न भूविम को गुरुद्वारा की सम्पखित्त में शाविमल र्थीी। मुसलमा+ों +े 1928 में सिसखों क े गुरुद्वारों न्यायाति*करर्ण क े समक्ष एक मुकदमा दायर विकया, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप यह पाया गया विक उ+का दावा प्रति कू ल कब्Sे क े आ*ार पर खारिरS कर विदया गया। वाद स्वयं मस्जिस्Sद सविह 18 वादी द्वारा वादविमत्र क े माध्यम से दायर विकया गया र्थीा, Sबविक अन्य +े पूSा क े अति*कार का दावा विकया र्थीा। यह मुकदमा णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क कमेर्टी क े खिखलाफ यह घोषर्णा विकये Sा+े क े खिलए र्थीा विक इमार एक मस्जिस्Sद है सिSसमें इस्लाम क े अ+ुयातिययों को पूSा कर+े का अति*कार है। यह मुकदमा सिSला न्याया*ीश द्वारा खारिरS कर विदया गया र्थीा और उच्च न्यायालय की पूर्ण: पीठ द्वारा एक अलग वि+र्ण:य सु+ाकर एक विवभासिS फ ै सले में उसकी पुविष्ट की गई र्थीी। विप्रवी काउंसिसल की ओर से सर SाS: रस्जिस्क+ +े *ारिर विकया: 372 ए.आई.आर. 1940 पी.सी. 116 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "यह वादी गर्ण की सिSम्मेदारी र्थीी विक वे विवलय की ति णिर्थी पर सही स्जिस्र्थीति को स्र्थीाविप करें। चूंविक सिसख महं ों +े सिसख राज्य क े ह लंबे समय क कब्Sा *ारर्ण विकये इसखिलए वादीगर्णों पर ही यह सिसद्ध कर+े का भार है विक वह इस उप*ारर्णा का ख°ड़+ करें विक महं गर्णों का कब्Sा उस समय और उस Sगह पर विवति*सम्म र्थीा।" इस क: की सु+वाई कर े हुए विक मस्जिस्Sद क े मामले में, Sो विक एक कविब्रस् ा+ है, वक्फ संपखित्त का उपयोग पैसों में विकया Sा+ा आशातिय है और + इसे विकरायेदारी अर्थीवा क ृ विष प्रायोS+ों हे ु, विप्रवी काउंसिसल +े वि+म्+ुसार *ारिर विकया: "... लेविक+ परिरसीमा अति*वि+यम मुस्जिस्लम विवति* में अन्य संक्रमर्णकी क्षम ा से संबंति* +हीं है। यह प्रविक्रया संबं*ी वि+यम को ब ा ा है सिSसक े ह आंग्ल भार ीय न्यायालय एक वि+तिश्च समय क े बाद अति*कारों को लागू +हीं कर े हैं, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप वे वि+तिश्च अति*कार समाप्त हो Sा ेहैं।मस्जिस्Sद क े प्रयोS+ों क े खिलए वक्फ की गई संपखित्त क े खिलए आ*ुवि+क परिरसीमा अति*वि+यमों क े विकसी भी अपवाद को पढ़ पा+ा असंभव है, चाहे उसका उद्देश्य क े वल मस्जिस्Sद क े रखरखाव और प्रबं* क े खिलए *+ प्रदा+ कर+ा हो या उद्देश्य क े खिलए एक स्र्थीा+ और भव+ उपलब्* करा+ा हो। Sबविक लॉर्ड:णिशप में *ार्मिमक भाव+ा क े सार्थी हर प्रकार की सहा+ुभूति है Sो पूSा स्र्थील क े पविवत्र ा और अ+ुलंघ+ीय ा का वर्ण:+ कर ी है, वे परिरसीमा अति*वि+यम क े ह +हीं आएँगे सिसवाय इस क: क े विक ऐसे भव+ को वक्फ क े प्रति क ू ल +हीं प्राप्त विकया Sा सक ा है, अर्थीवा इसको ब क +हीं प्राप्त Sा सक ा है Sब क इस मस्जिस्Sद क े रूप में वि+र्मिदष्ट +हीं विकया Sा ा अर्थीवा Sब क उस भूविम पर कोई भव+ + खड़ा विकया Sा ा अर्थीवा इसक े मूल उद्देश्य को विदखा+े वाला रूप समाप्त + हो Sाए।" (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

754. वष: 2015 में पारिर इस वि+र्ण:य में क+ा:र्टक उच्च न्यायालय क े एकल न्याया*ीश, न्यायमूर्ति अब्दुल +ज़ीर +े बारीविकयों की पहचा+ की और प्रति क ू ल कब्Sे संबं*ी दावे क े पूव: आपेक्षाओं का वि+म्+खिलखिख श Â में प्रति पाविद विकया373: "27. प्रति क ू ल कब्Sे की अव*ारर्णा एक पक्षˆोही कब्Sे को इंविग कर ा है, अर्थीा:, एक ऐसा कब्Sा Sो अणिभवयX या विववतिक्ष रूप से वास् विवक स्वामी माखिलक क े स्वत्व को खारिरS कर ा है। प्रति क ू ल कब्Sा हो+े क े खिलए ऐसे व्यविX द्वारा कब्Sा हो+ा चाविहए, Sो दूसरों क े अति*कारों को अणिभस्वीक ृ +हीं कर ा है बस्जिल्क अस्वीकार कर दे ा है। कब्ज़ा का अर्थी: है अति*पत्य और वि+यंत्रर्ण, और उस व्यविX क े म+ में यह भाव हो विक उसका उस वस् ु पर अति*पत्य है और वह अप+े इस अति*पत्य का प्रयोग कर सक ा है यह। भूविम पर कब्Sा मात्र से स्वत्व +हीं विमल Sाएगा। कब्Sा*ारी क े पास कब्Sे का आशय हो+ा चाविहए और वह वास् विवक स्वामी क े स्वत्व क े प्रति क ू ल भूविम को *ारिर करे। अति*पत्य से विब+ा विकसी अति*कार क े मात्र भूविम का उपयोग प ा चल ा है। प्रति क ू ल कब्Sा हो+े क े खिलए, ऐसे व्यविX का वास् विवक कब्Sा हो+ा चाविहए Sो स्वयं या उससे स्वत्व प्राप्त कर+े वाले व्यविXयों द्वारा अति*कार स्वरूप दावा कर े हैं। भूविम का स्वत्व सिसद्ध कर+े क े खिलए यह दर्भिश कर+ा पया:प्त +हीं है विक कब्Sे से संबं*ी कु छ काय: विकये गये हैं। आपेतिक्ष कब्Sा को वि+रं र ा, लोक ज्ञा+ में र्थीा इस सीमा क हो+ा चाविहए सिSससे यह दर्भिश हो विक वह स्वामी क े प्रति प्रति क ू ल है। दूसरे शब्दों में, कब्Sे को उस दौरा+ वास् विवक, दृश्यमा+, अ+न्य, प्रति क ू ल और चल हो+ा चाविहए Sब परिरसीमी विवति* क े ह बा*ा सृसिS कर+ा आवश्यक हो।" "30. परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 65 क े अं ग: आ+े वाले वाद में वादी को संपखित्त पर अप+ा स्वत्व अवश्य स्र्थीाविप कर+ा चाविहए। उन्हें यह साविब कर+े की आवश्यक ा +हीं है विक वह 12 वषÂ क कब्Sें में र्थीे। यविद वह अप+े स्वत्व को साविब कर+े में विवफल रह ा है, वाद 373 श्रीम ी विपल्ला अक्कायम्मा ब+ाम च+प्पा आई.एल.आर. क+ा:र्टक 3841 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवफल हो Sा ा है, और ऐसे मामले में प्रति क ू ल कब्Sे का प्रश्न Sब वादी +े विकसी भूविम पर अप+ा स्वत्व स्र्थीाविप कर विदया है, ो यह साविब कर+े का भार विक उस+े प्रति वादी क े प्रति क ू ल कब्Sे क े कारर्ण उस स्वत्व को खो विदया है, प्रति वादी पर वि+विह है। यविद प्रति वादी यह साविब कर+े में विवफल रह ा है विक वह 12 से अति*क वषÂ क प्रति क ू ल कब्Sे में रहा है, ब वादी अप+े स्वत्व क े बल पर मुकदमा Sी सक ा है। कोई व्यविX यह कह ा विक वह प्रति क ू ल कब्Sे से अचल संपखित्त का स्वामी ब+ गया है ो उसे यह स्र्थीाविप कर+ा होगा विक वह उस संपखित्त पर शास्जिन् पूर्ण: रीक े से काविबS है, और वास् विवक स्वामी +े उस कब्Sे पर खुले ौर पर अप+ी सहमति दे रखी है। वै*ावि+क अवति* क े खिलए प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा स्वत्व क े अति*£हर्ण को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कठोर प्रमार्ण की आवश्यक ा हो ी है।" (प्रभाव वर्ति* ) रविवन्ˆ कौर £ेवाल ब+ाम मंSी कौर374 क े मामले में, इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ में न्यायमूर्ति अब्दुल +ज़ीर +े यह *ारिर कर+े क े खिलए प्रति क ू ल कब्Sे पर आगे +यी विवति* का सृS+ कर कहा विक प्रति क ू ल कब्Sे क े माध्यम से विकसी व्यविX +े अप+ा स्वत्व स्र्थीाविप विकया है ो वह बेदखली की दशा में पु+स्र्थीा:प+ क े खिलए वाद दायर कर सक ा है। इसक े दृविष्टग, प्रति क ू ल कब्Sा एक लवार और एक ढाल दो+ों है।

755. यह साफ है विक वादी स्पष्ट रुख अप+ा+े में विवफल रहा है क्योंविक वे इस थ्य क े प्रति सचे हैं विक प्रति क ू ल कब्Sे की दलील दे+े में, उन्हें आवश्यक रूप से उस व्यविX या विकसी सत्ता क े स्वत्व को अणिभस्वीकृ कर+े का भार उठा+ा चाविहए सिSसक े विवरूद्ध प्रति क ू ल कब्Sे की यातिचका स्र्थीाविप से +हीं की गयी है और Sैसा विक ऊपर उल्लेख विकया गया है, और 374 (2019) 8 एस.सी.सी. 729 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sब न्यायालय में क: विदये Sा रहे र्थीे ो उस समय उसे प्रमाणिर्णक ा क े सार्थी +हीं रखा गया है। इ+ सबसे ऊपर, वादी क े खिलए पूरी संपखित्त क े शांति पूर्ण:, खुले और वि+रं र कब्Sे में हो+े का मामला स्र्थीाविप कर+ा असंभव है। र्डॉ. *व+ +े बार-बार कह े रहे विक हिंहदुओं क े इस अवै*ावि+क क ृ त्य क े परिरर्णामस्वरूप मुसलमा+ों द्वारा मस्जिस्Sद में इबाद कर+े में व्यव*ा+ उ बा*ा उत्पन्न हो गया। इसक े खिलए, र्डॉ. *व+ 1856-7,1934 में हुई घर्ट+ाओं को संदर्भिभ कर े हैं और 1949- उ+में से अंति म घर्ट+ा की परिरर्णति यह हुई विक *ारा 145 क े ह प्रारंणिभक आदेश कर+ा पड़ा।145. उपरोX घर्ट+ाओं में से प्रत्येक क े सार्थी Sो घर्ट+ाएं Sुड़ी हुई हैं उ+से अस्जिन् म वि+ष्कष: वि+कल ा है विक मस्जिस्Sद की संरच+ा क े अस्जिस् त्व क े बावSूद, मुसलमा+ों द्वारा ब ाए गए कब्Sे को प्रति क ू ल कब्Sे से Sुड़े मामले क े वि+स् ारर्ण क े खिलए आवश्यक दहलीS को पूरा कर+े क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है । अणिभलेखों में मौSूद साक्ष्य से यह संक े विमल ा है विक रेलिंलग क े वि+मा:र्ण क े बाद विकसी भी अवसर पर बाहरी अहा े में हिंहदुओं का कब्Sा र्थीा। अक े ले इसी आ*ार पर, क्षेत्र की संपूर्ण: ा क े संबं* में वादी द्वारा स्र्थीाविप प्रति क ू ल कब्Sे की दलील, Sो ए, बी, सी, र्डी, अक्षरों द्वारा प्रदर्भिश है, विवफल हो Sाएगी। ऊपरोX दर्भिश कारर्णों क े चल े वाद 4 का वादी प्रति क ू ल कब्Sे की आपेक्षाओं को पूरा कर+े में विवफल रहा है। O.13 विव+ष्ट अ+ुदा+ का सिसद्धां mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

756. बहस क े दौरा+, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े कर्थी+ विकया विक अ+ुदा+ क े लोप क े सिसद्धां क े आ*ार पर, वाद 4 क े वादी +े मुस्जिस्लम समुदाय को इबाद कर+े क े खिलए 1528 में बाबर द्वारा इसक े वि+मा:र्ण पर, मस्जिस्Sद क े समप:र्ण क े आ*ार पर उद्घोषर्णा की मांग की। इस सिसद्धां पर आ*ारिर वि+र्ण:य

757. अ+ुदा+ क े लोप सिसद्धां क े ह, लंबे समय क उपयोग अर्थीवा कब्Sा एक विवति*क उप*ारर्णा को Sन्म दे ा है का+ू+ी अ+ुमा+ लगाया Sा सक ा है विक प्रयुX अति*कार उपयोगक ा: अर्थीवा कब्Sे*ारी में चले गये और यह विक पारेषर्ण की खिलख खो गयी है।375 हाल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड क े अ+ुसार- "सव:प्रर्थीम न्यायालयों +े यह वि+यम अणिभवि+र्ण- विकया विक Sीव+ भर क े उपयोगक ा: से यह उप*ारर्णा उद्भू हुई विक दूरस्र्थी पुरावशेष से प ा चल ा है विक उसी क े Sैसा काय: विकया Sा रहा र्थीा। चूंविक यह हो+ा ही र्थीा विक कई मामलों में यह हुआ है, ऐसी उप*ारर्णा असंभव है, कब्Sे और भोग क े खिलए ऐसी उप*ारर्णा असंभाव्य र्थीी सिSसे विवति* को अति*कारों क े प्रक ृ ति क े सार्थी प्रदा+ कर+ा र्थीा, ऐसा काय: विव+ष्ट आ*ुवि+क अ+ुदा+ों क े सिसद्धान् क े खिलए उतिच +हीं र्थीा।..."376 375 Sेरोम Sे. क ु र्मिर्टस द्वारा रतिच "रेहिंवग द लॉस्र्ट £ांर्ट" रिरयल प्रॉपर्ट-, प्रोबेर्ट एंर्ड र्ट्रस्र्ट S+:ल 23, संख्या 3 (1988) पृष्ठ 535-60 । 376 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण प्रस् र 90 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह सिसद्धां क े वल वहीं लागू हो ा है Sहां भूविम का भोग या उपयोग अन्यर्थीा यर्थीोतिच रूप से +हीं विकया Sा सक ा है। 377 पारेषर्ण खिलख क े आभाव में, का+ू+ी स्मृति क े समय से विकये गये भोग को संक े क े रूप में देखा Sा+ा चाविहए विक दावाक ृ अति*कार अ+ुदा+ क े माध्यम से दावेदार (या उसक े पूव:वर्ति यों) को प्रदा+ कर विदया गया र्थीा।378 अ+ुदा+ को अणिभव्यX या विववतिक्ष हो सक ा है।379 लंबे समय क उपयोग क े माध्यम से संपखित्त का वि+रं र और वि+बा:* भोग को साविब कर+े का भार वादी पर है। अदाल उ+ मामलों में विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं करेगी, Sहां विकसी भी व्यविX को ऐसा अ+ुदा+ +हीं दे सक ा र्थीा, अर्थीवा Sहां कोई व्यविX या व्यविX विवशेष अ+ुदा+ प्राप्त कर+े क े खिलए सक्षम +हीं र्थीा।380 चूंविक वहां पर विवति*क उप*ारर्णा की गयी है इसखिलए यह सिसद्धान् ब क +हीं लागू हो ा है Sब ब विक उसी अवति* क े दौरा+ विव+ष्ट अ+ुदा+ द्वारा हस् ां रिर विकए गए दावाक ृ विह को पारेविष कर+े में सक्षम क ु छ व्यविX या व्यविXयों का समूह अक े ले या एक सार्थी मौSूद हों। इस सिसद्धां क े वै* अ+ुप्रयोग क े खिलए, एकमात्र संपोषक साक्ष्य यह है विक पया:प्त समय सीमा क े खिलए वि+बा:* हो+ा चाविहए। विव+ष्ट अ+ुदा+ का सिसद्धां लंबे समय से उपयोग कर+े क े साक्ष्य पर आ*ारिर +हीं है, बस्जिल्क सबू ों क े व्यति क्रम पर आ*ारिर है। इस सिसद्धां क े ह सुखाति*कार का दावा कर+े वाले व्यविX को विव+ष्ट अ+ुदा+ का अणिभवच+ कर+ा चाविहए, लेविक+ अणिभकणिर्थी आ*ुवि+क अ+ुदा+ क े खिलए 377 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण, प्रस् र 91 378 Sेरोम Sे. क ु र्मिर्टस द्वारा विवरतिच "रेहिंवग द लॉस्र्ट £ांर्ट" रिरयल प्रॉपर्ट- प्रोबेर्ट ए°ड़ र्ट्रस्र्ट S+:ल 23 संख्या 3 (1988) पृष्ठ संख्या 535-60 379 Sेरोम Sे. क ु र्मिर्टस द्वारा विवरतिच "रेहिंवग द लॉस्र्ट £ांर्ट" रिरयल प्रॉपर्ट- प्रोबेर्ट ए°ड़ र्ट्रस्र्ट S+:ल 23 संख्या 3 (1988) पृष्ठ संख्या 535-60 380 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण प्रस् र 94 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पक्षकारों को ारीख और +ामों को अप+े अणिभवच+ों में ब ा+े की आवश्यक ा +हीं है।

758. विप्रवी काउंसिसल द्वारा वि+र्ण- चोकलिंलगम विपल्लई ब+ाम मायांदी चेविट्टयार384 क े मामले में, लॉर्ड: बकमास्र्टर +े माखिलका+ा अति*कारों क े समर्थी:+ में एक वै* उत्पखित्त की उप*ारर्णा को सविवस् ार वि+म्+खिलखिख श Â में व्याख्या विकया: "Sब मूल संव्यवहार क े प्रत्येक पक्षकार का वि+*+ हो Sाए और यह अणिभवि+तिश्च कर+ा पूरी रह से असंभव हो Sा ा है विक वे कौ+-सी परिरस्जिस्र्थीति यां हैं सिS+क े कारर्ण मूल अ+ुदा+ विकया Sा+ा र्थीा, ो क े वल वि+म्+खिलखिख +ीति सिS+को न्यायालय Sहां क संभव हो, पूर्ण: कब्Sा ब+ाये रख+े वाले लोगों क े प्रति सिS+का विकसी सम्पदा में कब्Sा स्पष्ट है, यह उप*ारिर कर+े क े खिलए अ+ुदा+ विवति*पूर्ण: र्थीा और अविवति*पूर्ण: रीक े से विकया गया र्थीा, अप+ा ा है।" हैरिरस ए°ड़ चेस्र्टरफील्र्ड385 क े मामले में हाउस ऑफ लॉड्स: क े न्यायालय, लॉर्ड: लॉरब+: एल.Sे. +े वि+म्+ा+ुसार अणिभवि+*ा:रिर विकया: "..... लेविक+ यह सिसद्धां वि+तिश्च रूप से अच्छी भाव+ा पर आ*ारिर है। समय बी +े क े सार्थी पुरा+े संव्यवहारों क े अणिभलेख +ष्ट हो Sा े हैं, यविद उ+ लोगों में से विकसी को भी बेकब्Sा कर विदया Sाए सिSस पर उ+क े पूव:Sों का कब्Sा स्मार्णा: ी समय से है और क े वल इस आ*ार पर वे यह दर्भिश +हीं कर सक े है विक उन्हों+े इस भूविम को क ै से प्राप्त विकया गया र्थीा, बदा:श् +हीं विकया Sाएगा। इस कारर्ण से विवति* का यह वि+ष्कष: है विक मूल अति*£हर्ण ब क वै* र्थीा, Sब क विक दावाक ृ संपखित्त ऐसी + हो विक उ+में से कोई भी व्यविX का+ू++ इसे 384 आई.एल.आर. 19 मˆास 185 385 (1911) ए.सी. 623 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हासिसल + कर सक े, अर्थीवा थ्य यह दर्भिश करें विक इसे क े वल उ+ रीकों से हासिसल +हीं विकया Sा सक ा र्थीा सिS+को विवति* अ+ुज्ञा दे ा है।" उपरोX वि+र्ण:य में, न्यायालय क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या विकसी +दी पर कई श ास्जिब्दयों क सस्जिम्मखिल रूप से मत्स्य पाल+ अति*कारों का प्रयोग कर े हुए विव+ष्ट अ+ुदा+ का उप*ारर्णा की Sा सक ी है। हाउस ऑफ लॉड्स: +े बहुम से मा+ा विक विव+ष्ट अ+ुदा+ की कोई उप*ारर्णा इस मामले में उपलब्* +हीं र्थीी, यद्यविप कई इलाकों क े फ्री होल्र्डस:, अवि+तिश्च और अस्जिस्र्थीर व्यविXयों का संघ, विवति* में उतिच अ+ुदा+£ही ा +हीं हो सक े र्थीे।

759. उपरोX वि+र्ण:य कलकत्ता उच्च द्वारा वि+र्ण- असरबुल्ला ब+ाम विकयामट्टुला हाSी चौ*री386 क े मामले में संदर्भिभ विकया गया र्थीा, Sहाँ वादी +े दावा विकया विक स्मरर्णा ी काल से उस गाँव क े वि+वासी अप+े मवेणिशयों को स्व ंत्र ापूव: और विब+ा विकसी रोकर्टोक क े एक विववाविद भूविम पर चराया कर े और ब से वे विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा क े आ*ार पर चरागाह क े अति*कार को प्राप्त कर खिलया र्थीा। तिर्डवीS+ बेंच क े न्यायमूर्ति बी. क े. मुखS- इस प्रकार *ारिर विकया: "....यह विक यहां विवति*पूर्ण: उत्पखित्त की उप*ारर्णा की Sा सक ी है, प्रारम्भ में यह स्र्थीाविप कर+े की आवश्यक है विक वै* अ+ुदा+ क े पर्थी में विकसी भी प्रकार की विवति*क वS:+ा +हीं है, और यह विक + क े वल एक सक्षम अ+ुदा+क ा: र्थीा बस्जिल्क एक सक्षम अ+ुदा+£ही ा भी र्थीा सिSसक े पक्ष में अ+ुदा+ विदया Sा सक ा र्थीा। यविद विकसी भी कारर्ण से 386 ए.आई.आर. 1937 कलकत्ता 245 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कोई वै* अ+ुदा+ +हीं विदया Sा सक ा र्थीा ो ऐसे अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं की Sाएगी।"

760. ए+. शंकर+ारायर्ण विपल्लै ब+ाम बोर्ड: ऑफ कविमश्नर फॉर द हिंहदू रिरलीसिSयस ए+र्डोमेंर्ट, मˆास387 क े मामले में प्रवी कौंसिसल एक ऐसे मामले पर विवचार कर रही र्थीी Sहां पर वाद क े पक्षकारों +े दावा विकया विक वे वाद सम्पखित्त क े स्वामी हैं,सिSसमें इ+ाम (विकराया मुX) और रैय वारी अर्थीवा अया+ (वि+*ा:रिर ) दो+ों रह की भूविम शाविमल र्थीीं और उसक े एक विहस्से से प्राप्त आय से विहस्सा मध्यरावित्र कट्टलाई में खच: विकया Sा ा र्थीा सिSसका वि+*ा:रर्ण मˆास स्जिस्र्थी श्री पापा+ासम मंविदर कर ा र्थीा। न्यायालय क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या वाद सम्पखित्त पूरी रह से *म:दाय क े खिलए र्थीी अर्थीवा क्या दा+ क े पक्ष में संपखित्तयों की आय पर क े वल एक भार र्थीा। न्यायालय +े पाया विक यह *म:दाय क+ा:र्टक क े राSाओं +े विकया र्थीा + विक अपीलक ा:ओं क े पूव:Sों +े, Sो इस *म:दाय क े प्रबं*क अर्थीवा पय:वेक्षक मात्र र्थीे। ये संपखित्तयां और इससे हो+े वाली आय पूरी रह से मंविदर को समर्मिप र्थीी, और मुख्य रूप से मध्यरावित्र सेवाओं क े खिलए, और अति*शेष आय में अपीलक ा:ओं क े पास कोई लाभकारी विह +हीं र्थीा। *म:दाय की वास् विवक प्रक ृ ति का वि+*ा:रर्ण कर+े क े उद्देश्य क े खिलए दस् ावेSी साक्ष्य पर चचा: कर न्यायमूर्ति एम.आर. Sयकर +े इस प्रकार *ारिर विकया: "चूंविक *म:दाय की प्रक ृ ति या श Â पर प्रकाश फ ें क+े वाला कोई दस् ावेS अर्थीवा विवलेख अर्थीवा या अ+ुदा+ +हीं र्थीा इसखिलए *म:दाय की वास् विवक प्रक ृ ति क्या है, इसको वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए अन्य दस् ावेSी साक्ष्यों को अवलम्ब ले+े में उच्च न्यायालय क े न्यायमूर्ति की 387 ए.आई.आर. 1948 पी.सी. 25 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA राय ठीक र्थीी । इस रह क े दस् ावेSी साक्ष्य में, अन्य बा ों क े सार्थी, इ+ाम-रसिSस्र्टर, स्वत्व विवलेख, सव†क्षर्ण और बंदोबस् रसिSस्र्टर में दS: बया+, पत्रा एवं प्रशग *म:दाय क े संबं* में विवणिभन्न राSस्व अति*कारिरयों का अप+े अ*ी+स्र्थीों क े विदया गया आदेश शाविमल र्थीा।..... व:मा+ मामले में ऐसी कोई व्यवस्र्थीा साक्ष्य में +हीं है सिSसक े सार्थी अपीलक ा:ओं क े परिरवार क े कब्Sे या भोग को शुरू विकया Sा सक ा है। एकमात्र उसिल्लखिख करार परिरवार क े मध्य एक समझौ ा है सिSसका *म:दाय से कोई संबं* +हीं है।" विप्रवी काउंसिसल +े चोकलिंलगम विपल्लई क े मामले में पारिर वि+र्ण:य का संदर्भिभ कर वास् विवक साक्ष्य क े अस्जिस् त्व की अ+ुपस्जिस्र्थीति से Sुड़े मामलों में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां की प्रयोज्य ा पर चचा: की। न्यायालय +े वि+म्+ा+ुसार *ारिर विकया: "....सिS+ अन्य मामलों का अवलम्ब खिलया गया वह मोहम्मद मSफल अल मु्सावी ब+ा+ Sबीदा खा ू+ (ए.आई.आर. पी.सी. 103) का मामला र्थीा Sहां पर लम्बे समय से और शास्जिन् पूर्ण: सम्पखित्त क े भोग क े समर्थी:+ में विवति*पूर्ण: उद्गम की उप*ारर्णा संबं*ी विवति* की पुविष्ट हो गयी चूंविक इसकी व्यख्या लार्ड: बकमास्र्टर द्वारा पूव: मामले, चोकलिंलगम विपल्लई ब+ाम मयांर्डी चेविट्टयार आई.एल.आर. 19 मˆास 485 क े मामले में की गयी र्थीी।...... लेविक+ इसकी व्याख्या उसी मामले में की गयी र्थीी विक यह वि+यम वहां लागू हो ा है Sहा पर वास् विवक साक्ष्य + उपलब्* + हो या पक्षाकार उसको प्रस् ु कर+े में असफल रहे। अ+ुमा+, यह कहा गया र्थीा, क ु छ वै* शीष:क में एक मूल की, Sो अदाल ों +े अक्सर आसा+ी से लंबे समय क और चुपचाप आ+ंद ले+े वाले अति*कार का समर्थी:+ कर+े क े खिलए ब+ाया है, Sहां शीष:क का कोई वास् विवक प्रमार्ण आगामी +हीं है, और वि+यम का सहारा ले+ा होगा वास् विवक साक्ष्य की विवफल ा क े कारर्ण। व:मा+ मामले में, Sहां अ+ुदा+ की प्रक ृ ति, *म:दाय का उद्देश्य और उपयोगक ा: और भोग का दावा कर+े वाले व्यविXयों की क्षम ा से Sुड़े हुए सं ोषS+क और पया:प्त साक्ष्य मौSूद हों वहां इस वि+यम की उपयोविग ा +हीं हो सक ी है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

761. लक्ष्मी*र विमश्रा ब+ाम रंगलाल388 क े मामले में विप्रवी काउंसिसल क े उत्तरव - वि+र्ण:य में, £ामीर्णों की ओर से प्रति वि+ति* क्षम ा में अपीलक ा:ओं +े स्मरर्णा ी काल से कब्रस् ा+ क े रूप में भूविम क े एक र्टुकड़े कादावा विकया। दूसरी ओर प्रति वादी +े वि+Sी उद्योग क े प्रायोS+ क े खिलए भूविम का दावा विकया। प्रर्थीम अपील में अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश +े कहा विक भूविम का आरक्षर्ण एक समप:र्ण अर्थीवा मका+ माखिलक द्वारा अ+ुदा+ है। उच्च न्यायालय +े दूसरी अपील में अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश क े इस वि+र्ण:य को इस आ*ार पर अपास् विकया विक कोई विवति*मान्य अ+ुदा+ विवद्यमा+ +हीं है और अपीलार्थी- क े वाद को खारिरS कर विदया है। अपील में विप्रवी काउंसिसल +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक क्या भूविम का उपयोग अंति म संस्कार क े खिलए विकया Sा रहा र्थीा, यह थ्य और विवति* का विमणिश्र प्रश्न र्थीा और अपीलार्थी- का यह दावा है विक विववाविद संपखित्त गाँव की श्मशा+ भूविम र्थीी Sो प्रर्थीाग र्थीी। अ ः *ारिर विकया गया विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां की कोई प्रयोज्य ा +हीं है। विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां की प्रयोज्य ा क े बारे में ब ा े हुए, लॉर्ड: रेर्डविक्लफ +े इस प्रकार *ारिर विकया: ".... यह अवि+वाय: रूप से विववाविद क्षेत्र में £ामीर्णों क े अति*कारों को स्र्थीाविप कर+े वाला एक वाद है। विकसी +े भी आम S+ ा क े अति*कारों क े अ*ी+ भूविम का दावा विकया अर्थीवा इसक े बारे में बोला और + ही वास् व में विकसी विवशेष गांव में श्मशा+ घार्ट पर लागू ऐसी *ारर्णा को अर्थी: दे+ा आसा+ होगा। लेविक+ समप:र्ण क े वल अं£ेSी विवति* में विदया गया है, Sो विक विमट्टी क े माखिलक द्वारा S+ ा क े उपयोग क े खिलए विदए गए अप्रति संहृ लाइसेंस क े बराबर है। S+ ा क े सीविम वग: Sैसे विक विकसी गांव क े वि+वासी को भूविम क े विकसी भाग का समप:र्ण एक 388 ए.आई.आर. 1950 पी.सी. 56 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ऐसा दावा है Sो विवति* में अज्ञा है, और ऐसे विवशेष उपयोगक ा: क सीविम साक्ष्य समप:र्ण समप:र्ण क े वि+ष्कष: उतिच +हीं ठहराएंगे। (देखेंः पूले ब+ाम हसहिंकस+, विहल्र्ड्रेर्थी ब+ाम एर्डमस+ और बेरमंर्ड आई ब+ाम ब्राउ+।) भूविम को बां*+े वाले एक *मा:र्थी: र्ट्रस्र्ट क े वि+मा:र्ण से काफी हद क समा+ परिरर्णाम प्राप्त हो सक ा है, लेविक+ यह समप:र्ण +हीं है, और + ही यह यहां प्रश्नग है। सु+वाई क े विकसी भी स् र पर इस दावे का कोई रिरकॉर्ड: +हीं है विक £ाम समाS +े अप+े वि+वासिसयों में से कु छ वगÂ क े खिलए एक र्ट्रस्र्ट का प्रशास+ कर+े वाले वि+गम का गठ+ विकया हो, और + ही इस रह का कोई क: मा++ीय लॉर्ड:णिशप क े समक्ष उठाया गया।" यह सिसद्धां स्वत्व को शक्य ब+ा+े क े खिलए उत्पन्न हुआ है Sो तिचरभोगाति*कार द्वारा प्रदा+ विकया Sाएगा बSाय स्मर्णा: ी काल से प्रयोग कर+े की असंभाव्य ा क े । इंखिग्लश कॉमल लॉ क े अ+ुसार तिचरभोगाति*कार स्मर्णा: ी काल, अणिभसमय द्वारा, वष: 1189 में शुरू हुआ, मा+ा Sा ा है। यविद यह प्रदर्भिश कर+ा संभव हो ा विक प्र+ग उपयोगक ा:, भले ही प्राची+ है, Sो 1189 से उद्भू हुआ विफर भी स्मर्णा: ी उपयोगक ा: का तिचरभोगाति*कार द्वारा स्वत्व का साक्ष्य असफल हुआ। इस कविठ+ाई को दूर कर+े क े खिलए न्याया*ीशों +े Sूरी को यह प ा लगा+े क े खिलए अ+ुमति प्रदा+ की और प्रोत्साविह भी विकया,प्रश्नग अति*कार भले ही 1189 से पहले क े हों, उस ारीख से विव+ष्ट अ+ुदा+ में उत्पन्न हुए। इस प्रकार इस अति*कार +े आवश्यक विवति*क सूत्र प्राप्त कर खिलया। लेविक+ ऐसा अति*कार बस सिS +ा सुखाति*कार क े रुप में, एक संपखित्त क े सार्थी संलग्न विकया Sा+ा र्थीा: इसक े अति रिरX क्योंविक यह अ+ुदा+ में उत्पन्न हुआ, इसखिलए इसक े माखिलक, चाहे वहीं हो अर्थीवां चाहे न्यायगम+ क े द्वारा माखिलक ब+े होंऐसे व्यविX हो+े चाविहए Sो अं£ेSी विवति* क े ह अ+ुदा+£ही ा क े रूप में सक्षम र्थीे। समय-समय पर एक गाँव क े वि+वासिसयों द्वारा प्रयोग विकया Sा+े वाला कोई अति*कार + ो भूविम में विकसी भी संपखित्त से Sुड़ा हो ा है और + ही यह ऐसा अति*कार है Sो अ+ुदा+ का विवषयवस् ु ब+ाया Sा सक ा है। कोई £ाह्य अ+ुदा+£ी ा +हीं हैं। वास् व में, विव+ष्ट अ+ुदा+ का यह सिसद्धां में इस रह क े अति*कारों क े खिलए प्रयोग +हीं हो ा है Sैसा Sो विकसी विवशेष परिरक्षेत्र क े वि+वासिसयों भूविम का। (प्रभाव वर्ति* ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

762. राSा ब्रSा सुंदर देब ब+ाम मो+ी बेहरा389 क े मामले में इस अदाल क े ी+ SSों की बेंच क े फ ै सले में, यह दावा विकया गया र्थीा विक प्रमुख प्रति वादी और उ+क े पूव:S लंबे समय से एक वि+तिश्च वार्मिषक विकराये पर वि+बा:* रूप से मत्स्य पाल+ का काय: कर रहे र्थीे और वह भूविम उ+क े वास् विवक कब्Sे में र्थीी और उन्हों+े यह अति*कार सभी संभव रीकों Sैसे विक अ+ुदा+, प्रर्थीा, प्रति क ू ल कब्Sे और सुखाति*कार द्वारा अर्जिS कर खिलया र्थीा। वादी की रफ से +ौ गांवों क े अन्य मछ ु आरों की ओर से इस आ*ार पर व्यादेश Sारी कर+े हे ु एक वाद लाया विक चूंविक वे मत्स्य पाल+ का माखिलका+ा हक रख े हैं अ ः वे मत्स्य पालक क े अ+न्य माखिलक हैं और प्रति वादी वादी क े भोग क े अति*कार में हस् क्षेप कर +ुकसा+ पहुंचा रहे र्थीे। विवचारर्ण न्यायालय +े वादी क े पक्ष में एक तिर्डक्री पारिर की सिSसे बाद में उच्च न्यायालय द्वारा अपील में संशोति* विकया गया र्थीा, Sहां यह अणिभवि+र्ण- विकया गया विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े आ*ार पर प्रति वाविदयों क े पास विकरायेदार क े ौर पर क े वल विहल्सा मौसम मे ालाब में मछली पकड़+े क े विवशेष अति*कार र्थीे। उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य को पलर्टकर त्काली+ न्यायमूर्ति मेहर चंद महाS+ खंर्डपीठ क े खिलए बोल े हुए वि+म्+ा+ुसार *ारिर विकया: "12....... हमें उच्च न्यायालय क े इस दृविष्टकोर्ण को ब+ाए रख+ा मुस्जिश्कल पा े है विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े ह विववाविद मत्स्य पाल+ भूविम प्रति वाविदयों क े कब्Sे में र्थीी। विव+ष्ट अ+ुदा+ क े ह । विवशेष स्र्थीा+ीय क्षेत्र क े वि+वासिसयों क े मामले में यह सिसद्धां +हीं लागू हो ा है सिSसमें ह वे Sो भूविम या पा+ी क े ख°ड़ पर उपयोगक ा: क े 389 ए.आई.आर. 1951 एस.सी. 247 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*कार को स्र्थीाविप कर+ा चाह े हैं। Sैसा विक लक्ष्मी*र विमश्रा ब+ाम रंगलाल AIR 1950 PC 56 क े मामले में लॉर्ड: रेर्डविक्लफ +े उल्लेख विकया है विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां को एक क+ीकी उपकरर्ण क े रूप में उत्पन्न विकया गया है ाविक स्मर्णा: ी उपयोगक ा: को साविब कर+े की असंभव ा क े बावSूद तिचरभोगाति*कार द्वारास्वत्व प्रदा+ विकया Sा सक े और चूंविक यह अ+ुदा+ में उत्पन्न हुआ र्थीा इसखिलए इसक े माखिलक, चाहे मूल या भूविम हस् ां रर्ण से ब+े हों ऐसे व्यविX हो+े चाविहए Sो अ+ुदा+ प्राप्त कर सक े र्थीे, और यह विक विकसी गाँव क े वि+वासिसयों द्वारा समय-समय पर Sो अति*कार प्रयोग विकया Sा रहा र्थीा वह + ो विकसी भूविम में विकसी भी संपखित्त से Sुड़ा हुआ है और + ही यह ऐसा अति*कार है Sो अ+ुदा+ का विवषयक हो सक ा है, इसखिलए वहां पर को स्वीकाय: अ+ुदा+£ही ा +हीं है।" कोई स्वीकाय: अ+ुदा+£ी ा +हीं है। इस संबं* में कलकत्ता उच्च न्यायालय क े खंर्डपीठ द्वारा पारिर वि+र्ण:य आश्रबुल्ला ब+ाम कलकत्ता उच्च न्यायालय AIR 1937 Cal 245 का संदभ: विदया Sा सक ा है, सिSसमें इस विवषय पर विवति* की विवस् ार से Sांच की गई है। उस मामले में यह सवाल उठा विक £ामीर्णों +े सिSस चारागाह संबं*ी अति*कार का दावा विकया र्थीा वह अणिभयविX या विववतिक्ष अ+ुदा+ से विमल सक ा र्थीा। कई अं£ेSी और भार ीय प्रकरर्णों की Sांच क े उपरान् यह मा+ा गया विक कोई कोई विव+ष्ट अ+ुदा+ को अस्जिस्र्थीर और अवि+तिश्च गांव क े वि+वासिसयों क े पक्ष में +हीं मा+ा Sा सक ा है और इस रह क े अति*कार को क े वल प्रर्थीा द्वारा प्राप्त विकया Sा सक ा है। इस मामले में प्रति वादीगर्ण अवि+तिश्च व्यविXयों का एक वि+काय है और उ+की संख्या प्रत्येक Sन्म अर्थीवा मृत्यु द्वारा अर्थीवा मछ ु आरों क े इ+ गांवों से आ+े और Sा+े से बढ़ अर्थीवा घर्ट Sा ी है। (प्रभाव वर्ति* )

763. हॉल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड क े अ+ुसार: "यह उप*ारर्णा का क े वल साक्ष्य द्वारा खंतिर्ड विकया Sा सक ा हैविक ऐसे अ+ुदा+ का अस्जिस् त्व असंभव है; ऐसे साक्ष्य से कम क ु छ भी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पया:प्त +हीं होगा और न्याया*ीश क े वल इसखिलए अ+ुदा+ की उप*ारर्णा कर+े का अति*कारी +हीं है क्योंविक उ+को आश्वस् विकया गया है विक वह वास् व में कभी मंSूर +हीं विकया गया र्थीा।"390 बु*ू सत्य+ारायर्ण ब+ाम कोंर्डुरु वेंकर्टपय्या391 क े प्रकरर्ण में इस न्यायालय की दो SSों की बेंच +े कति पय अचल संपखित्तयों क े कब्Sे का प्रति उद्धरर्ण क े वाद से उत्पन्न अपील पर सु+वाई की। प्रति वाविदयों क े वि+ष्कास+ क े खिलए सरकार द्वारा वि+युX काय:कारी अति*कारी द्वारा इस आरोप पर एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा विक संपखित्त मंविदर की र्थीी सिSसे 1770 ई. में एक Sमींदार द्वारा विदया गया र्थीा। यह क: विदया गया र्थीा विक प्रति वादी अच:क हो+े क े +ा े कब्Sे में र्थीे और गल रीक े से संपखित्तयों को अप+े हो+े का दावा कर रहे र्थीे। मंविदर क े काय:कारी अति*कारी क े रूप में वादी की वाद संपखित्तयों पर कब्Sा कर+े क े खिलए प्रति वाविदयों को +ोविर्टस देकर वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय +े अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश क े आदेश को बरकरार रखा। प्रति वाविदयों की ओर से, इस न्यायालय क े समक्ष यह क: विदया गया र्थीा विक, प्रति वादीगर्ण और उ+क े पूव:वर्ति यों प्राची+ समय से संपखित्तयों पर कब्Sा में है इसखिलए विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् क े आ*ार पर वै* स्वत्व की वै* उप*ारर्णा की Sा+ी चाविहए। खंर्डपीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति एस.आर. दास +े इस क: को खारिरS कर वि+म्+ा+ुसार *ारिर विकया विकया: "2. प्रति*कारिरयों को कोई संदेह +हीं है, विक वै* स्वत्व कीउत्पखित्त की उप*ारर्णा क ु छ वि+तिश्च परिरस्जिस्र्थीति यों में लंबे समय क और 390 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण, प्रस् र 90 391 ए.आई.आर. 1953 एस.सी.195 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शास्जिन् पूव:क कब्Sे से संवंति* अति*कारों को समर्थी:+ कर+े क े खिलए विकया Sा सक ा है Sहां पर स्वत्व का कोई वास् विवक प्रमार्ण +हीं विदया Sा सक ा है। लेविक+ यह समा+ रूप सुस्र्थीाविप है विक वहां पर उप*ारर्णा +हीं विकया Sा सक ा Sहां पर अ+ुदा+ की प्रक ृ ति और सिS+को अ+ुदा+ विदया गया र्थीा उससे संबंति* साक्ष्य पया:प्त सबू और सं ोषS+क हो। यह सच है विक मूल अ+ुदा+ सुलभ +हीं है, लेविक+ Sैसे हम साक्ष्यों पर +Sर ड़ाल े हैं हमें दो दस् ावेS विमल े हैं Sो स्वत्व क े प्रश्न पर वि+र्णा:यक प्र ी हो े हैं। यह प्र ी होगा विक + ो इ+ाम रसिSस्र्टर प्रदश: पी -3 और + ही बया+ प्रदश: र्डी -3 में अ+ुदा+£ही ा क े रूप में अचा:क का अर्थीवा कोई भी कम से कम विह, व्यविXग या अन्यर्थीा, इ+ाम अ+ुदा+ क े विवषय-वस् ु में कोई उल्लेख है। दो+ों प्रदश: पूर्ण:रूपेर्ण इंविग कर े हैं विक इ+ाम का अ+ुदा+ अ+ुदा+क ा: द्वारा मंविदरक े पक्ष में विकया गया र्थीा और अ+ुदा+ की प्रक ृ ति क े संबं* में इस वि+तिश्च साक्ष्य क े मौSूदगी क े कारर्ण अच:क क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं की Sा सक ी है। अच:क इसखिलए, हम उच्च न्यायालय से सहम हैं और *ारिर कर े हैं विक देव ा अ+ुदा+£ही ा र्थीे और हमारे साम+े उठाए गए पहले प्रश्न का उत्तर अपीलक ा:ओं क े विवरूद्ध विदया Sा+ा चाविहए।" [देखेंः सी. पेरीस्वामी गौंर्डर ब+ाम सुंदरेश्या अय्यर 392 ]

764. म+ोहर दास मोहं ा ब+ाम चारू चंˆ पाल क े मामले में इस अदाल की एक संविव*ा+ पीठ को अपीलक ा:ओं Sो विक एक *ार्मिमक संस्र्थीा क े महं र्थीा उसक े द्वारा दायर प्रति वाविदयों क े विवरूद्ध भूविम क े विवणिभन्न भूखंर्डों क े कब्Sे की प्रत्युद्धरर्ण क े वाद पर विवचार कर+ा र्थीा। दूसरा, अपीलक ा: +े उतिच और न्यायसंग विकराए क े मूल्यांक+ की मांग की। प्रति वाविदयों +े प्रति वाद कर अणिभवच+ विकया विक विववाविद भूविम Sमींदारी का विहस्सा +हीं र्थीी, लेविक+ स्र्थीायी बंदोबस् से बहु पहले उ+क े पूव:व - स्वत्व*ारिरयों क े पक्ष में 392 ए.आई.आर. 1965 एस.सी. 516 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ+ुदा+ विकया गया र्थीा और Sमींदारी क े ह मांग कर+े वाले + ही बद:मा+ क े महाराSा और + ही वादी का स्वत्व र्थीा। सिSला न्यायालय +े मुंसिसफ क े फ ै सले को बरकरार रखा और *ारिर विक प्रति वादीगर्ण और पूव:व - बहु लंबे समय से विकराए का भुग ा+ क े विब+ा कब्Sे में र्थीे और विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा उ+क े पक्ष में की Sा सक ी र्थीी। उच्च न्यायालय +े सिSला न्यायालय क े फ ै सले क े खिखलाफ अपील खारिरS कर दी। इस न्यायालय क े समक्ष मुद्दा यह र्थीा विक क्या रिरकॉर्ड: पर मौSूद सामवि£यों क े आ*ार पर वि+चली अदाल ों +े प्रति वाविदयों क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ की सही उप*ारर्णा की र्थीी। इस न्यायालय +े *ारिर विकया विक प्रति वाविदयों क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ का कोई उप*ारर्णा +हीं की Sा सक ी है, और Sो सिSस भूविम पर वादी का कब्Sा है वह उसका उतिच और न्यायसंग विकराए क े आंकल+ कर+े का अति*कारी र्थीा। खंर्डपीठ की ओर बोल े हुए, न्यायमूर्ति र्टी. एल. वेंकर्टरामा अय्यर +े वि+म्+खिलखिख श Â में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां की प्रयोज्य ा की व्याख्या की: "7. सिS+ परिरस्जिस्र्थीति यों और श Â क े ह विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा की Sा सक ी र्थीी वह सुस्र्थीाविप है। Sब ऐसा पाया गया विक कोई व्यविX विब+ा विकसी विवरो* क े लम्बे समय से विकसी भूविम पर कब्Sे में र्थीा और उसका शास्जिन् पूर्ण: उपभोग कर रहा र्थीा, ो इंग्लैंर्ड में अदाल ें इस रह क े कब्Sे को विवति*क उत्पखित्त का श्रेय दीं, और Sब थ्यों से यह प ा चल ा हो विक तिचरभोगाति*कार द्वारा स्वत्व पोषर्णीय +हीं हो सक ा र्थीा ब यह *ारिर विकया विक ऐसी उप*ारर्णा की Sा सक ी र्थीी विक भूविम क े हकदार माखिलक द्वारा विकये गये अ+ुदा+ क े संबं* में कब्Sे का उल्लेख विकया गया, लेविक+ यह विक इस रह क े अ+ुदा+ को विव+ष्ट हो चुका र्थीा। यह उप*ारर्णा प्राची+ और स कब्Sे को प्राप्त कर+े क े खिलए की गयी र्थीी, Sो अन्यर्थीा युविXयुX रूप mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA से +हीं की Sा सक ी र्थीी। लेविक+ यह विवति* की एक वि+श्चायक उप*ारर्णा +हीं र्थीी, और यविद थ्य और साक्ष्य इसक े विवरूद्ध हो े ो अदाल ें ऐसी उप*ारर्णा कर+े क े खिलए बाध्य + हो ीं। विकसी न्याया*ीश का यह क:व्य +हीं हो सक ा विक वह ऐसे अ+ुदा+ की उप*ारर्णा करे सिSसका अस्जिस् त्व +हीं है भले ही उसक े बारे में वह आश्वस् है। यह अवलोक+ अर्ट+- S+रल ब+ाम सिसम्पस+ (1901)2 सी.एच.र्डीय 671,698 क े मामले में न्यायमूर्ति फाव†ल +े विकया। यविद ऐसा कर+े में कोई विवति*क बा*ा हो ी ो भी यह उप*ारर्णा +हीं की Sा ी। इस प्रकार, यह *ारिर विकया गया है विक यविद कोई व्यविX इस रह क े अ+ुदा+ को £हर्ण कर+े में सक्षम + हो ा ो इसे + विदया Sा ा क्योंविक वहां पर अवि+तिश्च व्यविXयों क े समूह द्वारा ऐसे अति*कार की मांग की गयी है।यह राSा ब्रS सुंदर देब ब+ाम मो+ी बेहरा 1951 एस.सी.आर. 431,446 में अणिभवि+र्ण- विकया गया र्थीा। यविद कोई व्यविX अ+ुदा+ दे+े में सक्षम + हो ा ो हीं है इस रह इस अ+ुमा+ क े खिलए कोई गुंSाइश + हो ी:(वाइर्ड हैल्सबरीS लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, खंर्ड. IV, पृष्ठ 574, प्रस् र 1074); अर्थीवा यविद अ+ुदा+ अवै* और अ+ुदा+क ा: की शविXयों से परे हो ा। (वाइर्ड बाक: र ब+ाम रिरचर्ड:स+ 4 बी एंर्ड एल्र्ड 579: 106 ई.आर. 1048 1049 और रोचर्डेल क ै +ाल क ं प+ी ब+ाम रेर्डविक्लफ 18 क्यू.बी. 287: 118 ई.आर. 108 एर्ट 118)।"

765. क ुं र्डा लक्ष्मर्ण बापूSी ब+ाम आन्ध्र प्रदेश सरकार 394 क े मामले में, प्रति वादी +े दावा विक विववाविद भूविम को पहले मXा भूविम क े रूप में और बाद में इ+ाम भूविम क े रूप में विदखाया गया र्थीा। अपीलक ा: +े उX मXा क े उत्तराति*कारिरयों में से वि+*ा:रिर ी हो+े का दावा विकया और 1958 में वह Sमी+ पर दाखिखल हो गया र्थीा और उस पर एक इमार ब+ा ली। यह क: विदया गया र्थीा विक विव+ष्ट अ+ुदा+ का सिसद्धां लागू होगा क्योंविक अपीलक ा: स्वत्व क े ह लंबे समय क विववाविद भूविम पर काविबS रहा है। प्रति वादी 394 (2002) 3 एस.सी.सी. 258 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +े यह आरोप लगाया गया र्थीा विक अपीलक ा: का दावा वै* +हीं र्थीा क्योंविक भूविम कभी भी उX मXा से संबंति* +हीं र्थीी; हालांविक यह उX ति णिर्थी से सरकार में वि+विह हो गयी और कलेक्र्टर क े आदेश सिSसमें उन्हो+े अति*कारों क े रिरकॉर्ड: में प्रविवविष्टयों को सही विकया र्थीा, वह अंति म हो चुका र्थीा। इस न्यायालय की एक दो न्याया*ीशों वाली पीठ +े विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां क े दावे को खारिरS कर म+ोहर दास मोहं ा क े वि+र्ण:य का उल्लेख विकया और *ारिर विकया विक विव+ष्ट अ+ुदा+ का उप*ारर्णा का लाभ अपीलक ा: को +हीं विमलेगा, सिSस+े 1954 से उस समय क े ई+ामदार (मXदार) द्वारा एक अपंSीक ृ स्र्थीायी पट्टा क े ह अप+े कब्Sे का प ा लगाया र्थीा।

766. ब्रS विकशोर Sगदेव ब+ाम लिंलगराS सामं 395 क े मामले में मामले में इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की पीठ +े लोक *ार्मिमक संस्र्थीा क े वंशा+ुग न्यासी हो+े क े प्रत्यर्थी- क े दावे पर विवचार विकया Sो इस क: पर आ*ारिर विकया विक उसक े पूव:Sों को उस *ार्मिमक संस्र्थीा क े कायÂ का प्रबं* सौंपा गया र्थीा सिSसे बहु पहले विकसी अज्ञा संस्र्थीापक द्वारा स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। प्रति वादी +े यह क: विदया विक उ+का परिरवार विब+ा विकसी रुकावर्ट क े सेवा और पूSा कर रहा र्थीा, Sैसा विक मारफ दार र मारफदर का काया:लय वंशा+ुग रूप से कर रहे र्थीे और यह प्रर्थीा विववि+यविम र्थीा। अपीलक ा:ओं +े प्रति वादी क े दावे का प्रति वाद विकया और सहायक आयुX +े प्रति वादी क े दावे को खारिरS कर विदया। र्थीाविप, उच्च न्यायालय +े अपील में प्रत्यर्थी- क े दावे को मंSूर विकया और विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां क े आ*ार 395 (2002) 6 एस.सी.सी. 540 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर उन्हें वंशा+ुग न्यासी अणिभवि+र्ण- विकया। न्यायमूर्ति एस. राSेन्ˆ बाबू +े उच्च न्यायालय क े विववि+श्चय को अपास् कर इस प्रकार अणिभवि+र्ण- विकया: "6. उच्च न्यायलय +े सिSस अन्य आ*ार अप+ा वि+र्ण:य विदया वह यह है विक वंशा+ुग न्यासी की परिरभाषा क े विहसाब से वि+मा:र्णक ा: क े समय से उ+क े वंशा+ुग न्यासी हो+े की विवति*क आवश्यक ा समय क े ग: में खो गयी है न्यायालय क े खिलए इसक े अति प्राची+ प्रयोग से अ+ुदा+ का अर्थी: लगा+े का विवकल्प खुला है लेविक+ इसका अर्थी: अ+ुमा+ +हीं लगाया Sाएगा यविद उपयोगक ा: को इससे अन्यर्थीा समझाया Sा सक े । विव+ष्ट अ+ुदा+ की कल्प+ा लंबे कब्Sे और स्वामी की सहमति से उपयोगक ा: क े सुखाति*कार क े प्रयोग की उप*ारर्णा मात्र है. यह विक दावा कर+े वाले को मूल रूप से एक अ+ुदा+ हुआ हो+ा चाविहए र्थीा Sो विक विव+ष्ट हो चुका है। ऐसे व्यविX क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं हो सक ी है Sो उत्तराति*कार क े अन् ग: न्यासी हो। हमें +हीं लग ा विक अणिभलेख में उपलब्* सामा£ी क े आ*ार पर ऐसा कोई हस् क्षेप (अऩुमा+) संभव है। प्रर्थीम ः न्यायालय क े समक्ष यह क: विदया गया है विक देव ा एक वि+Sी न्यास है और अति*वि+यम क े अन् ग: +हीं आ ा, उस संबं* में असफल हो+े पर अब वे इस थ्य पर आ+ा चाह े हैं विक वे वंशा+ुग न्यासी है। इसे स्र्थीाविप कर+े में विकसी प्रकार का साक्ष्य + दे पाकर वे दय+ीय रूप से असफल रहे।

767. इस विवषय पर पूव:व - क े विवश्लेषर्ण से वि+म्+खिलखिख सिसद्धां समाप्त विकए Sा सक े हैंः  विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् से साक्ष्य का वि+यम वि+कल ा है। समय बी Sा+े क े कारर्ण साक्ष्य क े आभाव में प्राची+ काल में विकये गये वै* अ+ुदा+ क े अस्जिस् त्व को साविब कर+े क े खिलए यह सिसद्धान् लागू हो ा है। र्थीाविप Sहां पर कब्Sे को साविब कर+े क े खिलए पया:प्त और सं ोषS+क साक्ष्य मौSूद हों अर्थीवा भूविम क े दावा सिSस मामले में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा + होगी वहां पर न्यायलय यह उप*ारर्णा कर+े क े खिलए बाध्य +हीं है।  Sहां पर न्यायालय क े खिलए उ+ परिरस्जिस्र्थीति यों को वि+तिश्च कर+ा असंभव हो सिS+ परिरस्जिस्र्थीति यों क े ह अ+ुदा+ विदया गया र्थीा वहां पर अ+ुसेवी स्वामी द्वारा कब्Sे*ारी अर्थीवा प्रयोगक ा: को विदये गये वै* और सकारात्मक अ+ुदा+ क े अस्जिस् त्व क े विवषय में उप*ारर्णा की Sा ी है। अ+ुदा+ अणिभव्यX अर्थीवा विववतिक्ष हो सक ा है। एक बार उप*ारर्णा कर ले+े क े उपरान्, न्यायालय यर्थीासंभव, उ+ लोगों क े कब्Sे को सुरतिक्ष करेगा Sो शास्जिन् पूर्ण:क कब्Sे को *ारर्ण विकये हैं।  विवति*पूर्ण: उप*ारर्णा कर+े क े खिलए कोई विवति*क रुकावर्टें +हीं हैं। इस सिसद्धान् की प्रायोज्य ा क े खिलए यह स्र्थीाविप कर+े की आवश्यक ा है विक शुरुआ में सिSस समय अ+ुदा+ विकया गया र्थीा उस समय वह + क े वल वै* अ+ुदा+ र्थीा अविप ु अ+ुदा+£ही ा सिSसक े पक्ष में अ+ुदा+ विकया गया र्थीा वह भी सक्षम र्थीा। परिरभाविष अ+ुदा+£ीह ा क े आभाव में विव+ष्ट अऩुदा+ की उप*ारर्णा +हीं की Sाएगी।  विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा क े खिलए लम्बे समय से, वि+बा:* और शास्जिन् पूर्ण: अकाय अति*कार का भोग हो+ा चाविहए। वि+बा:* भोग क े अन् ग: स उपभोग अर्थीवा कब्Sा आ ा है।  उपभोग और कब्Sे की आपेतिक्ष समयावति* परिरव:+शील है और मामला दर मामला वि+*ा:रिर की Sा+ी चाविहए; और  लम्बे से चली आ रही रूविढ़ एवं प्रर्थीा क े चल े अति*कारों का दावा एवं विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् क े मध्य अन् र विकया Sा+ा चाविहए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवश्लेषर्ण

768. प्रस् ु मामले में, वाद 4 क े वादीगर्ण 1528 में मुस्जिस्लमों क े इबाद क े खिलए बाबर द्वारा वि+र्मिम मस्जिस्Sद क े समप:र्ण क े आ*ार पर और इसक े विवकल्प में प्रति क ू ल कब्Sे क े आ*ार पर यविद यह स्र्थीाविप विकया Sा ा है विक हिंहदू मंविदर की Sगह पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, घोषर्णा का दावा स्र्थीाविप विकया है। विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा को समर्थी:+ कर+े क े खिलए वादीगर्णों +े कोई अणिभवच+ +हीं विकया है। वादीगर्ण का विवणिशष्ट मामला मुस्जिस्लमों द्वारा साव:Sवि+क इबाद क े खिलए मस्जिस्Sद क े समप:र्ण का है। इसका मूल्यांक+ उ+ साक्ष्यों क े आ*ार पर विकया Sा+ा चाविहए सिSन्हें Sोड़ा गया है। वास् व में प्रति क ू ल कब्Sे की वैकस्जिल्पक दलील साक्ष्य क े वि+यम क े रूप में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्दान् को लागू कर+े क े खिलए एक विव+ाशकारी विवति*क आ*ार है। प्रति क ू ल कब्Sे एक व्यविX में शीष:क क े वि+विह ार्थी: और दूसरे क े लंबे समय क Sारी और वि+बा:* कब्Sे क े अस्जिस् त्व को दशा: ा है, Sो विक वास् विवक शीष:क *ारक क े खिलए शत्रु ापूर्ण: और शत्रु ापूर्ण: रीक े से है। प्रति क ू ल कब्Sे की दलील से प्रति क ू ल कब्Sे की दलील क े रूप में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा क े विवरूद्ध Sो अऩुमा+ वि+क े लगा वह कणिर्थी अ+ुदा+£ही ा क े अलावा विकसी अन्य व्यविX में वि+विह स्वत्व पर आ*ारिर है। वि+विह स्वत्व पर आ*ारिर है। इस न्यायालय और इस सिसद्धान् को साक्ष्य की मान्य ा दे+े वाले विप्रवी कौंसिसल क े वि+र्ण:य यह दर्भिश कर े हैं विक इस सिसद्धान् को साव*ा+ी से लागू विकया Sा+ा चाविहए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह सिसद्धान् स्वत्व की मान्य ा क े खिलए एक स्व न्त्र, सारवा+ शीष:क का गठ+ +हीं कर ा है बस्जिल्क साक्ष्य का एक वि+यम है। साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 110 स्वाविमत्व क े दातियत्व क े प्रमार्ण क े बारे में ब ा ी है: Sब एक सवाल यह उठ ा है विक क्या कोइ: वस् ु Sो विकसी व्यविX क े कब्Sे में है ऐसी वस् ु का वह माखिलक है, ो यह साविब कर+े का भार विक वह माखिलक +हीं है, उस व्यविX पर र्डाला Sा ा है Sो विवरो* कर ा है विक वह माखिलक +हीं है। विकसी भी दलील अैार साक्ष्यों की अ+ुपस्जिस्र्थी में साक्ष्य क े एक व:मा+ मामले में, सिSसक े आ*ार पर सिसद्धां क े प्रयोग क े खिलए एक अ+ुमा+ को उठाया Sा सक ा है, आैर इसका आवश्यक रूप से पाल+ विकया Sा+ा चाविहए विक लुप्त अ+ुदा+ क े सिसद्धां का कोई प्रयोग +हीं है।

769. विववाविद स्र्थील विवश्वासों का विमलाSुला स्वरूप है आैर विहन्दू अैार मुतिश्लम क े आचरर्णों, आस्र्थीा अैार प्रर्थीाअेेां का सह-अस्जिस् त्व है। हिंहदू और मुतिश्लमो का कायÂ का विमलाSुला स्वरूप त्काली+ ढांचे से Sुड़ी *ार्मिमक और वास् ुणिशल्प परंपरा से ब+ा है सिSसमें मंविदर और मस्जिस्Sद दो+ों की विवशेष ाओं का समावेश हो ा है। Sबविक विवणिशष्ट वास् ुणिशल्पीय त्व आच्छाविद हैं वे आसा+ी से पहचा+े Sा+े योग्य र्थीे। वे विमणिश्र संस्कृ ति क े प्र ीक र्थीे। विवणिशष्ट मूर्ति कला में काला कसौर्टी पत्र्थीर क े स् म्भों में वराह, गरुड़, Sय और विवSय क े तिचत्रांक+ विमले हैं, सिSससे प ा चल ा है विक वे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुख्य रूप से हिंहदू मंविदर क े अ£भाग की सSावर्ट क े खिलए र्थीे और पूSा क े खिलए देव ाओं क े प्र ीक क े रूप में काय: कर े र्थीे। इसी क े सार्थी, मस्जिस्Sद क े विवणिशष्ट रूप क े प्र ीक ी+ गुम्बद, वSू, अल्लाह उत्कीर्भिर्ण पत्र्थीर, विमम्बर अैार मेहराब प्राप्त हुए हैं। इ+ विवशेष ाअेा से संक े विमल ा है विक विववाविद परिरसर का वि+मा:र्ण एक मस्जिस्Sद क े रूप में भी विकया गया र्थीा। इसी परिरसर क े भी र दो *ार्मिमक म विवद्यमा+ र्थीे। उ+का सह-अस्जिस् त्व समय समय पर र्थीा अैार विवशेष रूप से 1856 से पहले, Sो दूसरों क े सार्थी विवरो*ी अैार रXपा क े कारर्ण से स्वीकाय: विकया गया र्थीा। विफर भी इस स्र्थील की विवणिशष्ट विवशेष ाओं +े, हिंहदू और इस्लामी दो+ों ही परंपराओं को मू: रूप दे े हुए, अप+ी पहचा+ क े सार्थी एक अलग स्र्थील का वि+मा:र्ण विकया। सम£ संरच+ा से Sुड़ा वास् विवक प्रक ृ ति क े साक्ष्य और दो+ों पक्षों द्वारा लम्बे समय से उपयोग से स्पष्ट है।

770. हिंहदू और मुस्जिस्लम दो+ों गवाहों द्वारा पुविष्ट विकए गए यावित्रयों (मुख्य रूप से र्टीफ े न्र्थीेलर और मोंर्टगोमरी मार्मिर्ट+) क े लेख में पहचा+ योग्य पूSा स्र्थीलों और विववाविद स्र्थील पर हिंहदू श्रद्धालुओं द्वारा पूSा की व्यापक ा का संक े विमल ा है। स+् 1858 में अं£ेSों द्वारा मस्जिस्Sद की विववाविद इमार क े चारों ओर रेलिंलग स्र्थीाविप कर+े क े बाद हिंहदुओं द्वारा मस्जिस्Sद क े अहा े क े भी र पूSा कर+े क े दावे पर प्रति वाद विकया गया। विववाविद स्थ्ल पर +वाS विकए Sा+े की प्रारस्जिम्भक वि+शा+देही विद+ांविक 5 +वंबर 1860 को एक आवेद+ क े ह दस् ावेसिS की गइ सिSसे विहन्दू चबू रा क े वि+मा:र्ण को हर्टा+े क े खिलए दायर विकया गया र्थीा। आवेद+ यह इंविग कर ा है विक मुअखिज्ज+ क े अSा+, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विहन्दूअेा क े शंख बSा+े से मेल खा ी है ई ंर्ट अैार लोहे विक वि£ल से युX रेलिंलग विववाविद स्र्थील का उप-विवभाS+ +हीं र्थीा, Sो एक सयुX संपखित्त र्थीी, या औपवि+वेणिशक प्रशास+ द्वारा स्वत्व का वि+*ा:रर्ण र्थीा। यह स्पष्ट है-(i) ी+ गुम्बदीय ढ़ाचें क े बाहर रेलिंलग क े ब++े क े ुर ं बाद विहन्दुअों क े द्वारा रामचबू रे की स्र्थीाप+ा; (ii) हिंहदुओं द्वारा आं रिरक आहा े में अति*कारों क े वि+रं र दावे; और (iii) रेलिंलग क े बाहर खड़े हो+े क े खिलए श्रद्धालुओं द्वारा गभ: £ह की अेार खर्डे़ होकर पूSा की पेशकश। रामचबू रा का वि+मा:र्ण अैार की गइ पूSा एक एेसी *र्ट+ा र्थीी Sो संयोगवश रेलिंलग की स्र्थीाप+ा क े बाद *विर्ट हुइ। रेखिलगं विववाविद स्र्थील पर शांति ब+ाए रख+े का प्रयास र्थीा। हालांविक, शाचिं भ्रामक रही।

771. विहन्दुअों क े मौखिखक गवाहों का विववरर्ण उ+की विवश्वास अैार आस्र्थीा को विदखा ा है विक गभ: £ह भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ र्थीा अैार विववाविद स्र्थील पर विहन्दुअेां क े द्वारा लंम्बे समय से की गइ पूSा का अस्जिस् त्व है। Sैसा विक विववाविद स्र्थील क े भी र +माS का संबं* है, मुतिश्लम गवाहाें क े अणिभलेखिख सबू यह इंविग कर े है विक 1934 क े बाद +माS 16 विदसम्बर 1949 क अदा की Sा ी रही। हालाँविक, +माS क े वल शुक्रवार क े +माS क ही सीविम र्थीी अैार यह विवशेष रूप से विदसंम्बर 1949 क े समय से पहले क की Sा ी र्थीी विहन्दू अैार मुतिश्लम दो+ों गवाहों +े कहा विक मुतिश्लमों को विववाविद परिरसर में प्रवेश कर+े अैार +वाS कर+े से रोक+े क े खिलए सा*ूअों अैार बैराविगयों क े द्वारा सविक्रय भूविमका वि+भाइ: गइ: आैर यह मुख्य रूप से दशा: ा है विक विववाविद स्र्थील का उपयोग दो+ों *मÂ क े उपासकों द्वारा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया Sा ा है। मुसलमा+ों को मस्जिस्Sद क पहुँच+े से रोक+े का म लब यह +हीं र्थीा विक उ+का कोई दावा +हीं र्थीा या उन्हों+े विववाविद स्र्थील को छोड़ विदया र्थीा। हालांविक, यह याद रख+े की आवश्यक ा है विक व:मा+ मामला पूSा क े इस सम£ स्र्थीा+ क े स्वत्व या स्वाविमत्व से संबंति* है। ऐति हासिसक अणिभलेखों की अ+ुपस्जिस्र्थीति में, स्वाविमत्व या शीष:क क े संबं* में न्यायालय को दो+ों पक्षों में से एक क े द्वारा विववाविद परिरसर की प्रक ृ ति और उपयोग को वि+*ा:रिर कर+ा होगा। उपयोग की प्रक ृ ति का वि+*ा:रर्ण कर+े में, न्यायालय को उपयोग आैर विवस् ार का दायरा देख+ा होगा।

772. मुतिश्लमों क े स्वत्व का वि+*ा:रर्ण कर+े क े खिलए, मस्जिस्Sद की भौति क संरच+ा को ध्या+ में रखा Sा+ा एक थ्य हैं लेविक+ संपखित्त क े स्वत्व का दावा विवणिशष्ट और अप्रभाविव कब्Sे पर आ*ारिर हो+ा चाविहए सिSसे साक्ष्य द्वारा स्र्थीाविप विकया Sा+ा है। Sैसा विक ऊपर प्रस् ु विकया गया है, विववाविद परिरसर में हिंहदू और इस्लामी संस्क ृ ति की विवणिशष्ट वास् ुकला संबं*ी विवशेष ाएं हैं। स्वत्व क े दावे को इसक े लम्बे समय से उपयोग और वि+रं र कब्Sे क े परिरप्रेक्ष्य से आंका Sाएगा। यह अंविक कर+ा प्रासंविगक हो Sा ा है विक मुसलमा+ों +े संपखित्त की संपूर्ण: ा क े खिलए अप+े दावे पर Sोर विदया है, Sो उसको पूर्ण: ब+ा ा है, Sो हिंहदुओं क े दावों की ुल+ा में अप+े दावे में आं रिरक और बाहरी अहा े को शाविमल ब ाया हैं। बाहरी अहा े क े संबं* में, हिंहदू और मुस्जिस्लम दो+ों गवाहों क े द्वारा रामबू रे और *ार्मिमक महत्व क े अन्य स्र्थीा+ों की उपस्जिस्र्थीति को स्वीकार विकया है, सिS+की हिंहदू लगा ार पूSा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर रहे र्थीे। हिंहदुओं का उस स्र्थील क पहुंच+े और उ+क े बाहरी अहा े पर कब्Sे क े खिलए कोई बा*ा +हीं र्थीी।

773. 1857 में इ:र्ट से वि+र्मिम वि£ल की दीवार स्र्थीाविप कर+े क े बावSूद, हिंहदुओं +े भी री और बाहरी अहा े क े विवभाS+ को कभी स्वीकार +हीं विकया। हिंहदुओं क े खिलए यह संपूर्ण: परिरसर *ार्मिमक महत्व का र्थीा। विवति* अैार व्यवस्र्थीा को ब+ाए रख+े क े प्रयोS+ों क े खिलए अं£ेSों द्वारा विकया सीमांक+ भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ हो+े क े +ा े गभ: £ह की प्रासंविगक ा में उ+क े विवश्वास को समाप्त +हीं कर ा है। सातिक्षयों क े गवाहों से स्पष्ट ह Sो यह दर्भिश कर ा है विक गभ: £ह की अेार मुह करक े रेलिंलग में खर्डे़ होकर प्रार्थी:+ा कर े र्थीे। साक्ष्य का एक और प्रासंविगक भाग वि+हंग सिंसह क े विवरूद्घ 30 +वंबर 1858 को अप+ी णिशकाय में बाबरी मस्जिस्Sद क े मोविज़+ क े द्वारा कहा गया है। मुअखिज्ज+ +े स्वीकार विकया विक Sन्मस्र्थीा+ का प्र ीक पूव:काली+ सैकड़ों वषÂ से रहा र्थीा और हिंहदुओं +े ी+ प्रमुख ढांचे क े अंदर पूSा कर े र्थीे। स्र्थील क े विकसी भी विवभाS+ क े आभाव में, विहन्दुअेां क े पास विववाविद परिरसर क े अन्दर पूSा क े विवणिभन्न विबन्दु अैार स्वरूप उपस्जिस्र्थी र्थीे सिSसमें रामचबू रा अैार सी ा रसोइ अैार विववाविद परिरसर की परिरक्रमा शाविमल र्थीी। रेलिंलग स्र्थीाविप हो+े क े बाद भी, रामचबू रा, सी ा रासोई और अंSीर और +ीम क े पेड़ क े +ीचे रखी मूर्ति यों की पूSा हिंहदूअेा क े द्वारा की Sा ी र्थीी सिSससे स्पष्ट रूप से बाहरी अहा े पर उ+क े अ+न्य और अप्रभाविव कब्Sे का संक े विमल ा है। सभी साक्ष्य इंविग कर े हैं विक संभाव+ाओं क े आ*ार पर एक उतिच वि+ष्कष: वि+काला Sा सक ा है विक हिंहदुओं क े विवश्वास और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आस्र्थीा विववाविद परिरसर में स समय से र्थीी, विदवार क े वि+मा:र्ण क े बाद अैार पहले से ही 'गभ: £ह' को भगवा+ राम क े Sन्म का स्र्थीा+ क े रूप मा+ा Sा ा र्थीा। मुतिश्लमों द्वारा रेलिंलग क े भी र क े क्षेत्र का उपयोग विववादास्पद र्थीा और आं रिरक अहा े क उ+की पहुंच भू-आवेविष्ठ र्थीी; क े वल दो द्वारों से बाहरी भाग में पहुँचा Sा सक ा र्थीा अैार वह क्षेत्र हिंहदुओं क े वि+यंत्रर्ण में र्थीा। O.15 वाद 4 में साक्ष्यों का विवश्लेषर्ण

774. वाद 4 में वादी का मामला यह है विक 1528 में बाबर क े इशारे पर इसक े वि+मा:र्ण पर, मुसलमा+ों द्वारा इबाद क े उद्देश्य से मस्जिस्Sद को ब+ाया गया र्थीा। स्वत्व क े संबं* में, कोई दस् ावेSी साक्ष्य मौSूद +हीं है या 1860 से पहले की अवति* में प्रस् ु विकया गया है। उच्च न्यायालय क े समक्ष, Sैसा विक पहले देखा गया र्थीा विक 1856-7 क े पहले क े मूल्याक ं + पर या 1860 क े पहले +माS अदा कर+े पर या कब्Sे क े सम्बन्* में कोई सबू +हीं र्थीा। सिS+ साक्ष्यो को Sोड़ा गया है, उ+का विवश्लेषर्ण विवति* क े मूल सिसद्घान् को ध्या+ में रख े हुए कर+ा चाविहए विक राSस्व अणिभलेख स्वत्व +हीं प्रदा+ +हीं कर े है Sट्टू राम ब+ाम हकम सिंसह क े वाद396 में, दो न्याया*ीश की पीठ क े द्वारा यह अव*ारिर विकया गया: एकमात्र प्रविवविष्ट सिSस पर अपीलीय अदाल का अवलम्ब वि+विह र्थीा वह अवलम्ब पर्टवारी की Sमाबंदी में है यह पूव: स्र्थीाविप विवति* है विक Sमाबंदी प्रविवविष्टयां क े वल राSकोषीय उद्देश्य क े खिलए हैं और वे कोई स्वत्व +हीं प्रदा+ कर ी हैं

396. (1993) 4 SCC 403 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सूरSभा+ ब+ाम विवत्तीय आयुX397 क े वाद में इस वि+र्ण:य का अ+ुसरर्ण विकया गया र्थीा, Sहां न्यायमूर्ति सी क े ठक्कर +े दो SSों की बेंच क े खिलए अव*ारिर विकया विक:

9. यह पूर्ण: स्र्थीाविप है विक राSस्व अणिभलेखों में प्रविवविष्ट ऐसे व्यविX को स्वत्व प्रदा+ +हीं कर ी है सिSसका +ाम अति*कारों क े अणिभलेख में प्रकर्ट हो ा है। यह स्र्थीाविप विवति* है विक राSस्व अणिभलेखों या Sमाबन्दी में प्रविवविष्टयां क े वल राSकोषीय उद्देश्य या+ी भू-राSस्व का भुग ा+ क े खिलए हैं, और ऐसी प्रविवविष्टयों क े आ*ार पर कोई स्वाविमत्व +हीं विदया Sा ा है। Sहां क संपखित्त क े स्वत्व का प्रश्न है, यह क े वल एक सक्षम दीवा+ी न्यायालय द्वारा य विकया Sा सक ा है(Sट्टू राम ब+ाम हकम सिंसह (1993)4 एससीसी 403: ए.आइ:.आर 1994 एससी 1653 )।

775. मस्जिस्Sद में अं र्मि+विह भूविम क े अ+ुदा+ क े रूप में स्वत्व को इंविग कर+े वाले अणिभलेखों पर कोई दस् ावेSी साक्ष्य +हीं लाया गया है। सिS+ दस् ावेSी साक्ष्यों पर अवलंम्ब खिलया गया है, उ+में अवि+वाय: रूप से अ+ुदा+ शाविमल हैं Sो विब्रविर्टश सरकार द्वारा मस्जिस्Sद क े रखरखाव और संचाल+ क े खिलए विकए गए र्थीे। ये अ+ुदा+ उ+ लोगों की वि+रं र ा में हैं Sो पहले औपवि+वेणिशक सरकार द्वारा अव* क े विवलय से पहले विकए गए र्थीे। 13 माच: 1860 और 29 Sू+ 1860 को सरकार क े आदेशों को पंSीक ृ कर+े वाले रसिSस्र्टर माविफय को न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल क े फ ै सले में एक दस् ावेS क े रूप में मा+ा गया है Sो फर्टा हुआ है और सिSसकी विवषयवस् ु सुपाठय +हीं र्थीी। मस्जिस्Sद क े रखरखाव और संचाल+ क े खिलए अ+ुदा+ बहु लम्बे समय क चला र्थीा सिSससे मस्जिस्Sद का रखरखाव विकया Sा ा रहा और मुसलमा+ स्वयं अच्छे रीक े से संचाल+ कर े रहें हैं आैर यह दस् ावेS,

397. (2007) 6 SCC 186 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यद्यविप विवणिशष्ट उद्देश्यों क े खिलए प्रमाणिर्णक संक े दे ा है लेविक+ विववाविद भूविम का स्वत्व +हीं प्रदा+ कर ा है। 14 माच: 1860 की पंSीयक की Sाँच में विकराया-मुX अ+ुदा+ का क ु छ विववरर्ण शाविमल है और इसे गवाहों क े आ*ार पर कहा गया है। हालांविक, यह दशा: ा है विक वष: और ारीख ज्ञा +हीं हैं। Sैसा विक अ+ुदा+ क े विद+ांक क े सम्बन्* में, यह ब ाया गया है कोइ: ज्ञा+ +हीं। विकराया-मुX भूविम (सिSसकी) की Sांच क े खिलए रसिSस्र्टर में एक संदभ: है Sो1264 क े फसली वष: में प्रारम्भ विकया गया र्थीा Sब दंगे हुए र्थीे। 1264 फसली वष: का संदभ: 1856-7 इ:शवी से मेल खा ा है, Sबविक दा ा का +ाम बाबर ब ाया Sा ा है, यह विवलेख गवाही पर आ*ारिर है। पंSीयक सं. 6 (ई)-29 Sू+ 1860 की सश: छ ू र्ट, उ+ व्यविXयों क े +ाम इंविग कर ी है Sो विकराया मुX भूविम *ारर्ण कर रहे र्थीे।

776. दस् ावेSी साक्ष्यों में अगला चरर्ण राSस्व मुX भूविम क े अ+ुदा+ में +कद अ+ुदा+ क े रूपां रर्ण से संबंति* है। Sैसा विक पहले उल्लेख विकया गया है, यहाँ पर वंशावली क े सम्बन्* में एक गंम्भीर समस्या है अैार यह न्यायालय चौर्थीी पीढ़ी में विकए गए दावे क े आ*ार पर लगभग 325 वषÂ क े हस् क्षेप की अवति* में अस्पष्टीक ृ विवराम क े सार्थी आगे +हीं बढ़ सक ा है। यह इंविग कर+े क े खिलए क ु छ भी +हीं है विक क्या दावे की यर्थीार्थी: ा प ा कर+े क े खिलए कोई Sांच हुई र्थीी। अन् ः 302 रूपया 3 पैसा 6 आ+ा का +कद भुग ा+ क े बदले दो गाँवों की भूविम को अ+ुदा+ द्वारा स्र्थीा+ान् रिर विकया गया र्थीा। आयुX, फ ै Sाबाद ख°र्ड क े मुख्य आयुX अव* क े 25 अगस् 1863 क े विद+ांविक पत्र अैार उपायुX क े आदेश विद+ांविक 31 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अगस् 1863 सबू है। 1870 क े अ+ुदा+ में कहा गया है विक +कद ++कार ब क ब+ाए रखा Sा रहा र्थीा Sब क विक हस् ान् रिर ी विपछले सभी स+द, स्वत्व विवलेख और अ+ुदा+ से संबंति* अन्य दस् ावेSों को Sमा +हीं कर ा है। 1931 का +कल खसरा अबादी इंविग कर ा है विक अराज़ी +ंबर 583 +Sूल भूविम है। Sबविक इसका उल्लेख मस्जिस्Sद पोख् ा वक्फ अहमदीशाही से हो ा है, यह उस चबू रा का भी उल्लेख कर ा है सिSसे S+भूविम कहा Sा ा है।

777. दस् ावेSी साक्ष्य इंविग कर े हैं विक 1856-7 क े दंगों क े कारर्ण औपवि+वेणिशक सरकार +े पूSा क े क्षेत्रों को विवभासिS कर+े क े खिलए रेलिंलग क े सार्थी एक दीवार खड़ी की: सिSसमें भी री अहा े में मुसलमा+ और बाहरी अहा े में हिंहदुओं क े द्वारा पूSा की Sा ी है। रेलिंलग की स्र्थीाप+ा से पहले, ऐसा कोई स्पष्ट सीमांक+ +हीं र्थीा और हिंहदुओं और मुसलमा+ों +े संरच+ा क े भी र पूSा की र्थीी। रेखिलग से सर्टे बाहर की अेार चबू रा पर बैठ+ा अैार पूSा कर+ा इस बा का सूचक है विक हिंहदुओं +े इस स्र्थील को भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप विवश्वास विकया र्थीा उस पर पूSा कर+े क े अप+े अति*कार का दावा विकया र्थीा आैर चबू रा दूरी अैार समय क े सन्दभ: में समीप है। समय क े अ+ुसार, चबू रा की स्र्थीाप+ा एक घर्ट+ा है, Sो आं रिरक अहा े और बाहरी अहा े को सतिन्नविह और समेविक क्षेत्र में विद्वभासिS कर+े क े खिलए रेलिंलग की स्र्थीाप+ा का एक ात्काखिलक परिरर्णाम र्थीा। रेलिंलग स्र्थीाविप यह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अवलोक+ शस्त्र अति*वि+यम 1959 की *ारा 29 (बी) क े ह कब्Sे क े संदभ: में विकया गया र्थीा। पी. लक्ष्मी रेड्डी ब+ाम एल लक्ष्मी रेड्डी368 क े मामले में न्यायमूर्ति Sगन्नार्थीदास इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की पीठ की ओर से बोल े हुए प्रति क ू ल कब्Sे की मान्य आवश्यक ा पर विवचार विकया गया: "4. अब, प्रति क ू ल कब्Sे की सा*ारर्ण मान्य आवश्यक ा यह है विक इसको विब+ा बल, विब+ा गोप+ीय ा, विब+ा अ+ुज्ञा क े हो+ी चाविहए। (देखेंः सेक्र े र्ट्री ऑफ स्र्टेर्ट ब+ाम देवेंˆ लाल खा+ (1933) एल.आर. 61 ए 78,82 )। आवश्यक कब्Sा पया:प्त रूप से स, साव:Sवि+क, और उसे इस सीमा क हो सिSससे यह प ा चले विक वह विवपक्षी क े प्रति क ू ल कब्Sे में है।" न्यायालय +े यू. ए+. द्वारा विवरतिच पुस् र्टैगोर लॉ लेक्र्टर ऑ+ खिलविमर्टेश+ ऑफ प्रेसविक्रप्स+ संस्करर्ण 2 क े वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: का प्रोद्धरर्ण विदया। "7.... एक प्रति क ू ल कब्Sा भूविम का एक वास् विवक और अ+न्य विववि+योS+ है Sो उ+क े विवरूद्ध (sic) भूविम को *ारर्ण कर+े क े खिलए सिS+का उस भूविम पर कब्Sा है अति*कार क े दावे क े ह शुरू हो ा और ब+ा रह ा है, वह दावा या ो स्पष्ट हो या प्रलतिक्ष हो (विववि+योग क े कायÂ एवं परिरस्जिस्र्थीति यों से उत्पन्न )। (एंSेल, *ारा 390 और 398)। यह विवपरी पक्ष क े अति*कारों क े इस रह क े आक्रमर्ण क े सार्थी प्रति क ू ल रूप से दावा कर+े का इरादा है क्योंविक उसे कार:वाई का कारर्ण ब+ ा है Sो प्रति क ू ल कब्Sे का गठ+ कर ा है।369 " 368 1957 एस.सी.आर. 195 369 6 वां संस्करर्ण, भाग 1, लेक्चर 6, पृष्ठ संख्या 159 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह न्यायालय आयोसिS: "7.... इस सिसद्धां क े सार्थी सहमति, प्रति क ू ल कब्Sे की शुरुआ, विकसी व्यविX क े पक्ष में ात्पय: है विक व्यविX उस समय वास् विवक कब्Sे में है, उस समय, अ+न्य शीष:क क े क ु ख्या शत्रु ापूर्ण: दावे क े सार्थी, सिSसे वि+रस् कर+े क े खिलए, असली माखिलक ब एक कार:वाई ब+ाए रख+े की स्जिस्र्थीति में होगा। यह पाल+ करेगा विक Sो भी व्यविX प्रति क ू ल कब्Sे से शीष:क हासिसल कर+े क े इच्छ ु क व्यविX क े इरादे या इरादे हो सक े हैं, उसका प्रति क ू ल कब्Sा ब क शुरू +हीं हो सक ा Sब क विक वह पु+: कणिर्थी दुश्म+ी क े सार्थी वास् विवक कब्Sा प्राप्त +हीं कर ले ा।" क+ा:र्टक बोर्ड: ऑफ वक्फ ब+ाम भार सरकार370, न्यायमूर्ति एस राSेंˆ दो न्याय*ीशों की पीठ की ओर से बोल े हुए *ारिर विकया विक: "11... अ+न्य कब्Sे क े भौति क थ्य और वास् विवक माखिलक को बविहष्क ृ कर माखिलक क े रूप में कब्Sे में रह+े का आशय सबसे महत्वपूर्ण: कारक हैं सिSन्हें इस प्रक ृ ति क े मामलों में विवचारिर विकया Sा+ा चाविहए। प्रति क ू ल कब्Sा विवशुद्ध विवति* का प्रश्न +हीं है, बस्जिल्क एक थ्य और विवति* से संबंति* है। थ्य एवं विवति*। इसखिलए, प्रति क ू ल कब्Sे का दावा कर+े वाले व्यविX को विदखा+ा चाविहए: (क) वह विकस ारीख को कब्Sे में आया, (ख) उसक े कब्Sे की प्रक ृ ति क्या र्थीी, (ग) क्या कब्Sे का थ्य दूसरे पक्षकार को ज्ञा र्थीा, (घ) उसका कब्Sा कब क Sारी रहा, और (ड़) उसका कब्Sा खुला और बाति* +हीं र्थीा।" (प्रभाव वर्ति* ) 370 (2004) 10 एस.सी.सी. 779 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मामले की साम£ी को अणिभवच+ों में स्र्थीाविप कर साक्ष्य में साविब विकया Sा+ा चाविहए। आ*ारही+ साक्ष्य +हीं विदया Sा सक ा है और विवति* में साक्ष्य रविह अणिभवच+ मामले को गठ+ +हीं करेगा। अकाली ब+ाम ए. वेद+ायगम371 क े मामले में इस न्यायालय +े इस बा पर Sोर विदया विक भूविम पर कब्Sा मात्र स्वत्व में परिरणिर्ण +हीं हो Sाएगा। स्वामी क े पास कब्Sा हो+ा चाविहए और उसे वास् विवक स्वामी क े प्रति कू ल भूविम *ारर्ण कर+ा चाविहए। इसक े अलावा, उसे परिरसीमा अति*वि+यम क े ह वि+*ा:रिर अवति* क े खिलए उस क्षम ा में ब+े रह+ा चाविहए।

753. विप्रवी काउंसिसल द्वारा वि+र्ण- मस्जिस्Sद शाविहदगंS ब+ाम णिशरोमणिर्ण गुरूद्वारा प्रबं*क सविमति, अमृ सर372 क े मामले में लाहौर में एक मस्जिस्Sद र्थीी सिSसे स+ 1722 में ब+ाया गया र्थीा। 1762 या उसक े बाद से वह भव+ और उसक े आस-पास की Sमी+ सिसक्खों क े अति*भोग और कब्Sे में र्थीी। स+् 1849 में अं£ेSों द्वारा विवलय क े समय मस्जिस्Sद और संपखित्त मस्जिस्Sद और इसकी सम्पखित्त सिसख गुरुद्वारा क े महं क े कब्Sे में र्थीी और मस्जिस्Sद का Sो भव+ र्थीा उसका प्रयोग सिसख समुदाय कर रहा र्थीा। सिसख गुरूद्वारा अति*वि+यम 1925 क े ह पुरा+ी मस्जिस्Sद की इमार और उससे संलग्न भूविम को गुरुद्वारा की सम्पखित्त में शाविमल र्थीी। मुसलमा+ों +े 1928 में सिसखों क े गुरुद्वारों न्यायाति*करर्ण क े समक्ष एक मुकदमा दायर विकया, सिSसक े 371 (2007) 14 एस.सी.सी. 308 372 ए.आई.आर. 1940 पी.सी. 116 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरर्णामस्वरूप यह पाया गया विक उ+का दावा प्रति कू ल कब्Sे क े आ*ार पर खारिरS कर विदया गया। वाद स्वयं मस्जिस्Sद सविह 18 वादी द्वारा वादविमत्र क े माध्यम से दायर विकया गया र्थीा, Sबविक अन्य +े पूSा क े अति*कार का दावा विकया र्थीा। यह मुकदमा णिशरोमणिर्ण गुरुद्वारा प्रबं*क कमेर्टी क े खिखलाफ यह घोषर्णा विकये Sा+े क े खिलए र्थीा विक इमार एक मस्जिस्Sद है सिSसमें इस्लाम क े अ+ुयातिययों को पूSा कर+े का अति*कार है। यह मुकदमा सिSला न्याया*ीश द्वारा खारिरS कर विदया गया र्थीा और उच्च न्यायालय की पूर्ण: पीठ द्वारा एक अलग वि+र्ण:य सु+ाकर एक विवभासिS फ ै सले में उसकी पुविष्ट की गई र्थीी। विप्रवी काउंसिसल की ओर से सर SाS: रस्जिस्क+ +े *ारिर विकया: "यह वादी गर्ण की सिSम्मेदारी र्थीी विक वे विवलय की ति णिर्थी पर सही स्जिस्र्थीति को स्र्थीाविप करें। चूंविक सिसख महं ों +े सिसख राज्य क े ह लंबे समय क कब्Sा *ारर्ण विकये इसखिलए वादीगर्णों पर ही यह सिसद्ध कर+े का भार है विक वह इस उप*ारर्णा का ख°ड़+ करें विक महं गर्णों का कब्Sा उस समय और उस Sगह पर विवति*सम्म र्थीा।" इस क: की सु+वाई कर े हुए विक मस्जिस्Sद क े मामले में, Sो विक एक कविब्रस् ा+ है, वक्फ संपखित्त का उपयोग पैसों में विकया Sा+ा आशातिय है और + इसे विकरायेदारी अर्थीवा क ृ विष प्रायोS+ों हे ु, विप्रवी काउंसिसल +े वि+म्+ुसार *ारिर विकया: "... लेविक+ परिरसीमा अति*वि+यम मुस्जिस्लम विवति* में अन्य संक्रमर्णकी क्षम ा से संबंति* +हीं है। यह प्रविक्रया संबं*ी वि+यम को ब ा ा है सिSसक े ह आंग्ल भार ीय न्यायालय एक वि+तिश्च समय क े बाद अति*कारों को लागू +हीं कर े हैं, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप वे वि+तिश्च mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*कार समाप्त हो Sा ेहैं।मस्जिस्Sद क े प्रयोS+ों क े खिलए वक्फ की गई संपखित्त क े खिलए आ*ुवि+क परिरसीमा अति*वि+यमों क े विकसी भी अपवाद को पढ़ पा+ा असंभव है, चाहे उसका उद्देश्य क े वल मस्जिस्Sद क े रखरखाव और प्रबं* क े खिलए *+ प्रदा+ कर+ा हो या उद्देश्य क े खिलए एक स्र्थीा+ और भव+ उपलब्* करा+ा हो। Sबविक लॉर्ड:णिशप में *ार्मिमक भाव+ा क े सार्थी हर प्रकार की सहा+ुभूति है Sो पूSा स्र्थील क े पविवत्र ा और अ+ुलंघ+ीय ा का वर्ण:+ कर ी है, वे परिरसीमा अति*वि+यम क े ह +हीं आएँगे सिसवाय इस क: क े विक ऐसे भव+ को वक्फ क े प्रति क ू ल +हीं प्राप्त विकया Sा सक ा है, अर्थीवा इसको ब क +हीं प्राप्त Sा सक ा है Sब क इस मस्जिस्Sद क े रूप में वि+र्मिदष्ट +हीं विकया Sा ा अर्थीवा Sब क उस भूविम पर कोई भव+ + खड़ा विकया Sा ा अर्थीवा इसक े मूल उद्देश्य को विदखा+े वाला रूप समाप्त + हो Sाए।" (प्रभाव वर्ति* )

754. वष: 2015 में पारिर इस वि+र्ण:य में क+ा:र्टक उच्च न्यायालय क े एकल न्याया*ीश, न्यायमूर्ति अब्दुल +ज़ीर +े बारीविकयों की पहचा+ की और प्रति क ू ल कब्Sे संबं*ी दावे क े पूव: आपेक्षाओं का वि+म्+खिलखिख श Â में प्रति पाविद विकया373: "27. प्रति क ू ल कब्Sे की अव*ारर्णा एक पक्षˆोही कब्Sे को इंविग कर ा है, अर्थीा:, एक ऐसा कब्Sा Sो अणिभवयX या विववतिक्ष रूप से वास् विवक स्वामी माखिलक क े स्वत्व को खारिरS कर ा है। प्रति क ू ल कब्Sा हो+े क े खिलए ऐसे व्यविX द्वारा कब्Sा हो+ा चाविहए, Sो दूसरों क े अति*कारों को अणिभस्वीक ृ +हीं कर ा है बस्जिल्क अस्वीकार कर दे ा है। कब्ज़ा का अर्थी: है अति*पत्य और वि+यंत्रर्ण, और उस व्यविX क े म+ में यह भाव हो विक उसका उस वस् ु पर अति*पत्य है और वह अप+े इस अति*पत्य का प्रयोग कर सक ा है यह। भूविम पर कब्Sा मात्र से स्वत्व +हीं विमल Sाएगा। कब्Sा*ारी क े पास कब्Sे का आशय हो+ा चाविहए और वह वास् विवक स्वामी क े स्वत्व क े प्रति क ू ल भूविम को *ारिर 373 श्रीम ी विपल्ला अक्कायम्मा ब+ाम च+प्पा आई.एल.आर. क+ा:र्टक 3841 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA करे। अति*पत्य से विब+ा विकसी अति*कार क े मात्र भूविम का उपयोग प ा चल ा है। प्रति क ू ल कब्Sा हो+े क े खिलए, ऐसे व्यविX का वास् विवक कब्Sा हो+ा चाविहए Sो स्वयं या उससे स्वत्व प्राप्त कर+े वाले व्यविXयों द्वारा अति*कार स्वरूप दावा कर े हैं। भूविम का स्वत्व सिसद्ध कर+े क े खिलए यह दर्भिश कर+ा पया:प्त +हीं है विक कब्Sे से संबं*ी क ु छ काय: विकये गये हैं। आपेतिक्ष कब्Sा को वि+रं र ा, लोक ज्ञा+ में र्थीा इस सीमा क हो+ा चाविहए सिSससे यह दर्भिश हो विक वह स्वामी क े प्रति प्रति कू ल है। दूसरे शब्दों में, कब्Sे को उस दौरा+ वास् विवक, दृश्यमा+, अ+न्य, प्रति क ू ल और चल हो+ा चाविहए Sब परिरसीमी विवति* क े ह बा*ा सृसिS कर+ा आवश्यक हो।" "30. परिरसीमा अति*वि+यम क े अ+ुच्छेद 65 क े अं ग: आ+े वाले वाद में वादी को संपखित्त पर अप+ा स्वत्व अवश्य स्र्थीाविप कर+ा चाविहए। उन्हें यह साविब कर+े की आवश्यक ा +हीं है विक वह 12 वषÂ क कब्Sें में र्थीे। यविद वह अप+े स्वत्व को साविब कर+े में विवफल रह ा है, वाद विवफल हो Sा ा है, और ऐसे मामले में प्रति क ू ल कब्Sे का प्रश्न Sब वादी +े विकसी भूविम पर अप+ा स्वत्व स्र्थीाविप कर विदया है, ो यह साविब कर+े का भार विक उस+े प्रति वादी क े प्रति क ू ल कब्Sे क े कारर्ण उस स्वत्व को खो विदया है, प्रति वादी पर वि+विह है। यविद प्रति वादी यह साविब कर+े में विवफल रह ा है विक वह 12 से अति*क वषÂ क प्रति क ू ल कब्Sे में रहा है, ब वादी अप+े स्वत्व क े बल पर मुकदमा Sी सक ा है। कोई व्यविX यह कह ा विक वह प्रति क ू ल कब्Sे से अचल संपखित्त का स्वामी ब+ गया है ो उसे यह स्र्थीाविप कर+ा होगा विक वह उस संपखित्त पर शास्जिन् पूर्ण: रीक े से काविबS है, और वास् विवक स्वामी +े उस कब्Sे पर खुले ौर पर अप+ी सहमति दे रखी है। वै*ावि+क अवति* क े खिलए प्रति क ू ल कब्Sे द्वारा स्वत्व क े अति*£हर्ण को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कठोर प्रमार्ण की आवश्यक ा हो ी है।" (प्रभाव वर्ति* ) रविवन्ˆ कौर £ेवाल ब+ाम मंSी कौर374 क े मामले में, इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ में न्यायमूर्ति अब्दुल +ज़ीर +े यह *ारिर 374 (2019) 8 एस.सी.सी. 729 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर+े क े खिलए प्रति क ू ल कब्Sे पर आगे +यी विवति* का सृS+ कर कहा विक प्रति क ू ल कब्Sे क े माध्यम से विकसी व्यविX +े अप+ा स्वत्व स्र्थीाविप विकया है ो वह बेदखली की दशा में पु+स्र्थीा:प+ क े खिलए वाद दायर कर सक ा है। इसक े दृविष्टग, प्रति क ू ल कब्Sा एक लवार और एक ढाल दो+ों है।

755. यह साफ है विक वादी स्पष्ट रुख अप+ा+े में विवफल रहा है क्योंविक वे इस थ्य क े प्रति सचे हैं विक प्रति क ू ल कब्Sे की दलील दे+े में, उन्हें आवश्यक रूप से उस व्यविX या विकसी सत्ता क े स्वत्व को अणिभस्वीकृ कर+े का भार उठा+ा चाविहए सिSसक े विवरूद्ध प्रति क ू ल कब्Sे की यातिचका स्र्थीाविप से +हीं की गयी है और Sैसा विक ऊपर उल्लेख विकया गया है, और Sब न्यायालय में क: विदये Sा रहे र्थीे ो उस समय उसे प्रमाणिर्णक ा क े सार्थी +हीं रखा गया है। इ+ सबसे ऊपर, वादी क े खिलए पूरी संपखित्त क े शांति पूर्ण:, खुले और वि+रं र कब्Sे में हो+े का मामला स्र्थीाविप कर+ा असंभव है। र्डॉ. *व+ +े बार-बार कह े रहे विक हिंहदुओं क े इस अवै*ावि+क क ृ त्य क े परिरर्णामस्वरूप मुसलमा+ों द्वारा मस्जिस्Sद में इबाद कर+े में व्यव*ा+ उ बा*ा उत्पन्न हो गया। इसक े खिलए, र्डॉ. *व+ 1856-7,1934 में हुई घर्ट+ाओं को संदर्भिभ कर े हैं और 1949- उ+में से अंति म घर्ट+ा की परिरर्णति यह हुई विक *ारा 145 क े ह प्रारंणिभक आदेश कर+ा पड़ा।145. उपरोX घर्ट+ाओं में से प्रत्येक क े सार्थी Sो घर्ट+ाएं Sुड़ी हुई हैं उ+से अस्जिन् म वि+ष्कष: वि+कल ा है विक मस्जिस्Sद की संरच+ा क े अस्जिस् त्व क े बावSूद, मुसलमा+ों द्वारा ब ाए गए कब्Sे को प्रति क ू ल कब्Sे से Sुड़े मामले क े वि+स् ारर्ण क े खिलए आवश्यक दहलीS को पूरा कर+े क े रूप में +हीं मा+ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा सक ा है । अणिभलेखों में मौSूद साक्ष्य से यह संक े विमल ा है विक रेलिंलग क े वि+मा:र्ण क े बाद विकसी भी अवसर पर बाहरी अहा े में हिंहदुओं का कब्Sा र्थीा। अक े ले इसी आ*ार पर, क्षेत्र की संपूर्ण: ा क े संबं* में वादी द्वारा स्र्थीाविप प्रति क ू ल कब्Sे की दलील, Sो ए, बी, सी, र्डी, अक्षरों द्वारा प्रदर्भिश है, विवफल हो Sाएगी। ऊपरोX दर्भिश कारर्णों क े चल े वाद 4 का वादी प्रति क ू ल कब्Sे की आपेक्षाओं को पूरा कर+े में विवफल रहा है। O.13 विव+ष्ट अ+ुदा+ का सिसद्धां

756. बहस क े दौरा+, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ +े कर्थी+ विकया विक अ+ुदा+ क े लोप क े सिसद्धां क े आ*ार पर, वाद 4 क े वादी +े मुस्जिस्लम समुदाय को इबाद कर+े क े खिलए 1528 में बाबर द्वारा इसक े वि+मा:र्ण पर, मस्जिस्Sद क े समप:र्ण क े आ*ार पर उद्घोषर्णा की मांग की। इस सिसद्धां पर आ*ारिर वि+र्ण:य

