Rajasthan Laghu Udyog Nigam Limited v. Thekeda Da

Supreme Court of India · 23 Jan 2019 · 2019 INSC 82
A. Banumathi; Indira Banerjee
Civil Appeal No 1039 of 2019 @ SLP (C) No 22809 of 2016
civil appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court upheld the validity of the appellant's Managing Director's appointment as sole arbitrator under the 1996 Act, set aside the High Court's order and ex parte award, and directed continuation of arbitration with due opportunity to parties.

Full Text
Translation output
रि पोर्टेबल
भा त का सर्वो च्च न्यायालय
सिसविर्वोल अपीलीय क्षेत्राधि का
सिसविर्वोल अपील संख्या 1039/2019
(एस एल पी (सी) संख्या 22809/2016 से उत्पन्न)
ाजस्थान लघु उद्योग कॉप ेशन लिलवि8र्टेेड - अपीलकता;
बना8
8ैसस; गणेश क
ं र्टेेनस; 8ूर्वोस; सिंसधिडक
े र्टे - प्रत्यथA
विनण;य
आ . बानु8थिथ, न्याया ीश
JUDGMENT

1. अनु8धित दी गई।

2. यह अपील ाजस्थान उच्च न्यायालय, पीठ जयपु द्वा ा विदनांक 22.04.2016 को पारि त विनण;य से उत्पन्न होती है, सिजसक े द्वा ा उच्च न्यायालय ने 8ध्यस्थता औ सुलह अधि विनय[8], 1996 की ा ा 11 औ ा ा 15 क े तहत प्रत्यथA द्वा ा दाय आर्वोेदन को स्र्वोीका विकया है औ सिजसक े चलते श्री जे. पी. बंसल, सेर्वोाविनर्वोृत्त सिजला न्याया ीश को पक्षका ों क े बीच विर्वोर्वोाद को हल क ने क े लिलए एक8ात्र 8ध्यस्थ क े रूप 8ें विनयुक्त विकया गया है। 2019 INSC 82

3. संधिक्षप्त तथ्य सिजनक े का ण इस अपील को दालि\ल विकया गया, विनम्नानुसा हैः अपीलकता;- ाजस्थान लघु उद्योग विनग[8] लिलवि8र्टेेड ने अंतदशीय क ं र्टेेन धिडपो जयपु, जो पु औ बंद गाह क े बीच 8ें आईएसओ क ं र्टेेन ों औ 8ाल क े संचालन औ सड़क परि र्वोहन क े लिलए विनविर्वोदा आ8ंवित्रत की। प्रधितर्वोादी-ठेक े दा ने कथिथत विनविर्वोदा 8ें भाग लिलया औ 21.01.2000 को प्रधितर्वोादी-ठेक े दा क े पक्ष 8ें आशय पत्र जा ी विकया गया। दोनों पक्षों क े बीच स8झौता 28.01.2000 को विनष्पाविदत विकया गया था। शुरुआत 8ें यह अनुबं तीन साल का था, लेविकन दोनों पक्षों की सह8धित से इसे 31 जनर्वो ी, 2003 से दो साल क े लिलए बढ़ा विदया गया। अपीलकता; द्वा ा प्रत्यथA प क ं र्टेेन ों क े परि र्वोहन 8ें दे ी क े लिलए र्टे्रांसिजर्टे जु8ा;ना लगाने, विर्वोथिभन्न अर्वोधि क े लिलए क ं र्टेेन ों क े संचालन शुल्क का भुगतान न क ने, औ कई अन्य विर्वोर्वोादों क े लिलए पक्षका ों क े बीच विर्वोर्वोाद उत्पन्न हुआ। अनुबं की शतh- ा ा 4.2.[1] अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) क े तहत एक8ात्र 8ध्यस्थता क े लिलए स्र्वोयं प्रबं विनदेशक या उसक े द्वा ा नावि8त व्यविक्त द्वा ा 8ध्यस्थता का प्रार्वो ान विकया गया है। प्रधितर्वोादी-ठेक े दा ने ा ा 4.2.[1] अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) क े संदभ; 8ें 8ध्यस्थ की विनयुविक्त का अनु ो विकया। एक आईएएस (सेर्वोाविनर्वोृत्त) आई सी श्रीर्वोास्तर्वो को 21.02.2005 को एक8ात्र 8ध्यस्थ विनयुक्त विकया गया। चूंविक 8ा8ले को विनपर्टेाने 8ें एक8ात्र 8ध्यस्थ की प्रगधित संतोषजनक नहीं थी, इसलिलए उक्त एक8ात्र 8ध्यस्थ को 26.03.2009 को हर्टेा विदया गया औ उसक े स्थान प, अपीलकता;-विनग[8] क े अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक को दोनों पक्षों की सह8धित से एक8ात्र 8ध्यस्थ क े रूप 8ें काय; क ने क े लिलए विनयुक्त विकया गया।

4. विकसी न विकसी का ण से 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही पू ी नहीं हो सकी। अपीलकता; क े अनुसा, 8ा8ले को 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण क े विदनांक 10.02.2010, 11.02.2010, 15.02.2010, 18.02.2010 औ 10.03.2010 क े आदेशों द्वा ा बा -बा स्थविगत विकया गया क्योंविक प्रधितर्वोादी-ठेक े दा की ओ से कोई भी उपस्थिस्थत नहीं हुआ था। 16 8ाच;, 2010 को, प्रत्यथA ने नर्वोविनयुक्त एक8ात्र 8ध्यस्थ की विनष्पक्षता क े बा े 8ें अपना संदेह व्यक्त विकया। एक8ात्र 8ध्यस्थ ने विदनांक 06.04.2010 को यह कहते हुए आदेश पारि त विकया विक स8झौते की ा ा 4.2.[1] अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) 8ें विनग[8] क े अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक या उनक े द्वा ा नावि8त व्यविक्त द्वा ा 8ध्यस्थता का प्रार्वो ान है औ यह विक क े र्वोल दोनों पक्षों क े संयुक्त अनु ो प, अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक ने पक्षका ों क े बीच विर्वोर्वोाद को सुलझाने क े लिलए 8ध्यस्थता का 8ा8ला उठाया है। काय;र्वोाही आगे भी जा ी ही, 17.08.2011 तक सुनर्वोाई की ता ी\ विर्वोथिभन्न धितथिथयों प विनयत की गई।

5. 07.02.2013 को, प्रत्यथA-ठेक े दा ने अपीलकता; को एक कानूनी नोविर्टेस भेजा सिजस8ें कहा गया था विक इतने सा े अनु ो ों क े बाद भी, एक8ात्र 8ध्यस्थ ने विनण;य पारि त नहीं विकया है औ अपीलकता; को एक 8हीने क े भीत र्वोै ाविनक ब्याज सविहत 3,90,81,602/- रुपये की विनणAत ाथिश का भुगतान क ने क े लिलए कहा है। अपीलकता; ने 19 8ाच; 2013 को एक जर्वोाब भेजा सिजस8ें कहा गया था विक चूंविक अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक का स्थानांत ण क विदया गया है, अधि विनण;य पारि त नहीं विकया जा सका है औ प्रत्यथA-ठेक े दा को भुगतान क ने का कोई सर्वोाल ही नहीं है।

6. 13.05.2015 को, प्रत्यथA-ठेक े दा ने उच्च न्यायालय क े स8क्ष 8ध्यस्थता औ सुलह अधि विनय[8], 1996 की \ंड 11 (6) औ \ंड 15 क े तहत एक आर्वोेदन दाय विकया, सिजस8ें 28.01.2000 क े स8झौते क े संबं 8ें अपीलकता; औ प्रत्यथA क े बीच विर्वोर्वोाद क े न्यायविनण;यन क े लिलए एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त की 8ांग की गई। 18 विदसंब, 2015 को 8ध्यस्थ क े संज्ञान 8ें लाया गया विक उच्च न्यायालय क े स8क्ष एक 8ध्यस्थता आर्वोेदन दाय विकया गया है। विदनांक 05.01.2016 को 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने पक्षका ों को सुनर्वोाई क े अंधित[8] अर्वोस क े रूप 8ें 8ा8ले को 13.01.2016 क े लिलए स्थविगत क विदया। 13.01.2016 को, 8ध्यस्थ ने प्रत्यथA-ठेक े दा क े आर्वोेदन औ उच्च न्यायालय क े स8क्ष लंविबत 8ध्यस्थता आर्वोेदन की सुनर्वोाई औ अंधित[8] विनपर्टेान तक 8ा8ले को स्थविगत क ने क े उनक े अनु ो को अस्र्वोीका क विदया औ विनण;य विदया विक 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही को उपलब् तथ्यों क े आ ा प अंधित[8] रूप विदया जाएगा औ इसलिलए 8ा8ले को 21.01.2016 तक स्थविगत क विदया। एक8ात्र 8ध्यस्थ ने 21.01.2016 को एकपक्षीय विनण;य पारि त विकया।

7. उच्च न्यायालय ने आक्षेविपत आदेश द्वा ा 8ाध्यस्थ8् आर्वोेदन को अनुज्ञात विकया औ इस प्रका श्री जे. पी. बंसल (सेर्वोाविनर्वोृत्त), सिजला न्याया ीश को एक8ात्र 8ध्यस्थता क े रूप 8ें विनयुक्त विकया।उच्च न्यायालय ने अथिभविन ा;रि त विकया विक प्रत्यथA - ठेक े दा को एक8ात्र 8ध्यस्थ क े स8क्ष 8ा8ले की दीघAक ण क े का ण उच्च न्यायालय का द र्वोाजा \र्टे\र्टेाना पड़ा, जो एक क े बाद एक बदलता हा औ अपीलकता;-विनग[8] प 8ध्यस्थता याधिचका की नोविर्टेस की ता8ील होने क े बाद ही 8ध्यस्थ ने काय;र्वोाही 8ें तेजी लाई औ प्रधितर्वोादी-ठेक े दा को सुने विबना 21.01.2016 को एकपक्षीय पंचार्टे पारि त विकया गया।उच्च न्यायालय का विर्वोचा था विक 8ध्यस्थ ने 8ध्यस्थता आर्वोेदन को विर्वोफल क ने की दृविt से काय;र्वोाही को स8ाप्त क ने क े लिलए जल्दबाजी की।

