Full Text
भारिीय सवोच्च न्यायालय
दाांडिक अपीलीय अधिकाररिा
दाांडिक अपील सां. 1395/2018
[एस.एल.पी. (दाांडिक) सां. 3730/2016 से उत्पन्न]
आनंद क
ु मार मोहत्ता एवं अन्य ..............अपीलार्थी(यों)
बनाम
राज्य (रा.रा.क्षे. ददल्ली सरकार) .................प्रत्यर्थी(यों)
गृह ववभाग एवं अन्य
तनर्णय
एस.ए. बोबदे, न्यायािीश
इजाजत दी जाती है |
JUDGMENT
2. यह दांडिक अपील ददल्ली उच्च न्यायालय क े अंततम तनर्णय और आदेश ददनांक 02.02.2016 को चुनौती देते हुए अपीलार्थीयों द्वारा दायर की गई है | उच्च न्यायालय ने उपरोक्त ददनांककत अंततम तनर्णय और आदेश द्वारा दंि प्रकिया संदहता की धारा 482 क े तहत अपीलार्थीयों द्वारा दायर याचचका को खाररज कर ददया और एफआईआर संख्या 0139/2014 ददनांक 20.08.2014 को रद्द करने से इंकार कर ददया | इस न्यायालय में अपील क े लंबबत रहने क े दौरान, प्रत्यर्थी संख्या 1 ने मेट्रोपोललटन 2018 INSC 1060 मजजस्ट्ट्रेट, पदटयाला हाउस कोटण, ददल्ली क े न्यायालय क े समक्ष यहााँ अपीलार्थीयों क े खखलाफ एक आरोप पत्र ददनांक 03.08.2018 दाखखल ककया | इस प्रकार, अपील में मुख्य प्रार्थणना में संशोधन क े द्वारा, अपीलार्थीयों ने आरोप पत्र ददनांक 03.08.2018 को रद्द करने क े ललए भी प्रार्थणना की है | अपीलार्थीयों ने एफआईआर ददनांक 20.08.2014 और आरोप पत्र ददनांक 03.08.2018 को रद्द करने की मांग की है । िथ्य
3. यह अपील एक अलभयुक्त द्वारा की गई है जजसक े ववरुद्ध 20.08.2014 को अपीलार्थी संख्या 1, श्री आनन्द क ु मार मोहत्ता और लशकायतकताण, अंसल प्रॉपटीज एंि इंफ्रास्ट्ट्रक्चर लल. क े बीच ददनांक 03.06.1993 को ककये गए करार से उत्पन्न वववाद क े सम्बन्ध में एक एफआईआर दजण की गई र्थी | समझौते क े करीब 21 साल बाद एफआईआर दजण कराई गई । शुरू में अपीलार्थी संख्या 1 की पत्नी श्रीमती शोभा आनंद मोहत्ता क े खखलाफ एफआईआर भी दजण कराई गई र्थी, लेककन जांच क े बाद उनक े खखलाफ कोई अपराध नहीं पाया गया ।
4. दोनों पक्षों द्वारा ककया गया करार अपीलार्थी क े स्ट्वालमत्व वाली संपवत्त क े ववकास क े संबंध में है । यह संपवत्त 20, कफरोजशाह रोि, नई ददल्ली में जस्ट्र्थत है, जो लुटयंस जोन क े अंतगणत आती है । यह संपवत्त प्रारंभ में अपीलार्थी संख्या 1 क े स्ट्वालमत्व में र्थी और बाद में संपवत्त अपीलार्थी संख्या 2, अपीलार्थी संख्या 1 की पत्नी, क े नाम स्ट्र्थानांतररत कर दी गयी र्थी । संपवत्त क े ववकास क े इच्छ ु क, अपीलार्थी संख्या 1 ने प्रत्यर्थी सं. 2 मै. अंसल प्रॉपटीज एंि इंफ्रास्ट्ट्रक्चर लललमटेि क े सार्थ ववकास करने हेतु एक करार ददनांक 03.06.1993 ककया । पक्षकार ऊ ं ची इमारत वाले फ्लैटों का तनमाणर् कर संपवत्त ववकलसत करने पर सहमत हुए । जैसा कक करार क े खण्ि 38 से अपेक्षक्षत र्था, प्रत्यर्थी संख्या 2 ने एक करोड़ रुपये की रालश का भुगतान ककया | करार पूरा नहीं ककया जा सका क्योंकक नए तनमाणर् तनयमों क े अनुसार लुटयंस क्षेत्र, जहां संपवत्त जस्ट्र्थत है, में ऊ ं ची इमारतों का तनमाणर् तनविद्ध र्था | (देखें नई ददल्ली नगर पररिद बनाम तन्वी ट्रेडिंग एंि ि े डिट प्राइवेट लललमटेि)।
5. इसक े बाद, 14.03.2011 को, अपीलार्थी संख्या 1 ने एक पत्र ललखा जजसमें कहा कक वह संपवत्त को ववकलसत नहीं करना चाहता है | अपीलार्थीयों ने आगे कोई कारणवाई नहीं की और न ही उन्होंने प्रत्यर्थी संख्या 2 द्वारा दी गयी अचिम रालश लौटाई ।