757. अ+ुदा+ क े लोप सिसद्धां क े ह, लंबे समय क उपयोग अर्थीवा कब्Sा एक विवति*क उप*ारर्णा को Sन्म दे ा है का+ू+ी अ+ुमा+ लगाया Sा सक ा है विक प्रयुX अति*कार उपयोगक ा: अर्थीवा कब्Sे*ारी में चले गये और यह विक पारेषर्ण की खिलख खो गयी है।375 375 Sेरोम Sे. क ु र्मिर्टस द्वारा रतिच "रेहिंवग द लॉस्र्ट £ांर्ट" रिरयल प्रॉपर्ट-, प्रोबेर्ट एंर्ड र्ट्रस्र्ट S+:ल 23, संख्या 3 (1988) पृष्ठ 535-60 । mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हाल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड क े अ+ुसार- "सव:प्रर्थीम न्यायालयों +े यह वि+यम अणिभवि+र्ण- विकया विक Sीव+ भर क े उपयोगक ा: से यह उप*ारर्णा उद्भू हुई विक दूरस्र्थी पुरावशेष से प ा चल ा है विक उसी क े Sैसा काय: विकया Sा रहा र्थीा। चूंविक यह हो+ा ही र्थीा विक कई मामलों में यह हुआ है, ऐसी उप*ारर्णा असंभव है, कब्Sे और भोग क े खिलए ऐसी उप*ारर्णा असंभाव्य र्थीी सिSसे विवति* को अति*कारों क े प्रक ृ ति क े सार्थी प्रदा+ कर+ा र्थीा, ऐसा काय: विव+ष्ट आ*ुवि+क अ+ुदा+ों क े सिसद्धान् क े खिलए उतिच +हीं र्थीा।..."376 यह सिसद्धां क े वल वहीं लागू हो ा है Sहां भूविम का भोग या उपयोग अन्यर्थीा यर्थीोतिच रूप से +हीं विकया Sा सक ा है। 377 पारेषर्ण खिलख क े आभाव में, का+ू+ी स्मृति क े समय से विकये गये भोग को संक े क े रूप में देखा Sा+ा चाविहए विक दावाक ृ अति*कार अ+ुदा+ क े माध्यम से दावेदार (या उसक े पूव:वर्ति यों) को प्रदा+ कर विदया गया र्थीा।378 अ+ुदा+ को अणिभव्यX या विववतिक्ष हो सक ा है।379 लंबे समय क उपयोग क े माध्यम से संपखित्त का वि+रं र और वि+बा:* भोग को साविब कर+े का भार वादी पर है। अदाल उ+ मामलों में विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं करेगी, Sहां विकसी भी व्यविX को ऐसा अ+ुदा+ +हीं दे सक ा र्थीा, अर्थीवा Sहां कोई व्यविX या व्यविX विवशेष अ+ुदा+ प्राप्त कर+े क े खिलए सक्षम +हीं र्थीा।380 चूंविक वहां पर विवति*क उप*ारर्णा की गयी है इसखिलए यह सिसद्धान् ब क +हीं लागू हो ा है Sब 376 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण प्रस् र 90 377 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण, प्रस् र 91 378 Sेरोम Sे. क ु र्मिर्टस द्वारा विवरतिच "रेहिंवग द लॉस्र्ट £ांर्ट" रिरयल प्रॉपर्ट- प्रोबेर्ट ए°ड़ र्ट्रस्र्ट S+:ल 23 संख्या 3 (1988) पृष्ठ संख्या 535-60 379 Sेरोम Sे. क ु र्मिर्टस द्वारा विवरतिच "रेहिंवग द लॉस्र्ट £ांर्ट" रिरयल प्रॉपर्ट- प्रोबेर्ट ए°ड़ र्ट्रस्र्ट S+:ल 23 संख्या 3 (1988) पृष्ठ संख्या 535-60 380 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण प्रस् र 94 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ब विक उसी अवति* क े दौरा+ विव+ष्ट अ+ुदा+ द्वारा हस् ां रिर विकए गए दावाक ृ विह को पारेविष कर+े में सक्षम क ु छ व्यविX या व्यविXयों का समूह अक े ले या एक सार्थी मौSूद हों। इस सिसद्धां क े वै* अ+ुप्रयोग क े खिलए, एकमात्र संपोषक साक्ष्य यह है विक पया:प्त समय सीमा क े खिलए वि+बा:* हो+ा चाविहए। विव+ष्ट अ+ुदा+ का सिसद्धां लंबे समय से उपयोग कर+े क े साक्ष्य पर आ*ारिर +हीं है, बस्जिल्क सबू ों क े व्यति क्रम पर आ*ारिर है। इस सिसद्धां क े ह सुखाति*कार का दावा कर+े वाले व्यविX को विव+ष्ट अ+ुदा+ का अणिभवच+ कर+ा चाविहए, लेविक+ अणिभकणिर्थी आ*ुवि+क अ+ुदा+ क े खिलए पक्षकारों को ारीख और +ामों को अप+े अणिभवच+ों में ब ा+े की आवश्यक ा +हीं है।

758. विप्रवी काउंसिसल द्वारा वि+र्ण- चोकलिंलगम विपल्लई ब+ाम मायांदी चेविट्टयार384 क े मामले में, लॉर्ड: बकमास्र्टर +े माखिलका+ा अति*कारों क े समर्थी:+ में एक वै* उत्पखित्त की उप*ारर्णा को सविवस् ार वि+म्+खिलखिख श Â में व्याख्या विकया: "Sब मूल संव्यवहार क े प्रत्येक पक्षकार का वि+*+ हो Sाए और यह अणिभवि+तिश्च कर+ा पूरी रह से असंभव हो Sा ा है विक वे कौ+-सी परिरस्जिस्र्थीति यां हैं सिS+क े कारर्ण मूल अ+ुदा+ विकया Sा+ा र्थीा, ो क े वल वि+म्+खिलखिख +ीति सिS+को न्यायालय Sहां क संभव हो, पूर्ण: कब्Sा ब+ाये रख+े वाले लोगों क े प्रति सिS+का विकसी सम्पदा में कब्Sा स्पष्ट है, यह उप*ारिर कर+े क े खिलए अ+ुदा+ विवति*पूर्ण: र्थीा और अविवति*पूर्ण: रीक े से विकया गया र्थीा, अप+ा ा है।" 384 आई.एल.आर. 19 मˆास 185 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हैरिरस ए°ड़ चेस्र्टरफील्र्ड385 क े मामले में हाउस ऑफ लॉड्स: क े न्यायालय, लॉर्ड: लॉरब+: एल.Sे. +े वि+म्+ा+ुसार अणिभवि+*ा:रिर विकया: "..... लेविक+ यह सिसद्धां वि+तिश्च रूप से अच्छी भाव+ा पर आ*ारिर है। समय बी +े क े सार्थी पुरा+े संव्यवहारों क े अणिभलेख +ष्ट हो Sा े हैं, यविद उ+ लोगों में से विकसी को भी बेकब्Sा कर विदया Sाए सिSस पर उ+क े पूव:Sों का कब्Sा स्मार्णा: ी समय से है और क े वल इस आ*ार पर वे यह दर्भिश +हीं कर सक े है विक उन्हों+े इस भूविम को क ै से प्राप्त विकया गया र्थीा, बदा:श् +हीं विकया Sाएगा। इस कारर्ण से विवति* का यह वि+ष्कष: है विक मूल अति*£हर्ण ब क वै* र्थीा, Sब क विक दावाक ृ संपखित्त ऐसी + हो विक उ+में से कोई भी व्यविX का+ू++ इसे हासिसल + कर सक े, अर्थीवा थ्य यह दर्भिश करें विक इसे क े वल उ+ रीकों से हासिसल +हीं विकया Sा सक ा र्थीा सिS+को विवति* अ+ुज्ञा दे ा है।" उपरोX वि+र्ण:य में, न्यायालय क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या विकसी +दी पर कई श ास्जिब्दयों क सस्जिम्मखिल रूप से मत्स्य पाल+ अति*कारों का प्रयोग कर े हुए विव+ष्ट अ+ुदा+ का उप*ारर्णा की Sा सक ी है। हाउस ऑफ लॉड्स: +े बहुम से मा+ा विक विव+ष्ट अ+ुदा+ की कोई उप*ारर्णा इस मामले में उपलब्* +हीं र्थीी, यद्यविप कई इलाकों क े फ्री होल्र्डस:, अवि+तिश्च और अस्जिस्र्थीर व्यविXयों का संघ, विवति* में उतिच अ+ुदा+£ही ा +हीं हो सक े र्थीे।

759. उपरोX वि+र्ण:य कलकत्ता उच्च द्वारा वि+र्ण- असरबुल्ला ब+ाम विकयामट्टुला हाSी चौ*री386 क े मामले में संदर्भिभ विकया गया र्थीा, Sहाँ वादी +े दावा विकया विक स्मरर्णा ी काल से उस गाँव क े वि+वासी अप+े मवेणिशयों को स्व ंत्र ापूव: और विब+ा विकसी रोकर्टोक क े एक विववाविद भूविम पर चराया 385 (1911) ए.सी. 623 386 ए.आई.आर. 1937 कलकत्ता 245 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर े और ब से वे विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा क े आ*ार पर चरागाह क े अति*कार को प्राप्त कर खिलया र्थीा। तिर्डवीS+ बेंच क े न्यायमूर्ति बी. क े. मुखS- इस प्रकार *ारिर विकया: "....यह विक यहां विवति*पूर्ण: उत्पखित्त की उप*ारर्णा की Sा सक ी है, प्रारम्भ में यह स्र्थीाविप कर+े की आवश्यक है विक वै* अ+ुदा+ क े पर्थी में विकसी भी प्रकार की विवति*क वS:+ा +हीं है, और यह विक + क े वल एक सक्षम अ+ुदा+क ा: र्थीा बस्जिल्क एक सक्षम अ+ुदा+£ही ा भी र्थीा सिSसक े पक्ष में अ+ुदा+ विदया Sा सक ा र्थीा। यविद विकसी भी कारर्ण से कोई वै* अ+ुदा+ +हीं विदया Sा सक ा र्थीा ो ऐसे अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं की Sाएगी।"

760. ए+. शंकर+ारायर्ण विपल्लै ब+ाम बोर्ड: ऑफ कविमश्नर फॉर द हिंहदू रिरलीसिSयस ए+र्डोमेंर्ट, मˆास387 क े मामले में प्रवी कौंसिसल एक ऐसे मामले पर विवचार कर रही र्थीी Sहां पर वाद क े पक्षकारों +े दावा विकया विक वे वाद सम्पखित्त क े स्वामी हैं,सिSसमें इ+ाम (विकराया मुX) और रैय वारी अर्थीवा अया+ (वि+*ा:रिर ) दो+ों रह की भूविम शाविमल र्थीीं और उसक े एक विहस्से से प्राप्त आय से विहस्सा मध्यरावित्र कट्टलाई में खच: विकया Sा ा र्थीा सिSसका वि+*ा:रर्ण मˆास स्जिस्र्थी श्री पापा+ासम मंविदर कर ा र्थीा। न्यायालय क े समक्ष प्रश्न यह र्थीा विक क्या वाद सम्पखित्त पूरी रह से *म:दाय क े खिलए र्थीी अर्थीवा क्या दा+ क े पक्ष में संपखित्तयों की आय पर क े वल एक भार र्थीा। न्यायालय +े पाया विक यह *म:दाय क+ा:र्टक क े राSाओं +े विकया र्थीा + विक अपीलक ा:ओं क े पूव:Sों +े, Sो इस *म:दाय क े प्रबं*क अर्थीवा पय:वेक्षक मात्र र्थीे। ये संपखित्तयां और इससे हो+े वाली आय पूरी रह से मंविदर को समर्मिप र्थीी, 387 ए.आई.आर. 1948 पी.सी. 25 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और मुख्य रूप से मध्यरावित्र सेवाओं क े खिलए, और अति*शेष आय में अपीलक ा:ओं क े पास कोई लाभकारी विह +हीं र्थीा। *म:दाय की वास् विवक प्रक ृ ति का वि+*ा:रर्ण कर+े क े उद्देश्य क े खिलए दस् ावेSी साक्ष्य पर चचा: कर न्यायमूर्ति एम.आर. Sयकर +े इस प्रकार *ारिर विकया: "चूंविक *म:दाय की प्रक ृ ति या श Â पर प्रकाश फ ें क+े वाला कोई दस् ावेS अर्थीवा विवलेख अर्थीवा या अ+ुदा+ +हीं र्थीा इसखिलए *म:दाय की वास् विवक प्रक ृ ति क्या है, इसको वि+*ा:रिर कर+े क े खिलए अन्य दस् ावेSी साक्ष्यों को अवलम्ब ले+े में उच्च न्यायालय क े न्यायमूर्ति की राय ठीक र्थीी । इस रह क े दस् ावेSी साक्ष्य में, अन्य बा ों क े सार्थी, इ+ाम-रसिSस्र्टर, स्वत्व विवलेख, सव†क्षर्ण और बंदोबस् रसिSस्र्टर में दS: बया+, पत्रा एवं प्रशग *म:दाय क े संबं* में विवणिभन्न राSस्व अति*कारिरयों का अप+े अ*ी+स्र्थीों क े विदया गया आदेश शाविमल र्थीा।..... व:मा+ मामले में ऐसी कोई व्यवस्र्थीा साक्ष्य में +हीं है सिSसक े सार्थी अपीलक ा:ओं क े परिरवार क े कब्Sे या भोग को शुरू विकया Sा सक ा है। एकमात्र उसिल्लखिख करार परिरवार क े मध्य एक समझौ ा है सिSसका *म:दाय से कोई संबं* +हीं है।" विप्रवी काउंसिसल +े चोकलिंलगम विपल्लई क े मामले में पारिर वि+र्ण:य का संदर्भिभ कर वास् विवक साक्ष्य क े अस्जिस् त्व की अ+ुपस्जिस्र्थीति से Sुड़े मामलों में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां की प्रयोज्य ा पर चचा: की। न्यायालय +े वि+म्+ा+ुसार *ारिर विकया: "....सिS+ अन्य मामलों का अवलम्ब खिलया गया वह मोहम्मद मSफल अल मु्सावी ब+ा+ Sबीदा खा ू+ (ए.आई.आर. पी.सी. 103) का मामला र्थीा Sहां पर लम्बे समय से और शास्जिन् पूर्ण: सम्पखित्त क े भोग क े समर्थी:+ में विवति*पूर्ण: उद्गम की उप*ारर्णा संबं*ी विवति* की पुविष्ट हो गयी चूंविक इसकी व्यख्या लार्ड: बकमास्र्टर द्वारा पूव: मामले, चोकलिंलगम mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विपल्लई ब+ाम मयांर्डी चेविट्टयार आई.एल.आर. 19 मˆास 485 क े मामले में की गयी र्थीी।...... लेविक+ इसकी व्याख्या उसी मामले में की गयी र्थीी विक यह वि+यम वहां लागू हो ा है Sहा पर वास् विवक साक्ष्य + उपलब्* + हो या पक्षाकार उसको प्रस् ु कर+े में असफल रहे। अ+ुमा+, यह कहा गया र्थीा, क ु छ वै* शीष:क में एक मूल की, Sो अदाल ों +े अक्सर आसा+ी से लंबे समय क और चुपचाप आ+ंद ले+े वाले अति*कार का समर्थी:+ कर+े क े खिलए ब+ाया है, Sहां शीष:क का कोई वास् विवक प्रमार्ण आगामी +हीं है, और वि+यम का सहारा ले+ा होगा वास् विवक साक्ष्य की विवफल ा क े कारर्ण। व:मा+ मामले में, Sहां अ+ुदा+ की प्रक ृ ति, *म:दाय का उद्देश्य और उपयोगक ा: और भोग का दावा कर+े वाले व्यविXयों की क्षम ा से Sुड़े हुए सं ोषS+क और पया:प्त साक्ष्य मौSूद हों वहां इस वि+यम की उपयोविग ा +हीं हो सक ी है।"

761. लक्ष्मी*र विमश्रा ब+ाम रंगलाल388 क े मामले में विप्रवी काउंसिसल क े उत्तरव - वि+र्ण:य में, £ामीर्णों की ओर से प्रति वि+ति* क्षम ा में अपीलक ा:ओं +े स्मरर्णा ी काल से कब्रस् ा+ क े रूप में भूविम क े एक र्टुकड़े कादावा विकया। दूसरी ओर प्रति वादी +े वि+Sी उद्योग क े प्रायोS+ क े खिलए भूविम का दावा विकया। प्रर्थीम अपील में अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश +े कहा विक भूविम का आरक्षर्ण एक समप:र्ण अर्थीवा मका+ माखिलक द्वारा अ+ुदा+ है। उच्च न्यायालय +े दूसरी अपील में अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश क े इस वि+र्ण:य को इस आ*ार पर अपास् विकया विक कोई विवति*मान्य अ+ुदा+ विवद्यमा+ +हीं है और अपीलार्थी- क े वाद को खारिरS कर विदया है। अपील में विप्रवी काउंसिसल +े यह अणिभवि+*ा:रिर विकया विक क्या भूविम का उपयोग अंति म संस्कार क े खिलए विकया Sा रहा र्थीा, यह थ्य और विवति* का विमणिश्र प्रश्न र्थीा और अपीलार्थी- का यह दावा है विक विववाविद संपखित्त गाँव की श्मशा+ भूविम र्थीी Sो प्रर्थीाग र्थीी। अ ः *ारिर विकया गया विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां की कोई प्रयोज्य ा +हीं है। विव+ष्ट 388 ए.आई.आर. 1950 पी.सी. 56 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ+ुदा+ क े सिसद्धां की प्रयोज्य ा क े बारे में ब ा े हुए, लॉर्ड: रेर्डविक्लफ +े इस प्रकार *ारिर विकया: ".... यह अवि+वाय: रूप से विववाविद क्षेत्र में £ामीर्णों क े अति*कारों को स्र्थीाविप कर+े वाला एक वाद है। विकसी +े भी आम S+ ा क े अति*कारों क े अ*ी+ भूविम का दावा विकया अर्थीवा इसक े बारे में बोला और + ही वास् व में विकसी विवशेष गांव में श्मशा+ घार्ट पर लागू ऐसी *ारर्णा को अर्थी: दे+ा आसा+ होगा। लेविक+ समप:र्ण क े वल अं£ेSी विवति* में विदया गया है, Sो विक विमट्टी क े माखिलक द्वारा S+ ा क े उपयोग क े खिलए विदए गए अप्रति संहृ लाइसेंस क े बराबर है। S+ ा क े सीविम वग: Sैसे विक विकसी गांव क े वि+वासी को भूविम क े विकसी भाग का समप:र्ण एक ऐसा दावा है Sो विवति* में अज्ञा है, और ऐसे विवशेष उपयोगक ा: क सीविम साक्ष्य समप:र्ण समप:र्ण क े वि+ष्कष: उतिच +हीं ठहराएंगे। (देखेंः पूले ब+ाम हसहिंकस+, विहल्र्ड्रेर्थी ब+ाम एर्डमस+ और बेरमंर्ड आई ब+ाम ब्राउ+।) भूविम को बां*+े वाले एक *मा:र्थी: र्ट्रस्र्ट क े वि+मा:र्ण से काफी हद क समा+ परिरर्णाम प्राप्त हो सक ा है, लेविक+ यह समप:र्ण +हीं है, और + ही यह यहां प्रश्नग है। सु+वाई क े विकसी भी स् र पर इस दावे का कोई रिरकॉर्ड: +हीं है विक £ाम समाS +े अप+े वि+वासिसयों में से कु छ वगÂ क े खिलए एक र्ट्रस्र्ट का प्रशास+ कर+े वाले वि+गम का गठ+ विकया हो, और + ही इस रह का कोई क: मा++ीय लॉर्ड:णिशप क े समक्ष उठाया गया।" यह सिसद्धां स्वत्व को शक्य ब+ा+े क े खिलए उत्पन्न हुआ है Sो तिचरभोगाति*कार द्वारा प्रदा+ विकया Sाएगा बSाय स्मर्णा: ी काल से प्रयोग कर+े की असंभाव्य ा क े । इंखिग्लश कॉमल लॉ क े अ+ुसार तिचरभोगाति*कार स्मर्णा: ी काल, अणिभसमय द्वारा, वष: 1189 में शुरू हुआ, मा+ा Sा ा है। यविद यह प्रदर्भिश कर+ा संभव हो ा विक प्र+ग उपयोगक ा:, भले ही प्राची+ है, Sो 1189 से उद्भू हुआ विफर भी स्मर्णा: ी उपयोगक ा: का तिचरभोगाति*कार द्वारा स्वत्व का साक्ष्य असफल हुआ। इस कविठ+ाई को दूर कर+े क े खिलए न्याया*ीशों +े Sूरी को यह प ा लगा+े क े खिलए अ+ुमति प्रदा+ की और प्रोत्साविह भी विकया,प्रश्नग अति*कार भले ही 1189 से पहले क े हों, उस ारीख से विव+ष्ट अ+ुदा+ में उत्पन्न हुए। इस प्रकार इस अति*कार +े आवश्यक विवति*क सूत्र प्राप्त कर खिलया। लेविक+ ऐसा अति*कार बस सिS +ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सुखाति*कार क े रुप में, एक संपखित्त क े सार्थी संलग्न विकया Sा+ा र्थीा: इसक े अति रिरX क्योंविक यह अ+ुदा+ में उत्पन्न हुआ, इसखिलए इसक े माखिलक, चाहे वहीं हो अर्थीवां चाहे न्यायगम+ क े द्वारा माखिलक ब+े होंऐसे व्यविX हो+े चाविहए Sो अं£ेSी विवति* क े ह अ+ुदा+£ही ा क े रूप में सक्षम र्थीे। समय-समय पर एक गाँव क े वि+वासिसयों द्वारा प्रयोग विकया Sा+े वाला कोई अति*कार + ो भूविम में विकसी भी संपखित्त से Sुड़ा हो ा है और + ही यह ऐसा अति*कार है Sो अ+ुदा+ का विवषयवस् ु ब+ाया Sा सक ा है। कोई £ाह्य अ+ुदा+£ी ा +हीं हैं। वास् व में, विव+ष्ट अ+ुदा+ का यह सिसद्धां में इस रह क े अति*कारों क े खिलए प्रयोग +हीं हो ा है Sैसा Sो विकसी विवशेष परिरक्षेत्र क े वि+वासिसयों भूविम का। (प्रभाव वर्ति* )

762. राSा ब्रSा सुंदर देब ब+ाम मो+ी बेहरा389 क े मामले में इस अदाल क े ी+ SSों की बेंच क े फ ै सले में, यह दावा विकया गया र्थीा विक प्रमुख प्रति वादी और उ+क े पूव:S लंबे समय से एक वि+तिश्च वार्मिषक विकराये पर वि+बा:* रूप से मत्स्य पाल+ का काय: कर रहे र्थीे और वह भूविम उ+क े वास् विवक कब्Sे में र्थीी और उन्हों+े यह अति*कार सभी संभव रीकों Sैसे विक अ+ुदा+, प्रर्थीा, प्रति क ू ल कब्Sे और सुखाति*कार द्वारा अर्जिS कर खिलया र्थीा। वादी की रफ से +ौ गांवों क े अन्य मछ ु आरों की ओर से इस आ*ार पर व्यादेश Sारी कर+े हे ु एक वाद लाया विक चूंविक वे मत्स्य पाल+ का माखिलका+ा हक रख े हैं अ ः वे मत्स्य पालक क े अ+न्य माखिलक हैं और प्रति वादी वादी क े भोग क े अति*कार में हस् क्षेप कर +ुकसा+ पहुंचा रहे र्थीे। विवचारर्ण न्यायालय +े वादी क े पक्ष में एक तिर्डक्री पारिर की सिSसे बाद में उच्च न्यायालय द्वारा अपील में संशोति* विकया गया र्थीा, Sहां यह अणिभवि+र्ण- विकया गया विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े आ*ार पर प्रति वाविदयों क े पास विकरायेदार क े ौर पर क े वल विहल्सा 389 ए.आई.आर. 1951 एस.सी. 247 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मौसम मे ालाब में मछली पकड़+े क े विवशेष अति*कार र्थीे। उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य को पलर्टकर त्काली+ न्यायमूर्ति मेहर चंद महाS+ खंर्डपीठ क े खिलए बोल े हुए वि+म्+ा+ुसार *ारिर विकया: "12....... हमें उच्च न्यायालय क े इस दृविष्टकोर्ण को ब+ाए रख+ा मुस्जिश्कल पा े है विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े ह विववाविद मत्स्य पाल+ भूविम प्रति वाविदयों क े कब्Sे में र्थीी। विव+ष्ट अ+ुदा+ क े ह । विवशेष स्र्थीा+ीय क्षेत्र क े वि+वासिसयों क े मामले में यह सिसद्धां +हीं लागू हो ा है सिSसमें ह वे Sो भूविम या पा+ी क े ख°ड़ पर उपयोगक ा: क े अति*कार को स्र्थीाविप कर+ा चाह े हैं। Sैसा विक लक्ष्मी*र विमश्रा ब+ाम रंगलाल AIR 1950 PC 56 क े मामले में लॉर्ड: रेर्डविक्लफ +े उल्लेख विकया है विक विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां को एक क+ीकी उपकरर्ण क े रूप में उत्पन्न विकया गया है ाविक स्मर्णा: ी उपयोगक ा: को साविब कर+े की असंभव ा क े बावSूद तिचरभोगाति*कार द्वारास्वत्व प्रदा+ विकया Sा सक े और चूंविक यह अ+ुदा+ में उत्पन्न हुआ र्थीा इसखिलए इसक े माखिलक, चाहे मूल या भूविम हस् ां रर्ण से ब+े हों ऐसे व्यविX हो+े चाविहए Sो अ+ुदा+ प्राप्त कर सक े र्थीे, और यह विक विकसी गाँव क े वि+वासिसयों द्वारा समय-समय पर Sो अति*कार प्रयोग विकया Sा रहा र्थीा वह + ो विकसी भूविम में विकसी भी संपखित्त से Sुड़ा हुआ है और + ही यह ऐसा अति*कार है Sो अ+ुदा+ का विवषयक हो सक ा है, इसखिलए वहां पर को स्वीकाय: अ+ुदा+£ही ा +हीं है।" कोई स्वीकाय: अ+ुदा+£ी ा +हीं है। इस संबं* में कलकत्ता उच्च न्यायालय क े खंर्डपीठ द्वारा पारिर वि+र्ण:य आश्रबुल्ला ब+ाम कलकत्ता उच्च न्यायालय AIR 1937 Cal 245 का संदभ: विदया Sा सक ा है, सिSसमें इस विवषय पर विवति* की विवस् ार से Sांच की गई है। उस मामले में यह सवाल उठा विक £ामीर्णों +े सिSस चारागाह संबं*ी अति*कार का दावा विकया र्थीा वह अणिभयविX या विववतिक्ष अ+ुदा+ से विमल सक ा र्थीा। कई अं£ेSी और भार ीय प्रकरर्णों की Sांच क े उपरान् यह मा+ा गया विक कोई कोई विव+ष्ट अ+ुदा+ को अस्जिस्र्थीर और अवि+तिश्च गांव क े वि+वासिसयों क े पक्ष में +हीं मा+ा Sा सक ा है और इस रह क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति*कार को क े वल प्रर्थीा द्वारा प्राप्त विकया Sा सक ा है। इस मामले में प्रति वादीगर्ण अवि+तिश्च व्यविXयों का एक वि+काय है और उ+की संख्या प्रत्येक Sन्म अर्थीवा मृत्यु द्वारा अर्थीवा मछ ु आरों क े इ+ गांवों से आ+े और Sा+े से बढ़ अर्थीवा घर्ट Sा ी है। (प्रभाव वर्ति* )

763. हॉल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड क े अ+ुसार: "यह उप*ारर्णा का क े वल साक्ष्य द्वारा खंतिर्ड विकया Sा सक ा हैविक ऐसे अ+ुदा+ का अस्जिस् त्व असंभव है; ऐसे साक्ष्य से कम क ु छ भी पया:प्त +हीं होगा और न्याया*ीश क े वल इसखिलए अ+ुदा+ की उप*ारर्णा कर+े का अति*कारी +हीं है क्योंविक उ+को आश्वस् विकया गया है विक वह वास् व में कभी मंSूर +हीं विकया गया र्थीा।"390 बु*ू सत्य+ारायर्ण ब+ाम कोंर्डुरु वेंकर्टपय्या391 क े प्रकरर्ण में इस न्यायालय की दो SSों की बेंच +े कति पय अचल संपखित्तयों क े कब्Sे का प्रति उद्धरर्ण क े वाद से उत्पन्न अपील पर सु+वाई की। प्रति वाविदयों क े वि+ष्कास+ क े खिलए सरकार द्वारा वि+युX काय:कारी अति*कारी द्वारा इस आरोप पर एक वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा विक संपखित्त मंविदर की र्थीी सिSसे 1770 ई. में एक Sमींदार द्वारा विदया गया र्थीा। यह क: विदया गया र्थीा विक प्रति वादी अच:क हो+े क े +ा े कब्Sे में र्थीे और गल रीक े से संपखित्तयों को अप+े हो+े का दावा कर रहे र्थीे। मंविदर क े काय:कारी अति*कारी क े रूप में वादी की वाद संपखित्तयों पर कब्Sा कर+े क े खिलए प्रति वाविदयों को +ोविर्टस देकर वाद संस्जिस्र्थी विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय +े अ*ी+स्र्थी न्याया*ीश क े आदेश को बरकरार 390 हल्सबरी लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, भाग 14, चौर्थीा संस्करर्ण, प्रस् र 90 391 ए.आई.आर. 1953 एस.सी.195 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रखा। प्रति वाविदयों की ओर से, इस न्यायालय क े समक्ष यह क: विदया गया र्थीा विक, प्रति वादीगर्ण और उ+क े पूव:वर्ति यों प्राची+ समय से संपखित्तयों पर कब्Sा में है इसखिलए विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् क े आ*ार पर वै* स्वत्व की वै* उप*ारर्णा की Sा+ी चाविहए। खंर्डपीठ की ओर से बोल े हुए न्यायमूर्ति एस.आर. दास +े इस क: को खारिरS कर वि+म्+ा+ुसार *ारिर विकया विकया: "2. प्रति*कारिरयों को कोई संदेह +हीं है, विक वै* स्वत्व कीउत्पखित्त की उप*ारर्णा क ु छ वि+तिश्च परिरस्जिस्र्थीति यों में लंबे समय क और शास्जिन् पूव:क कब्Sे से संवंति* अति*कारों को समर्थी:+ कर+े क े खिलए विकया Sा सक ा है Sहां पर स्वत्व का कोई वास् विवक प्रमार्ण +हीं विदया Sा सक ा है। लेविक+ यह समा+ रूप सुस्र्थीाविप है विक वहां पर उप*ारर्णा +हीं विकया Sा सक ा Sहां पर अ+ुदा+ की प्रक ृ ति और सिS+को अ+ुदा+ विदया गया र्थीा उससे संबंति* साक्ष्य पया:प्त सबू और सं ोषS+क हो। यह सच है विक मूल अ+ुदा+ सुलभ +हीं है, लेविक+ Sैसे हम साक्ष्यों पर +Sर ड़ाल े हैं हमें दो दस् ावेS विमल े हैं Sो स्वत्व क े प्रश्न पर वि+र्णा:यक प्र ी हो े हैं। यह प्र ी होगा विक + ो इ+ाम रसिSस्र्टर प्रदश: पी -3 और + ही बया+ प्रदश: र्डी-3 में अ+ुदा+£ही ा क े रूप में अचा:क का अर्थीवा कोई भी कम से कम विह, व्यविXग या अन्यर्थीा, इ+ाम अ+ुदा+ क े विवषय- वस् ु में कोई उल्लेख है। दो+ों प्रदश: पूर्ण:रूपेर्ण इंविग कर े हैं विक इ+ाम का अ+ुदा+ अ+ुदा+क ा: द्वारा मंविदरक े पक्ष में विकया गया र्थीा और अ+ुदा+ की प्रक ृ ति क े संबं* में इस वि+तिश्च साक्ष्य क े मौSूदगी क े कारर्ण अच:क क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं की Sा सक ी है। अच:क इसखिलए, हम उच्च न्यायालय से सहम हैं और *ारिर कर े हैं विक देव ा अ+ुदा+£ही ा र्थीे और हमारे साम+े उठाए गए पहले प्रश्न का उत्तर अपीलक ा:ओं क े विवरूद्ध विदया Sा+ा चाविहए।" [देखेंः सी. पेरीस्वामी गौंर्डर ब+ाम सुंदरेश्या अय्यर 392 ] 392 ए.आई.आर. 1965 एस.सी. 516 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

764. म+ोहर दास मोहं ा ब+ाम चारू चंˆ पाल क े मामले में इस अदाल की एक संविव*ा+ पीठ को अपीलक ा:ओं Sो विक एक *ार्मिमक संस्र्थीा क े महं र्थीा उसक े द्वारा दायर प्रति वाविदयों क े विवरूद्ध भूविम क े विवणिभन्न भूखंर्डों क े कब्Sे की प्रत्युद्धरर्ण क े वाद पर विवचार कर+ा र्थीा। दूसरा, अपीलक ा: +े उतिच और न्यायसंग विकराए क े मूल्यांक+ की मांग की। प्रति वाविदयों +े प्रति वाद कर अणिभवच+ विकया विक विववाविद भूविम Sमींदारी का विहस्सा +हीं र्थीी, लेविक+ स्र्थीायी बंदोबस् से बहु पहले उ+क े पूव:व - स्वत्व*ारिरयों क े पक्ष में अ+ुदा+ विकया गया र्थीा और Sमींदारी क े ह मांग कर+े वाले + ही बद:मा+ क े महाराSा और + ही वादी का स्वत्व र्थीा। सिSला न्यायालय +े मुंसिसफ क े फ ै सले को बरकरार रखा और *ारिर विक प्रति वादीगर्ण और पूव:व - बहु लंबे समय से विकराए का भुग ा+ क े विब+ा कब्Sे में र्थीे और विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा उ+क े पक्ष में की Sा सक ी र्थीी। उच्च न्यायालय +े सिSला न्यायालय क े फ ै सले क े खिखलाफ अपील खारिरS कर दी। इस न्यायालय क े समक्ष मुद्दा यह र्थीा विक क्या रिरकॉर्ड: पर मौSूद सामवि£यों क े आ*ार पर वि+चली अदाल ों +े प्रति वाविदयों क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ की सही उप*ारर्णा की र्थीी। इस न्यायालय +े *ारिर विकया विक प्रति वाविदयों क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ का कोई उप*ारर्णा +हीं की Sा सक ी है, और Sो सिSस भूविम पर वादी का कब्Sा है वह उसका उतिच और न्यायसंग विकराए क े आंकल+ कर+े का अति*कारी र्थीा। खंर्डपीठ की ओर बोल े हुए, न्यायमूर्ति र्टी. एल. वेंकर्टरामा अय्यर +े वि+म्+खिलखिख श Â में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां की प्रयोज्य ा की व्याख्या की: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "7. सिS+ परिरस्जिस्र्थीति यों और श Â क े ह विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा की Sा सक ी र्थीी वह सुस्र्थीाविप है। Sब ऐसा पाया गया विक कोई व्यविX विब+ा विकसी विवरो* क े लम्बे समय से विकसी भूविम पर कब्Sे में र्थीा और उसका शास्जिन् पूर्ण: उपभोग कर रहा र्थीा, ो इंग्लैंर्ड में अदाल ें इस रह क े कब्Sे को विवति*क उत्पखित्त का श्रेय दीं, और Sब थ्यों से यह प ा चल ा हो विक तिचरभोगाति*कार द्वारा स्वत्व पोषर्णीय +हीं हो सक ा र्थीा ब यह *ारिर विकया विक ऐसी उप*ारर्णा की Sा सक ी र्थीी विक भूविम क े हकदार माखिलक द्वारा विकये गये अ+ुदा+ क े संबं* में कब्Sे का उल्लेख विकया गया, लेविक+ यह विक इस रह क े अ+ुदा+ को विव+ष्ट हो चुका र्थीा। यह उप*ारर्णा प्राची+ और स कब्Sे को प्राप्त कर+े क े खिलए की गयी र्थीी, Sो अन्यर्थीा युविXयुX रूप से +हीं की Sा सक ी र्थीी। लेविक+ यह विवति* की एक वि+श्चायक उप*ारर्णा +हीं र्थीी, और यविद थ्य और साक्ष्य इसक े विवरूद्ध हो े ो अदाल ें ऐसी उप*ारर्णा कर+े क े खिलए बाध्य + हो ीं। विकसी न्याया*ीश का यह क:व्य +हीं हो सक ा विक वह ऐसे अ+ुदा+ की उप*ारर्णा करे सिSसका अस्जिस् त्व +हीं है भले ही उसक े बारे में वह आश्वस् है। यह अवलोक+ अर्ट+- S+रल ब+ाम सिसम्पस+ (1901)2 सी.एच.र्डीय 671,698 क े मामले में न्यायमूर्ति फाव†ल +े विकया। यविद ऐसा कर+े में कोई विवति*क बा*ा हो ी ो भी यह उप*ारर्णा +हीं की Sा ी। इस प्रकार, यह *ारिर विकया गया है विक यविद कोई व्यविX इस रह क े अ+ुदा+ को £हर्ण कर+े में सक्षम + हो ा ो इसे + विदया Sा ा क्योंविक वहां पर अवि+तिश्च व्यविXयों क े समूह द्वारा ऐसे अति*कार की मांग की गयी है।यह राSा ब्रS सुंदर देब ब+ाम मो+ी बेहरा 1951 एस.सी.आर. 431,446 में अणिभवि+र्ण- विकया गया र्थीा। यविद कोई व्यविX अ+ुदा+ दे+े में सक्षम + हो ा ो हीं है इस रह इस अ+ुमा+ क े खिलए कोई गुंSाइश + हो ी:(वाइर्ड हैल्सबरीS लॉ ऑफ इंग्लैंर्ड, खंर्ड. IV, पृष्ठ 574, प्रस् र 1074); अर्थीवा यविद अ+ुदा+ अवै* और अ+ुदा+क ा: की शविXयों से परे हो ा। (वाइर्ड बाक: र ब+ाम रिरचर्ड:स+ 4 बी एंर्ड एल्र्ड 579: 106 ई.आर. 1048 1049 और रोचर्डेल क ै +ाल क ं प+ी ब+ाम रेर्डविक्लफ 18 क्यू.बी. 287: 118 ई.आर. 108 एर्ट 118)।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

765. क ुं र्डा लक्ष्मर्ण बापूSी ब+ाम आन्ध्र प्रदेश सरकार 394 क े मामले में, प्रति वादी +े दावा विक विववाविद भूविम को पहले मXा भूविम क े रूप में और बाद में इ+ाम भूविम क े रूप में विदखाया गया र्थीा। अपीलक ा: +े उX मXा क े उत्तराति*कारिरयों में से वि+*ा:रिर ी हो+े का दावा विकया और 1958 में वह Sमी+ पर दाखिखल हो गया र्थीा और उस पर एक इमार ब+ा ली। यह क: विदया गया र्थीा विक विव+ष्ट अ+ुदा+ का सिसद्धां लागू होगा क्योंविक अपीलक ा: स्वत्व क े ह लंबे समय क विववाविद भूविम पर काविबS रहा है। प्रति वादी +े यह आरोप लगाया गया र्थीा विक अपीलक ा: का दावा वै* +हीं र्थीा क्योंविक भूविम कभी भी उX मXा से संबंति* +हीं र्थीी; हालांविक यह उX ति णिर्थी से सरकार में वि+विह हो गयी और कलेक्र्टर क े आदेश सिSसमें उन्हो+े अति*कारों क े रिरकॉर्ड: में प्रविवविष्टयों को सही विकया र्थीा, वह अंति म हो चुका र्थीा। इस न्यायालय की एक दो न्याया*ीशों वाली पीठ +े विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां क े दावे को खारिरS कर म+ोहर दास मोहं ा क े वि+र्ण:य का उल्लेख विकया और *ारिर विकया विक विव+ष्ट अ+ुदा+ का उप*ारर्णा का लाभ अपीलक ा: को +हीं विमलेगा, सिSस+े 1954 से उस समय क े ई+ामदार (मXदार) द्वारा एक अपंSीक ृ स्र्थीायी पट्टा क े ह अप+े कब्Sे का प ा लगाया र्थीा।

766. ब्रS विकशोर Sगदेव ब+ाम लिंलगराS सामं 395 क े मामले में मामले में इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की पीठ +े लोक *ार्मिमक संस्र्थीा क े वंशा+ुग न्यासी हो+े क े प्रत्यर्थी- क े दावे पर विवचार विकया Sो इस क: पर आ*ारिर विकया विक उसक े पूव:Sों को उस *ार्मिमक संस्र्थीा क े कायÂ का प्रबं* 394 (2002) 3 एस.सी.सी. 258 395 (2002) 6 एस.सी.सी. 540 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सौंपा गया र्थीा सिSसे बहु पहले विकसी अज्ञा संस्र्थीापक द्वारा स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। प्रति वादी +े यह क: विदया विक उ+का परिरवार विब+ा विकसी रुकावर्ट क े सेवा और पूSा कर रहा र्थीा, Sैसा विक मारफ दार र मारफदर का काया:लय वंशा+ुग रूप से कर रहे र्थीे और यह प्रर्थीा विववि+यविम र्थीा। अपीलक ा:ओं +े प्रति वादी क े दावे का प्रति वाद विकया और सहायक आयुX +े प्रति वादी क े दावे को खारिरS कर विदया। र्थीाविप, उच्च न्यायालय +े अपील में प्रत्यर्थी- क े दावे को मंSूर विकया और विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धां क े आ*ार पर उन्हें वंशा+ुग न्यासी अणिभवि+र्ण- विकया। न्यायमूर्ति एस. राSेन्ˆ बाबू +े उच्च न्यायालय क े विववि+श्चय को अपास् कर इस प्रकार अणिभवि+र्ण- विकया: "6. उच्च न्यायलय +े सिSस अन्य आ*ार अप+ा वि+र्ण:य विदया वह यह है विक वंशा+ुग न्यासी की परिरभाषा क े विहसाब से वि+मा:र्णक ा: क े समय से उ+क े वंशा+ुग न्यासी हो+े की विवति*क आवश्यक ा समय क े ग: में खो गयी है न्यायालय क े खिलए इसक े अति प्राची+ प्रयोग से अ+ुदा+ का अर्थी: लगा+े का विवकल्प खुला है लेविक+ इसका अर्थी: अ+ुमा+ +हीं लगाया Sाएगा यविद उपयोगक ा: को इससे अन्यर्थीा समझाया Sा सक े । विव+ष्ट अ+ुदा+ की कल्प+ा लंबे कब्Sे और स्वामी की सहमति से उपयोगक ा: क े सुखाति*कार क े प्रयोग की उप*ारर्णा मात्र है. यह विक दावा कर+े वाले को मूल रूप से एक अ+ुदा+ हुआ हो+ा चाविहए र्थीा Sो विक विव+ष्ट हो चुका है। ऐसे व्यविX क े पक्ष में विव+ष्ट अ+ुदा+ की उप*ारर्णा +हीं हो सक ी है Sो उत्तराति*कार क े अन् ग: न्यासी हो। हमें +हीं लग ा विक अणिभलेख में उपलब्* सामा£ी क े आ*ार पर ऐसा कोई हस् क्षेप (अऩुमा+) संभव है। प्रर्थीम ः न्यायालय क े समक्ष यह क: विदया गया है विक देव ा एक वि+Sी न्यास है और अति*वि+यम क े अन् ग: +हीं आ ा, उस संबं* में असफल हो+े पर अब वे इस थ्य पर आ+ा चाह े हैं विक वे वंशा+ुग न्यासी है। इसे स्र्थीाविप कर+े में विकसी प्रकार का साक्ष्य + दे पाकर वे दय+ीय रूप से असफल रहे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

767. इस विवषय पर पूव:व - क े विवश्लेषर्ण से वि+म्+खिलखिख सिसद्धां समाप्त विकए Sा सक े हैंः  विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् से साक्ष्य का वि+यम वि+कल ा है। समय बी Sा+े क े कारर्ण साक्ष्य क े आभाव में प्राची+ काल में विकये गये वै* अ+ुदा+ क े अस्जिस् त्व को साविब कर+े क े खिलए यह सिसद्धान् लागू हो ा है। र्थीाविप Sहां पर कब्Sे को साविब कर+े क े खिलए पया:प्त और सं ोषS+क साक्ष्य मौSूद हों अर्थीवा भूविम क े दावा सिSस मामले में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा + होगी वहां पर न्यायलय यह उप*ारर्णा कर+े क े खिलए बाध्य +हीं है।  Sहां पर न्यायालय क े खिलए उ+ परिरस्जिस्र्थीति यों को वि+तिश्च कर+ा असंभव हो सिS+ परिरस्जिस्र्थीति यों क े ह अ+ुदा+ विदया गया र्थीा वहां पर अ+ुसेवी स्वामी द्वारा कब्Sे*ारी अर्थीवा प्रयोगक ा: को विदये गये वै* और सकारात्मक अ+ुदा+ क े अस्जिस् त्व क े विवषय में उप*ारर्णा की Sा ी है। अ+ुदा+ अणिभव्यX अर्थीवा विववतिक्ष हो सक ा है। एक बार उप*ारर्णा कर ले+े क े उपरान्, न्यायालय यर्थीासंभव, उ+ लोगों क े कब्Sे को सुरतिक्ष करेगा Sो शास्जिन् पूर्ण:क कब्Sे को *ारर्ण विकये हैं।  विवति*पूर्ण: उप*ारर्णा कर+े क े खिलए कोई विवति*क रुकावर्टें +हीं हैं। इस सिसद्धान् की प्रायोज्य ा क े खिलए यह स्र्थीाविप कर+े की आवश्यक ा है विक शुरुआ में सिSस समय अ+ुदा+ विकया गया र्थीा उस समय वह + क े वल वै* अ+ुदा+ र्थीा अविप ु अ+ुदा+£ही ा सिSसक े पक्ष में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ+ुदा+ विकया गया र्थीा वह भी सक्षम र्थीा। परिरभाविष अ+ुदा+£ीह ा क े आभाव में विव+ष्ट अऩुदा+ की उप*ारर्णा +हीं की Sाएगी।  विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा क े खिलए लम्बे समय से, वि+बा:* और शास्जिन् पूर्ण: अकाय अति*कार का भोग हो+ा चाविहए। वि+बा:* भोग क े अन् ग: स उपभोग अर्थीवा कब्Sा आ ा है।  उपभोग और कब्Sे की आपेतिक्ष समयावति* परिरव:+शील है और मामला दर मामला वि+*ा:रिर की Sा+ी चाविहए; और  लम्बे से चली आ रही रूविढ़ एवं प्रर्थीा क े चल े अति*कारों का दावा एवं विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् क े मध्य अन् र विकया Sा+ा चाविहए। विवश्लेषर्ण

768. प्रस् ु मामले में, वाद 4 क े वादीगर्ण 1528 में मुस्जिस्लमों क े इबाद क े खिलए बाबर द्वारा वि+र्मिम मस्जिस्Sद क े समप:र्ण क े आ*ार पर और इसक े विवकल्प में प्रति क ू ल कब्Sे क े आ*ार पर यविद यह स्र्थीाविप विकया Sा ा है विक हिंहदू मंविदर की Sगह पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, घोषर्णा का दावा स्र्थीाविप विकया है। विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा को समर्थी:+ कर+े क े खिलए वादीगर्णों +े कोई अणिभवच+ +हीं विकया है। वादीगर्ण का विवणिशष्ट मामला मुस्जिस्लमों द्वारा साव:Sवि+क इबाद क े खिलए मस्जिस्Sद क े समप:र्ण का है। इसका मूल्यांक+ उ+ साक्ष्यों क े आ*ार पर विकया Sा+ा चाविहए सिSन्हें Sोड़ा गया है। वास् व में प्रति क ू ल कब्Sे की वैकस्जिल्पक दलील साक्ष्य क े वि+यम क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रूप में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्दान् को लागू कर+े क े खिलए एक विव+ाशकारी विवति*क आ*ार है। प्रति क ू ल कब्Sे एक व्यविX में शीष:क क े वि+विह ार्थी: और दूसरे क े लंबे समय क Sारी और वि+बा:* कब्Sे क े अस्जिस् त्व को दशा: ा है, Sो विक वास् विवक शीष:क *ारक क े खिलए शत्रु ापूर्ण: और शत्रु ापूर्ण: रीक े से है। प्रति क ू ल कब्Sे की दलील से प्रति क ू ल कब्Sे की दलील क े रूप में विव+ष्ट अ+ुदा+ क े सिसद्धान् की प्रायोज्य ा क े विवरूद्ध Sो अऩुमा+ वि+क े लगा वह कणिर्थी अ+ुदा+£ही ा क े अलावा विकसी अन्य व्यविX में वि+विह स्वत्व पर आ*ारिर है। वि+विह स्वत्व पर आ*ारिर है। इस न्यायालय और इस सिसद्धान् को साक्ष्य की मान्य ा दे+े वाले विप्रवी कौंसिसल क े वि+र्ण:य यह दर्भिश कर े हैं विक इस सिसद्धान् को साव*ा+ी से लागू विकया Sा+ा चाविहए। कर+े से पहले हिंहदुओं क े ी+ गुम्बदीय ढांचे क े भी र पूSा कर+े की अ+ुमति दे+े पर कोई प्रति बं* +हीं र्थीा। दस् ावेSी साक्ष्यों से यह भी प ा चल ा है विक रेलिंलग की स्र्थीाप+ा वास् व में एक थ्य क े रूप में +हीं की गई र्थीी, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप दो+ों समुदायों क े खिलए अलग-अलग स्र्थीा+ों की पूSा क े स्र्थीा+ क े रूप में पहचा+ की गई आैर आं रिरक और बाहरी आंग+ का पूर्ण: विवभाS+ हुआ। +वंबर 1858 की घर्ट+ा क े ुरं बाद, सिSसमें वि+हंग सिंसह पर आरोप है विक उन्हों+े एक हव+ पूSा का आयोS+ विकया र्थीा और मस्जिस्Sद क े परिरसर में "श्री भगवा+" का एक प्र ीक स्र्थीाविप विकया र्थीा, सिSससे घर्ट+ाओं की एक श्रृंखला शुरू हो ी है, Sो यह दशा: ा है विक हिंहदुओं का बविहष्कार आं रिरक अहा े से + ो स्वीकार विकया गया र्थीा और + ही इसे वास् विवक रूप में लागू विकया गया र्थीा। वि+हंग सिंसह को हर्टा+े का विवरो* हुआ। आखिखरकार विदसंबर 1858 में यह दS: विकया गया विक मस्जिस्Sद से झंर्डा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उखाड़ विदया गया र्थीा और वि+हांग सिंसह को बाहर कर विदया गया र्थीा। +वंबर 1860 में क ु छ ही समय बाद मीर रज्जब अली +े णिशकाय विकया विक कविब्रस् ा+ में एक +ए चबू रे का वि+मा:र्ण हो रहा है। णिशकाय में दS: विकया गया है विक Sब मोअखिज्ज+ क े द्वारा आSा+ की Sा ी है, ो हिंहदू शंख बSा+े लग े हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र *ार्मिमक पूSा क े दावों से भरा र्थीा। उ+ दावों क े अ+ुरूप, समकाली+ ति णिर्थी क े अणिभलेखों से यह स्पष्ट है विक रेलिंलग क े वि+मा:र्ण क े बावSूद आं रिरक अहा े से हिंहदु पूरी रह से बाहर +ही गये। माच: 1861 में मोहम्मद असगर और रज्जब अली बाबरी मस्जिस्Sद क े पास अ+ुमति क े विब+ा एक चबू रा क े वि+मा:र्ण क े खिखलाफ णिशकाय कर+े पहुचें। इस+े सूबेदार को उस व्यविX क े बेदखली की रिरपोर्ट: दे+े क े खिलए प्रेरिर विकया सिSस+े ऐसा विकया है। 1866 में विफर से, मु ावल्ली द्वारा एक +ई कोठरी को ध्वस् कर+े की णिशकाय की गई, सिSसका वि+मा:र्ण मस्जिस्Sद क े दरवाSे क े अंदर मूर्ति यों को रख+े क े खिलए विकया गया र्थीा, Sहां बैराविगयों +े एक चबू रा का वि+मा:र्ण विकया र्थीा। इस आवेद+ पर, उपायुX +े अक्र्टूबर 1866 में इसक े सुपुद:गी को अणिभलेख में दS: विकये Sा+े का एक आदेश पारिर विकया।

778. 1868 में, मुसलमा+ों +े मस्जिस्Sद क े उत्तर पतिश्चमी को+े पर अति क्रमर्ण का आरोप लगाया Sो साविब +हीं हुआ र्थीा। 1870 में, मु वल्ली +े कविब्रस् ा+ से एक फकीर क े खिखलाफ बेदखली का आदेश मांगा और पेड़ों क े चारों ओर क ु छ अति क्रमर्णों की णिशकाय की। अगस् 1871 में एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा, सिSसमें कहा गया र्थीा विक वादी को मस्जिस्Sद क े दरवाSे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े साम+े अहा े में कविब्रस् ा+ पर स्वाविमत्व का कोई अति*कार +हीं र्थीा। 1873 में, चबू रा पर एक मूर्ति रख+े क े संबं* में एक विववाद साम+े आया।

779. अप्रैल 1877 में, उत्तर विदशा की अेार एक +ए गेर्ट क े वि+मा:र्ण क े खिलए उपायुX द्वारा अ+ुमति दे+ा (पूव: विदशा की अेार पहले से मौSूद गेर्ट क े अलावा) विफर से विववाद का कारर्ण ब+ा। उपायुX द्वारा लोगो सुरक्षा की रक्षा क े खिलए एक अति रिरX प्रविवविष्ट का वि+मा:र्ण उतिच ठहराया र्थीा क्योंविक ऐसा प्र ी हो ा है विक भXों की काफी भीड़ र्थीी। मुसलमा+ों की णिशकाय खारिरS कर दी गई और साव:Sवि+क सुरक्षा क े विह में उत्तर की विदशा की अेार एक अति रिरX दरवाSा खोल+े क े वि+र्ण:य को उतिच ठहराया गया।

780. Sब +वंबर 1883 में, मु ावल्ली +े मस्जिस्Sद की दीवार को पेंर्ट कर+े क े अति*कार का दावा विकया, ो सहायक आयुX +े रघुबर दास को परिरसर क े आं रिरक और बाहरी विहस्से में मरम्म कर+े से प्रति बंति* कर े हुए मु ावल्ली को बाहरी दरवाSे को बंद +हीं कर+े का वि+द†श इस आ*ार पर विदया विक मस्जिस्Sद क े पुरा+े मौSूदा आदेशों का अ+ुपाल+ विकया Sा+ा चाविहए। 1858 और 1883 क े बीच विववादों का क्रम इस प्रकार इंविग कर ा है विक रेलिंलग की स्र्थीाप+ा हो+े पर मुतिश्लमों का रेलिंलग क े अन्दर पूSा कर+े की अ+ुमति अैार आं रिरक अहा े से विहन्दुअेां को पूSा कर+े से बेदखल कर+ा वि+रं र विववाद का विवषय र्थीा। मुसलमा+ों +े अप+ी ओर से चबू रे की स्र्थीाप+ा की णिशकाय की र्थीी। हालाँविक, बाहरी अहा े में विहन्दुअेां की गति विवति*यां Sारी रहीं अैार हिंहदू भXों की उपस्जिस्र्थीति का महत्वपूर्ण: सूचक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1877 में एक अति रिरX द्वार खोल+े का र्थीा। Sहां क आं रिरक अहा े का संबं* है, यह स्पष्ट है विक यह हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच संघष: का विवषय र्थीा, मुसलमा+ इसे इबाद का स्र्थील मा+ े र्थीे और हिंहदू समय-समय पर इसे प्रवेश की मांग कर े र्थीे क्योंविक उन्हो+ें उस स्र्थीा+ को रेलिंलग ब++े क े पहले प्राप्त विकया र्थीा। 1934 क े दंगों क े परिरर्णामस्वरूप मस्जिस्Sद की गुम्बद को काफी +ुकसा+ पहुंचा और उ+क े द्वारा हिंहदुओं और बैरागीयों पर Sुमा:+ा लगाया। एक मुसलमा+ ठेक े दार द्वारा विब्रविर्टश सरकार क े पैसों पर मरम्म का काम विकया गया। पेश इमाम क े बकाया वे + से सम्बस्जिन्* दस् ावेSी साक्ष्य का युग्म यह इंविग कर ा है विक मुसलमा+ों द्वारा +माS अदा कर+े क े खिलए एक स्र्थीा+ क े रूप में कोई परिरत्याग +हीं विकया गया र्थीा। यह 1949 क Sारी रहा, हालांविक, वक्फ वि+रिरक्षक +े अप+ी 12 विदसंबर 1949 क े विद+ांविक रिरपोर्ट: में अंविक विकया गया र्थीा, Sो मुसलमा+ मस्जिस्Sद में प्रार्थी:+ा कर+े गए र्थीे, उन्हें बाहरी आहा े में हिंहदुओं द्वारा परेशा+ विकया Sा रहा र्थीा, Sहां उ+में से कई रूक े रह े र्थीे। अं ः 22/23 विदसंबर, 1949 की मध्य रावित्र से ठीक पहले की घर्ट+ाओं क े कारर्ण मस्जिस्Sद क े क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे मंच पर मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा हुई।

781. दस् ावेSी साक्ष्य से, यह प्रकर्ट हो ा है विक: (i) 1856-7 से पहले आं रिरक अहा े क े आस-पास में पूSा कर+े से हिंहदुओं का कोई बेदखली +हीं की गइ र्थीी; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) 1856-7 क े सस्जिम्मल+ से दो+ों समुदायों क े बीच पूSा स्र्थीलों क े विद्वभाS+ की व्यवस्र्थीा कर+े क े खिलए रेलिंलग की स्र्थीाप+ा हुई। (iii) रेलिंलग स्र्थीाविप कर+े का ात्काखिलक परिरर्णाम यह उ+ हिंहदुओं द्वारा पूSा कर+े क े अति*कार का लगा ार दावा, सिSन्हों+े रेलिंलग क े सतिन्नकर्ट समा+े चबू रा की स्र्थीाप+ा की र्थीी; (iv) रेलिंलग की उपस्जिस्र्थी ी क े बावSूद, आं रिरक अहा े से हिंहदुओं की बेदखली क े विववाद का विवषय र्थीा और कम से कम वि+रपेक्ष +ही र्थीा;

(v) Sहां क बाहरी अहा े का संबं* है, वह रामचबू रे र्थीा सी ा रासोई सविह बाहरी आहा े मे अैार अन्य *ार्मिमक संरच+ाओं दो+ों स्र्थीलों पर हिंहदू पूSा का क े न्ˆ विबन्दु ब+ गया। हालांविक, हिंहदुओं +े बाहरी आहा े में स्जिस्र्थी रामचबू रा में रेलिंलग की अेार खर्डे होकर सुंसगं विवति* से गभ: £ह को प्रसाद अर्मिप कर े हुए पूSा कर+ा Sारी रखा, इसमें कोई संदेह +हीं हो सक ा है विक यह उ+का विवश्वास र्थीा विक भगवा+ राम का Sन्म -स्र्थीा+ मस्जिस्Sद क े क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे और उसक े भी र र्थीा; (vi) 1934 क े दंगे और 22/23 विदसंबर, 1949 क की घर्ट+ाओं से संक े विमल ा है विक आं रिरक अहा े पर कब्Sा गंभीर संघष: का मामला र्थीा सिSसक े ह दो+ों पक्षों द्वारा हिंहसा की गइ: और मुसलमा+ों का आं रिरक अहा े पर अ+न्य कब्Sा +हीं र्थीा। उपरोX दस् ावेSी साक्ष्य क े आ*ार पर यह +हीं कहा Sा सक ा है विक मुस्जिस्लम पूर्ण: रूप से विववाविद स्र्थील में अप+े अति*कार का स्वत्व स्र्थीाविप कर+े में सक्षम हैं।

O. 16 मुस्जिस्लमों का कब्Sा हक का दावा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

782. वाद 4 में, वादी की ओर से पेश विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+, सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा स्वत्व पर एक मंविदर क े अस्जिस् त्व और विव+ाश क े प्रभाव पर प्रस् ुति याँ दे+े का आ£ह विकया। र्डॉ. *व+ +े वि+म्+ प्रकार की प्रविवविष्टयाँ पस् ु की हैं: (i) आरंणिभक समयावति* से संबंति* मस्जिस्Sद क े +ीचे मंविदर का अस्जिस् त्व स्वत्व क े प्रश्न से असंग है; (ii) एएसआई की रिरपोर्ट: क े अ+ुसार, विकसी भी घर्ट+ा में क्या यह प्रश्न अवि+र्णा:यक हैः- (क) विववाविद स्र्थील पर एक पू्व: सरंच+ा विवद्यमा+ र्थीी सिSसे मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए ध्वस् कर विदया गया र्थीा; और (ख) वह ढांचा मंविदर है या +हीं। (iii) उच्च न्यायालय +े यह भी स्वीकार विकया है विक एएसआई रिरपोर्ट: में इस बा का स्पष्ट वि+ष्कष: +हीं विदया गया र्थीा विक क्या मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण पूव: - विवद्यमा+ ढांचे क े विवध्वंस द्वारा विकया गया र्थीा; (iv) मुतिश्लमों पक्षकारों क े विवरूद्घ यह दलील दे+े में विवफल रह+े से कोइ: प्रति क ू ल वि+ष्कष: +हीं वि+काला Sा सक ा र्थीा विक क्या मंस्जिस्Sद की सरंच+ा क े +ीचे इदगाह या क+ार्टी मस्जिस्Sद स्जिस्र्थी र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (क) मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण कर+े से पहले बाबर द्वारा ऐसी Sांच +हीं की Sा सक ी र्थीी; और (ख) उच्च न्यायालय +े एएसआइ को क े वल इसखिलए अन्वेषर्ण कर+े का वि+द†श विदया विक वह साम£ी Sो गSर्टों और ऐति हासिसक इति हासकारों से प्राप्त हुई र्थीी, वह अवि+र्णा:यक र्थीी। स्वत्व से संबंति* का+ू+ पर अप+ी प्रविवविष्टया प्रस् ु कर+े पर, र्डॉ. *व+ +े न्यायालय द्वारा स्वीक ृ ति क े खिलए वि+म्+खिलखिख प्रस् ावों की सराह+ा की: (i) कब्Sे क े द्वारा स्वत्व का अ+ुमा+ लगाया Sा सक ा है, विवशेष या अगर कोई बेह र हक +हीं है या कोई अन्य दावा सीमा द्वारा वर्जिS है;

(ii) Sहां विकसी व्यविX क े पास हक है वहां यह उपयोग Sारी रहेगा या उपयोग कर+े में असमर्थी: ा ब+ी रहेगी; (iii) क ु छ परिरस्जिस्र्थीति यों में, कब्Sा स्वत्व विववि+श्चय कर+े क े खिलए पया:प्त हो सक ा है (iv) सबू का भार ऐसे व्यविX पर है Sो स्वत्वाति*कार क े विब+ा विवशेषकर साक्ष्य अति*वि+यम की खंर्ड 110 क े उपबं*ों को ध्या+ में रख े हुए कब्Sा कर+े का दावा कर ा है; (v). यविद कोइ: व्यविX ऐसी रीति से काय: कर ा है Sो विकसी कब्Sे की कमी को दर्भिश कर ा है और विकसी काय: का वि+ष्पाद+ कर ा है या उसका लोप कर ा है ो यह साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 115 क े अ*ी+ विववन्*+ का सिसद्घान् क े अ+ुसार होगा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vi) कब्Sे क े आशय द्वारा कायम रखा Sा ा है; और (vii) प्रार्थी:+ा या कम प्रार्थी:+ा क े अभाव क े परिरर्णामस्वरूप हक की हावि+ +हीं होगी और हक क े वल परिरसीमा से परे प्रति क ू ल कब्Sे पर खोया Sा सक ा है; संक्षेप में, र्डॉ. *व+ द्वारा इस न्यायालय क े समक्ष कणिर्थी रूप से शीष:क क े दावे का आ*ार इस प्रकार ैयार विकया Sा सक ा है: (i) बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण 1528 में बाबर क े इशारे में विकया गया र्थीा। बाबर क े शास+ में मस्जिस्Sद क े रखरखाव आैर संचाल+ का खच: शाही खSा+े से विदया Sा ा र्थीा आैर यह अ£ेSी शास+ क े दौरा+ भी इसको Sारी रखा गया र्थीाः (ii) सिसक्खों और विहन्दुओं द्वारा विकए गए अत्याचार और अति क्रमर्ण क े अ+ेक प्रयासों का मुस्जिस्लमों द्वारा ख°र्ड+ विकया गया और यहां क विक राज्य क े प्राति*कारिरयों +े वि+देश देकर उ+क े अति*कारों की रक्षा की (क) मस्जिस्Sद से विहन्दू/सिसख अति क्रमर्णकारिरयों से बेदखलीः आैर (ख) अमान्य वि+मा:र्णों को हर्टा+ा; (iii) कम से कम 1885 में, हिंहदुओं का सामान्य विवश्वास यह र्थीा विक भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ रामचबू रा में स्जिस्र्थी र्थीा। 1885 क े वाद में यह उल्लेखिख विकया गया र्थीा सिSसमें यह वि+ष्कष: वि+काला गया र्थीा विक विहन्दुआें क े पास mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA चबू रा पर कोइ हक +हीं र्थीा और उच्च म स् र पर उ+क े अति*कार प्रकृ ति में पूव: वि+*ा:रिर र्थीे. (iv) विहन्दुओं +े सदैव विववाविद ढांचे को मस्जिस्Sद क े रूप में वि+र्मिदष्ट विकया है और उसे इस प्रकार मान्य ा दी है; (v) मुस्जिस्लमों +े लगा ार विववाविद ढांचे में +वाS अदा की, Sो इस प्रकार है: (क) पेश इमाम क े बकाया और वे + क े संदाय क े खिलए 25 Sुलाई, 1936 का करार; (ख) 1941 क े णिशया/सुन्नी वाद में अणिभखिलखिख सातिक्षयों की गवाविहयाॅं; और (ग) स्वीक ृ ति, वाद 5 क े वाविदयों द्वारा बहस क े दौरा+, +माS 16 विदसंबर, 1949 क मस्जिस्Sद में पेश की गई र्थीी; (vi) विहन्दुओं द्वारा दावा विकए गए अति*कार पूर्ण: ः अवै* क ृ त्यों पर आ*ारिर हैं: (क) +वाS अदा कर+े क े पश्चा Sब मुतिश्लम मस्जिस्Sद की आेर आगे बढ़+े पर उन्हें रोक+ा या ंग कर+ा (ख) 1934 में मस्जिस्Sद क े एक भाग को +ष्ट कर+ा सिSसक े कारर्ण विहन्दूओं पर मरम्म क े खिलए Sुमा:+ा लगाया Sा सक े; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ग) 22/23 विदसंबर, 1949 को मस्जिस्Sद का अपविववित्रकरर्ण; और (घ) इस न्यायालय क े यर्थीास्जिस्र्थीति आदेशों का उल्लंघ+ कर े हुए 6 विदसंबर, 1992 को मस्जिस्Sद का विवध्वंस; (vii) परिरर्णामस्वरूप विववाविद संरच+ा सदैव एक मस्जिस्Sद ही रही है Sो 1528 से 22/23 विदसंबर, 1949 को उसक े विवध्वंश क मुस्जिस्लमों क े कब्Sे में रही।

783. र्डाॅ. *व+ क े प्रस् ु क: क े इस भाग में अवि+वाय: रूप से अति*कार सम्बस्जिन्* स्वत्व पाया गया है एक स्व ंत्र शीष:क क े दावे पर पूव: विवश्लेषर्ण में यह पाया गया है विक मुसलमा+ मुस्जिस्लम शासकों क े दौरा+ या 1857 क े पश्चा औपवि+वेणिशक शासक क दौरा+ मस्जिस्Sद की आ*ारभू भूविम क े विवति*क स्वत्व क े हस् ां रर्ण क े सम्बन्* में विवणिशष्ट अ+ुमति ले+े में असमर्थी: रहें है। दस् ोSी साक्ष्य सिSस पर अवलंम्ब खिलया गया है वे मस्जिस्Sद क े रखरखाव आैर संचाल+ क े खिलए अ+ुदा+ से संबस्जिन्* राSस्व अणिभलेख शाविमल है। यद्यविप र्डाॅ. *व+ +े मुसलमा+ों क े इस दावे को स्वीकार कर+े का आ£ह विकया विक उ+क े पास आं रिरक आैर बाह्य अहा े में कब्Sा र्थीा आैर उस कब्Sे की स प्रक ृ ति क े आ*ार पर स्वत्व का अ+ुमा+ लगाया Sा सक ा है सिSसे विहन्दुआें क े द्वारा विवस्र्थीाविप +ही विकया Sा सक ा है।

784. साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 110 वि+म्+ प्रकार हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA *ारा 110 - स्वाविमत्व क े बारे में सबू का भार- Sबविक प्रश्न यह है विक क्या कोई व्यविX ऐसी विकसी चीS का स्वामी है सिSस पर उसका कब्Sा हो+ा दर्भिश विकया गया है, ब यह साविब कर+े का भार विक वह स्वामी +हीं है, उस व्यविX पर है, Sो प्रति ज्ञा कर ा है विक वह स्वामी +हीं है। *ारा 110 सबू क े भार से सम्बस्जिन्* है। Sहां प्राव*ा+ लागू हो ा है, यह साविब कर+े का भार विक एक अन्य व्यविX सिSसक े कब्Sे में सम्पखित्त है, वह माखिलक +हीं है, ो वह उस व्यविX पर होगा Sो उस अन्य व्यविX क े स्वाविमत्व क े खिखलाफ पुविष्ट कर ा है। लेविक+, Sहाँ पर *ारा 110 लागू हो ी है वहाँ एक प्रश्न उत्पन्न हो+ा चाविहए विक क्या कोई व्यविX विकसी चीS का स्वामी है और स्वाविमत्व का दावा विकया गया है विक सिSसे उसक े द्वारा कब्Sे में विदखाया गया है। *ारा 110 इस सिसद्धां पर आ*ारिर है विक स्वत्व कब्Sे का अ+ुसरर्ण कर ा है। इसी कारर्ण से प्राव*ा+ यह अव*ारर्णा कर ा है विक Sहाँ विकसी वस् ु को कब्Sे में विदखाया गया है, और एक सवाल उठ ा है विक क्या वह व्यविX माखिलक है, का+ू+ उस व्यविX पर स्वाविमत्व को सिसद्घ + कर+े का बोझ उस व्यविX पर र्डाल ा है Sो इस बा की पुविष्ट कर ा है विक सिSस व्यविX क े कब्Sे में सम्पखित्त है वह माखिलक +हीं है।

785. इस न्यायालय क े कई फ ै सलों +े *ारा 110 क े प्राव*ा+ों की व्याख्या की है. *ारा 110 इस सिसद्धां पर आ*ारिर है विक कब्Sे मे हो+ें पर स्वयं स्वत्व का अ+ुमा+ लगाया Sा सक ा है। विकन् ु यह ब लागू हो ा है सिSस वाद में Sब विववादको में से विकसी एक क े द्वारा कोइ: स्वत्व +हीं प्रदा+ कर े है Sैसा विक कहा Sा ा है, ब कब्Sा स्वयं ही वि+*ा:रिर कर ा है। इसखिलए, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दूसरी ओर, यह भी पू्व: स्र्थीाविप है विक Sब थ्यों क े ज्ञा हो+े पर अ+ुमा+ +हीं लगाया Sा सक ा हैैं। +ायर सर्मिवस सोसाइर्टी खिलविमर्टेर्ड ब+ाम क े सी अलेक्Sेंर्डर398, क े वाद में न्यायमूर्ति एम. विहदाय ुल्लाह (उस समय क े मुख्य न्याया*ीश) ी+ न्याया*ीशों की पीठ की आेर से बोल े हुए यह अव*ारिर विकयाः- "इस कब्Sे से प्रर्थीम दृष्टया स्वत्व का अ+ुमा+ लगाया Sा सक ा है, इससे कोइ: भी इंकार +ही कर सक ा है, लेविक+ Sब थ्य ज्ञा+ हो ब यह अ+ुमा+ मुस्जिश्कल से ही लगाया Sा सक ा है। Sब थ्य विकसी भी पक्षकार का कोई स्वत्व +हीं ब ा े हैं, ो कब्Sा स्वयं ही वि+*ा:रिर कर ा है।" एम एस Sगदंबल ब+ाम दतिक्षर्णी भार ीय णिशक्षा र्ट्रस्र्ट399 क े वाद में, न्यायमूर्ति क े Sगन्नार्थी शेट्टी +े इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की पीठ की रफ से बोल े हुए अव*ारिर विकया विक स्वत्व *ारक क े सार्थी कब्Sा ब क Sारी रह ा है Sब क विक प्रति वादी प्रति क ू ल कब्Sे से स्वत्व प्राप्त +हीं कर ा है: “18. कब्Sा *ारक क े पास ब क Sारी रह ा है Sब क विक प्रति वादी प्रति क ू ल कब्Sे से स्वत्व प्राप्त +हीं कर ले ा है। Sब भूविम वि+विह रह ी है और Sब इसे उपयोग से बाहर रखा Sा ा है, ो प्रति क ू ल कब्Sे की कोई वि+रं र ा +हीं होगी। ऐसे मामले में Sो पक्षकार स्वत्व रख ा है ो वह प्रलतिक्ष कब्Sा प्रदा+ कर+े का दावा कर सक ी है को पूव: क े संविवलय क े द्वारा प्रति क ू ल कब्Sे को समाप्त +हीं विकया Sा

Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक ा सामातियक संविवलय और लम्बे समय से चल+े वाले सिसद्धां क े मध्य में कोई अं र +हीं है।" ए.पी. सरकार क े मुख्य व+ संरक्षक ब+ाम कलेक्र्टर400 क े वाद में, न्यायमूर्ति सैयद शाह मोहम्मद कादरी +े दो न्याया*ीश की पीठ की आेर से सम्बोति* कर े हुए अव*ारिर विकया विकः- “20... उप*ारर्णा, Sो प्रति क्षेप+ीय है, ब आकर्मिष हो ी है Sब कब्Sा प्रर्थीमदृष्टया विवति*पूर्ण: है और Sब विवरो*ी पक्षकार का कोई हक +हीं है।" ए.पी. राज्य ब+ाम स्र्टार बो+ विमल आैर फर्मिर्टलाइSर कम्प+ी401, में मा++ीय न्यायालय +े यह अव*ारिर विकया विक *ारा 110 का उद्देश्य साव:Sवि+क +ीति पर आ*ारिर है। उद्देश्य यह है विक व्यविXयों को का+ू+ को अप+े हार्थीों में लेकर शांति भंग कर+े से रोक+ा है, हालांविक उ+का स्वत्व विवचारा*ी+ भूविम पर प्रश्न तिचन्ह लग सक ा है। यह उद्देश्य विवणिशष्ट राह अति*वि+यम 1963 की *ारा 6, दंर्ड प्रविक्रया संविह ा 1973 की *ारा 145 और भार ीय दंर्ड संविह ा 1860 की *ारा 154 और 158 Sैसे प्राव*ा+ों को स्र्थीाविप कर ा है। न्यायमूर्ति बीएस चौहा+ +े इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की पीठ क े खिलए बोल े हुए उपरोX वि+र्ण:य में ब ाया विक: “21...... उX उप*ारर्णा साक्ष्य अति*वि+यम की खंर्ड 114 क े ह क े वल ऐसे मामले में लागू हो ी है Sहां दो+ों रफ कोई सबू +हीं है या स्वाविमत्व का बहु कम सबू है। सूविX -- कब्Sा स्वत्व का अ+ुसरर्ण 400 (2003) 3 SSC 472 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर ा है, उ+ मामलों में लागू हो ा है, Sहाँ वास् विवक कब्Sे क े प्रमार्ण की यर्थीोतिच रूप से उम्मीद +हीं की Sा सक ी है, उदाहरर्ण क े खिलए, वेस्र्टलै°र्ड क े मामले में, या Sहाँ एक या दूसरे रीक े से कब्Sे क े बारे में क ु छ भी +हीं Sा+ा Sा सक ा है। कब्Sे क े परिरर्णामस्वरूप स्वत्व की अव*ारर्णा, क े वल भी उत्पन्न हो सक ी है Sहां थ्य यह प्रदर्भिश कर े हैं विक विकसी भी पक्षकार क े खिलए कोई स्वत्व वि+विह +हीं है। वादी का कब्ज़ा प्रर्थीम दृष्टया गल +हीं है, और वादी का स्वत्व साविब +हीं विकया गया है। यह वि+तिश्च रूप से इसका म लब यह +हीं है विक क्योंविक विकसी व्यविX क े पास क ु छ Sमी+ क े स्वत्व है, ो यह Sरूरी है विक Sमी+ उसक े कब्Sे में हो। वास् व में इसका ात्पय: है विक यविद विकसी भी समय स्वत्व रख+े वाल व्यविX क े कब्Sे में सम्पखित्त र्थीी, ो विवति* यह उप*ारर्ण कर+े की अ+ुमति दे ी है एेसा स्वत्व उसमें वि+विह स्वत्व क े कब्Sे की वि+रं र ा में र्थीी (400 (2003)3 एसएससी 472 401 (2013)9 एससीसी 319) एक व्यविX को यह स्र्थीाविप कर+ा होगा विक उन्हो+ें वाद सम्पखित्त पर कब्Sा Sारी रखा है, Sबविक दूसरी रफ स्वत्व का दावा कर े हुए, अति चार/ अति क्रमर्ण आविद का मामला ब+ा+ा चाविहए। Sहां स्पष्ट स्वत्व वादी क े सार्थी है, यह प्रति वादी पर अवलंविब है, विक स्पष्ट स्वत्व क े इस दावे को विवस्र्थीाविप कर+े क े आदेश और अप+े आप में लाभकारी स्वत्व स्र्थीाविप आदेश क े स्र्थीाविप कर+े क े खिलए, उसे सं ोषS+क साक्ष्य, परिरस्जिस्र्थीति यां, Sो उ+क े अणिभकर्थी+ का पक्ष रख ी है, क े माध्यम से स्र्थीाविप कर+ा होगा। यहां क विक, एक राSस्व अणिभलेख स्वत्व का दस् ावेS +हीं है। यह क े वल कब्Sे क े संबं* में अव*ारर्णा उत्पन्न हो ी है। कब्Sे और /या वि+रं र ा का अ+ुमा+, आगे और पीछे दो+ों, साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 110 क े ह भी उठाया Sा सक ा है।" (प्रभाव वर्ति* ) *ारा 110 की प्रयोज्य ा पर प्रस् ु कर+े क े इस भाग का आकल+ कर+े में महत्वपूर्ण: परीक्षर्ण यह है विक क्या विववाविद स्र्थील से ात्पय: है, सिSसमें से क ु छ, मुस्जिस्लम दलों को कब्Sे में, भी विदखाया गया है। Sब क विदखाए गए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कब्Sे की आवश्यक ा पूरी +हीं हो Sा ी, ब क अ+ुमा+ +हीं लगाया Sा सक े गा और यह स्र्थीाविप कर+े का बोझ रख+े का कोई सवाल ही +हीं होगा विक वाद 4 में वादी विवपक्षी हिंहदू दलों क े +े ा +हीं हैं। मुतिश्लमों का कब्Sे क े दावों पर विवश्लेषर्ण

786. वाद 4 में वादीगर्णों क े मामले का मूल्यांक+ अणिभलेखिख सबू ों की संपूर्ण: ा क े आ*ार पर विकया Sा+ा चाविहए ाविक यह प ा लगाया Sा सक े विक क्या संभाव+ाओं की अति*क ा पर कब्Sा स्र्थीाविप विकया गया है। सबू कई महत्वपूर्ण: विवशेष ाओं का खुलासा कर े हैं सिSन्हें ध्या+ विदया Sा+ा चाविहए: (i) यद्यविप, वाद 4 में वाविदयों का मामला यह है विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण 1528 में बाबर क े इशारे पर या बाबर क े द्वारा विकया गया र्थीा, विफर भी उ+क े द्वारा वि+मा:र्ण की ारीख और 1856-7 क े बीच मस्जिस्Sद में +माS क े अदा कर+े या उपयोग कर+े पर भी उ+क े द्वारा कब्Sे का विवलेख उपस्जिस्र्थी +हीं है। मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण की रीख से 325 साल से अति*क की अवति* Sो अं£ेSों द्वारा पत्र्थीर वि+र्मिम वि£ल की दीवार स्र्थीाविप कर+े क, मुतिश्लमों द्वारा विववाविद स्र्थील पर अति*कार स्र्थीाविप कर+े क े खिलए काेइ: सबू प्रस् ु +हीं विकया गया है। + ही इस समयावति* क े दौरा+ मस्जिस्Sद में +माS अदा कर+े क े कोइ: साक्ष्य हैः mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) इसक े विवपरी, प्रमुख यावित्रयों (मुख्य रूप से विर्टफ े न्र्थीेलर और मोंर्टगोमरी मार्मिर्ट+) +े विहन्दुओं की उस पविवत्र ा पर आ*ारिर विवश्वास और आस्र्थीा का विवस् ृ विववरर्ण विदया है सिSसमे उन्हों+े भगवा+ राम क े Sन्म क े स्र्थीा+ और विहन्दुओं द्वारा Sन्मस्र्थीा+ की वास् विवक पूSा क े बारे में ब ाया र्थीा; (iii). 1743-1785 क े बीच भार की यात्रा कर+े वाले विवखिलयम हिंफच (1608-11) और विर्टफ े न्र्थीेलर +े अयोध्या का विववरर्ण विदया। दो+ों लेखों में विहन्दू भगवा+ राम की पूSा क े संदभ: हैं। भगवा+ राम क े प्रति हिंहदू पूSा का सकारात्मक विववरर्ण संभाविव है। विर्टफ े न्र्थीेलर +े विवशेष रूप से हिंहदू पूSा स्र्थीलों को संदर्भिभ कर ा है सिSसमें सी ा रसोई, स्वग:द्वार और बेदी या पाल+ा भी शाविमल हैं Sो भगवा+ राम क े Sन्म का प्र ीक हैं। उ+क े लेख *ार्मिमक पवÂ को दशा: ा है सिSसक े अन् ग: हिंहदू भX पूSा क े खिलए भारी भीड़ में Sा े र्थीे। अट्ठारहवीं श ाब्दी में र्टीफ े न्र्थीेलर क े लेख मस्जिस्Sद क े साम+े ई ंर्ट से वि+र्मिम वि£ल की दीवार क े ब++े से पू्व: की है। विर्टफ े न्र्थीेलर +े सन्दभ: विदया है - 5 इंच Sमी+ से उठा हुआ वगा:कार स्र्थील सिSसकी सीमायें चू+ा पत्र्थीर से ब+ी है अैार सिSसकी लंबाई 5 इला से ज्यादा अैार अति*क म चौड़ाई 4 इला है, सिSसे विहन्दू बेदी या पाल+े क े +ाम से बुला े है Sैसा विक उन्हो+ें उल्लेख विकया है उस इमार का वह स्र्थील Sहाँ भगवा+ विवष्र्णू Sी, भगवा+ राम क े रूप में Sन्म खिलए र्थीे। Sैसा विक उन्हो+ें उल्लेख विकया है यह मा+ा Sा ा र्थीा विक या ो औरंगSेब (दूसरों क े अ+ुसार) या बाबर क े द्वारा उस स्र्थीा+ को +ष्ट कर विदया गया र्थीा। हालांविक, विर्टफ े न्र्टलर +े उल्लेख विकया है विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वह स्र्थीा+ Sहां पर भगवा+ राम का पै ृक आवास स्जिस्र्थी र्थीा विहन्दू उस स्र्थीा+ की ी+ बार परिरक्रमा आैर द°र्डव प्रर्णाम कर े र्थीे। विर्टफ े न्र्थीेलर क े इस लेख में भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े +ाम का एक क े न्ˆ विबन्दू र्थीा सिSसकी पूSा की Sा ी र्थीी आैर विहन्दू उसकी परिरक्रमा आैर द°र्डव प्रर्णाम कर े र्थीे। (iv) 1856-7 में हुए साम्प्रदातियक दंगों क े परिरर्णामस्वरूप औपवि+वेणिशक प्रशास+ +े दो+ों समुदायों क े परस्पर विवरो*ी दावों क े मध्य शांति क े उपाय क े रूप में ई ं र्ट की Sाली+ुमा दीवार को स्र्थीाविप विकया। रेलिंलग क े ात्काखिलक परिरर्णामस्वरूप रामचबू रे पर विववाद उत्पन्न हुआ, Sो रेलिंलग क े ठीक बाहर खड़ा विकया गया र्थीा और Sहाँ से विहन्दूओं +े भगवा+ राम की पूSा कर+े की माँग की। चबू रा की स्र्थीाप+ा का समय, इसकी अवस्जिस्र्थीति और चबू रा पर भगवा+ राम की पूSा, ये आन् रिरक अहा े से संभाव्य वि+ष्कास+ पर रेलिंलग से ठीक बाहर पूSा Sारी रख+े क े विहन्दू की विदशा में संक े क हैं; (v) औपवि+वेणिशक प्रशास+ क े दौरा+ ई ंर्ट की Sाली+ुमा दीवार क े वि+मा:र्ण से विहन्दूओं और मुस्जिस्लमों क े मध्य स्वत्व का कोई वि+*ा:रर्ण +हीं हो ा, बस्जिल्क 1856-7 में हुई S+हावि+ की घर्ट+ाओं को ध्या+ में रखकर लोक शांति और सुरक्षा को ब+ाये रख+े का एक आशतिय उपाय र्थीा; (vi) यह विक ई ं र्ट की Sाली+ुमा दीवार क े रूप में प्रति रो* की स्र्थीाप+ा से पूर्ण: वि+ष्कास+ +हीं हो गया, यह बा इ+ णिछर्ट-पुर्ट घर्ट+ाओं से प्र ी हो ी है सिSसमें मस्जिस्Sद परिरसर क े भी र झंर्डा लगाया Sा+ा और वि+हंग सिंसह द्वारा हव+ र्थीा पूSा कर+ा शाविमल हैं। वि+हंग सिंसह को राज्य क े प्राति*कारिरयों क े हस् क्षेप क े बाद वि+काला गया; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (vii) 1877 क क े वल एक प्रवेश द्वारा र्थीा सिSसक े माध्यम से आन् रिरक अहा े में Sाया Sा सक ा र्थीा, Sो पूव- ओर का दरवाSा, ह+ुम द्वार र्थीा। प्रवेश कर+े पर विहन्दूओं क े कई उपास+ा स्र्थील र्थीे Sैसे रामचबू रा र्थीा सी ा रसोंई सार्थी ही सार्थी भंर्डार, सिSससे प्र ी हो ा र्थीा विक Sहाँ क बाहरी अहा े का संबं* है, विहन्दूओं का स्र्थीाविप कब्Sा र्थीा; (viii) बड़ी संख्या में पूSा कर+े परिरसर में आ+े वाले श्रद्धालुओं क े खिलए सुरतिक्ष रास् े को सुवि+तिश्च कर+े क े एक उपाय क े रूप में उत्तरी रफ, सिंसह द्वार क े रूप में ज्ञा एक अति रिरX दरवाSे को खोल+े की आवश्यक ा हुई। सिंसह द्वार खोल+े पर की गयी आपखित्तयों पर विवचार विकया गया और उ+को अस्वीक ृ कर विदया गया सिSसक े परिरर्णामस्वरूप रास् ा प्रदा+ कर+े क े खिलए एक अति रिरX दरवाSे को खोल+ा एक स्र्थीाविप थ्य ब+ गया; (ix) विहन्दूओं और मुस्जिस्लमों क े बीच विववाद Sारी रहे, Sो आं रिरक अहा े क े संबं* में संबंति* दावों की विववाविद प्रक ृ ति का संक े कर े हैं; (x) 1934 में एक अन्य साम्प्रदातियक दंगा हुआ सिSसक े दौरा+ मस्जिस्Sद की गुम्बदाकार ढाँचे को क्षति हुई। सिSसक े कारर्ण अयोध्या क े वि+वासी विहन्दूओं पर Sुमा:+ा लगाया गया और एक मुस्जिस्लम ठेक े दार क े माध्यम से औपवि+वेणिशक प्रशास+ क े खच† पर पु+रूद्धार काय: कराया गया। इससे प ा चल ा है विक विहन्दूओं +े बाहरी अहा े में वि+रन् र पूSा कर+ा Sारी रखा र्थीा, मस्जिस्Sद क े रूप में आं रिरक अहा े क े भी र ढाँचे की प्रास्जिस्र्थीति क े मुस्जिस्लमों क े दावे का परिरत्याग +हीं विकया गया र्थीा। 1934 क े बाद यह दर्भिश कर+े क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खिलए दस् ावेSी साम£ी है विक मस्जिस्Sद क े खिलए पेश इमाम र्थीा मु वल्ली की वि+युविX क े खिलए व्यवस्र्थीाएँ की गयी Sो इस *ारर्णा को गल साविब करेगी विक मस्जिस्Sद का परिरत्याग विकया गया; (xi) साक्ष्य से दर्भिश हो ा है विक आं रिरक अहा े में उ+की पहुँच में बा*ा क े परिरर्णामस्वरूप 1934 क े बाद मुस्जिस्लम का +माS अदा कर+ा कम हो गया र्थीा। 16 विदसम्बर 1949 (अस्जिन् म शुक्रवार की +माS) क मस्जिस्Sद का प्रयोग शुक्रवार की +माS अदा कर+े क े उद्देश्य क े खिलए विकया Sा रहा र्थीा। 1934 में मस्जिस्Sद को हुई क्षति की मरम्म पर प्रभाव र्डाल+े वाली परिरस्जिस्र्थीति याँ, पेश इमाम की सेवाओं का लाभ उठा+ा और क ु छ हद क +माS अदा कर+ा, वे परिरस्जिस्र्थीति याँ हैं Sो इस क: पूर्ण: अ+ुमा+ को इंविग कर ी हैं विक 22/23 विदसम्बर 1949 से पहले आं रिरक अहा े से मुस्जिस्लम पूरी रह बाहर +हीं र्थीे हालांविक उ+की पहुँच अवि+यविम र्थीा बाति* र्थीी; और (xii) 22/23 विदसम्बर 1949 को आं रिरक ढाँचें क े क े न्ˆीय गुम्बद क े +ीचें मूर्ति यों को स्र्थीाविप विकया गया, मुस्जिस्लमों क े अ+ुसार सिSससे मस्जिस्Sद अपविवत्र हो गयी। इससे पहले अस्जिन् म Sुमे की +माS 16 विदसम्बर 1949 को अदा की गयी। 23 विदसम्बर 1949 को हो+े वाली Sुमे की +माS, मस्जिस्Sद क े अपविवत्रीकरर्ण क े कारर्ण अदा +हीं की Sा सकी। इसखिलए संविवदा अति*वि+यम की *ारा 110 की प्रयोज्य ा को आकर्मिष कर+े क े खिलए सुन्नी वक्फ बोर्ड: क े कब्Sे क े वाद को दो परिरप्रेक्ष्यों से वि+*ा:रिर विकया Sा+ा चाविहए: पहला, Sहाँ क बाहरी अहा े का संबं* है, संभाव+ाओं की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रबल ा क े आ*ार पर यह स्वीकार कर+ा असंभव है विक मुस्जिस्लमों का कब्Sा र्थीा। इसक े विवपरी, बाहरी अहा े में विहन्दू उपास+ा स्र्थील की स्र्थीाप+ा, इस रह क े दावों को विमथ्या साविब कर दे ी है। दूसरा, Sहाँ क आं रिरक अहा े का संबं* है, मुस्जिस्लमों क े दावे को विवणिभन्न समयावति* क े संदभ: में वि+*ा:रिर विकया Sा+ा चाविहए अर्थीा: ् (i) 1856 से पहले (ii) 1856 और 1934 क े बीच (iii) 1934 क े बाद।

787. 1856 से पहले मुस्जिस्लमों क े उपास+ा क े विववरर्ण, विहन्दूओं द्वारा पूSा कर+े क े विववरर्ण क े विवपरी प्रत्यक्ष ः मूक है। दीवार और रेलिंलग की स्र्थीाप+ा क े बाद, यह स्पष्ट है विक अां रिरक अहा े में मुस्जिस्लमों की Sारी उपास+ा में बा*ाएँ उत्पन्न हुई ं Sो कई काय:वाविहयों क े सार्थी-सार्थी 1934 क े दंगों द्वारा स्पष्ट है। विफर भी, सिSस रीक े से दंगो क े बाद मस्जिस्Sद का Sीर्ण द्धार हुआ और विवशेष रूप से पेश इमाम की सेवाओं क े खिलए व्यवस्र्थीाओं से प ा चल ा है विक बा*ा क े हो े हुए भी +माS क ु छ रूप में 16 विदसम्बर 1949 क मस्जिस्Sद में अदा की Sा ी रहीं। Sैसा विक वक्फ वि+रीक्षक +े दर्भिश विकया विक +माS की विक्रया को बाति* विकया Sा रहा र्थीा और उपासकों को परेशा+ विकया गया, Sबविक मुस्जिस्लमों द्वारा दावे क े परिरत्याग को विदखा+े क े खिलए कोई सबू +हीं है। वास् व में दस् ावेSी और मौखिखक साक्ष्य से प ा चल ा है विक Sुमे की +माS 16 विदसम्बर 1949 क अवि+यविम रूप से अदा की Sा रही र्थीी। हालांविक आं रिरक अहा े पर मुस्जिस्लमों क े दावे का परिरत्याग +हीं विकया गया र्थीा, विफर भी Sैसा साक्ष्य से दर्भिश हो ा है, यह प्रति वाद और विववाद का एक थ्य र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पी. स्वत्व का विवश्लेषर्ण पी.[1] वाद 4 और वाद 5 में साक्ष्य का क्रमबं*+

788. अब वह स्जिस्र्थीति आ गयी है विक वाद 4 और वाद 5 में स्वत्व क े दावे पर साक्ष्य को एक सार्थी क्रम से रखा Sाए ाविक विदए Sा+े वाले अ+ु ोष क े अंति म वि+*ा:रर्ण क े खिलए माग: प्रशस् विकया Sा सक े । I एएसआई की रिरपोर्ट: से वि+म्+खिलखिख स्जिस्र्थीति का प ा चल ा है: (i) उत्ख++ क्षेत्र में पुरा ास्जित्वक खोS से दूसरी श ाब्दी ईसा पूव: में विमल+े वाले उत्तरी काले पॉखिलश्र्ड ब:+ों क े समय की क्रविमक सभ्य ाओं क े महत्वपूर्ण: अवशेषो का प ा चल ा है। (ii) एएसआई द्वारा उत्ख++ से पूव: विवद्यमा+ अन् वि+र्मिह संरच+ा क े अस्जिस् त्व का प ा चला है Sो बारहवीं श ाब्दी से संबंति* है। संरच+ा का एक लंबा विवस् ार है, यह इस थ्य से स्पष्ट है विक पाँच स् म्भ आ*ारों की 17 पंविXयों में ब+े 85 स् ंभ आ*ार र्थीे; (iii) संभाव+ाओं की प्रबल ा पर, अन् र्मि+विह संरच+ा की प्रक ृ ति पर पुरा ास्जित्वक वि+ष्कष: यह इंविग कर े हैं विक यह बारहवीं श ाब्दी ईसवी से संबंति* विहन्दू *ार्मिमक मूल का है। (iv) विववाविद मस्जिस्Sद, पूव: विवद्यमा+ संरच+ा की +ींव पर ब+ाया गया र्थीा। मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण इस रीक े से हुआ है ाविक पूव: विवद्यमा+ संरच+ा की दीवार का उपयोग कर े हुए अलग से +ींव ब+ा+े की आवश्यक ा से बचा Sा सक े; और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) उत्ख++ स्र्थील पर विकए गए उत्ख++ से एक गोलाकार पविवत्र स्र्थील क े अस्जिस् त्व का भी प ा चल ा है, सिSसमें मकरा प्र+ाला हिंहदू पूSा का सूचक है Sो आठवीं से दसवीं श ाब्दी क है। सबू क े मा+क क े आ*ार पर एक क: पूर्ण: अ+ुमा+ वि+काला Sा सक ा है Sो सिसविवल विवचारर्ण को वि+यंवित्र कर ा है विक: (i) मस्जिस्Sद की +ींव, एक बड़ी पूव:-विवद्यमा+ संरच+ा की दीवारों पर आ*ारिर है। (ii) पूव:-विवद्यमा+ संरच+ा बारहवीं सदी की है; र्थीा (iii) मस्जिस्Sद की +ींव वाली अन् र्मि+विह संरच+ा, अप+ी स्र्थीापत्य विवशेष ाओं और प्राविप्तयों से विहन्दू *ार्मिमक मूल का संक े दे े हैं Sो उस क्षेत्र में मस्जिन्दर उत्ख++ों से ुल+ीय है और उस युग से संबंति* है।

II. हालांविक बारहवीं श ाब्दी ईस्वी क े मंविदर वास् ुणिशल्प क े प्र ीकात्मक हिंहदू *ार्मिमक मूल क े एक अं र्मि+विह संरच+ा क े अवशेषों क े बारे में एएसआई रिरपोर्ट: में वि+ष्कष: को वि+म्+खिलखिख सचे कों क े सार्थी प्रासंविगक रूप से पढ़ा Sा+ा चाविहए:

(i) Sहां एएसआई रिरपोर्ट: में पूव: -विवद्यमा+ संरच+ा क े खंर्डहरों का अस्जिस् त्व पाया गया है, रिरपोर्ट: में यह प्राव*ा+ +हीं है: (क) पूव:-विवद्यमा+ संरच+ा क े विव+ाश का कारर्ण; और (ख) क्या मस्जिस्Sद वि+मा:र्ण क े प्रयोS+ क े खिलए पूव:व - संरच+ा को ध्वस् विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) चूंविक एएसआई रिरपोर्ट: में अं र्मि+विह संरच+ा को बारहवीं श ाब्दी का ब ाया गया हैं, अन् र्मि+विह संरच+ा की ति णिर्थी और मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण की ति णिर्थी क े बीच लगभग चार श ास्जिब्दयों का समय अं राल है। यह ब ा+े क े खिलए कोई सबू उपलब्* +हीं है विक लगभग चार श ास्जिब्दयों क े अं राल क े दौरा+ क्या हुआ। (iii) एएसआई रिरपोर्ट: (सिसवाय इसक े, अर्थीा: ्, विक पूव: की संरच+ा की +ींव पर मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े ) इसका वि+ष्कष: +हीं दे ी है विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े प्रयोS+ क े खिलए पूव:-विवद्यमा+ संरच+ा क े अवशेषों का उपयोग विकया गया र्थीा; और (iv) मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में प्रयुX स् म्भ, काले कसौर्टी पत्र्थीर क े स् ंभ र्थीे। एएसआई को यह विदखा+े क े खिलए कोई सबू +हीं विमला है विक ये कसौर्टी स् ंभ, मस्जिस्Sद क े +ीचे की संरच+ा में खुदाई क े दौरा+ पाए गए अं र्मि+विह स् ंभ आ*ारों से संबंति* हैं।

III. विवति* में स्वत्व का वि+ष्कष:, एएसआई द्वारा प्राप्त पुरा ास्जित्वक वि+ष्कषÂ पर आ*ारिर +हीं हो सक ा है। बारहवीं श ाब्दी की अन् र्मि+विह संरच+ा र्थीा सोलहवीं श ाब्दी में मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े मध्य चार श ास्जिब्दयों का अं राल है। बारहवीं और सोलह सविदयों क े बीच मा+व इति हास क े संबं* में अणिभलेख पर कोई सबू +हीं रखा गया है। इस प्राची+ ा क े मामले में कोई सबू उपलब्* +हीं है विक (i) अं र्मि+विह संरच+ा क े विव+ाश का कारर्ण; और (ii) क्या मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए पूव:-विवद्यमा+ संरच+ा को ध्वस् विकया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीा। Sमी+ का स्वत्व स्र्थीाविप विवति*क सिसद्धां ों और दीवा+ी विवचारर्ण को वि+यंवित्र कर+े वाले स्पष्ट मा+कों को लागू करक े वि+र्ण- विकया Sा+ा चाविहए।

IV. यावित्रयों क े ऐति हासिसक अणिभलेख (मुख्य ः विर्टफ े न्र्थीलर और अट्ठारहवीं श ाब्दी में मॉन्र्टगोमरी मार्मिर्ट+ क े विववरर्ण) दर्भिश कर े हैं विकः (i) विहन्दुओं की यह आस्र्थीा और विवश्वास विक विववाविद स्र्थील भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ र्थीा; (ii) विववाविद स्र्थील में और उसक े आसपास भगवा+ राम क े Sन्म क े प्र ीक सी ा रसोई ं, स्वग:दार और पाल+ा सविह विहन्दुओं द्वारा पूSा कर+े क े मान्य स्र्थील; (iii) विववाविद स्र्थील पर परिरक्रमा सविह श्रद्धालुओं द्वारा पूSा कर+े का प्रचल+ और *ार्मिमक उत्सवों क े अवसर पर बड़ी संख्या में भXों की उपस्जिस्र्थीति; और (iv) अं£ेSों द्वारा अव* क े विवलय और 1857 में ई ंर्ट की वि£ल क े वि+मा:र्ण से पहले से विववाविद स्र्थील पर उपासकों की ऐति हासिसक उपस्जिस्र्थीति और पूSा का अस्जिस् त्व। उपरोX विर्टप्पणिर्णयों क े अलावा, यावित्रयों क े विववरर्ण को साव*ा+ी क े सार्थी पढ़ा Sा+ा चाविहए। उ+की व्यविXग विर्टप्पणिर्णयों को दं कर्थीा और S+श्रुति क े मामलों से- अ+ुश्रु से ध्या+पूव:क अलग रखा Sा+ा चाविहए। साव:Sवि+क इति हास क े मामलों पर उ+क े विववरर्ण पर विवचार कर+ा, स्वत्व क े मामले में साक्ष्य से अलग है। स्वत्व क े एक वि+र्ण:य को, विवति* क े न्यायालय में संपोषर्णीय साक्ष्य क े आ*ार पर कार्टा Sा+ा चाविहए, Sो प्रति -परीक्षा की Sाँच mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पड़ ाल में खरा उ रा है। इसी रह, अति*क से अति*क गSेविर्टयरों की अन् व:स् ु साक्ष्य की संपोषर्णीय साम£ी प्रदा+ कर सक ी है Sो अणिभलेख से उभर ी है। अदाल को +कारात्मक वि+ष्कष: वि+काल+े में साव*ा+ी बर +ी चाविहए Sो एक यात्री +े +हीं देखा या अवलोक+ विकया। स्वत्व उपरोX आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर स्र्थीाविप +हीं विकया Sा सक ा है। आस्र्थीा और विवश्वास स्र्थील पर पूSा क े रीक े की ओर संक े कर े हैं सिSसक े आ*ार पर कब्Sे क े दावों का अणिभकर्थी+ विकया Sा ा है। न्यायालय +े विवरो*ी दावों का मूल्यांक+ ऐसी स्जिस्र्थीति में विकया है सिSसमें राज्य +े अप+े खिलखिख कर्थी+ में स्पष्ट रूप से कहा है विक उसका भूविम में कोई विह +हीं है।

V. साक्ष्य इंविग कर ा है विक स्र्थील पर एक मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व क े बावSूद, उस स्र्थीा+ को भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ मा+कर विहन्दू पूSा प्रति बंति* +हीं र्थीी। हिंहदुओं द्वारा पविवत्र मा+े Sा+े वाले स्र्थीा+ पर एक इस्लामी ढाँचे का अस्जिस् त्व, उन्हें विववाविद स्र्थील पर और 1856-7 की घर्ट+ाओं से पहले संरच+ा क े परिरसर क े भी र अप+ी पूSा Sारी रख+े से +हीं रोक ा र्थीा। इस्लामी मस्जिस्Sद की भौति क संरच+ा +े हिंहदुओं की इस आस्र्थीा और विवश्वास को दुब:ल +हीं विकया विक विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा। दूसरी ओर, विवद्वा+ अति*वXा +े स्पष्ट रूप से कहा विक सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा मुस्जिस्लम वि+वासिसयों द्वारा +माS अदा कर+े को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए अवलम्ब खिलए गए साक्ष्य लगभग 1856-7 से शुरू हो े हैं;

VI. 1857 में अं£ेSों द्वारा मस्जिस्Sद की विववाविद संरच+ा क े चारों ओर रेलिंलग की स्र्थीाप+ा, एक प्रति वाद की पृष्ठभूविम में हुई और हिंहदुओं क े मस्जिस्Sद क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अहा े क े भी र पूSा कर+े क े दावे पर विववाद पर हुई। इससे 1856-7 में हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े बीच हुए दंगों का संदभ: विमला। औपवि+वेणिशक प्रशास+ द्वारा ई ंर्ट की Sाली+ुमा दीवार क े वि+मा:र्ण का उद्देश्य दो+ों समुदायों क े बीच एक विववाविद उपास+ा स्र्थील क े संबं* में शांति सुवि+तिश्च कर+ा र्थीा। ई ंर्ट की Sाली+ुमा दीवार + ो सम£ संपखित्त क े विववाविद स्र्थील का एक उप- विवभाS+ गविठ कर ी र्थीी और + ही यह औपवि+वेणिशक प्रशास+ द्वारा स्वत्व का वि+*ा:रर्ण कर ी र्थीी;