8. श्री ए. डी. एन. ार्वो, अपीलाथA-विनग[8] क े विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने विनर्वोेदन विकया विक उच्च न्यायालय ने ा ा 4.20.[1] अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) को ध्यान 8ें न \क गलती की, विक 8ध्यस्थता औ सुलह अधि विनय[8], 1996 की ा ा 11 औ ा ा 15 क े तहत प्रत्यथA पक्षका ों क े बीच स8झौते औ पक्षका ों क े बीच विर्वोर्वोाद क े विनण;य क े लिलए 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की क्ष8ता को ध्यान 8ें \ते हुए आर्वोेदन नहीं क सकता था। यह आगे विनर्वोेदन विकया गया विक हालांविक 8ध्यस्थ 8ा8ले को आगे बढ़ाने क े लिलए तैया था, 8ध्यस्थ प्रगधित नहीं क सकता था क्योंविक प्रधितर्वोादी या तो उपस्थिस्थत नहीं था या स्थगन ले हा था औ जब 8ध्यस्थ 8ा8ले को सही त ीक े से आगे बढ़ा हा था, तो प्रधितर्वोादी 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े लिलए उच्च न्यायालय से संपक; नहीं क सकता था। इस तथ्य को ध्यान 8ें \ते हुए यह आग्रह विकया गया विक 8ाध्यस्थ[8] अधि क ण द्वा ा अंधित[8] 8ाध्यस्थ[8] पंचार्टे पारि त क विदया गया, प्रत्यथA 8ाध्यस्थ[8] औ सुलह अधि विनय[8], 1996 की ा ा 34 क े तहत अपील क े 8ाध्य[8] से ही इसे चुनौती दे सकता है औ उच्च न्यायालय क े आक्षेविपत आदेश को द्द विकया जा सकता है।

9. प्रधितर्वोादी-ठेक े दा की विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता सुश्री वि8श्रा ने प्रस्तुत विकया विक 8ध्यस्थता औ सुलह (संशो न) अधि विनय[8], 2015 की ा ा 12 क े 8द्देनज, यविद 8ध्यस्थ एक क[8];चा ी/सलाहका है या कोई अतीत या र्वोत;8ान का व्यापा संबं है या प्रबं क/विनदेशक है तो उसे 8ध्यस्थ क े रूप 8ें विनयुक्त नहीं विकया जा सकता है औ र्वोह विर्वोर्वोाद का फ ै सला क ने क े लिलए योग्य नहीं है औ इसलिलए, उच्च न्यायालय ने उधिचत रूप से नए स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त की है। यह विनर्वोेदन विकया गया विक 8ध्यस्थता औ सुलह (संशो न) अधि विनय[8], 2015 की सातर्वोीं अनुसूची 8ें र्वोर्णिणत 8ध्यस्थ का पद ा ण क ने क े लिलए व्यविक्त की अयोग्यता प्रत्यथA-ठेक े दा को प्रदान विकया गया एक विर्वोधि क अधि का है औ यह आ ोप लगाते हुए अधि विनय[8] क े लि\लाफ कोई र्वोचन-विर्वोबं नहीं हो सकता है विक 28.01.2000 क े स8झौते 8ें, प्रत्यथA ने सह8धित व्यक्त की विक विर्वोर्वोाद औ 8तभेदों को एक8ात्र 8ध्यस्थता क े लिलए स्र्वोयं प्रबं विनदेशक या उनक े नावि8त को संदर्णिभत विकया जाएगा। यूविनयन ऑफ इंधिडया औ अन्य बना8 उत्त प्रदेश ाज्य पुल विनग[8] लिलवि8र्टेेड (2015) 2 एस. सी. सी. 52, प विर्वोश्वास जताते हुए यह प्रधितर्वोाद विकया गया था विक जब 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की ओ से काय; क ने 8ें विर्वोफलता होती है औ अपने काय| को क ने 8ें अस8थ; होता है, तो यह 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही से जुड़े पक्षका क े लिलए \ुला होता है विक र्वोह 8ध्यस्थ क े विनण;य को स8ाप्त क ने क े लिलए अदालत से संपक; क े औ स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त की 8ांग क े। प्रत्यथA क े विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने आगे विनर्वोेदन विकया विक र्वोत;8ान 8ा8ले 8ें, लगभग दस र्वोष| की लंबी अर्वोधि 8ें कोई पंचार्टे पारि त नहीं विकया गया है औ 8ध्यस्थों को विकसी न विकसी का ण से बदलते \ा गया था, प्रत्यथA द्वा ा प्रधितस्थापन या नए 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े लिलए उच्च न्यायालय का द र्वोाजा \र्टे\र्टेाना उधिचत था। यह विनर्वोेदन विकया गया विक प्रत्यथA द्वा ा उच्च न्यायालय का द र्वोाजा \र्टे\र्टेाने क े बाद ही काय;र्वोाही 8ें तेजी लाई गई औ पंचार्टे पारि त विकया गया।

10. ह8ने दोनों पक्षों की दलीलों प सार्वो ानीपूर्वो;क विर्वोचा विकया है औ आक्षेविपत विनण;य औ रि कॉड; प आए तथ्यों का अर्वोलोकन विकया है। विनम्नलिललि\त बिंबदुओं प विर्वोचा विकया जाना चाविहएः-  विर्वोथिभन्न ता ी\ों को एक8ात्र 8ध्यस्थ क े स8क्ष काय;र्वोाही क े प्रकाश 8ें औ जब 8ध्यस्थ क े स8क्ष काय;र्वोाही लंविबत थी, क्या प्रधितर्वोादी स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े लिलए 8ध्यस्थता अधि विनय[8], 1996 की ा ा 11 औ ा ा 15 क े तहत उच्च न्यायालय 8ें 8ध्यस्थता याधिचका दाय क ने 8ें सही था?  जब 8ध्यस्थता स8झौते क े आ ा प अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) की ा ा 4.20.[1] क े अ ीन जब पक्षका इस बात प सह8त हुए विक पक्षका ों क े बीच विर्वोर्वोाद, 8तभेद प्रबं विनदेशक या उनक े द्वा ा नावि8त क े द्वा ा सुलझाया जाना चाविहए, क्या उच्च न्यायालय पक्षका ों क े बीच स8झौते की शत| से विर्वोचलिलत होक एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क ने 8ें सही था?  क्या 8ध्यस्थता औ सुलह (संशो न) अधि विनय[8], 2015 की ा ा 12 क े आ ा प अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक 8ध्यस्थ क े लिलए अयोग्य हैं?  क्या उच्च न्यायालय पंचार्टे पारि त क ने 8ें हुए विर्वोलंब क े आ ा प पक्षका ों की सह8धित से बने 8ध्यस्थ क े अधि देश को स8ाप्त क ने औ स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क ने 8ें सही था?

11. स8झौते की शत| से हर्टेक, क्या प्रधितर्वोादी 8ध्यस्थता अधि विनय[8] की ा ा 11 क े तहत 8ध्यस्थता याधिचका दाय क ने 8ें सही थाः- यह स्र्वोीका विकया जाता है विक दोनों पक्षों ने जयपु, जो पु 8ें अंतदशीय क ं र्टेेन धिडपो औ बंद गाहों क े बीच आईएसओ क ं र्टेेन ों औ 8ाल क े सड़क परि र्वोहन क े संचालन क े लिलए 28.01.2000 को एक स8झौता विकया था। यह स8झौता 10.4.2000 से तीन र्वोष; की अर्वोधि क े लिलए लागू होना था। उप ोक्त स8झौते को 31.01.2003 से दो र्वोष; की अर्वोधि क े लिलए औ बढ़ा विदया गया था। अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) की ा ा 4.20.[1] 8ें 8ध्यस्थता क े लिलए प्रार्वो ान विकया गया है, जो इस प्रका हैः- “4.20.[1] इस संविर्वोदा से उत्पन्न होने र्वोाले या इससे विकसी भी त ह से जुड़े सभी विर्वोर्वोादों औ 8तभेदों को एक8ात्र े लिलए स्र्वोयं प्रबं विनदेशक को या उनक े द्वा ा नावि8त व्यविक्तयों को संदर्णिभत विकया जाएगा। ऐसी विकसी भी विनयुविक्त प इस आ ा प कोई आपलित्त नहीं होगी विक इस प्रका विनयुक्त व्यविक्त विनग[8] का क[8];चा ी है, उसने उन 8ा8लों को विनपर्टेाया है सिजनसे अनुबं संबंधि त है औ यह विक अपने कत;व्यों क े दौ ान।इस त ह से 8ध्यस्थता अंधित[8] होगी औ अनुबं क े पक्षका ों क े लिलए बाध्यका ी होगी। यविद र्वोह व्यविक्त, सिजसक े पास 8ा8ला 8ूल रूप से 8ध्यस्थता क े लिलए भेजा गया था, काया;लय क े \ाली होने, स्थानांत ण, इस्तीफ े, सेर्वोाओं से सेर्वोाविनर्वोृलित्त, विनलंबन या विकसी अन्य का ण से का8 क ने 8ें अस8थ; हो जाता है, तो प्रबं विनदेशक उसक े काय; को जल्द से जल्द संभालने क े लिलए विकसी अन्य व्यविक्त को नावि8त क ेगा। ऐसा व्यविक्त उस प्रक्र[8] से आगे बढ़ेगा जहां 8ा8ला उसक े पूर्वो;र्वोतA द्वा ा छोड़ा गया था। 8ध्यस्थ अधि विनण;य क े लिलए का ण बताएगा।"