6. स्ट्पष्टतः, क्योंकक अपीलार्थी ने लशकायतकताण द्वारा ककए गए सभी वैकजल्पक प्रस्ट्तावों को अस्ट्वीकार कर ददया र्था, लेककन प्रत्यक्ष रूप से इस आधार पर कक एक करोड़ रूपये की यह जमानत रालश वापस नहीं दी गयी र्थी, प्रत्यर्थी सं. 2 ने ददनांक 19.11.2011 को र्थाना अध्यक्ष, र्थाना बाराखंभा रोि, नई ददल्ली क े समक्ष धारा 406 एवं 420 क े अंतगणत अपराधों की दांडिक लशकायत दजण की | तत्पश्चात अततररक्त पुललस आयुक्त क े समक्ष ददनांक 10.09.2012 को भी एक लशकायत दजण की | पुललस अचधकाररयों द्वारा अपीलार्थीयों क े खखलाफ एफआईआर दजण करने से इंकार करने पर प्रत्यर्थी-लशकायतकताण ने ददनांक 03.11.2012 को दंि प्रकिया की संदहता धारा 156 (3) क े अंतगणत न्यायालय की शजक्तयों का सहारा ललया | इसक े बाद, ददनांक 11.11.2013 को प्रत्यर्थी संख्या 2 ने धारा 156 (3) क े अंतगणत दजण की गयी लशकायत वापस ले ली । जजस एफआईआर से हम सम्बद्ध हैं, वह प्रत्यर्थी संख्या 2 द्वारा दायर नयी लशकायत पर अपीलार्थीयों क े खखलाफ ददनांक 20.08.2014 को भारतीय दंि संदहता की धारा 406 क े अपराध क े अंतगणत दजण की गयी र्थी |
7. जजसक े बाद, अपीलार्थी एफआईआर ददनांक 20.08.2014 को रद्द करने की मांग करते हुए दंि प्रकिया संदहता की धारा 482 क े अंतगणत उच्च न्यायालय पहुंचे । अपीलार्थीयों क े अनुसार, इस मामले की पररजस्ट्र्थततयों में एफआईआर पूरी तरह से अस्ट्वीकायण र्थी । मुख्यत: उनक े द्वारा एक करोड़ रुपये की रालश को रोकना ठीक र्था और इस तरह रालश को रोकने से आपराचधक न्यासभंग होने का कोई सवाल ही नहीं उठता । इसक े अलावा, यह मानते हुए कक प्रत्यर्थी संख्या 2 को क े वल पैसे रोकने क े बारे में लशकायत र्थी, तो भी इसका तनवारर् एक लसववल न्यायालय क े समक्ष होना चादहए । इसललए, एफआईआर दजण ककया जाना दुभाणवपूर्ण र्था तर्था अपीलार्थीयों पर करार क े क ु छ नए तनयम व शतों को मानने हेतु दबाव बनाने की नीयत से ऐसा ककया गया र्था जजसक े ललए अपीलार्थी राजी नहीं होना चाहते र्थे |
8. लशकायतकताण-प्रत्यर्थी संख्या 2 का मामला यह है कक अपीलार्थी संख्या 1 धारा 406 क े अंतगणत अपराध का दोिी है क्योंकक उसने ववियगत संपवत्त गुप्त रूप से चोरी से अपनी पत्नी अपीलार्थी संख्या 2 क े नाम हस्ट्तांतररत कर दी र्थी । यह करार ददनांक 03.06.1993 को अमान्य ठहराने क े ललए ककया गया र्था । यह भी कहा गया है कक अपीलार्थी मुम्बई उच्च न्यायालय क े समक्ष एक कपटपूर्ण वाद में संपवत्त की कीमत कम आंकने क े ललए न्यायालय की प्रकिया क े दुरूपयोग क े दोिी हैं और इस प्रकार उन्होंने गलत तरीक े से संपवत्त का हस्ट्तांतरर् ककया है |
9. उच्च न्यायालय ने हालांकक, धारा 482 क े तहत दायर अपीलार्थीयों की याचचका का तनपटारा इस आधार पर ककया कक याचचका समय से पूवण ही दायर की गई है क्योंकक मामला अभी भी जांच क े अधीन है । उच्च न्यायालय ने जांच को आगे बढाने का तनदेश ददया और अपीलार्थीयों को जांच में शालमल होने का तनदेश ददया । इसक े बाद अपीलार्थीयों द्वारा इस अदालत में ववशेि अनुमतत याचचका क े माध्यम से यह अपील दाखखल की गयी । वतणमान अपील में, इस न्यायालय ने मामले में प्रर्थम दृष्टया अपीलाचर्थणयों को चगरफ्तारी से सुरक्षक्षत रखा और तनदेश ददया कक जांच जारी रखी जाए । तदनुसार, प्रत्यर्थी संख्या 1 ने जांच की और मेट्रोपोललटन मजजस्ट्ट्रेट, पदटयाला हाउस कोटण, ददल्ली की अदालत में दंि प्रकिया संदहता की धारा 173 क े अंतगणत एक ररपोटण दाखखल की है । चूंकक, पुललस ने अब एक आरोप पत्र प्रस्ट्तुत ककया है, अपीलाचर्थणयों ने एफआईआर को रद्द करने की प्रार्थणना क े अततररक्त, आरोप पत्र को रद्द करने की प्रार्थणना को भी शालमल करने हेतु अततररक्त रूप से संशोधन अजी दायर की है । िक ण