VII. रेलिंलग की स्र्थीाप+ा क े बाद वि+कर्टव - समय में, 1857 में या उसक े आसपास रामचबू रा की स्र्थीाप+ा की गई। रामचबू रा की स्र्थीाप+ा रेलिंलग क े वि+कर्ट ही हुई र्थीी। अवि+वाय: रूप से, आं रिरक गुंबद क े सौ फीर्ट या उसक े आस-पास क े भी र रामचबू रा की स्र्थीाप+ा को ऐति हासिसक संदभ: में भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ पर पूSा कर+े क े हिंहदू अति*कार की अणिभव्यविX या दावे क े रूप में देखा Sा+ा चाविहए। अं£ेSों द्वारा विवभाSक दीवार क े वि+मा:र्ण क े बाद भी हिंहदुओं +े क ें ˆीय गुम्बद क े +ीचे अप+ी प्रार्थी:+ा कर+े का दावा Sारी रखा। यह स्पष्ट अणिभलेख से वि+कल ा है Sो मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर+े की कोणिशश और आं रिरक अहा े क े परिरसर क े भी र और बाहर दो+ों Sगह पूSा कर+े क े व्यविXयों क े क ृ त्यों को दशा: ा है। रामचबू रा की स्र्थीाप+ा क े बाद भी श्रद्धालु आन् रिरक र्थीा बाहरी अहा े को विवभासिS कर+े वाली लोहे की रेलिंलग पर खड़े होकर ी+ गुम्बद वाली संरच+ा क े भी र स्जिस्र्थी सिSसे वे 'गभ: £ह' मा+ े र्थीे, पर श्रद्धा सुम+ अर्मिप कर े र्थीे और प्रार्थी:+ा कर े र्थीे। मुसलमा+ों द्वारा इसक े विवपरी कोई सबू +हीं विदया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है Sो इंविग कर ा हो विक मस्जिस्Sद की विववाविद संरच+ा पर उ+का कब्Sा अ+न्य र्थीा और यह विक +माज़ हो+े से विहन्दू बविहष्क ृ हो गये;

VIII. रामचबू रा, सी ा रसोई र्थीा अन्य *ार्मिमक स्र्थीा+ों पर, सिS+में भंर्डार की स्र्थीाप+ा भी शाविमल है, विहन्दू उपास+ा से स्पष्ट रूप से बाहरी अहा े क े खुले, अ+न्य और अबाति* कब्Sे का संक े विमल ा है। मुस्जिस्लमों का बाहरी अहा े में कब्Sा +हीं र्थीा। अं£ेSों द्वारा 1858 में दीवार क े वि+मा:र्ण और आं रिरक गुंबद की समीप में रामचबू रे की स्र्थीाप+ा क े बावSूद, हिंहदुओं +े ी+ गुम्बद वाली संरच+ा क े अंदर प्रार्थी:+ा कर+े क े अप+े अति*कार का दावा कर+ा Sारी रखा;

IX. 1877 में या उसक े करीब, हिंहदुओं क े इशारे पर, बाहरी अहा े का एक अन्य दरवाSा प्रशास+ द्वारा उत्तरी विदशा में (सिंसह द्वार) खोल+े की अ+ुमति दी गई, Sो पूव: विदशा में (ह+ुमं द्वार) पर मौSूदा दरवाSे क े अलावा र्थीा। उप-आयुX +े दीवार में ब+े वि+कास क े विवरूद्ध णिशकाय दS: कर+े से इ+कार कर विदया। आयुX +े अपील को खारिरS कर े हुए कहा विक दरवाSा खोल+ा साव:Sवि+क विह में र्थीा। विब्रविर्टश प्रशास+ की अ+ुमति से एक अति रिरX द्वार खोल+े से हिंहदू भXों क े एक बड़े समूह की उपस्जिस्र्थीति की मान्य ा का संक े विमल ा है सिSससे साव:Sवि+क शांति और सुरक्षा क े विह में इस स्र्थील पर अति रिरX रास् े की आवश्यक ा हुई;

X. हिंहदू और मुस्जिस्लम दो+ों गवाहों की गवाही से संक े विमल ा है विक *ार्मिमक अवसरों और त्योहारों Sैसे राम +वमी, साव+ झूला, कार्ति क पूर्भिर्णमा, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरक्रमा मेला और राम विववाह पर हिंहदू भXों का बड़ा समूह दश:+ क े खिलए विववाविद परिरसर आ ा र्थीा। हिंहदू भXों की मौखिखक गवाही ई ंर्ट की दीवार की संरच+ा की रेलिंलग पर खड़े होकर सी ा रसोई, रामचबू रा और 'गभ: £ह' की ओर पूSा और प्रार्थी:+ा क े रीक े को स्र्थीाविप कर ी है;

XI. हिंहदू गवाहों +े इंविग विकया है विक हिंहदू मस्जिस्Sद क े अंदर रखे कसौर्टी पत्र्थीर क े खंभे की प्रार्थी:+ा कर े र्थीे। मुस्जिस्लम गवाहों +े मस्जिस्Sद क े अंदर और बाहर हिंहदू *ार्मिमक महत्व क े प्र ीकों की उपस्जिस्र्थीति को स्वीकार विकया है। ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े बाहर, उ+में वराह, Sय-विवSय और गरूड़ का तिचत्रर्ण है। वे + क े वल आस्र्थीा और विवश्वास क े अस्जिस् त्व का बस्जिल्क सविदयों से वास् विवक पूSा का संक े दे े हैं;

XII. संरच+ा पर 'अल्लाह' क े णिशलालेख क े सार्थी सोलहवीं श ाब्दी में इसक े वि+मा:र्ण क े बाद से मस्जिस्Sद की संरच+ा क े अस्जिस् त्व से कोई इ+कार +हीं कर सक ा है। 1856-7 की सांप्रदातियक घर्ट+ा की उत्पखित्त, पूSा पर दो+ों समुदायों क े बीच लड़ाई में वि+विह है। 1856-7 में रेलिंलग की स्र्थीाप+ा प्रशास+ द्वारा *ार्मिमक पूSा - मस्जिस्Sद की गुम्बदाकार संरच+ा क े भी र मुस्जिस्लमों द्वारा +माS और रेलिंलग क े बाहर विहन्दूओं द्वारा पूSा कर+े क े खिलए विद्वविवभाS+ का उपाय प्रदा+ कर+े का एक प्रयास र्थीा। सिसखों या फकीरों द्वारा मस्जिस्Sद में प्रवेश कर+े और पूSा क े खिलए *ार्मिमक प्र ीक स्र्थीाविप कर+े क े प्रयासों का मुसलमा+ों द्वारा विवरो* विकया गया, सिSसक े परिरर्णामस्वरूप प्रशास+ +े अति*भोगी को बाहर वि+काला; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

XIII. 1857 में ई ं र्ट की Sाली+ुमा दीवार क े वि+मा:र्ण क े बाद, हिंहदुओं क े अ+न्य और वि+बा:ति* कब्Sे और बाहरी अहा े में पूSा कर+े को, विदखा+े क े खिलए अणिभलेख पर सबू हैं। ी+ गुम्बदाकार संरच+ा में प्रवेश क े वल बाहरी अहा े क े पूव- और उत्तरी रफ क े दो दरवाSों से होकर ही संभव र्थीा Sो हिंहदू भXों क े वि+यंत्रर्ण में र्थीे;

XIV. संभाव+ाओं की प्रबल ा पर, यह स्र्थीाविप कर+े क े खिलए कोई सबू +हीं है विक मुस्जिस्लमों +े 1858 क े बाद आं रिरक अहा े क े उ+क े कब्Sे पर विववाद क े बावSूद मस्जिस्Sद को छोड़ विदया या +माS अदा कर+ा बंद कर विदया। मौखिखक साक्ष्य +माज़ की वि+रं र ा का संक े दे ा है।

XV. आं रिरक अहा े पर कब्Sे की लड़ाई 1934 क े सांप्रदातियक संघष: का क ें ˆ ब+ गई, सिSसक े दौरा+ मस्जिस्Sद क े गुंबद की संरच+ा को क्षति हुई। एक मुस्जिस्लम ठेक े दार क े अणिभकरर्ण क े माध्यम से विब्रविर्टश प्रशास+ क े खच† पर 1934 क े दंगों क े बाद मस्जिस्Sद की मरम्म और +वी+ीकरर्ण इस थ्य का संक े है विक दो समुदायों क े बीच विववादों क े बावSूद, मस्जिस्Sद की संरच+ा मौSूद रही; उसी रह मुस्जिस्लमों का उ+का इबाद कर+े क े अति*कार का दावा ब+ा रहा। 1934 क े बाद मस्जिस्Sद क े भी र +माS अदा विकया गया हो+ा प्र ी हो ा है, हालांविक 22/23 विदसंबर 1949 की घर्ट+ा क े समय क, क े वल Sुमे क े +माS अदा की Sा रही र्थीी। विदसंबर 1949 की वक्फ वि+रीक्षक की रिरपोर्टÂ से संक े विमल ा है विक सा*ुओं और बैराविगयों, सिSन्हों+े बाहरी अहा े में पूSा और वि+वास विकया, +े मुसलमा+ों को मस्जिस्Sद क े भी र +माS क े खिलए अहा े से गुSर+े से रोक विदया, Sो उ+क े वि+यंत्रर्ण में र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसखिलए वक्फ वि+रीक्षक +े उल्लेख विकया विक पुखिलस की सहाय ा से शुक्रवार को मस्जिस्Sद क े भी र इबाद संभव र्थीी;

XVI. 22/23 विदसंबर 1949 से पहले की घर्ट+ाओं से बाहरी अहा े में बैराविगयों का बड़ी संख्या में Sमावड़ा और पुखिलस अ*ीक्षक द्वारा उ+की आशंका की इस अणिभव्यविX का प ा चल ा है विक हिंहदू मूर्ति यों को स्र्थीाविप कर+े क े खिलए मस्जिस्Sद क े परिरसर में Sबर+ प्रवेश कर+ा चाह े र्थीे। उन्हें खिलखिख सूच+ा क े बावSूद, उपायुX और सिSला मसिSस्र्ट्रेर्ट (क े क े +ैय्यर) +े कोई ध्या+ +हीं विदया और मस्जिस्Sद की सुरक्षा क े खिलए पुखिलस अ*ीक्षक की आशंका को वि+रा*ार करार विदया। यह आशंका उस घर्ट+ा से पैदा हुई Sो 22/23 विदसंबर 1949 की रा को हुई र्थीी, Sब क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे मस्जिस्Sद क े विमम्बर पर पचास से साठ व्यविXयों क े एक समूह +े मूर्ति याँ स्र्थीाविप कर दी। इससे मस्जिस्Sद का अपविवत्रीकरर्ण और मुसलमा+ों का वि+ष्कास+ का+ू+ की उतिच प्रविक्रया से अन्यर्थीा हुआ। इसक े पश्चा ् 29 विदसंबर, 1949 को दंर्ड प्रविक्रया संविह ा 1898 की *ारा 145 क े अ*ी+ काय:वाविहयों में आं रिरक अहा े को क ु क: विकया गया और रिरसीवर +े कब्Sा ले खिलया;

XVII. 6 विदसंबर 1992 को मस्जिस्Sद क े ढांचे को विगरा विदया गया और मस्जिस्Sद को +ष्ट कर विदया गया। मस्जिस्Sद का विवध्वंश यर्थीा स्जिस्र्थीति क े आदेश और इस न्यायालय को विदए गए आश्वास+ क े उल्लंघ+ में विकया गया। मस्जिस्Sद का विवध्वंश और इस्लामी ढांचे का उन्मूल+ विवति* क े शास+ का घोर उल्लंघ+ र्थीा; mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

XVIII. सास्जिक्ष्यक अणिभलेख से क ु ल विमलाकर Sो वि+ष्कष: वि+कल ा है वह इस प्रकार है: (i) विववाविद स्र्थील एक सम£ संपूर्ण: है। 1856-7 में रेलिंलग की स्र्थीाप+ा +े +ा ो भूविम का उप-विवभाS+ विकया +ा ही हक का कोई वि+*ा:रर्ण विकया। (ii) सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: +े अप+े मामले को उपयोगक ा: द्वारा समप:र्ण का मामला स्र्थीाविप +हीं विकया है; (iii) प्रति क ू ल कब्Sे की वैकस्जिल्पक दलील सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा स्र्थीाविप +हीं की गई है क्योंविक यह प्रति क ू ल कब्Sे की आवश्यक ाओं को पूरा कर+े में विवफल रहा है; (iv) विहन्दू उस बाहरी अहा े में, Sहां वे पूSा कर े रहे हैं, अ+न्य और वि+बा:* कब्Sे में रहे हैं; (v) आं रिरक अहा ा, हिंहदुओं और मुसलमा+ों क े परस्पर विवरो*ी दावों क े खिलए प्रति वाद का स्र्थील रहा है; (vi) 6 विदसंबर, 1992 क मस्जिस्Sद क े ढांचे क े अस्जिस् त्व पर कोई विववाद +हीं है। यह क: विक मस्जिस्Sद इस्लामी सिसद्धां ों क े अ+ुरूप +हीं है, खारिरS हो गया। सबू ब ा े हैं विक मुस्जिस्लमों द्वारा मस्जिस्Sद का कोई परिरत्याग +हीं विकया गया र्थीा। विदसंबर 1949 क शुक्रवार को +माS हो ी र्थीी और 16 विदसंबर 1949 को अंति म +माS हुई; (vii) 1934 में मस्जिस्Sद को हुए +ुकसा+, 1949 में इसक े अपविवत्रीकरर्ण से मुसलमा+ों का वि+ष्कास+ हुआ और 6 विदसंबर, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1992 को हुए अंति म विवध्वंश +े विवति* क े शास+ का गंभीर उल्लंघ+ विकया; और (viii) न्याय, साम्या और सद्विववेक क े सिसद्धां ों क े अ+ुरूप, वाद 4 और 5 दो+ों की तिर्डक्री की Sा+ी होगी और अ+ु ोष को ऐसी रीति से ढाला Sा+ा होगा Sो न्याय, बं*ु ा, मा+व गरिरमा और *ार्मिमक विवश्वास की समा+ ा क े संवै*ावि+क मूल्यों को ब+ाए रख ा हो।

XVIII. विहन्दुओं +े रामचबू रा र्थीा *ार्मिमक महत्व की अन्य वस् ुओं पर लम्बे, स और वि+बा:* उपास+ा क े आ*ार पर बाहरी अहा े में अप+ा स्पष्ट कब्Sे का हक स्र्थीाविप कर खिलया है। हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों +े आं रिरक अहा े में ी+ गुम्बदाकार संरच+ा क े भी र पूSा कर+े का दावा विकया है। हिंहदुओं द्वारा अंदर पूSा कर+े क े उ+क े अति*कार क े दावे को मुस्जिस्लमों द्वारा प्रति वाद विकया गया है। उच्च न्यायालय द्वारा विवभाS+ क े खिलए तिर्डक्री की वै*ावि+क ा

789. उच्च न्यायालय +े इस वि+ष्कष: पर विक हिंहदू और मुस्जिस्लम का संयुX कब्Sा र्थीा, विववाविद स्र्थील का वित्र- विवभाS+ का वि+द†श विदया, एक ति हाई मुस्जिस्लमों, हिंहदुओं और वि+म ही अखाड़ा प्रत्येक को सौंपा गया। न्यायमूर्ति एस यू खा+ +े अव*ारिर विकया विक स्वत्व कब्Sे का अ+ुसरर्ण कर ा है और साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 110 क े प्राव*ा+ों क े आ*ार पर इस वि+ष्कष: पर पहुंचे विक विववाविद स्र्थील को ी+ पक्षों क े बीच समा+ रूप से विव रिर विकया Sा+ा चाविहए। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अव*ारिर विकया विक विववाविद ढाँचे क े क ें ˆीय गुंबद क े +ीचे क े क्षेत्र को हिंहदुओं द्वारा भगवा+ राम क े Sन्म mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्र्थीा+ क े रूप में मा+ा Sा ा है और पूSा की Sा ी है। उन्हो+ें अणिभवि+*ा:रिर विकया विक भूविम का यह भाग 'श्री रामSन्मस्र्थीा+' +ाम से ज्ञा देव ा का गठ+ कर ा है सिSसका हिंहदुओं क े खिलए विवशेष महत्व है। Sहाँ क आं रिरक अहा े क े भी र की अन्य भूविम का संबं* है, न्यायमूर्ति अ£वाल +े अव*ारिर विकया विक यह प्रार्थी:+ा और पूSा क े खिलए दो+ों समुदायों क े सदस्यों द्वारा लगा ार उपयोग विकया गया है, यह देख े हुए विक वाद 5 में अ+ु ोष क े खिलए प्रार्थी:+ा को "इस रीक े से शब्दबद्ध विकया गया र्थीा, Sो यह दशा: ा है विक न्यायालय से इसे माँगा +हीं गया है बस्जिल्क यह न्यायालय क े विववेक पर छोड़ विदया गया है, यविद वह इसे समुतिच पा ा है।" न्यायमूर्ति अ£वाल +े कहा विक पूर्ण: न्याय कर+े और मुकदमेबाSी की बाहुल्य ा से बच+े क े खिलए, सीपीसी क े आदेश VII वि+यम 7 क े ह अ+ु ोष को ढाल+ा अदाल क े खिलए खुला र्थीा। इसखिलए न्यायमूर्ति अ£वाल भी प्रारंणिभक तिर्डक्री क े संदभ: में वित्र -विवभाS+ क े वि+द†श में शाविमल हुए। न्यायमूर्ति र्डी वी शमा: +े वाद 5 को पूर्ण: ः तिर्डक्री दी।

790. वाद 5 में वाविदयों की ओर से पेश विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े. परासर+ +े क: विदया विक "पूर्ण: न्याय कर+े क े खिलए" अ+ु ोष गढ़+े क े प्रयास में, उच्च न्यायालय +े एक क्षेत्राति*कार प्रकस्जिल्प विकया Sो उसमें वि+विह +हीं र्थीा; यह कहा गया विक ऐसी शविX संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 142 क े अ*ी+ इस न्यायालय की अ+न्य अति*कारिर ा में वि+विह है।

791. उच्च न्यायालय की तिर्डक्री की शुद्ध ा का आकल+ कर+े में, यह शुरू में उल्लेख विकया Sा+ा चाविहए विक उच्च न्यायालय को विवभाS+ क े खिलए मुकदमे से रोका +हीं गया र्थीा। विवभाS+ क े खिलए एक मुकदमे में, यह अति सामान्य का+ू+ है विक हर पक्ष वादी और प्रति वादी दो+ों हैं। उच्च न्यायालय वि+म्+ की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सु+वाई कर रहा र्थीा: (i) पूSा कर+े क े अति*कार को लागू कर+े की मांग कर े हुए एक उपासक द्वारा विकया गया मुकदमा (वाद 1); (ii) मंविदर क े प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए सेवाय ी अति*कारों का दावा कर े हुए वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर मुकदमा (वाद 3); (iii) सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और मुस्जिस्लमों द्वारा स्वत्व पर घोषर्णा क े खिलए मुकदमा (वाद 4); और (iv) हिंहदू देव ाओं की ओर से एक घोषर्णा क े खिलए एक मुकदमा सिSसमें मंविदर क े वि+मा:र्ण में विकसी भी बा*ा को रोक+े क े खिलए वि+षे*ाज्ञा भी मांगी गई है (वाद 5)। उच्च न्यायालय को विवशेष रूप से घोषर्णात्मक वादों, वाद 4 और 5 में स्वत्व क े प्रश्न को वि+र्ण- कर+े क े खिलए आहू विकया गया र्थीा।

792. श्रीवि+वास राम क ु मार ब+ाम महाबीर प्रसाद402 में इस न्यायालय की ी+ न्याया*ीशों की खंर्डपीठ +े अव*ारिर विकया विक यह न्यायालय क े खिलए खुला +हीं है विक वह उस मामले पर वादी को अ+ु ोष प्रदा+ करे सिSसक े खिलए अणिभवच+ों में कोई आ*ार +हीं है। न्यायमूर्ति बी क े मुखS- +े अव*ारिर विकया: “9... हालांविक, सवाल उठ ा है विक क्या, वादपत्र में ऐसे विकसी वैकस्जिल्पक मामले की अ+ुपस्जिस्र्थीति में उसे उस आ*ार पर अ+ु ोष दे+े क े खिलए यह अदाल क े खिलए खुला है। वि+स्संदेह वि+यम यह है विक अदाल उस मामले पर वादी को अ+ु ोष +हीं दे सक ी है सिSसक े खिलए अणिभवच+ों में कोई आ*ार +हीं र्थीा और सिSसक े खिलए दूसरे पक्षकार को +हीं बुलाया गया र्थीा या उसे पूरा कर+े का अवसर +हीं विमला र्थीा।" 402 1951 एससीआर 277 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस सिसद्धां को श्री वेंकर्टरमर्ण देवरु ब+ाम मैसूर राज्य403 में संविव*ा+ पीठ क े फ ै सले में दोहराया गया र्थीा, इस न्यायालय क े खिलए बोल े हुए न्यायमूर्ति वेंकर्टरामा अय्यर +े अव*ारिर विकया: "एक पक्ष द्वारा अप+ी दलीलों को आगे रख+े की आवश्यक ा का उद्देश्य, विवरो*ी पक्ष को उन्हें पलर्ट+े और अप+े मामले क े समर्थी:+ में साक्ष्य प्रस् ु कर+े क े खिलए सक्षम ब+ा+ा है। और यह + ो विवति*क होगा और + ही उतिच होगा विक वास् विवक विववाद्यक मामले में प्रस् ु विकए गए साक्ष्यों को संदर्भिभ विकया Sाए और उस साक्ष्य क े आ*ार पर एक ऐसे मामले में वि+ष्कष: पर पहुँचा Sाए Sो विववाद्यक +हीं र्थीा और उस वि+ष्कष: क े आ*ार पर पक्षकारों क े अति*कारों का विववि+श्चय विकया Sाए।" उच्च न्यायालय +े एक ऐसा रास् ा अप+ाया है Sो ऊपर विदए गए सिसद्धां ों क े संदभ: में उसक े खिलए खुला +हीं र्थीा। उस+े वे अ+ु ोष विदए Sो मुकदमों में प्रार्थी:+ाओं की विवषय-वस् ु +हीं र्थीी। ऐसा कर+े की प्रविक्रया में, इस+े बँर्टवारे क े खिलए वाद में दीवा+ी न्यायालय वाली अति*कारिर ा को £हर्ण कर खिलया, Sबविक इसक े समक्ष वाद ऐसा +हीं र्थीा। सीपीसी का आदेश VII वि+यम 7 इस प्रकार उपबस्जिन्* कर ा है: “7. अ+ु ोष का विववि+र्मिदष्ट रूप से कर्थी+- हर वादपत्र में उस अ+ु ोष का विववि+र्मिदष्ट रूप से कर्थी+ होगा सिSसक े खिलए वादी सामान्य ः या अ+ुकल्प ः दावा कर ा है और यह आवश्यक +हीं होगा विक ऐसा कोई सा*ारर्ण या अन्य अ+ु ोष मांगा Sाए, Sो न्यायालय न्यायसंग समझे Sो सव:दा ही उसी विवस् ार क ऐसे विदया Sा सक े गा मा+ो वह मांगा गया हो, और यही वि+यम प्रति वादी द्वारा अप+े खिलखिख कर्थी+ में दावा विकए गए विकसी अ+ु ोष को भी लागू होगा।" उपरोX प्राव*ा+ क े खिलए वादी को विवर्मि+विदष्ट रूप से सामान्य ः या अ+ुकल्प ः अ+ु ोष का दावा कर+े की आवश्यक ा हो ी है। हालांविक, यह स्पष्ट कर ा है विक उस सामान्य और अन्य अ+ु ोष क े खिलए कह+ा आवश्यक 403 1958 एससीआर 895 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं है Sो हमेशा अदाल क े विववेका+ुसार विदया Sा सक ा है। यह उपबन्* दीवा+ी विवचारर्ण में विकसी न्यायालय को वाद क े ढाँचे को लगभग बदल दे+े क े काय: को कर+े का अति*कार +हीं दे ा Sैसा विक उच्च न्यायालय द्वारा विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय क े समक्ष अणिभवच+ों में कोई आ*ार +हीं र्थीा और वि+तिश्च रूप से उ+ अ+ु ोषों की कोई आवश्यक ा +हीं र्थीी सिSन्हें भूविम क े विवभाS+ को वि+द†णिश कर+े क े खिलए, उस रीक े से Sैसा विक कोई न्यायालय बँर्टवारे क े वाद में कर ा है, माँगा गया र्थीा ।

793. णिशव क ु मार शमा: ब+ाम सं ोष क ु मारी404 में इस न्यायालय की दो न्याया*ीशों की न्यायपीठ क े खिलए बोल े हुए न्यायमूर्ति एस. बी. सिसन्हा +े अव*ारिर विकया:

“27. विवति* का न्यायालय वै*ावि+क का+ू+ों से परे अप+ी विववेका*ी+ अति*कारिर ा का प्रयोग +हीं कर सक ा है। इसके विववेकाति*कार का प्रयोग मौSूदा क़ा+ू+ के संदभ: में विकया Sा+ा चाविहए।"
[इस संदभ: में शमसु सुहारा बीवी ब+ाम Sी एलेक्स405 में न्यायमूर्ति अशोक भा+ का वि+र्ण:य को भी देखें]। ओम प्रकाश ब+ाम राम क ु मार406 में, ी+ न्याया*ीशों की पीठ क े खिलए बोल े हुए न्यायमूर्ति एम फाति मा बीवी +े अव*ारिर विकया: “4... एक पक्षकार को वह अ+ु ोष +हीं विदया Sा सक ा है सिSसका दावा +हीं विकया गया है, यविद मामले की परिरस्जिस्र्थीति ऐसी है विक इस रह का अ+ु ोष दे+े से विह बद्ध पक्षकार को गंभीर क्षति होगी और वह संविवति* क े अ*ी+ मूल्यवा+ अति*कारों से वंतिच हो Sाएगा।" 404 (2007) 8 एससीसी 600 405 (2004) 8 एससीसी 569 प्रस् र 11 पर 406 (1991) 1 एससीसी 441 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उच्च न्यायालय +े उस अ+ु ोष को दे+े में पूरी रह से गल ी की है Sो अणिभवच+ों क े दायरे से परे है और वाद 3, 4 और 5 में वादकारिरयों द्वारा स्र्थीाविप मामलों से परे है।
794. विववाविद स्र्थील क े वित्र-विवभाS+ का अ+ु ोष दे+े में उच्च न्यायालय क े पूरे दृविष्टकोर्ण में एक और गंभीर दोष है। इस वि+ष्कष: पर आ+े क े बाद विक वाद 3 (वि+म ही अखाड़ा द्वारा दायर) और वाद 4 (सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: द्वारा दायर) परिरसीमा द्वारा बाति* र्थीे, उच्च न्यायालय +े वाद 3 और 4 में वादकारिरयों को वाद 5 में अ+ु ोष प्रदा+ विकया। यह क: की अवहेल+ा कर ा है और विवति* क े सुस्र्थीाविप सिसद्धां ों क े विवपरी है। इसक े अलावा, वि+म ही अखाड़ा द्वारा दावा एक सेवाय क े रूप में र्थीा सिSस+े प्रबं*+ और प्रभार क े खिलए एक तिर्डक्री का दावा विकया र्थीा। अप+े स्वयं क े मामले में, वि+म ही अखाड़ा को Sमी+ का एक स्व ंत्र विहस्सा +हीं विदया Sा सक ा र्थीा। इस वि+र्ण:य से, उच्च न्यायालय का यह वि+ष्कष: विक वि+म ही अखाड़ा का वाद परिरसीमा द्वारा बाति* र्थीा, बरकरार रखा गया है लेविक+ वाद 4 में परिरसीमा की बाध्य ा आकर्मिष हो+े क े संबं* में वि+ष्कष: को उलर्ट विदया गया है। अंति म अ+ु ोष का विवश्लेषर्ण कर े समय, Sो प्रदा+ की Sाएगी, इस पहलू पर विवचार विकया Sाएगा। पी. 2 स्वत्व पर वि+ष्कष:
795. व:मा+ मामले क े थ्यों, साक्ष्य और मौखिखक कÂ +े इति हास, पुरा त्व, *म: और का+ू+ क े क्षेत्रों का प ा लगाया है। का+ू+ को इति हास, विवचार*ारा और *म: पर राS+ीति क संघषÂ से अलग हो+ा चाविहए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पुरा स्जित्वक आ*ारों क े संदभ: से परिरपूर्ण: एक मामले क े खिलए, हमें यह याद रख+ा चाविहए विक यह का+ू+ ही है Sो वह संरच+ा प्रदा+ कर ा है सिSस पर हमारा बहुसंस्क ृ ति समाS विर्टका हुआ है। का+ू+ वह आ*ार ब+ा ा है सिSस पर इति हास, विवचार*ारा और *म: क े कई ा+े प्रति स्प*ा: कर सक े हैं। अप+ी सीमाओं का वि+*ा:रर्ण करक े, अंति म मध्यस्र्थी क े रूप में इस न्यायालय को इस सं ुल+ की भाव+ा को संरतिक्ष कर+ा चाविहए विक एक +ागरिरक की मान्य ाएँ दूसरे की स्व ंत्र ाओं और मान्य ाओं में हस् क्षेप या वच:स्व +हीं कर ी हों। 15 अगस् 1947 को, एक राष्ट्र क े रूप में भार +े आत्म-वि+र्ण:य क े सप+े को साकार विकया। 26 S+वरी, 1950 को हम+े स्वयं को भार का संविव*ा+ प्रदा+ विकया Sो उ+ मूल्यों क े प्रति अविवचल प्रति बद्ध ा क े रूप में है Sो हमारे समाS को परिरभाविष कर े हैं। संविव*ा+ क े मूल में विवति* क े शास+ द्वारा समर्भिर्थी और प्रवर्ति समा+ ा क े सिसद्धां क े प्रति प्रति बद्ध ा है। हमारे संविव*ा+ क े ह, दैवीय संबद्ध ा रख+े वाले सभी *मÂ, विवश्वासों और म ों क े +ागरिरक, विवति* क े अ*ी+ हैं और का+ू+ क े समक्ष समा+ हैं। इस न्यायालय क े प्रत्येक न्याया*ीश को संविव*ा+ और उसक े मूल्यों को ब+ाए रख+े क े खिलए + क े वल काय: सौंपा गया है बस्जिल्क शपर्थी भी विदलाई गयी है। संविव*ा+ एक *म: की आस्र्थीा और विवश्वास को अन्य *म: से अं र +हीं कर ा है। विवश्वास, उपास+ा और प्रार्थी:+ा क े सभी रूप समा+ हैं। सिS+ लोगों का यह क:व्य है विक वे संविव*ा+ की व्याख्या करें, इसे लागू करें और इसक े सार्थी Sुड़ें, वे क े वल इसकी अ+देखी भी कर सक े हैं Sब हमारे समाS और राष्ट्र को Sोखिखम हो। संविव*ा+, उ+ न्याया*ीशों से Sो इसकी व्याख्या कर े हैं, वे लोग Sो इसे शासिस कर े हैं, Sो इसे लागू कर े हैं, लेविक+ इ+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सबसे ऊपर, उ+ +ागरिरकों से Sो अप+े Sीव+ की एक अविवभाज्य विवशेष ा क े रूप में इसक े सार्थी संलग्न रह े हैं, से वा ा:लाप कर ा है।
796. व:मा+ मामले में, इस न्यायालय को अ+ोखे आयाम क े न्यायवि+र्ण:य+ क े सार्थी काय: कर+ा है। यह विववाद अचल संपखित्त का है। न्यायालय आस्र्थीा या विवश्वास क े आ*ार पर +हीं परन् ु साक्ष्यों क े आ*ार पर स्वत्व य कर ी है।विवति* हमें स्वाविमत्व और कब्Sे का मूलभू मापदंर्ड प्रदा+ कर ी है। विववाविद संपखित्त पर स्वत्व वि+*ा:रिर कर+े में न्यायालय साक्ष्य क े सुलझे हुए सिसद्धां ों को लागू कर ी है, सिSस पर पक्षकार +े अचल संपखित्त पर दावा विकया है।
797. प्रातियक ाओं क े सं ुल+ पर यह संक े कर+े क े खिलए स्पष्ट साक्ष्य है विक बाह्य अहा े में हिंहदुओं द्वारा वष: 1857 में एक वि£ल-ई ंर्ट दीवार ब+ा+े क े बावSूद पूSा +हीं की गई र्थीी। बाह्य अहा े में उ+का कब्Sा उ+क े वि+यंत्रर्ण से Sुड़ी घर्ट+ाओं क े सार्थी स्र्थीाविप है।
798. आं रिरक अहा े क े संबं* में 1857 में अं£ेSों द्वारा अव* क े विवलय से पूव: हिंहदुओं द्वारा पूSा कर+े की प्रातियक ाओं की प्रबल ा पर साक्ष्य है। मुस्जिस्लमों +े यह साविब कर+े का कोई साक्ष्य +हीं विदया विक सोलहवीं श ाब्दी में वि+मा:र्ण की ति णिर्थी से 1857 से पूव: आं रिरक संरच+ा उ+क े अ+न्य कब्Sे में र्थीा। वि£ल-ई ंर्ट की दीवार क े ब++े क े बाद मस्जिस्Sद का ढाँचा मौSूद रहा और साक्ष्य यह संक े देे े हैं विक इसक े परिरसर में +माS अदा की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गई र्थीी। विदसंबर 1949 क े वक्फ वि+रीक्षक की रिरपोर्ट: ब ा ी है विक मुसलमा+ों को +माS अदा कर+े क े खिलए स्व ंत्र और वि+र्मिवघ्+ रूप से मस्जिस्Sद क पहुंच+े में बा*ा र्डाली Sा रही र्थीी। हालांविक, यह दशा:+े क े साक्ष्य हैं विक मस्जिस्Sद क े ढाँचे में +माS अदा की गई र्थीी और विद+ांक 16 विदसंबर 1949 को विपछले शुक्रवार की +माS अदा की गई र्थीी। विद+ांक 22/23 विदसंबर 1949 क े मध्यरावित्र को Sब हिंहदू मूर्ति यों की स्र्थीाप+ा से मस्जिस्Sद को अपविवत्र विकया गया र्थीा ब मुस्जिस्लमों को पूSा और कब्Sे से बाहर कर विदया गया। उस अवसर पर मुस्जिस्लमों का बाहर विकया Sा+ा विकसी भी विवति*क अति*कार क े माध्यम से +हीं बस्जिल्क एक अति*वि+यम क े माध्यम से र्थीा, सिSसकी गर्ण+ा उन्हें उ+की पूSा क े स्र्थीा+ से वंतिच कर+े क े खिलए की गई र्थीी। सीआरपीसी 1898 की *ारा 145 क े ह काय:वाही प्रारम्भ कर+े क े बाद और आं रिरक अहा े की कु क— क े बाद एक प्रापक वि+युX विकया गया और हिंहदू मूर्ति यों की पूSा कर+े की अ+ुमति दी गई। वादों क े लंब+ क े दौरा+ मस्जिस्Sद क े संपूर्ण: ढाँचे को एक साव:Sवि+क पूSा स्र्थील को +ष्ट कर+े क े खिलए एक वि+*ा:रिर काय: में लाया गया र्थीा। मुस्जिस्लमों को गल रीक े से मस्जिस्Sद से वंतिच विकया गया है सिSसका वि+मा:र्ण 450 साल पूव: विकया गया र्थीा।
799. हम पहले ही यह वि+ष्कष: वि+काल चुक े हैं विक उच्च न्यायालय द्वारा ी+ प्रकार का विद्वभाS+ विवति*क रूप से अपोषर्णीय र्थीा। यहां क विक लोक शांति और प्रशांति रख+े क े मामले में भी उच्च न्यायालय का स्वयं का समा*ा+ व्यवहाय: +हीं है। विववाविद स्र्थील की सभी माप 1500 वग: गS की है। भूविम mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का विवभाS+ या ो पक्षकारों का या शांति और प्रशांति की भाव+ा को सुरतिक्ष कर+े का लोक सा*+ +हीं ब+ेगा।
800. वाद 5 को, प्रर्थीम वादी (देव ा भगवा+ राम) Sो एक न्यातियक व्यविX है, क े आदेश पर अ+ुरक्षर्ण योग्य अव*ारिर विकया गया है। ीसरे वादी (वाद विमत्र) को पहले वादी का प्रति वि+ति*त्व कर+े का हकदार अव*ारिर विकया गया है। हमारा दृविष्टकोर्ण यह है विक एक रफ वाद 5 में एक तिर्डक्री हो+ी चाविहए और वाद 4 में भी मुस्जिस्लमों को एक मस्जिस्Sद और उससे सहायक गति विवति*यों क े वि+मा:र्ण क े खिलए वैकस्जिल्पक भूविम क े आवंर्ट+ का वि+द†श दे े हुए आंणिशक रूप से तिर्डक्री हो+ी चाविहए। मुस्जिस्लमों का भूविम का आवंर्ट+ इसखिलए आवश्यक है क्योंविक यद्यविप सम्भाव+ाओं क े सं ुल+ पर मुस्जिस्लमों द्वारा प्रस् ु साक्ष्यों की ुल+ा में सम£ विववाविद संपखित्त पर कब्Sे क े संबं* में विहन्दुओं का दावा बेह र आ*ार पर है, मुस्जिस्लम 22 विदसम्बर 1949 को मस्जिस्Sद क े अपविवत्रीकरर्ण से बेदखल हो गए सिSसे अं ः 6 विदसम्बर 1992 को ध्वस् कर विदया गया। मुसलमा+ों द्वारा मस्जिस्Sद का कोई परिरत्याग +हीं विकया गया र्थीा। इस न्यायालय को संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 142 क े अ*ी+ अप+ी शविXयों का प्रयोग कर े हुए यह सुवि+तिश्च कर+ा चाविहए विक विकए गये अपक ृ त्य को उपचारिर विकया Sा+ा चाविहए। न्याय +हीं होगा, यविद न्यायालय उ+ मुस्जिस्लमों क े अति*कारों की अ+देखी कर ा है और Sो मस्जिस्Sद क े ढाँचे से वंतिच रह गए हैं सिS+क े माध्यम से विवति* क े शास+ क े खिलए प्रति बद्ध *म:वि+रपेक्ष राष्ट्र में वि+योसिS +हीं विकया Sा+ा चाविहए र्थीा। संविव*ा+ सभी *मÂ की समा+ ा को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अणिभ*ारिर कर ा है। सविहष्र्णु ा और परस्पर सहयोग से हमारे राष्ट्र और इसकी S+ ा की *म:वि+रपेक्ष प्रति बद्ध ा रतिक्ष हो ी है।
801. सम£ स्र्थील का क्षेत्रफल लगभग 1500 वग: गS का है। आवंविर्ट भूविम क े क्षेत्रफल का वि+*ा:रर्ण कर े समय मुस्जिस्लम समुदाय को उ+क े उपास+ा स्र्थील क े अवै* विव+ाश क े खिलए पु+स्र्थीा:प+ प्रदा+ कर+ा आवश्यक है। मुस्जिस्लमों को दी Sा+े वाली राह की प्रक ृ ति की ुल+ा कर+े क े बाद, हम यह वि+द†श दे े हैं विक सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: को अति*गृही भूविम में से अयोध्या शहर क े भी र या ो क ें ˆ सरकार द्वारा या उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 5 एकड़ भूविम आवंविर्ट की Sाए। यह काय:, और सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: को भूविम सौंप+े क े परिरर्णामस्वरूप वाद 5 में तिर्डक्री क े परिरर्णामस्वरूप आं रिरक और बाह्य अहा ों से युX विववाविद स्र्थील को सौंप+े क े सार्थी - सार्थी विकया Sाएगा। वाद 4 उपरोX श Â में तिर्डक्री की Sाएगी।
802. अयोध्या में क ु छ क्षेत्रों का अS:+ अति*वि+यम, 1993 की *ारा 6 क ें ˆीय सरकार को यह वि+देश दे+े की शविX प्रदा+ कर ी है विक उस क्षेत्र या उसक े विकसी भाग क े संबं* में अति*कार, हक और विह क े न्ˆ सरकार में वि+विह रह+े क े बSाय प्राति*कारी या वि+काय या विकसी न्यास क े न्यासी में वि+विह हो Sाएंगे, Sो सरकार द्वारा अति*रोविप वि+यमों और श Â का अ+ुपाल+ कर+े क े खिलए ैयार हैं।407 407 6. विकसी अन्य प्राति*कारी या वि+काय या न्यास में क्षेत्र को वि+विह कर+े का वि+देश दे+े की क ें ˆीय सरकार की शविX- (1) *ारा 3, *ारा 4, *ारा 5 और *ारा 7 में विकसी बा क े हो े हुए भी, यविद क ें ˆीय सरकार का यह समा*ा+ हो Sा ा है विक इस अति*वि+यम क े प्रारंभ को या उसक े पश्चा ् गविठ कोई प्राति*कारी या अन्य वि+काय या विकसी न्यास क े न्यासी ऐसे वि+बं*+ों और श Â का, Sो वह सरकार अति*रोविप कर+ा ठीक समझे, अ+ुपाल+ कर+े क े खिलए रSामंद है ो वह, राSपत्र में अति*सूच+ा द्वारा, यह वि+देश दे सक े गी विक उस क्षेत्र या उसक े विकसी भाग क े संबं* में अति*कार, हक और विह या उ+में से कोई, क े न्ˆीय सरकार में इस प्रकार वि+विह ब+े रह+े क े बSाय, उस प्राति*कारी या वि+काय या उस न्यास क े न्यासिसयों में अति*सूच+ा की ारीख को या ऐसी पश्चात्व - ारीख को, Sो अति*सूच+ा में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA *ारा 7 (1) में यह प्राव*ा+ है विक *ारा 3 क े ह क ें ˆ सरकार में वि+विह संपखित्त, सरकार या विकसी भी व्यविX या विकसी न्यास क े न्यासिसयों और अति*कारिरयों द्वारा इस संबं* में पोषर्णीय रखी Sाएगी।408
803. हमारा विवचार है विक क े न्ˆ सरकार को *ारा 6 और *ारा 7 द्वारा प्रदत्त शविXयों का प्रयोग कर े हुए विकसी न्यास या अन्य समुतिच ंत्र स्र्थीाविप कर+े क े खिलए, सिSसको वाद 5 की तिर्डक्री क े श Â में भूविम सौंपी Sाएगी, उसे स्कीम विवरतिच कर+े का वि+देश दे+ा आवश्यक होगा। इस योS+ा में न्यास क े प्रबं*+ या भूविम क े वि+विह ार्थी: चु+े गए वि+काय क े संबं* में वि+विह शविX और अति*कार क े खिलए आवश्यक सभी प्राव*ा+ शाविमल होंगे।
804. वि+म ही अखाड़े द्वारा दायर वाद 3 को परिरसीमा द्वारा बाति* अव*ारिर विकया गया है। हम+े वाद 5 की पोषर्णीय ा क े खिलए वि+म ही अखाड़ा और सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: की आपखित्त को भी खारिरS कर विदया है, Sो उ+की दलील पर आ*ारिर र्थीा विक वि+म ही अखाड़ा एक सेवाय है। वि+म ही अखाड़े क े एक सेवाय हो+े का दावा खारिरS हो चुका है। हालाँविक, विववि+र्मिदष्ट की Sाए, वि+विह हो Sाएगा । (2) Sब उस क्षेत्र या उसक े भाग क े संबं* में कोई अति*कार, हक और विह उप*ारा (1) में वि+र्मिदष्ट प्राति*कारी या वि+काय या न्यासिसयों में वि+विह हो Sा ा है ब उस क्षेत्र या उसक े भाग क े संबं* में क े न्ˆीय सरकार क े ऐसे अति*कार ऐसे वि+विह हो+े की ारीख से ही, उस प्राति*कारी या वि+काय या उस न्यास क े न्यासिसयों क े अति*कार समझे Sाएंगे। (3) *ारा 4, *ारा 5, *ारा 7 और *ारा 11 क े उपबं*, Sहां क हो सक े, ऐसे प्राति*कारी या वि+काय या न्यासिसयों क े संबं* में वैसे ही लागू होंगे Sैसे वे क े न्ˆीय सरकार क े संबं* में लागू हो े हैं और इस प्रयोS+ क े खिलए उसमें क े न्ˆीय सरकार क े प्रति वि+द†शों का यह अर्थी: लगाया Sाएगा विक वह ऐसे प्राति*कारी या वि+काय या न्यासिसयों क े प्रति वि+द†श हैं। 408 7. सरकार द्वारा संपखित्त का प्रबं*-(1) विकसी संविवदा या खिलख अर्थीवा विकसी न्यायालय, अति*करर्ण या अन्य प्राति*कारी क े आदेश में विकसी प्रति क ू ल बा क े हो े हुए भी, इस अति*वि+यम क े प्रारंभ से ही, *ारा 3 क े अ*ी+ क ें ˆीय सरकार में वि+विह संपखित्त का प्रबं*, क ें ˆीय सरकार द्वारा अर्थीवा उस सरकार द्वारा इस वि+विमत्त प्राति*क ृ विकसी व्यविX या व्यविX-वि+काय या विकसी न्यास क े न्यसिसयों द्वारा विकया Sाएगा । (2) *ारा 3 क े अ*ी+ क े न्ˆीय सरकार में वि+विह संपखित्त का प्रबं* कर+े में, क े न्ˆीय सरकार या प्राति*क ृ व्यविX यह सुवि+तिश्च करेगा विक उस क्षेत्र में, सिSस पर उत्तर प्रदेश राज्य क े सिSला फ ै Sाबाद की हसील फ ै Sाबाद सदर हसील क े परग+ा हवेली अव* क े अं ग: अयोध्या में £ाम कोर्ट रामचन्ˆ में ऐसी संरच+ा की (सिSसक े अं ग: उस संरच+ा क े भी री और बाहरी आंग+ों क े परिरसर हैं) स्जिस्र्थी र्थीी Sो सामान्य या राम Sन्म-भूविम बाबरी मस्जिस्Sद, क े +ाम से ज्ञा है । इस अति*वि+यम क े प्रारंभ क े पूव: विवद्यमा+ स्जिस्र्थीति को ब+ाए रखा Sाए । mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विववाविद स्र्थील पर वि+म ही अखाड़ा की ऐति हासिसक उपस्जिस्र्थीति और उसकी भूविमका क े संबं* में, पूर्ण: न्याय कर+े क े खिलए अ+ुच्छेद 142 क े ह इस न्यायालय क े खिलए अप+ी शविXयों का सहारा ले+ा आवश्यक है। इसखिलए, हम वि+द†श दे े हैं विक योS+ा विवरतिच कर+े क े खिलए वि+म ही अखाड़ा को प्रबं*+ में एक उपयुX भूविमका सौंपी Sाएगी।
805. द+ुसार हम आदेश और वि+द†श इस प्रकार दे े हैं: 1 (i) वि+म ही अखाड़ा द्वारा संस्जिस्र्थी वाद 3 को परिरसीमा द्वारा वर्जिS अव*ारिर और द+ुसार खारिरS विकया Sाएगा; (ii) सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: और अन्य वाविदयों द्वारा संस्जिस्र्थी वाद 4 को परिरसीमा क े अन्दर हो+ा अव*ारिर विकया गया है। वाद 4 को परिरसीमा द्वारा वS:+ कर+े वाले उच्च न्यायालय क े वि+र्ण:य को प्रत्यावर्ति कर विदया गया है; और (iii) वाद 5 को परिरसीमा क े ह अव*ारिर विकया गया है। 2 वाद 5 को प्रर्थीम वादी, सिSसका प्रति वि+ति*त्व ीसरे वादी द्वारा विकया गया है, क े इशारे पर अ+ुरक्षर्णीय ब+ाए रख+े क े खिलए अव*ारिर विकया गया है। वाद क े प्रार्थी:+ा खंर्ड (क) और (ख) क े संदभ: में एक तिर्डक्री Sो वि+म्+खिलखिख वि+द†शों क े अ*ी+ होगी: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) क े न्ˆ सरकार, इस वि+र्ण:य की ति णिर्थी से ी+ माह की अवति* क े भी र अयोध्या अति*वि+यम, 1993 में कति पय क्षेत्र क े अS:+ की *ारा 6 और 7 क े ह उसमें वि+विह शविXयों क े अ+ुसरर्ण में एक योS+ा ब+ाएगी। यह योS+ा *ारा 6 क े ह न्यासी बोर्ड: या विकसी अन्य उपयुX वि+काय क े सार्थी एक न्यास की स्र्थीाप+ा की परिरकल्प+ा करेगी। क े न्ˆ सरकार द्वारा विवरतिच योS+ा न्यास या वि+काय की काय:विवति* क े संबं* में आवश्यक प्राव*ा+ ब+ाएगी, सिSसमें न्यास क े प्रबं*+ से संबंति* मामले, न्यासिसयों की शविXयां सिSसमें मंविदर क े वि+मा:र्ण और सभी आवश्यक, आ+ुषंविगक और अ+ुपूरक मामले शाविमल हैं; (ii) आं रिरक और बाह्य अहा े का कब्ज़ा न्यास क े न्यासी बोर्ड: या इस प्रकार क े गविठ वि+काय को सौंप विदया Sाएगा। क ें ˆ सरकार उपरोX वि+द†शों क े अ+ुसार विवरतिच योS+ा क े संदभ: में प्रबं*+ और विवकास क े खिलए न्यास या वि+काय को शेष अति*गृही भूविम को सौंप+े क े संबं* में उपयुX प्राव*ा+ ब+ा+े क े खिलए स्व ंत्र होगी; और (iii) विववाविद संपखित्त क े कब्Sे को क ें ˆ सरकार क े ह वै*ावि+क प्रापक में वि+विह कर+ा Sारी रहेगा, Sब क विक 1993 क े अयोध्या अति*वि+यम की *ारा 6 क े ह अप+े क्षेत्राति*कार क े प्रयोग में न्यास या विकसी अन्य वि+काय में संपखित्त वि+विह कर े हुए एक अति*सूच+ा Sारी की गई हो। 3(i). उपरोX खंर्ड 2 क े ह न्यास या वि+काय को विववाविद संपखित्त सौंप+े क े सार्थी, 5 एकड़ भूविम क े उपयुX भूखंर्ड को वाद 4 में वादी सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: को सौंप विदया Sाएगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) भूविम या ो द्वारा आवंविर्ट की Sाएगी: (क) अयोध्या अति*वि+यम, 1993 क े ह अर्जिS भूविम में से क े न्ˆ सरकार द्वारा; या (ख) अयोध्या में विकसी उपयुX स्र्थीा+ पर राज्य सरकार द्वारा; क ें ˆ सरकार और राज्य सरकार वि+*ा:रिर अवति* में उपरोX आवंर्ट+ को काया:स्जिन्व कर+े क े खिलए एक-दूसरे क े परामश: से काय: करेंगे। (iii) सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड:, भूविम क े आवंर्ट+ पर मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े खिलए, सार्थी ही अन्य संबद्ध सुविव*ाओं क े खिलए सभी आवश्यक कदम उठा+े क े खिलए स्व ंत्र होगा; (iv) वाद 4 उपरोX वि+द†शों की श Â में इस सीमा की तिर्डक्री की Sाएगी; और (v) सुन्नी सेंर्ट्रल वक्फ बोर्ड: को वाद 4 में भूविम क े आबंर्ट+ क े खिलए वि+द†श इस न्यायालय में संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 142 क े ह वि+विह शविXयों क े अ+ुसरर्ण में Sारी विकए गए हैं।
4. संविव*ा+ क े अ+ुच्छेद 142 क े ह इस न्यायालय में वि+विह शविXयों का प्रयोग कर े हुए, हम वि+द†णिश कर े हैं विक क े न्ˆ सरकार द्वारा विवरतिच की Sा+े वाली योS+ा में न्यास अर्थीवा वि+काय में ऐसी रीति से सिSसे क े न्ˆ सरकार ठीक समझे, समुतिच प्रति वि+ति*त्व विकया Sा सक ा है।
5. विववाविद संपखित्त पर पूSा कर+े क े खिलए वाद 1 में वादी क े अति*कार को शांति और व्यवस्र्थीा ब+ाए रख+े और व्यवस्जिस्र्थी पूSा कर+े क े संबं* में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सुसंग प्राति*कारिरयों द्वारा अति*रोविप विकसी वि+बã*+ों क े अ*ी+ रह े हुए अणिभपुविष्ट विकया गया है।
806. सभी अपीलों का वि+स् ारर्ण उपरोX श Â में विकया Sाएगा। पक्षकारों को अप+े खच† स्वयं वह+ कर+ा होगा। अणिभस्वीक ृ ति इस वि+र्ण:य को दे+े में इस न्यायालय क े समक्ष-न्याय संबं*ी प्रति वाद +े मामले की Sविर्टल ा की प Â क े माध्यम से विववेच+ कर+े में एक मूल्यवा+ अं दृ:विष्ट प्रदा+ की है। अति*वXा की विवद्वत्ता, उ+क े काय:, उ+क े दृविष्टकोर्ण और उपरोX सभी न्यायालय क े अति*कारिरयों क े रूप में अप+ी भूविमका का वि+व:ह+ कर+े में र्टस्र्थी वि+ष्पक्ष ा की सराह+ा की Sा+ी चाविहए। हम विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े परासर+ और र्डॉ. राSीव *व+ द्वारा प्रदा+ की गई सहाय ा को स्वीकार कर े हैं सिSन्हों+े क: रखे। वास् व में, सु+वाई क े दौरा+ वे सिSस कारर्ण से न्यायालय में Sा े हैं, उ+क े प्रति वाविदयों क े प्रति उ+की वि+ष्पक्ष ा की भाव+ा क े सार्थी सु+वाई पूरी कर+े की सुसाध्य विकया है विक दो+ों पक्ष मूल ः सत्य और न्याय क े खिलए अाशास्जिन्व हैं। अन्य वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा श्री सी एस वैद्य+ार्थी+, श्री एस क े Sै+, श्री रंSी क ु मार, श्री Sफरयाब सिSला+ी, सुश्री मी+ाक्षी अरोड़ा, श्री शेखर +ेफड़े और श्री पी एस +रसिसम्हा, सिS+क े प्रयासों को स्वीकार कर+े की आवश्यक ा है। हम श्री पी ए+ विमश्रा, श्री मोहम्मद वि+Sामुद्दी+ पाशा, श्री वी ए+ सिसन्हा, श्री हरिर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA शंकर Sै+, श्री Sयदीप गुप्ता (वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा), श्री विवकास सिंसह (वरिरष्ठ विवद्वा+ अति*वXा), श्री एम सी ढींगरा, और श्री अ+ूप बोस द्वारा न्यायालय में प्रदा+ की गई सहाय ा को भी स्वीकार कर े हैं। अप+े मौखिखक और खिलखिख दो+ों कÂ में बहस कर+े वाले विवद्वा+ अति*वXा द्वारा विकए गए योगदा+ को स्वीकार कर े हुए, हमें विवद्वा+ सहायक अति*वXा की ईमा+दारी और समप:र्ण और उ+में से कवि+ष्ठ अति*वXा क े काय: को भी ध्या+ में रख+ा चाविहए। उपरोX कारर्णों और वि+द†शों क े सहम हो े हुए, हम में से एक +े इस प्रश्न पर विक “क्या विववाविद ढांचा विहन्दू भXों की आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार भगवा+ राम का Sन्म-स्र्थीा+ है" अलग कारर्ण अणिभखिलखिख विकया है। विवद्वा+ न्याया*ीश क े कारर्णों को परिरणिशष्ट में विदया गया है।.............................................. [ भार क े मुख्य न्यायमूर्ति, रंS+ गोगोई ].............................................. [ न्यायमूर्ति, एस ए बोबर्डे ].............................................. [ न्यायमूर्ति, र्डॉ. *+ंSय वाई चन्ˆचूड़ ].............................................. [ न्यायमूर्ति, अशोक भूषर्ण ]........................................... mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA [ न्यायमूर्ति, एस अब्दुल +ज़ीर ] +ई विदल्ली; 09 +वंबर, 2019 परिरणिशष्ट क्या विववाविद ढाँचा हिंहदुओं की आस्र्थीा, विवश्वास और वि+ष्ठा क े अ+ुसार भगवा+ राम का पविवत्र Sन्म स्र्थीा+ है?
1. उपरोX से संबंति* सभी वाद और उच्च न्यायालय द्वारा अणिभखिलखिख वि+ष्कषÂ में विवरतिच विववाद्यकों पर ध्या+ दे+ा आवश्यक है। वाद संख्या 1 में वि+म्+खिलखिख प्रासंविगक विववाद्यक र्थीा: विववाद्यक संख्या 1 यह र्थीी विक "क्या श्री राम चंˆ Sी की Sन्म भूविम स्र्थील वाद£स् संपखित्त है”? वाद संख्या 3 में वि+म्+खिलखिख प्रासंविगक विववाद्यक र्थीे: विववाद्यक संख्या 1: क्या वादपत्र क े प्रस् र 3 में कणिर्थी रूप से Sन्म भूविम का एक मंविदर है सिSसमें मूर्ति याँ स्र्थीाविप हैं ? विववाद्यक संख्या 5: क्या वाद£स् संपखित्त सम्रार्ट बाबर द्वारा ब+ाई गई मस्जिस्Sद है सिSसे बाबरी मस्जिस्Sद कहा Sा ा है? वाद संख्या 4 में प्रासंविगक विववाद्यक र्थीे: विववाद्यक संख्या 1 (क): यह कब और विकसक े द्वारा ब+ाया गया र्थीा-वादीगर्णों द्वारा अणिभकणिर्थी बाबर द्वारा या प्रति वादी सं. 13 द्वारा अणिभकणिर्थी मीर बाकी द्वारा ? विववाद्यक संख्या 1 (ख): Sैसा विक प्रति वादी संख्या 13 द्वारा अणिभकणिर्थी है विक क्या भव+ का वि+मा:र्ण एक कणिर्थी हिंहदू मंविदर स्र्थील को ध्वस् करक े विकया गया र्थीा? यविद हां, ो इसका प्रभाव? विववाद्यक संख्या 11: क्या श्री राम चंˆ Sी की Sन्म भूविम स्र्थील वाद£स् संपखित्त है”? mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विववाद्यक संख्या 14: क्या हिंहदू विववाविद स्र्थील की पूSा श्री राम Sन्म भूविम या Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में कर रहे हैं और अ+ं काल से ही श्रद्धालु इस पविवत्र स्र्थील में Sा रहे हैं। यविद ऐसा है, ो इसका प्रभाव? वाद संख्या 5 में प्रासंविगक विववाद्यक र्थीा: विववाद्यक संख्या 22: क्या प्रश्नग परिरसर या उसका कोई भाग परंपरा, आस्र्थीा और विवश्वास द्वारा भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है, Sैसा विक वादपत्र क े प्रस् र 19 और 20 में अणिभकणिर्थी है। यविद ऐसा है, ो इसका प्रभाव?

2. विवचारा*ी+ हिंबदुओं क े खिलए प्रासंविगक विववाद्यकों पर ध्या+ दे+े क े बाद, उपरोX संबं* में संक्षेप में पक्षकारों क े कÂ पर ध्या+ दे+ा आवश्यक है।

3. वाद संख्या 1 में, वादी स+ा + *म: को मा++े वाला अयोध्या का वि+वासी है और अप+े *म: क े अ+ुसार, वह देव ाओं और मूर्ति यों का दश:+ और पूSा कर ा र्थीा। प्रस् र 1 और 2 में यह दलील दी गई र्थीी।: “1. यह विक मूल वादी, स+ा + *म: का अ+ुयायी और अयोध्या का वि+वासी है और अप+े *म: क े अ+ुसार, वह देव ाओं और मूर्ति यों का दश:+ कर ा र्थीा और व:मा+ वादी अप+े मृ क विप ा (मूल वादी) की रह ही स+ा + *म: का अ+ुयायी है और पविवत्र स्र्थीा+ों आविद का दश:+ और देव ाओं की पूSा कर ा है।

2. यह विक वादी उस Sन्म भूविम स्र्थील में भगवा+ श्री राम चंˆ Sी की मूर्ति और चरर्ण पादुका का दश:+ और पूSा कर रहा है, सिSसका विववरर्ण यहां +ीचे विदया गया है और वह उस स्र्थीा+ में विब+ा विकसी बा*ा या हस् क्षेप क े और हमेशा भविवष्य में भी पूSा कर+े और दश:+ कर+े का हकदार है।

4. प्रति वादी संख्या 1, ज़हूर अहमद द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ में, वादपत्र क े प्रस् र 2 को वि+म्+खिलखिख रीक े से प्रत्युत्तर विदया गया र्थीा: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “2. संबंति* पैरा£ाफ को इ+कार विकया Sा ा है। सिSस संपखित्त का मामला दायर विकया गया है वह Sन्म भूविम +हीं है बस्जिल्क भार क े सम्रार्ट बाबर शाह द्वारा वि+र्मिम एक मस्जिस्Sद है।”

5. प्रस् र 9 में, यह दलील दी गई र्थीी विक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण बादशाह बाबर शाह +े अप+े मंत्री मोहम्मद मीर बाकी क े माध्यम से वष: 1528 में विकया र्थीा।

6. प्रस् र 27 में यह दलील दी गई र्थीी विक अयोध्या में राम Sन्मभूविम क े S+मस्र्थीा+ क े स्र्थीा+ पर काफी समय से एक मंविदर है और आS भी विवद्यमा+ है सिSसमें रामचन्ˆSी की मूर्ति याँ आविद हैं। यह कहा गया र्थीा विक प्रति वाविदयों और अन्य व्यविXयों क े विवरूद्ध बाबरी मस्जिस्Sद क े Sन्मस्र्थीा+ हो+े सम्बन्*ी दावा कर+े वाला व:मा+ वाद आपखित्तS+क है और अ+ुतिच लक्ष्यों को पा+े और आगामी चु+ावों में लाभ उठा+े क े खिलए लाया गया है।

7. वादी +े खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 9 से इ+कार कर े हुए प्रति उत्तर दायर विकया। इस बा से इ+कार विकया गया र्थीा विक मस्जिस्Sद बाबरी मस्जिस्Sद है। खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र 27 को भी इ+कार विकया गया र्थीा। यह कहा गया र्थीा विक प्रति वादी द्वारा उसिल्लखिख Sन्म स्र्थीा+ मंविदर कोई अन्य मंविदर है सिSसकी सीमाओं को भी प्रति उत्तर में उसिल्लखिख विकया गया र्थीा।

8. प्रति वादी संख्या 6, 8 और 9, Sो राज्य क े पक्षकार र्थीे, +े भी अप+ा खिलखिख कर्थी+ दS: कराया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

9. उ. प्र. सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: ऑफ वक्फ (ए स्जिस्म+्पश्चा "सुन्नी बोर्ड:" क े रूप में संदर्भिभ ) क े प्रति वादी संख्या 10, +े यह क: कर े हुए खिलखिख कर्थी+ दायर विकया सिSसमें कहा गया र्थीा विक वादपत्र क े प्रस् र 2 में संदर्भिभ भव+ राम चंˆ की Sन्म भूविम स्र्थील +हीं है और वादी और वादी का उX भव+ में राम चंˆ की कोई भी मूर्ति कभी भी स्र्थीाविप कर+े का कोई अति*कार +हीं है। वादी का पूSा और दश:+ कर+े का दावा और अति*कार का कोई प्रश्न ही +हीं है। यह दलील दी गई विक वाद£स् संपखित्त को बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में Sा+ा Sा ा है और उसका वि+मा:र्ण सम्रार्ट बाबर क े शास+काल में हुआ र्थीा। प्रस् र 10 क े अति रिरX दलीलों में वि+म्+खिलखिख रूप से कहा गया र्थीा: "यह विक वाद£स् संपखित्त मीर बाकी की देखरेख में सम्रार्ट बाबर क े शास+ काल में 1528 ईस्वी क े आसपास ब+ी एक पुरा+ी मस्जिस्Sद है और इसका उपयोग हमेशा मस्जिस्Sद क े रूप में विकया Sा ा रहा है और कभी भी मंविदर क े रूप में या मुस्जिस्लमों को छोड़कर विकसी अन्य समुदाय क े खिलए पूSा स्र्थील क े रूप में +हीं विकया गया र्थीा।"

10. वाद संख्या 3 क े वादी +े क: विदया विक अब Sन्म स्र्थीा+, सिSसे आम ौर पर Sन्म भूविम क े रूप में Sा+ा Sा ा है, को अयोध्या में राम का Sन्म स्र्थीा+ वादी संख्या 1 से संबंति* है। उX स्र्थीा+, Sन्म भूविम प्राची+ म काल से है और यह म+ुष्य की Sीविव स्मृति क े पूव: से ही मौSूद है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुस्जिस्लमों, प्रति वादी संख्या 6 से 8 +े खिलखिख कर्थी+ दS: विकया, Sहां यह क: विदया गया र्थीा विक सिSस संपखित्त क े विवरूद्ध वादी +े वाद दायर विकया है, वह बाबर शाह द्वारा ब+ाई गई बाबरी मस्जिस्Sद है, सिSसका वि+मा:र्ण वष: 1528 ईस्वी यू.पी. में विकया गया र्थीा। सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: ऑफ वक्फ +े भी यह दावा कर े हुए खिलखिख कर्थी+ दS: विकया र्थीा विक वष: 1528 में सम्रार्ट बाबर द्वारा वि+र्मिम मस्जिस्Sद र्थीी और वाद£स् संपखित्त को विकसी भी मंविदर क े अस्जिस् त्व से इ+कार विकया गया र्थीा।

11. प्रति वादी संख्या 10 उमेश चंˆ पांर्डे द्वारा एक खिलखिख कर्थी+ भी दS: विकया गया र्थीा। अप+े खिलखिख कर्थी+ में उन्हों+े कहा है विक Sन्म स्र्थीा+ देव ा रामलला विवराSमा+ की पूSा क े खिलए पविवत्र स्र्थीा+ है।

12. वाद संख्या 4 में, वादी +े क: विदया विक भार पर विवSय प्राप्त कर+े और अयोध्या शहर सविह क्षेत्रों पर कब्Sा कर+े क े बाद अयोध्या शहर में 433 वष: से अति*क समय पूव: सम्रार्ट बाबर द्वारा ब+ाई गई एक प्राची+ ऐति हासिसक मस्जिस्Sद मौSूद है सिSसे आम ौर पर बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में Sा+ा Sा ा है। वाद संख्या 4 में प्रति वादी संख्या 1 और 2 द्वारा खिलखिख कर्थी+ दS: विकया गया र्थीा। प्रस् र 25 में यह क: विकया गया र्थीा विक हिंहदू समुदाय क े सदस्य अ+ं काल से ही Sन्म भूविम क े रूप में स्र्थील की पूSा कर रहे हैं। प्रति वादी संख्या 3, वि+म ही अखाड़ा और प्रति वादी संख्या 4, महं रघु+ार्थी दास द्वारा एक खिलखिख कर्थी+ भी दायर विकया गया र्थीा। वादी द्वारा विकये गए मस्जिस्Sद क े अस्जिस् त्व क े दावे से इ+कार कर विदया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आगे यह रक विदया गया विक कणिर्थी मस्जिस्Sद कभी अस्जिस् त्व में +हीं र्थीी, + ही यह अब मौSूद है। सिSस भव+ को वादीगर्णों +े गल रीक े से बाबरी मस्जिस्Sद क े रूप में संदर्भिभ कर रहे हैं वह हमेशा से ही Sन्म भूविम का मंविदर सिSसमें हिंहदू देव ा की मूर्ति याँ स्र्थीाविप की गई हैं। अति रिरX कÂ में यह दलील दी गई विक प्रश्नग मंविदर सिSसे Sन्म भूविम क े रूप में Sा+ा Sा ा है, अयोध्या में स्जिस्र्थी भगवा+ राम चंˆ का Sन्म स्र्थीा+, Sो हमेशा से ही प्रति वादी संख्या 3 से संबंति* है।

13. वाद संख्या 4 में राज्य, प्रति वादी सं. 5 से 8 द्वारा खिलखिख कर्थी+ भी दायर विकया गया र्थीा, सिSसमें यह क: विदया गया र्थीा विक सरकार का उस संपखित्त में रूतिच +हीं रख ी है Sो विववाविद है और इस रह से वाद का प्रति वाद कर+े का प्रस् ाव +हीं है। प्रति वादी संख्या 10 +े एक खिलखिख कर्थी+ और अति रिरX खिलखिख कर्थी+ दS: विकया। क ु छ अन्य प्रति वाविदयों +े भी खिलखिख कर्थी+ दS: विकया। प्रति वादी संख्या 13, *रम दास द्वारा दायर खिलखिख कर्थी+ में यह कहा गया र्थीा विक मीर बाकी, Sो एक णिशया र्थीा और बाबर का मंत्री र्थीा, +े श्री राम Sन्म भूविम में राSा विवक्रमाविदत्य क े समय प्राची+ हिंहदू मंविदर को ध्वस् कर विदया। इसक े अलावा, यह कहा गया विक मूल रूप से एक मंविदर ब+ा र्थीा। अन्य प्रति वाविदयों में से कु छ +े खिलखिख कर्थी+ दS: विकए। प्रति वादी संख्या20, अखिखल भार ीय श्री राम Sन्म भूविम पु+रुद्धार सविमति क े संयोSक +े एक विवस् ृ खिलखिख कर्थी+ और अति रिरX कर्थी+ दS: विकया। वादी +े भी एक प्रति उत्तर दायर विकया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

14. वाद संख्या 5 में यह कहा गया र्थीा विक विववाविद परिरसर वह स्र्थील है Sहां मया:दा पुरुषोत्तम राम चंˆ Sी महाराS का Sन्म हुआ र्थीा। विहन्दू उस विदव्य की उपास+ा कर े हैं सिSसका कोई गुर्ण या आकार या रूप +हीं हो ा। प्रस् र 19 और 20 में वि+म्+खिलखिख क: विकया गया र्थीा: “19. यह विक प्राति*कारी क े लोक अणिभलेख द्वारा यह स्र्थीाविप है विक विववाविद परिरसर वह स्र्थील है Sहां मया:दा पुरुषोत्तम Sी महाराS का Sन्म सूय:वंशी महाराSा दशरर्थी क े पुत्र क े रूप में हुआ र्थीा, Sो भगवा+ श्री राम क े भXों की परंपरा और विवश्वास क े अ+ुसार यह वह स्र्थीा+ है Sहाँ उन्हों+े मा+व रूप में भगवा+ विवष्र्णु का अव ार खिलया। ब से इस स्र्थील को युगों-युगों से श्री राम Sन्म भूविम कहा Sा ा रहा है।

20. Sैसा विक यह ज्ञा है विक वह स्र्थील या स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम अप+े आप मे ही भगवा+ श्री राम क े भXों द्वारा एक देव ा क े रूप में पूSा की एक वस् ु रही है, क्योंविक श्री राम लला अर्थीवा बालक भगवा+ राम का यह दैवीय रूप में पूज्य विदव्य की भाव+ा को दशा: ा है। इस प्रकार स्र्थील को देव ा मा+ा गया और मंविदर का भव+ वि+मा:र्ण या वहां भगवा+ श्री राम की मूर्ति स्र्थीाविप कर+े से पहले ही उसका अप+ा एक विवति*क व्यविXत्व हो गया।”

15. वादपत्र क े प्रस् र 23 में, वादी +े गव+:मेंर्ट प्रेस, उ.प्र. द्वारा प्रकाणिश फ़ ै ज़ाबाद गSेविर्टयर क े 1928 संस्करर्ण पर भी अवलम्ब खिलया।

16. आगे कहा गया विक मंविदर को +ष्ट कर+े क े बाद वादी-देव ा से संबंति* भूविम पर विववाविद ढाँचे को खड़ा विकया गया र्थीा। प्रस् र 24 (सी) में यह कहा गया र्थीा विक मीर बाकी +े मंविदरों क े सार्थी Sो कु छ कर+े का प्रयास विकया, उसक े बावSूद भूविम हमेशा वादी देव ाओं क े पास ही रही। प्रस् र 24 (सी) इस प्रकार है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “24(सी) मीर बाकी +े मंविदरों क े सार्थी Sो क ु छ कर+े का प्रयास विकया, उसक े बावSूद भूविम हमेशा वादी देव ाओं क े पास ही रहीऔर उन्हों+े इस पर अप+ा कब्Sा कभी +हीं छोड़ा। थ्य ः और विवति* ः उ+का कब्Sा Sारी रहा। स्र्थीा+ देव ा और उसक े उपासकों क े कब्Sे से बाहर कभी +हीं गया। वे भव+ से संलग्न अहा े क े भी र इसक े दतिक्षर्णी गुंबद क े मेहराबदार क े साम+े का चबू रा, सिSसे राम चबू रा कहा Sा ा है, में भगवा+ श्री राम लला विवराSमा+ की मूर्ति, चरर्ण और सी ा रसोई Sैसे प्र ीकों क े माध्यम से उ+की पूSा कर े रहे। कोई भी इमार में प्रवेश +हीं कर सक ा, सिसवाय इसक े विक मस्जिस्Sद क े अहा े क े भी र विकसी मूर्ति की पूSा +हीं हो सक ी है, और मस्जिस्Sद का माग: अबाति* और स्व ंत्र हो+ा चाविहए और हर समय 'आस्र्थीा' रख+े वालों क े खिलए खुला हो+ा चाविहए। यह कभी भी हिंहदू पूSा स्र्थील क े द्वारा +हीं हो सक ा। मस्जिस्Sद क े सम्बन्* में अल्लाह क े सार्थी हक या कब्Sे का कोई सहभाग +हीं हो सक ा। उसका अति*कार अ+न्य हो+ा चाविहए।"

17. प्रस् र 25 में यह क: विदया गया र्थीा विक श्री राम Sन्म भूविम पर वादी- देव ाओं की पूSा अ+ं काल से हो रही है। यह देव ाओं का स्र्थीा+ है। वादी-देव ाओं क े हक और कब्Sे क े दृविष्टग कोई वै* वक्फ कभी +हीं ब+ाया गया र्थीा या उसक े विकसी भी विहस्से पर ब+ाया Sा सक ा र्थीा।

18. प्रति वादी संख्या 3, वि+म ही अखाड़ा +े एक खिलखिख कर्थी+ दायर विकया सिSसमें प्रस् र 19 और 20 को अस्वीकार कर विदया गया र्थीा सिSसमें कहा गया र्थीा: “19. यह विक प्रस् र-19 की अन् व:स् ु को कोई प्रति उत्तर दे+े की आवश्यक ा +हीं है, सिसवाय इसक े विक भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ वह स्र्थीा+ है Sहाँ राम Sन्म भूविम ज्ञा हो+े वाले मंविदर का वि+मा:र्ण विकया गया है लेविक+ विववाद भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े बारे में +हीं परन् ु वह मंविदर Sो श्री राम Sन्म भूविम मंविदर क े रूप में ज्ञा हो+े वाले मंविदर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े बारे में संबंति* है। यह विवश्वास है विक भगवा+ राम सूय:वंश क े राSा दशरर्थी क े पुत्र हैं, विववाविद +हीं है।

20. यह विक वादपत्र क े प्रस् र-20 क े अन् व:स् ु से इ+कार विकया गया है। वे वादीगर्णों 1 और 2 क े र्थीाकणिर्थी वाद विमत्र की कल्प+ा की उपS हैं। वादी विववाद क े विवषय में राम Sन्म भूविम मंविदर क े रूप में उल्लेख कर+े से बच े हैं, सिSसक े खिलए वि+म ही अखाड़ा +े राम Sन्मभूविम मंविदर क े प्रभार और प्रबं*+ क े खिलए वाद संख्या 2 वष: 1959 दायर विकया है और दुभा:व+ापूर्ण: रूप से स्र्थीा+ श्री राम Sन्म भूविम वाक्यांश का उपयोग कर ा है Sो वि+रर्थी:क है। उX स्र्थीा+ न्यातियक व्यविX +हीं है।”

19. प्रति वादी संख्या 3 द्वारा अति रिरX खिलखिख कर्थी+ भी दायर विकए गए र्थीे। अति रिरX खिलखिख कर्थी+ क े प्रस् र-42 में यह कहा गया र्थीा विक बाहरी सहा+ +े अन्य मूर्ति यों क े सार्थी भगवा+ राम ललाSी का एक छोर्टा सा मंविदर ब+वाया र्थीा, सिSसे रामा+ंदी बैराविगयों क े बीच प्रचखिल रीति -रिरवाSों क े अ+ुसार वि+यविम रूप से पूSा Sा ा र्थीा। रामलला Sी और अन्य देव ाओं क े मंविदर का बाहरी विहस्सा सेवाय क े रूप में कभी वि+म ही अखाड़ा क े प्रबं*+ और प्रभार में रहा है। आगे यह कहा गया विक वष: 1949 में की गई क ु क— क े वल गभ:गृह क े मुख्य भव+ क े संबं* में र्थीी सिSसमें ी+ “णिशखर” र्थीे, सिSसमें भगवा+ श्री रामचंˆ Sी को वि+म ही अखाड़ा द्वारा मा+व स्मृति से परे की अवति* में स्र्थीाविप विकया गया र्थीा।

20. प्रति वादी संख्या 4, सुन्नी बोर्ड: द्वारा खिलखिख कर्थी+ दS: विकया गया र्थीा। प्रस् र-13 में यह वि+वेद+ विकया गया र्थीा विक विववाविद भव+ श्री राम चंˆSी की Sन्म भूविम +हीं है और उX भव+ में राम चंˆSी की कोई भी मूर्ति mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कभी स्र्थीाविप +हीं की गई र्थीी। प्रस् र-13 क े दूसरे भाग में यह दलील दी गई र्थीी:

“13 …… यह आगे क: विदया गया है विक विववाविद भव+ श्री राम चंˆSी की Sन्मभूविम +हीं है और उX भव+ में श्री राम चंˆSी की कोई भी मूर्ति कभी भी स्र्थीाविप +हीं की गई र्थीी और इस रह से वहां पर पूSा और दश: + कर+े के खिलए प्रति वादी संख्या 20 या विकसी और का विकसी भी अति*कार या दावे का कोई प्रश्न ही +हीं उठ ा। थ्य यह है विक वाद£स् संपखित्त एक पुरा+ी मस्जिस्Sद है सिSसे बाबरी मस्जिस्Sद के रूप में Sा+ा Sा ा है और इसका वि+मा:र्ण सम्रार्ट बाबर के शास+काल में विकया गया र्थीा।”

21. प्रस् र-19 में यह दलील दी गई र्थीी विक यह + ो कोई साव:Sवि+क अणिभलेख है आैर सक्षम प्राति*कारी क े अणिभलेख विववाविद परिरसर में श्री राम चंˆSी क े Sन्म का स्र्थीा+ है क े बारे में उल्लेख कर+े क े खिलए पया:प्त +हीं है और + ही परीक्षर्ण कर+े क े खिलए कोई ऐति हासिसक या न्यातियक अणिभलेख है। प्रस् र-19 में आगे यह दलील दी गइ: है विक हिंहदू पुस् कों क े सार्थी -सार्थी विहन्दू विवद्वा+ों क े लेख+ से यह बहु संविदग्* हो Sा ा है विक क्या श्री राम चन्ˆ Sी का व्यविXत्व एक एेति हासिसक व्यविXत्व है। प्रस् र-24 में यह दलील दी गइ: र्थीी विक विकसी भी समय बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर कोई भी मंविदर +हीं र्थीा और यह कह+ा विबल्क ु ल गल है विक उX मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकसी भी प्राची+ मंविदर को +ष्ट कर+े क े बाद कणिर्थी मंविदर की साम£ी से विकया गया र्थीा। सम्रार्ट बाबर क े शास+ क े दौरा+ इसक े वि+मा:र्ण क े बाद से प्रश्नग मस्जिस्Sद को हमेशा मस्जिस्Sद क े रूप में Sा+ा गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

22. प्रति वादी संख्या-5 +े भी अप+ा खिलखिख बया+ प्रस् ु विकया। प्रस् र- 19 में यह दलील दी गई र्थीी विक रामचन्ˆ Sी का Sन्म वहाँ हुआ इस थ्य को इंविग कर+े क े खिलए वहाॅं कोइ: ऐति हासिसक या अन्य साक्ष्य उपलब्* +ही है, प्रति वादी सं. 4 और 5 +े भी एक अति रिरX खिलखिख बया+ प्रस् ु विकया।

23. एक और खिलखिख बया+ का संदभ: आवश्यक है अर्थीा: प्रति वादी संख्या 24 द्वारा प्रस् ु खिलखिख बया+ विकया। प्रति वादी सं. 24 हिंप्रस अंSुम है, Sो अखिखल भार ीय णिशया सम्मेल+, लख+ऊ क े अध्यक्ष है। भगवा+ राम क े संदभ: में, प्रति वादी सं. 24 +े दलील विदया है विक भार क े मुसलमा+ों का भगवा+ राम क े खिलए सव च्च आदर है। इस संबं* में खिलखिख बया+ क े प्रस् र-10 में की गई यातिचका इस प्रकार हैं: “10. प्रस् र 18 में विदए गए कर्थी+ों का संन्दभ: दे े हुए, यह प्रति वादी आरंभ में इस थ्य को अणिभखिलखिख कर+ा चाह ा है विक उसे और भार क े मुसलमा+ों का भगवा+ राम क े प्रति उच्च म आदर है। मुसलमा+ों की ये भाव+ाएं आS की श ाब्दी क े महा+ म मुस्जिस्लम विवचारक अल्लामा र्डा. णिशर मुहम्मद इक़बाल द्वारा रतिच 'राम' शीष:क कविव ा में सव त्तम रूप से परिरलतिक्ष हो ी हैं, सिSन्हों+े भार क े मुसलमा+ों द्वारा श्री रामचन्ˆSी क े बारे में विवचार कर+े वाली दीघ: कविव ा क े क े वल एक श्लोक में अणिभव्यX विकया है: "है राम क े वSूद पर विहन्दुस् ा+ को +ाS, अहल-ए-+Sर समझ ी है उसको इमाम-ए- विहन्द " अर्थी: - भार को भगवा+ राम क े अस्जिस् त्व पर गव: है। बुतिद्धSीवी उन्हें भार का सम्रार्ट मा+ े हैं। ’’ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

24. हालांविक, इस बा से इ+कार विकया गया विक विववाविद परिरसर वह स्र्थीा+ है Sहां राम चंˆSी का Sन्म हुआ र्थीा। खिलखिख बया+ क े पैरा£ाफ 15 में उन्हों+े मौला+ा सय्यद सबमुद्दी+ अब्दुर रहमा+ को संदर्भिभ विकया है, सिSन्हों+े अप+े £ंर्थी 'BABRI MASJID' में कहा र्थीा विक अगर यह साविब हो Sा ा है विक बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण राम Sन्म भूविम मंविदर को ध्वस् कर+े क े बाद विकया गया है, ो ऐसी मस्जिस्Sद अगर ऐसी छी+ी हुइ: भूविम पर ब+ाई गई है ो +ष्ट हो+े की हकदार है। प्रस् र 15 में वि+म्+खिलखिख वि+वेद+ विकया गया र्थीा: “15…...इस संबं* में प्रसिसद्ध मुस्जिस्लम इति हासकार और विवद्वा+ मौला+ा सय्यद सहाबुद्दी+ अब्दुर रहमा+ +े अप+े प्रसिसद्ध £ंर्थी 'BABRI MASJID' क े पृष्ठ 5 इस प्रकार खिलखा। (उदू: से अ+ुवाद) मुसलमा+ों की ओर से मुझे यह कह+े का भी अति*कार है विक अगर यह साविब हो Sा ा है विक बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण राम Sा+मभूविम मंविदर को विगरा+े क े बाद विकया गया है, ो ऐसी मस्जिस्Sद अगर ऐसी छी+ी हुइ: भूविम पर ब+ाई गई है ो वह +ष्ट हो+े की हकदार है। कोइ: भी *ार्मिमक व्यविX या विवद्वा+ +माS रोक+े क े खिलए फ वा +हीं दे सक ा है।"

25. उसी हे ु क े खिलए प्रस् र-26 में दलील दी गई र्थीी Sो इस प्रकार हैं: “26. यह विक वाद क े प्रस् र 34 आैर 35 की विवषयवस् ु क े सम्बन्* में, उत्तर दे+े वाला प्रति वादी भार क े णिशया मुसलमा+ों का प्रति वि+ति* है आैर विकसी भी प्रकार क े अपविवत्रीकरर्ण कायÂ क े विवरुद्ध घा क है। उ+का यह दृढ़ म है विक विकसी भी *म: की पूSा का कोई स्र्थीा+ +ष्ट mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +हीं विकया Sा+ा चाविहए और +ष्ट हुए खंर्डहर क े स्र्थीा+ पर पूSा का कोई स्र्थीा+ +हीं ब+ाया Sा+ा चाविहए। प्रत्यूत्तर कर+े वाले प्रति वादी का दृढ़ विवश्वास है विक विवक्रमाविदत्य मंविदर या विकसी भी मंविदर को +ष्ट कर+े क े बाद बाबरी मस्जिस्Sद वि+तिश्च रूप से +हीं ब+ाई गई र्थीी। विफर भी, एक ही समय में अगर यह ऐति हासिसक, पुरा ास्जित्वक और विवशेषज्ञों क े वैज्ञावि+क साक्ष्यों क े प्रकाश में इस मा++ीय न्यायालय में स्पष्ट रूप से साविब हो ा है विक मंविदर भूविम पर विकसी भी मंविदर को ध्वस् कर+े क े बाद बाबरी मस्जिस्Sद वास् व में ब+ाई गई र्थीी, भी यह प्रति वादी अप+ा विवरो* वापस ले लेगा। वादी संख्या-3 आैर भार ीय विहन्दू समुदाय को एक आैर रिरयाय क े रूप में, सिSससे उX वादी आैर उसक े पक्षकारों क े द्वारा *ार्मिमक भाव+ाआें को विपछले ी+ वष से गल रीक े से भड़का+े का प्रयास कर रहें है, यह प्रति वादी अप+ा विवरो* वापस ले+े को ैयार है, यविद यह इस मा++ीय न्यायालय में स्पष्ट रूप से सिसद्घ हो ा है विक भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ व:मा+ बाबरी मंस्जिस्Sद क े अन्दर हो+े का दावा विकया गया र्थीा आैर बाबरी मस्जिस्Sद क े ब++े से पूव: क े समय से अस्जिस् त्व में र्थीा, आैर बाबरी मस्जिस्Sद ब++े क े पूव: क े समय से अस्जिस् त्व में र्थीा और यह विक बाबरी मस्जिस्Sद Sा+बूझकर राम Sन्म स्र्थीा+ स्थ्ल पर ब+ाई गई र्थीी।"

26. प्रति वादी सं. 25 +े भी खिलखिख बया+ प्रस् ु विकये। सिSसमें दलील दी गइ: र्थीी विक वादी क े सलंग्नक सं 1,[2] और 3 में इंविग विकए गए क्षेत्र और स्र्थीा+ + ो राम Sन्म भूविम में है आैर + ही राम Sन्म स्र्थीा+ में है आगे यह कहा गया विक यह स्पष्ट है विक बाबरी मस्जिस्Sद +ाम से Sा+ी Sा+े वाली मस्जिस्Sद मौSूद है, इस मस्जिस्Sद का अस्जिस् त्व एैति हासिसक राSस्व आैर न्यातियक अणिभलेखों द्वारा स्र्थीाविप विकया गया है।

27. उपरोX विवचारा*ी+ हिंबदुओं पर पक्षकारों की प्रासंविगक दलीलें है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

28. विवश्वास आैर आस्र्थीा आत्मा क े आध्यास्जित्मक Sीव+ को बढ़ावा दे ा है।

29. मा++ीय न्यायलय +े शास्त्री यज्ञपुरूषSी आैर अन्य ब+ाम मूलदास भू*रदास वैश्य आैर एक अन्य एआईआर 1966 एससी 29 क े वाद में प्रस् र 29,30 आैर 31 में विहन्दू *म: की व्याख्या कर े हुए वि+म्+खिलखिख अवलोक+ प्रस् ु विकये हैः- “29. Sब हम विहन्दू *म: क े बारे में विवचार कर े है, ब हमें विहन्दू *म: की व्याख्या कर+ा अर्थीवा पया:प्त वर्ण:+ कर+ा यविद असंभव +हीं है ो कविठ+ प्र ी हो ा है। दुवि+या क े अन्य *मÂ क े विवपरी, हिंहदू *म: विकसी एक पैगम्बर का दावा +हीं कर ा है; यह विकसी एक भगवा+ की पूSा +हीं कर ा है; यह विकसी एक सिसद्धां की अ+ुपाल+ +हीं कर ा है; यह विकसी एक दाश:वि+क अव*ारर्णा में विवश्वास +हीं कर ा है; यह विकसी भी *ार्मिमक संस्कार या प्रदश:+ क े एक प्रारूप का पाल+ +हीं कर ा है; वास् व में, यह विकसी भी *म: या पंर्थी की संकीर्ण: पारंपरिरक विवशेष ाओं को सं ुष्ट कर+े क े खिलए प्रकर्ट +हीं हो ा है। इसे मोर्टे ौर पर Sीव+ का रीका कहा Sा सक ा है और इससे अति*क क ु छ +हीं।

30. इस कविठ+ाइ: पर विवचार कर े हुए, र्डा. रा*ाक ृ ष्र्ण+ Sी +े पाया विक '' बहु से लोगाें को विहन्दू *म: विब+ा विकसी सार का +ाम प्र ी हो ा है। क्या यह आस्र्थीाओं का सं£हालय है, या कम:कांर्डों का मंत्र है, या मात्र एक +क्शा है, या एक भौगोखिलक अणिभव्यविX है?” इ+ प्रश्नों को प्रस् ु कर+े क े बाद, Sो विवदेशी हिंहदू *म: क े बारे में सोच+े पर परेशा+ कर े हैं, र्डॉ. रा*ाक ृ ष्र्ण+ +े स्पष्ट विकया है विक विकस प्रकार हिंहदू *म: +े उ+ लोगों क े रीति -रिरवाSों और विवचारों को, सिS+क े सार्थी वह संपक: में आया है, वि+रं र समाविह कर खिलया है और इस प्रकार अप+े प्रभुत्व और यौव+ को कायम रख पाया है। र्डॉ. रा*ाक ृ ष्र्ण+ क े अ+ुसार ‘विहन्दू’ शब्द का मूल रूप से एक क्षेत्रीय महत्व र्थीा, + विक सैद्धांति क महत्व र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह एक अच्छी रह से परिरभाविष भौगोखिलक क्षेत्र में अन्:वि+विह है। आविदवासी, Sंगली और अ*:-सभ्य लोग, सुसंस्क ृ ˆविवड़ और वैविदक आय: सभी हिंहदू र्थीे क्योंविक वे एक ही मां क े पुत्र र्थीे। हिंहदू विवचारकों +े इस आश्चय:S+क थ्य की सराह+ा की विक भार में रह+े वाले पुरुष और मविहलाएं विवणिभन्न समुदायों क े र्थीे, विवणिभन्न देव ाओं की पूSा कर े र्थीे और विवणिभन्न संस्कारों (क ू म: पुरार्ण) (“र्डा. रा*ाक ृ ष्र्ण+ Sी क े द्वारा खिलखी गइ: पुस् क विहन्दू Sीव+ का विवचार का पृष्ठ संख्या -12”) का पाल+ कर े र्थीे।

31. मोवि+यर विवखिलयम्स +े कहा है विक “यह ध्या+ में रख+ा चाविहए विक हिंहदू *म: ब्रह्मर्णवाद पर विर्टकी हुई आस्र्थीा से कहीं अति*क है। इसमें हमारे समझ+े क े खिलए पर्थीों आैर सिसद्घान् ों का एक Sविर्टल समूह है सिSसक े क्रविमक सव:*+ की ुल+ा गंगा की विवशाल *ाराआें से की Sा सक ी है सिSसमें देश क े विवशाल भू-भाग पर विवस् ृ +विदकाएं आकर विमल ी है आैर अन् ः उफ+ा ी *ाराआें आैर बीहड़ कच्छ भूविम में विमल Sा ी है… विहन्दू *म: विहन्दुआें क े संतिश्लष्ट चरिरत्र को दशा: ा है Sो विक एक +हीं बस्जिल्क अ+ेक हैं। यह साव:भौविमक £ाह्य ा क े विवचार पर आ*ारिर है। इस+े स्वयं को परिरस्जिस्र्थीति यों क े अ+ुसार समायोसिS कर+े का लक्ष्य रखा है, और ी+ हSार से अति*क वषÂ क े माध्यम से अ+ुक ू ल+ की प्रविक्रया को आगे बढ़ाया है। यह प्रारम्भ से ही बोल+े, वि+गल+े, पचा+े आैर सभी पंर्थीों से क ु छ £हर्ण करक े ही उत्पन्न हुआ है। (मोवि+यर विवखिलयम्स, द्वारा खिलखी पुस् क 'भार में *ार्मिमक विवचार और Sीव+' क े पृष्ठ 57 से उद्धृ )”

30. हिंहदू *म: की अव*ारर्णा को महा+ विवद्वा+ों और न्यायविवदों द्वारा परिरभाविष विकया गया है, लेविक+ इस मामले में, हिंहदू *म: की अव*ारर्णा पर ध्या+ दे+ा आवश्यक +हीं है। सभी *मÂ और आस्र्थीाआें का मूल एक है अर्थीा: सत्य की खोS, आत्मा क े बारे अति*क Sा++े की खोS और सव च्च क े बारे में अति*क Sा++े की खोS, सिSसे एक या अ+ेक रूपों में सभी *मÂ में पूSा विकया Sा ा है। प्रत्येक *म: और प्रत्येक आस्र्थीा ईश्वर की मविहमा का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गुर्णगा+ और सम्मा+ कर ी है, सिSसक े सार्थी हम Sुड़+ा चाह े है। वर्ड:सवर्थी: +े अप+ी इस सुन्दर कविव ा में इसी विवचार को प्रति घ्ववि+ विकया हैः- हमारा Sीव+ क े वल एक वि+ˆा एवं विवस्मृति क े अलावा कु छ भी +हीं है! आत्मा हमारे सार्थी उपर की आरोहर्ण कर ी है! एवं हमारे Sीव+ क े (भाग्य क े ) सिस ारों का उद्भू कहीं आैर हाे ा है, आैर ये बहु दूर से अव रिर हो े हैं! पूर्ण: रूप से विवस्मृ +हीः एवं + ही पूर्ण: रूप से दर्भिश ! मविहमा एवं प्रभाम°र्डल क े ये अ£गामी मेघ हमारी आेर उसी परमेश्वर की आेर से आ े हैं, Sहाँ हमारा घर (अस्जिन् म गन् व्य) है।

31. Sो हमारे समक्ष विवचार क े खिलए आया इस विबन्दू पर वापस लौर्ट+े पर अर्थीा: हिंहदुओं क े आस्र्थीा और विवश्वास क े अ+ुसार विववाविद संरच+ा भगवा+ राम का पविवत्र Sन्म स्र्थीा+ है या +हीं?