12. बिंबदुओं को स8झने क े लिलए, प्रत्यथA-ठेक े दा द्वा ा उच्च न्यायालय का द र्वोाजा \र्टे\र्टेाने से पहले 8ध्यस्थ क े स8क्ष विर्वोथिभन्न काय;र्वोाविहयों क े ब्यौ े का उल्ले\ क ना आर्वोश्यक है। \ंड 4.20.[1] क े संदभ; 8ें आई सी श्रीर्वोास्तर्वो, आईएएस (सेर्वोाविनर्वोृत्त) को विदनांक 21.02.2005 क े आदेश द्वा ा एक8ात्र 8ध्यस्थ क े रूप 8ें विनयुक्त विकया गया था। चूंविक उक्त 8ध्यस्थ क े स8क्ष 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही की प्रगधित संतोषजनक नहीं थी, इसलिलए विदनांक 26.03.2009 क े आदेश संख्या आ एसआईसी/ लीगल/ 08-09/ 23999-24001 द्वा ा आई सी श्रीर्वोास्तर्वो, आईएएस (सेर्वोाविनर्वोृत्त) की 8ध्यस्थ क े रूप 8ें विनयुविक्त र्वोापस ले ली गई। उक्त 8ध्यस्थ से रि कॉड; प्राप्त नहीं हुए थे, इसलिलए दोनों पक्षों की उपस्थिस्थधित 8ें 13.08.2009 को एक आदेश पारि त विकया गया था, सिजस8ें इस बात प सह8धित व्यक्त की गई थी विक 8ा8ले क े रि कॉड; का पुनर्निन8ा;ण विकया जाना है औ इसी आदेश द्वा ा, अधितरि क्त 8ुख्य सधिचर्वो (एसएसआई), रुक्8णी हस्थिल्दया, आईएएस से एक8ात्र 8ध्यस्थ क े लिलए अनु ो क ने का विनण;य लिलया गया था। हालांविक, बाद 8ें दोनों पक्षों की सह8धित से अपीलकता;-विनग[8] क े अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक को एक8ात्र 8ध्यस्थ क े रूप 8ें विनयुक्त विकया गया था।

13. यह 8ा8ला 24.11.2009 औ 30.11.2009 औ अन्य ता ी\ों को 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण क े स8क्ष स्थविगत क विदया गया था। 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण क े विदनांक 08.01.2010 क े आदेश से पता चलता है विक पहले क े 8ध्यस्थ से कई बा अनु ो विकया गया था विक र्वोह 8ा8ले से संबंधि त रि कॉड; सौंप दे, लेविकन उसने रि कॉड; नहीं सौंपे औ इसलिलए, पक्षका ों को रि कॉड; का आदान-प्रदान क ने की सलाह दी गई ताविक काय;र्वोाही शुरू हो सक े औ 8ा8ले को स्थविगत क विदया गया। 25.1.2010 को बाद की सुनर्वोाई 8ें दोनों पक्षों का प्रधितविनधि त्र्वो उनक े र्वोकील ने विकया औ इसलिलए 8ा8ले को अंधित[8] बहस क े लिलए 8.2.2010 तक स्थविगत क विदया गया। 8.2.2010 को प्रधितर्वोादी-दार्वोेदा की दलीलों क े एक विहस्से को सुना गया औ स8य की क8ी क े का ण 8ा8ले को 10.02.2010 तक स्थविगत क विदया गया। बाद 8ें 10.02.2010, 11.02.2010, 15.02.2010, 18.02.2010 औ 10.03.2010 को प्रधितर्वोादी-दार्वोेदा की ओ से कोई भी उपस्थिस्थत नहीं था औ 8ा8ला 17.03.2010 तक स्थविगत क विदया गया। प्रत्यथA-ठेक े दा ने अपीलकता;- विनग[8] क े अध्यक्ष औ प्रबं विनदेशक को संबोधि त अपने विदनांक 16.03.2010 क े पत्र द्वा ा 8ध्यस्थता की विनष्पक्षता प संदेह व्यक्त क ते हुए एक8ात्र 8ध्यस्थ से 8ध्यस्थता को र्वोापस लेने की अपनी इच्छा व्यक्त की औ 8ा8ले का अथिभविनण;य विपछले 8ध्यस्थ आई. सी. श्रीर्वोास्तर्वो से क र्वोाने क े लिलए तैया था सिजन्हें दोनों पक्षका ों की संयुक्त सह8धित से पहले ही हर्टेा विदया गया था। पत्र विदनांविकत 18.03.2010 द्वा ा, प्रत्यथA ने 8ा8ले को स्थविगत क ने का अनु ो विकया। सुनर्वोाई की अगली ता ी\ 19 8ाच;, 2010 को प्रत्यथA-ठेक े दा पेश नहीं हुआ औ 8ा8ले को 06.04.2010 तक स्थविगत क विदया गया। 06.04.2010 को प्रत्यथA-ठेक े दा अपने प्रधितविनधि एफ. क े. शे र्वोानी द्वा ा पेश हुआ।जैसा विक 06.04.2010 की 8ध्यस्थ की काय;र्वोाही से पता चलता है, हालांविक शुरू 8ें अपीलकता;-आ एसआईसी क े बाह से 8ध्यस्थ क े लिलए दबार्वो डाला था, आलि\ का अपनी सह8धित दे दी विक अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक 8ध्यस्थता क सकते हैं।

14. 29.04.2010 को 8ा8ले प विर्वोचा नहीं विकया जा सका क्योंविक 28.04.2010 को 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने यह कहते हुए आदेश पारि त विकया विक एक8ात्र 8ध्यस्थ-सीए8डी को बहुत 8हत्र्वोपूण; आधि कारि क काय; 8ें भाग लेने क े लिलए 8ुंबई जाना होगा औ 8ा8ले को 19.05.2010 तक स्थविगत क विदया गया। इसक े बाद यह 8ा8ला 20.05.2010, 16.06.2010, 25.08.2010 औ 21.10.2010 तक स्थविगत क विदया गया। यह दे\ा गया है विक प्रत्यथA-दार्वोेदा ने (विदनांक 21.10.2010 क े पत्र द्वा ा) कहा विक उन्हें र्वोत;8ान एक8ात्र 8ध्यस्थ 8ें पू ा विर्वोश्वास है औ यह विक 8ा8ले को जल्द से जल्द रि कॉड; प उपलब् तथ्यों क े आ ा प जल्द तय विकया जाये।

15. पक्षका ों क े ेकॉड; औ कधितपय स्पtीक णों क े वि8लान क े अभार्वो 8ें, विदनांक 24.03.2011 क े आदेश द्वा ा, 8ध्यस्थ ने दोनों पक्षका ों को दार्वोे औ प्रधितदार्वोे से संबंधि त पूण; ेकॉड; क े साथ 18.04.2011 को उनक े स8क्ष उपस्थिस्थत होने का विनदश विदया। अगली सुनर्वोाई की धितथिथयों अथा;त 20.04.2011 औ 21.04.2011 को, पक्षका ों औ एक8ात्र 8ध्यस्थ क े बीच विर्वोस्तृत चचा; हुई औ तदनुसा, प्रत्यथA- ठेक े दा क ु छ दार्वोों को र्वोापस लेने क े लिलए सह8त हुए। विदनांक 21.04.2011, 18.05.2011, 20.05.2011 औ 24.05.2011 क े विर्वोथिभन्न पत्राचा द्वा ा, 8ध्यस्थ को विनण;य को अंधित[8] रूप देने क े लिलए दोनों पक्षों से क ु छ स्पtीक ण की आर्वोश्यकता थी औ जर्वोाब भी प्राप्त हुए थे।17.08.2011 को, दोनों पक्षों की उपस्थिस्थधित 8ें, 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने विनम्नलिललि\त आदेश पारि त विकयाः- - "इस 8ध्यस्थता से संबंधि त पत्रार्वोली से छेड़छाड़/दस्तार्वोेज़ गायब या अ ू ी प्रतीत होती है।इसलिलए, कालानुक्रवि8क घर्टेनाओं का पता लगाने औ पुनर्निन8ा;ण की आर्वोश्यकता होगी।इस संबं 8ें दोनों पक्षों को सूधिचत क ते हुए विर्वोस्तृत आदेश पारि त विकया जाएगा। उन्हें इस विर्वोषय 8ें अगले आदेश तक इंतजा क ना चाविहए।"

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16. उप ोक्त पृष्ठभूवि8 8ें, प्रत्यथA-ठेक े दा ने विदनांक 07.02.2013 को एक कानूनी नोविर्टेस भेजा सिजस8ें कहा गया था विक दोनों पक्षों ने 18.04.2011 को एक8ात्र 8ध्यस्थ क े स8क्ष अपने प्रासंविगक दार्वोे प्रस्तुत विकए हैं औ यह विक क ु छ ाथिश की कर्टेौती क े बाद दार्वोे को विनपर्टेाने क े लिलए पा स्परि क रूप से सह8धित व्यक्त की गई थी औ इस ाथिश को अंधित[8] रूप से 3,90,81,602/- रुपये प विन ा;रि त विकया गया था औ इस तथ्य क े बार्वोजूद विक पक्षका ों क े बीच तय ाथिश प सह8धित थी, 8ध्यस्थ द्वा ा कोई पंचार्टे पारि त नहीं विकया गया। प्रधितर्वोादी ने सांविर्वोधि क ब्याज क े साथ 3,90,81,602 रुपये क े दार्वोे को दोह ाते हुए विदनांक 07.03.2013 को एक औ कानूनी नोविर्टेस भेजा। अपीलकता;-विनग[8] ने 19.03.2013 को एक विर्वोस्तृत जर्वोाब भेजा है, सिजस8ें विकसी भी त ह क े स8झौते से इनका विकया गया है औ इस बात से भी इनका विकया गया है विक 3,90,81,602/- रुपये की ाथिश को अंधित[8] रूप विदया गया था।