10. अपीलाचर्थणयों की ओर से उपजस्ट्र्थत होने वाले वररष्ठ अचधवक्ता श्री महेश जेठमलानी ने तनवेदन ककया है कक वतणमान मामले में लेनदेन जो धारा 406 क े तहत अपराध का गठन करने क े ललए तनधाणररत है, ककसी भी पररजस्ट्र्थतत में उस धारा क े अंतगणत अपराध नहीं कहा जा सकता । यह मानते हुए कक प्रत्यर्थी संख्या 2 को एक करोड़ रुपये की रालश क े कचर्थत अनुचचत प्रततधारर् क े बारे में एक लशकायत है, तो भी ज्यादा से ज्यादा यह एक दीवानी वववाद ही हो सकता है ।
11. ववद्वान अचधवक्ता ने आगे यह भी तनवेदन ककया है कक अपीलाचर्थणयों को दी गयी अचिम एक करोड़ रूपये की रालश खंि 30 (ख) क े तहत वापस की जानी र्थी, जो कक इस प्रकार है:- "माललक क े हिस्से वाले क्षेत्रों का कब्ज़ा उक्ि ग्रुप िाउलसांग काम्प्लेक्स क े माललक को देने वाला ववकासकिाण” चूंकक यह आकजस्ट्मकता उत्पन्न नहीं हुई इसललए रालश वापस नहीं की गई। इसक े अततररक्त, अचधक्वता ने कहा कक अपीलाचर्थणयों ने रालश को रोक े रखा क्योंकक ववकासकताण, प्रत्यर्थी संख्या 2 ववियगत संपवत्त क े क ु छ दहस्ट्से पर काबबज है और उसने संपवत्त को ककरायेदार से खाली कराने की शतण का भी पालन नहीं ककया है ।
12. श्री संजीव सेन, प्रत्यर्थी संख्या 2 क े वररष्ठ अचधवक्ता ने कहा है कक एफआईआर को रद्द करने की याचचका अमान्य र्थी क्योंकक कायणवाही एफआईआर क े स्ट्तर से आगे तनकल चुकी है और आरोप पत्र में पररर्त हो चुकी है |
13. श्री संजीव सेन ने जोर देते हुए कहा कक अपीलार्थी संख्या 1 क े ववरूद्ध धारा 406 क े अंतगणत आरोप इस तथ्य से सामने आता है कक अपीलार्थी संख्या 1 ने धोखाधड़ी से संपवत्त, जो कक ववकास करार ददनांक 03.06.1993 की वविय वस्ट्तु है, का हस्ट्तांतरर् अपनी पत्नी, अपीलार्थी संख्या 2 क े नाम ककया है ।
14. प्रत्यर्थी सं. 1, रा.रा.क्षे. राज्य सरकार की ओर से उपजस्ट्र्थत ववद्वान वररष्ठ अचधवक्ता, श्री अजजत क ु मार लसन्हा ने आरोप पत्र पर ववश्वास प्रकट ककया है और कहा है कक अपीलाचर्थणयों ने प्रत्यर्थी सं. 2 से ली गयी एक करोड़ रुपये की रालश को न लौटाकर, धारा 406 क े अंतगणत दंिनीय अपराध ककया है । तनष्कर्ण
15. सवणप्रर्थम, हम प्रत्यर्थी सं. 2 की ओर से वररष्ठ अचधवक्ता क े तनवेदन पर ववचार करते हैं कक एक बार आरोप पत्र दायर होने क े उपरान्त एफआईआर रद्द करने की याचचका अमान्य है । जोसेफ सलवराज ए. बनाम गुजरात राज्य में इस न्यायालय की जस्ट्र्थतत को ध्यान में रखते हुए हम इस तक ण में कोई गुर् नहीं देखते हैं | जोसेफ सलवराज ए. (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय ने इस सवाल पर फ ै सला करते हुए कक जब धारा 482 क े अंतगणत याचचका क े लंबन क े दौरान पुललस द्वारा आरोप पत्र दायर ककया गया हो तो क्या उच्च न्यायालय एफआईआर को रद्द करने क े ललए धारा 482 क े अंतगणत दायर याचचका को सुन सकता है, देखा:- "16. इस