Rajasthan State Khel Parishad v. Uma Dadheech

Supreme Court of India · 21 Jan 2019
D. Y. Chandrachud; Hemant Gupta
Civil Appeal No 883 of 2019 @ SLP (C) No 492 of 2017
service_law appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that promotion criteria prescribed by service rules apply prospectively and cannot be retrospectively applied to vacancies arising before the rules came into force, allowing the appeal and setting aside the High Court order.

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रिपोर्टेबल
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
सिविल अपीलीय क्षेत्राधिकार
सिविल अपील संख्या 883/2019
(एस एल पी (सी) संख्या 492/2017 से उत्पन्न)
राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद और अन्य - अपीलार्थी (गण)
बनाम
श्रीमति उमा दधीच और अन्य - प्रतिवादी (गण)
निर्णय
डॉ धनंजय वाई. चंद्रचूड़, न्यायाधीश
अनुमति दी गई।
प्रतिवादी संख्या 1 को 20 मार्च 1986 को राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद क

अधीन कोच ग्रेड-III क
े पद पर नियुक्त किया गया था। इसक
े बाद उन्हें 22 फरवरी
1990 को कोच ग्रेड-II और 10 जनवरी 1997 को कोच ग्रेड-I क
े रूप में पदोन्नत
किया गया। 27 फरवरी, 2009 को नौ व्यक्तियों को कोच ग्रेड-1 क
े पद से खेल
अधिकारी क
े पद पर पदोन्नत किया गया। प्रत्यर्थी नं. 1 ने वर्ष 2003-2004 में होने
वाली रिक्तियों क
े लिए प्रत्यर्थी नं. 2 को पदोन्नत करने क
े अपीलकर्ता क
े निर्णय क

विरुद्ध उच्च न्यायालय क
े समक्ष एक रिट याचिका संस्थित की।
विद्वत एकल न्यायाधीश ने 1 अप्रैल 2015 क
े एक आदेश द्वारा रिट याचिका
को खारिज कर दिया। अपील में, उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने विद्वान एकल
न्यायाधीश क
े फ
ै सले को उलट दिया।
विद्वान एकल न्यायाधीश क
े फ
ै सले को पलटते हुए, उच्च न्यायालय ने
निम्नलिखित टिप्पणी की हैः
“इसमें कोई विवाद नहीं है कि खेल अधिकारी क
े पद पर
पदोन्नति क
े लिए वरिष्ठता-सह-योग्यता और योग्यता का
मानदंड राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद सेवा नियम, 2006
द्वारा लागू किया गया था। किंतु वर्ष 2006 में तय किए गए
मानदंडों को उपरोक्त नियमों क
े लागू होने से पहले हुई रिक्ति

े लिए लागू नहीं किया जा सकता था।"
यह वह निष्कर्ष है जो उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ द्वारा 2003-2004 की रिक्तियों

े लिए प्रासंगिक समय पर लागू मानदंडों को अपनाते हुए खेल अधिकारी क
े रूप में
े लिए प्रत्यर्थी नं. 1 क
े मामले पर पुनर्विचार करने क
े लिए जारी किए गए
अंतिम निर्देश का आधार बनाता है।
तथ्यों क
े विवरण को पूर्ण करते हुए, यह ध्यान देना आवश्यक होगा कि वर्ष
2006 से पहले खेल अधिकारी क
े पद पर पदोन्नति क
े लिए पूर्व मानदंड वरिष्ठता था।
इसक
े बाद, मानदंड को वरिष्ठता-सह-योग्यता और योग्यता में बदल दिया गया। उच्च
न्यायालय ने इस आधार पर कार्यवाही की, कि 2006 में प्रचलित मानदंड पूर्व
रिक्तियों पर लागू नहीं किया जा सकता था।
अपीलकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत किए गए निवेदन की महत्ता यह है कि
प्रतिवादी क
े पास पदोन्नति का कोई निहित अधिकार नहीं था, लेकिन क
े वल नियमों

े अनुसार विचार किए जाने का अधिकार था जो उस तारीख को मौजूद थे जब
े लिए मामले को उठाया गया था। इस न्यायालय क
े कई निर्णयों में इस
सिद्धान्त को दोहराया गया है। (देखें- एच. एस. ग्रेवाल बनाम भारत संघ- (1997)
11 एससीसी 758; दीपक अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश-(2011) 6 एससीसी 725;
और त्रिपुरा राज्य बनाम अन्य निखिल रंजन चक्रवर्ती-(2017) 3 एससीसी 646;
और भारत संघ और अन्य बनाम क
ृ ष्ण क
ु मार और अन्य -सीए @एसएलपी (सी)
2014 की संख्या 26541, जिसे 14 जनवरी, 2019 को तय किया गया था।)
वाई वी. रंगैया बनाम श्रीनिवास राव (1983) 3 एससीसी 284) वाले मामले
में दिए गए निर्णय में ऐसी स्थिति क
े बारे में चर्चा की गई थी जहां नियमों क
े अनुसार
पदोन्नति संबंधी कार्य सुसंगत वर्ष क
े भीतर पूरा किया जाना आवश्यक था। रंगैया का
मामला (उपर्युक्त) इसलिए उपरोक्त निर्णयों से अलग है।
राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद सेवा नियम, 2006 का नियम 9 (4), जिस
पर अपीलकर्ता की ओर से भरोसा किया गया है, यह संक
े त नहीं देता है कि रिक्तियों
को उन नियमों क
े आधार पर भरा जाना चाहिए जो उस वर्ष में प्रचलित हैं, जिसमें वे
उत्पन्न हुई हैं।
नियम 9 (4) निम्नलिखित शब्दों में हैः- -
"नियुक्ति प्राधिकारी उन पूर्ववर्ती वर्षों की वर्षवार रिक्तियों का
निर्धारण करेगा जिन्हें पदोन्नति द्वारा भरा जाना अपेक्षित था, यदि ऐसी रिक्तियों को निर्धारित नहीं किया गया था और उन्हें
उस वर्ष में नहीं भरा गया था जिसमें उन्हें भरा जाना अपेक्षित
था।"
इस मामले को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय द्वारा जारी किया गया निर्देश उचित
नहीं है।
हालांकि, हम स्पष्ट करते हैं कि यदि प्रत्यर्थी नं. 1 को नियमित रूप से पदोन्नत किया
गया है, तो यह आदेश उस पदोन्नति क
े गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेगा ।
तदनुसार, अपील की अनुमति दी जाती है। उच्च न्यायालय क
े आक्षेपित निर्णय
को रद्द किया जाता है।
खर्चे क
े बारे में कोई आदेश नहीं दिया जाता है ।
न्यायाधीश (डॉ. धनंजय वाई चंद्रचूड़)
न्यायाधीश (हेमंत गुप्ता)
नई दिल्ली
21 जनवरी, 2019
यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास' क
े जरिए अनुवादक की सहायता
से किया गया है।
अस्वीकरण: यह निर्णय वादी क
े प्रतिबंधित उपयोग क
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े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क
े लिए
इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों

े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन

े उद्देश्य से अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
JUDGMENT