17. उपयु;क्त पृष्ठभूवि8 8ें, 13.05.2015 को प्रत्यथA-ठेक े दा ने 28.01.2000 क े स8झौते क े संबं 8ें अपीलकता;-विनग[8] औ प्रत्यथA-ठेक े दा क े बीच विर्वोर्वोादों औ 8तभेदों क े लिलए एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े लिलए उच्च न्यायालय क े स8क्ष 8ध्यस्थता औ सुलह अधि विनय[8], 1996 की ा ा 11 औ ा ा 15 क े तहत एक आर्वोेदन दाय विकया। जब उक्त याधिचका उच्च न्यायालय क े स8क्ष लंविबत थी, तब 8ध्यस्थ ने विदनांक 18.12.2015 क े आदेश द्वा ा सुनर्वोाई की ता ी\ 05.01.2016 विन ा;रि त की। प्रधितर्वोादी-ठेक े दा ने 8ाध्यस्थ[8] की काय;र्वोाही को स्थविगत \ने का अनु ो क ते हुए एक पत्र भेजा। हालांविक, 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने 8ा8ले को 13.01.2016 औ उसक े बाद 21.01.2016 क े लिलए स्थविगत क विदया, सिजस ता ी\ को 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण द्वा ा अंधित[8] पंचार्टे पारि त विकया गया था। इसक े बाद, उच्च न्यायालय क े 22.04.2016 क े आक्षेविपत आदेश द्वा ा सेर्वोाविनर्वोृत्त सिजला न्याया ीश श्री जे. पी. बंसल को दोनों पक्षों क े बीच विर्वोर्वोाद को हल क ने क े लिलए एक8ात्र 8ध्यस्थ क े रूप 8ें विनयुक्त विकया गया था।

18. जैसा विक पहले बताया गया है, 06.04.2010 को, हालांविक प्रत्यथA ने शुरू 8ें आ एसआईसी क े बाह 8ध्यस्थ की 8ांग की, विफ अंत 8ें 8ध्यस्थता क े लिलए प्रबं विनदेशक क े लिलए अपनी सह8धित दी। विदनांक 06.04.2010 की उक्त काय;र्वोाही इस प्रका हैः- - "श्री एफ. क े. शे र्वोानी दार्वोेदा की ओ से औ श्री जी. सी. गग; औ श्री आ. क े. अग्रर्वोाल, अधि र्वोक्ता विनग[8] की ओ से उपस्थिस्थत हुए। आ ंभ 8ें श्री एफ. क े. शे र्वोानी ने आ एसआईसी क े बाह से एक 8ध्यस्थ विनयुक्त क ने प जो विदया। उनकी आशंका थी विक सीए8डी एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ नहीं होंगे क्योंविक उनक े आ एसआईसी क े विहत को ध्यान 8ें \ने की संभार्वोना है। ऐसा विनग[8] द्वा ा सा8ना की जा ही विर्वोत्तीय कविठनाइयों क े का ण होगा। श्री एफ़ क े शे र्वोानी को बताया गया विक सैद्धांधितक रूप से हस्ताक्षरि त स8झौते 8ें विनग[8] क े अध्यक्ष या प्रबं विनदेशक या उनक े द्वा ा नावि8त व्यविक्त द्वा ा 8ध्यस्थता का प्रार्वो ान है औ दोनों पक्षों क े संयुक्त अनु ो प पहले क े 8ध्यस्थ से 8ध्यस्थता को र्वोापस ले लिलया गया था। विर्वोचा -विर्वो8श; क े बाद यह विनण;य लिलया गया विक सीए8डी विर्वोर्वोाद का विनपर्टेा ा क सकते हैं। श्री शे र्वोानी ने अपनी सह8धित भी दे दी है विक सीए8डी 8ध्यस्थता क सकते हैं। सुनर्वोाई की ता ी\ 29.04.2010 को अप ाह्न 3 बजे विन ा;रि त की गई है।"

19. जैसा विक 21.10.2010 क े आदेश से दे\ा गया है, प्रधितर्वोादी ने कहा विक "र्वोे 8ा8ले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं औ उन्हें र्वोत;8ान एक8ात्र 8ध्यस्थ 8ें पू ा विर्वोश्वास है औ र्वोे चाहते हैं विक एक8ात्र 8ध्यस्थ 8ा8ले का फ ै सला क े औ जल्द से जल्द रि कॉड; प उपलब् दलीलों औ तथ्यों क े आ ा प विनण;य पारि त क े। जैसा विक इससे पहले बताया गया है, इस आशय से, श्री ा8 बी. साल्र्वोे, प्रत्यथA क े एक8ात्र 8ालिलक ने भी 21.10.2010 को एक पत्र विदया था। चूंविक दस्तार्वोेज गायब या अ ू े थे, इसलिलए दोनों पक्षों की उपस्थिस्थधित 8ें, 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने 17.08.2011 को अपने आदेश क े 8ाध्य[8] से फ ै सला विकया है विक कालानुक्रवि8क घर्टेनाओं का पता लगाने की आर्वोश्यकता है औ पुनर्निन8ा;ण की आर्वोश्यकता होगी औ दोनों पक्षों को सूधिचत क ते हुए एक विर्वोस्तृत आदेश पारि त विकया जाएगा। जैसा विक उस स8य तक 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की काय;र्वोाही से दे\ा गया, प्रधितर्वोादी ने स्र्वोेच्छा से भाग लिलया औ 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण क े स8क्ष काय;र्वोाही 8ें सह8धित व्यक्त की औ एक8ात्र 8ध्यस्थ 8ें विर्वोश्वास व्यक्त विकया। इस प्रका, स्र्वोेच्छा से 8ाध्यस्थ[8] की काय;र्वोाही 8ें भाग लेने क े बाद, प्रत्यथA ने अपीलाथA-विनग[8] को विदनांक 07.02.2013 का एक कानूनी नोविर्टेस भेजा, सिजस8ें कहा गया है विक 8ाध्यस्थ[8] की काय;र्वोाही 8ें, प्रत्यथA ने दार्वोे प स्प सह8धित व्यक्त की औ 3,90,81,602/- रुपये की ाथिश क े लिलए 8ा8ले का विनपर्टेा ा विकया गया औ बा -बा अनु ो क ने क े बार्वोजूद, प्रत्यथA को ाथिश का भुगतान नहीं विकया गया। प्रधितर्वोादी ने 3,90,81,602/- रुपये क े भुगतान की अपनी 8ांग दोह ाते हुए विदनांक 07.03.2013 को एक औ कानूनी नोविर्टेस भी भेजा। इसक े जर्वोाब 8ें, अपीलाथA- विनग[8] ने विदनांक 19.03.2013 को एक विर्वोस्तृत उत्त भेजा है।

20. इस पृष्ठभूवि8 8ें, प्रत्यथA ने एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े लिलए 8ध्यस्थता औ सुलह अधि विनय[8], 1996 की ा ा 11 औ ा ा 15 क े तहत 13.05.2015 को उच्च न्यायालय क े स8क्ष 8ध्यस्थता याधिचका दाय की है।जैसा विक पहले उल्ले\ विकया गया है, अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) की ा ा 4.20.[1] क े अनुसा पक्षका इस बात प सह8त विक अनुबं से संबस्थिन् त या उससे उत्पन्न होने र्वोाले सभी विर्वोर्वोाद औ 8तभेद एक8ात्र 8ध्यस्थता क े लिलए स्र्वोयं प्रबं विनदेशक या उनक े नावि8त व्यविक्तयों को संदर्णिभत विकए जाएंगे औ यह विक ऐसी विकसी विनयुविक्त प इस आ ा प कोई आपलित्त नहीं है विक इस प्रका विनयुक्त व्यविक्त विनग[8] का क[8];चा ी है औ उसने उस 8ा8ले प का;र्वोाई की है सिजससे संविर्वोदा संबंधि त है।जब पक्षका जानबूझक इस बात प सह8त हो जाते हैं विक विर्वोर्वोादों या 8तभेदों को एक8ात्र े लिलए स्र्वोयं प्रबं विनदेशक या उनक े द्वा ा नावि8त व्यविक्त को संदर्णिभत विकया जाएगा औ काफी स8य से 8ध्यस्थ क े स8क्ष 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही 8ें भाग लेने क े बाद, प्रत्यथA पीछे नहीं हर्टे सकता है औ एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त की 8ांग नहीं क सकता है।

21. प्रधितर्वोादी ने काफी स8य से 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण क े स8क्ष काय;र्वोाही 8ें भाग लिलया है औ एक8ात्र 8ध्यस्थ 8ें विर्वोश्वास व्यक्त विकया है, इसलिलए अपीलकता;- विनग[8] क े प्रबं विनदेशक की एक 8ात्र 8ध्यस्थ क े रूप 8ें विनयुविक्त को चुनौती देना उधिचत नहीं है। इंधिडयन ऑयल कॉ पो ेशन लिलवि8र्टेेड औ अन्य बना8 ाजा र्टे्रांसपोर्टे; प्राइर्वोेर्टे लिलवि8र्टेेड (2009) 8 एससीसी 520 8ें, इस न्यायालय ने विनम्नलिललि\त रूप 8ें विनण;य विदयाः- "34. यह तथ्य विक नावि8त 8ध्यस्थ पक्षका ों 8ें से एक का क[8];चा ी है, यह उसक े प्रधित पूर्वोा;ग्रह या पक्षपात या अपनी ओ से स्र्वोतंत्रता की क8ी की ा णा को बढ़ाने का एक र्वोास्तविर्वोक आ ा नहीं है। तथाविप, विकसी क[8];चा ी 8ध्यस्थ की स्र्वोतंत्रता या विनष्पक्षता क े बा े 8ें न्यायोधिचत आशंका हो सकती है, यविद ऐसा व्यविक्त प्राशनगत संविर्वोदा क े संबं 8ें विनयंत्रक या सम्बस्थिन् त प्राधि का ी था या यविद र्वोह उस अधि का ी क े प्रत्यक्ष अ ीनस्थ (जो विक विकसी अन्य विर्वोभाग 8ें अर्वो ैंक क े अधि का ी से अलग है) सिजसका विनण;य विर्वोर्वोाद का विर्वोषय है।