प्रकार, ववलभन्न धाराओं क े सामान्य लसंहावलोकन से, जजसक े तहत अपीलार्थी पर आरोप लगाया जा रहा है और मुकद्दमा चलाया जाएगा, यह ददखाएगा कक लशकायतकताण की एफआईआर से यहााँ तक कक प्रर्थम दृष्टया भी यह नहीं बनता है | यहााँ तक कक यदद आरोप-पत्र दायर ककया भी गया र्था, तो भी ववद्वान एकल न्यायाधीश जांच कर सकते र्थे कक क्या अपीलार्थी द्वारा कचर्थत रूप से ककया गया अपराध लशकायतकताण की एफआईआर, आरोप पत्र, दस्ट्तावेज आदद से प्रर्थम दृष्टया बनता भी है या नहीं |”
16. कफर भी यह अवश्य याद रखना चादहए कक उच्च न्यायालय क े समक्ष अलभयुक्त द्वारा दंि प्रकिया संदहता की धारा 482 क े प्रावधान का सहारा ललया गया है और यह न्यायालय दंि प्रकिया संदहता की धारा 482 क े अंतगणत एक आदेश से अपील की सुनवाई कर रहा है | दंि प्रकिया संदहता की धारा 482 तनम्नानुसार है:- “482. उच्च न्यायालय की अन्ितनणहिि शक्क्ियों की व्यावृवि – इस संदहता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्ततनणदहत शजक्त को सीलमत या प्रभाववत करने वाली न समझी जायेगी जैसे इस संदहता क े अधीन ककसी आदेश को प्रभावी करने क े ललए या ककसी न्यायालय की कायणवाही का दुरूपयोग तनवाररत करने क े ललए या ककसी अन्य प्रकार से न्याय क े उद्देश्यों की प्राजप्त सुतनजश्चत करने क े ललए आवश्यक हो |”
17. इस धारा में कहीं भी ऐसा क ु छ नहीं है जो क े वल एफआईआर क े स्ट्तर पर न्यायालय की कायणवाही क े दुरूपयोग अर्थवा न्यायहातन को रोकने क े ललए न्यायालय की शजक्त क े प्रयोग को रोकता हो | यह ववचध का एक तनधाणररत लसद्धांत है कक उच्च न्यायालय दंि प्रकिया संदहता की धारा 482 क े अंतगणत अचधकाररता का प्रयोग अधीनस्ट्र्थ न्यायालय में उन्मोचन आवेदन क े लंबबत रहते हुए भी कर सकता है । वास्ट्तव में, ऐसा मानना हास्ट्यास्ट्पद होगा कक ककसी व्यजक्त क े ववरुद्ध प्रारम्भ की गयी कायणवाही में एफआईआर क े स्ट्तर पर तो हस्ट्तक्षेप ककया जा सकता है परन्तु यदद यह आगे बढ चुकी हो तर्था कचर्थत आरोप पत्र में तब्दील हो चुक े हों तो नहीं | इसक े ववपरीत, यह कहा जा सकता है कक एफआईआर द्वारा काररत प्रकिया का दुरूपयोग बढ जाता है यदद एफआईआर जांच क े पश्चात आरोप पत्र में तब्दील हो गयी है | तनस्ट्संदेह रूप से, शजक्त ककसी भी न्यायालय की शजक्त की कायणवाही क े दुरुपयोग को रोकने क े ललए प्रदान की गई है ।
18. प्रत्यर्थी संख्या 2 क े ववद्वान अचधवक्ता का द्ववतीय कर्थन है कक अपीलार्थी संख्या 1 ने धोखे से संपवत्त, जो कक ददनांक 03.06.1993 क े करार की वविय वस्ट्तु है, का हस्ट्तांतरर् अपनी पत्नी को ककया और इस तरह आपराचधक न्यासभंग का अपराध ककया है | यह आरोप पूरी तरह से न क े वल अमान्य है बजल्क असाधारर् भी है क्योंकक अपीलार्थी सं. 1 द्वारा संपवत्त क े कचर्थत रूप से अपनी पत्नी को धोखाधड़ी से हस्ट्तांतरर् से, यह मानते हुए भी कक यह अवैध र्था, दूर-दूर तक न्यासभंग का अपराध नहीं बनता क्योंकक संपवत्त प्रत्यर्थी सं. 2 द्वारा अपीलाचर्थणयों को नहीं सौंपी गयी र्थी | संपवत्त अपीलार्थी संख्या 1 की र्थी और इसललए अपीलाचर्थणयों को उनकी स्ट्वयं की सम्पवत्त सौंपे जाने का कोई सवाल ही नहीं उठताऔर वह भी लशकायतकताण द्वारा, जजसने संपवत्त क े संबंध में क े वल इसक े ववकास का करार ककया र्था ।
