Rajasthan State v. Gram Vikas Samiti, Shivdaspura

Supreme Court of India · 07 Jan 2019
Abhay Manohar Sapre; Indu Malhotra
Civil Appeal No 3505 of 2009
civil appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court set aside the High Court's summary dismissal of a second appeal concerning disputed land ownership and remanded the case for fresh adjudication on substantial questions of law under Section 100 CPC.

Full Text
Translation output
रिपोर्टेबल
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
सिविल अपील संख्या 3505/2009
राजस्थान राज्य और अन्य ......अपीलकर्ता (ओं)
बनाम
ग्राम विकास समिति, शिवदासपुरा ...प्रतिवादी (ओं)
निर्णय
अभय मनोहर सप्रे, न्यायाधीश
JUDGMENT

1. यह अपील एस. बी. सिविल रेगुलर द्वितीय अपील संख्या 186/2007 में राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर की पीठ द्वारा दिनांक 20.04.2007 को पारित अंतिम निर्णय और आदेश क े खिलाफ निर्देशित है, जिसमें उच्च न्यायालय क े एकल न्यायाधीश ने यहां अपीलकर्ताओं द्वारा दायर दूसरी अपील को खारिज कर दिया और नियमित दीवानी याचिका संख्या 37/2003 में प्रथम अपील न्यायालय क े द्वारा पारित दिनांक 15.07.2006 क े आदेश की पुष्टि की।

2. इस अपील क े निपटान क े लिए क ु छ तथ्यों का उल्लेख करने की आवश्यकता है।

3. मूल सिविल प्रकरण, जिससे यह अपील उत्पन्न हुई है, उसमें अपीलार्थी राज्य और उसक े प्राधिकारी प्रतिवादीगण हैं जबकि प्रत्यर्थी वादी है।

4. सोसायटी होने का दावा करने वाले प्रतिवादी ने विवादित भूमि क े संबंध में राज्य और उसक े प्राधिकारियों क े खिलाफ एक सिविल मुकदमा दायर किया। मुकदमा अपीलार्थियों (प्रतिवादियों) को विवादित भूमि पर प्रत्यर्थी (वादी) क े कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोकने क े लिए स्थायी व्यादेश की राहत प्रदान करने क े लिए था। इसका अपीलकर्ताओं (प्रतिवादियों) द्वारा विरोध किया गया था।

5. विचारण न्यायालय ने सिविल मुकदमा संख्या 38/2000 में दिनांक 26.09.2002 क े निर्णय/डिक्री द्वारा मुकदमा की डिक्री किया और विवादित भूमि क े संबंध में प्रतिवादी (वादी) और अपीलार्थियों (प्रतिवादी) क े विरुद्ध स्थायी व्यादेश मंजूर किया। प्रतिवादी (राज्य) ने व्यथित महसूस किया और नियमित दीवानी याचिका संख्या 37/2003 क े रुप में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, जयपुर क े समक्ष पहली अपील दायर की। दिनांक 15.07.2006 क े निर्णय द्वारा, प्रथम अपील न्यायालय ने राज्य की अपील को खारिज कर दिया और उच्च न्यायालय क े समक्ष राज्य द्वारा दूसरी अपील दायर करने पर, जिसने विचारण न्यायालय क े निर्णय और डिक्री की पुष्टि की।

6. आक्षेपित आदेश द्वारा उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित करते हुए राज्य की अपील को खारिज कर दिया कि अपील में विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतर्वलित नहीं है और इसलिए आक्षेपित आदेश क े विरुद्ध इस न्यायालय में राज्य द्वारा विशेष अनुमति द्वारा यह अपील की गई है।

7. पक्षकारों की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ। हमने मामले क े रिकॉर्ड का अवलोकन किया। रिकॉर्ड का अवलोकन करने क े बाद, हमारा विचार है कि इस अपील को अनुमति दी जानी चाहिए और कानून क े अनुसार गुण-दोष क े आधार पर राज्य की दूसरी अपील पर नए सिरे से निर्णय लेने क े लिए मामले को उच्च न्यायालय में प्रतिप्रेषित किया जाना चाहिए।

8. गुणदोष क े आधार पर दूसरी अपील पर नए सिरे से निर्णय करने क े लिए मामले को उच्च न्यायालय को प्रतिप्रेषित करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है क्योंकि हम पाते हैं कि उच्च न्यायालय ने अपील को खारिज करते समय कोई कारण नहीं दिया और न ही तथ्यों या कानून क े आधार पर मामले पर चर्चा की। यह आक्षेपित आदेश से स्पष्ट है, जो नीचे पुनः प्रस्तुत किया गया हैः "मैंने अपीलकर्ता-प्रतिवादियों क े विद्वान अधिवक्ता को सुना है और नीचे क े दोनों न्यायालयों क े आक्षेपित निर्णयों को भी पढ़ा है। मैं पाता हूं कि निचली अदालतें पक्षकारों क े नेतृत्व में साक्ष्य क े उचित मूल्यांकन क े बाद निष्कर्ष पर पहुंची हैं। निचले न्यायालयों क े निष्कर्षों में कोई कमजोरी नहीं है। इसलिए, इस दूसरी अपील में कानून का कोई ठोस प्रश्न सम्मिलित नहीं है इसलिए, यह दूसरी अपील खारिज की जाती है।"