44. इस प्रश्न प विर्वोचा क ते स8य विक क्या विकसी नावि8त 8ध्यस्थ को संदर्णिभत क ने क े लिलए स8झौते 8ें विर्वोविहत 8ाध्यस्थ[8] प्रविक्रया को नज अंदाज विकया जा सकता है, यह भी ध्यान 8ें \ना आर्वोश्यक है विक अधि विनय[8] की ा ा 34 की उप- ा ा (2) क े ा ा (v) को भी ध्यान 8ें \ा जाए सिजस8ें यह प्रार्वो ान है विक न्यायालय द्वा ा कोई 8ाध्यस्थ[8] पंचार्टे द्द विकया जा सकता है यविद 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण सं चना या 8ाध्यस्थ[8] प्रविक्रया पक्षका ों क े क ा क े अनुसा नहीं हो (जब तक विक ऐसा क ा अधि विनय[8] क े भाग 1 क े विकसी उपबं क े विर्वो ो 8ें नहीं हो सिजसका पक्षका अर्वोहेलना नहीं क सकते, या, ऐसे क ा को असफल क ना अधि विनय[8] क े भाग 1 क े उपबं ों क े अनुसा नहीं था)। विर्वो ायी आशय यह है विक पक्षों को 8ध्यस्थता स8झौते की शत| का पालन क ना क ना चाविहए। [ े\ांविकत विकया गया]"

22. प्रत्यथA ने यह विद\ाने क े लिलए कोई तथ्य नहीं \ा है विक उसक े पास यह 8ानने का का ण है विक 8ध्यस्थ ने स्र्वोतंत्र या विनष्पक्ष रूप से काय; नहीं विकया था। प्रत्यथA ने इस आशंका को ग्रहण क ने क े लिलए ऐसे विकसी भी तथ्य को रि कॉड; प नहीं \ा है विक अपीलाथA-विनग[8] क े प्रबं विनदेशक क े स्र्वोतंत्र या विनष्पक्ष रूप से काय; क ने की संभार्वोना नहीं है। दूस ी ओ, जैसा विक पहले उल्ले\ विकया गया है, 8ाध्यस्थ[8] न्यायाधि क ण की काय;र्वोाही विदनांविकत 21.10.2010 क े अनुसा, प्रत्यथA ने एक8ात्र 8ध्यस्थ 8ें अपना पू ा विर्वोश्वास व्यक्त विकया था औ इस आशय का पत्र 21.10.2010 विदनांविकत भी विदया था। यह तथ्य विक एक8ात्र 8ध्यस्थ अपीलकता;-विनग[8] का प्रबं विनदेशक है, उसकी प्रधित पूर्वोा;ग्रह या उसकी त फ से स्र्वोतंत्रता की क8ी की ा णा को बढ़ाने का एक आ ा नहीं है। 8ाध्यस्थ8् \ंड अनुसूची-4 (सा8ान्य शतh) की ा ा 4.20.[1] एक उच्च अधि का ी का विन ा; ण क ता है अथा;त विनग[8] क े प्रबं विनदेशक जो ठेका या प्रधितर्वोादी द्वा ा विनष्पाविदत काय; से कोई संबं नहीं \ते है। पू ी 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही 8ें भाग लेने औ काय;र्वोाही 8ें सह8त होने क े बाद, प्रधितर्वोादी को 8ध्यस्थ की क्ष8ता को चुनौती देने से र्वोंधिचत विकया जाता है। प्रत्यथA द्वा ा एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त की 8ांग क ते हुए 8ध्यस्थता याधिचका दालि\ल क ना उधिचत नहीं था। क्या संशो न अधि विनय[8] की ा ा 12 क े आ ा प, प्रबं विनदेशक काय; क ने क े लिलए अपात्र हो गया है:-

23. 8ध्यस्थता औ सुलह अधि विनय[8], 2015 8ें संशो न क े बाद, \ंड 12 (5) एक पक्षका क े क[8];चा ी को 8ध्यस्थ बनने से प्रधितबंधि त क ती है।र्वोत;8ान 8ा8ले 8ें, पक्षका ों क े बीच स8झौता 28.01.2000 को विकया गया था औ 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही बहुत पहले 2009 8ें शुरू हुई थी औ इस प्रका, प्रधितर्वोादी 8ध्यस्थता औ सुलह (संशो न) अधि विनय[8], 2015 की ा ा 12 (5) का उपयोग नहीं क सकता है। अधि विनय[8] की ा ा 26 क े अनुसा, संशोधि त अधि विनय[8] 2015 क े प्रार्वो ान इस अधि विनय[8] क े लागू होने से पहले 8ूल अधि विनय[8] की \ंड 21 क े प्रार्वो ानों क े अनुसा शुरू की गई 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही प तब तक लागू नहीं होंगे जब तक विक पक्षका अन्यथा सह8त न हों।

24. भा तीय विक्रक े र्टे क ं र्टे्रोल बोड; बना8 कोधिच्च विक्रक े र्टे प्राइर्वोेर्टे लिलवि8र्टेेड औ अन्य, (2018) 6 एससीसी 287 8ें, इस न्यायालय ने अथिभविन ा;रि त विकया विक संशो न अधि विनय[8], 2015 (23.10.2015 से प्रभार्वोी) क े प्रार्वो ानों का पहले से शुरू हो चुकी 8ध्यस्थता काय;र्वोाविहयों 8ें पूर्वो;व्यापी संचालन नहीं हो सकता है जब तक विक पक्षका अन्यथा सह8त न हों। र्वोत;8ान 8ा8ले 8ें, यह सुझार्वो देने क े लिलए कोई आ ा नहीं है विक पक्षका इस बात प सह8त हो गए हैं विक नए अधि विनय[8] क े प्रार्वो ान 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही क े संबं 8ें लागू होंगे।

25. यह तक; देते हुए विक एक8ात्र 8ध्यस्थ/अध्यक्ष-सह-प्रबं विनदेशक, 2015 क े संशो न क े आ ा प, 8ध्यस्थ क े लिलए अपात्र हो गया है, प्रधितर्वोादी क े विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने र्टेीआ एफ लिलवि8र्टेेड बना8 एनेज इंजीविनयरिं ग प्रोजेक्ट्स लिलवि8र्टेेड (2017) 8 एससीसी 377 प विनभ; ता व्यक्त की है। उक्त 8ा8ले 8ें, हालांविक स8झौता/\ ीद आदेश विदनांक 10.05.2014 (संशो न से पहले) था, 8ध्यस्थता को लागू क ने क े लिलए नोविर्टेस 28.12.2015 को (संशो न अधि विनय[8] 2015 क े बाद) जा ी विकया गया था औ 8ध्यस्थ को नावि8त क ने क े लिलए प्रबं विनदेशक का पत्र विदनांक 27.01.2016 का है। 8ा8ले क े इस त ह क े तथ्यात्8क 8ैविर्टे्रक्स 8ें, इस न्यायालय ने विनण;य विदया है विक प्रधितर्वोादी का नावि8त 8ध्यस्थ-प्रबं विनदेशक कानूनी रूप से अयोग्य हो गया था औ इसलिलए, र्वोह विकसी अन्य व्यविक्त को 8ध्यस्थ क े रूप 8ें नावि8त नहीं क सकता है। अनुछेद “54. 8ें, यह विनम्नलिललि\त रूप 8ें अथिभविन ा;रि त विकया गयाः- - ऐसे संदभ; 8ें, विर्वोर्वोाद का आ ा यह हो सकता है की प्रबं विनदेशक जो की एक अपात्र 8ध्यस्थ हैं, एक ऐसे 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क सकते हैं जो अन्यथा पात्र औ एक सम्8ाविनत व्यविक्त है। जैसा विक पहले कहा गया है, ह[8] न तो विनष्पक्षतार्वोाद औ न ही व्यविक्तगत सम्8ान से चिंचधितत हैं। ह8ा ा स ोका क े र्वोल प्रबं विनदेशक क े अधि का या शविक्त से है। ह8ा े विर्वोश्लेषण क े अनुसा, ह[8] इस विनष्कष; प पहुंचने क े लिलए बाध्य हैं विक एक बा जब 8ध्यस्थ कानूनी रूप से अयोग्य हो जाता है, तो र्वोह एक अन्य 8ध्यस्थ को नावि8त नहीं क सकता है।8ध्यस्थ अधि विनय[8] की ा ा 12 (5) 8ें विनविहत विनय[8] क े अनुसा अयोग्य हो जाता है। यह कानून 8ें अकल्पनीय है विक कोई व्यविक्त जो कानूनी रूप से अयोग्य है, र्वोह विकसी व्यविक्त को नावि8त क सकता है। यह कहने की आर्वोश्यकता नहीं है विक एक बा बुविनयादी ढांचा ढहने क े बाद, अधि चना ढहने क े लिलए बाध्य है। विबना स्तंभ क े कोई इ8ा त नहीं हो सकती। या इसे अलग त ह से कहने क े लिलए, एक बा एक8ात्र 8ध्यस्थ क े रूप 8ें प्रबं विनदेशक की शविक्त स8ाप्त हो जाती है तो विकसी औ को 8ध्यस्थ क े रूप 8ें नावि8त क ने की शविक्त स8ाप्त हो जाती है। इसलिलए, उच्च न्यायालय द्वा ा व्यक्त विकया गया विर्वोचा ा णीय नहीं है औ ऐसा ह[8] कहते हैं। [ े\ांविकत विकया गया]"