19. अंततः, हम यह पाते हैं कक एफआईआर और आरोप पत्र में वास्ट्तव में दंि प्रकिया संदहता की धारा 406 क े अंतगणत याचचकाकताण पर उसे प्रत्यचर्थणयों द्वारा ववकास करार करते समय दी गयी एक करोड़ रूपये की रालश को रोकने क े अपराध का आरोप लगा है | क्या िारा 406 क े अांिगणि अपराि बना िै |
20. वतणमान मामले क े तथ्यों और पररजस्ट्र्थततयों को देखते हुए यह तनजश्चत करने क े ललए कक क्या भारतीय दंि संदहता की धारा 406 क े अंतगणत अपीलाचर्थणयों क े ववरुद्ध अपराध बनता भी है, भारतीय दंि संदहता की धारा 405 व 406 का सन्दभण देना आवश्यक है | भारतीय दंि संदहता की धारा 405 व 406 इस प्रकार हैं:- “405. आपराधिक न्यासभांग – जो कोई संपवत्त या संपवत्त पर कोई भी अख्त्यार ककसी प्रकार अपने को न्यस्ट्त ककये जाने पर उस संपवत्त का बेईमानी से दुववणतनयोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपररवततणत कर लेता है या जजस प्रकार ऐसा न्यास तनवाणहन ककया जाना है, उसको ववदहत करने वाली ववचध क े ककसी तनदेश का, या ऐसे न्यास क े तनवाणहन क े बारे में उसक े द्वारा की गई ककसी अलभव्यक्त या वववक्षक्षत वैध संववदा का अततिमर् करक े बेईमानी से उस संपवत्त का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर ककसी अन्य व्यजक्त का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराचधक न्यास भंग” करता है| स्ट्पष्टीकरर् 1 – जो व्यजक्त [ककसी स्ट्र्थापन का तनयोजक होते हुए, चाहे वह स्ट्र्थापन कमणचारी भववष्य-तनचध और प्रकीर्ण उपबन्ध अचधतनयम, 1952 (1952 का 19) की धारा 17 क े अधीन छ ू ट प्राप्त है या नहीं], तत्समय प्रवृत्त ककसी ववचध द्वारा स्ट्र्थावपत भववष्य-तनचध या क ु टुंब पेंशन तनचध में जमा करने क े ललए कमणचारी-अलभदाय की कटौती कमणचारी को सन्दे मजदूरी में से करता है उसक े बारे में यह समझा जायेगा कक उसक े द्वारा इस प्रकार कटौती ककये गए अलभदाय की रकम उसे न्यस्ट्त कर दी गयी है और यदद वह उक्त तनचध में ऐसे अलभदाय का संदाय करने में, उक्त ववचध का अततिमर् करक े व्यततिम करेगा तो उसक े बारे में यह समझा जाएगा कक उसने यर्थापूवोक्त ववचध क े ककसी तनदेश का अततिमर् करक े उक्त अलभदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग ककया है |] स्ट्पष्टीकरर् 2 – जो व्यजक्त, तनयोजक होते हुए, कमणचारी राज्य बीमा अचधतनयम, 1948 (1948 का 34) क े अधीन स्ट्र्थावपत कमणचारी राज्य बीमा तनगम द्वारा धाररत और शालसत कमणचारी राज्य बीमा तनगम तनचध में जमा करने क े ललए कमणचारी को संदेय मजदूरी में से कमणचारी – अलभदाय की कटौती करता है, उसक े बारे में यह समझा जाएगा कक उसे अलभदाय की वह रकम न्यस्ट्त कर दी गयी है, जजसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदद वह उक्त तनचध में ऐसे अलभदाय क े संदाय करने में, उक्त अचधतनयम का अततिमर् करक े, व्यततिम करता है, तो उसक े बारे में यह समझा जाएगा कक उसने यर्थापूवोक्त ववचध क े ककसी तनदेश का अततिमर् करक े उक्त अलभदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग ककया है |]
406. आपराधिक न्यासभांग क े ललए दांि – जो कोई आपराचधक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से ककसी भांतत क े कारावास से, जजसकी अवचध तीन विण तक की हो सक े गी, या जुमाणने से, या दोनों से, दजण्ित ककया जाएगा |”