32. भगवा+ा राम से सम्बस्जिन्घ अयोध्या एक पविवत्र +गरी मा+ी Sा ी है। ब्रृहद-*रम रा पुरार्ण में अयोध्या को वि+म्+खिलखिख दोहों में सा प्रमुख शहरों में से एक कहा हैः- अयोध्या मर्थीुरा माया काशी का ची ह्मवस्जिन् का ।। पुरी द्वाराव ी चैव सप्तै ा मोक्षदातियकाः। अयोध्या, मर्थीुरा, माया (हरिरद्वार), काशी, कांची, अवस्जिन् का (उज्जै+) आैर द्वाराव ी (द्वारका) सा सबसे पविवत्र शहर है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

33. बहु समय से, Sो कई श ास्जिब्दयों क विवचार क े खिलए विवस् ृ र्थीी। Sैसा विक ऊपर उल्लेख विकया गया है विक वाद संख्या 4 में वादी का मामला यह है विक वष: 1528 में मीर बकी द्वारा सम्रार्ट बाबर क े आदेश पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। मुतिश्लम पक्षकारों क े खिलए वाद संख्या 4 में वादी की आेर से उपस्जिस्र्थी वरिरष्ठ विवद्व अति*वXा र्डा. राSीव *व+ आैर सार्थी ही सार्थी वरिरष्ठ विवद्व अति*वXा श्री Sाफराबाद सिSला+ी +े दावा विकया है विक Sब वाद सख्या-5 को दाखिखल विकया गया र्थीा, ब 1989 से पहले क े समय में विववाविद स्र्थील पर भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में कोइ: विवश्वास आैर आस्र्थीा +हीं र्थीी। यह प्रस् ु विकया गया है विक विववाविद स्र्थील को सिSसे भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ कहा Sा ा है, हाल ही में उत्पन्न हुआ है और इस बा का प्राची+ काल में कोइ: सबू +हीं है विक हिंहदुआें का आस्र्थीा आैर विवश्वास है विक Sंहाँ मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, वह भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ र्थीा। र्डॉ. *व+ +े यह क: विदया विक स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य में राम Sन्मभूविम क े स्र्थीा+ का उल्लेख विमल ा है, Sो बाबरी मस्जिस्Sद की स्र्थील से मेल खा ा है, को सही +हीं पाया गया है। अप+े कर्थी+ क े समर्थी:+ में, उन्हो+ें ''विहस्र्टोरिरय+ रिरपोर्ट: र्टू +ेश+'' में अवलंम्ब खिलया गया है, सिSसे वादी क े द्वारा वाद संख्या 5 (प्रदश:. संख्या 44) में आैर सार्थी ही सार्थी वादी +े वाद संख्या 4 (प्रदश: संख्या 62) में प्रदर्भिश विकया गया है। यह प्रस् ु विकया गया है विक उपरोX रिरपोर्ट: में कहा गया है विक स्क ं द पुरार्ण में अयोध्या महात्मा में वर्भिर्ण स्र्थीा+ बाबरी मस्जिस्Sद क े व:मा+ स्र्थीा+ से मेल +हीं खा ा है। यह प्रस् ु विकया Sा ा है विक अयोध्या में कोई स्र्थीा+ ग्यारहवीं श ाब्दी में या विफर छठी श ाब्दी क े बाद भी भगवा+ राम क े Sन्म mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA से सम्बस्जिन्* +हीं है। Sब कोई स्र्थीा+ भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ से Sुड़ा हो ा है Sो संभव ः अठारहवीं श ाब्दी क े बाद विवणिभन्न महात्म्यों में वर्भिर्ण स्र्थीा+ बाबरी मस्जिस्Sद क े स्र्थील से मेल +हीं खा ा है। र्डाॅ. *व+ क े द्वारा हंस बाकर की पुस्त्क अयोध्या क े कÂ का खंर्ड+ विकया है। वह मा+ े है विक हंस बाकर की पुस् क पर कोइ: अवलंम्ब +हीं खिलया Sा सक ा है क्योंविक (i) हंस बाकर इस अ+ुमा+ पर आगे बढ़ े हैं विक अयोध्या वास् विवक शहर +हीं है बस्जिल्क कविव की कल्प+ा का तिचत्रांक+ है; (ii) हंस बाकर अयोध्या को साक े शहर की सम ुल्य मा+ े हुए आगे बढ़ े है; (iii) बाकर आगे कह े है विक यहां क विक अयोध्या महात्मा से Sन्म स्र्थीा+ का तिचत्राक ं + कर+े पर भी प ा चल ा है और अं ः वह ब ा े है विक बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण Sन्म स्र्थीा+ की भूमी पर विकया गया है सिSसकी पुविष्ट स्र्थीा+ीय अ+ुश्रुति यों से की Sा ी है; (iv) यहां क विक आक्षेविप वि+र्ण:य भी यह अणिभलेखिख है विक हंस बाकर विब+ा विकसी कारर्ण ब ाए अ+ुमा+ों क े आ*ार पर आगे बढ़ े हैं।

34. विवणिभन्न यात्रा वृ ां ों क े द्वारा दS: विकये गये कर्थी+ों क े सम्बन्* में, र्डा. *व+ कह े है विवणिभन्न यात्रा वृ ां ों द्वारा विदये कर्थी+ सब अ+ुश्रुति याँ हैं और वे यात्री क े वल कर्थीाकार र्थीे सिS+ पर कोई अवलंम्ब +हीं खिलया Sा सक ा। Sहाँ क गSेविर्टयस: का सम्बन्* है, र्डाॅ. *व+ कह े है विक गSेविर्टयरस: सिSन्हें इस्र्ट इंतिर्डयाँ कम्प+ी क े समय काल क े दौरा+ ैयार विकया गया र्थीी वे अ£ेSों क े द्वारा पहले ैयार विकये गये र्थीे आैर वे सरकारी प्राति*कारर्ण क े अ*ी+ +हीं र्थीे इसखिलए इ+का अवलम्ब +हीं खिलया Sा सक ा है वे कह े है विक 1858 क े बाद ैयार विकए गए गSेट्स, Sब अ£ेS +े उस क्षेत्र में सम्प्रभुत्व ा का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ+ुमा+ पर प्रश्न तिचन्ह लगा है, लेविक+ उ+ गSेट्स को एक सबू क े रूप में प्रस् ु +हीं विकया Sा सक ा है और उसको विकसी अन्य वास् विवक सबू क े द्वारा पुविष्ट की आवश्यक ा है। उन्हों+े कहा विक 1528 में बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील का वि+मा:र्ण भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ +हीं हो+े क े कारर्ण विकया गया र्थीा, भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण का कोई सवाल ही +हीं है।

35. विवद्व वरिरष्ठ अति*वXा श्री क े. पराशरर्ण, श्री सी.एस. विवद्या+ार्थी+, श्री पी.ए+. विमश्रा आैर पी.एस. +रसिसम्हा क े द्वारा उपरोX कÂ का खंर्ड+ विकया है। र्डाॅ. *व+ क े कÂ का खंर्ड+ कर े हुए श्री सी.एस. वैद्य+ार्थी+ +े कहा विक विववाविद परिरसर को मुगल काल क े दौरा+ ब+ाया गया उस पर विहन्दुआें की आस्र्थीा आैर विवश्वास है विक वह भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है आैर उस विदब्य स्र्थीा+ का पविवत्र चरिरत्र क े रूप में युगों से पूSा की Sा ी रही र्थीी। यह प्रस् ु विकया गया है विक शास्त्र और पविवत्र £ंर्थी्, Sो 1528 से बहु पहले क े हैं, सिS+में अयोध्या में भगवा+ राम क े Sन्म का उतिच रूप में वर्ण:+ विमल ा हैं। मुख्य या स्क ं द पुरार्ण, वैष्र्णव ख°र्ड, अयोध्या महात्म्य का अवलम्ब खिलया गया है। यह प्रस् ु विकया Sा ा है विक वाल्मीविक रामायर्ण, सिSसकी रच+ा ईसा पूव: में की गइ: गयी है, उसमें भी भगवा+ राम क े Sन्म-स्र्थीा+ क े रूप में भी वर्ण:+ है, सिSसक े अ+ुसार भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या क े राSा दशरर्थी क े महल में हुआ र्थीा। ुलसीदास Sी द्वारा रामचरिर मा+स का भी उल्लेख विकया गया है; सिSसमें अयोध्या में भगवा+ राम क े Sन्म का उल्लेख है Sो विक हर वष: शुक्ल पक्ष की चैत्र +वमी को म+ाया Sा ा है। विहन्दू पक्षकारों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े खिलए विवद्व अति*वXा यह भी प्रस् ु कर े हैं विक यावित्रयों क े लेखों से प ा चल ा है Sो 1858 से पहले की समयावति* आैर सार्थी ही सार्थी 1858 क े बाद क े लेखों से सम्बद्घ है Sो प्रकणिश पुस् कों क े रूप में है वे प्रासंविगक है आैर उ+का भार ीय साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 की *ारा 57 क े ह भी अवलंब खिलया Sा सक ा है। गSेविर्टयस: में ध्या+ आकर्मिष कर े हुए विवद्वा+ अति*वXा यह कह े है विक सरकारी अति*कारिरयों द्वारा गSर्ट प्रकाणिश विकए Sा े हैं, सिSसका पया:प्त सास्जिक्ष्यक महत्व है। यह प्रस् ु विकया Sा ा है विक गSेर्टस: को इस न्यायालय द्वारा कई मामलों में अवलंब खिलया गया है और गSेर्टस: में दS: कर्थी+ों को पया:प्त साक्ष्य मा+ा गया और इ+ पर विवचार विकया है। श्री पी.एस. +रसिसम्हा अप+े क पर विवस् ार से चचा: कर े हुए कह े है विक परिरक्षर्ण सिSसे साक्ष्य क े क्रमबन्*+ क े रूप में लागू विकया Sा+ा है वह संभाव्य ा की प्रबल ा का मा+क है। साक्ष्य अति*वि+यम क े ख°र्ड 3 का सन्दभ: दे े हुए, उन्हो+ें कहा विक थ्य का प्रमार्ण विवशेष मामले की परिरस्जिस्र्थीति यों को देख+े वाले थ्य की *ारर्णा या संभाव+ा पर वि+भ:र कर ा है। यह प्रस् ु विकया गया है विक हिंहदू पक्षकारों की ओर से प्रस् ु मौखिखक और दस् ावेSी साक्ष्य हिंहदुओं की आस्र्थीा और विवश्वास को प्रमाणिर्ण कर े हैं विक विववाविद स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है। उन्हों+े कहा विक वाल्मीविक रामायर्ण अयोध्या में श्री राम क े Sन्म का उल्लेख कर ा है, Sो प्राची+ काल का महाकाव्य है और हमारे देश की संस्कृ ति और परंपरा का आ*ार मा+ा Sा ा है। स्क ं द पुरार्ण आठारह सौ इ:स्वी क े है, Sो विहन्दुओं क े हृदय में उत्पन्न विवश्वास का पया:प्त प्रमार्ण प्रदा+ कर ा है, अर्थीा:, भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर Sा+ा, Sो अत्यति*क पविवत्र कम: मा+ा Sा ा है, Sो mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विहन्दुओं क े खिलए मोक्ष क े अलावा और क ु छ +हीं है। यह आगे प्रस् ु विकया गया है विक विववाविद परिरसर में हिंहदुओं द्वारा बार-बार विकए गए दावे और पूSा कर+े का अति*कार और हिंहदुओं द्वारा की गई विवणिभन्न लड़ाई आैर उ+क े अविमर्ट विवश्वास का पया:प्त प्रमार्ण है विक विववाविद स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है। श्री पीए+ विमश्रा +े अप+े कÂ को विवस् ृ कर े हुए पविवत्र *म: £ंर्थीों श्रीमद वाल्मीविक रामायर्ण, श्रीमद् स्क ं दपुरार्णम्, रुˆायमाला, श्री राम चरिर मा+स और श्रीमद +रसिंसह पुरार्णम् Sैसे अन्य *म:£ंर्थी पर अवलंम्ब खिलया है। स्कन्द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य क े विवशेष पृष्ठों आैर श्लोक 15 से18 आैर 18 से 25 का अवलंब खिलया गया है, उन्हो+ें कहा विक उपरोX श्लोक भगवा+ राम क े Sन्म की भौगोखिलक स्जिस्र्थीति क े बारे में ब ा े है, Sो अभी भी सत्याविप है। श्री विमश्रा +े हमें गवाहों क े मौखिखक साक्ष्य क े बारे में ब ाया विक Sहां उ+क े अ+ुसार गवाहों +े भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े सम्बन्* मे स्कन्द पुरार्ण क े उसिल्लखिख स्र्थीा+ों को साविब विकया गया है। वाद संख्या 2/1950 में हंस बाकर क े द्वारा ैयार विकए +क्शों को सन्दर्भिभ कर े हुए आैर णिशव शंकर लाल क े द्वारा ैयार विकए +क्शा +Sरी का सन्दभ: दे े हुए उन्हो+ें कहा विक स्कन्द पुरार्ण में उसिल्लखिख कइ: वि+शा+ अभी भी मौSूद हैं, Sो Sन्म स्र्थीा+ क े स्र्थीा+ को विववाविद स्र्थील क े रूप में प्रमाणिर्ण कर ा है।

36. आस्र्थीा आैर विवश्वास यह है विक विववाविद स्र्थील भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ 1528 से पहले स्र्थीाविप विकया गया है Sबविक कहा Sा ा है विक विववाविद संरच+ा का वि+मा:र्ण बाबर द्वारा विकया गया र्थीा। मौखिखक साक्ष्य, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिSसे पक्षकारों क े द्वारा अप+े वादों क े समर्थी:+ में प्रस् ु विकया है वह मौखिखक साक्ष्य क े रूप में सबसे उत्तम है सिSसे गवाहों क े द्वारा देखा गया है, सिSन्हो+ें न्यायालय क े समक्ष विवस् ार पूव:क ब ाया है, Sो क े वल बीसवीं श ाब्दी क वे वस् ुएँ अच्छी रह से स्र्थीाविप र्थीी। पक्षकारों क े द्वारा कु छ थ्यों को प्रद:णिश विकया है, Sो उन्नीसवीं श ाब्दी से संम्बति* है। विहन्दू पक्षकारों क े द्वारा अवलंब खिलए प्राची+ अवति* क े पविवत्र *म:£र्थीों आैर यात्रा वृत्तां आैर गSेविर्टयरस: क े लेख अलग-अलग अवति* क े है उ+में से कु छ उन्नीसवीं श ाब्दी से पहले क े है, विवचार की अवति* को ी+ भागाें में विवभासिS विकया Sा+ा है। पहली अवति* 1528 से पहले की है आैर दूसरी अवति* 1528 से 1858 क और ीसरी अवति* 1858 से 1949 क े बाद की है। यद्यविप मुस्जिस्लम पक्षकारों क े द्वारा प्रस् ु खिलखिख बया+ में, वाद संख्या 5 क े ह सुन्नी सेंर्ट्रल बोर्ड: +े दलील विदया है विक थ्य क े रूप में, *ार्मिमक पुस् कों क े सार्थी-सार्थी विहन्दू विवद्वा+ों क े लेख+ से यह प ा लगा+ा बहु मुस्जिश्कल है विक श्री राम चंन्ˆ Sी का व्यविXत्व, एक एैति हासिसक व्यविXत्व है लेविक+ दीवा+ी प्रविक्रया संविह ा क े आदेश वि+यम 2 क े ह विदए गये बया+, सिSसे उच्च न्यायालय +े अणिभलेखिख विकया है आैर उच्च न्यायालय द्वारा अप+े वि+र्ण:यों में भी सन्दर्भिभ भी विकया है, मुस्जिस्लम दलों क े रुख को स्पष्ट विकया गया है। सी.पी.सी आदेश X वि+यम II क े ह विदए गए उपरोX कर्थी+ों का उल्लेख कर+ा आवश्यक है, वाद संख्या 04 क े वादी क े खिलए अति*वXा श्री Sफरयाब सिSला+ी का बया+ 22.04.2009 को उच्च न्यायालय की पूर्ण: पीठ द्वारा अणिभलेखिख विकया गया र्थीा, Sो वि+म्+खिलखिख प्रभाव क े खिलए है:mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "सी.पी.सी क े आदेश X वि+यम 2 क े ह मूल वाद संख्या 4/1989 क े वाद में वादी क े अति*वXा श्री ज़फ़रयाब सिSला+ी का 22.04.2009 विद+ांविक बया+ः- इस मामलें क े उद्देश्य क े खिलए बाल्मीविक रामायर्ण में वर्भिर्ण अयोध्या मे भगवा+ राम क े Sन्म क े सम्बन्* में भगवा+ क े भXों की आस्र्थीा पर काेइ: विववाद +हीं है। हालांविक, यह विववाविद है और इससे इ+कार विकया Sा ा है विक बाबरी मस्जिस्Sद का स्र्थीा+ भगवा+ राम क े Sन्म का स्र्थीा+ र्थीा। इस बा से भी इ+कार विकया Sा ा है विक विकसी भी समय बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर कोई राम Sन्मभूविम मंविदर र्थीा। उन्नीसवीं श ाब्दी क े उत्तरा*: से वि+म ही अखाड़ा का अस्जिस् त्व भी विववाविद +हीं है। हालाँविक, यह विववाविद है आैर इस बा से इंकार विकया Sा ा है विक वि+म ही अखाड़ा 16 वीं श ाब्दी में या 1528 ईस्वी में अयोध्या में अस्जिस् त्व में र्थीा और इस बा से भी इ+कार विकया Sा ा है विक कोई भी मूर्ति 22 विदसंबर, 1949 क बाबरी मस्जिस्Sद में र्थीी। हस् ाक्षर/- Sे. सिSला+ी, अति*वXा 22.04.2009” उसी हे ुक क े खिलए एक अन्य विवद्वा+ अति*वXा श्री मुस् ाक अहमद सिसविद्दकी क े द्वारा बया+ विदए गये, Sो वाद संख्या 4 क े वादी क े अति*वXा क े रूप में उपस्जिस्र्थी हुए र्थीे आैर प्रत्यर्थी- संख्या 6/1 आैर 6/2 क े खिलए अति*वXा श्री सय्यद इरफा+ अहमद क े बया+ खिलए गये र्थीे। ी+ों बया+ समा+ शब्दों में +ीचें विदए गए हैः- "सीपीसी क े आदेश X वि+यम 2 क े ह मूल वाद 4/1989 क े वादी क े खिलए अति*वXा श्री मुसक अहमद सिसद्दीकी का 22.04.2009 विद+ांविक बया+ःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस मामले क े उद्देश्य क े खिलए बाल्मीविक रामायर्ण में वर्भिर्ण अयोध्या में भगवा+ राम क े Sन्म क े संबं* में भगवा+ राम क े भXों की आस्र्थीा पर कोई विववाद +हीं है, Sैसा विक आS भी अस्जिस् त्व में है। हालांविक, यह विववाविद है और इस बा से इ+कार विकया गया है विक बाबरी मस्जिस्Sद का स्र्थीा+ भगवा+ राम क े Sन्म का स्र्थीा+ र्थीा। इस बा से भी इ+कार विकया Sा ा है विक विकसी भी समय बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर कोई राम Sन्मभूविम मंविदर र्थीा। उन्नीसवीं श ाब्दी क े उत्तरा*: से वि+म ही अखाड़ा का अस्जिस् त्व भी विववाविद +हीं है। हालाँविक, यह विववाविद है आैर इस बा से इंकार विकया गया है विक विवशेष रूप से अयोध्या में 1600 ईस्वी या 1528 ईस्वी में वि+म ही अखाड़ा अस्जिस् त्व में र्थीा और इस बा से भी इ+कार विकया Sा ा है विक कोई भी मूर्ति 22 विदसंबर, 1949 क बाबरी मस्जिस्Sद में र्थीी।। हस् ाक्षर/- एम.ए. सिसद्दीकी, अति*वXा 22.04.2009” "सीपीसी आदेश X वि+यम 2 क े ह मूल वाद 34/1989 क े प्रत्यर्थी- संख्या 6/1 आैर 6/2 क े खिलए अति*वXा श्री सय्यद इरफा+ अरमद का 22.04.2009 विद+ांविक बया+ः- इस मामले क े उद्देश्य क े खिलए बास्जिल्मविक रामायार्ण मे वर्भिर्ण अयोध्या में भगवा+ राम क े Sन्म क े संबं* में भगवा+ राम क े भXों की आस्र्थीा पर कोई विववाद +हीं है Sैसा विक आS भी अस्जिस् त्व में है। हालांविक, यह विववाविद है आैर इस बा से इंकार विकया गया है विक बाबरी मस्जिस्Sद का स्र्थील भगवा+ राम क े Sन्म का स्र्थीा+ र्थीा। इस बा से भी इ+कार विकया Sा ा है विक विकसी भी समय बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील पर कोई राम Sन्मभूविम मंविदर र्थीा। उन्नीसवीं श ाब्दी क े उत्तरा*: से वि+म ही अखाड़ा का अस्जिस् त्व भी विववाविद +हीं है। हालाँविक, यह विववाविद है आैर इस बा से इंकार विकया गया है विक विवशेष रूप से अयोध्या में 1600 ईस्वी या 1528 ईस्वी में वि+म ही अखाड़ा अस्जिस् त्व में र्थीा और इस बा से भी इ+कार विकया Sा ा है विक कोई भी मूर्ति 22 विदसंबर, 1949 क बाबरी मस्जिस्Sद में र्थीी।। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हस् ाक्षर/- एस. इरफा+ अहमद, अति*वXा 22.04.2009” 37.वाद संख्या 4 क े वादी अयाेध्या में भगवा+ राम क े Sन्म क े सम्बन्* में विहन्दुआें क े विवश्चास आैर आस्र्थीा क े संम्बन्* में रूख स्पष्ट विकया गया है आैर यह स्वीकार विकया गया है विक विहन्दू भXों की आस्र्थीा में कोइ: विववाद +हीं है आैर भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा, हमारा विवचार क े वल एक सीविम प्रस् ुति यों क ही सीविम है विक क्या विववाविद संरच+ा का स्र्थीा+ Sहाँ बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, वह भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है या +ही। क े वल उपरोX पहलू क े संबं* में पक्षकारो क े द्वारा प्रस् ु सबू ों पर विवचार कर+ा आवश्यक होगा। 1528 से पहले की अवति*ः-

38. *ार्मिमक आस्र्थीा परंपराओं, *ार्मिमक शास्त्रों और प्रर्थीाओं द्वारा वि+र्मिम हो ी है। इस न्यायालय की संवै*ावि+क पीठ की आेर से न्यायमूर्ति बी.क े. मुखS- +े कविमश्नर, विहन्दू रिरलीसिSयश इन्र्डोमेन्र्ट, मˆास वस†स श्री लक्ष्मीन्ˆ ीर्थी: स्वामीअर आफ श्री णिशरूर मठ, ए.आइ:.आर. 1954 एससी 282 क े वाद में यह अव*ारिर विकया विक प्रस् र 17 क े ह *म: वि+तिश्च या व्यविXग या समूदातियक रूप से विवश्वास का विवषय है, सिSसेक े ह वि+म्+खिलखिख अवलोविक विकया गया है '17. Xxxxxxxxxxxxx mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA *म: वि+तिश्च रूप से व्यविXयों या समुदायों क े सार्थी विवश्वास का विवषय है और यह Sरूरी +हीं विक ईश्वरवादी हो। भार में बौद्ध और Sै+ *म: Sैसे प्रसिसद्ध *म: हैं Sो ईश्वर में या काेइ: बौतिद्घक विवश्वास का प्रर्थीम कारर्ण पर विवश्वास +हीं कर े है। एक *म: वि+स्संदेह विवश्वास या सिसद्धां ों की एक प्रर्णाली में अप+ा आ*ार रख ा है Sो उ+ लोगों द्वारा मा+ा Sा ा है Sो उस *म: को अप+ी आध्यास्जित्मक कल्यार्ण क े खिलए अ+ुक ू ल मा+ े हैं, लेविक+ यह कह+ा सही +हीं होगा विक *म: एक सिसद्धां या विवश्वास क े अलावा और क ु छ +हीं है। एक *म: अप+े अ+ुयातिययों को स्वीकार कर+े क े +ैति क वि+यमों की + क े वल एक संविह ा वि+*ा:रिर कर सक ा है बस्जिल्क यह री ी-रिरवाS, अ+ुपाल+ आैर अ+ुष्ठा+ और पूSा क े रीकों को वि+*ा:रिर कर सक ा है सिSन्हें *म: का अणिभन्न अंग मा+ा Sा ा है, और ये भोS+ और पोशाक क े मामलों क भी विवस् ारिर हो सक े हैं।

39. *ार्मिमक £ंर्थी, Sो विहन्दुत्व क े मुख्य स्रो हैं, वे आ*ार हैं सिSस पर विहन्दुओं की आस्र्थीा +े साकार रूप खिलया है। वाल्मीविक कृ रामायर्ण महाकाव्य भगवा+ राम और उ+क े कायÂ क े बारे में Sा+कारी का मुख्य स्रो है। वाल्मीविक रामायर्ण की रच+ा ईसा पूव: की है। वाल्मीविक रामायर्ण महाभार और श्रीमद्भगव गी ा क े पहले की अवति* का है। सिSस अवति* में वाल्मीविक रामायर्ण की रच+ा हुई वह इसाई युग क े काफी पहले की है। इस वाद क े उद्देश्य क े खिलए, इति हासकार क े रूप में वाद-4 क े वादी द्वारा प्रस् ु की गयी साक्षी सुवीरा Sायसवाल (पीर्डब्ल्यू-8) क े बया+ों पर ध्या+ दे+ा पया:प्त है। अप+े बया+ में वह कह ी हैं " वाल्मीविक रामायर्ण की अवति* 300 ई.पू.-200 ई.पू. की अणिभखिलखिख है।" बहु से विवद्वा+ों और अन्य लोगों +े वाल्मीविक रामायर्ण को बहु पहले की अवति* का ब ाया है लेविक+ उX प्रश्न पर रूक+ा हमारे खिलए आवश्यक +हीं क्योंविक हमारे उद्देश्य क े खिलए इ +ा पया:प्त है विक वाल्मीविक रामायर्ण की रच+ा ईसा क े पूव: युग में हुई। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

40. वाल्मीविक रामायर्ण क े बालका°र्ड क े 28 वें सग: का 8 से 12 वां श्लोक £हीय स्जिस्र्थीति यों क े सार्थी भगवा+ राम क े Sन्म से संबंति* है। उपरोX श्लोक में इस बा का तिचत्रर्ण है विक ब्रह्मंर्ड +ायक "विवष्र्णु" कौसल्या क े पुत्र क े रूप में Sन्में र्थीे। वाल्मीविक रामायर्ण में विवष्र्णु क े अव ार क े रूप में दशरर्थी और कौसल्या क े पुत्र क े रूप में भगवा+ राम क े अयोध्या में Sन्म का समुतिच उल्लेख है। श्लोक 10 कौसल्या क े पुत्र क े रूप में भगवा+ राम क े Sन्म क े बारे में ब ा ा है Sो वि+म्+व उद्*ृ है: प्रोद्यमा+े Sगन्नार्थीं सव:लोक+मस्क ृ म । कौसल्याS+यद् रामं विदव्यलक्षर्णसंयु म् ॥ (बालका°र्ड 18.10) "कौसल्या +े एक ऐसे पुत्र को Sन्म विदया Sो समस् Sग का ईश्वर है।सभी लोग उ+का आदर कर े र्थीे। वह दैवीय लक्षर्णों से युX र्थीे। यह विकसी समान्य म+ुष्य का Sन्म +हीं र्थीा। अयोध्या में समस् Sग क े स्वामी का आगम+ हुआ र्थीा विफर भी अलीगढ़ इति हासकार कह े हैं विक राम क े Sन्म की वSह से अयोध्या को कभी पविवत्र +हीं मा+ा Sा ा र्थीा।"

41. इस प्रकार, महाकाव्य में भगवा+ राम क े Sन्म को अयोध्या से Sोड़ा गया है। हालांविक यह सत्य है विक वाल्मीविक रामायर्ण में Sन्मस्र्थीा+ का कोई उल्लेख +हीं है सिसवाय इसक े विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में दशरर्थी क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA महल में कौसल्या क े पुत्र क े रूप में हुआ र्थीा। अगला *ार्मिमक £ंर्थी सिSसे वाद सं. 5 क े वादी और अन्य विहन्दू पक्षकारों +े संदर्भिभ विकया है व अवलंब खिलया है वह है स्क ं द पुरार्ण। स्क ं द पुरार्ण में वैष्र्णवखंर्ड क े अयोध्या महात्म्य का अवलंब खिलया गया है। पुरार्ण को प्रदश: 93 क े रूप में दाखिखल विकया गया है। स्क ं द पुरार्ण का अं£ेSी अ+ुवाद Sी.वी. ागड़े +े विकया है Sो मो ीलाल ब+ारसीदास पस्जिब्लशस: प्राइवेर्ट खिलविमर्टेर्ड, विदल्ली से प्रकाणिश है सिSसे भी स्क ं द पुरार्ण क े प्रासंविगक श्लोकों पर विवचार कर े समय संदर्भिभ विकया Sाएगा। स्क ं द पुरार्ण की पुस् क II वैष्र्णवखंर्ड है। वैष्र्णवखंर्ड क े विवणिभन्न भागों में विवणिभन्न विवषयों क े महात्म्य पर विवचार विकया गया है। भाग VII वैशाख मास क े महात्म्य से संबंति* है, भाग VIII अयोध्या महात्म्य से संबंति* है और भाग IX वासुदेव महात्म्य से संबंति* है। स्क ं दमहापुरार्णम् खेमराS श्रीक ृ ष्र्णदास (प्रदश: 93) द्वारा श्री वेंकर्टेश्वर स्र्टीम प्रेस मुंबई से प्रकाणिश है। र्डॉ Sी.वी. ागड़े का अ+ुवाद श्री वेंकर्टेश्वर स्र्टीम प्रेस मुंबई से प्रकाणिश स्क ं द पुरार्ण में से एक है। अयोध्या महात्म्य क े अध्याय X में 87 श्लोक हैं। मेसस: खेमराS श्रीक ृ ष्र्णदास, प्रोपराइर्टर, श्री वेंकर्टेश्वर स्र्टीम प्रेस मुंबई, +ाग प्रकाशक +ई विदल्ली से पु+प्र:काणिश । प्रासंविगक श्लोक 18 से 25 वि+म्+व हैं: स्मा ् स्र्थीा+ ऐशा+े रामSन्म प्रव: े। Sन्मस्र्थीा+विमदं प्रोX ं मोक्षाविदफलसा*+म् ।।18।। विवघ्+ेश्वरा ् पूव:भागे वासिसष्ठादुत्तरे र्थीा। लौमशा ् पतिश्चमे भागे Sन्मस्र्थीा+ं ः स्मृ म।।19।। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उस स्र्थीा+ क े पूव त्तर में राम का Sन्मस्र्थीा+ है। इस पविवत्र Sन्मस्र्थीा+ को मोक्ष आविद का सा*+ कहा गया है। कहा गया है विक Sन्मस्र्थीा+ विवघ्+ेश्वर क े पूव: में, वणिशष्ठ क े उत्तर में और लौमस क े पतिश्चम में स्जिस्र्थी है। यद् दृष्टवा च म+ुष्यस्य गभ:वासSयो भवे ्। विव+ा दा+े+ पसा विव+ा ीर्थी$र्मिव+ा मखैः।।20।। +वमीविदवसे प्राप्ते व्र *ारी विह मा+वः स्+ा+दा+प्रभावेर्ण मुच्य े Sन्मबन्*+ा ्।।21।। इसक े दश:+ मात्र से व्यविX को बार बार गभ: में Sा+े से (अर्थीा: पु+S:न्म) से छ ु र्टकारा विमल Sा ा है। विब+ा दा+, प या ीर्थी:यात्रा क े +वमी ति णिर्थी क े व्र से पविवत्र स्+ा+ दा+ क े प्रभाव से म+ुष्य Sन्मबं*+ से मुX हो Sा ा है। कविपलागोसहस्राणिर्ण यो ददाति विद+े विद+े। त्फलं समवाप्+ोति Sन्मभूमेः प्रदश:+ा ्।।22।। आश्रमे वस ां पुंसां ापसा+ां च य ् फलम्। राSसूयसहस्राणिर्ण प्रति वषा:विग्नहोत्र ः।।23।। Sन्मस्र्थीा+ क े दश:+ से म+ुष्य को वही फल प्राप्त हो ा है Sो कविपला गाय को प्रति विद+ दा+ कर+े से प्राप्त हो ा है। आश्रम में रहकर प कर+े वाले को, प्रति वष: हSारों राSसूय और अविग्नहोत्र यज्ञ कर+े वाले को Sो फल प्राप्त हो ा है वही फल Sन्मस्र्थीा+ क े दश:+ से प्राप्त हो ा है। वि+यमस्र्थीं +रं दृष्टवा Sन्मस्र्थीा+े विवशेष ः। मा ाविपत्रोगु:रूर्णाञ्च भविXमुद्वह ां स ाम्।।24।। त्फलं समवाप्+ोति Sन्मभूमेः प्रदश:+ा ्।।25।। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (अध्याय 10, पृ.293) विवशेषकर Sन्मस्र्थीा+ पर पविवत्र वि+यमों क े पाल+ से म+ुष्य को मा ा, विप ा, गुरुS+ों क े प्रति भविX का लाभ हो ा है।

42. उX श्लोक में रामSन्म स्र्थीा+ की Sगह का उल्लेख विमल ा है। राम Sन्मस्र्थीा+ की पहचा+ करा+े वाली श्रुति यों का श्लोक में उल्लेख है Sो विक विवघ्+ेश्वर क े पूव: में, वणिशष्ठ क े उत्तर में और लौमस क े पतिश्चम में स्जिस्र्थी है। बहस क े दौरा+ विवद्वा+ अति*वXा श्री पी.ए+. विमश्र +े श्रीमद् स्क ं दपुरार्णम् को सन्दर्भिभ विकया है। यह बा विक- क्या अयोध्या महात्म्य में वर्भिर्ण उपरोX श्रुति यों से राम Sन्म भूविम का सत्याप+ हो सक ा है- इस पर पक्षकारों क े मध्य म भेद है Sहां दो+ों पक्षों +े अलग-अलग दृविष्टकोर्ण अप+ाया है। विहन्दू पक्षकारों की ओर से प्रस् ु विवद्वा+ अति*वXा +े क: विदया है विक वह व:मा+ स्र्थीा+ Sहां पर राम Sन्म भूविम हो+े का दावा विकया Sा ा है, वही है Sैसा विक अयोध्या महात्म्य में वर्भिर्ण है Sो विक प्राची+ समय से अब क लाखों विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास है। दो+ों पक्षकारों द्वारा विदये गये मौखिखक साक्ष्यों में साक्षीगर्ण +े अयोध्या महात्म्य में वर्भिर्ण श्रुति को सिसद्ध कर+े वाली गवाही दी है। उन्हों+े बया+ विदया है विक विहन्दुओं द्वारा राम Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में दावा विकया Sा+े वाला स्र्थीा+ अयोध्या महात्म्य में विदये गये वर्ण:+ क े अ+ुसार राम Sन्मस्र्थीा+ है। विहन्दुओं की यह आस्र्थीा और विवश्वास विक राम Sन्म भूविम स्र्थीा+ सिSसे आS भी पूSा Sा ा है,वही पूSास्र्थील है सिSसकी चचा: प्राची+ £न्र्थीों में है और लाखों विहन्दुओं का प्राची+ काल से ऐसा विवश्वास mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है। ओ.पी.र्डब्ल्यू.[1] महन् राम चन्ˆ दास विदगम्बर वाद सं.[5] में वादी क े साक्षी क े रूप में प्रस् ु हुए उन्हों+े बया+ विदया विक अयोध्या में भगवा+ राम का Sन्म हमारे वेदों,उपवि+षदों, संविह ा, स्मृति यों आविद क े वर्ण:+ों से सिसद्ध है। साक्षीगर्ण +े विववि+र्मिदष्ट रूप से स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य को संदर्भिभ विकया और कहा विक भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ गभ: गृह अर्थीा: वह विववाविद स्र्थीा+ है Sहां रामलला व:मा+ में विवराSमा+ हैं। ओ.पी.र्डब्ल्यू.[1] क े बया+ को संदर्भिभ विकया गया है और न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े अप+े वि+र्ण:य में इसका व्यापक अवलंब खिलया है। उ+का कर्थी+ वि+म्+व है Sहाँ पर उन्हों+े स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य का अवलंब खिलया है:- “यह वही अयोध्या है Sो व:मा+ स्र्थील है। भगवा+ राम इसी स्र्थीा+ पर पैदा हुए र्थीे। इसे सीमांविक कर े हुए,उपरोX वर्भिर्ण सभी विहन्दू £न्र्थीों में स्पष्ट संदभ: है। कागS सं. 107C/ 75 मेरे समक्ष है। स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य में इसका स्पष्ट उल्लेख है। भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ और गभ: गृह वही विववाविद स्र्थीा+ हैं Sहां रामलला व:मा+ में विवराSमा+ हैं।” (ई.र्टी.सी.)

43. ओ.पी.र्डब्ल्यू.16 Sगद्गुरु रामा+ंदाचाय: स्वामी रामभˆाचाय: कह े है विक उ+क े इस बया+ में विक विववाविद स्र्थील राम Sन्म भूविम है, Sैसा अ+ाविद काल से विहन्दुओं की आस्र्थीा और परम्परा से विवश्वास है। अप+े बया+ में उन्हों+े कहा है विक:mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “अप+े अध्यय+ों और Sा+कारी से मुझे ज्ञा है विक अयोध्या स्जिस्र्थी विववाविद स्र्थील श्री रामSन्मभूविम है सिSसे आस्र्थीा, परम्परा और विवश्वास क े आ*ार पर अ+ाविदकाल से विहन्दू *म: क े अ+ुयातिययों द्वारा भगवा+ राम की Sन्म भूविम मा+ा गया है और वि+रन् र पूSा की गया है।” (ई.र्टी.सी.)

44. इस मुख्य परीक्षर्ण में Sगद्गुरु रामा+ंदाचाय: स्वामी रामभˆाचाय: +े यह भी बया+ विदया है विक अयोध्या महात्म्य में भगवा+ राम क े Sन्मस्र्थीा+ का स्पष्ट उल्लेख है। मुख्य परीक्षर्ण का पैरा 25 वि+म्+व है:- “25. मुझे श्री क ृ ष्र्णदासात्मS क्षेमराS शास्त्री द्वारा स्र्थीाविप प्रेस से 1966 में प्रकाणिश स्क ं द पुरार्ण क े वैष्र्णव खंर्ड क े अयोध्या महात्म्य की Sा+कारी है, सिSसमें भगवा+ श्री राम क े Sन्मस्र्थीा+ का स्पष्ट वर्ण:+ है। आवरर्ण पृष्ट और पृष्ट संख्या 292 अध्याय 10 में श्लोक संख्या 1-25 की छाया प्रति संलग्नक 1 क े रूप में इस शपर्थीपत्र क े सार्थी संलग्न है Sोविक मूल पुस् क की सत्य प्रति खिलविप है।”

45. रामSन्म भूविम को पहचा++े क े खिलए अ+ुश्रुति यों की +ामौSूदगी क े संबं* में साक्षी का कोई प्रति परीक्षर्ण +हीं विकया गया। महं रामविवलास दास वेदान् ी DW-2/3 +े प्रस् र 24 में स्क ं द पुरार्ण क े वैष्र्णव खंर्ड क े अयोध्या महात्म्य का अवलंब खिलया है, उन्हों+े वि+म्+व बया+ विदया है:mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “24. यह विक, विहन्दुओं की प्रसिसद्ध पुस् क स्क ं द पुरार्ण क े वैष्र्णव खंर्ड में अयोध्या महात्म्य का वर्ण:+ है,इसमें विववाविद स्र्थील का भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में प्रकर्ट वर्ण:+ है। वैष्र्णव खंर्ड क े अयोध्या महात्म्य की प्रासंविगक पंविXयां वि+म्+व हैं:- “स्क ं द पुरार्ण वैष्र्णव खंर्ड में अयोध्या क े महत्व का वर्ण:+ कर े हुए वेदव्यास +े खिलखा है विक समस् इच्छाओं की पूर्ति क े खिलए व्यविX को श्रद्धा भविX क े सार्थी अयोध्या का दश:+ कर+ा चाविहए। चैत्र क े मही+े में ीसरे +वरात्र में भS+ गा े हुए अयोध्या Sा+ा चाविहए। अयोध्या में श्री राम +वमी यात्रा चैत्र माह क े ीसरे +वरात्र से प्रारम्भ हो ी है। ऐसी मान्य ा है विक इस यात्रा से दैवीय फल प्राप्त हो ा है, विवणिभन्न प्रकार क े +ृत्य एवं संगी तिचत्ताकष:क हो े हैं और व्यविX इससे बं* Sा ा है,इसमें कोई संदेह +हीं है। उच्च योगी भX रामSन्म भूविम क े पतिश्चमी रफ रह े हैं। सिSस भूविम को विप°र्डारक क े रूप में Sा+ा Sा ा है। इस भूविम की फ ू ल इत्याविद से पूSा हो ी है। व्यविX को इस पूSा से सद्गुर्ण प्राप्त हो ा है। लोग पूरे विव*ा+ से यह पूSा कर े हैं। विप°र्डारक की पूSा सरयू +दी में स्+ा+ कर+े क े पश्चा की Sा+ी चाविहए। पापी व्यविX को +वरावित्र क े पविवत्र +क्षत्र क े समय सांसारिरक विवकारों को दूर रख+े क े खिलए इसकी पूSा कर+ी चाविहए। विवघ्+ दूर कर+े क े खिलए पतिश्चमी रफ भगवा+ गर्णेश की पूSा की Sा ी है। रामSन्म भूविम इशा+ कोर्ण में स्जिस्र्थी है। यह भूविम Sो मोक्ष दे ी है, Sन्मभूविम या Sन्मस्र्थीा+ कहला ी है। वणिशष्ठ क ु °र्ड विवघ्+ेश्वरी क े पूव: में है, रामSन्मभूविम वणिशष्ठ क ु °र्ड क े उत्तर रफ है और शब्द से यह स्पष्ट हो Sा ा है विक रामSन्मभूविम वणिशष्ठ कु °र्ड से उत्तर विदशा में है। व्यविX को लोमस आश्रम क े पतिश्चमी विहस्से में Sन्मस्र्थीा+ का ध्या+ कर+ा चाविहए।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

46. स्वामी अविवमुXस्वरा+ंद सरस्व ी DW-20/2 +े अप+े मुख्य परीक्षर्ण क े बया+ क े प्रस् र 35 में स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य का अवलंब खिलया है व संदर्भिभ विकया है। उन्हों+े बया+ विदया है विक ”अयोध्या एक पविवत्र स्र्थीा+ है Sैसा विक अयोध्या महात्म्य पुस् क में वर्भिर्ण है”। इस पुस् क में ” रामSन्मभूविम का विववरर्ण है लेविक+ विकसी मस्जिस्Sद का उल्लेख +हीं है। प्रस् र 35 में विदये गये बया+ को संदर्भिभ साक्षी का प्रति परीक्षर्ण विकया गया। अप+े प्रति परीक्षर्ण में उन्हों+े कहा है विक बड़ा स्र्थीा+, +ागेश्वर +ार्थी मंविदर, लोमस ऋविष, विवघ्+ेश विप°र्डारक और वणिशष्ठ क ु °र्ड देखे हैं। अप+े प्रति परीक्षर्ण में वह कह े हैं:- “ साक्षी का प्रति परीक्षर्ण कर+े वाले विवद्व अति*वXा +े उसक े मुख्य परीक्षर्ण शपर्थीपत्र क े प्रस् र 35 की ओर साक्षी का ध्या+ आकर्मिष विकया है। एक प्रश्न क े उत्तर मेंं साक्षी +े कहा विक श्रीरामSन्म भूविम मंविदर क े दश:+ का उसमें संदभ: है। इस प्रस् र में संदर्भिभ "अन्य मंविदरों" से मेरा आशय ह+ुमा+गढ़ी और क+क भव+ से है। इसक े अलावा मैं+े बड़ा स्र्थीा+, +ागेश्वर +ार्थी मंविदर, लोमस ऋविष आश्रम, विवघ्+ेश विप°र्डारक और वणिशष्ठ क ु °र्ड देखे हैं। विवघ्+ेश और विप°र्डारक मंविदर +हीं हैं ये स्र्थीा+ों क े +ाम हैं। वहां मात्र एक बड़ा णिशलाखंर्ड है। मैं+े अप+े मुख्य परीक्षर्ण शपर्थी पत्र क े प्रस् र 35 में कहा है विक मैं अयोध्या कई बार गया हूं। इ+ यात्राओं क े दौरा+ मैं+े बहु बार दश:+ विकया है। लेविक+ प्रत्येक बार +हीं विकया है।”

47. अप+े मुख्य परीक्षर्ण में उस+े स्क ं द पुरार्ण में विदए गए विव*ा+ क े अ+ुरूप अयोध्या Sा+े का और द+ुसार दश:+ कर+े का बया+ विदया है। उस+े अप+े मुख्य परीक्षर्ण में यह भी संदर्भिभ विकया है विक उसे विब्रविर्टश शास+ क े समय श्री एर्डवर्ड: द्वारा लगवाए गए पत्र्थीर क े बोर्डÂ से बहु सहाय ा विमल ी र्थीी। मुख्य परीक्षर्ण क े प्रस् र 36 में उस+े कहा है:- “36. यह विक स्क ं द पुरार्ण में विदए गए विव*ा+ क े अ+ुसार एक बार मैं अयोध्या गया और श्री राम Sन्मभूविम का दश:+ विकया। इस यात्रा क े दौरा+ मुझे एक उच्चाति*कारी श्री एर्डवर्ड: द्वारा विब्रविर्टश शास+ क े समय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लगवाए गए पत्र्थीर क े बोर्डÂ से बहु सहाय ा विमली Sो विक स्क ं द पुरार्ण में वर्भिर्ण क्रम से लगाए गए र्थीे, और त्काली+ भौगोखिलक स्जिस्र्थीति को सिसद्ध कर े हैं।” मुख्य परीक्षर्ण क े प्रस् र 36 क े संदभ: में साक्षी का प्रति परीक्षर्ण विकया गया, सिSस प्रति परीक्षर्ण में उस+े कहा विक उस+े अयोध्या महात्म्य में वर्भिर्ण अ+ुश्रुति क े अ+ुसार राम Sन्मभूविम का दश:+ विकया र्थीा। विब्रविर्टश शास+(1901-1902) में श्री एर्डवर्ड: द्वारा लगवाए गए पत्र्थीरों को संदर्भिभ कर े हुए उन्हों+े कहा विक उन्हों+े बड़ा स्र्थीा+, राम Sन्मभूविम, विप°र्डारक, लोमस,विवघ्+ेश और वणिशष्ठ क ु °र्ड पर पर लगे पत्र्थीरों को देखा है। उन्हों+े आगे कहा विक लोमस आश्रम में लगा पत्र्थीर राम Sन्मभूविम मंविदर क े पूव: में लगा र्थीा। अप+े प्रति परीक्षर्ण में उन्हों+े वि+म्+व बया+ विदया है:- ” मैं+े पांच पत्र्थीर बोर्ड: देखे हैं। ये पत्र्थीर क े बोर्ड: क्रमशः "बड़ा स्र्थीा+" राम Sन्मभूविम, हिंप°र्डारक, लोमस, विवघ्+ेश और वणिशष्ट क ु °र्ड और विवघ्+ेश्वरा पर लगे हुए र्थीे। मैं+े इ+ पत्र्थीर क े बोर्डÂ को 2001 या 2002 में देखा र्थीा। मैं+े इ+ पत्र्थीरों को 2001 या 2002 में सार्थी देखा। Sब भी मैं वहां गया मैं+े इ+ पत्र्थीरों को लगा ार देखा। लोमस आश्रम पर लगा पत्र्थीर मंविदर क े ईशा+ कोर्ण क े पूव: में लगा र्थीा। यह पत्र्थीर राम Sन्मभूविम क े रास् े क े पूव- रफ लगा र्थीा। हिंप°र्डारक में लगा पत्र्थीर Sन्मभूविम क े उत्तर रफ है। इस पत्र्थीर क े पास एक शमा: का मंविदर स्जिस्र्थी है। विवघ्+ेश पर लगा पत्र्थीर हिंप°र्डारक से संलग्न र्थीा। यह पत्र्थीर भूविम ल से 4 से 5 फीर्ट की ऊ ं चाई पर र्थीा और भूविम में दो से ढाई फीर्ट की गहराई में गड़ा र्थीा। ये पत्र्थीर दो से चार फीर्ट मोर्टे र्थीे, मुझे यह याद +हीं है विक विकस पत्र्थीर पर कौ+ सा अंक खिलखा र्थीा। विवघ्+ेश्वरा पर लगा पत्र्थीर Sन्मभूविम क े पतिश्चम की रफ र्थीा और वणिशष्ट क ु °र्ड से क ु छ दूरी पर र्थीा। मैं वणिशष्ट क ु °र्ड गया हूं। यह शायद Sन्मभूविम क े दतिक्षर्ण पतिश्चमी को+े पर है। यह लगभग दो से ढाई सौ यार्ड: की दूरी पर है। यह पत्र्थीर मैं+े पहली यात्रा में भी देखा र्थीा और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आखिखरी यात्रा में भी देखा र्थीा। इस पर उक े री गई साम£ी दो+ों भाषाओं अर्थीा: अं£ेSी एवं हिंहदी में र्थीी।”

49. इस प्रकार साणिर्थीयों +े स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य में दी गयी अ+ुश्रुति क े अ+ुसार राम Sन्मभूविम की अवस्जिस्र्थीति को स्पष्ट ः सिसद्ध विकया है। अन्य साक्षी DW3/7 महं राम Sी दास +े अप+े प्रति परीक्षर्ण में अयोध्या महात्म्य का अवलंब खिलया है सिSसमें Sन्म स्र्थीा+ का उल्लेख है। उन्हों+े अयोध्या महात्म्य क े अ+ुसार राम Sन्म स्र्थीा+ की स्जिस्र्थीति को सत्याविप विकया है। DW3/14 Sग गुरु स्वामी रामा+ंदाचाय: हया:चाय: अप+े मुख्य परीक्षर्ण में उन्हों+े स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य का अवलंब खिलया है। अप+े मुख्य परीक्षर्ण में उन्हों+े कहा विक लोमस ऋविष आश्रम व:मा+ श्री राम Sन्म भूविम क े पूव: में है। उन्हों+े आगे कहा है विक लोमस ऋविष आश्रम क े स्र्थीा+ पर अब एक राम गुलेला मंविदर है और श्री लोमस Sी क े +ाम पर एक पत्र्थीर है। मुख्य परीक्षर्ण क े प्रस् र 31 में वह कह े हैं:- “31. लोमस ऋविष आश्रम व:मा+ राम भूविम मंविदर क े पूव: में है, सिSसक े विवषय में एक वाद विवचारा*ी+ है। Sहां पर रामगुलेला मंविदर है वहां श्री लोमस Sी क े +ाम पर एक पत्र्थीर है। विवघ्+ेश्वर भगवा+ राम Sन्म भूविम क े पतिश्चम रफ हैं Sो विक वणिशष्ठ भव+ मंविदर क े पतिश्चम रफ है। साक्ष्य शपर्थी पत्र की सूची ’A’ में संलग्न है।"

50. आगे इस पर ध्या+ दे+ा प्रासंविगक है विक वह साक्षी Sो वाद संख्या 4 क े वादी की ओर से प्रस् ु हुआ, स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य क े संदभ: में उ+का भी प्रति परीक्षर्ण विकया गया। पीर्डब्ल्यू 13 सुरेश चंˆ विमश्रा Sो विक वाद संख्या 4 क े वादी की ओर से प्रस् ु हुए एक इति हासकार हैं। पीर्डब्ल्यू 15 सुशील श्रीवास् व, मुस्जिस्लम पक्षों, वाद संख्या 4 क े वादी गर्ण की ओर से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इति हासकार क े रूप में उपस्जिस्र्थी हुए। अप+े प्रति परीक्षर्ण में अयोध्या महात्म्य में भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े उल्लेख क े बारे में उन्हों+े अप+ी सहमति दी। अप+े प्रति परीक्षर्ण में उन्हों+े वि+म्+व बया+ विदया है:- "अयोध्या महात्म्य में राम क े Sन्म क े बारे में यह खिलखा हुआ है। राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े बारे में अयोध्या महात्म्य में Sो उल्लेख है उससे मैं सहम हूं। इस पुस् क में लोमस ऋविष क े आश्रम का भी उल्लेख है। अर्थीा: उसमें इसका वर्ण:+ विकया गया है। उसमें विवघ्+ेश्वर स्र्थीा+ का भी वर्ण:+ है। अयोध्या महात्म्य में वणिशष्ठ ऋविष क े आश्रम का वर्ण:+ है।" (ETC) अयोध्या महात्म्य में लोमस ऋविष और वणिशष्ठ ऋविष क े आश्रम क े बारे में संदभÂ से राम क े Sन्म स्र्थीा+ का भू अंक+ हुआ है। अयोध्या महात्म्य क े अ+ुसार रामSन्म स्र्थीा+ लोमस ऋविष आश्रम क े पतिश्चम में,विवघ्+ेश्वर मंविदर क े पूव: में और वणिशष्ठ मुवि+ आश्रम क े उत्तर में स्जिस्र्थी है। मुझे विवघ्+ेश्वर मंविदर +हीं विमला बस्जिल्क मैं+े "विवघ्+ेश्वर" शब्द अंविक एक पत्र्थीर देखा। मुझे लोमस ऋविष का आश्रम +हीं विमला, मुझे वणिशष्ठ मुवि+ का आश्रम भी +हीं विमला लेविक+ लोगों +े मुझे उ+क े बारे में ब ाया।" (ETC)

51. कोई र्डॉ. सी ाराम राय पीर्डब्ल्यू 28 भी वाद संख्या 4 क े वादी गर्ण की ओर से प्रस् ु हुआ। सिSसका स्क ं द पुरार्ण क े संदभ: में प्रति परीक्षर्ण विकया गया। अप+े बया+ में उस+े कहा है विक यह कह+ा सही +हीं होगा विक अयोध्या महात्म्य में राम Sन्म भूविम की परिरसीमा और उसकी स्जिस्र्थीति दी गई है। उस +े हालांविक कहा है विक यह सत्य है विक विप°र्डारक, विवघ्+ेश्वर, वणिशष्ठ और लोमस Sैसे पौराणिर्णक व्यविXत्व मौSूद हैं। उस+े अप+े बया+ में कहा विक अयोध्या महात्म्य में श्लोक से Sन्म स्र्थीा+ की ओर यात्रा का प ा चल ा है + विक इसकी परिरसीमा की स्पष्ट ा का। अप+े प्रति परीक्षर्ण में उस+े वि+म्+व बया+ विदया है:mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA " मेरे दृविष्टकोर्ण से यह कह+ा सही +हीं होगा विक अयोध्या महात्म्य अध्याय में राम Sन्म भूविम की परिरसीमा और उसकी अवस्जिस्र्थीति दी गई है। इस हिंबदु पर विवद्व अति*वXा +े साक्षी का ध्या+ पेपर संख्या 107- C1/75 क े श्लोक 14 से 25 की ओर आकर्मिष विकया । इस पर वादी क े अति*वXा श्री Sफरयाब सिSला+ी +े आपखित्त उठाई विक कागS को सिसद्ध +हीं विकया गया है और उस पर प्रश्न पूछ+े की अ+ुमति +हीं दी Sा+ी चाविहए। उसका प्रत्युत्तर बाद में विदया Sाएगा। उपरोX श्लोक को पढ़+े क े पश्चा साक्षी +े कहा विक मैं+े उसकी अन् व:स् ु को समझा है और कहा विक इसखिलए इसमें राम Sन्मभूविम की परिरसीमा का स्पष्ट अंक+ +हीं विकया गया है और बाद में कहा विक इसमें परिरसीमा +हीं दी गई है। विवद्व अति*वXा +े साक्षी को श्लोक की पंविX संख्या 18-19 पढ़वाया और इसे पढ़+े क े पश्चा साक्षी +े कहा विक परिरसीमा का स्पष्ट अंक+ +हीं विकया गया है। चारों विदशाओं का कोई उल्लेख +हीं है Sो विक परिरसीमा क े खिलए आवश्यक हो ी हैं। यह सत्य है विक इस श्लोक में विप°र्डारक,विवघ्+ेश्वर, वणिशष्ठ और लोमस का उल्लेख विकया गया है। प्रति परीक्षर्ण कर+े वाले विवद्वा+ अति*वXा से अट्ठारहवें श्लोक की पहली पंविX सु++े क े पश्चा साक्षी +े प्रत्युत्तर विदया विक इस स्र्थीा+ से आगे Sन्मभूविम क े खिलए ईशा+ विदशा में Sा+ा होगा। "प्रव: े" का अर्थी: वह हो ा है Sो Sा ा है। "विवघ्+ेश्वर पूव:भागे" का अर्थी: है विवघ्+ेश्वर क े पूव- ओर। "वणिशष्ठ उत्तरे" का अर्थी: है वणिशष्ठ क े उत्तर की ओर। "लोमस्र्थी पतिश्चमे" का अर्थी: है लोमस क े पतिश्चम की ओर। "Sन्मस्र्थीा+म र्थीाति " का अर्थी: है वहां से Sन्मस्र्थीा+। ऊपर मैं+े Sो कहा है उससे Sन्म स्र्थीा+ की ओर यात्रा का संक े विमल ा है + विक इसकी परिरसीमा की स्पष्ट ा का।"

52. उपरोX साक्षी क े अ+ुसार रामSन्मभूविम की स्पष्ट परिरसीमा +हीं दी गयी है। लेविक+ पूव:, पतिश्चम और उत्तर की ओर स्जिस्र्थी विवभूति यों क े बारे में संक े विदया गया है और यह संक े विदया गया है विक रामSन्मभूविम क क ै से पहुंंचे। द्+ुसार उX संक े रामSन्मभूविम की अवस्जिस्र्थीति का प ा लगा+े क े खिलए पया:प्त है। स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य Sैसे प्राची+ £ंर्थी में विबक्री या पट्टा दस् ावेS में संदर्भिभ की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sा+े वाली परिरसीमा क े Sैसी विकसी परिरसीमा का विदया Sा+ा अणिभकस्जिल्प +हीं र्थीा। यर्थीा उपरोX ध्या व्य, र्डॉ राSीव *व+ +े स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य में विदये गये तिचन्हों की पहचा+ को +कार े हुए 13.05.1991 विद+ांविक राष्ट्र क े +ाम इति हासकारों की रिरपोर्ट: पर भारी अवलंब खिलया है। स्क ं द पुरार्ण क े अयोध्या महात्म्य में दी गयी रामSन्म भूविम की अवस्जिस्र्थीति क े आ*ार पर विदये Sा+े वाले क: को +कार े हुए र्डॉ राSीव *व+ +े राष्ट्र क े +ाम इति हासकारों की रिरपोर्ट: का सहारा खिलया है। हैंस बेकर द्वारा खिलखिख पुस् क "अयोध्या" क े आ*ार पर श्री पी.ए+. विमश्र द्वारा विदये गये क को वि+म्+खिलखिख कर्थी+ कर े हुए +कारा गया है:- ”(a) हैंस बेकर की पुस् क इस अव*ारर्णा पर आ*ारिर है विक अयोध्या एक वास् विवक +गर +हीं बस्जिल्क कविव की एक कल्प+ा है। (b) उन्हों+े अयोध्या की समा+ ा साक े +गर से की है। (c) अयोध्या महात्म्य से Sन्मस्र्थीा+ का अंक+ कर े हुए वे भारी कविठ+ाई का हवाला दे े हैं, और अं ः कह े हैं विक बाबरी मस्जिस्Sद Sन्मस्र्थीा+ पर ब+ाई गयी है। Sैसा विक स्र्थीा+ीय विवश्वास से अणिभपुष्ट है। (d) यहां क विक आक्षेविप वि+र्ण:य में भी यह उसिल्लखिख है विक हैंस बेकर का लेख+ विब+ा कोई क: विदये कल्प+ा पर आ*ारिर है।”

53. राष्ट्र क े +ाम इति हासकारों की रिरपोर्ट: Sो विक वाद सं. 4 में प्रदश: सं. 62 है, पर पहले विवचार विकया Sाय। राष्ट्र क े +ाम इति हासकारों की रिरपोर्ट: से संदर्भिभ रिरपोर्ट: अयोध्या विववाद में विवश्व विहन्दू परिरषद क े पक्ष पर उ+की विर्टप्पर्णी र्थीी। भार सरकार को खिलखे गये पत्र में चारों इति हासकारों की राय र्थीी, “हमारा अध्यय+ ब ा ा है विक बाबरी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मस्जिस्Sद क े स्र्थीा+ पर + ो विकसी मंविदर का साक्ष्य है + ही वहां मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण क े पहले विकसी ढ़ाचे क े विवध्वंश का”।

54. रिरपोर्ट: में उपरोX विर्टप्पर्णी विक प्राची+ संस्क ृ £न्र्थीों का कोई संदभ: + हो+ा इस बा को बेहद संदेहास्पद ब+ा दे ा है विक राम Sन्मस्र्थीा+ में विवश्वास ऐसे सम्मा++ीय प्राची+ ा का विवषय है Sैसा विक दावा विकया Sा रहा है। यर्थीा उपरोX ध्या व्य,वाल्मीविक रामायर्ण महाकाव्य सिSसकी रच+ा इसाई युग क े प्रारम्भ क े पूव: की है, में अयोध्या में राSा दशरर्थी क े महल में भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में ब ाया गया है। रिरपोर्ट: इस वि+ष्कष: पर भी पहुंच गयी विक ऐसे विवश्वास का 18 वीं श ाब्दी क े उत्तरा*: से पहले का हो+ा और भी संदेहास्पद है। आगे रिरपोर्ट: में स्क ं द पुरार्ण की रच+ा की अवति* क े संबं* में विर्टप्पर्णी की गयी र्थीी। रिरपोर्ट: इस वि+ष्कष: पर पहुंच ी है विक अयोध्या महात्म्य को 18 वीं श ाब्दी क े अन् का या 19 वीं श ाब्दी क े प्रारम्भ का हो+ा चाविहए। इस पर विवचार कर+ा आवश्यक है विक क्या रिरपोर्ट: में की गयी विर्टप्पर्णी विक स्क ं द पुरार्ण का अयोध्या महात्म्य 18 वीं श ाब्दी क े अन् का या 19 वीं श ाब्दी क े प्रारम्भ की रच+ा है या इससे पहले की अवति* से संबंति* है।

55. भ°र्डारकर ओरिरएंर्टल रिरसच: इंस्र्टीट्यूर्ट द्वारा प्रकाणिश पी.वी. का+े द्वारा खिलखिख *म:शास्त्र का इति हास ख°र्ड 5 भाग II में पुरार्णों और उ+की ति णिर्थी या अवति* क े संबं* में विवस् ार से विवचार विकया गया है। पी.वी. का+े +े उपरोX संदर्भिभ वेंकर्टेश्वर प्रेस से यर्थीा प्रकाणिश mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA VII वें भाग में स्क ं द पुरार्ण को भी संदर्भिभ विकया गया है। विवस् ृ विवमश: क े पश्चा पी.वी. का+े इस वि+ष्कष: पर पहुंच े हैं विक स्क ं द पुरार्ण 7 वीं श ाब्दी ई. क े बाद का +हीं मा+ा Sा सक ा। ”*म:शास्त्र का इति हास” में स्क ं द पुरार्ण और इसकी ति णिर्थी वि+*ा:रर्ण क े संबं* में पी.वी. का+े का विवमश: वि+म्+व है:- “ "स्क ं द"- यह पुरार्णों में सबसे विवस् ृ है। इसमें Sविर्टल र समस्याएं साम+े आयीं हैं। यह दो रूपों में पाया Sा ा है। पहला- सा ख°र्डों- महेश्वर, वैष्र्णव, ब्रह्म, काशी, अवस्जिन् +गर और प्रभास में विवभासिS है और दूसरा छः संविह ाओं-स+ क ु मार, सू, शंकरी, वैष्र्णवी, ब्रह्मी और सौर में विवभासिS है। सा ख°र्डों वाला स्क ं द वेंकर्टेश्वर प्रेस से प्रकाणिश है और मा*वाचाय: की व्याख्या वाला सू संविह ा ए+.ए+. प्रेस पू+ा से प्रकाणिश है। स्क ं द पुरार्ण का विवस् ार णिभन्न णिभन्न 81000 श्लोक, 100000 श्लोक (PRHR p.158) 86000 श्लोक (PRHR p.159) विदया गया है। स्क ं द भगवा+ क े +ाम से खिलखे इस पुरार्ण में स्क ं द भगवा+ का बहु उल्लेख +हीं है। पद्म V.59.[2] स्क ं द I.2.6.79 में स्क ं द लगभग उन्हीं शब्दों में है Sैसे विकरा ाSु:+ीय (II.30 ‘सहसा विवदाति* ा +ा विक्रयम’) में। स्क ं द काशीखंर्ड 24 (8ff) बार्ण की शैली में श्लेष और परिरसंख्य से भरा है। +ाट्यवेद और अर्थी: शास्त्र का काशी खंर्ड (पूवा:*:

7. 4-5)में उल्लेख है। *+वं रिर और चरक का काशीखंर्ड में उल्लेख है (पूवा:*: 1.71)। काशीखंर्ड 72.74 में Sोचिं गा शब्द आ ा है। आरंणिभक भाष्यों में *म:शास्त्र क े विवषय पर स्क ं द का उद्धरर्ण विदया Sा ा है। Mit. On Yaj. ii.290 में इसका उल्लेख वेश्याओं की स्जिस्र्थीति क े संबं* में है।व्र क े संबं* में कल्प रु इससे क े वल 15 श्लोकों का उद्धरर्ण दे े हैं। ीर्थी: क े बारे में कल्प रु(pp. 36-39,32,46,130-135) 92 श्लोकों का, *+ पर क े वल 44 का, वि+य काल पर 63 श्लोकों का,राS*म: पर 18 श्लोक,श्राद्धका°र्ड में क े वल 4, गृहस्र्थीका°र्ड पर 3 है। अपाक: इससे क े वल 19 श्लोकों का उद्धरर्ण दे े हैं। एक अन्य उद्धरर्ण ांवित्रक प्रभाव (+ोर्ट द्वारा) दर्भिश कर ा है। दा+सागर दा+ क े विवषय पर 48 श्लोकों का उल्लेख कर ी है और Sm. C. क ु लविमलाकर 23। स्क ं द क े विवशाल श्लोकों को देखकर यह कहा Sा+ा चाविहए विक *म:शास्त्र £ंर्थीों में इसे कम ही उद्धृ विकया गया है।इसका एक श्लोक काखिलदास क े शब्दों को ध्ववि+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर ा प्र ी हो ा है और देवल क े दृविष्टकोर्ण को उद्धृ कर ा है। ऐसे विवशाल £ंर्थी में आसा+ी से प्रक्षेप विकया Sा सक ा है। अ ः इसे एक वि+तिश्च ति णिर्थी दे+ा कविठ+ है। +ेपाल दरबार क े पुस् कालय की एक प्रति में यह ऐसे अक्षरों में खिलखा गया है Sो 7 वीं श ाब्दी ए.र्डी. से संबंति* है। हरप्रसाद शास्त्री (+ेपाल Palm-leaf mss. p. LII.) द्वारा। यह कह+ा सत्य से दूर +हीं होगा विक उपलब्* साक्ष्यों क े आ*ार पर स्क ं द को 7 वीं श ाब्दी ए.र्डी. से पहले और 9 वीं श ाब्दी ए.र्डी. से बाद की अवति* में +हीं रखा Sा सक ा।"

56. साक्ष्य क े दृविष्टग स्क ं द पुरार्ण की रच+ा की कालावति* क े संबं* में आगे विकसी भी प्रकार की चचा: विकये Sा+े की आवश्यक ा +हीं है सिSसको वाद 4 क े वादी +े स्वयं रखा है। पी. र्डब्ल्यू. 20 श्रीरी+ मुसावी +े अप+े बया+ में कहा है विक रामकोर्ट क े भौगोखिलक परिरषद +े स्क ं द पुरार्ण में इसका विववरर्ण पाया। उX क े संबं* में उन्हों+े अप+े बया+ में स्पष्ट रूप से कहा विक स्कन्द पुरार्ण उन्नीसवीं श ाब्दी से संबंति* है Sो वि+म्+व हैः- "मैं+े अयोध्या में स्जिस्र्थी रामकोर्ट क े बारे में पढ़ा है। रामकोर्ट क े भौगोखिलक परिरक्षेत्र का विववरर्ण स्कन्द पुरार्ण में विमल ा है। लेविक+ यह स्पष्ट +हीं है। यह सच है विक सोलहवीं श ाब्दी क े अन् क अयोध्या में एक खास Sगह को रामकोर्ट क े +ाम से Sा+ा Sा ा है। स्कन्द पुरार्ण को +वीं श ाब्दी का मा+ा Sा सक ा है।" (ई.र्टी.सी.)

57. उX क े दृविष्टग, चारों इति हासकारों +े अप+े रिरपोर्ट: में कहा विक स्कन्द पुरार्ण का अयोध्या महात्मय की रच+ा अठ्ठारवीं श ाब्दी क े अन् में अर्थीवा उन्नीसवीं श ाब्दी क े प्रारम्भ में की गयी है ऐसा स्वीकार की Sा सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आगे यह ध्या+ दे+ा क: संग होगा विक स्कन्द पुरार्ण क े महात्मय क े संबं* में विहन्दू पक्षकारों की रफ से वाद 5 क े सातिक्षयों एवं अन्य सातिक्षयों का परीक्षर्ण विकया गया सार्थी ही सार्थी इ+का स्कन्द पुरार्ण क े महात्मय क े श्लोकों क े आ*ार पर प्रति परीक्षा की गयी लेविक+ विकसी भी साक्षी क े बया+ क े आ*ार यह +हीं कहा Sा सक ा विक स्कन्द पुरार्ण का अयोध्या महात्मय की रच+ा अठ्ठारवीं श ाब्दी क े अन् में अर्थीवा उन्नीसवीं श ाब्दी क े प्रारम्भ में की गयी र्थीी। इस प्रकार इति हासकारों +े Sो रिरपोर्ट: दी है उसमें उ+का मा++ा है विक स्कन्द पुरार्ण लम्बे समय से चले आ रहे राम Sन्म स्र्थीा+ में विकसी भी विवश्वास का समर्थी:+ +हीं कर ा है Sो विक अस्वीकाय: है।

58. इति हासकारों +े अप+ी रिरपोर्ट: में Sो अन्य त्रुविर्ट की है वह यह है विक अयोध्या महात्म्य में उसिल्लखिख कर्थीा को Sब दS: विकया Sा रहा र्थीा ो रिरपोर्ट: में "लॉमासा" को व:मा+ रिर+ मोचा+ घार्ट क े सार्थी संदर्भिभ विकया गया। उX क े संदभ: में यह रिरपोर्ट: वि+म्+खिलखिख कर्थी+ कर ी हैः- "स्र्थीा+ीय विहन्दू की मान्य ा क े अ+ुसार लॉमासा अर्थीवा लॉमासा का स्र्थीा+ रिर+ मोसा+ घार्ट Sैसा है।"

59. उX वि+ष्कष: स्र्थीा+ीय विहन्दू मान्य ा को संदर्भिभ कर वि+काला गया है Sबविक लॉमासा का अस्जिस् त्व और इसकी परिरस्जिस्र्थीति और पहचा+ ब से सुस्र्थीाविप है Sब से पत्र्थीर का स् म्भ वष: 1901-02 में यहां रखा गया है सिSसको वाद 5 में वादी की ओर से उपस्जिस्र्थी सातिक्षयों +े साविब कर विदया है। स्वामी अविवमुXस्वरा+ंद क े कर्थी+ का पहले ही संदभ: विदया Sा चुका है। उX त्रुविर्ट क े चल े चारों इति हासकारों द्वारा राम Sन्मभूविम का स्र्थीाप+ त्रुविर्टपूर्ण: रहा है। चारों इति हासकारों द्वारा रिर+ मोचा+ घार्ट क े रूप में लोमास mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की पहचा+ संभव ः गल है। वाद संख्या 2 वष: 1950, +क्शा +Sरी को विद+ांक 01.04.1950 को णिशवशंकर लाल, न्यायालय आयुX, +े ैयार विकया र्थीा सिSसका उत्तर मा++ीय उच्च न्यायालय +े दे विदया है और इस पर विकसी +े प्रश्न +हीं उठाया है। उX +क्सा +Sरी में, Sो न्यायमू्र्ति एस. यू. खा+ द्वारा पारिर वि+र्ण:य में संस्करर्ण 1 पृष्ठ संख्या 30 पर और न्यायमूर्ति सु*ीर अ£ावाल द्वारा पारिर वि+र्ण:य क े परिरणिशष्ट 2 सी में प्रकाणिश है सिSसमें लोमास को Sन्म भूविम क े दतिक्षर्ण पूव- विक+ारे क े रूप में उसिल्लखिख विकया है Sो सरयू +दी क े विक+ारे मोचा+ घार्ट क े रूप में चारों इति हासकारों द्वारा लोमास क े स्र्थीा++ को साफ-साफ +कार दे ा है। रिरपोर्ट: में कु छ अन्य अवलोक+ विकया गया है सिSसको अणिभस्वीक ृ +हीं विकया Sा सक ा है। रिरपोर्ट: में यह खिलखा है विक स्कन्द पुरार्ण स्वग:द्वार ीर्थी: का संदभ: दे ी है सिSस पर 100 छन्द स्वग:द्वार क े विववरर्ण को समर्मिप विकया गया है Sबविक क े वल 8 छन्द Sन्म स्र्थीा+ को समर्मिप है सिSसका अर्थी: है विक स्वग:द्वार ीर्थी: Sन्म स्र्थीा+ से अति*क महत्वपूर्ण: है। क्या 8 छन्दों में Sन्मस्र्थीा+ की व्याख्या इसक े विववरर्ण और परिरक्षेत्र का महत्व को कम करेगा?सिSसका उत्तर स्पष्ट रूप से '+हीं' है। यह आगे देखा Sा सक ा है विक पूरी रिरपोर्ट: कु छ भी +हीं है बस्जिल्क विवश्व विहन्दू परिरषद क े मामले का विवरो* है Sैसा विक रिरपोर्ट: क े शुरुआ में ही उल्लेख विकया गया है। इस प्रकार यह रिरपोर्ट: विवश्व विहन्दू परिरषद क े विवरो* में ब+ायी गयी है, Sो स्वयं यह ब ा ी है विक चारों इति हासकारों +ेे पूरे विवषय को वि+ष्पक्ष और वस् ुपरक +हीं मा+ा र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

60. न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े आक्षेविप वि+र्ण:य में चारों इति हासकारों द्वारा दी गयी रिरपोर्ट: पर सविवस् ार विवचार कर पाया विक इसका अवलम्ब ले+ा लाभकारी +हीं है। इति हासकारों की रिरपोर्ट: और कु छ सातिक्षयों संबं* में वि+म्+खिलखिख शब्दों में बहु ही मSबू विवश्लेषर्ण विकया गया हैः- "3622. हम यहां उल्लेख कर+ा चाहेंगें विक हालांविक यह दावा विकया गया है विक उX रिरपोर्ट: को चार लोगों द्वारा ब+ाया गया है लेविक+ इसमें श्री र्डी.ए+. झा क े हस् ाक्षर +हीं हैं। कणिर्थी विवशेषज्ञ की राय Sो उ+क े अध्यय+ और शो* काय: पर आ*ारिर +हीं है बस्जिल्क अन्य की रायों पर आ*ारिर है, हमारे विवचार में भार ीय साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 45 र्थीा विहमाचल प्रदेश ब+ाम Sयलाला(उपरोX) क े मामले में शीष: न्याायलय द्वारा सुस्र्थीाविप विवति* क े ह विवचारिर विकया Sा+ा सुसंग +हीं है।" "3623. आम ौर पर न्यायालय सातिक्षयों की गवाही पर प्रति क ू ल विर्टप्पर्णी +हीं कर े हैं और इसक े खिलए इ +ा पया:प्त है विक साक्षी विवश्व+ीय है अर्थीवा +हीं, लेविक+ विववाद की प्रक ृ ति और संवेदशील ा और लापरवाहीभरा और गैरसिSम्मेदारा+ा बया+ों को भी विवचार कर हम इस विवशेष मामले में स्वयं का प्रति रो* कविठ+ मा+ े हैं और उ+ थ्यों को इति हास और पुरात्तव इत्याविद क े विवशेषज्ञ का दावा कर+े वाले लोगों द्वारा विब+ा उस विवषय में उतिच Sांच, शो* अर्थीवा अध्यय+ क े प्रकाणिश करवा विदया गया।" "3624. यह सच में चौंका+ेवाला है। इस+े + क े लव हमको आश्चय:चविक विकया बस्जिल्क हम स् ब्* रह गये। साव:Sवि+क रूप से विकया गया ऐसा बया+ बड़े पैमा+े पर चीSों को स्पष्ट कर+े क े बSाय अति*क भ्रम पैदा कर ा है। समन्Sस्यपूर्ण: माहौल ब+ा+े में मदद कर+े की अपेक्षा यह अति*क Sविर्टल ा, विववाद और विवरो* पैदा कर ा है। उन्हें साव:Sवि+क रूप से ऐसा बया+ दे+े से पहले बहु ही साव*ा+ी और सचे ा बर +ी चाविहए।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "3625. उ+ लोगों का मा++ा है विक Sो क ु छ भी विवद्वा+ और शो*ार्थी- द्वारा कहा गया है वह विब+ा विकसी आ*ार क े +हीं होगा। आम ौर पर वे इसे थ्य और मामले क े सही कर्थी+ क े रूप में स्वीकार कर े हैं। आम ौर पर इ+ व्यविXयों को कोई ऐसा मंच +हीं विमल ा है Sहां पर इ+क े बया+ का अन्य विवशेषज्ञों द्वारा परीक्षर्ण विकया Sा सक े Sैसा विक न्यायालय में प्रति परीक्षा हो ी है। विवति*क शब्दावली में हम कह सक े हैं ये कर्थी+ आम ौर पर एकपक्षीय और एक रफा है। लेविक+ यह ऐसे व्यविX को यह अ+ुज्ञविप्त प्रदा+ +हीं कर ा है विक वह विब+ा सिSम्मेदारी व Sवाबदेही क े इसकी प्रमाणिर्णक ा क े बारे में कोई भी बया+ करे। कोई +हीं कह सक ा है विक यद्यविप मै+े बया+ विदया र्थीा लेविक+ मैं इसकी प्रमाणिर्णक ा की सिSम्मेदारी +हीं ले ा हूँ क्योंविक यह मेरे अध्यय+ और शो* पर आ*ारिर +हीं है बस्जिल्क Sो क ु छ मै+े दूसरों से Sा+ा वहीं मै+े कहा है। कोई भी व्यविX विवशेष ौर से वह विकसी विवषय का विवशेषज्ञ हो+े का दावा कर ा हो, इति हास इत्याविद विवषय का स्वघोविष विवद्वा+ हो;या थ्य या घर्ट+ा कोई म व्यX कर सक ी है Sब क विक वह अप+े अ+ुसं*ा+ या अध्यय+ से इस बा से सं ुष्ट + हो विक उसका/उसकी दृविष्टकोर्ण वहीं है और कÂ क े सार्थी वैसा ही कर्थी+ कर+ा चाह ा/चाह ी है।"

61. इस रिरपोर्ट: क े एक अन्य पहलू पर भी ध्या+ विदया Sा+ा चाविहए। इस रिरपोर्ट: में प्रो. बी.बी. लाला (भार ीय पुरा ास्जित्वक सव†क्षर्ण विवभाग) द्वारा करायी गयी खुदायी का संदभ: रामायर्ण क े स्र्थीलों को पहचा+ क े खिलए विदया गया है। उX खुदायी श्री बी.बी. लाला द्वारा स+् 1975-76 में कराया गया। विववाविद ढ़ाँचे की दतिक्षर्ण की रफ क ु छ खाई ं खोदी गयीं और श्री बी.बी. लाला +े म व्यX विकया विक क ु छ आ*ार स् म्भ विमले दतिक्षर्ण विदशा में बाबरी मस्जिस्Sद को दर्भिश कर े हैं। इस रिरपोर्ट: में, श्री बी.बी. लाल द्वारा खुदायी का संदभ: दे+े पर वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: वि+कल ा है- "अन् में, ऐसा क ु छ भी +हीं है सिSससे दर्भिश हो विक बाबरी मस्जिस्Sद से 60 मी. की दूरी पर स्जिस्र्थी आ*ार स् म्भ बाबरी मस्जिस्Sद में प्रयुX mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स् म्भों क े सी* में हैं। वास् व में आ*ार स् म्भों पर स्र्थीाविप ढा़ँचा से कोई महत्व +हीं Sोड़ा Sा सक ा है। यह एक छोर्टा बरामदा हो सक ा है सिSसका प्रयोग पशु छाव+ी अर्थीवा रह+े क े खिलए विकया Sा ा हो। ऐसे ढ़ाँचे आS भी उस Sगह पर पाये Sा े हैं।"

62. उस स्र्थील को छोड़कर Sहां पर अस्र्थीाई ढांचा स्जिस्र्थी र्थीा विववाविद स्र्थील की खुदाई उच्च न्यायालय क े आदेश विद+ांक 05-03-2003 क े ह भार ीय पुरा त्व एवं सव†क्षर्ण विवभाग (ए. एस. आई.) द्वारा करायी गयी। ए. एस. आई +े विवस् ृ रिरपोर्ट: Sमा कर दी है सिSस पर अलग से विवचा विकया Sाएगा। वष: 1975-76 में श्री बी.बी. लाल द्वारा की गयी खुदाई क े सिS+ वि+तिश्च आ*ार पर चारों इति हासकारों +े Sो राय ब+ायी है वह उच्च न्यायालय क े आदेशों क े ह ए.एस.आई. द्वारा की गयी विवस् ृ काय:वाविहयों क े दृविष्टग बहु अति*क सुसंग +हीं ं हो पायी है। अ ः ए.एस.आई. द्वारा उX उत्तरव - विवस् ृ खुदाई क े चल े इति हासकारों की रिरपोर्ट: पर भरोसा +हीं विकया Sा सक ा है।

63. र्डा. *व+ +े पर हंस बक्कर द्वारा रतिच पुस् क अयोध्या क े संदभ: में बया+ विदया है। पुस् क अयोध्या र्डच विवद्वा+ हंस बक्कर का शो* प्रबं* है सिSसको उस+े वष: 1984 में £ोवि+न्S+ विवश्वविवद्यालय में Sमा विकया। इस पुस् क का प्रकाश+ वष: 1986 में विकया गया है सिSसमें विवस् ृ विववरर्ण मौSूद है और Sो ी+ भागों में है। अयोध्या क े ी+ +क्शे भी ब+ाये गये सिSसमें रामSन्मभूविम, बाबरी मस्जिस्Sद एवं अन्य ऐति हासिसक महत्व क े स्र्थीा+ सस्जिम्मखिल हैं। हंस बक्कर +े अप+ी पुस् क में अयोध्या महात्म्य का सविवस् ार वर्ण:+ विकया है सिSसमें वेंकर्टेश्वर प्रेस मुम्बई प्रकाणिश अयोध्या महात्म्य का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वर्ण:+ एवं कई अन्य स्त्रो ों से प्राप्त अयोध्या महात्मय की कु छ हस् खिलविपयां सस्जिम्मखिल है। उन्हों+े उ+ हस् खिलविपयों की ुल+ा की सिSसमें एक बोस्जिल्र्डय+ लाइब्रेरी, ऑक्सफोर्ड:, ल°द+, हिंव्रदाव+ रिरसच: इंस्ट्यूर्ट, ओरिरए°र्टल इंस्ट्यूर्ट बरोदा ए°ड़ रिरसच: इंस्ट्यूर्ट Sो*पुर से प्राप्त विकया। इ+ ुल+ाओं की व्याख्या कर एवं सभी महत्वपूर्ण: पहलुओं पर विवचार कर हंस बक्कर +े अध्याय-21 में म व्यX विकया है विक Sन्म स्र्थीा+ का मूल स्र्थीा+ ुल+ात्मक रूप से वि+तिश्च है क्योंविक यह उस Sगह से प्रमाणिर्ण प्र ी हो ा है। बक्कर +े वि+म्+खिलखिख बया+ विकया हैः- "उपरोX उसिल्लखिख सभी कविठ+ाइयों क े हो े हुए भी, रामSन्म स्र्थीा+ की मूल स्जिस्र्थीति ुल+ात्मक रूप से वि+तिश्च है क्योंविक यह बाबर द्वारा ब+ायी गयी मस्जिस्Sद से सत्याविप प्र ी हो ा है उस भव+ में पूव: में ब+ाये गये मंविदर क े भव+ सामावि£यां अब भी देखीं Sा सक ी है। सामान्य ः यह मा+ा Sा ा है विक Sन्मस्र्थीा+ की Sगह पर काविबS हो+े क े खिलए मस्जिस्Sद ब+ायी गयी है। मूल मंविदर क े ोड़े Sा+े क े बाद मस्जिस्Sद क े उत्तर विदशा में +या Sन्मस्र्थीा+ मंविदर को ब+ाया गया Sो एक रास् े से इससे अलग हो ा है।"

64. अयोध्या महात्म्य में विदये गये स्र्थीा+ों की चचा: कर+े क े उपरान् Sहां क +क्शा ब+ाये Sा+े का प्रश्न है, अयोध्या महात्म्य क े अलग-अलग संस्करर्ण सिSसमें से एक वेंकर्टेश्वर प्रेस, बम्बई से प्रकाणिश शाविमल है, अन् में हंस बेकर वि+ष्कष: वि+काल े हैं विक पांचों +क्शों में अयोध्या और उसक े क्षेत्र की विवतिचत्र स्र्थीलाक ृ ति सस्जिम्मखिल है ऐसा अयोध्या महात्म्य की प्रर्थीा ब ा ी है Sो विक 1980 क े बसं और 1983 क े £ीष्मकाली+ समय क े बीच विकये गये सव† पर आ*ारिर है। अन् में, वह वि+म्+खिलखिख बया+ कर े हैंःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "इसमें संलग्न पांचो +क्शे अयोध्या और इसक े क्षेत्र क े विवतिचत्र स्र्थीालाक ृ ति को प्रस् ु कर े हैं ऐसा अयोध्या महात्म्य की प्रर्थीा ब ा ी है Sो Sो 1980 क े बसं और 1983 क े £ीष्मकाली+ समय क े बीच विकये गये सव† पर आ*ारिर है। अयोध्या +गर की स्र्थीलाक ृ ति क े संबं* में सीरीS 1:50000 क े पत्र संख्या 63 Sे/1 का सम्यक रूप से पु+रीक्षर्ण विकया Sा+ा आवश्यक र्थीा। (+क्सा-3, स्क े ल 1:10000)"

65. अप+े क: क े समर्थी:+ में विक अयोध्या वास् विवक शहर +हीं है बस्जिल्क कविव की कल्प+ा की उपS है Sैसा विक हंस बक्कर +े उल्लेख विकया है, र्डॉ. *व+ +े उस विक ाब की वि+म्+खिलखिख गद्यांश का संदभ: विदया हैः- "यह स्पष्ट हो चुका है विक अयोध्या +गर क े वल साविहत्य का भाग है Sो प्रसिसद्ध है, इस शहर की ऐति हासिसक ा का प्रश्न अच्छे से उठाया Sा सक ा है। इस प्रश्न क े वि+स् ारर्ण क े खिलए हमें शुरु क े ऐति हासिसक काल पर ध्या+ क े स्जिन्ˆ कर+ा चाविहए, कह+े का आशय यह विक ईस्वी क े दूसरी श ाब्दी क। 'अयोध्या' +ाम उस समय क े विकसी पुरा ास्जित्वक अर्थीवा उत्कीर्ण: लेख साक्ष्य द्वारा साविब +हीं है।"

66. उX अवलोक+ '600 ईसा पूव: से 1000 ईस्वी क े म्ध्य साक े /अयोध्या का इति हास' विवषय क े अध्याय में प्रकर्ट हो ा है। उX विर्टप्पर्णी कर+े क े उपरान्, हंस बक्कर +े Sो वि+ष्कष: वि+काला है वह इस प्रकार हैः- "अ ः हम इस वि+ष्कष: पर पहुंच े हैं विक प्राची+ महाकाव्य में अयोध्या क े बारे में Sो सूच+ाएं हैं वह उस +ाम क े प्राची+ शहर से संबंति* ऐति हासिसक आँकड़ा +हीं उपलब्* करा ी है बस्जिल्क क े वल उस Sगह ए. वाई.को प्रदर्भिश कर ी हैं।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

67. हंस बक्कर +े Sब इति हास का परीक्षर्ण विकये ब उन्हों+े Sै+ एवं बुद्द की मूर्ति यों पर भी विवचार विकया। इसक े बाद बक्कर +े *ारिर विकया विक अयोध्या की पहचा+ का प्रारम्भ एवं अन् गुप्त काल में हुआ। इस पुस् क में आगे Sो अवलोक+ विकया गया वह इस प्रकार हैः- "कर्थीा क्षेत्र का रूप *ारर्ण अन् में अयोध्या और साक े क े पहचा+ क े सामान्य अणिभस्वीक ृ ति में परिरर्ण हुया, Sो स्र्थीा+ ए.वाई. है यह प्रविक्रया गुप्त काल में सम्पन्न हुयी। वह पहचा+ अब भी साव:भौविमक रूप से प्रारस्जिम्भक गुप्त शास+ क े दौरा+ +हीं अणिभस्वीक ृ की गयी Sो क ु छ पुरार्णों में अ+ुसरर्ण की गयी प्र ी हो ी है, सिSसमें गुप्त शासकों को बSाय अद्भु अयोध्या क े वास् विवक क े साक े पर संप्रभु ा का श्रेय विदया गया। इस अवति* क े दौरा+ साक े क े सार्थी अयोध्या की पहचा+ + क े वल Sै+ स्त्रो से पुष्ट हो े हैंं बस्जिल्क संस्क ृ कर्थीा बह्मापुरार्ण 3.54.54 ( सी.पी. ओ.पी. सी.आई.र्टी. 3.54.5) और सबसे ज्यादा संग ा काखिलदास क े रघुवंश से है। यह क े वल उस अवति* से Sब से अयोध्या का +ाम मौSूदा +गर को दशा:+े क े खिलए प्रयोग विकया Sा ा र्थीा सिSसका हम सम्पोषक पुरा ास्जित्वक साक्ष्य प ा लगा+े क े खिलए आशातिय हैं। ऐसी गवाही आवश्यक हो ी है Sो उत्तरव - गुप्तों क े अणिभलेखों में विमल े हैं। (5 वीं श ाब्दी)- यह अणिभलेख 436 ईस्वी का है सिSसमें अयोध्या का ब्राह्मर्णों क े रूप में दा+दा ाओं का वर्ण:+ है। 533/3 ईस्वी क े गुप्त अणिभलेख में अयोध्या क े क ु ली+ S+ों का वर्ण:+ है। समुˆगुप्त का +कली गया ाम्रपत्र अणिभलेख संभव ः 8 वीं श ाब्दी क े प्रारम्भ में गढ़ा गया र्थीा सिSसमें अयोध्या का एक दुग: +गर क े रूप में वर्ण:+ है।"

68. इस प्रकार अयोध्या की पहचा+ संस्क ृ *म:शास्त्र और उत्तरव - गुप्तकाल से सत्याविप एवं साविब हो चुका है। इस प्रकार Sो पहले अवलोक+ विकया गया र्थीा उसका यह प्रभाव र्थीा विक अयोध्या विकसी भी महाकाव्य से सत्याविप +हीं है लेविक+ Sब लेखक +े इसकी पहचा+ कर ली ब पूव: में विकया गया अवलोक+ अप+े महत्व को खो दे ा है। Sहां क mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बक्कर द्वारा विकये गये अवलोक+ सिSसमें उन्हों+े अयोध्या की ुल+ा साक े से की, का प्रश्न है कोई भी अपवाद +हीं गविठ हो सक ा है। साक े और अयोध्या साविहत्य और इति हास में समा+र्थी- रूप में प्रयोग विकये गये हैं। सम्पूर्ण: सामा£ी पर विवचार कर+े क े पश्चा Sन्मस्र्थीा+ क े +क्शे क े संबं* में हंस बक्कर Sन्मस्र्थीा+ क्षेत्र को प्रमाणिर्ण कर े हैं। हंस बक्कर सिSस वि+ष्कष: पर पहुंचे हैं ऐसा कहा Sा सक ा है विक वह शंकाओं और अ+ुमा+ों पर आ*ारिर है।

69. एक अन्य पहलू Sो प्रश्नग कालावति* क े खिलए प्रसांविगक है उस पर विवचार विकया Sा सक ा है। र्डी. र्डब्ल्यू 2/1-1, रासिSन्दर सिंसह वाद संख्या -4 बचावपक्ष संख्या 2 क े खिलए गवाह क े ौर पर प्रस् ु हुआ Sो सिसख समुदाय की *ार्मिमक, सांस्क ृ ति क और ऐति हासिसक पुस् कों क े अध्यय+ कर+े में रूतिच रख ा है। उस+े मुख्य परीक्षा में सिसख समुदाय और इति हास की पुस् कों का संदभ: विदया। उस+े मुख्य परीक्षा में भी कहा विक गुुरु +ा+क देव Sी +े अयोध्या स्जिस्र्थी रामSन्मस्र्थीा+ मस्जिन्दर क े दश:+ की मांंग की र्थीी। सिSस समय गुरू +ा+क देव Sी अयोध्या गये और दश:+ विकये ऐसा कहा Sा ा है विक वह 1510-1511 ईस्वी का काल र्थीा। मुख्य परीक्षा क े प्रस् र 11 में वह कह ा हैः- "11. भाˆपद पूर्भिर्णमा 1564 विवक्रमी या+ी 1507 ईस्वी क े शुभ विद+ Sब गुरू +ा+क देव Sी को ईश्वर का साक्षात्कार हुआ ब उन्हों+े ीर्थी: यात्राओं पर Sा+े का वि+श्चय विकया। ब वे विदल्ली, हरिरद्वार, सुल् ा+पुर इत्याविद हो े हुए अयोध्या गये। इसी प्रकार 1567-1568 विवक्रमी या+ी 1510-1511 ईस्वी में गुरू+ा++क देव Sी रामSन्म भूविम देख+े ीर्थी: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यात्रा पर गये। यहां यह उल्लेख है विक उस समय क बाबर +े भार पर आक्रमर्ण +हीं विकया है।"

70. अप+े बया+ क े सार्थी उन्हों+े कई Sन्म साखी संलग्न की सिSसमें गुरू +ा+क देव Sी का अयोध्या दौरा और राम Sन्म भूविम का दश:+ मौSूद है। न्यायमूर्ति सु*ीर अ£वाल +े भी कई Sन्म साखी का संदभ: विदया है सिSसको सातिक्षयों द्वारा संदर्भिभ कर भरोसा S ाया गया। सातिक्षयों द्वारा संदर्भिभ कर भरोसा S ाये गये Sन्म साखी का विवस् ृ संदभ: का उल्लेख शपर्थीपत्र क े प्रस् र 5 में विकया गया है। मुख्य परीक्षा क े प्रस् र 5 में वह कह े हैः- "5. मै+े सिसख समुदाय और इति हास क े बारे में संपाविद और प्रकाणिश कई प्राची+ पुस् कों का अध्यय+ विकया र्थीा सिSसमें "आ*ी सखी (1758 विवक्रमी 1701 ईस्वी), गुरू +ा+क देव Sी की पुरा + Sन्म सखी (1791 विवक्रमी 1743 ईस्वी), भाई मा+ सिंसह की रच+ा ( Sीव+ काल 1701-1791 विवक्रमी 1644-1743 ईस्वी), पोर्थीी Sन्म साखीः ज्ञा+ रत्+ावली", भाई बलेवाली" (श्री गुरू +ा+क देव Sन्म सखी" (1940- विवक्रमी 1883 ईस्वी) सोढ़ी म+ोहरदास मेहरबा+ की रच+ा( Sीव+काल 1637-1697 विवक्रमी 1580-1610 ईस्वी) "सख°ड़ पोर्थीीः Sन्मसखी श्री गुरू +ा+क देव Sी, बाबू सुखबासी राम वेदी की रच+ा(गुरू +ा+क देव Sी क े छोर्टे पुत्र श्री लक्ष्मी चंˆ क े आठवें वंशS ) "गुरू +ा+क वंश प्रकाश (1986 विवक्रमी 1829 ईस्वी), ारा हरिर +रोत्तम की रच+ा ( Sीव+ काल 1879-1948 विवक्रमी 1822-1891 ईस्वी) "श्री गुरू ीरर्थी सं£ही " और ज्ञा+ सिंसह की प्रसिसद्ध रच+ा " वारिरख गुरू खैराः भाग-1 (1948 विवक्रमी 1891 ईस्वी) इत्याविद। इस पुस् क से प्राप्त सूच+ा से यह स्पष्ट है विक विववाविद स्र्थील श्रीरामचन्ˆ Sी की Sन्म भूविम है और श्री गुरू +ा+क देव Sी अयोध्या र्स्किस्र्थी राम Sन्म स्र्थीा+ का दश+ कर+ा चाह े र्थीे। इ+ पुस् कों से यह भी साविब हो ा है विक समय बी +े क े सार्थी गुरू ेगबहादुर सिंसह अप+े पुत्र गुरू गोहिंवद सिंसह क े सार्थी अयोध्या स्जिस्र्थी राम Sन्म भूविम मस्जिन्दर का दश:+ की इच्छा S ाये हैं।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

71. अणिभलेख पर मौSूद Sन्म सखी क े अंश में गुरू +ा+क देव Sी क े अयोध्या दौरे का विववरर्ण विमल ा है Sहां पर उन्हों+े भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ का दश:+ विकया र्थीा। अणिभलेख पर मौSूद Sन्म सखी क े अंश में राम Sन्म स्र्थीा+ क े वास् विवक स्र्थीा+ की पहचा+ कर+े क े खिलए कोई भी ऐसी सामा£ी +हीं है बस्जिल्क गुरू +ा+क का रामSन्म भूविम क े दश:+ कर+े का अयोध्या दौरा एक घर्ट+ा है, Sो उल्लेख कर ा है विक श्रद्धालु अयोध्या आ े र्थीे और 1528 ईस्वी से पहले भी Sन्म भूविम का दश:+ कर+े आ े र्थीे। 1510-11 ईस्वी में गुरू +ा+क का अयोध्या आ+ा और Sन्म भूविम का दश:+ कर+ा विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास का समर्थी:+ कर ा है।

72. अ ः यह *ारिर विकया Sा सक ा है विक भगवा+ राम क े Sन्मस्र्थीा+ क े संबं* में विहन्दुओं की आस्र्थीा एवं विवश्वास साविहत्य एवं पविवत्र पुस् कों से आ ा है सिSसमें बाल्मीविक रामायर्ण और स्क ं द पुरार्ण शाविमल है। यह आस्र्थीा और विवश्वास आ*ारही+ +हीं हो सक ा है। इस प्रकार यह प ा चल ा है विक 1528 ईस्वी से पहले की अवति* में पया:प्त मात्रा में *ार्मिमक पुस् क ें मौSूद र्थीी, सिSसक े कारर्ण विहन्दू व:मा+ राम Sन्मभूविम को भगवा+ राम की Sन्मस्र्थीली मा+ े र्थीे। 1528 ईस्वी से 31.10.1858 क े दौरा+ राम Sन्मस्र्थीा+ से संबंति* आस्र्थीा और विवश्वास

73. इस दौरा+ ुलसीदास +े संव ् 1631 (1574-75 ईस्वी) में रामचरिर मा+स की रच+ा की। रामचरिर मा+स +े श्रेष्ठ स्र्थीा+ प्राप्त विकया Sैसे mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विक विहन्दू बाल्मीविक रामायर्ण पढ़ े व सम्मा+ दे े हैं। रामचरिर मा+स +े विहन्दू आस्र्थीा क े महाकाव्य की प्रास्जिस्र्थीति को प्राप्त कर खिलया है। गोस्वामी ुलसी दास +े भगवा+ विवष्र्णु द्वारा बोले गये छन्दों बालका°ड़ की रच+ा की। Sब बह्मा +े भगवा+ विवष्र्णु से देव ा, ऋविषयों, और गन्*वÂ और राक्षस रावर्ण क े आ ंक से मुX करा+े की प्रार्थी:+ा की ो भगवा+ विवष्र्णु +े कहा विक मै कोशलापुरी में दशरर्थी और कौशल्या क े यहां मा+व अव ार में Sन्म लूंगा। 186 दोहा क े बाद बालका°ड़ में वि+म्+खिलखिख ी+ चौपाईयां भगवा+ विवष्र्णु +े कहीं ं हैः- Sवि+ र्डपरपहु मुवि+ सिसद्ध सुरेसा। ुम्हविह लाविग *रिरहउँ +र बेसा।। अंसन्ह सविह म+ुS अव ारा। लेहउँ विद+कर बंस उदारा।।१।। "हे मुवि+, सिसद्ध और इन्ˆ (देव ाओं क े राSा) आप म र्डरें, आप क े कल्यार्णार्थी: मैं मा+व रूप में अव ार लूंगा। गौरवमयी सूय:वंश में अप+े भागों सविह मा+व रूप में Sन्म लूंगा।" कस्यप अविदति महा प कीन्हा। ति न्ह कहुँ मैं पूब: बर दीन्हा।। े दसरर्थी कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगर्ट +रभूपा।। "ऋविष कश्यप और और उ+की पत्+ी अविदति +े घोर प्रयातिश्च विकया। उ+को मैं+े पहले ही वरदा+ दे विदया है। वे अयोध्या में दशरर्थी और कौशल्या क े रूप में मा+वीय शासक क े रूप में प्रकर्ट हो चुक ें हैं।" ति + क े गृह अव रिरहउँ Sाई। रघुक ु ल ति लक सो चारिरउ भाई।। +ारद बच+ सत्य सब करिरहुउँ। परम सविX समे अव रिरहउँ।। "मैं रघुक ु ल में चार भाईयों क े रूप में दशरर्थी और कौशल्या क े घर में Sन्म लूंगा। Sैसा विक +ारद +े कहा है मैं पूर्णा:व ार रूप में *र ी में प्रकर्ट होऊ ँ गा।"

74. उX चौपाईयां + क े वल भगवा+ विवष्र्णु क े अव*पुरी अर्थीा: अयोध्या में अव ार को ब ा ा है बस्जिल्क दोहा विवशेष ौर से यह ब ा ा है विक वह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कौशल्या और दशरर्थी क े यहां मा+वा ार लेगें। उX दोहा + क े वल भगवा+ का अयोध्या में Sन्म को ब ा ा है बस्जिल्क उस Sगह को भी ब ा ा है Sहां पर वह मा+वा ार लेगे, सिSसका वर्ण:+ स्पष्ट ौर पर शब्दों में 'र्टी+ का गृह' (दशरर्थी और कौशल्या का घर) +ाम से है।

75. विवरो*ी पक्षकारों +े इस काल से संबंति* अ+ेक प्रकार क े गSर्टों, यात्रावृत्तां ों का संदभ: देकर भरोसा S ाया है। विहन्दू पक्षकारों क े अ+ुसार उस काल क े गSर्ट और महत्वपूर्ण: पुस् क ें पया:प्त रूप से भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर विहन्दुओं क े आस्र्थीा और विवश्वास को साविब कर े हैं, सिSसकी उस दौरा+ विहन्दुओं द्वारा पूSा की गयी। दूसरी रफ राSीव *व+ +े क: विदया विक 1958 क े पहले गSेविर्टयर Sांच +हीं कर सक े हैं और विब्रविर्टस सरकार क े ह 1958 क े पहले ैयार विकया गया गSर्ट क ु छ मदद दे सक ा है। वह कर्थी+ कर े है विक ईस्र्ट इस्जि°ड़या कम्प+ी क े शास+ क े दौरा+ विकये गSर्ट पर + ो विवश्वास विकया Sा सक ा है और + ही उसे गSर्ट कहा Sा सक ा है। सभी यात्रावृत्तां ों से संबंति* विववरर्ण अलग-अलग पुस् कों में प्रकाणिश विकये गये, र्डॉ. *व+ कर्थी+ कर े हैं विक यावित्रयों द्वारा विदये गये उX विववरर्ण पर भरोसा +हीं विकया Sा सक ा है क्योंविक वे सभी सु+ी सु+ाई बा ें हैं और यह विववरर्ण क े वल कहावि+यों पर आ*ारिर हैं। सबसे पहले यह विवचार कर+ा Sरूरी है विक क्या गSेविर्टयर और यात्रावृत्तां पुस् कों को इस विवषय को विवचारिर कर+े क े खिलए न्यायालय द्वारा साक्ष्य मा+ा Sा सक ा है Sो इस वाद में इस न्यायालय क े समक्ष उत्पन्न हुये है सिSसक े चल े इसे आक्षेविप अपीलों में उठाया गया। साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 साक्ष्य संबं*ी विवति*यों को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समेविक, परिरभाविष एवं परिरभाविष कर ा है। साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 3 में परिरभाविष है। साक्ष्य की परिरभाषा अति*वि+यम संख्यांक 21 वष: 2000 द्वारा यर्थीासंशोति* रूप में परिरभाविष विकया गया है, Sो इस प्रकार हैः- "साक्ष्य".-"साक्ष्य" से अणिभप्रे एवं उसक े अन् ग: - (1) वे सभी कर्थी+ सिS+क े Sाँचा*ी+ न्यायालय सातिक्षयो द्वारा अप+े समक्ष विकये Sा+े की अ+ुज्ञा दे ा है, ऐसे कर्थी+ मौखिखक कर्थी+ कहे Sा े हैं; (2) सभी दस् ावेS सिSसमें इलेक्र्ट्रावि+क अणिभलेख शाविमल है सिSसको न्याायलय क े Sांच क े खिलए पेश विकया Sा ा है, ऐसे दस् ावेS दस् ावेSी साक्ष्य कहे Sा े हैं।"

76. साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 57 में वे थ्य प्रगणिर्ण है न्यायालय को सिS+की न्यातियक अवेक्षा कर+ी चाविहए। Sहां क *ारा 57 का प्रश्न है व:मा+ मामले में यह सुसंग Sो इस प्रकार हैः- "57. थ्य सिS+की न्यायालय द्वारा न्यातियक अवेक्षा की Sा+ी चाविहए.- न्यायालय वि+म्+खिलखिख थ्यों की न्यातियक अवेक्षा करेगा; (1) भार गर्णराज्य में प्रचखिल सभी विवति*यां; xxxxxxxxxxxx इऩ सभी मामले में, लोक इति हास साविहत्य और विवज्ञा+ अर्थीवा कला क े मामलों में भी यह अदाल समुतिच संदभ: पुस् कों दस् ावेSों की मदद ले सक ी है। यविद कोई व्यविX न्यायालय से विकसी थ्य की न्यातियक अवेक्षा विकये Sा+े की मांग कर ा है ो न्यायालय ऐसा कर+े से म+ा कर सक ी है Sब क ऐसा व्यविX ऐसी कोई पुस् क अर्थीवा ऐसा कोई दस् ावेS +हीं प्रस् ु कर ा है Sैसा विक न्यायालय ऐसा कर+े क े खिलए आवश्यक समझें।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

77. थ्य की परिरभाषा सिSस पर न्याायलय न्यातियक अवेक्षा करेगा वह पूर्ण: परिरभाषा +हीं है। कर्थी+ "लोक इति हास, साविहत्य, विवज्ञा+ अर्थीवा कला क े सभी मामलों पर" न्यायालय को गSेविर्टयरों, यात्रावृत्तां ों और पुस् कों पर विवचार विकये Sा+े क े खिलए समर्थी: ब+ा+े क े खिलए पया:प्त हैं। उX प्राव*ा+ आरोविहका क े सार्थी है विक यविद कोई व्यविX न्यायालय से विकसी थ्य की न्यातियक अवेक्षा विकये Sा+े की मांग कर ा है ो न्यायालय ऐसा कर+े से म+ा कर सक ी है Sब क ऐसा व्यविX ऐसी कोई पुस् क अर्थीवा ऐसा कोई दस् ावेS +हीं प्रस् ु कर ा है। दो+ों पक्षकारों +े इस न्यायालय क े कई वि+र्ण:यों का उल्लेख विकया है Sहां पर न्याायलय क े पास साक्ष्य क े ौर पर प्रस् ु गSेविर्टयर और अन्य पुस् कों की £ाह्य ा और गSेविर्टयरों, यात्रावृत्तां ों और पुस् कों में विकये गये कर्थी+ों क े महत्व पर विवचार विकये Sा+े का अवसर र्थीा। सुखदेव सिंसह ब+ाम विगदौर क े महाराSा बहादुर ए.आई.आर. 1951 एस.सी. 288 क े मामलें में इ+ न्यायालय +े अणिभवि+र्ण- विकया विक गSेविर्टयर एक शासकीय दस् ावेS हो ा है सिSसका कु छ महत्व हो ा है क्योंविक क ु शल अति*कारिरयों द्वारा बड़ी ही साव*ा+ी से ैयार विकया Sा ा है। प्रस् र 10 में वि+म्+खिलखिख अवलोक+ विकया गयाः- "10. xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx सिSला गSेविर्टयर में विकया गया कर्थी+ Sरूरी +हीं विक वह सम्पोषक हो, लेविक+ गSेविर्टयर एक शासकीय दस् ावेS हो ा सिSसका क ु छ महत्व हो ा है, क्योंविक इसको शासकीय कम:चारिरयों द्वारा शासकीय दस् ावेSों को प्राप्त कर बड़ी साव*ा+ी से ैयार विकया Sा ा है। क्योंविक मुख्य न्यायमूर्ति र्डाउस+ विमलर +े फ ू लब ी मामला, ए.आई.आर. 1923 पर्ट+ा 423 का उल्लेख विकया, Sहां पर उपरोX उसिल्लखिख बाद वाले भाग में क ु छ अशुतिद्धयां हैं लेक+ Sहां क पहले वाले भाग का प्रश्न है ऐसा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्र ी हो ा है यह उ+ दस् ावेSों से सिS+का संदभ: विदया गया है समुतिच समर्थी:+ प्राप्त कर ा है।"

78. गोपाल क े कर ब+ाम मोहम्मद Sफर मोहम्मद हुसै+ ए.आई.आर. 1954 एस.सी. 5 क े मामले में इस अदाल +े बाम्बे गSेविर्टयर का संदभ: देकर भरोसा S ाया है। प्रस् र 4 में अदाल 18 वीं श ाब्दी में ब+े गुम्बद की प्रक ृ ति की Sांच कर रहा र्थीा। प्रस् र 4 में अदाल +े कहाः- “4. उस पविवत्र स्र्थील का एक उत्क ृ ष्ट और क ु छ मामलों में पौराणिर्णक इति हास है। इसकी उत्पखित्त इसकी प्राची+ ा में खो गयी लेविक+ बॉम्बे प्रेसीर्डेंसी क े गSेविर्टयर हमें ब ा े हैं विक यह मकबरा एक मुस्जिस्लम सं का है Sो ेरहवीं श ाब्दी में एक अरब विमश+री क े रूप में भार आया र्थीा। वष: 1780 में उ+की प्रसिसतिद्ध ब भी अप+े चरम पर र्थीी Sब अं£ेSों +े उसकी उपस्जिस्र्थीति कल्यार्ण क े पास ब+ा दी र्थीी, Sहां मकबरा स्जिस्र्थी है। Sैसा विक वे क े वल दो वष: क रहे और वष: 1782 में उ+का Sा+ा मृ सं की शविX को ब ाया गया र्थीा।”

79. महन् श्री श्रीवि+वास रामा+ुS दास ब+ाम सूरS+ारायर्ण दास ब+ाम अन्य एआईआर 1967 एससी 256 में इस न्यायालय की संवै*ावि+क पीठ +े 1908 की ओ'मैले की पुरी गSेविर्टयर पर विवचार विकया र्थीा। गSेविर्टयर में ईमार मठ का इति हास ब ाया गया र्थीा। अपीलक ा: द्वारा न्यायालय क े समक्ष यह क: विदया गया विक गSेविर्टयर को एक साक्ष्य क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है। न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक साव:Sवि+क इति हास क े मामलों में गSेविर्टयर पर विवचार +हीं विकया Sा सक ा है। प्रस् र 26 में वि+म्+खिलखिख प्रति पाविद विकया गयाः- “26. अपीलक ा: की ओर से यह कहा गया है विक गSेविर्टयर में Sो क ु छ कहा गया है, उसे साक्ष्य क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है। गSेविर्टयर में विदए गए इ+ कर्थी+ों पर साक्ष्य क े रूप में अवलम्ब +हीं mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खिलया Sा ा है बस्जिल्क ऐति हासिसक साम£ी और मठ र्थीा इसक े प्रमुख द्वारा अ+ुसरर्णीय प्रर्थीा क े बारे में ब ा ी है। साव:Sवि+क इति हास क े मामलों में गSेविर्टयर पर विवचार +हीं विकया Sा सक ा है।"

80. बाला शंकर महा शंकर भट्टSी और अन्य ब+ाम चैरिरर्टी कविमश्नर, गुSरा राज्य, 1995 सप्प. (1) एससीसी 485 में इस न्यायालय +े 1879 में प्रकाणिश गSेविर्टयर ऑफ बॉम्बे प्रेसिसर्डेन्सी, ख°ड़ III पर विवचार विकया र्थीा। इस न्यायालय +े अव*ारिर विकया विक साक्ष्य अति*वि+यम, 1872 की *ारा 35 सपविठ *ारा 81 क े अन् ग: गSर्ट स्वीकाय: है। यह अव*ारिर विकया गया विक न्यायालय अन्य साक्ष्यों क े संयोS+ में वाद£स् प्रश्न को अति*वि+र्ण- कर+े में विवचार में ले सक ी है हालांविक इसे वि+श्चायक साक्ष्य क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है। पहाड़ी की चोर्टी पर स्जिस्र्थी काखिलका मा ाSी क े मंविदर क े स्र्थीा+ क े संबं* में गSर्ट में विववरर्णों का अवलम्ब खिलया गया। प्रस् र 22 में, वि+म्+खिलखिख प्रति पाविद विकया गयाः- “22................यह देखा गया है विक 1879 में प्रकाणिश गSर्ट ऑफ बॉम्बे प्रेसिसर्डेन्सी ख°ड़ III, साक्ष्य अति*वि+यम 1872 की *ारा 35 सपविठ *ारा 81 क े ह स्वीकाय: है। गSर्ट साव:Sवि+क मामलों क े आति*कारिरक अणिभलेख हो+े से स्वीकाय: है और न्यायालय उसकी अन् व:स् ु क े असली हो+े की उप*ारर्णा कर सक े हैं। इसमें वि+विह कर्थी+ को इसमें वि+विह ऐति हासिसक साम£ी का प ा लगा+े क े खिलए विवचार में खिलया Sा सक ा है और इसमें वि+विह थ्य *ारा 45 क े अ*ी+ साक्ष्य हैं और न्यायालय अन्य साक्ष्य और परिरस्जिस्र्थीति क े संयोS+ में वाद£स् प्रश्न को अति*वि+र्ण- कर+े में विवचार में ले सक ी है, यद्यविप इसे वि+श्चायक साक्ष्य क े रूप में +हीं मा+ा Sा सक ा है। गSर्ट में विदए गए विववरर्ण यह स्र्थीाविप कर े हैं विक काखिलका मा ाSी पहाड़ी की चोर्टी पर है, महाकाली मस्जिन्दर और बचरा मा ाSी काखिलका मा ाSी क े दाविह+े और बाये है। मुगल शास+ क े दौरा+ अन्य सैयद सादर पीर भी वहाँ स्र्थीाविप की गयी, लेविक+ काखिलका मा ाSी मुख्य मस्जिन्दर र्थीा। होखिलS और विबल्स मुख्य उपासक हैं। चैत्र (अप्रैल) की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पूर्भिर्णमा पर और दशहरा (अक्र्टूबर क े माह में) पर सभी वगÂ क े विहन्दू बड़ी संख्या में वहाँ एकवित्र हो े हैं और काखिलका मा ाSी, महाकाली आविद की पूSा कर े हैं.........।"