26. उक्त 8ा8ले क े तथ्य हाथ 8ें लिलए गए 8ा8ले से पू ी त ह से थिभन्न हैं। उक्त 8ा8ले 8ें, 28.12.2015 को जब 8ध्यस्थता का आह्वान क ने र्वोाला नोविर्टेस जा ी विकया गया था, तो 23.10.2015 से संशो न अधि विनय[8], 2015 लागू होने क े बाद, सिजसक े आ ा प स8झौते 8ें नावि8त व्यविक्त 8ध्यस्थ क े लिलए अयोग्य हो गया था।इस 8ा8ले 8ें, 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही 2015 क े संशो न अधि विनय[8] क े लागू होने से बहुत पहले 2009 8ें शुरू हुई थी औ इसलिलए, 2015 संशो न अधि विनय[8] इस 8ा8ले 8ें लागू नहीं है।इस 8ा8ले को शासिसत क ने र्वोाले र्वोै ाविनक प्रार्वो ान र्वोे हैं जो संशो न अधि विनय[8] से पहले लागू थे।

27. अपने दृविtकोण को 8जबूत क ने क े लिलए, ह[8] अ ार्वोली पार्वो क ं पनी प्राइर्वोेर्टे लिलवि8र्टेेड बना8 ए ा इन्फ्रा इंजीविनयरिं ग लिलवि8र्टेेड (2017) 15 एससीसी 32 8ें अदालत क े इस विनण;य का उपयोग क सकते हैं। इस 8ा8ले 8ें, 8ध्यस्थता का आह्वान 29.07.2015 को विकया गया था औ 8ध्यस्थ की विनयुविक्त 19.08.2015 को की गई थी औ पक्षका 23.10.2015 से काफी पहले यानी सिजस ता ी\ को संशो न अधि विनय[8] लागू 8ाना गया था, 07.10.2015 को 8ध्यस्थ क े स8क्ष उपस्थिस्थत हुए थे। यह 8ाना गया विक इस विर्वोर्वोाद को विनयंवित्रत क ने र्वोाले र्वोै ाविनक प्रार्वो ान र्वोे हैं जो संशो न अधि विनय[8] से पहले लागू थे। इसलिलए इस न्यायालय ने विनदश विदया है विक 8ध्यस्थता, 19.08.2015 को 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े अनुस ण 8ें, कानून क े अनुसा आगे बढ़ेगी। क्या उच्च न्यायालय क ा क े अनुसा विनयुक्त 8ध्यस्थ क े अधि देश को स8ाप्त क ने 8ें सही थाः- -

28. विर्वोचा क े लिलए 8ुख्य सर्वोाल यह है विक क्या उच्च न्यायालय स8झौते क े अनुसा विनयुक्त 8ध्यस्थ क े आदेश को स8ाप्त क ने औ 8ध्यस्थता अधि विनय[8] की ा ा 11 (6) औ ा ा 15 क े तहत दाय आर्वोेदन 8ें एक स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क ने 8ें सही था। प्रत्यथA ने 07.02.2013 को अपीलकता; को 3.90,81,602/- रुपये का भुगतान क ने क े लिलए कानूनी नोविर्टेस जा ी विकया, यह आ ोप लगाते हुए विक उक्त ाथिश 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण क े स8क्ष काय;र्वोाही क े दौ ान तय की गई थी। 8ांग को दोह ाते हुए, प्रत्यथA ने 07.03.2013 को विफ से कानूनी नोविर्टेस भेजा है.लेविकन कोई पु स्का नहीं विदया गया।प्रत्यथA ने अपीलकता; औ प्रत्यथA क े बीच विर्वोर्वोादों औ 8तभेदों क े लिलए एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त की 8ांग क ते हुए 13.05.2015 को 1996 क े अधि विनय[8] की ा ा 11 औ 15 क े तहत आर्वोेदन दालि\ल विकया.

29. अपने तक; क े स8थ;न 8ें, प्रत्यथA क े विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने भा त संघ औ अन्य बना8 उत्त प्रदेश ाज्य पुल विनग[8] लिलवि8र्टेेड (2015) 2 एससीसी 52 क े विनण;य प भ ोसा विकया। प्रत्यथA क े विर्वोद्वत र्वोकील ने प्रधितर्वोाद विकया विक 8ध्यस्थ चा साल क े बाद भी काय;र्वोाही को स8ाप्त क ने 8ें विर्वोफल हा औ उच्च न्यायालय ने े बीच स8झौते 8ें 8ध्यस्थता \ंड से हर्टेक स्थानापन्न 8ध्यस्थ को उधिचत रूप से विनयुक्त विकया। कथिथत 8ा8ले 8ें, चूंविक 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने चा साल की अर्वोधि स8ाप्त होने क े बार्वोजूद पंचार्टे पारि त नहीं विकया, इसलिलए प्रधितर्वोादी ने अनु ो र्वोाद संख्या 10/2010 दाय विकया औ उच्च न्यायालय ने 9.03.2011 को आदेश पारि त विकया सिजस8ें 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण को तीन 8हीने की अर्वोधि क े भीत 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही को पू ा क ने का अंधित[8] 8ौका विदया गया। फ ै सले क े अनुछेद (6) 8ें, इस न्यायालय ने बताया विक उच्च न्यायालय ने 25.03.2011 औ 25.06.2011 क े बीच न्यायाधि क ण द्वा ा तय की गई विर्वोथिभन्न ता ी\ों औ सुनर्वोाई प ध्यान विदया औ विनष्कष; विनकाला विक 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही 8ें हुई दे ी जानबूझक की गई थी। इसक े बाद भा त संघ बना8 सिंसह विबल्डस; सिंसधिडक े र्टे (2009) 4 एससीसी 523 औ अन्य फ ै सलों 8ें क े संदभ; 8ें इस न्यायालय ने कहा विक 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण 8ें दे ी औ बा -बा होने र्वोाले परि र्वोत;न 8ध्यस्थता की प्रविक्रया को विर्वोफल क ते हैं औ इसलिलए, 8ध्यस्थता \ंड से अलग अदालत द्वा ा अपनी पसंद क े 8ध्यस्थ की विनयुविक्त कानून की एक स्र्वोीकाय; प्रस्तार्वो बन गई है सिजसे कानूनी सिसद्धांत कहा जा सकता है जो इस न्यायालय क े विनण;यों की एक श्रृं\ला द्वा ा स्थाविपत विकया गया है। उक्त 8ा8ले क े तथ्यों को ध्यान 8ें \ते हुए, यह दे\ते हुए विक 8ाध्यस्थ[8] काय;र्वोाविहयों 8ें विर्वोलंब जानबूझक विकया गया था, उत्त प्रदेश ाज्य पुल विनग[8] लिलवि8र्टेेड क े अनुछेद (6) क े अनुसा, विनम्नलिललि\त रूप 8ें अथिभविन ा;रि त विकया गयाः- “6. उच्च न्यायालय ने अधि क ण द्वा ा 25-3-2011 औ 25-6-2011 क े बीच तय की गई सुनर्वोाई की विर्वोथिभन्न ता ी\ों प ध्यान विदया औ इस विनष्कष; प पहुंचा विक 8ध्यस्थता की काय;र्वोाही 8ें जानबूझक दे ी की गई थी। इतना ही नहीं, 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण क े सदस्य 2007 से 8ा8ले को विनपर्टेाने 8ें दे ी क ने की णनीधित अपना हे थे औ इस प्रविक्रया 8ें चा साल बीत चुक े थे। अधि क ण को तीन 8हीने क े भीत 8ा8ले को स8ाप्त क ने क े लिलए विर्वोथिशt विनदश देने क े बाद भी चूक गया औ लंबे स्थगन विदए गए थे, सिजससे उच्च न्यायालय क े विर्वोथिशt विनदशों का उल्लंघन हुआ। अधि क ण क े सदस्यों क े इस र्वोैये को विकसी भी कानून क े लिलए या उच्च न्यायालय क े आदेशों क े लिलए कोई गंभी ता नहीं होने क े साथ अपने कत;व्यों क े प्रधित लाप र्वोाही ब तने क े लिलए, उच्च न्यायालय ने यहां प्रत्यथA की याधिचका को अनु8धित दी औ स्र्वोयं न्यायालय द्वा ा एक8ात्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े साथ न्यायाधि क ण क े आदेश को द्द क विदया।"

30. र्वोत;8ान 8ा8ले क े तथ्यात्8क 8ैविर्टे्रक्स को ध्यान 8ें \ते हुए, ह8ा े सुविर्वोचारि त दृविtकोण 8ें, कथिथत विनण;य का अनुपात र्वोत;8ान 8ा8ले प लागू नहीं विकया जा सकता है। इसक े विर्वोप ीत, र्वोत;8ान 8ा8ले 8ें, 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की काय;र्वोाही 17.08.2011 तक जा ी ही। 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की विदनांक 17.08.2011 की काय;र्वोाही से यह दे\ा गया है विक, “8ध्यस्थ ने कहा विक 8ध्यस्थता से संबंधि त पत्रार्वोली से छेड़छाड़/दस्तार्वोेज़ गायब या अ ू ी प्रतीत होती है औ इसलिलए, कालानुक्रवि8क घर्टेनाओं का पता लगाने औ पुनर्निन8ा;ण की आर्वोश्यकता होगी।” इस पृष्ठभूवि8 8ें पंचार्टे 2013 तक पारि त नहीं विकया गया था। यह सही है विक पंचार्टे देने 8ें क ु छ दे ी हुई। हालांविक, 2011 औ 2013 क े बीच, प्रत्यथA ने काय;र्वोाही 8ें तेजी लाने औ पंचार्टे पारि त क ने क े लिलए कोई आर्वोेदन दाय नहीं विकया है।प्रत्यथA ने न तो शीघ्र विनण;य पारि त क ने क े लिलए अनु ो 8ा8ला दाय विकया है औ न ही 8ध्यस्थता क े अधि देश की स8ाविप्त क े लिलए अधि विनय[8] की \ंड 14 क े तहत याधिचका दाय की है विक 8ध्यस्थ 'विबना अनार्वोश्यक विर्वोलंब क े काय; क ने 8ें विर्वोफल हा है'.