21. अपराध का सार ककसी व्यजक्त को सौंपी गयी संपवत्त क े प्रयोग में तनदहत है, जजसका प्रयोग वह ककसी ववचधक तनदेश अर्थवा ककसी ववचधक करार जो उसने ऐसे ववश्वास क े तनवणहन क े दौरान ककया है क े उल्लंघन में करता है| पेश मामले में एक करोड़ रुपये की रालश का भुगतान लशकायतकताण-प्रत्यर्थी द्वारा अपीलार्थी को करार पर हस्ट्ताक्षर करने पर ब्याज मुक्त जमा क े रूप में ककया गया र्था। करार ददनांक 03.06.1993 क े खंि 30 (ख) क े अनुसार समूह आवास पररसर में माललक को उसक े दहस्ट्से वाले क्षेत्र का कब्ज़ा देने क े सार्थ ही सार्थ यह (रालश) लशकायतकताण को वापस की जानी र्थी |
22. पक्षकारों क े बीच लेनदेन में दो बातें महत्वपूर्ण हैं । प्रर्थमतः, रालश का वापस करने का अवसर, अर्थाणत ववकासकताण द्वारा समूह आवास पररसर में माललक को उसक े माललकाना दहस्ट्से क े क्षेत्र का कब्ज़े का सौंपा जाना, आया ही नहीं | अपीलाचर्थणयों क े अनुसार, करार ववफल माना जाता है क्योंकक वैधातनक रूप से 20, किरोज़शाह रोि, नई ददल्ली पर कोई समूह आवास नहीं बन सकता क्योंकक यह क्षेत्र लुटयंस बाँगला जोन में आता है | अतः अपीलार्थी संख्या 1 ने अनुबंध समाप्त कर ददया है | और रालश उसने ज़मानत क े तौर पर रख ली है क्योंकक ककसी भी तनलमणत भाग को उसे सौंपा नहीं गया है | लशकायतकताण जायदाद में एक भाग का कब्ज़ा ले चुका है एवं उसे वावपस नही ककया है एवं लशकायतकताण ककरायदारो क े दहस्ट्से से जायदाद को खाली कराने में असमर्थण है |
23. हम इसललए यह पाते हैं कक यह मानना संभव नहीं होगा कक जजसका भुगतान एक करोड़ रुपए की रालश को deposit क े रूप में ववकास करार क े संग ककया गया र्था सम्पवत्त का सौंपना र्था जजसे बेईमानी से अपने प्रयोग में लाया गया अर्थवा ववचध क े ककसी तनदेश अर्थवा अपीलार्थी क े अनुबंध क े उल्लंघन में लगाया गया | अपीलार्थीगर् ने रालश का प्रयोग नहीं ककया है अर्थवा दुरूपयोग नहीं ककया है | ववचध अर्थवा अनुबंध क े तनदेश क े ववरुद्ध जो यह बताता हो कक रालश का क ै से प्रयोग ककया जाए | ददनांक 3.6.1993 क े करार को देखते हुए माललक को बनी हुई जगह को सौंपने पर रालश को वावपस करना र्था जो स्ट्वीकार रूप से नहीं ककया गया अतत महत्वपूर्ण रूप से प्रततवादी संख्या 2 ने ककसी भी समय रालश वावपस ककये जाने की मांग नहीं की | वास्ट्तव में प्रत्यर्थी संख्या 2 का ववतनददणष्ट प्रततरोध यही है कक उन्होंने रालश की मांग इसललए नहीं की कक करार अभी भी बाकी र्था | हम नहीं देखते कक बहुत दूर की कौड़ी लाने पर भी यह प्रततरोध ककया जा सकता है कक अपीलार्थीगर् ने ककसी ववचध अर्थवा अनुबंध क े ववरुद्ध रालश को हड़पा है अर्थवा उसका प्रयोग बेईमानी से ककया है | ककसी भी जस्ट्र्थतत में वववाद दीवानी प्रवृवत्त क े लक्षर् रखता है एवं यह कोई दाजण्िक अपराध नहीं बनता है |
24. गहन ववचारर् पश्चात हमारा ववचार है कक इसे मानते हुए कक एक करोड़ क े रूप में security deposit है तो भी दोनों पक्षकारो क े बीच वववाद क े वल एक दीवानी वववाद होगा |
25. Indian Oil Corporation vs NTPC India Ltd. एवं अन्य में इस कोटण ने यह माना कक “13.......... दीवानी वववादों एवं दावों जजनमे कोई दाजण्िक अपराध नहीं हो को तनपटाने का कोई ऐसा प्रयास जजसमे दाजण्िक अलभयोग द्वारा दवाब िाला जाए उसको हतोत्सादहत एवं ववफल ककया जाना चादहए……….” न्यायलय में व्यावसातयक लोगो में दीवानी वववादों को अपराचधक मुकद्दमा बनाने क े बढते रुझान को नोदटस ककया | हम इसे ववचचत्र मानते हैं कक लशकायतकताण ने इस अपराचधक लशकायत को दायर करने में अततररक्त एक करोड़ की रालश की वापसी हेतु कोई प्रयास नहीं ककया है | यह कायण दुरववचारपूर्ण एवं खाररज ककये जाने योग्य है |