81. उपरोX परिरचचा: क े मद्दे+Sर, उपरोX उसिल्लखिख विवति* से स्पष्ट रूप से स्र्थीाविप हो ा है विक साक्ष्य अति*वि+यम 1872 क े ह न्यायालय गSेविर्टयरों को विवचार में ले सक ी है, यद्यविप गSेविर्टयरों में विदए गए कर्थी+ को वि+श्चायक साक्ष्य क े रूप में +हीं मा+ा Sाएगा लेविक+ उस कर्थी+ क े सही हो+े की उपा*ारर्णा इससे Sुड़ी हो ी है। *ारा 57 क े दृविष्टग विक ाबों और यात्रा वृत्तां ों की स्वीकाय: ा को अस्वीकार +हीं विकया Sा सक ा है। साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 81, शासकीय गSर्ट या आति*कारिरक गSर्ट हो+े की आशतिय प्रत्येक दस् ावेS क े सही हो+े की उपा*ारर्णा पर विवचार कर ी है। साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 81 वि+म्+ा+ुसार हैः- “81. गSर्ट, समाचारपत्रों, संसद क े वि+Sी अति*वि+यमों और अन्य दस् ावेSों क े बारे में उप*ारर्णाएं - न्यायालय हर ऐसी दस् ावेS का असली हो+ा उप*ारिर करेगा सिSसका लन्द+ गSर्ट, या कोई अति*कारिरक गSर्ट या विकसी उपवि+वेश का शासकीय गSर्ट, विब्रविर्टश क्राउ+ क े कब्Sा*ी+ क्षेत्र हो+ा या कोई समाचार या S+:ल हो+ा, या यू+ाइर्टेर्ड हिंकगर्डम की संसद क े वि+Sी अति*वि+यम की क्वीन्स विप्रन्र्टर द्वारा मुविˆ प्रति हो+ा, ात्पर्तिय है र्थीा हर ऐसी दस् ावेS का, सिSसका ऐसी दस् ावेS हो+ा ात्पर्तिय है सिSसका विकसी व्यविX द्वारा रखा Sा+ा विकसी विवति* द्वारा वि+र्मिदष्ट है, यविद ऐसी दस् ावेS सार ः उस प्ररूप में रखी गई ं हो, Sो विवति* द्वारा अपेतिक्ष है, और उतिच अणिभरक्षा में से पेश की गई हो, असली हो+ा उप*ारिर करेगा।"

82. अब र्डॉ *व+ का यह अगला क: बच ा है विक 1858 से पहले क े गSेविर्टयर, Sब ईस्र्ट इस्जि°ड़या क ं प+ी क े शास+ क े दौरा+ क्षेत्र की संप्रभु ा विब्रविर्टश क े सी*े वि+यंत्रर्ण में +हीं र्थीी, पर अवलम्ब+ +हीं खिलया Sा सक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व:मा+ मामले में, सिS+ गSेविर्टयरों पर अवलम्ब+ खिलया गया है, वे उन्नसवीं श ाब्दी क े हैं। 31.12.1600 को क्वी+ एखिलSावेर्थी से प्राप्त चार्ट:र द्वारा ईस्वीं इस्जि°ड़या क ं प+ी को पूव- देशों से व्यापार कर+े की अ+ुमति विमली। प्रारंभ में 1619 में क ं प+ी +े सूर (गुSरा राज्य) में एक फ ै क्र्ट्री का वि+मा:र्ण विकया। ईस्र्ट इस्जि°ड़या क ं प+ी की अति*कारिर ा और शविX को क्वी+ द्वारा Sारी विवणिभन्न चार्ट:रों द्वारा और बाद में विब्रविर्टश संसद द्वारा ब+ाये गये अति*वि+यमों द्वारा बढ़ाया गया। 1805 क, अव* क्षेत्र में क ु छ कायÂ को भी ईस्र्ट इस्जि°ड़या क ं प+ी को सौंपा गया सिSसमें अव* क्षेत्र में सदर न्यायालय की स्र्थीाप+ा कर+ा भी शाविमल है। उन्नसवीं श ाब्दी क े शुरूआ क ईस्र्ट इस्जि°ड़या क ं प+ी + क े वल एक व्यापारिरक क ं प+ी र्थीी बस्जिल्क वै*ावि+क और शासकीय सत्ता र्थीी सिSसे 1801 में अव* क े +वाब क े समझौ े क े सार्थी विब्रविर्टश संसद क े चार्ट:रों और अति*वि+यमों द्वारा सौंपा गया र्थीा। विकसी भी मामले में, उन्नसवीं श ाब्दी में ईस्र्ट इस्जि°ड़या क ं प+ी क े शास+ क े दौरा+ ैयार विकए गए गSेविर्टयर में लोक इति हास क े अणिभलेख शाविमल हैं और वे स्पष्ट ः साक्ष्य अति*वि+यम की *ारा 57 क े ह £ाह्य हैं। इसखिलए र्डॉ *व+ क े इस क: में विक 1858 क े पहले क े गSेविर्टयरों को देखा +हीं Sा+ा चाविहए, कोई सार +हीं है।

83. प्रासंविगक अवति* क े दौरा+, प्रर्थीम महत्वपूर्ण: ऐति हासिसक विक ाब सिSसमें अकबर क े शास+काल में प्रशास+ का विवस् ृ विववरर्ण है, आइ+-ए-अकबरी है Sो सोलहवीं श ाब्दी में पूरी हुई। आइ+ -ए-अकबरी अबुल-फज़ल अलामी की क ृ ति है, Sो अकबर क े दरबार में एक मंत्री र्थीे। आइ+-ए- अकबरी का एच. ब्लूचमै+ द्वारा फारसी से विहन्दी में अ+ुवाद विकया गया। क+:ल एच. एस. Sेरेर्ट +े ख°ड़ संख्या II का अ+ुवाद विकया। क+:ल एच. एस. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA Sेरैर्ट द्वारा अ£ेंSी में अ+ुवाविद ख°ड़ II को प्रसिसद्ध इति हासकार श्री Sदु+ार्थी सरकार +े संशोति* विकया और आगे विर्टप्पणिर्णयाँ Sोड़ी। श्री Sदु+ार्थी सरकार +े अप+े सम्पादक की प्रस् ाव+ा में संप्रेतिक्ष विकया है विक दूसरा ख°ड़ अकबर क े अ*ी+ मुगल साम्राज्य क े गSेविर्टयर क े रूप में प्रयुX हुआ। Sदु+ार्थी सरकार कह े हैं विक आइ+-ए-अकबरी का ीसरा ख°ड़ विहन्दूओं क े *म:, दश:+ और शास्त्रों का विवश्वकोष र्थीा। श्री Sदु+ार्थी सरकार द्वारा उपरोX को वि+म्+खिलखिख शब्दों में कहा गयाः- "आइ+-ए-अकबरी का ीसरा ख°ड़ विहन्दूओं क े *म:, दश:+ और शास्त्रों का एक विवश्वकोष है सिSसमें उसी विवषय पर विहन्दू विवचारों से ुल+ा क े खिलए, साविहस्जित्यक पंरपरा में Sैसी अपेक्षा हो ी है, इसक े पहले मुस्जिस्लमों का काला+ुक्रम और विवश्व दृविष्ट दी गयी है। दूसरा ख°ड़ अकबर क े अ*ी+ मुगल साम्राज्य क े गSेविर्टयर क े रूप में प्रयुX हुआ। इसकी महत्ता इसक े सूक्ष्म भूस्र्थीावि+क विववरर्णों और असंख्य छोर्टे स्र्थीा+ों की सांस्जिख्यकी और साम्राज्य क े विवत्त, व्यापार, उद्योग, Sाति यों और S+Sाति यों क े सव†क्षर्ण में है।"

84. आइ+-ए-अकबरी क े दूसरे ख°ड़ में "अव* की सुबह" क े संबं* में विववरर्ण विदए गए हैं, अव* (अयोध्या) का एक विववरर्ण र्थीा विक अव* (अयोध्या) भार क े बड़े शहरों में से एक है। विववरर्ण अव* को रामचन्ˆ क े वि+वास स्र्थीा+ क े रूप में संदर्भिभ कर ा है, ख°ड़ 2 क े पृष्ठ 182 पर वि+म्+खिलखिख विववरर्ण विदया गया हैः- "अव* (अयोध्या) भार क े सबसे बड़े शहरों में से एक है। यह 118o 6’ अक्षांश र्थीा 27o 22’ देशां र पर स्जिस्र्थी है। प्राची+ समय में इस प्रसिसद्ध स्र्थील का विवस् ार लंबाई में 148 कोस और चौड़ाई में 36 कोस र्थीा और यह पविवत्र म प्राची+ स्र्थीलों में से एक है। शहर की परिरति* में वे विमट्टी खोद े हैं और सो+ा प्राप्त हो ा है। यह रामचन्ˆ का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि+वास स्र्थीा+ र्थीा Sो त्रे ा युग में अप+े स्वयं क े व्यविXत्व में आध्यास्जित्मक सव च्च ा र्थीा राSसी पद दो+ो से संयुX र्थीे।"

85. आगे ख°ड़ III, अध्याय VI में एक शीष:क "अट्ठारह शास्त्र" है। यह विववरर्ण वेद र्थीा 18 पुरार्ण और अन्य *ार्मिमक £न्र्थीों को संदर्भिभ कर ा हैं। विक ाब में वि+म्+खिलखिख शब्दों में देव ा क े अव ारों का संदभ: भी हैः- “अव ार या देव ा क े अव ार वे विवश्वास कर े हैं विक परमेश्वर अप+ी स्वेच्छा से सृविष्ट की भलाई क े खिलए एक विवशेष चरिरत्र का आविद रूप £हर्ण कर े हैं और कई प्रबुद्ध विहन्दू इस सिसद्धां को स्वीकार कर े है। ऐसा एक संपूर्ण: अव ार पूर्णा:व ार कहला ा है और वह सिसद्धां सिSसमें कु छ सृसिS रूप दैवीय लक्षर्ण से परिरपूर्ण: हो ी हैं और उन्हें असा*ारर्ण शविXयाँ प्रदा+ की Sा ी है, अंशाव ार कहला ी है। इस पश्चा कणिर्थी पर यहाँ विवचार +हीं विकया Sायेगा। पहले प्रकार क े बारे में वे कह े हैं विक संपूर्ण: चार युगों में, दस अव ार होगें और व:मा+ समय क +ौं हो चुक े हैं।"

86. परमेश्वर (भगवा+ विवष्र्णु) क े 9 अव ारों का विववरर्ण विक ाब में है, राम अव ार को भी वि+म्+खिलखिख शब्दों में ब ाया गया हैः- “रामाव ार या राम-अव ार वे कह े हैं विक राक्षसों में से एक रावर्ण, ब्रह्मा की दूसरी पीढ़ी का वंशS र्थीा, उसक े दस सिसर और बीस हार्थी र्थीे। उस+े क ै लास पव: में दस हSार वषÂ क पस्या की और ी+ों लोकों की सम्प्रभु ा प्राप्त कर+े की आशा में इस देह द°ड़ में एक क े बाद एक अप+े सिसरों को अर्मिप विकया। देव ा उ+क े साम+े प्रकर्ट हुए और उसकी प्रार्थी:+ा को स्वीकार विकया। उसक े शास+ से देव ागर्ण त्रस् हुए और पूव: क े उदाहरर्णों की रह, उसे गद्दी से उ ार+े की प्रार्थी:+ा की गयी Sो प्रदा+ की गयी और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसका अन् कर+े क े खिलए राम को चु+ा गया र्थीा। द्+ुसार उ+का Sन्म अयोध्या में राSा दशरर्थी की पत्+ी कौशल्या से त्रै ा युग में चैत्र मास (माच:-अप्रैल) क े शुक्ल पक्ष की +वमी ति णिर्थी को हुआ। बुतिद्धमत्ता क े पहले दौर में, उन्हों+े बहु क ु छ सीखा और सभी सांसारिरक कायÂ को छोड़ े हुए, व+ों से होकर यात्रा कर+ा शुरू विकया और पविवत्र स्र्थीलों में Sाकर अप+े Sीव+ को एक +या सौंदय: विदया। वह इस *रा क े स्वामी ब+ गए और रावर्ण को मार विदया। उन्हों+े ग्यारह हSार वषÂ क शास+ विकया और प्रशास+ की न्यायपूर्ण: विवति*यों का सृS+ विकया।” (हमारे द्वारा प्रकीर्ण- )

87. आई+-ए-अकबरी सम्रार्ट अकबर क े काल में विहन्दूओं द्वारा *ारिर आस्र्थीा और मान्य ाओं का प्रमार्ण है। अयोध्या को रामचन्ˆ क े वि+वास स्र्थीा+ क े रूप में उसिल्लखिख विकया गया, सिSसे आगे विवष्र्णु का अव ार ब ाया गया। विवणिशष्ट कर्थी+ विकए गए हैं विक त्रै ा युग क े दौरा+ अयोध्या में चैत्र मास क े शुक्ल पक्ष की +वमी ति णिर्थी को राSा दशरर्थी की पत्+ी कौशला से भगवा+ राम का Sन्म हुआ। आई+-ए-अकबरी सुस्पष्ट रूप से अयोध्या को प्राची+ पविवत्र म स्र्थीलों में एक क े रूप में संदर्भिभ कर ी है। आई+ -ए-अकबरी में उपरोX कर्थी+ से स्पष्ट ः दर्भिश हो ा है विक विहन्दूओं की आस्र्थीा और विवश्वास यह र्थीी विक अयोध्या एक पविवत्र म स्र्थील और विवष्र्णु क े अव ार भगवा+ राम का Sन्मस्र्थील है, यह विवश्वास अकबर क े काल से पहले क ब+ा रहा और आS भी ब+ा हुआ है।

88. विवखिलयम हिंफच +े 1607 से 1611 ईस्वी. क भार का दौरा विकया, उसक े यात्रा विववरर्ण को विवखिलयम फोस्र्टर द्वारा अप+ी विक ाब "अल- र्टैवल्स इ+ इस्जि°ड़या" में प्रकाणिश विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

89. विवखिलयम हिंफच +े रामचन्ˆ क े विकले र्थीा भव+ों क े ध्वंसावशेष क े बारे में उल्लेख विकया। यात्रा विववरर्ण में भार ीयों क े इस विवश्वास का भी उल्लेख विकया गया विक रामचन्ˆ का Sन्म हुआ और उन्हो+े शरीर *ारर्ण विकया।

90. फादर Sोसेफ विर्टफ ें र्थीेलर +े 1766-1771 ई. क े बीच भार का दौरा विकया। उन्हों+े लैविर्ट+ में भार की ऐति हासिसक और भौगोखिलक वर्ण:+ खिलखा। सभी लैविर्ट+ काय: का अ+ुवाद फ्र ें च में विकया गया र्थीा। काय: का अं£ेSी अ+ुवाद उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रदश: 133 (वाद-5) क े रूप में दायर विकया गया र्थीा और बड़े पैमा+े पर अवलम्ब खिलया गया है। अव* प्रां क े विववरर्ण में यह कहा गया है:- “लेविक+ एक Sगह विवशेष रूप से प्रसिसद्ध है सिSसे सी ा रसोई कहा Sा ा है अर्थीा: राम की पत्+ी सी ा की मेS, Sो शहर क े दतिक्षर्ण में स्जिस्र्थी है, और एक विमट्टी क े र्टीले पर स्जिस्र्थी है। सम्रार्ट औरंगSेब +े रामकोर्ट +ामक विकले को ध्वस् करवा विदया और उसी स्र्थीा+ पर ी+ गुंबदाकार मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण करा विदया। अन्य का कह+ा है विक इसका वि+मा:र्ण 'बाबर' द्वारा विकया गया र्थीा। 5 स्पै+ क े चौदह काले पत्र्थीर क े खंभे, Sो विकले क े स्र्थील पर मौSूद र्थीे, वहां देखे Sा े हैं। इ+ स् ंभों में से बारह स् ंभ अब मस्जिस्Sद क े आं रिरक मेहराबों पर आ*ारिर हैं। 12 में से दो को मठ क े प्रवेश द्वार पर अवलस्जिम्ब है। दो अन्य क ु छ 'मूर' क े मकबरे का विहस्सा हैं। यह वर्ण:+ विकया गया है विक इ+ स् ंभों को या बस्जिल्क इ+की ई ं र्टों को अत्यति*क क ु शल ा से ब+ाया गया र्थीा Sो लैंस या सेलेंतिर्डप (यूरोविपयों द्वारा सील+ कहा गया है) क े द्वीपों से वा+र राS ह+ुमा+ द्वारा लाया गया र्थीा। बाई ंओर Sमी+ से 5 इंच ऊपर एक चौकोर बॉक्स देखा गया है, सिSसमें चू+े से ब+ा हुआ बॉर्ड:र है, सिSसकी लंबाई 5 एल से अति*क और लगभग 4 एल की अति*क म चौड़ाई हो ी है। हिंहदुओं द्वारा इसे बेदी या+ी 'पाल+ा' कहा Sा ा है। इसका कारर्ण यह है विक विकसी समय पर यहां एक मका+ र्थीा Sहां राम क े रूप में बेस्च+ ? का Sन्म हुआ र्थीा। कहा Sा ा है विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उ+क े ी+ भाईयों का भी Sन्म यहीं हुआ र्थीा। अन्य लोगों क े अ+ुसार, बाद में औरंगSेब या बाबर +े श्रेष्ठ लोगों को, उ+क े अं*विवश्वासों क े काय: कर+े क े अवसर से वंतिच कर विदया। हालांविक, अभी भी क ु छ स्र्थीा+ों पर या दूसरों में क ु छ अं* विवश्वास है। उदाहरर्ण क े खिलए, सिSस स्र्थीा+ पर राम का पै ृक वि+वास र्थीा, वे लगभग 3 बार घूम े हैं और फश: पर बैठ Sा े हैं। दो *ब्बे एक कम दीवार से तिघरे हैं, Sो विक चहारदीवारी क े सार्थी वि+र्मिम है। एक कम अ*:-वृत्ताकार द्वार क े माध्यम से साम+े वाले हॉल में प्रवेश कर ा है।"

91. विववरर्ण में वि+विह ी+ महत्वपूर्ण: कर्थी+ों पर ध्या+ दे+े की आवश्यक ा है:- सबसे पहले, सम्रार्ट औरंगSेब +े रामकोर्ट +ामक विकले को ध्वस् कर विदया और एक मस्जिस्Sद उसी स्र्थीा+ पर ब+वाया सिSसमें ी+ गुंबद र्थीे। यह आगे कहा गया है विक 5 स्पै+ ऊ ँ चे चौदह काले पत्र्थीर क े स् ंभ, Sो विक विकले क े स्र्थील पर मौSूद र्थीे, वहां देखे Sा े हैं। इ+ स् ंभों में से अब बारह स् ंभ मस्जिस्Sद क े आं रिरक मेहराबों पर आ*ारिर हैं। इ+ 12 स् ंभों में से दो को मठ क े प्रवेश द्वार पर अवलंविब विकया गया है। दूसरा, बाई ं रफ Sमी+ से 5 इंच ऊपर एक वगा:कार बॉक्स देखा Sा ा है, सिSसमें चू+े से ब+ा हुआ बॉर्ड:र है, सिSसकी लंबाई 5 एल्स से अति*क और लगभग 4 एल्स की अति*क म चौड़ाई है, सिSसे हिंहदुओं द्वारा बेदी (अर्थीा: "पाल+ा") कहा Sा ा है। आस्र्थीा और विवश्वास का कारर्ण यह भी र्थीा विक वहाँ एक मका+ भी र्थीा Sहां राम क े रूप में बेस्च+ (विवष्र्णु) का Sन्म हुआ र्थीा। ीसरा, औरंगSेब या बाबर को यह स्र्थीा+ विमला विक वे श्रेष्ठ लोगों को, उ+क े अं*विवश्वासों क े काय: कर+े क े अवसर से वंतिच कर दें। हालांविक, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हालांविक, अभी भी क ु छ स्र्थीा+ों पर या दूसरों में क ु छ अं* विवश्वास है। चूँविक सिSस स्र्थीा+ पर राम का पै ृक वि+वास र्थीा, वहाँ हिंहदू लगभग 3 बार Sा े हैं और फश: पर बैठ े हैं।

92. प्रर्थीम गSेविर्टयर का विवमोच+ 1828 में प्रकाणिश वाल्र्टर हैविमल्र्ट+ क े ईस्र्ट इंतिर्डया गSेविर्टयर से हुआ। गSेविर्टयर में हिंहदुस् ा+ क े साम्राज्यों, राज्यों, रिरयास ों, प्रां ों, शहरों, कस्बों, सिSलों, विकले, बंदरगाह, +विदयों और झीलों का विवशेष वर्ण:+ र्थीा।

93. गSेविर्टयर +े राम, सी ा, लक्ष्मर्ण और ह+ुमा+ को समर्मिप मंविदरों का उल्लेख विकया है। गSेविर्टयर +े आगे ध्या+ विदया विक अव* की ीर्थी:यात्रा मुख्य रूप से राम ा संप्रदाय क े हैं, Sो मंविदरों और मूर्ति यों क े चक्कर लगा े हैं, पविवत्र क ुं र्डों में स्+ा+ कर े हैं और प्रर्थीाग समारोह कर े हैं।

94. अगले राSपत्र में इति हास, प्राची+ वस् ुएँ, पूव- भार (1838) की स्र्थीलाक ृ ति और सांस्जिख्यकी पर अवलम्ब खिलया गया है। गोरखपुर क े इति हास और स्र्थीलाक ृ ति का उल्लेख कर े हुए, मॉन्र्टगोमरी मार्मिर्ट+ +े अयोध्या और इसकी मविहमा क े बारे में उल्लेख विकया।

95. एक गSेविर्टयर एर्डवर्ड: र्थीॉ+:र्ट+ "भार क े गSेविर्टयर" (1854) द्वारा प्रकाणिश विकया गया र्थीा। 1858 में एर्डवर्ड: र्थीॉ+:र्ट+ +े "भार ीय महाद्वीप पर देशी राज्यों की ईस्र्ट इंर्डीS क ं प+ी की सरकार क े ह क्षेत्रों का गSेविर्टयर" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA +ाम से एक और गSेविर्टयर प्रकाणिश विकया, सिSसमें अव* का काफी बड़ा वर्ण:+ वि+विह है।

96. एक और पुस् क का संदभ: Sो एक प्रदश: क े रूप में दायर विकया गया र्थीा, उसको एक संदभ: की आवश्यक ा है। हदीस-ए-सेबा की विक ाब विमSा: Sा+ +े वष: 1856 में खिलखी र्थीी। विक ाब में इस बा का उल्लेख विकया गया र्थीा विक भगवा+ राम की Sन्मस्र्थीली क े रूप में पूSा स्र्थील Sो 'सी ा-की- रसोई' से सर्टा हुआ र्थीा सिSसे विहSरी वष: 923 में बाबर द्वारा मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। पुस् क की अ+ुवाविद प्रति प्रदश: 17 क े रूप में है। पुस् क से वि+म्+खिलखिख वि+ष्कष: पर ध्या+ विदया Sा+ा प्रासंविगक है: - “उपयु:X स्र्थील भगवा+ राम क े विप ा की गद्दी कही Sा ी है। यहां स्जिस्र्थी मूर्ति पूSा क े स्र्थीा+ों को ध्वस् कर विदया गया र्थीा और यहां क विक हिंहदू *म: क े विकसी भी मूर्ति क े एक भी र्टुकड़े को वहां पर +हीं विगराया गया र्थीा। सिSस Sगह पर हिंहदुओं का बड़ा मंविदर र्थीा वहां बड़ी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा और सिSस Sगह पर हिंहदुओं का छोर्टा मंविदर र्थीा, वहां छोर्टी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। उपास+ा स्र्थील को भगवा+ राम की Sन्मस्र्थीली कहा Sा ा है और Sो स्र्थीा+ इसक े वि+कर्ट है, उसे "सी ा की रसोई" कहा Sा ा है और सी ा को भगवा+ राम की पत्+ी कहा Sा ा है। उस स्र्थीा+ पर बाबर शाह +े विहSरी वष: 923 में सय्यद मूसा आणिशकां की देखरेख में एक बहु बड़ी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण करवाया और इसका इति हास आS भी कायम है। आS उपयु:X "सी ा की रसोई" को मस्जिस्Sद कहा Sा ा है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

97. पुस् क प्रासंविगक है क्योंविक यह 1856 में खिलखी गई र्थीी Sो अयोध्या में मूर्ति पूSा क े मुद्दे क े संबं* में हिंहदुओं और मुस्जिस्लमों क े बीच असं ोष की अवति* र्थीी। पुस् क स्पष्ट रूप से स्वीकार कर ी है विक भगवा+ राम क े Sन्मस्र्थीा+ पर, बाबर द्वारा मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। 1858 से 1949 की अवति* क े दौरा+ भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े संबं* में हिंहदुओं की आस्र्थीा और विवश्वास।

98. इस अवति* क े दौरा+, कई गSेविर्टयर, एएसआई की रिरपोर्ट:, विक ाबें और अन्य दस् ावेSी साक्ष्य हैं, Sो वाद में प्रदश: विकए गए हैं। दस् ावेSी साक्ष्यों क े अलावा, कई मौखिखक साक्ष्यों का +े ृत्व पक्षकारों द्वारा विकया गया है।

99. सबसे पहले, सरकार द्वारा सम्बस्जिन्* अवति* क े दौरा+ प्रकाणिश गSेविर्टयर में +ोविर्टस हो सक ा है। सभी गSर्ट, Sो प्रासंविगक अवति* क े दौरा+ प्रकाणिश विकए गए र्थीे, पूर्ण: सरकारी अति*कार क े ह र्थीे क्योंविक विब्रविर्टश सरकार +े भार सरकार क े अति*वि+यम, 1858 द्वारा अव* क े क्षेत्र पर 01.11.1958 से प्रत्यक्ष वि+यंत्रर्ण कर खिलया र्थीा।

100. इस समय +ोविर्टस को एक और प्रासंविगक पहलू क े रूप में खिलया Sा सक ा है, Sो यह है विक विब्रविर्टश सरकार क े आति*कारिरक क्षेत्र में 01.11.1858 क े बाद से, विब्रविर्टश सरकार क े अति*कारिरयों द्वारा Sारी विकए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गए शासकीय रिरपोर्ट:, पत्रों, और आदेशों में “मस्जिस्Sद” हमेशा "Sन्म स्र्थीा+ मस्जिस्Sद" क े रूप में संदर्भिभ विकया Sा ा र्थीा, Sो स्पष्ट रूप से संक े कर ा है विक उस समय क े सरकारी अति*कारिरयों +े हमेशा मस्जिस्Sद को Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में मा+ा। अणिभलेख पर लाई गई पया:प्त साम£ी उपरोX पहलू को स्पष्ट कर ी है; सिSसे संदर्भिभ विकया Sा सक ा है। अव* क े र्थीा+ेदार शी ल दुबे +े विद+ांक 01.12.1858 को एक रिरपोर्ट: सौंपी, Sो वाद संख्या 1 का प्रदश: 21 है, Sो "मस्जिस्Sद" को "मस्जिस्Sद Sन्म स्र्थीा+" क े रूप में भी संदर्भिभ कर ी है। विद+ांक 01.12.1858 की रिरपोर्ट: पहले ही वि+काली Sा चुकी है।

101. इसी रह विद+ांक 06.12.1858 की अप+ी रिरपोर्ट: में अव* क े र्थीा+ेदार, शी ल दुबे +े विफर से “मस्जिस्Sद” को “मस्जिस्Sद S+म स्र्थीा+” क े रूप में संदर्भिभ विकया है। 10.12.1858 को र्थीा+ेदार शी ल दुबे क े आवेद+ पर एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा, इस आदेश में, "मस्जिस्Sद" को "मस्जिस्Sद Sन्म स्र्थीा+" क े रूप में संदर्भिभ विकया गया र्थीा। उX आदेश को प्रदश: ए-69 (सूर्ट +ंबर 1) अणिभलेख पर लाया गया है Sो पहले से ही वि+काला गया है।

102. एक और महत्वपूर्ण: दस् ावेS, सिSसमें र्डॉ. राSीव *व+ द्वारा उ+क े क: बहु अति*क अवलस्जिम्ब हैं वह A-14 (वाद-1) है, Sो सतिचव द्वारा भेSे गए पत्र की 25.08.1863 विद+ांविक की एक प्रति है, Sो अव* क े मुख्य आयुX, फ ै Sाबाद मंर्डल क े मुख्य आयुX को भेSा गया है, Sहां "मस्जिस्Sद" को "Sन्म स्र्थीा+ मस्जिस्Sद" क े रूप में संदर्भिभ विकया गया र्थीा। यह पत्र पहले ही वि+काला Sा चुका है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

103. उपरोX भी स्पष्ट रूप से साविब कर ा है विक भले ही सरकारी अति*कारिरयों +े मस्जिस्Sद को Sन्म स्र्थीा+ मस्जिस्Sद क े रूप में संदर्भिभ विकया, Sो विक गSेविर्टयर में विदए गए कर्थी+ों को पूरी रह से पुविष्ट कर ा है और ऊपर उसिल्लखिख है विक बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थील पर विकया गया र्थीा।

104. देखा Sा+े वाला अगला काय: हसील फ ै Sाबाद, विज़ला फ़ ै ज़ाबाद का ऐति हासिसक स्क े च है, Sो वष: 1870 में सरकार द्वारा प्रकाणिश विकया गया। ऐति हासिसक स्क े च को अयोध्या और फ़ ै ज़ाबाद क े काय:वाहक आयुX और बन्दोबस् अति*कारी पी. का+†गी द्वारा ैयार विकया गया र्थीा। पी. का+†गी +े अप+े स्क े च में कहा है विक अयोध्या विहन्दू का है Sबविक मक्का मोहम्मर्ड+ का और Sेरूसलम यहूविदयों का। पी. का+†गी का विववरर्ण उद्धृ विकया गया है।

105. पी. का+†गी +े Sन्मस्र्थीा+ और अन्य मंविदरों का उल्लेख विकया है और स्पष्ट रूप से कहा है विक Sन्मस्र्थीा+ क े स्र्थीा+ पर 1528 ईस्वी में सम्रार्ट बाबर द्वारा एक मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा, Sो आS भी उ+क े +ाम पर है।

106. पी. का+†गी +े हिंहदू और मुसलमा+ क े म भेदों क े बारे में भी ध्या+ विदया है, Sो हिंहदुओं और मोहम्मर्ड+ों क े बीच हुए म भेदों क े बारे में है, Sहां हिंहदुओं क े बीच अत्यति*क लड़ाइयों क े बाद Sन्मस्र्थीा+ पर वि+यंत्रर्ण रख+े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की बा कही गई र्थीी। इस+े आगे देखा विक उस समय क हिंहदू और मोहम्मर्ड+ समा+ रूप से मस्जिस्Sद-मंविदर में पूSा/उपास+ा कर े र्थीे और विब्रविर्टश शास+ क े बाद से विववाद को रोक+े क े खिलए रेलिंलग लगाई गई र्थीी।

107. 1877 में प्रकाणिश एक और गSेविर्टयर अव* प्रां का गSेविर्टयर है। अयोध्या को राSपत्र में विवस् ृ रूप से प्रस् ु विकया गया है। उपरोX गSेविर्टयर में, Sन्मस्र्थीा+ और अन्य मंविदरों क े संबं* में एक विववरर्ण वि+काला गया है।

108. "बाबर की मस्जिस्Sद" और "विहन्दू और मुसलमा+ म भेद" शीष:क से वही अन् व:स् ु गSेविर्टयर में दोहरायी गयी हैं सिSसे मैं+े पी. का+†Sी क े हसील फ ै Sाबाद, सिSला फ ै Sाबाद का ऐति हासिसक तिचत्रर्ण को देख े समय पहले ही उद्धृ विकया है, सिSसे विवषय को संतिक्षप्त रख+े क े खिलए दोहराया +हीं Sा रहा है।

109. वष: 1880 में, ए.एफ विमखिलर्ट +े "फ ै Sाबाद क े भू राSस्व बन्दोबस् पर अप+ी रिरपोर्ट:" ैयार की Sो ऊपर उद्धृ है।

110. ध्या+ दे+े योग्य अगली साम£ी है वष: 1889 में प्रकाणिश अव* एवं उत्तर पतिश्चम प्रान् की ए.एस.आई. रिरपोर्ट: सिSसमें कहा गया है विक Sन्मस्र्थीा+ वाला रामचन्ˆ का पुरा+ा मंविदर बहु उत्क ृ ष्ट रहा होगा क्योंविक पूव: ः उद्धृ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसक े कई कॉलम बाबर की मस्जिस्Sद ब+ा+े क े खिलए मुसलमा+ों द्वारा प्रयोग विकये गये र्थीे।

111. भार ीय पुरा त्व सव†क्षर्ण द्वारा 1889 में प्रकाणिश ए. फहरर की "Sौ+पुर का शक— वास् ु; Sाफराबाद, साहे -माहे और अव* एवं उत्तर पतिश्चमी प्रान् ों क े अन्य स्र्थीा+ों पर विर्टप्पर्णी सविह " शीष:क वाली रिरपोर्ट: (पूव: ः उद्घृ ) पर ध्या+ विदया Sा+ा चाविहए।

112. इस प्रकार ए.एस.आई. का स्पष्ट मा++ा है विक अयोध्या में बाबर की मस्जिस्Sद उसी स्र्थीा+ पर ब+ाई गयी र्थीी Sहां रामचन्ˆ का पुरा+ा Sन्मस्र्थीा+ मंविदर र्थीा।

113. ए. एस.आई. द्वारा अव* और उत्तर पतिश्चमी प्रान् क े स्मारकीय पुरावशेष और णिशलालेखों पर ए. फहरर की एक अन्य रिरपोर्ट: प्रकाणिश की गयी र्थीी। रामचंˆ को संदर्भिभ कर े हुए इसमें उल्लेख विकया गया र्थीा विक भगवा+ राम वहां Sन्मे र्थीे। रिरपोर्ट: में इस बा का सन्दभ: है विक Sन्मस्र्थीा+ मंविदर को ध्वस् कर विदया गया र्थीा और 930 विहSरी में एक मस्जिस्Sद ब+ाया गया।

114. अगला गSेविर्टयर सिSसे संदर्भिभ विकया गया है और सिSसका अवलंब खिलया गया है, वह है फ ै Sाबाद का गSेविर्टयर ख°र्ड XLIII सिSसका प्रकाश+ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आगरा और अव* क े संयुX प्रां की सरकार द्वारा 1905 में विकया गया र्थीा। (पूव: ः उद्धृ )

115. पूव: ः उद्धृ 1908 में फ ै Sाबाद खंर्ड क े संदभ: में प्रकाणिश "इंपीरिरयल गSेविर्टयर ऑफ इस्जि°र्डया में।

116. वष: 1928 में फ ै Sाबाद गSेविर्टयर का प्रकाश+ एच.आर. +ेविवल द्वारा विकया गया। (पूव: ः उद्धृ )

117. भार ीय पुरा त्व सव†क्षर्ण +े "अव* और उत्तर पतिश्चमी प्रान् क े स्मारकीय पुरावशेष और णिशलालेख" ख°र्ड में 1891 में फ ै Sाबाद सिSले का वर्ण:+ कर े हुए, अयोध्या +गर क े विवषय में +ोर्ट विकया विक 'Sन्मस्र्थीा+' +ाम क े महत्वपूर्ण: विहन्दू मंविदर क े स्र्थीा+ पर बाबर क े शास+ में एक 'मस्जिस्Sद' ब+ा दी गयी Sो आS भी उसी क े +ाम पर है। आगे यह उल्लेख विकया गया विक पुरा+ा मंविदर बहु उत्क ृ ष्ट रहा होगा क्योंविक इसक े कई कॉलम मुसलमा+ों द्वारा बाबरी मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण में प्रयोग कर खिलये गये।

118. आगरा और अव* क े संयुX प्रां क े सिSला गSेविर्टयर क े "बारा बंकी" गSेविर्टयर खंर्ड 48 (1921) में विहन्दू पुSारिरयों और मुसलमा+ों क े बीच 1853 में उस भूविम क े खिलए सिSस पर पहले Sन्मस्र्थीा+ मंविदर र्थीा सिSसे बाबर द्वारा ध्वस् करवाकर मस्जिस्Sद ब+वा दी गयी र्थीी,हुए विववाद का उल्लेक विकया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गया र्थीा। गSेर्ट क े अध्याय 5 में 'इति हास' शीष:क से पृष्ट सं. 169 पर वि+म्+ कर्थी+ विकया गया है:- “...यह प्र ी होगा विक घर्ट+ा 1853 में हुई। घर्ट+ा का कारर्ण उ+ बहु ेरे विववादों में से एक र्थीा Sो उस भूविम क े संबं* में, सिSस पर पहले Sन्मस्र्थीा+ मंविदर र्थीा, सिSसे बाबर द्वारा ध्वस् कर वहां मस्जिस्Sद ब+वा दी गयी र्थीी, क े संबं* में समय समय पर विहन्दू पुSारिरयों और मुसलमा+ों क े बीच पैदा हो े र्थीे। वहां अन्य मस्जिस्Sदें औरंगSेब और अन्य द्वारा ब+वाई गयी र्थीी और उ+में से क ु छ +ष्ट हो गयी र्थीी। विहन्दूओं क े खिलए विवशेष रूप से पविवत्र हो+े क े कारर्ण वह स्र्थीा+ ुरं बैराविगयों और अन्य द्वारा कब्Sा कर खिलया गया सिSससे र्टकराव का उव:र स्रो ैयार हो गया।....”

119. गSेविर्टयर +े आगे अमीर अली द्वारा एक माच: (क ू च) क े विववरर्ण का उल्लेख विकया है सिSसक े +े ृत्व में बड़ी संख्या में मुस्जिस्लमों +े अयोध्या की ओर क ू च विकया लेविक+ अव* की पहली रेSीमेंर्ट क े क+:ल बाल द्वारा रोक े गये सिSसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गये और फस्र्ट: इंफ ैं र्ट्री लगभग विव+ष्ट हो गयी। गSेविर्टयर +े ब ाया है विक अमीर अली भी मारा गया। फरवरी 1856 में, अव* का राज्य विब्रविर्टश सरकार द्वारा हड़प खिलया गया।

120. यर्थीा सन्दर्भिभ गSेविर्टयरों और पुस् कों क े अलावा, प्रश्नग वाद क े पक्षकारों द्वारा अणिभलेख पर लाये गये अन्य दस् ावेSी साक्ष्य हैं। कति पय प्रदशÂ, साव:Sवि+क रिरकार्ड: से प्राप्त प्रमाणिर्ण +कल का सन्दभ: विदया Sा सक ा है Sो वाद में दाखिखल की गयी हैं। पूव: ः उद्धृ वाद सं.[1] में 28.11.1858 विद+ांविक शी ल दूबे द्वारा विदया गया आवेद+ प्रदश:-19 क े रूप में दाखिखल विकया गया।

121. अणिभलेख पर लाया गया अगला दस् ावेSी साक्ष्य है अव* में बाबरी मस्जिस्Sद स्र्थील क े मोअखिज्जम सैयद मोहम्मद खाति ब द्वारा दाखिखल विकया गया 30.11.1858 विद+ांविक आवेद+। बाबरी मस्जिस्Sद क े मोअखिज्जम सैयद मोहम्मद खाति ब द्वारा दाखिखल परिरवाद में इस बा का उल्लेख र्थीा विक अव* mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में स्जिस्र्थी Sन्मस्र्थीा+ मंविदर पर कोई वि+हंग सिंसह +ाम का व्यविX बलवा कर रहा है। परिरवाद में उल्लेख र्थीा विक मस्जिस्Sद क े भी र मेहराब क े वि+कर्ट उस+े विमट्टी का एक चबू रा ब+ा विदया र्थीा, वहां 'पूSा' और 'होम' हो ी है और पूरे मस्जिस्Sद में राम राम खिलखा हुआ है। परिरवाद में विहन्दुओं को मस्जिस्Sद से बाहर कर+े की प्रार्थी:+ा की गयी र्थीी। (पूव: ः उद्धृ )

122. प्रदश: 21 क े रूप में दाखिखल अन्य दस् ावेS 31.12.1828 विद+ांविक रिरपोर्ट: है Sो अव* क े र्थीा+ेदार शी ल दूबे द्वारा प्रस् ु की गयी र्थीी। रिरपोर्ट: में शी ल दूबे +े 'मस्जिस्Sद' को 'Sन्मस्र्थीा+ मस्जिस्Sद' क े रूप में सन्दर्भिभ विकया है।

123. अवलंविब अगला प्रदश: वाद सं.[1] का प्रदश: 31 है Sो विक मीर रज्जाबअली खाति ब मस्जिस्Sद द्वारा मस्जिस्Sद क े भी र ब+ाए गये चबू रे को हर्टा+े का प्रार्थी:+ा पत्र है। (पूव: ः उद्धृ )

124. उपयु:X प्रार्थी:+ा पत्र ही मस्जिस्Sद परिरसर क े भी र विहन्दुओं क े चबू रे का और शंख बSा कर पूSा विकये Sा+े का साक्ष्य है।

125. एक अन्य प्रार्थी:+ा पत्र विकसी मोहम्मद असगर +ामक व्यविX 12 फरवरी 1861 को विकया गया र्थीा सिSसमें मस्जिस्Sद परिरसर से चबू रा और विहन्दूओं की झोपड़ी हर्टा+े की मांग की गयी र्थीी। यह प्रार्थी:+ा पत्र वाद 4 में प्रदश: 54 क े रूप में दाखिखल विकया गया र्थीा।

126. यह प्रार्थी:+ा पत्र मोहम्मद असगर, मीर रज्जाब अली और मोहम्मद अफSल, अयोध्या, Sन्मस्र्थीा+ पर ब+ी बाबरी मस्जिस्Sद क े खा ीब और मुएखिज्ज+ की ओर से दी गयी र्थीी। 12 माच: 1861 विद+ांविक प्रार्थी:+ा पत्र पूव: ः उद्धृ है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 127.उपरोX प्रार्थी:+ा पत्र और पहले क े क ु छ प्रार्थी:+ा पत्र सिSन्हें बाबरी मस्जिस्Sद क े खा ीब और मुएखिज्ज+ की ओर से विदया गया र्थीा,से सिSस एक महत्वपूर्ण: थ्य को +ोर्ट विकया Sा सक ा है वह यह है विक बाबरी मस्जिस्Sद को हमेशा "Sन्मस्र्थीा+ अयोध्या में स्जिस्र्थी बाबरी मस्जिस्Sद" क े रूप में विकया गया है।

128. वाद सं.[4] में दाखिखल प्रदश: ए-55 इ+ाकी सिंसह की क ु विर्टया ढहाए Sा+े क े संबं* में खेम सिंसह सूबेदार की 16.03.1861 विद+ांविक रिरपोर्ट: है।

129. वाद सं.[4] में दाखिखल प्रदश: ए -30 मोहम्मद अफSल द्वारा दाखिखल 25.09.1866 विद+ांविक प्रार्थी:+ा पत्र है सिSसमें यह उल्लेख है विक ुलसीदास इत्याविद बैराविगयों +े 3 घंर्टे में परिरसर क े भी र मूर्ति रख दी है। साव:Sवि+क परिरवाद विकया गया। ( पूव: ः उद्धृ )।

130. इस आशय का साक्ष्य अणिभलेख पर लाया गया है विक अयोध्या क े उपायुX +े 03.04.1877 विद+ांविक आदेश द्वारा Sन्मस्र्थीा+ क े महं खेमदास को मस्जिस्Sद क े परिरसर में उत्तरी दीवार में दरवाSा खोल+े की अ+ुज्ञा दी र्थीी। सैयद मोहम्मद असगर द्वारा उX आदेश क े विवरुद्ध अपील दायर की गयी र्थीी। अपील क े आ*ारों को वाद सं. 1 में प्रदश: 30 क े रूप में अणिभलेख पर लाया गया है।अपील में यह भी पाया गया विक परिरसर की मूर्ति यों को अभी +हीं हर्टाया गया है। अपील में परिरसर में छोर्टा चूल्हा हो+े की बा भी कही गयी है। अपील( प्रदश: 30) का आ*ार 6 वि+म्+व है:- “*ारा6. यह विक प्रत्यर्थी- और अपीलार्थी- क े बीच एक पुरा+ा विववाद है और मा++ीय न्यायालय +े यह आदेश विदया है विक प्रत्यर्थी- को उस स्र्थीा+ पर कोई भी +या काय: +हीं कर+ा चाविहए। लेविक+ बलदेवदास बैरागी क े भूविमग हो+े क े कारर्ण 7 +वम्बर 1873 विद+ांविक आदेश उस पर ामील +हीं विकया Sाएगा। कह+े का आशय है विक आदेश क े अ+ुसार मूर्ति को हर्टाया +हीं गया है। कब्Sा कर+े क े अणिभप्राय से प्रत्यर्थी- दीवार क े पास कई गति विवति*यों में संलग्न है और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकसी क े द्वारा रोक े Sा+े पर वह आक्रामक हो Sा ा है और मारपीर्ट कर+े को ैयार हो Sा ा है। अ ः उस+े उX अहा े क े अन्दर एक चूल्हा ब+ा खिलया है Sो पहले कभी +हीं विकया गया र्थीा। पहले पूSा क े खिलए कोई चूल्हा +हीं र्थीा सिSसे ब+ा विदया गया है।"

131. उपरोX अपील में, फ ै Sाबाद क े उपायुX की रिरपोर्ट: Sमा की गयी र्थीी। रिरपोर्ट: में, उपायुX +े उल्लेख विकया है विक विवशेष विद+ों में Sन्मस्र्थीा+ Sा+े वालों को अलग माग: दे+े क े खिलए दरवाSे का खोला Sा+ा आवश्यक र्थीा।

132. उपायुX की उपरोX रिरपोर्ट: स्पष्ट ः यह सिसद्ध कर ी है विक विहन्दू Sन्मस्र्थीा+ पर Sा े र्थीे Sो विक मस्जिस्Sद परिरसर क े अंदर र्थीा। आयुX +े अन् ः मोहम्मद असगर की अपील को 13.04.1877 को खारिरS कर विदया।

133. ध्या+ दे+े योग्य अन्य महत्वपूर्ण: थ्य महं रघुबर दास द्वारा उप न्याया*ीश फ ै Sाबाद क े समक्ष वाद दायर विकया Sा+ा र्थीा सिSसका वाद सं. 61 ऑफ 280 ऑफ 1885 है। सिSसमें वादी +े मस्जिस्Sद परिरसर क े भी र मौSूद चबू रे पर मस्जिन्दर ब+ा+े की अ+ुमति मांगी र्थीी। 24.12.1885 को वाद को खारिरS कर े हुए मंविदर ब+ा+े की अ+ुमति को +कार विदया गया। महं रघुबर दास द्वारा सिSला न्याया*ीश फ ै Sाबाद क े समक्ष अपील दायर की गयी र्थीी। सिSला न्याया*ीश +े अपील को 18.12.1886 को खारिरS कर विदया।

134. उX आदेश क े विवरुद्ध दूसरी अपील न्यातियक आयुX अव* द्वारा खारिरS कर दी गयी।

135. क ु छ आैर साक्ष्य है सिSन्हे यह साविब कर+े क े खिलए अणिभलेखिख विकया गया है विक वष: 1934 में अयोध्या में विहन्दू मुतिश्लम दगें हुए उ+ दंगों क े दौरा+ बाबरी मस्जिस्Sद क े गुम्बद को विहन्दुआें क े द्वारा क्षति £स् कर विदया गया र्थीा, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिSसे एक मुतिश्लम ठेक े दार क े माध्यम से प्रशास+ क े द्वारा वि+र्मिम विकया गया र्थीा। एक मुस्जिस्लम ठेक े दार द्वारा मस्जिस्Sद की मरम्म से संबंति* दस् ावेSों को वाद संख्या-4 क े वादी क े द्वारा उसक े भुग ा+ क े खिलए आवेद+ को अणिभलेख क े रूप में प्रस् ु विकया है, Sो 1934 में हुई मस्जिस्Sद को +ुकसा+ पहुंचा+े की घर्ट+ा क े फलस्वरूप पक्षकारों क े बीच म भेदों और विववादो क े गवाह हैं सिSसे क ु छ मही+ों क े बाद मरम्मद विकया Sा सका। ऊपर उसिल्लखिख दस् ावेSी साक्ष्य यह साविब कर+े क े खिलए पया:प्त है मस्जिस्Sद परिरसर क े अन्दर, Sो एक चहारविदवारी से तिघरा हुआ है और प्रश्नग अवति* में विहन्दू वहाँ Sा े र्थीे और पूSा कर े र्थीे। बाबरी मस्जिस्Sद क े ख ीब और मुअखिज्ज+ क े द्वारा प्रस् ु आवदे+, Sैसा विक ऊपर उल्लेख विकया है में स्पष्ट रूप से विहन्दुआें क े द्वारा पूSा और विहन्दुआे क े द्वारा चबू रा का वि+मा:र्ण और विहन्दुआें क े द्वारा मस्जिस्Sद परिरसर में मूर्ति की स्र्थीाप+ा कर+े की घर्ट+ा को स्वीकार कर ा है। बाबरी मस्जिस्Sद का सन्दभ: Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में, मस्जिस्Sद क े कइ: आवेद+ों में इंविग विकया गया है विक मस्जिस्Sद भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर स्र्थीाविप है। उपराेX सास्जिक्ष्यक दस् ावेS विहन्दुआें की आस्र्थीा और विवश्वास की गवाही दे े है विक मस्जिस्Sद भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर स्र्थीाविप है। मस्जिस्Sद क े भी र पूSा कर+े क े खिलए उ+का विवरो*, दृढ़ ा और कार:वाई उ+क े विवश्वास और आस्र्थीा की गवाही है विक मस्जिस्Sद का परिरसर भगवा+ राम का S+मस्र्थीा+ है। मौखिखक साक्ष्य: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

136. पक्षकारों +े वाद क े मौखिखक साक्ष्य की पया:प्त मात्रा को प्रस् ु विकया। वाद संख्या 4 क े वादी +ें 32 गवाहों को न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु विकया, सिSन्हें पीर्डब्लू क े रूप में ब ाया गया है। वाद संख्या 5 क े वादी +ें 19 गवाहों को न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु विकया सिSन्हें आेपीर्डब्लू क े रूप में ब ाया गया है। वाद संख्या 3 क े वादी +े 20 गवाहों को न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु विकया है सिSन्हें र्डीर्डब्लू क े रूप में ब ाया गया है। वाद संख्या 3 में प्रति वादी संख्या 1/2 +े 3 गवाह न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु विकये। वाद संख्या 4 क े अन्य प्रति वाविदयों क े द्वारा भी क ु छ गवाहों को प्रस् ु विकया गया है। 137.राम Sन्म भूविम क े Sन्म स्र्थीा+ और सार्थी ही सार्थी पूSा और Sहाँ पूSा की Sा ी र्थीी वहाँ क े साक्ष्य क े बारे में विहन्दुआें की आस्र्थीा और विवश्वास क े पहलु क े सम्बन्* में गवाहों क े मौखिखक साक्ष्य की Sाँच कर+े की आवश्यक ा है।

327. महं परमहंस रामचंˆ दास ओपीर्डब्ल्यू-1, उम्र लगभग 90 वष: (23.12.1999 को), वाद, मुकदमा +ंबर 5 क े वादी क े द्वारा उ+की परीक्षा कराई गई र्थीी। महं राम चंदर दास पंच रामा+ंदी अखिखल भार ी अन्नी और विदगंबर अखाड़ा, अयोध्या क े वि+वासी हैं। वह 14-15 साल की उम्र में अयोध्या आए। महं परमहंस राम चंˆ दास अप+ी मुख्य परीक्षा में कह े हैं:- “......... Sब से मैं अयोध्या आया, ब से मैं+े हमेशा राम Sन्मभूविम, ह+ुमा+ गढ़ी, +ागेश्वर+ार्थी, सरयू, छोर्टी देवकली, बर्डी देवकली, लक्ष्मर्ण घार्ट, छोर्टे देवकली क े पास स्जिस्र्थी सप्त सागर और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क+क भव+ मंविदर Sैसे सा स्र्थीा+ों पर लोगों को दश:+ (झलक) क े खिलए Sा े देखा है। सा स्र्थीा+ अपरिरव:+ीय हैं और उ+क े स्र्थीा+ को परीवर्ति +हीं Sा सक ा है, सिSसका अर्थी: है विक एक स्र्थीा+ को दूसरे क े स्र्थीा+ पर +हीं ब+ाया Sा सक ा है। मर्णी पव: एक प्रसिसद्ध स्र्थीा+ है Sो सा स्र्थीा+ों से णिभन्न है। राम Sन्मभूविम में भगवा+ राम की मूर्ति र्थीी। वहाँ पर सी ा रसोई भी र्थीी। रीति -रिरवाSों क े अ+ुसार, राम Sन्मभूविम क े +ाम से एक विवशेष हॉल र्थीा और यहां अ+ेक देव ाओं और देविवयों की सभी प्रति माओं और मूर्ति स्वयंं उत्कीर्भिर्ण र्थीी। मूर्ति यों क े अलावा. उस स्र्थीा+ की भी पूSा की Sा ी र्थीी, सिSसे भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ कहा Sा ा र्थीा और Sहाँ भगवा+ राम प्रकर्ट हुए हैं। राम लाला क े मंच (चबू रा) क े रूप में एक मंच और पुआल की एक झोपड़ी भी र्थीी, सिSसमें वि+म ही अखाड़ा क े पुSारी भगवा+ राम की पूSा कर े र्थीे और चढ़ावा इत्याविद चढ़ा े र्थीे।

138. अप+ी प्रति परीक्षा में वह कह े है:- ".......वह स्र्थीा+ सिSसको मै+े गभ: £ह क े रूप में वर्भिर्ण विकया है, वह मेरे विवश्वास क े आ*ार पर है आैर सभी विहन्दुआें क े विवश्वास क े आ*ार पर है विक वह स्र्थीा+ राम चन्ˆ Sी का Sन्म स्र्थीा+ है। मैं उस स्र्थीा+ क े बारें में मेरा यह विवचार हूं, Sहां 23 विदसंबर 1949 को चबू रा से हर्टा+े क े बाद इस मूर्ति की स्र्थीाप+ा की गई र्थीी सिSसे Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में मा+ा Sा ा है और मैं उस स्र्थीा+ को मूर्ति स्र्थीाप+ा से पहले से ही Sन्म स्र्थीा+ क े रूप में मा+ ा र्थीा। प्रश्न:-क्या वह स्र्थीा+, सिSसे आप+े अप+े विवश्वास क े अ+ुसार Sन्मस्र्थीा+ क े रूप में वर्भिर्ण विकया है, मध्य गुंबद स्र्थीा+ क े दो+ों रफ से 10-15 हार्थी दूर है? उत्तर:- +हीं, वह स्र्थीा+ Sहां आदेश(sic {मूर्ति }) ) स्र्थीाविप की गइ: र्थीी, प्रामाणिर्णक स्र्थीा+ और संपूर्ण: हिंहदू समुदाय उस स्र्थीा+ पर आस्र्थीा रख े है। इसमें संदेह की कोई गुंSाइश +हीं है आैर इस स्र्थीा+ से उस स्र्थीा+ की दूरी दो-चार फीर्ट से ज्यादा +हीं हो सक ी है। इस विवश्वास का आ*ार यह है विक हिंहदुओं क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द्वारा सविदयों से इस स्र्थीा+ का दश:+ Sन्भूविम क े रूप में विकया Sा ा रहा है''

139. अगला बया+ सिSसमें ध्या+ विदया Sा+ा है वह आेपीर्डब्लू श्री हरिरहर प्रसाद ति वारी का है। सिS+की उम्र 85 वष: र्थीी (01.08.2002 को)। वह राम वि+वास मंविदर में 1934 से 1938 क अयोध्या में रह+े का दावा कर े हैं, Sो राम Sन्मभूविम से क े वल 250-300 कदम की दूरी पर र्थीा। उन्हों+े लोगों क े विवश्वास और आस्र्थीा का सन्दभ: विदया है विक भगवा+ विवष्र्णु +े उसी स्र्थीा+ पर भगवा+ श्री राम क े रूप में अव ार खिलया है। उन्हो+ें अप+े मुख्य परीक्षा क े पैरा 3 में कहा हैः-

3. अयोध्या विहन्दुओं क े खिलए एक प्राची+ और पविवत्र ीर्थी: स्र्थील है Sहां परम ब्रह्म परमेश्वर भगवा+ विवष्र्णु राSा दशरर्थी क े पुत्र श्री राम क े रूप में अव ार खिलया गया। विहन्दू *म: क े अ+ुयातिययों को अ+ं काल से ही यह विवश्वास है विक भगवा+ विवष्र्णू +े भगवा+ श्री राम क े रूप में अयोध्या में अव ार खिलया र्थीा। इस आस्र्थीा और विवश्वास क े कारर्ण लोग श्री राम Sन्मभूविम क े दश:+ और परिरक्रमा (चक्कर लगा+े) क े खिलए Sा े र्थीे। 1934 से 1938 क मेरे अध्यय+ क े दौरा+, मेरे परिरवार क े सदस्य, मेरे दादा-दादी, बुSुग:, सं और अयोध्या क े आश्रम क े आश्रम क े लोग कह े र्थीे विक भगवा+ विवष्र्णु +े इसी स्र्थीा+ पर भगवा+ श्री राम क े रूप में अव ार खिलया र्थीा और यही श्री राम Sन्मभूविम है। इसी विवश्वास क े आ*ार पर मैं दश:+ क े खिलए श्रीराम Sन्मभूविम Sा ा रहा हूं। मेरा अध्यय+ पूरा कर+े क े बाद Sब मैं अयोध्या आया ो मैं दश:+ क े खिलए वहां Sा ा र्थीा। मैं ज्यादा र विपछले 8-9 वषÂ से सु£ीव विकला, रामकोर्ट, अयोध्या में रहां हूं और दश:+ कर+े क े खिलए आम ौर पर राम Sन्मभूविम Sा ा रहा हूं। ”

140. अप+ी प्रति परीक्षा में वह आगे कह े हैः- mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “6................ भव+ सिSसमें गुम्बद है वह पविवत्र गभ: £ह है, Sहाँ यह विवश्वास विकया Sा ा है विक यहाॅं भगवा+ राम +े Sन्म खिलया है। विहन्दू ीर्थी: यात्री आैर दश:+ार्थी- (दश:क) फल, फ ू ल आैर *+ अप+ी-अप+ी आस्र्थीा पर चढ़ा े र्थीे।………...”

141. प्रति परीक्षा में राम Sन्म भूविम पर अप+े विवश्वास को दोहरा े हुए उन्हों+े आगे कहा: - “......... यह सही है विक मेरे उपरोX कर्थी+ में 1(sic मै+े) +े कहा र्थीा विक विववाविद स्र्थील राम की S+भूविम है। मेरा यह विवश्वास विकसी भी *ार्मिमक पुस् क को पढ़कर +हीं है, बस्जिल्क यह उस पर आ*ारिर है Sो मैं+े वृद्ध और बुSुग: व्यविXयों से सु+ा है। अयोध्या आ+े से पहले से ही मेरा यह विवश्वास है। यह कह+ा है विक Sबसे मै सचे हुआ ब से मेरा ऐसा विवश्वास है और यह S+ ा से सु+ कर र्थीा। 1934 से 38 क े मध्यकाल में Sब मैं अयोध्या में र्थीा, संभव ः मैं Sन्नभूविम या+ी विववाविद स्र्थील हSारों बार गया हूॅं। मेरी पढ़ाई क े दौरा+ मैं Sन्मभूविम में Sाया कर ा र्थीा………….”

142. उन्हों+े अप+े बया+ में यह भी कहा विक विववाविद इमार की पतिश्चम की दीवार क े बाहर परिरक्रमा माग: र्थीा और उसका उपयाेग परिरक्रमा कर+े में विकया Sा ा र्थीा। "विववाविद भव+ की पतिश्चम की दीवार क े बाहर आैर दीवार से लगा हुआ एक परिरक्रमा माग: (माग:) र्थीा और इस माग: पर चल े हुए मैं परिरक्रमा (*ार्मिमक चक्कर लगा+ा) कर ा र्थीा। इस माग: को पैदल चल+े योग्य ब+ाया गया र्थीा आैर उस पर क ु छ पुरा+ी ई ं र्टें पड़ी र्थीी।..........”

143. अप+े बया+ में उन्हों+े यह भी कहा विक वह परिरक्रमा माग: क े माध्यम से परिरक्रमा विकया कर े र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

144. अगला बया+ आेपीर्डब्लू-5 राम +ार्थी विमश्रा क े बया+ पर ध्या+ आकर्मिष विकया Sा+ा चाविहए सिS+की उम्र 91 वष: र्थीी (06.08.2006 को)। उन्हों+े 1932 क े बैसाख माह में अयोध्या आ+े का दावा विकया। वे ीर्थी: पुरोविह क े रूप में काम कर े र्थीे। अप+ी प्रति परीक्षा में वह कह े हैः- “........ बुSुगÂ क े अ+ुसार, यह मध्य गुंबद क े +ीचे भगवा+ राम का Sन्म राSा दशरर्थी क े पुत्र क े रूप में हुआ र्थीा। इसी आस्र्थीा और विवश्वास क े आ*ार पर मैं और भगवा+ राम क े सभी हिंहदू भX श्री राम Sन्मभूविम क े दश:+ कर े र्थीे। यह पु°यमय स्र्थीा+ आैर पूSा योग्य स्र्थीा+ क े रूप में मा+ा गया र्थीा।........."

145. वह आगे कह े है:- “............ सभी हिंहदुओं का यह प्राची+ पारंपरिरक विवश्वास है विक भगवा+ विवष्र्णु का Sन्म राSा दशरर्थी क े पुत्र क े रूप में इस स्र्थीा+ पर हुआ र्थीा और इसीखिलए यह स्र्थीा+ इ +ा पविवत्र और पूSा योग्य है। इसी विवश्वास और आस्र्थीा क े आ*ार पर है विक लाखों श्रद्धालु भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ क े दश:+ और परिरक्रमा क े खिलए अयोध्या आ े रहे हैं। मुख्य प्रवेश द्वार क े बाहर अं£ेSों क े समय का एक पत्र्थीर है, सिSस पर 'Sन्मभूविम वि+त्य यात्रा ' खिलखा गया है और विहन्दी क े अंकों में से ('ek').............”

146. आेपीर्डब्लू-6, हौसिसला प्रसाद वित्रपाठी की उम्र 80 वष: है (13.08.2002 को) सिSन्हो+ें विदसंबर 1935 में अयोध्या आ+े का दावा है। अप+े मुख्य परीक्षा में वह कह े हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “7. हमें यह विवश्वास है विक भगवा+ राम का Sन्म अयोध्या में हुआ र्थीा अैेार वह स्र्थीा+ राम Sन्म भूमी क े +ाम से प्रसिसद्घ है, Sहाँ पर लाखों लोग देश क े को+े-काे+े से आ े हैं आैर दश:+ क े बाद श्री राम Sन्म भूमी की परिरक्रमा कर े हैं। यह इस विवश्वास आैर आस्र्थीा क े आ*ार पर है विक हम भी एक वष: में ी+ से चार बार श्री राम Sन्म भूमी में Sा े है आैर श्री राम Sन्म भूमी क े दश:+ कर+े आैर उसक े बाद परिरक्रमा कर+े का महत्व है।

8. मेरा यह भी दृढ़ विवश्वास और आस्र्थीा है विक भगवा+ श्री राम का Sन्म अयोध्या में उसी स्र्थीा+ पर हुआ र्थीा Sहाँ हSारों विहन्दू श्रद्धालु दश:+ और परिरक्रमा क े खिलए आ े हैं। यह इसी आस्र्थीा क े आ*ार पर र्थीा विक 1935 से मैं प्रत्येक वष: ी+ से चार बार अयोध्या गया और सरयू +दी में स्+ा+ कर+े क े बाद क+क भव+, ह+ुमा+गढ़ी और श्री राम Sन्मभूविम क े दश:+ प्राप्त कर े र्थीे और श्री राम Sन्मभूविम की परिरक्रमा कर े र्थीे।”

147. वह आगे कह े है:- “10. विहन्दू री ी रिरवाS, आस्र्थीा आैर विवश्वास क े अ+ुसार लोहे की सलाखों वाली दीवार क े पतिश्चम की रफ एक ी+ णिशखर वाला भव+ है, सिSसमें मध्य णिशखर वाला भाग श्री राम Sन्म भूमी का स्र्थीा+ है, सिSसे गभ: £ह कहा Sा ा है, इस विवश्वास और आस्र्थीा क े आ*ार पर, मै श्री राम Sन्म भूमी क े दश:+ और परिरक्रमा क े खिलए Sा ा र्थीा।"

148. वह आगे कह े हैः-

12. सभी ीर्थी: यात्री-दश:+ार्थी- पूव: में स्जिस्र्थी प्रवेश द्वार से श्री राम Sन्मभूविम परिरसर में प्रवेश विकया कर े र्थीे और रामचबू रा पर स्जिस्र्थी मू - और दतिक्षर्ण-पूव: को+े पर स्जिस्र्थी पीपल और +ीम क े पेड़ क े +ीचे स्जिस्र्थी मूर्ति यों और सी ा रसोइ और पदतिचन्हों इत्याविद क े दश:+ कर े र्थीे, और वर्जिS दीवार क े अन्दर स्जिस्र्थी पु°यमय स्र्थील राम Sन्म भूमी क े दश:+ भी कर े र्थीे सिSसे गभ: £ह की मान्य ा दी गइ: है। श्रद्धालु और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दश:+ क े खिलए आ+े वाले लोग और हम अप+ी श्रद्घा क े अ+ुसार फल, फ ू ल और +कदी का चढ़ावा चढ़ा े र्थीे। गभ: गृह में भी, श्रद्धालु और हम इसक े दश:+ क े बाद हमारे विवश्वास क े अ+ुसार वर्जिS दीवार क े माध्यम से प्रसाद चढ़ा े र्थीे। ”

149. अप+ी सिSरह में, उन्हों+े साव:Sवि+क राय क े इस थ्य से इ+कार विकया है विक राम Sन्मभूविम की बीसवीं सदी की है। वह कह े है यह परंपरा क े अ+ुसार बहु लम्बे समय से है। “....हालांविक, लोकम यह है विक रामSी का Sन्म स्र्थीा+ वही है, अर्थीा: राम Sन्म भमी सिSसक े बारे में विववाद चल रहा है यह कह+ा गल है विक यह S+म बीसवीं श ाब्दी का है। वास् व में, यह परंपरा क े अ+ुसार लंबे समय से चली आ रही है.........”

149. अप+े प्रति परीक्षा में उन्हों+े इस थ्य से इंकार विकया विक राम Sन्म भूविम से संबंति* लोक राय बीसवीं श ाब्दी की है। वह कर्थी+ कर े हैं विक यह उ +ी पुरा+ी है सिS +ी विक प्रर्थीा। “... हालांविक लोगों का मा++ा है भगवा+ राम Sहां पैदा हुए है वह वही स्र्थीा+ है Sो राम Sन्म भूविम है और सिSस पर विववाद चल रहा है। यह कह+ा गल होगा विक लोगों की Sो राय है वह बीसवीं श ाब्दी की है. थ्यों से Sाविहर है विक यह राय प्रर्थीाग रूप से ब से रही है।"

150. ओ.पी.र्डब्ल्यू.-7, सूरS ति वारी, 73 वष: (19.19.2002), +े दावा विकया है विक वह वष: 1932 में अयोध्या गये र्थीे और उसक े बाद लगा ार Sा े रहे. अप+े मुख्य परीक्षा में वह कर्थी+ कर े हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “...मेरे बड़े भाई +े ब ाया विक यह भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ (रामSन्म भूविम) है और बहु प्राची+ काल से विहन्दुओं में आस्र्थीा विवश्वास एवं अविड़ग मान्य ा है विक भगवा+ विवष्र्णु राSा दशरर्थी क े पुत्र क े श्री राम रूप में गुम्बद क े मध्य में अव ार खिलया र्थीा और यही कारर्ण है विक इसे ‘गभ: गृह कहा गया है। राम चबू रा क े दश:+ कर+े क े बाद ीर्थी:यात्री और आगन् ुक Sालीदार दरवाSे से होकर वित्रगुम्बदीय भव+ में Sाया कर े हैं और वहां से गभ: गृह का दश:+ कर े हैं और वे गभ: गृह में पुष्प, प्रसाद और सिसक्क े चढ़ा े हैं।"

151. वह आगे अप+ी प्रति परीक्षा में राम Sन्म भूविम क े बारे में अप+ी आस्र्थीा और विवश्वास को वि+म्+खिलखिख शब्दों में व्यX कर े हैः- "Sहां क वित्र-गुम्बदीय भव+ का प्रश्न है मुझे विवश्वास र्थीा Sो आS भी है विक यह राम Sन्म भूविम है।"

152. आगे अप+ी प्रति परीक्षा में उन्हों+े कहा विक प्रसाद और पुष्प को चढ़ा+े क े उपरान् वे बाहर से गुम्बद क े +ीचे वाली भूविम पर सर झुकाकर प्रर्णाम विकये। “...पूव- दरवाSे पर पहुंच+े से पहले मेरे भाई +े दीवार क े बाहर से सिSसमें ी+ लोहे क े छड़ लगे र्थीे वहां से वित्र -गुम्बदीय भव+ पर पुष्प चढ़ाया और मुझे भी विदया सिSसको मै+े भी चढ़ा विदया। मैं+े क े वल बाहर से लोहे की छड़ों से पुष्प को चढ़ाया। सिSस समय मैं पुष्प, प्रसाद, और पैसा चढ़ा रहा र्थीा उस समय अन्य लोग भी वहां यहीं सामा£ी चढ़ा रहे र्थीे। मैं+े क े वल बाहर से Sमी+ पर लेर्टकर द°ड़व प्रर्णाम विकया। मै+े अप+े भाई से पूँछा विक वह उस Sगह पर पुष्प क्यों चढ़ा रहे र्थीे, सिSस पर उन्हों+े मुझे ब ाया विक इस भव+ क े बीच वाले गुम्बद की Sगह पर भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा। सिSस Sगह पर मैं गया वह मध्य वाले गुम्बद क े +ीचे वाली Sगह है।....” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

153. ओ.पी.र्डब्ल्यू.-12 श्री कौशल विकशोर, उम्र 75 ( 16.12.2002) +े कर्थी+ विकया विक Sब वह 14-15 वष: क े र्थीे ो वे राम Sन्म भूविम की पूSा विकये र्थीे। अप+े प्रति परीक्षा में वे कर्थी+ कर े हैः- “6. Sब मैं अप+े दादा और विप ा क े सार्थी राम Sन्म भूविम Sा+ा प्रारम्भ विकया ो मैं+े देखा विक ीर्थी:यात्री, भX इत्याविद Sो अयोध्या आ े र्थीे वे विब+ा चूक े राम Sन्म भूविम Sाया कर े र्थीे। त्यौहारों क े समय भीड़ बहु ज्यादा र्थीी, कह+े का अर्थी: यह है विक यह एक लाख से ज्यादा र्थीी. वे राम चबू रा, सी ा रसोई ं, णिशव चबू रा, वित्र-गुम्बदीय भव+ मध्य गुम्बद क े +ीचे मंविदर क े वि+Sी कमरे और उसक े गभ: गृह (Sहां भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा) पूSा विकया कर े र्थीे और उस परिरसर की दीवार क े बाहर से परिरक्रमा विकया कर े र्थीे।"

154. वह आगे कर्थी+ कर े हैः- “12. मेरे दादा और विप ा द्वारा मुझे ब ाया गया विक स्मर्णा: ी काल से विहन्दू विवश्वास और मान्य ा क े अ+ुसार त्रे ा युग में इस वित्र-गुम्बदीय भव+ में स्जिस्र्थी मंविदर क े गभ: गृह में राSा दशरर्थी क े पुत्र क े रूप भगवा+ राम का Sन्म हुआ र्थीा। यह लोगों का पारम्परिरक विवश्वास और आस्र्थीा है सिSसक े चल े इस देश क े लोग और बाहर से अ+ेक ीर्थी:यात्री Sगह की पूSा और परिरक्रमा कर+े भगवा+ क े Sन्मस्र्थीा+ पर आ े हैं। "

155. अप+े प्रति परीक्षा में वह इस बा पर कायम रहें विक राम का Sो Sन्म है वह उस Sगह पर है Sहां पर बाबरी मस्जिस्Sद ब+ायी गयी है, यह आस्र्थीा क े कारर्ण है।

156. अगले गवाह ओ.पी.र्डब्ल्यू.-13 +ारद सरर्ण, उम्र 26 (27-01-

2003) +े दाया विकया विक वह सा*ु ब++े अयोध्या आये र्थीे। मुख्य परीक्षा में वह कर्थी+ कर े हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "पूव- दरवाSे पर अन्दर प्रवेश कर+े पर पतिश्चम की रफ वहां पर वित्र- गुम्बदीय भव+ र्थीा, Sहां पर मंविदर का गभ:गृह र्थीा सिSसकी पूSा की Sा ी र्थीी। मेरे पूव:Sों +े मुझे इस Sगह क े बारे में ब ाया र्थीा विक इस Sगह की पूSा भगवा+ राम क े Sन्म क े रूप में स्मर्णा: ी काल से की Sा ी र्थीी। मैं+े भी इस स्र्थीा+ की पूSा की है और पाया विक यहां पर लाखों ीर्थी:यात्री आ े र्थीे और इस पविवत्र स्र्थीा+ पर मत्र्थीा र्टेक े र्थीे। वे भी इस स्र्थीा+ पर आये और सी ा रसोई ं, राम चबू रा इत्याविद की पूSा विकये और ह+ुमा+ द्वार से बाहर आ+े क े बाद इस पूरे परिरसर की परिरक्रमा विकया।"

157. अप+े प्रति परीक्षा में वह कर्थी+ कर े हैः- “... अयोध्या भगवा+ राम की Sन्मस्र्थीा+ है और हमें विववाविद ढ़ांचे क े मध्य गुम्बद क े +ीचे वाले स्र्थीा+ को उ+का Sन्मस्र्थीा+ ब ाया गया। Sन्मस्र्थीा+ और Sन्मभूविम का एक ही म लब है।....”

158. र्डी.र्डब्ल्यू. – 3/14 Sग गुरू रामा+न्द आचाय: स्वामी हया:चाय:, उम्र 69 वष: (23.07.2004) अप+े प्रति परीक्षा में वि+म्+खिलखिख कर्थी+ कर े हैः- "मैं पूव: में वित्र-गुम्बदीय भव+ का दश:+ कर+े Sाया कर ा र्थीा। मैं+े राम लला का दश:+ भी विकया है। मैं+े दश:+ इसखिलए विकया क्योंविक मुझे विवश्वास है विक कोई भी राम लला का दश:+ कर मोक्ष प्राप्त कर सक ा है।...”

159. र्डी.र्डब्ल्यू. – 3/1 महं भास्कर दास, उम्र 75 वष: (29.08.2003) अप+े मुख्य परीक्षा में वि+म्+खिलखिख कर्थी+ कर े हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “...मेरे काय:काल में 1946-1949 की अवति* में क ु क— की ति णिर्थी क कोई भी मुसलमा+ विववाविद स्र्थीा+ पर +माS पढ़+े +हीं आया और ही +माS वहां बोली गयी। विहन्दू भX पैसा, फल, विमष्ठा+ और अन्य पदार्थी: विववाविद स्र्थीा+ क े अन्दर और बाहर स्र्थीाविप देव ाओं को अर्मिप कर+े आ े र्थीे और सिSसे वि+म ही अखाड़ा क े सा*ुओं द्वारा प्राप्त कर खिलया Sा ा र्थीा।....”

160. सिS+ गवाहों की वाद-4 क े वाविदयों द्वारा परीक्षा की गयी उन्हों+े भी अप+े बया+ यह स्वीकार विकया विक सिSस स्र्थीा+ को वह बाबरी मस्जिस्Sद कह े हैं विहन्दू उस स्र्थीा+ को Sन्मस्र्थीा+ कह े हैं।

161. मोहम्मद हासिसम, उम्र 75 वष: (24.07.1996) पी. र्डब्ल्यू.- 1 क े रूप में उपस्जिस्र्थी हुए। अप+े प्रति परीक्षा उन्हों+े स्वीकार विकया विक वह स्र्थीा+ सिSसे विहन्दू राम Sन्मभूविम मा+ े हैं और मुस्जिस्लम बाबरी मस्जिस्Sद मा+ े हैं उसकी क ु क— 22/23 विदसम्बर 1949 को की गयी र्थीी। “... सिSस स्र्थीा+ की क ु क— 22/23 विदसम्बर 1949 को की गयी र्थीी विहन्दू उसे राम Sन्मभूविम र्थीा मुस्जिस्लम उसे बाबरी मस्जिस्Sद मा+ े हैं। गोपाल सिंसह विवसारद क े वाद में भी विहन्दुओं द्वारा इसे राम Sन्मभूविम और मुस्जिस्लमों द्वारा इसे बाबरी मस्जिस्Sद कहा गया है।"

162. वह आगे कर्थी+ कर े हैं विक सिS +ा महत्व मक्का का मुस्जिस्लमों क े खिलए है उ +ा महत्व भगवा+ राम क े कारर्ण अयोध्या का विहन्दुओं क े खिलए है।

163. पी.र्डब्ल्यू.-2 हाSी महमूद अहमद उम्र 58 वष: वि+वासी - र्टेढ़ी बाSार, अयोध्या अप+ी प्रति परीक्षा में वि+म्+खिलखिख कर्थी+ कर े हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “...वि£ल वाली दीवार दतिक्षर्ण विदशा में मस्जिस्Sद की दीवार क े बगल में र्थीी। हम इसे मस्जिस्Sद कह े हैं और अन्य पक्षकार इसे मंविदर कह े हैं। पूरे चाहारदीवारी की ऊ ँ चाई समा+ है। यह आँग+ क े दतिक्षर्णी विहस्से क पूर्ण: वि+र्मिम भव+ है। यह एक मस्जिस्Sद र्थीी सिSसे अन्य लोग मंविदर कह े हैं।...”

164. पी.र्डब्ल्यू.-4 मोहम्मद यासी+ उम्र 66 वष: (07.10.1996) भी वि+म्+खिलखिख कर्थी+ कर े हैः- “...मैं अयोध्या में रह ा हूँ इसखिलए अक्सर मेरी क ु छ विहन्दुओं और सा*ुओं से भी मुलाका हो ी है। हम उ+से वैवाविहक समारोहों में भी विमल े हैं। उ+का मा++ा है विक यह भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ है। ( ब कहा, यह उ+का खुद का मा++ा है।) विहन्दू इसे पविवत्र स्र्थीा+ मा+ े और यहां पूSा कर े हैं।...”

165. पी.र्डब्ल्यू.-23 मोहम्द कासिसम, उम्र 74 वष: अप+े प्रति परीक्षा में स्वीकार विकया विक सिSसको वह बाबरी मस्जिस्Sद कह े है उसे विहन्दू राम Sन्मस्र्थीा+ कह े हैं। वह कर्थी+ कर े हैः उसक े बाद एक को+े पर वहां बाबरी मस्जिस्Sद है। यह सच है विक सिSस स्र्थीा+ को मैं बाबरी मस्जिस्Sद कह ा हूँ उस स्र्थीा+ को विहन्दू राम Sन्मस्र्थीा+ कह े हैं।

166. उपरोX उसिल्लखिख वाद-5 क े वाविदयों, वाद-3 क े वाविदयों और वाद -4 क े वाविदयों द्वारा भी परीक्षा विकये गये गवाहों क े मौखिखक साक्ष्य विहन्दुओँ की आस्र्थीा और विवश्वास को स्पष्ट रूप से साविब कर े हैं विक भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ वह स्र्थीा+ है Sहां पर बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया है। वित्र-गुम्बदीय ढ़ांचा को भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ मा+ा गया। लोग वित्रmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गुम्बदीय ढांचे की पूSा कर े हैं, भXों द्वारा सम्पूर्ण: परिरसर की परिरक्रमा वाद में उद्घृ मौखिख साक्ष्यों से पूर्ण:रूपेर्ण साविब हो चुकी है।

167. उपरोX उसिल्लखिख यह कर्थी+ सभी गSर्टों में दS: है Sो विवस् ृ और एकम से सरकार क े प्राति*कार क े अ*ी+ प्रकाणिश उ+से यह प ा चल ा है विक भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर वष: 1528 में बाबर द्वारा मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। यह सच है विक गSर्ट में दS: कर्थी+ वि+श्चायक साक्ष्य +हीं हैं लेविक+ उपयुX साक्ष्यों द्वारा खारिरS विकये Sा+े क े सापेक्ष अणिभखिलखिख कर्थी+ों की सत्य ा की उप*ारर्णा की Sा+ी चाविहए। सरकार द्वारा प्रकाणिश सभी गSर्ट इसी कर्थी+ को दोहरा े हैं विक बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर विकया गया र्थीा। यहां पर कोई महत्वपूर्ण: साक्ष्य +हीं है विक वाद-4 क े वादी उपरोX कर्थी+ से असहम हों और आगे, उपरोX उसिल्लखिख साक्ष्य स्पष्ट रूप से विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास का समर्थी:+ कर े हैं विक भगवा+ राम का Sन्म वहीं पर हुआ र्थीा Sहां पर बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया है। इसखिलए इस वि+ष्कष: पर पहुंचा Sा सक ा है विक वित्र-गुम्बदीय ढ़ांचा भगवा+ राम का Sन्म स्र्थीा+ है।

168. विवद्वा+ वरिरष्ठ अति*वXा र्डॉ. राSीव *व+ कर्थी+ कर े हैं विक यद्यविप मौखिखक साक्ष्य में सातिक्षयों द्वारा यह कहा गया विक भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ मध्य गुम्बद क े +ीचे है विफर भी वास् व में बाहरी आँग+ क े दांयी रफ वित्र-गुम्बदीय भव+ क े बाहर Sो रामचबू रा है वहीं भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ है। वह मा+ े हैं विक 1885 में रघुवर दास द्वारा दायर वाद में Sो वि+र्ण:य पारिर विकया गया उसमें भी रामचबू रे को राम Sन्मस्र्थीा+ मा+ा गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

169. उपरोX उसिल्लखिख घर्ट+ाओं का यह क्रम से दर्भिश हो ा है विक विहन्दुओं की आस्र्थीा एवं विवश्वास यह र्थीी विक वित्र-गुम्बदीय ढ़ांचा भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ र्थीा Sहां पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया र्थीा। विब्रविर्टश काल में वि£ल वाली दीवार का वि+मा:र्ण कराया गया Sो मस्जिस्Sद क े दीवार वाले परिरसर को आन् रिरक और वाह्य आँग+ में बांर्ट ी र्थीी। लोहे की वि£ल वाली दीवार का वि+मा:र्ण विहन्दुओं को बाहरी आँग+ में वि£ल वाली लोहे की दीवार क े बाहर रख+े क े खिलए विकया गया र्थीा। लोहे क े दीवार क े वि+मा:र्ण क े दृविष्टग बाहरी आँग+ में स्जिस्र्थी राम चबू रे पर पूSा-अच:+ा प्रारम्भ हो गयी। उX चबू रे पर मंविदर ब+ा+े की अ+ुमति मांग े हुए 1885 में वाद दायर विकया गया Sहां पर विब्रविर्टश प्राति*कारिरयों +े पूSा की अ+ुमति प्रदा+ की र्थीी। अणिभलेख में मौSूद साक्ष्य में यर्थीा उसिल्लखिख विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास स्पष्ट रूप से स्र्थीाविप कर ी है विक विहन्दू विवश्वास कर े हैं विक भगवा+ राम क े Sन्मस्र्थीा+ पर मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया और वित्र-गुम्बदीय ढ़ांचा भगवा+ राम का Sन्मस्र्थीा+ है। यह थ्य विक लोहे की दीवार ब+ाकर, मस्जिस्Sद परिरसर को बाँर्टकर विहन्दुओं को वित्र-गुम्बदीय ढांचे से बाहर रख+े से यह +हीं कहा Sा सक ा है विक Sन्म स्र्थीा+ क े संबं* में विहन्दुओं की आस्र्थीा एवं विवश्वास में परिरव:+ हो Sाएगा। बाहरी आँग+ स्जिस्र्थी राम चबू रे पर Sो पूSा हो ी है वह भगवा+ राम की प्र ीकात्मक है र्थीा ऐसा मा+ा Sा ा है विक वह विक उ+का Sन्म परिरसर क े अन्दर हुआ र्थीा।

170. इस प्रकार वि+ष्कष: वि+कल ा है विक मस्जिस्Sद क े वि+मा:र्ण से पहले और उसक े बाद में विहन्दुओं की आस्र्थीा और विवश्वास हमेशा से यह रहा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है विक भगवा+ राम क े Sन्म स्र्थीा+ पर बाबरी मस्जिस्Sद का वि+मा:र्ण विकया गया है और यह आस्र्थीा और विवश्वास उपरोX उसिल्लखिख मौखिख और दस् ावेSी साक्ष्यों से सिसद्ध हो Sा ी है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रति वेद्य भार ीय सव च्च न्यायालय में सिसविवल अपीलीय अति कारिर ा सिसविवल अपील संख्या 10866-10867 वर्ष 2010 मौहम्मद सिसद्दकी (मृ क) द्वारा विवति क प्रति वि'ति.....अपीलक ा (गण) ब'ाम महन् सुरेश दास और अन्य आविद....प्रत्यर्थी1 (गण) सह सिसविवल अपील संख्या 4768-4771/2011, सिसविवल अपील सं. 2636/2011, सिसविवल अपील सं. 821/2011, सिसविवल अपील सं. 4739/2011, सिसविवल अपील सं. 4905-4908/2011, सिसविवल अपील सं. 2215/2011, सिसविवल अपील सं. 4740/2011, सिसविवल अपील सं. 2894/2011, सिसविवल अपील सं. 6965/2011, सिसविवल अपील सं. 4192/2011, सिसविवल अपील सं. 5498/2011, सिसविवल अपील सं. 7226/2011, सिसविवल अपील सं. 8096/2011, सिसविवल अपील सं. ________ वर्ष 2018 (@ डायरी सं. 22744/2017) वि'णय न्यायमूर्ति अशोक भूर्षण (स्वयं क े लिलए और मा''ीय मुख्य न्यायमूर्ति दीपक विमश्रा) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ये अपीलें विद'ांक 05.12.2017 को अन्तिन् म बहस क े लिलए वि'य र्थीीं जब अपीलक ागण (सिसविवल अपील संख्या 10866-10867 वर्ष 2010 और सिसविवल अपील सं. 2215 वर्ष 2011) क े लिलए पेश विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता डॉ राजीव व' 'े कहा विक डॉ एम. इस्माइल फारूखी और अन्य ब'ाम भार संघ और अन्य, (1994) 6 एससीसी 360 (इसक े पश्चा ् इस्माइल फारूखी क े वाद क े रूप में उसिHलिख ) में इस न्यायालय की संवै ावि'क पीठ क े वि'णय को पु'ः विवचारिर विकए जा'े की आवश्यक ा है, इसलिलए बड़ी पीठ को संदर्भिभ विकया जाए। डॉ व' क े उपरोक्त क का प्रत्यर्भिर्थीयों क े लिलए पेश विवद्वा' अति वक्ता द्वारा विवरो विकया गया। अभिभवच'ों की समाविS क े बाद जब मामले को पु'ः विद'ांक 14.03.2018 को रखा गया, हम'े इसे उतिच मा'ा विक हमें डॉ व' को इस प्रश्न पर सु''ा चाविहए विक क्या इस्माइल फारूखी क े वाद को पु'ः विवचारिर विकए जा'े की आवश्यक ा है।

2. हम'े सिसविवल अपील संख्या 4768-4771/2011 में अपीलार्भिर्थीयों क े लिलए विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता डॉ राजीव व' र्थीा प्रत्यर्भिर्थीयों क े लिलए विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता श्री क े. पारासर' र्थीा श्री सी. एस. वैद्य'ार्थी' को सु'ा। श्री ुर्षार मेह ा विवद्वा' अपर सालिलसिसटर ज'रल उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए। हम'े श्री पी. ए'. विमश्रा, श्री एस. क े. जै' और कई अन्य विवद्वा' अति वक्ताओं को भी सु'ा। विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता श्री राजू रामचन्द्र' 'े भी बड़ी पीठ को संदभ विकए जा'े क े समर्थी' में क[ को रखा। पक्षकारों क े विवद्वा' अति वक्ताओं 'े अप'े क[ क े 'ोट विदए है।

3. पक्षकारों क े विवद्वा' अति वक्ताओं क े क[ पर ध्या' दे'े से पहले, हमें ऐसे क ु छ थ्यों पर ध्या' दे'ा चाविहए सिज'क े आ ार पर इस्माइल फारूखी क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाद में संवै ावि'क पीठ 'े अप'ा वि'णय विदया। इ' अपीलो क े दालिखले को अग्रसरिर कर'े वाली घट'ाओं क े क्रम को भी ध्या' विदया जा'ा चाविहए। इस्माइल फारूखी क े वाद में संवै ावि'क पीठ 'े क े न्द्रीय सरकार द्वारा प्रकाभिश श्वे पत्र से क ु छ थ्यों को उद् ृ विकया है। वि'णय क े प्रस् र 5 और 6 में, संवै ावि'क पीठ 'े 'ोविटस विकयाः- “5. अध्याय I में श्वे पत्र क े प्रारम्भ में 'सिंसहावलोक'' इस प्रकार हैः “1.[1] भार क े उत्तर में न्तिस्र्थी अयोध्या उत्तर प्रदेश क े फ ै जाबाद सिजले में एक 'गर-क्षेत्र है। महाकाव्य रामायण में श्री राम जन्म स्र्थील क े रूप में इसका उHेख हो'े क े कारण यह लम्बे समय से पविवत्र ीर्थीस्र्थील रहा है। राम जन्म भूविम- बाबरी मन्तिस्जद क े रूप में सामान्य रूप से ज्ञा यह ढाँचा 1528 ईस्वी में अयोध्या में मीर बकी द्वारा मन्तिस्जद क े रूप में स्र्थीाविप विकया गया। क ु छ ाराओं (संप्रदायों) द्वारा यह दावा विकया जा ा है विक यह श्री राम की जन्म स्र्थील मा'े जा'े वाले स्र्थील पर ब'ाया गया जहाँ पहले से मन्तिन्दर र्थीा। सिजसक े परिरणामस्वरूप दीघकालिलक विववाद उत्पन्न हुआ। 1.[2] विदसंबर 1949 में विववाविद ढ़ाँचे में मूर्ति यों को रख'े से विववाद एक 'ये चरण में पहुँच गया। परिरसर को आपराति क प्रविक्रया संविह ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की ारा 145 क े अ ी' क ु क विकया गया। इसक े ुरं बाद दीवा'ी वाद दायर विकए गये। इ' दीवा'ों वादों में अन् रिरम आदेशों द्वारा पक्षकारों को मूर्ति याँ हटा'े या उ'की उपास'ा में हस् क्षेप कर'े से अवरूद्ध विकया गया। अ ः इसक े परिरणास्वरूप विदसम्बर 1949 से 6-12- 1992 क ढाँचे को मन्तिस्जद क े रूप में प्रयुक्त 'हीं विकया गया र्थीा।"

6. हालिलया वर्ष[ में विववाविद ढाँचा स्र्थील पर राम मंविदर वि'माण क े आंदोल' 'े गति पकड़ी जो एक बड़े विववाद का मामला और 'ाव का स्त्रो ब'ा। इस पर कई संति वा ाएँ हुई ं, सिज'का विववरण व मा' उद्देश्य क े लिलए बहु ान्तित्वक 'हीं है। हालांविक विववाद क े समा ा' क े लिलए विवश्व विहन्दू परिरर्षद (वीएचपी) और ऑल इन्तिpड़या बाबरी मन्तिस्जद एक्श' कमेटी (एआईबीएमएसी) सविह ये संति वा ाएँ असफल रहीं। जू' 1991 में भार ीय ज' ा पाट[1] (बीजेपी) की उत्तर प्रदेश में सरकार ब''े से मंविदर वि'माण की मुविहम में एक 'या आयाम जुड़ गया सिजस'े मंविदर क े वि'माण क े लिलए अप'ी प्रति बद्ध ा घोविर्ष की और कु छ कदम उठाये जैसे विक विववाविद संरच'ा से संलग्न भूविम का अति ग्रहण हालांविक विववाविद संरच'ा को अति ग्रहण से बाहर रखा गया। अक्टूबर 1991 से मंविदर वि'माण क े आंदोल' का क े न्द्र विबन्दु, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अति ग्रही भूविम पर कार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सेवा क े माध्यम से मन्तिन्दर वि'माण को शुरू कर'ा र्थीा हालांविक विववाविद संरच'ा को अक्षुpण (वैसा ही) ब'ाए रख'ा र्थीा। यह प्रयत्' सफल 'हीं हुआ और इस न्यायालय क े सार्थी-सार्थी उच्च न्यायालय में भी मुकदमेबाजी हुई। 6-12-1992 से कार सेवा को विफर से शुरू क े लिलए कहा गया और आयोजकों द्वारा की गयी घोर्षणा इस न्यायालय में लंविब कायवाविहयों में विदए गए आदेशों सविह न्यायालय क े आदेशों का उHंघ' विकए विब'ा प्र ीकात्मक कार सेवा क े लिलए र्थीी। अयोध्या में सामान्य न्तिस्र्थीति हो'ा दर्भिश कर'े वाली आरंभिभक रिरपोट[ क े बावजूद, 6-12-1992 को लगभग दोपहर क े समय बीजेपी, वीएचपी आविद क े 'े ाओं द्वारा संबोति भीड़, राम जन्म भूविम-बाबरी मन्तिस्जद ढाँचें पर चढ़ गयी और गुम्बदों को क्ष कर'ा शुरू कर विदया। र्थीोड़े ही समय में संपूण ढाँचें को ढहा विदया गया और जमींदोज कर विदया गया। वास् व में यह "राष्ट्रीय शर्मिंमदगी" का एक काय र्थीा। जो ढहाया गया, वह मात्र एक प्राची' इमार 'हीं र्थीी, बन्तिuक न्याय क े अर्थी में और बहुसंख्यकों क े न्यायपूण व्यवहार में अuपसंख्यकों की आस्र्थीा र्थीी। इस'े विवति क े शास' में और संवै ावि'क व्यवस्र्थीा में उ'की आस्र्थीा को चोट पहुँचायी। एक पाँच-हजार-वर्ष पुरा'ा ढाँचा जो अरतिक्ष र्थीा और सिजसकी सुरक्षा कर'ा राज्य सरकार क े हार्थीों में एक पविवत्र विवश्वास र्थीा, उसे ढहा विदया गया।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

4. संवै ावि'क पीठ 'े वर्ष 1950 में दायर विकए गए वादों और उसक े बाद जो वाद वर्ष 1989 में सु'े जा'े क े लिलए पूण रूप से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अन् रिर कर विदए गए र्थीे, ऐसे वादों क े विववरण का अवलोक' विकया है। वि'णय क े प्रस् र 9 में, वि'म्'लिललिख संप्रेतिक्ष विकया गया हैः- “9. अब इस संबं में क ु छ वादों का संतिक्षS संदभ विकया जा'ा चाविहए। 1950 में क ु छ विहन्दूओं द्वारा दो वाद दायर विकए गए र्थीे, ज'वरी 1950 में इ' वादों में से एक में विवचारण न्यायालय 'े अं रिरम आदेश पारिर विकए सिजसक े ह मूर्ति यों को उसी स्र्थीा' पर रह'े विदया गया जहाँ वे विदसंबर 1949 में रखी गयी र्थीी और विहन्दूओं द्वारा उ'की पूजा को जारी रखा गया। अप्रैल 1955 में उच्च न्यायालय द्वारा अं रिरम आदेश को संपुष्ट कर विदया गया। विद'ांक 1-2-1986 को सिजला न्याया ीश 'े विववाविद संरच'ा में पविवत्र स्र्थील क े गभ -ग्रह की ओर जा'े वाले विग्रल पर लगे ाले को खोल'े का आदेश विदया और विहन्दू भक्तों द्वारा पूजा कर'े की अ'ुमति दी। 1959 में वि'म ही अखाड़ा द्वारा विववाविद संरच'ा क े हक का दावा कर े हुए एक अन्य वाद दायर विकया गया। 1981 में सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोड द्वारा विववाविद सरंच'ा क े हक का दावा कर े हुए एक अन्य वाद दायर विकया गया। 1989 में देवकी 'न्द' अग्रवाल द्वारा देव ा क े वाद विमत्र क े रूप में, विववाविद संरच'ा क े संबं में एक स्वत्व वाद दायर विकया गया। 1989 में पूवाक्त उसिHलिख वादों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अन् रिर कर विदया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और सभी को एक सार्थी सु'े जा'े का आदेश विदया गया। विद'ांक 14-8-1989 को उच्च न्यायालय 'े विववाविद संरच'ा क े संबं में यर्थीा-न्तिस्र्थीति रख'े का आदेश विदया (श्वे पत्र का परिरभिशष्ट-I)। जैसा विक पहले उसिHलिख है, श्वे पत्र क े प्रस् र 1.[2] में यहा कहा गया है विकः “… इ' सिसविवल वादों क े अन् रिरम आदेशों में पक्षकारों को मूर्ति यों को हटा'े या उ'क े उपास'ा में हस् क्षेप कर'े से अवरूद्ध विकया गया। इस प्रकार, फलस्वरूप विदसंबर 1949 से विद'ांक 6-12-1992 क इमार को मन्तिस्जद क े रूप में प्रयुक्त 'हीं विकया गया र्थीा।"

5. अयोध्या में इ' घट'ाओं क े परिरणामस्वरूप, विद'ांक 06.12.1992 को भार क े राष्ट्रपति 'े भार ीय संविव ा' क े अ'ुच्छेद 356 क े ह एक उद्घोर्षणा जारी की सिजसमें उत्तर प्रदेश विव ा' सभा को भंग कर े हुए उत्तर प्रदेश सरकार क े सभी काय[ को स्वंय ग्रहण विकया। अयोध्या में इ' घट'ाओं क े परिरणामस्वरूप, विद'ांक 06.02.1992 को क े न्द्र सरकार 'े इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंविब वादों में विववादग्रस् सभी क्षेत्रों को अति गृही कर'े का फ ै सला विकया। उपयुक्त आसन्न क्षेत्र का अति गृहण कर'े का भी फ ै सला विकया गया, सिजसे क्रमशः राम मंविदर और मन्तिस्जद क े वि'माण क े लिलए दो न्यासों को उपलब् कराया जाएगा। भार सरकार 'े राष्ट्रपति से यह अ'ुरो कर'े का भी फ ै सला विकया है विक वह इस प्रश्न पर उच्च म न्यायालय की राय माँगे विक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क्या जहाँ विववाविद ढाँचा है उस स्र्थील पर विहन्दू मन्तिन्दर र्थीा। राम जन्म भूविम- बाबरी मन्तिस्जद परिरसर में 67.703 एकड़ भूविम क े अति गृहण क े लिलए "अयोध्या में क ु छ क्षेत्रों का अति गृहण अध्यादेश " 'ामक एक अध्यादेश विद'ांक 07.01.1993 को जारी विकया गया। उसी विद' अर्थीा ् 07.01.1993 को संविव ा' क े अ'ुच्छेद 143 क े ह सुप्रीम कोट को एक संदभ भी विकया गया। अध्यादेश संख्या 8 वर्ष 1993 को अयोध्या में क ु छ क्षेत्रों का अति गृहण अति वि'यम 1993 (1993 का संख्यांक 33) (इसक े पश्चा ् "अति वि'यम 1993” क े रूप में संदर्भिभ ) द्वारा प्रति स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। 1993 क े अति वि'यम संख्यांक 33 की वै ा को चु'ौ ी दे े हुए इस न्यायालय में अ'ुच्छेद 32 क े ह एक रिरट यातिचका दायर की गयी। अति वि'यम 1993 क े क ु छ पहलुओं को चु'ौ ी दे े हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी कई रिरट यातिचकाएँ दायर की गयी। इस न्यायालय 'े अ'ुच्छेद 139A क े ह अप'ी अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए रिरट यातिचकाओं को अन् रिर कर विदया र्थीा जो उच्च न्यायालय में लंविब र्थीीं। अ'ुच्छेद 32 क े ह रिरट यातिचकाएँ, इलाहाबाद उच्च न्यायालय से अन् रिर मामले सार्थी ही अ'ुच्छेद 143 क े ह राष्ट्रपति द्वारा विकया गया संदभ संख्या 1 वर्ष 1993, सभी को एक सार्थी सु'ा गया और विद'ांक 24.10.1994 क े एक सामान्य वि'णय द्वारा वि'ण[1] विकया गया सिजसमें संवै ावि'क पीठ 'े 1993 क े अति वि'यम की ारा 4(3) को अभिभखन्तिpड़ कर'े क े सिसवाय संपूण अति वि'यम की वै ा को बरकरार रखा र्थीा।

6. उपरोक्त संवै ावि'क पीठ में इस न्यायालय क े वि'णय क े बाद, सभी वादों को, जो उच्च न्यायालय की पूण पीठ द्वारा सु'े जा'े क े लिलए उच्च न्यायालय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द्वारा अं रिर विकए गए र्थीे, उन्हें पु'ज1विव मा'ा गया। मौहम्मद असलम जो इस्माइल फारूकी क े वाद में संवै ावि'क पीठ क े वि'णय में भी यातिचकाक ाओं में से एक र्थीा, उस'े 1993 क े अति वि'यम क े ह अति गृही 67.703 एकड़ भूविम क े संबं में क ु छ अ'ु ोर्ष मांग े हुए एक रिरट यातिचका दायर की। विद'ांक 13.03.2002 को इस न्यायालय 'े एक अं रिरम आदेश पारिर विकया। अं रिरम आदेश क े प्रस् र 4 और 5 इस प्रकार हैं:- “4. इसी बीच, हम वि'दzश दे े हैं विक अयोध्या में कु छ क्षेत्रों का अति गृहण अति वि'यम, 1993 की अ'ुसूची में उसिHलिख विवभिभन्न भूविमखpड़ों में न्तिस्र्थी अति गृही भूविम क े 67.703 एकड़ पर, जो क े न्द्र सरकार में वि'विह है, उस पर विकसी क े भी द्वारा विकसी प्रकार की या ो प्र ीकात्मक या वास् विवक सिजसमें भूविम पूजा या भिशला पूजा भी शाविमल है, कोई ार्मिमक विक्रयाकलाप कर'े की अ'ुमति 'हीं दी जायेगी और ' हीं हो'े दी जायेगी।

5. इसक े अलावा, पूव क्त भूविम का कोई भाग क े न्द्र सरकार द्वारा विकसी को भी सौंपा 'हीं जाएगा और इस रिरट यातिचका क े वि'स् ारिर हो'े क सरकार द्वारा इसे रखा जाएगा और ' ो इस भूविम का कोई भाग विकसी ार्मिमक उद्देश्य क े लिलए या इस संबं में आति पत्य में रख'े की अ'ुमति दी जायेगी या प्रयुक्त की जायेगी।"