31. पक्षका ों द्वा ा सह8त शत| से हर्टेक विकसी अन्य 8ध्यस्थ को विनयुक्त क ने का आ ा क े र्वोल विकसी 8ध्यस्थ द्वा ा काय; क ने 8ें लाप र्वोाही या पंचार्टे को पारि त क ने 8ें विर्वोलंब नहीं हो सकता है। ह[8] उपयोगी रूप से सेल ऑन आर्निबर्टे्रेशन क े 20 र्वोें संस्क ण का संदभ; ले सकते हैं जो इस प्रका हैः "क े र्वोल एक 8ध्यस्थ की काय; क ने की उपेक्षा, इनका या अस8थ;ता से अलग है, औ अपने आप 8ें अदालत को उसक े स्थान प विकसी अन्य 8ध्यस्थ को विनयुक्त क ने की शविक्त नहीं देता है। हालाँविक, यह अदालत को उसे हर्टेाने की शविक्त देता है, जहाँ उसे बदलने की शविक्त होती है।[ सेल ऑन आर्निबर्टे्रेशन क े 20 र्वोें संस्क ण, पृष्ठ 136, 8ध्यस्थता औ सुलह से संबंधि त कानून 8ें उद्धृत, 9 र्वोां संस्क ण, द्वा ा डॉ. पी.सी. 8ाक; ण्डा पृष्ठ 620]

32. \ंड 15 अधि देश की स8ाविप्त औ 8ध्यस्थ क े प्रधितस्थापन से संबंधि त है।\ंड 15 क े उप-\ंड (1) 8ें कहा गया है विक अधि विनय[8] की \ंड 13 औ 14 8ें उसिल्ललि\त परि स्थिस्थधितयों क े अलार्वोा, विकसी 8ध्यस्थ का अधि देश स8ाप्त हो जाएगा जहां र्वोह विकसी भी का ण से या पार्निर्टेयों क े स8झौते क े अनुसा काया;लय हर्टे जाता है। उप- ा ा (2) क े संदभ; 8ें, 8ध्यस्थ क े अधि देश की स8ाविप्त क े बाद, स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त उस 8ध्यस्थ की विनयुविक्त प लागू विनय8ों क े अनुसा होगी सिजसे प्रधितस्थाविपत विकया जा हा है।

33. एस. एस. बी. पी. औ क ं पनी बना8 पर्टेेल इंजीविनयरिं ग लिलवि8र्टेेड औ एक अन्य (2009) 10 एस. सी. सी. 293 8ें ा ा 11, 14 औ 15 क े प्रयोजन क े विर्वोश्लेषण क े पश्चात् इस न्यायालय ने अथिभविन ा;रि त विकया विक विर्वो ान8ंडल ने 8ध्यस्थों की विनयुविक्त क े 8ा8ले 8ें पक्षका ों क े बीच क ा की शत| औ ऐसी े लिलए अपनाई जाने र्वोाली प्रविक्रया क े पालन की आर्वोश्यकता प बा -बा जो विदया है।पै ा (31) 8ें, यह विनम्नलिललि\त रूप 8ें अथिभविन ा;रि त विकया गयाः- "31. यहां तक विक स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त को विर्वोविनयवि8त क ने र्वोाली \ंड 15 (2) 8ें यह अपेक्षा की गई है विक ऐसी विनयुविक्त उन विनय8ों क े अनुसा की जाएगी जो 8ूल 8ध्यस्थ की विनयुविक्त प लागू होते हैं। इस उप ा ा 8ें प्रयुक्त 'विनय8' शब्द सांविर्वोधि क विनय8ों या प्रत्यायोसिजत विर्वो ान की शविक्त का प्रयोग क ते हुए सक्ष[8] प्राधि का ी द्वा ा बनाए गए विनय8ों तक ही सीवि8त नहीं है बस्थिल्क इस8ें पक्षका ों क े बीच विकए गए क ा क े विनबं न भी शावि8ल हैं।"

34. यशविर्वोद क ं स्र्टे्रक्शन्स (पी) लिलवि8र्टेेड बना8 सिंसप्लेक्स क ं क्रीर्टे पाइल्स इंधिडया लिलवि8र्टेेड औ एक अन्य (2006) 6 एससीसी 204, 8ें उच्चत[8] न्यायालय से अधि विनय[8] की \ंड 15 क े दाय े की इस तथ्य की पृष्ठभूवि8 8ें जांच क ने क े लिलए विनर्वोेदन विकया गया था विक प्रत्यथA क ं पनी क े प्रबं विनदेशक द्वा ा विनयुक्त 8ध्यस्थ क े इस्तीफ े क े बाद, उसक े द्वा ा 8ध्यस्थता स8झौते क े अनुसा एक औ 8ध्यस्थ विनयुक्त विकया गया था। उस स्त प, याधिचकाकता; ने अधि विनय[8] की \ंड 11(5) क े साथ पविठत \ंड 15(2) क े तहत एक आर्वोेदन दालि\ल विकया, सिजस8ें अनु ो विकया गया विक पक्षका ों क े बीच विर्वोर्वोाद को स8ाप्त क ने क े लिलए स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क ें । उक्त आर्वोेदन को 8ुख्य न्याया ीश द्वा ा यह अथिभविन ा;रि त क ते हुए \ारि ज क विदया गया था विक \ंड 15 (2) न क े र्वोल 8ध्यस्थों की विनयुविक्त को विर्वोविनयवि8त क ने क े लिलए बनाए गए कानूनी विनय8ों का उल्ले\ क ती है बस्थिल्क ऐसी े लिलए संविर्वोदात्8क प्रार्वो ानों का भी उल्ले\ क ती है जो 8ुख्य न्याया ीश द्वा ा अपनाए गए दृविtकोण को ब क ा \ते हैं। अनुछेद (4) 8ें, यह विनम्नलिललि\त रूप 8ें अथिभविन ा;रि त विकया गयाः- "4........विकसी भी का ण से विकसी 8ध्यस्थ को काया;लय से हर्टेाना अधि विनय[8] की \ंड 15 (1) (ए) क े दाय े 8ें है। इसलिलए, \ंड 15 (2) क े अनुसा बदले जाने र्वोाले 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े लिलए लागू विनय8ों क े अनुसा एक स्थानापन्न 8ध्यस्थ विनयुक्त की जाएगी । इसलिलए, जो ा ा 15(2) का प्रार्वो ान है र्वोह यह है की प्रधितस्थाविपत 8ध्यस्थ की विनयुविक्त या 8ध्यस्थ की जगह विकसी अन्य की प्रधितस्थापना 8ूल 8ध्यस्थ की विनयुविक्त प लागू होने र्वोाले विनय8ों क े अनुसा है। ा ा 15(2) 8ें शब्द "विनय8" स्पt रूप से 8ध्यस्थता स8झौते 8ें विनविहत विनयुविक्त क े प्रार्वो ान को संदर्णिभत क ता है या विकसी संस्थान का कोई विनय[8] सिजसक े तहत विर्वोर्वोादों को े लिलए भेजा गया था। 8ध्यस्थता स8झौते क े अनुसा संबंधि त पक्ष की ओ से अधि विनय[8] की ा ा 11 क े संदभ; 8ें अपने दाधियत्र्वो को पू ा क ने 8ें ऐसी कोई विर्वोफलता नहीं थी की एक स्थानापन्न 8ध्यस्थविनयुविक्त क े लिलए अधि विनय[8] की ा ा 11(6) क े तहत 8ुख्य न्याया ीश क े अधि का क्षेत्र को आकर्निषत विकया जाये। जाविह है, अधि विनय[8] की \ंड 11 (6) क े र्वोल तभी लागू होती है जब कोई पक्ष या संबंधि त व्यविक्त 8ध्यस्थता स8झौते क े संदभ; 8ें काय; क ने 8ें विर्वोफल हा हो।जब \ंड 15 (2) कहता है विक स्थानापन्न 8ध्यस्थ को उन विनय8ों क े अनुसा विनयुक्त विकया जा सकता है जो 8ूल रूप से 8ध्यस्थ की विनयुविक्त क े लिलए लागू थे, तो यह विकसी भी र्वोै ाविनक विनय[8] या विकसी अधि विनय[8] या योजना क े तहत बनाए गए विकसी भी विनय[8] तक सीवि8त नहीं है। इसका 8तलब क े र्वोल यह है विक स्थानापन्न 8ध्यस्थ की विनयुविक्त 8ूल स8झौते या प्रा ंथिभक च ण 8ें 8ध्यस्थ की े लिलए लागू प्रार्वो ान क े अनुसा की जानी चाविहए। [ े\ांविकत विकया गया]" जैसा विक यशविर्वोद क ं स्र्टे्रक्शंस 8ें अथिभविन ा;रि त विकया गया है, अधि विनय[8] की \ंड 11 (6) क े र्वोल तभी लागू होगी जब संबंधि त पक्ष की ओ से 8ध्यस्थता स8झौते क े संदभ; 8ें एक 8ध्यस्थ विनयुक्त क ने 8ें विर्वोफलता होगी। इस 8ा8ले 8ें, ह8ा े विर्वोचा 8ें, े बीच स8झौते की शत| को ध्यान 8ें \े विबना उच्च न्यायालय द्वा ा एक स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ की विनयुविक्त सही नहीं है, इसलिलए स्र्वोतंत्र 8ध्यस्थ/सेर्वोाविनर्वोृत्त सिजला न्याया ीश की विनयुविक्त का आदेश उधिचत नहीं है।