26. State of Haryana Vs Ors. V. Bhajan Lal and Ors. इस कोटण ने मुकद्दमे क े उन तमाम श्रेखर्यों को स्ट्पष्ट को ककया है जजनमे दंि प्रकिया संदहता की धारा 482 क े अंतगणत तनदहत शजक्तयों का प्रयोग ककया जा सकता है | तनर्णय क े Para 102 में तनम्न बाते हैं:- “102: अध्याय XIV क े अंतगणत संदहता क े सुसंगत लभन्न प्रावधानों एवं इस न्यायलय द्वारा ववचध क े स्ट्पष्ट ककये गए लसद्धांतों की व्याख्या की पृष्ठभूलम में अनुच्छेद 226 क े अंतगणत असाधारर् शजक्तयो क े प्रयोग अर्थवा संदहता की धारा 482 क े अंतगणत तनदहत शजक्तयों क े प्रयोग क े वविय में तनर्णयों की श्रृंखला में जजन्हें हमने ललया है एवं उपरोक्त में वैसे ही रखा है हम उदाहरर् स्ट्वरूप मुकद्दमे की तनम्न श्रेखर्यों को रखते हैं जजनमें ऐसी शजक्त का प्रयोग ककसी न्यायलय की प्रकिया क े दुरूपयोग को रोकने अर्थवा अन्यर्था न्याय क े दहत को सुरक्षक्षत करने हेतु ऐसी शजक्त का प्रयोग ककया जा सकता है यद्यवप यह संभव नही होगा कक कोई ववलशष्ट अस्ट्पष्ट प्रभाववत एवं पयाणप्त रूप से अडिग ददशा-तनदेश अर्थवा कठोर formula ददया जा सक े अर्थवा ववलभन्न प्रकारों क े मुकद्दमों की समस्ट्त सूची दी जा सक े जजनमें ऐसी शजक्त का प्रयोग ककया जाना चादहए |
1. जब प्रर्थम सूचना प्रततवेदन अर्थवा लशकायत में लगाये गये आरोप जब वह साधारर् रूप से ललये जाये एवं सम्पूर्ण रूप से स्ट्वीकार ककये जाये कफर भी उनसे कोई अपराध अर्थवा अलभयुजक्त क े ववरुद्ध मुकद्दमा नहीं बनता |
2. जब प्रर्थम सूचना ररपोटण एवं प्रर्थम सूचना ररपोटण क े संग लगी सामिी आदद कोई दो में आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध न दशाणते हो जो संदहता की धारा 156 (1) क े अंतगणत पुललस अचधकाररयो द्वारा अन्वेंिर् को न्यायसंगत ठहराये अततररक्त उस दशा क े जब संदहता की धारा 155 (2) क े प्रावधानों क े अंतगणत दंिाचधकारी क े आदेश क े अंतगणत |
3. जब प्रर्थम सूचना ररपोटण अर्थवा लशकायत में लगाये गये अखंडित आरोप एवं उनक े समर्थणन में जमा ककये गये साक्ष्य ककसी अपराध क े घदटत होने को नहीं दशाणता हो एवम अलभयुक्त क े ववरुद्ध कोई मुकद्दमा नहीं बनाते हो |
4. जब प्रर्थम सूचना ररपोटण मे लगाये गये आरोप कोई संज्ञेय आपराध नहीं बनता हो बजल्क क े वल एक असंज्ञेय अपराध बनता हो तो संदहता की धारा 155 (2) क े अंतगणत जैसा कक सववचाररत है दंिाचधकारी क े आदेश क े बबना ककसी पुललस अचधकारी द्वारा कोई अन्वेिर् अनुज्ञय नहीं है |
5. जब प्रर्थम सूचना ररपोटण अर्थवा लशकायत में लगाये गये आरोप इतने बेतुक े एवं तनदहत रूप से असंभव हों कक जजनक े आधार पर कोई भी समझदार व्यजक्त ककसी न्यायसांगत तनष्किण पर न पहुंचे कक अलभयुक्त क े ववरुद्ध कायणवाही करने हेतु पयाणप्त आधार है |
6. जब कायणवाही प्रारंभ करने एवं जारी रखने क े ववरुद्ध संदहता क े प्रावधानों अर्थवा सम्बंचधत अचधतनयम (जजसक े अंतगणत अपराचधक कायणवाही प्रारम्भ की गई हो अस्ट्पष्ट रूप से कोई ववचधक रूकावट न हो एवं / अर्थवा संदहता अर्थवा सम्बंचधत अचधतनयम क े अन्दर ववतनददणष्ट प्रावधान हो जो व्यचर्थत पक्षकार की लशकायत का भली-भांतत समाधान उपलब्ध करने में सक्षम हो |