9. हमारी सुविचारित राय में और जैसा कि ऊपर उद्धृत आदेश क े क े वल अवलोकन से स्पष्ट होगा, उच्च न्यायालय ने मामले में उत्पन्न होने वाले किसी भी मुद्दे पर चर्चा नहीं की, न ही अपीलकर्ता (राज्य) द्वारा आग्रह किए गए किसी भी प्रस्तुतियों पर विचार किया, यह दिखाने क े लिए कि क ै से और किस आधार पर दूसरी अपील में आक्षेपित निष्कर्ष कानून क े लिहाज से गलत थे और क्यों अपील में कानून का कोई सारभूत प्रश्न शामिल नहीं था।

10. यह न्यायालय दूसरी अपील क े निपटान में उच्च न्यायालय क े इस तरह क े आकस्मिक दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं कर सकता है, जो मामले में उत्पन्न किसी भी मुद्दे (ओं) का निर्णय नहीं करता है। 11 हमारे विचार में, यहां तक कि विचारण न्यायालय और प्रथम अपील न्यायालय क े निर्णयों क े सरसरी पठन से भी यह दर्शित होता है कि दूसरी अपील में विधि क े सारवान प्रश्न अंतर्वलित हैं और इसलिए, दूसरी अपील को उसक े अंतिम निपटान क े लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (जिसे इसमें इसक े पश्चात् 'संहिता' कहा गया है) की खंड 100 क े अधीन मामले में उत्पन्न विधि क े उचित सारवान प्रश्न विरचित करक े अंतिम सुनवाई क े लिए ग्रहण किया जाना चाहिए था। 12 जैसा कि मामले क े अभिलेख से स्पष्ट है, दूसरी अपील में शामिल विवाद राज्य की भूमि से संबंधित है। प्रश्नगत भूमि पर स्वामित्व और कब्जे से संबंधित प्रश्न अंतर्ग्रस्त है। उच्च न्यायालय ने यह पता लगाने की दृष्टि से कि भूमि का मालिक कौन है और उसक े कब्जे में कौन है, क्या अभियोक्ता, जैसा कि दावा किया गया है, राज्य क े अधिकारों का अपवर्जन करक े मुकदमा भूमि पर अपना हक साबित करने में समर्थ था और, यदि हां, तो किस आधार पर और यदि साबित होता है कि उसका कब्जा कानूनी है या नहीं, आदि पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है।इसका निर्णय मामले, अभिवचनों और साक्ष्य पर लागू कानूनी सिद्धांत क े आलोक में किया जाना चाहिए था।

13. इन्हीं कारणों से हमारा विचार है कि मामले में उत्पन्न होने वाले ऐसे सभी प्रश्नों पर नए सिरे से द्वितीय अपील का विनिश्चय करने क े लिए मामले को उच्च न्यायालय को प्रतिप्रेषित किए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि उसका विधि क े अनुसार विनिश्चय नहीं किया गया है।

14. पूर्वगामी चर्चा को ध्यान में रखते हुए, यह अपील स्वीकार की जाती है और आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया जाता है। मामले को गुण-दोष क े आधार पर नए सिरे से दूसरी अपील संख्या 186/2007 तय करने क े लिए उच्च न्यायालय क े पास भेजा जाता है।

15. उच्च न्यायालय संहिता की खंड 100 क े अधीन अपेक्षित रूप में मामले में उत्पन्न विधि क े समुचित सारभूत प्रश्न (ओं) की विरचना करक े और तत्पश्चात् प्रतिवादी (वादी) को विरचित विधि क े सारभूत प्रश्न की एक प्रति क े साथ अपील का नोटिस जारी करने क े पश्चात् विधि क े अनुसार विरचित प्रश्नों का उत्तर देकर गुणागुण क े आधार पर दूसरी अपील का विनिश्चय करेगा। 16 तथापि, हम यह स्पष्ट करते हैं कि हमने मामले को उच्च न्यायालय को प्रतिप्रेषित करने क े लिए एक राय बनाने क े बाद विवाद क े गुण-दोष पर अपना ध्यान नहीं लगाया है। इसलिए उच्च न्यायालय हमारी किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना दूसरी अपील का निर्णय करेगा।

17. चूंकि अपील काफी पुरानी है, हम उच्च न्यायालय से अपील पर यथासंभव शीघ्र निर्णय लेने का अनुरोध करते हैं। 18 चूंकि इस अपील में किसी भी पक्ष की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ, हम उच्च न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि वह दूसरी अपील में अपनी उपस्थिति क े लिए पक्षकारों नोटिस जारी करना करे ताकि उच्च न्यायालय उपरोक्त निर्देश क े अनुसार अपील का अंतिम रूप से निपटान कर सक े । अभय मनोहर सप्रे, न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा, न्यायाधीश नई दिल्ली: 07 जनवरी, 2019 यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास' क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय पक्षकार को उसकी भाषा में समझाने क े सीमित उपयोग क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से भी अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।