7. विद'ांक 31.03.2003 को उपरोक्त रिरट यातिचकाएँ, संवै ावि'क पीठ द्वारा अन् ः वि'ण[1] कर दी गयी, सिजसका वि'णय (2003) 4 एससीसी 1, मौहम्मद असलम उफ भूरे ब'ाम भार संघ और अन्य में प्रति वेविद है। संवै ावि'क mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पीठ क े समक्ष दो'ों पक्षकारों द्वारा इस्माइल फारूकी क े वाद पर अवलम्ब लिलया गया र्थीा। इस न्यायालय 'े रिरट यातिचका को यह वि'दzश दे े हुए वि'स् ारिर विकया विक इस न्यायालय का आदेश विद'ांविक 13.03.2002 जैसा विक विद'ांक 14.03.2002 को संसोति है, ब क कायशील रहेगा जब क उच्च न्यायालय, इलाहाबाद वादों को वि'स् ारिर 'हीं कर दे ा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय 'े सभी वादों को गुणावगुण पर सु'कर अप'े वि'णय विद'ांविक 30.08.2010 द्वारा सभी वादों को वि'ण[1] विकया। मूल वादों में वादीगण और प्रति वादीगण दो'ों व्यभिर्थी पक्षकारों 'े इस न्यायालय में ये अपील दायर की हैं।

8. डॉ राजीव व' 'े कहा विक इस्माइल फारूखी क े वाद में विटप्पभिणयाँ की गयीं र्थीी विक मन्तिस्जद इस्लाम म की प्रर्थीा का एक अवि'वाय भाग 'हीं है और मुन्तिस्लमों द्वारा कहीं भी 'माज अदा की जा सक ी है, यहाँ क विक खुले में भी 'माज अदा की जा सक ी है। संवै ावि'क पीठ द्वारा की गयी विटप्पभिणयों 'े अपील में वि'णयों को प्रभाविव विकया है, मन्तिस्जद में 'माज अदा कर'ा एक अवि'वाय प्रर्थीा ' हो'े क े संबं में इस्माइल फारूखी में प्रति पाविद विवति, अवि'वाय प्रर्थीा से संबंति विवति और सिजस प्रविक्रया द्वारा अवि'वाय प्रर्थीा पर विवचार विकया जा'ा है, दो'ो क े विवपरी है। क्या अवि'वाय प्रर्थीा को न्यायालय क े मात्र 'ासाविब दावे पर य विकया जा सक ा है या क्या न्यायालय आस्र्थीा, मान्य ाओं और प्रर्थीाओं का परीक्षण कर'े क े लिलए विववश है, यह विवशुद्ध रूप से विवति का प्रश्न है। इस्माइल फारूखी वाद क े वि'णय में उपरोक्त मुद्दों का परीक्षण ' हो'े क े कारण, मामला बड़ी पीठ को भेजा जा'ा चाविहए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

9. डॉ व' 'े इस्माइल फारूखी वाद क े वि'णय क े प्रस् र 78 और 82 को विववि'र्मिदष्ट रूप से संदर्भिभ विकया। उन्हो'ें प्रस् र 78 में वि'म्'लिललिख विटप्पभिणयों पर विवभिशष्ट रूप से आक्षेप विकयाः- “78. यद्यविप प्रार्थी'ा या पूजा कर'ा एक ार्मिमक प्रर्थीा है, उस प्रत्येक स्र्थीा' पर प्रार्थी'ा कर'ा, जहाँ ऐसी प्रार्थी'ाएँ की जा सक ी है, ऐसी ार्मिमक प्रर्थीा का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब क 'हीं होगा जब क विक वह स्र्थीा' उस म क े लिलए एक विवशेर्ष महत्व ' रख ा हो ाविक वह उस म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग का ब' जाये। विकसी भी म क े उपास'ा स्र्थील, जो उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व क े हों, को म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए एक भिभन्न आ ार पर न्तिस्र्थी हो े हैं और इसक े सार्थी भिभन्न रीक े से और अति क श्रद्धापूण रीक े से व्यवहार विकया जा'ा चाविहए।"

10. प्रस् र 82 में वि'म्'लिललिख विटप्पणी पर विवभिशष्ट रूप से आक्षेप विकया गया हैः- "मन्तिस्जद इस्लाम म की प्रर्थीा का एक अवि'वाय अंग 'हीं है और मुन्तिस्लमों द्वारा 'माज कहीं पर भी अदा की जा सक ी है यहाँ क विक खुले में भी 'माज अदा की जा सक ी है।"

11. उन्हों'े कहा विक म की अवि'वाय प्रर्थीा का एक विवस् ृ परीक्षण कर'े की आवश्यक ा हो ी है। उन्हो'ें अप'े इस क का समर्थी' कर'े क े लिलए इस न्यायालय क े विवभिभन्न वि'णयों का संदभ विदया है, विक जहाँ भी इस न्यायालय को म की अवि'वाय प्रर्थीा का वि' ारण कर'ा र्थीा, वहाँ विवस् ृ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परीक्षण विकया गया। उन्हो'ें कहा विक इस्माइल फारूखी का वाद ' ो विकसी सामग्री को संदर्भिभ कर ा है और ' ही प्रस् र 78 और 82 में विटप्पणी कर'े से पहले कोई विवस् ृ परीक्षण कर ा है जैसा विक उपरोक्त उसिHलिख है। डॉ व' 'े आगे कहा विक कविमश्नर, विहन्दू रिरलिलसिजयस इंडाउमेन्ट, मद्रास ब'ाम श्री लक्ष्मीन्द्र ीर्थी स्वाविमअर ऑफ श्री भिशरूर मठ, 1954 एससीआर 1005 में सा न्याया ीशों की पीठ द्वारा प्रति पाविद अवि'वाय ा क े एक व्यापक मा'क को कम संख्या बल वाले बाद क े एक वि'णय द्वारा अभिभखन्तिpड़ 'हीं विकया जा सक ा, सिजसक े द्वारा वि'णयों से अखpड़ ा का परीक्षण लाया गया है। उन्हो'ें कहा विक अखpड़ ा का परीक्षण आवश्यक परीक्षण क े सार्थी अं ःपरिरव 'ीय है। अप'े क[ क े दौरा', डॉ व' 'े उच्च न्यायालय क े समक्ष विवभिभन्न पक्षकारों द्वारा विकए गए क[ को हमारे समक्ष प्रस् ु विकया है, जहाँ पर इस्माइल फारूखी क े वाद का अवलम्ब लिलया गया र्थीा। उन्हो'ें इ' अपीलों में लिलए गए विवभिभन्न आ ारों को भी संदर्भिभ विकया है, ये आ ार इस्माइल फारूखी क े वाद क े वि'णय पर अवलंविब है। उन्हो'ें कहा विक उपरोक्त विदए गए क इस्माइल फारूखी क े वाद क े पु'र्मिवचारण क े लिलए अपीलार्भिर्थीयों की प्रार्थी'ा क े लिलए पयाS आ ार दे े हैं। डॉ व' 'े 'बड़ी पीठ को संदभ क े लिलए' अप'े 'ोट में स्पष्ट विकया है विक प्रश्नग पहलू, जैसा विक उपरोक्त उसिHलिख है, इस्माइल फारूखी क े वाद क े वि'णया ार 'हीं हैं। डॉ व' 'े कहा विक इस्माइल फारूखी क े वाद में वि'णया ार को वि'म्'लिललिख प्रभाव क े रूप में अभिभव्यक्त विकया जा सक ा हैः- (i) वाद अप'ी संपूण ा में पु'ज1विव हो े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) अज' विवति ः सक्षम र्थीा, जो संविव ा' की सा वीं अ'ुसूची क े सूची III और प्रविवविष्ट 42 से उद्भू है। (iii) शब्द 'वि'विह ' क े कई अर्थी हैं और विववतिक्ष है विक क े न्द्रीय सरकार की प्रान्तिस्र्थीति वै ावि'क रिरसीवर की र्थीी जो अस्वीकार विकए गए संदभ क े बजाय, वादों में वि'णय क े अ'ुसरण में भूविम को (अन्य अति ग्रही क्षेत्र सविह ) विव रिर करेगा। (iv) अति वि'यम की ारा 7(2) क े अ'ुसार यर्थीान्तिस्र्थीति को ब'ाए रखा जाएगा, जो 1949 से ुल'ात्मक उपयोगक ा क े आ ार पर उतिच हो। (v) पंर्थीवि'रपेक्ष ा समा' ा का एक पहलू है और सभी म[ को उ'क े अ'ुसार समा' व्यवहार कर'े और समा' आदर दे'े और सभी क े सार्थी समा' ा रख'े को प्रदर्भिश कर ा है।

12. विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता श्री क े परासर' 'े डॉ व' क े क[ का खpड़' कर े हुए कहा विक इस्माइल फारूखी क े वाद में वि'णय क े पु'र्मिवचारण क े लिलए प्रार्थी'ा, अपीलार्थी1गण की ओर से पोर्षणीय 'हीं है। उन्हो'ें कहा विक वे जो इस्माइल फारूखी क े वाद में कायवाविहयों क े ईओ 'ॉविम'ी (विकसी क े अ ी') पक्षकार र्थीे, सिजन्हो'ें सावजवि'क अति कार क े संबं में अर्थीा ् मुन्तिस्लम समुदाय क े अति कार क े संबं में सद्भाव'ापूवक वाद चलाया, ऐसे अति कार में विह बद्ध सभी व्यविक्त सिसविवल प्रविक्रया संविह ा की ारा 11 क े उद्देश्य क े लिलए ऐसे मुकदमेबाजी कर'े वाले व्यविक्तयों क े अ ी' दावा कर'े वाले मा'े जाएँगें और सिसविवल प्रविक्रया संविह ा की ारा 11 क े स्पष्टीकरण क े दृविष्टग पूव न्याय द्वारा वर्जिज हैं। उन्हो'ें कहा विक मुन्तिस्लम समुदाय क े विह mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का इस्माइल फारूखी क े वाद में इस न्यायालय क े समक्ष पयाS रूप से प्रति वि'ति त्व विकया गया र्थीा। उन्हो'ें आगे कहा विक इस्माइल फारूखी क े वाद में विदया गया वि'णय ईओ 'ॉविम'ी (विकसी क े 'ाम से/अ ी' कर'े वाले) पर बाध्यकारी है। यहाँ क विक पूव न्याय क े प्रश्न क े अलावा, प्रति वि'ति त्व का सिसद्धान् उ' पर बाध्यकारी है सिज'क े विह ईओ-'ॉविम'ी की रह ही राम जन्म भूविम-बाबरी मन्तिस्जद की विबर्षय वस् ु में समा' हैं। उन्हो'ें कहा विक अपीलार्थी1गण प्रति वि'ति त्व क े सिसद्धां क े आ ार पर उक्त वि'णय क े पु'र्मिवचारण की प्रार्थी'ा कर'े क े लिलए हकदार 'हीं हैं। श्री परासर' 'े कहा विक इस्माइल फारूखी क े वाद में विदए गए वि'णय का पु'र्मिवचारण कर'ा वि'रर्थीक ा का अभ्यास कर'ा होगा क्योंविक उसमें विदया गया वि'णय व मा' अपीलार्भिर्थीयों पर बाध्यकारी है। स्वीकार विकए विब'ा यह मा''ा विक बड़ी पीठ को आगे संदभ कर'े से इस्माइल फारूखी का वाद अभिभखन्तिpड़ हो जा ा है, विफर भी, जहाँ क "अयोध्या जन्मस्र्थीा' बाबरी मन्तिस्जद" का संबं हैं, इस्माइल फारूखी क े वाद में विदया गया वि'णय अन्तिन् म ा क े सिसद्धां क े आ ार पर अपीलार्भिर्थीयों पर अभी भी बाध्यकारी होगा। उन्हो'ें कहा विक व मा' वाद में विदए गए क इस्माइल फारूखी क े वाद में विदए गए क[ की पु'ःदलील र्थीी जैसे विक यह उक्त वि'णय की शुद्ध ा को जाँच कर उक्त वि'णय क े विवरुद्ध अपील र्थीी। उन्हो'ें आगे कहा विक वि'णय पक्षकारों पर बाध्यकारी हो'े क े अलावा, संविव ा' क े अ'ुच्छेद 141 क े ह विवति की घोर्षणा क े रूप में कायशील है।

13. श्री परासर' 'े आगे कहा विक इस्माइल फारूखी क े वाद में यह अवलोक' विक मन्तिस्जद इस्लाम की प्रर्थीा का अवि'वाय अंग 'हीं है, इसे 1993 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े अति वि'यम क े ह वादग्रस् संपलित्त क े अज' की वै ा क े संदभ में पढ़ा जा'ा चाविहए। उन्हो'ें कहा विक इस न्यायालय 'े यह अव ारिर 'हीं विकया है विक मुन्तिस्लमों द्वारा 'माज अदा कर'ा एक अवि'वाय ार्मिमक प्रर्थीा 'हीं है। उस'े क े वल यह अव ारिर विकया विक प्रत्येक विवद्यमा' मन्तिस्जद में 'माज अदा कर'े का अति कार एक अवि'वाय ार्मिमक प्रर्थीा 'हीं है। लेविक' यविद विकसी म का कोई उपास'ा स्र्थील उस म में एक विवशेर्ष महत्व रख ा है, ो यह म का अवि'वाय या अभिभन्न अंग हो'े क े लिलए पयाS है, और यह एक अलग अवन्तिस्र्थीति (पायदा') पर होगा र्थीा इसक े सार्थी अलग और अति क श्रद्धापूण ढ़ंग से व्यवहार कर'ा होगा। श्री परासर' 'े सादर कहा विक इस न्यायालय क े क का जोर संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह म की स्व ंत्र ा क े रूप में समझा जा'ा चाविहए ाविक एक मवि'रपेक्ष लोक ंत्र में राज्य की अं र्मि'विह संप्रभु ा शविक्त क े संदभ में विवभिशष्ट अति कार क्षेत्र में संपलित्त का अवि'वाय अति ग्रहण हो सक े ।

14. श्री परासर' 'े आगे कहा विक अ'ुच्छेद 25 क े ह मुन्तिस्लम समुदाय का 'माज अदा कर'े का मूल अति कार प्रभाविव 'हीं हो ा है क्योंविक बाबरी मन्तिस्जद उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख'े वाला मन्तिस्जद 'हीं र्थीा। 'माज अदा कर'े की प्रर्थीा मुन्तिस्लम म का एक अवि'वाय भाग है और इसलिलए यह अयोध्या क े विकसी भी मन्तिस्जद में अदा की जा सक ी है। एक ीर्थीस्र्थील क े रूप में अयोध्या का विहन्दूओं क े लिलए एक विवशेर्ष महत्व है क्योंविक यह प्राची' मान्य ा है विक वहाँ भगवा' राम का जन्म हुआ र्थीा। उन्हो'ें आगे कहा विक अति ग्रहण का दो'ो समुदायों क े अति कारों और विह ों पर समा' रूप से प्रभाव है। अप'े क[ क े दौरा', श्री परासर' 'े संदभ विकए जा'े क े पक्ष में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अप'े क[ का समर्थी' कर'े क े लिलए अपीलार्भिर्थीयों द्वारा अवलम्ब लिलए गए वादों में अं र समझा'े का प्रयास विकया है।

15. श्री सी. एस. वैद्य'ार्थी' 'े क विदया है विक व मा' मामला ऐसा मामला 'हीं है जहाँ इस्माइल फारूखी क े वाद क े वि'णय को बड़ी पीठ को संदर्भिभ विकए जा'े की आवश्यक ा हो। उन्हो'ें श्री परासर' द्वारा विदए गए क[ का ही अ'ुसरण विकया है।

16. विवद्वा' अपर सॉलिलसिसटर ज'रल, श्री ुर्षार मेह ा 'े कहा विक इस्माइल फारूखी क े वाद में इस न्यायालय का संवै ावि'क पीठ का वि'णय एक सही विवति है, सिजसको बड़ी पीठ को संदर्भिभ करक े छेड़ा 'हीं जा'ा चाविहए। श्री मेह ा 'े आगे कहा विक बड़ी पीठ को संदर्भिभ कर'े क े लिलए अपीलार्भिर्थीयों की प्रार्थी'ा को अत्यति क विवलम्ब क े आ ार पर अस्वीकार विकया जा'ा चाविहए। उन्हो'ें कहा विक वि'णय 1994 में विदया गया र्थीा। मौहम्मद असलम क े वाद, (2003) 4 एससीसी 1 में वि'णय विवचारण क े लिलए आया जहाँ दो'ों पक्षकारों 'ें वि'णयों पर अवलम्ब लिलया है। अगर कोई वास् विवक आ ार र्थीा, ो उसी समय संदभ क े लिलए अ'ुरो विकया जा'ा चाविहए र्थीा। उन्हो'ें आगे कहा विक अ'ुरो सद्भाव'ापूवक 'हीं है और कायवाविहयों को विवलम्ब कर'े क े आशय से विकया गया है। विवद्वा' अपर सॉलिलसिसटर ज'रल श्री ुर्षार मेह ा 'े उ'क े क[ को दोहराया है विक जहाँ क दो'ों रफ क े पक्षकारों क े गुणावगुणों का संबं है, उत्तर प्रदेश राज्य वि'ष्पक्ष है।

17. प्रत्यर्भिर्थीयों में से एक की ओर से पेश विवद्वा' अति वक्ता, श्री परमेश्वर 'ार्थी विमश्रा 'े कहा विक इस्लाम की प्रर्थीा क े लिलए विवश्व क े सभी मन्तिस्जद अवि'वाय 'हीं हैं। अप'े क[ क े दौरा' उन्हो'ें इस्लाम म क े विवभिभन्न ग्रन्र्थीों, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कलाक ृ ति यों को संदर्भिभ विकया। उन्हो'ें आगे कहा विक अल -मन्तिस्जद, अल- हराम अर्थीा ् मक्का में न्तिस्र्थी काबा इस कारण से एक विवशेर्ष महत्व का मन्तिस्जद है विक क ु रा' में काबा की ओर मुँह करक े 'माज अदा कर'े क े लिलए और काबा में हज क े सार्थी-सार्थी उमरा कर'े क े लिलए आदेभिश विकया गया है सिजसक े विब'ा इस्लाम म को पाल' कर'े का अति कार बो गम्य 'हीं है। दो अन्य मन्तिस्जदों अर्थीा ्, अल-मन्तिस्जद अल-अक्सा यावि' यरुशलम में बै ुल मुक़द्दस और मदी'ा में 'बी क े अल-मन्तिस्जद का भी विवशेर्ष महत्व है क्योंविक काबा क े अलावा, इ' दो'ों मन्तिस्जद की यात्रा को भी पविवत्र हदीस द्वारा आदेभिश विकया गया है। श्री विमश्रा 'े अप'े क[ में विवभिभन्न ग्रन्र्थीों और कलाक ृ ति यों को संदर्भिभ विकया है और अवलम्ब' लिलया है। उन्हो'ें पविवत्र क ु रा' और हदीस की आय ों को संदर्भिभ विकया है, जो इस्लाम म, इसकी मान्य ाओं, सिसद्धां ों, रीति यों और प्रर्थीाओं का मुख्य स्त्रो हैं।

18. वि'म ही अखाड़ा की ओर से पेश विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता, श्री एस. क े. जै' 'े भी डॉ व' क े इस क का खpड़' विकया है विक इस्माइल फारूखी क े वाद को बड़ी पीठ को संदर्भिभ विकए जा'े की आवश्यक ा है।

19. डॉ राजीव व' 'े जवाब दावे में अप'ी दलीलों में श्री परासर' क े इस क का खpड़' विकया विक पूव न्याय का सिसद्धां व मा' मामलें में लागू हो ा है। उन्हो'ें कहा विक इस्माइल फारूखी का वाद अति वि'यम, 1993 और राष्ट्रपति संदभ को चु'ौ ी दे'े क े बारे में र्थीा र्थीा इस प्रश्न पर र्थीा विक क्या अति वि'यम, 1993 क े आलोक में अति वि'यम, 1993 की ारा 4(3) क े कारण मुकदमें उपशविम हो गये। इ' अपीलों क े ह वाद, उ' मुकदमों से आये हैं, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जहाँ वाद विबन्दु पूरी रह भिभन्न र्थीे। उन्हो'ें कहा विक विकसी मामले को पूव न्याय हो'े क े लिलए वि'म्' श ‡ को पूरा कर'ा होगा, अर्थीा ्ः-

1. मामला प्रत्यक्ष ः और सार ः उत्तरव 1 वाद में विववाद्यक हो या विववाद्यक समा' मामले हो'े चाविहए जो पूवव 1 वाद में प्रत्यक्ष ः और सार ः विववाद्यक र्थीे;

2. पूवव 1 वाद समा' पक्षकारों क े बीच या सिज'क े अ ी' वे या उ'में से कोई दावा कर ा है, उ'क े बीच रहा हो'ा चाविहए;

3. पूवव 1 वाद में समा' हक क े अ ी' पक्षकारों 'े मुकदमेबाजी की हो।

4. सिजस न्यायालय 'े पूवव 1 वाद वि'ण[1] विकया हो, उसे पश्चा ्व 1 वाद क े विवचारण क े लिलए या उस वाद में सिजसमें ऐसा विववाद्यक पश्चा व 1 उठाया गया हो, क े विवचारण क े लिलए सक्षम हो'ा चाविहए;

5. पश्चा ्व 1 वाद में प्रत्यक्ष ः और सार ः विववाद्य विवर्षय, पूवव 1 वाद में न्यायालय द्वारा सु'ा गया हो और अन्तिन् म रूप से विववि'श्च कर विदया गया हो। आगे स्पष्टीकरण I दर्भिश कर ा है विक यह उस ति भिर्थी को 'हीं हो ा सिजस ति भिर्थी पर वाद दायर विकया जा ा है बन्तिuक उस ति भिर्थी पर हो ा है जब वाद वि'ण[1] कर विदया जा ा है भले ही वह मुकदमा बाद में दायर र्थीा, यह पूवव 1 वाद होगा यविद यह पहले ही वि'ण[1] कर विदया गया है। इसलिलए इस क्रम में उच्च न्यायालय द्वारा खारिरज की गयी पूव र दो अपीलों में विदया गया वि'णय पूव न्याय क े रूप में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA काय करेगा, यह देख'ा होगा विक क्या उपरोक्त उसिHलिख सभी पाँच श ‡ पूरी हो रही हैं।

20. उन्हो'ें कहा विक वह मामला जो वादों में प्रत्यक्ष ः व सार ः विववाद्यक र्थीा, वह उ' विववाद्यकों से पूरी रह अलग है, सिज' पर इस्माइल फारूखी क े वाद में विवचार विकया गया र्थीा। उ'का क है विक इस्माइल फारूखी का वाद अति वि'यम, 1993 और राष्ट्रपति संदभ से संबंति र्थीा। उन्हो'ें आगे कहा विक मन्तिस्जद की अवि'वाय ा का मुद्दा सामान्य ः न्यायालय क े समक्ष 'हीं र्थीा और यह क े वल वि'णय में उभर कर आया। उन्हो'ें आगे कहा विक विवति क े विवशुद्ध प्रश्न पूव न्याय 'हीं हैं। न्यायालय का 'ासाविब कर्थी' विक कोई चीज अवि'वाय प्रर्थीा है या 'हीं, यह विवति क े विवपरी है। उन्हो'ें आगे कहा संवै ावि'क पीठ में वादों को अन् रिर 'हीं विकया गया र्थीा बन्तिuक उस रिरट यातिचका को अन् रिर विकया गया र्थीा जो उच्च न्यायालय में अति वि'यम, 1993 को चु'ौ ी दे'े हुए दायर की गयी र्थीी। उच्च म न्यायालय में इस्माइल फारूखी वाद क े सार्थी सु'वाई क े लिलए इ' वादों को अन् रिर 'हीं विकया गया र्थीा, इस्माइल फारूखी क े वाद में विदया गया वि'णय इ' वादों में वि'णय हो'ा 'हीं कहा जा सक ा। अवि'वाय प्रर्थीा का गठ' विकससे हो ा है और इसे क ै से स्र्थीाविप विकया जा'ा है, यह विवति का एक विवशुद्ध प्रश्न है और पूव न्याय क े लिलए उत्तरदायी 'हीं है। अवि'वाय प्रर्थीाओं क े परीक्षण का वि' ारण और प्रयोज्य ा से संबंति विवति की जाँच कर'ा इस न्यायालय क े लिलए खुला है। मन्तिस्जद में 'माज अदा कर'े की अवि'वाय 'हीं हो'े का अवलोक' या विवशेर्ष महत्व या ुल'ात्मक महत्व की अव ारणा विब'ा विकसी आ ार की हैं। श्री ुर्षार मेह ा की दलीलों का उत्तर दे े हुए डॉ व' 'े कहा विक राज्य 'े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व मा' कायवाही में गैर- टस्र्थी रुख 'हीं अप'ाया है। उन्हो'ें कहा विक इस्माइल फारूखी क े वि'णय को पु'र्मिवचारिर विकए जा'े की प्रार्थी'ा में अपीलार्भिर्थीयों की ओर कोई से कोई विवलम्ब 'हीं है। उन्हो'ें कहा विक उच्च न्यायालय का आक्षेविप वि'णय इस्माइल फारूखी में विदए गए अवलोक'ों से प्रभाविव है। उन्हो'ें कहा विक श्री ुर्षार मेह ा की ये दलीलें विक प्रार्थी'ा सद्भाव'ापूवक 'हीं की गयी है और क े वल कायवाविहयों को विवलन्तिम्ब कर'े क े लिलए की गयी है, गल हैं और इसे अस्वीकार विकया जा'ा चाविहए। डॉ व' 'े अप'े इस क का समर्थी' कर'े क े लिलए उच्च न्यायालय क े वि'णय में विदए गए विवभिभन्न अवलोक'ों को भी संदर्भिभ विकया है विक इस्माइल फारूखी वाद क े वि'णय 'े उच्च न्यायालय क े वि'णय को प्रभाविव विकया है। उन्हो'ें आगे पक्षकारों क े विवद्वा' अति वक्ताओं द्वारा विदए गए विवभिभन्न क[ को भी संदर्भिभ विकया है सिजसमें उच्च न्यायालय क े समक्ष इस्माइल फारूखी क े वाद क े वि'णय पर अवलम्ब लिलया गया है। उन्हो'ें आगे कहा विक इ' अपीलों में भी विवभिभन्न विवद्वा' अति वक्तों द्वारा इस्माइल फारूखी वाद पर अवलम्ब ले े हुए कई आ ार लिलए गए हैं।

21. पक्षकारों क े विवद्वा' अति क्ता 'े इस न्यायालय क े कई वि'णयों को उसिHलिख विकया है और उ' पर अवलम्ब लिलया है, सिजन्हें विवस् ृ में दलीलों पर विवचार कर े समय संदर्भिभ विकया जाएगा।

22. पक्षकारों क े विवद्वा' अति वक्ता द्वारा विदए गए क[ पर आ'े से पहले न्यायालय क े वि'णय में स्र्थीाविप विकए गए कु छ सिसद्धां ों का उHेख कर'ा सुसंग है। व मा' मामले में क े न्द्र विबन्दु, डॉ एम. इस्माइल फारूखी व अन्य ब'ाम भार संघ व अन्य (1994) 6 एससीसी 360 में संवै ावि'क पीठ का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वि'णय है। हमें वि'णय में विदए गए अवलोक'ों क े संदभ का प ा लगा'ा होगा जो विक अपीलक ा क े अ'ुसार प्रश्नग हैं और यह विववि'तिश्च कर'ा होगा विक क्या उक्त अवलोक' संवै ावि'क पीठ क े वि'णय को पु'ःविवचारिर विकए जा'े का कोई आ ार दे े हैं। विवति क े न्यायालय क े वि'णय को पढ़'े पर सबसे प्रचलिल सिसद्धां सिजसे इस न्यायालय द्वारा बार-बार अ'ुमोविद विकया गया है, यह न्तिक्व' ब'ाम लिलर्थीेम, 1901 एसी 495 में लॉड हuसबरी का कर्थी' है, जहाँ वि'म्'लिललिख प्रति पाविद विकया गयाः “एले' ब'ाम फ्लड क े वाद पर चचा कर'े से पहले और इसमें जो वि'ण[1] विकया गया र्थीा, इससे पहले, सामान्य प्रक ृ ति क े दो अवलोक' हैं सिजन्हें मैं कह'ा चाहूंगा, और एक यह है जो मैं'े बहु बार पहले कहा है, उसे दोहरा ा है विक प्रत्येक वि'णय को साविब विवशेर्ष थ्यों पर लागू हो'े की सीमा क पढ़ा जा'ा चाविहए, या साविब हुआ मा'ा जा'ा चाविहए, क्योंविक उ' अभिभव्यविक्तयों की सामान्य बा ें जो वहां पाई जा सक ी हैं, पूरे का'ू' की व्याख्या कर'े क े लिलए आशतिय 'हीं है, लेविक' मामले क े विवशेर्ष थ्यों पर शासिस और अह हैं सिजसमें ऐसी अभिभव्यविक्तयां पाई जा'ी हैं। दूसरा यह है विक एक मामला क े वल वहीं क प्राति क ृ हो ा है सिज 'ा वह वास् व में वि'ण[1] कर ा है। मैं इस बा को पूरी रह से अस्वीकार कर ा हूं विक इसे एक ऐसे कर्थी' क े लिलए उद्धृ विकया जा सक ा है जो इससे ार्मिकक रूप से वि'कल ा है। इस रह क े क की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रणाली यह मा' ी है विक का'ू' अवि'वाय रूप से एक ार्मिकक संविह ा है, जबविक प्रत्येक वकील को यह स्वीकार कर'ा चाविहए विक का'ू' हमेशा ार्मिकक 'हीं हो ा है।"

23. पूव वि'णयों को लागू कर'े क े मामलें में लॉड ड़ेनिं'ग क े वि'म्'लिललिख शब्द सवाति क प्राति कारवा' (लोकस क्ल सि क ) ब' गए हैंः “प्रत्येक मामला इसक े अप'े थ्यों पर वि'भर कर ा है और एक मामले की अन्य मामले से काफी हद क समा' ा ही पयाS 'हीं है क्योंविक एेसे मामलों को वि'ण[1] कर'े में, एक अक े ला महत्वपूण विववरण पूरे स्वरूप को बदल सक ा है, (जैसा विक न्यायमूर्ति कारडोजो द्वारा कहा गया है) एक वाद क े स्वरूप को अन्य वाद क े स्वरूप से सुमेलिल करक े वादों को वि'ण[1] कर'े क े प्रलोभ' से बच'ा चाविहए। अ ः यह य कर'ा विक कोई मामला रेखा क े विकस ओर पड़ ा है, दूसरे मामले से व्यापक समा' ा विबuक ु ल भी वि'णायक 'हीं है। *** पूव वि'णय का अ'ुसरण भी क कर'ा चाविहए जब क विक वह न्याय का माग प्रशस् करे, लेविक' ुम्हें मृ लकड़ी को काट दे'ा चाविहए और बगल की शाखाओं को छाँट दे'ा चाविहए, अन्यर्थीा ुम अप'े आप को झाविड़यों और शाखाओं में खोया हुआ पाओगे। मेरी दलील है विक न्याय क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA माग को उ' बा ाओं से मुक्त रखा जाए जो इसे बाति कर सक ी हैं।" उपरोक्त अव रण को सव श्रविमक संगठ' (क े वी), मुम्बई ब'ाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य, (2008) 1 एससीसी 494 में इस न्यायालय क े अ'ुमोद' द्वारा उद्धृ विकया गया है।

24. इस्लाविमक एक े डमी ऑफ एजुक े श' व अन्य ब'ाम क'ाटक राज्य व अन्य, (2003) 6 एससीसी 697 में संवै ावि'क पीठ क े वि'णय में, बहुम की ओर से बोल े हुए मा''ीय मुख्य न्यायमूर्ति वी. ए'. खरे 'े अव ारिर विकयाः “विकसी वि'णय क े वि'णय-आ ार को क े वल पूरे वि'णय को पढ़कर ही प ा लगा'ा चाविहए। वास् व में वि'णय का आ ार वह है जो स्वयं वि'णय में ही वर्भिण (वि' ारिर ) है। प्रश्न क े उत्तर को अवि'वाय ः वि'णय में वर्भिण (वि' ारिर ) क े संदभ में पढ़ा जा'ा चाविहए और उससे अलग 'हीं। विकन्हीं अवलोक'ों, कारणों और सिसद्धां ों क े संबं में कोई संदेह उत्पन्न हो'े की न्तिस्र्थीति में, वि'णय क े अन्य भाग को देखा जा'ा चाविहए। वि'णय में यहाँ वहाँ कोई पंविक्त पढ़'े से वि'णय का संपूण वि'णय - आ ार प ा 'हीं लगाया जा सक ा। इसलिलए, हम अप'ा स्पष्टीकरण दे े समय, उ' विहस्सों क े अलावा सिज' पर अवलम्ब लिलया जा सक ा है, वि'णय क े अन्य भागों को देख'े क े लिलए बाध्य हैं।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

25. प्रस् र 139 से 146 में न्यायमूर्ति एस. बी. सिसन्हा 'ें अप'ी सहम राय में वि'णय क े अर्थीान्वय' क े सिसद्धां ों को दोहराया है। प्रस् र 139-146 में वि'म्'लिललिख अव ारिर विकया गया हैः- "विकसी वि'णय का अर्थीान्वय'

139. यह स्पष्ट है, विक वि'णय को का'ू' क े रूप में 'हीं पढ़ा जा'ा चाविहए। विकसी वि'णय का वि'णय-आ ार उसका क हो ा है सिजसे वि'णय को संपूण ा में पढ़'े पर ही समझा जा सक ा है। विकसी मामले का वि'णय-आ ार या सिसद्धां और कारण सिजस पर यह आ ारिर है, अंति म रूप से विदए गए अ'ु ोर्ष या उसक े वि'स् ारण क े लिलए अप'ाए गए रीक े से अलग हो ा है। [एक्जीक्यूविटव इंजीवि'यर, ेंक'ल माइ'र इरिरगेश' तिडवीज' ब'ाम ए'. सी. बुद्धराज (2001) 2 एससीसी 721 देखें।]

140. पद्म सुन्दर राव ब'ाम विमल'ाडू राज्य (2002) 3 एससीसी 533 में यह कहा गया हैः (एससीसी पेज 540 प्रस् र 9) “लॉड मॉरिरस 'ें हेरिंरगट' ब'ाम विŸविटश रेलवे बोड (1972) 2 डब्uयूएलआर 537 [सब 'ॉम विŸविटश रेलवे बोड mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ब'ाम हेरिंरगट', (1972) 1 ऑल ईआर 749] में कहा विक व्याख्या' या वि'णय क े शब्दों को विव ायी अति वि'यम क े शब्द मा''े में हमेशा जोलिखम हो ा है और यह याद रख'ा चाविहए विक न्यातियक कर्थी' विकसी विवशेर्ष मामले क े थ्यों की परिरन्तिस्र्थीति में विकए जा े हैं। परिरन्तिस्र्थीति जन्य लचीलाप', एक अति रिरक्त या अलग थ्य, दो मामलों क े वि'ष्कर्ष[ क े बीच बहु अं र ला सक ी है।" [हरिरयाणा फाइ'ेंभिशयल कॉरपोरेश' ब'ाम जगदम्बा ऑयल विमuस (2002 3 एससीसी 496 भी देखें]

141. ज'रल इलेन्तिक्ट्रक कॉरपोरेश' ब'ाम रे'ुसागर पॉवर कॉरपोरेश', (1987) 4 एससीसी 137, में यह अभिभ ारिर विकया गयाः (एससीसी पेज 157, प्रस् र 20) "जैसा विक हमारे द्वारा कई बार दशाया गया है, विक विकसी वि'णय में प्रयुक्त शब्दों और पदों का अर्थी संविवति यों की रह समा' रूप से 'हीं लगाया जा'ा चाविहए या संविवति यों में परिरभाविर्ष शब्दों और पदों क े रूप में 'हीं लगाया जा'ा चाविहए। हमें कोई संदेह 'हीं है विक उत्तर प्रदेश राज्य ब'ाम जा'की सर' क ै लाश चंद्र [1974] 1 एससीआर 31, में जब इस न्यायालय द्वारा "वाद में विववादग्रस् क े गुण -दोर्ष का न्यायवि'णय'" शब्दों का प्रयोग विकया गया र्थीा, ो शब्दों का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रयोग हर उस न्यायवि'णय' में कर'े क े लिलए 'हीं विकया गया र्थीा, जो विकसी भी रीक े से अदाल क े समक्ष कायवाही को समाS कर दे ा र्थीा, बन्तिuक क े वल ऐसे न्यायवि'णय' को कवर कर'े क े लिलए र्थीे जो पक्षकारों क े बीच वास् विवक विववाद को स्पश कर े र्थीे सिजस'े कारवाई को जन्म विदया। पक्षकारों क े बीच विववादों क े न्यायवि'णय' पर आपलित्तयां, चाहे वे विकसी भी आ ार पर हों, यर्थीार्थी में वाद की प्रगति में सहायक 'हीं हो ीं बन्तिuक ऐसी प्रगति में बा क हो ीं हैं। ऐसी आपलित्तयों क े न्यायवि'णय' को वाद में विववादग्रस् क े गुण -दोर्षों का न्यायवि'णय' 'हीं कहा जा सक ा है। जैसा विक हम'े पहले कहा, इसमें शाविमल सिसद्धां ों क े बारे में एक व्यापक दृविष्टकोण लिलया जा'ा चाविहए और संकीण र्थीा क'ीकी व्याख्या से बच'ा चाविहए जो विव ाय' क े उद्देश्य को विवफल कर ी हो।"

142. राजेश्वर प्रसाद विमश्रा ब'ाम पतिश्चम बंगाल राज्य एआईआर 1965 एससी 1887, में यह अव ारिर विकया गयाः "अ'ुच्छेद 141 उच्च म न्यायालय को विवति घोविर्ष कर'े और इसे अति वि'यविम कर'े क े लिलए सशक्त कर ी है। इसलिलए उच्च म न्यायालय क े अवलोक' को वै ावि'क अति वि'यविमति यों (का'ू'ों) क े रूप में 'हीं पढ़ा जा'ा चाविहए। यह भी सवविवविद है विक विकसी वि'णय का आ ार उसमें वि'र्मिदष्ट कारण हो े हैं।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (अमर 'ार्थी ओम प्रकाश व अन्य ब'ाम पंजाब राज्य [1985] 1 एससीसी 345 और हमीद जोहरा' ब'ाम अब्दुल सलाम, 2001 (7) एससीसी 573)।

143. इसलिलए, यह क दे'ा सही 'हीं होगा, जैसा विक श्री 'रीम' 'े क विदया है विक प्रश्नों क े उत्तर वि'णय क े आ ार होंगे। प्रश्नों क े उत्तर मात्र वि'ष्कर्ष हैं। वि'णय की काया में उसक े समर्थी' में वि'र्मिदष्ट कारणों पर संशय या विववाद हो'े की न्तिस्र्थीति में उसका अर्थीान्वय' विकया जा'ा चाविहए, इसक े लिलए वि'णय क े अन्य पैराग्राफ को भी पढ़'ा आवश्यक होगा। इस उद्देश्य क े लिलए पक्षकारों क े अभिभवच'ों को देख'ा भी अ'ुम है। (यद्यविप क े वल क ु छ ही मामलों में और यविद कोई मजबू व ठोस कारण मौजूद हों)।

144. डायरेक्ट रिरक्र ू ट्स क्ल II इंजीवि'यरिंरग ऑफीसस एशोसिसएश' ब'ाम महाराष्ट्र राज्य (1990) 2 एससीसी 715 में वरिरष्ठ ा क े वि' ारण क े लिलए प्रति पाविद विकए गए विवभिशष्ट विदशावि'दzशों की कविठ'ाईयों से जब इस न्यायालय का साम'ा हुआ, ो क े शव चन्द्र जोशी ब'ाम भार संघ 1992 सप्लीमेंटरी (1) एससीसी 272 में इस न्यायालय 'े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अव ारिर विकया विक वि'ष्कर्ष[ को वि'णय की काया में दी गयी परिरचचा और कारणों क े सार्थी पढ़ा जा'ा चाविहए।

145. आगे यह स्पष्ट है विक कोई वि'णय क े वल वहाँ क प्राति क ृ हो ा है सिजसे वह वि'ण[1] कर ा है और उसक े लिलए प्राति क ृ 'हीं हो ा है सिजसे इससे कसंग रूप से वि'काला जा सक ा है। [भार संघ ब'ाम छज्जु राम, (2003) 5 एससीसी 568 को देखें]

146. इसलिलए, टी.एम.ए. पाई फाउpड़ेश' (2002) 8 एससीसी 481, में इस न्यायालय क े वि'णय का अर्थी लगा'ा होगा या उपरोक्त सिसद्धां ों का अर्थीान्वय' कर'ा होगा, न्यायालय ' क े वल उसमें जो कहा गया है, बन्तिuक पाठ्य और संदभ सिजसमें यह कहा गया र्थीा, पर विवचार करक े वि'णय क े आशय और उद्देश्य का प ा लगा'े क े लिलए यहां-वहां से क ु छ वाक्य 'हीं पढ़ सक ी है। उक्त उद्देश्य क े लिलए न्यायालय संविव ावि'क या सुसंग वै ावि'क प्राव ा'ों क े संदभ में इसक े हालिलयों वि'णयों पर भी विवचार कर सक ी है, सिजस पर अवलम्ब लिलया गया है।"

26. कविमश्नर ऑफ सेन्ट्रल एक्साइज, विदHी ब'ाम एलाइड एयरक ं तिडशनिं'ग कॉरपोरेश' (रसिजस्टड) (2006) 7 एससीसी 735 में इस न्यायालय क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लिलए बोल े हुए न्यायमूर्ति अरिरसिज पसाय 'े अव ारिर विकया विक वि'णय को वाद क े थ्यों क े आलोक में समझा जा'ा चाविहए और इसमें वास् व में जो कहा गया है, उससे अति क 'हीं पढ़ा जा'ा चाविहए। प्रस् र 8 में वि'म्'लिललिख प्रति पाविद विकया गया हैः "8.....विकसी वि'णय को वाद क े थ्यों क े आलोक में समझा जा'ा चाविहए और इसमें वास् व में जो कहा गया है, उससे अति क 'हीं पढ़ा जा'ा चाविहए। विवचारा ी' प्रश्न क े संदभ से अलग विकए गए वि'णय से विकसी शब्द या वाक्य को ले'ा और इसे इस न्यायालय द्वारा य विकया गया पूण का'ू' मा''ा, ' ो वांछ'ीय है और ' ही अ'ुज्ञेय है। वि'णय को समग्र रूप से पढ़ा जा'ा चाविहए और वि'णय क े अवलोक'ों को उ' प्रश्नों क े आलोक में विवचार विकया जा'ा चाविहए जो इस न्यायालय क े समक्ष र्थीे। (महबूब दाऊद शेख ब'ाम महाराष्ट्र राज्य (2004) 2 एससीसी 362...."

27. उपरोक्त सिसद्धां ों क े आलोक में, अब हम इस्माइल फारूखी में संवै ावि'क पीठ क े वि'णय पर वापस आ े हैं। हमें संवै ावि'क पीठ क े समक्ष विवचारण क े लिलए आए हुए मुद्दों, वि'णय क े आ ार और अवलोक'ों क े संदभ को देख'ा होगा। हम'े ऊपर देखा है विक इस्माइल फारूखी वाद में संवै ावि'क पीठ 'े पाँच हस् ां रिर वादों, अ'ुच्छेद 32 क े ह दायर दो रिरट यातिचकाओं और विवशेर्ष संदभ संख्या 1/1993 को वि'ण[1] विकया। अ'ुच्छेद 143 क े ह भार क े राष्ट्रपति द्वारा विकया गया विवशेर्ष संदभ mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संख्या 1 वर्ष 1993 को संवै ावि'क पीठ द्वारा उत्तर दे'े क े लिलए सम्मा'पूवक अस्वीकार कर विदया गया। अ'ुच्छेद 32 क े ह रिरट यातिचकाओं और अं रिर वादों में 1993 क े अति वि'यम को चु'ौ ी दी गयी र्थीी। अति वि'यम, 1993 को अयोध्या में क ु छ क्षेत्रों क े अज' क े लिलए और उससे संबंति या उससे आ'ुर्षंविगक विवर्षयों क े लिलए अति वि'यविम विकया गया र्थीा। ारा 2(a) ) क्षेत्र को इस रूप में परिरभाविर्ष कर ा हैः "2(a) ) "क्षेत्र" से ात्पय अ'ुसूची में विववि'र्मिदष्ट क्षेत्र (संपूण इमार ों, संरच'ाओं या इसमें शाविमल अन्य संपलित्तयों सविह ) से है;

28. अति वि'यम की अ'ुसूची में अति ग्रविह क्षेत्र का विववरण र्थीा। अन्य भूखpड़ों क े अलावा कोट रामचन्द्र गाँव में न्तिस्र्थी राजस्व प्लाट संख्या 159 और 160, सिजसमें आम ौर पर राम जन्म भूविम-बाबरी मन्तिस्जद क े 'ाम से ज्ञा संरच'ा न्तिस्र्थी र्थीी, को भी शाविमल विकया गया र्थीा। इसमें शाविमल अन्य संपलित्तयों पर न्तिस्र्थी सभी भव' संरच'ा सविह कई अन्य भूखंडों का अति ग्रहण विकया गया र्थीा।

29. अति वि'यम, 1993 की वै ा को कई आ ारों पर चु'ौ ी दी गयी र्थीी। चु'ौ ी क े आ ार को वि'णय क े प्रस् र 17 में उसिHलिख विकया गया है जो वि'म्'लिललिख प्रभाव का हैः "17. व्यापक रूप से कहा गया, विक संविवति को चु'ौ ी दे'े का क े न्द्र विबन्दु समग्र रूप से मवि'रपेक्ष ा, समा' ा का अति कार और म की स्व ंत्र ा क े अति कार क े आ ारों पर है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विववाविद क्षेत्र से अति क क्षेत्र क े अति ग्रहण को चु'ौ ी इस आ ार पर अति रिरक्त है विक अति ग्रहण ही अ'ावश्यक र्थीा क्योंविक यह इसक े भी र न्तिस्र्थी छोटे विववाविद क्षेत्र क े विववाद से संबंति 'हीं र्थीा। इस अति वि'यम को जोरदार रीक े से चु'ौ ी दे े हुए क ु छ पक्षकारों की ओर से रखा गया एक बड़ा क यह र्थीा विक यह प्रश्न विक क्या अति ग्रहण से ार्मिमक आचरण कर'े का अति कार प्रभाविव हुआ, इस प्रश्न से स्व ंत्र रूप से अलग, मन्तिस्जद मुन्तिस्लमों का एक ार्मिमक उपास'ा स्र्थील हो'े से राज्य की अति ग्रहण की शविक्त से विबuकु ल बाहर (उन्मुक्त) है और इसलिलए संविवति इस अक े ले कारण से ही भार क े संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े उHंघ' क े रूप में असंवै ावि'क है। हालांविक अन्य पक्षकारों 'े अति ग्रहण से उन्मुविक्त क े इस क को उ' विवशेर्ष महत्व क े स्र्थीा'ों क ही सीविम रखा है जो विक म क े आचरण क े अति कार क े अवि'वाय और अभिभन्न अंग हैं, ऐसे स्र्थीा'ों क े अति ग्रहण का परिरणाम म की स्व ंत्र ा क े अति कार का अं होगा। यह भी क विदया गया र्थीा विक व मा' मामले में अति ग्रहण का उद्देश्य, संविवति को प्रविवविष्ट 42, सूची III क े दायरे में 'हीं ला ा है बन्तिuक प्रविवविष्ट 1, सूची II क े संदभ में है और इसलिलए संसद इसे अति वि'यविम कर'े में सक्षम 'हीं है। आगे मुन्तिस्लम विह को दर्भिश कर'े वाले विवद्वा' अति वक्ता द्वारा यह कहा गया र्थीा विक का'ू' निंहदू विह ों क े पक्ष में बहु अति क झुका हुआ है और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसलिलए गैर- मवि'रपेक्ष ा क े दोर्ष से ग्रस् है, और मुन्तिस्लम समुदाय क े म की स्व ंत्र ा क े अति कार क े उHंघ' क े अलावा भेदभावपूण भी है।....."

30. सिजस क्षेत्र में विववाविद क्षेत्र अति क है उस क्षेत्र क े अति ग्रहण की चु'ौ ी इस आ ार पर र्थीी विक यह अ'ावश्यक र्थीा, इसलिलए इसे अवै घोविर्ष विकया जा'ा चाविहए। अति रिरक्त क्षेत्र की चु'ौ ी निंहदू समुदाय क े सदस्यों द्वारा की गई र्थीी, जो उक्त भूखंड से संबंति र्थीे। हमले का एक आ ार मवि'रपेक्ष ा पर आ ारिर र्थीा। यह क विदया गया विक अति वि'यम को पूरी रह से पढ़ा जा'ा मवि'रपेक्ष और मुन्तिस्लम समुदाय क े विवरूद्ध है। एक मन्तिस्जद में राज्य की अति ग्रहण की शविक्त से प्रति रक्षा हो ी है। मुन्तिस्लम समुदाय की ओर से यह क विदया गया र्थीा विक 1528 ईस्वी क े बाद से जब मन्तिस्जद का वि'माण विकया गया र्थीा ब अति ग्रहण से 400 से अति क वर्ष[ क दूसरे पक्ष द्वारा दायर प्रति क ू ल कब्जे सविह अन्य वादों में अuपसंख्यक समुदाय क े लिलए र्थीा सिजसे अति ग्रहण द्वारा समाS कर विदया गया। एक वैकन्तिuपक विववाद समा ा' ंत्र क े प्रति स्र्थीाप' क े विब'ा ही वाद को समाS कर विदया गया है, सिजसक े लिलए वे संवै ावि'क योज'ा में हकदार हैं।

31. संविव ा' पीठ 'े अव ारिर विकया विक अति वि'यम क े ह संपलित्तयों का अति ग्रहण दो'ों समुदायों क े अति कारों को प्रभाविव कर ा है, ' क े वल मुन्तिस्लम समुदाय क े लोगों को। प्रस् र 49 में वि'म्'लिललिख पर ध्या' विदया गया है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "49. थ्यों का वण' संक े कर ा है विक अति वि'यम क े ह संपलित्तयों का अति ग्रहण दो'ों समुदायों क े अति कारों को प्रभाविव कर ा है ' विक क े वल मुन्तिस्लम समुदाय क े लोगों को। मुन्तिस्लमों द्वारा दावा विकया गया विह क े वल उस विववाविद स्र्थील पर है जहां मन्तिस्जद विवध्वंस से पहले ब'ी हुई र्थीी। इस दावे पर निंहदुओं की आपलित्त को न्यायवि'णय' विकया जा'ा चाविहए। अति वि'यम क े ह प्राS शेर्ष संपूण संपलित्त ऐसी है, सिजस पर मुन्तिस्लमों द्वारा कोई दावा 'हीं विकया गया है। इसक े एक बड़े विहस्से में निंहदुओं की संपलित्त शाविमल है, सिजसका स्वत्व विववाद में भी 'हीं है...।”

32. इस न्यायालय 'े यह भी ध्या' विदया विक अयोध्या को निंहदुओं क े लिलए विवशेर्ष महत्व क े स्र्थीा' क े रूप में कहा जा ा है क्योंविक प्राची' मान्य ा है विक भगवा' राम का जन्म वहां हुआ र्थीा। न्यायालय 'े यह भी ध्या' विदया विक 1528 ईसवी में मीर बाकी द्वारा वि'र्मिम एक प्राची' मन्तिस्जद क े रूप में मुन्तिस्लम समुदाय का समा' रूप से मन्तिस्जद का महत्व र्थीा। वि'म्'लिललिख वि'णय क े प्रस् र 51 में उHेख विकया गया है:

"51. यह भी उHेख विकया जा सक ा है विक अयोध्या को निंहदओ ीर्थीस्र्थील के रूप में भी विवशेर्ष महत्व के रूप में कहा जा ा है क्योंविक भगवा' राम का जन्म हुआ र्थीा, इस विवश्वास के कारण विक मुन्तिस्लम समुदाय के लिलए मन्तिस्जद का महत्व र्थीा, यह 1528 ईसवी में मीर बाक़ी द्वारा वि'र्मिम प्राची' मन्तिस्जद, एक मन्तिस्जद के रूप में मुन्तिस्लमों द्वारा ार्मिमक उपास' स्र्थील र्थीा। यह दो समुदायों के लिलए विववाविद स्र्थील के ुल'ात्मक महत्व की ओर संके कर ा है और यह भी विक अति ग्रहण का प्रभाव निंहद ू समुदाय के अति कार और विह पर समा' रूप से पड़ ा

mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है। इस पहलू का उHेख क े वल इस क क े संदभ में विकया जा ा है विक का'ू' क े रूप में पूण ः ारा 7 ही 'हीं बन्तिuक निंहदुओं क े पक्ष में और मुन्तिस्लमों क े विवरूद्ध मवि'रपेक्ष ा का विवरो विकया जा रहा है।”

33. जैसा विक ऊपर उHेख विकया गया है विक संविव ा' पीठ क े समक्ष यातिचकाक ाओं द्वारा उठाए गए प्रमुख क[ में से एक यह र्थीा विक मन्तिस्जद को मुन्तिस्लम विवति में विवशेर्ष दजz क े कारण अति ग्रहण 'हीं विकया जा सक ा है। संविव ा' पीठ 'े प्रस् र 65 से 82 क े एक अलग शीर्षक "मन्तिस्जद- अज' से प्रति रक्षा" द्वारा इस्माइल फारुकी मामले में उपरोक्त आ ार पर विवचार विकया।

34. शीर्षक क े अ'ुसार प्रस् र 65 से 82 की परिरचचा संक े कर ी है विक परिरचचा और समस् अवलोक' एक मन्तिस्जद क े अति ग्रहण से प्रति रक्षा क े संदभ में र्थीे। वि'णय क े प्रस् र 65 में सु'वाई में एक बड़ा प्रश्न उठाया गया र्थीा विक इस्लाम म क े काय क े महत्व क े बावजूद, विकसी भी मन्तिस्जद का अति ग्रहण कर'े की राज्य को कोई शविक्त 'हीं है। उपयुक्त अवलोक' को अति सूतिच कर'े क े बाद न्यायालय 'े देखा विक प्रस् ाव उन्न स्वीकृ ति क े लिलए बहु व्यापक है। हम प्रस् र 65 को पु': प्रस् ु कर े हैं जो वि'म्'लिललिख प्रभाव क े लिलए है: “65. सु'वाई में एक बड़ा प्रश्न यह र्थीा विक विकसी भी मन्तिस्जद का अति ग्रहण कर'े की राज्य को कोई शविक्त 'हीं है, चाहे वह इस्लाम म क े काय क े महत्व क े बावजूद हो। क यह है विक एक मन्तिस्जद, भले ही इसका इस्लाम म क े काय क े लिलए कोई विवशेर्ष महत्व ' हो, मुन्तिस्लम विवति में एक मन्तिस्जद की विवशेर्ष न्तिस्र्थीति क े कारण अति ग्रहण 'हीं विकया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जा सक ा है। यह क विवशेर्ष महत्व वाली एक मन्तिस्जद क सीविम 'हीं र्थीा, सिजसक े विब'ा म का काय कर'ा उतिच 'हीं है क्योंविक यह इस्लाम क े काय का एक अवि'वाय और अभिभन्न अंग हो सक ा है। इसक े दृविष्टग इसे पक्षकार जो इसक े हकदार र्थीे, को सौंप'े क े उद्देश्य से और ब क इसे ब'ाए रख'े की आवश्यक ा र्थीी, हम'े क ें द्र सरकार में विववाविद क्षेत्र क े एक वै ावि'क प्रापक क े रूप में क ें द्र सरकार में सीविम वि'विह कर लिलया है सिजसमें मन्तिस्जद ब'ी हुई र्थीी, यह प्रश्न विकसी भी व्यावहारिरक महत्व का 'हीं हो सक ा है क्योंविक उस संपलित्त क े वास् विवक स्वामी का कोई पूण विवभाज' 'हीं है। हम अवलोक' कर सक े हैं विक उन्नति शील प्रस् ाव हमें अन्तिस्म ा की स्वीक ृ ति क े लिलए बहु व्यापक प्र ी हो ा है क्योंविक यह अति ग्रहण की संप्रभु शविक्त को प्रति बंति करेगा, जहां वि'स्संदेह राष्ट्रीय उद्देश्य क े लिलए ऐसा अज' आवश्यक है, यविद मन्तिस्जद संपलित्त में म क े रूप में इस्लाम क े काय क े लिलए विब'ा विकसी विवशेर्ष महत्व क े उपास'ा क े एक सामान्य स्र्थीा' क े रूप में न्तिस्र्थी है। इससे यह भी असामान्य परिरणाम होगा विक मवि'रपेक्ष भार में इस्लाम क े अलावा अन्य म[ क े विवरूद्ध भेदभाव होगा। हमारे लिलए इस प्रश्न को य कर'ा आवश्यक है विक सिजस ीव्र ा क े सार्थी यह क डॉ. राजीव व' और श्री अब्दुल मन्न' द्वारा विकया गया र्थीा, उस दृविष्ट में अज' क े वल इस कारण से अमान्य है।”

35. यद्यविप प्रस् र 65 में न्यायालय 'े अवलोक' विकया विक प्रस् ाव स्वीक ृ ति क े लिलए बहु अच्छा है, परन् ु उस ीव्र ा की दृविष्ट में सिजसमें यातिचकाक ाओं क े लिलए विवद्वा' अति वक्ता द्वारा क विकया गया र्थीा, इस मुद्दे को य कर'े क े लिलए न्यायालय 'े कायवाही की। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

36. संविव ा' पीठ क े समक्ष क यह भी र्थीा विक मन्तिस्जद का अज' भार क े संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह विदए गए अति कार का उHंघ' कर ा है। 1950 से पूव विŸविटश भार ीय का'ू' को ध्या' में रख े हुए और संविव ा' क े लागू हो'े क े बाद, संविव ा' पीठ इस वि'ष्कर्ष पर पहुंची विक राज्य क े अज' की संप्रभु शविक्त क े ह ार्मिमक पूजा स्र्थील जैसे मन्तिस्जद, चच, मंविदर आविद का अज' विकया जा सक ा है। इस रह का अज' संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 या अ'ुच्छेद 26 का स्वयमेव उHंघ' 'हीं कर ा है। विवभिभन्न वि'णयों पर ध्या' दे'े क े बाद पैराग्राफ 74 में इस प्रकार प्रति पाविद विकया गया र्थीा: “74. यह इस न्यायालय द्वारा विदए गए विवभिभन्न वि'णयों से प्रकट हो ा है, सिजसे बाद में संदर्भिभ विकया गया है, जो संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संरक्षण क े अ ी' है और ार्मिमक स्र्थीलों जैसे मन्तिस्जदों, चच[, मंविदरों आविद को राज्य क े संप्रभु शविक्त क े ह अज' विकया जा सक ा है। इस रह का अज' संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 या अ'ुच्छेद 26 का स्वयमेव उHंघ' 'हीं कर ा है। संपलित्त क े अज' क े लिलए राज्य की संप्रभु शविक्त पर प्रबं ' का अति कार ले'े से संबंति फ ै सलों का कोई असर 'हीं है।"

37. संविव ा' पीठ 'े आगे अव ारिर विकया विक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह गारंटीक ृ म का काय कर'े, प्रचार और प्रसार कर'े का अति कार आवश्यक रूप से संपलित्त क े अज' या स्वयं क े अति कार को शाविमल 'हीं कर ा है। इसी प्रकार, यह अति कार पूजा कर'े और हर स्र्थीा' पर पूजा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर'े क े विकसी भी अति कार का विवस् ार 'हीं कर ा है। आगे, यह अव ारिर विकया गया र्थीा विक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संरक्षण ार्मिमक काय है जो म का एक अवि'वाय और अभिभन्न अंग है। प्रस् र 77 और 78 में वि'म्'लिललिख अव ारिर विकया गया है: “77. यह अव ारिर विकया जा सक ा है विक अ'ुच्छेद 25 में संविव ा' क े अ'ुच्छेद 26 क े विवपरी संपलित्त का कोई संदभ 'हीं है। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह गारंटीक ृ म का काय, प्रचार और प्रसार कर'े का अति कार आवश्यक रूप से संपलित्त क े अज' या स्वयं क े अति कार को शाविमल 'हीं कर ा है। इसी प्रकार यह अति कार पूजा कर'े क े विकसी भी स्र्थीा' और प्रत्येक स्र्थीा' पर पूजा कर'े क े अति कार क विवस् ृ 'हीं है, सिजसक े वजह से स्वयमेव विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा कर'े क े लिलए कोई बा ा संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह गारंटीक ृ ार्मिमक स्व ंत्र ा का उHंघ' कर सक े । संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संरक्षण ार्मिमक काय क े लिलए है जो म का एक अवि'वाय और अभिभन्न अंग ब' ा है। कोई काय एक ार्मिमक काय हो सक ा है लेविक' उस म क े काय का अवि'वाय और अभिभन्न अंग 'हीं है।

78. प्रार्थी'ा या उपास'ा कर'ा एक ार्मिमक काय है, इसे हर उस स्र्थीा' पर विकया जा ा है जहाँ यह विकया जा सक ा है और यह ऐसे ार्मिमक काय का एक अवि'वाय या अभिभन्न विहस्सा 'हीं होगा जब क विक उस म क े लिलए स्र्थीा' का कोई विवशेर्ष महत्व या एक आवश्यक या अभिभन्न अंग ' हो। विकसी भी म की पूजा का स्र्थीा' उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा है, इसे म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए, एक अलग पायदा' पर खड़ा हो'ा चाविहए और अलग-अलग और अति क आदर क े सार्थी व्यवहार कर'ा होगा।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

38. उपयुक्त अवलोक' क े सार्थी संविव ा' पीठ 'े अव ारिर विकया विक प्रार्थी'ा या पूजा का प्रस् ाव एक ार्मिमक काय है, हर स्र्थीा' पर इसको कर'ा ऐसे ार्मिमक काय का अवि'वाय या अभिभन्न विहस्सा 'हीं होगा जब क विक उस म क े लिलए इस स्र्थीा' का एक आवश्यक या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए कोई विवशेर्ष महत्व ' हो। विकसी भी म की पूजा का स्र्थीा' उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा है, इसे म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए, एक अलग पायदा' पर खड़े होकर अलग-अलग और अति क आदरपूवक व्यवहार कर'ा होगा।

39. हम'े ऊपर जो ध्या' विदया है, उससे वि'म्'लिललिख क वि'कल ा है: (i) मन्तिस्जदों, चच[, मंविदरों आविद जैसे ार्मिमक पूजा स्र्थीलों को अज' की संप्रभु शविक्त क े ह अर्जिज विकया जा सक ा है, जो संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 या 26 का उHंघ' 'हीं कर ा है। (ii) अ'ुच्छेद 25 क े ह प्रत्याभू म का प्रचार और प्रसार क े अति कार का काय विकसी भी स्र्थीा' और प्रत्येक पूजा स्र्थील पर पूजा क े अति कार का विवस् ार 'हीं कर ा है ाविक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' पर स्वयमेव पूजा कर'े क े लिलए कोई बा ा ार्मिमक स्व ंत्र ा का उHंघ' कर सक े । (iii) संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संरक्षण ार्मिमक व्यवहार क े लिलए है जो म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब' ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) एक अभ्यास एक ार्मिमक अभ्यास हो सक ा है लेविक' उस म क े अभ्यास का अवि'वाय और अभिभन्न अंग 'हीं है। (v) प्रार्थी'ा या पूजा कर'ा एक ार्मिमक काय है, प्रत्येक स्र्थीा' पर इसको कर'ा जहां इसे विकया जा सक ा है, ऐसे ार्मिमक काय का अवि'वाय या अभिभन्न अंग 'हीं होगा जब क विक एक आवश्यक या अभिभन्न अंग ैयार कर'े में उस म क े लिलए इस स्र्थीा' का कोई विवशेर्ष महत्व ' हो। न्यायालय 'े स्वयं उस म क े एक विवशेर्ष महत्व क े स्र्थीा' क े संबं में एक अं र वि'काला है जहां प्रार्थी'ा या पूजा कर'ा म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग हो सक ा है।

40. न्यायालय 'े अव ारिर विकया विक मन्तिस्जदों को परिरसीविम कर'ा का'ू' क े प्राव ा'ों क े अ ी' र्थीे, सिजससे मुन्तिस्लमों को विवशेर्ष मन्तिस्जद में 'माज अदा कर'े का अति कार समाS हो गया। प्रस् र 80 में वि'म्'लिललिख अव ारिर विकया गया र्थीा: "80. यह क विदया गया है विक एक मन्तिस्जद का मुन्तिस्लम का'ू' में एक विवशेर्ष न्तिस्र्थीति हो ी है और एक बार एक मन्तिस्जद स्र्थीाविप हो ी है और ऐसी मन्तिस्जद में 'माज अदा विकया जा ा है, वही हमेशा क े लिलए अHाह की संपलित्त हो जा ी है और वही मन्तिस्जद क े दा ा या संस्र्थीापक को वापस कभी 'हीं लौट ा है और इस्लाम में विवश्वास रख'े वाले कोई भी व्यविक्त इस रह की मन्तिस्जद में 'माज अदा कर सक ा है और यहां क विक यविद ढाँचे को ध्वस् भी कर विदया जा ा है, ो उस स्र्थीा' पर 'माज अदा विकया जा सक ा है। जैसा विक यहां ब ाया गया है विक विŸविटश भार में विकसी मन्तिस्जद को ऐसी कोई सुरक्षा 'हीं दी गई र्थीी और मन्तिस्जद को मुन्तिस्लमों की उस संपलित्त पर प्रति क ू ल कब्जे द्वारा विवशेर्ष मन्तिस्जद में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 'माज अदा कर'े क े लिलए मुन्तिस्लमों क े अति कार को समाS कर'े क े लिलए परिरसीमा क े का'ू' क े प्राव ा'ों क े अ ी' विकया गया र्थीा।”

41. संविव ा' पीठ 'े स्पष्ट रूप से यह प्रति पाविद विकया विक प्रत्येक अचल संपलित्त मंविदर, चच या मन्तिस्जद हो सक ी है और अज' क े लिलए उत्तरदायी है और एक मन्तिस्जद में कोई भी अति रिरक्त सुरक्षा 'हीं हो ी है जो अन्य म[ क े ार्मिमक स्र्थीलों क े लिलए उपलब् 'हीं है।

42. अब, हम वि'णय क े प्रस् र 82 पर आ े हैं, जो डॉ. राजीव व' द्वारा उठाये गए क का मुख्य आ ार है। डॉ. राजीव व' द्वारा प्रस् र 82 में विकए गये क ु छ अवलोक'ों पर गंभीर आपलित्तयाँ ज ाई गई हैं। सम्पूण प्रस् र 82 'ीचे सन्दर्भिभ विकया गया है: "82. सही न्तिस्र्थीति को इस प्रकार संक्षेप में प्रस् ु विकया जा सक ा है। भार में लागू मुन्तिस्लम विवति क े ह, एक मन्तिस्जद का स्वत्व प्रति क ू ल कब्जे में खो सक ा है (मुHा क े मुन्तिस्लम का'ू' क े सिसद्धां ों को एम. विहदाय ुHा- ारा 217; और एआईआर 1940 पीसी 116 19 वें संस्करण में देखें)। यविद का'ू' में यही न्तिस्र्थीति है, ो यह मा''े का कोई कारण 'हीं हो सक ा है विक मन्तिस्जद की एक विवभिशष्ट या विवशेर्ष न्तिस्र्थीति है, जो मवि'रपेक्ष भार में अन्य म[ क े पूजा स्र्थीलों की ुल'ा में अति क है, ाविक इसे संप्रभु ा या राज्य की प्रार्थीविमक शविक्त क े काय द्वारा अज' से प्रति रतिक्ष विकया जा सक े । एक मन्तिस्जद इस्लाम म क े काय का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है और मुन्तिस्लमों द्वारा 'माज़ (प्रार्थी'ा) को कहीं भी, खुले स्र्थीा' में भी अदा विकया जा सक ा है। द'ुसार, इसका अज' भार क े संविव ा' में प्राव ा'ों द्वारा वि'विर्षद्ध 'हीं है। संविव ा' क े ह भार क े मवि'रपेक्ष लोकाचार में अज' से संप्रभु ा शविक्त का काय और इसकी न्तिस्र्थीति और अति ग्रहण से राज्य mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द्वारा अति ग्रहण से प्रति रक्षा क े उद्देश्य क े लिलए एक इस्लामी देश में विकसी मन्तिस्जद की न्तिस्र्थीति क े बावजूद चच, मंविदर आविद समा' और उसक े बराबर है। यह अन्य म[ क े पूजा स्र्थीलों की ुल'ा में ' ो अति क है और ' ही कम है। जाविहर है, विकसी भी ार्मिमक स्र्थीा' का अज' क े वल एक बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य क े लिलए असामान्य और असा ारण न्तिस्र्थीति यों में विकया जा'ा है, यह ध्या' में रख े हुए विक ऐसे अज' से म का काय कर'े क े अति कार क े लोप हो'े का परिरणाम 'हीं हो'ा चाविहए, यविद उस स्र्थीा' का महत्व ऐसा हो। इस श क े अ ी', अज' की शविक्त मन्तिस्जद क े लिलए विकसी भी म क े विकसी भी अन्य पूजा स्र्थील की रह है। पूजा कर'े का अति कार कहीं भी और प्रत्येक स्र्थीा' पर 'हीं है, इसलिलए जब क विक इसे प्रभावी ढंग से काय 'हीं विकया जा सक ा, जब क विक विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा कर'े का अति कार स्वयं उस अति कार का अभिभन्न अंग ' हो।” "एक मन्तिस्जद इस्लाम म क े काय का अवि'वाय विहस्सा 'हीं है और मुन्तिस्लमों द्वारा 'माज़ (प्रार्थी'ा) कहीं भी, खुले में भी अदा की जा सक ी है।"

43. डॉ. व' 'े क विदया विक इस्माईल फारुकी क े मामले में संविव ा' पीठ क े प्रस् र 82 में विदया गया वि'णय पु'र्मिवचार का कारण है। उन्हों'े कहा विक प्रस् र 82 में उपयुक्त कर्थी' गल हैं क्योंविक यह कह'ा गल है विक (vi) इस्लाम क े लिलए एक मन्तिस्जद आवश्यक 'हीं है। (vii) आवश्यक काय का सिसद्धां विवशेर्ष महत्व रख'े वाले लोगों क े अलावा अन्य पूजा स्र्थीलों की रक्षा 'हीं कर े हैं।

44. अप'े क को प्रस् ु कर े हुए डॉ. व' इस न्यायालय क े कई वि'णयों पर अवलंब ले े हैं, जहां विकसी म की आवश्यक प्रर्थीा को विवस् ार विदया गया है और यह देखा गया है विक न्यायालय को विकसी म का आवश्यक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA काय विकस प्रकार वि' ारिर कर'ा चाविहए। क यह है विक संविव ा' पीठ द्वारा उपरोक्त अवलोक'ों को विकसी भी सामग्री पर विवचार विकए विब'ा उसक े वस् ुन्तिस्र्थीति द्वारा विकया गया र्थीा, सिजस कारण से यह कर्थी' अपरिरहाय है।

45. इससे पहले विक हम उपरोक्त कर्थी' की प्रक ृ ति और सामग्री की जांच कर'े क े लिलए आगे बढ़ें, इस न्यायालय द्वारा म क े आवश्यक प्रर्थीाओं क े संबं में वि' ारिर का'ू' का अवलोक' कर'ा प्रासंविगक है। इसका महत्वपूण विवर्षय कविमश्नर, निंहदू ार्मिमक बंदोबस्, मद्रास ब'ाम श्री लक्ष्मींद्र ीर्थी स्वामीयर ऑफ श्री भिशरूर मठ, एआई आर 1954 एससी 282 में इस न्यायालय की संविव ा' पीठ का वि'णय है। भिशरुर मठ क े मठाति पति 'े मद्रास निंहदू ार्मिमक और मार्थी बंदोबस् ी अति वि'यम, 1951 क े विवभिभन्न प्राव ा'ों को चु'ौ ी दे े हुए मद्रास उच्च न्यायालय में एक यातिचका दायर की। अति वि'यम की चु'ौ ी विवभिभन्न आ ारों में शाविमल इस आ ार पर र्थीी विक अति वि'यम क े प्राव ा' भार क े संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह मौलिलक अति कार की गारंटी दे े हैं। उच्च न्यायालय 'े अति वि'यम क े विवभिभन्न प्राव ा'ों को अभिभखंतिड कर विदया र्थीा, सिजसक े विवरूद्ध आयुक्त, निंहदू ार्मिमक बंदोबस् मद्रास द्वारा अपील दायर की गई र्थीी। न्यायमूर्ति बी.क े. मुखज[1] 'े संविव ा' पीठ क े लिलए कहा विक यह कह'ा सही 'हीं होगा विक म एक सिसद्धां या विवश्वास क े अलावा और कु छ 'हीं है। यह मा'ा जा ा र्थीा विक एक म अप'े अ'ुयातिययों क े लिलए 'ैति क वि'यमों की एक संविह ा भी प्रति पाविद कर सक ा है और यह आचार और रीति रिरवाज, अ'ुष्ठा' और पूजा क े ौर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रीक े वि' ारिर कर सक ा है सिजन्हें म क े अभिभन्न अंग क े रूप में मा'ा जा ा है। प्रस् र 17 में वि'म्'लिललिख अव ारिर विकया गया र्थीा:- “17..... म वि'तिश्च रूप से व्यविक्तयों या समुदायों क े सार्थी विवश्वास का विवर्षय है और यह आवश्यक रूप से आन्तिस् क ा 'हीं है। भार में बौद्ध और जै' म जैसे प्रसिसद्ध म हैं जो ईश्वर या विकसी बुतिद्धमा' प्रर्थीम कारण में विवश्वास 'हीं कर े हैं। एक म वि'स्संदेह विवश्वासों या सिसद्धां ों की एक प्रणाली में अप'ा आ ार रख ा है जो उ' लोगों से संबंति हो ा है जो उस म को अप'े आध्यान्तित्मक कuयाण क े लिलए अ'ुक ू ल मा' े हैं, लेविक' यह कह'ा सही 'हीं होगा विक म क ु छ और 'हीं बन्तिuक एक सिसद्धां या विवश्वास है। एक म अप'े अ'ुयातिययों को स्वीकार कर'े क े लिलए ' क े वल 'ैति क वि'यमों की एक संविह ा प्रति पाविद कर सक ा है बन्तिuक यह आचार और रीति रिरवाज, अ'ुष्ठा' और पूजा क े रीक े विवविह कर सक ा है, सिजन्हें म क े अभिभन्न अंग क े रूप में मा'ा जा ा है, और ये रूप और अ'ुसरण भोज' और पोशाक क े मामलों क भी विवस् ारिर हो सक े हैं।”

46. आगे, प्रस् र 18 में, वि'म्'लिललिख प्रति पाविद विकया गया र्थीा: “18. हमारे संविव ा' क े ह गारंटी ' क े वल ार्मिमक म की स्व ंत्र ा की रक्षा कर ी है, बन्तिuक यह म क े अ'ुसरण में विकए गए क ृ त्यों की भी रक्षा कर ी है और इसे अ'ुच्छेद 25 में " म क े अभ्यास" की अभिभव्यविक्त क े उपयोग से स्पष्ट विकया गया है...."

47. न्यायालय 'े आगे अव ारिर विकया; विकसी म क े आवश्यक भाग का गठ' मुख्य रूप से उस म क े सिसद्धां ों क े संदभ में वि' ारिर विकया जा'ा है। प्रस् र 19 में वि'म्'लिललिख प्रति पाविद विकया गया है:- “19. हमें लग ा है इस रह क े व्यापक श [ में ैयार विकया गया क, समर्भिर्थी 'हीं होगा। पहली न्तिस्र्थीति में, विकसी म क े आवश्यक विहस्से का गठ' मुख्य रूप से उस म क े सिसद्धां ों क े संदभ में विकया जा'ा है। यविद निंहदुओं क े विकसी भी ार्मिमक संप्रदाय क े सिसद्धां यह कह े हैं विक भोज' का प्रसाद विद' क े विवशेर्ष घंटों में मूर्ति को चढ़ाया जा'ा चाविहए, ो वर्ष mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े वि'तिश्च समयावति पर उतिच रीक े से पविवत्र अविग्न क े यज्ञ या पविवत्र ग्रंर्थीों क े उच्चारण से पूजा-अच'ा की जा'ी चाविहए, इ' सभी को म क े भाग क े रूप में मा'ा जाएगा और क े वल इस थ्य क े लिलए विक वे पुजारिरयों और 'ौकरों को ' अर्थीवा रोजगार का खच शाविमल कर े हैं या विबक्री योग्य वस् ुओं क े उपयोग से उन्हें मवि'रपेक्ष गति विवति यों को एक वाभिणन्तिज्यक या आर्भिर्थीक चरिरत्र का विहस्सा 'हीं ब'ाया जाएगा; ये सभी ार्मिमक प्रर्थीाएं हैं और इन्हें अ'ुच्छेद 26 (बी) क े अर्थी क े भी र म क े मामलों क े रूप में मा'ा जा'ा चाविहए। जो अ'ुच्छेद 25(2)(क) क े अ'ुसार ार्मिमक प्रर्थीाओं की न्तिस्र्थीति क े अ'ुसार विवचार -विवमश वि'यम' 'हीं है, सिजसकी स्व ंत्र ा की गारंटी संविव ा' द्वारा दी जा ी है, सिसवाय इसक े विक जब वे लोक आदेश, स्वास्थ्य और 'ैति क ा की गण'ा कर े हैं लेविक' उ'क े चरिरत्र में आर्भिर्थीक वाभिणन्तिज्यक या राज'ीति क गति विवति यों का विववि'यम' कर े हैं, हालांविक वे ार्मिमक प्रर्थीाओं से जुड़े हैं......"

48. एक ही वर्ष में दो अन्य वि'णय विदए गए र्थीे, सिजन्हों'े मद्रास क े वि'णय पर अवलम्ब लिलया र्थीा। रति लाल पा'ाचंद गां ी एवं अन्य ब'ाम बॉम्बे राज्य एवं अन्य, एआईआर 1954 एससी 388, प्रस् र संख्या 10 और 13 में वि'म्'लिललिख अव ारिर विकया गया र्थीा:- “10. संविव ा' का अ'ुच्छेद 25 ' क े वल भार ीय 'ागरिरकों को बन्तिuक प्रत्येक व्यविक्त को अं ःकरण की स्व ंत्र ा, स्व ंत्र रूप से म को अप'ा'े का काय और प्रचार कर'े का अति कार की गारंटी दे ा है। यह लोक आदेश, स्वास्थ्य और 'ैति क ा क े प्रत्येक मामले का विवर्षय है। अ'ुच्छेद क े खpड(2) द्वारा इस अति कार पर क ु छ अपवाद विदए गए हैं। खंड (2) का उप-खpड (a) ) विकसी भी आर्भिर्थीक, विवत्तीय, राज'ीति क या अन्य मवि'रपेक्ष गति विवति को विववि'यविम कर'े या प्रति बंति कर'े क े लिलए राज्य की शविक्त को बचा ा है जो ार्मिमक काय से जुड़ा हो mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक ा है; और उपखंड (b) ) सामासिजक सु ार और सामासिजक कuयाण क े लिलए का'ू' प्रदा' कर'े की राज्य की शविक्त को सुरतिक्ष रख ा है, भले ही वे ार्मिमक प्रर्थीाओं में हस् क्षेप कर े हों। इस प्रकार, यह अ'ुच्छेद जो प्रति बं ों क े अ ी' है, हमारे संविव ा' क े ह प्रत्येक व्यविक्त का मौलिलक अति कार है विक ' क े वल ऐसे ार्मिमक विवश्वास पर विवचार कर'े क े लिलए सिजसे उसक े वि'णय या विववेक द्वारा अ'ुमोविद विकया जा सक ा है, बन्तिuक उसक े विवश्वास और विवचारों को इस रह क े प्रत्यक्ष काय[ में प्रदर्भिश कर'ा है, जो उ'क े म द्वारा स्र्थीविग या स्वीक ृ विकए गए हैं और दूसरों की 'ैति क उन्नति क े लिलए उ'क े ार्मिमक विवचारों को प्रसारिर कर े हैं.......

13. ार्मिमक विवश्वास क े अ'ुसरण में ार्मिमक प्रर्थीाओं या काय[ क े प्रदश' में म का उ 'ा ही विहस्सा है सिज 'ा विक विवशेर्ष सिसद्धां ों में आस्र्थीा या विवश्वास का। इस प्रकार यविद जै' या पारसी म क े सिसद्धां ों को प्रति पाविद विकया जा ा है विक क ु छ संस्कार और समारोह वि'तिश्च समय पर और विवशेर्ष रीक े से विकए जा े हैं, ो यह 'हीं कहा जा सक ा है विक ये वाभिणन्तिज्यक या आर्भिर्थीक स्वरूप की मवि'रपेक्ष गति विवति याँ हैं, क्योंविक इ'में ' का व्यय या पुजारिरयों का वि'योज' या विवपण' योग्य वस् ुओं का उपयोग शाविमल है। विकसी भी अन्य प्राति कारी को यह कह'े का कोई अति कार 'हीं है विक ये म क े आवश्यक अंग 'हीं हैं औ रयह राज्य क े मवि'रपेक्ष प्राति करण क े लिलए उपलब् 'हीं है विक वे न्यास सम्पलित्त क े प्रशास' की आड़ में उन्हें विकसी भी रह से प्रति बंति या वि'विर्षद्घ करें..."

49. भिशरूर मठ मामले क े बाद एक अन्य वि'णय श्री जगन्नार्थी रामा'ुज दास एवं अन्य ब'ाम उड़ीसा और अन्य, एआईआर 1954 एससी 400 का मामला र्थीा। श्री वेंकटरमण देवरू एवं अन्य ब'ाम मैसूर राज्य एवं अन्य, एआईआर 1958 एससी 255 में संविव ा' पीठ 'े मद्रास मंविदर प्रवेश प्राति करण अति वि'यम, 1947 क े संदभ में भार क े संविव ा' क े अ'ुच्छेद mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 25 और 26 पर विवचार कर'े का अवसर विदया र्थीा। भिशरूर मठ मामले को सन्दर्भिभ कर े हुए, प्रस् र 16(3) में यह कहा गया र्थीा विक:- "16(3)....आयुक्त, निंहदू ार्मिमक बंदोबस् मद्रास ब'ाम श्री लक्ष्मींद्र ीर्थी स्वामी ऑफ श्री भिशरूर मठ (एआईआर 1954 एससी 282) में अब इस न्यायालय द्वारा विवचार क े लिलए " म क े मामलों" की अभिभव्यविक्त का वि'य संक े ार्थी साम'े आया, और उसमें यह अव ारिर विकया गया र्थीा विक यह क े वल म से संबंति सिसद्धां और विवश्वास क े मामलों को ही 'हीं बन्तिuक इसक े कर'े का भी है या इसे निंहदू मशास्त्रों क े संदभ में ' क े वल इसक े ज्ञा' की बन्तिuक भविक्त और कमकाpड पर भी है...."

50. एक अन्य वि'णय सिजस पर ध्या' दे'े की आवश्यक ा है, वह मोहम्मद ह'ीफ क ु रैशी एवं अन्य ब'ाम विबहार राज्य, एआईआर 1958 एससी 731 है। अ'ुच्छेद 32 क े ह एक रिरट यातिचका क्रमशः विबहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों द्वारा पारिर कु छ जा'वरों की हत्या पर प्रति बं लगा'े वाले ी' विव ायी अति वि'यमों की वै ा पर प्रश्न कर े हुए दायर की गई र्थीी। यातिचकाक ा द्वारा उठाए गये एक क में कहा गया र्थीा विक गायों की हत्या पर प्रति बं लगा'े से यातिचकाक ा क े मौलिलक अति कार का उHंघ' हो ा है, जो बकरीद पर गाय की बलिल दे े हैं। न्यायालय 'े उपरोक्त संदभ में इस्लाम म क े आवश्यक काय पर विवचार कर'े क े लिलए कहा। न्यायालय 'े म क े आवश्यक काय क े वि' ारण कर'े क े लिलए इससे पहले रखी गई सामग्री की जांच की और प्रस् र 13 में वि'म्'लिललिख अवलोक'ों को उद्धृ विकया:mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “ ब क्या, हम पूछ े हैं विक क्या हमारे साम'े इस दावे को पुष्ट कर'े क े लिलए थ्य रखे गए हैं विक गाय की हत्या को इस्लाम द्वारा स्वीकार या मंजूरी दी जा ी है?हमारे साम'े यह थ्य बहु छोटा है और इसक े सन्दभ क े थ्य पर चविक कर'े की बा है अ ः यातिचका में आरोप इ 'े अस्पष्ट हो'े चाविहए। विबहार यातिचका संख्या 58 वर्ष 1956 में वि'म्'लिललिख इकलौ ा आरोप लगाया गया है: Xxxxxxxxxxxxxxxxx हालाँविक, हमारे समक्ष अभिभलेख पर कोई भी सामग्री 'हीं है, जो हमें पूवगामी थ्यों क े साम'े यह कह'े में सक्षम ब'ाए विक उस विद' एक गाय का बलिलदा' एक मुसलमा' क े लिलए अवि'वाय प्रकट कम है जो उसकी ार्मिमक मान्य ा और विवचार को प्रदर्भिश कर ा है। इस परिरसर में, यातिचकाक ाओं क े इस दावे को मा''ा हमारे लिलए संभव 'हीं है।”

51. विवचार कर'े वाला अगला मामला सरदार सैयद'ा ाविहर सैफ ु द्दी' साहब ब'ाम बॉम्बे राज्य, एआईआर 1962 एससी 853 है। उपरोक्त मामले में इस न्यायालय क े समक्ष उठाया गया मुद्दा अप'े सदस्यों को बविहष्कृ कर'े क े लिलए ार्मिमक संप्रदाय क े अति कार क े सार्थी हस् क्षेप कर'े वाले का'ू' की वै ा क े बारे में र्थीा। उपरोक्त संदभ में अ'ुच्छेद 25 और 26 पर विवचार विकया गया। इस न्यायालय क े पूव क े वि'णयों का सिजक्र कर े हुए, वि'णय क े प्रस् र 34 में मुख्य सिसद्धां ों पर ध्या' विदया गया है, जो वि'म्'लिललिख प्रभाव रख ा है:- "34. संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 की अन् वस् ु इस न्यायालय क े समक्ष 1954 एससीआर 1005: (एआईआर 1954 एस.सी. 282); रामा'ुज दास ब'ाम उड़ीसा राज्य, 1954 एससीआर 1046: (एआईआर 1954 एस.सी. 400); 1958 एससीआर 895: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (एआईआर 1958 एस.सी. 255); सिसविवल अपील संख्या 272 वर्ष 1969 डी/-17-3-1961: (एआईआर 1961 एस.सी. 1402) पर विवचार क े लिलए आई र्थीी और कई अन्य मामलों और इ' प्राव ा'ों द्वारा अं र्मि'विह मुख्य सिसद्धां ों को विववादों से परे रखा गया है। पहला यह है विक इ' अ'ुच्छेदों की सुरक्षा सिसद्धां या विवश्वास क े मामलों में सीविम 'हीं है, वे म क े अ'ुसरण में विकए गए काय[ का भी विवस् ार कर े हैं और इसलिलए अ'ुष्ठा'ों और रीति रिरवाजों, समारोहों और पूजा क े रीकों की गारंटी हो ी है जो म क े अभिभन्न अंग हैं। दूसरा यह है विक विकसी म या ार्मिमक प्रर्थीा क े एक अवि'वाय विहस्से का गठ' न्यायालयों द्वारा विकसी विवशेर्ष म क े सिसद्धां क े संदभ में विकया जा'ा है और इसमें उ' प्रर्थीाओं को शाविमल विकया जा ा है सिजन्हें समुदाय द्वारा अप'े म क े विहस्से क े रूप में मा'ा जा ा है।”

52. विवचार विकया जा'े वाला अगला वि'णय विटक ै श्री गोनिंवदलालजी महाराज आविद ब'ाम राजस्र्थीा' राज्य एवं अन्य, एआईआर 1963 एससी 1638 का संविव ा' पीठ का वि'णय है। 'ार्थीद्वारा मंविदर अति वि'यम, 1959 की वै ा को राजस्र्थीा' उच्च न्यायालय में चु'ौ ी दी गई र्थीी। ति लकाय द्वारा यह क विदया गया र्थीा विक 'ार्थीद्वारा मंविदर में श्री श्री'ार्थीजी की मूर्ति और उससे संबंति सभी संपलित्तयाँ उ'की वि'जी संपलित्त र्थीी और इसलिलए, राज्य विव ा'मंडल अति वि'यम पारिर कर'े क े लिलए सक्षम 'हीं र्थीा। यह भी क विदया गया र्थीा विक यविद मंविदर को सावजवि'क मंविदर मा'ा जा ा है, ो अति वि'यम अमान्य होगा क्योंविक इस'े संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संप्रदाय की गारंटी क े मौलिलक अति कारों की अवहेल'ा की र्थीी। न्यायमूर्ति गजेन्द्रगडकर, 'े न्यायालय क े लिलए बोल े हुए प्रस् र 58 एवं 59 में वि'म्'लिललिख प्रति पाविद विकया: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "58. इस प्रश्न को य कर'े में विक क्या कोई दी गई ार्मिमक परिरपाटी म का अभिभन्न अंग है या 'हीं, परीक्षण हमेशा यह होगा विक क्या इसे म क े बाद समुदाय द्वारा मा'ा जा ा है या 'हीं। यह सिसद्धान् कु छ मामलों में इसक े कायान्वय' में कविठ'ाइयाँ ला सक ा है। भोज' या पोशाक क े संबं में विकसी प्रर्थीा का मामला ले े हैं। यविद दी गई कायवाही में, समुदाय का एक वग दावा कर ा है विक क ु छ संस्कारों में श्वे पोशाक का उपयोग कर'ा ही म का एक अभिभन्न अंग है, जबविक एक अन्य वग यह मा' ा है विक श्वे रंग की पोशाक 'हीं बन्तिuक पीला पोशाक म का अवि'वाय विहस्सा है, ो न्यायालय यह प्रश्न क ै से य कर'े जा रही है? भोज' क े संबं में इसी रह क े विववाद उत्पन्न हो सक े हैं। ऐसे मामलों में, जहां विवरो ी क[ क े संबं में परस्पर-विवरो ी साक्ष्य उत्पन्न हो े हैं, जैसे विक ार्मिमक प्रर्थीाओं की प्रति स्प ा क े लिलए न्यायालय उस सिसद्धान् को विववेकशून्य अ'ुप्रयोग द्वारा विववाद को हल कर'े में सक्षम 'हीं हो सक ा है और समुदाय यह य कर ा है विक कौ' सा रीति रिरवाज उसक े म का अभिभन्न अंग है, क्योंविक समुदाय में लोगों की राय भिभन्न भिभन्न हो सक ी है, इसलिलए सिसद्धान् टूट जाएगा। यह प्रश्न हमेशा न्यायालय द्वारा य विकया जा'ा चाविहए और ऐसा कर'े पर, न्यायालय को यह जाँच कर'ी पड़ सक ी है विक क्या प्रश्नग रीति रिरवाज की प्रक ृ ति ार्मिमक है और यविद है, ो क्या इसे म का अभिभन्न या आवश्यक अंग मा'ा जा सक ा है, इस रह क े मुद्दे पर न्यायालय का वि'ष्कर्ष हमेशा समुदाय क े विववेक और उसक े म क े सिसद्धां ों क े रूप में इससे पहले जुड़े साक्ष्यों पर वि'भर करेगी। यह इस संभाविव जविटल ा क े प्रकाश में है जो क ु छ मामलों में उत्पन्न हो सक ी है विक इस न्यायालय 'े डूंगा कमेटी अजमेर ब'ाम सैयद हुसै' अली एवं अन्य 18 क े मामले में साव ा'ी बर ी और अवलोक' करक े आदेश विदया विक प्रश्नग प्रर्थीाओं को म क े एक ऐसे भाग क े रूप में मा'ा जा'ा चाविहए सिजसे वे उक्त म द्वारा अप'ा आवश्यक और अभिभन्न अंग मा' े हैं; अन्यर्थीा यहां क विक विवशुद्ध रूप से मवि'रपेक्ष प्रर्थीाओं जो विक म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग 'हीं हैं वे ार्मिमक रूप ारण कर'े क े लिलए उपयुक्त हैं और अ'ुच्छेद 26 क े अर्थी क े भी र ार्मिमक प्रर्थीाओं क े रूप में व्यवहार विकए जा'े का दावा कर सक े हैं। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

59. इस संबं में, यह 'जरअंदाज 'हीं विकया जा सक ा है विक क्रमशः अ'ुच्छेद 25(1) और 26(बी) क े ह जो संरतिक्ष है, वे ार्मिमक रीति रिरवाजों और म क े मामलों में काय[ क े प्रबं ' का अति कार है। यविद विवचारा ी' रीति रिरवाज विवशुद्ध रूप से पंर्थीवि'रपेक्ष है या वै ावि'क रूप से वि'यंवित्र हो'े वाला संबं अवि'वाय रूप से और व्यवहार में विबuकु ल पंर्थीवि'रपेक्ष है, ो यह क 'हीं विकया जा सक ा है विक अ'ुच्छेद 25(1) या अ'ुच्छेद 26(बी) का उHंघ' विकया गया है। म क े रीति रिरवाज को और म क े मामलों में अप'े स्वयं क े मामलों को प्रबंति कर'े क े संप्रदाय क े अति कार को संरक्षण विदया जा ा है। इसलिलए, जब भी एक व्यविक्तग 'ागरिरक की ओर से यह दावा विकया जा ा है विक जब भी विकसी व्यविक्त की ओर से एक दावा विकया जा ा है विक आक्षेविप क़ा'ू' म क े रीति रिरवाजों को उसक े मौलिलक अति कार का उHंघ' कर ा है या इस संप्रदाय की ओर से दावा विकया जा ा है विक म क े मामलों में अप'े स्वयं क े काय[ का प्रबं ' कर'े क े लिलए इसे मौलिलक अति कार की गारंटी दी गई है, इस पर विवचार कर'ा आवश्यक है विक क्या प्रश्नग रीति रिरवाज ार्मिमक है या सिज' मामलों में प्रबं ' क े अति कार का उHंघ' विकया गया है, उ'क े संबं में म क े मामलों में मामलों का उHेख है। यविद प्रर्थीा एक ार्मिमक प्रर्थीा है या मामले म क े मामले हैं ो वि'तिश्च रूप से अ'ुच्छेद 25(1) और अ'ुच्छेद 26(बी) द्वारा गारंटीक ृ अति कार का उHंघ' 'हीं विकया जा सक ा है।”

53. इस न्यायालय का उपरोक्त वि'णय स्पष्ट रूप से यह कह ा है विक क्या विवशेर्ष रूप से ार्मिमक रीति रिरवाज का आवश्यक या अभिभन्न अंग है यह एक प्रश्न है, जो विक म क े 'ीति यों, सिसद्धां ों और विवश्वासों पर ध्या' रख े हुए मा'ा गया है। जब विक डॉ. व' का क है विक इस्माईल फारुकी क े मामले में संविव ा' पीठ 'े विब'ा विकसी म की अवि'वाय ा क े विवचार विकया है, जैसा विक ऊपर विदए गए प्रस् र 82 में विवचारणीय अवलोक' विकया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

54. हम'े संविव ा' पीठ का वि'णय प्रस् र 82 में विदए गए अवलोक'ों की जांच ऊपर की गई विवति, का'ू' और पूव में ध्या' विदए गये क[ क े आलोक में की है। कर्थी' "एक मन्तिस्जद म की प्रर्थीा का अवि'वाय विहस्सा 'हीं है....." एक कर्थी' है सिजसे संविव ा' पीठ द्वारा विवभिशष्ट परिरप्रेक्ष्य और संदभ में ब'ाया गया है। उपरोक्त अवलोक' का संदभ अज' से एक मन्तिस्जद की प्रति रक्षा कर'े का दावा र्थीा। क्या प्रत्येक मन्तिस्जद इस्लाम क े म की प्रर्थीा का मूलभू अंग है, सिजसक े अज' क े कारण अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह अति कारों का स्वयमेव उHंघ' हो सक ा है, यह प्रश्न र्थीा सिजसे संविव ा' पीठ क े समक्ष विवचार क े लिलए रखा गया र्थीा। यह कर्थी' विक मन्तिस्जद इस्लाम क े म की प्रर्थीा का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है, इस मुद्दे क े संदभ में है विक क्या मन्तिस्जद, सिजसे अति वि'यम, 1993 द्वारा अर्जिज की गई र्थीी, में अज' से प्रति रक्षा र्थीी।

55. संविव ा' पीठ द्वारा उपरोक्त अवलोक' इस बा पर जोर दे'े क े लिलए विकया गया है विक अज' हो'े से मन्तिस्जद की कोई प्रति रक्षा 'हीं है। हम'े ध्या' विदया है विक संविव ा' पीठ 'े यह अव ारिर विकया र्थीा विक प्रार्थी'ा या पूजा कर'ा एक ार्मिमक प्रर्थीा है और प्रत्येक स्र्थीा' पर प्रार्थी'ा की जा सक ी है और जहाँ इस रह की प्रार्थी'ाएँ की जा सक ी हैं, वह इस रह की ार्मिमक प्रर्थीा का अवि'वाय या अभिभन्न अंग 'हीं होगा जब क विक उस स्र्थीा' का उस म क े लिलए कोई विवशेर्ष महत्व ' हो, ाविक उसक े लिलए एक आवश्यक या अभिभन्न अंग ब' सक े । प्रस् र 78 में विकए गए उपरोक्त अवलोक' को प्रस् र 82 में विदए गए अवलोक' क े सार्थी पढ़ा जा'ा चाविहए। न्यायालय का आशय यह र्थीा विक जब क पूजा कर'े की जगह का कोई mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खास महत्व ' हो, ाविक पूजा क े लिलए कोई बा ा अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह उHंघ' करे, विकसी भी स्र्थीा' पर पूजा कर'े में कोई बा ा अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह सही प्रभाव 'हीं डालेगी। प्रस् र 82 में जैसा अवलोक' ऊपर उद्धृ विकया गया है, उसी प्रस् र में विकए गए आगे क े अवलोक' क े सार्थी समझा जा'ा चाविहए जहां न्यायालय 'े यह अव ारिर विकया विकया र्थीा: "82....जाविहर है, विकसी भी ार्मिमक स्र्थीा' का अज' क े वल एक बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य क े लिलए असामान्य और असा ारण न्तिस्र्थीति यों में विकया जा'ा है, यह ध्या' में रख े हुए विक इस रह क े अज' से म क े रीति रिरवाज कर'े क े अति कार क े लोप हो'े का परिरणाम 'हीं हो'ा चाविहए, यविद उस स्र्थीा' का महत्व इस प्रकार है। इस श क े अ ी', अति ग्रहण की शविक्त मन्तिस्जद क े लिलए विकसी भी म क े विकसी भी पूजा स्र्थील की रह प्राS है। विकसी भी और प्रत्येक स्र्थील पर पूजा कर'े का अति कार 'हीं है, इसलिलए यह प्रभावी ढंग से रीति रिरवाज विकया जा सक ा है, जब क विक विकसी विवशेर्ष स्र्थील पर पूजा कर'े का अति कार स्वयं उस अति कार का अभिभन्न अंग 'हीं है।”

56. न्यायालय 'े यह अव ारिर विकया विक यविद 'माज़ पढ़'े का स्र्थीा' विवशेर्ष महत्व का है, ो इसका अज' कर'े से म क े रीति रिरवाज क े अति कार का लोप हो सक ा है, क े वल उस न्तिस्र्थीति में अज' स्वीकाय 'हीं है और यह न्तिस्र्थीति इसक े अ ी' है, अति ग्रहण की शविक्त मन्तिस्जद क े लिलए विकसी भी म क े विकसी भी पूजा स्र्थील की रह प्राS है। इस प्रकार, प्रस् र 82 में विकए गए अवलोक' विक मन्तिस्जद इस्लाम म की प्रर्थीा का एक अवि'वाय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विहस्सा 'हीं है और यहां क विक खुले में 'माज भी अदा की जा सक ी है और यह क यातिचकाक ाओं द्वारा मन्तिस्जद क े अति ग्रहण की प्रति रक्षा क े विवर्षय में विकया गया र्थीा

57. सिजस क पर संविव ा' पीठ क े समक्ष बल विदया गया र्थीा वह यह र्थीा विक इस्लाम म क े रीति रिरवाज क े महत्व क े बावजूद राज्य में विकसी भी मन्तिस्जद को अति गृही कर'े की कोई शविक्त 'हीं है। उक्त क को वि'णय क े प्रस् र 65 में ध्या' विदया गया है जो विक ऊपर उद्धृ विकया गया है।

58. यह वाक्य "एक मन्तिस्जद इस्लाम म क े रीति रिरवाज का अवि'वाय विहस्सा 'हीं है और मुन्तिस्लमों द्वारा 'माज़ (इबाद ) को विकसी भी स्र्थील, यहां क विक खुले में भी अदा की जा सक ी है" अगले वाक्य क े ुरं बाद है विक " द'ुसार, इसका अज' भार क े संविव ा' में प्राव ा'ों को वि'विर्षद्ध 'हीं विकया गया है" जो यह स्पष्ट कर ा है विक उपरोक्त वाक्य एक मन्तिस्जद क े अज' से प्रति रक्षा क े प्रश्न क सीविम र्थीी, सिजसे न्यायालय क े समक्ष तिचवित्र विकया गया र्थीा। पहले वाक्य को दूसरे वाक्य से अलग 'हीं पढ़ा जा सक ा है जो पहले वाक्य का त्काल पाल' कर ा है।

59. संविव ा' पीठ क े समक्ष कोई क 'हीं उठाया जा रहा है विक राम जन्म भूविम-बाबरी मन्तिस्जद एक विवशेर्ष महत्व की मन्तिस्जद है, सिजसक े अति ग्रहण से म क े रीति रिरवाज का अति कार विवलुS हो जाएगा, न्यायालय इस वि'ष्कर्ष पर पहुंची र्थीी विक मन्तिस्जद क े अति कारों का अति ग्रहण करक े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह उHंघ' 'हीं विकया जा ा है। हम यह वि'ष्कर्ष वि'काल े हैं विक संविव ा' पीठ द्वारा प्रस् र 78 और 82 में विकए गये अवलोक'ों सिज' पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यातिचकाक ाओं 'े सवाल उठाए र्थीे, क े अ'ुसार वे पूजा स्र्थील क े अति ग्रहण क े संदभ में विकए गए अवलोक' र्थीे और उन्हें क े वल पूजा स्र्थील क े अति ग्रहण क े मुद्दे पर सीविम कर'ा र्थीा। इस अवलोक' को मोटे ौर पर पढ़'े की आवश्यक ा 'हीं है विक इस्लाम म की प्रर्थीा का एक अवि'वाय विहस्सा कभी भी मन्तिस्जद 'हीं हो सक ा है। " ुल'ात्मक महत्व" और "विवशेर्ष महत्व"

60. डॉ राजीव व' 'े क विदया विक संविव ा' पीठ 'े उ' दो'ों स्र्थीा'ों का ुल'ात्मक महत्व विकया है जो निंहदुओं क े लिलए राम का जन्म स्र्थीा' और मुसलमा'ों क े लिलए राम जन्म भूविम-बाबरी मन्तिस्जद है। उन्हों'े कहा विक भार एक मवि'रपेक्ष देश है और सभी म[ को समा' मा'ा जा ा है और ुल'ात्मक महत्व की अव ारणा प्रस् ु कर े हुए न्यायालय 'े पंर्थीवि'रपेक्ष सिसद्धां ों की दृविष्ट को खो विदया है जो भार क े संविव ा' में अं र्मि'विह है। यह सच है विक संविव ा' पीठ 'े " ुल'ात्मक महत्व" वाक्यांश का उपयोग विकया है, लेविक' दो'ों समुदायों क े ुल'ात्मक महत्व को क े वल उस स्र्थीा' क े महत्व को तिचन्हांविक कर'े क े लिलए ध्या' विदया है जो दो'ों पक्षकारों द्वारा दावा विकया गया है और इस बा पर जोर दे'े क े लिलए विक अति ग्रहण का प्रभाव निंहदू समुदाय क े सार्थी-सार्थी मुन्तिस्लम समुदाय क े अति कार और विह पर समा' रूप से पड़ ा है। वि'णय क े प्रस् र 51 में वि'म्'लिललिख अवलोक' विकया गया है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

"51. यह भी उHेख विकया जा सक ा है विक भले ही अयोध्या को निंहदओ के लिलए ीर्थी स्र्थीा' के रूप में विवशेर्ष महत्व के रूप में कहा जा ा है क्योंविक वहाँ पर भगवा' राम का जन्म हुआ र्थीा और 1528 ई. में मीर बाकी द्वारा वि'र्मिम एक प्राची' मन्तिस्जद के रूप में मुन्तिस्लम समुदाय के लिलए मन्तिस्जद का महत्व र्थीा। एक मन्तिस्जद के रूप में , यह मुन्तिस्लमों का ार्मिमक उपास'ा स्र्थील र्थीा। यह दो समुदायों के लिलए विववाविद स्र्थील के ुल'ात्मक महत्व को दर्भिश कर ा है और यह भी विक अज' का प्रभाव निंहद ू समुदाय के अति कार और विह पर समा' रूप से पड़ ा है। इस पहलू का उHेख केवल इस क के संदभ में विकया जा ा है विक संपूण ु ं के पक्ष में और मुसलमा'ों क़ा'ू', ' विक केवल उसकी ारा 7, निंहदओ के विवरुद्ध एक पंर्थीवि'रपेक्ष विवरो ी है।”