7. जब फौजदारी कायणवाही देखने से ही बदनीयतत को ददखलाता हो एवं / अर्थवा जब बदनीयतत से कायणवाही प्रारंभ की गई हो जजसका पूरा उद्देश्य अलभयुक्त से बदला लेना हो एवं ककसी तनजी एवं आपसी जलन से हातन पंहुचाना हो |
27. हमारा यह मत है कक भजनलाल (उपरोक्त) क े मुकद्दमे क े तनर्णय क े पैरा 102 क े अंतगणत रखे गये पहली, तीसरी, पांचवी श्रेर्ी में यह मामला आता है | ऐसी पररजस्ट्र्थतत में अपीलार्थीगर् द्वारा दण्ि प्रकिया संदहता की े अंतगणत दायर की गयी याचचका क े खाररज़ करक े उच्च न्यायालय ने गलत ककया है | उच्च न्यायालय क े ललए यह एक उचचत मुकद्दमा र्था जजसमें प्रर्थम सूचना ररपोटण समाप्त करने हेतु द. प्र. स. की े अन्तगणत अपनी तनदहत शजक्तयों का प्रयोग करता |
28. यह आवश्यक है कक State of Karnataka V. L. Muniswamy and others[6] में इस न्यायालय क े शब्दों का स्ट्मरर् ककया जाए जो तनम्न प्रकार है “7. …… अपनी पूर्ण शजक्तयों का प्रयोग करने में उच्च न्यायालय इसका हक रखता है कक ककसी कायणवाही को समाप्त कर दे जब वह इस तनष्किण पर पहुंचे कक कायणवाही को जारी रहने देना न्यायलय की प्रकिया का दुरूपयोग होगा अर्थवा न्यायदहत यह है कक कायणवाही समाप्त कर दी जाए| उच्च न्यायालय की तनदहत शजक्तयों की व्यावृवत्त, दीवानी एवं िौजदारी दोनों मामलो में, यह है कक शोभनीय जन पररयोजन हेतु बनाया गया है जो यह है कक न्यायालय कायणवाही को अनुमतत नहीं जाएं कक वह ककसी अत्याचार अर्थवा व्यचर्थत करने का हचर्थयार बन जाएं| िौजदारी मुकद्दमे में ककसी बेढंगे अलभयोग क े पीछे छ ु पे उद्देश्य, सामिी की वही प्रवृवत्त जजसक े आधार पर अलभयोग दटका हो एवं उस जैसी बातें उच्च न्यायालय को न्याय दहत में कायणवाही समाप्त करने हेतु न्यायसंगत ठहरायेंगे.....”
28. हम मानते हैं कक अलभयोग बदनीयततपूर्ण, नहीं चलने वाला एवं इसका उद्देश्य क े वल अपीलार्थीगर् को प्रताडड़त करना है | प्रत्यर्थी द्वारा ककसी दीवानी कायणवाही से एक करोड़ रूपये क े deposit क े वावपस लेने हेतु कोई प्रयास नहीं करने से हम रुक े हैं |
29. अतः हमे अपीलार्थीगर् क े ववरुद्ध प्रर्थम सूचना ररपोटण एवं दायर की गई चालान को समाप्त करने में कोई दहचककचाहट नहीं है | अतः एतद्द्वारा प्रर्थम सूचना ररपोटण संख्या 0139/2014 ददनांक 20.08.14 और चाजणशीट ददनांक 03.08.2018 समाप्त ककये जाते हैं |
30. उपरोक्त कारर्ों से हम ददल्ली उच्च न्यायालय क े आक्षेवपत तनर्णय / आदेश ददनांक 02.02.06 को ख़ाररज करते हैं एवं तदनुसार अपील एवं अपील क े सार्थ मुख्य प्रार्थणना में प्रततशोधन मांगने हेतु अपीलार्थीगर् द्वारा दायर ककये गये आवेदन पत्र को स्ट्वीकार ककया जाता है |.................न्यायमूततण, [एस. ए. बोबदे].................न्यायमूततण, [एल. नागेश्वर राव] नई ददल्ली नवम्बर 15, 2018 अस्वीकरर्: देशी भािा में तनर्णय का अनुवाद मुकद्द्मेबाज़ क े सीलमत प्रयोग हेतु ककया गया है ताकक वो अपनी भािा में इसे समझ सक ें एवं यह ककसी अन्य प्रयोजन हेतु प्रयोग नहीं ककया जाएगा| समस्ट्त कायाणलयी एवं व्यावहाररक प्रयोजनों हेतु तनर्णय का अंिेज़ी स्ट्वरूप ही अलभप्रमाखर्त माना जाएगा और कायाणन्वयन तर्था लागू ककए जाने हेतु उसे ही वरीयता दी जाएगी |