35. प्रधितर्वोादी-ठेक े दा क े लिलए उपाय - विर्वोचा क े लिलए अगला प्रश्न यह है की क्या 8ध्यस्थ द्वा ा पारि त विकया गया पंचार्टे विदनांविकत 21.01. 2016 उधिचत है? जैसा विक पहले चचा; की गई थी, 17.08.2011 क े बाद 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण प्रगधित नहीं क सका औ 17.08.2011 को 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की काय;र्वोाही क े अनुसा, 8ध्यस्थ ने कहा विक “…...गायब कागजात अ ू े हैं अ ू ा…... कालानुक्रवि8क घर्टेनाओं का पता लगाने की जरू त है औ पुनग;ठन की आर्वोश्यकता होगी..."। जैसा विक पहले बताया गया है, प्रत्यथA ने 13. 05. 2015 को उच्च न्यायालय क े स8क्ष 1996 क े अधि विनय[8] की ा ा 11 औ 15 क े तहत आर्वोेदन दालि\ल विकया। विदनांक 18.12.2015 की 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की काय;र्वोाही क े अनुसा, उच्च न्यायालय क े स8क्ष प्रस्तुत 8ध्यस्थता आर्वोेदन को न्यायाधि क ण क े संज्ञान 8ें लाया गया औ इसे दज; विकया गया। 05-01-2016 को, प्रधितर्वोादी ने प्रास्थगन की काय;र्वोाही को स्थविगत \ने क े लिलए प्राथ;ना की औ 8ा8ले को 13.01.2016 क े लिलए स्थविगत क विदया गया।8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने 13.01.2016 को एक विर्वोस्तृत आदेश पारि त विकया सिजस8ें कहा गया था विक यह 8ा8ला क ु छ स8य से लंविबत है औ उपलब् तथ्यों औ दलीलों क े आ ा प, 8ा8लों को अंधित[8] रूप विदया जाएगा औ 8ा8ले को 21.01.2016 क े लिलए स्थविगत क विदया। उपलब् तथ्यों क े आ ा प, 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण ने 21.01.2016 को दार्वोेदा क े दार्वोों क े संबं 8ें क्र[8] संख्या 3,[4] औ 9 8ें क्र8शः 1,38,000/- रुपये, 83,000/- रुपये औ 1,97,110/- रुपये की ाथिश प्रदान क ते हुए अंधित[8] पंचार्टे पारि त विकया औ अन्य दार्वोों क े संबं 8ें प्रधितर्वोादी क े दार्वोों को \ारि ज क विदया।जहां तक क्र[8] संख्या 17 क े संबं 8ें अपीलाथA-विनग[8] क े प्रधित-दार्वोे का संबं है, 8ध्यस्थ ने रु. 58,39,018/- की ाथिश अधि विनणAत की।

36. चूंविक उच्च न्यायालय 8ा8ले की सुनर्वोाई क हा था, इसलिलए 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण प्रत्यथA को अपना 8ा8ला \ने क े लिलए औ अर्वोस दे सकता था। 8ध्यस्थ न्यायाधि क ण की काय;र्वोाही 2009 से 2015 तक काफी स8य से लंविबत थी औ प्रत्यथA द्वा ा 8ई, 2015 8ें उच्च न्यायालय का द र्वोाजा \र्टे\र्टेाने क े बाद, ऐसा प्रतीत होता है विक 8ध्यस्थ ने जल्दबाजी 8ें पंचार्टे पारि त क विदया था। यह ध्यान देने योग्य है विक प्रत्यथA बा -बा 05.01.2016,13.01.2016 को स्थगन क े लिलए प्राथ;ना क हा था औ 21.01.2016 को अंधित[8] पंचार्टे क े पारि त होने की ता ी\ प उपस्थिस्थत नहीं था। जैसा विक पहले बताया गया है, 17.08.2011 की काय;र्वोाही 8ें यह उल्ले\ विकया गया था विक कालानुक्रवि8क घर्टेनाओं का पता लगाने की आर्वोश्यकता है औ पुनर्निन8ा;ण की आर्वोश्यकता होगी।यह ज्ञात नहीं है विक 21.01.2016 को अंधित[8] अधि विनण;य पारि त क ने से पहले इसका पता लगाया गया था या नहीं औ क्या पुनर्निन8ा;ण विकया गया था? प्रधितर्वोादी ने विर्वोथिभन्न शीष| क े तहत कई दार्वोे विकए हैं। प्रधितर्वोादी को विर्वोथिभन्न शीष| क े तहत अपने दार्वोे को साविबत क ने का अर्वोस विदया जाना चाविहए। पक्षका ों क े बीच पूण; न्याय क ने क े लिलए औ भा त क े संविर्वो ान क े अनुच्छेद 142 क े तहत शविक्तयों का प्रयोग क ते हुए विदनांक 21.01.2016 क े अधि विनण;य को द्द विकया जाना है।

37. भा त क े संविर्वो ान क े अ ीन शविक्त का प्रयोग क ते हुए, यह न्यायालय क े लिलए \ुला है विक र्वोह पक्षका ों क े विहतों की क्षा क क े ाहत प्रदान क े। ऐसे 8ा8लों 8ें सर्वो परि ध्यान यह सुविनधिश्चत क ने प होना चाविहए विक कोई अन्याय न हो। ाज क ु 8ा औ अन्य बना8 भा त संघ औ एक अन्य (2006) 1 एससीसी 737 8ें, इस न्यायालय ने विनम्नलिललि\त रूप 8ें विनण;य विदयाः- - “19....संविर्वो ान क े \ंड 142 क े तहत ह8ा ी शविक्तयों का उपयोग क ते हुए, कार्नि8कों क े एक र्वोग; को पूण; न्याय विदलाने क े लिलए, सिजन्हें अन्यथा एक अन्यायपूण; स्थिस्थधित 8ें \ा जाएगा, सिजसक े लिलए प्राधि का ी भी आंथिशक रूप से दोषी हैं। यह न्यायालय क े लिलए \ुला है विक र्वोह कानून की घोषणा क ते स8य भी पक्षका ों क े विहतों की क्षा क क े ाहत प्रदान क सकता है। ऐसे 8ा8लों 8ें सर्वो परि ध्यान यह सुविनधिश्चत क ने प होना चाविहए विक कोई अन्याय न हो।"

38. अनुच्छेद 142 (1) 8ें संलग्न "पूण; न्याय" र्वोाक्यांश लोच से आच्छाविदत विर्वोस्तृत अथ; र्वोाला शब्द है जो 8ानर्वोीय बुधिद्ध8त्ता द्वा ा बनने र्वोाली असंख्य स्थिस्थधितयों 8ें उपयोग क े लिलए औ या संविर्वो ान क े अनुच्छेद 32, 136 औ 141 क े तहत घोविषत संविर्वोधि कानून या कानून क े संचालन क े परि णा8 से उत्पन्न हुई है। संविर्वो ान.(दे\ें - अशोक क ु 8ा गुप्ता औ अन्य बना8 यू. पी. ाज्य औ अन्य (1997) 5 एस. सी. सी. 201) र्वोत;8ान 8ा8ले 8ें, अधि विनय[8] की \ंड 34 क े तहत पंचार्टे को चुनौती देने क े लिलए प्रत्यथA को कहना, पक्षका ों क े बीच 8ुकद8ेबाजी को औ अधि क बढ़ाएगा। 8ा8ले क े तथ्यों प विर्वोचा क ते हुए औ पक्षों क े बीच पूण; न्याय क ने क े लिलए, संविर्वो ान क े तहत शविक्त का उपयोग क ते हुए, 21.01.2016 क े अधि विनण;य को द्द विकया जाता है।

39. इसक े परि णा8स्र्वोरूप, उच्च न्यायालय क े विदनांक 22.04.2016 क े आक्षेविपत आदेश को द्द क विदया जाता है औ यह अपील स्र्वोीका की जाती है।अपीलकता;- ाजस्थान लघु उद्योग विनग[8] लिलवि8र्टेेड का र्वोत;8ान प्रबं विनदेशक एक8ात्र 8ध्यस्थ होगा औ प्रबं विनदेशक को 8ा8ले को लेने औ काय;र्वोाही जा ी \ने औ दोनों पक्षों को आगे सबूत पेश क ने औ 8ौलि\क प्रस्तुधितयां देने क े लिलए पया;प्त अर्वोस प्रदान क क े चा 8हीने की अर्वोधि क े भीत अंधित[8] विनण;य पारि त क ने का विनदश विदया जाता है। यह स्पt विकया जाता है विक 8ध्यस्थ उच्च न्यायालय द्वा ा व्यक्त विकसी भी विर्वोचा से प्रभाविर्वोत न हो। न्याया ीश [आ. बानु8थिथ] न्याया ीश [इंविद ा बनजA] नई विदल्ली। 23 जनर्वो ी, 2019 यह अनुर्वोाद आर्निर्टेविफथिशयल इंर्टेेलिलजेंस र्टेूल 'सुर्वोास' क े जरि ए अनुर्वोादक की सहायता से विकया गया है। अस्र्वोीक ण: यह विनण;य र्वोादी क े प्रधितबंधि त उपयोग क े लिलए उसकी भाषा 8ें स8झाने क े लिलए स्थानीय भाषा 8ें अनुर्वोाविदत विकया गया है औ विकसी अन्य उद्देश्य क े लिलए इसका उपयोग नहीं विकया जा सकता है। सभी व्यार्वोहारि क औ आधि कारि क उद्देश्यों क े लिलए, विनण;य का अंग्रेजी संस्क ण प्रा8ाथिणक होगा औ विनष्पादन औ काया;न्र्वोयन क े उद्देश्य से अंग्रेजी संस्क ण ही 8ान्य होगा।