61. डॉ. व' 'े 'विवशेर्ष महत्व' वाक्यांश क े अपवाद को भी लिलया है, जैसा विक संविव ा' पीठ क े फ ै सले में हो रहा है। वह क दे े हैं विक सभी म समा' हैं और राज्य सविह सभी को समा' रूप से सम्मा' दे'ा होगा। सभी मन्तिस्जदें, सभी चच और सभी मंविदर समा' रूप से ऐसे म[ क े रीति यों को कर'े वाले और उन्हें स्वीकार कर'े वाले समुदायों क े लिलए समा' रूप से महत्वपूण हैं। यह अव ारणा विक कु छ स्र्थीा' विवशेर्ष महत्व क े हैं, स्वयं दोर्षपूण है। हम'े मामले क े उपरोक्त पहलू पर अप'ा विवचार रखा है। हम पहले ही देख चुक े हैं विक संविव ा' पीठ 'े यह अव ारिर विकया है विक संपलित्त अर्जिज कर'े क े लिलए अति ग्रहण की गई संपलित्त प्राS कर'े क े लिलए राज्य की एक संप्रभु या विवशेर्षाति कार शविक्त है और सभी ार्मिमक स्र्थीा', जैसे चच, मन्तिस्जद, मंविदर आविद राज्य क े प्रति विष्ठ क्षेत्रों क े अति कार का प्रयोग कर'े क े लिलए उत्तरदायी हैं। संविव ा' पीठ 'े यह भी अवलोक' विकया विक चच, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मन्तिस्जद आविद क े प्रति ार्मिमक उपास'ा स्र्थील का अति ग्रहण अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह अति कारों का स्वयंमेव उHंघ' 'हीं कर ा है। हालांविक, न्यायालय 'े इस रह क े अति ग्रहण पर एक श्रंखला को देखा है। संविव ा' पीठ 'े अव ारिर विकया विक यविद विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' का उस म क े लिलए इ 'ा महत्व है विक ऐसे स्र्थीा' पर पूजा एक आवश्यक ार्मिमक प्रर्थीा है और ऐसे स्र्थीा' का लोप अ'ुच्छेद 25 क े उसक े अति कार को भंग कर सक ा है, ो ऐसे स्र्थीा' का अति ग्रहण स्वीकाय 'हीं है। उपरोक्त संदभ में संविव ा' पीठ द्वारा विवशेर्ष महत्व क े स्र्थीा' को देखा गया है। जब इस रह क े स्र्थीा' क े अति ग्रहण से म का पाल' कर'े क े अति कार का लोप हो ा है, ो अ'ुच्छेद 25 का उHंघ' हो ा है, जो विक संविव ा' पीठ द्वारा प्रति पाविद एक अपवाद र्थीा, जो संविव ा' पीठ द्वारा सामान्य प्रस् ाव रख े हुए एक अपवाद र्थीा विक सभी पूजा स्र्थीलों का अति ग्रहण अ'ुमन्य है। इस प्रकार, राज्य क े ार्मिमक स्र्थीलों जैसे चच, मन्तिस्जद और मंविदर या गुरुद्वारा क े अति ग्रहण की सामान्य शविक्त क े अपवाद को बाहर वि'काल'े क े लिलए संविव ा' में 'विवशेर्ष महत्व क े स्र्थीा'' का इस् ेमाल कर'े वाली संविव ा' पीठ क े लिलए कोई अपवाद 'हीं लिलया जा सक ा है। संविव ा' पीठ द्वारा उक े रा गया उपरोक्त अपवाद अ'ुच्छेद 25 क े ह गारंटीक ृ संवै ावि'क अति कार की रक्षा कर'ा है। भगवा' राम क े जन्म स्र्थीा' का 'विवशेर्ष महत्व' mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

62. डॉ. व' 'े संविव ा' पीठ क े अवलोक' को अपवाद लिलया है, जहां भगवा' राम क े जन्म स्र्थीा' का विवशेर्ष महत्व मा'ा गया है। उन्हों'े क विकया विक उपरोक्त अवलोक' अ'ावश्यक र्थीा क्योंविक दो म[ क े बीच कोई ुल'ा 'हीं की जा सक ी है। हम'े ऊपर देखा है विक "विवशेर्ष महत्व" वाक्यांश का प्रयोग संविव ा' पीठ द्वारा क े वल अति ग्रहण से प्रति रक्षा क े संदभ में विकया गया र्थीा। न्यायालय 'े यह अव ारिर विकया र्थीा विक यविद विकसी ार्मिमक स्र्थीा' का विवशेर्ष महत्व है, ो उसका अति ग्रहण वास् व में अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह म क े अति कार का उHंघ' कर ा है, इसलिलए उक्त पूजा स्र्थील अति ग्रहण से प्रति रतिक्ष है। यह और बा है विक भगवा' राम क े जन्म स्र्थीा' को निंहदू समुदाय क े लिलए पविवत्र स्र्थीा' क े रूप में जा'ा जा ा है, सिजस क को हमेशा ही प्रस् ु विकया जा ा रहा है। अति वि'यम, 1993 क े ह मामले का अति ग्रहण बरकरार रख'े क े विकसी भी दृविष्टकोण में, "विवशेर्ष महत्व" अभिभव्यविक्त क े प्रयोग 'े वादों और अपीलों क े वि'णय क े लिलए अप'ा सारा महत्व खो विदया है। पूव - न्याय

63. श्री परासर' 'े क विदया विक अपीलक ाओं को इस्माइल फारुकी क े वि'णय पर सवाल उठा'े से रोका जा ा है। इस्माइल फारुकी क े मामले में यातिचकाक ा 'े मुन्तिस्लम ज' ा क े अति कार का प्रति वि'ति त्व विकया, इसलिलए ारा 11 क े प्रयोज'ों क े लिलए ऐसे अति कारों में रुतिच रख'े वाले सभी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्यविक्तयों को ऐसे मुकदमेबाजी क े ह दावा कर'े क े लिलए समझा जा ा है और स्पष्टीकरण VI क े ारा 11, सीपीसी क े मद्दे'जर पूव-न्याय द्वारा रोक विदया जा ा है। उन्हों'े आगे कहा विक इस्माइल फारुकी क े मामले में वि'णय वाद में ही वि'णय का विहस्सा है, इस थ्य क े मद्दे'जर विक वादों में आईए को स्र्थीा'ां रिर कर विदया गया र्थीा और अ'ुच्छेद 32 क े ह यातिचकाओं क े सार्थी वि'णय लिलया गया र्थीा। अपीलक ा इस प्रकार इस्माइल फारुकी क े मामले में वि'णय से स्पष्ट रूप से बाध्य हैं।

64. अति वि'यम, 1993 को चु'ौ ी, राष्ट्रपति का संदभ और आगे क्या अति वि'यम, 1993 क े आलोक में अति वि'यम की ारा 4 (3) क े कारण अभिभयोग समाS कर विदया गया। अपील क े ह मामले उ' मुकदमों से हैं जहां विववाद्यक पूरी रह से अलग हैं। वादों को इस्माइल फारुकी क े वाद क े सार्थी वि'णय क े लिलए कभी स्र्थीा'ां रिर 'हीं विकया गया। इस्माइल फारुकी क े मामले में विदए गए वि'णय को वाद में विदए गये वि'णय का विहस्सा 'हीं कहा जा सक ा है। उन्हों'े कहा विक इस्माइल फारुकी क े मामले में जो मुद्दे उठाए गए र्थीे, वे विववाद्यक में 'हीं र्थीे जो वाद में प्रत्यक्ष और मूल रूप से विववाद्यक में हैं। वह आगे कह े है विक व मा' कायवाही में पूव न्याय लागू 'ही हो ा है।

65. सिसविवल प्रविक्रया संविह ा की ारा 11 क े सार्थी-सार्थी सामान्य सिसद्धां ों में वि'विह पूव न्याय का सिसद्धां इस न्यायालय क े कई वि'णयों द्वारा सुस्र्थीाविप विकया गया है। पूव न्याय क े सिसद्धां की प्रयोज्य ा क े लिलए कई आवश्यक mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA श ‡ हैं सिजन्हें पूरा कर'े की आवश्यक ा है। अप'े थ्यों क े समर्थी' में श्री परासरण जी 'े कहा विक इस्माइल फारूकी क े मामलें में पक्षकारों 'े मुन्तिस्लम समुदाय क े विह का प्रति वि'ति त्व विकया र्थीा और उ' यातिचकाक ाआें क े द्वारा सावजवि'क अति कारों क े सम्बन् में सदभाव पूवक मुकदमेंबाजी की गइ, इसलिलए ऐसे अति कारों में रुतिच रख'े वाले सभी व्यविक्तयों को सीपीसी की ारा 11 क े स्पष्टीकरण की प्रयोज्य ा क े ह उ' व्यविक्तयों क े अ ी' दावा कर'े क े लिलए समझा जाएगा। उन्हों'े अहमद अदम सै और अन्य ब'ाम इ'ाय उHाह मेखरी और अन्य, 1964 (2) एससीआर 647 में न्यायालय क े फ ै सले पर अवलंम्ब लिलया। उपरोक्त मामले में, सीपीसी क े ारा 92 क े ह वाद में, एक योज'ा सक्षम न्यायक्षेत्र क े न्यायालय द्वारा पहले ही ैयार की जा चुकी र्थीी। एक और मुकदमा सीपीसी की ारा 92 क े ह जुम्मा मन्तिस्जद क े उतिच प्रशास' क े लिलए एक योज'ा को ैयार कर'े की प्रार्थी'ा कर े हुए स्र्थीाविप विकया गया र्थीा। सिजसमें पूव न्याय की दलील का आग्रह विकया गया र्थीा। पू्व न्याय की दलील को कायम रख े हुए, वि'म्'लिललिख अव ारिर विकया गयाः- “......... इस क की विवति मान्य ा का मूuयांक' कर'े में, उ' विववि'श्चयों क े आ ार पर विवचार कर'ा आवश्यक है जो ारा 92 क े अ ी' वाद में पारिर तिडक्री सभी पक्षकारों को आबद्ध कर ी है इस म का आ ार यह है विक ारा 92 क े अ ी' वाद, प्रति वि'ति वाद है और न्यास में विह बद्ध सभी विह ाति कारिरयों की ओर से उसक े द्वारा अपेतिक्ष आवश्यक अ'ुमोद' क े सार्थी लाया जा ा है उक्त ारा न्यास में रुतिच mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रख'े वाले दो या दो से अति क व्यविक्तयों को वि' ारिर लिललिख सहमति क े बाद उप ारा (1) क े ारा (ए) से (एच) में वि'र्मिदष्ट राह का दावा कर'े क े लिलए मुकदमा दायर कर'े क े लिलए अति क ृ कर ा है। इस प्रकार, जब कोई मुकदमा ारा 92 क े ह लाया जा ा है, ो वह न्यास में रुतिच रख'े वाले दो या दो से अति क व्यविक्तयों द्वारा लाया जा ा है सिजन्हों'े न्यास क े सभी लाभार्भिर्थीयों का प्रति वि'ति त्व कर'े की सिजम्मेदारी अप'े उपर ली है। इस प्रकार क े मुकदमे में, हालांविक सभी लाभार्भिर्थीयों को स्पष्ट रूप से वि'विह 'हीं विकया जा सक ा है आैर कारवाई उ'की ओर से की जा ी है और एक प्रति वि'ति क े रूप में राह का दावा विकया जा ा है। ये न्तिस्र्थीति संविह ा की अ'ुच्छेद 11 क े स्पष्टीकरण VI क े प्राव ा'ों को आकर्मिर्ष कर ा है। स्पष्टीकरण VI यह प्राव ा' कर ा है विक जहाँ सावजवि'क अति कार या विकसी व्यविक्तग अति कार वाला व्यविक्त अप'े या दूसरों क े लिलए सदभाव'ा पूवक वाद का दावा कर े है, इस रह क े अति कारों में रूतिच रख'े वाले सभी व्यविक्तयों को इस ारा क े उद्देश्य क े लिलए वादकारी व्यविक्त मा''े का दावा विकया जा सक ा है यह स्पष्ट है विक ारा 11 को स्पविष्टकरण VI क े सार्थी पढ़'े पर यह इस परिरणाम की ओर ले जा ा है विक विकसी व्यविक्त द्वारा संन्तिस्र्थी वाद में यह तिडविक्र जारी की गइ हे सिजसमें स्पविष्टकरण VI लागू हो ा है ो यह समा' अति कार सिजसक े सम्बन् में पूव वाद संन्तिस्र्थी विकया गया र्थीा, में रूतिच ले'े वाले व्यविक्त क े लिलए वर्जिज होगा। स्पष्टीकरण VI इस प्रकार रच'ात्मक पूव न्याय क े एक पहलू को दशा ा है। जहाँ एक प्रति वि'ति वाद ारा 92 क े ह लाया जा ा है आैर इस प्रकार क े वाद में तिड्रकी पारिर की जा ी है, विवति यह अ'ुमा' लगा ी है विक वादी क े जैसे समा' विह रख'े वाले व्यविक्त उस प्रति वि'ति वाद में उक्त वादी क े द्वारा प्रति वि'ति त्व विकया जा ा है आैर इसलिलए वे पूव न्याय क े द्वारा रचा'ात्मक रूप से उक्त पूव वाद क े म विववाद्यक को मूल रूप से सी े मामलें को पु'ः सयोसिज विकया जा'ा वर्जिज विकया जा ा है।"

66. दो'ों पक्षों क े विवद्वा' अति वक्ताें 'े गुलाबचंद छोटेलाल पारिरख ब'ाम गुजरा राज्य, एआईआर 1965 एससी 1153 में इस न्यायालय की संविव ा' पीठ क े वि'णय का संन्दभ विदया है और उस पर अवलंम्ब् लिलया है। क्या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संविव ा' क े अ'ुच्छेद 226 क े ह एक रिरट यातिचका पर प्रति वाद कर े हुए क ु छ मामलें क े गुणों क े आ ार पर उच्च् न्यायालय क े वि'णय उसी मामलें को उन्ही पक्षकारों क े मध्य वि'यविम वाद को पूव न्याय क े रूप में संचालिल विकया जा ा है, उपरोक्त विवर्षय पर न्यायालय द्वारा विवचार विकया गया र्थीा। इस न्यायालय 'े पैराग्राफ 60 और 61 में वि'म्'लिललिख विवर्षयों पर लगभग सभी प्रासंविगक वि'णयों का उHेख विकया है जो वि'म्' है:- “60. उपराेक्त चचा क े परिरणामस्वरूप, हमारा विवचार यह है विक सीपीसी की ारा 11 क े प्राव ा' अग्रव 1 वि'यविम वाद क े विववाद क े समा' मामलें क े उन्ही पक्षकारों क े मध्य पूव न्याय क े रूप पूव वि'णयों क े सम्बन् सम्पूण 'हीं है आैर पूव न्याय क े सामान्य सिसद्घान् पर विकसी पूव मामलें क े वि'णय विववाविद है आैर उ'को पूण विवचारण क े बाद वि'ण[1] विकया गया है या पक्षकारों को न्यायालय द्वारा अप'े वाद को सिसद्घ कर'े क े सम्बन् में उतिच अवसर प्रदा' कर'े क े पश्चा वि'णय कर'े में सक्षम है, सिजसे अग्रव 1 वि'यविम वाद को पू्व न्याय क े रूप में संचालिल विकया जायेगा। यह आवश्यक 'हीं है विक पूवव 1 मामलें को य कर'े वाला न्यायालय अग्रव 1 वाद को वि'ण[1] कर'े में सक्षम हो या यह विक पूव क्त कायवाही आैर अग्रव 1 वाद एक विवर्षय क े मामलें हों। पूव क्त कायवाही की प्रक ृ ति सारही' है। 61.समा' पक्षकारों क े मध्य विववाविद उसी मामलें पर अग्रव 1 वि'यविम वाद को पूव न्याय क े ह संचालिल कर'े में और इस प्रकार पूण ः प्रति वाद कर'े क े पश्चा वि'णयों की अंति म ा क े सिसद्घान् को सिसविम प्रभाव दे'े क े लिलए संविव ा' क े अ'ुच्छेदों 226 और 32 क े ह रिरट कायवाही क े विववाविद मामलें में इस रह क े वि'णय को रोक'े क े लिलए कोइ पयाS कारण 'ही विदख ा है इसलिलए हम पूव न्याय क े सामान्य सिसद्घान् पर, उसी मामलें क े सम्बन् में उन्ही पक्षकारो क े मध्य अग्रव 1 वि'यविम वाद अ'ुच्छेद 226 क े रिरट यातिचका उच्च न्यायायल क े वि'णय mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को मामलें क े गुणावगुण क े आ ार पर रोक'ा पूव न्याय क े रूप संचालिल होगा। "

67. ड्रायो और अन्य ब'ाम स्टेट ऑफ यूपी और अन्य, एआईआर 1961 एससी 1457 में, इस न्यायालय 'े अव ारिर विकया विक सावजवि'क 'ीति क े सामान्य विवचार पर ऐसा कोई कारण 'हीं प्र ी हो ा है सिजसक े द्वारा पूव न्याय क े वि'यम को अ'ुच्छेद 32 क े ह दायर रिरट यातिचका को य कर'े में स्वीकाय या अप्रासंविगक 'हीं मा'ा जा'ा चाविहए।

68. श्योदा' सिंसह ब'ाम दरिरयाओ क ुं वर, एआईआर 1966 एससी 1332 में इस न्यायालय की एक संविव ा' पीठ 'े सीपीसी की ारा 11 क े ह रेखांविक सिसद्धां ों पर विवस् ृ रूप से विवचार कर'े क े बाद कहा विक पांच आवश्यक श ‡ हैं सिजन्हें पू्व न्याय की दलील से पहले सं ुष्ट विकया जा'ा चाविहए। वि'णय क े अ'ुच्छेद 9 में, श [ की गण'ा की गई है जो वि'म्'लिललिख प्रभाव क े लिलए हैं: "9. अ'ुच्छेद 11 को पढ़'े से यह प ा चल ा है विक पू्व न्याय क े ह मामलें को संन्तिस्र्थी कर'े क े लिलए वि'न्तिम्'लिललिख श [ को पूरा विकया जा'ा आवश्यक है, अर्थीा (I) अग्रव 1 वाद में मामला को सी े ौर से या पूण रूप से विववाद्यक में हो'ा चाविहए या विववाद्यक मामले क े विववाद्यक क े समा' हो'ा चाविहए सिजसे पूव क्त मामलें में सी े ौर पर या पूण रूप से विववाद्यक में र्थीा (II) पू्व क्त वाद एक एैसा वाद हो'ा चाविहए जो समा' पक्षकारों क े मध्य हो'ा चाविहए या एेसे पक्षकारो क े मध्य mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिजन्हो'े या उ'में से विकसी एक क े द्वारा दावा विकया गया हो (III) पू्व क्त वाद में पक्षकारों क े द्वारा समा' शीर्षक क े ह वाद प्रति वाद विकया जा'ा चाविहए (IV) न्यायलय सिजस'े पूव वाद का फ ै सला विकया र्थीा, उसको अग्रव 1 वाद में या उस वाद क े लिलए सक्षम हो'ा चाविहए सिजसमें ऐसा विववाद्यक अग्रव 1 वाद में उठाया गया हो (V) अग्रव 1 वाद में सी े और पूण ः इस मामले को सु'ा गया और अं: पहले वाद में न्यायालय 'े फ ै सला विकया। अ ः स्पविष्टकरण I से यह प ा चल ा है विक यह वह ारीख 'हीं है सिजस पर वाद य विकया जा ा है, ाविक यद्यविप एक वाद बाद मे दायर विकया गया र्थीा, यह पूव वाद होगा यविद इसको पहले य विकया गया है। इसलिलए यह विक उच्च न्यायालय द्वारा खारिरज की गई पहले की दो अपीलों में वि'णय पूव न्याय क े रूप में संचालिल हो ा है, यह देख'ा होगा विक ऊपर उसिHलिख सभी पांच श से सं ुष्ट हो'ा चाविहए।"

69. डॉ. व' द्वारा प्रस् ु कर्थी'ाें में से एक यह है विक इस्माइल फारुकी क े मामले में शाविमल विववाद्यक ऐसे विववाद्यक 'हीं हैं जो इ' अपीलों को उत्पन्न् कर'े वाले वादों में सी े और पूण रूप से शाविमल हैं, इसलिलए, पूण न्याय की यातिचका अक े ले इस आ ार पर विवफल हो'ी चाविहए। श्योदा' सिंसह क े मामले (उपरोक्त) में इस न्यायालय द्वारा प्रगभिण श [ में से एक यह है विक 'मामले को सी े और पूण रूप से विववाद्यक में हो'ा चाविहए और न्यायालय द्वारा अग्रव 1 वाद को सु'ा और अंति म रूप से वि'ण[1] विकया जा'ा चाविहए।' डॉ. व' 'े मामले में सी े और पूण रूप से विववाद्यक क े सिसद्धां को विवस् ृ कर े हुए सज्जादा'शी' सईद ब'ाम मुसा दादाभाई उममेर, (2000)3 एससीसी 350 में इस न्यायालय क े वि'णय पर अवलंब लिलया है। इस न्यायालय 'े "सी े और पूण रूप से मुद्दे मे" की न्तिस्र्थीति पर विवचार कर े हुए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ारा 11 का सन्दभ दे े प्रस् र 12,13 और 14 में वि'म्'लिललिख सिसद्घान् ों काे वि' ारिर विकया है- “12. इस पर ध्या' विदया जा'ा चाविहए विक सीपीसी की ारा 11 क े ह शब्द "प्रत्यक्ष और पूण रूप से विववाद्यक में " का उपयोग विकया जा ा है। यविद मामला पूव मुकदमेबाजी में प्रत्यक्ष रूप से और पूण रूप से विववाद्यक में र्थीा और विकसी पक्षकार क े विवरूद्घ वि'ण[1] विकया र्थीा, ब अग्रव 1 कायवाही में पूव न्याय को वि'णय क े रूप मे मा'ा जायेगा। न्यातियक वि'णयों क े द्वारा हालांविक यह अव ारिर विकया है विक यविद एक मामला क े वल "समव 1 या संयोगवश" विववाद्यक में र्थीा और पूव की कायवाही में वि'ण[1] विकया गया र्थीा, उसक े वि'ष्कर्ष बाद की कायवाही में सा ारण रूप से पूव न्याय में 'हीं होगा जहाँ मामला प्रत्यक्ष रूप से और पूण रूप से विववाद्यक में है।

13. जैसा विक इंग्लैंड क े हuसबरी की विवति (Vol. 16, पैरा 1538, क े 4 वें संस्करण) में ब ाया गया है, मौलिलक वि'यम यह है विक कोई वि'णय वि'णायक 'हीं है यविद कोई मामला प्रश्न में समव 1 रूप से आया[आर.वी.कन्टाफ्ट इ'हैविबटेन्टस; हेप्टुHा Ÿदस ब'ाम ठाकोर डब्uयू एल आर पी. 297 (पीसी)]; या यविद कोई मामला संयोग से संज्ञेय र्थीा सैंडस (अन्यर्थीा सौंडस) ब'ाम सैंडस (अन्यर्थीा सौंडस) एएलएल ईआर क े पेज संख्या. 771 पर]।

14. एक समव 1 या संयोगवश विववाद्यक एक ही है जो एक प्रत्यक्ष और मूल विववाद्यक क े लिलए सहायक है; पहले वाला एक सहायक विववाद्यक है और बाद वाला कए प्रमुख विववाद्यक है। विववाद्यक में "समव 1 या संयोगवश" पद का ात्पय यह है विक एक और मामला है जो विववाद्यक (मुHा की सिसविवल प्रविक्रया संविह ा, 15 वें संस्करण, पृष्ठ 104) में “प्रत्यक्ष और सार ः” है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कविठ'ाइयों में विवभेद कर'ा विक क्या एक मामला प्रत्यक्ष रूप से विववाद्यक में र्थीा या समव 1 रूप से या सयाेंगवश विववाद्यक का परीक्षण विवभिभन्न न्यायालयों क े द्वारा वि' ारिर विकया गया र्थीा।

70. मविहला बजरंगी (मृ ) अप'े विवति क प्रति वि' ी क े द्वारा ब'ाम बद्रीबाई पत्'ी जगन्नार्थी और एक अन्य, (2003)2 एससीसी 464, में उपरोक्त सिसद्धां पैरा 6 में वि'म्'लिललिख शब्दों में दोहराया गया र्थीा जो वि'म्'लिललिख प्रभाव क े लिलए हैः- ”6..... इसक े अलावा, यह हमेशा एक मुद्दे पर वि'णय हो ा है जो प्रत्यक्ष आैर सार ः एक ही पक्ष क े बीच पूव वाद क े विववाद्यक में है सिजसे सु'ा गया है और अं ः इसका वि'णय विदया गया सिजसे पू्व न्याय क े रूप में संचालिल विकया जाय आैर प्रत्येक सयोग आैर समव 1 विववरक क े पश्न में ' क े वल विकसी वि'ष्कर्ष क े द्वारा इस प्रकार क े वि'णय क पहुच'े क े लिलये पूव न्याय का वि'माण कर'ा होगा।"

71. आक्षेविप वि'णय में भी स्पष्ट रूप से अव ारिर विकया गया है विक सिज' वादो मे उसे उठाया गया है वे विववाद्यक में 'ही है सिजस पर ध्या' दे'े क े लिलए कहा जा सक ा है आैर न्यायालय क े द्वारा स्माइल फारूकी वाद में वि'ण[1] विकया गया है उच्च न्यायालय 'े स्पष्ट रूप से अव ारिर विकया है विक उच्च र न्यायालय क े प्राति कारिरयों 'े एक वि'यम ब'ाया जो वि'चली अदाल ों क े लिलए बाध्यकारी है, बश z विक अदाल द्वारा मामला वि'ण[1] विकया गया हो। पैरा 4054 में, वि'म्'लिललिख अव रिर विकया गया है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "4054. एकमात्र थ्य यह है विक श्वे पत्र पर क ु छ ब्यों को भार सरकार क े द्वारा उHेख विकया जा'ा चाविहए आैर उ' थ्यों पर सा ारण या शीर्ष न्यायालयों क े द्वारा ध्या' विदया जा'ा चाविहए जबविक श्वे पत्र क े थ्यों का सन्दभ दे े हुए, यह 'हीं कहा जा सक ा विक उ' थ्यों को ब'ाया जा सक ा है जैसे ही शीर्ष न्यायालय 'े उ'को सही मा'ा है आैर उसका न्यायवि'णय' विकया है। पूवव 1 विवति सवविवविद है उच्च र न्यायालय क े प्राति कारिरयों 'े एक वि'यम ब'ाया जो वि'चली अदाल ों क े लिलए बाध्यकारी है, बश z विक अदाल द्वारा मामला वि'ण[1] विकया गया हो। एक विववाद्यक को एक श्रेष्ठ न्यायालय द्वारा वि'ण[1] विकया जा सक ा है जब इसे उसक े समक्ष प्रस् ु विकया गया हो आेर उस पर क विदया गया हो और वि'णय लिलया गया हो और क े वल भी यह अन्य अदाल ों क े लिलए एक बाध्यकारी है। '

72. हम'े ऊपर देखा है विक इस्माइल फारुकी क े मामले में जो विववाद्यक शाविमल र्थीे, वे अति वि'यम, 1993 की वै ा क े प्रमाण र्थीे। इस्माइल फारुकी क े मामले में उठाया गया एक विववाद्यक यह र्थीा विक क्या इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंविब अति वि'यम, 1993 की खंड 4 उप खंड (3) क े आ ार पर वि'रस् है। राष्ट्रपति संदभ संख्या 1/1993 को भी रिरट यातिचकाओं और स्र्थीा'ां रिर मामलों क े सार्थी सु'ा गया र्थीा। इ' अपीलों को उत्पन्न हो'े वाले मुकदमों में सिज' विववाद्यक को उठाया गया है, वे अलग-अलग मुद्दे हैं सिजन्हें इस्माइल फारुकी क े वाद में प्रत्यक्ष आैर सार ः रूप से है 'हीं कहा जा सक ा है। इस श की पूर्ति स्वयं श्री परासर' द्वारा उठाए गए पूव न्याय की यातिचका को खारिरज कर'े क े लिलए पयाS है।

73. हम श्री परासरण द्वारा प्रस् ु थ्यों पर पु'ः ध्या' दे सक े है क्योविक आइ ए सिजसे वाद में भरा गया है को भी इस्माइल फारूखी वाद क े सार्थी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जोड़ा जा सक ा है, इसलिलए इस्माइल फारूकी क े वाद में विदये गये वि'णय को उ' वादों क े वि'णयों का विहस्सा मा'ा जायेगा सिजसे अपीलक ा द्वारा उसी विववादद्यक को पु'ः प्रस् ु कर'े से रोक ा है। उपरोक्त प्रस् ुति याें का अवलोक' कर'े क े लिलए हमें इस बा पर ध्या' दे'े की आवश्यक ा है विक इस्माइल फारुकी क े मामले में इस न्यायालय क े समक्ष क्या मामला र्थीा।

74. अध्यादेश को अति वि'यम, 1993 क े द्वारा हटाया गया सिजसे 07.01.1993 को जारी विकया गया। अध्यादेश की ारा 4 (3) में विवचार विकया गया र्थीा विक ारा 3 क े ह क ें द्र सरकार में वि'विह विकसी भी संपलित्त क े अति कार, स्वत्व या विह क े संबं में वाद, अपील या अन्य कायवाही समाS हो जाएगी। अध्यादेश क े बाद वादी 'े अध्यादेश की वै ा और मान्य ा को चु'ौ ी दे े हुए वाद-पत्र क े संशो ' क े लिलए आवेद' विकया र्थीा। उच्च न्यायालय 'े इस वाद यह विववाद्यक विवरतिच विकया है विक "क्या वाद समाS हो गये या जीविव है" अध्यादेश को चु'ौ ी दे'े वाली उच्च न्यायालय में कई रिरट यातिचकाएं भी दायर की गई र्थीीं। रिरट यातिचका संख्या 208/1993, मो. असलम ब'ाम भार क े संघ और अन्य को इस न्यायालय में अ'ुच्छेद 32 क े ह दायर विकया गया र्थीा। भार संघ 'े इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर रिरट यातिचकाओं को स्र्थीा'ां रिर कर'े क े लिलए अ'ुच्छेद 139 ए क े ह स्र्थीा'ां रण यातिचकाएं दायर की र्थीीं। 24.09.1993 क े विद'ांविक आदेश को भार संघ और अन्य ब'ाम डॉ. एम. इस्माइल फारुकी और अन्य (1994)1 एससीसी 265 में पारिर विकया गया, इस अदाल 'े अ'ुच्छेद 32 क े ह दायर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्र्थीा'ां रण आवेद' को राष्ट्रपति क े संदभ और रिरट यातिचकाओं क े सार्थी सु'वाई क े लिलए पांच रिरट यातिचकाओं को स्र्थीा'ां रिर कर'े की अ'ुमति दी। दो'ों वादों में उच्च न्यायालय द्वारा ैयार विकया गया प्रारंभिभक मुद्दा को स्र्थीविग कर विदया गया र्थीा। आदेश क े अ'ुच्छेद 4 और 7 को वि'काल'ा उपयोगी है:-

4. अध्यादेश जारी कर'े क े बाद ऐसा प्र ी हो ा है विक लंविब मुकदमों, ओ ओ एस संख्या 3 और 4/1989 को विफर से 'ामांविक विकया गया र्थीा, वादी 'े अध्यादेश की वै ा और मान्य ा को चु'ौ ी दे े हुए वाद- पत्र क े संशो ' क े लिलए आवेद' विकया र्थीा, सिजसक े द्वारा वाद को समाS कर विदया गया र्थीा। उच्च न्यायालय की पूण पीठ 'े उक्त आवेद'ों को सु'ा और 15 माच, 1993 को एक आदेश पारिर विकया। उक्त आदेश से उच्च न्यायालय 'े यह प्रश्न विवरतिच विकया विक “क्या वाद समाS हो गया है या जीविव है” और चूंविक उक्त विववाद्यक को अध्यादेश की विवति मान्य ा को स्पश विकया गया है, न्यायालय 'े महान्यायवादी को 'ोविटस का आदेश विदया और इस मुद्दे की सु'वाई क े लिलए मामले को 26 अप्रैल, 1993 क े विद'ांक को सूचीबद्ध विकया यद्यविप वाद ओ ओ एस संख्या 4/1989 में आदेश पारिर विकया गया र्थीा, सह वाद ओ ओ एस संख्या 4/1989 क े संशो ' आवेद' को वि'यंवित्र कर'े क े लिलए भी आदेश विकया गया र्थीा। यह भी प्र ी हो ा है विक इस बीच, 1993 की पांच रिरट यातिचका सं. 552,925,1351,1532 और 1809 उच्च न्यायालय 'े व मा' में अति वि'यम क े अध्यादेश की वै ा को चु'ौ ी दे े हुए दायर विकया गया र्थीा। उच्च न्यायालय में इ' कायवाविहयों क े अलावा संविव ा' क े अ'ुच्छेद 32 क े ह रिरट यातिचका संख्या 208/1993 भी इस न्यायालय में दायर की गई र्थीी, जो उसी विवति की वै ा और मान्य ा को चु'ौ ी दे ी है।

7. परिरणाम में, हम इस आवेद' को 1993 की पांच रिरट यातिचका संख्या 552,925,1351,1532 और 1809 को वापस ले'े का आदेश देकर इस न्यायालय को राष्ट्रपति क े संदभ क े सार्थी सु'वाई कर'े की अ'ुमति दे े हैं, और रिरट यातिचका संख्या 208/1993 इस न्यायालय में लंविब है। उच्च न्यायालय द्वारा विवरतिच प्रारंभिभक विववाद्यक की सु'वाई दो'ों वादों में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “क्या वाद समाS हो गया है या जीविव है” अगले आदेश क रुकी रहेगी। सु'वाई में ेजी ला'े क े लिलए हम वि'म्'ा'ुसार वि'दzभिश कर े हैं: “

75. उपरोक्त से यह स्पष्ट है विक उच्च न्यायालय में लंविब मुकदमों को राष्ट्रपति क े संदभ और अ'ुच्छेद 32 क े ह दायर रिरट यातिचका क े सार्थी कभी भी सु'वाई क े लिलए स्र्थीा'ां रिर 'हीं विकया गया र्थीा। इस न्यायालय 'े क े वल उच्च न्यायालय द्वारा वि' ारिर प्रारंभिभक विववाद्यक की सु'वाई पर रोक लगा दी र्थीी विक क्या वाद समाS हो गए हैं या जीविव हैं। इस पर ध्या' दे'ा भी प्रासंविगक है विवशेर्ष संदभ संख्या 1/1993 में, पक्षकारों को कायवाही क े लिलए व्यविक्तग 'ोविटस जारी विकए गए र्थीे जो अध्यादेश की ारा 4 (3) क े आ ार पर वि'रस् हो गए र्थीे, लेविक' क े वल 'ोविटस जारी कर'ा जब वादों को इस न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति क े संदभ क े सार्थी सु'वाई क े लिलए स्र्थीा'ां रिर विकया जा'ा यह वि'ष्कर्ष वि'काल'े क े लिलए पयाS 'हीं है विक इस्माइल फारुकी क े फ ै सले को मुकदमों में वि'णय क े विहस्से क े रूप में मा'ा जा'ा चाविहए। इस प्रकार, हम श्री परासर' की प्रस् ुति याँ भी स्वीकार 'हीं कर े हैं विक इस्माइल फारुकी का वि'णय वाद क े वि'णय का विहस्सा है। इस प्रकार, हम श्री परासर' द्वारा उठाए गए उपरोक्त प्रस् ुति करण में कोई थ्य 'हीं पा े हैं। इस्माइल फारुकी क े वि'णय पर अवलंब mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

76. डॉ. व' 'े कहा विक इस्माइल फारुकी का वि'णय इ' अपीलों में मुद्दों क े मूल क े बारे में है और यह मुकदमों क े आक्षेविप आदेशों में व्याS है। उन्हो'े 'े कहा विक विववाविद स्र्थील का ुल'ात्मक महत्व सम्बन्तिन् विटप्पभिणयां और अवलोक' यह है विक मन्तिस्जद इस्लाम म में 'वाज अदा कर'े का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है, को आक्षेविप वि'णय में व्याS मा'ा गया है जैसे की विहन्दू पक्षकारों 'े विववाविद स्र्थील में सफल ापूवक दावा विकया है विक विववाविद स्थ्ल, सिजसे भगवा' राम का जन्म स्र्थीा' ब ाया गया है को अ'ुच्छेद 25 आैर 26 क े द्वारा संरतिक्ष विकया गया है। डा. व' 'े आक्षेविप आदेश में उच्च न्यायालय क े विवभिभन्न अवलोक'ों को सन्दर्भिभ कर े हुए अप'े प्रस् ुति करण का समर्थी' विकया है। उन्हों'े उच्च न्यायालय क े फ ै सले क े लिखलाफ दायर अपील में लिलए गए विवभिभन्न आ ारों का भी उHेख विकया है।

77. श्री परासर' और श्री ुर्षार मेह ा 'े उपरोक्त दलीलों का खंड' कर े हुए कहा विक भले ही इस्माइल फारुकी क े वि'णय को पक्षकारों क े अति वक्ताआें 'े उच्च न्यायालय क े समक्ष अप'े प्रस् ुति करण में संदर्भिभ विकया जा'ा चाविहए और आक्षेविप वि'णय में देखा जा'ा चाविहए विक विकसी भी रह आक्षेविप वि'णय इस्माइल फारुकी क े मामले में की गई विटप्पभिणयों से प्रभाविव 'हीं हो ा है।

78. उच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए क ु छ वि'णयों और क ु छ अपीलों में लिलए गए क ु छ आ ारों पर ध्या' दे'ा प्रासंविगक है, जो हमारे साम'े हैं। न्यायमूर्ति एस. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यू. खा' 'े इस्माइल फारुकी क े मामले का उHेख कर े हुए अप'े फ ै सले में वि'म्'लिललिख विटप्पभिणयों का उHेख विकया:- "एक मन्तिस्जद भले ही इसका वि'माण मन्तिस्जद क े रूप विकया जाये ो उसे मन्तिस्जद 'हीं मा'ा जा सक ा है यविद उसमें कोई 'वाज अदा 'ही की जा ी है और यह मन्तिस्जद शाविहद गंज ब'ाम एस. जी. पी. सी. अमृ सर, एआईआर 1940 पीसी 116 में अ'ुमोविद डॉ. एम. इस्माइल फारूकी ब'ाम भार संघ, 1994 (6) एस. सी. 360 में विप्रवी काउंसिसल द्वारा आयोसिज गैर-मुसलमा'ों क े कब्जे और उपयोग में है। द'ुसार, जब क विक यह साविब 'हीं हो जा ा है विक विववाविद परिरसर में 'वाज अदा की जा रही र्थीी, या निंहदुओं क े पास विवशेर्ष रूप से वि'र्मिम भाग और आं रिरक अहा े में 'हीं र्थीा, इसे मन्तिस्जद या एक वि'रं र मन्तिस्जद क े रूप में 22/23 विदसंबर, 1949 क अव ारिर 'हीं विकया जा सक ा है । मामला स्र्थीाविप विकया गया और कु छ निंहदू दलों का क है विक 1855 क मन्तिस्जद में कोई 'माज़ अदा 'हीं की गई र्थीी, विबuक ु ल स्वीकाय 'हीं है। यविद विकसी मन्तिस्जद को कई गजेटस, पुस् कों आविद में मन्तिस्जद क े रूप में संदर्भिभ विकया जा ा है और कु छ और 'हीं कहा जा ा है ो इसका म लब है विक यह उपयोग में एक मन्तिस्जद है। एक वि'न्तिष्क्रय मन्तिस्जद जहां 'माज़ कभी 'हीं अदा की जा ी है, जब भी मन्तिस्जद क े रूप में उHेख विकया जा ा है, को आगे वि'न्तिष्क्रय मा'ा जा'े क े लिलए बाध्य है और उपयोग में 'हीं है। यविद मन्तिस्जद का वि'माण बाति 'हीं विकया जा सक ा है, ो इसमें 'माज अदा कर'े से क ै से बाति विकया जा सक ा है। इसक े अलावा, 1856 या 1857 में रेलिंलग द्वारा विववाविद परिरसर को विवभासिज कर'े में कोई म लब 'हीं र्थीा यविद मुसलमा' ब क वि'र्मिम विहस्से में 'माज़ अदा 'हीं कर े र्थीे। 1855 क े दंगों में विववाविद परिरसर में शरण लिलए हुए सत्तर मुसलमा'ों की हत्या कर दी गई र्थीी। इ 'ी बड़ी परााजय क े पश्चा पहली बार उस समय 'माज अदा 'हीं की जा सकी।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

79. न्यायमूर्ति सु ीर अग्रवाल 'े अप'े वि'णय में इस्माइल फारुकी क े मामले पर भी गौर विकया है। डॉ. व' 'े श्री रविवशंकर प्रसाद द्वारा आक्षेविप वि'णय क े प्रस् र 3501 और 3502 में विदये गये बया' का उHेख विकयाः-

3501. श्री प्रसाद 'े क विदया विक निंहदुओं का विवश्वास है विक भगवा' राम अयोध्या का जन्म भगवा' विवष्णु क े अव ार क े रूप में हुआ जो निंहदू म का अभिभन्न अंग हैं, सिजन्हें उ'की पूजा, अ'ुशरण और प्रर्थीाआें को मा''े से इ'कार 'हीं विकया जा सक ा है और पुलिलस आयुक्त और अन्य ब'ाम आचाय जगदीशा'ंद अव ू और एक अन्य, (2004)12 एससीसी 770 (पैरा 9) और काशी विवश्व'ार्थी मंविदर, वाराणसी (सुप्रा) क े श्री आविद विवशेश्वर को संदर्भिभ कर ा है। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े अ ी' लोक व्यवस्र्थीा का गठ' क े आदेश क े लिलए, उन्हों'े दलबीर सिंसह और अन्य ब'ाम पंजाब राज्य, एआईआर 1962 एससी 1106 (पैरा 8) पर अवलंब लिलया।

3502. इसक े बाद वह यह स्वीकार कर ा है विक श्रेष्ठ अति कारिर ा क े सिसद्धां को लागू कर'ा, विववाविद स्र्थील, निंहदुओं क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा है और विकसी विवशेर्ष व्यविक्त या राज्य द्वारा भी इससे छेड़छाड 'हीं विकया जा सक ा है और यहां क विक कभिर्थी मन्तिस्जद क े लिलए अति ग्रहण क े प्राव ा' भी इस संबं में लागू 'हीं होंगे, यह पहले से ही अव ारिर और शीर्ष न्यायालय द्वारा देखा गया है विक विववाविद भव' को मुसलमा'ों क े लिलए विकसी विवशेर्ष महत्व का 'हीं विदखाया जा सका। वह डॉ. एम. इस्माइल फारुकी और अन्य ब'ाम भार संघ और अन्य, (1994)6 एससीसी 360 (पैरा 65, 72,75 और 96); आचाय महाराज श्री 'रेंद्र प्रसाद जी, आ'ंद प्रसाद जी महाराज और अन्य ब'ाम गुजरा राज्य और अन्य, (1975)1 एससीसी 11.को संदर्भिभ कर े है। अभिभयोक्ता (वाद 4) द्वारा मांगी गई राह को विवभिशष्ट अ'ु ोर्ष अति वि'यम, 1963 की ारा 34 द्वारा वर्जिज विकया गया है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और वैश तिडग्री कॉलेज, शामली और अन्य ब'ाम लक्ष्मी 'ारायण और अन्य, (1976)2 एससीसी 58 (पैरा 20 और 27); अमेरिरकी एक्सप्रेस बैंक लिलविमटेड ब'ाम कलकत्ता स्टील क ं प'ी और अन्य, (1993)2 एससीसी 199 में अवलंब लिलया है

80. न्यायमूर्ति सु ीर अग्रवाल 'े इस्माइल फारुकी वाद क े पैरा 2723 को वि'म्'लिललिख रीक े से अव ारिर विकया है:

2723. इस्माइल फारूकी (उपरोक्त) में, उच्च म न्यायालय 'े भूविम अति ग्रहण अति वि'यम क े ह भूविम क े अति ग्रहण की वै ा की दलील पर विवचार विकया है विक एक बार जब मन्तिस्जद का वक्फ ब'ाया जा ा है, ो संपलित्त अHाह में वि'विह हो ी है और यह हमेशा एक वक्फ रह ा है इसलिलए ऐसी संपलित्त का अति ग्रहण 'हीं विकया जा सक ा है। इस दलील को 'कार े हुए, शीर्ष न्यायालय 'े कहा विक सामान्य ार्मिमक उद्देश्यों क े संबं में एक दलील को म का एक अभिभन्न विहस्सा 'हीं कहा जा सक ा है जो उपासकों को विकसी अन्य स्र्थीा' पर पूजा क े अति कार से वंतिच करेगा और इसलिलए, ऐसी संपलित्त का अति ग्रहण राज्य द्वारा विकया जा सक ा है । हालाँविक, न्तिस्र्थीति अन्यर्थीा होगी यविद ार्मिमक संपलित्त विवशेर्ष महत्व की हो ी और ऐसी कई संपलित्तयों में से एक 'हीं हो सक ी। इस संबं में प्रासंविगक अवलोक' को पु': प्रस् ु कर'ा उपयोगी होगा:

78. इस न्यायालय द्वारा वि'र्मिदष्ट विकए गए विवभिभन्न विववि'श्चयों से यह प्र ी हो ा है विक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े अ ी' संरक्षण क े अ ी' रह े हुए, मन्तिस्जदों, चच[, मंविदरों आविद जैसे ार्मिमक उपास'ा स्र्थीलों का अज' राज्य की प्रभुत्वसंपन्न शविक्त क े अ ी' विकया जा सक ा है इस रह क े अति ग्रहण से संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 या अ'ुच्छेद 26 का उHंघ' 'हीं हो ा है। प्रबं ' को संभाल'े से संबंति वि'णयों का संपलित्त अर्जिज कर'े क े लिलए राज्य की संप्रभु शविक्त पर कोई असर 'हीं पड़ ा है। ' mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

82. जब प्रार्थी'ा या पूजा की पेशकश एक ार्मिमक प्रर्थीा है, ो हर स्र्थीा' पर इसकी पेशकश जहां ऐसी प्रार्थी'ा की जा सक ी है, ऐसी ार्मिमक प्रर्थीा का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग 'हीं होगा जब क विक उस म क े लिलए जगह का कोई विवशेर्ष महत्व ' हो ाविक एक आवश्यक या अभिभन्न विहस्सा ब' सक े । विकसी भी म की पूजा क े स्र्थीा' जो उस म काे एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख े हैं, एक अलग पायदा' पर खड़े हो े हैं और उन्हें अलग और अति क श्रद्धापूवक व्यवहार कर'ा पड़ ा है

81. न्यायमूर्ति सु ीर अग्रवाल क े वि'णय में विवभिभन्न अन्य स्र्थीा'ों पर इस्माइल फारुकी क े मामले क े वि'णयों क े संदभ हैं जैसे वि'णय क े पैरा 5 में सिजसमें यह देखा गया है विक विववाद में भूविम का क्षेत्र, सिजसे इस न्यायालय (उच्च न्यायालय) द्वारा न्यायवि'ण[1] विकया जा'ा है, अब इस्माइल फारूकी क े मामले में वि'र्मिदष्ट वि'णय क ही सीविम है। वि'णय का प्रस् र 5 इस प्रकार है: “5. डॉ. एम. इस्माइल फारुकी आविद ब'ाम भार संघ और अन्य, (1994)6 एससीसी 360: एआईआर 1995 एससी 605 में शीर्ष न्यायालय क े वि'णय क े मद्दे'जर, विववाविद भूविम क्षेत्र सिजसका इस न्यायालय द्वारा न्यायवि'णय' विकया जा'ा है अब स्र्थीविग कर विदया गया है जैसा विक ऊपर पैरा 4 में वि'र्मिदष्ट विकया गया है, अर्थीा मुख्य छ वाली संरच'ा, आं रिरक अहा ा और बाहरी अहा ा। वास् व में, सुविव ा क े उद्देश्य से छ वाली संरच'ा और सहा' क े ह क्षेत्र को इसक े बाद 'आं रिरक अहा े' क े रूप में संदर्भिभ विकया जाएगा और बचे हुए भाग को 'बाहरी अहा े' क े रूप मेंह सन्दर्भिभ विकया जाएगा। मोटे ौर पर, विववाविद क्षेत्र का माप लगभग 130X80 वग फीट है।" mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

82. डॉ. व' 'े अप'ी लिललिख प्रस् ुति याँ में कई अन्य स्र्थीा'ों क े विववरणों का उHेख विकया है, जहां न्यायमूर्ति सु ीर अग्रवाल 'े इस्माइल फारुकी क े मामले का उHेख विकया है।

83. न्यायमूर्ति रम वीर शमा 'े एक असहमति पूण वि'णय दे े हुए खंड III क े प्रस् र 3038 और 3039 में इस्माइल फारुकी क े मामले में पक्षकारों को प्रस् ु कर'े का उHेख विकया है, विववाद्यक संख्या 19 (डी) पर विवचार कर े समय वि'म्'लिललिख विटप्पभिणयां की गई हैं: प्रति वाविदयों की ओर से यह क विदया जा ा है विक विवचारा ी' इमार इस्लाविमक का'ू' क े ह मन्तिस्जद 'हीं र्थीी। यह विववाविद 'हीं है विक संरच'ा पहले ही 6.12.1992 को ध्वस् कर दी गई है। डॉ. एम. इस्माइल फारुकी और अन्य ब'ाम भार संघ और अन्य, (1994)6 एससीसी 360 क े अ'ुसार, मा''ीय शीर्ष न्यायालय 'े पैरा 70 में कहा विक मन्तिस्जद का पविवत्र चरिरत्र भी खो सक ा है। इस्लाम क े सिसद्धां ों क े अ'ुसार अज़ा' दे'े क े लिलए मी'ारों की आवश्यक ा हो ी है। मन्तिस्जद में इबाद का एक सावजवि'क स्र्थीा' 'हीं हो सक ा है सिजसमें अज़ा' का व्यवस्र्थीा उपलब् 'हीं है, इसलिलए विववाविद संरच'ा को मन्तिस्जद 'हीं मा'ा जा सक ा है

84. इसक े अलावा, न्यायमूर्ति म वीर शमा 'े श्री एचएस जै' को क े बया' पर वि'म्'ा'ुसार अव ारिर विकया है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA श्री एच एस जै', अति वक्ता 'े इस्माइल फारुकी क े फ ै सले क े पैरा 78 पर यह क दे'े क े लिलए अवलंब विकया विक चूंविक भगवा' राम क े जन्म स्र्थीा' को पूजा स्र्थील क े रूप में मा'ा जा ा र्थीा जो प्राची' काल से निंहदू क े ार्मिमक अभ्यास का अभिभन्न अंग र्थीा। देव ा का एक अलग स्र्थीा' हो ा अ ः उसे श्रद्घापूवक व्यवहार कर'ा पड़ ा है

85. न्यायमूर्ति शमा 'े यह म व्यक्त विकया है विक इस्माइल फारुकी क े वि'णय क े प्रस् र 78 में, शीर्ष न्यायालय 'े यह अभिभवि' ारिर विकया विक जन्मस्र्थीा' का निंहदुओं क े लिलए एक विवशेर्ष महत्व है और उसका स्र्थीा' भिभन्न पायदा' पर मा'ा जा'ा चाविहए। पृष्ठ 3455 पर, इस्माइल फारुकी क े मामले का उHेख कर े हुए न्यायमूर्ति शमा द्वारा वि'म्'लिललिख विटप्पभिणयां की गई हैं: मा''ीय सव च्च न्यायालय 'े डॉ. इस्माइल फारुकी (उपरोक्त) क े मामले में अयोध्या में क ु छ क्षेत्र क े अति ग्रहण क े प्राव ा'ों की वै ा को बरकरार रखा और कहा विक क ें द्र सरकार पूजा क े विकसी भी स्र्थीा' का अति ग्रहण कर सक ी है। पैरा 78 सव च्च न्यायालय 'े मा'ा विक जन्म क े स्र्थीा' का निंहदुओं क े लिलए एक विवशेर्ष महत्व है और इसे अलग-अलग पायदा' पर मा'ा जा'ा चाविहए, जो वि'म्'ा'ुसार है:

78. जब प्रार्थी'ा या पूजा कर'ा एक ार्मिमक प्रर्थीा है, ो हर स्र्थीा' पर इसकी पेशकश जहां ऐसी प्रार्थी'ा की जा सक ी है, ऐसी ार्मिमक प्रर्थीाका एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग 'हीं होगा जब क विक उस म क े लिलए जगह का कोई विवशेर्ष महत्व ' हो ाविक एक आवश्यक या अभिभन्न विहस्सा ब' सक े । विकसी भी म की पूजा क े स्र्थीा' जो उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख े हैं, इसे म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े लिलए, एक अलग पायदा' पर खड़े हो े हैं और उन्हें अलग और अति क श्रद्धापूवक मा'ा जा ा है निंहदुओं की ओर से यह आग्रह विकया जा ा है विक वादी दावा विकए गए राह क े हकदार 'हीं हैं और इस रह की राह विवभिशष्ट अ'ु ोर्ष अति वि'यम, 1877 की ारा 42 क े प्राव ा'ों द्वारा वर्जिज है, जो विवभिशष्ट अ'ु ोर्ष अति वि'यम 1963 की ारा 34 क े बराबर है, इस आ ार पर विक उ'क े पास श्रेष्ठ मौलिलक अति कार हैं। निंहदुओं क े विवचार वि'म्'ा'ुसार हैं: निंहदुओं को भार क े संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह मुसलमा'ों की ुल'ा में बेह र मौलिलक अति कार है, सिज' कारणों से पारंपरिरक अ'ुष्ठा' विकए जा े हैं और पुpय प्राS कर'े क े लिलए और मुविक्त प्राS कर'े क े लिलए Ÿह्मांड क े स्वामी को चढ़ावा चढ़ा े हैं और जैसे विक यह निंहदू म और म का अभिभन्न अंग है, इसे देख े हुए यह विव'म्र ापूवक प्रस् ु विकया जा ा है विक वाद, मुकदमा अ'ुकरणीय लाग क े सार्थी खारिरज विकए जा'े क े लिलए उत्तरदायी है: '

86. डॉ. व' 'े आगे कहा विक न्यायमूर्ति शमा 'े श्री पीए' विमश्रा द्वारा प्रस् ु बया' पर अवलंब लिलया है, सिजन्हों'े इस्माइल फारुकी क े वाद क े पैराग्राफ 77,78,80 और 82 पर अवलंब लिलया र्थीा। डॉ. व' 'े श्री रविवशंकर प्रसाद क े बया' का भी उHेख विकया है, सिजसे न्यायमूर्ति शमा द्वारा देखा गया र्थीा विक राम जन्म भूविम में पूजा कर'े का निंहदुओं का अति कार, प्राची' काल से जारी रह'ा उ'क े ार्मिमक अति कार और विवश्वास का एक अभिभन्न अंग र्थीा और 1949 से न्यातियक आदेशों द्वारा भी ब ाया गया र्थीा। इस अति कार को मजबू ब'ाया गया है और इसे संरतिक्ष विकया जा'ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

87. यद्यविप डा. व' 'े आक्षेविप वि'णय क े विवभिभन्न अंशों का सन्दभ विदया है, जहां इस्माइल फारुकी क े मामले का सन्दभ विदया गया है निंक ु मुख्य प्रस् र जहां इस्माइल फारुकी क े मामले क े संदभ में वि'ष्कर्ष विदए गए हैं, न्यायमूर्ति सु ीर अग्रवाल क े वि'णय क े प्रस् र 4049 से 4054 (खंड II) हैं, जैसा विक श्री ुर्षार मेह ा, विवद्व अपर महाअति वक्ता क े द्वारा ब ाया है।

88. प्रस् र 4049 और 4050 वि'म्'लिललिख हैं:

4049. पक्षकरों क े लिलए क ु छ विवद्वा' अति वक्ताआें 'े डां एम. इस्माइल फारूकी (उपरोक्त) क े वाद क े क ु छ अशों को इस रीक े से पढ'े क े बाद संविव ा' पीठ क े फ ै सले पर अवलंब ले'े की मांग की, जैसे विक शीर्ष अदाल 'े क ु छ पहलुआें पर अप'ी राय व्यक्त की है जो हमारे साम'े लंविब मुकदमों में इस न्यायालय क े समक्ष विववादास्पद मुद्दे हैं और कहा विक उक्त अवलोक' इस न्यायालय क े लिलए बाध्यकारी हैं और इसलिलए, उ' पहलुओं पर ध्या' 'हीं विदया जा सक ा है।

4050. श्री अय्यर, वरिरष्ठ अति वक्ता 'े पूव क्त वि'णय को पढ़'े की मांग की, जहां क ें द्र सरकार द्वारा जारी विकए गए श्वे पत्र की सामग्री 'े यह सुझाव दे'े क े लिलए उद्धृ विकया विक ये भार सरकार क े वि'ष्कर्ष हैं, सिजन्हों'े सव च्च न्यायालय द्वारा तिचन्तिन्ह विकया है और इसलिलए, वि'ष्कर्ष मा'ा जा'ा चाविहए। यह सुझाव विदया जा ा है विक उ' मामलों में, यविद कोई हो, मुद्दों को शीर्ष न्यायालय क े वि'णय द्वारा वि'ष्कर्ष वि'काला जा'ा चाविहए mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

89. उपरोक्त दलीलों को प्रस् र 4051 क े ह उच्च न्यायालय द्वारा सु'ा गया और स्पष्ट रूप से खारिरज कर विदया गया र्थीा, जो वि'म्'लिललिख है:

4051. हालांविक, हम इस दलील में कोई बल 'हीं पा े हैं। संविव ा' पीठ 'े अयोध्या अति वि'यम, 1993 की वै ा पर विवचार विकया, सिजसक े ह अयोध्या में क ु छ भूविम भी शाविमल र्थीी, जो भार सरकार द्वारा अति ग्रविह विकए जा'े वाले इ' मुकदमों में विवर्षय वस् ु र्थीी। इसक े अलावा, शीर्ष न्यायालय क े द्वारा संविव ा' क े अ'ुच्छेद 143 क े ह 7 ज'वरी, 1993 को भार क े राष्ट्रपति द्वारा विकए गए विवशेर्ष संदभ पर विवचार कर रहा र्थीा, सिजसमें वि'म्'लिललिख प्रश्न पर शीर्ष न्यायालय की राय मांगी गई र्थीी: "क्या एक निंहदू मंविदर या कोई निंहदू ार्मिमक संरच'ा राम जन्मभूविम बाबरी मन्तिस्जद (उक्त संरच'ा क े आं रिरक और बाहरी अहा े क े परिरसर सविह ) क े वि'माण से पहले मौजूद है सिजस क्षेत्र में संरच'ा खड़ी र्थीी।"

90. उच्च न्यायालय 'े स्पष्ट रूप से कहा है विक इस्माइल फारुकी क े मामले में क ु छ थ्यों का उHेख कर'े का म लब यह 'हीं है विक उ' थ्यों को इस न्यायालय द्वारा इस कारण से न्यायवि'णय' विकया गया र्थीा विक वे थ्य ' ो सव च्च न्यायालय क े समक्ष विववाद्यक में र्थीे और ' ही उ'का न्यायवि'णय' विकया गया र्थीा। उपरोक्त संदभ में प्रासंविगक चचा अ'ुच्छेद 4053 में वि'विह है, जो वि'म्'लिललिख है:

4053. यह इस संदभ में है विक अभिभलेख में रखे गय कु छ थ्यों का उHेख विकया गया है, लेविक' यह 'हीं कहा जा सक ा है विक उ' थ्यों को सव च्च न्यायालय द्वारा इस कारण से न्यायवि'णय' विकया गया र्थीा विक वे थ्य ' ो न्यायालय क े समक्ष विववाद्यक में र्थीे और ' ही वास् व में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायवि'णय' विकए गए हैं। एकमात्र प्रश्न जो विवशेर्ष रूप से विवचारिर और वि'ण[1] विकया गया है विक भूविम क े अति ग्रहण की शविक्त क े ह दी गइ चु'ौ ी क े आलोक में आवश्यक र्थीा, सिजस पर एक मन्तिस्जद मौजूद र्थीी। ऐसा प्र ी हो ा है विक मन्तिस्जद समर्थीक दलों 'े एक विववाद उठाया विक इस्लाम क े ार्मिमक प्रर्थीाआें क े लिलए इसक े महत्व क े बावजूद मूति»म विवति में विवशेर्ष न्तिस्र्थीति क े कारण एक मन्तिस्जद का अति ग्रहण 'हीं विकया जा सक ा है। भूविम क े अति ग्रहण क े संदभ में इस क को वि'णय क े पैरा 68 (एआईआर) और इसक े आगे क े भाग को विवचारिर विकया गया र्थीा। न्यायालय 'े अभिभवि' ारिर विकया है विक विकसी मन्तिस्जद में मुसलमा'ों क े द्वारा इबाद और विकसी मंविदर में निंहदुओं क े द्वारा पूजा कर'े क े अति कार को क े वल विŸविटश भार में दीवा'ी अति कार क े रूप में मान्य ा दी गई र्थीी। मन्तिस्जद शाविहदगंज ब'ाम भिशरोमभिण गुरुद्वारा प्रबं क सविमति, अमृ सर, ए. आई. आर. 1938 लाहौर 369 में लाहौर उच्च न्यायालय क े पूण न्यायपीठ क े विववि'श्चय पर अवलंब ले े हुए, जहां यह अभिभवि' ारिर विकया गया र्थीा विक एक मन्तिस्जद यविद विकसी गैर मुन्तिस्लमों क े द्वारा प्रति कू ल रूप से ारिर कोई मन्तिस्जद क े रूप में अप'े पविवत्र चरिरत्र को खो देगी, ो सव च्च न्यायालय 'े यह म व्यक्त विकया विक यविद मन्तिस्जद पविवत्र है ो एक बार मन्तिस्जद क े रूप में यह हमेशा पूजा का स्र्थीा' मुन्तिस्लम विवाति में 'ही ब'ी रह ी है जैसा विक भार ीय न्यायालयों द्वारा अ'ुमोविद है लाहौर उच्च न्यायालय 'े यह भी अभिभवि' ारिर विकया विक, "भार में एक मन्तिस्जद एक अचल संपलित्त र्थीी और विकसी विवभिशष्ट स्र्थीा' पर पूजा का अति कार ब खो जा ा है जब संपलित्त का अति कार, सिजस पर वह प्रति क ू ल कब्जे से प्राS विकया गया र्थीा समाS हो जा ा है। " इ' दो'ों दृविष्टकोणों को विप्रवी काउंसिसल द्वारा अ'ुमोविद विकया गया र्थीा और सव च्च न्यायालय 'े उक्त दृविष्टकोण का अ'ुशरण विकया। इसक े अलावा, स्व ंत्र रूप से भी न्यायालय का यह दृविष्टकोण भी र्थीा विक राज्य की संप्रभु शविक्त इसे संपलित्त प्राS कर'े का अति कार दे ी है। सावजवि'क उपयोग क े लिलए व्यविक्तग 'ागरिरकों से संबंति एक उपयुक्त वि'जी संपलित्त ले'ा प्रत्येक संप्रभु में वि'विह है। इस अति कार को अमेरिरकी का'ू' में प्रख्या क्षेत्र क े रूप में वर्भिण विकया गया है और राज'ीति क आवश्यक ा की पेशकश क े करा ा' की शविक्त की रह है और सरकार द्वारा एक वि'विह आरक्षण परआ ारिर मा'ा जा ा है विक इसक े संरक्षण क े ह अप'े 'ागरिरकों द्वारा अति ग्रविह वि'जी संपलित्त ली जा सक ी है या इसका उपयोग mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मालिलक की इच्छाओं क े बावजूद सावजवि'क लाभ क े लिलए वि'यंवित्र विकया जा सक ा है। न्यायालय 'े पूजा क े अति कार पर भी विवचार विकया विक क्या संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 या 26 क े अ ी' मूल अति कार प्रति ष्ठाविप है और यह म व्यक्त विकया गया है, "जबविक प्रार्थी'ा या पूजा कर'ा एक ार्मिमक प्रर्थीा है, हर स्र्थीा' पर इसकी पेशकश जहां ऐसी प्रार्थी'ा की जा सक ी है, ऐसी ार्मिमक प्रर्थीा का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग 'हीं होगा जब क विक उस म क े लिलए उस स्र्थीा' का कोई विवशेर्ष महत्व ' हो ाविक उसका एक आवश्यक या अभिभन्न विहस्सा ब' सक े । विकसी भी म की पूजा क े स्र्थीा', उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख े हैं, जो इसे म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए, एक अलग पायदा' पर खड़े हो े हैं और उन्हें अलग और अति क श्रद्धापूवक मा'ा जा ा है। अं ः संवै ावि'क पीठ द्वारा बहुम से का'ू' वि' ारिर विकया गया है विक मन्तिस्जद क े स्वत्च यविद विवति की यह न्तिस्र्थी ी है ो अव ारिर कर'े काेइ कारण 'ही हो सक ा है विक एक मन्तिस्जद एक अविद्व ीय या विवशेर्ष न्तिस्र्थी ी क े रूप में है ो मवि'रपेक्ष भार में अन्य म[ क े पूजा स्र्थीलों से महत्व अति क है ाविक राज्य क े संप्रभु या विवशेर्षाति कार शविक्त क े प्रयोग से उसकी प्रति रक्षा की जा सक े । एक मन्तिस्जद इस्लाम क े म की प्रर्थीा का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है और मुसलमा'ों द्वारा 'माज़ (प्रार्थी'ा) खुली जगह में भी दी जा सक ी है। न्यायालय 'े यह भी अव ारिर विकया विक जब क विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा कर'े का अति कार स्वयं उस अति कार का एक अभिभन्न अंग 'हीं है, अर्थीा, स्र्थीा' एक विवशेर्ष महत्व का है, इसकी अन्य संक्रसम्य ा पर संदेह 'हीं विकया जा सक ा है। शीर्ष अदाल 'े अति वि'यम 1993 की वै ा पर विवभिभन्न सवालों क े जवाब विदए और संदभ का जवाब दे'े से म'ा कर विदया और उसी रह वापस कर विदया जैसे विक यह है। अति वि'यम की ारा4 (3) क े वि'रस' क े कारण वाद को पु'जीविव विकया गया, ये न्यायालय मूल वाद को विवचारिर कर े समय पूरे मामलों कों गुणों क े आ ार पर वि'ण[1] विकया जा'ा चाविहए जब क विक कोइ विवशेर्ष विववाद्यक ' विदखाया गया हो जो न्यायालय क े ध्या' अप'ी रफ आकर्मिर्ष करे विक मूल वाद क े विवचारण का मुद्दा शीर्ष न्यायालय क े समक्ष पहले ही उठाया गया, क विदया गया और वि'ण[1] विकया जा चुका है, पक्षकारों की रफ से उपन्तिस्र्थी विवद्व अति वक्ता क े द्वारा इस न्यायालय क े समक्ष विवभिभन्न मुद्दों में शाविमल मामलों क े संबं में ऐसी कोई वि'ष्कर्ष mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 'हीं विदखा पाए हैं और इसलिलए, हम पार्मिटयों क े लिलए अति वक्ताआें क े सार्थी समझौ ा 'हीं कर रहे हैं जैसा विक अन्यर्थीा क विदया गया है।" (हमारे द्वारा रेखांविक विकया गया है)

91. उच्च न्यायालय 'े स्पष्ट रूप से मा'ा है विक विकसी मुद्दे को एक श्रेष्ठ न्यायालय द्वारा भी य विकया जा सक ा है जब इसे उठाया गया, क विदया गया और इसमें वि'णय लिलया गया। वि'म्'लिललिख को अ'ुच्छेद 4054 में आयोसिज विकया गया र्थीा:

4054. एक मात्र थ्य यह है विक श्वे पत्र में भार सरकार द्वारा कु छ थ्यों पर ध्या' विदया गया है और उ' थ्यों को क े वल शीर्ष अदाल 'े श्वे पत्र में उसिHलिख थ्यों का उHेख कर े हुए देखा है, यह 'हीं कहा जा सक ा है विक उ' थ्यों को मा'ा जा सक ा है जैसे विक उन्हें सव च्च न्यायालय द्वारा सही मा'ा गया है और न्यायवि'णय' विकया गया है। पूव ा का वि'यम सवविवविद है। विवति ब'ा'े वाले श्रेष्ठ न्यायालय क े प्राति कारी क े द्वारा ब'ायी गइ विवति वि'चली अदाल ों क े लिलए बाध्य है बश z विक न्यायालय द्वारा मामला य विकया गया हो। श्रेष्ठ न्यायालय क े द्वारा एक मुद्दे क े वि'णय' क े लिलए विवचारण विकया जा सक ा जब इसे उठाया गया क विदया गया आैर वि'ण[1] विकया गया और क े वल ब यह अन्य अदाल ों क े एक बाध्यकारी विमसाल है।

92. इस प्रकार, अपील क े बहु ाय वि'णयों में यह उक्त दृविष्टकोण क े बारे में ब ा ा है और यह स्पष्ट कर ा विक उच्च् न्यायालय 'े यह अव ारिर विकया की इस्माइल फारूकी क े वाद क े वि'णय में विकसी मुद्दे को य 'हीं कर ा है जो वाद की विवर्षय वस् ु है। इस्माइल फारुकी क े वि'णय में जो भी अवलोक' विकए गए हैं, वे मुकदमों mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA में वि'णय को वि'यंवित्र कर'े क े लिलए 'हीं हैं और अभिभलेख पर साक्ष्य क े आ ार पर वाद का फ ै सला विकया जा'ा र्थीा। इस्माइल फारुकी क े मामले में की गई संविदग् विटप्पभिणयों को क े वल विटप्पभिणयों क े रूप में मा'ा जा'ा चाविहए, ' विक सूट और इ' अपीलों को य कर'े क े उद्देश्य से, उन्हें शासी कारक या प्रासंविगक 'हीं मा'ा जा'ा चाविहए। उक्त विटप्पभिणयों को पूरी रह से भूविम अति ग्रहण क े संदभ में विकए गए अवलोक' क े रूप में समझा जा'ा चाविहए और इससे अति क क ु छ 'हीं।

93. यह उच्च न्यायालय क े उपरोक्त वि'ष्कर्ष क े कारण है विक वाद, संख्या. 1 और 5 क े वादी द्वारा आक्षेविप वि'णय क े विवरूद्घ दायर कई अपीलों का आ ार लिलया गया है, सिज' आ ारों को सन्दर्भिभ विकया गया है आैर डॉ. राजीव व' 'े अप'ी प्रस् ु ीकरण में उसका अवलंब लिलया गया है अपील में लिलया गया आ ार, सिजसमें डॉ. व' द्वारा अपवाद लिलया जा रहा है: (i) स्र्थील का विवभाज' प्रभावी रूप से अ'ुच्छेद 25 द्वारा संरतिक्ष स्र्थील पर निंहदू म क े अभिभन्न और आवश्यक भाग क े रूप में पूजा कर'े क े अति कार को समाS कर देगा; (ii) इस क्षेत्र में कभिर्थी मुन्तिस्लम संरच'ा को कभी भी इस्लामी म का अवि'वाय या अभिभन्न अंग हो'े का अभिभवच' 'हीं विकया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

94. इ' अपीलों में इस न्यायालय द्वारा उपरोक्त आ ारों पर ध्या' विदया आैर विवचारण विकया जा'ा बाकी है।

95. हम पहले ही इस न्यायालय द्वारा इस्माइल फारुकी क े मामले क े अ'ुच्छेद 78 और 82 में दी गई विटप्पभिणयों की सीमा और प्रक ृ ति पर विवचार कर चुक े हैं। इस्माइल फारुकी क े मामले में वि'णय में हो'े वाली अभिभव्यविक्त 'विवशेर्ष महत्व' और ' ुल'ात्मक महत्व' को भी पूवगामी प्रस् र में हमारे द्वारा ध्या' विदया गया और समझाया गया है। इस्माइल फारुकी क े मामले में इस न्यायालय की विटप्पभिणयों को ऊपरोक्त क े जैसे समझा जा'ा चाविहए। यह प्रश्न विक क्या आक्षेविप वि'णय में, इस्माइल फारुकी क े मामले पर वि'भर ा उच्च न्यायालय क े अंति म वि'णय को प्रभाविव कर ा है और विकसी भी स्पष्टीकरण या सु ार का एक काय है, सिजसे हमें व मा' अपीलों में पक्षकारों क े विवद्व अति वक्ता की सहाय ा से कर'ा होगा। इस प्रकार, हम यह वि'ष्कर्ष वि'काल े है विक उच्च न्यायालय 'े आक्षेविप आदेश क े द्वारा इस्माइल फारूखी क े वि'णय पर अवलंब ले'ा और अपीलार्थी1 क े लिलए विवद्व अति वक्ता क े द्वारा अवलंब ले'ा आैर इस्माइल फारुकी क े मामले क े वि'णय क े बल पर इ' अपीलों में आ ार ले'ा, सभी प्रश्नग हैं, अपील क े गुणावणुण क े आ ार पर, सिजन्हें अपीलों में संबोति कर'े की आवश्यक ा है। इस प्रकार, उपरोक्त प्रस् ुति करण अपीलक ा को प्रति वाद कर'े में मदद 'हीं कर ा है विक इस्माइल फारुकी क े मामले क े फ ै सले पर पु'र्मिवचार की आवश्यक ा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बड़ी पीठ क े संदभ में अन्य आ ार

96. क ु छ पक्षों क े उपन्तिस्र्थी विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री राजू रामचन्द्र' 'े कहा जैसा विक डॉ. राजीव व' द्वारा रद्द विकए गए कु छ अति रिरक्त आ ारों पर इस्माइल फारुकी क े मामले पर पु'र्मिवचार क े लिलए बड़ी बेंच क े संदभ में दबाया गया है। श्री राजू रामचंद्र' 'े कहा विक मामले क े महत्व को देख े हुए इस मामले को इस्माइल फारुकी क े फ ै सले पर पु'र्मिवचार क े लिलए संविव ा' पीठ को भेजा जा'ा चाविहए। उन्हो'ें 'े कहा विक बहु से उदाहरण है जहाँ न्यायालय 'े मामलें क े महत्व क े समझ'े क े लिलए बड़ी पीठों को मामलेें को सन्दर्भिभ विकया र्थीा। उन्हो'ें 'े कहा विक उच्च न्यायालय 'े अप'े आदेश विद'ांविक 10.07.1989 क े द्वारा उच्च् न्यायालयों वाद क े महत्व को देख े हुए वाद उच्च न्यायालय की पूण पीठ से विवचारण करवा'े क े मामलें को अप'े पास मगां लिलया र्थीा। वाद बहु महत्वपूण ब' गया है आैर अपील सभी पक्षों क े द्वारा दालिखल की गइ है आैर मामला इ 'ा बड़ा है विक यह उतिच है विक मामले पर विवचार कर'े क े लिलए मामले को बड़ी संख्या की पी ै ठ क े पास भेजा जाए। श्री रामचंद्र' 'े इस न्यायालय क े कई वि'णयों का उHेख विकया है और उ' पर अवलंब लिलया है, सिजन्हें हम आगे देखेंगे।

97. श्री राजू रामचंद्र' की दलीलों को विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री क े पराशरण आैर श्री सी. एस. वैद्य'ार्थी' क े द्वारा खंड' विकया गया है। उ'का मा''ा है विक यविद संवै ावि'क सिसद्घां शविमल है, ो मामलें को एक बड़ी को mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भेजा जा सक ा है, लेविक' व मा' ऐसा मामला 'हीं है जहां संवै ावि'क व्याख्या का कोई सिसद्धां शाविमल है, इसलिलए मामले क े संदभ को एक बड़ी पीठ क े पास भेज'े से अस्वीकार कर'े की आवश्यक ा है। श्री परासर' का कह'ा है विक व मा' अपील एक वाद से उत्पन्न हो ी है जहां एक मुकदमे में मुद्दों को य कर'े क े लिलए साक्ष्यों का मूuयाक ं ' विकया जा'ा चाविहए, सिजसे पांच न्याया ीशों द्वारा कर'े की आवश्यक ा 'हीं है। उन्हो'े कहा विक पाँच न्याया ीश क े द्वारा क े वल राष्ट्रपति चु'ाव क े वाद क े साक्ष्याें का मूuयाक'ं विकया जा ा रहा है।

98. इससे पहले विक हम पक्षकारों क े लिलए विवद्व अति वक्ता की दलील को सु'े, संविव ा' पीठ द्वारा सु'वाई क े लिलए एक मामले क े संदभ क े बारे में संवै ावि'क प्राव ा' है सिजसक े द्वारा पांच न्याया ीशों को शाविमल विकया जा'ा चाविहए। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 145 (3) में यह उपबं है विक ऐसे न्याया ीशों की न्यू' म संख्या, जो संविव ा' क े वि'वच' क े बारे में या अ'ुच्छेद 143 क े अ ी' विकसी वि'दzश को सु''े क े प्रयोज' क े लिलए विवति क े सारवा' प्रश्न से संबंति विकसी मामले का विववि'श्चय कर'े क े प्रयोज' क े लिलए हैं, पांच होगी। अ'ुच्छेद 145 (3) का परं ुक उपबं कर ा है:- "बश z विक, जहां न्यायालय अ'ुच्छेद 132 क े अलावा इस अध्याय क े विकसी भी प्राव ा' क े ह अपील की सु'वाई कर रहा है, सिजसमें पांच से कम न्याया ीश हैं और अपील की सु'वाई क े दौरा' न्यायालय इस बा से सं ुष्ट है विक अपील में संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का सारवा' प्रश्न वि'विह है सिजसका वि' ारण इस अपील क े वि'स् ारण क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लिलए आवश्यक है, ऐसा न्यायालय इस खंड द्वारा अपेतिक्ष इस प्रकार क े विकसी प्रश्न क े विववि'श्चय क े उद्देश्य से गविठ न्यायालय राय क े लिलए संदर्भिभ करेगा और राय प्राS हो'े पर ऐसी राय क े अ'ुरूप अपील का वि'स् ारण करेगा"

99. परं ुक क े अ'ुसार, पाँच न्याया ीशों से कम संख्या में विकसी अपील की सु'वाई कर रहे न्याया ीशों द्वारा वि'म्' दो श [ क े पूरा हो'े पर पाँच न्याया ीशों की पीठ को सन्दर्भिभ विकया जा सक ा है:- (i) न्यायालय इस बा से सं ुष्ट है विक अपील में इस संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का कोई सारवा' प्रश्न वि'विह है। (ii) सिजसका वि' ारण अपील क े वि'स् ारण क े लिलए आवश्यक है।

100. यर्थीा उपरोक्त अ'ुच्छेद 145(3)का परं ुक, इस प्रकार स्पष्ट इंविग कर ा है विक यर्थीा उपरोक्त ध्या ब्य दो'ों श [ क े पूरा हो'े पर पाँच न्याया ीशों से कम संख्या वाली पीठ विकसी मामले की सु'वाई पाँच न्याया ीशों की पीठ द्वारा विकया जा'ा सन्दर्भिभ कर सक ा है।अब्दुल रहीम इस्माइल सी. रविहम ुHा ब'ाम बाम्बे राज्य, एआईआर 1959 एससी 1315 क े मामले में इस न्यायालय क े पास अ'ुच्छेद 145(3) पर विवचार कर'े का अवसर र्थीा। उपरोक्त मामले में, अ'च्छेद 19(1)(d), (e) ), (e) ) और अ'ुच्छेद 19 की उप ारा (5) विवचारार्थी आये। इŸाहीम वजीर मवा ब'ाम बाम्बे राज्य एवं अन्य एआईआर 1954 एससी 229 क े मामले में पाँच न्याया ीश वाली पीठ 'े पहले ही ारिर विकया र्थीा विक भार ीय 'ागरिरक से यह पूवापेक्षा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विक भार में प्रवेश कर'े से पहले पासपोट प्रस् ु करे, भार में प्रवेश कर'े पर एक उतिच वि'ब¾ ' है। अब्दुल रहीम इस्माइल (उपरोक्त) क े मामले में दो न्याया ीश पीठ क े समक्ष पासपोट वि'यम,1950 क े वि'यम 3 को चु'ौ ी दी गयी र्थीी सिजसमें यह उपबंति र्थीा विक भार क े बाहर से आ'े वाला कोई भी व्यविक्त भार में जल, र्थील या वायुमाग से ब क प्रवेश या प्रवेश कर'े का प्रयास 'हीं करेगा जब क विक उसक े पास वै पासपोट ' हो। आपलित्त यह र्थीी विक अति वि'यम की ारा 3 और वि'यम' का वि'यम 3, जहां क इसका संबं भार ीय 'ागरिरकों से आशतिय र्थीा, संविव ा' विवरुद्ध है क्योंविक वे अ'ुच्छेद 19(1)(d), (e) )और (e) ) क े विवपरी है। इस न्यायालय 'े ारिर विकया विक मामला पाँच न्याया ीशों की पीठ द्वारा पहले ही वि'ण[1] हो'े क े कारण संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का कोई सारवा' प्रश्न उत्पन्न 'हीं हो ा। प्रस् र 6 में वि'म्'व ारिर विकया गया:- “6. …हालांविक यह कहा गया विक चूंविक एक संवै ावि'क प्रश्न उठाया गया है, इस मामले का वि'णय पाँच से कम न्याया ीशों द्वारा 'हीं हो सक ा। अ ः, मामले को संवै ावि'क पीठ को सन्दर्भिभ विकया जा'ा चाविहए। संविव ा' का अ'ुच्छेद 145(3) कह ा है विक संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति क े विकसी सारवा' प्रश्न का वि' ारण कर'े क े लिलए या अ'ुच्छेद 143 क े अन् ग विकसी सन्दभ की सु'वाई कर'े क े लिलए बैठ'े वाले न्याया ीशों की न्यू' म संख्या पाँच होगी। यह स्पष्ट है विक व मा' मामले में संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का कोई सारवा' प्रश्न 'हीं उठ ा क्योंविक उठाया गया प्रश्न इस न्यायालय की पाँच न्याया ीशों वाली पीठ द्वारा वि'ण[1] है। चूंविक हमारे समक्ष उठाया गया प्रश्न इस न्यायालय द्वारा पहले ही वि'ण[1] है, यह 'हीं कहा जा सक ा विक संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का कोई सारवा' प्रश्न उठ ा है।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

101. भगवा' स्वरूप लाल विबश' लाल ब'ाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 1965 एससी 682 क े मामले में, इस न्यायालय 'े ारिर विकया विक संविव ा' क े विकसी उपबं क े वि'वच' का सारवा' प्रश्न ब 'हीं उत्पन्न हो सक ा जब उस विवर्षय पर विवति को इस न्यायालय द्वारा अन्तिन् म एवं प्रभावी रूप से अभिभवि'ण[1] विकया जा चुका है। प्रस् र 11 में वि'म्'व कहा गया है:- “11. ……विवद्वा' अति वक्ता का कह'ा है विक उठाये गये प्रश्न में संविव ा' क े उपबं क े वि'वच' का प्रश्न वि'विह है और इसलिलए इस आरोपी की अपील पाँच से अन्यू' न्याया ीशों वाली पीठ को संदर्भिभ विकया जा'ा होगा। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 145(3) क े अ'ुसार, संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति क े सारवा' प्रश्न वाले मामले ही पाँच से अन्यू' न्याया ीशों द्वारा सु'े जाएंगे। जम्मू और कश्मीर ब'ाम ठाकु र गंगा सिंसह, एआईआर 1960 एससी 356 क े मामले में इस न्यायालय 'े ारिर विकया विक संविव ा' क े उपबं क े वि'वच' का सारवा' प्रश्न ब उत्पन्न 'हीं हो सक ा जब उस विवर्षय पर विवति अन्तिन् म और प्रभावी रूप से इस न्यायालय द्वारा अभिभवि' ारिर की जा चुकी है। ………… xxxxxxxxxxxxxxxxxxxx चूंविक उठाया गया प्रश्न इस न्यायालय द्वारा पहले ही अभिभवि'ण[1] है, क े वल प्रति पाविद सिसद्धान् की व मा' मामले में प्रयोज्य ा ही शेर्ष बच ी है। अ ः हम यह 'हीं कह सक े विक उठाये गये प्रश्न में संविव ा' क े अ'ुच्छेद 145(3) क े अर्थी[ में संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का सारवा' प्रश्न वि'विह है।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

102. पीपुuस युवि'य' फॉर सिसविवल लिलबट1ज (पीयूसीएल) एवं अन्य ब'ाम भार संघ एवं अन्य (2003) 4 एससीसी 399 क े वाद में ी' न्याया ीश वाली पीठ को अ'ुच्छेद 145(3) पर भी विवचार कर'े का अवसर विमला। यह क विदया गया विक संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का एक सारवा' प्रश्न उत्पन्न हुआ है, अ ः मामले को पाँच न्याया ीशों वाली पीठ को संदर्भिभ विकया जा'ा चाविहए। ी' न्याया ीश वाली पीठ 'े पाया विक उठाया गया प्रश्न पहले ही भार संघ ब'ाम एसोसिसएश' फॉर डेमोक्र े विटक रिरफॉम एवं अन्य, 2002(5) एससीसी 294 – ( ी' न्याया ीशों वाली पीठ का वि'णय) क े मामले में अभिभवि'ण[1] है और संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का कोई सारवा' प्रश्न 'हीं बच ा अ ः प्रस् र सं. 28,32 और 78 में वि'म्'व ारिर विकया गया:- ”28. वरिरष्ठ विवद्वा' अति वक्ता श्री अरुण जेटली और विवद्वा' महान्यायवादी श्री विकरिर ए'. रावल 'े कहा विक इ' यातिचकाओं में वि'विह प्रश्न संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का एक सारवा' प्रश्न है। अ ः मामले को पाँच न्याया ीशों वाली पीठ को संदर्भिभ विकया जा सक ा है।

32. एसोसिसएश' फॉर डेमोक्र े विटक रिरफॉम[1] क े मामले में इस न्यायालय द्वारा विदये गये वि'णय से यह स्पष्ट है विक विवद्वा' महान्यायवादी द्वारा ऐसा कोई क 'हीं विदया गया जो भार संघ की ओर से दायर अपील में प्रस् ु हुए विक उस मामले में वि'विह प्रश्न का विववि'श्चय संविव ा' क े अ'ुच्छेद 145(3) में यर्थीा उपबंति पाँच न्याया ीशों की पीठ द्वारा विकये जा'े की आवश्यक ा है। हमारे समक्ष उठाया गया प्रश्न अंति म रूप से अभिभवि' ारिर विकया जा चुका है और संविव ा' क े वि'वच' क े संबं में विवति का कोई सारवा' प्रश्न mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 'हीं बच ा। अ ः मामले को पाँच न्याया ीशों की पीठ को संदर्भिभ विकये जा'े की आवश्यक ा 'हीं है।

78. उपरोक्त बहस से जो बा साम'े आ ी है वह यह है:xxxxxxxxxxxxxxxxxx (c) एसोसिसएश' फॉर डेमोक्र े विटक रिरफॉम क े मामले में इस न्यायालय द्वारा विदया गया वि'णय अंति म है और उस संवै ावि'क प्राव ा' क े वि'वच' का कोई प्रश्न 'हीं है सिजसमें अ'ुच्छेद 145(3) क े अन् ग संदभ की आवश्यक ा है।”

103. वृहद पीठ को संदर्भिभ विकये जा'े क े प्रश्न पर इस न्यायालय की संविव ा' पीठ द्वारा विदये गये एक अन्य वि'णय पर ध्या' विदया जा'ा चाविहए। वह है-सेंट्रल बोड ऑफ दाउदी बोहरा कम्यूवि'टी एंड ए'ादर ब'ाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य, (2005) 2 SCC 673। इस न्यायालय की संविव ा' पीठ 'े उच्च म न्यायालय वि'यम, 1966 और अ'ुच्छेद 141 और 145 (2) क े प्राव ा'ों पर ध्या' दे े हुए वि'णय क े प्रस् र 12 में पाया विक वृहद पीठ द्वारा विदये गये वि'णय में इस न्यायालय द्वारा प्रति पाविद विवति न्यू' र या समा' न्याया ीशों की संख्या वाले पीठ पर बाध्यकारी होगा। न्यू' र न्याया ीश संख्या वाली पीठ वृहद पीठ द्वारा प्रति पाविद विवति से असहम 'हीं हो सक ी। संदेह की न्तिस्र्थीति में, न्यू' र न्याया ीश संख्या वाली पीठ वाई उस पीठ से वृहत्तर पीठ क े साम'े विकये जा'े की प्रार्थी'ा कर सक ी है सिजसका वि'णय विवचार क े लिलए आया है। प्रस् र 12(3) में, उपरोक्त सिसद्धान् क े दो अपवाद भी पाये गये, जो वि'म्' प्रभाव वाले हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “(3) उपरोक्त वि'यमों क े दो अपवाद हैं: (i) उक्त वि'यम मुख्य न्याया ीश क े विववेकाति कार को बाध्य 'हीं कर े सिजसमें रोस्टर ब'ा'े की शविक्त वि'विह हो ी है और जो विकसी विवभिशष्ट मामले की विकसी भी संख्या बल की पीठ क े समक्ष सु'वाई विकया जा'ा वि'र्मिदष्ट कर सक ा;और (ii) उपरोक्त प्रति पाविद वि'यम क े बावजूद यविद मामला एक बार वृहद पीठ क े समक्ष सु'वाई क े लिलए आ चुका है और वह पीठ ही यह मा' ी है विक न्यू' र संख्याबल वाली पीठ द्वारा अप'ाया गया विवति क दृविष्टकोण जो संदेह क े घेरे में है,में सु ार या पु'र्मिवचार की आवश्यक ा है ो अपवाद क े रूप में (और एक वि'यम क े रूप में 'हीं) और इसक े द्वारा विदए गए कारणों से, यह विवभिशष्ट संदभ या पीठ गठ' या ऐसे सूचीकरण हे ु मुख्य न्याया ीश क े आदेश दे े हुए मामले की सु'वाई और युविक्तयुक्त ा की जांच कर सक ा है। रघुबीर सिंसह व अन्य ब'ाम हंसोली देवी और अन्य (उपरोक्त)क े मामले में ऐसी न्तिस्र्थीति र्थीी। "

104. व मा' मामले में, चूंविक श्री राजू रामचंद्र' और डॉ व' का कर्थी' इस्माइल फारूकी क े मामले पर पु'र्मिवचार कर'े क े लिलए संविव ा' पीठ को संदर्भिभ विकये जा'े क े संबं में है, जैसा विक उपरोक्त देका गया इस न्यायालय द्वारा अ'ुच्छेद 145(3) क े संबं में प्रति पाविद विवति क े मद्दे'जर प्रश्न पर विवचार कर'े की आवश्यक ा है। श्री राजू रामचंद्र' और डॉ व' दो'ों 'े इस न्यायालय द्वारा 26.03.2018 को रिर.या. (सी) 222 वर्ष 2018 - समी'ा बेगम ब'ाम भार संघ और अन्य में पारिर आदेश पर भारी अवलंब लिलया है। विवद्वा' अति वक्ता का क है विक इस न्यायालय की ी' न्याया ीशों की खंडपीठ द्वारा इस मुद्दे क े महत्व को देख े हुए संविव ा' पीठ को संदर्भिभ विकया गया है। विद'ांक 26.03.2018 क े आदेश का अवलोक' इंविग कर ा है विक उ' रिरट यातिचकाओं में चु'ौ ी वि'काह हलाला,वि'काह मु ाह और वि'काह विमस्यार सविह बहुविववाह की प्रचलिल mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रर्थीा से संबंति है जो इस आ ार पर है विक वे असंवै ावि'क हैं। शायरा बा'ो आविद ब'ाम भार संघ और अन्य आविद, (2017) 9 एससीसी 1 क े मामले में इस न्यायालय क े पांच न्याया ीशों की संविव ा' पीठ क े फ ै सले का सिजक्र कर े हुए, जहां इस न्यायालय 'े घोर्षणा की विक लाक े विबद्द या ी' लाक की प्रर्थीा अ'ुच्छेद 25 द्वारा संरतिक्ष 'हीं है और यह एक आवश्यक ार्मिमक प्रर्थीा 'हीं है, यह क विदया गया र्थीा विक शायरा बा'ो (उपरोक्त) में पांच न्याया ीशों की खंडपीठ का वि'णय वि'काह हलाला, वि'काह मु ाह और वि'काह विमस्यार क े पहलुओं पर विवचार 'हीं विकया। इस प्रकार, यह प्रश्न विक क्या वे ार्मिमक प्रर्थीाएं अ'ुच्छेद 25 द्वारा संरतिक्ष हैं या 'हीं, ी' न्याया ीशों की पीठ क े समक्ष रिरट यातिचका में काफी हद क शाविमल र्थीा। ी' न्याया ीशों की पीठ इस ' ीजे पर पहुंची विक ऊपर ब ाई गई अव ारणाएं संविव ा' पीठ द्वारा अभिभवि' ारिर 'हीं की गई हैं, इसलिलए इस मुद्दे क े महत्व को देख े हुए संविव ा' पीठ को संदर्भिभ विकया गया र्थीा। 26.03.2018 विद'ांविक आदेश द्वारा विदया गया ऊपर उसिHलिख थ्यों क े आलोक में र्थीा और व मा' मामले में श्री राजू रामचंद्र' द्वारा विदये गये क[ का समर्थी' 'हीं कर ा है।

105. अब हम उ' मामलों पर आ े हैं सिज'का अवलंब श्री राजू रामचंद्र' द्वारा अप'े क क े समर्थी' में लिलया गया है।

106. हैदराबाद इंडस्ट्रीज लिलविमटेड एवं अन्य ब'ाम भार संघ एवं अन्य (1995)5 एससीसी 338 क े मामले में इस न्यायालय का वि'णय एक ऐसा ही आ ार र्थीा सिजसमें एक ी' न्याया ीश पीठ 'े पूव क े वि'णय अर्थीा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खpडेलवाल मेटल एंड इंजीवि'यरिंरग वक्स एवं अन्य ब'ाम भार संघ एवं अन्य (1995) 3 एससीसी 620 क े मामले में वि'णय क े युविक्तयुक्त ा पर संदेह व्यक्त विकया। इसी रह एस.एस. राठौर ब'ाम म.प्र. राज्य 1988(SUPP) एससीसी 522 का मामला भी ऐसा ही र्थीा सिजसमें सी ाराम गोयल ब'ाम म्यूवि'सिसपल बोड का'पुर एवंं अन्य एआईआर 1958 एससी 1036 क े मामले में पाँच न्याया ीशों द्वारा विदये गये वि'णय की युविक्तयुक्त ा पर संदेह व्यक्त विकया गया। आगे दो वि'णयों में म विवभिभन्न ा या म विवरो हो'े क े कारण इस न्यायालय क े वि'णयों को संदर्भिभ विकया गया जो इस न्यायालय द्वारा अतिश्व'ी क ु मार एवं अन्य ब'ाम विबहार राज्य एवं अन्य (1996)7 एससीसी 577 और बलसारिरया क ं स्ट्रक्श' प्रा. लिल. ब'ाम ह'ुमा' सेवा ट्रस्ट एवं अन्य (2006) 5 एससीसी 662 क े मामले में विदये गये वि'णय हैं। इसलिलए ये मामले भी क का समर्थी' 'हीं कर े। अच्च' रिरज्वी एवं अन्य (I) ब'ाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (1994) 6 एससीसी 751 और अच्च' रिरज्वी (II) एवं अन्य ब'ाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (1994)6 एससीसी 752 क े मामलों में इस न्यायालय द्वारा विदये गये वि'णय ऐसे ही मामले र्थीे सिज'में अ'मा''ा यातिचकाओं में अन् रिरम आवेद' विदये व अभिभवि' ारिर विकये गये। सन्दभ से संबंति कोई भी सिसद्धान् 'हीं पाया गया। उक्त वि'णयों का वृहत्तर पीठ को सन्दर्भिभ विकये जा'े क े विवर्षय क े संबं में प्रासंविगक ा 'हीं है। इसी रह मो.असलम उफ भूरे ब'ाम भार संघ एवं अन्य (2008) 2 एससीसी 576 क े वाद में इस न्यायालय द्वारा विदया गया वि'णय ऐसा ही मामला र्थीा सिजसमें इस न्यायालय द्वारा इस्माइल फारूकी क े मामले की भांति 67.703 एकड़ भूविम क े अति ग्रहण क े संबं में mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अं रिरम आदेश पारिर विकया गया र्थीा। इस वि'णय को वृहत्तर पीठ को संदर्भिभ विकये जा'े क े संबं में कोई प्रासंविगक ा 'हीं है। मो.असलम उफ भूरे ब'ाम भार संघ एवं अन्य (2003) 4 एससीसी 1 क े मामले में इस न्यायालय द्वारा वि'णय लिलया गया है जो विक पाँच न्याया ीशों की पीठ द्वारा वि'ण[1] मामला र्थीा। अ'ुच्छेद 32 क े अन् ग संलग्न भूविम अर्थीा विववाविद ढ़ाचे से संलग्न भूविम को उच्च न्यायालय में लंविब वाद में अंति म वि'णय आ'े क संरतिक्ष विकये जा'े क े संबं में एक ज'विह यातिचका दायर की गयी र्थीी जो इस्माइल फारूकी क े वाद में वि'णय आ'े क े बाद बहाल हो गयी र्थीी। पाँच न्याया ीशों की पीठ 'े कई विटप्पभिणयों और वि'दzशों को संज्ञा' में लिलया जो विक इस्माइल फारूकी क े वाद में पारिर की गयी र्थीी और अं ः यह वि'दzश विदया विक 13.3.2002 को इस न्यायालय द्वारा पारिर और 14.3.2002 को संशोति अं रिरम आदेश इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा वाद क े वि'स् ारण विकये जा'े क ' क े वल साम्प्रदातियक सौहाद ब'ाये रख'े क े लिलए अविप ु अति वि'यम क े अन्य उद्देश्य को पूरा कर'े क े लिलए भी कायशील रह'ा चाविहए। रिरट यातिचका को द्नुसार वि'स् ारिर विकया गया। वृहत्तर पीठ को संदर्भिभ विकये जा'े संबं ी ऐसा कोई सिसद्दान् उक्त वाद में पारिर 'हीं विकया गया जो विवद्वा' अति वक्ता क े क[ का समर्थी' करे।

107. विव'ोद क ु मार शान्तिन् लाल गोसालिलया ब'ाम गंगा र एवं अन्य 1980 (SUPP) एससीसी 340 क े मामले में दो न्याया ीशों क े एक वि'णय को भी अवलंब लिलया गया है सिजसमें वि'म्' आदेश पारिर विकया गया र्थीा:mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “ पक्षकारों क े विवद्वा' अति वक्ताओं को सु''े क े पश्चा हम'े वि'णय आरतिक्ष विकया। न्यातियक आयुक्त पढ़कर और दस् ावेजों को देखकर र्थीा पक्षकारों क े क[ पर साव ा'ी पूवक विवचार कर'े क े पश्चा हमें यह लग ा है विक इ' अपीलों में अत्यति क महत्व का सारवा' प्रश्न वि'विह है। जोविक गोवा दम' और दीव क े व मा' क्षेत्र में ख'' पट्टा से संबंति बहु से मामलों को शासिस करेगा। इसीलिलए हम यह वि'दzश दे े हैं विक इस मामले को वृहत्तर पीठ क े समक्ष रखा जाय। इ' अपीलों को आदेश हे ु मा''ीय मुख्य न्याया ीश महोदय क े समक्ष रखा जाय।"

108. उपरोक्त आदेश दो न्याया ीश पीठ द्वारा पारिर विकया गया र्थीा। सिजसमें अपील को इस थ्य क े कारण विक अपील में अत्यति क महत्व का विवति का सारवा' प्रश्न वि'विह है मा''ीय मुख्य न्याया ीश महोदय क े समक्ष रखे जा'े का वि'दzश विदया र्थीा। उक्त प्रकरण को मामले को संविव ा' पीठ क े समक्ष रख'े हे ु वि'र्मिदष्ट कर'े वाले आदेश क े रूप में 'हीं देखा जा सक ा है ' ही उपरोक्त आदेश से संविव ा' पीठ को सन्दर्भिभ कर'े संबं ी कोई उप ारणा वि'कल ी है जो विक विवद्वा' अति वक्ता की मदद कर सक े । एक अन्य वि'णय सिजसका अवलंब लिलया गया है वह न्यायमूर्ति ई.एस. वेंकटरामैया द्वारा पारिर एक आदेश है। रामजेठ मला'ी ब'ाम भार संघ (1984)3 एससीसी 696 क े मामले में अवकाश काली' न्यायमूर्ति उपरोक्त आदेश रिरट यातिचका (आपराति क) में पारिर विकया गया र्थीा। उपरोक्त मामले में विवर्षय पंजाब एक्श' क े बाद वि'रूद्ध विकये गये सिसख 'े ाओं की रिरहाई से संबंति र्थीा। आदेश में विदये गये विवर्षयों में एक यह र्थीा विक यह समुदाय क े बड़े विहस्से की व्यविक्तग स्व ंत्र ा से संबंति र्थीा। न्यायालय का यह म र्थीा विक संबद्ध प्रश्न एकल न्याया ीश क े लिलए बहु बड़े व जविटल र्थीे। न्यायालय 'े विवचार व्यक्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया विक इ' और इ'क े समा' मामलों को इस न्यायालय की सा न्याया ीशों की पीठ द्वारा सु'ा जा'ा चाविहए। उपरोक्त आदेश वि'णय में यर्थीा दृश्टब्य विवशेर्ष परिरन्तिस्र्थीति यों में पारिर विकया गया र्थीा और विकसी मामले को संविव ा' पीठ को संदर्भिभ विकये जा'े संबं ी कोई विवति क सिसद्धान् प्रति पाविद 'हीं विकया गया र्थीा। इस प्रकार उपरोक्त आदेश मामले क े विवभिशष्ट थ्यों क े सन्दभ में र्थीा।

109. क ृ र्ष' क ु मार ब'ाम भार संघ एवं अन्य (1989) 2 एससीसी 504 क े मामले में पाया गया विक इस मामले पर इस न्यायालय क े वि'ण[1] वाद 'हीं है, अ ः न्यायालय 'े विटप्पणी की विक उपरोक्त क े दृविष्टग मामलों को वृहत्तर पीठ को सन्दर्भिभ विकया जा'ा चाविहए। पु'श्च वह दो न्याया ीश पीठ का वि'णय र्थीा और ऐसा कोई वि'दzश 'हीं र्थीा विक आदेश में अभिभकन्तिuप वृहत्तर पीठ को सन्दर्भिभ विकया जा'ा चाविहए जो विवर्षय का अभिभवि' ारण कर'े वाले ी' न्याया ीशों की पीठ हो'ी चाविहए र्थीी। भार संघ ब'ाम एम. गोपाल क ृ ष्णैया 1995 (SUPP)4 एससीसी 81 क े मामले में विदHी परिरवह' वि'गम ब'ाम डीटीसी मजदूर कांग्रेस एवं अन्य 1991 (SUPP) 1 एससीसी 600 क े मामले में संविव ा' पीठ द्वारा विदये गये पुरा'े वि'णय पर दृविष्टपा विकया गया और इस प्रश्न पर विवचार विकया गया विक क्या विदHी परिरवह' वि'गम (उपरोक्त) और सेंट्रल इ'लैंड वाटर ट्रांसपोट काप रेश' लिल. एवं अन्य ब'ाम बैज'ार्थी गांगुली एवं अन्य (1986) 3 एससीसी 156 क े वि'णय की ार्मिकक ा जो स्र्थीायी कमचारिरयों पर लागू हो ी र्थीी, वि'य कालिलक वि'देशकों क विवस् ारिर की जा सक ी र्थीी। इस प्रकार यह एक संदर्भिभ प्रश्न र्थीा विक क्या mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संविव ा' पीठ का वि'णय उपरोक्त मामलों में लागू हो ा र्थीा जो विक स्वंय मामले क े विवभिशष्ट थ्यों क े आलोक में विदया गया वि'णय है और वृहत्तर पीठ को सन्दर्भिभ विकये जा'े क े संबं में कोई अ'ुपा 'हीं ब ा ा।

110. इसी रह सिंसतिडक े ट बैंक ब'ाम प्रभा डी. 'ाइक एवं अन्य (2002)10 एससीसी 686 क े मामले में दो न्याया ीशों की पीठ 'े पु गाली सिसविवल कोड क े वि'वच' पर विवचार कर'े और परिरसीम' अति वि'यम की प्रयोज्य ा हे ु वृहत्तर पीठ को संदर्भिभ विकया। सन्दभ क े वल संविव ा' पीठ को 'हीं र्थीा और क े वल वृहत्तर पीठ को र्थीा जो विक ी' न्याया ीशों की भी हो सक ी र्थीी। इसी रह चर'जी सिंसह ब'ाम रवींद्र कौर (2008) 17 एससीसी 650 क े मामले में प्रश्न क े महत्व को देख े हुए दो न्याया ीशों की पीठ 'े वृहत्तर पीठ को सन्दर्भिभ विकया र्थीा। दो न्याया ीश पीठ का सन्दभ संविव ा' पीठ को 'हीं र्थीा। इसलिलए यह क का समर्थी' 'हीं कर ा। भार ीय दूरसंचार वि'यामक प्राति करण ब'ाम भार संचार वि'गम लिल. (2014)3 एससीसी 304 क े मामले का प्रभाव भी समा' प्रभाव वाला है सिजसमें दो न्याया ीश की पीठ 'े वृहत्तर पीठ को संदर्भिभ विकया र्थीा। सिसक्योरिरटीज एंड एक्सचेंज बोड ऑफ इंतिडया ब'ाम सहारा इंतिडया रिरयल एस्टेट काप रेश' एवं अन्य (2014) 8 एससीसी 751 क े मामले में ी' न्याया ीश की पीठ द्वारा पारिर विकया गया एक पुरा'ा वि'णय लागू कराया गया इसलिलए ी' न्याया ीश पीठ को संदर्भिभ विकया गया जो विक पाँच न्याया ीशों की संविव ा' पीठ को संदर्भिभ विकये जा'े का मामला 'हीं र्थीा। राजीव व' ब'ाम गुलश' क ु मार महाज' एवं अन्य (2014) 12 एससीसी 618 क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मामले में इस न्यायालय का वि'णय अवमा''ा यातिचका से संबंति मामला र्थीा जो विक व मा' विववाद से संबंति मामला 'हीं है। रामचंद्र' द्वारा अवलंविब अंति म वि'णय विववेक 'ारायण शमा ब'ाम भार संघ (2017) 1 एससीसी 388 का वि'णय है। ी' न्याया ीश पीठ रू. 500/- और रू. 1000/- क े 'ोटों का विवमुद्रीकरण कर'े वाली 08.11.2016 विद'ांविक अति सूच'ा पर विवचार कर रहा र्थीा। अ'ुच्छेद 32 क े अन् ग दालिखल रिरट यातिचका और अं रण यातिचकाओं में विवमुद्रीकरण क े विवभिभन्न पहलू विवचार विवमश क े लिलए आये। प्रस् र 3 में वि'म्'व अवलोक' विकया गया:- “3. इ' प्रश्नों क े उत्तरों का सावजवि'क महत्व और दूरगामी वि'विह ार्थी[ को दृृविष्ट में रख े हुए हमें यह वि'दzश दे'ा उतिच लग ा है विक मामले को अति क ृ प्रकर्थी' क े लिलए पाँच न्याया ीशों की वृहत्तर पीठ क े समक्ष रखा जाय। रसिजस्ट्री द्'ुरूप उपयुक्त पीठ का गठ' कर'े क े लिलए कागजा ों को मा''ीय मुख्य न्याया ीश महोदय क े समक्ष रखेगा।"

111. उपरोक्त पृष्ठभूविम में ी' न्याया ीशों की पीठ 'े मामले को पांच न्याया ीशों की वृहत्तर पीठ समक्ष रख'े का वि'दzश विदया है।

112. व मा' मामला ऐसा मामला है सिजसमें अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े 30.09.2010 विद'ांविक वि'णय क े विवरुद्ध दालिखल की गयी है। सिजसक े द्वारा चार मूल वाद, जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इसे स्र्थीा'ां रिर विकये गये र्थीे,अभिभवि' ारिर विकये गये हैं। चार वाद विववाविद ढ़ाचे पर अप'े स्वत्व का दावा कर े हुए दालिखल विकये गये र्थीे। पक्षकारों 'े कई हजार पन्नों वाले वृहद साक्ष्य प्रस् ु विकये। न्यायालय 'े इसक े समक्ष प्रस् ु mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA साक्ष्यों का विव»ेर्षण कर अभिभवि' ारिर विकया है विक ये सिसविवल वाद इ' अपीलों को जन्म दे े हैं। इ' अपीलों में उत्पन्न विवर्षय वि'ःसंदेह महत्वपूण विवर्षय हैं। सिज'की इ' अपीलों में सु'वाई विकया जा'ा है एवं अभिभवि'ण[1] विकये जा'े हैं। सामान्य ः वाद से उत्पन्न अपील दो न्याया ीशों की पीठ क े समक्ष रखे जा े हैं। लेविक' मामले क े महत्व को देख े हुए व मा' अपील को पहले ही ी' न्याया ीश पीठ क े समक्ष रखा गया है। उपरोक्त कारण से हम श्री राजू रामचन्द्र' क े इस क से सहम 'हीं हैं विक इ' अपीलों को इस्माइल फारूकी क े वाद में संविव ा' पीठ क े वि'णय पर विवचार कर'े क े लिलए पाँच न्याया ीशों की संविव ा' पीठ को सन्दर्भिभ विकया जा'ा चाविहए।

113. समाS कर'े से पहले हमें विहन्दू और मुसलमा' समुदाय क े सदस्यों को यह स्मरण रख'ा चाविहए विक इस्माइल फारूकी क े मामले में न्यायमूर्ति एस.यू. खा' और बहुम की ओर से बोल'े वाले न्यायमूर्ति जे.एस.वमा क े सुतिचन्तिन् संदेश को ध्या' में रख'ा चाविहए। न्यायमूर्ति एस.यू.खा' 'े वि'म्'लिललिख अपील की है: “मुन्तिस्लमों को इस पर भी विवचार कर'ा चाविहए विक व मा' में सम्पूण विवश्व मुन्तिस्लमों का दूसरों से संबं क े बवि'स्ब इस्लाम की वास् विवक भिशक्षाओं को जा''ा चाह ा है। शत्रु ा, विमत्र ा, सविहष्णु ा, शांति, दूसरों को प्रभाविव कर'े का अवसर या जहां और जब भी संभव हो दूसरों पर हमला कर'ा या क्या? इस संबं में भार क े मुसलमा'ों की न्तिस्र्थीति विवभिशष्ट है। वे यहां पर शासक रहे, उ' पर शास' विकया गया और अब वे सत्ता में सहभागी हैं (सचमुच कवि'ष्ठ सहभागी)। वे बहुम में 'हीं हैं लेविक' वे 'गpय अuपम में भी 'हीं हैं। मुन्तिस्लमों क े अति कांश सदस्य व्यापक बहुम में हैं। जो उन्हें प्रश्नग समस्याओं से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अप्रभाविव ब'ा ा है या ऐसे 'गpय अuपम में हैं विक उन्हें महत्वही' ब'ा दे ा है। भार ीय मुसलमा'ों को ार्मिमक भिशक्षाओं और ज्ञा' की एक वृहद विवरास प्राS है। इसलिलए वे विवश्व को वास् विवक न्तिस्र्थीति ब ा'े में सबसे अति क सक्षम हैं। उन्हें व मा' विववाद क े समा ा' में अप'ी भूविमका से शुरुआ कर'ी चाविहए।”

114. न्यायमूर्ति जे.एस. वमा 'े वि'णय क े प्रस् र 156 में निंहदू म में महा' आशा व्यक्त की जो एक सविहष्णु विवश्वास है। प्रस् र 156 में यह अव ारिर विकया गया: “156. अन्तिन् म आदेश पारिर कर'े से पूव सामान्य प्रक ृ ति की क ु छ विटप्पभिणयां उतिच प्र ी हो ी हैं। विहन्दू म एक सविहष्णु म है। यह इ 'ा सविहष्णु है विक इसमें इस्लाम, विक्रतिश्चयवि'टी, पारसी, यहूदी,बौद्ध, जैवि'यों और सिसखों को शरण प्रदा' विकया और अप'ी भूविम पर सहाय ा दी। हमें इसमें संदेह 'हीं विक आ ुवि'क विहन्दुओं को मंविदर ब'ा'े क े लिलए दूसरों का पूजा स्र्थील हटा'े में कोई रूतिच है। हमारी यह आशा है विक एक मध्यममाग1य म को व्यक्त विकया जाएगा और सामुदातियक भा ृत्व से अयोध्या क े विववाद का एक सवमान्य समा ा' न्यायालय द्वारा इसे हल विकये जा'े से पहले ही खोज लिलया जाएगा।”

115. हमें इस प्राची' देश की समृद्ध संस्क ृ ति और विवरास का भी स्मरण है जो सदैव पूरे विवश्व क े लिलए महा' भिशक्षा और प्रेरणा का विवर्षय रहा है।

116. महा' राजा अशोक 'े 245 ई.पू. (ईसा से पूव) 'े दुवि'या को कई संदेश विदए र्थीे जो विक भिशलालेखों में उक े रे गए हैं जो दूसरों क े विवश्वास क े प्रति श्रद्धा दशा े हैं। महा' राजा अशोक क े बारहवें भिशलालेख में कहा गया है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “राजा, देव ाओं का विप्रय, ार्मिमक विवश्वास क े हर रूप का सम्मा' कर ा है, लेविक' विकसी भी उपहार या सम्मा' को म क े पदार्थी की वृतिद्ध क े रूप में 'हीं मा' ा है; सिजसका मूल 109 है, अप'े स्वयं क े विवश्वास का सम्मा' कर'ा और कभी भी दूसरों की निं'दा 'हीं कर'ा। जो अलग रह से काय कर ा है वह अप'े ही म को 'ुकसा' पहुंचा ा है जबविक वह दूसरे क े म को गल ब ा ा है।' मेरे संरक्षण में सभी प्रकार क े म[ ग्रंर्थीों का पाल' विकया जाएगा।' "

117. डॉ. एस. रा ाक ृ ष्ण', भार क े सबसे विवद्वा' और सम्मावि' पूव राष्ट्रपति, 'े अप'ी प्रसिसद्ध पुस् क "द निंहदू व्यू ऑफ लाइफ" में " म क े संघर्ष" क े विवर्षय पर विवचार कर े हुए' जीव' क े निंहदू दृविष्टकोण में आशा व्यक्त की है। डॉ रा ाक ृ ष्ण' क े शब्दों में: "यह बा - विक म[ क े संघर्ष की समस्या का निंहदू समा ा' भविवष्य में स्वीकार विकए जा'े की संभाव'ा है, मुझे काफी हद क वि'तिश्च लग ी है। अप'े लक्ष्य को चु''े की स्व ंत्र ा में अप'े अपार विवश्वास क े सार्थी लोक ंत्र की भाव'ा और उन्हें साकार कर'े क े प्रयास में अप'े माग को वि'दzभिश कर'ा इसकी पुविष्ट कर ी है। वह क ु छ भी अच्छा 'हीं है जो स्वयं चु'ा 'हीं गया है; कोई भी दृढ़ संकuप मूuयवा' 'हीं है जो आत्मवि'णय 'हीं है। विवभिभन्न म ीरे- ीरे एक दूसरे क े सार्थी रह'ा सीख रहे हैं। म[ की संसद और सभी पंर्थीों क े उदार विवचारकों क े सम्मेल' आपसी समझ और सद्भाव को बढ़ावा दे े हैं। ुल'ात्मक म का अध्यय' अन्य म[ क े प्रति एक वि'ष्पक्ष दृविष्टकोण विवकसिस कर रहा है। यह सभी म[ की मौलिलक एक ा को रेखांविक कर रहा है और समय की आवश्यक ा प्रत्येक म में रूझा' को वि' ारिर कर ा है। हम म[ क े अं स¾बं ों क े बारे में स्पष्ट रूप से सोच'ा सीख रहे हैं। हम विवभिभन्न म[ को एक दूसरे से असंग रूप में 'हीं बन्तिuक पूरक क े रूप में देख े हैं, और सामान्य लक्ष्य की प्राविS क े लिलए एक दूसरे क े लिलए अपरिरहाय हैं। अन्य म[ क े सार्थी वि'कट संपक 'े इस विवश्वास को दूर कर विदया है विक क े वल इस या उस म 'े साहस mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और ैय, वि'स्वार्थी प्रेम और रच'ात्मक ऊजा क े व्यविक्त पैदा विकए हैं।हर महा' म 'े अप'े अ'ुयातिययों को वास'ा क े वेग, काम'ा क े बल और क्रो क े अं ेप' का समा ा' विकया है। ऐसा लग ा है विक Ÿह्मांडीय योज'ा में मूलभू म का अप'ा स्र्थीा' है, क्योंविक भव्य फ ू ल उ' मैली जड़ों को सही ठहरा े हैं सिज'से वे पHविव हो े हैं।"

118. हमें विवश्वास है विक इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े न्यायमूर्ति एस.यू. खा' एवं न्यायमूर्ति जे.एस. वमा वि'णय क े प्रस् र 156 में दी गयी उविक्तयां दो'ों समुदायों को उ'क े विवचार, कम और काय में मागदश' करेंगे।

119. वि'ष्कर्ष रूप में, हम विफर से यह स्पष्ट कर े हैं विक इस्माइल फारूकी क े मामले में, जैसा विक ऊपर उHेख विकया गया है, की गयी विटप्पभिणयां भूविम अति ग्रहण क े संदभ में की गयी र्थीीं। वे उविक्तयां ' ो वादों क े वि'णय क े लिलए प्रासंविगक र्थीे और ' ही इ' अपीलों क े अभिभवि' ारण क े लिलए।

120. पूवगामी बहस क े दृविष्टग, हमारा यह विवचार है विक इस्माइल फारूकी मामले (उपरोक्त) में इस न्यायालय क े संविव ा' पीठ क े फ ै सले को पु'र्मिवचार क े लिलए संदर्भिभ कर'े का कोई आ ार 'हीं विदया गया है।

121. हम दो'ों पक्षों क े विवद्वा' अति वक्ताओं, विवशेर्ष रूप से श्री एजाज मकबूल और पी.वी. योगेश्वर' द्वारा दी गयी सहाय ा की प्रशंसा कर े है सिजन्हों'े विवभिभन्न खंडों को व्यवन्तिस्र्थी रीक े से संकलिल कर'े में न्यायालय को बहु सहाय ा प्रदा' की है, जो इस मुद्दे को सु''े और अभिभवि' ारिर कर'े में न्यायालय क े लिलए बहु सहायक रहा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

122. सिज' अपीलों पर इस न्यायालय द्वारा काफी लंबी अवति से विवचार 'हीं विकया गया है उन्हें अब सु'वाई क े लिलए 29 अक्टूबर, 2018 से प्रारम्भ हो'े वाले सSाह में सूचीबद्ध विकया जाए। …………………….. (मुख्य न्यायमूर्ति दीपक विमश्रा) ………………………... (न्यायमूर्ति अशोक भूर्षण) 'ई विदHी सिस म्बर 27, 2018 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रति वेद्य भार ीय सव च्च न्यायालय दीवा'ी अपीलीय अति कारिर ा सिसविवल अपील सं. 10866-10867 वर्ष 2010 एस सिसद्दीकी (मृ ) द्वारा विवति क प्रति वि'ति...… अपीलार्थी1(गण) ब'ाम महन् सुरेश दास एवं अन्य इत्याविद......प्रत्यर्थी1 (गण) सिसविवल अपील सं. 4768-4771 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 2636 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं.821 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 4739 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 4905-4908 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 2215 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 4740 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 2894 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 6965 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 4192 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 5498 वर्ष 2011 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिसविवल अपील सं. 7226 वर्ष 2011 सिसविवल अपील सं. 8096 वर्ष 2011 डायरी सं. 22744 वर्ष 2017 वि'णय न्यायमूर्ति एस.अब्दुल 'जीर

1. मुझे अप'े विवद्वा' बं ु न्यायमूर्ति अशोक भूर्षण क े विवद्व ापूण वि'णय को पढ़'े का सौभाग्य प्राS हुआ है। मेरे विवद्वा' बं ु 'े मा'ा है विक डॉ इस्माइल फारूकी एवं अन्य ब'ाम भार संघ एवं अन्य (1994) 6 एससीसी 360 (संक्षेप में 'इस्माइल फारूकी') क े फ ै सले क े पैराग्राफ 82 में की गई प्रश्नांविक विटप्पभिणयां इ' अपीलों क े अभिभवि' ारण क े लिलए प्रासंविगक 'हीं हैं। इसलिलए, मा''ीय न्यायमूर्ति महोदय 'े वि'ष्कर्ष वि'काला है विक इ' अपीलों को इस न्यायालय की संविव ा' पीठ को संदर्भिभ कर'े क े लिलए कोई आ ार 'हीं विदया गया है। मैं अप'े बं ु द्वारा व्यक्त इस विवचार को स्वीकार कर'े में असमर्थी हूं। हालांविक, मैं वि'णय क े पैरा 63 से 75 में वि'विह प्रान्तिÉ'णय क े प्रश्न पर उ'की राय से ससम्मा' सहम हूं और इस वि'णय को अन्य मुद्दों क सीविम रखा है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

2. चूंविक मेरे विवद्वा' बं ु 'े मामले क े थ्य और पक्षकारों क े प्रति द्वंदी क[ को विवस् ार से रखा है, इसलिलए उन्हें दोहरा'ा आवश्यक 'हीं है। इसलिलए, मैं'े क े वल क ु छ प्रासंविगक थ्य ब ाए हैं।

3. इस्माइल फारूकी क े मामले में, न्यायालय 'े अयोध्या अति वि'यम, 1993 (संख्या 33 वर्ष 1993) (संतिक्षS में '1993 अति वि'यम' ) क े अन् ग अति ग्रहण की पृष्ठभूविम और भार क े संविव ा' क े अ'ुच्छेद 143 क े खंड (1) क े ह अप'ी शविक्त का प्रयोग कर े हुए भार क े राष्ट्रपति द्वारा इस न्यायालय को सन्दर्भिभ कर'े क े कारणों का उHेख प्रारम्भ में ही विकया है। यहां उसिHलिख विवशेर्ष संदभ में विवचार और राय क े लिलए वि'म्'लिललिख प्रश्न र्थीा: "क्या उस क्षेत्र में राम जन्म भूविम-बाबरी मन्तिस्जद (ऐसी संरच'ा क े आं रिरक और बाहरी प्रांगण क े परिरसर सविह ) क े वि'माण से पहले कोई निंहदू मंविदर या कोई निंहदू ार्मिमक संरच'ा मौजूद र्थीी?"

4. थ्यों का वण' कर'े क े पश्चा, न्यायालय 'े 1993 क े अति वि'यम की संवै ावि'क वै ा की जांच की। इस मुद्दे पर, न्यायालय का वि'ष्कर्ष र्थीा विक संसद क े पास उक्त का'ू' को अति वि'यविम कर'े की विव ायी क्षम ा है और ारा 4(3) को छोड़कर, 1993 का संपूण अति वि'यम संवै ावि'क रूप से वै है। ऐसा वि'णय ले े हुए, न्यायालय 'े प्रस् र 51 में दो'ों समुदायों क े लिलए विववाविद स्र्थील क े " ुल'ात्मक महत्व" पर चचा की। जो विक वि'म्'ा'ुसार पु'प्रस् ु है: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

"51. यह भी उHेख विकया जा सक ा है विक ीर्थी स्र्थीा' के रूप अयाध्या ु ं के लिलए विवशेर्ष महत्व का कहा जा ा है क्योंविक प्राची' को निंहदओ मान्य ा है विक भगवा' राम का जन्म वहां हुआ र्थीा, मुन्तिस्लम समुदाय के लिलए मन्तिस्जद का महत्व मीर बाकी द्वारा 1528 ई. में ब'वाई गयी एक प्राची' मन्तिस्जद के रूप में र्थीा। एक मन्तिस्जद के रूप में , यह मुसलमा'ों द्वारा पूजा का एक ार्मिमक स्र्थीा' र्थीा। यह दो'ों समुदायों के लिलए विववाविद स्र्थील के ुल'ात्मक महत्व को इंविग कर ा है और यह भी विक अति ग्रहण का प्रभाव निंहद ू समुदाय के अति कार और विह पर समा' रूप से है। इस पहलू का उHेख केवल इस क के संदभ में विकया गया है विक ु ं के पक्ष में और मुसलमा'ों के विवरुद्ध हो'े के कारण संपूण निंहदओ विव ा', ' विक केवल उसकी ारा 7, गैर मवि'रपेक्ष है।"

5. उपरोक्त वि'ष्कर्ष क े बाद, प्रस् र 65 से 82 में न्यायालय 'े इस प्रश्न का परीक्षण विकया विक क्या क्या मन्तिस्जद अति ग्रहण से मुक्त है। इ' प्रस् रों में, प्रस् र 77, 78 और 80 की गयी उविक्तयां व मा' मामले क े लिलए महत्वपूण हैं और वि'म्'ा'ुसार पु'प्रस् ु की जा ी हैं: - "77. यह ध्या ब्य है विक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 26 क े विवपरी अ'ुच्छेद 25 में संपलित्त का कोई संदभ 'हीं है। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह प्रत्याभू म क े आचरण, मा''े और प्रचार कर'े क े अति कार में संपलित्त हासिसल कर'े या स्वत्व या कब्जे का अति कार शाविमल 'हीं है। इसी प्रकार यह अति कार विकसी भी पूजा स्र्थील पर पूजा क े अति कार क विवस् ृ 'हीं है सिजससे विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा कर'े में कोई बा ा संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह प्रत्याभू ार्मिमक स्व ंत्र ा का उHंघ' हो जाय। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संरक्षण ार्मिमक आचरण क े लिलए है जो म का एक अवि'वाय और अभिभन्न अंग है। कोई क ृ त्य/ आचरण एक ार्मिमक आचरण हो सक ा है लेविक' आवश्यक 'हीं विक उस म क े आचरण का एक अवि'वाय और अभिभन्न अंग हो। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

78. हालांविक पूजा या उपास'ा कर'ा एक ार्मिमक प्रर्थीा है, लेविक' हर स्र्थीा' पर पूजा की जा सक ी हो, इसे कर'ा ार्मिमक आचरण का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग 'हीं होगा जब क विक उस स्र्थीा' का उस म क े लिलए ऐसा विवशेर्ष महत्व ' हो विक वह उसका एक आवश्यक या अभिभन्न अंग हो जाय। विकसी म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख'े वाले ार्मिमक स्र्थील जो उस म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग हों, वे एक अलग पायदा' पर हो े हैं और उ'क े सार्थी अलग और अति क सम्मा'ज'क व्यवहार विकया जा'ा चाविहए।

80. यह क विदया गया है विक विकसी मन्तिस्जद को मुन्तिस्लम विवति में एक विवशेर्ष स्र्थीा' प्राS है और एक बार विकसी मन्तिस्जद की स्र्थीाप'ा हो जा'े और उसमें 'माज़ हो जा'े पर वह हमेशा क े लिलए अHाह की संपलित्त हो जा ी है और वह कभी भी दा ा या संस्र्थीापक को को वापस 'हीं हो ी और इस्लामी आस्र्थीा को मा''े वाला कोई भी व्यविक्त ऐसी मन्तिस्जद में 'माज अदा कर सक ा है और अगर ढांचा विगरा विदया जाए ो भी वह जगह वही रह ी है जहां 'माज अदा की जा सक ी है। जैसा विक इससे पूव ब ाया गया है, विŸविटश भार में, विकसी मन्तिस्जद को ऐसी कोई सुरक्षा 'हीं दी गई र्थीी और मन्तिस्जद को परिरसीमा क़ा'ू' क े प्राव ा'ों क े अ ी' विकया गया र्थीा, सिजससे उस संपलित्त पर प्रति क ू ल कब्जे छ ू ट जा'े पर मुसलमा'ों का उस विवशेर्ष मन्तिस्जद में 'माज़ अदा कर'े का अति कार समाS हो जा ा है।" (प्रभाव वर्ति )

6. प्रस् र 82 में इस न्यायालय 'े इस न्तिस्र्थीति को संक्षेप में वि'म्'व प्रस् ु विकया: "82. सही न्तिस्र्थीति को इस प्रकार संक्षेप में प्रस् ु विकया जा सक ा है। भार में प्रयोज्य मुन्तिस्लम विवति क े ह, एक मन्तिस्जद का मालिलका'ा हक प्रति क ू ल कब्जे से खो सक ा है (देखें एम. विहदाय ुHा लिललिख मुHाज निंप्रसिसपल ऑफ मोहम्मड' लॉ, 19 वां संस्करण, - ारा 217; और शहीद गंज ब'ाम भिशरोमभिण गुरुद्वारा [AIR 1940 PC mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 116, 121]। यविद ऐसी विवति क न्तिस्र्थीति है, ो यह मा''े का कोई कारण 'हीं हो सक ा है विक एक मन्तिस्जद को एक अविद्व ीय या विवशेर्ष दजा प्राS है, जो विक मवि'रपेक्ष भार में अन्य म[ क े पूजा स्र्थीलों की ुल'ा में उच्च है, सिजससे राज्य की संप्रभु या विवशेर्षाति कार शविक्त क े प्रयोग से अति ग्रहण से बचाया जा सक े । मन्तिस्जद इस्लाम म क े आचरण का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है और मुसलमा'ों द्वारा 'माज (प्रार्थी'ा) कहीं भी की जा सक ी है, यहां क विक खुले में भी। द'ुसार, इसका अति ग्रहण भार क े संविव ा' क े प्राव ा'ों द्वारा वि'विर्षद्ध 'हीं है। संप्रभु शविक्त क े प्रयोग में राज्य द्वारा अति ग्रहण से प्रति रक्षा क े उद्देश्य से एक इस्लामी देश में एक मन्तिस्जद की न्तिस्र्थीति क े बावजूद, संविव ा' क े ह भार क े मवि'रपेक्ष लोकाचार में अति ग्रहण से इसकी न्तिस्र्थीति और प्रति रक्षा अन्य म[ क े पूजा स्र्थील, अर्थीा ् चच, मंविदर आविद क े समा' और बराबर है। यह अन्य म[ क े पूजा स्र्थीलों की ुल'ा में ' अति क है और ' ही कम है। स्पष्ट ः, विकसी भी ार्मिमक स्र्थीा' का अति ग्रहण क े वल असामान्य और असा ारण परिरन्तिस्र्थीति यों में एक बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य क े लिलए विकया जा'ा चाविहए, इस बा को ध्या' में रख े हुए विक इस रह क े अति ग्रहण क े परिरणामस्वरूप म का पाल' कर'े का अति कार खत्म 'हीं हो'ा चाविहए, यविद उस स्र्थीा' का महत्व ऐसा हो। इस श क े अ ी', विकसी भी म क े पूजा स्र्थील की रह मन्तिस्जद क े लिलए अति ग्रहण की शविक्त उपलब् है। पूजा कर'े का अति कार हरेक स्र्थीा' पर 'हीं है, जब क विक प्रभावी ढंग से इसका आचरण विकया जा सक ा है, एवं विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा कर'े का अति कार स्वयं उस अति कार का अभिभन्न अंग ' हो।" (प्रभाव वर्ति )

7. विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता डॉ राजीव व' 'े क विदया है विक उपरोक्त प्रस् रप में व्यक्त उविक्त विक, "मन्तिस्जद इस्लाम क े म क े आचरण का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है और मुसलमा'ों द्वारा 'माज (प्रार्थी'ा) कहीं भी की जा सक ी है, खुले में भी।" विवति क े विवपरी है और न्यायालय यह बया' mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दे'े क े लिलए आस्र्थीा की जांच कर'े क े लिलए बाध्य र्थीा। उन्हों'े आगे क विदया विक विवशेर्ष महत्व और ुल'ात्मक महत्व की अव ारणाओं पर उविक्तयां आ ारही' हैं। इसक े अलावा, उ'का क है विक एक म क े अवि'वाय विहस्से का गठ' कर'े वाले त्व मुख्य रूप से उसी म क े सिसद्धां क े संदभ में वि' ारिर विकये जा'े चाविहए, जैसा विक इस न्यायालय क े सा -न्याया ीशों की संविव ा' पीठ, द्वारा आयुक्त, निंहदू ार्मिमक बंदोबस् ी, मद्रास ब'ाम श्री लक्ष्मींद्र ीर्थी स्वामीयार ऑफ श्री भिशरूर मठ 1954 एससीआर 1005 (संक्षेप में 'भिशरूर मठ' ) क े मामले में विकया गया है। यह भी कहा गया है विक भिशरूर मठ क े मामले में "अवि'वाय ा" की व्यापक कसौटी को बाद क े पांच और दो न्याया ीशों क े फ ै सलों से 'हीं काटा जा सक ा है। "अभिभन्न" "आवश्यक" क े सार्थी विववि'मेय है। बाद वाले को पूव वाले क े उपयोग से बेकार 'हीं विकया जा सक ा है। यह कई गल समझ क े मूल में हो सक ा है और इसे स्पष्ट कर'े की आवश्यक ा है। इसक े अलावा, जब इस्माइल फारुकी क े मामले में "विवशेर्ष महत्व" की बा कर े हो ी है, ो यह ठीक अभिभन्न ा की त्रुविट है। उन्हों'े यह भी कहा विक इस्माइल फारूकी क े मामले में प्रस् र 78 में प्रयुक्त कसौटी आवश्यक और अभिभन्न र्थीा, भले ही "या" शब्द का प्रयोग विकया गया र्थीा। न्यायालय आस्र्थीा क े त्वों की जांच कर'े में विवफल रहा और अप'े सहज ज्ञा' से असिसद्ध विटप्पभिणयों विकया। विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता 'े अप'े क[ क े समर्थी' में इस न्यायालय क े कु छ वि'णयों का भी अवलंब लिलया है। इस्माइल फारूकी क े मामले में इस विवर्षय पर कोई परीक्षण ' हो'े क े कारण मामला बड़ी बेंच को भेजा जा'ा चाविहए। डॉ. व' आगे कह े हैं विक आक्षेविप वि'णय इस्माइल फारूकी क े मामले में की गयी आपलित्तज'क mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विटप्पभिणयों से प्रभाविव र्थीा। उन्हों'े इस संबं में हमें आक्षेविप वि'णय क े विवभिभन्न प्रस् रों से अवग कराया। डॉ व' 'े अप'े इस क क े समर्थी' में आक्षेविप वि'णय में की गई विवभिभन्न विटप्पभिणयों का भी उHेख विकया है विक इस्माइल फारूकी क े वाद 'े उक्त वि'णय को प्रभाविव विकया है।

8. दूसरी ओर, विवद्वा' वरिरष्ठ अति वक्ता श्री परासर', 'े क विदया है विक इस्माइल फारूकी क े वाद में आपलित्तज'क विटप्पभिणयां विक मन्तिस्जद इस्लाम क े आचरण का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है, को वाद संपलित्त क े 1993 क े अति वि'यम क े ह अति ग्रहण की वै ा क े संदभ में पढ़ा जा'ा चाविहए। उ'का कह'ा है विक इस न्यायालय 'े यह 'हीं कहा है विक मुसलमा'ों द्वारा 'माज़ पढ़'ा एक अवि'वाय ार्मिमक प्रर्थीा 'हीं है। इस'े क े वल यह कहा विक विवद्यमा' प्रत्येक मन्तिस्जद में 'माज अदा कर'े का अति कार आवश्यक ार्मिमक आचरण 'हीं है। लेविक' यविद विकसी म क े पूजा स्र्थील का उस म क े लिलए एक विवशेर्ष महत्व है, जो उसे म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए पयाS है, ो वह एक अलग पायदा' पर खड़ा होगा और उससे अलग और अति क सम्मा'ज'क व्यवहार कर'ा होगा। यह क विदया जा ा है विक अ'ुच्छेद 25 क े ह मुन्तिस्लम समुदाय का 'माज अदा कर'े का मौलिलक अति कार व मा' मामले में प्रभाविव 'हीं होगा क्योंविक बाबरी मन्तिस्जद उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व वाली मन्तिस्जद 'हीं र्थीी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

9. हम'े वरिरष्ठ विवद्वा' अति वक्ता श्री सी.एस. वैद्य'ार्थी', राजू रामचंद्र', एस.क े. जै', र्थीा अपर सोलिलसिसटर ज'रल श्री ुर्षार मेह ा एवं विवद्वा' अति वक्ता श्री पी.ए'. विमश्रा को भी सु'ा।

10. पक्षकारों क े विवद्वा' अति वक्ताओं 'े मन्तिस्जद क े विवर्षय में इस्लामी ार्मिमक ग्रंर्थी, पविवत्र क ु रा' क े प्रासंविगक अंश और पविवत्र क ु रा' पर प्रबुद्ध प्रवच'ों को अप'े संबंति क[ क े समर्थी' में प्रस् ु विकया है विक क्या मन्तिस्जद इस्लाम म क े आचरण का एक अवि'वाय विहस्सा है या 'हीं।

11. इस्माइल फारुकी क े वाद से यह स्पष्ट है विक यातिचकाक ाओं का मुख्य क यह र्थीा विक मुन्तिस्लम का'ू' में विवशेर्ष दजा क े कारण मन्तिस्जद का अति ग्रहण 'हीं विकया जा सक ा है। संविव ा' पीठ 'े इस पहलू पर फ ै सले क े प्रस् र 65 से एक अलग शीर्षक "मन्तिस्जद - अति ग्रहण से प्रति रक्षा" क े ह चचा की है। विवशेर्ष रूप से प्रस् र 74 में, न्यायालय 'े कहा विक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संरक्षण क े विवर्षयग, ार्मिमक पूजा स्र्थीलों, जैसे मन्तिस्जदों, चच[, मंविदरों, आविद को अति ग्रहण की राज्य की संप्रभु शविक्त क े ह अति ग्रही विकया जा सक ा है। इस रह का अति ग्रहण स्वयं संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 या अ'ुच्छेद 26 का उHंघ' 'हीं कर ा है। इसक े अलावा, प्रस् र 77 में न्यायालय 'े कहा विक अ'ुच्छेद 25 में संविव ा' क े अ'ुच्छेद 26 क े विवपरी संपलित्त का कोई संदभ 'हीं है। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह प्रत्याभू म को मा''े, आचरण और प्रचार कर'े क े अति कार में संपलित्त हासिसल कर'े या स्वत्व या रख'े का अति कार शाविमल mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 'हीं है। इसी रह, यह अति कार प्रत्येक पूजा स्र्थील पर पूजा क े अति कार क विवस् ृ 'हीं है, सिजससे विकसी स्र्थीा' पर पूजा कर'े में कोई बा ा संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह प्रत्याभू ार्मिमक स्व ंत्र ा का उHंघ' कर हो जाए। इसक े अति रिरक्त, प्रस् र 78 में, यह 'ोट विकया गया विक विकसी भी म क े पूजा स्र्थीलों का उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व हो ा है। इसे म का एक अवि'वाय या अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए, एक अलग स् र पर हो'ा हो ा है और उ'से अलग और अति क सम्मा'ज'क व्यवहार विकया जा'ा चाविहए। प्रस् र 82 में न्तिस्र्थीति का संक्षेपण कर े हुए, न्यायालय 'े कहा विक मन्तिस्जद इस्लाम म क े आचरण का एक अवि'वाय विहस्सा 'हीं है और मुसलमा'ों द्वारा 'माज़ कहीं भी यहां क विक खुले में भी पढ़ी जा सक ी है।

12. सिज' बा ों से विकसी म का आवश्यक भाग गविठ हो ा है वह प्रार्थीविमक ौर पर स्वयं उस म क े सिसद्धान् ों मान्य ाओं और विवश्वासों क े संदभ में अभिभवि'तिश्च विकया जा'ा चाविहए। इस सिसद्धान् को सिसद्धान् भिशरूर मठ क े पृष्ठ संख्या 1025 में प्रति पाविद विकया गया है:- “...विवद्वा' अटा'1 ज'रल उस अ'ुच्छेद क े उपखpड़ 2(ए) पर जोर दे े हैं और उ'का क यह है विक वे सभी गति विवति यां जो म से जुड़ी हो सक ी है विकन् ु वास् व में इसका भाग 'हीं हैं वे राज्य क े प्रति उत्तरदायी हैं। हमरा मा''ा है विक ऐसी व्यापक श [ का समर्थी' 'हीं विकया जा'ा चाविहए। प्रर्थीम ः जो म का आवश्यक भाग ब' ी है उसे प्रार्थीविमक ौर पर उस म क े सिसद्धान् ों मान्य ाओं और विवश्वासों क े संदभ में अभिभवि'तिश्च कर'ा होगा। यविद विहन्दू म का कोई भी पंर्थी यह विवविह कर ा है विक भगवा' को भोग विद' में विकसी विवशेर्ष समय पर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लगाया जा'ा चाविहए, और प्रत्येक वर्ष म'ाये जा'े वाले सामारोहों को विवशेर्ष रीक े से प्रत्येक वर्ष वि'तिश्च रीकों से विकया जा'ा चाविहए अर्थीवा पाठ विकया जा'ा चाविहए और पविवत्र आग की आर ी ली जा'ी चाविहए इस सभी को म का भाग मा'ा जाएगा और क े वल यह थ्य विक ' खच हो ा है अर्थीवा सा ुओं और 'ौकरों की वि'युविक्त अर्थीवा बाजार की वस् ुओं का प्रयोग इ'को मवि'पzक्ष विक्रयाकलाप 'हीं ब'ाएंगी, यह सभी ार्मिमक प्रर्थीाएँ हैं और इन्हें अ'ुच्छेद 26(ब) क े ह म विवर्षयक मा'ा जा'ा चाविहए। अ'ुच्छेद 25 (2) (ए) कह ा है विक राज्य ार्मिमक गति विवति यों को वि'यंवित्र 'हीं कर सक ी है चूंविक यह संविव ा' द्वारा प्रदत्त स्व ंत्र ा है, राज्य क े वल उ' परिरन्तिस्र्थीति यों में इन्हें वि'यंवित्र कर सक ी है जब यह लोक व्यवस्र्थीा, स्वास्थ्य और सुरक्षा क े प्रति ख रा उत्पन्न कर दें, विकन् ु राज्य आर्भिर्थीक, राज'ैति क और वाभिणन्तिज्यक गति विवति यों पर वि'यंत्रण आरोविप कर सक ी है भले ही वे ार्मिमक प्रर्थीाओं से जुड़ी हों।" (प्रभाव वर्ति )

13. आगे पृष्ठ 1028-1029 में वि'म्'लिललिख कर्थी' विकया गया हैः “इसलिलए अ'ुच्छेद 26(बी) क े ह विकसी भी ार्मिमक संस्र्थीा अर्थीवा ईकाई को यह य कर'े की पूरी स्व ंत्र ा है विक वे कौ' सी प्रर्थीाएं रीति वरिरवाज है जो उ'क े ार्मिमक म क े अ'ुसार आवश्यक हैं और विकसी भी बाहरी प्राति कारी को इ' मामलों में हस् क्षेप कर'े का कोई क्षेत्राति कार 'हीं है। वास् व में इ' ार्मिमक संस्कारों में खच की मात्रा ार्मिमक अति पत्य से जुड़ी सम्पलित्त क े प्रशास' का मामला होगा और मवि'रपेक्ष प्राति कारिरयों सक्षम विव ाय' द्वारा ब'ाये गये विवति क े अ'ुरूप इसे वि'यंवित्र कर सक े हैं क्योंविक यह रीति रिरवाजों पर विफजूल खच कर विकसी संस्र्थीा और इसक े मदाय को 'ष्ट कर'े का विकसी म का व्यादेश 'हीं हो सक ा है।"” (प्रभाव वर्ति ) mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

14. र ीलाल प्रेमचन्द्र गां ी ब'ाम बम्मभी राज्य एवं अन्य 1954 एस.सी.आर.1055, क े मामले में इस न्यायलय की संवै ावि'क पीठ 'े वि'म्'ा'ुसार ारिर विकयाः "यह ध्या' विदया जाए विक म आन्तिस् क हो'ा 'हीं है और वास् व में भार में बौद्ध और जै' जैसे म है जो ईश्वर की सत्ता अर्थीवा परम सत्ता पर विवश्वास 'हीं कर े हैं। म विवश्वास और सिसद्धान् ों पर आ ारिर हो ा है और इसको वे लोग मान्य ा प्रदा' कर े है जो यह दावा कर े हैं विक म उ'की आध्यान्तित्मक उन्नति क े सहायक है। लेविक' यह कह'ा सही 'हीं होगा जैसा विक बाम्बे उच्च न्यायालय क े एक विवद्वा' न्यायमूर्ति क े विवचारों से दर्भिश हो ा है म क ु छ भी 'हीं है बन्तिuक यह एक आस्र्थीा और विवश्वास है। xxx xxx xxx.........विकसी भी बाहरी प्राति कारी को यह कह'े का हक 'हीं है विक ये सब म का आवश्यक भाग 'हीं है और राज्य क े म वि'रपेक्ष प्राति कारी को यह अति कार 'हीं है विक वह ट्रस्ट सम्पलित्त क े प्रशास' की आड़ में उ'पर विकसी भी रह से रोक लगायें अर्थीवा प्रति र्षेति करें।" (प्रभाव वर्ति )

15. श्री वेंकटारमन्ना देवारू एवं अन्य ब'ाम मैसूर राज्य एवं अन्य 1958 एस.सी.आर. 895 क े मामले में इस न्यायालय की संविव ा' पीठ क े पास 1949 में यर्थीासंशोति मद्रास टेम्पल एन्ट्री अर्थीॉरिरसेश' एक्ट, 1947 क े संदभ में भार क े संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 एवं 26 पर विवचार कर'े का अवसर र्थीा। इस न्यायालय 'े श्रीरूर मठ का संदभ देकर वि'म्'ा'ुसार ारिर विकयाः mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “16 (3)...अब, ार्मिमक मामलों का सटीक अभिभ ा' को इस न्यायायल 'े कविमश्नर, विहन्दू मदाय, मद्रास ब'ाम श्री श्रीरूर मठ क े लक्ष्मीन्द्र ीर्थी स्वाविमयार 1954 एस.सी.आर. 2015 क े मामले में विवचारिर कर उस मामले में यह ारिर विकया विक इस'े ' क े वल म से जुड़े हुए सिसद्धान् एवं मान्य ा बन्तिuक इसकी प्रर्थीा भी समाविह र्थीी, अर्थीवा इसको विहन्दू मशास्त्र क े सिसद्धान् ों क े श [ में ला'ा ' क े वल इसक े गा' को बन्तिuक इसक े भविक्त एवं कमकाpड़ को भी...”

16. दुगzश कमेटी, अजमेर एवं अन्य ब'ाम सैय्यद हुसै' अली एवं अन्य (1962) 1 एस.सी.आर. 383 क े मामले में इस न्यायालय की संवै ावि'क पीठ 'े विववाद की ऐति हासिसक पृष्ठभूविम पर विवचार कर इस प्रकार ारिर विकया हैः- "इस प्रकार उस पविवत्र स्र्थीा', इसक े विवकास और मदाय र्थीा इसक े प्रबं ' से जुड़ी कहा'ी की विवस् ृ समीक्षा कर'े क े उपरान् यह जांच कर'ा उतिच होगा विक इसक े सिसद्धान् ों और मान्य ाओं की प्रक ृ ति क्या है सिजसका क ु क विकया जा ा है। ऐसी जांच हमे यह य कर'े में मदद करेगी क्या तिचश् ी सम्प्रदाय को अ'ुच्छेद 26 क े ह ार्मिमक सत्ता है अर्थीवा उसका एक भाग है। (प्रभाव वर्ति )

17. सरदार सैय्यद'ा ाविहर सैफ्फ ु द्दी' साहेब ब'ाम बाम्बे राज्य 1962 सप्लीमेंट्री (2) एस.सी.आर. 496 क े मामले में यह न्यायालय उस विवति की वै ा पर विवचार कर रहा र्थीा जो अप'े सदस्यों को समाज से बविहष्क ृ कर'े वाले ार्मिमक सत्ता क े अति कार क े सार्थी हस् क्षेप कर ी र्थीी। इस संदभ में अ'ुच्छेद 25 और 26 पर विवचार विकया गया। इस न्यायालय की संवै ावि'क पीठ कई वि'णयों का संदभ देकर इस प्रकार ारिर विकया हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े अंश पर इस न्यायालय 'े कविमश्नर विहन्दू मदाय ब'ाम श्री श्रीरूर मठ क े श्री लक्ष्मीन्द्र ीर्थी स्वामीयार;महन् जगन्नार्थी रामा'ुज दास ब'ाम उड़ीसा राज्य;श्री वेंकटरमन्ना देवारा ब'ाम मैसूर राज्य; दुगzश कमेटी; अजमेर ब'ाम सैय्यद हुसै' अली और अन्य कई मामलों में विवचारिर विकया गया और इ' प्राव ा'ों से स्र्थीाविप मुख्य सिसद्धान् ों को इ' वि'णयों द्वारा विववाद से परे रखा गया है। प्रर्थीम,इस अ'ुच्छेद का संरक्षण ार्मिमक सिसद्धान् और मान्य ा क सीविम 'हीं है बन्तिuक यह म क े संबं में विकये गये काय[ क विवस् ृ है इसलिलए इसमें कमकाpड़ों, अ'ुपाल', अ'ुष्ठा'ों और पूजा पद्धति क े लिलए गारन्टी समाविह है जो म क े अभिभन्न भाग है। विद्व ीय, जो म और ार्मिमक कमकाpड़ आवश्यक अंग है न्यायालय को उन्हें उस म विवशेर्ष क े संदभ में वि'ण[1] कर'ा होगा और इसमें वे कमकाpड़ शाविमल हैं सिज'कों उस समुदाय अप'े म क े अंग क े रूप में मान्य ा प्रदा' विकया है।" (प्रभाव वर्ति )

18. ति लकाय श्री गोविवन्द लाल जी महाराज ब'ाम राजस्र्थीा' राज्य एवं अन्य (1964) 1 एस. सी.आर. 561 क े मामले में इस न्यायालय की संवै ावि'क पीठ 'ार्थीवारा टेम्पल एक्ट, 1949 (अति वि'यम संख्याक 8 वर्ष

1949) की वै ा पर विवचार कर र्थीी। इस मामले में मुख्य रूप से 'ार्थीवारा अध्यादेश, 1949 (संख्यांक 2 वर्ष 1949) को चु'ौ ी दी गयी जो 6 फरवरी 1949 जारी हुआ। इसक े बाद इस अति वि'यम द्वारा इस अध्यादेश को वि'रसिस कर विदया गया और यातिचकाक ा को अप'ी यातिचका में संशो ' कर'े की अ'ुमति प्रदा' की गयी। यह क विदया गया विक यविद इस मंविदर को सावजवि'क मंविदर ब'ा विदया जाए ब यह अति वि'यम अवै हो जाएगा क्योंविक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 द्वारा प्रदत्त मौलिलक अति कारों का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उHंघ' कर ा है। न्यायायल 'े विवरो ी क[ पर विवचार कर न्यायालय 'े इस प्रकार ारिर विकयाः- "इस प्रश्न का वि'स् ारण कर'े में विक क्या कोई ार्मिमक कमकाpड़ उस म का अभिभन्न अंग है विक 'हीं ब इसकी जांच की जा'ी चाविहए विक उस म को मा''े लोग इसको ऐसा मा' े है विक 'हीं। यह सूत्र क ु छ मामलों में प्रयोग कर'े पर समस्या पैदा कर देगा। खा'पा' और परिर ा' संबं ी मामले को ही ले लीसिजए। यविद विकसी मामले में उस समुदाय का एक वग दावा कर ा है विक क ु छ ार्मिमक अ'ुष्ठा' कर े समय सफ े द कपड़ा पह''ा उस म का अभिभन्न अंग है जबविक अन्य वग क दे ा है विक पीला वस्त्र पह''ा चाविहए, सफ े द वस्त्र उस म का अभिभन्न अंग 'हीं है, ब न्यायालय इस प्रश्न का वि'स् ारण क ै से करे?ऐसा ही खा'पा' क े संबं में विववाद खड़ा हो सक ा है। सिज' मामलों में विववादास्पद साक्ष्य प्रस् ु विकये जा े हैं वहां पर न्यायालय विववाद को सुलझा'े क े लिलए आँख बंद करक े उस सूत्र का प्रयोग 'हीं कर पाएगी ब वह समुदाय यह य कर ा है विक कौ' सा कमकाpड़ उस म विवशेर्ष का अभिभन्न अंग है क्योंविक समुदाय की आवाज न्यायलय की आवाज को दबा सक ी है और इसलिलए यह सूत्र विगर जाएगा। इस प्रश्न को सदैव न्यायालय को य कर'ा चाविहए ऐसा कर'े में न्यायालय को यह जांच कर'ी चाविहए विक क्या प्रश्नग प्रर्थीा ार्मिमक प्रक ृ ति का है अर्थीवा 'हीं और यविद ऐसा है ब क्या इसे उस म का अभिभन्न अर्थीवा आवश्यक अंग मा'ा जा सक ा है, और ऐसे विवर्षय पर न्यायालय का वि'ष्कर्ष सदैव न्यायालय क े समक्ष उस समुदाय की चे 'ा और उस म की मान्य ा क े संबं में रखे गये साक्ष्य पर वि'भर करेगा। ऐसा इस सम्भाविव जविटल ा क े प्रकाश में है जो क ु छ मामलों में उत्पन्न हो सक ा है सिजसका इस न्यायालय 'े दुगzश कमेटी अजमेर ब'ाम सैय्यद हुसै' (1962) 1 एस.सी.आर. 383 पृष्ठ संख्या 411 में साव ा' हो गया और अवलोक' विकया विक प्रश्नग कमकाpड़ को उस म विवशेर्ष का अभिभन्न अंग मा'ा जा'ा जा'ा चाविहए सक ा है जब उक्त म उस प्रर्थीा को अभिभन्न एवं आवश्यक अंग मा'े अन्यर्थीा पूण या मवि'पzक्ष प्रर्थीा,जो उस म का अभिभन्न एवं आवश्यक अंग 'हीं है, सिज'की म की रह स्वीकार कर ली जा ी है, ब वह भी दावा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA करेंगी विक विक उन्हें भी अ'ुच्छेद 25(1) क े अर्थी[ में ार्मिमक प्रर्थीा मा'ा चाए। (प्रभाव वर्ति )

19. उक्त वि'णयों से यह स्पष्ट हो जा ा है विक क्या कोई प्रर्थीा विकसी म का अभिभन्न एवं आवश्यक अंग है विक 'हीं एक ऐसा प्रश्न है सिजसका वि' ारण उस म क े सिसद्धान्, मान्य ाएं एवं विवश्वास पर विवचार करक े विकया जाएगा। यह भी स्पष्ट हो जा ा है विक अवि'वाय प्रर्थीा का अंग हो'े वाले प्रर्थीाओं की विवस् ृ परीक्षण की आवश्यक ा हो ी है जैसा पूव क्त वि'णयों से दर्भिश विकया गया है।

20. इस विबन्दु पर काशी विवश्व'ार्थी मंविदर, वाराणसी क े श्री आविद विवश्वेश्वर एवं अन्य ब'ाम उ.प्र. राज्य एवं अन्य (1997) 4 एस.सी.सी. 606 प्रस् र 28, क े मामले में लिलये गये अवलोक'ों का भी उHेख विकया जा'ा आवश्यक है, जो इस प्रकार हैः- "अवि'तिश्च ा का सिसद्धान् अप'े आप में वि'श्चायक त्व 'हीं है। यह वि'ण[1] कर'े में विक क्या म अर्थीवा ार्मिमक प्रर्थीाओं अर्थीवा विवश्वास की कोई विवशेर्ष बा उस म का अभिभन्न अंग है इस परिरन्तिस्र्थीति पर विवचार विकया जाए। यह य विकया जा'ा चाविहए विक क्या वह समुदाय उ' प्रर्थीाओं अर्थीवा मामलों को अभिभन्न मा' ा है। भले ही यह वि'श्चायक ' हो विफर भी यह एक ऐसा थ्य है सिजस पर ध्या' आकर्मिर्ष विकया जाए। प्रश्नग प्रर्थीा ार्मिमक प्रक ृ ति की है और क्या इसे उस म का अभिभन्न और आवि'वाय अंग मा'ा जा सक ा है और यविद न्यायाल अप'े समक्ष प्रस् ु साक्ष्यों क े आ ार पर वि'ष्कर्ष वि'काल ा है विक यह उस म का mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अभिभन्न एवं अवि'वाय अंग है ब संविव ा' का अ'ुच्छेद 25 उसको संरक्षण प्रदा' कर ा है। (प्रभाव वर्ति )

21. जैसा विक ऊपर उHेख विकया गया है पक्षकारों 'े अप'े-अप'े क[ क े समर्थी' में इस्लाम पर आ ारिर विवभिभन्न पुस् कों को प्रस् ु विकया है। प्रस् ु मामले में उस म क े सिसद्धान्, मान्य ाओं और विवश्वास की जांच विकये विब'ा प्रश्नग वि'ष्कर्ष वि'काल'े में न्यायालय द्वारा लिलये गये दृविष्टकोण पर हम चिंचति हैं। इस्माइल फारूखी 'े विब'ा विवस् ृ जांच विकये प्रस् र 82 में वि'म्'लिललिख वि'ष्कर्ष वि'काला हैः "इस्लाम म में मन्तिस्जद प्रर्थीा का अभिभन्न अंग 'हीं है और मुन्तिस्लम 'माज (प्रार्थी'ा) कहीं भी पढ़ सक े हैं, यहां क खुले में भी।"

22. अब प्रश्न यह है विक क्या आक्षेविप वि'णय इस्माइल फारूखी द्वारा वि'काले गये प्रश्नग वि'ष्कर्ष[ से प्रभाविव हुआ है विक 'हीं। आक्षेविप वि'णय क े परिरशील' से दर्भिश हो ा है विक पक्षकारों की ओर से प्रस् ु विवद्वा' बहस क े दौरा' अति वक्ता इस्माइल फारूकी क े अ'ेक प्रस् रों को बार-बार उदृ विकया और इस्माइल फारूखी में जो प्रश्नग वि'ष्कर्ष वि'काले गये हैं उसका भी मजबू अवलम्ब लिलया है।

23. न्यायमूर्ति डी.वी. शमा द्वारा पारिर आक्षेविप वि'णय क े क ु छ प्रस् रों को पृष्ठ संख्या 3038-3039, 3061, 3392, 3429, 3439 पर उHेख विकया गया सिजसमें इस्माइल फारूखी उदृ विकये गये है और सिजसे वि'म्'लिललिख रूप में पु'ः प्रस् ु विकया गया हैः mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "विववाद्य संख्या 19 (डी)- जब यह थ्य स्वीकार कर लिलया गया विक इसमें मी'ार 'हीं र्थीे ब क्या उस विववाविद भव' को इस्लाविमक विवति क े ह मन्तिस्जद 'हीं मा'ा जा सक ा र्थीा? वि'ष्कर्षः बचाव पक्षकार की रफ से यह दलील दी गयी विक इस्लाविमक विवति क े ह विववाविद भव' मन्तिस्जद 'हीं र्थीी। इस पर विववाद 'हीं है विक विद'ांक 06.12.1992 को उस विववाविद ढ़ांचे को विगरा विदया गया है। डॉ. इस्माइल फारूखी एवं अन्य ब'ाम भार संघ एवं अन्य 1994 (6) एस.सी.सी. 960 क े अ'ुसार शीर्ष न्यायलय 'े प्रस् र 70 पर यह ारिर विकया विक मन्तिस्जद की पविवत्र प्रक ृ ति को 'ष्ट विकया जा सक ा है। इस्लाविमक मान्य ा क े अ'ुसार अजा' दे'े क े लिलए मी'ार जरूरी हो ा है। जहां पर अजा' 'हीं हो ी है वह प्रार्थी'ा का समासिजक स्र्थील 'हीं हो सक ा है। इसलिलए विववाविद स्र्थील को मन्तिस्जद 'हीं मा'ा जा सक ा है। इस्लाविमक मान्य ा क े अ'ुसार जहां पर वजू और ी' ओर से गलिलयारे द्वारा तिघरा हुआ स्र्थीा' ' हो वहां मन्तिस्जद 'हीं हो सक ी है। इस प्रकार उक्त चचाओं क े दृविष्टग इसकी मजबू संभाव'ा है विक विक विब'ा मी'ार क े कोई मन्तिस्जद 'हीं ब'ायी जा सक ी हो। विववाद्य संख्या 19 (डी) वादीगणों क े विवरूद्ध और बचावपक्षों क े पक्ष में द'ुरूप वि'ण[1] हो जा ा है। [इस वि'णय की मुविद्र संस्करण पृष्ठ संख्या 3038-3039 विदया गया है।] "बचाव पक्षकार आगे दावा कर े हैं विक 1858 से वाद संपलित्त पूणय ा मुन्तिस्लमों क े कब्जें में 'हीं र्थीी। आगे यह कर्थी' विकया गया विक १९५८ और उसक े बाद विहन्दुओं क े कब्जे क े दृविष्टग जो विक प्रदश 15,16,18,20 27, 31 से स्पष्ट है आंग' क े बाहरी भाग पर पूरी रह से विहन्दुओं का कब्जा र्थीा और भी री आँग' में पूरी रह से मुन्तिस्लमों का कब्जा 'हीं र्थीा बन्तिuक 1934 क दो'ों का संयुक्त कब्जा र्थीा। 1934 में मुन्तिस्लमों को आँग' क े भी री भाग से हटा विदया गया और वादीगणों 'े स्वीकार विकया है विक मुन्तिस्लमों को 22/23 विदसम्बर, 1934 को भी री आँग' से हटाया गया। इस प्रकार मुन्तिस्लम म क े अ'ुसार इस सम्पलित्त mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को मन्तिस्जद मा'ा जाए। इस संदभ में इस विववाद को पहले ही विप्रवी कौंसिसल द्वारा मन्तिस्जद शाविहब गंज ब'ाम भिशरोमणी गुरूद्वारा कमेटी, अमृ सर ए.आई.आर. 1940 पी.सी. 116 में पारिर वि'णय में सुलझा विदया र्थीा। उक्त दृविष्टकोण को डॉ. एम. इस्माइल फारूखी ब'ाम भार संघ, 1994 (6) एस.सी.सी. 360 प्रस् र 70 में पारिर वि'णय में अ'ुमोविद कर विदया गया जो महत्वपूण है और इस प्रकार है...” [पृष्ठ संख्या 3061 इस वि'णय का मुविद्र संस्करण] "श्री जै' 'े डॉ. एम. इस्माइल फारूखी ब'ाम भार संघ, 1994 (6) एस.सी.सी. 360 प्रस् र 78 का अवलम्ब लिलया जो इस प्रकार है जो वि'म्' रूप में प्रस् ु विकया गया हैः "जबविक प्रार्थी'ा अर्थीवा पूजा कर'ा ार्मिमक प्रर्थीा हो ब इसका उ' जगहों पर प्रार्थी'ा विकया जा'ा जहां यह की जा सक ी है, ऐसे ार्मिमक प्रर्थीा का आवश्यक एवं अभिभन्न अंग 'हीं होगी जब क विक उस जगह का उस म क े लिलए विवशेर्ष स्र्थीा' ' हो सिजससे वह उसक े लिलए आवश्यक एवं अभिभन्न अंग ब' जाए। विकसी भी म क े पूजा स्र्थील जो उस म में विवशेर्ष महत्व रख ी है उन्हें उस म का आवश्यक एवं अभिभन्न अंग ब'ा'े क े लिलए अलग पायदा' पर रख'ा होगा और अलग से और अति क महत्व का मा''ा होगा।" अति वक्ता श्री एच. एस. जै' 'े आगे कर्थी' विकया विक चूंविक भगवा' राम क े जन्म स्र्थीा' को पूजा स्र्थील मा'ा गया जो स्मणा ी काल से ार्मिमक विक्रया कलाप का अभिभन्न अंग र्थीा। यह देव ा हैं और अलग पायदा' पर खड़े हो े हैं और इ'क े सार्थी सम्मा'ज'क व्यवहार कर'ा होगा। श्री जै' 'े आगे क विदया विक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह यर्थीा उपबंति संवै ावि'क आदेश क े दृविष्टग चूंविक इस स्र्थीा' की सदैव से पूजा हो ी आ रही है इसलिलए न्यायालय 'े इसको पूजा स्र्थील मा'ा है क्योंविक ार्मिमक पुस् क और आस्र्थीा क े आ ार पर विहन्दू इसे जन्म स्र्थीा' मा' े हैं क्योंविक 12 वीं क े से पूव क े साक्ष्य ब ा े हैं विक इस स्र्थीा' पर प्राची' काल' मंविदर ब'ाये गये इसलिलए श्री जै' क े अ'ुसार श ाब्दी में मंविदर का वि'माण विकय गया र्थीा। रामजन्म भूविम क े स्र्थील को गविठ कर'े क े लिलए शविक्तशाली साक्ष्य मौजूद है और न्यायालय को इसे मा''ा पड़ेगा। इस प्रकार यह वाद जो विहन्दू की पूजा में बा ा पहुंचा ा है सिजसे खारिरज कर विदया जा'ा चाविहए और इस आ ार पर विववि'र्मिदष्ट mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अ'ु ोर्ष अति वि'यम, 1877 की ारा 42 ज अब विववि'र्मिदष्ट अ'ु ोर्ष अति वि'यम,1963 की ारा 34 क े ह कोई अ'ु ोर्ष 'हीं प्रदा' विकया जा सक ा है।" [इस वि'णय की मुविद्र संस्करण पृष्ठ संख्या 3392] "भगवा' राम 'े अयोध्या में अव ार लिलया र्थीा जो जन्म स्र्थीा' क े रूप में विहन्दू आस्र्थीा एवं विवश्वास का मूल भाग है जो हजारों सालों से मौजूद है और उसकी पूजा की जा रही है। भार ीय संविव ा' का अ'ुच्छेद 25 मूल अति कार क े ौर पर इसको संरक्षण प्रदा' कर ा है और इस अति कार को समाS कर'े संबं ी न्यायालय से विकसी अ'ु ोर्ष की मांग 'हीं की जा सक ी है। यह थ्य विक राम जन्म भूविम विहन्दू म का अभिभन्न अंग है यहां पर पूजा कर'ा विहन्दू म का मौलिलक अति कार है और इस अति कार को वाद दायर कर प्रवर्ति कराया जा सक ा है जो मा''ीय शीर्ष न्यायालय द्वारा पारिर कई वि'णयों से स्पष्ट हो सक ा है।" [इस वि'णय की मुविद्र संस्करण पृष्ठ संख्या 3429] "जन्म स्र्थीा' पर रामलला की पूजा संबं ी विहन्दुओं क े ार्मिमक अति कार संविव ा' क े प्रव ' क े पूव ही मजबू हो गये और इसे संरतिक्ष विकये जा'े की जरूर है। यह सवविवविद है विक भार का संविव ा' 26 ज'वरी, 1950 को अँगीक ृ हुआ। इससे पूव विहन्दुओं क े पूजा संबं ी अति कार सम्मक रूप से न्यातियक आदेशों द्वारा मान्य ा प्राS र्थीे। वास् व में, भार सरकार क े शासकीय दस् ावेद क े प्रस् र 1.[2] में जो क इस्माइल फारूखी मामले में विदेये गये हैं उसको सव च्च अदाल 'े उक्त वि'णय क े प्रस् र 9 पृष्ठ 380 में अभिभलिललिख विकया है। जो इस प्रकार हैः “इस सिसविवल वादों में अन् रिरम आदेश पक्षकारों को मूर्ति को हटा'े और पूजा में बा ा डाल'े से रोक ा है। इसलिलए विदसम्बर 1949 से 06.12.1992 क इस ढ़ांचे को मन्तिस्जद क े ौर पर प्रयोग 'हीं विकया गया र्थीा।” mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह उसिHलिख विकया जा'ा अति महत्वपूण है विक 1949 क े बाद पहली बार मुन्तिस्लमों 'े 18 विदसम्बर,1961 में अप'े अति कारों को अपोर्षणीय ब ाया।" [इस वि'णय की मुविद्र संस्करण पृष्ठ संख्या 3439]

24. इसी प्रकार सु ीर अग्रवाल द्वारा पारिर वि'णय में इस्माइल फारूखी को इस वि'णय क े मुविद्र संस्करण में पृष्ठ संख्या 2015 उदृ विकया गया जो इस प्रकार हैः “3501. श्री प्रसाद 'े प्रार्थी'ा विकया विक विहन्दुओं का यह विवश्वास विक भागवा' विवष्णु 'े भगवा' राम क े रूप में अयोध्या में अव ार लिलया है, विहन्दू म का अभिभन्न अंग है और इस मान्य ा एवं विवश्वास को खारिरज 'हीं विकया जा सक ा है और उन्हो'े पुलिलस कविमश्नर एवं अन्य ब'ाम आचाय जगदीश्वारा'ंद एवं अन्य, (2004) 12 एस.सी.सी. 770 (प्रस् र 9) एवं श्री आविद विवशेश्वर, काशी विवश्व'ार्थी मंविदर (उपरोक्त) का संदभ विदया। संविव ा' का अ'ुच्छेद 25 क े ह विक' चीजों से लोक व्यवस्र्थीा का गठ' हो ा है इस बा को दर्भिश कर'े क े लिलए उन्हों'े दलबीर सिंसह एवं ब'ाम पंजाब राज्य ए.आई.आर. 1962 एस.सी. 1106 (प्रस् र 8) का अवलम्ब लिलया।

3502. आगे उन्हों'े कर्थी' विकया विक एमी'ेंट डोमे' का सिसद्धान् लगाकर उस विववाविद स्र्थील, जो विहन्दुओं क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा है, में कोई व्यविक्त अर्थीवा राज्य हस् क्षेप 'हीं कर सक ा है, यहां क अति ग्रहण क े प्राव ा' भी उस पर लागू 'हीं हो े हैं। यद्यविप मन्तिस्जद क े संबं में शीर्ष न्यायालय 'े पहले ही यह अभिभवि'ण[1] कर अवलोक' विकया विक विववाविद भव' को मुन्तिस्लमों क े लिलए विवशेर्ष महत्व का 'हीं दर्भिश विकया जा सक ा है। उन्हों'े डी.एम. इस्माइल फारूखी एवं अन्य ब'ाम भार संघ एवं अन्य (1994) 6 एस.सी.सी. 360 (प्रस् र 65,72,75,96), आचाय महर्मिर्ष 'रेंद्र प्रसाद जी आ'न्द प्रसाद जी महाराज एवं अन्य गुजरा राज्य एवं अन्य, (1975) 1 एस.सी.सी. 11 का संदभ विदया है। वाद-4 में वादी 'े सिजस अ'ु ोर्ष की मांग की है mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वह विववि'र्मिदष्ट अ'ु ोर्ष अति वि'यम,1963 की ारा 34 क े ह बाति है और उन्हों'े कायकारी परिरर्षद, वैश तिडग्री कॉलेज, शामली एवं अन्य ब'ाम लक्ष्मी 'ारायण एवं अन्य (1976) 2 एस.सी.सी. 58 प्रस् र 20,27) र्थीा अमेरिरक' एक्सप्रेस बैंक लिलविमटेड़ ब'ाम कलकत्ता स्टील कम्प'ी एवं अन्य (1993) 2 एस.सी.सी. 199 (प्रस् र 22) का अवलम्ब लिलया गया है।"

25. इस्माइल फारुकी पर विवचार कर'े क े बाद, न्यायमूर्ति सु ीर अग्रवाल 'े प्रस् र 2722 से 2725 में वि'म्'ा'ुसार राय दी है: "2722 चौर्थीा दृविष्टकोण: यह एक देव ा है सिजस'े अप'े अति कारों क े प्रव ' क े लिलए व मा' वाद दायर विकया है। जैसा विक उन्हों'े सामान्य रूप से अ'ुरो विकया है, जहां क मामले में ार्मिमक बंदोबस् ी में निंहदुओं का संबं है, उ'क े लिलए विवभिशष्ट और अविद्व ीय महत्व में एक स्र्थीा' है और इस रह का कोई अन्य स्र्थीा' 'हीं हो सक ा है। यविद इस स्र्थीा' को संविवति यों क े प्राव ा' लागू हो'े क े द्वारा लोप/विवलुS हो'े की अ'ुमति दी जा ी है, ो परिरसीमा हो सक ी है या अन्यर्थीा, म का पाल' कर'े क े मौलिलक अति कार से निंहदुओं को स्र्थीायी रूप से वंतिच कर विदया जाएगा क्योंविक म का प्रति दाय या स्र्थीा' आ'े वाले सभी समय क े लिलए विवलुS हो जाएगा और इस रह का स्र्थीा' कहीं और 'हीं ब'ाया जा सक ा है। 2723.इस्माइल फारूकी (उपरोक्त) में, सुप्रीम कोट 'े भूविम अति ग्रहण अति वि'यम क े ह भूविम अति ग्रहण की वै ा की यातिचका पर विवचार विकया है विक एक बार मन्तिस्जद का वक्फ ब''े क े बाद, संपलित्त सवशविक्तमा' में वि'विह हो जा ी है और यह हमेशा वक्फ रह ी है इसलिलए ऐसी संपलित्त का अज' 'हीं विकया जा सक ा है। इस क को खारिरज कर े हुए शीर्ष न्यायालय 'े कहा विक सामान्य ार्मिमक उद्देश्यों क े संबं में एक क को म का अभिभन्न अंग 'हीं कहा जा सक ा है जो उपासकों को अन्यत्र पूजा क े अति कार से वंतिच करेगा और इसलिलए ऐसी संपलित्त राज्य द्वारा अर्जिज की जा सक ी है। हालाँविक, यह न्तिस्र्थीति दूसरे प्रकार की होगी यविद ार्मिमक संपलित्त विवशेर्ष महत्व की हो ी और mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस रह की कई संपलित्तयों में से एक 'हीं हो सक ी। इस संबं में प्रासंविगक अवलोक' को पु': प्रस् ु कर'ा उपयोगी होगा: “78. उच्च न्यायालय द्वारा पारिर पश्चा संदर्भिभ अ'ेक वि'णयों से स्पष्ट हो ा है विक अ'ुच्चेद 26 और 26 क े अ ी' रह े हुए मस्जीद, मंविदर, चच इत्याविद पूजा स्र्थील को राज्य अप'े संप्रभु शविक्त क े ह अति ग्रहण कर सक ी है। ऐसा अति ग्रहण संविव ा' क े अ'ुच्चेद 26 और 26 को भंग 'हीं कर ा है। उस स्र्थील का प्रबं ' से संबंति वि'णय राज्य को यह शविक्त 'हीं प्रदा' कर ा विक वह उस संम्पलित्त अति ग्रहण करे।

82. जबविक पूजा कर'ा अर्थीवा पूजा एक ार्मिमक प्रर्थीा हो और ऐसी पूजा को उ' सभी स्र्थीा'ों पर कर'ा जहां पर वह की जा सक ी है ब क ऐसी ार्मिमक प्रर्थीा का आवश्यक एवं अवि'वाय अंग 'हीं ब'ेगी जब क वह स्र्थीा' उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व का ' हो सिजससे विक वह उसका अवि'वाय एवं आवश्यक अंग ' ब' जाए। विकसी भी म का पूजा स्र्थील जो उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा है उसे उस म का अवि'वाय एवं अभिभन्न अँग ब'ा'े क े लिलए अलग पायदा' पर हो'ा चाविहए और उसे अलग एवं अति क महत्व दे'ा होगा।"

2724. उपरोक्त वि'ष्कर्ष से यह प्रकट हो ा है विक यविद मदाय ऐसी प्रक ृ ति का हो जो विवशेर्ष महत्व का हो अर्थीवा विवशेर्ष प्रक ृ ति का हो जो हर जगह 'हीं संभव हो, ब सरकार क े द्वारा ऐसी संपलित्त क े अति ग्रहण संविव ा' क े अ'ुच्चेद 25 क े ह प्रदत्त पूजा क े अति कार से वंतिच कर'े का प्रभाव रखेगी, ऐसा अति ग्रहण भले ही सांविवति क प्राव ा'ों क े ह हो ब भी ऐसा अति ग्रहण अ'ुज्ञेय 'हीं हो सक ा है। हमें इस दलील को सांविवति क सीमा क ले जा'े क े पयाS कारण प्राS हो े हैं क्योंविक अति ग्रहण से संबंति विव ा' विवशेर्ष महत्व क े ार्मिमक स्र्थीा' क विवस् ृ 'हीं विकया जा सक ा है जो विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा क े अति कार समाS कर'े का प्रभाव रख ा हो अन्यर्थीा यह प्राव ा' mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति कारा ी हो जाएगा और यही बा सांविवति क परिरसीमा पर भी लागू होगी और ऐसा ही होगा, यह ध्या' विदया जाए विक इस सीमा क परिरसीमा संबं ी विव ा' का लाभ 'हीं लिलया जा सक े गा जहां पर दे'दार की संपलित्त की प्रक ृ ति ऐसी प्रक ृ ति की है विक यह पूजा क े अति कार क े समाविS का प्रभाव रख ा जो विवभिशष्ट प्रक ृ ति और विवशेर्ष महत्व का है। यह संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह प्रदत्त अति कारों का उHंघ' करेगा।

2725. वास् व में यह क वाद 4 क े वाविदयों को उपलब् हो सक ा र्थीा और क्या उन्हों'े इसे प्रकट भी विकया है विक विववाविद मन्तिस्जद उ'क े लिलए विवशेर्ष महत्व का स्र्थीा' र्थीा लेविक' इस बा को शीर्ष न्यायालय 'े पहले ही विवचारिर विकया र्थीा विक दूसरी मन्तिस्जदों की रह यह भी एक मन्तिस्जद है और इस स्र्थीा' का अति ग्रहण कर ले'े से मुन्तिस्लमों क े मौलिलक अति कारों का ह'' 'हीं होगा। वे कहीं भी प्रार्थी'ा कर सक े हैं जैसे वे यहां पर कर सक े र्थीे। विहन्दुओं को एक पायदा' पर 'हीं रखा गया है। विहन्दुओं क े अ'ुसार यह भगवा' राम का जन्म स्र्थीा' है और ऐसा ही होगा, कोई अन्य स्र्थीा' 'हीं है जहां पर स्मणा ी काल से ऐसा विवश्वास कायम रहा हो। विहन्दुओं से इ र अन्य लोगों क े काय[ द्वारा एक बार इस स्र्थील की पहचा' खो जा ी है ो अ'ुच्छेद 25 क े ह प्रदत्त विहन्दुओं को विमला यह अति कार समाS हो जाएगा। प्रस् ु मामले में परिरसीमा संबं ी प्राव ा'ों को आकर्मिर्ष ' कर'े का यह एक अन्य कारण है।

26. इसी प्रकार डी.वी. शमा 'े जो वि'ष्कर्ष वि'काला इस प्रकार हैः "कोई संप्रभु सरकार अप'े संप्रभु शविक्त का प्रयोग करक े भी भूविम अर्थीवा सम्पलित्त का अति ग्रहण 'हीं कर सक ी है जो लोगों की आस्र्थीा, उस पविवत्र स्र्थील अर्थीवा उस संस्र्थीा' की बुवि'याद को समाS कर दे। जो स्पष्ट रूप से अ'ुसरण कर ा है वह यह विक कोई भी संप्रभु सरकार विहन्दू म क े बुवि'याद य'ी रामजन्म भूविम को समाS 'हीं कर सक ी है। पूजा क े अति कार को इस मामले क े अन्य पक्षकार को हस् ान् रण करक े क े वल वाद क े माध्यम से समाS हो'े विदया जाए, वादी 'े सुवि'तिश्च विकया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विक रामजन्म स्र्थील पर पूजा का मौलिलक अति कार सदैव क े लिलए समाS हो गया है। महत्वपूण मामले (बी) डॉ. इस्माइल फारूखी एवं अन्य ब'ाम भार संघ एवं अन्य 1994 (6) एस.सी.सी. प्रस् र 76 पृष्ठ 416 – आचाय महर्मिर्ष 'रेन्द्र प्रसाद जी आ'न्द प्रसाद जी महाराज ब'ाम गुजरा राज्य 1976 2 एस.सी.आर. 317 पृष्ठ 327-328 (ए.आई.आर. 1974 एस.सी. 2098 पृष्ठ 2103) में वि'म्'ा'ुसार ारिर विकयाः हालांविक विफर भी एक चीज स्पष्ट है विक अ'ुच्छेद 26 ार्मिमक मामले क े प्रबं ' हे ु स्र्थीावर र्थीा जंगम सम्पलित्त को स्वाविमत्व रख'े और अति ग्रहण कर'े क े अति कार को संरक्षण प्रदा' कर ी है। हलांविक यह अति कार राज्य क े सम्पलित्त को अति ग्रहण कर'े क े अति कार को 'हीं छी' ी है। दूसरी रफ राज्य द्वारा ार्मिमक प्रभुत्व क े अ ी' सम्पलित्त क े अति ग्रहण इस रह से साविब विकया जा सक ा है विक स्र्थीावर र्थीा जंगम सम्पलित्त को स्वाविमत्व रख'े और अति ग्रहण कर'े क े इसक े अति कार को समाS कर देगा अर्थीवा विकसी ार्मिमक संस्र्थीा' ब'े रह'े क े लिलए भी 'कारात्मक होगा, इस प्रश्न का परीक्षण अन्य आलोक में कर'ा होगा। प्रस् र 82. मन्तिस्जद इस्लाम म का अभिभन्न अंग 'हीं है और मुन्तिस्लमों द्वारा 'माज कहीं भी पढ़ी जा सक ी है यहां क विक इसको खुले स्र्थीा' में भी पढ़ा जा सक ा है। द'ुरूप इसका अति ग्रहण भार क े संविव ा' क े प्राव ा'ों क े ह वि'विर्षद्ध 'हीं है। स्पष्ट है विकसी भी ार्मिमक स्र्थीा' का अति ग्रहण क े वल असमान्य अपरिरहाय परिरन्तिस्र्थी बड़े राष्ट्रीय विह क े लिलए विकया जा'ा चाविहए। यह ध्या' रखा जा'ा चाविहए विक ऐसे अति ग्रहण से उस म क े आचरण कर'े क े अति कार का विवलोप' ' हो जाए, यविद वह स्र्थीा' विवशेर्ष महत्व का हो। 'ोट (अ) अयोध्या में राम जन्म भूविम जहां पर रामलला विवराजमा' हैं वह ार्मिमक महत्व का स्र्थीा' है जैसा विक उक्त वि'णय में वर्भिण विकया गया mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है। यविद संप्रभु प्राति कारी विवशेर्ष अति कारिर ा की शविक्तयों क े ह इसको प्राS ' कर पाये ब प्रति वाविदयों, जो वाद संख्या 4 में प्राइवेट पक्षकार हैं, की दलील पर इसे मा' लिलया जाए ो इसका परिरणाम यह होगा विक विहन्दू सिजसे पविवत्र स्र्थील मा' े हैं उसकी मान्य ा अस्वीक ृ हो जाएगी। 'ोट (ब) पृष्ठ 413 प्रस् र 65 इस्माइल फारूखी- मन्तिस्जद क े विवशेर्ष महत्व क े विवर्षय में कोई भी क 'हीं विदया गया सिजससे वह इस्लाम का अभिभन्न अंग ब' जाए। इसलिलए बाबरी मन्तिस्जद का इस्लाम क े अभिभन्न विहस्से संबं ी कोई प्रश्न 'हीं उठ ा है और इस बा को वादपत्र में 'हीं उठाया गया है अर्थीवा इससे संबंति कोई साक्ष्य विदया गया है अर्थीवा कोई क विदया गया हो विक उक्त मन्तिस्जद का इस्लाम म क े आचरण कर'े में कोई महत्व रहा हो। [इस वि'णय का मुविद्र संस्करण, पृष्ठ संख्या 3438-3439] वि'ष्कर्ष....... शीर्ष न्यायालय 'े 1993 में वि'ण[1] इस्माइल फारूखी (उपरोक्त) मामले में अयोध्या क े क ु छ भागों में अति ग्रहण क े प्राव ा'ों की वै ा को बरकरार रख े हुए अभिभवि'ण[1] विकया विक क ें द्र सरकार विकसी भी पूजा स्र्थील का अति ग्रहण कर सक ी है। प्रस् र 78 में शीर्ष न्यायालय 'े अभिभवि'र्भिण विकया विक वह जन्म स्र्थीा' विहन्दुओं क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा है और इसे अन्यों से अलग मा'ा जा'ा चाविहए जो इस प्रकार हैः “78. जबविक प्रार्थी'ा और पूजा एक ार्मिमक प्रर्थीा हो ब इसे कहीं भी विकये जा'े से वह उस म का अभिभन्न अंग 'हीं ब' जाएगा जब क विक वह स्र्थीा' उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व का ' हो। विकसी म क े पूजा स्र्थील सिजसका उस म में विवशेर्ष महत्व है उसे उस म का अवि'वाय एवं आवश्यक अंग ब''े क े लिलए अलग पायदा' पर खड़ा हो'ा होगा र्थीा उसे अलग से और अति क सम्मा' दे'ा होगा।" विहन्दुओं की रफ से यह क विदया गया है विक वादकारी दावाक ृ अ'ु ोर्ष क े हकदार 'हीं हैं क्योंविक यह अ'ु ोर्ष विववि'र्मिदष्ट अ'ु ोर्ष अति वि'यम, 1877 की 42 द्वारा बाति है जो विववि'र्मिदष्ट अ'ु ोर्ष अति वि'यम, 1963 की 34 से संग 'हीं है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "विहन्दुओं क े पास भार क े संविव ा' क े 25 और 26 क े ह प्रद्त्त मौलिलक अति कार मुन्तिस्लमों से श्रेष्ठ हैं। सिजसका कारण यह है विक प्रर्थीाग कमकाpड़ों को कर'े से और भगवा' की सेवा कर'े से पुpय विमल ा है और मुविक्त विमल ी है क्योंविक यह विहन्दू म का एक अभिभन्न अंग है। उक्त क े दृविष्टग न्यायालय विव'म्र आग्रह है विक प्रस् ु मामले को अ'ुकरणीय वाद व्यय सविह खारिरज कर विदया जाए।

2. डॉ. एम. इस्माइल फारूखी ब'ाम भार संघ (1994) 6 एस.सी.सी. 360 क े मामले में मा''ीय सव च्च न्यायलय 'े अभिभवि'ण[1] विकया विक संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह प्रदत्त म को मा''े, आचरण कर'े और प्रचार कर'े का अति कार कहीं पर भी पूजा कर'े क े अति कार क विवस् ृ 'हीं है सिजससे कहीं पर भी पूजा कर'े पर लगाए गये प्रति बं से संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह विमले ार्मिमक अति कार उHंघ' हो। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और 26 क े ह संरक्षण उस म क े आचरण कर'े का अभिभन्न अंग का वि'माण कर ी है। जबविक प्रार्थी'ा और पूजा एक ार्मिमक आचरण हो ब प्रत्येक स्र्थीा' पूजा जहां पर इसे विकया जा सक ा है उससे यह ऐसे ार्मिमक आचरण का अभिभन्न अंग 'हीं ब'ेगा जब क विक वह उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व का ' ब' जाए। विकसी म क े पूजा स्र्थील सिजसका उस म में विवशेर्ष महत्व है उसे उस म का अवि'वाय एवं आवश्यक अंग ब''े क े लिलए अलग पायदा' पर खड़ा हो'ा होगा र्थीा उसे अलग से और अति क सम्मा' दे'ा होगा। विकसी भी म का पूजा स्र्थील जो उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा हो ो उसे उस म क े लिलए आवश्यक एवं अवि'वाय अंग ब''े क े लिलए अलग पायदा' पर खड़ा हो'ा होगा और अलग से और अति क महत्व दे'ा होगा। उक्त वि'णय का अवलम्ब लेकर यह कर्थी' विकया गया विक राम जन्म भूविम विहन्दुओं क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा है क्योंविक विहन्दुओं का मा''ा है विक यहां पर आ'े और पूजा कर'े से पुpय की प्राविS हो ी है र्थीा मोक्ष विमल ा है और इस विवश्वास की जांच कोई भी न्यायालय 'हीं कर सक ा है और ' ही विकसी ऐसी व्यविक्त द्वारा चु'ौ ी विदया जा सक ा है सिजसको विहन्दू म को कोई आस्र्थीा ' हो क्योंविक यह विहन्दुओं की mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आस्र्थीा है सिजसको संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह संरक्षण प्राS है। उक्त वि'णय का महत्वपूण प्रस् र 77 और 78 इस प्रकार हैः

77. इस पर ध्या' विदया जा'ा चाविहए विक अ'ुच्छेद 25 में सम्पलित्त का संदभ 'हीं विदया गया है जैसा विक अ'ुच्छेद 26 में विदया गया है। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 क े ह प्रदत्त म को मा''े आचरण कर'े प्रचार कर'े क े अति कार में सम्पलित्त को ग्रहण कर'े कब्जा कर'े ारण कर'े का अति कार शाविमल 'हीं है। इसी प्रकार यह अति कार विकन्ही अर्थीवा सभी पूजा स्र्थील पर पूजा कर'े क े अति कार क विवस् ृ 'हीं है सिजससे विक उस विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा कर'े की बा ा संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और अ'ुच्छेद 26 क े ह प्रदत्त अति कार का उHंघ' करे। संविव ा' क े अ'ुच्छेद 25 और अ'ुच्छेद 26 का संरक्षण ार्मिमक प्रर्थीा क े लिलए है उस म क े अभिभन्न एवं आवश्यक अंग का वि'माण कर ा है। कोई प्रर्थीा ार्मिमक प्रर्थीा हो सक ी है लेक' यह आवश्यक 'हीं है विक वह उस म की आवश्यक एवं अभिभन्न अंग का वि'माण करे।

78. जबविक प्रार्थी'ा कर'ा अर्थीवा पूजा एक ार्मिमक प्रर्थीा हो, और प्रत्येक जगह ऐसा कर'ा जहां पर ऐसी प्रार्थी'ा की जा सक ी है वह ऐसी ार्मिमक प्रर्थीा का आवश्यक अवि'वाय अंग 'हीं होगी जब क विक वह स्र्थीा' उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व ' रख ा हो सिजससे विक वह उस म विवशेर्ष का आवश्यक एवं अभिभन्न अंग ब' जाए। विकसी भी म का पूजा स्र्थील जो उस म क े लिलए विवशेर्ष महत्व रख ा हो ो उसे उस म क े लिलए आवश्यक एवं अवि'वाय अंग ब''े क े लिलए अलग पायदा' पर खड़ा हो'ा होगा और अलग से और अति क महत्व दे'ा होगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

3. डॉ. इस्माइल फारूखी ब'ाम भार संघ (उपरोक्त) क े मामले में मा''ीय उच्च म न्यायालय 'े अभिभवि'ण[1] विकया विक इस्लाम म में मन्तिस्जद ार्मिमक प्रर्थीा का आवश्यक अंंग 'हीं है और 'म़ाज (प्रार्थी'ा) कहीं भी पढ़ी जा सक ी है, खुले स्र्थीा' में भी। पूजा का अति कार विकन्हीं अर्थीवा प्रत्येक स्र्थीा' पर 'हीं है भले ही यह विक 'े समय क प्रभावी रूप से की जा सक े जब क विक उस स्र्थीा' विवशेर्ष में पूजा का अति कार स्वयं में उस अति कार का अभिभन्न अंग ' हो। विवति क े उक्त अ'ुपा का अवलम्ब लेकर यह कर्थी' विकया गया विक श्री राम जन्म स्र्थीा', वादपत्र में जो बाबरी मन्तिस्जद क े रूप में दर्भिश है, पर विब'ा प्रार्थी'ा विकए इसे कहीं और विकया जा सक ा है लेविक' श्री रामजन्म भूविम क े स्र्थीा' पर विकसी अन्य जगह पूजा 'हीं की जा सक ी है क्योंविक जो पुpय श्री राम जन्म भूविम पर पूजा करक े प्राS हो ा है कहीं और पूजा करक े 'हीं प्राS विकया जा सक ा है और यह विहन्दुओं क े पविवत्र दैवीय मूर्ति क े प्रति क ू ल होगा विहन्दुओं क े सबसे पविवत्र गभ गृह को विवलुS कर देगा। उक्त वि'णय क े सुसंग प्रस् र 80 से 87 इस प्रकार हैैैैंः

80. यह क विदया गया है विक मन्तिस्जद मुन्तिस्लम विवति में विवशेर्ष स्र्थीा' रख ा है और एक बार जब मन्तिस्जद का वि'माण हो जा ा है और ऐसी मन्तिस्जद में 'माज पढ़ी जा ी है ो ब वह सम्पलित्त अHाह में वि'विह जा ी है और ब वह सम्पलित्त दा'क ा, मन्तिस्जद का वि'माण कर'े वाले व्यविक्त पु'ः 'हीं विमल सक ी है और कोई भी व्यविक्त जो इस्लाम में विवश्वास रख ा है ऐसी मन्तिस्जद में 'माज पढ़ सक ा है और भले ही यविद उस ढ़ांचे को ोड़ विदया जाए ब भी उस स्र्थीा' का वही महत्व रह ा है जहां पर 'माज पढ़ी जा सक ी है। जैसा विक यहां पूव में दर्भिश है विक विŸविटश भार में मन्तिस्जद को ऐसा कोई भी संरक्षण 'हीं विदया गया और मन्तिस्जद परिरसीमा विवति क े प्राव ा'ों क े अ ी' र्थीी सिजसक े द्वारा विकसी विवशेर्ष मन्तिस्जद में मुन्तिस्लमों क े पूजा क े अति कार समाS हो जा े र्थीे जो उस सम्पलित्त पर प्रति क ू ल कब्जे द्वारा समाS हो गये। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

81. ज'रल क्लाजेज ऐक्ट की ारा 3 (26) भार ीय विवति में दी गयी सम्पलित्तयों क े वग1करण का वण' कर ी है। संविव ा' का अ'ुच्छेद 367 संवै ावि'क उद्देश्यों क े लिलए सम्पलित्त क े इस मवि'पzक्ष संकuप'ा को अंगीकार कर ा है। एक मंविदर, चच या मन्तिस्जद इत्याविद अचल सम्पलित्त है और वह अ'ुच्छेद 25 र्थीा 26 क े अ ी' है। प्रत्येक अचल सम्पलित्त का अति ग्रहण विकया जा सक ा है। यविद सही से देखा जाए ो मन्तिस्जद को विकसी भी प्रकार का अति रिरक्त संरक्षण 'हीं विमल ा है जो अन्य म[ क े प्रार्थी'ा स्र्थील को प्राS 'हीं है।

82. उतिच न्तिस्र्थीति को इस प्रकार वर्भिण विकया जा सक ा है। भार में लागू मुन्तिस्लम विवति क े अ'ुसार मन्तिस्जद का स्वत्व प्रति क ू ल कब्जे द्वारा समाS विकया जा सक ा है। (देखें- विहदाय ुHा द्वारा रतिच मुन्तिस्लम विवति पर मुHा क े सिसद्धान्, 19 वां संस्करण, ारा 217; और शाविहबगंज ब'ाम भिशरोमभिण गुरुद्वारा) यविद विवति में वह न्तिस्र्थीति हो ी है ब इसको मा''े क े कोई कारण 'हीं विक राज्य द्वारा अति ग्रहण से बच'े क े लिलए मवि'पzक्ष भार में अन्य म[ क े पूजा स्र्थील की अपेक्षा उच्च मन्तिस्जद में अविद्व ीय अर्थीवा विवभिशष्ट प्रान्तिस्र्थीति है। इस्लाम म का आचरण कर'े क े लिलए कोई मन्तिस्जद अवि'वाय अंग 'हीं है और 'माज मुन्तिस्लमों द्वारा कहीं भी या'ी खुले में भी पढ़ी जा सक ी है। द'ुरूप मन्तिस्जद का अति ग्रहण विकया जा सक ा है जो भार क े संविव ा' क े प्राव ा'ों द्वारा वर्जिज 'हीं है। सम्प्रभु शविक्त क े प्रयोग में राज्य द्वारा अति ग्रहण से बच'े क े उद्देश्यों क े लिलए विकसी इस्लाविमक देश में विकसी मन्तिस्जद की प्रान्तिस्र्थीति से कोई फक 'हीं पड़ ा है, इसकी प्रान्तिस्र्थीति और भार की मवि'पzक्ष छविव में अति ग्रहण से बचाव वही है जो अन्य म[ क े पूजा स्र्थील जैसे विक चच मंविदर इत्याविद को प्राS है। यह अन्य म[ क े पूजा स्र्थील से कम अर्थीवा ज्यादा 'हीं है। स्पष्ट है विकसी भी ार्मिमक स्र्थीा' का अति ग्रहण क े वल mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA असा ारण और विवशेर्ष परिरन्तिस्र्थीति यों में बड़े राष्ट्रीय विह क े लिलए विकया जा सक ा है और यह ध्या' रख'ा चाविहए विक ऐसे अति ग्रहण से उस म को मा''े क े अति कार समाS ' हो जाए यविद उस स्र्थीा' का महत्व ऐसा हो। श [ क े अ ी' रह े हुए अति ग्रहण की शविक्त मन्तिस्जद क े लिलए उपलब् है जैसे विकसी भी म क े पूजा क े अन्य स्र्थीा'ों को प्राS है। विकसी भी अर्थीवा प्रत्येक जगह पर पूजा का अति कार ब क 'हीं विमल ा जब क प्रभावी रूप से इसका आचरण ' विकया जाए 'हीं ो विकसी विवशेर्ष स्र्थीा' पर पूजा का अति कार स्वयं में उस अति कार का अभिभन्न विहस्सा ' ब' जाए। [उस वि'णय का मुविद्र संस्करण पृष्ठ संख्या 3454- 3458]

27. अ ः स्पष्ट है विक स्माइल फारूखी क े मामले में जो आपलित्तज'क वि'ष्कर्ष वि'काला गया वह वि'तिश्च रूप से आक्षेविप वि'णय में समाविह हो चुका है। इस प्रकार आक्षेविप वि'णय इस्माइल फारूखी क े मामले में वि'काले गये आपलित्तज'क वि'णय से प्रभाविव हुआ ऐसा स्पष्ट एवं अन् र्मि'विह दो'ों रूप से दावा विकया जा सक ा है। आगे इस्माइल फारूखी का मामला प्रर्थीम दृष्टया आवश्यक त्वों की प्रायोज्य ा अर्थीवा समाकलिल परीक्षण क े संबं में अलग दृविष्टकोण अप'ा ा है सिजसे संवै ावि'क महत्व क े विवर्षय क े रूप में हल विकये जा'े की आवश्यक ा है। मेरे विवचार में इस्माइल फारूखी क े मामले को भिशरूर मठ और अन्य वि'णयों से पुष्ट विकये जा'े की आवश्यक ा है सिजसका संदभ इस वि'णय क े प्रस् र 14 से 18 एवं 20 में विदया गया है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

28. इस मामले की गम्भीर ा और महत्व को इसी आक्षेविप वि'णय में न्यायमूर्ति एस. यू खा' द्वारा वि'काले गये वि'ष्कर्ष क े माध्यम से अच्छे से समझा जा सक ा है, जो इस प्रकार हैः "यहां जमी' एक छोटा सा टुकड़ा है ( 1500 वग याड) जहां देव ा पैर रख'े से डर े हैं। यह असंख्य बारूदी सुरंगो से भरा है। हमें इसे साफ कर'ा है। क ु छ समझदार लोगों 'े हमें ऐसा ' कर'े की विहदायद दी। हम मूख[ की रह यह 'हीं जा'े क े लिलए कहा 'हीं हम उड़ जाएंगे। हालांविक विफर भी हमें यह जोलिखम ले'ा होगा। ऐसा कहा जा ा है विक जीव' में सबसे बड़ा ख रा, सिजस समय वैसी परिरन्तिस्र्थीति हो, ख रा ' उठा'ा। एक बार देव ाओं को म'ुष्य क े साम'े झुकाया गया। कभी-कभी उन्हें उक्त सम्मा' को न्यायोतिच ठहरा'ा चाविहए। यह उ' अवसरों में से एक है। हम सफल हो अर्थीवा असफल?कोई भी अप'े मामले में न्याया ीश 'हीं हो सक ा है। द'ुरूप, यहां जो क ु छ कहा गया वह उस वि'णय का अ'ुसरण कर ा है सिजसक े लिलए पूरा देश बेसŸी से इं जार कर रहा है।"

29. यहां यह कह'ा सुसंग है विक समी'ा बेगम ब'ाम भार संघ एवं अन्य [रिरट यातिचका (सिसविवल) संख्या 222 वर्ष 2018] ी' न्याया ीशों वाली पीठ 'े विद'ांविक 26.03.2018 क े आदेश द्वारा बहु-विववाह सिजसमें वि'काह हलाला, वि'काह मु ा, वि'काह मीसा शाविमल है,से संबंति मामले को संवै ावि'क पीठ को संदर्भिभ विकया है। उक्त मामले में संदभ क े लिलए आदेश इस प्रकार हैः "यातिचकाक ाओं की ओर से विवद्वा' अति वक ा 'े कर्थी' विकया विक इ' रिरट यातिचकाओं बहु विववाह की प्रर्थीा सिजसमें वि'काह हलाला, वि'काह मु ा, वि'काह मीशा शाविमल है,को इसलिलए चु'ौ ी दी गयी है क्योंविक यह असंवै ावि'क है। इस रुख क े समर्थी' में कई आ ार विग'ाए गये विक क ै से mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ये प्रर्थीाएँ ेेजो वैयविक्तक विवति अन् ग आ ी हैं,संविव ा' क े ह न्यातियक समीक्षा से बच 'हीं सक ी हैं। उ'क े द्वारा यह क विदया गया विक शायरा बा'ो इत्याविद ब'ाम भार संघ एवं अन्य इत्याविद (2017) 9 एस.सी.सी. 1 क े मामले में संवै ावि'क पीठ में अति क र न्यामू्र्ति यों 'े इ' पक्षों को विवचारिर 'हीं विकया है। उन्हों'े इस विबन्दु पर जोर डाल'े क े लिलए इस वि'णय क े कई प्रस् रों पर हमारा ध्या' आकर्मिर्ष विकया है विक उक्त विववाद्यों को वास् व में प्रस् ु 'हीं विकया गया है क्योंविक इ' पक्षों पर कोई तिचत्रण 'हीं विकया गया है। इस वि'णय का परिरशील' कर'े पर हम पक्षकारों/वादकारिरयों क े विवद्वा' अति वक्ता क े क[ को सही पा े हैं विक संवै ावि'क पीठ द्वारा इ' अव ारणाओं को 'हीं वि'ण[1] विकया गया है। xxx xxx xxx xxx xxx xxx इस विबन्दु पर, बार क े समक्ष यह क विदया गया है विक इस विववाद्य क े महत्व क े दृविष्टग, मामले को संवै ावि'क पीठ क े समक्ष रखा जा'ा चाविहए। उक्त क को स्वीकार कर यह वि'दzश विदया जा ा है विक मामले को भार क े मुख्य न्यायमूर्ति क े समक्ष रखा जाए ाविक समुतिच संवै ावि'क पीठ गविठ कर रिरट यातिचकाओं से विवचारण हे ु उत्पन्न उ' विववाद्यको का वि'पटारा विकया जा सक े ।" (प्रभाव वर्ति )

30. इसक े अति रिरक्त, इस न्यायालय की दो न्यायमूर्ति यों वाली पीठ 'े विद'ांक 06.07.2018 को ज्योति जागरण मंच ब'ाम एस.डी.एम.सी. एवं अन्य, सिसविवल अपील संख्या 5820 वर्ष 2018, क े मामले में सावजवि'क पाक में वर्ष में एक बार रामलीला और पूजा की अ'ुज्ञा दे'े वाले 'ीति वि'णय से संबंति मामले को संवै ावि'क पीठ को संदर्भिभ विकया है, सिजसमें इस प्रकार अभिभवि'ण[1] विकया गया हैः mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "इस आक्षेविप आदेश की प्रामाभिणक प्रति लगा'े से छ ू ट की मांग कर'े वाला आवेद' अ'ुज्ञा विकया जा ा है। अपील अ'ुज्ञा । 'ेश'ल ग्री' विट्रब्यू'ल, प्र ा' पीठ, 'ई विदHी 'े एक आदेश जारी कर याची क े उस आवेद' को खारिरज कर विदया है सिजसमें उस'े सावजवि'क पाक में 'मा ा की चौकी' बैठा'े की मांग की र्थीी। याची 'े स्पष्ट ौर पर पूव में पारिर विकये गये वि'णयों का अवलम्ब लिलया है सिजसमें सावजवि'क पाक में वर्ष में एक बार रामलीला और पूजा की अ'ुज्ञा दे'े वाले 'ीति वि'णय शाविमल हैं। इस अपील से संवै ावि'क महत्व का एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो ा है विक क्या ऐसे विक्रयाकलाप राज्य क े कब्जे वाले परिरसर में अ'ुज्ञा विकये जा सक े हैं जबविक हमारे संविव ा' की प्रक ृ ति पंर्थी वि'रपेक्ष है। इसलिलए मा''ीय मुख्य न्यायमूर्ति 'े उक्त मामल की सु'वाई हे ु समुतिच संवै ावि'क पीठ गविठ विकये जा'े का आदेश विदया।" (प्रभाव वर्ति )

31. सु'ी ा ति वारी ब'ाम भार संघ एवं अन्य, {रिरट यातिचका (सिसविवल) संख्या 286 वर्ष 2017}, क े मामले में इस न्यायालय की ी' न्यायमूर्ति यों वाली पीठ मविहलाओं का ख 'ा अर्थीवा खफ़ की प्रर्थीा पर रोक लगा'े संबं ी प्रश्न पर विवचार कर रहा र्थीा। प्रत्यर्भिर्थीयों की ओर से वरिरष्ठ अति वक्ता 'े क विदया विक इस मामले को प्राति कारिर वि'णय क े लिलए बड़ी पीठ को संदर्भिभ विकया जा'ा चाविहए क्योंविक यह प्रर्थीा उस ार्मिमक पंर्थी की आवश्यक एवं अभिभन्न अंग है। भार क े विवद्वा' अटा'1 ज'रल 'े भी कर्थी' विकया विक इस मामले को पड़ी पीठ को संदर्भिभ विकया जा'ा चाविहए। विद'ांक 24.09.2018 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े आदेश द्वारा इस मामले को बड़ी पीठ को संदर्भिभ कर विदया गया, सिजसका महत्वपूण अंश इस प्रकार हैः "वाद की प्रक ृ ति, ार्मिमक समुदायों पर प्रभाव और कई संलग्न कारकों क े प्रति सम्मा' क े सार्थी हमें उ' प्रश्नों को विवरतिच ' कर'ा उuटा प्र ी हो ा है सिजन्हें वृहत्तर पीठ द्वारा कर'ा होगा। हम यह भी उतिच मा' े हैं विक वृहत्तर पीठ इस मुद्दे पर सभी दृविष्टकोणों से विवचार करे। उक्त क े दृविष्टग हमारा विवचार यह है विक इस मामले को वृहत्तर पीठ क े समक्ष रखा जा'ा चाविहए। रसिजस्ट्री को वि'दzश विदया जा ा है विक प्रस् ु मामले क े सभी कागजा इस संबं में समुतिच वि'दzश हे ु भार क े मा''ीय मुख्य न्याया ीश क े समक्ष रखा जाय।" (प्रभाव वर्ति )

32. इसमें शाविमल मुद्दों की संवै ावि'क महत्व और उपयोविग ा पर विवचार कर'े क े उपरान् इस मामले को वृहद पीठ को संदर्भिभ कर'े क े वि'म्'लिललिख अपेक्षाएँ हैंः (a) ) क्या भिशरूर मठ और उपरोक्त उसिHलिख मामलों क े आलोक में, विकसी अवि'वाय प्रर्थीा को विवश्वास, मान्य ाओं और प्रश्नग रीति रिरवाज में आस्र्थीा की विवस् ृ जाँच विकये बगैर वि'ण[1] विकया जा सक ा है? (b) ) क्या अवि'वाय रीति रिरवाज को वि' ारिर कर'े का परीक्षण अवि'वाय ा और समग्र ा दो'ों है? (c) क्या अ'ुच्छेद 25 क े वल विवशेर्ष महत्व की आस्र्थीा और प्रर्थीाओं या आस्र्थीा द्वारा मान्य ा प्राS अवि'वाय रीति रिरवाज को संरतिक्ष कर ी हैं? (d), (e) ) क्या अ'ुच्छेद 15, 25 और 26 (सपविठ अ'ुच्छेद 14), आस्र्थीा क े ुल'ात्मक महत्व को अ'ुज्ञा कर ी हैं? mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

33. रसिजस्ट्री को वि'दzभिश विकया जा ा है विक वे मामले पर समुतिच आदेशों हे ु मा''ीय मुख्य न्याय ीश क े समक्ष पर प्रस् ु करें।..................................... (न्यायमूर्ति एस. अब्दुल 'जीर) 'ई विदHी 27 सिस म्बर, 2018 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA